ग्रन्थ
18मोक्षसंन्यासयोग

मोक्षसंन्यासयोग

Moksha-Sannyasa-Yoga
Liberation through Renunciation
78 verses · 75 printed blockspp. 713798 · Srimad Bhagavad Gita — Tattva-Vivechaniसाधारण भाषाटीका 75 · साधक-संजीवनी 74 · श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्य 78 · श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीका 75
1अर्जुन
अर्जुन उवाच संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्। त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन॥ 1॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
अर्जुन बोले— हे महाबाहो! हे अन्तर्यामिन्! हे वासुदेव! मैं संन्यास और त्यागके तत्त्वको
सम्बन्ध

सम्बन्ध—दूसरे अध्यायके ग्यारहवें श्लोकसे गीताके उपदेशका आरम्भ हुआ। वहाँसे आरम्भ करके तीसवें श्लोकतक भगवान्ने ज्ञानयोगका उपदेश दिया और प्रसंगवश क्षात्रधर्मकी दृष्टिसे युद्ध करनेकी कर्तव्यताका प्रतिपादन करके उनतालीसवें श्लोकसे लेकर अध्यायकी समाप्तिपर्यन्त कर्मयोगका उपदेश दिया, उसके बाद तीसरे अध्यायसे सत्रहवें अध्यायतक कहीं ज्ञानयोगकी दृष्टिसे और कहीं कर्मयोगकी दृष्टिसे परमात्माकी प्राप्तिके बहुत-से साधन बतलाये। उन सबको सुननेके अनन्तर अब अर्जुन इस अठारहवें अध्यायमें समस्त अध्यायोंके उपदेशका सार जाननेके उद्देश्यसे भगवान्के सामने संन्यास यानी ज्ञानयोगका और त्याग यानी फलासक्तिके त्यागरूप कर्मयोगका तत्त्व भलीभाँति अलग-अलग जाननेकी इच्छा प्रकट करते हैं—

2श्रीभगवान्
श्रीभगवान् उवाच
श्रीभगवानुवाच काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः। सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः॥ 2॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
श्रीभगवान् बोले—कितने ही पण्डितजन तो काम्यकर्मोंके त्यागको संन्यास समझते हैं तथा दूसरे विचारकुशल पुरुष सब कर्मोंके फलके त्यागको त्याग कहते हैं॥ 2॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार अर्जुनके पूछनेपर भगवान् अपना निश्चय प्रकट करनेके पहले संन्यास और त्यागके विषयमें दो श्लोकोंद्वारा अन्य विद्वानोंके भिन्न-भिन्न मत बतलाते हैं—

3
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः। यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे॥ 3॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
कई एक विद्वान् ऐसा कहते हैं कि कर्ममात्र दोषयुक्त हैं, इसलिये त्यागनेके योग्य हैं और दूसरे विद्वान् यह कहते हैं कि यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्यागनेयोग्य नहीं है॥ 3॥
4
निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम। त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः॥ 4॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे पुरुषश्रेष्ठ अर्जुन! संन्यास और त्याग, इन दोनोंमेंसे पहले त्यागके विषयमें तू मेरा निश्चय सुन। क्योंकि त्याग सात्त्विक, राजस और तामस भेदसे तीन प्रकारका कहा
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार संन्यास और त्यागके विषयोंमें विद्वानोंके भिन्न-भिन्न मत बतलाकर अब भगवान् त्यागके विषयमें अपना निश्चय बतलाना आरम्भ करते हैं—

5
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्। यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥ 5॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्याग करनेके योग्य नहीं है, बल्कि वह तो अवश्य कर्तव्य है, क्योंकि यज्ञ, दान और तप—ये तीनों ही कर्म बुद्धिमान् पुरुषोंको पवित्र
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार त्यागका तत्त्व सुननेके लिये अर्जुनको सावधान करके अब भगवान् उस त्यागका स्वरूप बतलानेके लिये पहले दो श्लोकोंमें शास्त्रविहित शुभ कर्मोंको करनेके विषयमें अपना निश्चय बतलाते हैं—

6
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च। कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्॥ 6॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
इसलिये हे पार्थ! इन यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंको तथा और भी सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मोंको आसक्ति और फलोंका त्याग करके अवश्य करना चाहिये; यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है॥ 6॥
7
नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते। मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः॥ 7॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
(निषिद्ध और काम्य कर्मोंका तो स्वरूपसे त्याग करना उचित ही है) परन्तु नियत कर्मका स्वरूपसे त्याग उचित नहीं है। इसलिये मोहके कारण उसका त्याग कर देना तामस त्याग कहा
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार अपना सुनिश्चित मत बतलाकर अब भगवान् शास्त्रोंमें कहे हुए तामस, राजस और सात्त्विक इन तीन प्रकारके त्यागोंमें सात्त्विक त्याग ही वास्तविक त्याग है और वही कर्तव्य है; दूसरे दोनों त्याग वास्तविक त्याग नहीं हैं, अतः वे करनेयोग्य नहीं हैं—यह बात समझानेके लिये तथा अपने मतकी शास्त्रोंके साथ एकवाक्यता दिखलानेके लिये तीन श्लोकोंमें क्रमसे तीन प्रकारके त्यागोंके लक्षण बतलाते हुए पहले निकृष्ट कोटिके तामस त्यागके लक्षण बतलाते हैं—

8
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्। स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्॥ 8॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो कुछ कर्म है वह सब दुःखरूप ही है—ऐसा समझकर यदि कोई शारीरिक क्लेशके भयसे कर्तव्यकर्मोंका त्याग कर दे, तो वह ऐसा राजस त्याग करके त्यागके फलको किसी
सम्बन्ध

सम्बन्ध—तामस त्यागका निरूपण करके अब राजस त्यागके लक्षण बतलाते हैं—

9
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन। सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः॥ 9॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे अर्जुन! जो शास्त्रविहित कर्म करना कर्तव्य है—इसी भावसे आसक्ति और फलका त्याग करके किया जाता है—वही सात्त्विक त्याग माना गया है॥ 9॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अब उत्तम श्रेणीके सात्त्विक त्यागके लक्षण बतलाये जाते हैं—

10
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते। त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः॥ 10॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो मनुष्य अकुशल कर्मसे तो द्वेष नहीं करता और कुशल कर्ममें आसक्त नहीं होता— वह शुद्ध सत्त्वगुणसे युक्त पुरुष संशयरहित, बुद्धिमान् और सच्चा त्यागी है॥ 10॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—उपर्युक्त प्रकारसे सात्त्विक त्याग करनेवाले पुरुषका निषिद्ध और काम्य कर्मोंको स्वरूपसे छोड़नेमें और कर्तव्यकर्मोंके करनेमें कैसा भाव रहता है, इस जिज्ञासापर सात्त्विक त्यागी पुरुषकी अन्तिम स्थितिके लक्षण बतलाते हैं—

11
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः। यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते॥ 11॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
क्योंकि शरीरधारी किसी भी मनुष्यके द्वारा सम्पूर्णतासे सब कर्मोंका त्याग किया जाना शक्य नहीं है; इसलिये जो कर्मफलका त्यागी है, वही त्यागी है—यह कहा जाता
सम्बन्ध

सम्बन्ध—उपर्युक्त श्लोकमें सात्त्विक त्यागीको यानी निष्कामभावसे कर्तव्यकर्मका अनुष्ठान करनेवाले कर्मयोगीको सच्चा त्यागी बतलाया। इसपर यह शंका होती है कि निषिद्ध और काम्य कर्मोंकी भाँति अन्य समस्त कर्मोंका स्वरूपसे त्याग कर देनेवाला मनुष्य भी तो सच्चा त्यागी हो सकता है, फिर केवल निष्कामभावसे कर्म करनेवालेको ही सच्चा त्यागी क्यों कहा गया। इसलिये कहते हैं—

12
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्। भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित्॥ 12॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
कर्मफलका त्याग न करनेवाले मनुष्योंके कर्मोंका तो अच्छा, बुरा और मिला हुआ—ऐसे तीन प्रकारका फल मरनेके पश्चात् अवश्य होता है; किन्तु कर्मफलका त्याग कर देनेवाले मनुष्योंके कर्मोंका फल किसी कालमें भी नहीं होता॥ 12॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें यह बात कही गयी कि “जो कर्मफलका त्यागी है, वही त्यागी है।” इसपर यह शंका हो सकती है कि कर्मोंका फल न चाहनेपर भी किये हुए कर्म अपना फल दिये बिना नष्ट नहीं हो सकते—जैसे बोया हुआ बीज समयपर अपने-आप वृक्षको उत्पन्न कर देता है, वैसे ही किये हुए कर्मोंका फल भी किसी-न-किसी जन्ममें सबको अवश्य भोगना पड़ता है; इसलिये केवल कर्मफलके त्यागसे मनुष्य त्यागी यानी “कर्मबन्धनसे रहित” कैसे हो सकता है? इस शंकाकी निवृत्तिके लिये कहते हैं—

13
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे। साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्॥ 13॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे महाबाहो! सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिके ये पाँच हेतु कर्मोंका अन्त करनेके लिये उपाय बतलानेवाले सांख्यशास्त्रमें कहे गये हैं, उनको तू मुझसे भलीभाँति जान॥ 13॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—पहले श्लोकमें अर्जुनने संन्यास और त्यागका तत्त्व अलग-अलग जाननेकी इच्छा प्रकट की थी। उसका उत्तर देते हुए भगवान्ने दूसरे और तीसरे श्लोकोंमें इस विषयपर विद्वानोंके भिन्न-भिन्न मत बतलाकर अपने मतके अनुसार चौथे श्लोकसे बारहवें श्लोकतक त्यागका यानी कर्मयोगका तत्त्व भलीभाँति समझाया; अब संन्यासका यानी सांख्ययोगका तत्त्व समझानेके लिये पहले सांख्य-सिद्धान्तके अनुसार कर्मोंकी सिद्धिमें पाँच हेतु बतलाते हैं—

14
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्। विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥ 14॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
इस विषयमें अर्थात् कर्मोंकी सिद्धिमें अधिष्ठान और कर्ता तथा भिन्न-भिन्न प्रकारके करण एवं नाना प्रकारकी अलग-अलग चेष्टाएँ और वैसे ही पाँचवाँ हेतु दैव है॥ 14॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अब उन पाँच हेतुओंके नाम बतलाये जाते हैं—

15
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः। न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः॥ 15॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
मनुष्य मन, वाणी और शरीरसे शास्त्रानुकूल अथवा विपरीत जो कुछ भी कर्म करता है—
16
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः। पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः॥ 16॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
परन्तु ऐसा होनेपर भी जो मनुष्य अशुद्धबुद्धि होनेके कारण उस विषयमें यानी कर्मोंके होनेमें केवल—शुद्धस्वरूप आत्माको कर्ता समझता है, वह मलिन बुद्धिवाला अज्ञानी यथार्थ नहीं समझता॥ 16॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार सांख्ययोगके सिद्धान्तसे समस्त कर्मोंकी सिद्धिके अधिष्ठानादि पाँच कारणोंका निरूपण करके अब, वास्तवमें आत्माका कर्मोंसे कोई सम्बन्ध नहीं है, आत्मा सर्वथा शुद्ध, निर्विकार और अकर्ता है—यह बात समझानेके लिये पहले आत्माको कर्ता माननेवालेकी निन्दा करते हैं—

17
यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते। हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥ 17॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जिस पुरुषके अन्तःकरणमें “मैं कर्ता हूँ” ऐसा भाव नहीं है तथा जिसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थोंमें और कर्मोंमें लिपायमान नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकोंको मारकर भी वास्तवमें न तो मारता है और न पापसे बँधता है॥ 17॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—आत्मा सर्वथा शुद्ध, निर्विकार और अकर्ता है—यह बात समझानेके लिये आत्माको “कर्ता” माननेवालेकी निन्दा करके अब आत्माके यथार्थ स्वरूपको समझकर उसे अकर्ता समझनेवालेकी स्तुति करते हैं—

18
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना। करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः॥ 18॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय—यह तीन प्रकारकी कर्म-प्रेरणा है और कर्ता, करण तथा क्रिया—
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार संन्यास (ज्ञानयोग) का तत्त्व समझानेके लिये आत्माके अकर्तापनका प्रतिपादन करके अब उसके अनुसार कर्मके अंग-प्रत्यंगोंको भलीभाँति समझानेके लिये कर्म-प्रेरणा और कर्मसंग्रहका प्रतिपादन करते हैं—

