ग्रन्थ
10विभूतियोग

विभूतियोग

Vibhuti-Yoga
Divine Manifestations
42 verses · 40 printed blockspp. 468514 · Srimad Bhagavad Gita — Tattva-Vivechaniसाधारण भाषाटीका 40 · साधक-संजीवनी 40 · श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्य 42 · श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीका 40
1श्रीभगवान्
श्रीभगवान् उवाच
श्रीभगवानुवाच भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः। यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया॥ 1॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
श्रीभगवान् बोले—हे महाबाहो! फिर भी मेरे परम रहस्य और प्रभावयुक्त वचनको सुन, जिसे मैं तुझ अतिशय प्रेम रखनेवालेके लिये हितकी इच्छासे कहूँगा॥ 1॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—सातवें अध्यायसे लेकर नवें अध्यायतक विज्ञानसहित ज्ञानका जो वर्णन किया गया उसके बहुत गम्भीर हो जानेके कारण अब पुनः उसी विषयको दूसरे प्रकारसे भलीभाँति समझानेके लिये दसवें अध्यायका आरम्भ किया जाता है। यहाँ पहले श्लोकमें भगवान् पूर्वोक्त विषयका ही पुनः वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा करते हैं—

2
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः। अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः॥ 2॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
मेरी उत्पत्तिको अर्थात् लीलासे प्रकट होनेको न देवतालोग जानते हैं और न महर्षिजन ही जानते हैं, क्योंकि मैं सब प्रकारसे देवताओंका और महर्षियोंका भी आदिकारण हूँ॥ 2॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—पहले श्लोकमें भगवान्ने जिस विषयपर कहनेकी प्रतिज्ञा की है; उसका वर्णन आरम्भ करते हुए वे पहले पाँच श्लोकोंमें योगशब्दवाच्य प्रभावका और अपनी विभूतिका संक्षिप्त वर्णन करते हैं—

3
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्। असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ 3॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो मुझको अजन्मा अर्थात् वास्तवमें जन्मरहित, अनादि और लोकोंका महान् ईश्वर तत्त्वसे जानता है, वह मनुष्योंमें ज्ञानवान् पुरुष सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ 3॥
4–5Merged
बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः। सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च॥ 4॥ अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः। भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः॥ 5॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
निश्चय करनेकी शक्ति, यथार्थ ज्ञान, असम्मूढता, क्षमा, सत्य, इन्द्रियोंका वशमें करना, मनका निग्रह तथा सुख-दुःख, उत्पत्ति-प्रलय और भय-अभय तथा अहिंसा, समता, सन्तोष, तप, दान, कीर्ति और अपकीर्ति—ऐसे ये प्राणियोंके नाना प्रकारके भाव मुझसे ही
* मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि प्राणियोंके निमित्तसे प्राप्त होनेवाले कष्टोंको “आधिभौतिक”, अनावृष्टि,
अतिवृष्टि, भूकम्प, वज्रपात और अकाल आदि दैवी प्रकोपसे होनेवाले कष्टोंको “आधिदैविक” और शरीर, इन्द्रिय तथा
अन्तःकरणमें किसी प्रकारके रोगसे होनेवाले कष्टोंको “आध्यात्मिक” दुःख कहते हैं।
6
महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा। मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः॥ 6॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
सात महर्षिजन, चार उनसे भी पूर्वमें होनेवाले सनकादि तथा स्वायम्भुव आदि चौदह मनु—ये मुझमें भाववाले सब-के-सब मेरे संकल्पसे उत्पन्न हुए हैं, जिनकी संसारमें यह सम्पूर्ण
(वायुपुराण 61। 93-94)
(महा0, शान्ति0 340। 69-70)
1-देवर्षियोंके लक्षण इसी अध्यायके 12-13वें श्लोकोंकी टीकामें देखिये।
2-ये सप्तर्षि प्रवृत्तिमार्गी होते हैं, इनके विचारोंका और जीवनका वर्णन इस प्रकार है—
षट्कर्माभिरता नित्यं शालिनो गृहमेधिनः। तुल्यैर्व्यवहरन्ति स्म अदृष्टैः कर्महेतुभिः॥
अग्राम्यैर्वर्तयन्ति स्म रसैश्चैवस्वयंकृतैः। कुटुम्बिनः
ऋद्धिमन्तो
बाह्यान्तरनिवासिनः॥
कृतादिषु युगाख्येषु सर्वेष्वेव पुनः पुनः। वर्णाश्रमव्यवस्थानं क्रियते प्रथमं तु वै॥
(वायुपुराण 61। 95—97)
ये महर्षि पढ़ना-पढ़ाना, यज्ञ करना-कराना, दान देना-लेना—इन छः कर्मोंको सदा करनेवाले, ब्रह्मचारियोंको पढ़ानेके
लिये घरोंमें गुरुकुल रखनेवाले तथा प्रजाकी उत्पत्तिके लिये ही स्त्री और अग्निका ग्रहण करनेवाले होते हैं। कर्मजन्य
अदृष्टकी दृष्टिसे (अर्थात् वर्ण आदिमें) जो समान हैं, उन्हींके साथ ये व्यवहार करते हैं और अपने ही द्वारा रचित अनिन्द्य
भोग्य-पदार्थोंसे निर्वाह करते हैं। ये बाल-बच्चेवाले, गो-धन आदि सम्पत्तिवाले तथा लोकोंके बाहर तथा भीतर निवास
करनेवाले हैं। सत्य आदि सभी युगोंके आरम्भमें पहले-पहल ये ही सब महर्षिगण बार-बार वर्णाश्रमधर्मकी व्यवस्था किया
करते हैं।
* ये सातों ही अत्यन्त तेजस्वी, तपस्वी और बुद्धिमान् प्रजापति हैं। प्रजाकी उत्पत्ति करनेवाले होनेके कारण इनको
“सप्त ब्रह्मा” कहा गया है (महाभारत, शान्तिपर्व 208। 3,4,5)। इनका संक्षिप्त चरित्र इस प्रकार है—
(1) मरीचि—ये भगवान्के अंशांशावतार माने जाते हैं। इनके कई पत्नियाँ हैं, जिनमें प्रधान दक्ष-प्रजापतिकी पुत्री
सम्भूति और धर्म नामक ब्राह्मणकी कन्या धर्मव्रता हैं। इनकी सन्ततिका बड़ा विस्तार है। महर्षि कश्यप इन्हींके पुत्र हैं।
ब्रह्माजीने इनको पद्मपुराणका कुछ अंश सुनाया था। प्रायः सभी पुराणोंमें, महाभारतमें और वेदोंमें भी इनके प्रसंगमें बहुत
कुछ कहा गया है। ब्रह्माजीने सबसे पहले ब्रह्मपुराण इन्हींको दिया था। ये सदा-सर्वदा सृष्टिकी उत्पत्ति और उसके पालनके
कार्यमें लगे रहते हैं। इनकी विस्तृत कथा वायुपुराण, स्कन्दपुराण, अग्निपुराण, पद्मपुराण, मार्कण्डेयपुराण, विष्णुपुराण और
महाभारत आदिमें है।
(2) अंगिरा—ये बड़े ही तेजस्वी महर्षि हैं। इनके कई पत्नियाँ हैं, जिनमें प्रधानतया तीन हैं; उनमेंसे
मरीचिकी कन्या सुरूपासे बृहस्पतिका, कर्दम ऋषिकी कन्या स्वराट्से गौतम-वामदेवादि पाँच पुत्रोंका और मनुकी
पुत्री पथ्यासे विष्णु आदि तीन पुत्रोंका जन्म हुआ (वायुपुराण, अ0 65) तथा अग्निकी कन्या आत्रेयीसे आंगिरसनामक
पुत्रोंकी उत्पत्ति हुई (ब्रह्मपुराण)। किसी-किसी ग्रन्थमें माना गया है कि बृहस्पतिका जन्म इनकी शुभानामक पत्नीसे
हुआ था। (महाभारत)
(3) अत्रि—ये दक्षिण दिशाकी ओर रहते हैं। प्रसिद्ध पतिव्रता अनसूयाजी इन्हींकी धर्मपत्नी हैं। अनसूयाजी
भगवान् कपिलदेवकी बहिन और कर्दम-देवहूतिकी कन्या हैं। भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने वनवासके समय इनका
आतिथ्य स्वीकार किया था। अनसूयाजीने जगज्जननी सीताजीको भाँति-भाँतिके गहने-कपड़े और सतीधर्मका महान्
उपदेश दिया था।
ब्रह्मवादियोंमें श्रेष्ठ महर्षि अत्रिको जब ब्रह्माजीने प्रजाविस्तारके लिये आज्ञा दी, तब अत्रिजी अपनी पत्नी
अनसूयाजीसहित ऋक्षनामक पर्वतपर जाकर तप करने लगे। ये दोनों भगवान्के बड़े ही भक्त हैं। इन्होंने घोर तप किया
और तपके फलस्वरूप चाहा भगवान्का प्रत्यक्ष दर्शन! ये जगत्पति भगवान्के शरणापन्न होकर उनका अखण्ड चिन्तन
करने लगे। इनके मस्तकसे योगाग्नि निकलने लगी, जिससे तीनों लोक जलने लगे। तब इनके तपसे प्रसन्न होकर ब्रह्मा,
विष्णु और शंकर—तीनों इन्हें वर देनेके लिये प्रकट हुए। भगवान्के तीनों स्वरूपोंके दर्शन करके मुनि अपनी पत्नीसहित
कृतार्थ हो गये और गद्गद होकर भगवान्की स्तुति करने लगे। भगवान्ने इन्हें वर माँगनेको कहा। ब्रह्माजीकी सृष्टि
रचनेकी आज्ञा थी, इसलिये अत्रिने कहा—“मैंने पुत्रके लिये भगवान्की आराधना की थी और उनके दर्शन चाहे थे, आप
तीनों पधार गये। आपलोगोंकी तो कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। मुझपर यह कृपा कैसे हुई, आप ही बतलाइये।”
अत्रिके वचन सुनकर तीनों मुसकुरा दिये और बोले—“ब्रह्मन्! तुम्हारा संकल्प सत्य है। तुम जिनका ध्यान करते हो,
हम तीनों वे ही हैं—एकके ही तीन स्वरूप हैं। हम तीनोंके अंशसे तुम्हारे तीन पुत्र होंगे। तुम तो कृतार्थरूप हो ही।”
इतना कहकर भगवान्के तीनों स्वरूप अन्तर्धान हो गये। तीनोंने उनके यहाँ अवतार धारण किया। भगवान् विष्णुके अंशसे
दत्तात्रेय, ब्रह्माके अंशसे चन्द्रमा और शिवजीके अंशसे दुर्वासाजी हुए। भक्तिका यही प्रताप है। जिनकी ध्यानमें भी कल्पना
नहीं हो सकती; वे ही बच्चे बनकर गोदमें खेलने लगे। (वाल्मीकीय रामायण, वनकाण्ड और श्रीमद्भागवत, स्कन्ध 4)
(श्रीमद्भागवत 2। 7। 5)
(4) पुलस्त्य—ये बड़े ही धर्मपरायण, तपस्वी और तेजस्वी हैं। योगविद्याके बहुत बड़े आचार्य और पारदर्शी हैं।
पराशरजी जब राक्षसोंका नाश करनेके लिये एक बड़ा यज्ञ कर रहे थे, तब वसिष्ठकी सलाहसे पुलस्त्यने उनसे यज्ञ बंद
करनेके लिये कहा। पराशरजीने पुलस्त्यकी बात मानकर यज्ञ रोक दिया। इससे प्रसन्न होकर महर्षि पुलस्त्यने ऐसा आशीर्वाद
दिया, जिससे पराशरको समस्त शास्त्रोंका ज्ञान हो गया।
इनकी सन्ध्या, प्रतीची, प्रीति और हविर्भू नामक पत्नियाँ हैं—जिनसे कई पुत्र हुए। दत्तोलि अथवा अगस्त्य और प्रसिद्ध
ऋषि निदाघ इन्हींके पुत्र हैं। विश्रवा भी इन्हींके पुत्र हैं—जिनसे कुबेर, रावण, कुम्भकर्ण और विभीषणका जन्म हुआ
था। पुराणोंमें और महाभारतमें जगह-जगह इनकी चर्चा आयी है। इनकी कथा विष्णुपुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण, कूर्मपुराण,
श्रीमद्भागवत, वायुपुराण और महाभारत-उद्योगपर्वमें विस्तारसे है।
(5) पुलह—ये बड़े ऐश्वर्यवान् और ज्ञानी महर्षि हैं। इन्होंने महर्षि सनन्दनसे ईश्वरीय ज्ञानकी शिक्षा प्राप्त की
थी और वह ज्ञान गौतमको सिखाया था। इनके दक्षप्रजापतिकी कन्या क्षमा और कर्दम ऋषिकी पुत्री गतिसे अनेकों सन्तान
र्हुइं। कूर्मपुराण, विष्णुपुराण, श्रीमद्भागवतमें इनकी कथा है।
(6) क्रतु—ये भी बड़े ही तेजस्वी महर्षि हैं। इन्होंने कर्दम ऋषिकी कन्या क्रिया और दक्षपुत्री सन्नतिसे विवाह
किया था। इनके साठ हजार बालखिल्य नामक ऋषियोंने जन्म लिया। ये ऋषि भगवान् सूर्यके रथके सामने उनकी ओर
मुँह करके स्तुति करते हुए चलते हैं। पुराणोंमें इनकी कथाएँ कई जगह आयी हैं।
(श्रीमद्भागवत-चतुर्थस्कन्ध; विष्णुपुराण-प्रथम अंश)
(7) वसिष्ठ—महर्षि वसिष्ठका तप, तेज, क्षमा और धर्म विश्वविदित है। इनकी उत्पत्तिके संबंधमें पुराणोंमें कई
प्रकारके वर्णन मिलते हैं, जो कल्पभेदकी दृष्टिसे सभी ठीक हैं। वसिष्ठजीकी पत्नीका नाम अरुन्धती है। ये बड़ी ही
साध्वी और पतिव्रताओंमें अग्रगण्य हैं। वसिष्ठ सूर्यवंशके कुलपुरोहित थे। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीरामके दर्शन और
सत्संगके लोभसे ही इन्होंने सूर्यवंशी राजाओंकी पुरोहिती स्वीकार की और सूर्यवंशके हितके लिये ये लगातार चेष्टा
करते रहे। भगवान् श्रीरामको शिष्यरूपमें पाकर इन्होंने अपने जीवनको कृतकृत्य समझा।
कहा जाता है कि “तपस्या बड़ी है या सत्संग?” इस विषयपर एक बार विश्वामित्रजीसे इनका मतभेद हो गया।
वसिष्ठजी कहते थे कि सत्संग बड़ा है और विश्वामित्रजी तपको बड़ा बतलाते थे। अन्तमें दोनों पंचायत करानेके लिये
शेषजीके पास पहुँचे। इनके विवादके कारणको सुनकर शेषभगवान्ने कहा कि “भगवन्! आप देख रहे हैं कि मेरे सिरपर
सारी पृथ्वीका भार है। आप दोनोंमें कोई महात्मा थोड़ी देरके लिये इस भारको उठा लें तो मैं सोच-समझकर आपका
झगड़ा निपटा दूँ।” विश्वामित्रजीको अपने तपका बड़ा भरोसा था; उन्होंने दस हजार वर्षकी तपस्याका फल देकर पृथ्वीको
उठाना चाहा, परंतु उठा न सके। पृथ्वी काँपने लगी। तब वसिष्ठजीने अपने सत्संगका आधे क्षणका फल देकर पृथ्वीको
सहज ही उठा लिया और बहुत देरतक उसे लिये खड़े रहे। विश्वामित्रजीने शेषभगवान्से पूछा कि “इतनी देर हो गयी,
आपने निर्णय क्यों नहीं सुनाया?” तब उन्होंने हँसकर कहा “ऋषिवर! निर्णय तो अपने-आप ही हो गया। जब आधे
क्षणके सत्संगकी भी बराबरी दस हजार वर्षके तपसे नहीं हो सकती, तब आप ही सोच लीजिये कि दोनोंमें कौन बड़ा
है।” सत्संगकी महिमा जानकर दोनों ही ऋषि प्रसन्न होकर लौट आये।
वसिष्ठजी वसुसम्पन्न अर्थात् अणिमादि सिद्धियोंसे युक्त और गृहवासियोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं, इसीलिये इनका नाम “वसिष्ठ”
पड़ा था। काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि शत्रु इनके आश्रमके समीप भी नहीं आ सकते थे। सौ पुत्रोंका संहार करनेवाले
विश्वामित्रके प्रति, अपनेमें पूरा सामर्थ्य होनेपर भी क्रोध न करके इन्होंने उनका जरा भी अनिष्ट नहीं किया। महादेवजीने
प्रसन्न होकर वसिष्ठजीको ब्राह्मणोंका आधिपत्य प्रदान किया था। सनातनधर्मके मर्मको यथार्थरूपसे जाननेवालोंमें
वसिष्ठजीका नाम सर्वप्रथम लिया जानेयोग्य है। इनके जीवनकी विस्तृत घटनाएँ रामायण, महाभारत, देवीभागवत,
विष्णुपुराण, मत्स्यपुराण, वायुपुराण, शिवपुराण, लिंगपुराण आदि ग्रन्थोंमें हैं।
* सूर्यसिद्धान्तमें मन्वन्तर आदिका जो वर्णन है, उसके अनुसार इस प्रकार समझना चाहिये—
सौरमानसे 43,20,000 वर्षकी अथवा देवमानसे 12,000 वर्षकी एक चतुर्युगी होती है। इसीको महायुग कहते
हैं। ऐसे इकहत्तर युगोंका एक मन्वन्तर होता है। प्रत्येक मन्वन्तरके अन्तमें सत्ययुगके मानकी अर्थात् 17,28,000 वर्षकी
सन्ध्या होती है। मन्वन्तर बीतनेपर जब सन्ध्या होती है, तब सारी पृथ्वी जलमें डूब जाती है। प्रत्येक कल्पमें (ब्रह्माके
एक दिनमें) चौदह मन्वन्तर अपनी-अपनी सन्ध्याओंके मानके सहित होते हैं। इसके सिवा कल्पके आरम्भकालमें भी
एक सत्ययुगके मानकालकी सन्ध्या होती है। इस प्रकार एक कल्पके चौदह मनुओंमें 71 चतुर्युगीके अतिरिक्त सत्ययुगके
मानकी 15 सन्ध्याएँ होती हैं। 71 महायुगोंके मानसे 14 मनुओंमें 994 महायुग होते हैं और सत्ययुगके मानकी 15
सन्ध्याओंका काल पूरा 6 महायुगोंके समान हो जाता है। दोनोंका योग मिलानेपर पूरे एक हजार महायुग या दिव्ययुग
बीत जाते हैं।
इस हिसाबसे निम्नलिखित अंकोंके द्वारा इसको समझिये—
सौरमान या मानव वर्ष
एक चतुर्युगी (महायुग या दिव्ययुग)
इकहत्तर चतुर्युगी
देवमान या दिव्य वर्ष
43,20,000
12,000
30,67,20,000
8,52,000
7
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः। सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः॥ 7॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो पुरुष मेरी इस परमैश्वर्यरूप विभूतिको और योगशक्तिको तत्त्वसे जानता है, वह निश्चल भक्तियोगसे युक्त हो जाता है—इसमें कुछ भी संशय नहीं है॥ 7॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार दूसरे और तीसरे श्लोकोंद्वारा जो भगवान्के योग (प्रभाव)-का और चौथेसे छठेतक उनकी विभूतियोंका वर्णन किया गया, उसे जाननेका फल अगले श्लोकमें बतलाया जाता है—

सौरमान या मानव वर्ष
कल्पकी सन्धि
मन्वन्तरकी चौदह सन्ध्या
सन्धिसहित एक मन्वन्तर
देवमान या दिव्य वर्ष
17,28,000
4,800
2,41,92,000
67,200
30,84,48,000
चौदह सन्ध्यासहित चौदह मन्वन्तर
8,56,800
4,31,82,72,000
1,19,95,200
कल्पकी सन्धिसहित चौदह मन्वन्तर या एक कल्प 4,32,00,00,000
1,20,00,000
ब्रह्माजीका दिन ही कल्प है, इतनी ही बड़ी उनकी रात्रि है। इस अहोरात्रके मानसे ब्रह्माजीकी परमायु एक सौ वर्ष
है। इसे “पर” कहते हैं। इस समय ब्रह्माजी अपनी आयुका आधा भाग अर्थात् एक परार्द्ध बिताकर दूसरे परार्द्धमें चल
रहे हैं। यह उनके 51वें वर्षका प्रथम दिन या कल्प है। वर्तमान कल्पके आरम्भसे अबतक स्वायम्भुव आदि छः मन्वन्तर
अपनी-अपनी सन्ध्याओंसहित बीत चुके हैं, कल्पकी सन्ध्यासमेत सात सन्ध्याएँ बीत चुकी हैं। वर्तमान सातवें वैवस्वत
मन्वन्तरके 27 चतुर्युग बीत चुके हैं। इस समय अट्ठाईसवें चतुर्युगके कलियुगका सन्ध्याकाल चल रहा है। (सूर्यसिद्धान्त,
मध्यमाधिकार, श्लोक 15 से 24 देखिये)
इस 2045 वि0 तक कलियुगके 5089 वर्ष बीते हैं। कलियुगके आरम्भमें 36,000 वर्ष सन्ध्याकालका मान होता
है। इस हिसाबसे अभी कलियुगकी सन्ध्याके ही 30,911 सौर वर्ष बीतने बाकी हैं।
* श्रीमद्भागवतके आठवें स्कन्धके पहले, पाँचवें और तेरहवें अध्यायमें इनका विस्तारसे वर्णन पढ़ना चाहिये। विभिन्न
पुराणोंमें इनके नामभेद मिलते हैं। यहाँ ये नाम श्रीमद्भागवतके अनुसार दिये गये हैं।
8
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते। इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥ 8॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
मैं वासुदेव ही सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्तिका कारण हूँ और मुझसे ही सब जगत् चेष्टा करता है—इस प्रकार समझकर श्रद्धा और भक्तिसे युक्त बुद्धिमान् भक्तजन मुझ परमेश्वरको ही निरन्तर भजते हैं॥ 8॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—भगवान्के प्रभाव और विभूतियोंके ज्ञानका फल अविचल भक्तियोगकी प्राप्ति बतलायी गयी, अब दो श्लोकोंमें उस भक्तियोगकी प्राप्तिका क्रम बतलाते हैं—

9
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्। कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥ 9॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
निरन्तर मुझमें मन लगानेवाले और मुझमें ही प्राणोंको अर्पण करनेवाले भक्तजन मेरी भक्तिकी चर्चाके द्वारा आपसमें मेरे प्रभावको जनाते हुए तथा गुण और प्रभावसहित मेरा कथन करते हुए ही निरन्तर सन्तुष्ट होते हैं और मुझ वासुदेवमें ही निरन्तर रमण
10
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्। ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥ 10॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
उन निरन्तर मेरे ध्यान आदिमें लगे हुए और प्रेमपूर्वक भजनेवाले भक्तोंको मैं वह तत्त्वज्ञानरूप योग देता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं॥ 10॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—उपर्युक्त प्रकारसे भजन करनेवाले भक्तोंके प्रति भगवान् क्या करते हैं, अगले दो श्लोकोंमें यह बतलाते हैं—

11
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः। नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥ 11॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे अर्जुन! उनके ऊपर अनुग्रह करनेके लिये उनके अन्तःकरणमें स्थित हुआ मैं स्वयं ही उनके अज्ञानजनित अन्धकारको प्रकाशमय तत्त्वज्ञानरूप दीपकके द्वारा नष्ट कर देता हूँ॥ 11॥
* न नाकपृष्ठं न च पारमेष्ठ्यं न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम्। न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा समञ्जस त्वा विरहय्य काङ्क्षे॥
(श्रीमद्भागवत 6। 11। 25)
“हे सर्वसद्गुणयुक्त! आपको त्यागकर न तो मैं स्वर्गमें सबसे ऊँचे लोकका निवास चाहता हूँ, न ब्रह्माका पद चाहता
हूँ, न समस्त पृथ्वीका राज्य, न पाताललोकका आधिपत्य, न योगकी सिद्धि—अधिक क्या मुक्ति भी नहीं चाहता।”
12–13अर्जुनMerged
अर्जुन उवाच परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्। पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्॥ 12॥ आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा। असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे॥ 13॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
अर्जुन बोले—आप परम ब्रह्म, परम धाम और परम पवित्र हैं, क्योंकि आपको सब ऋषि-गण सनातन, दिव्य पुरुष एवं देवोंका भी आदिदेव, अजन्मा और सर्वव्यापी कहते हैं। वैसे ही देवर्षि नारद तथा असित और देवल ऋषि तथा महर्षि व्यास भी कहते हैं और स्वयं आप भी
सम्बन्ध

सम्बन्ध—सातवें अध्यायके पहले श्लोकमें अपने समग्ररूपका ज्ञान करानेवाले जिस विषयको सुननेके लिये भगवान्ने अर्जुनको आज्ञा दी थी तथा दूसरे श्लोकमें जिस विज्ञानसहित ज्ञानको पूर्णतया कहनेकी प्रतिज्ञा की थी—उसका वर्णन भगवान्ने सातवें अध्यायमें किया। उसके बाद आठवें अध्यायमें अर्जुनके सात प्रश्नोंका उत्तर देते हुए भी भगवान्ने उसी विषयका स्पष्टीकरण किया; किंतु वहाँ कहनेकी शैली दूसरी रही, इसलिये नवम अध्यायके आरम्भमें पुनः विज्ञानसहित ज्ञानका वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा करके उसी विषयको अंग-प्रत्यंगोंसहित भलीभाँति समझाया। तदनन्तर दूसरे शब्दोंमें पुनः उसका स्पष्टीकरण करनेके लिये दसवें अध्यायके पहले श्लोकमें उसी विषयको पुनः कहनेकी प्रतिज्ञा की और पाँच श्लोकोंद्वारा अपनी योगशक्ति और विभूतियोंका वर्णन करके सातवें श्लोकमें उनके जाननेका फल अविचल भक्तियोगकी प्राप्ति बतलायी। फिर आठवें और नवें श्लोकोंमें भक्तियोगके द्वारा भगवान्के भजनमें लगे हुए भक्तोंके भाव और आचरणका वर्णन किया और दसवें तथा ग्यारहवेंमें उसका फल अज्ञानजनित अन्धकारका नाश और भगवान्की प्राप्ति करा देनेवाले बुद्धियोगकी प्राप्ति बतलाकर उस विषयका उपसंहार कर दिया। इसपर भगवान्की विभूति और योगको तत्त्वसे जानना भगवत्प्राप्तिमें परम सहायक है, यह बात समझकर अब सात श्लोकोंमें अर्जुन पहले भगवान्की स्तुति करके भगवान्से उनकी योगशक्ति और विभूतियोंका विस्तारसहित वर्णन करनेके लिये प्रार्थना करते हैं—

1-ऋषीत्येष गतौ धातुः श्रुतौ सत्ये
तपस्यथ। एतत् सन्नियतं यस्मिन् ब्रह्मणा स ऋषिः स्मृतः॥
गत्यर्थादृषतेर्धातोर्नामनिर्वृत्तिरादितः
। यस्मादेष स्वयम्भूतस्तस्माच्च ऋषिता स्मृता॥
(वायुपुराण 59। 79, 81)
“ऋष्” धातु गमन (ज्ञान), श्रवण, सत्य और तप इन अर्थोंमें प्रयुक्त होता है। ये सब बातें जिसके अंदर एक साथ
निश्चित रूपसे हों, उसीका नाम ब्रह्माने “ऋषि” रखा है। गत्यर्थक “ऋष्” धातुसे ही “ऋषि” शब्दकी निष्पत्ति हुई है और
आदि कालमें चूँकि यह ऋषिवर्ग स्वयं उत्पन्न होता है, इसीलिये इसकी “ऋषि” संज्ञा है।”
2-परम सत्यवादी धर्ममूर्ति पितामह भीष्मजीने दुर्योधनको भगवान् श्रीकृष्णका प्रभाव बतलाते हुए कहा है—
“भगवान् वासुदेव सब देवताओंके देवता और सबसे श्रेष्ठ हैं; ये ही धर्म हैं; धर्मज्ञ हैं, वरद हैं, सब कामनाओंको
पूर्ण करनेवाले हैं और ये ही कर्ता, कर्म और स्वयंप्रभु हैं। भूत, भविष्यत्, वर्तमान, सन्ध्या, दिशाएँ, आकाश और सब
नियमोंको इन्हीं जनार्दनने रचा है। इन महात्मा अविनाशी प्रभुने ऋषि, तप और जगत्की सृष्टि करनेवाले प्रजापतिको रचा।
सब प्राणियोंके अग्रज संकर्षणको भी इन्होंने ही रचा। लोक जिनको “अनन्त” कहते हैं और जिन्होंने पहाड़ोंसमेत सारी
पृथ्वीको धारण कर रखा है, वे शेषनाग भी इन्हींसे उत्पन्न हैं; ये ही वाराह, नृसिंह और वामनका अवतार धारण करनेवाले
हैं; ये ही सबके माता-पिता हैं, इनसे श्रेष्ठ और कोई भी नहीं है; ये ही केशव परम तेजरूप हैं और सब लोगोंके
पितामह हैं, मुनिगण इन्हें हृषीकेश कहते हैं, ये ही आचार्य, पितर और गुरु हैं। ये श्रीकृष्ण जिसपर प्रसन्न होते हैं, उसे
अक्षय लोककी प्राप्ति होती है। भय प्राप्त होनेपर जो इन भगवान् केशवके शरण जाता है और इनकी स्तुति करता है,
वह मनुष्य परम सुखको प्राप्त होता है।” “जो लोग भगवान् श्रीकृष्णकी शरणमें चले जाते हैं, वे कभी मोहको नहीं
प्राप्त होते। महान् भय (संकट)-में डूबे हुए लोगोंकी भी भगवान् जनार्दन नित्य रक्षा करते हैं।”
(वायुपुराण 61। 88, 90, 91, 92)
(वायुपुराण 61। 83, 84, 85)
ये च कृष्णं प्रपद्यन्ते ते न मुह्यन्ति मानवाः। भये महति मग्नांश्च पाति नित्यं जनार्दनः॥
(महा0, भीष्म0 67। 24)
* नारद कई हुए हैं परंतु ये देवर्षि नारद एक ही हैं। इनको भगवान्का “मन” कहा गया है। ये परम तत्त्वज्ञ, परम
प्रेमी और ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारी हैं। भक्तिके तो ये प्रधान आचार्य हैं। संसारपर इनका अमित उपकार है। प्रह्लाद, ध्रुव, अम्बरीष
आदि महान् भक्तोंको इन्हींने भक्तिमार्गमें प्रवृत्त किया और श्रीमद्भागवत तथा वाल्मीकीय रामायण-जैसे दो अनूठे ग्रन्थ
भी संसारको इन्हींकी कृपासे प्राप्त हुए। शुकदेव-जैसे महान् ज्ञानीको भी इन्होंने उपदेश दिया।
ये पूर्वजन्ममें दासीपुत्र थे। इनकी माता महर्षियोंके जूँठे बर्तन माँजा करती थीं। जब ये पाँच ही वर्षके थे, इनकी
माताकी अकस्मात् मृत्यु हो गयी। तब ये सब प्रकारके सांसारिक बन्धनोंसे मुक्त होकर जंगलकी ओर निकल पडे़। वहाँ
जाकर ये एक वृक्षके नीचे बैठकर भगवान्के स्वरूपका ध्यान करने लगे। ध्यान करते-करते इनकी वृत्तियाँ एकाग्र हो
गयीं और इनके हृदयमें भगवान् प्रकट हो गये। परंतु थोड़ी देरके लिये इन्हें अपने मनमोहनरूपकी झलक दिखलाकर
भगवान् तुरंत अन्तर्धान हो गये। अब तो ये बहुत छटपटाये और मनको पुनः स्थिर करके भगवान्का ध्यान करने लगे।
किंतु भगवान्का वह रूप उन्हें फिर न दीख पड़ा। इतनेहीमें आकाशवाणी हुई कि “हे दासीपुत्र! इस जन्ममें फिर तुम्हें
मेरा दर्शन न होगा। इस शरीरको त्यागकर मेरे पार्षदरूपमें तुम मुझे पुनः प्राप्त करोगे।” भगवान्के इन वाक्योंको सुनकर
इन्हें बड़ी सान्त्वना हुई और ये मृत्युकी बाट जोहते हुए निःसंग होकर पृथ्वीपर विचरने लगे। समय आनेपर इन्होंने अपने
पांचभौतिक शरीरको त्याग दिया। कल्पके अन्तमें भगवान्के प्राणोंमें प्रविष्ट हो गये और फिर दूसरे कल्पमें ये दिव्य
विग्रह धारणकर ब्रह्माजीके मानसपुत्रके रूपमें पुनः अवतीर्ण हुए और तबसे ये अखण्ड ब्रह्मचर्य व्रतको धारणकर वीणा
बजाते हुए भगवान्के गुणोंको गाते रहते हैं (श्रीमद्भागवत, स्कन्ध 1, अ0 6)।
महाभारत, सभापर्वके पाँचवें अध्यायमें कहा है—
“देवर्षि नारदजी वेद और उपनिषदोंके मर्मज्ञ, देवगणोंसे पूजित, इतिहास-पुराणोंके विशेषज्ञ, अतीत कल्पोंकी बातोंको
जाननेवाले, न्याय और धर्मके तत्त्वज्ञ, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, आयुर्वेदादिके जाननेवालोंमें श्रेष्ठ, परस्पर-विरुद्ध विविध
विधि-वाक्योंकी एकवाक्यता करनेमें प्रवीण, प्रभावशाली वक्ता, नीतिज्ञ, मेधावी, स्मरणशील, ज्ञानी, कवि, भले-बुरेको
पृथक्-पृथक् पहचाननेमें चतुर, समस्त प्रमाणोंद्वारा वस्तुतत्त्वका निर्णय करनेमें समर्थ, न्यायके वाक्योंके गुण-दोषोंको
जाननेवाले, बृहस्पतिजी-जैसे विद्वानोंकी शंकाओंका समाधान करनेमें समर्थ, धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके तत्त्वको
यथार्थरूपमें जाननेवाले, सारे ब्रह्माण्डमें और त्रिलोकीमें इधर-उधर, ऊपर-नीचे जो कुछ होता है—सबको योगबलसे प्रत्यक्ष
देखनेवाले, सांख्य और योगके विभागको जाननेवाले, देव-दैत्योंको वैराग्यका उपदेश करनेमें चतुर, सन्धि-विग्रहके तत्त्वको
जाननेवाले, कर्तव्य-अकर्तव्यका विभाग करनेमें दक्ष, षाड्गुण्य-प्रयोगके विषयमें अनुपम, सकल शास्त्रोंमें प्रवीण, युद्धविद्यामें
निपुण, संगीत-विशारद और भगवान्के भक्त, विद्या और गुणोंके भण्डार, सदाचारके आधार, सबके हितकारी और सर्वत्र
गतिवाले हैं।” उपनिषद्, पुराण और इतिहास इनकी पवित्र गाथाओंसे भरे हैं।
महर्षि असित और देवल पिता-पुत्र हैं। इनके सम्बन्धमें कूर्मपुराणमें वर्णन मिलता है—
एतानुत्पाद्य पुत्रांस्तु
प्रजासन्तानकारणात्। कश्यपः
पुत्रकामस्तु
चचार
सुमहत्तपः॥
तस्यैवं तपतोऽत्यर्थं प्रादुर्भूतौ सुताविमौ। वत्सरश्चासितश्चैव
असितस्यैकपर्णायां ब्रह्मिष्ठः
तावुभौ
ब्रह्मवादिनौ॥
समपद्यत। नाम्ना वै देवलः पुत्रो योगाचार्यो महातपाः॥
(कूर्मपुराण 19। 1, 2, 5)
“कश्यप मुनि प्रजाविस्तारके हेतुसे इन पुत्रोंको उत्पन्न करके फिर पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे महान् तप करने लगे। उनके
इस प्रकार उग्र तप करनेसे ये “वत्सर” और “असित” नामके दो पुत्र हुए। वे दोनों ही ब्रह्मवादी (ब्रह्मवेत्ता एवं ब्रह्मका
उपदेश करनेवाले) थे। “असित” के उनकी पत्नी एकपर्णाके गर्भसे महातपस्वी योगाचार्य “देवल” नामके वेदनिष्णात पुत्र
उत्पन्न हुए।”
ये दोनों ऋग्वेदके मन्त्रद्रष्टा ऋषि हैं। देवल ऋषिने भगवान् शिवकी आराधना करके सिद्धि प्राप्त की थी। ये दोनों
बड़े ही प्रवीण और प्राचीन महर्षि हैं। प्रत्यूषनामक वसुके भी देवल ऋषिनामक पुत्र थे (हरिवंश0 3। 44)।
श्रीवेदव्यासजी भगवान्के अंशावतार माने जाते हैं। इनका जन्म द्वीपमें हुआ था, इससे इनका “द्वैपायन” नाम पड़ा;
शरीर श्यामवर्ण है, इससे ये “कृष्णद्वैपायन” कहलाये और वेदोंके विभाग करनेसे लोग इन्हें “वेदव्यास” कहने लगे। ये
महामुनि पराशरजीके पुत्र हैं। इनकी माताका नाम सत्यवती था। ये जन्मते ही तप करनेके लिये वनमें चले गये थे। ये
भगवत्तत्त्वके पूर्ण ज्ञाता और अद्वितीय महाकवि हैं। ये ज्ञानके असीम और अगाध समुद्र हैं, विद्वत्ताकी पराकाष्ठा और
कवित्वकी सीमा हैं। व्यासके हृदय और वाणीका विकास ही समस्त जगत्के ज्ञानका प्रकाश एवं अवलम्बन है।
ब्रह्मसूत्रकी रचना भगवान् व्यासने ही की। महाभारत-सदृश अलौकिक ग्रन्थका प्रणयन भगवान् व्यासने किया। अठारह
पुराण और अनेक उपपुराण भगवान् व्यासने बनाये। भारतका इतिहास इस बातका साक्षी है। आज सारा संसार व्यासके
ज्ञानप्रसादसे अपने-अपने कर्तव्यका मार्ग खोज रहा है।
प्रत्येक द्वापरयुगमें वेदोंका विभाग करनेवाले भिन्न-भिन्न व्यास होते हैं। इसी वैवस्वत मन्वन्तरके ये पराशरपुत्र
श्रीकृष्णद्वैपायन अट्ठाईसवें वेदव्यास हैं। इन्होंने अपने प्रधान शिष्य पैलको ऋग्वेद, वैशम्पायनको यजुर्वेद, जैमिनिको सामवेद
और सुमन्तुको अथर्ववेद पढ़ाया एवं सूतजातीय महान् बुद्धिमान् रोमहर्षण महामुनिको इतिहास और पुराण पढ़ाये।
* देवर्षि नारदने कहा—“भगवान् श्रीकृष्ण समस्त लोकोंको उत्पन्न करनेवाले और समस्त भावोंको जाननेवाले हैं
तथा साध्योंके और देवताओंके ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं।”
मार्कण्डेय मुनिने कहा—“श्रीकृष्ण यज्ञोंके यज्ञ, तपोंके तप और भूत-भविष्यत्-वर्तमानरूप हैं।”
भृगुने कहा—“ये देवताओंके देवता और परम पुरातन विष्णु हैं।”
व्यासने कहा—“ये इन्द्रको इन्द्रत्व देनेवाले देवताओंके परम देवता हैं।”
अंगिराने कहा—“ये सब प्राणियोंकी रचना करनेवाले हैं।”
सनत्कुमार आदिने कहा—“इनके मस्तकसे आकाश और भुजाओंसे पृथ्वी व्याप्त है, तीनों लोक इनके पेटमें हैं; ये
सनातन पुरुष हैं; तपसे अन्तःकरणकी शुद्धि होनेपर ही साधक इन्हें जान सकते हैं। आत्मदर्शनसे तृप्त ऋषिगणोंमें भी ये
परमोत्तम माने जाते हैं और युद्धसे पीठ न दिखानेवाले उदार राजर्षियोंके भी ये ही परम गति हैं।” (महा0, भीष्म0 68)
महाभारत, वनपर्वके बारहवें अध्यायमें भक्तिमती द्रौपदीका वचन है—
असित और देवल ऋषिने कहा है—“श्रीकृष्ण ही प्रजाकी पूर्व सृष्टिमें प्रजापति और सब लोकोंके एकमात्र रचयिता हैं।”
परशुरामजीने कहा है—“ये ही विष्णु हैं, इन्हें कोई जीत नहीं सकता; ये ही यज्ञ हैं, यज्ञ करनेवाले हैं और यज्ञके
द्वारा यजनीय हैं।”
नारदजीने कहा है—“ये साध्यदेवोंके और समस्त कल्याणोंके ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं।”
“जैसे बालक अपने इच्छानुसार खिलौनोंसे खेला करता है, वैसे ही श्रीकृष्ण भी ब्रह्मा, शिव और इन्द्रादि देवताओंको
लेकर खेला करते हैं।”
इसके अतिरिक्त महाभारतमें भगवान् व्यासने कहा है—“सौराष्ट्रदेशमें द्वारका नामकी एक पवित्र नगरी है, उसमें साक्षात्
पुराणपुरुषोत्तम मधुसूदनभगवान् विराजते हैं। वे स्वयं सनातनधर्मकी मूर्ति हैं। वेदज्ञ ब्राह्मण और आत्मज्ञानी पुरुष महात्मा
श्रीकृष्णको साक्षात् “सनातनधर्म” बतलाते हैं। भगवान् गोविन्द पवित्रोंमें परम पवित्र, पुण्योंमें परम पुण्य और मंगलोंके
परम मंगल हैं। वे कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण तीनों लोकोंमें सनातन देवोंके देव हैं। वे ही मधुसूदन अक्षर, क्षर, क्षेत्रज्ञ,
परमेश्वर और अचिन्त्यमूर्ति हैं।” (महा0, वन0 8। 24 से27)
श्रीमद्भागवतमें देवर्षि नारदने धर्मराज युधिष्ठिरसे कहा है—“हे राजन्! मनुष्योंमें तुम लोग बड़े ही भाग्यवान् हो, क्योंकि
लोकोंको पवित्र करनेवाले मुनिगण तुम्हारे महलोंमें पधारते हैं और मानवचिह्नधारी साक्षात् परब्रह्म गूढ़रूपसे यहाँ विराजते
हैं। अहा! महात्मालोग जिस कैवल्य निर्वाण सुखके अनुभवको खोजा करते हैं, ये श्रीकृष्ण वही परम ब्रह्म हैं। ये तुम्हारे
प्रिय, सुहृद्, मामाके लड़के, पूज्य, पथप्रदर्शक एवं गुरु हैं; तब बताओ तुम्हारे समान भाग्यशाली और कौन है?”
(7। 15। 75-76)
14
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव। न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः॥ 14॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे केशव! जो कुछ भी मेरे प्रति आप कहते हैं, इस सबको मैं सत्य मानता हूँ। हे भगवन्! आपके लीलामय स्वरूपको न तो दानव जानते हैं और न देवता ही॥ 14॥
(6। 5। 74)
(6। 5। 78)
15
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम। भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते॥ 15॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे भूतोंको उत्पन्न करनेवाले! हे भूतोंके ईश्वर! हे देवोंके देव! हे जगत्के स्वामी! हे पुरुषोत्तम! आप स्वयं ही अपनेसे अपनेको जानते हैं॥ 15॥
16
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः। याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि॥ 16॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
इसलिये आप ही उन अपनी दिव्य विभूतियोंको सम्पूर्णतासे कहनेमें समर्थ हैं, जिन विभूतियोंके द्वारा आप इन सब लोकोंको व्याप्त करके स्थित हैं॥ 16॥
17
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्। केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया॥ 17॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे योगेश्वर! मैं किस प्रकार निरन्तर चिन्तन करता हुआ आपको जानूँ और हे भगवन्! आप किन-किन भावोंमें मेरे द्वारा चिन्तन करनेयोग्य हैं॥ 17॥
18
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन। भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्॥ 18॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे जनार्दन! अपनी योगशक्तिको और विभूतिको फिर भी विस्तारपूर्वक कहिये, क्योंकि आपके अमृतमय वचनोंको सुनते हुए मेरी तृप्ति नहीं होती अर्थात् सुननेकी उत्कण्ठा बनी ही
19श्रीभगवान्
श्रीभगवान् उवाच
श्रीभगवानुवाच हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः। प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे॥ 19॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
श्रीभगवान् बोले—हे कुरुश्रेष्ठ! अब मैं जो मेरी दिव्य विभूतियाँ हैं, उनको तेरे लिये प्रधानतासे कहूँगा; क्योंकि मेरे विस्तारका अन्त नहीं है॥ 19॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अर्जुनके द्वारा योग और विभूतियोंका विस्तारपूर्वक पूर्णरूपसे वर्णन करनेके लिये प्रार्थना की जानेपर भगवान् पहले अपने विस्तारकी अनन्तता बतलाकर प्रधानतासे अपनी विभूतियोंका वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा करते हैं—

20
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः। अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च॥ 20॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे अर्जुन! मैं सब भूतोंके हृदयमें स्थित सबका आत्मा हूँ तथा सम्पूर्ण भूतोंका आदि, मध्य
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अब अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार भगवान् बीसवेंसे उनतालीसवें श्लोकतक पहले अपनी विभूतियोंका वर्णन करते हैं।

* विश्वमें अनन्त पदार्थों, भावों और विभिन्न जातीय प्राणियोंका विस्तार है। इन सबका यथाविधि नियन्त्रण और
संचालन करनेके लिये जगत्स्त्रष्टा भगवान्के अटल नियमके द्वारा विभिन्न जातीय पदार्थों, भावों और जीवोंके विभिन्न
समष्टि-विभाग कर दिये गये हैं और उन सबका ठीक नियमानुसार सृजन, पालन तथा संहारका कार्य चलता रहे—इसके
लिये प्रत्येक समष्टि-विभागके अधिकारी नियुक्त हैं। रुद्र, वसु, आदित्य, इन्द्र, साध्य, विश्वेदेव, मरुत्, पितृदेव, मनु
और सप्तर्षि आदि इन्हीं अधिकारियोंकी विभिन्न संज्ञाएँ हैं। इनके मूर्त और अमूर्त दोनों ही रूप माने गये हैं। ये सभी
भगवान्की विभूतियाँ हैं।
सर्वे च देवा मनवः समस्ताः सप्तर्षयो ये मनुसूनवश्च। इन्द्रश्च योऽयं त्रिदशेशभूतो विष्णोरशेषास्तु विभूतयस्ताः॥
(श्रीविष्णुपुराण 3। 1। 46)
“सभी देवता, समस्त मनु, सप्तर्षि तथा जो मनुके पुत्र और ये देवताओंके अधिपति इन्द्र हैं—ये सभी भगवान् विष्णुकी
ही विभूतियाँ हैं।”
इनके अतिरिक्त, सृष्टि-संचालनार्थ प्रजाके समष्टि-विभागोंमेंसे यथायोग्य निर्वाचन कर लिया जाता है। इस सारे
निर्वाचनमें प्रधानतया उन्हींको लिया जाता है, जिनमें भगवान्के तेज, शक्ति, विद्या, ज्ञान और बल आदिका विशेष विकास
हो। इसीलिये भगवान्ने इन सबको भी अपनी विभूति बतलाया है।
वायुपुराणके सत्तरवें अध्यायमें वर्णन आता है कि “महर्षि कश्यपके द्वारा जब प्रजाकी सृष्टि हो गयी, तब प्रजापतिने
विभिन्न जातीय प्रजाओंमेंसे जो सबसे श्रेष्ठ और तेजस्वी थे, उनको चुनकर उन-उन जातियोंकी प्रजाका नियन्त्रण
करनेके लिये उन्हें उनका राजा बना दिया। चन्द्रमाको नक्षत्र-ग्रह आदिका, बृहस्पतिको आंगिरसोंका, शुक्राचार्यको
भार्गवोंका, विष्णुको आदित्योंका, पावकको वसुओंका, दक्षको प्रजापतियोंका, प्रह्लादको दैत्योंका, इन्द्रको मरुतोंका,
नारायणको साध्योंका, शंकरको रुद्रोंका, वरुणको जलोंका, कुबेरको यक्ष-राक्षसादिका, शूलपाणिको भूत-पिशाचोंका,
सागरको नदियोंका, चित्ररथको गन्धर्वोंका, उच्चैःश्रवाको घोड़ोंका, सिंहको पशुओंका, साँड़को चौपायोंका, गरुड़को
पक्षियोंका, शेषको डसनेवालोंका, वासुकिको नागोंका, तक्षकको दूसरी जातिके सर्पों और नागोंका, हिमवान्को पर्वतोंका,
विप्रचित्तिको दानवोंका, वैवस्वतको पितरोंका, पर्जन्यको सागर, नदी और मेघोंका, कामदेवको अप्सराओंका, संवत्सरको
ऋतु और मासादिका, सुधामाको पूर्वका, केतुमान्को पश्चिमका और वैवस्वत मनुको सब मनुष्योंका राजा बनाया। इन्हीं
सब अधिकारियोंद्वारा समस्त जगत्का संचालन और पालन हो रहा है।” यहाँ इस अध्यायमें जो विभूतिवर्णन है, वह बहुत
अंशमें इसीसे मिलता-जुलता है।
21
आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्। मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी॥ 21॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
मैं अदितिके बारह पुत्रोंमें विष्णु और ज्योतियोंमें किरणोंवाला सूर्य हूँ तथा मैं उनचास वायुदेवताओंका तेज1 और नक्षत्रोंका अधिपति चन्द्रमा हूँ॥ 21॥
1-उनचास मरुतोंके नाम ये हैं—सत्त्वज्योति, आदित्य, सत्यज्योति, तिर्यग्ज्योति, सज्योति, ज्योतिष्मान्, हरित, ऋतजित्,
सत्यजित्, सुषेण, सेनजित्, सत्यमित्र, अभिमित्र, हरिमित्र, कृत, सत्य, ध्रुव, धर्ता, विधर्ता, विधारय, ध्वान्त, धुनि, उग्र,
भीम, अभियु, साक्षिप, ईदृक्, अन्यादृक्, यादृक्, प्रतिकृत, ऋक्, समिति, संरम्भ, ईदृक्ष, पुरुष, अन्यादृक्ष, चेतस, समिता,
समिदृक्ष, प्रतिदृक्ष, मरुति, सरत, देव, दिश, यजुः, अनुदृक्, साम, मानुष और विश् (वायुपुराण 67। 123 से 130)।
गरुडपुराण तथा अन्यान्य पुराणोंमें कुछ नामभेद पाये जाते हैं। परंतु “मरीचि” नाम कहीं भी नहीं मिला है। इसीलिये “मरीचि”
को मरुत् न मानकर समस्त मरुद्गणोंका तेज या किरणें माना गया है।
दक्षकन्या मरुत्वतीसे उत्पन्न पुत्रोंको भी मरुद्गण कहते हैं (हरिवंश0)। भिन्न-भिन्न मन्वन्तरोंमें भिन्न-भिन्न नामोंसे
तथा विभिन्न प्रकारसे इनकी उत्पत्तिके वर्णन पुराणोंमें मिलते हैं।
2-धाता मित्रोऽर्यमा शक्रो वरुणस्त्वंश एवच। भगो विवस्वान् पूषा च सविता दशमस्तथा॥
ञ् एकादशस्तथा त्वष्टा द्वादशो विष्णुरुच्यते। जघन्यजस्तु
सर्वेषामादित्यानां
गुणाधिकः॥
(महा0, आदि0 65। 15-16)
22
वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः। इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना॥ 22॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
मैं वेदोंमें सामवेद हूँ, देवोंमें इन्द्र हूँ, इन्द्रियोंमें मन हूँ और भूतप्राणियोंकी चेतना अर्थात्
* कश्यपजीकी पत्नी दितिके बहुत-से पुत्रोंके नष्ट हो जानेपर उसने अपने पति कश्यपजीको अपनी सेवासे
प्रसन्न किया। उसकी सम्यक् आराधनासे सन्तुष्ट हो तपस्वियोंमें श्रेष्ठ कश्यपजीने उसे वर देकर सन्तुष्ट किया। उस
समय उसने इन्द्रके वध करनेमें समर्थ एक अति तेजस्वी पुत्रका वर माँगा। मुनिश्रेष्ठ कश्यपजीने उसे अभीष्ट वर
दिया और उस अति उग्र वरको देते हुए वे उससे बोले—“यदि तुम नित्य भगवान्के ध्यानमें तत्पर रहकर अपने
गर्भको पवित्रता और संयमके साथ सौ वर्षतक धारण कर सकोगी तो तुम्हारा पुत्र इन्द्रको मारनेवाला होगा।” उस गर्भको
अपने वधका कारण जान देवराज इन्द्र भी विनयपूर्वक दितिकी सेवा करनेके लिये आ गये। उसकी पवित्रतामें कभी
बाधा हो तो हम कुछ कर सकें, इसी प्रतीक्षामें इन्द्र वहाँ हर समय उपस्थित रहने लगे। अन्तमें सौ वर्षमें जब कुछ
दिन ही कम रहे थे तब एक दिन दिति बिना ही चरणशुद्धि किये अपने बिछौनेपर लेट गयी। उसी समय निद्राने उसे
घेर लिया। तब इन्द्र मौका पाकर हाथमें वज्र लेकर उसकी कोखमें प्रवेश कर गये और उन्होंने उस महागर्भके सात
टुकड़े कर डाले। इस प्रकार वज्रसे पीडि़त होनेसे वह गर्भ जोर-जोरसे रोने लगा। इन्द्रने उससे पुनः-पुनः कहा कि “मत
रो।” किंतु जब वह गर्भ सात भागोंमें विभक्त होकर भी न मरा तो इन्द्रने अत्यन्त कुपित हो फिर एक-एकके सात-
सात टुकड़े कर डाले। इस प्रकार एकसे उनचास होकर भी वे जीवित ही रहे। तब इन्द्रने जान लिया ये मरेंगे नहीं।
वे ही अति वेगवान् मरुत् नामक देवता हुए। इन्द्रने जो उनसे कहा था कि “मा रोदीः” (मत रो), इसलिये वे मरुत्
कहलाये (विष्णुपुराण, प्रथम अंश, अध्याय 21)।
23
रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्। वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्॥ 23॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
मैं एकादश रुद्रोंमें शंकर हूँ और यक्ष तथा राक्षसोंमें धनका स्वामी कुबेर हूँ । मैं आठ वसुओंमें अग्नि हूँ और शिखरवाले पर्वतोंमें सुमेरु पर्वत हूँ॥ 23॥
1-हरश्च बहुरूपश्च
त्र्यम्बकश्चापराजितः। वृषाकपिश्च शम्भुश्च कपर्दी रैवतस्तथा॥
मृगव्याधश्च शर्वश्च कपाली च विशाम्पते। एकादशैते
कथिता
रुद्रास्त्रिभुवनेश्वराः॥
(हरिवंश0 1। 3। 51, 52)
2-ये पुलस्त्य ऋषिके पौत्र हैं और विश्रवाके औरस पुत्र हैं। भरद्वाज-कन्या देववर्णिनीके गर्भसे इनका जन्म हुआ
था। इनके दीर्घकालतक कठोर तप करनेपर ब्रह्माजीने प्रसन्न होकर इनसे वर माँगनेको कहा। तब इन्होंने विश्वके धनरक्षक
होनेकी इच्छा प्रकट की। इसपर ब्रह्माजीने कहा कि “मैं भी चौथे लोकपालकी नियुक्ति करना चाहता हूँ; अतएव इन्द्र,
यम और वरुणकी भाँति तुम भी इस पदको ग्रहण करो।” उन्होंने ही इनको पुष्पकविमान दिया। तबसे ये ही धनाध्यक्ष
हैं। इनकी विमाता कैकसीसे रावण-कुम्भकर्णादिका जन्म हुआ था (वाल्मीकि0, उत्तरकाण्ड, स0 3)। नलकूबर और
मणिग्रीव, जो नारद मुनिके शापसे जुड़े हुए अर्जुनके वृक्ष हो गये थे और जिनका भगवान् श्रीकृष्णने उद्धार किया था,
कुबेरके ही पुत्र थे (श्रीमद्भागवत 10। 10)।
3-धरो ध्रुवश्च सोमश्च अहश्चैवानिलोऽनलः। प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः॥
( महा0, आदि0 66। 18)
24
पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्। सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः॥ 24॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
पुरोहितोंमें मुखिया बृहस्पति मुझको जान। हे पार्थ! मैं सेनापतियोंमें स्कन्द और जलाशयोंमें
25
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्। यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः॥ 25॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
मैं महर्षियोंमें भृगु और शब्दोंमें एक अक्षर अर्थात् ओंकार हूँ। सब प्रकारके यज्ञोंमें जपयज्ञ और स्थिर रहनेवालोंमें हिमालय पहाड़ हूँ॥ 25॥
1-ये महर्षि अंगिराके बड़े ही प्रतापी पुत्र हैं। स्वारोचिष मन्वन्तरमें बृहस्पति सप्तर्षियोंमें प्रधान थे (हरिवंश0 7।
12, मत्स्यपुराण 9। 8)। ये बड़े भारी विद्वान् हैं। वामन-अवतारमें भगवान्ने सांगोपांग वेद, षट्शास्त्र, स्मृति, आगम
आदि सब इन्हींसे सीखे थे (बृहद्धर्मपुराण, मध्य0 16। 69से 73)। इन्हींके पुत्र कचने शुक्राचार्यके यहाँ रहकर संजीवनी-
विद्या सीखी थी। ये देवराज इन्द्रके पुरोहितका काम करते हैं। इन्होंने समय-समयपर इन्द्रको जो दिव्य उपदेश दिये हैं,
उनका मनन करनेसे मनुष्यका कल्याण हो सकता है। महाभारत-शान्ति और अनुशासनपर्वमें इनके उपदेशोंकी कथाएँ पढ़नी
चाहिये।
2-कहीं-कहीं इन्हें अग्निके तेजसे तथा दक्षकन्या स्वाहाके द्वारा उत्पन्न माना गया है (महाभारत, वनपर्व 223)।
इनके सम्बन्धमें महाभारत और पुराणोंमें बड़ी ही विचित्र-विचित्र कथाएँ मिलती हैं।
3-“समुद्र” से यहाँ “समष्टि समुद्र” समझना चाहिये।
(वायुपुराण 59। 82-83, 89-90)
* ब्रह्माजीके मानसपुत्रोंमें भृगु एक प्रधान हैं। स्वायम्भुव और चाक्षुष आदि कई मन्वन्तरोंमें ये सप्तर्षियोंमें रह चुके
हैं। इनके वंशजोंमें बहुत-से ऋषि, मन्त्रप्रणेता और गोत्रप्रवर्तक हुए हैं। महर्षियोंमें इनका बड़ा भारी प्रभाव है, इन्होंने
दक्षकन्या ख्यातिसे विवाह किया था। उनसे धाता-विधाता नामके दो पुत्र और श्री नामकी एक कन्या हुई थी। यही
श्रीभगवान् नारायणकी पत्नी हुई। च्यवन ऋषि भी इन्हींके पुत्र थे। इनके ज्योतिष्मान्, सुकृति, हविष्मान्, तपोधृति, निरुत्सुक
और अतिबाहु नामक पुत्र विभिन्न मन्वन्तरोंमें सप्तर्षियोंमें प्रधान रह चुके हैं। ये महान् मन्त्रप्रणेता महर्षि हैं। विष्णुभगवान्के
वक्षःस्थलपर लात मारकर इन्होंने ही उनकी सात्त्विक क्षमाकी परीक्षा ली थी। आज भी विष्णुभगवान् इस भृगुलताके
चिह्नको अपने हृदयपर धारण किये हुए हैं। भृगु, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अंगिरा, मरीचि, दक्ष, अत्रि और वसिष्ठ—
ये प्रजा-सृष्टि करनेवाले होनेसे “नौ ब्रह्मा” माने गये हैं। प्रायः सभी पुराणोंमें भृगुजीकी चर्चा भरी है (इनकी कथाका
विस्तार हरिवंशपुराण, मत्स्यपुराण, शिवपुराण, ब्रह्माण्डपुराण, देवीभागवत, मार्कण्डेयपुराण, पद्मपुराण, वायुपुराण, महाभारत
और श्रीमद्भागवतमें है)।
26
अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः। गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः॥ 26॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
मैं सब वृक्षोंमें पीपलका वृक्ष, देवर्षियोंमें नारद मुनि, गन्धर्वोंमें चित्ररथ और सिद्धोंमें
1-विधियज्ञाज्जपयज्ञो विशिष्टो
दशभिर्गुणैः। उपांशुः स्याच्छतगुणः साहस्त्रो मानसः स्मृतः॥ (मनु0 2। 85)
“विधि-यज्ञसे जपयज्ञ दसगुना, उपांशुजप सौगुना और मानसजप हजारगुना श्रेष्ठ कहा गया है।”
2-पुराणोंमें अश्वत्थका बड़ा माहात्म्य मिलता है। स्कन्दपुराणमें है—
मूले विष्णुः स्थितो नित्यं स्कन्धे केशव एव च।
नारायणस्तु
शाखासु
पत्रेषु
फलेऽच्युतो
भगवान्
हरिः॥
सन्देहः
सर्वदेवैः
समन्वितः।
स एव विष्णुर्द्रुम एव मूर्तो महात्मभिः सेवितपुण्यमूलः।
यस्याश्रयः पापसहस्त्रहन्ता भवेन्नृणां कामदुघो गुणाढ्यः॥
(स्कन्द0, नागर0 247। 41, 42, 44)
“पीपलकी जड़में विष्णु, तनेमें केशव, शाखाओंमें नारायण, पत्तोंमें भगवान् हरि और फलमें सब देवताओंसे युक्त अच्युत
सदा निवास करते हैं—इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है। यह वृक्ष मूर्तिमान् श्रीविष्णुस्वरूप है; महात्मा पुरुष इस वृक्षके पुण्यमय
मूलकी सेवा करते हैं। इसका गुणोंसे युक्त और कामनादायक आश्रय मनुष्योंके हजारों पापोंका नाश करनेवाला है।”
इसके अतिरिक्त वैद्यक-ग्रन्थोंमें भी अश्वत्थकी बड़ी महिमा है—इसके पत्ते, फल, छाल सभी रोगनाशक हैं। रक्तविकार,
कफ, वात, पित्त, दाह, वमन, शोथ, अरुचि, विषदोष, खाँसी, विषम-ज्वर, हिचकी, उरःक्षत, नासारोग, विसर्प, कृमि,
कुष्ठ, त्वचा-व्रण, अग्निदग्धव्रण, वागी आदि अनेक रोगोंमें इसका उपयोग होता है।
(श्रीमद्भागवत 3। 24। 19)
27
उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम्। ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्॥ 27॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
घोड़ोंमें अमृतके साथ उत्पन्न होनेवाला उच्चैःश्रवा नामक घोड़ा, श्रेष्ठ हाथियोंमें ऐरावत नामक हाथी और मनुष्योंमें राजा मुझको जान॥ 27॥
(वायुपुराण 70। 18)
28
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्। प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः॥ 28॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
मैं शस्त्रोंमें वज्र और गौओंमें कामधेनु हूँ । शास्त्रोक्त रीतिसे सन्तानकी उत्पत्तिका हेतु कामदेव हूँ, और सर्पोंमें सर्पराज वासुकि हूँ॥ 28॥
29
अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्। पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्॥ 29॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
मैं नागोंमें शेषनाग और जलचरोंका अधिपति वरुणदेवता हूँ और पितरोंमें अर्यमा नामक पितर तथा शासन करनेवालोंमें यमराज मैं हूँ॥ 29॥
1-शेषं चाकल्पयद्देवमनन्तं विश्वरूपिणम्। यो धारयति भूतानि धरां चेमां सपर्वताम्॥
(महा0, भीष्म0 67। 13)
“इन परमदेवने विश्वरूप अनन्त नामक देवस्वरूप शेषनागको उत्पन्न किया, जो पर्वतोंके सहित इस सारी पृथ्वीको
तथा भूतमात्रको धारण किये हुए हैं।”
2-कव्यवाहोऽनलः सोमो यमश्चैवार्यमा तथा।
अग्निष्वात्ता बर्हिषदस्त्रयश्चान्त्या ह्यमूर्तयः॥ (शिवपुराण, धर्म0 63। 2)
“कहीं-कहीं इनके नाम इस प्रकार मिलते हैं—सुकाल, आंगिरस, सुस्वधा, सोमपा, वैराज, अग्निष्वात्त और बर्हिषद्
(हरिवंश0, पूर्व0 अ0 18)। मन्वन्तरभेदसे नामोंका यह भेद सम्भव है।
3-यमराजके दरबारमें न किसीके साथ किसी भी कारणसे कोई पक्षपात ही होता है और न किसी प्रकारकी सिफारिश,
30
प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्। मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्॥ 30॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
मैं दैत्योंमें प्रह्लाद और गणना करनेवालोंका समय हूँ तथा पशुओंमें मृगराज सिंह और
रिश्वत या खुशामद ही चलती है। इनके नियम इतने कठोर हैं कि उनमें जरा भी रियायतके लिये गुंजाइश नहीं है, इसीलिये
ये “नियमन करनेवालोंमें सबसे बढ़कर” माने जाते हैं। इन्द्र, अग्नि, र्निऋति, वरुण, वायु, कुबेर, ईशान, ब्रह्मा, अनन्त
और यम—ये दस दिक्पाल हैं (बृहद्धर्मपुराण, उत्तर0 9)। ये समष्टिजगत्की सब दिशाओंके संरक्षक हैं।
कहते हैं कि पुण्यात्मा जीवको ये यमराज स्वाभाविक ही सौम्यमूर्ति दीखते हैं और पापियोंको अत्यन्त लाल नेत्र,
विकराल दाढ़, बिजली-सी लपलपाती हुई जीभ और ऊपरको उठे हुए भयानक बालोंसे युक्त अत्यन्त भयानक काली
आकृतिवाले तथा हाथमें कालदण्ड उठाये हुए दिखलायी देते हैं (स्कन्दपुराण, काशीखण्ड पूर्व0 8। 55, 56)।
ये परम ज्ञानी हैं। नचिकेताको इन्होंने आत्मतत्त्वका ज्ञान दिया था। कठोपनिषद्, महाभारत-अनुशासनपर्व और
वाराहपुराणमें नचिकेताकी कथा मिलती है। साथ ही ये बड़े ही भगवद्भक्त हैं। श्रीमद्भागवत, छठे स्कन्धके तीसरे अध्यायमें,
विष्णुपुराण, तृतीय अंशके सातवें अध्यायमें और स्कन्दपुराण, काशीखण्ड पूर्वार्धके आठवें अध्यायमें इन्होंने अपने दूतोंके
सामने जो भगवान्की और भगवन्नामकी महिमा गायी है, वह अवश्य ही पढ़नेयोग्य है।
परंतु इनको भी छकानेवाले पुरुष कभी-कभी हो जाते हैं। स्कन्दपुराणमें कथा आती है कि कीर्तिमान् नामक एक
चक्रवर्ती भक्त राजा थे। उनके सदुपदेशसे समस्त प्रजा सदाचार और भक्तिसे पूर्ण हो गयी। उनके पुण्यफलसे इनके यहाँ
जो पहलेके जीव थे, उन सबकी सद्गति होने लगी और वर्तमानमें मरनेवाले सब लोग परम गतिको प्राप्त होने लगे।
इससे नये जीवोंका इनके यहाँ जाना ही बंद हो गया। इस प्रकार यमलोक सूना हो गया! तब इन्होंने जाकर ब्रह्माजीसे
कहा, उन्होंने इनको श्रीविष्णुभगवान्के पास भेजा। भगवान् विष्णुने कहा—“जबतक ये धर्मात्मा भक्त कीर्तिमान् राजा जीवित
हैं, तबतक तो ऐसा ही होगा; परंतु संसारमें ऐसा सदा चलता नहीं। (स्कन्दपुराण, विष्णु0 वै0 11। 12। 13)
31
पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्। झषाणां मकरश्चास्मि स्त्रोतसामस्मि जाह्नवी॥ 31॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
मैं पवित्र करनेवालोंमें वायु और शस्त्रधारियोंमें श्रीराम हूँ तथा मछलियोंमें मगर हूँ और
* धातुः
कमण्डलुजलं
तदुरुक्रमस्य
पादावनेजनपवित्रतया
नरेन्द्र।
स्वर्धुन्यभून्नभसि सा पतती निमार्ष्टि लोकत्रयं भगवतो विशदेव कीर्तिः॥
(श्रीमद्भागवत 8। 21। 4)
“हे राजन्! वह ब्रह्माजीके कमण्डलुका जल, भगवान्के चरणोंको धोनेसे पवित्रतम होकर स्वर्ग-गंगा
(मन्दाकिनी) हो गया। वह गंगा भगवान्की निर्मल कीर्तिके समान आकाशसे पृथ्वीपर गिरकर अबतक तीनों लोकोंको
पवित्र कर रही हैं।”
ह्येतत्परमाश्चर्यं
अनन्तचरणाम्भोजप्रसूताया
सन्निवेश्य
मनो
स्वर्धुन्या
यदिहोदितम्।
भवच्छिदः॥
यस्मिञ्छ्रद्धया
मुनयोऽमलाः।
त्रैगुण्यं दुस्त्यजं हित्वा सद्यो यातास्तदात्मताम्॥
(श्रीमद्भागवत 9। 9। 14-15)
“जिन अनन्त भगवान्के चरण-कमलोंमें श्रद्धापूर्वक भलीभाँति चित्तको लगाकर निर्मलहृदय मुनिगण तुरंत ही दुस्त्यज
त्रिगुणोंके प्रपंचको त्यागकर उनके स्वरूप बन गये हैं, उन्हीं चरण-कमलोंसे उत्पन्न हुई, भव-बन्धनको काटनेवाली भगवती
गंगाजीका जो माहात्म्य यहाँ बतलाया गया है, इसमें कोई बड़े आश्चर्यकी बात नहीं है।”
32
सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन। अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्॥ 32॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे अर्जुन! सृष्टियोंका आदि और अन्त तथा मध्य भी मैं ही हूँ। मैं विद्याओंमें अध्यात्मविद्या अर्थात् ब्रह्मविद्या और परस्पर विवाद करनेवालोंका तत्त्वनिर्णयके लिये किया जानेवाला वाद
* जगज्जननी महेश्वरी दक्षकन्या सतीके देह त्याग करनेपर जब भगवान् शिव तप करने लगे, तब देवताओंने
जगन्माताकी स्तुति की। महेश्वरी प्रकट र्हुइं। देवताओंने पुनः शंकरजीको वरण करनेके लिये उनसे प्रार्थना की।
देवीने कहा—“मैं दो रूपोंमें सुमेरुकन्या मेनकाके गर्भसे शैलराज हिमालयके घर प्रकट होऊँगी।” तदनन्तर वे पहले
गंगारूपमें प्रकट र्हुइं। देवता उनकी स्तुति करते हुए उन्हें देवलोकमें ले गये। वहाँ वे मूर्तिमती हो शंकरजीके साथ दिव्य
कैलासधामको पधार गयीं और ब्रह्माजीकी प्रार्थनापर अन्तर्धानांशसे अर्थात् निराकाररूपसे उनके कमण्डलुमें स्थित हो गयीं
(अन्तर्धानांशभागेन स्थिता ब्रह्मकमण्डलौ)। ब्रह्माजी कमण्डलुमें उन्हें ब्रह्मलोक ले गये। तदनन्तर एक बार भगवान्
शंकरजी गंगाजीसहित वैकुण्ठमें पधारे। वहाँ भगवान् विष्णुके अनुरोध करनेपर उन्होंने गान किया। वे जो रागिनी गाते,
वही मूर्तिमती होकर प्रकट हो जाती। वे “श्री” रागिनी गाने लगे, तब वह भी प्रकट हो गयीं। उस रागिनीसे मुग्ध
होकर रसमय भगवान् नारायण स्वयं रसरूप होकर बह गये। ब्रह्माजीने सोचा—“ब्रह्मसे उत्पन्न संगीत ब्रह्ममय है और
स्वयं ब्रह्म हरि भी इस समय द्रवीभूत हो गये हैं; अतएव ब्रह्ममयी गंगाजी इन्हें संवरण कर लें।” यह विचारकर
उन्होंने ब्रह्मद्रवसे कमण्डलुका स्पर्श कराया। स्पर्श होते ही सारा जल गंगाजीमें मिल गया और निराकारा गंगाजी
जलमयी हो गयीं। ब्रह्माजी फिर ब्रह्मलोकमें चले गये। इसके बाद जब भगवान् विष्णुने वामन-अवतारमें अपने
सात्त्विक पादसे समस्त द्युलोकको नाप लिया, तब ब्रह्माजीने कमण्डलुके उसी जलसे भगवच्चरणको स्नान कराया।
कमण्डलुका जल प्रदान करते ही वह चरण वहीं स्थिर हो गया और भगवान्के अन्तर्धान होनेपर भी उनका दिव्यचरण
वहीं स्वर्ग-गंगाके साथ रह गया। उसीसे उत्पन्न गंगाजीको महान् तप करके भगीरथजी अपने पूर्वपुरुषोंका उद्धार
करनेके लिये इस लोकमें लाये। यहाँ भी श्रीशंकरजीने ही उनको मस्तकमें धारण किया। गंगाजीके माहात्म्यकी यह
बड़ी ही सुन्दर, उपदेशप्रद और विचित्र कथा विस्तारपूर्वक बृहद्धर्मपुराण मध्य खण्डके बारहवें अध्यायसे अट्ठाईसवें
अध्यायतक पढ़नी चाहिये।
33
अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च। अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः॥ 33॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
मैं अक्षरोंमें अकार हूँ और समासोंमें द्वन्द्व नामक समास हूँ। अक्षय काल अर्थात् कालका भी महाकाल तथा सब ओर मुखवाला, विराट्स्वरूप, सबका धारण-पोषण करनेवाला भी
(ऐतरेय, ब्रा0 पू0 3। 6)।
* संस्कृत-व्याकरणके अनुसार समास चार हैं—1 अव्ययीभाव, 2 तत्पुरुष, 3 बहुव्रीहि और 4 द्वन्द्व। कर्मधारय
और द्विगु—ये दोनों तत्पुरुषके ही अन्तर्गत हैं। अव्ययीभाव समासके पूर्व और उत्तर—इन दो पदोंमेंसे पूर्व पदके अर्थकी
प्रधानता होती है। जैसे अधिहरि—यहाँ अव्ययीभाव समास है; इसका अर्थ है—“हरौ” अर्थात् हरिमें; सप्तमी विभक्ति ही
“अधि” शब्दका अर्थ है और यही व्यक्त करना यहाँ अभीष्ट है। तत्पुरुष समासमें उत्तरपदके अर्थकी प्रधानता होती है;
जैसे—“सीतापतिं वन्दे”, इस वाक्यके अन्तर्गत “सीतापति”शब्दमें तत्पुरुष समास है। इस वाक्यका अर्थ है—सीताके पति
श्रीरामचन्द्रजीको प्रणाम करता हूँ। यहाँ सीता और पति—इन दो पदोंमेंसे “पति” पदके अर्थकी ही प्रधानता है;
क्योंकि “सीतापति” शब्दसे “श्रीराम”का ही बोध होता है। बहुव्रीहि समासमें अन्य पदके अर्थकी प्रधानता होती है;
जैसे “पीताम्बरः” यहाँ बहुव्रीहि समास है। इसका अर्थ है—जिसके पीले वस्त्र हों, वह व्यक्ति। यहाँ पूर्वपद है “पीत”
और उत्तरपद है “अम्बर”। इनमेंसे किसी भी पदके अर्थकी प्रधानता नहीं है, इनके द्वारा जो “अन्य व्यक्ति” (भगवान्)
रूप अर्थ व्यक्त होता है उसकी प्रधानता है। द्वन्द्व समासमें दोनों ही पदोंके अर्थकी प्रधानता रहती है—जैसे
“रामलक्ष्मणौ पश्य”—राम और लक्ष्मणको देखो। यहाँ राम और लक्ष्मण—दोनोंको ही देखना व्यक्त होता है; अतः दोनों
पदोंके अर्थकी प्रधानता है।
34
मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्। कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा॥ 34॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
मैं सबका नाश करनेवाला मृत्यु और उत्पन्न होनेवालोंका उत्पत्तिहेतु हूँ तथा स्त्रियोंमें कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ॥ 34॥
* कालके तीन भेद हैं—
1—“समय” वाचक काल।
2—“प्रकृति” रूप काल। महाप्रलयके बाद जितने समयतक प्रकृतिकी साम्यावस्था रहती है, वही प्रकृतिरूपी
काल है।
3—नित्य शाश्वत विज्ञानानन्दघन परमात्मा।
समयवाचक स्थूल कालकी अपेक्षा तो बुद्धिकी समझमें न आनेवाला प्रकृतिरूप काल सूक्ष्म और पर है;
और इस प्रकृतिरूप कालसे भी परमात्मारूप काल अत्यन्त सूक्ष्म, परातिपर और परम श्रेष्ठ है। वस्तुतः परमात्मा
देश-कालसे सर्वथा रहित है; परंतु जहाँ प्रकृति और उसके कार्यरूप संसारका वर्णन किया जाता है, वहाँ सबको
सत्ता-स्फूर्ति देनेवाले होनेके कारण उन सबके अधिष्ठानरूप विज्ञानानन्दघन परमात्मा ही वास्तविक “काल” हैं। ये ही
“अक्षय” काल हैं।
35
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्। मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः॥ 35॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
तथा गायन करनेयोग्य श्रुतियोंमें मैं बृहत्साम और छन्दोंमें गायत्री छन्द हूँ तथा महीनोंमें
1-सामवेदमें “बृहत्साम” एक गीत-विशेष है। इसके द्वारा परमेश्वरकी इन्द्ररूपमें स्तुति की गयी है। “अतिरात्र” यागमें
यही पृष्ठस्तोत्र है।
2-गायत्रीकी महिमाका निम्नांकित वचनोंद्वारा किंचित् दिग्दर्शन कराया जाता है—
ञ् “गायत्री छन्दसां मातेति।”(नारायणोपनिषद् 34)
ञ् “गायत्री समस्त वेदोंकी माता है।”
सर्ववेदसारभूता गायत्र्यास्तु समर्चना।
ब्रह्मादयोऽपि सन्ध्यायां तां ध्यायन्ति जपन्ति च॥
(देवीभागवत 11। 16। 15)
ञ् “गायत्रीकी उपासना समस्त वेदोंकी सारभूत है, ब्रह्मा आदि देवता भी सन्ध्याकालमें गायत्रीका ध्यान और जप
करते हैं।”
गायत्र्युपासना नित्या सर्ववेदैः समीरिता।
यया विना त्वधःपातो ब्राह्मणस्यास्ति सर्वथा॥
(देवीभागवत 12। 8। 89)
“गायत्रीकी उपासनाको समस्त वेदोंने नित्य (अनिवार्य) कहा है। इस गायत्रीकी उपासनाके बिना ब्राह्मणका तो सब
तरहसे अधःपतन है ही।”
अभीष्टं लोकमाप्नोति प्राप्नुयात् काममीप्सितम्।
गायत्री वेदजननी गायत्री पापनाशिनी॥
36
द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्। जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्॥ 36॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
मैं छल करनेवालोंमें जूआ और प्रभावशाली पुरुषोंका प्रभाव हूँ। मैं जीतनेवालोंका विजय हूँ, निश्चय करनेवालोंका निश्चय और सात्त्विक पुरुषोंका सात्त्विक भाव हूँ॥ 36॥
गायत्र्याः परमं नास्ति दिवि चेह च पावनम्।
हस्तत्राणप्रदा देवी पततां नरकार्णवे॥ (शंखस्मृति 12। 24-25)
“(गायत्रीकी उपासना करनेवाला द्विज) अपने अभीष्ट लोकको पा जाता है, मनोवांछित भोग प्राप्त कर लेता है।
गायत्री समस्त वेदोंकी जननी और सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेवाली हैं। स्वर्गलोकमें तथा पृथ्वीपर गायत्रीसे बढ़कर पवित्र
करनेवाली दूसरी कोई वस्तु नहीं है। गायत्री देवी नरकसमुद्रमें गिरनेवालोंको हाथका सहारा देकर बचा लेनेवाली हैं।”
गायत्र्यास्तु परं नास्ति शोधनं पापकर्मणाम्।
महाव्याहृतिसंयुक्तां प्रणवेन च संजपेत्॥ (संवर्तस्मृति 218)
“गायत्रीसे बढ़कर पापकर्मोंका शोधक (प्रायश्चित्त) दूसरा कुछ भी नहीं है। प्रणव (ॐकार) सहित तीन
महाव्याहृतियोंसे युक्त गायत्री मन्त्रका जप करना चाहिये।”
नास्ति गङ्गासमं तीर्थं न देवः केशवात्परः।
गायत्र्यास्तु परं जप्यं न भूतं न भविष्यति॥ (बृहद्योगियाज्ञवल्क्य 10। 10)
“गंगाजीके समान तीर्थ नहीं है, श्रीविष्णुभगवान्से बढ़कर देवता नहीं है और गायत्रीसे बढ़कर जपनेयोग्य मन्त्र न
हुआ, न होगा।”
* शुक्ले मार्गशिरे पक्षे योषिद्भर्तुरनुज्ञया। आरभेत व्रतमिदं सार्वकामिकमादितः॥
(श्रीमद्भागवत 6। 19। 2)
“पहले-पहल मार्गशीर्षके शुक्लपक्षमें स्त्री अपने पतिकी आज्ञासे सब कामनाओंके देनेवाले इस पुंसवन-व्रतका
आरम्भ करे।”
* केन-उपनिषद्में एक गाथा है—एक समय स्वर्गके देवताओंने परमात्माके प्रतापसे असुरोंपर विजय प्राप्त की। देवोंकी
कीर्ति और महिमा सब तरफ छा गयी। विजयोन्मत्त देवता भगवान्को भूलकर कहने लगे कि “हमारी ही जय हुई है।
हमने अपने पराक्रम और बुद्धिबलसे दैत्योंका दलन किया है, इसीलिये लोग हमारी पूजा करते हैं और हमारे विजयगीत
गाते हैं।” देवताओंके अभिमानका नाश कर उनका उपकार करनेके लिये परमात्मा ब्रह्मने अपनी लीलासे एक ऐसा अद्भुत
रूप प्रकट किया, जिसे देखकर देवताओंकी बुद्धि चक्कर खा गयी। देवताओंने इस यक्षरूपधारी अद्भुत पुरुषका पता लगानेके
लिये अपने अगुआ अग्निदेवसे कहा कि “हे जातवेदस्! हम सबमें आप सर्वापेक्षया अधिक तेजस्वी हैं, आप इनका पता
लगाइये कि ये यक्षरूपधारी वास्तवमें कौन हैं?” अग्निने कहा—“ठीक है, मैं पता लगाकर आता हूँ।” यों कहकर अग्नि
वहाँ गये, परंतु उसके समीप पहुँचते ही तेजसे ऐसे चकरा गये कि बोलनेतकका साहस न हुआ। अन्तमें उस यक्षरूपी
ब्रह्मने अग्निसे पूछा कि “तू कौन है?” अग्निने कहा—“मेरा नाम प्रसिद्ध है, मुझे अग्नि कहते हैं और जातवेदस् भी कहते
हैं।” ब्रह्मने फिर पूछा—“यह सब तो ठीक है; परंतु हे अग्निदेव! तुझमें किस प्रकारका सामर्थ्य है, तू क्या कर सकता है?”
37
वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः। मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः॥ 37॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
वृष्णिवंशियोंमें वासुदेव अर्थात् मैं स्वयं तेरा सखा, पाण्डवोंमें धनंजय अर्थात् तू, मुनियोंमें वेदव्यास और कवियोंमें शुक्राचार्य कवि भी मैं ही हूँ॥ 37॥
अग्निने कहा—“हे यक्ष! इस पृथ्वी और अन्तरिक्षमें जो कुछ भी स्थावर-जंगम पदार्थ हैं, उन सबको मैं जलाकर भस्म
कर सकता हूँ।”
ब्रह्मने उसके सामने एक सूखे घासका तिनका डालकर कहा कि “ इस तृणको तू जला दे!” अग्निदेवता अपने पूरे
वेगसे तृणको जलानेके लिये सर्वप्रकारसे यत्न करने लगे, परंतु तृणको नहीं जला सके। लज्जासे उनका मस्तक नीचा
हो गया और अन्तमें यक्षसे बिना कुछ कहे ही अग्निदेवता अपना-सा मुँह लिये देवताओंके पास लौट आये और बोले
कि “मैं तो इस बातका पता नहीं लगा सका कि यह यक्ष कौन है?”
इसके बाद वायुदेव यक्षके पास गये; परंतु उनकी भी अग्निकी-सी दशा हो गयी, वे बोल नहीं सके। यक्षने पूछा—
“तू कौन है?” वायुने कहा—“मैं वायु हूँ, मेरा नाम और गुण प्रसिद्ध है—मैं गमनक्रिया करनेवाला और पृथ्वीकी गन्धको
वहन करनेवाला हूँ। अन्तरिक्षमें गमन करनेवाला होनेके कारण मुझे मातरिश्वा भी कहते हैं।” यक्षने कहा—“तुझमें क्या
सामर्थ्य है?” वायुने कहा—“इस पृथ्वी और अन्तरिक्षमें जो कुछ भी पदार्थ हैं, उन सबको मैं ग्रहण कर सकता हूँ (उड़ा
ले सकता हूँ)।” ब्रह्मने वायुके सम्मुख भी वही सूखा तिनका रख दिया और कहा—“इस तिनकेको उड़ा दे।” वायुने
अपना सारा बल लगा दिया, परंतु तिनका हिलातक नहीं। यह देखकर वायुदेव बड़े लज्जित हुए और तुरंत ही देवताओंके
पास आकर उन्होंने कहा—“हे देवगण! पता नहीं यह यक्ष कौन है; मैं तो कुछ भी नहीं जान सका।”
अब इन्द्र यक्षके समीप गये। देवराजको अभिमानमें भरा देखकर यक्षरूपी ब्रह्म वहाँसे अन्तर्धान हो गये। इन्द्रका
अभिमान चूर्ण करनेके लिये उनसे बाततक नहीं की। इतनेमें उन्होंने देखा कि अन्तरिक्षमें अत्यन्त शोभायुक्त और सब
प्रकारके उत्तमोत्तम अलंकारोंसे विभूषित हिमवान्की कन्या भगवती पार्वती उमा खड़ी हैं। इन्द्रने विनयभावसे उनसे पूछा—
“माता! अभी जो यक्ष हमें दर्शन देकर अन्तर्धान हो गये, वे कौन थे?” उमाने कहा—“वे यक्ष प्रसिद्ध ब्रह्म थे।
हे इन्द्र! इन ब्रह्मने ही असुरोंको पराजित किया है, तुमलोग तो केवल निमित्तमात्र हो; ब्रह्मकी विजयसे ही तुमलोगोंकी
महिमा बढ़ी है और इसीसे तुम्हारी पूजा भी होती है। तुम जो अपनी विजय और अपनी महिमा मानते हो, वह सब
तुम्हारा मिथ्या अभिमान है; इसे त्याग करो और यह समझो कि जो कुछ होता है सो केवल उस ब्रह्मकी सत्तासे ही
होता है।”
उमाके वचनोंसे इन्द्रकी आँखें खुल गयीं, अभिमान जाता रहा। ब्रह्मकी महती शक्तिका परिचय पाकर इन्द्र लौटे और
उन्होंने अग्नि और वायुको भी ब्रह्मका उपदेश दिया। अग्नि और वायुने भी ब्रह्मको जान लिया। इसीसे ये तीन देवता
सबसे श्रेष्ठ हुए। इनमें भी इन्द्र सबसे श्रेष्ठ माने गये। कारण, उन्होंने ब्रह्मको सबसे पहले जाना था।
38
दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्। मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्॥ 38॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
मैं दमन करनेवालोंका दण्ड अर्थात् दमन करनेकी शक्ति हूँ, जीतनेकी इच्छावालोंकी नीति हूँ , गुप्त रखनेयोग्य भावोंका रक्षक मौन हूँ और ज्ञानवानोंका तत्त्वज्ञान मैं ही हूँ॥ 38॥
1-भगवान्ने स्वयं कहा है—
नरस्त्वमसि दुर्द्धर्ष हरिर्नारायणो
ह्यहम्। काले लोकमिमं प्राप्तौ नरनारायणावृषी॥
अनन्यः पार्थ मत्तस्त्वं त्वत्तश्चाहं तथैवच। नावयोरन्तरं शक्यं वेदितुं भरतर्षभ॥
(महा0, वन0 12। 46-47)
“हे दुर्द्धर्ष अर्जुन! तू भगवान् नर है और मैं स्वयं हरिनारायण हूँ। हम दोनों एक समय नर और नारायण ऋषि होकर
इस लोकमें आये थे। इसलिये हे अर्जुन! तू मुझसे अलग नहीं है और उसी प्रकार मैं तुझसे अलग नहीं हूँ। हे भरतश्रेष्ठ!
हम दोनोंमें कुछ भी अन्तर है, यह किसीके जाननेमें नहीं आ सकता।”
2-महर्षि भृगुके च्यवन आदि सात पुत्रोंमें शुक्र प्रधान हैं। इन्होंने भगवान् शंकरकी आराधना करके संजीवनी-विद्या
और जरा-मरणरहित वज्रके समान दृढ़ शरीर प्राप्त किया था। भगवान् शंकरके प्रसादसे ही योगविद्यामें निपुण होकर
इन्होंने योगाचार्यकी पदवी प्राप्त की थी। ये दैत्योंके पुरोहित हैं। “काव्य”, “कवि” और “उशना” इन्हींके नामान्तर हैं।
पितरोंकी मानसी कन्या गोसे इनका विवाह हुआ था। शण्ड-अमर्क नामक दो पुत्र, जो प्रह्लादके गुरु थे, इन्हींसे
उत्पन्न हुए थे। ये अनेकों अत्यन्त गुप्त और दुर्लभ मन्त्रोंके ज्ञाता, अनेकों विद्याओंके पारदर्शी, महान् बुद्धिमान् और
परम नीतिनिपुण हैं। इनकी “शुक्रनीति” प्रसिद्ध है। बृहस्पतिपुत्र कचने इन्हींसे संजीवनी-विद्या सीखी थी। इनकी
महाभारत, श्रीमद्भागवत, वायुपुराण, ब्रह्मपुराण, मत्स्यपुराण और स्कन्दपुराण आदिमें बड़ी ही विचित्र और शिक्षाप्रद
कथाएँ हैं।
39
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन। न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्॥ 39॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
और हे अर्जुन! जो सब भूतोंकी उत्पत्तिका कारण है, वह भी मैं ही हूँ; क्योंकि ऐसा चर और अचर कोई भी भूत नहीं है, जो मुझसे रहित हो॥ 39॥
40
नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप। एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया॥ 40॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे परंतप! मेरी दिव्य विभूतियोंका अन्त नहीं है, मैंने अपनी विभूतियोंका यह विस्तार तो तेरे लिये एकदेशसे अर्थात् संक्षेपसे कहा है॥ 40॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—उन्नीसवें श्लोकमें भगवान्ने अपनी दिव्य विभूतियोंको अनन्त बतलाकर प्रधानतासे उनका वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा की थी, उसके अनुसार बीसवेंसे उनतालीसवें श्लोकतक उनका वर्णन किया। अब पुनः अपनी दिव्य विभूतियोंकी अनन्तता दिखलाते हुए उनका उपसंहार करते हैं—

41
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जि तमेव वा। तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्॥ 41॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो-जो भी विभूतियुक्त अर्थात् ऐश्वर्ययुक्त, कान्तियुक्त और शक्तियुक्त वस्तु है, उस-उसको तू मेरे तेजके अंशकी ही अभिव्यक्ति जान॥ 41॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अठारहवें श्लोकमें अर्जुनने भगवान्से उनकी विभूति और योगशक्तिका वर्णन करनेकी प्रार्थना की थी, उसके अनुसार भगवान् अपनी दिव्य विभूतियोंका वर्णन समाप्त करके अब संक्षेपमें अपनी योग-शक्तिका वर्णन करते हैं—

42
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन। विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्॥ 42॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
अथवा हे अर्जुन! इस बहुत जाननेसे तेरा क्या प्रयोजन है। मैं इस सम्पूर्ण जगत्को अपनी योगशक्तिके एक अंशमात्रसे धारण करके स्थित हूँ॥ 42॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार मुख्य-मुख्य वस्तुओंमें अपनी योगशक्तिरूपी तेजके अंशकी अभिव्यक्तिका वर्णन करके अब भगवान् यह बतला रहे हैं कि समस्त जगत् मेरी योगशक्तिके एक अंशसे ही धारण किया हुआ है—

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः॥
10.1श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीका