राजविद्याराजगुह्ययोग
अष्टमे नाडीद्वारेण धारणायोगः सगुण उक्तः। तस्य च फलम् अग्न्यर्चिरादिक्रमेण कालान्तरे ब्रह्मप्राप्तिलक्षणम् एव अनावृत्तिरूपं निर्दिष्टम्।
तत्र अनेन एव प्रकारेण मोक्षप्राप्तिफलम् अधिगम्यते न अन्यथा इति तदाशङ्का-व्याविवृत्सया—
आठवें अध्यायमें सुषुम्ना नाड़ीद्वारा धारणायोगका अंगोंसहित वर्णन किया है और उसका फल अग्नि, ज्योति आदिकी प्राप्तिके क्रमसे कालान्तरमें ब्रह्म-प्राप्तिरूप और अपुनरावृत्तिरूप दिखलाया गया है।
वहाँ (यह शङ्का होती है कि) क्या इस प्रकार साधन करनेसे ही मोक्षप्राप्तिरूप फल मिलता है अन्य किसी प्रकारसे नहीं मिलता? इस शङ्काको निवृत्त करनेकी इच्छासे श्रीभगवान् बोले—
इदं ब्रह्मज्ञानं वक्ष्यमाणम् उक्तं च पूर्वेषु अध्यायेषु तद् बुद्धौ सन्निधीकृत्य इदम् इति आह। तु शब्दो विशेषनिर्धारणार्थः।
इदम् एव सम्यग्ज्ञानं साक्षाद् मोक्षप्राप्तिसाधनम् “वासुदेवः सर्वमिति” “आत्मैवेदं सर्वम्” (बृह0 उ0 2। 4। 6) “एकमेवाद्वितीयम्” (छा0 उ0 6। 2। 1) इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः। न अन्यत्।
“अथ येऽन्यथातो विदुरन्यराजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति” इत्यादिश्रुतिभ्यः च।
ते तुभ्यं गुह्यतमं गोप्यतमं प्रवक्ष्यामि कथयिष्यामि अनसूयवे असूयारहिताय।
किं तत्, ज्ञानम्, किंविशिष्टं विज्ञानसहितम् अनुभवयुक्तम्।
यद् ज्ञानं ज्ञात्वा प्राप्य मोक्ष्यसे अशुभात् संसारबन्धनात्॥ 1॥
जो ब्रह्मज्ञान आगे कहा जायगा और जो कि पूर्वके अध्यायोंमें भी कहा जा चुका है, उसको बुद्धिके सामने रखकर यहाँ “इदम्” शब्दका प्रयोग किया है। “तु” शब्द अन्यान्य ज्ञानोंसे इसे अलग करके विशेषतासे लक्ष्य करानेके लिये है।
यही यथार्थ ज्ञान साक्षात् मोक्षप्राप्तिका साधन है। जो कि “सब कुछ वासुदेव ही है” “आत्मा ही यह समस्त जगत् है” “ब्रह्म अद्वितीय एक ही है” इत्यादि श्रुति-स्मृतियोंसे दिखलाया गया है, (इसके अतिरिक्त) और कोई (मोक्षका साधन) नहीं है।
“जो इससे विपरीत जानते हैं वे अपनेसे भिन्न अपना स्वामी माननेवाले मनुष्य विनाशशील लोकोंको प्राप्त होते हैं” इत्यादि श्रुतियोंसे भी यही सिद्ध होता है।
तुझ असूयारहित भक्तसे मैं यह अति गोपनीय विषय कहूँगा।
वह क्या है? ज्ञान। कैसा ज्ञान? विज्ञानसहित अर्थात् अनुभवसहित ज्ञान।
जिस ज्ञानको जानकर अर्थात् पाकर तू संसाररूप बन्धनसे मुक्त हो जायगा॥ 1॥
तत् च—
वह ज्ञान—
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राजविद्या विद्यानां राजा दीप्त्यतिशयत्वात् दीप्यते हि इयम् अतिशयेन ब्रह्मविद्या सर्वविद्यानाम्।
तथा राजगुह्यं गुह्यानां राजा। पवित्रम् पावनम् इदम् उत्तमं सर्वेषां पावनानां शुद्धिकारणम् इदं ब्रह्मज्ञानम् उत्कृष्टतमम्। अनेकजन्मसहस्त्रसञ्चितम् अपि धर्माधर्मादि समूलं कर्म क्षणमात्राद् भस्मीकरोति यतः अतः किं तस्य पावनत्वं वक्तव्यम्।
किं च प्रत्यक्षावगमं प्रत्यक्षेण सुखादेः इव अवगमो यस्य तत् प्रत्यक्षावगमम्।
अनेकगुणवतः अपि धर्मविरुद्धत्वं दृष्टं न तथा आत्मज्ञानं धर्मविरोधि किन्तु धर्म्यं धर्माद् अनपेतम्।
एवम् अपि स्याद् दुःसम्पाद्यम् इति अत आह सुसुखं कर्तुं यथा रत्नविवेकविज्ञानम्।
तत्र अल्पायासानां कर्मणां सुखसम्पाद्यानाम् अल्पफलत्वं दुष्कराणां च महाफलत्वं दृष्टम् इति इदं तु सुखसम्पाद्यत्वात् फलक्षयाद् व्येति इति प्राप्तम् अत आह—
अव्ययं न अस्य फलतः कर्मवद् व्ययः अस्ति इति अव्ययम् अतः श्रद्धेयम् आत्म-ज्ञानम्॥ 2॥
अतिशय प्रकाशयुक्त होनेके कारण समस्त विद्याओंका राजा है। ब्रह्मविद्या सब विद्याओंमें अतिशय देदीप्यमान है यह प्रसिद्ध ही है।
तथा (यह ज्ञान) समस्त गुप्त रखनेयोग्य भावोंका भी राजा है। एवं यह बड़ा पवित्र और उत्तम भी है, अर्थात् सम्पूर्ण पवित्र करनेवालोंको पवित्र करनेवाला यह ब्रह्मज्ञान सबसे उत्कृष्ट है। जो अनेक सहस्त्र जन्मोंमें इकट्ठे हुए पुण्य-पापादि कर्मोंको क्षणमात्रमें मूलसहित भस्म कर देता है उसकी पवित्रताका क्या कहना है?