19
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः। प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि॥ 19॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
गुणोंकी संख्या करनेवाले शास्त्रमें ज्ञान और कर्म तथा कर्ता गुणोंके भेदसे तीन-तीन प्रकारके ही कहे गये हैं, उनको भी तू मुझसे भलीभाँति सुन॥ 19॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार सांख्ययोगके सिद्धान्तसे कर्म-चोदना (कर्म-प्रेरणा) और कर्म-संग्रहका निरूपण करके अब तत्त्वज्ञानमें सहायक सात्त्विक भावको ग्रहण करानेके लिये और उसके विरोधी राजस, तामस भावोंका त्याग करानेके लिये उपर्युक्त कर्म-प्रेरणा और कर्म-संग्रहके नामसे बतलाये हुए ज्ञान आदिमेंसे ज्ञान, कर्म और कर्ताके सात्त्विक, राजस और तामस—इस प्रकार त्रिविध भेद क्रमसे बतलानेकी प्रस्तावना करते हैं—

20
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते। अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥ 20॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जिस ज्ञानसे मनुष्य पृथक्-पृथक् सब भूतोंमें एक अविनाशी परमात्मभावको विभागरहित समभावसे स्थित देखता है, उस ज्ञानको तो तू सात्त्विक जान॥ 20॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें जो ज्ञान, कर्म और कर्ताके सात्त्विक, राजस और तामस भेद क्रमशः बतलानेकी प्रस्तावना की थी—उसके अनुसार पहले सात्त्विक ज्ञानके लक्षण बतलाते हैं—

21
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्। वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्॥ 21॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
किन्तु जो ज्ञान अर्थात् जिस ज्ञानके द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण भूतोंमें भिन्न-भिन्न प्रकारके नाना भावोंको अलग-अलग जानता है, उस ज्ञानको तू राजस जान॥ 21॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अब राजस ज्ञानके लक्षण बतलाते हैं—

22
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्। अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्॥ 22॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
परन्तु जो ज्ञान एक कार्यरूप शरीरमें ही सम्पूर्णके सदृश आसक्त है; तथा जो बिना युक्तिवाला, तात्त्विक अर्थसे रहित और तुच्छ है—वह तामस कहा गया है॥ 22॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अब तामस ज्ञानका लक्षण बतलाते हैं—

23
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्। अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते॥ 23॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो कर्म शास्त्रविधिसे नियत किया हुआ और कर्तापनके अभिमानसे रहित हो तथा फल न चाहनेवाले पुरुषद्वारा बिना राग-द्वेषके किया गया हो—वह सात्त्विक कहा जाता
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अब सात्त्विक कर्मके लक्षण बतलाते हैं—

24
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः। क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्॥ 24॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
परन्तु जो कर्म बहुत परिश्रमसे युक्त होता है तथा भोगोंको चाहनेवाले पुरुषद्वारा या अहंकारयुक्त पुरुषद्वारा किया जाता है, वह कर्म राजस कहा गया है॥ 24॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अब राजस कर्मके लक्षण बतलाते हैं—

25
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम्। मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते॥ 25॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्यको न विचारकर केवल अज्ञानसे आरम्भ किया जाता है—वह तामस कहा जाता है॥ 25॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अब तामस कर्मके लक्षण बतलाते हैं—

26
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः। सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते॥ 26॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो कर्ता संगरहित, अहंकारके वचन न बोलनेवाला, धैर्य और उत्साहसे युक्त तथा कार्यके सिद्ध होने और न होनेमें हर्ष-शोकादि विकारोंसे रहित है—वह सात्त्विक कहा जाता है॥ 26॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अब सात्त्विक कर्ताके लक्षण बतलाते हैं—

27
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः। हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः॥ 27॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो कर्ता आसक्तिसे युक्त, कर्मोंके फलको चाहनेवाला और लोभी है तथा दूसरोंको कष्ट देनेके स्वभाववाला, अशुद्धाचारी और हर्ष-शोकसे लिप्त है—वह राजस कहा
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अब राजस कर्ताके लक्षण बतलाते हैं—

28
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः। विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥ 28॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो कर्ता अयुक्त, शिक्षासे रहित, घमंडी, धूर्त और दूसरोंकी जीविकाका नाश करनेवाला तथा शोक करनेवाला, आलसी और दीर्घसूत्री है—वह तामस कहा जाता है॥ 28॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अब तामस कर्ताके लक्षण बतलाते हैं—

29
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु। प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय॥ 29॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे धनंजय! अब तू बुद्धिका और धृतिका भी गुणोंके अनुसार तीन प्रकारका भेद मेरे द्वारा सम्पूर्णतासे विभागपूर्वक कहा जानेवाला सुन॥ 29॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार तत्त्वज्ञानमें सहायक सात्त्विक भावको ग्रहण करानेके लिये और उसके विरोधी राजस-तामस भावोंका त्याग करानेके लिये कर्म-प्रेरणा और कर्मसंग्रहमेंसे ज्ञान, कर्म और कर्ताके सात्त्विक आदि तीन-तीन भेद क्रमसे बतलाकर अब बुद्धि और धृतिके सात्त्विक, राजस और तामस—इस प्रकार त्रिविध भेद क्रमशः बतलानेकी प्रस्तावना करते हैं—

30
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये। बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी॥ 30॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे पार्थ! जो बुद्धि प्रवृत्तिमार्ग और निवृत्तिमार्गको, कर्तव्य और अकर्तव्यको, भय और अभयको तथा बन्धन और मोक्षको यथार्थ जानती है—वह बुद्धि सात्त्विकी
सम्बन्ध

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें जो बुद्धि और धृतिके सात्त्विक, राजस और तामस तीन-तीन भेद क्रमशः बतलानेकी प्रस्तावना की है, उसके अनुसार पहले सात्त्विक बुद्धिके लक्षण बतलाते हैं—

31
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च। अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी॥ 31॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे पार्थ! मनुष्य जिस बुद्धिके द्वारा धर्म और अधर्मको तथा कर्तव्य और अकर्तव्यको भी यथार्थ नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है॥ 31॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अब राजसी बुद्धिके लक्षण बतलाते हैं—

* शास्त्रोंमें धर्मकी बड़ी महिमा है। बृहद्धर्मपुराणमें कहा है—
इस विश्वकी रक्षा करनेवाले वृषभरूप धर्मके चार पैर माने गये हैं। सत्ययुगमें चारों पैर पूरे रहते हैं; त्रेतामें तीन,
द्वापरमें दो और कलियुगमें एक ही पैर रह जाता है।
धर्मके चार पैर हैं—सत्य, दया, शान्ति और अहिंसा।
सत्यं दया तथा शान्तिरहिंसा चेति कीर्तिता। धर्मस्यावयवास्तात चत्वारः पूर्णतां गताः॥
इनमें सत्यके बारह भेद हैं—
अमिथ्यावचनं सत्यं
स्वीकारप्रतिपालनम्। प्रियवाक्यं गुरोः सेवा दृढं चैव व्रतं कृतम्॥
आस्तिक्यं साधुसङ्गश्च पितुर्मातुः
प्रियङ्करः। शुचित्वं द्विविधं चैव ह्रीरसंचय एव च॥
“झूठ न बोलना, स्वीकार किये हुएका पालन करना, प्रिय वचन बोलना, गुरुकी सेवा करना, नियमोंका दृढ़तासे पालन
करना, आस्तिकता, साधुसङ्ग, माता-पिताका प्रियकार्य, बाह्यशौच-आन्तरशौच, लज्जा और अपरिग्रह।”
दयाके छः प्रकार हैं—
“परोपकारो दानं च सर्वदा स्मितभाषणम्। विनयो
न्यूनताभावस्वीकारः
समतामतिः॥
“परोपकार, दान, सदा हँसते हुए बोलना, विनय, अपनेको छोटा समझना और समत्वबुद्धि।”
शान्तिके तीस लक्षण हैं—
अनसूयाल्पसन्तोष इन्द्रियाणां च
संयमः। असङ्गमो
मौनमेवं
देवपूजाविधौ
मतिः॥
अकुतश्चिद्भयत्वं च गाम्भीर्यं स्थिरचित्तता। अरूक्षभावः सर्वत्र निःस्पृहत्वं दृढा मतिः॥
विवर्जनं ह्यकार्याणां समः
पूजापमानयोः। श्लाघा परगुणेऽस्तेयं ब्रह्मचर्यं धृतिः क्षमा॥
आतिथ्यं च जपो
होमस्तीर्थसेवाऽऽर्यसेवनम्। अमत्सरो
सहिष्णुता सुदुःखेषु
अकार्पण्यममूर्खता।
बन्धमोक्षज्ञानं
संन्यासभावना॥
“किसीमें दोष न देखना, थोड़ेमें सन्तोष करना, इन्द्रिय-संयम, भोगोंमें अनासक्ति, मौन, देवपूजामें मन लगाना, निर्भयता,
गम्भीरता, चित्तकी स्थिरता, रूखेपनका अभाव, सर्वत्र निःस्पृहता, निश्चयात्मिका बुद्धि, न करनेयोग्य कार्योंका त्याग,
मानापमानमें समता, दूसरेके गुणमें श्लाघा, चोरीका अभाव, ब्रह्मचर्य, धैर्य, क्षमा, अतिथिसत्कार, जप, होम, तीर्थसेवा, श्रेष्ठ
पुरुषोंकी सेवा, मत्सरहीनता, बन्ध-मोक्षका ज्ञान, संन्यास-भावना, अति दुःखमें भी सहिष्णुता, कृपणताका अभाव और
मूर्खताका अभाव।”
अहिंसाके सात भाव हैं—
अहिंसा
त्वासनजयः
श्रद्धा
चातिथ्यसेवा
परपीडाविवर्जनम्।
शान्तरूपप्रदर्शनम्॥
आत्मीयता च सर्वत्र आत्मबुद्धिः परात्मसु।
“आसनजय, दूसरेको मन-वाणी-शरीरसे दुःख न पहुँचाना, श्रद्धा, अतिथिसत्कार, शान्तभावका प्रदर्शन, सर्वत्र आत्मीयता
और दूसरेमें भी आत्मबुद्धि।”
यह धर्म है। इस धर्मका थोड़ा-सा भी आचरण परम लाभदायक और इसके विपरीत आचरण महान् हानिकारक है—
यथा स्वल्पमधर्मं हि जनयेत् तु महाभयम्। स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥
(बृहद्धर्मपुराण, पूर्वखण्ड 1। 47)
“जैसे थोड़े-से अधर्मका आचरण महान् भयको उत्पन्न करनेवाला होता है, वैसे ही थोड़ा-सा भी इस धर्मका आचरण
महान् भयसे रक्षा करता है।”
इस चतुष्पाद धर्मके साथ-साथ ही अपने-अपने वर्णाश्रमानुसार धर्मोंका आचरण करना चाहिये।
32
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता। सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी॥ 32॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे अर्जुन! जो तमोगुणसे घिरी हुई बुद्धि अधर्मको भी “यह धर्म है” ऐसा मान लेती है तथा इसी प्रकार अन्य सम्पूर्ण पदार्थोंको भी विपरीत मान लेती है, वह बुद्धि तामसी है॥ 32॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अब तामसी बुद्धिके लक्षण बतलाते हैं—

33
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः। योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी॥ 33॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे पार्थ! जिस अव्यभिचारिणी धारणशक्तिसे मनुष्य ध्यानयोगके द्वारा मन, प्राण और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको धारण करता है, वह धृति सात्त्विकी है॥ 33॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अब सात्त्विकी धृतिके लक्षण बतलाते हैं—

34
यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन। प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥ 34॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
परन्तु हे पृथापुत्र अर्जुन! फलकी इच्छावाला मनुष्य जिस धारणशक्तिके द्वारा अत्यन्त आसक्तिसे धर्म, अर्थ और कामोंको धारण करता है, वह धारणशक्ति राजसी है॥ 34॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अब राजसी धृतिके लक्षण बतलाते हैं—

35
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च। न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी॥ 35॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे पार्थ! दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य जिस धारणशक्तिके द्वारा निद्रा, भय, चिन्ता और दुःखको तथा उन्मत्तताको भी नहीं छोड़ता अर्थात् धारण किये रहता है—वह धारणशक्ति तामसी है॥ 35॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अब तामसी धृतिका लक्षण बतलाते हैं—

36–37Merged
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ। अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥ 36॥ यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्। तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्॥ 37॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे भरतश्रेष्ठ! अब तीन प्रकारके सुखको भी तू मुझसे सुन। जिस सुखमें साधक मनुष्य भजन, ध्यान और सेवादिके अभ्याससे रमण करता है और जिससे दुःखोंके अन्तको प्राप्त हो जाता है—जो ऐसा सुख है, वह आरम्भकालमें यद्यपि विषके तुल्य प्रतीत होता है, परन्तु परिणाममें अमृतके तुल्य है; इसलिये वह परमात्मविषयक बुद्धिके प्रसादसे उत्पन्न होनेवाला
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार सात्त्विकी बुद्धि और धृतिका ग्रहण तथा राजसी-तामसीका त्याग करानेके लिये बुद्धि और धृतिके सात्त्विक आदि तीन-तीन भेद क्रमसे बतलाकर अब, जिसके लिये मनुष्य समस्त कर्म करता है उस सुखके भी सात्त्विक, राजस और तामस—इस प्रकार तीन भेद क्रमसे बतलाना आरम्भ करते हुए पहले सात्त्विक सुखके लक्षणोंका निरूपण करते हैं—

38
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् । परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्॥ 38॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो सुख विषय और इन्द्रियोंके संयोगसे होता है, वह पहले—भोगकालमें अमृतके तुल्य प्रतीत होनेपर भी परिणाममें विषके तुल्य है; इसलिये वह सुख राजस कहा गया
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अब राजस सुखके लक्षण बतलाते हैं—

39
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः। निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्॥ 39॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो सुख भोगकालमें तथा परिणाममें भी आत्माको मोहित करनेवाला है—वह निद्रा, आलस्य और प्रमादसे उत्पन्न सुख तामस कहा गया है॥ 39॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अब तामस सुखका लक्षण बतलाते हैं—

40
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः। सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः॥ 40॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
पृथ्वीमें या आकाशमें अथवा देवताओंमें तथा इनके सिवा और कहीं भी ऐसा कोई भी सत्त्व नहीं है, जो प्रकृतिसे उत्पन्न इन तीनों गुणोंसे रहित हो॥ 40॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार अठारहवें श्लोकसे वर्णित मुख्य-मुख्य पदार्थोंके सात्त्विक, राजस और तामस— ऐसे तीन-तीन भेद बतलाकर अब इस प्रकरणका उपसंहार करते हुए भगवान् सृष्टिके समस्त पदार्थोंको तीनों गुणोंसे युक्त बतलाते हैं—

41
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप। कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥ 41॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंके तथा शूद्रोंके कर्म स्वभावसे उत्पन्न गुणोंके द्वारा
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस अध्यायके पहले श्लोकमें अर्जुनने संन्यास और त्यागका तत्त्व अलग-अलग जाननेकी इच्छा प्रकट की थी, अतः दोनोंका तत्त्व समझानेके लिये पहले इस विषयपर विद्वानोंकी सम्मति बतलाकर चौथेसे बारहवें श्लोकतक भगवान्ने अपने मतके अनुसार त्याग और त्यागीके लक्षण बतलाये। तदनन्तर तेरहवेंसे सत्रहवें श्लोकतक संन्यास (सांख्य)-के स्वरूपका निरूपण करके संन्यासमें सहायक सत्त्वगुणका ग्रहण और उसके विरोधी रज एवं तमका त्याग करानेके उद्देश्यसे अठारहवेंसे चालीसवें श्लोकतक गुणोंके अनुसार ज्ञान, कर्म और कर्ता आदि मुख्य-मुख्य पदार्थोंके भेद समझाये और अन्तमें समस्त सृष्टिको गुणोंसे युक्त बतलाकर उस विषयका उपसंहार किया।

वहाँ त्यागका स्वरूप बतलाते समय भगवान्ने यह बात कही थी कि नियत कर्मका स्वरूपसे त्याग उचित नहीं है (18। 7) अपितु नियत कर्मोंको आसक्ति और फलके त्यागपूर्वक करते रहना ही वास्तविक त्याग है (18। 9), किंतु वहाँ यह बात नहीं बतलायी कि किसके लिये कौन-सा कर्म नियत है। अतएव अब संक्षेपमें नियत कर्मोंका स्वरूप, त्यागके नामसे वर्णित कर्मयोगमें भक्तिका सहयोग और उसका फल परम सिद्धिकी प्राप्ति बतलानेके लिये पुनः उसी त्यागरूप कर्मयोगका प्रकरण आरम्भ करते हुए ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंके स्वाभाविक नियत कर्म बतलानेकी प्रस्तावना करते हैं—

42
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च। ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥ 42॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
अन्तःकरणका निग्रह करना; इन्द्रियोंका दमन करना; धर्मपालनके लिये कष्ट सहना; बाहर-भीतरसे शुद्ध रहना, दूसरोंके अपराधोंको क्षमा करना; मन, इन्द्रिय और शरीरको सरल रखना; वेद, शास्त्र, ईश्वर और परलोक आदिमें श्रद्धा रखना; वेद-शास्त्रोंका अध्ययन-अध्यापन करना और परमात्माके तत्त्वका अनुभव करना—ये सब-के-सब ही ब्राह्मणके
सम्बन्ध

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें की हुई प्रस्तावनाके अनुसार पहले ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म बतलाते हैं—

* एक बार गाधिपुत्र महाराज विश्वामित्र महर्षि वसिष्ठके आश्रममें जा पहुँचे। उनके साथ बहुत बड़ी सेना थी।
नन्दिनी नामक कामधेनु गौके प्रसादसे वसिष्ठजीने सेनासमेत राजाको भाँति-भाँतिके भोजन कराये और रत्न तथा वस्त्राभूषण
दिये। विश्वामित्रका मन गौके लिये ललचा गया और उन्होंने वसिष्ठसे गौको माँगा। वसिष्ठने कहा—इस गौको मैंने
देवता, अतिथि, पितृगण और यज्ञके लिये रख छोड़ा है; अतः इसे मैं नहीं दे सकता। विश्वामित्रको अपने जनबल और
शस्त्रबलका गर्व था, उन्होंने जबरदस्ती नन्दिनीको ले जाना चाहा। नन्दिनीने रोते हुए कहा—“भगवन्! विश्वामित्रके निर्दयी
सिपाही मुझे बड़ी क्रूरताके साथ कोड़ों और डण्डोंसे मार रहे हैं, आप इनके इस अत्याचारकी उपेक्षा कैसे कर रहे हैं?”
वसिष्ठजीने कहा—
क्षत्रियाणां बलं तेजो ब्राह्मणानां क्षमा बलम्।
क्षमा मां भजते यस्माद्गम्यतां यदि रोचते॥ (महा0, आदि0 174। 29)
“क्षत्रियोंका बल तेज है और ब्राह्मणोंका बल क्षमा। मैं क्षमाको नहीं छोड़ सकता, तुम्हारी इच्छा हो तो चली जाओ।”
नन्दिनी बोली—“यदि आप त्याग न करें तो बलपूर्वक मुझको कोई भी नहीं ले जा सकता।” वसिष्ठने कहा—“मैं त्याग
नहीं करता, तुम रह सकती हो तो रह जाओ।”
इसपर नन्दिनीने रौद्र रूप धारण किया, उसकी पूँछसे आग बरसने लगी; इसके बाद उसकी पूँछसे अनेकों म्लेच्छ
जातियाँ उत्पन्न र्हुइं। विश्वामित्रकी सेनाके छक्के छूट गये। नन्दिनीकी सेनाने विश्वामित्रके एक भी सिपाहीको नहीं मारा,
वे सब डरके मारे भाग गये। विश्वामित्रको अपनी रक्षा करनेवाला कोई भी नहीं दीख पड़ा। तब उन्हें बड़ा आश्चर्य
हुआ और उन्होंने कहा—
धिग्बलं क्षत्रियबलं ब्रह्मतेजोबलं बलम्। (महा0, आदि0 174। 45)
“क्षत्रियके बलको धिक्कार है, असलमें ब्राह्मण-तेजका बल ही बल है।” इसके बाद शापवश राक्षस हुए
राजा कल्माषपादने विश्वामित्रकी प्रेरणासे वसिष्ठके सभी पुत्रोंको मार डाला, तो भी वसिष्ठने उनसे बदला लेनेकी चेष्टा
न की।
वाल्मीकिरामायणमें आता है कि तदनन्तर विश्वामित्र राज्य छोड़कर महान् तप करने लगे और हजारों वर्षके उग्र तपके
प्रतापसे क्रमशः राजर्षि और महर्षिके पदको प्राप्त करके अन्तमें ब्रह्मर्षि हुए। देवताओंके अनुरोधसे क्षमाशील महर्षि वसिष्ठने
भी उनको “ब्रह्मर्षि” मान लिया। अन्तमें—
विश्वामित्रोऽपि धर्मात्मा लब्ध्वा ब्राह्मण्यमुत्तमम्। पूजयामास ब्रह्मर्षिं वसिष्ठं जपतां वरम्॥
(वाल्मीकीय रामायण 1। 65। 27)
“धर्मात्मा विश्वामित्रने भी उत्तम ब्राह्मणपद पाकर मन्त्र-जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि श्रीवसिष्ठजीकी पूजा की।”
43
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्। दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्॥ 43॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्धमें न भागना, दान देना और स्वामिभाव—ये सब-के-सब ही क्षत्रियके स्वाभाविक कर्म हैं॥ 43॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार ब्राह्मणोंके स्वाभाविक कर्म बतलाकर अब क्षत्रियोंके स्वाभाविक कर्म बतलाते हैं—

1-अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा। दानं प्रतिग्रहं चैव ब्राह्मणानामकल्पयत्॥ (मनुस्मृति 1। 88)
2-बालब्रह्मचारी पितामह भीष्ममें क्षत्रियोचित सब गुण प्रकट थे। उन्होंने प्रसिद्ध क्षत्रियशत्रु भगवान् परशुरामजीसे
शस्त्रविद्या सीखी थी। जिस समय परशुरामजीने काशिराजकी कन्या अम्बासे विवाह कर लेनेके लिये भीष्मपर बहुत दबाव
डाला, उस समय उन्होंने बड़ी नम्रतासे अपने सत्यकी रक्षाके लिये ऐसा करनेसे बिलकुल इनकार कर दिया; परन्तु जब
परशुरामजी किसी तरह न माने और बहुत धमकाने लगे, तब उन्होंने साफ कह दिया—
न भयान्नाप्यनुक्रोशान्नार्थलोभान्न
काम्यया। क्षात्रं धर्ममहं जह्यामिति मे व्रतमाहितम्॥
यच्चापि कत्थसे राम बहुशः परिवत्सरे । निर्जिताः क्षत्रिया लोके मयैकेनेति तच्छृणु॥
न तदा जातवान् भीष्मः क्षत्रियो वापि मद्विधः। पश्चाज्जातानि तेजांसि तृणेषु ज्वलितं त्वया॥
व्यपनेष्यामि ते दर्पं युद्धे राम न संशयः। (महा0, उद्योग0 178)
“भय, दया, धनके लोभ और कामनासे मैं कभी क्षात्रधर्मका त्याग नहीं कर सकता—यह मेरा धारण किया हुआ
व्रत है। हे परशुरामजी! आप जो लोगोंके सामने बड़ी डींग हाँका करते हैं कि “मैंने बहुत वर्षोंतक अकेले ही क्षत्रियोंका
अनेकों बार (इक्कीस बार) संहार किया है तो उसके लिये भी सुनिये—उस समय भीष्म या भीष्मके समान कोई क्षत्रिय
पैदा नहीं हुआ था। आपने तिनकोंपर ही अपना प्रताप दिखाया है! क्षत्रियोंमें तेजस्वी तो पीछेसे प्रकट हुए हैं। हे परशुरामजी!
इस समय युद्धमें मैं आपके घमंडको निःसन्देह चूर्ण कर दूँगा।”
परशुरामजी कुपित हो गये। युद्ध छिड़ गया और लगातार तेईस दिनोंतक भयानक युद्ध होता रहा, परन्तु परशुरामजी
भीष्मको परास्त न कर सके। आखिर नारद आदि देवर्षियोंके और भीष्मजननी श्रीगंगाजीके प्रकट होकर बीचमें पड़नेपर
तथा परशुरामजीके धनुष छोड़ देनेपर ही युद्ध समाप्त हुआ। भीष्मने न तो रणसे पीठ दिखायी और न पहले शस्त्रको
ही छोड़ा (महा0, उद्योग0 185)।
महाभारतके अठारह दिनोंके संग्राममें दस दिनोंतक अकेले भीष्मजीने कौरवपक्षके सेनापतित्वके पदको सुशोभित किया।
शेष आठ दिनोंमें कई सेनापति बदले।
भगवान् श्रीकृष्णने महाभारत-युद्धमें शस्त्र ग्रहण न करनेकी प्रतिज्ञा की थी। कहते हैं कि भीष्मने किसी कारणवश
प्रण कर लिया कि मैं भगवान्को शस्त्र ग्रहण करवा दूँगा। महाभारतमें यह कथा इस रूपमें न होनेपर भी सूरदासने
भीष्मप्रतिज्ञाका बड़ा ही सुन्दर वर्णन किया है—
आज जो हरिहि न सस्त्र गहाऊँ।
तौ लाजौ गंगा जननी को, सांतनु सुत न कहाऊँ॥
स्यंदन खंडि महारथ खंडौं, कपिध्वज सहित डुलाऊँ। इती न करौं सपथ मोहि हरि की, क्षत्रिय गतिहि न पाऊँ॥
पांडवदल सनमुख ह्वै धाऊँ, सरिता रुधिर बहाऊँ। सूरदास रनभूमि बिजय बिन, जियत न पीठ दिखाऊँ॥
जो कुछ भी हो; महाभारतमें लिखा है—युद्धारम्भके तीसरे दिन भीष्मपितामहने जब बड़ा ही प्रचण्ड संग्राम किया
तब भगवान्ने कुपित होकर घोड़ोंकी रास हाथसे छोड़ दी और सूर्यके समान प्रभायुक्त अपने चक्रको हाथमें लेकर उसे
घुमाते हुए रथसे कूद पडे़। श्रीकृष्णको चक्र हाथमें लिये हुए देखकर सब लोग ऊँचे स्वरसे हाहाकार करने लगे। भगवान्
प्रलयकालकी अग्निके समान भीष्मकी ओर बड़े वेगसे दौड़े। श्रीकृष्णको चक्र लिये अपनी ओर आते देखकर महात्मा
भीष्म तनिक भी नहीं डरे और अविचलितभावसे अपने धनुषकी डोरीको बजाते हुए कहने लगे—“हे देवदेव! हे जगन्निवास!
हे माधव! हे चक्रपाणि! पधारिये। मैं आपको प्रणाम करता हूँ। हे सबको शरण देनेवाले! मुझे बलपूर्वक इस श्रेष्ठ रथसे
नीचे गिरा दीजिये। हे श्रीकृष्ण! आज आपके हाथसे मारे जानेपर मेरा इस लोक और परलोकमें बड़ा कल्याण होगा।
हे यदुनाथ! आप स्वयं मुझे मारने दौड़े, इससे मेरा गौरव तीनों लोकोंमें बढ़ गया।” अर्जुनने दौड़कर पीछेसे भगवान्के
पैर पकड़ लिये और किसी तरह उन्हें लौटाया (महा0, भीष्म0 59)।
नवें दिनकी बात है, भगवान्ने देखा—भीष्मने पाण्डवसेनामें प्रलय-सा मचा रखा है। भगवान् घोड़ोंकी रास छोड़कर
कोड़ा हाथमें लिये फिर भीष्मकी ओर दौड़े। भगवान्के तेजसे पग-पगपर मानो पृथ्वी फटने लगी। कौरवपक्षके वीर घबड़ा
उठे और भीष्म मरे! भीष्म मरे! कहकर चिल्लाने लगे। हाथीपर झपटते हुए सिंहकी भाँति भगवान्को अपनी ओर आते
देखकर भीष्म तनिक भी विचलित न हुए और उन्होंने धनुष खींचकर कहा—
एह्येहि पुण्डरीकाक्ष देवदेव नमोऽस्तु
ते। मामद्य
सात्त्वतश्रेष्ठ
पातयस्व
महाहवे॥
त्वया हि देव संग्रामे हतस्यापि ममानघ। श्रेय एव परं कृष्ण लोके भवति सर्वतः॥
सम्भावितोऽस्मि गोविन्द त्रैलोक्येनाद्य संयुगे। प्रहरस्व यथेष्टं वै दासोऽस्मि तव चानघ॥
(महा0, भीष्म0 106। 64—66)
“हे पुण्डरीकाक्ष! हे देवदेव! आपको नमस्कार है। हे यादवश्रेष्ठ! आइये, आइये, आज इस महायुद्धमें मेरा वध करके
मुझे वीरगति दीजिये। हे अनघ! हे देवदेव श्रीकृष्ण! आज आपके हाथसे मरनेपर मेरा लोकमें सर्वथा कल्याण हो जायगा।
हे गोविन्द! युद्धमें आपके इस व्यवहारद्वारा आज मैं त्रिभुवनसे सम्मानित हो गया। हे निष्पाप! मैं आपका दास हूँ, आप
मुझपर जी भरकर प्रहार कीजिये!”
अर्जुनने दौड़कर भगवान्के हाथ पकड़ लिये, पर भगवान् रुके नहीं और उन्हें घसीटते हुए आगे बढ़े। अन्तमें अर्जुनके
प्रतिज्ञाकी याद दिलाने और सत्यकी शपथ खाकर भीष्मको मारनेकी प्रतिज्ञा करनेपर भगवान् लौटे।
दस दिन महायुद्ध करनेपर जब भीष्म मृत्युकी बात सोच रहे थे, तब आकाशमें स्थित ऋषियों और वसुओंने भीष्मसे
कहा—“हे तात! तुम जो सोच रहे हो वही हमें पसंद है।” इसके बाद शिखण्डीके सामने बाण न चलानेके कारण
बालब्रह्मचारी भीष्म अर्जुनके बाणोंसे बिंधकर शर-शय्यापर गिर पडे़। गिरते समय भीष्मने सूर्यको दक्षिणायनमें देखा, इसलिये
उन्होंने प्राणत्याग नहीं किया। गंगाजीने महर्षियोंको हंसरूपमें उनके पास भेजा। भीष्मने कहा कि “मैं उत्तरायण सूर्य आनेतक
जीवित रहूँगा और उपयुक्त समयपर ही प्राण त्याग करूँगा।” भीष्मके शरीरमें दो अंगुल भी ऐसी जगह न बची थी जहाँ
अर्जुनके बाण न बिंध गये हों (महा0, भीष्म0 119)। सिर्फ उनका सिर नीचे लटक रहा था। उन्होंने तकिया माँगा।
दुर्योधन आदि बढि़या कोमल तकिये लेकर दौड़े आये। भीष्मने हँसकर कहा—“वीरो! ये तकिये वीरशय्याके योग्य नहीं
हैं।” अन्तमें अर्जुनसे कहा—“बेटा! मेरे योग्य तकिया दो!” अर्जुनने तीन बाण उनके मस्तकके नीचे इस प्रकार मारे कि
सिर ऊँचा उठ गया और वे बाण तकियेका काम देने लगे। इसपर भीष्म बड़े प्रसन्न हुए और कहा—
एवमेव महाबाहो धर्मेषु
परितिष्ठता। स्वप्तव्यं
क्षत्रियेणाजौ
शरतल्पगतेन
वै॥
(महा0, भीष्म0 120। 49)
“हे महाबाहो! क्षात्रधर्ममें दृढ़तापूर्वक स्थित रहनेवाले क्षत्रियोंको रणांगणमें प्राणत्याग करते समय शर-शय्यापर इसी
प्रकार सोना चाहिये।”
भीष्मजी बाणोंसे घायल शर-शय्यापर पड़े थे। यह देखकर बाण निकालनेवाले कुशल शस्त्रवैद्य बुलाये गये। इसपर
भीष्मजीने कहा कि मुझको तो क्षत्रियोंकी परमगति मिल चुकी है, अब इन चिकित्सकोंकी क्या आवश्यकता है?
(महा0, भीष्म0 120)
घावके कारण भीष्मको बड़ी पीड़ा हो रही थी। उन्होंने ठण्डा पानी माँगा। लोग घड़ोंमें ठण्डा पानी ले-लेकर
दौड़े। भीष्मने कहा “मैं शर-शय्यापर लेट रहा हूँ और उत्तरायणकी बाट देख रहा हूँ। आप मेरे लिये यह क्या ले आये?”
अन्तमें अर्जुनको बुलाकर कहा—“बेटा! मेरा मुँह सूख रहा है। तुम समर्थ हो, पानी पिलाओ!” अर्जुनने रथपर सवार होकर
गाण्डीवपर प्रत्यंचा चढ़ायी और भीष्मकी दाहिनी ओर पृथ्वीमें पार्जन्यास्त्र मारा। उसी क्षण वहाँसे अमृतके समान सुगन्धित
और उत्तम जलकी धारा निकली और भीष्मके मुँहमें गिरने लगी। भीष्मजी उस जलको पीकर तृप्त हो गये (महा0,
भीष्म0 121)।
महाभारत-युद्ध समाप्त हो जानेके बाद युधिष्ठिर श्रीकृष्ण महाराजको साथ लेकर भीष्मके पास गये। सब बड़े-बड़े
ब्रह्मवेत्ता ऋषि-मुनि वहाँ उपस्थित थे। भीष्मने भगवान्को देखकर प्रणाम और स्तवन किया। श्रीकृष्णने भीष्मसे कहा कि
“उत्तरायण आनेमें अभी देर है; इतनेमें आपने धर्मशास्त्रका जो ज्ञान सम्पादन किया है, वह युधिष्ठिरको सुनाकर इनके
शोकको दूर कीजिये।” भीष्मने कहा—“प्रभो! मेरा शरीर बाणोंके घावोंसे व्याकुल हो रहा है, मन-बुद्धि चंचल है, बोलनेकी
शक्ति नहीं है, बार-बार मूर्च्छा आती है, केवल आपकी कृपासे अबतक जी रहा हूँ; फिर आप जगद्गुरुके सामने मैं शिष्य
यदि कुछ कहूँ तो वह भी अविनय ही है। मुझसे बोला नहीं जाता, क्षमा करें।” प्रेमसे छलकती हुई आँखोंसे भगवान्
गद्गद होकर बोले—“भीष्म! तुम्हारी ग्लानि, मूर्च्छा, दाह, व्यथा, क्षुधाक्लेश और मोह—सब मेरी कृपासे अभी नष्ट हो
जायँगे; तुम्हारे अन्तःकरणमें सब प्रकारके ज्ञानकी स्फुरणा होगी; तुम्हारी बुद्धि निश्चयात्मिका हो जायगी; तुम्हारा मन
नित्य सत्त्वगुणमें स्थिर हो जायगा; तुम धर्म या जिस किसी भी विद्याका चिन्तन करोगे, उसीको तुम्हारी बुद्धि बताने
लगेगी।” श्रीकृष्णने फिर कहा कि “मैं स्वयं इसीलिये उपदेश न करके तुमसे करवाता हूँ जिससे मेरे भक्तकी कीर्ति और
यश बढ़े!” भगवत्प्रसादसे भीष्मके शरीरकी सारी वेदनाएँ उसी समय नष्ट हो गयीं, उनका अन्तःकरण सावधान और
बुद्धि सर्वथा जाग्रत् हो गयी। ब्रह्मचर्य, अनुभव, ज्ञान और भगवद्भक्तिके प्रतापसे अगाध ज्ञानी भीष्म जिस प्रकार दस
दिनोंतक रणमें तरुण उत्साहसे झूमे थे, उसी प्रकारके उत्साहसे युधिष्ठिरको धर्मके सब अंगोंका पूरी तरह उपदेश दिया
और उनके शोक-सन्तप्त हृदयको शान्त कर दिया (महा0, शान्ति0 और अनुशासनपर्व)।
अट्ठावन दिन शर-शय्यापर रहनेके बाद सूर्यके उत्तरायण होनेपर भीष्मने प्राणत्यागका निश्चय किया और उन्होंने भगवान्
श्रीकृष्णसे कहा—“हे भगवन्! हे देवदेवेश! हे सुरासुरोंके द्वारा वन्दित! हे त्रिविक्रम! हे शंख-चक्रगदाधारी! मैं आपको
प्रणाम करता हूँ। हे वासुदेव! हिरण्यात्मा, परम पुरुष, सविता, विराट्, जीवरूप, अणुरूप परमात्मा और सनातन आप ही
हैं। हे पुण्डरीकाक्ष! हे पुरुषोत्तम! आप मेरा उद्धार कीजिये। हे श्रीकृष्ण! हे वैकुण्ठ! हे पुरुषोत्तम! अब मुझे जानेके लिये
आज्ञा दीजिये! मैंने मन्दबुद्धि दुर्योधनको बहुत समझाया था—
यतः कृष्णस्ततो धर्मो यतो धर्मस्ततो जयः।
“जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहीं धर्म है और जहाँ धर्म है, वहीं विजय है”, परन्तु उस मूर्खने मेरी बात नहीं मानी। मैं आपको
पहचानता हूँ, आप ही पुराणपुरुष हैं। आप नारायण ही अवतीर्ण हुए हैं।
स मां त्वमनुजानीहि कृष्ण मोक्ष्ये कलेवरम्। त्वयाहं समनुज्ञातो गच्छेयं परमां गतिम्॥ (महा0, अनु0 167। 45)
“हे श्रीकृष्ण! आप मुझे आज्ञा दीजिये कि मैं शरीर त्याग करूँ। आपकी आज्ञासे शरीर त्यागकर मैं परम गतिको
प्राप्त करूँगा!”
भगवान्ने आज्ञा दी, तब भीष्मने योगके द्वारा वायुको रोककर क्रमशः प्राणोंको ऊपर चढ़ाना आरम्भ किया। प्राणवायु
जिस अंगको छोड़कर ऊपर चढ़ता था; उस अंगके बाण उसी क्षण निकल जाते और घाव भर जाते थे। क्षणभरमें भीष्मजीके
शरीरसे सब बाण निकल गये, शरीरपर एक भी घाव न रहा और प्राण ब्रह्मरन्ध्रको भेदकर ऊपर चले गये। लोगोंने देखा,
ब्रह्मरन्ध्रसे निकला हुआ तेज देखते-देखते आकाशमें विलीन हो गया।
44
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्। परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्॥ 44॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
खेती, गोपालन और क्रय-विक्रयरूप सत्य व्यवहार—ये वैश्यके स्वाभाविक कर्म हैं। तथा सब वर्णोंकी सेवा करना शूद्रका भी स्वाभाविक कर्म है॥ 44॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार क्षत्रियोंके स्वाभाविक कर्मोंका वर्णन करके अब वैश्य और शूद्रोंके स्वाभाविक कर्म बतलाते हैं—

