विभूतियोग
सप्तमे अध्याये भगवतः तत्त्वं विभूतयः च प्रकाशिता नवमे च। अथ इदानीं येषु येषु भावेषु चिन्त्यो भगवान् ते ते भावा वक्तव्याः। तत्त्वं च भगवतो वक्तव्यम् उक्तम् अपि दुर्विज्ञेय-त्वाद् इति अतः।
सातवें और नवें अध्यायमें भगवान्के तत्त्वका और विभूतियोंका वर्णन किया गया। अब जिन-जिन भावोंमें भगवान् चिन्तन किये जानेयोग्य हैं उन-उन भावोंका वर्णन किया जाना चाहिये। यद्यपि भगवान्का तत्त्व पहले कहा गया है; परंतु दुर्विज्ञेय होनेके कारण फिर भी उसका वर्णन होना चाहिये, इसलिये श्रीभगवान् बोले—
भूय एव भूयः पुनः हे महाबाहो शृणु मे मदीयं परमं प्रकृष्टं निरतिशयवस्तुनः प्रकाशकं वचो वाक्यम्, यत् परमं ते तुभ्यं प्रीयमाणाय मद्वचनात् प्रीयसे त्वम् अतीव अमृतम् इव पिबन् ततो वक्ष्यामि हितकाम्यया हितेच्छया॥ 1॥
हे महाबाहो! फिर भी तू मेरे परम उत्तम निरतिशय वस्तुको प्रकाशित करनेवाले वाक्य सुन, जो कि मैं तुझ प्रसन्न होनेवालेके हितकी इच्छासे कहूँगा। मेरे वचनोंको सुनकर तू अमृतपान करता हुआ-सा अत्यन्त प्रसन्न होता है, इसीलिये मैं तुझसे यह परम वाक्य कहने लगा हूँ॥ 1॥
किमर्थम् अहं वक्ष्यामि इति अत आह—
मैं (ऐसा) किसलिये कहता हूँ? सो बतलाते हैं—
न मे विदुः न जानन्ति सुरगणा ब्रह्मादयः। किं ते न विदुः मम प्रभवं प्रभावं प्रभुशक्त्यति-शयम् , अथवा प्रभवं प्रभवनम् उत्पत्तिम्। न अपि महर्षयो भृग्वादयो विदुः।
कस्मात् ते न विदुः इति उच्यते—
अहम् आदिः कारणं हि यस्माद् देवानां महर्षीणां च सर्वशः सर्वप्रकारैः॥ 2॥
ब्रह्मादि देवता मेरे प्रभवको यानी अतिशय प्रभुत्व-शक्तिको अथवा प्रभव यानी मेरी उत्पत्तिको नहीं जानते और भृगु आदि महर्षि भी (मेरे प्रभवको) नहीं जानते।
वे किस कारणसे नहीं जानते? सो कहते हैं—
क्योंकि देवोंका और महर्षियोंका सब प्रकारसे मैं ही आदि—मूल कारण हूँ॥ 2॥
किं च—
तथा—
यो माम् अजम् अनादिं च यस्माद् अहम् आदिः देवानां महर्षीणां च न मम अन्यः आदिः विद्यते अतः अहम् अजः अनादिः च, अनादित्वम् अजत्वे हेतुः। तं माम् अजम् अनादिं च यो वेत्ति विजानाति लोकमहेश्वरं लोकानां महान्तम् ईश्वरं तुरीयम्
अज्ञानतत्कार्यवर्जितम्
असम्मूढः सम्मोहवर्जितः स मर्त्येषु मनुष्येषु सर्वपापैः सर्वैः पापैः मतिपूर्वामतिपूर्वकृतैः प्रमुच्यते प्रमोक्ष्यते॥ 3॥
क्योंकि मैं महर्षियोंका और देवोंका आदिकारण हूँ, मेरा आदि दूसरा कोई नहीं है, इसलिये मैं अजन्मा और अनादि हूँ। अनादित्व ही जन्मरहित होनेमें कारण है। इस प्रकार जो मुझे जन्मरहित अनादि और लोकोंका महान् ईश्वर अर्थात् अज्ञान और उसके कार्यसे रहित (जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओंसे अतीत) चतुर्थ अवस्थायुक्त जानता है, वह (इस प्रकार जाननेवाला) मनुष्योंमें ज्ञानी है अर्थात् मोहसे रहित श्रेष्ठ पुरुष है और वह जान-बूझकर किये हुए या बिना जाने किये हुए सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ 3॥
इतः च अहं महेश्वरो लोकानाम्—
इसलिये भी मैं लोकोंका महान् ईश्वर हूँ—
बुद्धिः अन्तःकरणस्य सूक्ष्माद्यर्थावबोधन-सामर्थ्यं तद्वन्तं बुद्धिमान् इति हि वदन्ति।
ज्ञानम् आत्मादिपदार्थानाम् अवबोधः। असम्मोहः प्रत्युपपन्नेषु बोद्धव्येषु विवेकपूर्विका प्रवृत्तिः। क्षमा आक्रुष्टस्य ताडितस्य वा अविकृतचित्तता। सत्यं यथादृष्टस्य यथाश्रुतस्य च आत्मानुभवस्य परबुद्धिसङ्क्रान्तये तथा एव उच्चार्यमाणा वाक् सत्यम् उच्यते। दमो बाह्येन्द्रियोपशमः। शमः अन्तःकरणस्य। सुखम् आह्लादः। दुःखं सन्तापः। भव उद्भवः, अभावः तद्विपर्ययः। भयं च त्रासः, अभयम् एव च तद्विपरीतम्॥ 4॥
सूक्ष्म, सूक्ष्मतर आदि पदार्थोंको समझनेवाली अन्तःकरणकी ज्ञानशक्तिका नाम बुद्धि है। उससे युक्त मनुष्यको ही “बुद्धिमान्” कहते हैं।
ज्ञान—आत्मा आदि पदार्थोंका बोध, असम्मोह— जाननेयोग्य पदार्थ प्राप्त होनेपर उनमें विवेकपूर्वक प्रवृत्ति, क्षमा—किसीके द्वारा अपनी निन्दा की जाने या ताड़ना दी जानेपर भी चित्तमें विकार न होना, सत्य—देखने और सुननेसे जिस प्रकारका अपनेको अनुभव हुआ हो, उसको दूसरेकी बुद्धिमें पहुँचानेके लिये उसी प्रकार कही जानेवाली वाणी “सत्य” कहलाती है, दम—बाह्य इन्द्रियोंको वशमें कर लेना, शम—अन्तःकरणकी उपरति, सुख—आह्लाद, दुःख— सन्ताप, भव—उत्पत्ति, अभाव—उत्पत्तिके विपरीत (विनाश) तथा भय—त्रास और अभय—उसके विपरीत जो निर्भयता है वह भी॥ 4॥
अहिंसा
अपीडा
प्राणिनाम्।
समता समचित्तता। तुष्टिः सन्तोषः पर्याप्तबुद्धिः लाभेषु। तप इन्द्रियसंयमपूर्वकं शरीरपीडनम्। दानं यथाशक्ति संविभागः। यशो धर्मनिमित्ता कीर्तिः। अयशः तु अधर्मनिमित्ता अकीर्तिः।
भवन्ति भावा यथोक्ता बुद्ध्यादयो भूतानां प्राणिनां मत्त एव ईश्वरात् पृथग्विधा नानाविधाः स्वकर्मानुरूपेण॥ 5॥
अहिंसा—प्राणियोंको किसी प्रकार पीड़ा न पहुँचाना, समता—चित्तका समभाव, संतोष—जो कुछ मिले उसीको यथेष्ट समझना, तप—इन्द्रियसंयमपूर्वक शरीरको सुखाना, दान—अपनी शक्तिके अनुसार धनका विभाग करना (दूसरोंको बाँटना), यश—धर्मके निमित्तसे होनेवाली कीर्ति, अपयश—अधर्मके निमित्तसे होनेवाली अपकीर्ति।
इस प्रकार जो प्राणियोंके अपने-अपने कर्मोंके अनुसार होनेवाले बुद्धि आदि नाना प्रकारके भाव हैं, वे सब मुझ ईश्वरसे ही होते हैं॥ 5॥
किं च—
तथा—
महर्षयः सप्त भृग्वादयः1 पूर्वे अतीतकाल-सम्बन्धिनः चत्वारो मनवः तथा सावर्णा इति प्रसिद्धाः2। ते च मद्भावा मद्गतभावना वैष्णवेन सामर्थ्येन उपेता मानसा मनसा एव उत्पादिता मया जाता उत्पन्ना येषां मनूनां महर्षीणां च सृष्टिः लोके इमाः स्थावरजङ्गमाः प्रजाः॥ 6॥
भृगु आदि सप्त महर्षि और पहले होनेवाले चार मनु जिनका अतीत कालसे सम्बन्ध है और जो “सावर्ण” इस नामसे पुराणोंमें प्रसिद्ध हैं, ये सभी मुझमें भावनावाले—ईश्वरीय सामर्थ्यसे युक्त और मेरे द्वारा मनसे उत्पन्न किये हुए हैं, जिन मनु और महर्षियोंकी रची हुई ये चर और अचररूप सब प्रजाएँ लोकमें प्रसिद्ध हैं॥ 6॥
एतां यथोक्तां विभूतिं विस्तारं योगं च युक्तिं च आत्मनो घटनम् अथवा योगैश्वर्यसामर्थ्यं सर्वज्ञत्वं योगजं योग उच्यते। मम मदीयं यो वेत्ति तत्त्वतः तत्त्वेन यथावद् इति एतत्।
सः
अविकम्पेन
अप्रचलितेन
योगेन सम्यग्दर्शनस्थैर्यलक्षणेन युज्यते सम्बध्यते न अत्र संशयो न अस्मिन् अर्थे संशयः अस्ति॥ 7॥
मेरी इस उपर्युक्त विभूतिको अर्थात् विस्तारको और योग-युक्तिको अर्थात् अपनी मायिक घटनाको, अथवा योगसे उत्पन्न हुई सर्वज्ञतारूप सामर्थ्यको जो कि योग-शब्दसे कही जाती है, जो तत्त्वसे—यथार्थ जानता है।
वह पुरुष पूर्ण ज्ञानकी स्थिरतारूप निश्चल योगसे युक्त हो जाता है, इस विषयमें (कुछ भी) संशय नहीं है॥ 7॥
कीदृशेन अविकम्पेन योगेन युज्यते इति उच्यते—
किस प्रकारके अविचल योगसे युक्त हो जाता है? सो कहा जाता है—
अहं परं ब्रह्म वासुदेवाख्यं सर्वस्य जगतः प्रभव उत्पत्तिः मत्त एव स्थितिनाशक्रिया-फलोपभोगलक्षणं विक्रियारूपं सर्वं जगत् प्रवर्तते इति एवं मत्वा भजन्ते सेवन्ते मां बुधा अवगततत्त्वार्था भावसमन्विता भावो भावना परमार्थतत्त्वाभिनिवेशः तेन समन्विताः संयुक्ता इत्यर्थः॥ 8॥
मैं वासुदेव नामक परब्रह्म समस्त जगत्की उत्पत्तिका कारण हूँ और मुझसे ही यह स्थिति, नाश, क्रिया और कर्मफलोपभोगरूप विकारमय सारा जगत् घुमाया जा रहा है। इस अभिप्रायको (अच्छी प्रकार) समझकर भावसमन्वित—परमार्थतत्त्वकी धारणासे युक्त हुए बुद्धिमान्—तत्त्वज्ञानी पुरुष मुझे भजते हैं अर्थात् मेरा चिन्तन किया करते हैं॥ 8॥
किं च—
तथा—
मच्चित्ता मयि चित्तं येषां ते मच्चित्ता मद्गतप्राणा मां गताः प्राप्ताः चक्षुरादयः प्राणा येषां ते मद्गतप्राणा मयि उपसंहृतकरणा इत्यर्थः अथवा मद्गतप्राणा मद्गतजीवना इति एतत्।
बोधयन्तः अवगमयन्तः परस्परम् अन्योन्यं कथयन्तो ज्ञानबलवीर्यादिधर्मैः विशिष्टं मां तुष्यन्ति च परितोषम् उपयान्ति रमन्ति च रतिं च प्राप्नुवन्ति प्रियसङ्गत्या इव॥ 9॥
मुझमें ही जिनका चित्त है वे मच्चित्त हैं तथा मुझमें ही जिनके चक्षु आदि इन्द्रियरूप प्राण लगे रहते हैं—मुझमें ही जिन्होंने समस्त करणोंका उपसंहार कर दिया है वे मद्गतप्राण हैं अथवा जिन्होंने मेरे लिये ही अपना जीवन अर्पण कर दिया है वे मद्गतप्राण हैं।
ऐसे मेरे भक्त आपसमें एक-दूसरेको (मेरा तत्त्व) समझाते हुए एवं ज्ञान, बल और सामर्थ्य आदि गुणोंसे युक्त मुझ परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन करते हुए सदा संतुष्ट रहते हैं अर्थात् संतोषको प्राप्त होते हैं और रमण करते हैं अर्थात् मानो कोई अपना अत्यन्त प्यारा मिल गया हो उसी तरह रतिको प्राप्त होते हैं॥ 9॥
ये यथोक्तप्रकारैः भजन्ते मां भक्ताः सन्तः—
जो पुरुष मुझमें प्रेम रखते हुए उपर्युक्त प्रकारसे मेरा भजन करते हैं—
तेषां सततयुक्तानां नित्याभियुक्तानां निवृत्त-सर्वबाह्यैषणानां भजतां सेवमानानाम्, किम् अर्थित्वादिना कारणेन, न इति आह, प्रीतिपूर्वकं प्रीतिः स्नेहः तत्पूर्वकं मां भजताम् इत्यर्थः। ददामि प्रयच्छामि बुद्धियोगं बुद्धिः सम्यग्दर्शनं मत्तत्त्वविषयं तेन योगो बुद्धियोगः तं बुद्धि-योगम्। येन बुद्धियोगेन सम्यग्दर्शनलक्षणेन मां परमेश्वरम् आत्मभूतम् आत्मत्वेन उपयान्ति प्रतिपद्यन्ते।
के, ते ये मच्चित्तत्वादिप्रकारैः मां भजन्ते॥ 10॥
उन समस्त बाह्य तृष्णाओंसे रहित निरन्तर तत्पर होकर भजन—सेवन करनेवाले पुरुषोंको, किसी वस्तुकी इच्छा आदि कारणोंसे भजनेवालोंको नहीं, किंतु प्रीतिपूर्वक भजनेवालोंको यानी प्रेमपूर्वक मेरा भजन करनेवालोंको, मैं वह बुद्धियोग देता हूँ। मेरे तत्त्वके यथार्थ ज्ञानका नाम बुद्धि है, उससे युक्त होना ही बुद्धियोग है। वह ऐसा बुद्धियोग मैं (उनको) देता हूँ कि जिस पूर्णज्ञानरूप बुद्धियोगसे वे मुझ आत्मरूप परमेश्वरको आत्मरूपसे समझ लेते हैं।
वे कौन हैं? जो “मच्चित्ताः” आदि ऊपर कहे हुए प्रकारोंसे मेरा भजन करते हैं॥ 10॥
किमर्थं कस्य वा त्वत्प्राप्तिप्रतिबन्धहेतोः नाशकं बुद्धियोगं तेषां त्वद्भक्तानां ददासि इति आकाङ्क्षायाम् आह—
आपकी प्राप्तिके कौन-से प्रतिबन्धके कारणका नाश करनेवाला बुद्धियोग आप उन भक्तोंको देते हैं और किसलिये देते हैं? इस आकांक्षापर कहते हैं—
तेषाम् एव कथं नाम श्रेयः स्याद् इति अनुकम्पार्थं दयाहेतोः अहम् अज्ञानजम् अविवेकतो जातं मिथ्याप्रत्ययलक्षणं मोहान्धकारं तमो नाशयामि
आत्मभावस्थ
आत्मनो
भावः अन्तःकरणाशयः तस्मिन् एव स्थितः सन्। ज्ञानदीपेन विवेकप्रत्ययरूपेण।
भक्तिप्रसादस्नेहाभिषिक्तेन मद्भावनाभि-निवेशवातेरितेन ब्रह्मचर्यादिसाधनसंस्कारवत्-प्रज्ञावर्तिना
विरक्तान्तःकरणाधारेण विषयव्यावृत्तचित्तरागद्वेषाकलुषितनिवातापवार-कस्थेन नित्यप्रवृत्तैकाग् ्रयध्यानजनितसम्यग्दर्शन-भास्वता ज्ञानदीपेन इत्यर्थः॥ 11॥
उन (मेरे भक्तों)-का किसी तरह भी कल्याण हो ऐसा अनुग्रह करनेके लिये ही मैं उनके आत्मभावमें स्थित हुआ अर्थात् आत्माका भाव जो अन्तःकरण है उसमें स्थित हुआ उनके अविवेकजन्य मिथ्या प्रतीतिरूप मोहमय अन्धकारको प्रकाशमय विवेक-बुद्धिरूप ज्ञानदीपकद्वारा नष्ट कर देता हूँ।
अर्थात् जो भक्तिके प्रसादरूप घृतसे परिपूर्ण है और मेरे स्वरूपकी भावनाके अभिनिवेशरूप वायुकी सहायतासे प्रज्वलित हो रहा है, जिसमें ब्रह्मचर्य आदि साधनोंके संस्कारोंसे युक्त बुद्धिरूप बत्ती है, आसक्तिरहित अन्तःकरण जिसका आधार है, जो विषयोंसे हटे हुए और राग-द्वेषरूप कालुष्यसे रहित हुए चित्तरूप वायुरहित अपवारकमें (ढकनेमें) स्थित है और जो निरन्तर अभ्यास किये हुए एकाग्रतारूप ध्यानजनित, पूर्ण ज्ञानस्वरूप प्रकाशसे युक्त है, उस ज्ञानदीपकद्वारा (मैं उनके मोहका नाश कर देता हूँ)॥ 11॥
यथोक्तां भगवतो विभूतिं योगं च श्रुत्वा—
ऊपर कही हुई भगवान्की विभूतिको और योगको सुनकर अर्जुन बोला—
परं ब्रह्म परमात्मा परं धाम परं तेजः पवित्रं पावनं परमं प्रकृष्टं भवान् पुरुषं शाश्वतं नित्यं दिव्यं दिवि भवम् आदिदेवं सर्वदेवानाम् आदौ भवं देवम् अजं विभुं विभवनशीलम्॥ 12॥
आप परमब्रह्म-परमात्मा, परमधाम—परमतेज और परमपावन हैं तथा आप नित्य और दिव्य पुरुष हैं अर्थात् देवलोकमें रहनेवाले अलौकिक पुरुष हैं एवं आप सब देवोंसे पहले होनेवाले आदिदेव, अजन्मा और व्यापक हैं॥ 12॥
ईदृशम्—
ऐसे—
आहुः कथयन्ति त्वाम् ऋषयो वसिष्ठादयः सर्वे देवर्षिः नारदः तथा असितो देवलः अपि एवम् एव आह व्यासः च स्वयं च एव ब्रवीषि मे॥ 13॥
आपका वसिष्ठादि सब महर्षिगण वर्णन करते हैं तथा असित, देवल, व्यास और देवर्षि नारद भी इसी प्रकार कहते हैं एवं स्वयं आप भी मुझसे ऐसा ही कह रहे हैं॥ 13॥
सर्वम् एतद् यथोक्तम् ऋषिभिः त्वया च तद् ऋतं सत्यम् एव मन्ये यद् मां प्रति वदसि भाषसे हे केशव। न हि ते तव भगवन् व्यक्तिं प्रभवं विदुः न देवा न दानवाः॥ 14॥
हे केशव! उपर्युक्त प्रकारसे ऋषियोंद्वारा और आपके द्वारा कही हुई ये सब बातें जो कि आप मुझसे कह रहे हैं, मैं सत्य मानता हूँ; क्योंकि हे भगवन्! आपकी उत्पत्तिको न देवता जानते हैं और न दानव ही जानते हैं॥ 14॥
यतः त्वं देवादीनाम् आदिः अतः—
क्योंकि आप देवादिके आदि कारण हैं, इसलिये—
स्वयम् एव आत्मना आत्मानं वेत्थ त्वं निरतिशयज्ञानैश्वर्यबलादिशक्तिमन्तम्
ईश्वरं पुरुषोत्तम। भूतानि भावयति इति भूतभावनो हे भूतभावन भूतेश भूतानाम् ईश, हे देवदेव जगत्पते॥ 15॥
हे पुरुषोत्तम! हे भूतप्राणियोंको उत्पन्न करनेवाले भूतभावन! हे भूतेश—भूतोंके ईश्वर! हे देवोंके देव! हे जगत्पते! आप स्वयं ही अपने द्वारा अपने-आपको अर्थात् निरतिशय ज्ञान, ऐश्वर्य, सामर्थ्य आदि शक्तियोंसे युक्त ईश्वरको जानते हैं॥ 15॥
वक्तुं कथयितुम् अर्हसि अशेषेण दिव्या हि आत्मविभूतय आत्मनो विभूतयो याः ता वक्तुम् अर्हसि याभिः विभूतिभिः आत्मनो माहात्म्यविस्तरैः इमान् लोकान् त्वं व्याप्य तिष्ठसि॥ 16॥
अपनी दिव्य विभूतियोंका पूर्णतया वर्णन करनेमें (आप ही) समर्थ हैं—आपकी जो विभूतियाँ हैं, जिन विभूतियोंसे अर्थात् अपने माहात्म्यके विस्तारसे आप इन सारे लोकोंको व्याप्त करके स्थित हो रहे हैं, उन्हें कहनेमें आप ही समर्थ हैं॥ 16॥
कथं विद्यां विजानीयाम् अहं हे योगिन् त्वां सदा परिचिन्त्यन्। केषु केषु च भावेषु वस्तुषु चिन्त्यः असि ध्येयः असि भगवन् मया॥ 17॥
हे योगिन्! आपका सदा चिन्तन करता हुआ मैं आपको किस प्रकार जानूँ? हे भगवन्! आप किन-किन भावोंमें अर्थात् वस्तुओंमें मेरे द्वारा चिन्तन किये जानेयोग्य हैं॥ 17॥
विस्तरेण आत्मनो योगं योगैश्वर्यशक्ति-विशेषं विभूतिं च विस्तरं ध्येयपदार्थानां हे जनार्दन।
अर्दतेः* गतिकर्मणो रूपम्। असुराणां देवप्रतिपक्षभूतानां जनानां नरकादिगमयितृत्वाद् जनार्दनः। अभ्युदयनिःश्रेयसपुरुषार्थप्रयोजनं सर्वैः जनैः याच्यते इति वा।
भूयः पूर्वम् उक्तम् अपि कथय तृप्तिः हि परितोषो यस्माद् न अस्ति मे शृण्वतः त्वन्मुख-निःसृतवाक्यामृतम्॥ 18॥
हे जनार्दन! अपने योगको—अपनी योगैश्वर्यरूप विशेष शक्तिको और विभूतिको यानी चिन्तन करनेयोग्य पदार्थोंके विस्तारको, विस्तारपूर्वक कहिये।
गमन जिसका कर्म है ऐसी अर्द धातुका रूप जनार्दन है। असुरोंको यानी देवोंके प्रतिपक्षी मनुष्योंको नरकादिमें भेजनेवाले होनेसे भगवान्का नाम जनार्दन है। अथवा उन्नति और कल्याण—ये दोनों पुरुषार्थरूप प्रयोजन सब लोगोंके द्वारा भगवान्से माँगे जाते हैं, इसलिये भगवान्का नाम जनार्दन है—
यद्यपि आप पहले कह चुके हैं तो भी फिर कहिये; क्योंकि आपके मुखसे निकले हुए वाक्यरूप अमृतको सुनते-सुनते मुझे तृप्ति नहीं होती है—संतोष नहीं होता है॥ 18॥
श्रीभगवान् बोले—
हन्त इदानीं ते दिव्या दिवि भवा आत्मविभूतय आत्मनो मम विभूतयो याः ताः कथयिष्यामि इति एतत्, प्राधान्यतो यत्र यत्र प्रधाना या या विभूतिः तां तां प्रधानां प्राधान्यतः कथयिष्यामि अहं कुरुश्रेष्ठ। अशेषतः तु वर्षशतेन अपि न शक्या वक्तुं यतो न अस्ति अन्तो विस्तरस्य मे मम विभूतीनाम् इत्यर्थः॥ 19॥
हे कुरुवंशियोंमें श्रेष्ठ! अब मैं तुझे अपनी दिव्य— देवलोकमें होनेवाली विभूतियाँ प्रधानतासे बतलाता हूँ अर्थात् मेरी जहाँ-जहाँपर जो-जो प्रधान-प्रधान विभूतियाँ हैं, उन-उन प्रधान विभूतियोंका ही मैं प्रधानतासे वर्णन करता हूँ। सम्पूर्णतासे तो वे सैकड़ों वर्षोंमें भी नहीं कही जा सकतीं; क्योंकि मेरे विस्तारका अर्थात् मेरी विभूतियोंका अन्त नहीं है॥ 19॥
तत्र प्रथमम् एव तावत् शृणु—
उनमें तू पहली विभूतिको ही सुन—
अहम् आत्मा प्रत्यगात्मा गुडाकेश गुडाका निद्रा तस्या ईशो गुडाकेशो जितनिद्र इत्यर्थः, घनकेश इति वा। सर्वेषां भूतानाम् आशये अन्तर्हृदि स्थितः नित्यं ध्येयः।
तदशक्तेन च उत्तरेषु भावेषु चिन्त्यः, अहं चिन्तयितुं शक्यो यस्माद् अहम् एव आदिः भूतानां कारणं तथा मध्यं च स्थितिः अन्तः प्रलयः च॥ 20॥
गुडाका—निद्रा उसका स्वामी यानी निद्राजयी होनेके कारण अथवा घनकेश होनेके कारण अर्जुनका नाम गुडाकेश है। हे गुडाकेश! समस्त भूतोंके आशयमें यानी आन्तरिक हृदयदेशमें स्थित सबका अन्तरात्मा मैं हूँ (ऊँचे अधिकारियोंको तो) मेरा ध्यान सदा इस प्रकार करना चाहिये।
परंतु जो ऐसा ध्यान करनेमें असमर्थ हों उन्हें आगे कहे हुए भावोंमें मेरा चिन्तन करना चाहिये, अर्थात् उनके द्वारा (इन अगले भावोंमें) मेरा चिन्तन किया जा सकता है; क्योंकि मैं ही सब भूतोंका आदि, मध्य और अन्त हूँ अर्थात् उनकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयरूप मैं ही हूँ॥ 20॥
एवं च ध्येयः अहम्—
तथा इस प्रकार भी मेरा ध्यान किया जा सकता है—
आदित्यानां द्वादशानां विष्णुः नाम आदित्यः अहम्, ज्योतिषां रविः प्रकाशयितॄणाम् अंशुमान् रश्मिमान् मरीचिः नाम मरुतां मरुद्देवताभेदानाम् अस्मि नक्षत्राणाम् अहं शशी चन्द्रमाः॥ 21॥
द्वादश आदित्योंमें मैं विष्णु नामक आदित्य हूँ। प्रकाश करनेवाली ज्योतियोंमें मैं किरणोंवाला सूर्य हूँ। वायु-सम्बन्धी देवताओंके भेदोंमें मैं मरीचि नामक देवता हूँ और नक्षत्रोंमें मैं शशी—चन्द्रमा हूँ॥ 21॥
वेदानां मध्ये सामवेदः अस्मि, देवानां रुद्रा-दित्यादीनां वासव इन्द्रः अस्मि, इन्द्रियाणाम् एकादशानां चक्षुरादीनां मनः च अस्मि सङ्कल्पविकल्पात्मकं मनः च अस्मि। भूतानाम् अस्मि चेतना, कार्यकरणसङ्घाते नित्याभिव्यक्ता बुद्धिवृत्तिः चेतना॥ 22॥
मैं वेदोंमें सामवेद हूँ, रुद्र, आदित्य आदि देवोंमें इन्द्र हूँ और चक्षु आदि एकादश इन्द्रियोंमें संकल्प-विकल्पात्मक मन हूँ। सब प्राणियोंमें (मैं) चेतना हूँ। कार्य-करणके समुदायरूप शरीरमें सदा प्रकाशित रहनेवाली जो बुद्धिवृत्ति है, उसका नाम चेतना है॥ 22॥
रुद्राणां एकादशानां शङ्करः च अस्मि, वित्तेशः कुबेरो यक्षरक्षसां यक्षाणां रक्षसां च, वसूनाम् अष्टानां पावकः च अस्मि अग्निः, मेरुः शिखरिणां शिखरवताम् अहम्॥ 23॥
एकादश रुद्रोंमें मैं शंकर हूँ। यक्ष और राक्षसोंमें मैं धनेश्वर कुबेर हूँ। आठ वसुओंमें मैं पावक—अग्नि हूँ। शिखरवालोंमें (पर्वतोंमें) मैं सुमेरु पर्वत हूँ॥ 23॥
पुरोधसां राजपुरोहितानां मुख्यं प्रधानं मां विद्धि जानीहि हे पार्थ बृहस्पतिम्। स हि इन्द्रस्य इति मुख्यः स्यात् पुरोधाः। सेनानीनां सेनापतीनाम् अहं स्कन्दो देवसेनापतिः। सरसां यानि देवखातानि सरांसि तेषां सरसां सागरः अस्मि भवामि॥ 24॥
हे पार्थ! पुरोहितोंमें यानी राजपुरोहितोंमें तू मुझे प्रधान पुरोहित बृहस्पति समझ; क्योंकि वे ही इन्द्रके मुख्य पुरोहित हैं। सेनापतियोंमें मैं देवोंका सेनापति कार्तिकेय हूँ तथा सरोवरोंमें अर्थात् जो देवनिर्मित सरोवर हैं उनमें समुद्र हूँ॥ 24॥
महर्षीणां भृगुः अहम्, गिरां वाचां पदलक्षणानाम् एकम् अक्षरम् ओङ्कारः अस्मि। यज्ञानां जपयज्ञः अस्मि, स्थावराणां स्थितिमतां हिमालयः॥ 25॥
महर्षियोंमें मैं भृगु हूँ, वाणीसम्बन्धी भेदोंमें— पदात्मक वाक्योंमें एक अक्षर—ओंकार हूँ, यज्ञोंमें जपयज्ञ हूँ और स्थावरोंमें अर्थात् अचल पदार्थोंमें हिमालय नामक पर्वत हूँ॥ 25॥
अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम्, देवर्षीणां च नारदो देवा एव सन्त ऋषित्वं प्राप्ता मन्त्रदर्शित्वात् ते देवर्षयः तेषां नारदः अस्मि। गन्धर्वाणां चित्ररथो नाम गन्धर्वः अस्मि। सिद्धानां जन्मना एव धर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्यातिशयं प्राप्तानां कपिलो मुनिः॥ 26॥
समस्त वृक्षोंमें पीपलका वृक्ष और देवर्षियोंमें अर्थात् जो देव होकर मन्त्रोंके द्रष्टा होनेके कारण ऋषिभावको प्राप्त हुए हैं, उनमें मैं नारद हूँ। गन्धर्वोंमें मैं चित्ररथ नामक गन्धर्व हूँ, सिद्धोंमें अर्थात् जन्मसे ही अतिशय धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्यको प्राप्त हुए पुरुषोंमें मैं कपिल मुनि हूँ॥ 26॥
उच्चैःश्रवसम् अश्वानाम् उच्चैःश्रवा नाम अश्वः तं मां विद्धि जानीहि अमृतोद्भवम् अमृतनिमित्तमथनोद्भवम्। ऐरावतम् इरावत्या अपत्यं गजेन्द्राणां हस्तीश्वराणां तं मां विद्धि इति अनुवर्तते। नराणां मनुष्याणां च नराधिपं राजानं मां विद्धि जानीहि॥ 27॥
घोड़ोंमें, जो अमृतप्राप्तिके निमित्त किये हुए समुद्रमन्थनसे उत्पन्न उच्चैःश्रवा नामक घोड़ा है, उसको तू मेरा स्वरूप समझ। गजेन्द्रोंमें—मुख्य हाथियोंमें—इरावतीका पुत्र जो ऐरावत नामक हाथी है, उसको तू मेरा स्वरूप जान और मनुष्योंमें मुझे तू राजा समझ॥ 27॥
आयुधानाम् अहं वज्रं दधीच्यस्थिसम्भवं धेनूनां दोग्ध्रीणाम् अस्मि कामधुक्, वसिष्ठस्य सर्वकामानां दोग्ध्री सामान्या वा कामधुक्। प्रजनः प्रजनयिता अस्मि कन्दर्पः कामः, सर्पाणां सर्पभेदानाम् अस्मि वासुकिः सर्पराजः॥ 28॥
शस्त्रोंमें मैं दधीचि ऋषिकी अस्थियोंसे बना हुआ वज्र हूँ। दूध देनेवाली गौओंमें कामधेनु—वसिष्ठको सब कामनारूप दूध देनेवाली अथवा सामान्य भावसे जो भी कामधेनु है वह मैं हूँ। प्रजाको उत्पन्न करनेवाला कामदेव मैं हूँ और सर्पोंमें अर्थात् सर्पोंके नाना भेदोंमें सर्पराज वासुकि मैं हूँ॥ 28॥
अनन्तः च अस्मि नागानां नागविशेषाणां नागराजः च अस्मि। वरुणो यादसाम् अहम् अब्देवतानां राजा अहम्। पितॄणाम् अर्यमा नाम पितृराजः च अस्मि, यमः संयमतां संयमनं कुर्वताम् अहम्॥ 29॥
नागोंके नाना भेदोंमें मैं अनन्त हूँ अर्थात् नागराज शेष हूँ और जलसम्बन्धी देवोंमें उनका राजा वरुण मैं हूँ। मैं पितरोंमें अर्यमा नामक पितृराज हूँ और शासन करनेवालोंमें यमराज हूँ॥ 29॥
प्रह्लादो नाम च अस्मि दैत्यानां दितिवंश्यानाम्, कालः कलयतां कलनं गणनं कुर्वताम् अहम्, मृगाणां च मृगेन्द्रः सिंहो व्याघ्रो वा अहम्, वैनतेयः च गरुत्मान् विनतासुतः पक्षिणां पतत्रिणाम्॥ 30॥
दैत्योंमें अर्थात् दितिके वंशजोंमें मैं प्रह्लाद नामक दैत्य हूँ और कलना—गणना करनेवालोंमें मैं काल हूँ। पशुओंमें पशुओंका राजा सिंह या व्याघ्र और पक्षियोंमें विनतापुत्र—गरुड़ मैं हूँ॥ 30॥
पवनो वायुः पवतां पावयितॄणाम् अस्मि, रामः शस्त्रभृताम् अहं शस्त्राणां धारयितॄणां दाशरथी रामः अहम्। झषाणां मत्स्यादीनां मकरो नाम जातिविशेषः अहं स्त्रोतसां स्त्रवन्तीनाम् अस्मि जाह्नवी गङ्गा॥ 31॥
पवित्र करनेवालोंमें वायु और शस्त्रधारियोंमें दशरथपुत्र राम मैं हूँ, मछली आदि जलचर प्राणियोंमें मकर नामक जलचरोंकी जातिविशेष मैं हूँ, स्त्रोतोंमें— नदियोंमें मैं जाह्नवी —गङ्गा हूँ॥ 31॥
सृष्टीनाम् आदिः अन्तः च मध्यं च एव अहम् उत्पत्तिस्थितिलया अहम् अर्जुन। भूतानां जीवाधिष्ठितानाम् एव आदिः अन्तः च इत्यादि उक्तम् उपक्रमे, इह तु सर्वस्य एव सर्गमात्रस्य इति विशेषः।
अध्यात्मविद्या विद्यानां मोक्षार्थत्वात् प्रधानम् अस्मि। वादः अर्थनिर्णयहेतुत्वात् प्रवदतां प्रधानम् अतः सः अहम् अस्मि। प्रवक्तृद्वारेण वदनभेदानाम् एव वादजल्पवितण्डानाम् इह ग्रहणं प्रवदताम् इति॥ 32॥
हे अर्जुन! सृष्टियोंका आदि, अन्त और मध्य अर्थात् उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय मैं हूँ। आरम्भमें तो भगवान्ने अपनेको केवल चेतनाधिष्ठित प्राणियोंका ही आदि, मध्य और अन्त बतलाया है, परंतु यहाँ समस्त जगन्मात्रका आदि, मध्य और अन्त बतलाते हैं, यह विशेषता है।
समस्त विद्याओंमें जो कि मोक्ष देनेवाली होनेके कारण प्रधान है, वह अध्यात्मविद्या मैं हूँ। शंका-समाधान करनेके समय बोले जानेवाले वाक्योंमें जो अर्थनिर्णयका हेतु होनेसे प्रधान है वह वाद नामक वाक्य मैं हूँ। यहाँ “प्रवदताम्” इस पदसे वक्ताद्वारा बोले जानेवाले वाद, जल्प और वितण्डा— इन तीन प्रकारके वचन-भेदोंका ही ग्रहण है (बोलनेवालोंका नहीं)॥ 32॥
अक्षराणां वर्णानाम् अकारो वर्णः अस्मि द्वन्द्वः
समासः
अस्मि
सामासिकस्य समाससमूहस्य। किं च अहम् एव अक्षयः अक्षीणः कालः प्रसिद्धः क्षणाद्याख्यः, अथवा परमेश्वरः कालस्य अपि कालः अस्मि, धाता अहं कर्मफलस्य विधाता सर्वजगतो विश्वतोमुखः सर्वतोमुखः॥ 33॥
अक्षरोंमें—वर्णोंमें अकार—“अ” वर्ण मैं हूँ। समाससमूहमें द्वन्द्व नामक समास मैं हूँ तथा मैं ही अविनाशी काल—जो क्षण-घड़ी आदि नामोंसे प्रसिद्ध है वह समय अथवा कालका भी काल परमेश्वर हूँ और मैं ही विधाता—सब जगत्के कर्मफलका विधान करनेवाला तथा सब ओर मुखवाला परमात्मा हूँ॥ 33॥
मृत्युः द्विविधो धनादिहरः प्राणहरः च सर्वहर उच्यते सः अहम् इत्यर्थः। अथवा पर ईश्वरः प्रलये सर्वहरणात् सर्वहरः सः अहम्।
उद्भव उत्कर्षः अभ्युदयः तत्प्राप्तिहेतुः च अहम्, केषां भविष्यतां भाविकल्याणानाम् उत्कर्षप्राप्तियोग्यानाम् इत्यर्थः।
कीर्तिः श्रीः वाक् च नारीणां स्मृतिः मेधा धृतिः क्षमा इति एता उत्तमाः स्त्रीणाम् अहम् अस्मि यासाम् आभासमात्रसम्बन्धेन अपि लोकः कृतार्थम् आत्मानं मन्यते॥ 34॥
धनादिका नाश करनेवाला और प्राणोंका नाश करनेवाला ऐसे दो प्रकारका मृत्यु “सर्वहर” कहलाता है, वह सर्वहर मृत्यु मैं हूँ। अथवा परम ईश्वर प्रलयकालमें सबका नाश करनेवाला होनेसे सर्वहर है, वह मैं हूँ।
भविष्यत्में जिनका कल्याण होनेवाला है अर्थात् जो उत्कर्षता-प्राप्तिके योग्य हैं उनका उद्भव अर्थात् उत्कर्ष—उन्नतिकी प्राप्तिका कारण मैं हूँ।
स्त्रियोंमें जो कीर्ति, श्री, वाणी, स्मृति, बुद्धि, धृति और क्षमा ये उत्तम स्त्रियाँ हैं, जिनके आभासमात्र-सम्बन्धसे भी लोग अपनेको कृतार्थ मानते हैं, वे मैं हूँ॥ 34॥
बृहत्साम तथा साम्नां प्रधानम् अस्मि। गायत्री छन्दसाम् अहं गायत्र्यादिछन्दोविशिष्टानाम् ऋचां गायत्री ऋग् अहम् इत्यर्थः। मासानां मार्गशीर्षः अहम् ऋतूनां कुसुमाकरो वसन्तः॥ 35॥
तथा सामवेदके प्रकरणोंमें जो बृहत्साम नामक प्रधान प्रकरण है वह मैं हूँ। छन्दोंमें मैं गायत्री छन्द हूँ अर्थात् जो गायत्री आदि छन्दोबद्ध ऋचाएँ हैं उनमें गायत्री नामक ऋचा मैं हूँ। महीनोंमें मार्गशीर्ष नामक महीना और ऋतुओंमें वसन्त-ऋतु मैं हूँ॥ 35॥
द्यूतम्
अक्षदेवनादिलक्षणं
छलयतां छलस्य कर्तृृणाम् अस्मि, तेजः तेजस्विनाम् अहम्, जयः अस्मि जेतॄणाम्, व्यवसायः अस्मि व्यवसायिनाम् सत्त्वं सत्त्ववतां सात्त्विकानाम् अहम्॥ 36॥
छल करनेवालोंमें जो पासोंसे खेलना आदि द्यूत है वह मैं हूँ। तेजस्वियोंका मैं तेज हूँ। जीतनेवालोंका मैं विजय हूँ। निश्चय करनेवालोंका निश्चय (अथवा उद्यमशीलोंका उद्यम) हूँ और सत्त्वयुक्त पुरुषोंका अर्थात् सात्त्विक पुरुषोंका मैं सत्त्वगुण हूँ॥ 36॥
वृष्णीनां वासुदेवः अस्मि अयम् एव अहं त्वत्सखा, पाण्डवानां धनञ्जयः त्वम् एव, मुनीनां मननशीलानां सर्वपदार्थज्ञानिनाम् अपि अहं व्यासः, कवीनां क्रान्तदर्शिनाम् उशना कविः अस्मि॥ 37॥
वृष्णिवंशियोंमें यह तुम्हारा सखा वासुदेव मैं हूँ। पाण्डवोंमें धनञ्जय अर्थात् तू ही मैं हूँ। मुनियोंमें अर्थात् मनन करनेवालोंमें और सब पदार्थोंको जाननेवालोंमें भी मैं व्यास हूँ। कवियोंमें अर्थात् त्रिकालदर्शियोंमें मैं शुक्राचार्य हूँ॥ 37॥
दण्डो दमयतां दमयितॄणाम् अस्मि अदान्तानां दमकारणम्, नीतिः अस्मि जिगीषतां जेतुम् इच्छताम्, मौनं च एव अस्मि गुह्यानां गोप्यानाम्, ज्ञानं ज्ञानवताम् अहम्॥ 38॥
दमन करनेवालोंका दण्ड अर्थात् उन्मार्गमें चलनेवालोंको दमन करनेकी शक्ति मैं हूँ। विजय चाहनेवालोंका न्याय मैं हूँ। गुप्त रखने योग्य भावोंमें मौन मैं हूँ। ज्ञानवानोंका ज्ञान मैं हूँ॥ 38॥
यत् च अपि सर्वभूतानां बीजं प्ररोहकारणं तद् अहम् अर्जुन।
प्रकरणोपसंहारार्थं विभूतिसङ्क्षेपम् आह—
न तद् अस्ति भूतं चराचरं चरम् अचरं वा मया विना यत् स्याद् भवेद् मया अपकृष्टं परित्यक्तं निरात्मकं शून्यं हि तत् स्याद् अतो मदात्मकं सर्वम् इत्यर्थः॥ 39॥
हे अर्जुन! सर्वभूतोंका जो बीज अर्थात् उत्पत्तिका कारण है, वह मैं हूँ।
प्रकरणका उपसंहार करनेके लिये समस्त विभूतियोंका सार कहते हैं—
ऐसा वह चर या अचर कोई भी भूत प्राणी नहीं है जो मेरे बिना हो। क्योंकि जो मुझसे रहित होगा वह सत्तारहित—शून्य होगा, अतः यह सिद्ध हुआ कि सब कुछ मेरा ही स्वरूप है॥ 39॥
न अन्तः अस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां विस्तराणां परन्तप। न हि ईश्वरस्य सर्वात्मनो दिव्यानां विभूतीनाम् इयत्ता शक्या वक्तुं ज्ञातुं वा केनचित्। एष तु उद्देशत एकदेशेन प्रोक्तो विभूतेः विस्तरो मया॥ 40॥
हे परन्तप! मेरी दिव्य विभूतियोंका अर्थात् विस्तारका अन्त नहीं है। क्योंकि सर्वात्मरूप ईश्वरकी दिव्य विभूतियाँ “इतनी ही है” इस प्रकार किसीके द्वारा भी जाना या कहा नहीं जा सकता। यह तो अपनी विभूतियोंका विस्तार मेरे द्वारा संक्षेपसे अर्थात् एक अंशसे ही कहा गया है॥ 40॥
यद् यद् लोके विभूतिमद् विभूतियुक्तं सत्त्वं वस्तु श्रीमद् उर्जितम् एव वा श्रीः लक्ष्मीः तया सहितम् उत्साहोपेतं वा। तत् तद् एव अवगच्छ त्वं जानीहि मम ईश्वरस्य तेजोंऽशसम्भवं
तेजसः
अंश
एकदेशः सम्भवो यस्य यत् तेजोंऽशसम्भवम् इति अवगच्छ त्वम्॥ 41॥
संसारमें जो-जो भी पदार्थ विभूतिमान्—विभूतियुक्त हैं तथा श्रीमान् और ऊर्जित (शक्तिमान्) अर्थात् श्री—लक्ष्मी, उससे युक्त और उत्साहयुक्त हैं उन-उनको तू मुझ ईश्वरके तेजोमय अंशसे उत्पन्न हुए ही जान। अर्थात् मेरे तेजका एक अंश—भाग ही जिनकी उत्पत्तिका कारण है, इन सब वस्तुओंको ऐसी जान॥ 41॥
अथवा बहुना एतेन एवमादिना किं ज्ञातेन तव अर्जुन स्यात् सावशेषेण। अशेषतः त्वम् इमम् उच्यमानम् अर्थं शृणु।
विष्टभ्य विशेषतः स्तम्भनं दृढं कृत्वा इदं कृत्स्नं जगद् एकांशेन एकावयवेन एकपादेन सर्वभूतस्वरूपेण इति एतत्, तथा च मन्त्र-वर्णः—“पादोऽस्य विश्वा भूतानि” (तै0 आर0 3। 12) इति स्थितः अहम् इति॥ 42॥
अथवा हे अर्जुन! इस उपर्युक्त प्रकारसे वर्णन किये हुए अधूरे विभूति-विस्तारके जाननेसे तेरा क्या (प्रयोजन सिद्ध) होगा, (तू तो बस,) यह सम्पूर्णतासे कहा जानेवाला अभिप्राय ही सुन ले—
मैं एक अंशसे अर्थात् सर्व भूतोंका आत्मरूप जो मेरा एक अवयव है उससे, इस सारे जगत्को विशेष रूपसे दृढ़तापूर्वक धारण करके स्थित हो रहा हूँ। ऐसा ही वेदमन्त्र भी कहते हैं कि “समस्त भूत इस परमेश्वरका एक पाद है।” इत्यादि॥ 42॥