साथ ही यह ज्ञान प्रत्यक्ष अनुभवमें आनेवाला है, अर्थात् सुख आदिकी भाँति जिसका प्रत्यक्ष अनुभव हो सके, ऐसा है।
अनेक गुणोंसे युक्त वस्तुका भी धर्मसे विरोध देखा जाता है, परंतु आत्मज्ञान उनकी तरह धर्मविरोधी नहीं है बल्कि धर्म्य—धर्ममय है अर्थात् धर्मसे युक्त है।
ऐसा पदार्थ भी दुःसम्पाद्य (प्राप्त करनेमें बड़ा कठिन) हो सकता है। इसलिये कहते हैं कि वह ज्ञान रत्नोंके विवेक-विज्ञानकी भाँति समझनेमें बड़ा सुगम है।
परंतु संसारमें अल्प परिश्रमसे सुखपूर्वक सम्पन्न होनेवाले कर्मोंका अल्प फल और कठिनतासे सम्पन्न होनेवाले कर्मोंका महान् फल देखा गया है, अतः यह ज्ञान भी सुगमतासे सम्पन्न होनेवाला होनेके कारण अपने फलका क्षय होनेपर क्षीण हो जायगा, ऐसी शङ्का प्राप्त होनेपर कहते हैं—
यह ज्ञान अव्यय है अर्थात् कर्मोंकी भाँति फलनाशके द्वारा इसका नाश नहीं होता। अतः यह आत्मज्ञान श्रद्धा करने योग्य है॥ 2॥
ये पुनः—
परंतु जो—
अश्रद्दधानाः श्रद्धाविरहिता आत्मज्ञानस्य धर्मस्य अस्य स्वरूपे तत्फले च नास्तिकाः पापकारिणः असुराणाम् उपनिषदं देहमात्रात्म-दर्शनम् एव प्रतिपन्ना असुतृपः पुरुषाः परन्तप अप्राप्य मां परमेश्वरं मत्प्राप्तौ न एव आशङ्का इति मत्प्राप्तिमार्गसाधनभेदभक्तिमात्रम् अपि अप्राप्य इत्यर्थः। निवर्तन्ते निश्चयेन आवर्तन्ते।
क्व, मृत्युसंसारवर्त्मनि मृत्युयुक्तः संसारो मृत्युसंसारः तस्य वर्त्म नरकतिर्यगादिप्राप्तिमार्गः तस्मिन् एव वर्तन्त इत्यर्थः॥ 3॥
इस आत्मज्ञानरूप धर्मकी श्रद्धासे रहित हैं, अर्थात् इसके स्वरूपमें और फलमें आस्तिकभावसे रहित हैं—नास्तिक हैं वे असुरोंके सिद्धान्तोंका अनुवर्तन करनेवाले देहमात्रको ही आत्मा समझनेवाले एवं पापकर्म करनेवाले इन्द्रियलोलुप मनुष्य, हे परंतप! मुझ परमेश्वरको प्राप्त न होकर—मेरी प्राप्तिकी तो उनके लिये आशङ्का भी नहीं हो सकती, मेरी प्राप्तिके मार्गकी साधनरूप भेदभक्तिको भी प्राप्त न होकर निश्चय ही घूमते रहते हैं।
कहाँ घूमते रहते हैं? मृत्युयुक्त संसारके मार्गमें, अर्थात् जो संसार मृत्युयुक्त है उस मृत्युसंसारके नरक और पशु-पक्षी आदि योनियोंकी प्राप्तिरूप मार्गमें वे बारम्बार घूमते रहते हैं॥ 3॥
स्तुत्या अर्जुनम् अभिमुखीकृत्य आह—
इस प्रकार ज्ञानकी प्रशंसाद्वारा अर्जुनको सम्मुख करके कहते हैं—
मया मम यः परो भावः तेन ततं व्याप्तं सर्वम् इदं जगद् अव्यक्तमूर्तिना न व्यक्ता मूर्तिः स्वरूपं यस्य मम सः अहम् अव्यक्तमूर्तिः तेन मया अव्यक्तमूर्तिना करणागोचरस्वरूपेण इत्यर्थः।
तस्मिन् मयि अव्यक्तमूर्तौ स्थितानि मत्स्थानि सर्वभूतानि ब्रह्मादीनि स्तम्बपर्यन्तानि।
न हि निरात्मकं किञ्चिद् भूतं व्यवहाराय अवकल्पते अतो मत्स्थानि मया आत्मना आत्मवत्त्वेन स्थितानि अतो मयि स्थितानि इति उच्यन्ते।
तेषां भूतानाम् अहम् एव आत्मा इति अतः तेषु स्थित इति मूढबुद्धीनाम् अवभासते। अतः ब्रवीमि न च अहं तेषु भूतेषु अवस्थितः, मूर्तवत् संश्लेषाभावेन आकाशस्य अपि अन्तरतमो हि अहम्। न हि असंसर्गि वस्तु क्वचिद् आधेयभावेन अवस्थितं भवति॥ 4॥
मुझ अव्यक्तरूप परमात्माद्वारा अर्थात् मेरा जो परमभाव है, जिसका स्वरूप प्रत्यक्ष नहीं है यानी मन, बुद्धि और इन्द्रियोंका विषय नहीं है, ऐसे मुझ अव्यक्तमूर्तिद्वारा यह समस्त जगत् व्याप्त है— परिपूर्ण है।
उस अव्यक्तस्वरूप मुझ परमात्मामें ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त समस्त प्राणी स्थित हैं।
क्योंकि कोई भी निर्जीव प्राणी व्यवहारके योग्य नहीं समझा जाता। अतः वे सब मुझमें स्थित हैं अर्थात् मुझ परमात्मासे ही आत्मवान् हो रहे हैं, इसलिये मुझमें स्थित कहे जाते हैं।
उन भूतोंका वास्तविक स्वरूप मैं ही हूँ इसलिये अज्ञानियोंको ऐसी प्रतीति होती है कि मैं उनमें स्थित हूँ, अतः कहता हूँ कि मैं उन भूतोंमें स्थित नहीं हूँ। क्योंकि साकार वस्तुओंकी भाँति मुझमें संसर्गदोष नहीं है। इसलिये मैं बिना संसर्गके सूक्ष्मभावसे आकाशके भी अन्तर्व्यापी हूँ। सङ्गहीन वस्तु कहीं भी आधेयभावसे स्थित नहीं होती, यह प्रसिद्ध है॥ 4॥
अत एव असंसर्गित्वाद् मम—
मैं असंसर्गी हूँ इसलिये—
न च मत्स्थानि भूतानि ब्रह्मादीनि पश्य मे योगं युक्तिं घटनं मे मम ऐश्वरम् ईश्वरस्य इमम् ऐश्वरं योगम् आत्मनो याथात्म्यम् इत्यर्थः।
तथा च श्रुतिः असंसर्गित्वाद् असङ्गतां दर्शयति “असङ्गो न हि सज्जते” (बृह0 उ0 3। 9। 26) इति।
इदं च आश्चर्यम् अन्यत् पश्य भूतभृद् असङ्गः अपि सन् भूतानि बिभर्ति न च भूतस्थो यथोक्तेन न्यायेन दर्शितत्वाद् भूतस्थत्वा-नुपपत्तेः।
कथं पुनः उच्यते असौ मम आत्मा इति,
विभज्य देहादिसङ्घातं तस्मिन् अहङ्कारम् अध्यारोप्य लोकबुद्धिम् अनुसरन् व्यपदिशति मम आत्मा इति, न पुनः आत्मन आत्मा अन्य इति लोकवद् अजानन्।
तथा भूतभावनो भूतानि भावयति उत्पादयति वर्धयति इति वा भूतभावनः॥ 5॥
(वास्तवमें) ब्रह्मादि सब प्राणी भी मुझमें स्थित नहीं हैं, तू मेरे इस ईश्वरीय योग—युक्ति—घटनाको देख, अर्थात् मुझ ईश्वरके योगको यानी यथार्थ आत्मतत्त्वको समझ।
“संसर्गरहित आत्मा कहीं भी लिप्त नहीं होता” यह श्रुति भी संसर्गरहित होनेके कारण (आत्माकी) निर्लेपता दिखलाती है।
यह और भी आश्चर्य देख कि भूतभावन मेरा आत्मा संसर्गरहित होकर भी भूतोंका भरण-पोषण करता रहता है परंतु भूतोंमें स्थित नहीं है। क्योंकि परमात्माका भूतोंमें स्थित होना सम्भव नहीं, यह बात उपर्युक्त न्यायसे स्पष्ट दिखलाया जा चुका है।
पू0—(जब कि आत्मा अपनेसे कोई अन्य वस्तु ही नहीं है) तो “मेरा आत्मा” यह कैसे कहा जाता है?
उ0—लौकिक बुद्धिका अनुकरण करते हुए देहादि संघातको आत्मासे अलग करके फिर उसमें अहंकारका अध्यारोप करके “मेरा आत्मा” ऐसा कहते हैं, आत्मा अपने-आपसे भिन्न है ऐसा समझकर लोगोंकी भाँति अज्ञानपूर्वक ऐसा नहीं कहते।
जो भूतोंको प्रकट करता है—उत्पन्न करता है या बढ़ाता है उसको भूतभावन कहते हैं॥ 5॥
यथोक्तेन श्लोकद्वयेन उक्तम् अर्थं दृष्टान्तेन उपपादयन् आह—
उपर्युक्त दो श्लोकोंद्वारा कहे हुए अर्थको दृष्टान्तसे सिद्ध करते हुए कहते हैं—
यथा लोके आकाशस्थित आकाशे स्थितो नित्यं सदा वायुः सर्वत्र गच्छति इति सर्वत्रगो महान् परिमाणतः तथा आकाशवत् सर्वगते मयि असंश्लेषेण एव स्थितानि इति एवम् उपधारय जानीहि॥ 6॥
लोकमें जैसे (यह प्रसिद्ध है कि) सब जगह विचरनेवाला परिमाणमें अति महान् वायु सदा आकाशमें ही स्थित है, वैसे ही आकाशके समान सर्वत्र परिपूर्ण मुझ परमात्मामें समस्त भूत निर्लिप्तभावसे स्थित हैं, ऐसा तू जान॥ 6॥
एवं वायुः आकाशे इव मयि स्थितानि सर्वभूतानि स्थितिकाले तानि—
इस प्रकार जगत्के स्थितिकालमें, आकाशमें वायुकी भाँति, मुझमें स्थित जो समस्त भूत हैं वे—
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं त्रिगुणात्मिकाम् अपरां निकृष्टां यान्ति मामिकां मदीयां कल्पक्षये प्रलयकाले। पुनः भूयः तानि भूतानि उत्पत्ति-काले कल्पादौ विसृजामि उत्पादयामि अहं पूर्ववत्॥ 7॥
सम्पूर्ण प्राणी, हे कुन्तीपुत्र! प्रलयकालमें मेरी त्रिगुणमयी—अपरा-निकृष्ट प्रकृतिको प्राप्त हो जाते हैं और फिर कल्पके आदिमें अर्थात् उत्पत्तिकालमें मैं पहलेकी भाँति पुनः उन प्राणियोंको रचता हूँ—उत्पन्न करता हूँ॥ 7॥
एवं अविद्यालक्षणाम्—
इस प्रकार अविद्यारूप—
प्रकृतिं स्वां स्वीयाम् अवष्टभ्य वशीकृत्य विसृजामि पुनः पुनः प्रकृतितो जातं भूतग्रामं भूतसमुदायम् इमं वर्तमानं कृत्स्नं समग्रम् अवशम् अस्वतन्त्रम् अविद्यादिदोषैः परवशीकृतं प्रकृतेः वशात् स्वभाववशात्॥ 8॥
अपनी प्रकृतिको वशमें करके, मैं प्रकृतिसे उत्पन्न हुए इस विद्यमान समग्र अस्वतन्त्र भूतसमुदायको, जो कि स्वभाववश अविद्यादि दोषोंसे परवश हो रहा है, बारम्बार रचता हूँ॥ 8॥
तर्हि तस्य ते परमेश्वरस्य भूतग्रामं विषमं विदधतः तन्निमित्ताभ्यां धर्माधर्माभ्यां सम्बन्धः स्याद् इति इदम् आह भगवान्—
तब तो भूतसमुदायको विषम रचनेवाले आप परमेश्वरका उस विषम रचनाजनित पुण्य-पापसे भी सम्बन्ध होता ही होगा? ऐसी शङ्का होनेपर भगवान् ये वचन बोले—
न च माम् ईशं तानि भूतग्रामस्य विषम-विसर्गनिमित्तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय।
तत्र कर्मणाम् असंबद्धत्वे कारणम् आह—
उदासीनवद् आसीनं यथा उदासीन उपेक्षकः कश्चित् तद्वद् आसीनम् आत्मनः अविक्रियत्वात् असक्तं फलासङ्गरहितम् अभिमानवर्जितम् अहं करोमि इति तेषु कर्मसु।
अतः अन्यस्य अपि कर्तृत्वाभिमानाभावः फलासङ्गाभावः च अबन्धकारणम् अन्यथा कर्मभिः बध्यते मूढः कोशकारवद् इति अभिप्रायः॥ 9॥
हे धनंजय! भूतसमुदायकी विषम रचनानिमित्तक वे कर्म, मुझ ईश्वरको बन्धनमें नहीं डालते।
उन कर्मोंका सम्बन्ध न होनेमें कारण बतलाते हैं—
मैं उन कर्मोंमें उदासीनकी भाँति स्थित रहता हूँ अर्थात् आत्मा निर्विकार है, इसलिये जैसे कोई उदासीन—उपेक्षा करनेवाला स्थित हो उसीकी भाँति मैं स्थित रहता हूँ। तथा उन कर्मोंमें फलसम्बन्धी आसक्तिसे और “मैं करता हूँ” इस अभिमानसे भी मैं रहित हूँ (इस कारण वे कर्म मुझे नहीं बाँधते)।
इससे यह अभिप्राय समझ लेना चाहिये कि कर्तापनके अभिमानका अभाव और फलसम्बन्धी आसक्तिका अभाव दूसरोंको भी बन्धनरहित कर देनेवाला है। इसके सिवा अन्य प्रकारसे किये हुए कर्मोंद्वारा मूर्खलोग कोशकार (रेशमके कीड़े)-की भाँति बन्धनमें पड़ते हैं॥ 9॥
तत्र भूतग्रामम् इमं विसृजामि उदासीनवद् आसीनम् इति च विरुद्धम् उच्यते इति तत्परिहारार्थम् आह—
यहाँ यह शङ्का होती है कि “इस भूतसमुदायको मैं रचता हूँ, तथा मैं उदासीनकी भाँति स्थित रहता हूँ” यह कहना परस्पर विरुद्ध है। इस शङ्काको दूर करनेके लिये कहते हैं—
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मया सर्वतो दृशिमात्रस्वरूपेण अविक्रिया-त्मना अध्यक्षेण मम माया त्रिगुणात्मिका अविद्यालक्षणा प्रकृतिः सूयते उत्पादयति सचराचरं जगत्।
तथा च मन्त्रवर्णः—“एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा। कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च॥” (श्वे0 उ0 6। 11) इति।
हेतुना निमित्तेन अनेन अध्यक्षत्वेन कौन्तेय जगत् सचराचरं व्यक्ताव्यक्तात्मकं विपरिवर्तते सर्वासु अवस्थासु।
दृशिकर्मत्वापत्तिनिमित्ता हि जगतः सर्वा प्रवृत्तिः अहम् इदं भोक्ष्ये पश्यामि इदं शृणोमि इदं सुखम् अनुभवामि दुःखम् अनुभवामि तदर्थम् इदं करिष्यामि एतदर्थम् इदं करिष्ये इदं ज्ञास्यामि इत्याद्या अवगतिनिष्ठा अवगत्यवसाना एव।
“यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्” (तै0 ब्रा0 2। 8। 9) इत्यादयः च मन्त्रा एतम् अर्थं दर्शयन्ति।
ततः च एकस्य देवस्य सर्वाध्यक्षभूत-चैतन्यमात्रस्य परमार्थतः सर्वभोगानभिसम्बन्धिनः अन्यस्य चेतनान्तरस्य अभावे भोक्तुः अन्यस्य अभावात् किन्निमित्ता इयं सृष्टिः इति अत्र प्रश्नप्रतिवचने अनुपपन्ने।
“को अद्धा वेद क इह प्रवोचत् कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः” (तै0 ब्रा0 2। 8। 9) इत्यादिमन्त्रवर्णेभ्यः।
दर्शितं च भगवता “अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः” इति॥ 10॥
सब ओरसे द्रष्टामात्र ही जिसका स्वरूप है ऐसे निर्विकारस्वरूप मुझ अधिष्ठातासे (प्रेरित होकर) अविद्यारूप मेरी त्रिगुणमयी माया—प्रकृति समस्त चराचर जगत्को उत्पन्न किया करती है।
वेद-मन्त्र भी यही बात कहते हैं कि “समस्त भूतोंमें अदृश्यभावसे रहनेवाला एक ही देव है जो कि सर्वव्यापी और सम्पूर्ण भूतोंका अन्तरात्मा तथा कर्मोंका स्वामी, समस्त भूतोंका आधार, साक्षी, चेतन, शुद्ध और निर्गुण है।”
हे कुन्तीपुत्र! इसी कारणसे अर्थात् मैं इसका अध्यक्ष हूँ इसीलिये चराचरसहित साकार-निराकाररूप समस्त जगत् सब अवस्थाओंमें परिवर्तित होता रहता है,
क्योंकि जगत्की समस्त प्रवृत्तियाँ साक्षी-चेतनके ज्ञानका विषय बननेके लिये ही हैं। मैं यह खाऊँगा, यह देखता हूँ, यह सुनता हूँ, अमुक सुखका अनुभव करता हूँ, दुःख अनुभव करता हूँ, उसके लिये अमुक कार्य करूँगा, इसके लिये अमुक कार्य करूँगा, अमुक वस्तुको जानूँगा इत्यादि जगत्की समस्त प्रवृत्तियाँ ज्ञानाधीन और ज्ञानमें ही लय हो जानेवाली हैं।
“जो इस जगत्का अध्यक्ष साक्षी चेतन है वह परम हृदयाकाशमें स्थित है” इत्यादि मन्त्र भी यही अर्थ दिखला रहे हैं।
जब कि सबका अध्यक्षरूप चैतन्यमात्र एक देव वास्तवमें समस्त भोगोंके सम्बन्धसे रहित है और उसके सिवा अन्य चेतन न होनेके कारण दूसरे भोक्ताका अभाव है तो यह सृष्टि किसके लिये है? इस प्रकारका प्रश्न और उसका उत्तर—यह दोनों ही नहीं बन सकते (अर्थात् यह विषय अनिर्वचनीय है)।
“(इसको) साक्षात् कौन जानता है—इस विषयमें कौन कह सकता है? यह जगत् कहाँसे आया? किस कारण यह रचना हुई?” इत्यादि मन्त्रोंसे (यही बात कही गयी है)।
इसके सिवा भगवान्ने भी कहा है कि “अज्ञानसे ज्ञान आवृत हो रहा है इसलिये समस्त जीव मोहित हो रहे हैं”॥ 10॥
एवं मां नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावं सर्वजन्तूनाम् आत्मानम् अपि सन्तम्—
इस प्रकार मैं यद्यपि नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव तथा सभी प्राणियोंका आत्मा हूँ तो भी—
अवजानन्ति अवज्ञां परिभवं कुर्वन्ति मां मूढा अविवेकिनो मानुषीं मनुष्यसम्बन्धिनीं तनुं देहम् आश्रितं मनुष्यदेहेन व्यवहरन्तम् इति एतत्। परं प्रकृष्टं भावं परमात्मतत्त्वम् आकाशकल्पम् आकाशाद् अपि अन्तरतमम् अजानन्तो मम भूतमहेश्वरं सर्वभूतानां महान्तम् ईश्वरं स्वम् आत्मानम्।
ततः च तस्य मम अवज्ञानभावनेन आहता वराकाः ते॥ 11॥
मूढ़—अविवेकी लोग मेरे सर्व लोकोंके महान् ईश्वररूप परमभावको अर्थात् सबका अपना आत्मारूप मैं परमात्मा सब प्राणियोंका महान् ईश्वर हूँ एवं आकाशकी भाँति बल्कि आकाशकी अपेक्षा भी सूक्ष्मतर भावसे व्यापक हूँ—इस परम परमात्मतत्त्वको न जाननेके कारण मुझ मनुष्यदेहधारी परमात्माको तुच्छ समझते हैं अर्थात् मनुष्यरूपसे लीला करते हुए मुझ परमात्माकी अवज्ञा—अनादर करते हैं।
इसलिये मुझ परमात्माके निरादरकी भावनासे वे पामर जीव (व्यर्थ) मारे हुए पड़े हैं॥ 11॥
कथम्—
क्योंकि—
मोघाशा वृथा आशा आशिषो येषां ते मोघाशाः। तथा मोघकर्माणो यानि च अग्निहोत्रादीनि तैः अनुष्ठीयमानानि कर्माणि तानि च तेषां भगवत्परिभवात् स्वात्मभूतस्य अवज्ञानाद् मोघानि एव निष्फलानि कर्माणि भवन्ति इति मोघकर्माणः।
तथा मोघज्ञाना निष्फलज्ञाना ज्ञानम् अपि तेषां निष्फलम् एव स्यात्। विचेतसो विगत-विवेकाः च ते भवन्ति इति अभिप्रायः।
किं च ते भवन्ति राक्षसीं रक्षसां प्रकृतिं स्वभावम् आसुरीम् असुराणां च प्रकृतिं मोहिनीं मोहकरीं देहात्मवादिनीं श्रिता आश्रिताः छिन्धि भिन्धि पिब खाद परस्वम् अपहर इति एवं वदनशीलाः क्रूरकर्माणो भवन्ति इत्यर्थः। “असुर्या नाम ते लोकाः” (ई0 उ0 3) इति श्रुतेः॥ 12॥
वे मोघाशा—जिनकी आशाएँ—कामनाएँ व्यर्थ हों ऐसे व्यर्थ कामना करनेवाले और मोघकर्मा—व्यर्थ कर्म
करनेवाले
होते
हैं;
क्योंकि
उनके द्वारा जो कुछ अग्निहोत्रादि कर्म किये जाते हैं वे सब अपने अन्तरात्मारूप भगवान्का अनादर करनेके कारण निष्फल हो जाते हैं। इसलिये वे मोघकर्मा होते हैं।
इसके अतिरिक्त वे मोघज्ञानी—निष्फल ज्ञानवाले होते हैं, अर्थात् उनका ज्ञान भी निष्फल ही होता है। और वे विचेता अर्थात् विवेकहीन भी होते हैं।
तथा वे मोह उत्पन्न करनेवाली देहात्मवादिनी राक्षसी और आसुरी प्रकृतिका यानी राक्षसोंके और असुरोंके स्वभावका आश्रय करनेवाले हो जाते हैं। अभिप्राय यह कि तोड़ो, फोड़ो, पिओ, खाओ, दूसरोंका धन लूट लो इत्यादि वचन बोलनेवाले और बड़े क्रूरकर्मा हो जाते हैं। श्रुति भी कहती है कि “वे असुरोंके रहने योग्य लोक प्रकाशहीन हैं” इत्यादि॥ 12॥
ये पुनः श्रद्दधाना भगवद्भक्तिलक्षणे मोक्ष-मार्गे प्रवृत्ताः—
परंतु जो श्रद्धायुक्त हैं और भगवद्भक्तिरूप मोक्षमार्गमें लगे हुए हैं वे—
महात्मानः तु अक्षुद्रचित्ता माम् ईश्वरं पार्थ दैवीं देवानां प्रकृतिं शमदमदयाश्रद्धादिलक्षणाम् आश्रिताः सन्तः, भजन्ति सेवन्ते अनन्यमनसः अनन्यचित्ता ज्ञात्वा भूतादिं भूतानां वियदादीनां प्राणिनां च आदिं कारणम् अव्ययम्॥ 13॥
हे पार्थ! शम, दम, दया, श्रद्धा आदि सद्गुणरूप देवोंके स्वभावका अवलम्बन करनेवाले उदारचित्त महात्मा भक्तजन, मुझ ईश्वरको सब भूतोंका अर्थात् आकाशादि पञ्चभूतोंका और समस्त प्राणियोंका भी आदिकारण जानकर एवं अविनाशी समझकर, अनन्य मनसे युक्त हुए भजते हैं अर्थात् मेरा चिन्तन किया करते हैं॥ 13॥
कथम्—
किस प्रकार भजते हैं—
सततं सर्वदा भगवन्तं ब्रह्मस्वरूपं मां कीर्त-यन्तो यतन्तः च इन्द्रियोपसंहारशमदमदया-हिंसादिलक्षणैः धर्मैः प्रयतन्तः च दृढव्रता दृढं स्थिरम् अचाञ्चल्यं व्रतं येषां ते दृढव्रताः, नमस्यन्तः च मां हृदयेशयम् आत्मानं भक्त्या नित्ययुक्ताः सन्त उपासते सेवन्ते॥ 14॥
वे दृढ़व्रती भक्त अर्थात् जिनका निश्चय दृढ़—स्थिर— अचल है ऐसे वे भक्तजन सदा—निरन्तर ब्रह्मस्वरूप मुझ भगवान्का कीर्तन करते हुए तथा इन्द्रिय-निग्रह, शम, दम, दया और अहिंसा आदि धर्मोंसे युक्त होकर प्रयत्न करते हुए एवं हृदयमें वास करनेवाले मुझ परमात्माको भक्तिपूर्वक नमस्क ार करते हुए और सदा मेरा चिन्तन करनेमें लगे रहकर, मेरी उपासना—सेवा करते रहते हैं॥ 14॥
ते केन केन प्रकारेण उपासते इति उच्यते—
वे किस-किस प्रकारसे उपासना करते हैं सो कहते हैं—
ज्ञानयज्ञेन ज्ञानम् एव भगवद्विषयं यज्ञः तेन ज्ञानयज्ञेन यजन्तः पूजयन्तो माम् ईश्वरं च अपि अन्ये अन्याम् उपासनां परित्यज्य उपासते। तत् च ज्ञानम् एकत्वेन एकम् एव परं ब्रह्म इति परमार्थदर्शनेन यजन्त उपासते।
केचित् च पृथक्त्वेन आदित्यचन्द्रादिभेदेन स एव भगवान् विष्णुः आदित्यादिरूपेण अवस्थित इति उपासते।
केचिद् बहुधा अवस्थितः स एव भगवान् सर्वतोमुखो विश्वतोमुखो विश्वरूप इति, तं विश्वरूपं सर्वतोमुखं बहुधा बहुप्रकारेण उपासते॥ 15॥
कुछ (ज्ञानीजन) दूसरी उपासनाओंको छोड़कर भगवद्विषयक ज्ञानरूप यज्ञसे मेरा पूजन करते हुए उपासना किया करते हैं अर्थात् परमब्रह्म परमात्मा एक ही है, ऐसे एकत्वरूप परमार्थज्ञानसे पूजन करते हुए मेरी उपासना करते हैं।
और कोई-कोई पृथक्भावसे अर्थात् आदित्य, चन्द्रमा आदिके भेदसे इस प्रकार समझकर उपासना करते हैं कि वही भगवान् विष्णु, सूर्य आदिके रूपमें स्थित हुए हैं।
तथा कितने ही भक्त ऐसा समझकर कि वही सब ओर मुखवाले विश्वमूर्ति भगवान् अनेक रूपसे स्थित हो रहे हैं। उन विश्वरूप विराट् भगवान्हीकी विविध प्रकारसे उपासना करते हैं॥ 15॥
यदि बहुभिः प्रकारैः उपासते कथं त्वाम् एव उपासते इति अत आह—
यदि भक्तलोग बहुत प्रकारसे उपासना करते हैं तो आपकी ही उपासना कैसे करते हैं? इसपर कहते हैं—
अहं क्रतुः श्रौतकर्मभेदः अहम् एव अहं यज्ञः स्मार्तः। किं च स्वधा अन्नम् अहं पितृभ्यो यद् दीयते। अहम् औषधं सर्वप्राणिभिः यद् अद्यते तद् औषधशब्दवाच्यम्।
अथवा स्वधा इति सर्वप्राणिसाधारणम् अन्नम् औषधम् इति व्याध्युपशमार्थं भेषजम्।
मन्त्रः अहं येन पितृभ्यो देवताभ्यः च हविः दीयते। अहम् एव आज्यं हविः च अहम् अग्निः यस्मिन् हूयते सः अग्निः अहम् एव अहं हुतं हवनकर्म च॥ 16॥
क्रतु—श्रौतयज्ञविशेष मैं हूँ और यज्ञ—स्मार्त-कर्मविशेष भी मैं ही हूँ। तथा जो पितरोंको दिया जाता है, वह स्वधा नामक अन्न भी मैं ही हूँ। सब प्राणियोंसे जो खायी जाती है, उसका नाम औषध है, वह औषध भी मैं ही हूँ।
अथवा यों समझो कि सब प्राणियोंका साधारण अन्न “स्वधा” है और व्याधिका नाश करनेके लिये काममें ली जानेवाली भेषज “औषध” है।
तथा जिसके द्वारा देव और पितरोंको हवि पहुँचायी जाती है वह मन्त्र भी मैं ही हूँ। इसके अतिरिक्त मैं ही आज्य हवि-घृत हूँ, जिसमें होम किया जाता है वह अग्नि भी मैं ही हूँ और मैं ही हवनरूपकर्म भी हूँ॥ 16॥
किं च—
तथा—
पिता जनयिता अहम् अस्य जगतो माता जनयित्री, धाता कर्मफलस्य प्राणिभ्यो विधाता, पितामहः पितुः पिता, वेद्यं वेदितव्यम्, पवित्रं पावनम्, ओङ्कारः च ऋक्सामयजुः एव च॥ 17॥
मैं ही इस जगत्का उत्पन्न करनेवाला पिता और उसकी जन्मदात्री माता हूँ तथा मैं ही प्राणियोंके कर्मफलका विधान करनेवाला विधाता और पितामह अर्थात् पिताका पिता हूँ; तथा जाननेके योग्य, पवित्र करनेवाला, ओंकार, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद सब कुछ मैं ही हूँ॥ 17॥
किं च—
तथा मैं ही—
गतिः कर्मफलम्, भर्ता पोष्टा, प्रभुः स्वामी, साक्षी प्राणिनां कृताकृतस्य, निवासो यस्मिन् प्राणिनो निवसन्ति, शरणम् आर्तानां प्रपन्नानां आर्तिहरः, सुहृत् प्रत्युपकारानपेक्षः सन् उपकारी, प्रभव उत्पत्तिः जगतः, प्रलयः प्रलीयते यस्मिन् इति।
तथा स्थानं तिष्ठति अस्मिन् इति, निधानं निक्षेपः कालान्तरोपभोग्यं प्राणिनाम्, बीजं प्ररोहकारणं प्ररोहधर्मिणाम्, अव्ययम्।
यावत्संसारभावित्वाद् अव्ययम्। न हि अबीजं किञ्चित् प्ररोहति। नित्यं च प्ररोहदर्शनाद् बीजसन्ततिः न व्येति इति गम्यते॥ 18॥
गति—कर्मफल, भर्ता—सबका पोषण करनेवाला, प्रभु—सबका स्वामी, प्राणियोंके कर्म और अकर्मका साक्षी, जिसमें प्राणी निवास करते हैं वह वासस्थान, शरण अर्थात् शरणमें आये हुए दुःखियोंका दुःख दूर करनेवाला, सुहृत् —प्रत्युपकार न चाहकर उपकार करनेवाला, प्रभव—जगत्की उत्पत्तिका कारण और जिसमें सब लीन हो जाते हैं वह प्रलय भी मैं ही हूँ।
तथा जिसमें सब स्थित होते हैं वह स्थान, प्राणियोंके कालान्तरमें उपभोग करनेयोग्य कर्मोंका भण्डाररूप निधान और अविनाशी बीज भी मैं ही हूँ अर्थात् उत्पत्तिशील वस्तुओंकी उत्पत्तिका अविनाशी कारण मैं ही हूँ।
जबतक संसार है तबतक उसका बीज भी अवश्य रहता है, इसलिये बीजको अविनाशी कहा है; क्योंकि बिना बीजके कुछ भी उत्पन्न नहीं होता और उत्पत्ति नित्य देखी जाती है, इससे यह जाना जाता है कि बीजकी परम्पराका नाश नहीं होता॥ 18॥
किं च—
तथा—
तपामि अहम् आदित्यो भूत्वा कैश्चिद् रश्मिभिः उल्बणैः अहं वर्षं कैश्चिद् रश्मिभिः उत्सृजामि उत्सृज्य पुनः निगृह्णामि कैश्चिद् रश्मिभिः अष्टभिः मासैः पुनः उत्सृजामि प्रावृषि।
अमृतं च एव देवानां मृत्युः च मर्त्यानाम्। सद् यस्य यत् सम्बन्धितया विद्यमानं तद्विपरीतम् असत् च एव अहम् अर्जुन।
न पुनः अत्यन्तम् एव असद् भगवान् स्वयम्। कार्यकारणे वा सदसती।
ये पूर्वोक्तैः अनुवृत्तिप्रकारैः एकत्व-पृथक्त्वादिविज्ञानैः
यज्ञैः
मां
पूजयन्त उपासते ज्ञानविदः ते यथाविज्ञानं माम् एव प्राप्नुवन्ति॥ 19॥
मैं ही सूर्य होकर अपनी कुछ प्रखर रश्मियोंसे सबको तपाता हूँ और कुछ किरणोंसे वर्षा करता हूँ तथा वर्षा कर चुकनेपर फिर कुछ रश्मियोंद्वारा आठ महीनेतक जलका शोषण करता रहता हूँ और वर्षाकाल आनेपर फिर बरसा देता हूँ।
हे अर्जुन! देवोंका अमृत और मर्त्यलोकमें बसनेवालोंकी मृत्यु तथा सत् और असत् सब मैं ही हूँ अर्थात् जो जिसके सम्बन्धसे विद्यमान है वह और जो उसके विपरीत है वह भी मैं ही हूँ।
परंतु (यह ध्यानमें रखना चाहिये कि) स्वयं भगवान् अत्यन्त असत् नहीं हैं। अथवा सत् और असत्का अर्थ यहाँ कार्य और कारण समझना चाहिये।
जो ज्ञानी पहले कहे हुए क्रमानुसार एकत्व-पृथक्त्व आदि विज्ञानरूप यज्ञोंसे पूजन करते हुए मेरी उपासना करते हैं वे अपने विज्ञानानुसार मुझे ही प्राप्त होते हैं॥ 19॥
ये पुनः अज्ञाः कामकामाः—
परंतु जो विषयवासनायुक्त अज्ञानी—
त्रैविद्या ऋग्यजुःसामविदो मां वस्वादिदेव-रूपिणं सोमपाः सोमं पिबन्ति इति सोमपाः तेन एव सोमपानेन पूतपापाः शुद्धकिल्बिषाः, यज्ञैः अग्निष्टोमादिभिः इष्ट्वा पूजयित्वा, स्वर्गतिं स्वर्गगमनम् स्वर्गतिः तां प्रार्थयन्ते। ते च पुण्यं पुण्यफलम् आसाद्य सम्प्राप्य सुरेन्द्रलोकं शतक्रतोः स्थानम् अश्नन्ति भुञ्जते दिव्यान् दिवि भवान् अप्राकृतान् देवभोगान् देवानां भोगाः तान्॥ 20॥
ऋक्, यजु और साम—इन तीनों वेदोंको जानने-वाले, सोमरसका पान करनेवाले और पापरहित हुए अर्थात् सोमरसका पान करनेसे जिनके पाप नष्ट हो गये हैं ऐसे सकाम पुरुष वसु आदि देवोंके रूपमें स्थित मुझ परमात्माका अग्निष्टोमादि यज्ञोंद्वारा पूजन करके स्वर्गप्राप्तिकी इच्छा करते हैं। वे अपने पुण्यके फलस्वरूप इन्द्रके स्थानको पाकर स्वर्गमें देवताओंके दिव्य भोगोंको भोगते हैं अर्थात् देवताओंके जो स्वर्गमें होनेवाले अप्राकृत भोग हैं उनको भोगते हैं॥ 20॥
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं विस्तीर्णं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकम् इमं विशन्ति आविशन्ति।
एवं हि यथोक्तेन प्रकारेण त्रैधर्म्यं केवलं वैदिकं कर्म अनुप्रपन्ना गतागतं गतं च आगतं च गतागतं गमनागमनं कामकामाः कामान् कामयन्ते इति कामकामा लभन्ते गतागतम् एव न तु स्वातन्त्र्यं क्वचिद् लभन्ते इत्यर्थः॥ 21॥
वे उस विशाल—विस्तृत स्वर्गलोकको भोग चुकनेपर (उसकी प्राप्तिके कारणरूप) पुण्योंका क्षय हो जानेपर इस मृत्युलोकमें लौट आते हैं।
उपर्युक्त प्रकारसे केवल वैदिक कर्मोंका आश्रय लेनेवाले कामकामी—विषयवासनायुक्त मनुष्य बारम्बार आवागमनको ही प्राप्त होते रहते हैं अर्थात् जाते हैं और लौट आते हैं; इस प्रकार बराबर आवागमनको ही प्राप्त होते हैं, कहीं भी स्वतन्त्रता लाभ नहीं करते॥ 21॥
ये पुनः निष्कामाः सम्यग्दर्शिनः—
परंतु जो निष्कामी—पूर्ण ज्ञानी हैं—
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अनन्या अपृथग्भूताः परं देवं नारायणम् आत्मत्वेन गताः सन्तः चिन्तयन्तो मां ये जनाः सन्न्यासिनः पर्युपासते, तेषां परमार्थदर्शिनां नित्याभियुक्तानां सतताभियुक्तानां योगक्षेमं योगः अप्राप्तस्य प्रापणं क्षेमः तद्रक्षणं तद् उभयं वहामि प्रापयामि अहम्।
“ज्ञानी तु आत्मा एव मे मतम्” “स च मम प्रियः” यस्मात् तस्मात् ते मम आत्मभूताः प्रियाः च इति।
ननु अन्येषाम् अपि भक्तानां योगक्षेमं वहति एव भगवान्।
सत्यम् एवं वहति एव। किं तु अयं विशेषः अन्ये ये भक्ताः ते स्वात्मार्थं स्वयम् अपि योगक्षेमम् ईहन्ते। अनन्यदर्शिनः तु न आत्मार्थं योगक्षेमम् ईहन्ते न हि ते जीविते मरणे वा आत्मनो गृधिं कुर्वन्ति केवलम् एव भगवच्छरणाः ते। अतो भगवान् एव तेषां योगक्षेमं वहति इति॥ 22॥
जो संन्यासी अनन्यभावसे युक्त हुए अर्थात् परमदेव मुझ नारायणको आत्मरूपसे जानते हुए मेरा निरन्तर चिन्तन करते हुए मेरी श्रेष्ठ—निष्काम उपासना करते हैं, निरन्तर मुझमें ही स्थित उन परमार्थज्ञानियोंका योग-क्षेम मैं चलाता हूँ। अप्राप्त वस्तुकी प्राप्तिका नाम योग है और प्राप्त वस्तुकी रक्षाका नाम क्षेम है, उनके ये दोनों काम मैं स्वयं किया करता हूँ।
क्योंकि “ज्ञानीको तो मैं अपना आत्मा ही मानता हूँ” और “वह मेरा प्यारा है” इसलिये वे उपर्युक्त भक्त मेरे आत्मारूप और प्रिय हैं।
पू0—अन्य भक्तोंका योगक्षेम भी तो भगवान् ही चलाते हैं?
उ0—यह बात ठीक है, अवश्य भगवान् ही चलाते हैं; किंतु उसमें यह भेद है कि जो दूसरे भक्त हैं वे स्वयं भी अपने लिये योगक्षेम-सम्बन्धी चेष्टा करते हैं, पर अनन्यदर्शी भक्त अपने लिये योगक्षेम-सम्बन्धी चेष्टा नहीं करते। क्योंकि वे जीने और मरनेमें भी अपनी वासना नहीं रखते, केवल भगवान् ही उनके अवलम्बन रह जाते हैं। अतः उनका योगक्षेम स्वयं भगवान् ही चलाते हैं॥ 22॥
ननु अन्या अपि देवताः त्वम् एव चेत् तद्भक्ताः च त्वाम् एव यजन्ते सत्यम् एवम्—
यदि कहो कि अन्य देव भी आप ही हैं, अतः उनके भक्त भी आपहीका पूजन करते हैं तो यह बात ठीक है—
ये अपि अन्यदेवताभक्ता अन्यासु देवतासु भक्ता अन्यदेवताभक्ताः सन्तो यजन्ते पूजयन्ते श्रद्धया आस्तिक्यबुद्ध्या अन्विता अनुगताः ते अपि माम् एव कौन्तेय यजन्ति अविधिपूर्वकम् अविधिः अज्ञानं तत्पूर्वकम् अज्ञानपूर्वकं यजन्ते इत्यर्थः॥ 23॥
जो कोई अन्य देवोंके भक्त—अन्य देवताओंमें भक्ति रखनेवाले, श्रद्धासे—आस्तिकबुद्धिसे युक्त हुए (उनका) पूजन करते हैं, हे कुन्तीपुत्र! वे भी मेरा ही पूजन करते हैं (परंतु) अविधिपूर्वक (करते हैं)। अविधि अज्ञानको कहते हैं, सो वे अज्ञानपूर्वक मेरा पूजन करते हैं॥ 23॥
कस्मात् ते अविधिपूर्वकं यजन्ते इति उच्यते यस्मात्—
उनका पूजन करना अविधिपूर्वक कैसे है? सो कहते हैं कि—
अहं हि सर्वयज्ञानां श्रौतानां स्मार्तानां च सर्वेषां यज्ञानां देवतात्मत्वेन भोक्ता च प्रभुः एव च। मत्स्वामिको हि यज्ञः “अधियज्ञोऽहमेवात्र” इति हि उक्तम्। तथा न तु माम् अभिजानन्ति तत्त्वेन यथावत्। अतः च अविधिपूर्वकम् इष्ट्वा यागफलात् च्यवन्ति प्रच्यवन्ते ते॥ 24॥
श्रौत और स्मार्त समस्त यज्ञोंका देवतारूपसे मैं ही भोक्ता हूँ और मैं ही स्वामी हूँ। मैं ही सब यज्ञोंका स्वामी हूँ यह बात “अधियज्ञोऽहमेवात्र” इस श्लोकमें भी कही गयी है। परंतु वे अज्ञानी इस प्रकार यथार्थ तत्त्वसे मुझे नहीं जानते। अतः अविधिपूर्वक पूजन करके वे यज्ञके असली फलसे गिर जाते हैं अर्थात् उनका पतन हो जाता है॥ 24॥
ये अपि अन्यदेवताभक्तिमत्त्वेन अविधि-पूर्वकं यजन्ते तेषाम् अपि यागफलम् अवश्यं-भावि, कथम्—
जो भक्त अन्य देवताओंकी भक्तिके रूपमें अविधिपूर्वक भी मेरा पूजन करते हैं उनको भी यज्ञका फल अवश्य मिलता है। कैसे? (सो कहा जाता है—)
यान्ति गच्छन्ति देवव्रता देवेषु व्रतं नियमो भक्तिः च येषां ते देवव्रता देवान् यान्ति। पितॄन् अग्निष्वात्तादीन् यान्ति पितृव्रताः श्राद्धादि-क्रियापराः पितृभक्ताः। भूतानि विनायक-मातृगणचतुर्भगिन्यादीनि
यान्ति
भूतेज्या भूतानां पूजकाः। यान्ति मद्याजिनो मद्यजनशीला वैष्णवा माम् एव। समाने अपि आयासे माम् एव न भजन्ते अज्ञानात्। तेन ते अल्प-फलभाजो भवन्ति इत्यर्थः॥ 25॥
जिनका नियम और भक्ति देवोंके लिये ही है वे देव-उपासकगण देवोंको प्राप्त होते हैं। श्राद्ध आदि क्रियाके परायण हुए पितृभक्त अग्निष्वात्तादि पितरोंको पाते हैं। भूतोंकी पूजा करनेवाले विनायक, षोडशमातृकागण और चतुर्भगिनी आदि भूतगणोंको पाते हैं तथा मेरा पूजन करनेवाले वैष्णव भक्त अवश्यमेव मुझे ही पाते हैं। अभिप्राय यह कि समान परिश्रम होनेपर भी वे (अन्य देवोपासक) अज्ञानके कारण केवल मुझ परमेश्वरको ही नहीं भजते इसीसे वे अल्प फलके भागी होते हैं॥ 25॥
न केवलं मद्भक्तानाम् अनावृत्तिलक्षणम् अनन्तफलं सुखाराधनः च अहं कथम्—
मेरे भक्तोंको केवल अपुनरावृत्तिरूप अनन्त फल मिलता है इतना ही नहीं, किंतु मेरी आराधना भी सुखपूर्वक की जा सकती है। कैसे? (सो कहते हैं—)
पत्रं पुष्पं फलं तोयम् उदकं यो मे मह्यं भक्त्या प्रयच्छति तद् अहं पत्रादि भक्त्या उपहृत भक्तिपूर्वकं प्रापितं भक्त्या उपहृतम् अश्नामि गृह्णामि प्रयतात्मनः शुद्धबुद्धेः॥ 26॥
जो भक्त मुझे पत्र, पुष्प, फल और जल आदि कुछ भी वस्तु भक्तिपूर्वक देता है, उस प्रयतात्मा— शुद्धबुद्धि भक्तके द्वारा भक्तिपूर्वक अर्पण किये हुए वे पत्र-पुष्पादि मैं (स्वयं) खाता हूँ अर्थात् ग्रहण करता हूँ॥ 26॥
यत एवम् अतः—
क्योंकि यह बात है, इसलिये—
यत् करोषि स्वतः प्राप्तं यद् अश्नासि यत् च जुहोषि हवनं निर्वर्तयसि श्रौतं स्मार्तं वा, यद् ददासि प्रयच्छसि ब्राह्मणादिभ्यो हिरण्यान्नाज्यादि यत् तपस्यसि तपः चरसि कौन्तेय तत् कुरुष्व मदर्पणं मत्समर्पणम्॥ 27॥
हे कुन्तीपुत्र! तू जो कुछ भी स्वतःप्राप्त कर्म करता है, जो खाता, जो कुछ श्रौत या स्मार्त यज्ञरूप हवन करता है, जो कुछ सुवर्ण, अन्न, घृतादि वस्तु ब्राह्मणादि सत्पात्रोंको दान देता है और जो कुछ तपका आचरण करता है, वह सब मेरे समर्पण कर॥ 27॥
एवं कुर्वतः तव यद् भवति तत् शृणु—
ऐसा करनेसे तुझे जो लाभ होगा वह सुन—
शुभाशुभफलैः एवं शुभाशुभे इष्टानिष्टफले येषां तानि शुभाशुभफलानि कर्माणि तैः शुभाशुभफलैः कर्मबन्धनैः कर्माणि एव बन्धनानि तैः कर्मबन्धनैः एवं मत्समर्पणं कुर्वन् मोक्ष्यसे। सः अयं सन्न्यासयोगो नाम सन्न्यासः च असौ मत्समर्पणतया कर्मत्वाद् योगः च असौ इति तेन सन्न्यासयोगेन युक्त आत्मा अन्तःकरणं यस्य तव स त्वं सन्न्यासयोगयुक्तात्मा सन् विमुक्तः
कर्मबन्धनैः जीवन् एव पतिते च अस्मिन् शरीरे माम् उपैष्यसि आगमिष्यसि॥ 28॥
इस प्रकार कर्मोंको मेरे अर्पण करके तू शुभाशुभ फलयुक्त कर्मबन्धनसे अर्थात् अच्छा और बुरा जिसका फल है ऐसे कर्मरूप बन्धनसे छूट जायगा। तथा इस प्रकार तू संन्यासयोगयुक्तात्मा होकर—मेरे अर्पण करके कर्म किये जानेके कारण जो “संन्यास” है और कर्मरूप होनेके कारण जो “योग” है उस संन्यासरूप योगसे जिसका अन्तःकरण युक्त है उसका नाम “संन्यासयोगयुक्तात्मा है” ऐसा होकर—तू इस जीवितावस्थामें ही कर्मबन्धनसे मुक्त होकर इस शरीरका नाश होनेपर मुझे ही प्राप्त हो जायगा। अर्थात् मुझमें ही विलीन हो जायगा॥ 28॥
रागद्वेषवान् तर्हि भगवान् यतो भक्तान् अनुगृह्णाति न इतरान् इति, तद् न—
(यदि कहो कि) तब तो भगवान् राग-द्वेषसे युक्त हैं; क्योंकि वे भक्तोंपर ही अनुग्रह करते हैं दूसरोंपर नहीं करते, तो यह कहना ठीक नहीं है—
समः तुल्यः अहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्यः अस्ति न प्रिया अग्निवद् अहम्, दूरस्थानां यथा अग्निः शीतं न अपनयति समीपम् उपसर्पताम् अपनयति, तथा अहं भक्तान् अनुगृह्णामि न इतरान्।
ये भजन्ति तु माम् ईश्वरं भक्त्या मयि ते स्वभावत एव न मम रागनिमित्तं मयि वर्तन्ते। तेषु च अपि अहं स्वभावत एव वर्ते न इतरेषु न एतावता तेषु द्वेषो मम॥ 29॥
मैं सभी प्राणियोंके प्रति समान हूँ, मेरा न तो (कोई) द्वेष्य है और न (कोई) प्रिय है। मैं अग्निके समान हूँ। जैसे अग्नि अपनेसे दूर रहनेवाले प्राणियोंके शीतका निवारण नहीं करता, पास आनेवालोंका ही करता है, वैसे ही मैं भक्तोंपर अनुग्रह किया करता हूँ, दूसरोंपर नहीं।
जो (भक्त) मुझ ईश्वरका प्रेमपूर्वक भजन करते हैं, वे मुझमें स्वभावसे ही स्थित हैं, कुछ मेरी आसक्तिके कारण नहीं और मैं भी स्वभावसे ही उनमें स्थित हूँ, दूसरोंमें नहीं। परंतु इतनेहीसे यह बात नहीं है कि मेरा उनमें (दूसरोंमें) द्वेष है॥ 29॥
शृणु मद्भक्तेः माहात्म्यम्—
मेरी भक्तिकी महिमा सुन—
अपि चेद् यद्यपि सुष्ठु दुराचारः सुदुराचारः अतीव कुत्सिताचारः अपि भजते माम् अनन्यभाग् अनन्यभक्तिः सन् साधुः एव सम्यग्वृत्त एव स मन्तव्यो ज्ञातव्यः सम्यग् यथावद् व्यवसितो हि यस्मात् साधुनिश्चयः सः॥ 30॥
यदि कोई सुदुराचारी अर्थात् अतिशय बुरे आचरणवाला मनुष्य भी अनन्य प्रेमसे युक्त हुआ मुझ (परमेश्वर)-को भजता है तो उसे साधु ही मानना चाहिये अर्थात् उसे यथार्थ आचरण करनेवाला ही समझना चाहिये; क्योंकि वह यथार्थ निश्चययुक्त हो चुका है—उत्तम निश्चयवाला हो गया है॥ 30॥
उत्सृज्य
च
बाह्यां
दुराचारताम् अन्तःसम्यग्व्यवसायसामर्थ्यात्—
आन्तरिक यथार्थ निश्चयकी शक्तिसे बाहरी दुराचारिताको छोड़कर—
क्षिप्रं शीघ्रं भवति धर्मात्मा धर्मचित्त एव शश्वद् नित्यं शान्तिं च उपशमं निगच्छति प्राप्नोति।
शृणु
परमार्थं
कौन्तेय
प्रतिजानीहि निश्चितां प्रतिज्ञां कुरु, न मे मम भक्तो मयि समर्पितान्तरात्मा
मद्भक्तो
न
प्रणश्यति इति॥ 31॥
वह शीघ्र ही धर्मात्मा—धार्मिक चित्तवाला बन जाता है और सदा रहनेवाली नित्य शान्ति—उपरतिको पा लेता है।
हे कुन्तीपुत्र! तू यथार्थ बात सुन, तू यह निश्चित प्रतिज्ञा कर अर्थात् दृढ़ निश्चय कर ले कि जिसने मुझ परमात्मामें अपना अन्तःकरण समर्पित कर दिया है वह मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता, अर्थात् उसका कभी पतन नहीं होता॥ 31॥
किं च—
तथा—
मां हि यस्मात् पार्थ व्यपाश्रित्य माम् आश्रयत्वेन गृहीत्वा ये अपि स्युः भवेयुः पापयोनयः पापा योनिः येषां ते पापयोनयः पापजन्मानः। के ते इति आह स्त्रियो वैश्याः तथा शूद्राः ते अपि यान्ति गच्छन्ति परां गतिं प्रकृष्टां गतिम्॥ 32॥
क्योंकि हे पार्थ! जो कोई पापयोनिवाले हैं अर्थात् जिनके जन्मका कारण पाप है ऐसे प्राणी हैं—वे कौन हैं? सो कहते हैं—वे स्त्री, वैश्य और शूद्र भी मेरी शरणमें आकर—मुझे ही अपना अवलम्बन बनाकर परम—उत्तम गतिको ही पाते हैं॥ 32॥
किं पुनः ब्राह्मणाः पुण्याः पुण्ययोनयो भक्ता राजर्षयः तथा राजानः च ते ऋषयः च इति राजर्षयः।
यत एवम् अतः अनित्यं क्षणभङ्गुरम् असुखं च सुखवर्जितम् इमं लोकं मनुष्यलोकं प्राप्य, पुरुषार्थसाधनं दुर्लभं मनुष्यत्वं लब्ध्वा भजस्व सेवस्व माम्॥ 33॥
फिर जो पुण्ययोनि ब्राह्मण और राजर्षि भक्त हैं उनका तो कहना ही क्या है? जो राजा भी हों और ऋषि भी हों, वे राजर्षि कहलाते हैं।
क्योंकि यह बात है, इसलिये इस अनित्य, क्षणभङ्गुर और सुखरहित मनुष्यलोकको पाकर अर्थात् परम पुरुषार्थके साधनरूप दुर्लभ मनुष्य-शरीरको पाकर मुझ ईश्वरका ही भजन कर—मेरी ही सेवा कर॥ 33॥
कथम्—
किस प्रकार (भजन-सेवा करें सो कहा जाता है—)
मयि मनो यस्य स त्वं मन्मना भव तथा मद्भक्तो भव। मद्याजी मद्यजनशीलो भव। माम् एव च नमस्कुरु। माम् एव ईश्वरम् एष्यसि आगमिष्यसि युक्त्वा समाधाय चित्तम्। एवम् आत्मानम् अहं हि सर्वेषां भूतानाम् आत्मा परा च गतिः परम् अयनम्, तं माम् एवम्भूतम् एष्यसि इति अतीतेन पदेन सम्बन्धः। मत्परायणः सन् इत्यर्थः॥ 34॥
तू मन्मना—मुझमें ही मनवाला हो। मद्भक्त—मेरा ही भक्त हो। मद्याजी— मेरा ही पूजन करनेवाला हो और मुझे ही नमस्कार किया कर। इस प्रकार चित्तको मुझमें लगाकर मेरे परायण—शरण हुआ तू मुझ परमेश्वरको ही प्राप्त हो जायगा। अभिप्राय यह कि मैं ही सब भूतोंका आत्मा और परमगति—परम स्थान हूँ, ऐसा जो मैं आत्मरूप हूँ उसीको तू प्राप्त हो जायगा। इस प्रकार पहलेके “माम्” शब्दसे “आत्मानम्” शब्दका सम्बन्ध है॥ 34॥