* प्रजानां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च। विषयेष्वप्रसक्तिश्च क्षत्रियस्य समासतः॥ (मनुस्मृति 1। 89)
1-काशीमें तुलाधार नामके एक वैश्य व्यापारी थे। वे महान् तपस्वी और धर्मात्मा थे। न्याय और सत्यका आश्रय
लेकर क्रय-विक्रयरूप व्यापार करते थे।
जाजलि नामक एक ब्राह्मण समुद्रतटपर कठिन तपस्या करते थे। उनकी जटाओंमें चिडि़योंने घोंसले बना लिये थे;
इससे उनको अपनी तपस्यापर गर्व हो गया। तब आकाशवाणी हुई कि “हे जाजलि! तुम तुलाधारके समान धार्मिक नहीं
हो, वे तुम्हारी भाँति गर्व नहीं करते।” जाजलि काशी आये और उन्होंने देखा—“तुलाधार फल, मूल, मसाले, घी आदि
बेच रहे हैं। तुलाधारने स्वागत, सत्कार और प्रणाम करके जाजलिसे कहा—“आपने समुद्रके किनारे बड़ी तपस्या की है।
आपके सिरकी जटाओंमें चिडि़योंने बच्चे पैदा कर दिये, इससे आपको गर्व हो गया और अब आप आकाशवाणी सुनकर
यहाँ पधारे हैं, बतलाइये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ।” तुलाधारका ऐसा ज्ञान देखकर जाजलिको बड़ा आश्चर्य हुआ।
जाजलिने तुलाधारसे पूछा, तब उन्होंने धर्मका बहुत ही सुन्दर निरूपण किया। जाजलिने तुलाधारके मुखसे धर्मका रहस्य
सुनकर बड़ी शान्ति प्राप्त की। महाभारत, शान्तिपर्वमें 261से 264 अध्यायतक यह सुन्दर कथा है।
2-पशूनां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च। वणिक्पथं कुसीदं च वैश्यस्य कृषिमेव च॥ (मनुस्मृति 1। 90)
1-एकमेव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत्। एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषामनसूयया॥ (मनुस्मृति 1। 91)
“भगवान्ने शूद्रका केवल एक ही कर्म बतलाया है कि दोषदृष्टि छोड़कर पूर्वोक्त द्विज वर्णवालोंकी सेवा करना।”
2-आजकल ऐसी बात कही जाती है कि वर्णविभाग उच्च वर्णके अधिकारारूढ़ लोगोंकी स्वार्थपूर्ण रचना है, परन्तु
ध्यान देनेपर पता लगता है कि समाज-शरीरकी सुव्यवस्थाके लिये वर्णधर्म बहुत ही आवश्यक है और यह मनुष्यकी
रचना है भी नहीं। वर्णधर्म भगवान्के द्वारा रचित है। स्वयं भगवान्ने कहा है—“चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।”
(4। 13)
“गुण और कर्मोंके विभागसे चारों वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) मेरे ही द्वारा रचे हुए हैं। भारतके दिव्य
दृष्टि प्राप्त त्रिकालज्ञ महर्षियोंने भगवान्के द्वारा निर्मित इस सत्यको प्रत्यक्षरूपसे प्राप्त किया और इसी सत्यपर समाजका
निर्माण करके उसे सुव्यवस्थित, शान्ति, शीलमय, सुखी, कर्मप्रवण, स्वार्थदृष्टिशून्य कल्याणप्रद और सुरक्षित बना दिया।
सामाजिक सुव्यवस्थाके लिये मनुष्योंके चार विभागकी सभी देशों और सभी कालोंमें आवश्यकता हुई है और सभीमें
चार विभाग रहे और रहते भी हैं। परन्तु इस ऋषियोंके देशमें वे जिस सुव्यवस्थितरूपसे रहे, वैसे कहीं नहीं रहे।”
समाजमें धर्मकी स्थापना और रक्षाके लिये और समाज-जीवनको सुखी बनाये रखनेके लिये, जहाँ समाजकी जीवन-
पद्धतिमें कोई बाधा उपस्थित हो, वहाँ प्रयत्नके द्वारा उस बाधाको दूर करनेके लिये, कर्मप्रवाहके भँवरको मिटानेके लिये,
45
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥ 45॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
अपने-अपने स्वाभाविक कर्मोंमें तत्परतासे लगा हुआ मनुष्य भगवत्प्राप्तिरूप परम सिद्धिको प्राप्त हो जाता है। अपने स्वाभाविक कर्ममें लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकारसे कर्म करके परम सिद्धिको प्राप्त होता है, उस विधिको तू सुन॥ 45॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार चारों वर्णोंके स्वाभाविक कर्मोंका वर्णन करके अब भक्तियुक्त कर्मयोगका स्वरूप और फल बतलानेके लिये, उन कर्मोंका किस प्रकार आचरण करनेसे मनुष्य अनायास परम सिद्धिको प्राप्त कर लेता है—यह बात दो श्लोकोंमें बतलाते हैं—

उलझनोंको सुलझानेके लिये और धर्मसंकट उपस्थित होनेपर समुचित व्यवस्था देनेके लिये परिष्कृत और निर्मल मस्तिष्ककी
आवश्यकता है। धर्मकी और धर्ममें स्थित समाजकी भौतिक आक्रमणोंसे रक्षा करनेके लिये बाहुबलकी आवश्यकता है।
मस्तिष्क और बाहुका यथायोग्य रीतिसे पोषण करनेके लिये धनकी और अन्नकी आवश्यकता है। और उपर्युक्त कर्मोंको
यथायोग्य सम्पन्न करानेके लिये शारीरिक परिश्रमकी आवश्यकता है।
इसीलिये समाज-शरीरका मस्तिष्क ब्राह्मण है, बाहु क्षत्रिय है, ऊरु वैश्य है और चरण शूद्र है। चारों एक ही समाज
शरीरके चार आवश्यक अंग हैं और एक-दूसरेकी सहायतापर सुरक्षित और जीवित हैं। घृणा या अपमानकी तो बात ही
क्या है, इनमेंसे किसीकी तनिक भी अवहेलना नहीं की जा सकती। न इनमें नीच-ऊँचकी ही कल्पना है। अपने-अपने
स्थान और कार्यके अनुसार चारों ही बड़े हैं। ब्राह्मण ज्ञानबलसे, क्षत्रिय बाहुबलसे, वैश्य धनबलसे और शूद्र जनबल
या श्रमबलसे बड़ा है। और चारोंकी ही पूर्ण उपयोगिता है। इनकी उत्पत्ति भी एक ही भगवान्के शरीरसे हुई है—ब्राह्मणकी
उत्पत्ति भगवान्के श्रीमुखसे, क्षत्रियकी बाहुसे, वैश्यकी ऊरुसे और शूद्रकी चरणोंसे हुई है।
ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः। ऊरु तदस्य यद् वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत॥
(ऋग्वेद सं0 10। 90। 12)
परंतु इनका यह अपना-अपना बल न तो स्वार्थसिद्धिके लिये है और न किसी दूसरेको दबाकर स्वयं ऊँचा बननेके
लिये ही है। समाज शरीरके आवश्यक अंगोंके रूपमें इनका योग्यतानुसार कर्मविभाग है। और यह है केवल धर्मके पालने-
पलवानेके लिये ही। ऊँच-नीचका भाव न होकर यथायोग्य कर्म-विभाग होनेके कारण ही चारों वर्णोंमें एक शक्ति-सामंजस्य
रहता है। कोई भी किसीकी न अवहेलना कर सकता है, न किसीके न्याय्य अधिकारपर आघात कर सकता है। इस
कर्मविभाग और कर्माधिकारके सुदृढ़ आधारपर रचित यह वर्णधर्म ऐसा सुव्यवस्थित है कि इसमें शक्ति-सामंजस्य अपने-
आप ही रहता है। स्वयं भगवान्ने और धर्मनिर्माता ऋषियोंने प्रत्येक वर्णके कर्मोंका अलग-अलग स्पष्ट निर्देश करके
तो सबको अपने-अपने धर्मका निर्विघ्न पालन करनेके लिये और भी सुविधा कर दी है और स्वकर्मका पूरा पालन होनेसे
शक्ति-सामंजस्यमें कभी बाधा आ ही नहीं सकती।
यूरोप आदि देशोंमें स्वाभाविक ही मनुष्य-समाजके चार विभाग रहनेपर भी निर्दिष्ट नियम न होनेके कारण शक्ति-
सामंजस्य नहीं है। इसीसे कभी ज्ञानबल सैनिक-बलको दबाता है और कभी जनबल धनबलको परास्त करता है। भारतीय
वर्णविभागमें ऐसा न होकर सबके लिये पृथक्-पृथक् कर्म निर्दिष्ट हैं।
ऋषिसेवित वर्णधर्ममें ब्राह्मणका पद सबसे ऊँचा है, वह समाजके धर्मका निर्माता है, उसीकी बनायी हुई विधिको
सब मानते हैं। वह सबका गुरु और पथप्रदर्शक है; परन्तु वह धन-संग्रह नहीं करता, न दण्ड ही देता है, न भोग-
विलासमें ही रुचि रखता है। स्वार्थ तो मानो उसके जीवनमें है ही नहीं। धनैश्वर्य और पद-गौरवको धूलके समान समझकर
वह फल-मूलोंपर निर्वाह करता हुआ सपरिवार शहरसे दूर वनमें रहता है। दिन-रात तपस्या, धर्मसाधन और ज्ञानार्जनमें
लगा रहता है और अपने शम, दम, तितिक्षा, क्षमा आदिसे समन्वित महान् तपोबलके प्रभावसे दुर्लभ ज्ञाननेत्र प्राप्त करता
है और उस ज्ञानकी दिव्य ज्योतिसे सत्यका दर्शन कर उस सत्यको बिना किसी स्वार्थके सदाचारपरायण, साधु-स्वभाव
पुरुषोंके द्वारा समाजमें वितरण कर देता है। बदलेमें कुछ भी चाहता नहीं। समाज अपनी इच्छासे जो कुछ दे देता है
या भिक्षासे जो कुछ मिल जाता है, उसीपर वह बड़ी सादगीसे अपनी जीवनयात्रा चलाता है। उसके जीवनका यही धर्ममय
आदर्श है।
क्षत्रिय सबपर शासन करता है। अपराधीको दण्ड और सदाचारीको पुरस्कार देता है। दण्डबलसे दुष्टोंको सिर नहीं
उठाने देता और धर्मकी तथा समाजकी दुराचारियों, चोरों, डाकुओं और शत्रुओंसे रक्षा करता है। क्षत्रिय दण्ड देता है,
परन्तु कानूनकी रचना स्वयं नहीं करता। ब्राह्मणके बनाये हुए कानूनके अनुसार ही वह आचरण करता है। ब्राह्मणरचित
कानूनके अनुसार ही वह प्रजासे कर वसूल करता है और उसी कानूनके अनुसार प्रजाहितके लिये व्यवस्थापूर्वक उसे
व्यय कर देता है। कानूनकी रचना ब्राह्मण करता है और धनका भंडार वैश्यके पास है। क्षत्रिय तो केवल विधिके अनुसार
व्यवस्थापक और संरक्षकमात्र है।
धनका मूल वाणिज्य, पशु और अन्न सब वैश्यके हाथमें है। वैश्य धन-उपार्जन करता है और उसको बढ़ाता है,
किन्तु अपने लिये नहीं। वह ब्राह्मणके ज्ञान और क्षत्रियके बलसे संरक्षित होकर धनको सब वर्णोंके हितमें उसी विधानके
अनुसार व्यय करता है। न शासनपर उसका कोई अधिकार है और न उसे उसकी आवश्यकता ही है। क्योंकि ब्राह्मण
और क्षत्रिय उसके वाणिज्यमें कभी कोई हस्तक्षेप नहीं करते, स्वार्थवश उसका धन कभी नहीं लेते, वरं उसकी रक्षा
करते हैं और ज्ञानबल और बाहुबलसे ऐसी सुव्यवस्था करते हैं कि जिससे वह अपना व्यापार सुचारुरूपसे निर्विघ्न चला
सकता है। इससे उसके मनमें कोई असंतोष नहीं है। और वह प्रसन्नताके साथ ब्राह्मण और क्षत्रियका प्राधान्य मानकर
चलता है और मानना आवश्यक भी समझता है, क्योंकि इसीमें उसका हित है। वह खुशीसे राजाको कर देता है, ब्राह्मणकी
सेवा करता है और विधिवत् आदरपूर्वक शूद्रको भरपूर अन्न-वस्त्रादि देता है।
अब रहा शूद्र, शूद्र स्वाभाविक ही जनसंख्यामें अधिक है। शूद्रमें शारीरिक शक्ति प्रबल है, परन्तु मानसिक शक्ति
कुछ कम है। अतएव शारीरिक श्रम ही उसके हिस्सेमें रखा गया है। और समाजके लिये शारीरिक शक्तिकी बड़ी आवश्यकता
भी है। परन्तु इसकी शारीरिक शक्तिका मूल्य किसीसे कम नहीं है। शूद्रके जनबलके ऊपर ही तीनों वर्णोंकी प्रतिष्ठा
है। यही आधार है। पैरके बलपर ही शरीर चलता है। अतएव शूद्रको तीनों वर्ण अपना प्रिय अंग मानते हैं। उसके श्रमके
बदलेमें वैश्य प्रचुर धन देता है, क्षत्रिय उसके धन-जनकी रक्षा करता है और ब्राह्मण उसको धर्मका, भगवत्-प्राप्तिका
मार्ग दिखलाता है। न तो स्वार्थसिद्धिके लिये कोई वर्ण शूद्रकी वृत्ति हरण करता है, न स्वार्थवश उसे कम पारिश्रमिक
देता है और न उसे अपनेसे नीचा मानकर किसी प्रकारका दुर्व्यवहार ही करता है। सब यही समझते हैं कि सब अपना-
अपना स्वत्व ही पाते हैं, कोई किसीपर उपकार नहीं करता। परन्तु सभी एक-दूसरेकी सहायता करते हैं और सब अपनी
उन्नतिके साथ उसकी उन्नति करते हैं और उसकी उन्नतिमें अपनी उन्नति और अवनतिमें अपनी अवनति मानते हैं।
ऐसी अवस्थामें जनबलयुक्त शूद्र सन्तुष्ट रहता है, चारोंमें कोई किसीसे ठगा नहीं जाता, कोई किसीसे अपमानित नहीं होता।
एक ही घरके चार भाइयोंकी तरह एक ही घरकी सम्मिलित उन्नतिके लिये चारों भाई प्रसन्नता और योग्यताके अनुसार
बाँटे हुए अपने-अपने पृथक्-पृथक् आवश्यक कर्तव्यपालनमें लगे रहते हैं। यों चारों वर्ण परस्पर—ब्राह्मण धर्मस्थापनके द्वारा,
क्षत्रिय बाहुबलके द्वारा, वैश्य धनबलके द्वारा और शूद्र शारीरिक श्रमबलके द्वारा एक-दूसरेका हित करते हुए समाजकी
शक्ति बढ़ाते हैं। न तो सब एक-सा कर्म करना चाहते हैं और न अलग-अलग कर्म करनेमें कोई ऊँच-नीच भाव ही मनमें
लाते हैं। इसीसे उनका शक्ति-सामंजस्य रहता है और धर्म उत्तरोत्तर बलवान् और पुष्ट होता है। यह है वर्णधर्मका स्वरूप।
इस प्रकार गुण और कर्मके विभागसे ही वर्णविभाग बनता है। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि मनमाने कर्मसे वर्ण
बदल जाता है। वर्णका मूल जन्म है और कर्म उसके स्वरूपकी रक्षामें प्रधान कारण है। इस प्रकार जन्म और कर्म दोनों
ही वर्णमें आवश्यक हैं। केवल कर्मसे वर्णको माननेवाले वस्तुतः वर्णको मानते ही नहीं। वर्ण यदि कर्मपर ही माना जाय
तब तो एक दिनमें एक ही मनुष्यको न मालूम कितनी बार वर्ण बदलना पड़ेगा। फिर तो समाजमें कोई शृंखला या
46
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्। स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥ 46॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जिस परमेश्वरसे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत् व्याप्त है, उस परमेश्वरकी अपने स्वाभाविक कर्मोंद्वारा पूजा करके मनुष्य परमसिद्धिको प्राप्त हो
नियम ही नहीं रहेगा। सर्वथा अव्यवस्था फैल जायगी। परन्तु भारतीय वर्णधर्ममें ऐसी बात नहीं है। यदि केवल कर्मसे
वर्ण माना जाता तो युद्धके समय ब्राह्मणोचित कर्म करनेको तैयार हुए अर्जुनको गीतामें भगवान् क्षत्रियधर्मका उपदेश न
करते। मनुष्यके पूर्वकृत शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार ही उसका विभिन्न वर्णोंमें जन्म हुआ करता है। जिसका जिस वर्णमें
जन्म होता है, उसको उसी वर्णके निर्दिष्ट कर्मोंका आचरण करना चाहिये। क्योंकि वही उसका स्वधर्म है। और स्वधर्मका
पालन करते-करते मर जाना भगवान् श्रीकृष्णने कल्याणकारक बतलाया है। “स्वधर्मे निधनं श्रेयः।” साथ ही परधर्मको
“भयावह” भी बतलाया है। यह ठीक ही है; क्योंकि सब वर्णोंके स्वधर्म-पालनसे ही सामाजिक शक्ति-सामंजस्य रहता
है और तभी समाज-धर्मकी रक्षा और उन्नति होती है। स्वधर्मका त्याग और परधर्मका ग्रहण व्यक्ति और समाज दोनोंके
लिये ही हानिकर है। खेदकी बात है, विभिन्न कारणोंसे आर्यजातिकी यह वर्ण-व्यवस्था इस समय शिथिल हो चली
है। आज कोई भी वर्ण अपने धर्मपर आरूढ़ नहीं है, सभी मनमाने आचरण करनेपर उतर रहे हैं और इसका कुफल
भी प्रत्यक्ष ही दिखायी दे रहा है।
47
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥ 47॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
अच्छी प्रकार आचरण किये हुए दूसरेके धर्मसे गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है, क्योंकि स्वभावसे नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्मको करता हुआ मनुष्य पापको नहीं प्राप्त
सम्बन्ध

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें यह बात कही गयी कि मनुष्य अपने स्वाभाविक कर्मोंद्वारा परमेश्वरकी पूजा करके परमसिद्धिको पा लेता है; इसपर यह शंका होती है कि यदि कोई क्षत्रिय अपने युद्धादि क्रूर कर्मोंको न करके ब्राह्मणोंकी भाँति अध्यापनादि शान्तिमय कर्मोंसे अपना निर्वाह करके परमात्माको प्राप्त करनेकी चेष्टा करे या इसी तरह कोई वैश्य या शूद्र अपने कर्मोंको उच्च वर्णोंके कर्मोंसे हीन समझकर उनका त्याग कर दे और अपनेसे ऊँचे वर्णकी वृत्तिसे अपना निर्वाह करके परमात्माको प्राप्त करनेका प्रयत्न करे तो उचित है या नहीं? इसपर दूसरेके धर्मकी अपेक्षा स्वधर्मको श्रेष्ठ बतलाकर उसके त्यागका निषेध करते हैं—

48
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्। सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥ 48॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
अतएव हे कुन्तीपुत्र! दोषयुक्त होनेपर भी सहज कर्मको नहीं त्यागना चाहिये, क्योंकि धूएँसे अग्निकी भाँति सभी कर्म किसी-न-किसी दोषसे युक्त हैं॥ 48॥
49
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः। नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति॥ 49॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
सर्वत्र आसक्तिरहित बुद्धिवाला, स्पृहारहित और जीते हुए अन्तःकरणवाला पुरुष सांख्ययोगके द्वारा उस परम नैष्कर्म्यसिद्धिको प्राप्त होता है॥ 49॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अर्जुनकी जिज्ञासाके अनुसार त्याग और संन्यासके तत्त्वको समझानेके लिये भगवान्ने चौथेसे बारहवें श्लोकतक त्यागका विषय कहा और तेरहवेंसे चालीसवें श्लोकतक संन्यास यानी सांख्यका निरूपण किया। फिर इकतालीसवें श्लोकसे यहाँतक कर्मयोगरूप त्यागका तत्त्व समझानेके लिये स्वाभाविक कर्मोंका स्वरूप और उनकी अवश्यकर्तव्यताका निर्देश करके तथा कर्मयोगमें भक्तिका सहयोग दिखलाकर उसका फल भगवत्प्राप्ति बतलाया। किन्तु वहाँ संन्यासके प्रकरणमें यह बात नहीं कही गयी कि संन्यासका क्या फल होता है और कर्मोंमें कर्तापनका अभिमान त्यागकर उपासनाके सहित सांख्ययोगका किस प्रकार साधन करना चाहिये? अतः यहाँ उपासनाके सहित विवेक और वैराग्यपूर्वक एकान्तमें रहकर साधन करनेकी विधि और उसका फल बतलानेके लिये पुनः सांख्ययोगका प्रकरण आरम्भ करते हैं—

50
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे। समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा॥ 50॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो कि ज्ञानयोगकी परानिष्ठा है, उस नैष्कर्म्य सिद्धिको जिस प्रकारसे प्राप्त होकर मनुष्य ब्रह्मको प्राप्त होता है, उस प्रकारको हे कुन्तीपुत्र! तू संक्षेपमें ही मुझसे समझ॥ 50॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—उपर्युक्त श्लोकमें यह बात कही गयी कि संन्यासके द्वारा मनुष्य परम नैष्कर्म्यसिद्धिको प्राप्त होता है; इसपर यह जिज्ञासा होती है कि उस संन्यास (सांख्ययोग)-का क्या स्वरूप है और उसके द्वारा मनुष्य किस क्रमसे सिद्धिको प्राप्त होकर ब्रह्मको प्राप्त होता है? अतः इन सब बातोंको बतलानेकी प्रस्तावना करते हुए भगवान् अर्जुनको सुननेके लिये सावधान करते हैं—

51–53Merged
बुद्ध्या विशुद्ध ्या युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च। शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च॥ 51॥ विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः। ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥ 52॥ अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्। विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥ 53॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
विशुद्ध बुद्धिसे युक्त तथा हलका, सात्त्विक और नियमित भोजन करनेवाला, शब्दादि विषयोंका त्याग करके एकान्त और शुद्ध देशका सेवन करनेवाला, सात्त्विक धारणशक्तिके द्वारा अन्तःकरण और इन्द्रियोंका संयम करके मन, वाणी और शरीरको वशमें कर लेनेवाला, राग-द्वेषको सर्वथा नष्ट करके भलीभाँति दृढ़ वैराग्यका आश्रय लेनेवाला तथा अहंकार, बल, घमंड, काम, क्रोध और परिग्रहका त्याग करके निरन्तर ध्यानयोगके परायण रहनेवाला, ममतारहित और शान्तियुक्त पुरुष सच्चिदानन्द ब्रह्ममें अभिन्नभावसे स्थित होनेका पात्र होता
सम्बन्ध

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें की हुई प्रस्तावनाके अनुसार अब तीन श्लोकोंमें अंग-प्रत्यंगोंके सहित ज्ञानयोगका वर्णन करते हैं—

54
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति। समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥ 54॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
फिर वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्ममें एकीभावसे स्थित, प्रसन्न मनवाला योगी न तो किसीके लिये शोक करता है और न किसीकी आकांक्षा ही करता है। ऐसा समस्त प्राणियोंमें समभाववाला योगी मेरी परा भक्तिको प्राप्त हो जाता है॥ 54॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार अंग-प्रत्यंगोंसहित संन्यासका यानी सांख्ययोगका स्वरूप बतलाकर अब उस साधनद्वारा ब्रह्मभावको प्राप्त हुए योगीके लक्षण और उसे ज्ञानयोगकी परानिष्ठारूप परा भक्तिका प्राप्त होना बतलाते हैं—

55
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः। ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥ 55॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
उस परा भक्तिके द्वारा वह मुझ परमात्माको, मैं जो हूँ और जितना हूँ ठीक वैसा-का-वैसा तत्त्वसे जान लेता है; तथा उस भक्तिसे मुझको तत्त्वसे जानकर तत्काल ही मुझमें प्रविष्ट हो
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार ब्रह्मभूत योगीको परा भक्तिकी प्राप्ति बतलाकर अब उसका फल बतलाते हैं—

56
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः। मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥ 56॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
मेरे परायण हुआ कर्मयोगी तो सम्पूर्ण कर्मोंको सदा करता हुआ भी मेरी कृपासे सनातन अविनाशी परमपदको प्राप्त हो जाता है॥ 56॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार अर्जुनकी जिज्ञासाके अनुसार त्यागका यानी कर्मयोगका और संन्यासका यानी सांख्ययोगका तत्त्व अलग-अलग समझाकर यहाँतक उस प्रकरणको समाप्त कर दिया; किन्तु इस वर्णनमें भगवान्ने यह बात नहीं कही कि दोनोंमेंसे तुम्हारे लिये अमुक साधन कर्तव्य है, अतएव अर्जुनको भक्तिप्रधान कर्मयोग ग्रहण करानेके उद्देश्यसे अब भक्तिप्रधान कर्मयोगकी महिमा कहते हैं—

57
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः। बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥ 57॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
सब कर्मोंको मनसे मुझमें अर्पण करके तथा समबुद्धिरूप योगको अवलम्बन करके मेरे परायण और निरन्तर मुझमें चित्तवाला हो॥ 57॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार भक्तिप्रधान कर्मयोगीकी महिमाका वर्णन करके अब अर्जुनको वैसा बननेके लिये आज्ञा देते हैं—

58
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि। अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥ 58॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
उपर्युक्त प्रकारसे मुझमें चित्तवाला होकर तू मेरी कृपासे समस्त संकटोंको अनायास ही पार कर जायगा और यदि अहंकारके कारण मेरे वचनोंको न सुनेगा तो नष्ट हो जायगा अर्थात् परमार्थसे भ्रष्ट हो जायगा॥ 58॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार भगवान् अर्जुनको भक्तिप्रधान कर्मयोगी बननेकी आज्ञा देकर अब उस आज्ञाके पालन करनेका फल बतलाते हुए उसे न माननेमें बहुत बड़ी हानि दिखलाते हैं—

59
यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे। मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति॥ 59॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो तू अहंकारका आश्रय लेकर यह मान रहा है कि “मैं युद्ध नहीं करूँगा”, तेरा यह निश्चय मिथ्या है, क्योंकि तेरा स्वभाव तुझे जबरदस्ती युद्धमें लगा देगा॥ 59॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें जो अहंकारवश भगवान्की आज्ञाको न माननेसे नष्ट हो जानेकी बात कही है, उसीकी पुष्टि करनेके लिये अब भगवान् दो श्लोकोंद्वारा अर्जुनकी मान्यतामें दोष दिखलाते हैं—

60
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा। कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्॥ 60॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे कुन्तीपुत्र! जिस कर्मको तू मोहके कारण करना नहीं चाहता, उसको भी अपने पूर्वकृत स्वाभाविक कर्मसे बँधा हुआ परवश होकर करेगा॥ 60॥
61
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥ 61॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे अर्जुन! शरीररूप यन्त्रमें आरूढ़ हुए सम्पूर्ण प्राणियोंको अन्तर्यामी परमेश्वर अपनी मायासे उनके कर्मोंके अनुसार भ्रमण कराता हुआ सब प्राणियोंके हृदयमें स्थित है॥ 61॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकोंमें कर्म करनेमें मनुष्यको स्वभावके अधीन बतलाया गया; इसपर यह शंका हो सकती है कि प्रकृति या स्वभाव जड है, वह किसीको अपने वशमें कैसे कर सकता है? इसलिये भगवान् कहते हैं—

62
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत। तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥ 62॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे भारत! तू सब प्रकारसे उस परमेश्वरकी ही शरणमें जा। उस परमात्माकी कृपासे ही तू परम शान्तिको तथा सनातन परम धामको प्राप्त होगा॥ 62॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—उपर्युक्त श्लोकमें यह बात सिद्ध की गयी कि मनुष्य कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेमें स्वतन्त्र नहीं है, उसे अपने स्वभावके वश होकर स्वाभाविक कर्मोंमें प्रवृत्त होना ही पड़ता है, क्योंकि सर्वशक्तिमान् सर्वान्तर्यामी परमेश्वर स्वयं सब प्राणियोंके हृदयमें स्थित होकर उनकी प्रकृतिके अनुसार उनको भ्रमण कराते हैं और उनकी प्रेरणाका प्रतिवाद करना मनुष्यके लिये अशक्य है। इसपर यह प्रश्न उठता है कि यदि ऐसी ही बात है तो फिर कर्मबन्धनसे छूटकर परम शान्तिलाभ करनेके लिये मनुष्यको क्या करना चाहिये? इसपर भगवान् अर्जुनको उसका कर्तव्य बतलाते हुए कहते हैं—

63
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया। विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥ 63॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
इस प्रकार यह गोपनीयसे भी अति गोपनीय ज्ञान मैंने तुझसे कह दिया। अब तू इस रहस्ययुक्त ज्ञानको पूर्णतया भलीभाँति विचारकर, जैसे चाहता है वैसे ही कर॥ 63॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार अर्जुनको अन्तर्यामी परमेश्वरकी शरण ग्रहण करनेके लिये आज्ञा देकर अब भगवान् उक्त उपदेशका उपसंहार करते हुए कहते हैं—

64
सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः। इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्॥ 64॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
सम्पूर्ण गोपनीयोंसे अति गोपनीय मेरे परम रहस्ययुक्त वचनको तू फिर भी सुन। तू मेरा अतिशय प्रिय है, इससे यह परम हितकारक वचन मैं तुझसे कहूँगा॥ 64॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार अर्जुनको सारे उपदेशपर विचार करके अपना कर्तव्य निर्धारित करनेके लिये कहे जानेपर भी जब अर्जुनने कुछ भी उत्तर नहीं दिया और वे अपनेको अनधिकारी तथा कर्तव्य निश्चय करनेमें असमर्थ समझकर खिन्नचित्त और चकित-से हो गये, तब सबके हृदयकी बात जाननेवाले अन्तर्यामी भगवान् स्वयं ही अर्जुनपर दया करके उसे समस्त गीताके उपदेशका सार बतलानेका विचार करके कहने लगे—

65
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥ 65॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे अर्जुन! तू मुझमें मनवाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करनेवाला हो और मुझको प्रणाम कर। ऐसा करनेसे तू मुझे ही प्राप्त होगा, यह मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ; क्योंकि
सम्बन्ध

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें जिस सर्वगुह्यतम बातको कहनेकी भगवान्ने प्रतिज्ञा की, उसे अब कहते हैं—

* जिन महात्मा अर्जुनके लिये भगवान्ने स्वयं अपने श्रीमुखसे गीताका दिव्य उपदेश किया, उनकी महिमाका कौन
वर्णन कर सकता है। महाभारत, उद्योगपर्वमें कहा है—
एष नारायणः कृष्णः फाल्गुनश्च नरः स्मृतः। नारायणो नरश्चैव सत्त्वमेकं द्विधा कृतम्॥ (49। 20)
“ये श्रीकृष्ण साक्षात् नारायण हैं और अर्जुन नर कहे गये हैं; ये नारायण और नर दो रूपोंमें प्रकट एक ही
सत्त्व हैं।”
यहाँ संक्षेपमें यह दिखलाना है कि अर्जुनके प्रति भगवान्का कितना प्रेम था। इसीसे पता लग जायगा कि अर्जुन
भगवान्से कितना प्रेम करते थे।
वनविहार, जलविहार, राजदरबार, यज्ञानुष्ठान आदिमें भी भगवान् श्रीकृष्ण प्रायः अर्जुनके साथ रहते थे। उनका परस्पर
इतना मेल था कि अन्तःपुरतकमें पवित्र और विशुद्ध प्रेमके संकोचरहित दृश्य देखे जाते थे। संजयने पाण्डवोंके यहाँसे
लौटकर धृतराष्ट्रसे कहा था—“श्रीकृष्ण-अर्जुनका मैंने विलक्षण प्रेम देखा है; मैं उन दोनोंसे बातें करनेके लिये बड़े ही
विनीत भावसे उनके अन्तःपुरमें गया! मैंने जाकर देखा वे दोनों महात्मा उत्तम वस्त्राभूषणोंसे भूषित होकर महामूल्यवान्
आसनोंपर विराजमान थे! अर्जुनकी गोदमें श्रीकृष्णके चरण थे और द्रौपदी तथा सत्यभामाकी गोदमें अर्जुनके दोनों पैर
थे! मुझे देखकर अर्जुनने अपने पैरके नीचेका सोनेका पीढ़ा सरकाकर मुझे बैठनेको कहा, मैं आदरके साथ उसे छूकर
नीचे ही बैठ गया।”
वनमें भगवान् श्रीकृष्ण पाण्डवोंसे मिलने गये और वहाँ बातचीतके सिलसिलेमें उन्होंने अर्जुनसे कहा—
ममैव त्वं तवैवाहं ये मदीयास्तवैव
ते। यस्त्वां द्वेष्टि स मां द्वेष्टि यस्त्वामनु स मामनु॥
(महा0, वन0 12। 45)
“हे अर्जुन! तुम मेरे हो और मैं तुम्हारा हूँ। जो मेरे हैं, वे तुम्हारे ही हैं। अर्थात् जो कुछ मेरा है, उसपर तुम्हारा
अधिकार है। जो तुमसे शत्रुता रखता है, वह मेरा शत्रु है और जो तुम्हारा अनुवर्ती (साथ देनेवाला) है, वह मेरा भी है।”
भीष्मको पाण्डवसेनाका संहार करते जब नौ दिन बीत गये, तब रात्रिके समय युधिष्ठिरने बहुत ही चिन्तित होकर
भगवान्से कहा—“हे श्रीकृष्ण! भीष्मसे हमारा लड़ना वैसा ही है जैसा जलती हुई आगकी ज्योतिपर पतंगोंका मरनेके
लिये टूट पड़ना। आप कहिये अब क्या करें।” इसपर भगवान् श्रीकृष्णने युधिष्ठिरको आश्वासन देते हुए कहा—“आप
चिन्ता न करें, मुझे आज्ञा दें तो मैं भीष्मको मार डालूँ। आप निश्चय मानिये कि अर्जुन भीष्मको मार देंगे।” फिर अर्जुनके
साथ अपने प्रेमका सम्बन्ध जताते हुए भगवान्ने कहा—
तव भ्राता मम सखा सम्बन्धी शिष्य एवच। मांसान्युत्कृत्य दास्यामि फाल्गुनार्थे महीपते॥
एष चापि नरव्याघ्रो मत्कृते जीवितं
त्यजेत्। एष नः समयस्तात तारयेम परस्परम्॥
(महा0, भीष्म0 107। 33-34)
“हे राजन्! आपके भाई अर्जुन मेरे मित्र हैं, सम्बन्धी हैं और शिष्य हैं। मैं अर्जुनके लिये अपने शरीरका मांसतक
काटकर दे सकता हूँ। पुरुषसिंह अर्जुन भी मेरे लिये प्राण दे सकते हैं। हे तात! हम दोनों मित्रोंकी यह प्रतिज्ञा है कि
परस्पर एक-दूसरेको संकटसे उबारें।”
इससे पता लग सकता है कि भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनके साथ कैसा विलक्षण प्रेमका सम्बन्ध था।
इन्द्रसे प्राप्त एक अमोघ शक्ति कर्णके पास थी। इन्द्रने कह दिया था कि “इस शक्तिको तुम जिसपर छोड़ोगे, उसकी
निश्चय ही मृत्यु हो जायगी। परन्तु इसका प्रयोग एक ही बार होगा।” कर्णने वह शक्ति अर्जुनको मारनेके लिये
रख छोड़ी थी। दुर्योधनादि उनसे बार-बार कहते कि “तुम शक्तिका प्रयोग करके अर्जुनको मार क्यों नहीं डालते?” कर्ण
अर्जुनको मारनेकी इच्छा भी करते, परन्तु सामने आते ही अर्जुनके रथपर सारथिरूपमें बैठे हुए भगवान् श्रीकृष्ण कर्णपर
ऐसी मोहिनी डालते कि जिससे वे शक्तिका प्रयोग करना भूल जाते। जब भीमपुत्र घटोत्कचने राक्षसी मायासे कौरवसेनाका
भीषणरूपसे संहार किया, तब दुर्योधन आदि सब घबड़ा गये। सभीने कर्णको पुकारकर कहा—“इन्द्रकी शक्तिका प्रयोगकर
पहले इसे मारो, जिससे हमलोगोंके प्राण तो बचें। इस आधी रातके समय यदि यह राक्षस हम सबको मार ही डालेगा
तब अर्जुनको मारनेके लिये रखी हुई शक्ति हमारे किस काम आवेगी?” अतः कर्णको वह शक्ति घटोत्कचपर छोड़नी
पड़ी और शक्तिके लगते ही घटोत्कच मर गया। घटोत्कचकी मृत्युसे सारा पाण्डव-परिवार दुःखी हो गया, परन्तु भगवान्
श्रीकृष्ण बड़े प्रसन्न हुए और वे हर्षोन्मत्त-से होकर बार-बार अर्जुनको हृदयसे लगाने लगे। आगे चलकर उन्होंने सात्यकिसे
कहा—“हे सात्यके! युद्धके समय कर्णको मैं ही मोहित कर रखता था। इसीसे आजतक वह अर्जुनपर उस शक्तिका
प्रयोग न कर सका। अर्जुनको मारनेमें समर्थ वह शक्ति जबतक कर्णके पास थी, तबतक मैं सदा चिन्तित रहता था।
चिन्ताके मारे न मुझे रातको नींद आती थी और न चित्तमें कभी हर्ष ही होता था। आज उस अमोघ शक्तिको व्यर्थ
हुई जानकर मैं अर्जुनको कालके मुखसे बचा हुआ समझता हूँ। देखो—माता-पिता, तुमलोग, भाई-बन्धु और मेरे प्राण
भी मुझे अर्जुनसे बढ़कर प्रिय नहीं हैं। मैं जिस प्रकार रणमें अर्जुनकी रक्षा करना आवश्यक समझता हूँ, उस प्रकार किसीकी
नहीं समझता। तीनों लोकोंके राज्यकी अपेक्षा भी अधिक दुर्लभ कोई वस्तु हो तो उसे भी मैं अर्जुनको छोड़कर नहीं
चाहता। इस समय अर्जुनका पुनर्जन्म-सा हो गया देखकर मुझे बड़ा भारी हर्ष हो रहा है।”
त्रैलोक्यराज्याद्यत्किञ्चिद्भवेदन्यत्सुदुर्लभम्
। नेच्छेयं सात्वताहं तद्विना पार्थं धनञ्जयम्॥
अतः प्रहर्षः सुमहान् युयुधानाद्य
मेऽभवत्। मृतं प्रत्यागतमिव दृष्ट्वा पार्थं धनञ्जयम्॥
(महा0, द्रोण0 182। 44-45)
श्रीकृष्ण और अर्जुनकी मैत्री इतनी प्रसिद्ध थी कि स्वयं दुर्योधनने भी एक बार ऐसा कहा था—
आत्मा हि कृष्णः पार्थस्य कृष्णस्यात्मा धनञ्जयः॥
यद् ब्रूयादर्जुनः कृष्णं सर्वं कुर्यादसंशयम्।
कृष्णो धनञ्जयस्यार्थे स्वर्गलोकमपि त्यजेत्॥
तथैव पार्थः कृष्णार्थे प्राणानपि परित्यजेत्।
(महा0, सभा0 52। 31—33)
“श्रीकृष्ण अर्जुनके आत्मा हैं और अर्जुन श्रीकृष्णके। अर्जुन श्रीकृष्णको जो कुछ भी करनेको कहें, श्रीकृष्ण वह सब
कर सकते हैं, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। श्रीकृष्ण अर्जुनके लिये दिव्यलोकका भी त्याग कर सकते हैं तथा इसी
प्रकार अर्जुन भी श्रीकृष्णके लिये प्राणोंका परित्याग कर सकते हैं।”
श्रीकृष्ण और अर्जुनकी आदर्श प्रीतिके और भी बहुत-से उदाहरण हैं। इसके लिये महाभारत और श्रीमद्भागवतके
उन-उन स्थलोंको देखना चाहिये।
अर्जुनके इस विलक्षण प्रेमका ही प्रभाव है, जिसके कारण भगवान्को गुह्याद्गुह्यतर ज्ञानकी अपेक्षा भी अत्यन्त गुह्य
सर्वगुह्यतम अपने पुरुषोत्तमस्वरूपका रहस्य अर्जुनके सामने खोल देना पड़ा और इस प्रेमका ही प्रताप है कि परम धाममें
भी अर्जुनको भगवान्की अत्यन्त दुर्लभ सेवाका ही सौभाग्य प्राप्त हुआ, जिसके लिये बड़े-बड़े ब्रह्मवादी महापुरुष भी
ललचाते रहते हैं। स्वर्गारोहणके अनन्तर धर्मराज युधिष्ठिरने दिव्य देह धारण कर परम धाममें देखा—
ददर्श तत्र गोविन्दं ब्राह्मेण वपुषान्वितम्॥
दीप्यमानं
स्ववपुषा
चक्रप्रभृतिभिर्घोरैर्दिव्यैः
उपास्यमानं
वीरेण
दिव्यैरस्त्रैरुपस्थितम्।
पुरुषविग्रहैः॥
फाल्गुनेन
सुवर्चसा।
(महा0, स्वर्गा0 4। 2—4)
“भगवान् श्रीगोविन्द वहाँ अपने ब्राह्मशरीरसे युक्त हैं। उनका शरीर देदीप्यमान है। उनके समीप चक्र आदि दिव्य
शस्त्र और अन्यान्य घोर अस्त्र दिव्य पुरुष-शरीर धारण कर उनकी सेवा कर रहे हैं! महान् तेजस्वी वीर अर्जुनके द्वारा
भी भगवान् सेवित हो रहे हैं।” यही “परम फल” है गीतातत्त्वके भलीभाँति सुनने, समझने और धारण करनेका। एवं
अर्जुन-सरीखे इन्द्रियसंयमी, महान् त्यागी, विचक्षण ज्ञानी—विशेषकर भगवान्के परम प्रिय सखा, सेवक और शिष्यको
इस “परम फल” का प्राप्त होना सर्वथा उचित ही है।
66
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥ 66॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
सम्पूर्ण धर्मोंको अर्थात् सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मोंको मुझमें त्यागकर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार परमेश्वरकी ही शरणमें आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा,
67
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन। न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति॥ 67॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
तुझे यह गीतारूप रहस्यमय उपदेश किसी भी कालमें न तो तपरहित मनुष्यसे कहना चाहिये, न भक्तिरहितसे और न बिना सुननेकी इच्छावालेसे ही कहना चाहिये; तथा जो मुझमें दोषदृष्टि रखता है उससे तो कभी भी नहीं कहना चाहिये॥ 67॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार भगवान् गीताके उपदेशका उपसंहार करके अब उस उपदेशके अध्यापन और अध्ययन आदिका माहात्म्य बतलानेके लिये पहले अनधिकारीके लक्षण बतलाकर उसे गीताका उपदेश सुनानेका निषेध करते हैं—

68
य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति। भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥ 68॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो पुरुष मुझमें परम प्रेम करके इस परम रहस्ययुक्त गीताशास्त्रको मेरे भक्तोंमें कहेगा, वह मुझको ही प्राप्त होगा—इसमें कोई सन्देह नहीं है॥ 68॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार गीतोक्त उपदेशके अनधिकारीके लक्षण बतलाकर अब भगवान् दो श्लोकोंद्वारा अपने भक्तोंमें इस उपदेशके वर्णनका फल और माहात्म्य बतलाते हैं—

69
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः। भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि॥ 69॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करनेवाला मनुष्योंमें कोई भी नहीं है; तथा पृथ्वीभरमें उससे बढ़कर मेरा प्रिय दूसरा कोई भविष्यमें होगा भी नहीं॥ 69॥
70
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः। ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः॥ 70॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो पुरुष इस धर्ममय हम दोनोंके संवादरूप गीताशास्त्रको पढ़ेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञसे पूजित होऊँगा—ऐसा मेरा मत है॥ 70॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार उपर्युक्त दो श्लोकोंमें गीताशास्त्रका श्रद्धा-भक्तिपूर्वक भगवद्भक्तोंमें विस्तार करनेका फल और माहात्म्य बतलाया; किन्तु सभी मनुष्य इस कार्यको नहीं कर सकते, इसका अधिकारी तो कोई विरला ही होता है। इसलिये अब गीताशास्त्रके अध्ययनका माहात्म्य बतलाते हैं—

71
श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः। सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्॥ 71॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो मनुष्य श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टिसे रहित होकर इस गीताशास्त्रका श्रवण भी करेगा, वह भी पापोंसे मुक्त होकर उत्तम कर्म करनेवालोंके श्रेष्ठ लोकोंको प्राप्त होगा॥ 71॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार गीताशास्त्रके अध्ययनका माहात्म्य बतलाकर, अब जो उपर्युक्त प्रकारसे अध्ययन करनेमें असमर्थ हैं—ऐसे मनुष्योंके लिये उसके श्रवणका फल बतलाते हैं—

72
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा। कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय॥ 72॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे पार्थ! क्या इस (गीताशास्त्र) को तूने एकाग्रचित्तसे श्रवण किया? और हे धनंजय! क्या तेरा अज्ञानजनित मोह नष्ट हो गया?॥ 72॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार गीताशास्त्रके कथन, पठन और श्रवणका माहात्म्य बतलाकर अब भगवान् स्वयं सब कुछ जानते हुए भी अर्जुनको सचेत करनेके लिये उससे उसकी स्थिति पूछते हैं—

73अर्जुन
अर्जुन उवाच नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत। स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव॥ 73॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
अर्जुन बोले—हे अच्युत! आपकी कृपासे मेरा मोह नष्ट हो गया और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है, अब मैं संशयरहित होकर स्थित हूँ, अतः आपकी आज्ञाका पालन करूँगा॥ 73॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार भगवान्के पूछनेपर अब अर्जुन भगवान्से कृतज्ञता प्रकट करते हुए अपनी स्थितिका वर्णन करते हैं—

74सञ्जय
संजय उवाच इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः। संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्॥ 74॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
संजय बोले—इस प्रकार मैंने श्रीवासुदेवके और महात्मा अर्जुनके इस अद्भुत रहस्ययुक्त,
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार धृतराष्ट्रके प्रश्नानुसार भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादरूप गीताशास्त्रका वर्णन करके अब उसका उपसंहार करते हुए संजय दो श्लोकोंमें धृतराष्ट्रके सामने गीताका महत्त्व प्रकट करते हैं—

75
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्। योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्॥ 75॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
श्रीव्यासजीकी कृपासे दिव्य दृष्टि पाकर मैंने इस परम गोपनीय योगको अर्जुनके प्रति कहते हुए स्वयं योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्णसे प्रत्यक्ष सुना है॥ 75॥
* गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रसंग्रहैः। या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता॥ (महा0, भीष्म0 43। 1)
“गीताका ही सम्यक् प्रकारसे श्रवण-कीर्तन, पठन-पाठन, मनन और धारण करना चाहिये, अन्य शास्त्रोंके संग्रहसे
क्या प्रयोजन है? क्योंकि यह स्वयं पद्मनाभ भगवान् विष्णुके मुखकमलसे निकली है।”
76
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्। केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः॥ 76॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे राजन्! भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनके इस रहस्ययुक्त, कल्याणकारक और अद्भुत संवादको पुनः-पुनः स्मरण करके मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ॥ 76॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार अतिदुर्लभ गीताशास्त्रके सुननेका महत्त्व प्रकट करके अब संजय अपनी स्थितिका वर्णन करते हुए उस उपदेशकी स्मृतिका महत्त्व प्रकट करते हैं—

77
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः। विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः॥ 77॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे राजन्! श्रीहरिके उस अत्यन्त विलक्षण रूपको भी पुनः-पुनः स्मरण करके मेरे चित्तमें महान् आश्चर्य होता है और मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ॥ 77॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार गीताशास्त्रकी स्मृतिका महत्त्व बतलाकर अब संजय अपनी स्थितिका वर्णन करते हुए भगवान्के विराट्स्वरूपकी स्मृतिका महत्त्व दिखलाते हैं—

78
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥ 78॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे राजन्! जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन हैं, वहींपर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है—ऐसा मेरा मत है॥ 78॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार अपनी स्थितिका वर्णन करते हुए गीताके उपदेशकी और भगवान्के अद्भुत रूपकी स्मृतिका महत्त्व प्रकट करके, अब संजय धृतराष्ट्रसे पाण्डवोंकी विजयकी निश्चित सम्भावना प्रकट करते हुए इस अध्यायका उपसंहार करते हैं—

18.1श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीका