विश्वरूपदर्शनयोग
सम्बन्ध—दसवें अध्यायके सातवें श्लोकतक भगवान्ने अपने विभूति तथा योगशक्तिका और उनके जाननेके माहात्म्यका संक्षेपमें वर्णन करके ग्यारहवें श्लोकतक भक्तियोग और उसके फलका निरूपण किया। इसपर बारहवेंसे अठारहवें श्लोकतक अर्जुनने भगवान्की स्तुति करके उनसे दिव्य विभूतियोंका और योगशक्तिका विस्तृत वर्णन करनेके लिये प्रार्थना की। तब भगवान्ने चालीसवें श्लोकतक अपनी विभूतियोंका वर्णन समाप्त करके अन्तमें योगशक्तिका प्रभाव बतलाते हुए समस्त ब्रह्माण्डको अपने एक अंशमें धारण किया हुआ कहकर अध्यायका उपसंहार किया। इस प्रसंगको सुनकर अर्जुनके मनमें उस महान् स्वरूपको (जिसके एक अंशमें समस्त विश्व स्थित है) प्रत्यक्ष देखनेकी इच्छा उत्पन्न हो गयी। इसीलिये इस ग्यारहवें अध्यायके आरम्भमें पहले चार श्लोकोंमें भगवान्की और उनके उपदेशकी प्रशंसा करते हुए अर्जुन उनसे विश्वरूपका दर्शन करानेके लिये प्रार्थना करते हैं—
सम्बन्ध—परम श्रद्धालु और परम प्रेमी अर्जुनके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर तीन श्लोकोंमें भगवान् अपने विश्वरूपका वर्णन करते हुए उसे देखनेके लिये अर्जुनको आज्ञा देते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार तीन श्लोकोंमें बार-बार अपना अद्भुत रूप देखनेके लिये आज्ञा देनेपर भी जब अर्जुन भगवान्के रूपको नहीं देख सके तब उसके न देख सकनेके कारणको जाननेवाले अन्तर्यामी भगवान् अर्जुनको दिव्यदृष्टि देनेकी इच्छा करके कहने लगे—
सम्बन्ध—अर्जुनको दिव्य दृष्टि देकर भगवान्ने जिस प्रकारका अपना दिव्य विराट्स्वरूप दिखलाया था, अब पाँच श्लोकोंद्वारा संजय उसका वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—उपर्युक्त विराट्स्वरूप परमदेव परमेश्वरका प्रकाश कैसा था, अब उसका वर्णन किया जाता है—
सम्बन्ध—भगवान्के उस प्रकाशमय अद्भुत स्वरूपमें अर्जुनने सारे विश्वको किस प्रकार देखा, अब यह बतलाया जाता है—
सम्बन्ध—इस प्रकार अर्जुनद्वारा भगवान्का विराट्रूप देखे जानेके पश्चात् क्या हुआ, इस जिज्ञासापर कहते हैं—
सम्बन्ध—उपर्युक्त प्रकारसे हर्ष और आश्चर्यसे चकित अर्जुन अब भगवान्के विश्वरूपमें दीख पड़नेवाले दृश्योंका वर्णन करते हुए उस विश्वरूपका स्तवन करते हैं—
सम्बन्ध—दोनों सेनाओंके योद्धाओंको अर्जुन किस प्रकार भगवान्के विकराल मुखोंमें प्रविष्ट होते देख रहे हैं, अब दो श्लोकोंमें उसका पहले नदियोंके जलके दृष्टान्तसे और तदनन्तर पतंगोंके दृष्टान्तसे स्पष्टीकरण कर रहे हैं—
सम्बन्ध—दोनों सेनाओंके लोगोंके प्रवेशका दृष्टान्तद्वारा वर्णन करके अब उन लोगोंको भगवान् किस प्रकार नष्ट कर रहे हैं, इसका वर्णन किया जाता है—
सम्बन्ध—अर्जुनने तीसरे और चौथे श्लोकोंमें भगवान्से अपने ऐश्वर्यमय रूपका दर्शन करानेके लिये प्रार्थना की थी, उसीके अनुसार भगवान्ने अपना विश्वरूप अर्जुनको दिखलाया; परन्तु भगवान्के इस भयानक उग्र रूपको देखकर अर्जुन बहुत डर गये और उनके मनमें इस बातके जाननेकी इच्छा उत्पन्न हो गयी कि ये श्रीकृष्ण वस्तुतः कौन हैं? तथा इस महान् उग्र स्वरूपके द्वारा अब ये क्या करना चाहते हैं? इसीलिये वे भगवान्से पूछ रहे हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार अर्जुनके पूछनेपर भगवान् अपने उग्ररूप धारण करनेका कारण बतलाते हुए प्रश्नानुसार उत्तर देते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार अर्जुनके प्रश्नका उत्तर देकर अब भगवान् दो श्लोकोंद्वारा युद्ध करनेमें सब प्रकारसे लाभ दिखलाकर अर्जुनको युद्धके लिये उत्साहित करते हुए आज्ञा देते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार भगवान्के मुखसे सब बातें सुननेके बाद अर्जुनकी कैसी परिस्थिति हुई और उन्होंने क्या किया—इस जिज्ञासापर संजय कहते हैं—
सम्बन्ध—अब छत्तीसवेंसे छियालीसवें श्लोकतक अर्जुनद्वारा किये हुए भगवान्के स्तवन, नमस्कार और क्षमायाचनासहित प्रार्थनाका वर्णन है, उसमें प्रथम “स्थाने” पदका प्रयोग करके जगत्के हर्षित होने आदिका औचित्य बतलाते हैं—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें जो “स्थाने” पदका प्रयोग करके सिद्धसमुदायोंका नमस्कार आदि करना उचित बतलाया गया था, अब चार श्लोकोंमें भगवान्के प्रभावका वर्णन करके उसी बातको सिद्ध करते हुए अर्जुनके बार-बार नमस्कार करनेका भाव दिखलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार भगवान्की स्तुति और प्रणाम करके अब भगवान्के गुण, रहस्य और माहात्म्यको यथार्थ न जाननेके कारण वाणी और क्रियाद्वारा किये गये अपराधोंको क्षमा करनेके लिये दो श्लोकोंमें भगवान्से अर्जुन प्रार्थना करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार अपराध क्षमा करनेके लिये प्रार्थना करके अब दो श्लोकोंमें अर्जुन भगवान्के प्रभावका वर्णन करते हुए अपराध क्षमा करनेकी योग्यताका प्रतिपादन करके भगवान्से प्रसन्न होनेके लिये पुनः प्रार्थना करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार भगवान्से अपने अपराधोंके लिये क्षमा-याचना करके अब अर्जुन दो श्लोकोंमें भगवान्से चतुर्भुजरूपका दर्शन करानेके लिये प्रार्थना करते हैं—
सम्बन्ध—अर्जुनकी प्रार्थनापर अब अगले दो श्लोकोंमें भगवान् अपने विश्वरूपकी महिमा और दुर्लभताका वर्णन करते हुए उनचासवें श्लोकमें अर्जुनको आश्वासन देकर चतुर्भुजरूप देखनेके लिये कहते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार चतुर्भुजरूपका दर्शन करनेके लिये अर्जुनको आज्ञा देकर भगवान्ने क्या किया, अब संजय धृतराष्ट्रसे वही कहते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णने अपने विश्वरूपको संवरण करके, चतुर्भुजरूपके दर्शन देनेके पश्चात् जब स्वाभाविक मानुषरूपसे युक्त होकर अर्जुनको आश्वासन दिया, तब अर्जुन सावधान होकर कहने लगे—
सम्बन्ध—इस प्रकार अर्जुनके वचन सुनकर अब भगवान् दो श्लोकोंद्वारा अपने चतुर्भुज देवरूपके दर्शनकी दुर्लभता और उसकी महिमाका वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—यदि उपर्युक्त उपायोंसे आपके दर्शन नहीं हो सकते तो किस उपायसे हो सकते हैं, ऐसी जिज्ञासा होनेपर भगवान् कहते हैं—
सम्बन्ध—अनन्य भक्तिके द्वारा भगवान्को देखना, जानना और एकीभावसे प्राप्त करना सुलभ बतलाया जानेके कारण अनन्यभक्तिका स्वरूप जाननेकी आकांक्षा होनेपर अब अनन्य भक्तके लक्षणोंका वर्णन किया जाता है—