अर्जुन बोले—आप परम ब्रह्म, परम धाम और परम पवित्र हैं, क्योंकि आपको सब ऋषि-गण सनातन, दिव्य पुरुष एवं देवोंका भी आदिदेव, अजन्मा और सर्वव्यापी कहते हैं। वैसे ही देवर्षि नारद तथा असित और देवल ऋषि तथा महर्षि व्यास भी कहते हैं और स्वयं आप भी
1-ऋषीत्येष गतौ धातुः श्रुतौ सत्ये
तपस्यथ। एतत् सन्नियतं यस्मिन् ब्रह्मणा स ऋषिः स्मृतः॥
गत्यर्थादृषतेर्धातोर्नामनिर्वृत्तिरादितः
। यस्मादेष स्वयम्भूतस्तस्माच्च ऋषिता स्मृता॥
(वायुपुराण 59। 79, 81)
“ऋष्” धातु गमन (ज्ञान), श्रवण, सत्य और तप इन अर्थोंमें प्रयुक्त होता है। ये सब बातें जिसके अंदर एक साथ
निश्चित रूपसे हों, उसीका नाम ब्रह्माने “ऋषि” रखा है। गत्यर्थक “ऋष्” धातुसे ही “ऋषि” शब्दकी निष्पत्ति हुई है और
आदि कालमें चूँकि यह ऋषिवर्ग स्वयं उत्पन्न होता है, इसीलिये इसकी “ऋषि” संज्ञा है।”
2-परम सत्यवादी धर्ममूर्ति पितामह भीष्मजीने दुर्योधनको भगवान् श्रीकृष्णका प्रभाव बतलाते हुए कहा है—
“भगवान् वासुदेव सब देवताओंके देवता और सबसे श्रेष्ठ हैं; ये ही धर्म हैं; धर्मज्ञ हैं, वरद हैं, सब कामनाओंको
पूर्ण करनेवाले हैं और ये ही कर्ता, कर्म और स्वयंप्रभु हैं। भूत, भविष्यत्, वर्तमान, सन्ध्या, दिशाएँ, आकाश और सब
नियमोंको इन्हीं जनार्दनने रचा है। इन महात्मा अविनाशी प्रभुने ऋषि, तप और जगत्की सृष्टि करनेवाले प्रजापतिको रचा।
सब प्राणियोंके अग्रज संकर्षणको भी इन्होंने ही रचा। लोक जिनको “अनन्त” कहते हैं और जिन्होंने पहाड़ोंसमेत सारी
पृथ्वीको धारण कर रखा है, वे शेषनाग भी इन्हींसे उत्पन्न हैं; ये ही वाराह, नृसिंह और वामनका अवतार धारण करनेवाले
हैं; ये ही सबके माता-पिता हैं, इनसे श्रेष्ठ और कोई भी नहीं है; ये ही केशव परम तेजरूप हैं और सब लोगोंके
पितामह हैं, मुनिगण इन्हें हृषीकेश कहते हैं, ये ही आचार्य, पितर और गुरु हैं। ये श्रीकृष्ण जिसपर प्रसन्न होते हैं, उसे
अक्षय लोककी प्राप्ति होती है। भय प्राप्त होनेपर जो इन भगवान् केशवके शरण जाता है और इनकी स्तुति करता है,
वह मनुष्य परम सुखको प्राप्त होता है।” “जो लोग भगवान् श्रीकृष्णकी शरणमें चले जाते हैं, वे कभी मोहको नहीं
प्राप्त होते। महान् भय (संकट)-में डूबे हुए लोगोंकी भी भगवान् जनार्दन नित्य रक्षा करते हैं।”
(वायुपुराण 61। 88, 90, 91, 92)
(वायुपुराण 61। 83, 84, 85)
ये च कृष्णं प्रपद्यन्ते ते न मुह्यन्ति मानवाः। भये महति मग्नांश्च पाति नित्यं जनार्दनः॥
(महा0, भीष्म0 67। 24)
* नारद कई हुए हैं परंतु ये देवर्षि नारद एक ही हैं। इनको भगवान्का “मन” कहा गया है। ये परम तत्त्वज्ञ, परम
प्रेमी और ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारी हैं। भक्तिके तो ये प्रधान आचार्य हैं। संसारपर इनका अमित उपकार है। प्रह्लाद, ध्रुव, अम्बरीष
आदि महान् भक्तोंको इन्हींने भक्तिमार्गमें प्रवृत्त किया और श्रीमद्भागवत तथा वाल्मीकीय रामायण-जैसे दो अनूठे ग्रन्थ
भी संसारको इन्हींकी कृपासे प्राप्त हुए। शुकदेव-जैसे महान् ज्ञानीको भी इन्होंने उपदेश दिया।
ये पूर्वजन्ममें दासीपुत्र थे। इनकी माता महर्षियोंके जूँठे बर्तन माँजा करती थीं। जब ये पाँच ही वर्षके थे, इनकी
माताकी अकस्मात् मृत्यु हो गयी। तब ये सब प्रकारके सांसारिक बन्धनोंसे मुक्त होकर जंगलकी ओर निकल पडे़। वहाँ
जाकर ये एक वृक्षके नीचे बैठकर भगवान्के स्वरूपका ध्यान करने लगे। ध्यान करते-करते इनकी वृत्तियाँ एकाग्र हो
गयीं और इनके हृदयमें भगवान् प्रकट हो गये। परंतु थोड़ी देरके लिये इन्हें अपने मनमोहनरूपकी झलक दिखलाकर
भगवान् तुरंत अन्तर्धान हो गये। अब तो ये बहुत छटपटाये और मनको पुनः स्थिर करके भगवान्का ध्यान करने लगे।
किंतु भगवान्का वह रूप उन्हें फिर न दीख पड़ा। इतनेहीमें आकाशवाणी हुई कि “हे दासीपुत्र! इस जन्ममें फिर तुम्हें
मेरा दर्शन न होगा। इस शरीरको त्यागकर मेरे पार्षदरूपमें तुम मुझे पुनः प्राप्त करोगे।” भगवान्के इन वाक्योंको सुनकर
इन्हें बड़ी सान्त्वना हुई और ये मृत्युकी बाट जोहते हुए निःसंग होकर पृथ्वीपर विचरने लगे। समय आनेपर इन्होंने अपने
पांचभौतिक शरीरको त्याग दिया। कल्पके अन्तमें भगवान्के प्राणोंमें प्रविष्ट हो गये और फिर दूसरे कल्पमें ये दिव्य
विग्रह धारणकर ब्रह्माजीके मानसपुत्रके रूपमें पुनः अवतीर्ण हुए और तबसे ये अखण्ड ब्रह्मचर्य व्रतको धारणकर वीणा
बजाते हुए भगवान्के गुणोंको गाते रहते हैं (श्रीमद्भागवत, स्कन्ध 1, अ0 6)।
महाभारत, सभापर्वके पाँचवें अध्यायमें कहा है—
“देवर्षि नारदजी वेद और उपनिषदोंके मर्मज्ञ, देवगणोंसे पूजित, इतिहास-पुराणोंके विशेषज्ञ, अतीत कल्पोंकी बातोंको
जाननेवाले, न्याय और धर्मके तत्त्वज्ञ, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, आयुर्वेदादिके जाननेवालोंमें श्रेष्ठ, परस्पर-विरुद्ध विविध
विधि-वाक्योंकी एकवाक्यता करनेमें प्रवीण, प्रभावशाली वक्ता, नीतिज्ञ, मेधावी, स्मरणशील, ज्ञानी, कवि, भले-बुरेको
पृथक्-पृथक् पहचाननेमें चतुर, समस्त प्रमाणोंद्वारा वस्तुतत्त्वका निर्णय करनेमें समर्थ, न्यायके वाक्योंके गुण-दोषोंको
जाननेवाले, बृहस्पतिजी-जैसे विद्वानोंकी शंकाओंका समाधान करनेमें समर्थ, धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके तत्त्वको
यथार्थरूपमें जाननेवाले, सारे ब्रह्माण्डमें और त्रिलोकीमें इधर-उधर, ऊपर-नीचे जो कुछ होता है—सबको योगबलसे प्रत्यक्ष
देखनेवाले, सांख्य और योगके विभागको जाननेवाले, देव-दैत्योंको वैराग्यका उपदेश करनेमें चतुर, सन्धि-विग्रहके तत्त्वको
जाननेवाले, कर्तव्य-अकर्तव्यका विभाग करनेमें दक्ष, षाड्गुण्य-प्रयोगके विषयमें अनुपम, सकल शास्त्रोंमें प्रवीण, युद्धविद्यामें
निपुण, संगीत-विशारद और भगवान्के भक्त, विद्या और गुणोंके भण्डार, सदाचारके आधार, सबके हितकारी और सर्वत्र
गतिवाले हैं।” उपनिषद्, पुराण और इतिहास इनकी पवित्र गाथाओंसे भरे हैं।
महर्षि असित और देवल पिता-पुत्र हैं। इनके सम्बन्धमें कूर्मपुराणमें वर्णन मिलता है—
एतानुत्पाद्य पुत्रांस्तु
प्रजासन्तानकारणात्। कश्यपः
पुत्रकामस्तु
चचार
सुमहत्तपः॥
तस्यैवं तपतोऽत्यर्थं प्रादुर्भूतौ सुताविमौ। वत्सरश्चासितश्चैव
असितस्यैकपर्णायां ब्रह्मिष्ठः
तावुभौ
ब्रह्मवादिनौ॥
समपद्यत। नाम्ना वै देवलः पुत्रो योगाचार्यो महातपाः॥
(कूर्मपुराण 19। 1, 2, 5)
“कश्यप मुनि प्रजाविस्तारके हेतुसे इन पुत्रोंको उत्पन्न करके फिर पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे महान् तप करने लगे। उनके
इस प्रकार उग्र तप करनेसे ये “वत्सर” और “असित” नामके दो पुत्र हुए। वे दोनों ही ब्रह्मवादी (ब्रह्मवेत्ता एवं ब्रह्मका
उपदेश करनेवाले) थे। “असित” के उनकी पत्नी एकपर्णाके गर्भसे महातपस्वी योगाचार्य “देवल” नामके वेदनिष्णात पुत्र
उत्पन्न हुए।”
ये दोनों ऋग्वेदके मन्त्रद्रष्टा ऋषि हैं। देवल ऋषिने भगवान् शिवकी आराधना करके सिद्धि प्राप्त की थी। ये दोनों
बड़े ही प्रवीण और प्राचीन महर्षि हैं। प्रत्यूषनामक वसुके भी देवल ऋषिनामक पुत्र थे (हरिवंश0 3। 44)।
श्रीवेदव्यासजी भगवान्के अंशावतार माने जाते हैं। इनका जन्म द्वीपमें हुआ था, इससे इनका “द्वैपायन” नाम पड़ा;
शरीर श्यामवर्ण है, इससे ये “कृष्णद्वैपायन” कहलाये और वेदोंके विभाग करनेसे लोग इन्हें “वेदव्यास” कहने लगे। ये
महामुनि पराशरजीके पुत्र हैं। इनकी माताका नाम सत्यवती था। ये जन्मते ही तप करनेके लिये वनमें चले गये थे। ये
भगवत्तत्त्वके पूर्ण ज्ञाता और अद्वितीय महाकवि हैं। ये ज्ञानके असीम और अगाध समुद्र हैं, विद्वत्ताकी पराकाष्ठा और
कवित्वकी सीमा हैं। व्यासके हृदय और वाणीका विकास ही समस्त जगत्के ज्ञानका प्रकाश एवं अवलम्बन है।
ब्रह्मसूत्रकी रचना भगवान् व्यासने ही की। महाभारत-सदृश अलौकिक ग्रन्थका प्रणयन भगवान् व्यासने किया। अठारह
पुराण और अनेक उपपुराण भगवान् व्यासने बनाये। भारतका इतिहास इस बातका साक्षी है। आज सारा संसार व्यासके
ज्ञानप्रसादसे अपने-अपने कर्तव्यका मार्ग खोज रहा है।
प्रत्येक द्वापरयुगमें वेदोंका विभाग करनेवाले भिन्न-भिन्न व्यास होते हैं। इसी वैवस्वत मन्वन्तरके ये पराशरपुत्र
श्रीकृष्णद्वैपायन अट्ठाईसवें वेदव्यास हैं। इन्होंने अपने प्रधान शिष्य पैलको ऋग्वेद, वैशम्पायनको यजुर्वेद, जैमिनिको सामवेद
और सुमन्तुको अथर्ववेद पढ़ाया एवं सूतजातीय महान् बुद्धिमान् रोमहर्षण महामुनिको इतिहास और पुराण पढ़ाये।
* देवर्षि नारदने कहा—“भगवान् श्रीकृष्ण समस्त लोकोंको उत्पन्न करनेवाले और समस्त भावोंको जाननेवाले हैं
तथा साध्योंके और देवताओंके ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं।”
मार्कण्डेय मुनिने कहा—“श्रीकृष्ण यज्ञोंके यज्ञ, तपोंके तप और भूत-भविष्यत्-वर्तमानरूप हैं।”
भृगुने कहा—“ये देवताओंके देवता और परम पुरातन विष्णु हैं।”
व्यासने कहा—“ये इन्द्रको इन्द्रत्व देनेवाले देवताओंके परम देवता हैं।”
अंगिराने कहा—“ये सब प्राणियोंकी रचना करनेवाले हैं।”
सनत्कुमार आदिने कहा—“इनके मस्तकसे आकाश और भुजाओंसे पृथ्वी व्याप्त है, तीनों लोक इनके पेटमें हैं; ये
सनातन पुरुष हैं; तपसे अन्तःकरणकी शुद्धि होनेपर ही साधक इन्हें जान सकते हैं। आत्मदर्शनसे तृप्त ऋषिगणोंमें भी ये
परमोत्तम माने जाते हैं और युद्धसे पीठ न दिखानेवाले उदार राजर्षियोंके भी ये ही परम गति हैं।” (महा0, भीष्म0 68)
महाभारत, वनपर्वके बारहवें अध्यायमें भक्तिमती द्रौपदीका वचन है—
असित और देवल ऋषिने कहा है—“श्रीकृष्ण ही प्रजाकी पूर्व सृष्टिमें प्रजापति और सब लोकोंके एकमात्र रचयिता हैं।”
परशुरामजीने कहा है—“ये ही विष्णु हैं, इन्हें कोई जीत नहीं सकता; ये ही यज्ञ हैं, यज्ञ करनेवाले हैं और यज्ञके
द्वारा यजनीय हैं।”
नारदजीने कहा है—“ये साध्यदेवोंके और समस्त कल्याणोंके ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं।”
“जैसे बालक अपने इच्छानुसार खिलौनोंसे खेला करता है, वैसे ही श्रीकृष्ण भी ब्रह्मा, शिव और इन्द्रादि देवताओंको
लेकर खेला करते हैं।”
इसके अतिरिक्त महाभारतमें भगवान् व्यासने कहा है—“सौराष्ट्रदेशमें द्वारका नामकी एक पवित्र नगरी है, उसमें साक्षात्
पुराणपुरुषोत्तम मधुसूदनभगवान् विराजते हैं। वे स्वयं सनातनधर्मकी मूर्ति हैं। वेदज्ञ ब्राह्मण और आत्मज्ञानी पुरुष महात्मा
श्रीकृष्णको साक्षात् “सनातनधर्म” बतलाते हैं। भगवान् गोविन्द पवित्रोंमें परम पवित्र, पुण्योंमें परम पुण्य और मंगलोंके
परम मंगल हैं। वे कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण तीनों लोकोंमें सनातन देवोंके देव हैं। वे ही मधुसूदन अक्षर, क्षर, क्षेत्रज्ञ,
परमेश्वर और अचिन्त्यमूर्ति हैं।” (महा0, वन0 8। 24 से27)
श्रीमद्भागवतमें देवर्षि नारदने धर्मराज युधिष्ठिरसे कहा है—“हे राजन्! मनुष्योंमें तुम लोग बड़े ही भाग्यवान् हो, क्योंकि
लोकोंको पवित्र करनेवाले मुनिगण तुम्हारे महलोंमें पधारते हैं और मानवचिह्नधारी साक्षात् परब्रह्म गूढ़रूपसे यहाँ विराजते
हैं। अहा! महात्मालोग जिस कैवल्य निर्वाण सुखके अनुभवको खोजा करते हैं, ये श्रीकृष्ण वही परम ब्रह्म हैं। ये तुम्हारे
प्रिय, सुहृद्, मामाके लड़के, पूज्य, पथप्रदर्शक एवं गुरु हैं; तब बताओ तुम्हारे समान भाग्यशाली और कौन है?”
(7। 15। 75-76)