मोक्षसंन्यासयोग
सर्वस्य एव गीताशास्त्रस्य अर्थः अस्मिन् अध्याये उपसंहृत्य सर्वः च वेदार्थो वक्तव्य इति एवम् अर्थः अयम् अध्याय आरभ्यते।
सर्वेषु हि अतीतेषु अध्यायेषु उक्तः अर्थः अस्मिन् अध्याये अवगम्यते। अर्जुनः तु सन्न्यास-त्यागशब्दार्थयोः एव विशेषं बुभुत्सुः उवाच—
इस अध्यायमें समस्त गीता-शास्त्रका आशय और वेदोंका सम्पूर्ण तात्पर्य इकट्ठा करके कहना है, इस अभिप्रायसे यह अठारहवाँ अध्याय आरम्भ किया जाता है।
इस अध्यायमें पहलेके सभी अध्यायोंमें कहा हुआ अभिप्राय मिलता है। तथापि अर्जुन केवल संन्यास और त्याग—इन दो शब्दोंके अर्थोंका भेद जाननेकी इच्छासे ही प्रश्न करता है—
अर्जुन बोला—
सन्न्यासस्य सन्न्यासशब्दार्थस्य इति एतद् हे महाबाहो तत्त्वं तस्य भावः तत्त्वं याथात्म्यम् इति एतद् इच्छामि वेदितुं ज्ञातुं त्यागस्य च त्यागशब्दार्थस्य इति एतद् हृषीकेश पृथग् इतरेतरविभागतः। केशिनिषूदन।
केशिनामा हयच्छद्मा असुरः तं निषूदितवान् भगवान् वासुदेवः तेन तन्नाम्ना सम्बोध्यते अर्जुनेन॥ 1॥
हे महाबाहो! हे हृषीकेश! हे केशिनिषूदन! मैं संन्यासका अर्थात् संन्यास-शब्दके अर्थका और त्यागका अर्थात् त्याग-शब्दके अर्थका तत्त्व—यथार्थ स्वरूप अलग-अलग विभागपूर्वक जानना चाहता हूँ।
भगवान् वासुदेवने छलसे घोड़ेका रूप धारण करनेवाले केशि नामक असुरको मारा था, इसलिये वे उस (केशिनिषूदन) नामसे अर्जुनद्वारा सम्बोधित किये गये हैं॥ 1॥
तत्र तत्र निर्दिष्टौ सन्न्यासत्यागशब्दौ न निलुण्ठितार्थौ पूर्वेषु अध्यायेषु अतः अर्जुनाय पृष्टवते तन्निर्णयाय—
पहले अध्यायोंमें जिनका जगह-जगह निर्देश किया गया है, वे संन्यास और त्याग—दोनों शब्द स्पष्टार्थयुक्त नहीं हैं, इसलिये (उनका स्पष्ट अर्थ जाननेकी इच्छासे) पूछनेवाले अर्जुनको उनका निर्णय सुनानेके लिये श्रीभगवान् बोले—
भाष्य10 paragraphs · खोलें
काम्यानाम् अश्वमेधादीनां कर्मणां न्यासं परित्यागं सन्न्यासं सन्न्यासशब्दार्थम् अनुष्ठेयत्वेन प्राप्तस्य अननुष्ठानं कवयः पण्डिताः केचिद् विदुः विजानन्ति।
नित्यनैमित्तिकानाम् अनुष्ठीयमानानां सर्व-कर्मणाम् आत्मसम्बन्धितया प्राप्तस्य फलस्य परित्यागः
सर्वकर्मफलत्यागः
तं
प्राहुः कथयन्ति त्यागं त्यागशब्दार्थं विचक्षणाः पण्डिताः।
यदि काम्यकर्मपरित्यागः फलपरित्यागो वा अर्थो वक्तव्यः सर्वथा अपि त्यागमात्रं सन्न्यासत्यागशब्दयोः एकः अर्थो न घटपट-शब्दौ इव जात्यन्तरभूतार्थौ।
ननु नित्यनैमित्तिकानां कर्मणां फलम् एव नास्ति इति आहुः कथम् उच्यते तेषां फल-त्याग इति। यथा वन्ध्यायाः पुत्रत्यागः।
न एष दोषः, नित्यानाम् अपि कर्मणां भगवता फलवत्त्वस्य इष्टत्वात्। वक्ष्यति हि भगवान् “अनिष्टमिष्टम्” इति “न तु सन्न्यासिनाम्” इति च। सन्न्यासिनाम् एव हि केवलं कर्मफलासम्बन्धं
दर्शयन्
असन्न्यासिनां नित्यकर्मफलप्राप्तिम् “भवत्यत्यागिनां प्रेत्य” इति दर्शयति॥ 2॥
कितने ही बुद्धिमान्—पण्डित लोग, अश्वमेधादि सकाम कर्मोंके त्यागको संन्यास समझते हैं अर्थात् कर्तव्यरूपसे प्राप्त (शास्त्रविहित) सकाम कर्मोंके न करनेको संन्यास शब्दका अर्थ समझते हैं।
कुछ विचक्षण पण्डितजन अनुष्ठान किये जानेवाले नित्य-नैमित्तिक सम्पूर्ण कर्मोंके, अपनेसे सम्बन्ध रखनेवाले फलका परित्याग करनारूप जो सर्व-कर्म-फल-त्याग है, उसे ही त्याग कहते हैं, अर्थात् “त्याग” शब्दका वे ऐसा अभिप्राय बतलाते हैं।
कहनेका अभिप्राय, चाहे काम्य कर्मोंका (स्वरूपसे) त्याग करना हो और चाहे समस्त कर्मोंका फल छोड़ना ही हो, सभी प्रकारसे संन्यास और त्याग—इन दोनों शब्दोंका अर्थ तो एकमात्र त्याग ही है। ये दोनों शब्द “घड़ा” और “वस्त्र” आदि शब्दोंकी भाँति भिन्न जातीय अर्थके बोधक नहीं हैं।
पू0—जब ऐसा कहा जाता है कि नित्य और नैमित्तिक कर्मोंका तो फल ही नहीं होता, फिर यहाँ वन्ध्याके पुत्रत्यागकी भाँति, उनके फलका त्याग करनेके लिये कैसे कहा जाता है?
उ0—नित्यकर्मोंका भी फल होता है—यह बात भगवान्को इष्ट है, इसलिये यह दोष नहीं है। क्योंकि भगवान् स्वयं कहेंगे कि “मरनेके बाद कर्मोंका अच्छा-बुरा और मिला हुआ फल असंन्यासियोंको होता है”, “संन्यासियोंको नहीं” इस प्रकार वहाँ केवल संन्यासियोंके लिये कर्मफलकी अभाव दिखाकर, असंन्यासियोंके लिये कर्मफलका प्राप्ति अवश्यम्भावी दिखलायेंगे॥ 2॥
भाष्य17 paragraphs · खोलें
त्याज्यं त्यक्तव्यं दोषवद् दोषः अस्य अस्ति इति दोषवत्। किं तत् कर्म बन्धहेतुत्वात् सर्वम् एव। अथवा दोषो यथा रागादिः त्यज्यते तथा त्याज्यम् इति एके प्राहुः मनीषिणः पण्डिताः साङ्ख्यादिदृष्टिम् आश्रिता अधिकृतानां कर्मिणाम् अपि इति।
तत्र एव यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यम् इति च अपरे।
कर्मिण एव अधिकृतान् अपेक्ष्य एते विकल्पा न तु ज्ञाननिष्ठान् व्युत्थायिनः सन्न्यासिनः अपेक्ष्य।
ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां निष्ठा मया पुरा प्रोक्ता इति कर्माधिकाराद् अपोद्धृता ये न तान् प्रति चिन्ता।
ननु “कर्मयोगेन योगिनाम्” इति अधिकृताः पूर्वं विभक्तनिष्ठा अपि इह सर्वशास्त्रोपसंहार-प्रकरणे यथा विचार्यन्ते तथा साङ्ख्या अपि ज्ञाननिष्ठा विचार्यन्ताम् इति।
न, तेषां मोहदुःखनिमित्तत्यागानुपपत्तेः।
न कायक्लेशनिमित्तानि दुःखानि साङ्ख्या आत्मनि पश्यन्ति इच्छादीनां क्षेत्रधर्मत्वेन एव दर्शितत्वात्। अतः ते न कायक्लेशदुःखभयात् कर्म परित्यजन्ति।
न अपि ते कर्माणि आत्मनि पश्यन्ति येन नियतं कर्म मोहात् परित्यजेयुः।
गुणानां कर्म न एव किञ्चित् करोति इति हि ते सन्न्यसन्ति। “सर्वकर्माणि मनसा सन्न्यस्य” इत्यादिभिः हि तत्त्वविदः सन्न्यास-प्रकार उक्तः।
तस्माद् ये अन्ये अधिकृताः कर्मणि अनात्मविदो येषां च मोहात् त्यागः सम्भवति कायक्लेशभयात् च ते एव तामसाः त्यागिनो राजसाः च इति निन्द्यन्ते कर्मिणाम् अनात्मज्ञानां कर्मफलत्यागस्तुत्यर्थम्।
“सर्वारम्भपरित्यागी” “मौनी” “सन्तुष्टो येन केनचित्” “अनिकेतः स्थिरमतिः” इति गुणातीत-लक्षणे च परमार्थसन्न्यासिनो विशेषितत्वात्। वक्ष्यति च “ज्ञानस्य या परा निष्ठा” इति। तस्माद् ज्ञाननिष्ठाः सन्न्यासिनो न इह विवक्षिताः।
कर्मफलत्याग एव सात्त्विकत्वेन गुणेन तामसत्वाद्यपेक्षया सन्न्यास उच्यते न मुख्यः सर्वकर्मसन्न्यासः।
सर्वकर्मसन्न्यासासम्भवे च “न हि देहभृता” इति हेतुवचनाद् मुख्य एव इति चेत्।
न, हेतुवचनस्य स्तुत्यर्थत्वात्। यथा “त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्” इति कर्मफलत्याग-स्तुतिः एव यथोक्तानेकपक्षानुष्ठानाशक्तिमन्तम् अर्जुनम् अज्ञं प्रति विधानात्, तथा इदम् अपि “न हि देहभृता शक्यम्” इति कर्मफलत्याग-स्तुत्यर्थं वचनम्।
न सर्वकर्माणि मनसा सन्न्यस्य न एव कुर्वन् न कारयन् आस्ते इति अस्य पक्षस्य अपवादः केनचिद् दर्शयितुं शक्यः।
तस्मात् कर्मणि अधिकृतान् प्रति एव एष सन्न्यासत्यागविकल्पः। ये तु परमार्थदर्शिनः साङ्ख्याः तेषां ज्ञाननिष्ठायाम् एव सर्वकर्म-सन्न्यासलक्षणायाम् अधिकारो न अन्यत्र इति न ते विकल्पार्हाः।
तथा उपपादितम् अस्माभिः “वेदाविनाशिनम्” इति अस्मिन् प्रदेशे तृतीयादौ च॥ 3॥
कितने ही सांख्यादि मतावलम्बी पण्डितजन कहते हैं कि जिसमें दोष हो वह दोषवत् है। वह क्या है? कि बन्धनके हेतु होनेके कारण सभी कर्म दोषयुक्त हैं, इसलिये कर्म करनेवाले कर्माधिकारी मनुष्योंके लिये भी वे त्याज्य हैं, अथवा जैसे राग-द्वेष आदि दोष त्यागे जाते हैं, वैसे ही समस्त कर्म भी त्याज्य हैं।
इसी विषयमें दूसरे विद्वान् कहते हैं कि यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्याग करनेयोग्य नहीं हैं।
ये सब विकल्प, कर्म करनेवाले कर्माधिकारियोंको लक्ष्य करके ही किये गये हैं। समस्त भोगोंसे विरक्त ज्ञाननिष्ठ, संन्यासियोंको लक्ष्य करके नहीं।
(अभिप्राय यह कि) “सांख्ययोगियोंकी निष्ठा ज्ञानयोगके द्वारा मैं पहले कह चुका हूँ” इस प्रकार जो (संन्यासी) कर्माधिकारसे अलग कर दिये गये हैं उनके विषयमें यहाँ कोई विचार नहीं करना है।
पू0—“कर्मयोगियोंकी निष्ठा कर्मयोगसे कही गयी है” इस कथनसे जिनकी निष्ठाका विभाग पहले किया जा चुका है, उन कर्माधिकारियोंके सम्बन्धमें जिस प्रकार यहाँ गीताशास्त्रके उपसंहार-प्रकरणमें फिर विचार किया जाता है, वैसे ही सांख्यनिष्ठावाले संन्यासियोंके विषयमें भी तो किया जाना उचित ही है।
उ0—नहीं, क्योंकि उनका त्याग मोह या दुःखके निमित्तसे होनेवाला नहीं हो सकता।
(भगवान्ने क्षेत्राध्यायमें) इच्छा और द्वेष आदिको शरीरके ही धर्म बतलाया है, इसलिये सांख्यनिष्ठ संन्यासी शारीरिक पीड़ाके निमित्तसे होनेवाले दुःखोंको आत्मामें नहीं देखते। अतः वे शारीरिक क्लेशजन्य दुःखके भयसे कर्म नहीं छोड़ते।
तथा वे आत्मामें कर्मोंका अस्तित्व भी नहीं देखते, जिससे कि उनके द्वारा मोहसे नियत कर्मोंका परित्याग किया जा सकता हो।
“सारे कर्म गुणोंके हैं, मैं कुछ भी नहीं करता” ऐसा समझकर ही वे कर्मसंन्यास करते हैं, क्योंकि “सब कर्मोंको मनसे त्यागकर” इत्यादि वाक्योंद्वारा तत्त्वज्ञानियोंके संन्यासका प्रकार (ऐसा ही) बतलाया गया है।
अतः जो अन्य आत्मज्ञानरहित कर्माधिकारी मनुष्य हैं, जिनके द्वारा मोहपूर्वक या शारीरिक क्लेशके भयसे कर्मोंका त्याग किया जाना सम्भव है, वे ही तामस और राजस त्यागी हैं। ऐसा कहकर, आत्मज्ञानरहित कर्माधिकारियोंके कर्म-फलत्यागकी स्तुति करनेके लिये, उन राजस-तामस त्यागियोंकी निन्दा की जाती है।
क्योंकि “सर्वारम्भपरित्यागी” “मौनी” “संतुष्टो येन केनचित्” “अनिकेतः स्थिरमतिः” इत्यादि विशेषणोंसे (बारहवें अध्यायमें) और गुणातीतके लक्षणोंमें भी यथार्थ संन्यासीको पृथक् करके कहा गया है, तथा “ज्ञानकी जो परानिष्ठा है” इस प्रकरणमें भी यही बात कहेंगे, इसलिये यहाँ यह विवेचन ज्ञाननिष्ठ संन्यासियोंके विषयमें नहीं है।
कर्मफलत्याग (रूपसंन्यास) ही सात्त्विकतारूप गुणसे युक्त होनेके कारण यहाँ तामस-राजस त्याग-की अपेक्षा गौणरूपसे संन्यास कहा जाता है। यह (सात्त्विक त्याग) सर्वकर्मसंन्यासरूप मुख्य संन्यास नहीं है।
पू0—“न हि देहभृता” इत्यादि हेतुयुक्त कथनसे यह पाया जाता है कि स्वरूपसे सर्वकर्मोंका संन्यास असम्भव है, अतः कर्मफलत्याग ही मुख्य संन्यास है।
उ0—यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि यह हेतुयुक्त कथन कर्मफलत्यागकी स्तुतिके लिये है। जिस प्रकार पूर्वोक्त अनेक साधनोंका अनुष्ठान करनेमें असमर्थ और आत्मज्ञानरहित अर्जुन-के लिये विहित होनेके कारण “त्यागा-च्छान्तिरनन्तरम्” यह कहना कर्मफलत्यागकी स्तुतिमात्र है। वैसे ही “न हि देहभृता शक्यम्” यह कहना भी कर्मफलत्यागकी स्तुतिके लिये ही है।
क्योंकि “सब कर्मोंको मनसे छोड़कर न करता हुआ और न कराता हुआ रहता है” इस पक्षका अपवाद किसीके द्वारा भी दिखलाया जाना सम्भव नहीं है।
सुतरां यह संन्यास और त्यागसम्बन्धी विकल्प, कर्माधिकारियोंके विषयमें ही है। जो यथार्थ ज्ञानी सांख्ययोगी हैं, उनका केवल सर्वकर्मसंन्यासरूप ज्ञाननिष्ठामें ही अधिकार है, अन्यत्र नहीं, अतः वे विकल्पके पात्र नहीं हैं।
यही सिद्धान्त हमने “वेदाविनाशिनम्” इस श्लोककी व्याख्यामें और तीसरे अध्यायके आरम्भमें सिद्ध किया है॥ 3॥
तत्र एतेषु विकल्पभेदेषु—
इन विकल्पभेदोंमें —
निश्चयं शृणु अवधारय मे मम वचनात् तत्र त्यागे त्यागसन्न्यासविकल्पे यथादर्शिते भरतसत्तम भरतानां साधुतम।
त्यागो हि त्यागसन्न्यासशब्दवाच्यो हि यः अर्थः स एक एव इति अभिप्रेत्य आह त्यागो हि इति। पुरुषव्याघ्र त्रिविधः त्रिप्रकारः तामसादिप्रकारैः सम्प्रकीर्तितः शास्त्रेषु सम्यक् कथितः।
यस्मात् तामसादिभेदेन त्यागसन्न्यास-शब्दवाच्यः अर्थः अधिकृतस्य कर्मिणः अनात्मज्ञस्य त्रिविधः सम्भवति न परमार्थ-दर्शिन इति अयम् अर्थो दुर्ज्ञानः तस्माद् अत्र तत्त्वं न अन्यो वक्तुं समर्थः तस्माद् निश्चयं परमार्थशास्त्रार्थविषयम् अध्यवसायम् ऐश्वरं शृणु॥ 4॥
हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठतम अर्जुन! उस पूर्वदर्शित त्यागके विषयमें, अर्थात् त्याग-संन्याससम्बन्धी विकल्पोंके विषयमें तू मेरा निश्चय सुन, अर्थात् मेरे वचनोंसे कहा हुआ तत्त्व भली प्रकार समझ।
त्याग और संन्यास शब्दका जो वाच्यार्थ है वह एक ही है, इस अभिप्रायसे केवल त्यागके नामसे ही (प्रश्नका) उत्तर देते हैं। हे पुरुषसिंह! (उस) त्यागका शास्त्रोंमें तामस आदि तीन प्रकारके भेदोंसे भली प्रकार निरूपण किया गया है।
जिससे कि आत्मज्ञानरहित कर्माधिकारी— कर्मी पुरुषका ही “त्याग-संन्यास-शब्दका वाच्यार्थ (संन्यास) तामस आदि भेदोंसे तीन प्रकारका होना सम्भव है, परमार्थज्ञानी नहीं” यह अभिप्राय समझमें आना बड़ा कठिन है, इसलिये इस विषयमें यथार्थ तत्त्व बतलानेको दूसरा कोई समर्थ नहीं है, अतः तू मुझ ईश्वरका शास्त्रोंके यथार्थ अभिप्रायसे युक्त निश्चय सुन॥ 4॥
कः पुनः असौ निश्चय इति अत आह—
वह निश्चय क्या है! इसपर कहते हैं—
यज्ञो दानं तप इति एतत् त्रिविधं कर्म न त्याज्यं न त्यक्तव्यं कार्यं करणीयम् एव तत्। कस्माद् यज्ञो दानं तपः च एव पावनानि विशुद्धिकारणानि मनीषिणां फलानभिसन्धीनाम् इति एतत्॥ 5॥
यज्ञ, दान और तप, ये तीन प्रकारके कर्म त्यागनेयोग्य नहीं हैं अर्थात् इन तीनोंका त्याग करना उचित नहीं है, इन्हें तो करना ही चाहिये; क्योंकि यज्ञ, दान और तप ये तीनों बुद्धिमानोंको अर्थात् फल-कामनारहित पुरुषोंको, पवित्र करनेवाले हैं॥ 5॥
भाष्य11 paragraphs · खोलें
एतानि अपि तु कर्माणि यज्ञदानतपांसि पावनानि उक्तानि सङ्गम् आसक्तिं तेषु त्यक्त्वा, फलानि च तेषां त्यक्त्वा परित्यज्य कर्तव्यानि इति अनुष्ठेयानि इति मे मम निश्चितं मतम् उत्तमम्।
“निश्चयं शृणु मे तत्र” इति प्रतिज्ञाय पावनत्वं च हेतुम् उक्त्वा एतानि अपि कर्माणि कर्तव्यानि इति एतद् निश्चितं मतम् उत्तमम् इति प्रतिज्ञातार्थोपसंहार एव न अपूर्वार्थं वचनम् एतानि अपि इति प्रकृतसन्निकृष्टार्थतोपपत्तेः।
सासङ्गस्य फलार्थिनो बन्धहेतव एतानि अपि कर्माणि मुमुक्षोः कर्तव्यानि इति अपि शब्दस्य अर्थो न तु अन्यानि कर्माणि अपेक्ष्य एतानि अपि इति उच्यते।
अन्ये
वर्णयन्ति
नित्यानां
कर्मणां फलाभावात् सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च इति न उपपद्यते। एतानि अपि इति यानि काम्यानि कर्माणि नित्येभ्यः अन्यानि एतानि अपि कर्तव्यानि किमुत यज्ञदानतपांसि नित्यानि इति।
तद् असत् नित्यानाम्, अपि कर्मणां फल-वत्त्वस्य उपपादितत्वात्। “यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि” इत्यादि वचनेन।
नित्यानि अपि कर्माणि बन्धहेतुत्वाशङ्कया जिहासोः मुमुक्षोः कुतः काम्येषु प्रसङ्गः।
“दूरेण ह्यवरं कर्म” इति च निन्दितत्वात् “यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र” इति च काम्यकर्मणां बन्धहेतुत्वस्य निश्चितत्वात्, “त्रैगुण्यविषया वेदाः” “त्रैविद्या मां सोमपाः” “क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति” इति च दूरव्यवहितत्वात् च न काम्येषु एतानि अपि इति व्यपदेशः॥ 6॥
जो पवित्र करनेवाले बतलाये गये हैं, ऐसे ये यज्ञ, दान और तपरूप कर्म भी तद्विषयक आसक्ति और फलका त्याग करके ही किये जाने चाहिये, अर्थात् आसक्ति और फलके त्यागपूर्वक ही इनका अनुष्ठान करना उचित है। यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है।
“इस विषयमें मेरा निश्चय सुन” इस प्रकार प्रतिज्ञा करके और (उनकी कर्तव्यतामें) पावनत्वरूप हेतु बतलाकर जो ऐसा कहना है कि “ये कर्म किये जाने चाहिये” “यह मेरा निश्चित उत्तम मत है” यह प्रतिज्ञा किये हुए विषयका उपसंहार ही है, किसी अपूर्व विषयका वर्णन नहीं है; क्योंकि “एतानि” शब्दका आशय प्रकरणमें अत्यन्त निकटवर्ती विषयको ही लक्ष्य कराना होता है।
आसक्तियुक्त और फलेच्छुक मनुष्योंके लिये यद्यपि ये (यज्ञ, दान और तपरूप) कर्म बन्धनके कारण हैं, तो भी मुमुक्षुको (फल-आसक्तिसे रहित होकर) करने चाहिये, यही “अपि” शब्दका अभिप्राय है। यहाँ (यज्ञ, दान और तपसे अतिरिक्त) अन्य (काम्य) कर्मोंको लक्ष्य करके “एतानि” के साथ “अपि” शब्दका प्रयोग नहीं है।
कुछ अन्य टीकाकार कहते हैं कि नित्यकर्मोंके फलका अभाव होनेके कारण उनको फल और आसक्ति छोड़कर कर्तव्य बतलाना नहीं बन सकता, (अतः) “एतान्यपि” इस पदका अभिप्राय यह है कि जो नित्यकर्मोंसे अतिरिक्त काम्य कर्म हैं वे भी करने चाहिये, फिर यज्ञ, दान और तपरूप नित्यकर्मोंके विषयमें तो कहना ही क्या है।
यह अर्थ (करना) ठीक नहीं; क्योंकि “यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि” इत्यादि वचनोंसे “नित्यकर्मोंका भी फल होता है; यह सिद्ध किया गया है।
नित्यकर्मोंको भी बन्धनकारक होनेकी आशङ्कासे छोड़नेकी इच्छा रखनेवाले मुमुक्षुकी प्रवृत्ति काम्य-कर्मोंमें कैसे हो सकती है?
इसके सिवा “सकाम कर्म अत्यन्त निकृष्ट हैं” इस कथनमें
काम्यकर्मोंकी
निन्दा
की
जानेके कारण और “यथार्थ कर्मके अतिरिक्त अन्य कर्म बन्धनकारक हैं” इस कथनसे काम्यकर्म बन्धन-कारक माने जानेके कारण, एवं “वेद त्रिगुणात्मक (संसार)-को विषय करनेवाले हैं” “तीनों वेदोंको जाननेवाले सोमरस पीनेवाले” “पुण्य क्षीण होनेपर मृत्युलोकमें आ जाते हैं” ऐसा कहा जानेके कारण और साथ ही काम्यकर्मोंका विषय बहुत दूर व्यवधानयुक्त होनेके कारण भी (यह सिद्ध होता है कि) “एतान्यपि” यह कथन काम्यकर्मोंके विषयमें नहीं है॥ 6॥
तस्माद् अज्ञस्य अधिकृतस्य मुमुक्षोः—
अतः आत्मज्ञानरहित कर्माधिकारी मुमुक्षुके लिये—
नियतस्य तु नित्यस्य सन्न्यासः परित्यागः कर्मणो न उपपद्यते अज्ञस्य पावनत्वस्य इष्टत्वात्। मोहाद् अज्ञानात् तस्य नियतस्य परित्यागः।
नियतं च अवश्यं कर्तव्यं त्यज्यते च इति विप्रतिषिद्धम् अतो मोहनिमित्तः परित्यागः तामसः परिकीर्तितो मोहः च तम इति॥ 7॥
विहित—नित्यकर्मोंका संन्यास यानी परित्याग करना नहीं बन सकता, क्योंकि अज्ञानीके लिये नित्यकर्म शुद्धिके हेतु माने गये हैं। अतः मोहसे अज्ञानपूर्वक (किया हुआ) उन नित्यकर्मोंका परित्याग (तामस कहा गया है)।
नियत अवश्य कर्तव्यको कहते हैं, फिर उसका त्याग किया जाना अत्यन्त विरुद्ध है, अतः यह मोहनिमित्तक त्याग तामस कहा गया है। मोह ही तम है, यह प्रसिद्ध है॥ 7॥
किं च—
तथा—
दुःखम् इति एव यत् कर्म कायक्लेशभयात् शरीरदुःखभयात् त्यजेत् परित्यजेत् स कृत्वा राजसं रजोनिर्वृत्तं त्यागं न एव त्यागफलं ज्ञानपूर्वकस्य सर्वकर्मत्यागस्य फलं मोक्षाख्यं न लभेद् न एव लभते॥ 8॥
समस्त कर्म दुःखरूप हैं, ऐसा मानकर जो कोई शारीरिक क्लेशके भयसे कर्मोंको छोड़ बैठता है, वह (ऐसा) राजस त्याग करके, त्यागका फल अर्थात् ज्ञानपूर्वक किये हुए सर्वकर्मसंन्यासका मोक्षरूप फल नहीं पाता॥ 8॥
कः पुनः सात्त्विकः त्यागः—
तो फिर सात्त्विक त्याग कौन-सा है?
भाष्य6 paragraphs · खोलें
कार्यं कर्तव्यम् इति एव यत् कर्म नियतं नित्यं क्रियते निर्वर्त्यते हे अर्जुन सङ्गं त्यक्त्वा फलं च एव।
नित्यानां कर्मणां फलवत्त्वे भगवद्वचनं प्रमाणं अवोचाम। अथवा यद्यपि फलं न श्रूयते नित्यस्य कर्मणः तथापि नित्यं कर्म कृतम् आत्मसंस्कारम् प्रत्यवायपरिहारं वा फलं करोति आत्मन इति कल्पयति एव अज्ञः, तत्र ताम् अपि कल्पनां निवारयति फलं त्यक्त्वा इति अनेन, अतः साधु उक्तं सङ्गं त्यक्त्वा फलं च इति।
स त्यागो नित्यकर्मसु सङ्गफलपरित्यागः सात्त्विकः सत्त्वनिर्वृत्तो मतः अभिमतः।
ननु कर्मपरित्यागः त्रिविधः सन्न्यास इति च प्रकृतः तत्र तामसो राजसः च उक्तः त्यागः कथम् इह सङ्गफलत्यागः, तृतीयत्वेन उच्यते यथा त्रयो ब्राह्मणा आगताः तत्र षडङ्गविदौ द्वौ क्षत्रियः तृतीय इति तद्वत्।
न एष दोषः, त्यागसामान्येन स्तुत्यर्थत्वात्। अस्ति हि कर्मसन्न्यासस्य फलाभिसन्धित्यागस्य च त्यागत्वसामान्यं तत्र राजसतामसत्वेन कर्मत्यागनिन्दया
कर्मफलाभिसन्धित्यागः सात्त्विकत्वेन स्तूयते “स त्यागः सात्त्विको मतः” इति॥ 9॥
हे अर्जुन! करना चाहिये—कर्तव्य है, ऐसा समझकर,जो नित्यकर्म आसक्ति और फल छोड़कर सम्पादन किये जाते हैं।
नित्यकर्मोंका फल होता है, इस विषयमें पहले भगवान्के वचनोंका प्रमाण दे चुके हैं। अथवा यों समझो कि यद्यपि नित्यकर्मोंका फल नहीं सुना जाता है, तो भी अज्ञ मनुष्य ऐसी कल्पना कर ही लेता है कि किया हुआ नित्यकर्म अन्तःकरणकी शुद्धि या प्रत्यवायकी निवृत्तिरूप फल देता है, सुतरां “फलं त्यक्त्वा” इस कथनसे ऐसी कल्पनाका भी निषेध करते हैं। अतः “सङ्गं त्यक्त्वा फलं च” यह कहना बहुत ही उचित है।
वह त्याग अर्थात् नित्यकर्मोंमें आसक्ति और फलका त्याग सात्त्विक—सत्त्वगुणसे किया हुआ त्याग माना गया है।
पू0—तीन प्रकारका कर्मपरित्याग संन्यास है, यह प्रकरण है। उसमें तामस और राजस तो त्याग बतलाये गये, परंतु तीसरे (सात्त्विक) त्यागकी जगह (कर्मोंका त्याग न कहकर) आसक्ति और फलका त्याग कैसे कहते हैं? जैसे कोई कहे कि तीन ब्राह्मण आये हैं, उनमें दो तो वेदके छहों अङ्गोंको जाननेवाले हैं और तीसरा क्षत्रिय है, उसीके समान यह कथन भी प्रकरणविरुद्ध है।
उ0—यह दोष नहीं है; क्योंकि त्यागमात्रकी समानतासे कर्मफलत्यागकी स्तुतिके लिये ऐसा कहा है। कर्मसंन्यासकी और फलासक्तिके त्यागकी, त्यागमात्रमें तो समानता है ही। उनमें (स्वरूपसे) कर्मोंके त्यागको राजस और तामस त्याग बतलाकर उसकी निन्दा करके, “स त्यागः सात्त्विको मतः” इस कथनसे कर्मफल और आसक्तिके त्यागको सात्त्विक त्याग बतलाकर उसकी स्तुति की जाती है॥ 9॥
यः तु अधिकृतः सङ्गं त्यक्त्वा फलाभिसन्धिं च नित्यं कर्म करोति तस्य फलरागादिना अकलुषीक्रियमाणम् अन्तःकरणं नित्यैः च कर्मभिः संस्क्रियमाणं विशुध्यति।
विशुद्धं प्रसन्नम् आत्मालोचनक्षमं भवति तस्य एव नित्यकर्मानुष्ठाने न विशुद्धान्तःकरणस्य आत्मज्ञानाभिमुखस्य क्रमेण यथा तन्निष्ठा स्यात् तद् वक्तव्यम् इति आह—
जो अधिकारी, आसक्ति और फलवासना छोड़कर नित्यकर्म करता है, उसका फलासक्ति आदि दोषोंसे दूषित न किया हुआ अन्तःकरण, नित्यकर्मोंके अनुष्ठानद्वारा संस्कृत होकर विशुद्ध हो जाता है।
विशुद्ध और प्रसन्न अन्तःकरण ही आध्यात्मिक विषयकी आलोचनामें समर्थ होता है। अतः इस प्रकार नित्यकर्मोंके अनुष्ठानसे जिसका अन्तःकरण विशुद्ध हो गया है एवं जो आत्मज्ञानके अभिमुख है, उसकी उस आत्मज्ञानमें जिस प्रकार क्रमसे स्थिति होती है, वह कहनी है, इसलिये कहते हैं—
भाष्य8 paragraphs · खोलें
न द्वेष्टि अकुशलम् अशोभनं काम्यं कर्म शरीरारम्भद्वारेण संसारकारण किम् अनेन इति एवम्।
कुशले शोभने नित्ये कर्मणि सत्त्वशुद्धि-ज्ञानोत्पत्तितन्निष्ठाहेतुत्वेन मोक्षकारणम् इदम् इति एवं न अनुषज्जते तत्र अपि प्रयोजनम् अपश्यन् अनुषङ्गं प्रीतिं न करोति इति एतत्।
कः पुनः असौ, त्यागी पूर्वोक्तेन सङ्गफल-परित्यागेन तद्वान् त्यागी यः कर्मणि सङ्गं त्यक्त्वा तत्फलं च नित्यकर्मानुष्ठायी स त्यागी।
कदा पुनः असौ, अकुशलं कर्म न द्वेष्टि कुशले च न अनुषज्जते इति उच्यते—
सत्त्वसमाविष्टो यदा सत्त्वेन आत्मानात्म-विवेकविज्ञानहेतुना समाविष्टः सव्याप्तः संयुक्त इति एतत्।
अत एव च मेधावी मेधया आत्मज्ञान-लक्षणया प्रज्ञया संयुक्तः तद्वान् मेधावी मेधावित्वाद् एव छिन्नसंशयः छिन्नः अविद्याकृतः संशयो यस्य आत्मस्वरूपावस्थानम् एव परं निःश्रेयससाधन न अन्यत् किञ्चिद् इति एवं निश्चयेन छिन्नसंशयः।
यः अधिकृतः पुरुषः पूर्वोक्तेन प्रकारेण कर्मयोगानुष्ठानेन क्रमेण संस्कृतात्मा सन् जन्मादिविक्रियारहितत्वेन निष्क्रियम् आत्मानम् आत्मत्वेन सम्बुद्धः, सः “सर्वकर्माणि मनसा सन्न्यस्य” “नैव कुर्वन्न कारयन् आसीनः” नैष्कर्म्यलक्षणां ज्ञाननिष्ठाम् अश्नुते।
इति एतत् पूर्वोक्तस्य कर्मयोगस्य प्रयोजनम् अनेन श्लोकेन उक्तम्॥ 10॥
अकुशल—काम्यकर्मोंसे (वह) द्वेष नहीं करता अर्थात् काम्यकर्म पुनर्जन्म देनेवाले होनेके कारण संसारके कारण हैं, इनसे मुझे क्या प्रयोजन है, इस प्रकार उससे द्वेष नहीं करता।
कुशल—शुभ-नित्यकर्मोंमें आसक्त नहीं होता। अर्थात् अन्तःकरणकी शुद्धि, ज्ञानकी उत्पत्ति और उसमें स्थितिके हेतु होनेसे नित्यकर्म मोक्षके कारण हैं, इस प्रकार उनमें आसक्त नहीं होता। यानी उनमें भी अपना कोई प्रयोजन न देखकर प्रीति नहीं करता।
वह कौन है? त्यागी, जो कि पूर्वोक्त आसक्ति और फलके त्यागसे सम्पन्न है अर्थात् कर्मोंमें आसक्ति और उनका फल छोड़कर नित्यकर्मोंका अनुष्ठान करनेवाला है, ऐसा त्यागी।
ऐसा पुरुष किस अवस्थामें, काम्यकर्मोंसे द्वेष नहीं करता और नित्यकर्मोंमें आसक्त नहीं होता? सो कहते हैं—
जब कि वह सात्त्विक भावसे युक्त होता है। अर्थात् आत्म-अनात्मविषयक विवेक-ज्ञानके हेतुस्वरूप सत्त्वगुणसे भरपूर—भली प्रकार व्याप्त होता है।
इसीलिये वह मेधावी है अर्थात् आत्मज्ञानरूप बुद्धिसे युक्त है। मेधावी होनेके कारण ही छिन्नसंशय है—अविद्याजनित संशयसे रहित है। अर्थात् आत्मस्वरूपमें स्थित हो जाना ही परम कल्याणका साधन है, और कुछ नहीं, इस निश्चयके कारण संशयरहित हो चुका है।
जो अधिकारी पुरुष, पूर्वोक्त प्रकारसे कर्मयोगके अनुष्ठानद्वारा क्रमसे विशुद्धान्तःकरण होकर, जन्मादि विकारोंसे रहित और क्रियारहित आत्माको भली प्रकार अपना स्वरूप समझ गया है, वह “समस्त कर्मोंको मनसे त्यागकर” “न कुछ करता और न कराता हुआ रहनेवाला” (आत्मज्ञानी) निष्कर्मतारूप ज्ञाननिष्ठाको भोगता है।
इस प्रकार इस श्लोकद्वारा यह पूर्वोक्त कर्मयोगका फल बतलाया गया है॥ 10॥
यः पुनः अधिकृतः सन् देहात्माभिमानि-त्वेन देहभृद् अज्ञः अवाधितात्मकर्तृत्वविज्ञान-तया अहं कर्ता इति निश्चितबुद्धिः तस्य अशेषकर्मपरित्यागस्य अशक्यत्वात् कर्मफल-त्यागेन चोदितकर्मानुष्ठाने एव अधिकारो न तत्त्यागे इति एतम् अर्थं दर्शयितुम् आह—
परंतु जो पुरुष कर्माधिकारी है और शरीरमें आत्माभिमान रखनेवाला होनेके कारण देहधारी अज्ञानी है, आत्मविषयक कर्तृत्व-ज्ञान नष्ट न होनेके कारण जो “मैं करता हूँ” ऐसी निश्चित बुद्धिवाला है उससे कर्मका अशेष त्याग होना असम्भव होनेके कारण, उसका कर्मफलत्यागके सहित विहित कर्मोंके अनुष्ठानमें ही अधिकार है, उनके त्यागमें नहीं। यह अभिप्राय दिखलानेके लिये कहते हैं—
न हि यस्माद् देहभृता देहं बिभर्ति इति देहभृद् देहात्माभिमानवान् देहभृद् उच्यते न हि विवेकी स हि “वेदाविनाशिनम्” इत्यादिना कर्तृत्वाधिकाराद् निवर्तितः अतः तेन देहभृता अज्ञेन न शक्यं त्यक्तुं सन्न्यसितुं कर्माणि अशेषतो निःशेषेण। कस्माद् यः तु अज्ञः अधिकृतो नित्यानि कर्माणि कुर्वन् कर्मफलत्यागी कर्मफलाभिसन्धिमात्रसन्न्यासी स त्यागी इति अभिधीयते कर्मी अपि सन् इति स्तुत्यभिप्रायेण।
तस्मात् परमार्थदर्शिना एव अदेहभृता देहात्मभावरहितेन अशेषकर्मसन्न्यासः शक्यते कर्तुम्॥ 11॥
देहधारी—देहको धारण करे सो देहधारी, इस व्युत्पत्तिके अनुसार शरीरमें आत्माभिमान रखनेवाला देहभृत् कहा जाता है, विवेकी नहीं। क्योंकि “वेदाविनाशिनम्” इत्यादि श्लोकोंसे वह (विवेकी) कर्तापनके अधिकारसे अलग कर दिया गया है। अतः (यह अभिप्राय समझना चाहिये कि) जिस कारण उस देहधारी-अज्ञानीसे समस्त कर्मोंका पूर्णतया त्याग किया जाना सम्भव नहीं है, इसलिये जो तत्त्वज्ञानरहित अधिकारी, नित्यकर्मोंका अनुष्ठान करता हुआ उन कर्मोंके फलका त्यागी है, अर्थात् कर्मफलकी वासनामात्रको छोड़नेवाला है, वह कर्म करनेवाला होनेपर भी स्तुतिके अभिप्रायसे “त्यागी” कहा जाता है।
सुतरां यह सिद्ध हुआ कि देहात्माभिमानसे रहित परमार्थज्ञानीके द्वारा ही निःशेषभावसे कर्मसंन्यास किया जा सकता है॥ 11॥
किं पुनः तत् प्रयोजनं यत् सर्वकर्मपरित्यागात् स्याद् इति उच्यते—
सर्व कर्मोंका त्याग करनेसे जो फल होता है, वह क्या है? इसपर कहते हैं—
अनिष्टं नरकतिर्यगादिलक्षणम् इष्टं देवादि-लक्षणं मिश्रम् इष्टानिष्टसंयुक्तं मनुष्यलक्षणं च एवं त्रिविधं त्रिप्रकारं कर्मणो धर्माधर्मलक्षणस्य फलम्।
बाह्यानेककारकव्यापारनिष्पन्नं
सद् अविद्याकृतम् इन्द्रजालमायोपमं महामोहकरं प्रत्यगात्मोपसर्पि इव फल्गुतया लयम् अदर्शनं गच्छति इति फलम् इति फलनिर्वचनम्।
तद् एतद् एवं लक्षणं फलं भवति अत्यागिनाम्
अज्ञानां
कर्मिणाम् अपरमार्थसन्न्यासिनां प्रेत्य शरीरपाताद् ऊर्ध्वम्। न तु परमार्थसन्न्यासिनाम् परमहंसपरिव्राजकानां केवलज्ञाननिष्ठानां क्वचित्।
न हि केवलसम्यग्दर्शननिष्ठा अविद्यादि-संसारबीजं
न
उन्मूलयन्ति
कदाचिद् इत्यर्थः॥ 12॥
अनिष्ट—नरक और पशु-पक्षी आदि योनिरूप इष्ट—देवयोनिरूप तथा मिश्र—इष्ट और अनिष्टमिश्रित मनुष्ययोनिरूप, इस प्रकार यह पुण्य-पापरूप कर्मोंका फल तीन प्रकारका होता है।
जो पदार्थ बाह्य कर्ता, कर्म, क्रिया आदि अनेक कारकोंद्वारा निष्पन्न हुआ हो और बाजीगरकी मायाके समान, अविद्याजनित, महामोहकारक हो, एवं जीवात्माके आश्रित-सा प्रतीत होता हो और साररहित होनेके कारण तत्काल ही लय—नष्ट हो जाता हो, उसका नाम फल है। यह फल शब्दकी व्याख्या है।
ऐसा यह तीन प्रकारका फल, अत्यागियोंको अर्थात् परमार्थसंन्यास न करनेवाले कर्मनिष्ठ अज्ञानियोंको ही, मरनेके पीछे मिलता है। केवल ज्ञाननिष्ठामें स्थित परमहंस-परिव्राजक वास्तविक संन्यासियोंको, कभी नहीं मिलता।
क्योंकि (वे) केवल सम्यग्ज्ञाननिष्ठ पुरुष, संसारके बीजरूप अविद्यादि दोषोंका मूलोच्छेद नहीं करते, ऐसा कभी नहीं हो सकता॥ 12॥
अतः परमार्थदर्शिन एव अशेषकर्मसन्न्यासित्वं सम्भवति अविद्याध्यारोपितत्वाद् आत्मनि क्रियाकारकफलानां न तु अज्ञस्य अधिष्ठानादीनि क्रियाकर्तृ ृणि कारकाणि आत्मत्वेन पश्यतः अशेषकर्मसन्न्यासः सम्भवति। तद् एतद् उत्तरैः श्लोकैः दर्शयति—
इसलिये क्रिया, कारक और फल आदि आत्मामें अविद्यासे आरोपित होनेके कारण परमार्थदर्शी (आत्माज्ञानी) ही सम्पूर्ण कर्मोंका अशेषतः त्यागी हो सकता है। कर्म करनेवाले अधिष्ठान (शरीर) कर्ता-क्रिया आदि कारणोंको, आत्मभावसे देखनेवाला अज्ञानी, सम्पूर्ण कर्मोंका अशेषतः त्याग नहीं कर सकता। यह बात अगले श्लोकसे दिखलाते हैं—
पञ्च इमानि वक्ष्यमाणानि हे महाबाहो कारणानि निर्वर्तकानि निबोध मे मम इति।
उत्तरत्र
चेतःसमाधानार्थं
वस्तुवैषम्य-प्रदर्शनार्थं च तानि कारणानि ज्ञातव्यतया स्तौति।
साङ्ख्ये ज्ञातव्याः पदार्थाः सङ्ख्यायन्ते यस्मिन् शास्त्रे तत् साङ्ख्यं वेदान्तः। कृतान्ते इति तस्य एव विशेषणं कृतम् इति कर्म उच्यते तस्य अन्तः कृतस्य परिसमाप्तिः यत्र स कृतान्तः कर्मान्त इति एतत्। “यावानर्थं उदपाने” “सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते” इति आत्मज्ञाने सञ्जाते सर्वकर्मणां निवृत्तिं दर्शयति।
अतः तस्मिन् आत्मज्ञानार्थे साङ्ख्ये कृतान्ते वेदान्ते प्रोक्तानि कथितानि सिद्धये निष्पत्त्यर्थं सर्वकर्मणाम्॥ 13॥
हे महाबाहो! इन आगे कहे जानेवाले पाँच कारणोंको अर्थात् कर्मके साधनोंको, तू मुझसे जान।
अगले उपदेशमें अर्जुनके चित्तको लगानेके लिये और अधिष्ठानादिके ज्ञानकी कठिनता दिखानेके लिये, उन पाँचों कारणोंको जाननेयोग्य बतलाकर, उनकी स्तुति करते हैं।
जिस शास्त्रमें जाननेयोग्य पदार्थोंकी संख्या (गणना) की जाय उसका नाम सांख्य अर्थात् वेदान्त है। कृतान्त भी उसीका विशेषण है। “कृत” कर्मको कहते हैं, जहाँ उसका अन्त अर्थात् जहाँ कर्मोंकी समाप्ति हो जाती है वह “कृतान्त” है—यानी कर्मोंका अन्त है। “यावानर्थ उदपाने” “सर्व कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते” इत्यादि वचन भी आत्मज्ञान उत्पन्न होनेपर समस्त कर्मोंकी निवृत्ति दिखलाते हैं।
इसलिये (कहते हैं कि) उस आत्मज्ञानप्रद कृतान्त—सांख्यमें यानी वेदान्तशास्त्रमें समस्त कर्मोंकी सिद्धिके लिये कहे हुए (उन पाँच कारणोंको तू मुझसे सुन)॥ 13॥
कानि तानि इति उच्यते—
वे (पाँच कारण) कौन-से हैं! सो बतलाते हैं—
अधिष्ठानम् इच्छाद्वेषसुखदुःखज्ञानादीनाम् अभिव्यक्तेः आश्रयः अधिष्ठानं शरीरम् तथा कर्ता उपाधिलक्षणो भोक्ता, करणं च श्रोत्रादिकं सङ्ख्यम्, विविधाः च पृथक् चेष्टा वायवीयाः प्राणापानाद्याः, दैवं च एव दैवम् एव च अत्र एतेषु चतुर्षु पञ्चमं पञ्चानां पूरणम् आदित्यादि चक्षुराद्यनुग्राहकम्॥ 14॥
अधिष्ठान—इच्छा-द्वेष, सुख-दुःख और ज्ञान आदिकी अभिव्यक्तिका आश्रय शरीर, कर्ता— उपाधिस्वरूप भोक्ता जीव, भिन्न-भिन्न प्रकारके कारण—शब्दादि विषयोंको ग्रहण करनेवाले श्रोत्रादि अलग-अलग बारह करण, नाना प्रकारकी चेष्टाएँ—श्वास-प्रश्वास आदि अलग-अलग वायुसम्बन्धी क्रियाएँ और इन चारोंके साथ पाँचवाँ—पाँचकी संख्याको पूर्ण करनेवाला कारण दैव है। अर्थात् चक्षु आदि इन्द्रियोंके अनुग्राहक सूर्यादि देव हैं॥ 14॥
भाष्य6 paragraphs · खोलें
शरीरवाङ्मनोभिः यत् कर्म त्रिभिः एतैः प्रारभते निर्वर्तयति नरो न्याय्यं वा धर्म्यं शास्त्रीयम्, विपरीतं वा अशास्त्रीयम् अधर्म्यम्। यत् च अपि निमिषितचेष्टादि जीवनहेतुः तद् अपि पूर्वकृतधर्माधर्मयोः
एव
कार्यम्
इति न्याय्यविपरीतयोः एव ग्रहणेन गृहीतम्। पञ्च एते यथोक्ताः तस्य सर्वस्य एव कर्मणो हेतवः कारणानि।
ननु अधिष्ठानादीनि सर्वकर्मणां कारणानि कथम् उच्यते शरीरवाङ्मनोभिः कर्म प्रारभते इति।
न एष दोषः, विधिप्रतिषेधलक्षणं सर्वं कर्म शरीरादित्रयप्रधानं तथा दर्शनश्रवणादि च जीवनलक्षणं त्रिधा एव राशीकृतम् उच्यते शरीरादिभिः आरभते इति, फलकाले अपि तत्प्रधानैः भुज्यते इति पञ्चानाम् एव हेतुत्वं न विरुध्यते॥ 15॥
मन, वाणी और शरीरसे अर्थात् इन तीनोंके द्वारा; मनुष्य जो कुछ न्याययुक्त—धर्ममय-शास्त्रीय अथवा धर्म-विरुद्ध—अशास्त्रीय कर्म करता है, उन सबके ये उपर्युक्त पाँच हेतु यानी कारण हैं। जीवनके लिये जो कुछ आँख खोलने-मूँदने आदिकी भी चेष्टाएँ की जाती हैं, वे भी, पहले किये हुए पुण्य और पापका ही परिणाम हैं। अतः न्याय और विपरीत (अन्याय)-के ग्रहणसे ऐसी समस्त चेष्टाओंका भी ग्रहण हो जाता है।
पू0—जब कि अधिष्ठानादि ही समस्त कर्मोंके कारण हैं, तब यह कैसे कहा जाता है कि मन, वाणी और शरीरसे कर्म करता है?
उ0—यह दोष नहीं है। विहित और निषेधरूप सारे कर्म शरीर, वाणी और मन इन्हीं तीनोंकी प्रधानतासे होनेवाले हैं, तथा देखना-सुनना आदि जीवननिमित्तक चेष्टाएँ भी उन्हीं कर्मोंकी अङ्गभूत हैं, इसलिये समस्त कर्मोंको तीन भागोंमें बाँटकर ऐसा कहते हैं कि जो कुछ भी शरीर आदिद्वारा कर्म करता है; (क्योंकि) फलभोगके समय भी शरीर आदि प्रधान कारणोंद्वारा ही फल भोगा जाता है। सुतरां उपर्युक्त अधिष्ठानादि पाँच कारणोंकी हेतुता ठीक है, इसमें विरोध नहीं है॥ 15॥
भाष्य3 paragraphs · खोलें
तत्र इति प्रकृतेन संबध्यते, एवं सति, एवं यथोक्तैः पञ्चभिः हेतुभिः निर्वर्त्ये सति कर्मणि। *तत्र एवं सति इति दुर्मतित्वस्य हेतुत्वेन संबध्यते। तत्र तेषु आत्मानम् अनन्यत्वेन अविद्यया परिकल्प्य तैः क्रियमाणस्य कर्मणः अहम् एव कर्ता इति कर्तारम् आत्मानं केवलं शुद्धं तु यः पश्यति अविद्वान्, कस्मात्, वेदान्ताचार्योपदेशन्यायैः अकृतबुद्धित्वाद् असंस्कृतबुद्धित्वात्।
यः अपि देहादिव्यतिरिक्तात्मवादी अन्यम् आत्मानम् एव केवलं कर्तारं पश्यति असौ अपि अकृतबुद्धिः एव अतः अकृतबुद्धित्वाद् न स पश्यति आत्मनः तत्त्वं कर्मणो वा इत्यर्थः।
अतः दुर्मतिः कुत्सिता विपरीता दुष्टा अजस्त्रं जननमरणप्रतिपत्तिहेतुभूता मतिः अस्य इति दुर्मतिः स पश्यन् अपि न पश्यति, यथा तैमिरिकः अनेकं चन्द्रम्, यथा वा अभ्रेषु धावत्सु चन्द्रं धावन्तम्, यथा वा वाहने उपविष्टः अन्येषु धावत्सु आत्मानं धावन्तम्॥ 16॥
“तत्र” शब्द प्रकरणसे सम्बन्ध जोड़ता है। ऐसा होनेसे, यानी पहले बतलाये हुए पाँच कारणोंद्वारा ही समस्त कर्म सिद्ध होते हैं, इसलिये, जो अज्ञानी पुरुष, वेदान्त और आचार्यके उपदेशद्वारा तथा तर्कद्वारा संस्कृतबुद्धि न होनेके कारण, उन अधिष्ठानादि पाँचों कारणोंके साथ अविद्यासे आत्माकी एकता मानकर, उनके द्वारा किये हुए कर्मोंका “मैं ही कर्ता हूँ” इस प्रकार केवल—शुद्ध आत्माको (उन कर्मोंका) कर्ता समझता है, (वह वास्तवमें कुछ भी नहीं समझता)।
तथा आत्माको शरीरादिसे अलग माननेवाला भी, जो शरीरादिसे अलग केवल आत्माको ही कर्ता समझता है, वह भी अकृतबुद्धि ही है। अतः असंस्कृतबुद्धि होनेके कारण वह भी वास्तवमें आत्माका या कर्मका तत्त्व नहीं समझता, यह अभिप्राय है।
इसलिये वह दुर्बुद्धि है। जिसकी बुद्धि कुत्सित, विपरीत, दुष्ट और बारम्बार जन्म-मरण देनेमें कारणरूप हो उसे दुर्बुद्धि कहते हैं; ऐसा मनुष्य देखता हुआ भी वास्तवमें नहीं देखता। जैसे तिमिररोगवाला अनेक चन्द्र देखता है, या जैसे बालक दौड़ते हुए बादलोंमें चन्द्रमाको दौड़ता हुआ देखता है, अथवा जैसे (पालकी आदि) किसी सवारीपर चढ़ा हुआ मनुष्य दूसरोंके चलनेमें अपना चलना समझता है (वैसे ही उसका समझना है)॥ 16॥
कः पुनः सुमतिः यः सम्यक् पश्यति इति उच्यते—
तो फिर जो वास्तवमें देखता है (ऐसा) सुबुद्धि कौन है? इसपर कहते हैं—
भाष्य23 paragraphs · खोलें
यस्य शास्त्राचार्योपदेशन्यायसंस्कृतात्मनो न भवति अहङ्कृतः अहं कर्ता इति एवं लक्षणो भावो भावना प्रत्यय एते एव पञ्चाधिष्ठानादयः अविद्यया आत्मनि कल्पिताः सर्वकर्मणां कर्तारो न अहम्, अहं तु तद्व्यापाराणां साक्षिभूतः “अप्राणो ह्यमनाः शुभोऽक्षरात्परतः परः” (मु0 उ0 2। 1। 2) केवलः अविक्रिय इति एवं पश्यति इति एतत्।
बुद्धिः अन्तःकरणं यस्य आत्मन उपाधिभूता न लिप्यते न अनुशायिनी भवति इदम् अहम् अकार्षं तेन अहं नरकं गमिष्यामि इति एवं यस्य बुद्धिः न लिप्यते स सुमतिः स पश्यति।
हत्वा अपि स इमान् लोकान् सर्वान् प्राणिन इत्यर्थः। न हन्ति हननक्रियां न करोति न निबध्यते न अपि तत्कार्येण अधर्मफलेन सम्बध्यते।
ननु हत्वा अपि न हन्ति इति विप्रतिषिद्धम् उच्यते यद्यपि स्तुतिः।
न एष दोषः, लौकिकपारमार्थिकदृष्ट्यपेक्षया तदुपपत्तेः।
देहाद्यात्मबुद्ध्या हन्ताहम् इति लौकिकीं दृष्टिम् आश्रित्य हत्वा अपि इति आह, यथादर्शितां पारमार्थिकीं दृष्टिम् आश्रित्य न हन्ति न निबध्यते इति तद् उभयम् उपपद्यते एव।
ननु अधिष्ठानादिभिः सम्भूय करोति एव आत्मा “कर्तारमात्मानं केवलं तु” इति केवल-शब्दप्रयोगात्।
न एष दोषः आत्मनः अविक्रियस्वभावत्वे अधिष्ठानादिभिः संहतत्वानुपपत्तेः।
विक्रियावतो हि अन्यैः संहननं सम्भवति संहत्य वा कर्तृत्वं स्यात्।
न तु अविक्रियस्य आत्मनः केनचित् संहननम् अस्ति इति न सम्भूय कर्तृत्वम् उपपद्यते। अतः केवलत्वम् आत्मनः स्वाभाविकम् इति केवलशब्दः अनुवादमात्रम्।
अविक्रियत्वं च आत्मनः श्रुतिस्मृतिन्याय-प्रसिद्धम्। “अविकार्योऽयमुच्यते,” “गुणैरेव कर्माणि क्रियन्ते”, “शरीरस्थोऽपि न करोति” इत्यादि असकृद् उपपादितं गीतासु एव तावत्। श्रुतिषु च “ध्यायतीव” “लेलायतीव” (छा0 उ0 7। 6। 1) इति एवम् आद्यासु।
न्यायतः च निरवयवम् अपरतन्त्रम् अविक्रियम् आत्मतत्त्वम् इति राजमार्गः।
विक्रियावत्त्वाभ्युपगमे
अपि
आत्मनः स्वकीया एव विक्रिया स्वस्य भवितुम् अर्हति।
न
अधिष्ठानादीनां
कर्माणि आत्मकर्तृकाणि स्युः। न हि परस्य कर्म परेण अकृतम् आगन्तुम् अर्हति। यत् तु अविद्यया गमितं न तत् तस्य।
यथा रजतत्वं न शुक्तिकायाः। यथा वा तलमलवत्त्वं बालैः गमितम् अविद्यया न आकाशस्य। तथा अधिष्ठानादिविक्रिया अपि तेषाम् एव इति न आत्मनः।
तस्माद् युक्तम् उक्तम् अहङ्कृतत्वबुद्धि-लेपाभावाद् विद्वान् न हन्ति न निबध्यते इति।
“नायं हन्ति न हन्यते” इति प्रतिज्ञाय “न जायते” इत्यादिहेतुवचनेन अविक्रियत्वम् आत्मन उक्त्वा “वेदाविनाशिनम्” इति विदुषः कर्माधिकारनिवृत्तिं शास्त्रादौ सङ्क्षेपत उक्त्वा मध्ये प्रसारितां च तत्र तत्र प्रसङ्गं कृत्वा इह उपसंहरति शास्त्रार्थपिण्डीकरणाय विद्वान् न हन्ति न निबध्यते इति।
एवं च सति देहभृत्त्वाभिमानानुपपत्तौ अविद्याकृताशेषकर्मसन्न्यासोपपत्तेः सन्न्यासिनाम् अनिष्टादि त्रिविधं कर्मणः फलं न भवति इति उपपन्नं तद्विपर्ययात् च इतरेषां भवति इति एतत् च अपरिहार्यम् इति एष गीताशास्त्रस्य अर्थ उपसंहृतः।
स एष सर्ववेदार्थसारो निपुणमतिभिः पण्डितैः विचार्य प्रतिपत्तव्य इति तत्र तत्र प्रकरणविभागेन दर्शितः अस्माभिः शास्त्र-न्यायानुसारेण॥ 17॥
शास्त्र और आचार्यके उपदेशसे तथा न्यायसे जिसका अन्तःकरण भली प्रकार शुद्ध संस्कृत हो गया है, ऐसे जिस पुरुषके अन्तःकरणमें “मैं कर्ता हूँ” इस प्रकारकी भावना—प्रतीति नहीं होती, जो ऐसा समझता है कि “अविद्यासे आत्मामें अध्यारोपित, ये अधिष्ठानादि पाँच हेतु ही समस्त कर्मोंके कर्ता हैं, मैं नहीं हूँ, मैं तो केवल उनके व्यापारोंका साक्षीमात्र “प्राणोंसे रहित, मनसे रहित, शुद्ध, श्रेष्ठ अक्षरसे भी पर” केवल और अक्रिय आत्मस्वरूप हूँ।”
तथा जिसकी बुद्धि यानी आत्माका उपाधिस्वरूप अन्तःकरण, लिप्त नहीं होता—अनुताप नहीं करता, यानी “मैंने अमुक कार्य किया है उससे मुझे नरकमें जाना पड़ेगा” इस प्रकार जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती; वह सुबुद्धि है; वही वास्तवमें देखता है।
ऐसा ज्ञानी इन समस्त लोकोंको अर्थात् सब प्राणियोंको मारकर भी (वास्तवमें) नहीं मारता अर्थात् हननक्रिया नहीं करता और उसके परिणामसे अर्थात् पापके फलसे भी नहीं बँधता।
पू0—यद्यपि यह (ज्ञानकी) स्तुति है, तो भी यह कहना सर्वथा विपरीत है कि “मारकर भी नहीं मारता।”
उ0—यह दोष नहीं है, क्योंकि लौकिक और पारमार्थिक इन दो दृष्टियोंकी अपेक्षासे ऐसा कहना बन सकता है।
शरीर आदिमें आत्मबुद्धि करके “मैं मारनेवाला हूँ” ऐसा माननेवाले लौकिक मनुष्योंकी दृष्टिका आश्रय लेकर “मारकर भी” यह कहा है और पूर्वोक्त पारमार्थिक दृष्टिका आश्रय लेकर “न मारता है और न बँधता है” यह कहा है। इस प्रकार ये दोनों कथन बन सकते हैं।
पू0—“कर्तारमात्मानं केवलं तु” इस कथनमें केवल-शब्दका प्रयोग होनेसे यह पाया जाता है कि आत्मा (अकेला कर्म नहीं करता, पर) अधिष्ठान आदि अन्य हेतुओंके साथ सम्मिलित होकर निःसंदेह कर्म करता है।
उ0—यह दोष नहीं है, क्योंकि अविक्रिय-स्वभाववाला होनेके कारण, आत्माका अधिष्ठानादिसे संयुक्त होना नहीं बन सकता।
विकारवान् वस्तुका ही अन्य पदार्थोंके साथ संघात हो सकता है और विकारी पदार्थ ही संहत होकर कर्ता बन सकता है।
निर्विकार आत्माका, न तो किसीके साथ संयोग हो सकता है और न संयुक्त होकर उसका कर्तृत्व ही बन सकता है। इसलिये (यह समझना चाहिये कि) आत्माका केवलत्व स्वाभाविक है, अतः यहाँ “केवल” शब्दका अनुवादमात्र किया गया है।
आत्माका अविक्रियत्व श्रुति-स्मृति और न्यायसे प्रसिद्ध है। गीतामें भी “यह विकाररहित कहलाता है” “सब कर्म गुणोंसे ही किये जाते हैं” “आत्मा शरीरमें स्थित हुआ भी नहीं करता” इत्यादि वाक्योंद्वारा अनेक बार प्रतिपादित है और “मानो ध्यान करता है” मानो चेष्टा करता है” इस प्रकारकी श्रुतियोंमें भी प्रतिपादित है।
तथा न्यायसे भी यही सिद्ध होता है, क्योंकि आत्मतत्त्व अवयवरहित, स्वतन्त्र और विकाररहित है। ऐसा मानना ही राजमार्ग है।
यदि आत्माको विकारवान् मानें तो भी इसका स्वकीय विकार ही अपना हो सकता है। अधिष्ठानादिके किये हुए कर्म आत्मकर्तृक नहीं हो सकते; क्योंकि अन्यके कर्मोंको बिना किये ही अन्यके पल्ले बाँध देना उचित नहीं है। जो अविद्यासे आरोपित किये जाते हैं, वे वास्तवमें उसके नहीं होते।
जैसे सीपमें आरोपित चाँदीपन सीपका नहीं होता एवं जैसे मूर्खोंद्वारा आकाशमें आरोपित की हुई तलमलीनता आकाशकी नहीं हो सकती, वैसे ही अधिष्ठानादि पाँच हेतुओंके विकार भी उनके ही हैं, आत्माके नहीं।
सुतरां यह ठीक ही कहा है कि “मैं कर्ता हूँ” ऐसी भावनाका और बुद्धिके लेपका अभाव होनेके कारण, पूर्ण ज्ञानी “न मारता है और न बँधता है।”
दूसरे अध्यायमें “यह आत्मा न मारता है और न मारा जाता है” इस प्रकार प्रतिज्ञा करके, “न जायते” इत्यादि हेतुयुक्त वचनोंसे आत्माका अविक्रियत्व बतलाकर, फिर “वेदाविनाशिनम्” इस श्लोकसे उपदेशके आदिमें विद्वान्के लिये संक्षेपमें कर्माधिकारकी निवृत्ति कहकर, जगह-जगह, प्रसङ्ग लाकर बीच-बीचमें जिसका विस्तार किया गया है, ऐसी कर्माधिकारकी निवृत्तिका, अब शास्त्रके अर्थका संग्रह करनेके लिये “विद्वान् न मारता है और न बँधता है” इस कथनसे उपसंहार करते हैं।
सुतरां यह सिद्ध हुआ कि विद्वान्में देहधारी-पनका अभिमान न होनेके कारण उसके अविद्याकर्तृक समस्त कर्मोंका संन्यास हो सकता है, इसलिये संन्यासियोंको अनिष्ट आदि तीन प्रकारके कर्मफल नहीं मिलते। साथ ही यह भी अनिवार्य है कि दूसरे (कर्माधिकारी) इससे विपरीत होते हैं। इस कारण तीन प्रकारके कर्मफल (अवश्य) मिलते हैं। इस प्रकार यह गीताशास्त्रके अर्थका उपसंहार किया गया।
ऐसा यह समस्त वेदोंके अर्थका सार, निपुण-बुद्धिवाले पण्डितोंद्वारा विचारपूर्वक धारण किया जाने योग्य है। इस विचारसे हमने जगह-जगह प्रकरणोंका विभाग करके, शास्त्र-न्यायानुसार इस तत्त्वको दिखलाया है॥ 17॥
अथ इदानीं कर्मणां प्रवर्तकम् उच्यते—
इस प्रकार शास्त्रके आशयका उपसंहार करके अब कर्मोंका प्रवर्तक बतलाया जाता है—
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ज्ञानं ज्ञायते अनेन इति सर्वविषयम् अविशेषेण उच्यते। तथा ज्ञेयं ज्ञातव्यं तद् अपि सामान्येन एव सर्वम् उच्यते। तथा परिज्ञाता उपाधिलक्षणः अविद्याकल्पितो भोक्ता इति एतत् त्रयम् एषाम् अविशेषेण सर्वकर्मणां प्रवर्तिका त्रिविधा त्रिप्रकारा कर्मचोदना।
ज्ञानादीनां हि त्रयाणां सन्निपाते हानो-पादानादिप्रयोजनः सर्वकर्मारम्भः स्यात्।
ततः पञ्चभिः अधिष्ठानादिभिः आरब्धं वाङ्मनःकायाश्रयभेदेन त्रिधा राशीभूतं त्रिषु करणादिषु सङ्गृह्यते इति एतद् उच्यते—
करणं क्रियते अनेन इति बाह्यं श्रोत्रादि, अन्तःस्थं बुद्ध्यादि, कर्म ईप्सिततमं कर्तुः क्रियया व्याप्यमानम्, कर्ता करणानां व्यापारयिता उपाधिलक्षण
इति
त्रिविधः
त्रिप्रकारः कर्मसङ्ग्रहः।
सङ्गृह्यते अस्मिन् इति सङ्ग्रहः कर्मणः सङ्ग्रहः कर्मसङ्ग्रहः। कर्म एषु हि त्रिषुः समवैति तेन अयं त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः॥ 18॥
ज्ञान—जिसके द्वारा कोई पदार्थ जाना जाय। यहाँ ज्ञान शब्दसे सामान्य भावसे सर्व पदार्थविषयक ज्ञान कहा गया है। वैसे ही ज्ञेय अर्थात् जाननेमें आनेवाला पदार्थ, यह भी सामान्य भावसे समस्तका ही वर्णन है। तथा परिज्ञाता अर्थात् उपाधियुक्त अविद्याकल्पित भोक्ता, इस प्रकार जो यह इन तीनोंका समुदाय है, यही सामान्य भावसे समस्त कर्मोंकी प्रवर्तक तीन प्रकारकी “कर्मचोदना” है।
क्योंकि उक्त ज्ञान आदि तीनोंके सम्मिलित होनेपर ही त्याग और ग्रहण आदि जिनके प्रयोजन हैं, ऐसे समस्त कर्मोंका आरम्भ होता है।
अब अधिष्ठानादि पाँच हेतुओंसे जिसकी उत्पत्ति है तथा मन, वाणी और शरीररूप आश्रयोंके भेदसे जिसके तीन वर्ग किये गये हैं, ऐसे समस्त कर्म, करण आदि तीन कारकोंमें संगृहीत हैं। यह बात बतलायी जाती है—
“करण”—जिसके द्वारा कर्म किया जाय, अर्थात् श्रोत्रादि दस बाह्य इन्द्रियाँ और बुद्धि आदि चार अन्तःकरण। “कर्म”—जो कर्ताका अत्यन्त इष्ट हो और क्रियाद्वारा सम्पादन किया जाय। “कर्ता”— श्रोत्रादि करणोंको अपने-अपने व्यापारमें नियुक्त करनेवाला उपाधिस्वरूप जीव। इस प्रकार यह त्रिविध “कर्मसंग्रह” है।
जिनमें कुछ संगृहीत किया जाय उसका नाम संग्रह है, अतः कर्मोंके संग्रहका नाम कर्मसंग्रह है; क्योंकि इन तीन कारकोंमें ही कर्म संगृहीत है। इसलिये यह तीन प्रकारका कर्मसंग्रह है॥ 18॥
अथ इदानीं क्रियाकारकफलानां सर्वेषां गुणात्मकत्वात् सत्त्वरजस्तमोगुणभेदतः त्रिविधो भेदो वक्तव्य इति आरभ्यते—
क्रिया, कारक और फल सभी त्रिगुणात्मक हैं, अतः सत्त्व, रज और तम इन तीनों गुणोंके भेदसे उन सबका त्रिविध भेद बतलाना है। सो आरम्भ करते हैं—
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ज्ञानं कर्म च, कर्म क्रिया, न कारकं पारि-भाषिकम् ईप्सिततमं कर्म, कर्ता च निर्वर्तकः क्रियाणां त्रिधा एव अवधारणं गुणव्यतिरिक्त-जात्यन्तराभावप्रदर्शनार्थं गुणभेदतः सत्त्वादि-भेदेन इत्यर्थः, प्रोच्यते कथ्यते गुणसङ्ख्याने कापिले शास्त्रे,
तद् अपि गुणसङ्ख्यानं शास्त्रं गुणभोक्तृ-विषये प्रमाणम् एव परमार्थब्रह्मैकत्वविषये यद्यपि विरुध्यते।
ते हि कापिला गुणगौणव्यापारनिरूपणे अभियुक्ता इति तत् शास्त्रम् अपि वक्ष्यमाणार्थ-स्तुत्यर्थत्वेन उपादीयते इति न विरोधः।
यथावद् यथान्यायं यथाशास्त्रं शृणु तानि अपि ज्ञानादीनि तद्भेदजातानि गुणभेदकृतानि शृणु वक्ष्यमाणे अर्थे मनःसमाधिं कुरु इत्यर्थः॥ 19॥
यहाँ कर्म शब्दका अर्थ क्रिया है, कर्ताका अत्यन्त इष्ट पारिभाषिक शब्द कारकरूप कर्म नहीं। ज्ञान, कर्म और कर्ता अर्थात् क्रिया करनेवाला—ये तीनों ही, गुणोंकी संख्या करनेवाले शास्त्रोंमें अर्थात् कपिलमुनिप्रणीत शास्त्रमें गुणोंके भेदसे यानी सात्त्विक आदि भेदसे, प्रत्येक तीन-तीन प्रकारके बतलाये गये हैं। यहाँ त्रिधाके साथ एव शब्द जोड़कर यह आशय प्रकट किया गया है कि उक्त तीनों पदार्थ गुणोंसे अतिरिक्त अन्य जातिके नहीं हैं।
वह गुणोंकी संख्या करनेवाला कापिलशास्त्र यद्यपि परमार्थ-ब्रह्मकी एकताके विषयमें (भगवान्के सिद्धान्तसे) विरुद्ध है तो भी गुणोंके भोक्ता (जीव)-के विषयमें तो प्रमाण है ही।
वे कापिलसांख्यके अनुयायी, गुण और गुणके व्यापारका निरूपण करनेमें निपुण हैं। इसलिये उनका शास्त्र भी आगे कहे हुए अभिप्रायकी स्तुति करनेके लिये प्रमाणरूपसे ग्रहण किया जाता है, सुतरां कोई विरोध नहीं है।
उनको अर्थात् ज्ञान, कर्म और कर्ताको तथा गुणोंके अनुसार किये हुए उनके सात्त्विक आदि समस्त भेदोंको, तू यथावत्—जैसा शास्त्रमें न्यायानुसार कहा है उसी प्रकार सुन; अर्थात् आगे कही जानेवाली बातमें चित्त लगा॥ 19॥
ज्ञानस्य तु तावत् त्रिविधत्वम् उच्यते—
पहले (तीन श्लोकोंद्वारा) ज्ञानके तीन भेद कहे जाते हैं।
सर्वभूतेषु अव्यक्तादिस्थावरान्तेषु भूतेषु येन ज्ञानेन एकं भावं वस्तु भावशब्दो वस्तुवाची एकम् आत्मवस्तु इत्यर्थः। अव्ययं न व्येति स्वात्मना धर्मैः वा कूटस्थनित्यम् इत्यर्थः। ईक्षते येन ज्ञानेन पश्यति।
तं च भावम् अविभक्तं प्रतिदेहं विभक्तेषु देहभेदेषु न विभक्तं तद् आत्मवस्तु व्योमवद् निरन्तरम् इत्यर्थः। तद् ज्ञानम् अद्वैतात्मदर्शनं सात्त्विकं सम्यग्दर्शनं विद्धि इति।
यानि
द्वैतदर्शनानि
असम्यग्भूतानि राजसानि तामसानि च इति न साक्षात् संसारोच्छित्तये भवन्ति॥ 20॥
जिस ज्ञानके द्वारा मनुष्य अव्यक्तसे लेकर स्थावरपर्यन्त समस्त भूतोंमें एकभाव—एक आत्मवस्तु, जो कि अपने स्वरूपसे या धर्मसे कभी क्षय नहीं होता, ऐसा अविनाशी और कूटस्थ नित्यतत्त्व देखता है। यहाँ भाव शब्द वस्तु-वाचक है।
तथा (जिस ज्ञानके द्वारा) उस आत्मतत्त्वको अलग-अलग प्रत्येक शरीरमें विभागरहित अर्थात् आकाशके समान समभावसे स्थित देखता है, उस ज्ञानको अर्थात् अद्वैतभावसे आत्मसाक्षात्कार कर लेनेको तू सात्त्विक ज्ञानपूर्ण ज्ञान जान।
जो द्वैतदर्शनरूप अयथार्थ ज्ञान है, वे राजस-तामस हैं, अतः वे संसारका उच्छेद करनेमें साक्षात् हेतु नहीं हैं॥ 20॥
पृथक्त्वेन तु भेदेन प्रतिशरीरम् अन्यत्वेन यद् ज्ञानं नानाभावान् भिन्नान् आत्मनः पृथग्विधान् पृथक्प्रकारान् भिन्नलक्षणान् इत्यर्थः। वेत्ति विजानाति यद् ज्ञानं सर्वेषु भूतेषु। ज्ञानस्य कर्तृत्वासम्भवाद् येन ज्ञानेन वेत्ति इत्यर्थः तद् ज्ञानं विद्धि राजसं रजोनिर्वृत्तम्॥ 21॥
और जो ज्ञान, सम्पूर्ण भूतोंमें भिन्न-भिन्न प्रकारके भिन्न-भिन्न भावोंको, आत्मासे अलग विलक्षण पृथक्-रूपसे देखता है, अर्थात् प्रत्येक शरीरमें अलग-अलग अपनेसे दूसरा आत्मा समझता है, उस ज्ञानको तू राजस यानी रजोगुणसे उत्पन्न हुआ जान। ज्ञानमें कर्तापन होना असम्भव है, इसलिये “जो ज्ञान देखता है” इसका आशय यह है कि “जिस ज्ञानके द्वारा मनुष्य देखता है”॥ 21॥
यत् तु ज्ञानं कृत्स्नवत् समस्तवत् सर्वविषयम् इव एकस्मिन् कार्ये देहे बहिः वा प्रतिमादौ सक्तम् एतावान् एव आत्मा ईश्वरो वा न अतः परम् अस्ति इति यथा नग्नक्षपणकादीनां शरीरानुवर्ती देहपरिमाणो जीव ईश्वरो वा पाषाणदार्वादिमात्र इति एवम् एकस्मिन् कार्ये सक्तम्।
अहैतुकं हेतुवर्जितं निर्युक्तिकम् अतत्त्वार्थवद् यथाभूतः अर्थः तत्त्वार्थः सः अस्य ज्ञेयभूतः अस्ति इति तत्त्वार्थवद् न तत्त्वार्थवद् अतत्त्वार्थ-वद् अहेतुकत्वाद् एव अल्पं च अल्पविषय-त्वाद् अल्पफलत्वाद् वा तत् तामसम् उदाहृतम्। तामसानां हि प्राणिनाम् अविवेकिनाम् ईदृशं ज्ञानं दृश्यते॥ 22॥
जो ज्ञान, किसी एक कार्यमें, शरीरमें या शरीरसे बाहर प्रतिमादिमें, सर्ववस्तुविषयक सम्पूर्ण ज्ञानकी भाँति आसक्त है, अर्थात् (यह समझता है कि) यह आत्मा या ईश्वर इतना ही है इससे परे और कुछ भी नहीं है, जैसे दिगम्बर जैनियोंका (माना हुआ) आत्मा शरीरमें रहनेवाला और शरीरके बराबर है और पत्थर या काष्ठ (की प्रतिमा)-मात्र ही ईश्वर है, इसी प्रकार जो ज्ञान किसी एक कार्यमें ही आसक्त है।
तथा जो हेतुरहित—युक्तिरहित और तत्त्वार्थसे भी रहित है। यथार्थ अर्थका नाम तत्त्वार्थ है, ऐसा तत्त्वार्थ जिस ज्ञानका ज्ञेय हो, वह ज्ञान तत्त्वार्थयुक्त होता है और जो तत्त्वार्थयुक्त न हो वह अतत्त्वार्थवत् अर्थात् तत्त्वार्थसे रहित होता है। एवं जो हेतुरहित होनेके कारण ही अल्प है अथवा अल्पविषयक होनेसे या अल्प फलवाला होनेसे अल्प है, वह ज्ञान तामस कहा गया है; क्योंकि अविवेकी तामसी प्राणियोंमें ही ऐसा ज्ञान देखा जाता है॥ 22॥
अथ कर्मणः त्रैविध्यम् उच्यते—
अब कर्मके तीन भेद कहे जाते हैं—
नियतं नित्यं सङ्गरहितम् आसक्तिवर्जितम्। अरागद्वेषतः कृतं रागप्रयुक्तेन द्वेषप्रयुक्तेन च कृतं रागद्वेषतः कृतं तद्विपरीतं कृतम् अराग-द्वेषतः कृतम् अफलप्रेप्सुना फलं प्रेप्सति इति फलप्रेप्सुः फलतृष्णः तद्विपरीतेन अफल-प्रेप्सुना कर्त्रा कृतं कर्म यत् तत् सात्त्विकम् उच्यते॥ 23॥
जो कर्म नियत—नित्य है तथा सङ्ग—आसक्तिसे रहित है और फल न चाहनेवाले पुरुषद्वारा बिना राग-द्वेषके किया गया है, वह सात्त्विक कहा जाता है। जो कर्म रागसे या द्वेषसे प्रेरित होकर किया जाता है, वह राग-द्वेषसे किया हुआ कहलाता है और जो उससे विपरीत है वह बिना राग-द्वेषके किया हुआ है। जो कर्ता कर्मफलको चाहता है, वह कर्मफलप्रेप्सु अर्थात् कर्मफलकी तृष्णावाला होता है और जो उससे विपरीत है वह कर्मफलको न चाहनेवाला है॥ 23॥
यत् तु कामेप्सुना फलप्रेप्सुना इत्यर्थः कर्म साहङ्कारेण वा—
साहङ्कारेण इति न तत्त्वज्ञानापेक्षया। किं तर्हि लौकिकश्रोत्रियनिरहङ्कारापेक्षया। यो हि परमार्थनिरहङ्कार आत्मविद् न तस्य कामेप्सुत्वबहुलायासकर्तृत्वप्राप्तिः अस्ति।
सात्त्विकस्य अपि कर्मणः अनात्मवित् साहङ्कारः कर्ता किम् उत राजसतामसयोः।
लोके अनात्मविद् अपि श्रोत्रियो निरहङ्कार उच्यते निरहङ्कारः अयं ब्राह्मण इति। तस्मात् तदपेक्षया एव साहङ्कारेण वा इति उक्तम्। पुनः शब्द पादपूरणार्थः।
क्रियते बहुलायासं कर्त्रा महता आयासेन निर्वर्त्यते तत् कर्म राजसम् उदाहृतम्॥ 24॥
जो कर्म, भोगरूप फलकी इच्छावाले पुरुषद्वारा या अहंकारयुक्त पुरुषद्वारा (किया जाता है)।
इस श्लोकमें “साहङ्कारेण” पद तत्त्वज्ञानकी अपेक्षासे नहीं है। तो क्या है? वेद-शास्त्रको जाननेवाले लौकिक निरहङ्कारीकी अपेक्षासे है; क्योंकि जो वास्तविक निरहङ्कारी आत्मवेत्ता है, उसमें तो फलेच्छुकता और बहुत परिश्रमयुक्त कर्तृत्वकी आशंका ही नहीं हो सकती।
सात्त्विक कर्मका भी कर्ता, आत्मतत्त्वको न जाननेवाला अहंकारयुक्त मनुष्य ही होता है, फिर राजस-तामस कर्मोंके कर्ताकी तो बात ही क्या है?
संसारमें आत्मतत्त्वको न जाननेवाला भी, वेदशास्त्रका ज्ञाता पुरुष निरहङ्कारी कहा जाता है। जैसे “अमुक ब्राह्मण निरहङ्कारी है” ऐसा प्रयोग होता है। सुतरां ऐसे पुरुषकी अपेक्षासे ही इस श्लोकमें “साहङ्कारेण वा” यह वचन कहा गया है। “पुनः” शब्द पाद-पूर्ण करनेके लिये है।
तथा जो कर्म बहुत परिश्रमसे युक्त है, अर्थात् करनेवाला जिसको बहुत परिश्रमसे कर पाता है, वह कर्म राजस कहा गया है॥ 24॥
अनुबन्धं पश्चाद् भावि यद् वस्तु सः अनुबन्ध उच्यते तं च अनुबन्धम्, क्षयं यस्मिन् कर्मणि क्रियमाणे शक्तिक्षयः अर्थक्षयो वा स्यात् तं क्षयं हिंसां प्राणिपीडाम् अनपेक्ष्य च पौरुषं पुरुषकारं शक्नोमि इदं कर्म समापयितुम् इति एवम्
आत्मसामर्थ्यम्
इति
एतानि अनुबन्धादीनि अनपेक्ष्य पौरुषान्तानि मोहाद् अविवेकत आरभ्यते कर्म यत् तत् तामसं तमोनिर्वृत्तम् उच्यते॥ 25॥
अनुबन्धको—अन्तमें होनेवाला जो परिणाम है उसे अनुबन्ध कहते हैं, उसको, क्षयको—कर्मके करनेमें जो शक्तिका या धनका क्षय होता है उसको, हिंसाको—प्राणियोंकी पीड़ाको और पौरुषको—“अमुक कर्मको मैं समाप्त कर सकता हूँ” ऐसी अपनी सामर्थ्यको, इस प्रकार अनुबन्धसे लेकर पौरुषतकके इन समस्त भावोंकी अपेक्षा न करके— इनकी परवा न करके, जो धर्म मोहसे—अज्ञानसे आरम्भ किया जाता है, वह तामस—तमोगुणपूर्वक किया हुआ कहा जाता है॥ 25॥
मुक्तसङ्गो मुक्तः परित्यक्तः सङ्गो येन स मुक्तसङ्गः
अनहंवादी
न
अहंवदनशीलो धृत्युत्साहसमन्वितो धृतिः धारणम् उत्साह उद्यमः ताभ्यां समन्वितः संयुक्तो धृत्युत्साहसमन्वितः, सिद्ध्यसिद्ध्योः क्रियमाणस्य कर्मणः फलसिद्धौ, असिद्धौ च सिद्ध्यसिद्ध्योः निर्विकारः केवलं शास्त्रप्रमाणप्रयुक्तो न फलरागादिना यः स निर्विकार उच्यते। एवम्भूतः कर्ता यः स सात्त्विक उच्यते॥ 26॥
जो कर्ता मुक्तसङ्ग है—जिसने आसक्तिका त्याग कर दिया है, जो निरहंवादी है—जिसका “मैं कर्ता हूँ” ऐसे कहनेका स्वभाव नहीं रह गया है, जो धृति और उत्साहसे युक्त है—धृति यानी धारणाशक्ति और उत्साह यानी उद्यम—इन दोनोंसे जो युक्त है, तथा जो किये हुए कर्मके फलकी सिद्धि होने या न होनेमें निर्विकार है। जो ऐसा कर्ता है, वह सात्त्विक कहा जाता है। जो केवल शास्त्रप्रमाणसे ही कर्ममें प्रयुक्त होता है, फलेच्छा या आसक्ति आदिसे नहीं, वह निर्विकार कहा जाता है॥ 26॥
रागी रागः अस्य अस्ति इति रागी, कर्मफलप्रेप्सुः कर्मफलार्थी लुब्धः परद्रव्येषु सञ्जाततृष्णः तीर्थादौ च स्वद्रव्यापरित्यागी।
हिंसात्मकः
अशुचिः
परपीडास्वभावः बाह्यान्तः शौचवर्जितो हर्षशोकान्वित इष्टप्राप्तौ हर्षः अनिष्टप्राप्तौ इष्टवियोगे च शोकः ताभ्यां हर्षशोकाभ्याम् अन्वितः संयुक्तः तस्य एव च कर्मणः
सम्पत्तिविपत्त्योः
हर्षशोकौ स्यातां ताभ्यां संयुक्तो यः कर्ता स राजसः परिकीर्तितः॥ 27॥
जो कर्ता रागी है—जिसमें राग यानी आसक्ति विद्यमान है, जो कर्मफलको चाहनेवाला है—कर्मफलकी इच्छा रखता है, जो लोभी यानी दूसरोंके धनमें तृष्णा रखनेवाला है और तीर्थादि (उपयुक्त देशकाल)-में भी अपने धनको खर्च करनेवाला नहीं है।
तथा जो हिंसात्मक—दूसरोंको कष्ट पहुँचानेके स्वभाववाला, अशुचि—बाहरी और भीतरी दोनों प्रकारके शुद्धिसे रहित और हर्ष-शोकसे लिप्त यानी इष्ट पदार्थकी प्राप्तिमें हर्ष एवं अनिष्टकी प्राप्ति और इष्टके वियोगमें होनेवाला शोक—इन दोनों प्रकारके भावोंसे युक्त है—ऐसे पुरुषको ही कर्मोंकी सिद्धि-असिद्धिमें हर्ष-शोक हुआ करते हैं, अतः जो कर्ता उन दोनोंसे युक्त है, वह राजस कहा जाता है॥ 27॥
अयुक्तः असमाहितः, प्राकृतः अत्यन्तासंस्कृत-बुद्धिः बालसमः, स्तब्धो दण्डवद् न नमति कस्मैचित्, शठो मायावी शक्तिगूहनकारी, नैष्कृतिकः परवृत्तिच्छेदनपरः, अलसः अप्रवृत्ति-शीलः कर्तव्येषु अपि, विषादी सर्वदा अवसन्न-स्वभावः, दीर्घसूत्री च कर्तव्यानां दीर्घप्रसारणो यद् अद्य श्वो वा कर्तव्यं तद् मासेन अपि न करोति यः च एवम्भूतः कर्ता स तामस उच्यते॥ 28॥
जो कर्ता अयुक्त है—जिसका चित्त समाहित नहीं है, जो बालकके समान प्राकृत—अत्यन्त संस्कारहीन बुद्धिवाला है, जो स्तब्ध है—दण्डकी भाँति किसीके सामने नहीं झुकता, जो शठ अर्थात् अपनी सामर्थ्यको गुप्त रखनेवाला कपटी है, जो नैष्कृतिक—दूसरोंकी वृत्तिका छेदन करनेमें तत्पर और आलसी है—जिसका कर्तव्य-कार्यमें भी प्रवृत्त होनेका स्वभाव नहीं है, जो विषादी—सदा शोकयुक्त स्वभाववाला और दीर्घसूत्री है—कर्तव्यमें बहुत विलम्ब करनेवाला है अर्थात् आज या कल कर लेनेयोग्य कार्यको महीनेभरमें भी समाप्त नहीं कर पाता, जो ऐसा कर्ता है वह तामस कहा जाता है॥ 28॥
बुद्धेः भेदं धृतेः च एव भेदं गुणतः सत्त्वादिगुणतः त्रिविधं शृणु इति सूत्रोपन्यासः, प्रोच्यमानं कथ्यमानम् अशेषेण निरवशेषतो यथावत् पृथक्त्वेन विवेकतो धनञ्जय।
दिग्विजये मानुषं दैवं च प्रभूतं धनम् अजयत् तेन असौ धनञ्जयः अर्जुनः॥ 29॥
हे धनञ्जय! बुद्धिके और धृतिके भी सत्त्वादि गुणोंके अनुसार तीन-तीन प्रकारके भेद तू विभागपूर्वक सम्पूर्णतासे यथावत् कहे हुए सुन। यह सूत्ररूपसे कहना है।
दिग्विजयके समय अर्जुनने मनुष्योंका और देवोंका बहुत-सा धन जीता था, इसलिये उसका नाम धनञ्जय हुआ॥ 29॥
प्रवृत्तिं च प्रवृत्तिः प्रवर्तनं बन्धहेतुः कर्ममार्गः निवृत्तिं च निवृत्तिः मोक्षहेतुः सन्न्यासमार्गः बन्धमोक्षसमानवाक्यत्वात्
प्रवृत्तिनिवृत्ती कर्मसन्न्यासमार्गौ इति अवगम्यते।
कार्याकार्ये विहितप्रतिषिद्धे कर्तव्याकर्तव्ये करणाकरणे इति एतत्, कस्य, देशकालाद्य-पेक्षया दृष्टादृष्टार्थानां कर्मणाम्।
भयाभये बिभेति अस्माद् इति भयं तद्विपरीतम् अभयं भयं च अभयं च भयाभये दृष्टादृष्टविषययोः भयाभययोः कारणे इत्यर्थः। बन्धं सहेतुकं मोक्षं च सहेतुकं या वेत्ति विजानाति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी।
तत्र ज्ञानं बुद्धेः वृत्तिः बुद्धिः तु वृत्तिमती। धृतिः अपि वृत्तिविशेष एव बुद्धेः॥ 30॥
जो बुद्धि, प्रवृत्तिको—बन्धनके हेतुरूप कर्ममार्गको और निवृत्तिको—मोक्षके हेतुरूप संन्यासमार्गको जानती है। बन्ध और मोक्षके साथ प्रवृत्ति और निवृत्तिकी समानवाक्यता है, इससे यह निश्चय होता है कि प्रवृत्ति और निवृत्तिका अर्थ कर्ममार्ग और संन्यासमार्ग ही है।
तथा कर्तव्य और अकर्तव्यको—विधि और प्रतिषेधको, यानी करनेयोग्य और न करनेयोग्यको (भी जानती है)। यह कहना किसके सम्बन्धमें है? देश-काल आदिकी अपेक्षासे जिनके दृष्ट और अदृष्ट फल होते हैं, उन कर्मोंके सम्बन्धमें।
तथा जो बुद्धि भय और अभयको—(जानती है)। जिससे मनुष्य भयभीत होता है, उसका नाम भय है और उससे विपरीतका नाम अभय है; उन दोनोंको, यानी दृष्टादृष्टविषयक जो भय और अभय हैं उन दोनोंके कारणोंको जानती है, एवं हेतुसहित बन्धन और मोक्षको भी जानती है, हे पार्थ! वह बुद्धि सात्त्विकी है।
पहले जो ज्ञान कहा गया है, वह बुद्धिकी एक वृत्तिविशेष है और बुद्धि वृत्तिवाली है। धृति भी बुद्धिकी वृत्तिविशेष ही है॥ 30॥
यया धर्मं शास्त्रचोदितम् अधर्मं च तत्प्रतिषिद्धं कार्यं च अकार्यम् एव च पूर्वोक्ते एव कार्याकार्ये अयथावद् न यथावत् सर्वतो निर्णयेन न प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी॥ 31॥
हे पार्थ! जिस बुद्धिके द्वारा मनुष्य शास्त्रविहित धर्मको और शास्त्रप्रतिषिद्ध अधर्मको, एवं पूर्वोक्त कर्तव्य और अकर्तव्यको, यथार्थरूपसे—सर्वतोभावसे निर्णयपूर्वक नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है॥ 31॥
अधर्मं प्रतिषिद्धं धर्मं विहितम् इति या मन्यते जानाति तमसा आवृता सती सर्वार्थान् सर्वान् एव ज्ञेयपदार्थान् विपरीतान् च विपरीतान् एव विजानाति बुद्धिः सा पार्थ तामसी॥ 32॥
हे पार्थ! जो तमोगुणसे आवृत हुई बुद्धि अधर्मको— निषिद्ध कार्यको धर्म मान लेती है, यानी शास्त्रविहित मान लेती है, तथा जाननेयोग्य अन्यान्य समस्त पदार्थोंको भी, जो विपरीत ही समझती है, वह तामसी है॥ 32॥
धृत्या यया अव्यभिचारिण्या इति व्यवहितेन सम्बन्धः, धारयते किम्, मनःप्राणेन्द्रियक्रिया मनः च प्राणाः च इन्द्रियाणि च मनःप्राणेन्द्रियाणि तेषां क्रियाः चेष्टाः ता उच्छास्त्रमार्गप्रवृत्तेः धारयति। धृत्या हि धार्यमाणा उच्छास्त्रविषया न भवन्ति। योगेन समाधिना अव्यभिचारिण्या नित्यसमाध्यनुगतया इत्यर्थः।
एतद् उक्तं भवति अव्यभिचारिण्या धृत्या मनःप्राणेन्द्रियक्रिया
धारयमाणो
योगेन धारयति इति। या एवंलक्षणा धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी॥ 33॥
“धृति” शब्दके साथ दूर पड़े हुए “अव्यभिचारिणी” शब्दका सम्बन्ध है। जिस अव्यभिचारिणी धृतिके द्वारा, अर्थात् सदा समाधिमें लगी हुई जिस धारणाके द्वारा, समाधियोगसे मन, प्राण और इन्द्रियोंकी सब क्रियाएँ धारण की जाती हैं अर्थात् मन, प्राण और इन्द्रियोंकी सब चेष्टाएँ जिसके द्वारा शास्त्रविरुद्ध प्रवृत्तिसे रोकी जाती हैं, (वह धृति सात्त्विकी है)। (सात्त्विकी) धृतिद्वारा धारण की हुई (इन्द्रियाँ) ही शास्त्रविरुद्ध विषयमें प्रवृत्त नहीं होतीं।
कहनेका तात्पर्य यह है कि धारण करनेवाला मनुष्य, जिस अव्यभिचारिणी धृतिके द्वारा समाधि-योगसे मन, प्राण और इन्द्रियोंकी चेष्टाओंको धारण किया करता है, हे पार्थ! वह इस प्रकारकी धृति सात्त्विकी है॥ 33॥
यया तु धर्मकामार्थान् धर्मः च कामः च अर्थः च धर्मकामार्थाः तान् धर्मकामार्थान् धृत्या यया धारयते मनसि नित्यकर्तव्यरूपान् अवधारयते हे अर्जुन।
प्रसङ्गेन यस्य यस्य धर्मादेः धारणप्रसङ्गः तेन तेन प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी च भवति यः पुरुषः तस्य धृतिः या सा पार्थ राजसी॥ 34॥
हे अर्जुन! जिस धृतिके द्वारा मनुष्य धर्म, काम और अर्थोंको धारण करता है, अर्थात् जिस धृतिद्वारा मनुष्य इन सबको मनमें अवश्यकर्तव्यरूपसे निश्चय किया करता है।
तथा जिस-जिस धर्म, अर्थ आदिके धारण करनेका प्रसङ्ग आता है, उस-उस प्रसङ्गसे ही जो मनुष्य फल चाहनेवाला है, हे पार्थ! उसकी जो धृति है वह राजसी होती है॥ 34॥
यया स्वप्नं निद्रां भयं त्रासं शोकं विषादम् अवसादं विषण्णतां मदं विषयसेवाम् आत्मनो बहु मन्यमानो मत्त इव मदम् एव च मनसि नित्यम् एव कर्तव्यरूपतया कुर्वन् न विमुञ्चति धारयति एव दुर्मेधाः कुत्सितमेधाः पुरुषो यः तस्य धृतिः या सा तामसी मता॥ 35॥
जिस धृतिके द्वारा मनुष्य स्वप्न—निद्रा, भय— त्रास, शोक—दुःख और मदको नहीं छोड़ता। अर्थात् विषय-सेवनको ही अपने लिये बहुत बड़ा पुरुषार्थ मानकर उन्मत्तकी भाँति मदको ही मनमें सदा कर्तव्यरूपसे समझता हुआ जो कुत्सित बुद्धिवाला मनुष्य इन सबको नहीं छोड़ता। यानी धारण ही किये रहता है। उसकी जो धृति है, वह तामसी मानी गयी है॥ 35॥
गुणभेदेन क्रियाणां कारकाणां च त्रिधा भेद उक्तः, अथ इदानीं फलस्य च सुखस्य त्रिधा भेद उच्यते—
गुण-भेदके अनुसार क्रियाओं और कारकोंके तीन-तीन प्रकारके भेद कहे; अब फलस्वरूप सुखके तीन तरहके भेद कहे जाते हैं—
सुखं तु इदानीं त्रिविधं शृणु समाधानं कुरु इति एतद् मे भरतर्षभ।
अभ्यासात् परिचयाद् आवृत्ते रमते रतिं प्रतिपद्यते यत्र यस्मिन् सुखानुभवे दुःखान्तं च दुःखावसानं दुःखोपशमं च निगच्छति निश्चयेन प्राप्नोति॥ 36॥
हे भरतर्षभ! अब तू मुझसे तीन तरहके सुखको भी सुन, अर्थात् सुननेके लिये चित्तको समाहित कर।
जिस सुखमें मनुष्य अभ्याससे रमता है अर्थात् जिस सुखके अनुभवमें बारम्बार आवृत्ति करनेसे मनुष्यका प्रेम हुआ करता है और जहाँ मनुष्य (अपने) दुःखोंका अन्त पाता है अर्थात् जहाँ उसके सारे दुःखोंकी निःसन्देह निवृत्ति हो जाया करती है॥ 36॥
यत् तत् सुखम् अग्रे पूर्वं प्रथमसन्निपाते ज्ञानवैराग्यध्यानसमाध्यारम्भे
अत्यन्तायास-पूर्वकत्वाद् विषम् इव दुःखात्मकं भवति, परिणामे
ज्ञानवैराग्यादिपरिपाकजं
सुखम् अमृतोपमम्।
तत् सुखं सात्त्विकं प्रोक्तं विद्वद्भिः आत्मनो बुद्धिः
आत्मबुद्धिः
आत्मबुद्धेः
प्रसादो नैर्मल्यं सलिलवत् स्वच्छता ततो जातम् आत्म-बुद्धिप्रसादजम् आत्मविषया वा आत्मावलम्बना वा बुद्धिः आत्मबुद्धिः तत्प्रसादप्रकर्षाद् वा जातम् इति एतत् तस्मात् सात्त्विकं तत्॥ 37॥
जो ऐसा सुख है, वह पहले-पहल—ज्ञान, वैराग्य, ध्यान और समाधिके आरम्भकालमें, अत्यन्त श्रम-साध्य होनेके कारण, विषके सदृश—दुःखात्मक होता है। परंतु परिणाममें वह ज्ञान-वैराग्यादिके परिपाकसे उत्पन्न हुआ सुख अमृतके समान है।
वह आत्मबुद्धिके प्रसादसे उत्पन्न हुआ सुख विद्वानोंद्वारा सात्त्विक बतलाया गया है। अपनी बुद्धिका नाम आत्मबुद्धि है, उसका जो जलकी भाँति स्वच्छ निर्मल हो जाना है, वह आत्मबुद्धिप्रसाद है, उससे उत्पन्न हुआ सुख आत्मबुद्धिप्रसादजन्य सुख है। अथवा, आत्मविषयक या आत्माको अवलम्बन करनेवाली बुद्धिका नाम आत्मबुद्धि है, उसके प्रसादकी अधिकतासे उत्पन्न सुख आत्मबुद्धिप्रसादसे उत्पन्न है, इसीलिये वह सात्त्विक है॥ 37॥
विषयेन्द्रियसंयोगाद् यत् तत् सुखं जायते अग्रे प्रथमक्षणे अमृतोपमम् अमृतसमं परिणामे विषम् इव बलवीर्यरूपप्रज्ञामेधाधनोत्साहहानि-हेतुत्वाद् अधर्मतज्जनितनरकादिहेतुत्वात् च परिणामे तदुपभोगविपरिणामान्ते विषम् इव तत् सुखं राजसं स्मृतम्॥ 38॥
जो सुख विषय और इन्द्रियोंके संयोगसे उत्पन्न होता है, वह पहले—प्रथम क्षणमें, अमृतके सदृश होता है, परंतु परिणाममें विषके समान है। अभिप्राय यह है कि बल, वीर्य, रूप, बुद्धि, मेधा, धन और उत्साहकी हानिका कारण होनेसे, तथा अधर्म और उससे उत्पन्न नरकादिका हेतु होनेसे, वह परिणाममें— अपने उपभोगका अन्त होनेके पश्चात् विषके सदृश होता है; अतः ऐसा सुख राजस माना गया है॥ 38॥
यद् अग्रे च अनुबन्धे च अवसानोत्तरकाले सुखं मोहनं मोहकरम् आत्मनो निद्रालस्यप्रमादोत्थं निद्रा च आलस्यं च प्रमादः च इति एतेभ्यः समुत्तिष्ठति इति निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत् तामसम् उदाहृतम्॥ 39॥
जो सुख आरम्भमें और परिणाममें भी अर्थात् उपभोगके पीछे भी आत्माको मोहित करनेवाला होता है तथा निद्रा, आलस्य और प्रमादसे उत्पन्न हुआ है, अर्थात् जो निद्रा, आलस्य और प्रमाद— इन तीनोंसे उत्पन्न होता है, वह सुख तामस कहा गया है॥ 39॥
अथ इदानीं प्रकरणोपसंहारार्थः श्लोक आरभ्यते—
इसके उपरान्त अब प्रकरणका उपसंहार करनेवाला श्लोक कहा जाता है—
न तद् अस्ति तद् न अस्ति पृथिव्यां वा मनुष्यादि सत्त्वं प्राणिजातम् अन्यद् वा अप्राणिजातं दिवि देवेषु वा पुनः सत्त्वं प्रकृतिजैः प्रकृतितो जातैः एभिः त्रिभिः गुणैः सत्त्वादिभिः मुक्तं परित्यक्तं यत् स्याद् भवेद् न तद् अस्ति इति पूर्वेण सम्बन्धः॥ 40॥
ऐसा कोई सत्त्व अर्थात् मनुष्यादि प्राणी या अन्य कोई भी प्राणरहित वस्तुमात्र पृथिवीमें, स्वर्गमें अथवा देवताओंमें भी नहीं है, जो कि इन प्रकृतिसे उत्पन्न हुए सत्त्वादि तीनों गुणोंसे मुक्त अर्थात् रहित हो। “ऐसा कोई नहीं है” इस पूर्वके पदसे इस वाक्यका सम्बन्ध है॥ 40॥
सर्वः संसारः क्रियाकारकफललक्षणः सत्त्व-रजस्तमोगुणात्मकः अविद्यापरिकल्पितः समूलः अनर्थ उक्तो वृक्षरूपकल्पनया च “ऊर्ध्वमूलम्” इत्यादिना।
तं च “असङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ततः पदं तत् परिमार्गितव्यम्” इति च उक्तम्।
तत्र च सर्वस्य त्रिगुणात्मकत्वात् संसार-कारणनिवृत्त्यनुपपत्तौ प्राप्तायां यथा तन्निवृत्तिः स्यात् तथा वक्तव्यम्।
सर्वः
च
गीताशास्त्रार्थ
उपसंहर्तव्य एतावान् एव च सर्वो वेदस्मृत्यर्थः पुरुषार्थम् इच्छद्भिः अनुष्ठेय इति एवम् अर्थं च ब्राह्मण-क्षत्रियविशाम् इत्यादिः आरभ्यते—
क्रिया, कारक और फल ही जिसका स्वरूप है, ऐसा यह सारा संसार सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंका ही विस्तार है, अविद्यासे कल्पित है और अनर्थरूप है, (पंद्रहवें अध्यायमें) वृक्षरूपकी कल्पना करके “ऊर्ध्वमूलम्” इत्यादि वाक्योंद्वारा मूलसहित इसका वर्णन किया गया है।
तथा यह भी कहा है कि “उसको दृढ़ असंगशस्त्र-द्वारा छेदन करके उसके पश्चात् उस परम पदको खोजना चाहिये।”
उसमें यह शङ्का होती है कि तब तो सब कुछ तीनों गुणोंका ही कार्य होनेसे संसारके कारणकी निवृत्ति नहीं हो सकती। इसलिये जिस उपायसे उसकी निवृत्ति हो, वह बतलाना चाहिये।
तथा सम्पूर्ण गीताशास्त्रका इस प्रकार उपसंहार भी किया जाना चाहिये कि “परम पुरुषार्थकी सिद्धि चाहनेवालोंके द्वारा अनुष्ठान किये जाने-योग्य यह इतना ही समस्त वेद और स्मृतियोंका अभिप्राय है” अतः इस अभिप्रायसे ये “ब्राह्मण-क्षत्रियविशाम्” इत्यादि श्लोक आरम्भ किये जाते हैं—
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ब्राह्मणाः च क्षत्रियाः च विशः च ब्राह्मणक्षत्रियविशः तेषां ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां
च
शूद्राणाम्
असमासकरणम् एकजातित्वे सति वेदे अनधिकारात्, हे परन्तप कर्माणि प्रविभक्तानि इतरेतरविभागेन व्यवस्थापितानि।
केन, स्वभावप्रभवैः गुणैः स्वभाव ईश्वरस्य प्रकृतिः त्रिगुणात्मिका माया सा प्रभवो येषां गुणानां ते स्वभावप्रभवाः तैः, शमादीनि कर्माणि प्रविभक्तानि ब्राह्मणादीनाम्।
अथवा ब्राह्मणस्वभावस्य सत्त्वगुणः प्रभवः कारणम्, तथा क्षत्रियस्वभावस्य सत्त्वोपसर्जनं रजः प्रभवः, वैश्यस्वभावस्य तम-उपसर्जनं रजः प्रभवः, शूद्रस्वभावस्य रज-उपसर्जनं तमः प्रभवः
प्रशान्त्यैश्वर्येहामूढतास्वभावदर्शनात् चतुर्णाम्।
अथवा जन्मान्तरकृतसंस्कारः प्राणिनां वर्तमानजन्मनि स्वकार्याभिमुखत्वेन अभिव्यक्तः स्वभावः स प्रभवो येषां गुणानां ते स्वभावप्रभवा गुणाः।
गुणप्रादुर्भावस्य निष्कारणत्वानुपपत्तेः स्वभावः कारणम् इति कारणविशेषोपादानम्।
एवं स्वभावप्रभवैः प्रकृतिप्रभवैः सत्त्वरज-स्तमोभिः गुणैः स्वकार्यानुरूपेण शमादीनि कर्माणि प्रविभक्तानि।
ननु शास्त्रप्रविभक्तानि शास्त्रेण विहितानि ब्राह्मणादीनां शमादीनि कर्माणि कथम् उच्यते सत्त्वादिगुणप्रविभक्तानि इति।
न एष दोषः, शास्त्रेण अपि ब्राह्मणादीनां सत्त्वादिगुणविशेषापेक्षया एव शमादीनि कर्माणि प्रविभक्तानि न गुणानपेक्षया एव इति शास्त्रप्रविभक्तानि अपि कर्माणि गुण-प्रविभक्तानि इति उच्यन्ते॥ 41॥
हे परन्तप! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—इन तीनोंके और शूद्रोंके भी कर्म विभक्त किये हुए हैं अर्थात् परस्पर विभागपूर्वक निश्चित किये हुए हैं। ब्राह्मणादिके साथ शूद्रोंको मिलाकर— समास करके न कहनेका अभिप्राय यह है कि शूद्र द्विज न होनेके कारण वेद-पठनमें उनका अधिकार नहीं है।
किसके द्वारा विभक्त किये गये हैं? स्वभावसे उत्पन्न हुए गुणोंके द्वारा। स्वभाव यानी ईश्वरकी प्रकृति—त्रिगुणात्मिका माया, वह माया जिन गुणोंके प्रभवका यानी उत्पत्तिका कारण है, ऐसे स्वभावप्रभव गुणोंके द्वारा ब्राह्मणादिके शम आदि कर्म विभक्त किये गये हैं।
अथवा यों समझो कि ब्राह्मणस्वभावका कारण सत्त्वगुण है, वैसे ही क्षत्रियस्वभावका कारण सत्त्वमिश्रित रजोगुण है, वैश्यस्वभावका कारण तमोमिश्रित रजोगुण है और शूद्रस्वभावका कारण रजोमिश्रित
तमोगुण
है।
क्योंकि
उपर्युक्त चारों वर्णोंमें (गुणोंके अनुसार) क्रमसे शान्ति, ऐश्वर्य, चेष्टा और मूढ़ता—ये अलग-अलग स्वभाव देखे जाते हैं।
अथवा यों समझो कि प्राणियोंके जन्मान्तरमें किये हुए कर्मोंके संस्कार, जो वर्तमान जन्ममें अपने कार्यके अभिमुख होकर व्यक्त हुए हैं, उनका नाम स्वभाव है। ऐसा स्वभाव जिन गुणोंको उत्पत्तिका कारण है, वे स्वभावप्रभव गुण हैं।
गुणोंका प्रादुर्भाव बिना कारणके नहीं बन सकता। इसलिये “स्वभाव उनकी उत्पत्तिका कारण है” यह कहकर कारणविशेषका प्रतिपादन किया गया है।
इस प्रकार स्वभावसे उत्पन्न हुए अर्थात् प्रकृतिसे उत्पन्न हुए सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंद्वारा अपने-अपने कार्यके अनुरूप शमादि कर्म विभक्त किये गये हैं।
पू0—ब्राह्मणादि वर्णोंके शम आदि कर्म तो शास्त्रद्वारा विभक्त हैं, अर्थात् शास्त्रद्वारा निश्चित किये गये हैं; फिर यह कैसे कहा जाता है कि सत्त्व आदि तीनों गुणोंद्वारा विभक्त किये गये हैं?
उ0—यह दोष नहीं है, क्योंकि शास्त्रद्वारा भी ब्राह्मणादिके शमादि कर्म सत्त्वादि गुण-भेदोंकी अपेक्षासे ही विभक्त किये गये हैं, बिना गुणोंकी अपेक्षासे नहीं। अतः शास्त्रद्वारा विभक्त किये हुए भी कर्म गुणोंद्वारा विभक्त किये गये हैं, ऐसा कहा जाता है॥ 41॥
कानि पुनः तानि कर्माणि इति उच्यन्ते—
वे कर्म कौन-से हैं? यह बतलाया जाता है—
शमो दमः च यथाव्याख्यातार्थौ, तपो यथोक्तं शारीरादि, शौचं व्याख्यातम्, क्षान्तिः क्षमा, आर्जवम् ऋजुता एव च ज्ञानं विज्ञानम्, आस्तिक्यम् अस्तिभावः श्रद्दधानता आगमार्थेषु ब्रह्मकर्म ब्राह्मणजातेः कर्म ब्रह्मकर्म स्वभावजम्।
यद् उक्तम् “स्वभावप्रभवैः गुणैः प्रविभक्तानि” इति तद् एव उक्तं स्वभावजम् इति॥ 42॥
जिनके अर्थकी व्याख्या पहले की जा चुकी है वे शम और दम तथा पहले कहा हुआ शारीरिकादि-भेदसे तीन प्रकारका तप एवं पूर्वोक्त (दो प्रकारका) शौच, क्षान्ति—क्षमा, आर्जव—अन्तःकरणकी सरलता तथा ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता अर्थात् शास्त्रके वचनोंमें श्रद्धा-विश्वास—ये सब ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म हैं अर्थात् ब्राह्मणजातिके कर्म हैं।
जो बात “स्वभावजन्य गुणोंसे कर्म विभक्त किये गये हैं” इस वाक्यसे कही थी, वही यहाँ “स्वभावजम्” पदसे कही गयी है॥ 42॥
शौर्यं शूरस्य भावः। तेजः प्रागल्भ्यम्। धृतिः धारणं सर्वावस्थासु अनवसादो भवति यया धृत्या उत्तम्भितस्य। दाक्ष्यं दक्षस्य भावः सहसा प्रत्युत्पन्नेषु कार्येषु अव्यामोहेन प्रवृत्तिः। युद्धे च अपि अपलायनम् अपराङ्मुखीभावः शत्रुभ्यः।
दानं
देयेषु
मुक्तहस्तता।
ईश्वरभावः च ईश्वरस्य भावः प्रभुशक्तिप्रकटीकरणम् ईशितव्यान् प्रति।
क्षत्रकर्म क्षत्रियजातेः विहितं कर्म क्षत्रकर्म स्वभावजम्॥ 43॥
शौर्य—शूरवीरता, तेज—दूसरोंसे न दबनेका स्वभाव, धृति—धारणाशक्ति, जिस शक्तिसे उत्साहित हुए मनुष्यका सभी अवस्थाओंमें अनवसाद (नाश या शोकका अभाव) होता है, दक्षता—सहसा प्राप्त हुए बहुत-से कार्योंमें बिना घबड़ाहटके प्रवृत्त होनेका स्वभाव तथा युद्धमें न भागना—शत्रुको पीठ न दिखानेका भाव।
दान—देनेयोग्य पदार्थोंको खुले हाथ देनेका स्वभाव और ईश्वरभाव यानी जिनका शासन करना है, उनके प्रति प्रभुत्व प्रकट करना।
ये सब क्षत्रियोंके कर्म अर्थात् क्षत्रियजातिके लिये विहित उनके स्वाभाविक कर्म हैं॥ 43॥
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं कृषिः च गौरक्ष्यं च वाणिज्यं च कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं कृषिः भूमेः विलेखनं गौरक्ष्यं गा रक्षति इति गोरक्षः तद्भावो गौरक्ष्यं पाशुपाल्यं वाणिज्यं वणिक्कर्म क्रयविक्रयादिलक्षणं वैश्यकर्म वैश्यजातेः कर्म वैश्यकर्म स्वभावजम्।
परिचर्यात्मकं शुश्रूषास्वभावं कर्म शूद्रस्य अपि स्वभावजम्॥ 44॥
कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य—भूमिमें हल चलानेका नाम “कृषि” है, गौओंकी रक्षा करनेवाला “गोरक्ष” है, उसका भाव “गौरक्ष्य” यानी पशुओंको पालना है तथा क्रय-विक्रयरूप वणिक् कर्मका नाम “वाणिज्य” है—ये तीनों वैश्यकर्म हैं अर्थात् वैश्यजातिके स्वाभाविक कर्म हैं।
वैसे ही शूद्रका भी परिचर्यात्मक अर्थात् सेवारूप कर्म स्वाभाविक है॥ 44॥
एतेषां जातिविहितानां कर्मणां सम्य-गनुष्ठितानां स्वर्गप्राप्तिः फलं स्वभावतः।
“वर्णा आश्रमाश्च स्वकर्मनिष्ठाः प्रेत्य कर्मफल-मनुभूय ततः शेषेण विशिष्टदेशजातिकुलधर्मायुः-श्रुतवृत्तवित्तसुखमेधसो
जन्म
प्रतिपद्यन्ते” (आ0 स्मृ0 2। 2। 2। 3) इत्यादिस्मृतिभ्यः पुराणे च वर्णिनाम् आश्रमिणां च लोकफलभेद-विशेषस्मरणात्।
कारणान्तरात् तु इदं वक्ष्यमाणं फलम्—
जातिके उद्देश्यसे कहे हुए इन कर्मोंका भली प्रकार अनुष्ठान किये जानेपर स्वर्गकी प्राप्तिरूप स्वाभाविक फल होता है।
क्योंकि “अपने कर्मोंमें तत्पर हुए वर्णाश्रमावलम्बी मरकर, परलोकमें कर्मोंका फल भोगकर, बचे हुए कर्मफलके अनुसार श्रेष्ठ देश, काल, जाति, कुल, धर्म, आयु, विद्या, आचार, धन, सुख और मेधा आदिसे युक्त, जन्म ग्रहण करते हैं” इत्यादि स्मृति-वचन हैं और पुराणमें भी वर्णाश्रमियोंके लिये अलग-अलग लोकप्राप्तिरूप फलभेद बतलाया गया है।
परंतु दूसरे कारणसे (उनका प्रकारान्तरसे अनुष्ठान करनेपर) यह अब बतलाया जानेवाला फल होता है—
स्वे स्वे यथोक्तलक्षणभेदे कर्मणि अभिरतः तत्परः संसिद्धिं स्वकर्मानुष्ठानाद् अशुद्धिक्षये सति कायेन्द्रियाणां ज्ञाननिष्ठायोग्यतालक्षणां लभते प्राप्नोति नरः अधिकृतः पुरुषः।
किं स्वकर्मानुष्ठानत एव साक्षात् संसिद्धिः। न, कथं तर्हि स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा येन प्रकारेण विन्दति तत् शृणु॥ 45॥
कर्माधिकारी मनुष्य, उक्त लक्षणोंवाले अपने-अपने कर्मोंमें अभिरत—तत्पर हुआ, संसिद्धि लाभ करता है अर्थात् अपने कर्मोंका अनुष्ठान करनेसे अशुद्धिका क्षय होनेपर, शरीर और इन्द्रियोंकी ज्ञाननिष्ठाकी योग्यतारूप सिद्धि प्राप्त कर लेता है।
तो क्या अपने कर्मोंका अनुष्ठान करनेसे ही साक्षात् संसिद्धि मिल जाती है? नहीं। तो किस तरह मिलती है? अपने कर्मोंमें तत्पर हुआ मनुष्य, जिस प्रकार सिद्धि लाभ करता है, वह तू सुन॥ 45॥
यतो यस्मात् प्रवृत्तिः उत्पत्तिः चेष्टा वा यस्माद् अन्तर्यामिण ईश्वरात् भूतानां प्राणिनां स्याद् येन ईश्वरेण सर्वम् इदं जगत् ततं व्याप्तम्, स्वकर्मणा पूर्वोक्तेन प्रतिवर्णं तम् ईश्वरम् अभ्यर्च्य पूजयित्वा आराध्य केवलं ज्ञाननिष्ठायोग्यतालक्षणां सिद्धिं विन्दति मानवो मनुष्यः॥ 46॥
जिस अन्तर्यामी ईश्वरसे समस्त प्राणियोंकी प्रवृत्ति यानी उत्पत्ति या चेष्टा होती है और जिस ईश्वरसे यह सारा जगत् व्याप्त है, उस ईश्वरका प्रत्येक वर्णके लिये पहले बतलाये हुए अपने कर्मोंद्वारा पूजकर—उसकी आराधना करके मनुष्य केवल ज्ञाननिष्ठाकी योग्यतारूप सिद्धि प्राप्त कर लेता है॥ 46॥
यत एवम् अतः—
ऐसा होनेके कारण—
श्रेयान् प्रशस्यतरः स्वो धर्मः स्वधर्मो विगुणः अपि इति अपिशब्दो द्रष्टव्यः,* परधर्मात् स्वनुष्ठितात् स्वभावनियतं स्वभावेन नियतम्, यद् उक्तम् “स्वभावजम्” इति तद् एव उक्तं स्वभावनियतम् इति, यथा विषजातस्य इव कृमेः विषं न दोषकरं तथा स्वभावनियतं कर्म कुर्वन् न आप्नोति किल्बिषं पापम्॥ 47॥
अपना गुणरहित भी धर्म, दूसरेके भली प्रकार अनुष्ठान किये हुए धर्मसे श्रेष्ठतर है। जैसे विषमें उत्पन्न हुए कीड़ेके लिये विष दोषकारक नहीं होता, उसी प्रकार स्वभावसे नियत किये हुए कर्मोंको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता। जो बात पहले “स्वभावजम्” इस पदसे कही थी, वही यहाँ “स्वभावनियतम्” इस पदसे कही गयी है। स्वभावसे नियत कर्मका नाम स्वभावनियत है॥ 47॥
स्वभावनियतं कर्म कुर्वाणो विषजात इव कृमिः किल्बिषं न आप्नोति इति उक्तम्। परधर्मः च भयावह इति। अनात्मज्ञः च न हि कश्चित् क्षणम् अपि अकर्मकृत् तिष्ठति इति, अतः—
उपर्युक्त श्लोकमें यह बात कही कि स्वभावनियत कर्मोंको करनेवाला मनुष्य, विषमें जन्मे हुए कीड़ेकी भाँति पापको प्राप्त नहीं होता, तथा (तीसरे अध्यायमें)यह भी कहा है कि दूसरेका धर्म भयावह है और “कोई भी अज्ञानी बिना कर्म किये क्षणभर भी नहीं रह सकता।” इसलिये—
भाष्य52 paragraphs · खोलें
सहजं सह जन्मना एव उत्पन्नं सहजं किं तत् कर्म कौन्तेय सदोषम् अपि त्रिगुणत्वाद् न त्यजेत्।
सर्वारम्भा आरभ्यन्ते इति आरम्भाः सर्व-कर्माणि इति एतत् प्रकरणात्। ये केचिद् आरम्भाः स्वधर्माः परधर्माः च ते सर्वे हि यस्मात् त्रिगुणात्मकत्वम् अत्र हेतुः त्रिगुणात्मक-त्वाद् दोषेण धूमेन सहजेन अग्निः इव आवृताः।
सहजस्य कर्मणः स्वधर्माख्यस्य परित्यागेन परधर्मानुष्ठाने अपि दोषाद् न एव मुच्यते, भयावहः च परधर्मः। न च शक्यते अशेषतः त्यक्तुम् अज्ञेन कर्म यतः तस्माद् न त्यजेद् इत्यर्थः।
किम् अशेषतः त्यक्तुम् अशक्यं कर्म इति न त्यजेत् किं वा सहजस्य कर्मणः त्यागे दोषो भवति इति।
किं च अतः?
यदि तावद् अशेषतः त्यक्तुम् अशक्यम् इति न त्याज्यं सहजं कर्म एवं तर्हि अशेषतः त्यागे गुण एव स्याद् इति सिद्धं भवति।
सत्यम् एवम् अशेषतः त्याग एव न उपपद्यते इति चेत्।
किं नित्यप्रचलितात्मकः पुरुषो यथा साङ्ख्यानां गुणाः किं वा क्रिया एव कारकं यथा बौद्धानां पञ्च स्कन्धाः क्षण-प्रध्वंसिनः, उभयथा अपि कर्मणः अशेषतः त्यागो न भवति।
अथ तृतीयः अपि पक्षो यदा करोति तदा सक्रियं वस्तु यदा न करोति तदा निष्क्रियं वस्तु तद् एव। तत्र एवं सति शक्यं कर्म अशेषतः त्युक्तम्।
अयं तु अस्मिन् तृतीये पक्षे विशेषो न नित्यप्रचलितं वस्तु न अपि क्रिया एव कारकं किं तर्हि व्यवस्थिते द्रव्ये अविद्यमाना क्रिया उत्पद्यते विद्यमाना च विनश्यति। शुद्धं द्रव्यं शक्तिमद् अवतिष्ठते इति एवम् आहुः काणादाः तद् एव च कारकम् इति।
अस्मिन् पक्षे को दोष इति?
अयम् एव तु दोषो यतः तु अभागवतं मतम् इदम्।
कथं ज्ञायते?
यत आह भगवान् “नासतो विद्यते भावः” इत्यादि। काणादानां हि असतो भावः सतः च अभाव इति इदं मतम्।
अभागवतत्वे अपि न्यायवत् चेत् को दोष इति चेत्।
उच्यते, दोषवत् तु इदं सर्वप्रमाण-विरोधात्।
कथम्?
यदि तावद् द्व्यणुकादि द्रव्यं प्राग उत्पत्तेः अत्यन्तम् एव असद् उत्पन्नं च स्थितं कञ्चित् कालं पुनः अत्यन्तम् एव असत्त्वम् आपद्यते। तथा च सति असद् एव सद् जायते अभावो भावो भवति भावः च अभाव इति।
तत्र अभावो जायमानः प्राग् उत्पत्तेः शश-विषाणकल्पः
समवाय्यसमवायिनिमित्ताख्यं कारणम् अपेक्ष्य जायते इति।
न च एवम् अभाव उत्पद्यते कारणं वा अपेक्षते इति शक्यं वक्तुम् असतां शशविषाणा-दीनाम् अदर्शनात्।
भावात्मकाः चेद् घटादय उत्पद्यमानाः किञ्चिद्
अभिव्यक्तिमात्रकारणम्
अपेक्ष्य उत्पद्यन्ते इति शक्यं प्रतिपत्तुम्।
किं च असतः च सद्भावे सतः च असद्भावे न क्वचित् प्रमाणप्रमेयव्यवहारे विश्वासः कस्यचित् स्यात्। सत् सद् एव असद् असद् एव इति निश्चयानुपपत्तेः।
किं च उत्पद्यते इति द्व्यणुकादेः द्रव्यस्य स्वकारणसत्तासम्बन्धम् आहुः। प्रागुत्पत्तेः च असत् पश्चात् स्वकारणव्यापारम् अपेक्ष्य स्वकारणैः परमाणुभिः सत्तया च समवाय-लक्षणेन सम्बन्धेन सम्बध्यते सम्बद्धं सत् कारणसमवेतं सद् भवति।
तत्र वक्तव्यं कथम् असतः सत् कारणं भवेत् सम्बन्धो वा केनचित्। न हि वन्ध्यापुत्रस्य सत्ता सम्बन्धो वा कारणं वा केनचित् प्रमाणतः कल्पयितुं शक्यम्।
ननु न एव वैशेषिकैः अभावस्य सम्बन्धः कल्प्यते द्व्यणुकादीनां हि द्रव्याणां स्वकारणेन समवायलक्षणः सम्बन्धः सताम् एव उच्यते इति।
न; सम्बन्धात् प्राक् सत्त्वानभ्युपगमात्। न हि वैशेषिकैः कुलालदण्डचक्रादिव्यापारात् प्राग् घटादीनाम् अस्तित्वम् इष्यते। न च मृद एव घटाद्याकारप्राप्तिम् इच्छन्ति। ततः च असत् एव सम्बन्धः पारिशेष्याद् इष्टो भवति।
ननु असतः अपि समवायलक्षणः सम्बन्धो न विरुद्धः।
न; वन्ध्यापुत्रादीनाम् अदर्शनात्।
घटादेः एव प्रागभावस्य स्वकारणसम्बन्धो भवति न वन्ध्यापुत्रादेः अभावस्य तुल्यत्वे अपि इति विशेषः अभावस्य वक्तव्यः।
एकस्य अभावो द्वयोः अभावः सर्वस्य अभावः प्रागभावः प्रध्वंसाभाव इतरेतराभावः अत्यन्ताभाव इति लक्षणतो न केनचिद् विशेषो दर्शयितुं शक्यः।
असति च विशेषे घटस्य प्रागभाव एव कुलालादिभिः घटभावम् आपद्यते सम्बध्यते च भावेन कपालाख्येन स्वकारणेन सर्व-व्यवहारयोग्यः च भवति न तु घटस्य एव प्रध्वंसाभावः अभावत्वे सति अपि इति प्रध्वंसाद्यभावानां न क्वचिद् व्यवहारयोग्यत्वं प्रागभावस्य
एव
द्व्यणुकादिद्रव्याख्यस्य उत्पत्त्यादिव्यवहारार्हत्वम्
इति
एतत् असमञ्जसम् अभावत्वाविशेषाद् अत्यन्तप्रध्वंसा-भावयोः इव।
ननु न एव अस्माभिः प्रागभावस्य भावापत्तिः उच्यते।
भावस्य एव हि तर्हि भावापत्तिः यथा घटस्य घटापत्तिः पटस्य वा पटापत्तिः। एतद् अपि अभावस्य भावापत्तिवद् एव प्रमाणविरुद्धम्।
साङ्ख्यस्य अपि यः परिणामपक्षः सः अपि अपूर्वधर्मोत्पत्तिविनाशाङ्गीकरणाद् वैशेषिक-पक्षाद् न विशिष्यते।
अभिव्यक्तितिरोभावाङ्गीकरणे
अपि अभिव्यक्तितिरोभावयोः विद्यमानत्वाविद्यमान-त्वनिरूपणे पूर्ववद् एव प्रमाणविरोधः।
एतेन कारणस्य एव संस्थानम् उत्पत्त्यादि इति एतद् अपि प्रत्युक्तम्।
पारिशेष्यात् सद् एकम् एव वस्तु अविद्यया उत्पत्तिविनाशादिधर्मैः
नटवद्
अनेकधा विकल्प्यते इति इदं भागवतं मतम् उक्तम् “नासतो विद्यते भावः” इति अस्मिन् श्लोके। सत्प्रत्ययस्य अव्यभिचाराद् व्यभिचारात् च इतरेषाम् इति।
कथं तर्हि आत्मनः अविक्रियत्वे अशेषतः कर्मणः त्यागो न उपपद्यते इति।
यदि वस्तुभूता गुणा यदि वा अविद्या-कल्पिताः तद्धर्मः कर्म तदा आत्मनि अविद्याध्यारोपितम् एव इति अविद्वान् न हि कश्चित् क्षणमपि अशेषतः त्यक्तुं शक्नोति इति उक्तम्।
विद्वान् तु पुनः विद्यया अविद्यायां निवृत्तायां शक्नोति एव अशेषतः कर्म परित्यक्तुम् अविद्याध्यारोपितस्य शेषानुपपत्तेः।
न हि तैमिरिकदृष्ट्या अध्यारोपितस्य द्विचन्द्रादेः तिमिरापगमे शेषः अवतिष्ठते।
एवं च सति इदं वचनम् उपपन्नम् “सर्व-कर्माणि मनसा” इत्यादि “स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः” “स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः” इति च॥ 48॥
जो जन्मके साथ उत्पन्न हो उसका नाम सहज है। वह क्या है? कर्म। हे कौन्तेय! त्रिगुणमय होनेके कारण जो दोषयुक्त है, ऐसे दोषयुक्त भी अपने सहज कर्मको नहीं छोड़ना चाहिये।
क्योंकि सभी आरम्भ —जो आरम्भ किये जाते हैं उनका नाम आरम्भ है, अतः यहाँ प्रकरणके अनुसार सर्वारम्भका तात्पर्य समस्त कर्म है। सो स्वधर्म या परधर्मरूप जो कुछ भी कर्म है, वे सभी तीनों गुणोंके कार्य हैं। अतः त्रिगुणात्मक होनेके कारण साथ जन्मे हुए धुएँसे अग्निकी भाँति दोषसे आवृत हैं।
अभिप्राय यह है कि स्वधर्म नामक सहज कर्मका परित्याग करनेसे और परधर्मका ग्रहण करनेसे भी, दोषसे छुटकारा नहीं हो सकता और परधर्म भयावह भी है; तथा अज्ञानीद्वारा सम्पूर्ण कर्मोंका पूर्णतया त्याग होना सम्भव भी नहीं है; सुतरां सहज कर्मको नहीं छोड़ना चाहिये।
(यहाँ यह विचार करना चाहिये कि) क्या कर्मोंका अशेषतः त्याग होना असम्भव है, इसलिये उनका त्याग नहीं करना चाहिये, अथवा सहज कर्मका त्याग करनेमें दोष है इसलिये?
पू0—इसमें क्या सिद्ध होगा?
उ0—यदि यह बात हो कि अशेषतः त्याग होना अशक्य है, इसलिये सहज कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये, तब तो यही सिद्ध होगा कि कर्मोंका अशेषतः त्याग करनेमें गुण ही है।
पू0—यह ठीक है, परंतु यदि कर्मोंका पूर्णतया त्याग हो ही नहीं सकता (तो फिर गुण-दोषकी बात ही क्या है?)
उ0—तो क्या सांख्यवादियोंके गुणोंकी भाँति आत्मा सदा चलन-स्वभाववाला है? अथवा बौद्धमतावलम्बियोंके प्रतिक्षणमें नष्ट होनेवाले (रूप, वेदना, विज्ञान, संज्ञा और संस्काररूप) पञ्चस्कन्धोंकी भाँति क्रिया ही कारक है? इन दोनों ही प्रकारोंसे कर्मोंका अशेषतः त्याग नहीं हो सकता।
हाँ, तीसरा एक पक्ष और भी है कि जब आत्मा कर्म करता है तब तो वह सक्रिय होता है और जब कर्म नहीं करता, तब वही निष्क्रिय होता है, ऐसा मान लेनेसे कर्मोंका अशेषतः त्याग भी हो सकता है।
इस तीसरे पक्षमें यह विशेषता है कि न तो आत्मा नित्य चलन-स्वभाववाला माना गया है और न क्रियाको ही कारक माना गया है, तो फिर क्या है कि अपने स्वरूपमें स्थित द्रव्यमें ही अविद्यमान क्रिया उत्पन्न हो जाती है और विद्यमान क्रियाका नाश हो जाता है? शुद्ध द्रव्य क्रियाकी शक्तिसे युक्त होकर स्थित रहता है और वही कारक है। इस प्रकार वैशेषिकमतावलम्बी कहते हैं।
पू0—इस पक्षमें क्या दोष है?
उ0—इसमें प्रधान दोष तो यही है कि यह मत भगवान्को मान्य नहीं है।
पू0—यह कैसे जाना जाता है।
उ0—इसीलिये कि भगवान् तो “असत् वस्तुका कभी भाव नहीं होता” इत्यादि वचन कहते हैं और वैशेषिक-मतवादी असत्का भाव और सत्का अभाव मानते हैं।
पू0—भगवान्का मत न होनेपर भी यदि न्याययुक्त हो तो इसमें क्या दोष है?
उ0—बतलाते हैं (सुनो) सब प्रमाणोंसे इस मतका विरोध होनेके कारण भी यह मत दोषयुक्त है।
पू0—किस प्रकार?
उ0—यदि यह माना जाय कि द्व्यणुक आदि द्रव्य उत्पत्तिसे पहले अत्यन्त असत् हुए ही उत्पन्न हो जाते हैं और किञ्चित् काल स्थित रहकर फिर अत्यन्त ही असत् भावको प्राप्त हो जाते हैं, तब तो यही मानना हुआ कि असत् ही सत् हो जाता है अर्थात् अभाव भाव हो जाता है और भाव अभाव हो जाता है।
अर्थात् (यह मानना हुआ कि) उत्पन्न होनेवाला अभाव, उत्पत्तिसे पहले शश-शृङ्गकी भाँति सर्वथा असत् होता हुआ ही समवायि, असमवायि और निमित्त नामक तीन कारणोंकी सहायतासे उत्पन्न होता है।
परंतु अभाव इस प्रकार उत्पन्न होता है अथवा कारणकी अपेक्षा रखता है—यह कहना नहीं बनता; क्योंकि खरगोशके सींग आदि असत् वस्तुओंमें ऐसा नहीं देखा जाता।
हाँ, यदि यह माना जाय कि उत्पन्न होनेवाले घटादि भावरूप हैं और वे अभिव्यक्तिके किसी कारणकी सहायतासे उत्पन्न होते हैं, तो यह माना जा सकता है।
तथा असत्का सत् और सत्का असत् होना मान लेनेपर तो किसीका प्रमाण-प्रमेय-व्यवहारमें कहीं विश्वास ही नहीं रहेगा; क्योंकि ऐसा मान लेनेसे फिर यह निश्चय नहीं होगा कि सत् सत् ही है और असत् असत् ही है।
इसके सिवा वे “उत्पन्न होता है” इस वाक्यसे द्व्यणुक आदि द्रव्यका अपने कारण और सत्तासे सम्बन्ध होना बतलाते हैं अर्थात् उत्पत्तिसे पहले कार्य असत् होता है, फिर अपने कारणके व्यापारकी अपेक्षासे (सहायतासे) अपने कारणरूप परमाणुओंसे और सत्तासे समवायरूप सम्बन्धके द्वारा संगठित हो जाता है और संगठित होकर कारणसे मिलकर सत् हो जाता है।
इसपर उनको बतलाना चाहिये कि असत्का कारण सत् कैसे हो सकता है? और असत्का किसीके साथ सम्बन्ध भी कैसे हो सकता है? क्योंकि वन्ध्यापुत्रकी सत्ता, उसका किसी सत् पदार्थके साथ सम्बन्ध अथवा उसका कारण किसीके भी द्वारा प्रमाणपूर्वक सिद्ध नहीं किया जा सकता।
पू0—वैशेषिक-मतवादी अभावका सम्बन्ध नहीं मानते। वे तो भावरूप द्व्यणुक आदि द्रव्योंका ही अपने कारणके साथ समवायरूप सम्बन्ध बतलाते हैं।
उ0—यह बात नहीं है; क्योंकि (उनके मतमें) कार्य-कारणका सम्बन्ध होनेसे पहले कार्यकी सत्ता नहीं मानी गयी। अर्थात् वैशेषिक-मतावलम्बी कुम्हार और दण्ड-चक्र आदिकी क्रिया आरम्भ होनेसे पहले घट आदिका अस्तित्व नहीं मानते और यह भी नहीं मानते कि मिट्टीको ही घटादिके आकारकी प्राप्ति हुई है। इसलिये अन्तमें असत्का ही सम्बन्ध मानना सिद्ध होता है।
पू0—असत्का भी समवायरूप सम्बन्ध होना विरुद्ध नहीं है।
उ0—यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि वन्ध्यापुत्र आदिका किसीके साथ सम्बन्ध नहीं देखा जाता।
अभावकी समानता होनेपर भी यदि कहो कि घटादिके प्रागभावका ही अपने कारणके साथ सम्बन्ध होता है, वन्ध्यापुत्रादिके अभावका नहीं, तो इनके अभावोंका भेद बतलाना चाहिये।
एकका अभाव, दोका अभाव, सबका अभाव, प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अन्योन्याभाव, अत्यन्ताभाव— इन लक्षणोंसे कोई भी अभावकी विशेषता नहीं दिखला सकता।
फिर किसी प्रकारकी विशेषता न होते हुए भी यह कहना कि घटका प्रागभाव ही कुम्हार आदिके द्वारा घटभावको प्राप्त होता है तथा उसका कपाल नामक अपने कारणरूप भावसे सम्बन्ध होता है और वह सब व्यवहारके योग्य भी होता है। परंतु उसी घटका जो प्रध्वंसाभाव है, वह अभावत्वमें समान होनेपर भी सम्बन्धित नहीं होता। इस तरह प्रध्वंसादि अभावोंको किसी भी अवस्थामें व्यवहारके योग्य न मानना और केवल द्व्यणुक आदि द्रव्य नामक प्रागभावको ही उत्पत्ति आदि व्यवहारके योग्य मानना, असमञ्जसरूप ही है; क्योंकि अत्यन्ताभाव और प्रध्वंसाभावके समान ही प्रागभावका भी अभावत्व है, उसमें कोई विशेषता नहीं है।
पू0—हमने प्रागभावका भावरूप होना नहीं बतलाया है।
उ0—तब तो तुमने भावका ही भावरूप हो जाना कहा है, जैसे घटका घटरूप हो जाना, वस्त्रका वस्त्ररूप हो जाना; परंतु यह भी अभावके भावरूप होनेकी भाँति ही प्रमाण-विरु द्ध है।
सांख्य-मतावलम्बियोंका जो परिणामवाद है, उसमें अपूर्व धर्मकी उत्पत्ति और विनाश स्वीकार किया जानेके कारण, वह भी (इस विषयमें) वैशेषिक-मतसे कुछ विशेषता नहीं रखता।
अभिव्यक्ति (प्रकट होना) और तिरोभाव (छिप जाना) स्वीकार करनेसे भी अभिव्यक्ति और तिरोभावकी विद्यमानता और अविद्यमानताका निरूपण करनेमें पहलेकी भाँति ही प्रमाणसे विरोध होगा।
इस विवेचनसे “कारणका कार्यरूपमें स्थित होना ही उत्पत्ति आदि हैं” ऐसा निरूपण करनेवाले मतका भी खण्डन हो जाता है।
इन सब मतोंका खण्डन हो जानेपर अन्तमें यही सिद्ध होता है कि “एक ही सत्य तत्त्व (आत्मा) अविद्याद्वारा नटकी भाँति उत्पत्ति, विनाश आदि धर्मोंसे अनेक रूपमें कल्पित होता है।” यही भगवान्का अभिप्राय “नासतो विद्यते भावः” इस श्लोकमें बतलाया गया है; क्योंकि सत्प्रत्ययका व्यभिचार नहीं होता और अन्य (असत्) प्रत्ययोंका व्यभिचार होता है (अतः सत् ही एकमात्र तत्त्व है)।
पू0—यदि (भगवान्के मतमें) आत्मा निर्विकार है तो (वे) यह कैसे कहते हैं कि “अशेषतः कर्मोंका त्याग नहीं हो सकता?”
उ0—शरीर-इन्द्रियादिरूप गुण चाहे सत्य वस्तु हों, चाहे अविद्याकल्पित हों, जब कर्म उन्हींका धर्म है, तब आत्मामें तो वह अविद्याध्यारोपित ही है। इस कारण “कोई भी अज्ञानी अशेषतः कर्मोंका त्याग क्षणभर भी नहीं कर सकता” यह कहा गया है।
परंतु विद्याद्वारा अविद्या निवृत्त हो जानेपर ज्ञानी तो कर्मोंका अशेषतः त्याग कर ही सकता है; क्योंकि अविद्या नष्ट होनेके उपरान्त, अविद्यासे अध्यारोपित वस्तुका अंश बाकी नहीं रह सकता।
(यह प्रत्यक्ष ही है कि) तिमिर-रोगसे विकृत हुई दृष्टिद्वारा अध्यारोपित दो चन्द्रमा आदिका कुछ भी अंश तिमिर-रोग नष्ट हो जानेपर शेष नहीं रहता।
सुतरां “सब कर्मोंको मनसे छोड़कर” इत्यादि कथन ठीक ही हैं। तथा “अपने-अपने कर्मोंमें लगे हुए मनुष्य संसिद्धिको प्राप्त होते हैं” “मनुष्य अपने कर्मोंसे उसकी पूजा करके सिद्धि प्राप्त करता है”— ये कथन भी ठीक हैं॥ 48॥
या च कर्मजा सिद्धिः उक्ता ज्ञाननिष्ठा-योग्यतालक्षणा तस्याः फलभूता नैष्कर्म्यसिद्धिः ज्ञाननिष्ठालक्षणा
वक्तव्या
इति
श्लोक आरभ्यते—
ज्ञाननिष्ठाकी योग्यताप्राप्तिरूप जो कर्मजनित सिद्धि कही गयी है, उसकी फलभूत ज्ञाननिष्ठारूप नैष्कर्म्यसिद्धि भी कही जानी चाहिये। इसलिये अगला श्लोक आरम्भ किया जाता है—
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असक्तबुद्धिः असक्ता सङ्गरहिता बुद्धिः अन्तःकरणं यस्य सः असक्तबुद्धिः सर्वत्र पुत्रदारादिषु आसक्ति निमित्तेषु।
जितात्मा जितो वशीकृत आत्मा अन्तःकरणं यस्य स जितात्मा।
विगतस्पृहो विगता स्पृहा तृष्णा देहजीवित-भोगेषु यस्मात् स विगतस्पृहः।
य एवम्भूत आत्मज्ञः स नैष्कर्म्यसिद्धिं निर्गतानि कर्माणि यस्माद् निष्क्रियब्रह्मात्म-सम्बोधात् स निष्कर्मा तस्य भावो नैष्कर्म्यं नैष्कर्म्यं
च
तत्
सिद्धिः
च
सा नैष्कर्म्यसिद्धिः
नैष्कर्म्यस्य
वा
सिद्धिः निष्क्रियात्मस्वरूपावस्थानलक्षणस्य सिद्धिः निष्पत्तिः तां नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां प्रकृष्टां कर्मजसिद्धिविलक्षणां सद्योमुक्त्यवस्थानरूपां सन्न्यासेन सम्यग्दर्शनेन तत्पूर्वकेण वा सर्वकर्म-सन्न्यासेन अधिगच्छति प्राप्नोति। तथा च उक्तम् “सर्वकर्माणि मनसा सन्न्यस्य नैव कुर्वन्न कारयन्नास्ते” इति॥ 49॥
जो सर्वत्र असक्तबुद्धि है—पुत्र, स्त्री आदि जो आसक्तिके स्थान हैं, उन सबमें जिसका अन्तःकरण आसक्तिसे—प्रीतिसे रहित हो चुका है।
जो जितात्मा है—जिसका आत्मा यानी अन्तःकरण जीता हुआ है अर्थात् वशमें किया हुआ है।
जो स्पृहारहित है—शरीर, जीवन और भोगोंमें भी जिसकी स्पृहा—तृष्णा नष्ट हो गयी है।
जो ऐसा आत्मज्ञानी है, वह परम नैष्कर्म्य-सिद्धिको (प्राप्त करता है)। निष्क्रिय ब्रह्म ही आत्मा है यह ज्ञान होनेके कारण जिसके सर्वकर्म निवृत्त हो गये हैं वह “निष्कर्मा” है। उसके भावका नाम “नैष्कर्म्य” है और निष्कर्मतारूप सिद्धिका नाम “नैष्कर्म्यसिद्धि” है। अथवा निष्क्रिय आत्मस्वरूपसे स्थित होनारूप निष्कर्मताका सिद्ध होना ही “नैष्कर्म्यसिद्धि” है। ऐसी जो कर्मजनित सिद्धिसे विलक्षण और सद्योमुक्तिमें स्थित होनारूप उत्तम सिद्धि है, उसको संन्यासके द्वारा, यानी यथार्थ ज्ञानसे अथवा ज्ञानपूर्वक सर्वकर्मसंन्यासके द्वारा लाभ करता है; ऐसा ही कहा भी है कि “सब कर्मोंको मनसे छोड़कर न करता हुआ और न करवाता हुआ रहता है”॥ 49॥
पूर्वोक्तेन स्वकर्मानुष्ठानेन ईश्वराभ्यर्चन-रूपेण जनितां प्रागुक्तलक्षणां सिद्धिं प्राप्तस्य उत्पन्नात्मविवेकज्ञानस्य केवलात्मज्ञाननिष्ठारूपा नैष्कर्म्यलक्षणा सिद्धिः येन क्रमेण भवति तद् वक्तव्यम् इति आह—
पूर्वोक्त स्वधर्मानुष्ठानद्वारा ईश्वरार्चनरूप साधनसे उत्पन्न हुई ज्ञाननिष्ठा-प्राप्तिकी योग्यतारूप सिद्धिको जो प्राप्त कर चुका है और जिसमें आत्मविषयक विवेकज्ञान उत्पन्न हो गया है, उस पुरुषको जिस क्रमसे केवल आत्म-ज्ञाननिष्ठारूप नैष्कर्म्यसिद्धि मिलती है, वह (क्रम) बतलाना है, अतः कहते हैं—
भाष्य35 paragraphs · खोलें
सिद्धिं प्राप्तः स्वकर्मणा ईश्वरं समभ्यर्च्य तत्प्रसादजां कायेन्द्रियाणां ज्ञाननिष्ठायोग्यता-लक्षणां सिद्धिं प्राप्तः सिद्धिं प्राप्त इति तदनुवाद उत्तरार्थः।
किं तद् उत्तरं यदर्थः अनुवाद इति उच्यते।
यथा येन प्रकारेण ज्ञाननिष्ठारूपेण ब्रह्म परमात्मानम् आप्नोति तथा तं प्रकारं ज्ञाननिष्ठा-प्राप्तिक्रमं मे मम वचनाद् निबोध त्वं निश्चयेन अवधारय इति एतत्।
किं विस्तरेण, न इति आह समासेन एव सङ्क्षेपेण एव हे कौन्तेय। यथा ब्रह्म प्राप्नोति तथा निबोध इति अनेन या प्रतिज्ञाता ब्रह्म-प्राप्तिः ताम् इदन्तया दर्शयितुम् आह निष्ठा ज्ञानस्य या परा इति, निष्ठा पर्यवसानं परि-समाप्तिः इति एतत्। कस्य, ब्रह्मज्ञानस्य या परा परिसमाप्तिः।
कीदृशी सा, यादृशम् आत्मज्ञानम्। कीदृक् तत्, यादृश आत्मा। कीदृशः असौ, यादृशो भगवता उक्त उपनिषद्वाक्यैः च न्यायतः च।
ननु विषयाकारं ज्ञानं न विषयो न अपि आकारवान् आत्मा इष्यते क्वचित्।
ननु “आदित्यवर्णम्” “भारूपः” “स्वयञ्ज्योतिः” इति आकारवत्त्वम् आत्मनः श्रूयते।
न, तमोरूपत्वप्रतिषेधार्थत्वात् तेषां वाक्या-नाम्।
द्रव्यगुणाद्याकारप्रतिषेधे
आत्मनः तमोरूपत्वे प्राप्ते तत्प्रतिषेधार्थानि “आदित्यवर्णम्” इत्यादिवाक्यानि, “अरूपम्” इति च विशेषतो रूपप्रतिषेधात्। अविषयत्वात् च “न सदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम्।” (श्वे0 उ0 4। 20) “अशब्दमस्पर्शम्” (क0 उ0 1। 3। 15) इत्याद्यैः।
तस्माद् आत्माकारं ज्ञानम् इति अनुपपन्नम्।
कथं तर्हि आत्मनो ज्ञानम्। सर्वं हि यद्विषयं ज्ञानं तत्तदाकारं भवति निराकारः च आत्मा इति उक्तम्। ज्ञानात्मनोः च उभयोः निराकारत्वे कथं तद्भावनानिष्ठ इति।
न, अत्यन्तनिर्मलत्वस्वच्छत्वसूक्ष्मत्वोपपत्तेः आत्मनो बुद्धेः च आत्मसमनैर्मल्याद्युपपत्तेः आत्मचैतन्याकाराभासत्वोपपत्तिः।
बुद्ध्याभासं मनः तदाभासानि इन्द्रियाणि इन्द्रियाभासः च देहः अतो लौकिकैः देहमात्रे एव आत्मदृष्टिः क्रियते।
देहचैतन्यवादिनः
च
लोकायतिकाः चैतन्यविशिष्टः कायः पुरुष इति आहुः तथा अन्ये इन्द्रियचैतन्यवादिनः। अन्ये मनश्चैतन्य-वादिनः। अन्ये बुद्धिचैतन्यवादिनः।
ततः अपि अन्तरव्यक्तम् अव्याकृताख्यम्। अविद्यावस्थम् आत्मत्वेन प्रतिपन्नाः केचित्।
सर्वत्र हि बुद्ध्यादिदेहान्ते आत्मचैतन्या-भासता आत्मभ्रान्तिकारणम् इति।
अत आत्मविषयं ज्ञानं न विधातव्यम्, किं तर्हि, नामरूपाद्यनात्माध्यारोपणनिवृत्तिः एव कार्या न आत्मचैतन्यविज्ञानम् अविद्याध्यारोपित-सर्वपदार्थाकारैः एव विशिष्टतया गृह्य-माणत्वात्।
अत एव हि विज्ञानवादिनो बौद्धा विज्ञान-व्यतिरेकेण वस्तु एव न अस्ति इति प्रतिपन्नाः प्रमाणान्तरनिरपेक्षतां च स्वसंविदितत्वाभ्युप-गमेन।
तस्माद्
अविद्याध्यारोपणनिराकरणमात्रं ब्रह्मणि कर्तव्यं न तु ब्रह्मज्ञाने यत्नः अत्यन्तप्रसिद्धत्वात्।
अविद्याकल्पितनामरूपविशेषाकारापहृत-बुद्धित्वाद् अत्यन्तप्रसिद्धं सुविज्ञेयम् आसन्नतरम् आत्मभूतम् अपि अप्रसिद्धं दुर्विज्ञेयम् अतिदूरम् अन्यद् इव च प्रतिभाति अविवेकिनाम्।
बाह्याकारनिवृत्तबुद्धीनां तु लब्धगुर्वात्म-प्रसादानां न अतः परं सुखं सुप्रसिद्धं सुविज्ञेयं स्वासन्नम् अस्ति। तथा च उक्तम् “प्रत्यक्षावगमं धर्म्यम्” इत्यादि।
केचित् तु पण्डितम्मन्या निराकारत्वाद् आत्मवस्तु न उपैति बुद्धिः अतो दुःसाध्या सम्यग्ज्ञाननिष्ठा इति आहुः।
सत्यम् एवम्, गुरुसम्प्रदायरहितानाम् अश्रुत-वेदान्तानाम्
अत्यन्तबहिर्विषयासक्तबुद्धीनां सम्यक्प्रमाणेषु अकृतश्रमाणाम्, तद्विपरीतानां तु लौकिकग्राह्यग्राहकद्वैतवस्तुनि सद्बुद्धिः नितरां दुःसम्पाद्या आत्मचैतन्यव्यतिरेकेण वस्त्वन्तरस्य अनुपलब्धेः।
यथा च एतद् एवम् एव न अन्यथा इति अवोचाम। उक्तं च भगवता—“यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः” इति।
तस्माद् बाह्याकारभेदबुद्धिनिवृत्तिः एव आत्मस्वरूपालम्बने कारणम्। न हि आत्मा नाम कस्यचित् कदाचिद् अप्रसिद्धः प्राप्यो हेय उपादेयो वा।
अप्रसिद्धे हि तस्मिन् आत्मनि अस्वार्थाः सर्वाः प्रवृत्तयः प्रसज्येरन्। न च देहाद्यचेत-नार्थत्वं शक्यं कल्पयितुम्। न च सुखार्थं सुखं दुःखार्थं वा दुःखम् आत्मावगत्यवसा-नार्थत्वात् च सर्वव्यवहारस्य।
तस्माद् यथा स्वदेहस्य परिच्छेदाय न प्रमाणान्तरापेक्षा ततः अपि आत्मनः अन्तर-तमत्वात् तदवगतिं प्रति न प्रमाणान्तरापेक्षा इति आत्मज्ञाननिष्ठा विवेकिनां सुप्रसिद्धा इति सिद्धम्।
येषाम् अपि निराकारं ज्ञानम् अप्रत्यक्षं तेषाम् अपि ज्ञानवशा एव ज्ञेयावगतिः इति ज्ञानम् अत्यन्तं प्रसिद्धं सुखादिवद् एवं इति अभ्युपगन्तव्यम्।
जिज्ञासानुपपत्तेः च। अप्रसिद्धं चेद् ज्ञानं ज्ञेयवद् जिज्ञास्येत। तथा ज्ञेयं घटादिलक्षणं ज्ञानेन ज्ञाता व्याप्तुम् इच्छति तथा ज्ञानम् अपि ज्ञानान्तरेण ज्ञाता व्याप्तुम् इच्छेत्। न च एतद् अस्ति।
अतः अत्यन्तप्रसिद्धं ज्ञानं ज्ञाता अपि अत एव प्रसिद्ध इति। तस्माद् ज्ञाने यत्नो न कर्तव्यः किं तु अनात्मबुद्धिनिवृत्तौ एव। तस्माद् ज्ञाननिष्ठा सुसम्पाद्या॥ 50॥
सिद्धिको प्राप्त हुआ, अर्थात् अपने कर्मोंद्वारा ईश्वरकी पूजा करके, उसकी कृपासे उत्पन्न हुई शरीर और इन्द्रियोंकी ज्ञाननिष्ठा-प्राप्तिकी योग्यतारूप सिद्धिको प्राप्त हुआ पुरुष—यह पुनरुक्ति आगे कहे जानेवाले वचनोंके साथ सम्बन्ध जोड़नेके लिये है।
वे आगे कहे जानेवाले वचन कौन-से हैं जिनके लिये पुनरुक्ति है? सो बतलाते हैं—
जिस ज्ञाननिष्ठारूप प्रकारसे (साधक) ब्रह्मको— परमात्माको पाता है, उस प्रकारको यानी ज्ञाननिष्ठा-प्राप्तिके क्रमको तू मेरे वचनोंसे निश्चयपूर्वक समझ।
क्या (उसका) विस्तारपूर्वक (वर्णन करेंगे?) इसपर कहते हैं कि नहीं। हे कौन्तेय! समाससे अर्थात् संक्षेपसे ही, जिस क्रमसे ब्रह्मको प्राप्त होता है, उसे समझ। इस वाक्यसे जिस ब्रह्म-प्राप्तिके लिये प्रतिज्ञा की थी, उसे इदंरूपसे (स्पष्ट) दिखानेके लिये कहते हैं कि ज्ञानकी जो परानिष्ठा है उसको सुन। अन्तिम अवधि-परिसमाप्तिका नाम निष्ठा है। ऐसी जो ब्रह्मज्ञानकी परमावधि है (उसको सुन)।
वह (ब्रह्मज्ञानकी निष्ठा) कैसी है? जैसा कि आत्मज्ञान है। वह कैसा है? जैसा आत्मा है। वह (आत्मा) कैसा है? जैसा भगवान्ने बतलाया है तथा जैसा उपनिषद्वाक्योंद्वारा कहा गया है और जैसा न्यायसे सिद्ध है।
पू0—ज्ञान विषयाकार होता है, परंतु आत्मा न तो कहीं भी विषय माना जाता है और न आकारवान् ही।
उ0—किंतु “आदित्यवर्ण” “प्रकाशस्वरूप” “स्वयं-ज्योति” इस तरह आत्माका आकारवान् होना तो श्रुतिमें कहा है।
पू0—यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि वे वाक्य तमःस्वरूपत्वका निषेध करनेके लिये कहे गये हैं। अर्थात् आत्मामें द्रव्यगुण आदिके आकारका प्रतिषेध करनेपर जो आत्माके अन्धकाररूप माने जानेकी आशङ्का होती है, उसका प्रतिषेध करनेके लिये ही “आदित्यवर्णम्” इत्यादि वाक्य हैं; क्योंकि “अरूपम्” आदि वाक्योंसे विशेषतः रूपका प्रतिषेध किया गया है और “इसका (आत्माका) रूप इन्द्रियोंके सामने नहीं ठहरता, इसको (आत्माको) कोई भी आँखोंसे नहीं देख सकता” “यह अशब्द है, अस्पर्श है” इत्यादि वचनोंसे भी आत्मा किसीका विषय नहीं है, यह बात कही गयी है।
सुतरां “जैसा आत्मा है वैसा ही ज्ञान है” यह कहना युक्तियुक्त नहीं है।
तब फिर आत्माका ज्ञान कैसे होता है? क्योंकि सभी ज्ञान जिसको विषय करते हैं उसीके आकारवाले होते हैं और “आत्मा निराकार है” ऐसा कहा है। फिर ज्ञान और आत्मा दोनों निराकार होनेसे उसमें भावना और निष्ठा कैसे हो सकती है?
उ0—यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि आत्माका अत्यन्त निर्मलत्व, स्वच्छत्व और सूक्ष्मत्व सिद्ध है और बुद्धिका भी आत्माके सदृश निर्मलत्व आदि सिद्ध है, इसलिये उसका आत्मचैतन्यके आकारसे आभासित होना बन सकता है।
बुद्धिसे आभासित मन, मनसे आभासित इन्द्रियाँ और इन्द्रियोंसे आभासित स्थूल शरीर है। इसलिये सांसारिक मनुष्य देहमात्रमें ही आत्मदृष्टि करते हैं।
देहात्मवादी लोकायतिक, “चेतनताविशिष्ट शरीर ही आत्मा है” ऐसा कहते हैं, दूसरे, इन्द्रियोंको चेतन कहनेवाले हैं तथा कोई मनको और कोई बुद्धिको चेतन कहनेवाले हैं।
कितने ही उस बुद्धिके भी भीतर व्याप्त, अव्यक्तको—अव्याकृतसंज्ञक अविद्यावस्थ (चिदा-भास)-को आत्मरूपसे समझनेवाले हैं।
बुद्धिसे लेकर शरीरपर्यन्त सभी जगह आत्म-चैतन्यका आभास ही उनमें आत्माकी भ्रान्तिका कारण है।
अतः (यह सिद्ध हुआ कि) आत्मविषयक ज्ञान विधेय नहीं है। तो क्या विधेय है? नाम-रूप आदि अनात्मा वस्तुओंका जो आत्मामें अध्यारोप है उसकी निवृत्ति ही कर्तव्य है। आत्मचैतन्यका विज्ञान प्राप्त करना नहीं है; क्योंकि ज्ञान अविद्याद्वारा आरोपित समस्त पदार्थोंके आकारमें ही विशेषरूपसे ग्रहण किया हुआ है।
यही कारण है कि विज्ञानवादी बौद्ध “विज्ञानसे अतिरिक्त अन्य कोई वस्तु ही नहीं है” इस प्रकार मानते हैं; और उस ज्ञानको स्वसंवेद्य माननेके कारण प्रमाणान्तरकी आवश्यकता नहीं मानते।
सुतरां ब्रह्ममें जो अविद्याद्वारा अध्यारोप किया गया है, उसका निराकरणमात्र कर्तव्य है। ब्रह्मज्ञानके लिये प्रयत्न कर्तव्य नहीं है; क्योंकि ब्रह्म तो अत्यन्त प्रसिद्ध ही है।
ब्रह्म यद्यपि अत्यन्त प्रसिद्ध, सुविज्ञेय, अति समीप और आत्मस्वरूप है तो भी वह विवेकरहित मनुष्योंको अविद्याकल्पित नाम-रूपके भेदसे उनकी बुद्धि भ्रमित हो जानेके कारण अप्रसिद्ध, दुर्विज्ञेय, अति दूर और दूसरा-सा प्रतीत हो रहा है।
परंतु जिनकी बाह्याकार बुद्धि निवृत्त हो गयी है, जिन्होंने गुरु और आत्माकी कृपा लाभ कर ली है, उनके लिये इससे अधिक सुप्रसिद्ध, सुविज्ञेय, सुखस्वरूप और अपने समीप कुछ भी नहीं है। “प्रत्यक्ष-उपलब्ध धर्ममय” इत्यादि वाक्योंसे भी यही बात कही गयी है।
कितने ही अपनेको पण्डित माननेवाले यों कहते हैं कि आत्मतत्त्व निराकार होनेके कारण उसको बुद्धि नहीं पा सकती; अतः सम्यग् ज्ञाननिष्ठा दुःसाध्य है।
ठीक है, जो गुरु-परम्परासे रहित हैं, जिन्होंने वेदान्त-वाक्योंको (विधिपूर्वक) नहीं सुना है, जिनकी बुद्धि सांसारिक विषयोंमें अत्यन्त आसक्त हो रही है, जिन्होंने यथार्थ ज्ञान करानेवाले प्रमाणोंमें परिश्रम नहीं किया है, उनके लिये यही बात है। परंतु जो उनसे विपरीत हैं, उनके लिये तो लौकिक ग्राह्य-ग्राहक-भेदयुक्त वस्तुओंमें सद्भाव सम्पादन करना (इनको सत्य समझना) अत्यन्त कठिन है; क्योंकि उनको आत्मचैतन्यसे अतिरिक्त दूसरी वस्तुकी उपलब्धि ही नहीं होती।
यह ठीक इसी तरह है, अन्यथा नहीं है। यह बात हम पहले सिद्ध कर आये हैं और भगवान्ने भी कहा है कि “जिसमें सब प्राणी जागते हैं, ज्ञानी मुनिकी वही रात्रि है” इत्यादि।
सुतरां आत्मस्वरूपके अवलम्बनमें, बाह्य नानाकार भेदबुद्धिकी निवृत्ति ही कारण है; क्योंकि आत्मा कभी किसीके भी लिये अप्रसिद्ध, प्राप्तव्य, त्याज्य या उपादेय नहीं हो सकता।
आत्माको अप्रसिद्ध मान लेनेपर तो सभी प्रवृत्तियोंको निरर्थक मानना सिद्ध होगा। इसके सिवा न तो यह कल्पना की जा सकती है कि अचेतन शरीरादिके लिये (सब कर्म किये जाते हैं) और न यही कि सुखके लिये सुख है या दुःखके लिये दुःख है; क्योंकि सारे व्यवहारका प्रयोजन अन्तमें आत्माके ज्ञानका विषय बन जाना है।
इसलिये, जैसे अपने शरीरको जाननेके लिये अन्य प्रमाणकी अपेक्षा नहीं है, वैसे ही आत्मा उससे भी अधिक अन्तरतम होनेके कारण आत्माको जाननेके लिये प्रमाणान्तरकी आवश्यकता नहीं है; अतः यह सिद्ध हुआ कि विवेकियोंके लिये आत्मज्ञाननिष्ठा सुप्रसिद्ध है।
जिनके मतमें ज्ञान निराकार और अप्रत्यक्ष है उनको भी ज्ञेयका बोध (अनुभव) ज्ञानके ही अधीन होनेके कारण सुखादिकी तरह ही ज्ञान अत्यन्त प्रसिद्ध है, यह मान लेना चाहिये।
तथा ज्ञानको जाननेके लिये जिज्ञासा नहीं होती, इसलिये भी (यह मान लेना चाहिये कि ज्ञान प्रत्यक्ष है) यदि ज्ञान अप्रत्यक्ष होता तो अन्य ज्ञेय वस्तुओंकी तरह उसको भी जाननेके लिये इच्छा की जाती, अर्थात् जैसे ज्ञाता (पुरुष) घटादिरूप ज्ञेय पदार्थोंका ज्ञानके द्वारा अनुभव करना चाहता है, उसी तरह उस ज्ञानको भी अन्य ज्ञानके द्वारा जाननेकी इच्छा करता, परंतु यह बात नहीं है।
सुतरां ज्ञान अत्यन्त प्रत्यक्ष है और इसीलिये ज्ञाता भी अत्यन्त ही प्रत्यक्ष है। अतः ज्ञानके लिये प्रयत्न कर्तव्य नहीं है, किंतु अनात्मबुद्धिकी निवृत्तिके लिये ही कर्तव्य है; इसीलिये ज्ञाननिष्ठा सुसंपाद्य है॥ 50॥
सा इयं ज्ञानस्य परा निष्ठा उच्यते कथं कार्या इति—
वह ज्ञानकी परा निष्ठा किस प्रकार करनी चाहिये? सो कहते हैं—
बुद्ध्या
अध्यवसायात्मिकया
विशुद्धया मायारहितया युक्तः सम्पन्नो धृत्या धैर्येण आत्मानं कार्यकरणसङ्घातं नियम्य च नियमनं कृत्वा वशीकृत्य शब्दादीन् शब्द आदिः येषां ते शब्दादयः तान् विषयान् त्यक्त्वा। सामर्थ्यात् शरीरस्थितिमात्रान् केवलान् मुक्त्वा ततः अधिकान्
सुखार्थान्
त्यक्त्वा
इत्यर्थः। शरीरस्थित्यर्थत्वेन प्राप्तेषु च रागद्वेषौ व्युदस्य च परित्यज्य॥ 51॥
विशुद्ध—कपटरहित निश्चयात्मिका बुद्धिसे सम्पन्न पुरुष, धैर्यसे कार्य-करणके संघातरूप आत्माको (शरीरको) संयम करके—वशमें करके शब्दादि विषयोंको, अर्थात् शब्द जिनका आदि है ऐसे सभी विषयोंको छोड़कर, प्रकरणके अनुसार यहाँ यह अभिप्राय है कि केवल शरीरस्थितिमात्रके लिये जिन विषयोंकी आवश्यकता है, उनसे अतिरिक्त सुखभोगके लिये जो अधिक विषय हैं, उन सबको छोड़कर तथा शरीरस्थितिके निमित्त प्राप्त हुए विषयोंमें भी राग-द्वेषका अभाव करके—त्याग करके॥ 51॥
ततः—
उसके बाद—
विविक्तसेवी अरण्यनदीपुलिनगिरिगुहादीन् विविक्तान् देशान् सेवितुं शीलम् अस्य इति विविक्तसेवी।
लघ्वाशी
लघ्वशनशीलः। विविक्तसेवालघ्वशनयोः निद्रादिदोषनिवर्तकत्वेन चित्तप्रसादहेतुत्वाद् ग्रहणम्।
यतवाक्कायमानसो वाक् च कायः च मानसं च यतानि संयतानि यस्य ज्ञाननिष्ठस्य स ज्ञाननिष्ठो यतिः यतवाक्कायमानसः स्यात्। एवम् उपरतसर्वकरणः सन्,
ध्यानयोगपरो ध्यानम् आत्मस्वरूपचिन्तनं योग आत्मविषये एव एकाग्रीकरणं तौ ध्यानयोगौ परत्वेन कर्तव्यौ यस्य स ध्यान-योगपरः। नित्यं नित्यग्रहणं मन्त्रजपाद्यन्य-कर्तव्याभावप्रदर्शनार्थम्।
वैराग्यं विरागभावो दृष्टादृष्टेषु विषयेषु वैतृष्ण्यं समुपाश्रितः सम्यग् उपाश्रितो नित्यम् एव इत्यर्थः॥ 52॥
विविक्त देशका सेवन करनेवाला—अर्थात् वन, नदी-तीर, पहाड़की गुफा आदि एकान्त देशका सेवन करना ही जिसका स्वभाव है ऐसा, और हलका आहार करनेवाला होकर, “एकान्त-सेवन” और “हलका भोजन” यह दोनों निद्रादि दोषोंके निवर्तक होनेसे चित्तकी स्वच्छतामें हेतु हैं, इसलिये इनका ग्रहण किया गया है।
तथा मन, वाणी और शरीरको वशमें करनेवाला होकर, अर्थात् जिस ज्ञाननिष्ठ यतिके काया, मन और वाणी तीनों जीते हुए होते हैं, वह “यतवाक्कायमानस” होता है—इस प्रकार सब इन्द्रियोंको कर्मोंसे उपराम करके,
तथा नित्य ध्यानयोगके परायण रहता हुआ, आत्मस्वरूप-चिन्तनका नाम ध्यान है और आत्मामें चित्तको एकाग्र करनेका नाम योग है, यह दोनों प्रधानरूपसे जिसके कर्तव्य हों उसका नाम ध्यानयोगपरायण है, उसके साथ नित्य पदका ग्रहण मन्त्र-जप आदि अन्य कर्तव्योंका अभाव दिखानेके लिये किया गया है।
तथा इस लोक और परलोकके भोगोंमें तृष्णाका अभावरूप जो वैराग्य है, उसके आश्रित होकर अर्थात् सदा वैराग्यसम्पन्न होकर॥ 52॥
किं च—
तथा—
अहङ्कारम् अहङ्करणम् अहङ्कारो देहेन्द्रियादिषु तम् बलं सामर्थ्यं कामरागादियुक्तं न इतरत् शरीरादिसामर्थ्यं स्वाभाविकत्वेन त्यागस्य अशक्यत्वात्। दर्पो नाम हर्षानन्तरभावी धर्मातिक्रमहेतुः “हृष्टो दृप्यति दृप्तो धर्ममति-क्रामति” इति स्मरणात् तं च।
कामम् इच्छां क्रोधं द्वेषं परिग्रहम् इन्द्रिय-मनोगतदोषपरित्यागे अपि शरीरधारणप्रसङ्गेन धर्मानुष्ठाननिमित्तेन वा बाह्यः परिग्रहः प्राप्तः तं च विमुच्य परित्यज्य,
परमहंसपरिव्राजको भूत्वा, देहजीवनमात्रे अपि निर्गतममभावो निर्ममः अत एव शान्त उपरतः। यः संहृतायासो यतिः ज्ञाननिष्ठो ब्रह्मभूयाय
ब्रह्मभवनाय
कल्पते
समर्थो भवति॥ 53॥
अहंकार, बल और दर्पको छोड़कर शरीर-इन्द्रियादिमें अहंभाव करनेका नाम “अहंकार” है। कामना और आसक्तिसे युक्त जो सामर्थ्य है उसका नाम “बल” है; यहाँ शरीरादिकी साधारण सामर्थ्यका नाम बल नहीं है, क्योंकि वह स्वाभाविक है, इसलिये उसका त्याग अशक्य है, हर्षके साथ होनेवाला और धर्म-उल्लङ्घनका कारण जो गर्व है उसका नाम “दर्प” है; क्योंकि स्मृतिमें कहा है कि “हर्षयुक्त पुरुष दर्प करता है, दर्प करनेवाला धर्मका उल्लङ्घन किया करता है” इत्यादि।
तथा इच्छाका नाम काम है, द्वेषका नाम क्रोध है, इनका और परिग्रहका भी त्याग करके अर्थात् इन्द्रिय और मनमें रहनेवाले दोषोंका त्याग करनेके पश्चात् भी शरीर-धारणके प्रसङ्गसे या धर्मानुष्ठानके निमित्तसे जो बाह्य संग्रहकी प्राप्ति होती है उसका भी परित्याग करके,
तथा परमहंस परिव्राजक (संन्यासी) होकर एवं देहजीवनमात्रमें भी ममतारहित और इसीलिये जो शान्त—उपरतियुक्त है, ऐसा जो सब परिश्रमोंसे रहित ज्ञाननिष्ठ यति है, वह ब्रह्मरूप होनेके योग्य होता है॥ 53॥
अनेन क्रमेण—
इस क्रमसे—
ब्रह्मभूतो ब्रह्मप्राप्तः प्रसन्नात्मा लब्धाध्यात्म-प्रसादो न शोचति किञ्चिद् अर्थवैकल्याम् आत्मनो वैगुण्यं च उद्दिश्य न शोचति न सन्तप्यते न काङ्क्षति।
ब्रह्मभूतस्य अयं स्वभावः अनूद्यते न शोचति न काङ्क्षति इति।
न हि अप्राप्तविषयाकाङ्क्षा ब्रह्मविद उपपद्यते। न हृष्यति इति वा पाठः।
समः सर्वेषु भूतेषु आत्मौपम्येन सर्वेषु भूतेषु सुखं दुःखं वा समम् एव पश्यति इत्यर्थो न आत्मसमदर्शनम् इह तस्य वक्ष्यमाणत्वात् “भक्त्या मामभिजानाति” इति।
एवम्भूतो ज्ञाननिष्ठो मद्भक्तिं मयि परमेश्वरे भक्तिं भजनं पराम् उत्तमां ज्ञानलक्षणां चतुर्थी लभते “चतुर्विधा भजन्ते माम्” इति उक्तम्॥ 54॥
ब्रह्मको प्राप्त हुआ, प्रसन्नात्मा अर्थात् जिसको अध्यात्मप्रसाद लाभ हो चुका है ऐसा पुरुष न शोक करता है और न आकांक्षा ही करता है। अर्थात् न तो किसी पदार्थकी हानिके या निजसम्बन्धी विगुणताके उद्देश्यसे सन्ताप करता है और न किसी वस्तुको चाहता ही है।
“न शोचति न काङ्क्षति” इस कथनसे ब्रह्मभूत पुरुषके स्वभावका अनुवादमात्र किया गया है।
क्योंकि ब्रह्मवेत्तामें अप्राप्त विषयोंकी आकांक्षा बन ही नहीं सकती। अथवा “न काङ्क्षति” की जगह “न हृष्यति” ऐसा पाठ समझना चाहिये।
तथा जो सब भूतोंमें सम है अर्थात् अपने सदृश सब भूतोंमें सुख और दुःखको जो समान देखता है। इस वाक्यमें आत्माको समभावसे देखना नहीं कहा है; क्योंकि वह तो “भक्त्या मामभिजानाति” इस पदसे आगे कहा जायगा।
ऐसा ज्ञाननिष्ठ पुरुष, मुझ परमेश्वरकी भजनरूप पराभक्तिको पाता है, अर्थात् “चतुर्विधा भजन्ते माम्” इसमें जो चतुर्थ भक्ति कही गयी है उसको पाता है॥ 54॥
ततो ज्ञानलक्षणया—
उसके बाद उस ज्ञानलक्षणा—
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भक्त्या माम् अभिजानाति यावान् अहम् उपाधिकृतविस्तरभेदो यः च अहं विध्वस्त-सर्वोपाधिभेद उत्तमपुरुष आकाशकल्पः तं माम् अद्वैतं चैतन्यमात्रैकरसम् अजम् अजरम् अमरम् अभयम् अनिधनं तत्त्वतः अभिजानाति।
ततो माम् एवं तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरं माम् एव।
न
अत्र
ज्ञानानन्तरप्रवेशक्रिये
भिन्ने विवक्षिते ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् इति, किं तर्हि, फलान्तराभावज्ञानमात्रम् एव, “क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि” इति उक्तत्वात्।
ननु विरुद्धम् इदम् उक्तं ज्ञानस्य या परा निष्ठा तया माम् अभिजानाति इति। कथं विरुद्धम् इति चेद् उच्यते, यदा एव यस्मिन् विषये ज्ञानम् उत्पद्यते ज्ञातुः तदा एव तं विषयम् अभिजानाति ज्ञाता इति न ज्ञाननिष्ठां ज्ञानावृत्तिलक्षणाम् अपेक्षते इति। ततः च ज्ञानेन न अभिजानाति ज्ञानावृत्त्या तु ज्ञाननिष्ठया अभिजानाति इति।
न एष दोषो ज्ञानस्य स्वात्मोत्पत्तिपरिपाक-हेतुयुक्तस्य प्रतिपक्षविहीनस्य यद् आत्मानुभव-निश्चयावसानत्वं तस्य निष्ठाशब्दाभिलापात्।
शास्त्राचार्योपदेशेन ज्ञानोत्पत्तिपरिपाकहेतुं सहकारिकारणं बुद्धिविशुद्ध्यादि अमानित्वादि च अपेक्ष्य जनितस्य क्षेत्रज्ञपरमात्मैकत्व-ज्ञानस्य
कर्त्रादिकारकभेदबुद्धिनिबन्धन-सर्वकर्मसन्न्याससहितस्य स्वात्मानुभवनिश्चय-रूपेण यद् अवस्थानं सा परा ज्ञाननिष्ठा इति उच्यते।
सा इयं ज्ञाननिष्ठा आर्तादिभक्ति त्रयापेक्षया परा चतुर्थी भक्तिः इति उक्ता। तया परया भक्त्या भगवन्तं तत्त्वतः अभिजानाति। यदनन्तरम् एव ईश्वरक्षेत्रज्ञभेदबुद्धिः अशेषतो निवर्तते। अतो ज्ञाननिष्ठालक्षणया भक्त्या माम् अभिजानाति इति वचनं न विरुध्यते।
अत्र च सर्वं निवृत्तिविधायि शास्त्रं वेदान्तेतिहासपुराणस्मृतिलक्षणम् अर्थवद् भवति।
“विदित्वा व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति” (बृह0 उ0 3। 5। 1) “तस्मान्न्यासमेषां तपसामतिरिक्तमाहुः” (ना0 उ0 2। 79) “न्यास एवात्यरेचयत्” (ना0 उ0 2। 78) इति
सन्न्यासः
कर्मणां
न्यासो “वेदानिमं च लोकममुं च परित्यज्य” (आप0 ध0 1। 23। 13) “त्यज धर्ममधर्मं च” (महा0 शां0 329। 40) इत्यादि। इह च दर्शितानि वाक्यानि।
न च तेषां वाक्यानाम् आनर्थक्यं युक्तम्। न च अर्थवादत्वं स्वप्रकरणस्थत्वात्।
प्रत्यगात्माविक्रियस्वरूपनिष्ठत्वात्
च मोक्षस्य। न हि पूर्वसमुद्रं जिगमिषोः प्राति-लोम्येन प्रत्यक्समुद्रं जिगमिषुणा समानमार्गत्वं सम्भवति।
प्रत्यगात्मविषयप्रत्ययसन्तानकरणाभिनिवेशः च ज्ञाननिष्ठा। सा च प्रत्यक्समुद्रगमनवत् कर्मणा सहभावित्वेन विरुध्यते।
पर्वतसर्षपयोः इव अन्तरवान् विरोधः प्रमाणविदां निश्चितः। तस्मात् सर्वकर्मसन्न्या-सेन एव ज्ञाननिष्ठा कार्या इति सिद्धम्॥ 55॥
भक्तिसे मैं जितना हूँ और जो हूँ, उसको तत्त्वसे जान लेता है। अभिप्राय यह है कि मैं जितना हूँ, यानी उपाधिकृत विस्तारभेदसे जितना हूँ और जो हूँ, यानी वास्तवमें समस्त उपाधिभेदसे रहित, उत्तमपुरुष और आकाशकी तरह (व्याप्त) जो मैं हूँ, उस अद्वैत, अजर, अमर, अभय और निधनरहित मुझको तत्त्वसे जान लेता है।
फिर मुझे इस तरह तत्त्वसे जानकर तत्काल मुझमें ही प्रवेश कर जाता है।
यहाँ “ज्ञात्वा” “विशते तदनन्तरम्” इस कथनसे ज्ञान और उसके अनन्तर प्रवेशक्रिया, यह दोनों भिन्न-भिन्न विवक्षित नहीं हैं। तो क्या है? फलान्तरके अभावका ज्ञानमात्र ही विवक्षित है; क्योंकि “क्षेत्रज्ञ भी तू मुझे ही समझ” ऐसे कहा गया है।
पू0—यह कहना विरुद्ध है कि ज्ञानकी जो परा निष्ठा है उससे मुझे जानता है। यदि कहो कि विरुद्ध कैसे है तो बतलाते हैं, जब ज्ञाताको जिस विषयका ज्ञान होता है, वह उसी समय उस विषयको जान लेता है, ज्ञानकी बारम्बार आवृत्ति करनारूप ज्ञाननिष्ठाकी अपेक्षा नहीं करता। इसलिये “वह (ज्ञेय पदार्थको) ज्ञानसे नहीं जानता, ज्ञानावृत्तिरूप ज्ञाननिष्ठासे जानता है” यह कहना विरुद्ध है।
उ0—यह दोष नहीं है; क्योंकि अपनी उत्पत्ति और परिपाकके हेतुओंसे युक्त एवं विरोधरहित ज्ञानका जो अपने स्वरूपानुभवमें निश्चयरूपसे पर्यवसान—स्थित हो जाना है, उसीको निष्ठा शब्दसे कहा गया है।
अभिप्राय यह है कि ज्ञानकी उत्पत्ति और परिपाकके हेतु, जो विशुद्ध-बुद्धि आदि और अमानित्वादि सहकारी कारण हैं, उनकी सहायतासे, शास्त्र और आचार्यके उपदेशसे उत्पन्न हुआ, जो “मैं कर्ता हूँ, मेरा यह कर्म है” इत्यादि कारक-भेदबुद्धिजनित समस्त कर्मोंके संन्याससहित क्षेत्रज्ञ और ईश्वरकी एकताका ज्ञान है, उसका जो अपने स्वरूपके अनुभवमें निश्चयरूपसे स्थित रहना है, उसे “परा ज्ञाननिष्ठा” कहते हैं।
वही यह ज्ञाननिष्ठा आर्त आदि तीन भक्तियोंकी अपेक्षासे चतुर्थ परा भक्ति कही गयी है। उस (ज्ञान-निष्ठारूप) परा भक्तिसे भगवान्को तत्त्वसे जानता है जिससे उसी समय ईश्वर और क्षेत्रज्ञविषयक भेदबुद्धि पूर्णरूपसे निवृत्त हो जाती है। इसलिये ज्ञाननिष्ठारूप भक्तिसे मुझे जानता है यह कहना विरुद्ध नहीं होता।
ऐसा मान लेनेसे वेदान्त, इतिहास, पुराण और स्मृतिरूप समस्त निवृत्तिविधायक शास्त्र सार्थक हो जाते हैं अर्थात् उन सबका अभिप्राय सिद्ध हो जाता है।
“आत्माको जानकर (तीनों तरहकी एषणाओंसे) विरक्त होकर फिर भिक्षाचरण करते हैं”, “पुरुषार्थका अन्तरंग साधन होनेके कारण संन्यास हो इन सब तपोंमें अधिक कहा गया है”, “अकेला संन्यास ही उन सबको उल्लङ्घन कर जाता है”, कर्मोंके त्यागका नाम संन्यास है, “वेदोंको तथा इस लोक और परलोकको परित्याग करके”, “धर्म-अधर्मको छोड़” इत्यादि शास्त्रवाक्य हैं। तथा यहाँ भी (संन्यासपरक) बहुत-से वचन दिखाये गये हैं।
उन सब वचनोंको व्यर्थ मानना उचित नहीं और अर्थवादरूप मानना भी ठीक नहीं; क्योंकि वे अपने प्रकरणमें स्थित हैं।
इसके सिवा अन्तरात्माके अविक्रियस्वरूपमें निश्चयरूपसे स्थित हो जाना ही मोक्ष है। इसलिये भी (पूर्वोक्त बात ही सिद्ध होती है); क्योंकि पूर्वसमुद्रपर जानेकी इच्छावालेका उसके प्रतिकूल पश्चिमसमुद्रपर जानेकी इच्छावालेके साथ समान मार्ग नहीं हो सकता।
अन्तरात्मविषयक प्रतीतिका निरन्तरता रखनेके आग्रहका नाम “ज्ञाननिष्ठा” है। उसका कर्मोंके साथ रहना (पूर्वकी ओर जानेकी इच्छावालेके लिये) पश्चिमसमुद्रकी ओर जानेकी मार्गकी भाँति विरुद्ध है।
प्रमाणवेत्ताओंने उनका पर्वत और राईके समान भेद निश्चित किया है। सुतरां यह सिद्ध हुआ कि सर्वकर्म-संन्यासपूर्वक ही ज्ञाननिष्ठा करनी चाहिये॥ 55॥
स्वकर्मणा भगवतः अभ्यर्चनभक्तियोगस्य सिद्धिप्राप्तिः फलं ज्ञाननिष्ठायोग्यता। यन्निमित्ता ज्ञाननिष्ठा मोक्षफलावसाना स भगवद्भक्तियोगः अधुना
स्तूयते
शास्त्रार्थोपसंहारप्रकरणे शास्त्रार्थनिश्चयदार्ढ्याय—
अपने कर्मोंद्वारा भगवान्की पूजा करनारूप भक्तियोगकी सिद्धि, अर्थात् फल, ज्ञाननिष्ठाकी योग्यता है। जिस (भक्तियोग)-से होनेवाली ज्ञाननिष्ठा, अन्तमें मोक्षरूप फल देनेवाली होती है, उस भगवद्भक्ति-योगकी अब शास्त्राभिप्रायके उपसंहार-प्रकरणमें, शास्त्र-अभिप्रायके निश्चयको दृढ़ करनेके लिये स्तुति की जाती है—
सर्वकर्माणि प्रतिषिद्धानि अपि सदा कुर्वाणः अनुतिष्ठन् मद्व्यपाश्रयः अहं वासुदेव ईश्वरो व्यपाश्रयो यस्य स मद्व्यपाश्रयो मय्यर्पित-सर्वात्मभाव इत्यर्थः। सः अपि मत्प्रसादाद् मम ईश्वरस्य प्रसादाद् अवाप्नोति शाश्वतं नित्यं वैष्णवं पदम् अव्ययम्॥ 56॥
सदा सब कर्मोंको करनेवाला अर्थात् निषिद्ध कर्मों-को भी करनेवाला जो मद्व्यपाश्रय भक्त है—जिसका मैं वासुदेव ही पूर्ण आश्रय हूँ, ऐसा मुझे ही अपना सब कुछ अर्पण कर देनेवाला जो भक्त है, वह भी मुझ ईश्वरके अनुग्रहसे, विष्णुके शाश्वत—नित्य— अविनाशी पदको प्राप्त कर लेता है॥ 56॥
यस्माद् एवं तस्मात्—
जब कि यह बात है इसलिये—
चेतसा
सर्वकर्माणि
विवेकबुद्ध्या दृष्टादृष्टार्थानि मयि ईश्वरे सन्न्यस्य “यत्करोषि यदश्नासि” इति उक्तन्यायेन मत्परः अहं वासुदेवः परो यस्य तव स त्वं मत्परः सन् बुद्धियोगं मयि समाहितबुद्धित्वं बुद्धियोगः तं बुद्धियोगम् उपाश्रित्य आश्रयः अनन्यशरणत्वं मच्चित्तो मयि एव चित्तं यस्य तव स त्वं मच्चित्तः सततं सर्वदा भव॥ 57॥
तू दृष्ट और अदृष्ट फलवाले समस्त कर्मोंको विवेक-बुद्धिसे अर्थात् “यत्करोषि यदश्नासि” इस श्लोकमें बतलाये हुए भावसे, मुझ ईश्वरमें समर्पण करके तथा मेरे परायण होकर, अर्थात् मैं वासुदेव ही जिसका पर (परमगति) हूँ, ऐसा होकर, मुझमें बुद्धिको स्थिर करनारूप बुद्धि-योगका आश्रय लेकर—बुद्धियोगके अनन्यशरण होकर, निरन्तर मुझमें चित्तवाला हो, अर्थात् जिसका निरन्तर मुझमें ही चित्त रहे, ऐसा हो॥ 57॥
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि सर्वाणि दुस्तराणि
मत्प्रसादात्
तरिष्यसि संसारहेतुजातानि अतिक्रमिष्यसि। अथ चेद् यदि त्वं मदुक्तम् अहङ्कारात् पण्डितः अहम् इति न श्रोष्यसि न ग्रहीष्यसि ततः त्वं विनङ्क्ष्यसि विनाशं गमिष्यसि॥ 58॥
मुझमें चित्तवाला होकर तू समस्त कठिनाइयोंको अर्थात् जन्म-मरणरूप संसारके समस्त कारणोंको मेरे अनुग्रहसे तर जायगा—सबसे पार हो जायगा। परंतु यदि तू मेरे कहे हुए वचनोंको अहंकारसे “मैं पण्डित हूँ” ऐसा समझकर, नहीं सुनेगा—ग्रहण नहीं करेगा, तो नष्ट हो जायगा—नाशको प्राप्त हो जायगा॥ 58॥
इदं च त्वया न मन्तव्यं स्वतन्त्रः अहं किमर्थं परोक्तं करिष्यामि इति—
तुझे यह भी नहीं समझना चाहिये कि मैं स्वतन्त्र हूँ, दूसरेका कहना क्यों करूँ?—
यत् च एतत् त्वम् अहङ्कारम् आश्रित्य न योत्स्ये इति न युद्धं करिष्यामि इति मन्यसे चिन्तयसि निश्चयं करोषि मिथ्या एष व्यवसायो निश्चयः ते तव यस्मात् प्रकृतिः क्षत्रस्वभावः त्वां नियोक्ष्यति॥ 59॥
जो तू अहंकारका आश्रय लेकर यह मान रहा है—ऐसा निश्चय कर रहा है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा सो यह तेरा निश्चय मिथ्या है; क्योंकि तेरी प्रकृत—तेरा क्षत्रिय-स्वभाव तुझे युद्धमें नियुक्त कर देगा॥ 59॥
यस्मात् च—
क्योंकि—
स्वभावजेन शौर्यादिना यथोक्तेन कौन्तेय निबद्धो निश्चयेन बद्धः स्वेन आत्मीयेन कर्मणा कर्तुं न इच्छसि यत् कर्म मोहाद् अविवेकतः करिष्यसि अवशः अपि परवश एव तत् कर्म॥ 60॥
हे कौन्तेय! तू उपर्युक्त शूरवीरता आदि अपने स्वाभाविक कर्मोंद्वारा निबद्ध हुआ—दृढ़तासे बँधा हुआ है, इसलिये जो कर्म तू मोहसे—अविवेकके कारण नहीं करना चाहता है, वही कर्म विवश होकर करेगा॥ 60॥
यस्मात्—
क्योंकि—
ईश्वरः ईशनशीलो नारायणः सर्वभूतानां सर्वप्राणिनां हृद्देशे हृदयदेशे अर्जुन शुक्लान्त-रात्मस्वभावो
विशुद्धान्तःकरण
इति। “अहश्च कृष्णमहरर्जुनं च” (ऋ0 सं0 6। 9। 1) इति दर्शनात्। तिष्ठति स्थितिं लभते।
स कथं तिष्ठति इति आह—
भ्रामयन् भ्रमणं कारयन् सर्वभूतानि यन्त्रा-रूढानि यन्त्राणि आरूढानि अधिष्ठितानि इव इति इवशब्दः अत्र द्रष्टव्यः। यथा दारुकृत-पुरुषादीनि
यन्त्रारूढानि
मायया
छद्मना भ्रामयन् तिष्ठति इति सम्बन्धः॥ 61॥
हे अर्जुन! ईश्वर अर्थात् सबका शासन करनेवाला नारायण समस्त प्राणियोंके हृदयदेशमें स्थित है। जो शुक्ल स्वच्छ-शुद्ध अन्तरात्मा—स्वभाववाला हो अर्थात् पवित्र अन्तःकरणयुक्त हो उसका नाम अर्जुन है; क्योंकि “अहश्च कृष्णमहरर्जुनं च” इस कथनमें अर्जुन शब्द शुद्धताका वाचक देखा गया है।
वह (ईश्वर) कैसे स्थित है? सो कहते हैं—
समस्त प्राणियोंको, यन्त्रपर आरूढ़ हुई—चढ़ी हुई कठपुतलियोंकी भाँति, भ्रमाता हुआ—भ्रमण कराता हुआ स्थित है। यहाँ इव (भाँति) शब्द अधिक समझना चाहिये, अर्थात् जैसे यन्त्रपर आरूढ़ कठपुतली आदिको (खिलाड़ी) मायासे भ्रमाता हुआ स्थित रहता है, उसी तरह ईश्वर सबके हृदयमें स्थित है, इस प्रकार इसका सम्बन्ध है॥ 61॥
तम् एव ईश्वरं शरणम् आश्रयं संसारार्ति-हरणार्थं गच्छ आश्रयं सर्वभावेन सर्वात्मना हे भारत ततः तत्प्रसादाद् ईश्वरानुग्रहात् परां प्रकृष्टां शान्तिं पराम् उपरतिं स्थानं च मम विष्णोः परमं पदम् अवाप्स्यसि शाश्वतं नित्यम्॥ 62॥
हे भारत! तू सर्वभावसे उस ईश्वरकी ही शरणमें जा अर्थात् संसारके समस्त क्लेशोंका नाश करनेके लिये मन, वाणी और शरीरद्वारा सब प्रकारसे उस ईश्वरका ही आश्रय ग्रहण कर। फिर उस ईश्वरके अनुग्रहसे परम—उत्तम शान्तिको, अर्थात् उपरतिको और शाश्वत स्थानको अर्थात् मुझ विष्णुके परम नित्यधामको प्राप्त करेगा॥ 62॥
इति एतत् ते तुभ्यं ज्ञानम् आख्यातं कथितं गुह्याद् गोप्याद् गुह्यतरम् अतिशयेन गुह्यं रहस्यम् इत्यर्थो मया सर्वज्ञेन ईश्वरेण विमृश्य विमर्शनम् आलोचनं कृत्वा एतद् यथोक्तं शास्त्रम् अशेषेण समस्तं यथोक्तं च अर्थजातं यथा इच्छसि तथा कुरु॥ 63॥
मुझ सर्वज्ञ ईश्वरने तुझसे यह गुह्यसे भी गुह्य अत्यन्त गोपनीय रहस्ययुक्त ज्ञान कहा है। इस उपर्युक्त शास्त्रको, अर्थात् ऊपर कहे हुए समस्त अर्थको पूर्णरूपसे विचारकर—इसके विषयमें भली-प्रकार आलोचना करके, तेरी जैसी इच्छा हो वैसे ही कर॥ 63॥
भूयः अपि मया उच्यमानं शृणु—
फिर भी मैं जो कुछ कहता हूँ उसे सुन—
सर्वगुह्यतमं सर्वगुह्येभ्यः अत्यन्तरहस्यम् उक्तम् अपि असकृद् भूयः पुनः शृणु मे मम परमं प्रकृष्टं वचो वाक्यम्।
न भयाद् न अपि अर्थकारणाद् वा वक्ष्यामि किं तर्हि इष्टः प्रियः असि मे मम दृढम् अव्यभि-चारेण इति कृत्वा ततः तेन कारणेन वक्ष्यामि कथयिष्यामि ते हितं परं ज्ञानप्राप्तिसाधनम्। तद् हि सर्वहितानां हिततमम् च॥ 64॥
सर्व गुह्योंमें अत्यन्त गुह्य—रहस्ययुक्त मेरे परम उत्तम वचन तू फिर भी सुन; अर्थात् जो वचन मैंने पहले अनेक बार कहे हैं उनको तू फिरसे सुन।
मैं (जो कुछ कहूँगा वह) भयसे अथवा स्वार्थके लिये नहीं कहूँगा; किंतु तू मेरा दृढ़ ऐकान्तिक प्रिय है, यह समझकर—केवल इसी कारणसे तेरे हितकी बात अर्थात् परम ज्ञानप्राप्तिका साधन कहूँगा; क्योंकि यही साधन सब हितोंमें उत्तम हित है॥ 64॥
किं तद् इति आह—
वे वचन कौन-से हैं? सो कहते हैं—
मन्मना भव मच्चित्तो भव मद्भक्तो भव मद्भजनो भव मद्याजी मद्यजनशीलो भव मां नमस्कुरु नमस्कारम् अपि मम एव कुरु।
तत्र एवं वर्तमानो वासुदेवे एव सर्वसमर्पित-साध्यसाधनप्रयोजनो माम् एव एष्यसि आ-गमिष्यसि। सत्यं ते तव प्रतिजाने सत्यां प्रतिज्ञां करोमि एतस्मिन् वस्तुनि इत्यर्थः। यतः प्रियः असि मे।
एवं
भगवतः
सत्यप्रतिज्ञत्वं
बुद्ध्वा भगवद्भक्तेः अवश्यम्भाविमोक्षफलम् अवधार्य भगवच्छरणैकपरायणो भवेद् इति वाक्यार्थः॥ 65॥
तू मुझमें मनवाला अर्थात् मुझमें चित्तवाला हो, मेरा भक्त अर्थात् मेरा ही भजन करनेवाला हो और मेरा ही पूजन करनेवाला हो, तथा मुझे ही नमस्कार कर, अर्थात् नमस्कार भी मुझे ही किया कर।
इस प्रकार करता हुआ, अर्थात् मुझ वासुदेवमें ही (अपने) समस्त साध्य, साधन और प्रयोजनको समर्पण करके तू मुझे ही प्राप्त होगा। इस विषयमें मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ; क्योंकि तू मेरा प्रिय है।
कहनेका अभिप्राय यह है कि इस प्रकार भगवान्को सत्यप्रतिज्ञ जानकर तथा भगवान्की भक्तिका फल निःसन्देह—ऐकान्तिक मोक्ष है—यह समझकर, मनुष्यको केवल एकमात्र भगवान्की शरणमें ही तत्पर हो जाना चाहिये॥ 65॥
कर्मयोगनिष्ठायाः परमरहस्यम् ईश्वरशरणताम् उपसंहृत्य अथ इदानीं कर्मयोगनिष्ठाफलं सम्यग्दर्शनं सर्ववेदान्तविहितं वक्तव्यम् इति आह—
कर्मयोगनिष्ठाके परम रहस्य ईश्वरशरणागतिका उपसंहार करके, उसके पश्चात् अब कर्मयोगनिष्ठाका फलस्वरूप, समस्त वेदान्तोंमें कहा हुआ यथार्थ ज्ञान कहना है, इसलिये (भगवान्) बोले—
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सर्वधर्मान् सर्वे च ते धर्माः च सर्वधर्माः तान्। धर्मशब्देन अत्र अधर्मः अपि गृह्यते नैष्कर्म्यस्य विवक्षितत्वात् “नाविरतो दुश्चरितात्” (क0 उ0 1। 2। 24) “त्यज धर्ममधर्मं च” (महा0 शान्ति0 329। 40) इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः।
सर्वधर्मान् परित्यज्य सन्न्यस्य सर्वकर्माणि इति एतत्। माम् एकं सर्वात्मानं समं सर्वभूतस्थम् ईश्वरम् अच्युतं गर्भजन्मजरामरणविवर्जितम् अहम् एव इति एवम् एकं शरणं व्रज न मत्तः अन्यद् अस्ति इति अवधारय इत्यर्थः।
अहं त्वा त्वाम् एवं निश्चितबुद्धिं सर्वपापेभ्यः सर्वधर्माधर्मबन्धनरूपेभ्यो मोक्षयिष्यामि स्वात्म-भावप्रकाशीकरणेन। उक्तं च—“नाशयाम्यात्म-भावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता” इति अतो मा शुचः शोकं मा कार्षीः इत्यर्थः॥ 66॥
अस्मिन् हि गीताशास्त्रे परं निःश्रेयस-साधनं निश्चितं किं ज्ञानं किं कर्म वा आहोस्विद् उभयम् इति।
कुतः सन्देहः?
“यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते” “ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्” इत्यादीनि वाक्यानि केवलाद् ज्ञानाद् निःश्रेयसप्राप्तिं दर्शयन्ति “कर्मण्येवाधिकारस्ते” “कुरु कर्मैव” इत्येवमादीनि कर्मणाम् अवश्यकर्तव्यतां दर्शयन्ति।
एवं
ज्ञानकर्मणोः
कर्तव्यतोपदेशात् समुच्चितयोः अपि निःश्रेयसहेतुत्वं स्याद् इति भवेत् संशयः।
किं पुनरत्र मीमांसाफलम्।
ननु एतद् एव एषाम् अन्यतमस्य परम-निःश्रेयससाधनत्वावधारणम्। अतो विस्तीर्णतरं मीमांस्यम् एतत्।
आत्मज्ञानस्य तु केवलस्य निःश्रेयस-हेतुत्वं भेदप्रत्ययनिवर्तकत्वेन कैवल्यफलावसान-त्वात्।
क्रियाकारकफलभेदबुद्धिः अविद्यया आत्मनि नित्यप्रवृत्ता मम कर्म अहं कर्ता अमुष्मै फलाय इदं कर्म करिष्यामि इति इयम् अविद्या अनादिकालप्रवृत्ता।
अस्या अविद्याया निवर्तकम् अयम् अहम् अस्मि केवलः अकर्ता अक्रियः अफलो न मत्तः अन्यः अस्ति कश्चिद् इति एवंरूपम् आत्म-विषयं ज्ञानम् उत्पद्यमानं कर्मप्रवृत्तिहेतुभूताया भेदबुद्धेः निवर्तकत्वात्।
तु शब्दः पक्षद्वयव्यावृत्त्यर्थो न केवलेभ्यः कर्मभ्यो न च ज्ञानकर्मभ्यां समुच्चिताभ्यां निःश्रेयसप्राप्तिः इति पक्षद्वयं निवर्तयति।
अकार्यत्वात् च निःश्रेयस्य कर्मसाधन-त्वानुपपत्तिः। न हि नित्यं वस्तु कर्मणा ज्ञानेन वा क्रियते।
केवलं ज्ञानम् अपि अनर्थकं तर्हि?
न अविद्यानिवर्तकत्वे सति दृष्टकैवल्य-फलावसानत्वात्।
अविद्यातमोनिवर्तकस्य ज्ञानस्य
दृष्टं
कैवल्यफलावसानत्वम्। रज्ज्वादिविषये सर्पाद्यज्ञानतमोनिवर्तकप्रदीप-प्रकाशफलवत्, विनिवृत्तसर्पविकल्परज्जु-कैवल्यावसान हि प्रकाशफलं तथा ज्ञानम्।
दृष्टार्थानां च छिदिक्रियाग्निमन्थनादीनां व्यापृतकर्त्रादिकारकाणां
द्वैधीभावाग्नि-दर्शनादिफलाद् अन्यफले कर्मान्तरे व्यापारा-नुपपत्तिः
यथा
तथा
ज्ञाननिष्ठाक्रियायां दृष्टार्थायां
व्यापृतस्य
ज्ञात्रादिकारकस्य आत्मकैवल्यफलाद्
अन्यफले
कर्मान्तरे प्रवृत्तिः
अनुपपन्ना
इति
न
ज्ञाननिष्ठा कर्मसहिता उपपद्यते।
भुज्यग्निहोत्रादिक्रियावत् स्याद् इति चेत्। न, कैवल्यफले ज्ञाने क्रियाफलार्थित्वा-नुपपत्तेः। कैवल्यफले हि ज्ञाने प्राप्ते सर्वतः-सम्प्लुतोदके फले कूपतडागादिक्रियाफलार्थि-त्वाभाववत् फलान्तरे तत्साधनभूतायां वा क्रियायाम् अर्थित्वानुपपत्तिः।
न हि राज्यप्राप्तिफले कर्मणि व्यापृतस्य क्षेत्रप्राप्तिफले व्यापारोपपत्तिः तद्विषयं च अर्थित्वम्।
तस्माद् न कर्मणः अस्ति निःश्रेयससाधन-त्वम्। न च ज्ञानकर्मणोः समुच्चितयोः न अपि ज्ञानस्य कैवल्यफलस्य कर्मसाहाय्यापेक्षा अविद्यानिवर्तकत्वेन विरोधात्।
न हि तमः तमसो निवर्तकम् अतः केवलम् एवं ज्ञानं निःश्रेयससाधनम् इति।
न, नित्याकरणे प्रत्यवायप्राप्तेः कैवल्यस्य च नित्यत्वात्। यत् तावत् केवलज्ञानात् कैवल्यप्राप्तिः इति एतद् असत्। यतो नित्यानां कर्मणां श्रुत्युक्तानाम् अकरणे प्रत्यवायो नरकादिप्राप्तिलक्षणः स्यात्।
ननु एवं तर्हि कर्मभ्यो मोक्षो नास्ति इति अनिर्मोक्ष एव। न एष दोषः, नित्यत्वाद् मोक्षस्य। नित्यानां कर्मणाम् अनुष्ठानात् प्रत्यवायस्य अप्राप्तिः। प्रतिषिद्धस्य च अकरणाद् अनिष्ट-शरीरानुपपत्तिः।
काम्यानां
च
वर्जनाद् इष्टशरीरानुपपत्तिः।
वर्तमानशरीरारम्भकस्य च कर्मणः फलोपभोगक्षये पतिते अस्मिन् शरीरे देहान्तरोत्पत्तौ च कारणाभावाद् आत्मनो रागादीनां च अकरणात् स्वरूपाव-स्थानम् एव कैवल्यम् इति अप्रयत्नकैवल्यम् इति।
अतिक्रान्तानेकजन्मान्तरकृतस्य
स्वर्ग-नरकादिप्राप्तिफलस्य अनारब्धकार्यस्य उपभोगा-नुपपत्तेः क्षयाभाव इति चेद्।
न,
नित्यकर्मानुष्ठानायासदुःखोपभोगस्य तत्फलोपभोगत्वोपपत्तेः। प्रायश्चित्तवद् वा पूर्वोपात्तदुरितक्षयार्थत्वाद्
नित्यकर्मणाम्। आरब्धानां च उपभोगेन एव कर्मणां क्षीणत्वाद् अपूर्वाणां च कर्मणाम् अनारम्भे अयत्नसिद्धं कैवल्यम् इति।
न, “तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय” (श्वे0 उ0 3। 8) इति विद्याया अन्यः पन्था मोक्षाय न विद्यते इति श्रुतेः चर्मवत्
आकाशवेष्टनासम्भववद्
अविदुषो मोक्षासम्भवश्रुतेः। ज्ञानात् कैवल्यम् आप्नोति इति च पुराणस्मृतेः।
अनारब्धफलानां पुण्यानां कर्मणां क्षया-नुपपत्तेः च। यथा पूर्वोपात्तानां दुरितानाम् अनारब्धफलानां सम्भवः तथा पुण्यानाम् अपि अनारब्धफलानां स्यात् सम्भवः। तेषां च देहान्तरम् अकृत्वा क्षयानुपपत्तौ मोक्षा-नुपपत्तिः।
धर्माधर्महेतूनां च रागद्वेषमोहानाम् अन्यत्र आत्मज्ञानाद् उच्छेदानुपपत्तेः धर्माधर्मोच्छेदा-नुपपत्तिः।
नित्यानां च कर्मणां पुण्यलोकफलश्रुतेः “वर्णा आश्रमाश्च स्वकर्मनिष्ठाः” (आ0 स्मृ0 2। 2। 2। 3) इत्यादिस्मृतेः च कर्मक्षयानुपपत्तिः।
ये तु आहुः नित्यानि कर्माणि दुःखरूप-त्वाद् पूर्वकृतदुरितकर्मणां फलम् एव न तु तेषां स्वरूपव्यतिरेकेण अन्यत् फलम् अस्ति अश्रुत-त्वाद् जीवनादिनिमित्ते च विधानाद् इति। न, अप्रवृत्तानां फलदानासम्भवात्, दुःखफल-विशेषानुपपत्तिः च स्यात्।
यद् उक्तं पूर्वजन्मकृतदुरितानां कर्मणां फलं नित्यकर्मानुष्ठानायासदुःखं भुज्यते इति तद् असत्। न हि मरणकाले फलदानाय अनङ्कुरीभूतस्य कर्मणः फलम् अन्यकर्मारब्धे जन्मनि उपभुज्यते इति उपपत्तिः।
अन्यथा स्वर्गफलोपभोगाय अग्निहोत्रादि कर्मारब्धे जन्मनि नरककर्मफलोपभोगा-नुपपत्तिः न स्यात्।
तस्य दुरितदुःखविशेषफलत्वानुपपत्तेः च, अनेकेषु हि दुरितेषु सम्भवत्सु भिन्नदुःखसाधन-फलेषु
नित्यकर्मानुष्ठानायासदुःखमात्रफलेषु कल्प्यमानेषु द्वन्द्वरोगादिबाधानिमित्तं न हि शक्यते कल्पयितुं नित्यकर्मानुष्ठानायासदुःखम् एव पूर्वकृतदुरितफलं न शिरसा पाषाण-वहनादिदुःखम् इति।
अप्रकृतं च इदम् उच्यते नित्यकर्मानुष्ठाना-यासदुःखं पूर्वकृतदुरितकर्मफलम् इति।
कथम्,
अप्रसूतफलस्य पूर्वकृतदुरितस्य क्षयो न उपपद्यते इति प्रकृतं तत्र प्रसूतफलस्य कर्मणः फलं नित्यकर्मानुष्ठानायासदुःखम् आह भवान् न अप्रसूतफलस्य इति।
अथ सर्वम् एव पूर्वकृतं दुरितं प्रसूतफलम् एव इति मन्यते भवान् ततो नित्यकर्मानुष्ठाना-यासदुःखम् एव फलम् इति विशेषणम् अयुक्तं नित्यकर्मविध्यानर्थक्यप्रसङ्गः च उपभोगेन एव प्रसूतफलस्य दुरितकर्मणः क्षयोपपत्तेः।
किं च श्रुतस्य नित्यस्य दुःखं कर्मणः चेत् फलम्, नित्यकर्मानुष्ठानायासाद् एव तद् दृश्यते व्यायामादिवत् तद् अन्यस्य इति कल्पना-नुपपत्तिः।
जीवनादिनिमित्ते च विधानाद् नित्यानां कर्मणाम्, प्रायश्चित्तवत् पूर्वकृतदुरितफल-त्वानुपपत्तिः। यस्मिन् पापकर्मनिमित्ते यद्विहितं प्रायश्चित्तं न तु तस्य पापस्य तत् फलम्। अथ तस्य एव पापस्य निमित्तस्य प्रायश्चित्तदुःखं फलं जीवनादिनिमित्तम् अपि नित्यकर्मानुष्ठा-नायासदुःखं जीवनादिनिमित्तस्य एव तत् फलं प्रसज्येत
नित्यप्रायश्चित्तयोः
नैमित्तिक-त्वाविशेषात्।
किं च अन्यद् नित्यस्य काम्यस्य च अग्निहोत्रादेः अनुष्ठानायासदुःखस्य तुल्यत्वाद् नित्यानुष्ठानायासदुःखम् एव पूर्वकृतदुरितस्य फलं न तु काम्यानुष्ठानायासदुःखम् इति विशेषो न अस्ति इति तद् अपि पूर्वकृत-दुरितफलं प्रसज्येत।
तथा च सति नित्यानां फलाश्रवणात् तद्विधानान्यथानुपपत्तेः च नित्यानुष्ठानायास-दुःखं पूर्वकृतदुरितफलम् इति अर्थापत्तिकल्पना अनुपपन्ना।
एवं विधानान्यथानुपपत्तेः अनुष्ठानायास-दुःखव्यतिरिक्तफलत्वानुमानात् च नित्यानाम्।
विरोधात् च। विरुद्धं च इदम् उच्यते नित्यकर्मणि अनुष्ठीयमाने अन्यस्य कर्मणः फलं भुज्यते इति अभ्युपगम्यमाने स एव उपभोगो नित्यस्य कर्मणः फलम् इति नित्यस्य कर्मणः फलाभाव इति च विरुद्धम् उच्यते।
किं च काम्याग्निहोत्रादौ अनुष्ठीयमाने नित्यम् अपि अग्निहोत्रादि तन्त्रेण एव अनुष्ठितं भवति इति तदायासदुःखेन एव काम्याग्नि-होत्रादिफलम् उपक्षीणं स्यात् तत्तन्त्रत्वात्।
अथ काम्याग्निहोत्रादिफलम् अन्यद् एव स्वर्गादि तदनुष्ठानायासदुःखम् अपि भिन्नं प्रसज्येत। न च तद् अस्ति दृष्टविरोधात्। न हि काम्यानुष्ठानायासदुःखात् केवलनित्यानुष्ठाना-यासदुःखं विद्यते।
किं च अन्यद् अविहितम् अप्रतिषिद्धं च कर्म तत्कालफलं न तु शास्त्रचोदितं प्रतिषिद्धं वा तत्कालफलम्। भवेद् यदि तदा स्वर्गादिषु अपि अदृष्टफलशासने च उद्यमो न स्यात्।
अग्निहोत्रादीनाम् एव कर्मस्वरूपाविशेषे अनुष्ठानायासदुःखमात्रेण उपक्षयः। काम्यानां च स्वर्गादिमहाफलत्वम् अङ्गेतिकर्तव्यता-द्याधिक्ये तु असति फलकामित्वमात्रेण इति न शक्यं कल्पयितुम्।
तस्माद् न नित्यानां कर्मणाम् अदृष्टफलाभावः कदाचिद् अपि उपपद्यते। अतः च अविद्या-पूर्वकस्य कर्मणो विद्या एव शुभस्य अशुभस्य वा क्षयकारणम् अशेषतो न नित्यकर्मानुष्ठानम्।
अविद्याकामबीजं हि सर्वम् एव कर्म। तथा च उपपादितम्। अविद्वद्विषयं कर्म विद्वद्विषया च सर्वकर्मसन्न्यासपूर्विका ज्ञाननिष्ठा।
“उभौ तौ न विजानीतः” “वेदाविनाशिनं नित्यम्” “ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्” “अज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्” “तत्त्ववित्तु” “गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते” “सर्वकर्माणि
मनसा
सन्न्यस्यास्ते”
“नैव किञ्चित् करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्” अर्थाद् अज्ञः करोमि इति।
आरुरुक्षोः कर्म कारणम् आरूढस्य योगस्थस्य शम एव कारणम्। उदाराः त्रयः अपि अज्ञाः, ज्ञानी तु आत्मा एव मे मतम्।
अज्ञाः कर्मिणो गतागतं कामकामा लभन्ते। अनन्याः चिन्तयन्तो मां नित्ययुक्ता यथोक्तम् आत्मानम् आकाशकल्पम् अकल्मषम् उपासते।
“ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते।” अर्थाद् न कर्मिणः अज्ञा उपयान्ति।
भगवत्कर्मकारिणो ये युक्ततमा अपि कर्मिणः अज्ञाः ते उत्तरोत्तरहीनफलत्यागा-वसानसाधनाः।
अनिर्देश्याक्षरोपासकाः तु “अद्वेष्टा सर्व-भूतानाम्” इत्यादि आअध्यायपरिसमाप्ति उक्त-साधनाः
क्षेत्राध्यायाद्यध्यायत्रयोक्तज्ञान-साधनाः च।
अधिष्ठानादिपञ्चहेतुकसर्वकर्मसन्न्यासिनाम् आत्मैकत्वाकर्तृत्वज्ञानवतां परस्यां ज्ञाननिष्ठायां वर्तमानानां भगवत्तत्त्वविदाम् अनिष्टादिकर्म-फलत्रयं परमहंसपरिव्राजकानाम् एवं लब्धभग-वत्स्वरूपात्मैकत्वशरणानां न भवति। भवति एव अन्येषाम् अज्ञानां कर्मिणाम् असन्न्यासिनाम् इति एष गीताशास्त्रोक्तस्य कर्तव्याकर्तव्यार्थस्य विभागः।
अविद्यापूर्वकत्वं सर्वस्य कर्मणः असिद्धम् इति चेत्।
न, ब्रह्महत्यादिवत् । यद्यपि शास्त्रावगतं नित्यं कर्म तथापि अविद्यावत एव भवति।
यथा प्रतिषेधशास्त्रावगतम् अपि ब्रह्महत्यादि-लक्षणं कर्म अनर्थकारणम् अविद्याकामादिदोष-वतो भवति अन्यथा प्रवृत्त्यनुपपत्तेः तथा नित्यनैमित्तिककाम्यानि अपि इति।
व्यतिरिक्तात्मनि अज्ञाते प्रवृत्तिः नित्यादि-कर्मसु अनुपपन्ना इति चेत्।
न, चलनात्मकस्य कर्मणः अनात्मकर्तृकस्य अहं करोमि इति प्रवृत्तिदर्शनात्।
देहादिसङ्घाते अहम्प्रत्ययो गौणो न मिथ्या इति चेत्। न, तत्कार्येषु अपि गौणत्वोपपत्तेः।
आत्मीये देहादिसङ्घाते अहम्प्रत्ययो गौणो यथा आत्मीये पुत्रे “आत्मा वै पुत्र नामासि” (तै0 सं0 2। 11) इति, लोके च अपि मम प्राण एव अयं गौः इति तद्वद् न एव अयं मिथ्याप्रत्ययः, मिथ्याप्रत्ययः तु स्थाणुपुरुषयोः अगृह्यमाणविशेषयोः।
न गौणप्रत्ययस्य मुख्यकार्यार्थत्वम् अधि-करणस्तुत्यर्थत्वाद् लुप्तोपमाशब्देन।
यथा सिंहो देवदत्तः अग्निः माणवक इति सिंह इव अग्निः इव क्रौर्यपैङ्गल्यादिसामान्य-वत्त्वाद् देवदत्तमाणवकाधिकरणस्तुत्यर्थम् एव, न तु सिंहकार्यम् अग्निकार्यं वा गौणशब्दप्रत्यय-निमित्तं किञ्चित् साध्यते, मिथ्याप्रत्ययकार्यं तु अनर्थम् अनुभवति।
गौणप्रत्ययविषयं च जानाति न एष सिंहो देवदत्तः स्याद् न अयम् अग्निः माणवक इति।
तथा गौणेन देहादिसङ्घातेन आत्मना कृतं कर्म न मुख्येन अहम्प्रत्ययविषयेण आत्मना कृतं स्यात्। न हि गौणसिंहाग्निभ्यां कृतं कर्म मुख्यसिंहाग्निभ्यां कृतं स्यात्। न च क्रौर्येण
पैङ्गल्येन
वा
मुख्यसिंहाग्न्योः कार्यं किञ्चित् क्रियते स्तुत्यर्थत्वेन उप-क्षीणत्वात्।
स्तूयमानौ च जानीतो न अहं सिंहो न अहम् अग्निः इति, न सिंहस्य कर्म मम अग्नेः च इति, तथा न सङ्घातस्य कर्म मम मुख्यस्य आत्मन इति प्रत्ययो युक्ततरः स्याद् न पुनः अहं कर्ता मम कर्म इति।
यत् च आहुः आत्मीयैः स्मृतीच्छाप्रयत्नैः कर्महेतुभिः आत्मा करोति इति। न, तेषां मिथ्याप्रत्ययपूर्वकत्वात्।
मिथ्याप्रत्यय-निमित्तेष्टानिष्टानुभूतक्रियाफलजनितसंस्कार-पूर्वका हि स्मृतीच्छाप्रयत्नादयः।
यथा अस्मिन् जन्मनि देहादिसङ्घाताभिमान-रागद्वेषादिकृतौ धर्माधर्मौ तत्फलानुभवः च तथा अतीते अतीततरे अपि जन्मनि इति अनादिः अविद्याकृतः संसारः अतीतः अनागतः च अनुमेयः।
ततः च सर्वकर्मसन्न्यासाद् ज्ञाननिष्ठायाम् आत्यन्तिकः
संसारोपरम
इति
सिद्धम्। अविद्यात्मकत्वात् च देहाभिमानस्य तन्निवृत्तौ देहानुपपत्तेः संसारानुपपत्तिः।
देहादिसङ्घाते आत्माभिमानः अविद्यात्मकः। न हि लोके गवादिभ्यः अन्यः अहं मत्तः च अन्ये गवादय इति जानन् तेषु अहम् इति प्रत्ययं मन्यते कश्चित्।
अजानन् तु स्थाणौ पुरुषविज्ञानवद् अविवेकतो देहादिसङ्घाते कुर्याद् अहम् इति प्रत्ययं न विवेकतो जानन्।
यः तु “आत्मा वै पुत्र नामासि” (तै0 सं0 2। 11) इति पुत्रे अहम्प्रत्ययः स तु जन्यजनकसम्बन्धनिमित्तो गौणः। गौणेन च आत्मना भोजनादिवत् परमार्थकार्यं न शक्यते कर्तुं गौणसिंहाग्निभ्यां मुख्यसिंहाग्निकार्यवत्।
अदृष्टविषयचोदनाप्रामाण्याद् आत्मकर्तव्यं गौणैः देहेन्द्रियात्मभिः क्रियते इति चेत्।
न, अविद्याकृतात्मकत्वात् तेषाम्। न गौणा आत्मानो देहेन्द्रियादयः।
कथं तर्हि।
मिथ्याप्रत्ययेन एव असङ्गस्य आत्मनः सङ्गत्यात्मत्वम् आपाद्यते तद्भावे भावात् तदभावे च अभावात्।
अविवेकिनां हि अज्ञानकाले बालानां दृश्यते दीर्घः अहं गौरः अहम् इति देहादिसङ्घाते अहम्प्रत्ययो न तु विवेकिनाम् अन्यः अहं देहादिसङ्घाताद्
इति
ज्ञानवतां
तत्काले देहादिसङ्घाते अहम्प्रत्ययो भवति।
तस्माद् मिथ्याप्रत्ययाभावे अभावात् तत्कृत एव न गौणः।
पृथग्गृह्यमाणविशेषसामान्ययोः हि सिंह-देवदत्तयोः अग्निमाणवकयोः वा गौणः प्रत्ययः शब्दप्रयोगो वा स्याद् न अगृह्यमाणसामान्य-विशेषयोः।
यत् तु उक्तं श्रुतिप्रामाण्याद् इति। न, तत् प्रामाण्यस्य अदृष्टविषयत्वात्। प्रत्यक्षादि-प्रमाणानुपलब्धे हि विषये अग्निहोत्रादिसाध्य-साधनसम्बन्धे श्रुतेः प्रामाण्यं न प्रत्यक्षादिविषये अदृष्टदर्शनार्थत्वात् प्रामाण्यस्य।
तस्माद्
न
दृष्टमिथ्याज्ञाननिमित्तस्य अहम्प्रत्ययस्य देहादिसङ्घाते गौणत्वं कल्पयितुं शक्यम्।
न हि श्रुतिशतम् अपि शीतः अग्निः अप्रकाशो वा इति ब्रुवत् प्रामाण्यम् उपैति। यदि ब्रूयात् शीतः अग्निः अप्रकाशो वा इति अथापि अर्थान्तरं श्रुतेः विवक्षितं कल्प्यं प्रामाण्यान्यथानुपपत्तेः न तु प्रमाणान्तरविरुद्धं स्ववचनविरुद्धं वा।
कर्मणो मिथ्याप्रत्ययवत्कर्तृकत्वात् कर्त्तुः अभावे श्रुतेः अप्रामाण्यम् इति चेत्।
न, ब्रह्मविद्यायाम् अर्थवत्त्वोपपत्तेः।
कर्मविधिश्रुतिवद् ब्रह्मविद्याविधिश्रुतेः। अप्रामाण्यप्रसङ्ग इति चेत्।
न, बाधकप्रत्ययानुपपत्तेः। यथा ब्रह्मविद्या-विधिश्रुत्या आत्मनि अवगते देहादिसङ्घाते अहम्प्रत्ययो बाध्यते तथा आत्मनि एव आत्मावगतिः न कदाचित् केनचित् कथञ्चिद् अपि बाधितुं शक्या फलाव्यतिरेकावगतेः यथा अग्निः उष्णः प्रकाशः च इति।
न च कर्मविधिश्रुतेः अप्रामाण्यम्, पूर्वपूर्व-प्रवृत्तिनिरोधेन
उत्तरोत्तरापूर्वप्रवृत्तिजननस्य प्रत्यगात्माभिमुख्यप्रवृत्त्युत्पादनार्थत्वात् मिथ्यात्वे अपि उपायस्य उपेयसत्यतया सत्यत्वम् एव स्याद् यथा अर्थवादानां विधिशेषाणाम्।
लोके अपि बालोन्मत्तादीनां पय आदौ पाययितव्ये चूडावर्धनादिवचनम्।
प्रकारान्तरस्थानां च साक्षाद् एव प्रामाण्य-सिद्धिः प्राग् आत्मज्ञानाद् देहाभिमाननिमित्त-प्रत्यक्षादिप्रामाण्यवत्।
यत् तु मन्यसे स्वयम् अव्याप्रियमाणः अपि आत्मा सन्निधिमात्रेण करोति तद् एव च मुख्यं कर्तृत्वम् आत्मनः यथा राजा युध्यमानेषु योधेषु युध्यते इति प्रसिद्धं स्वयम् अयुध्यमानः अपि सन्निधानाद् एव जितः पराजितः च इति च तथा सेनापतिः वाचा एव करोति क्रियाफलसम्बन्धः च राज्ञः सेनापतेः च दृष्टः, यथा च ऋत्विक्कर्म यजमानस्य, तथा देहादीनां कर्म आत्मकृतं स्यात् तत्फलस्य आत्मगामित्वात्।
यथा च भ्रामकस्य लोहभ्रामयितृत्त्वाद् अव्यापृतस्य एव मुख्यम् एव कर्तृत्वं तथा च आत्मन इति।
तद् असत्, अकुर्वतः कारकत्वप्रसङ्गात्।
कारकम् अनेकप्रकारम् इति चेत्। न, राजप्रभृतीनां
मुख्यस्य
अपि
कर्तृत्वस्य दर्शनात्। राजा तावत् स्वव्यापारेण अपि युध्यते योधानां योधयितृत्वेन धनदानेन च मुख्यम् एव कर्तृत्वं तथा जयपराजयफलोप-भोगे।
तथा यजमानस्य अपि प्रधानत्यागेन दक्षिणादानेन च मुख्यम् एव कर्तृत्वम्।
तस्माद् अव्यापृतस्य कर्तृत्वोपचारो यः स गौण इति अवगम्यते। यदि मुख्यं कर्तृत्वं
स्वव्यापारलक्षणं
न
उपलभ्यते राजयजमानप्रभृतीनां
तदा
सन्निधिमात्रेण अपि कर्तृत्वं मुख्यं परिकल्प्येत यथा भ्रामकस्य लोहभ्रामणेन न तथा राजयजमानादीनां स्वव्यापारो न उपलभ्यते। तस्मात् सन्निधि-मात्रेण अपि कर्तृत्वं गौणम् एव।
तथा च सति तत्फलसम्बन्धः अपि गौण एव स्यात्। न गौणेन मुख्यं कार्यं निर्वर्त्यते। तस्माद् असद् एव एतद् गीयते देहादीनां व्यापारेण अव्यापृत आत्मा कर्ता भोक्ता च स्याद् इति।
भ्रान्तिनिमित्तं तु सर्वम् उपपद्यते। यथा स्वप्ने मायायां च एवम्। न च देहाद्यात्मा-प्रत्ययभ्रान्तिसन्तानविच्छेदेषु सुषुप्तिसमाध्यादिषु कर्तृत्वभोक्तृत्वादिः अनर्थ उपलभ्यते।
तस्माद् भ्रान्तिप्रत्ययनिमित्त एव अयं संसारभ्रमो न तु परमार्थ इति सम्यग्दर्शनाद् अत्यन्तम् एव उपरम इति सिद्धम्॥ 66॥
समस्त धर्मोंको, अर्थात् जितने भी धर्म हैं उन सबको, यहाँ नैष्कर्म्य (कर्माभाव)-का प्रतिपादन करना है, इसलिये “धर्म” शब्दसे अधर्मका भी ग्रहण किया जाता है। “जो बुरे चरित्रोंसे विरक्त नहीं हुआ” “धर्म और अधर्म दोनोंको छोड़” इत्यादि श्रुति-स्मृतियोंसे भी यही सिद्ध होता है।
सब धर्मोंको छोड़कर—सर्व-कर्मोंका संन्यास करके, मुझ एककी शरणमें आ, अर्थात् मैं जो कि सबका आत्मा, समभावसे सर्व-भूतोंमें स्थित, ईश्वर, अच्युत तथा गर्भ, जन्म, जरा और मरणसे रहित हूँ, उस एकके इस प्रकार शरण हो। अभिप्राय यह कि “मुझ परमेश्वरसे अन्य कुछ है ही नहीं” ऐसा निश्चय कर।
तुझ इस प्रकार निश्चयवालेको मैं अपना स्वरूप प्रत्यक्ष कराके, समस्त धर्माधर्मबन्धनरूप पापोंसे मुक्त कर दूँगा। पहले कहा भी है कि—“मैं हृदयमें स्थित हुआ प्रकाशमय ज्ञान-दीपकसे (अज्ञानजनित अन्धकारका) नाश करता हूँ” इसलिये तू शोक न कर अर्थात् चिन्ता मत कर॥ 66॥
(शास्त्रके उपसंहारका प्रकरण)
यह विचार करना चाहिये कि इस गीताशास्त्रमें निश्चय किया हुआ, परम कल्याण (मोक्ष)-का साधन ज्ञान है या कर्म, अथवा दोनों?
पू0—यह सन्देह क्यों होता है?
उ0—“जिसको जानकर अमरता प्राप्त कर लेता है” “तदनन्तर मुझे तत्त्वसे जानकर मुझमें ही प्रविष्ट हो जाता है” इत्यादि वाक्य तो केवल ज्ञानसे मोक्षकी प्राप्ति दिखला रहे हैं; तथा “तेरा कर्ममें ही अधिकार है” “तू कर्म ही कर” इत्यादि वाक्य कर्मोंकी अवश्य-कर्तव्यता दिखला रहे हैं।
इस प्रकार ज्ञान और कर्म दोनोंकी कर्तव्यताका उपदेश होनेसे ऐसा संशय भी हो सकता है कि सम्भवतः दोनों समुच्चित (मिलकर) ही मोक्षके साधन होंगे।
पू0—परंतु इस मीमांसाका फल क्या होगा?
उ0—यही कि इन तीनोंमेंसे किसी एकको ही परम कल्याणका साधन निश्चय करना। अतः इसकी विस्तारपूर्वक मीमांसा कर लेनी चाहिये।
(सिद्धान्तका प्रतिपादन)
केवल आत्मज्ञान ही परम कल्याण (मोक्ष)-का हेतु (साधन) है; क्योंकि भेद-प्रतीतिका निवर्तक होनेके कारण, कैवल्य (मोक्ष)-की प्राप्ति ही उसकी अवधि है।
आत्मामें क्रिया, कारक और फलविषयक भेद-बुद्धि अविद्याके कारण सदासे प्रवृत्त हो रही है। “कर्म मेरे हैं, मैं उनका कर्ता हूँ, मैं अमुक फलके लिये यह कर्म करता हूँ” यह अविद्या अनादिकालसे प्रवृत्त हो रही है।
“यह केवल, (एकमात्र) अकर्ता, क्रियारहित और फलसे रहित आत्मा मैं हूँ, मुझसे भिन्न और कोई भी नहीं है” ऐसा आत्मविषयक ज्ञान इस अविद्याका नाशक है; क्योंकि यह उत्पन्न होते ही, कर्म-प्रवृत्तिकी हेतुरूप भेदबुद्धिका नाश करनेवाला है।
उपर्युक्त वाक्यमें “तु” शब्द दोनों पक्षोंकी निवृत्तिके लिये है अर्थात् मोक्ष न तो केवल कर्मसे मिलता है और न ज्ञान-कर्मके समुच्चयसे ही। इस प्रकार “तु” शब्द दोनों पक्षोंका खण्डन करता है।
मोक्ष अकार्य अर्थात् स्वतःसिद्ध है, इसलिये कर्मोंको उसका साधन मानना नहीं बन सकता; क्योंकि कोई भी नित्य (स्वतःसिद्ध) वस्तु कर्म या ज्ञानसे उत्पन्न नहीं की जाती।
पू0—तब तो केवल ज्ञान भी व्यर्थ ही है?
उ0—यह बात नहीं है; क्योंकि अविद्याका नाशक होनेके कारण उसकी मोक्षप्राप्तिरूप फल-पर्यन्तता प्रत्यक्ष है। अर्थात् जैसे दीपकके प्रकाश-का, रज्जु आदि वस्तुओंमें होनेवाली सर्पादिकी भ्रान्तिको और अन्धकारको नष्ट कर देना ही फल है और जैसे उस प्रकाशका फल सर्पविषयक विकल्पको हटाकर, केवल रज्जुको प्रत्यक्ष कराके समाप्त हो जाता है, वैसे ही अविद्यारूप अन्धकारके नाशक आत्मज्ञानका भी फल, केवल आत्मस्वरूपको प्रत्यक्ष कराके ही समाप्त होता देखा गया है।
जिनका फल प्रत्यक्ष है, ऐसी जो लकड़ीको चीरना अथवा अरणीमन्थनद्वारा अग्नि उत्पन्न करना आदि क्रियाएँ हैं, उनमें लगे हुए कर्ता आदि कारकोंकी, जैसे अलग-अलग टुकड़े हो जाना, अथवा अग्नि प्रज्वलित हो जाना आदि फलसे अतिरिक्त किसी अन्य फल देनेवाले कर्ममें प्रवृत्ति नहीं हो सकती, वैसे ही जिसका फल प्रत्यक्ष है, ऐसी ज्ञाननिष्ठारूप क्रियामें लगे हुए ज्ञाता आदि कारकोंकी भी आत्मकैवल्यरूप फलसे अतिरिक्त फलवाले किसी अन्य कर्ममें प्रवृत्ति नहीं हो सकती। अतः ज्ञाननिष्ठा कर्मसहित नहीं हो सकती।
यदि कहो कि भोजन और अग्निहोत्र आदि क्रियाओंके समान (इसमें भी समुच्चय) हो सकता है तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि जिसका फल कैवल्य (मोक्ष) है, उस ज्ञानके प्राप्त होनेके पश्चात् कर्मफलकी इच्छा नहीं रह सकती, जैसे सब ओरसे परिपूर्ण जलाशयके प्राप्त हो जानेपर कूप-तालाब आदिकी जलके लिये चाह नहीं रहती, उसी प्रकार मोक्ष जिसका फल है, ऐसे ज्ञानकी प्राप्ति होनेके बाद क्षणिक सुखरूप फलान्तरकी या उसकी साधनभूत क्रियाकी इच्छुकता नहीं रह सकती।
क्योंकि जो मनुष्य राज्य प्राप्त करा देनेवाले कर्ममें लगा हुआ है उसकी प्रवृत्ति, क्षेत्र-प्राप्ति ही जिसका फल है ऐसे कर्ममें नहीं होती और उस कर्मके फलकी इच्छा भी नहीं होती।
सुतरां यह सिद्ध हुआ कि परम कल्याणका साधन न तो कर्म है और न ज्ञान-कर्मका समुच्चय ही है तथा कैवल्य (मोक्ष) ही जिसका फल है, ऐसे ज्ञानको कर्मोंकी सहायता भी अपेक्षित नहीं है; क्योंकि ज्ञान अविद्याका नाशक है; इसलिये उसका कर्मोंसे विरोध है।
यह प्रसिद्ध ही है कि अन्धकारका नाशक अन्धकार नहीं हो सकता। इसलिये केवल ज्ञान ही परम कल्याणका साधन है।
पू0—यह सिद्धान्त ठीक नहीं; क्योंकि नित्यकर्मोंके न करनेसे प्रत्यवाय होता है और मोक्ष नित्य है। भाव यह कि—पहले जो यह कहा गया कि केवल ज्ञानसे ही मोक्ष मिलता है, ठीक नहीं; क्योंकि वेद-शास्त्रमें कहे हुए नित्यकर्मोंके न करनेसे नरकादिकी प्राप्तिरूप प्रत्यवाय होगा।
यदि कहो कि ऐसा होनेसे तो कर्मोंसे छुटकारा ही न होगा, अतः मोक्षके अभावका प्रसङ्ग आ जायगा, तो ऐसा दोष नहीं है; क्योंकि मोक्ष नित्यसिद्ध है। नित्यकर्मोंका आचरण करनेसे तो प्रत्यवाय न होगा, निषिद्ध कर्मोंका सर्वथा त्याग कर देनेसे अनिष्ट (बुरे) शरीरोंकी प्राप्ति न होगी, काम्यकर्मोंका त्याग कर देनेके कारण इष्ट (अच्छे) शरीरोंकी प्राप्ति न होगी तथा वर्तमान शरीरको उत्पन्न करनेवाले कर्मोंका, फलके उपभोगसे क्षय हो जानेपर, इस शरीरका नाश हो जानेके पश्चात्, दूसरे शरीरकी उत्पत्तिका कोई कारण नहीं रहनेसे तथा शरीरसम्बन्धी आसक्ति आदिके न करनेसे, जो स्वरूपमें स्थित हो जाना है वही कैवल्य है, अतः बिना प्रयत्नके ही कैवल्य सिद्ध हो जायगा।
उ0—किंतु भूतपूर्व अनेक जन्मोंके किये हुए जो स्वर्ग-नरक आदिकी प्राप्तिरूप फल देनेवाले अनेक अनारब्धफल—सञ्चित कर्म हैं, उनके फलका उपभोग न होनेके कारण, उनका तो नाश नहीं होगा—ऐसा कहें तो?
पू0—यह बात नहीं है; क्योंकि नित्यकर्मके अनुष्ठानमें होनेवाले परिश्रमरूप दुःखभोगको, उस कर्मोंके फलका उपभोग माना जा सकता है। अथवा प्रायश्चित्तकी भाँति नित्यकर्म भी पूर्वकृत पापका नाश करनेवाले मान लिये जायँगे तथा प्रारब्धकर्मका फलभोगसे नाश हो जायगा, फिर नये कर्मोंका आरम्भ न करनेसे “कैवल्य” बिना यज्ञके सिद्ध हो जायगा।
उ0—यह सिद्धान्त ठीक नहीं है; क्योंकि “उस (परमात्मा)-को जानकर ही मनुष्य मृत्युसे तरता है; मोक्ष-प्राप्तिके लिये दूसरा मार्ग नहीं है” इस प्रकार मोक्षके लिये विद्याके अतिरिक्त अन्य मार्गका अभाव बतलानेवाली श्रुति है; तथा जैसे चमड़ेकी भाँति आकाशको लपेटना असम्भव है, उसी प्रकार अज्ञानीकी मुक्ति असम्भव बतलानेवाली भी श्रुति है, एवं पुराण और स्मृतियोंमें भी यही कहा गया है कि ज्ञानसे ही कैवल्यकी प्राप्ति होती है।
इसके सिवा (उस सिद्धान्तमें) जिनका फल मिलना आरम्भ नहीं हुआ है ऐसे पूर्वकृत पुण्योंके नाशकी उत्पत्ति न होनेसे भी यह पक्ष ठीक नहीं है। अर्थात् जिस प्रकार पूर्वकृत सञ्चित पुण्योंका होना सम्भव है, उसी प्रकार सञ्चित पापोंका होना भी सम्भव है ही; अतः देहान्तरको उत्पन्न किये बिना उनका क्षय सम्भव न होनेसे (इस पक्षके अनुसार) मोक्ष सिद्ध नहीं हो सकेगा।
इसके सिवा, पुण्य-पापके कारणरूप राग, द्वेष और मोह आदि दोषोंका, बिना आत्मज्ञानके मूलोच्छेद होना सम्भव न होनेके कारण भी पुण्य-पापका उच्छेद होना सम्भव नहीं।
तथा श्रुतिमें नित्यकर्मोंका पुण्यलोककी प्राप्तिरूप फल बतलाया जानेके कारण और “अपने कर्मोंमें स्थित वर्णाश्रमावलम्बी” इत्यादि स्मृतिवाक्योंद्वारा भी यही बात कही जानेके कारण भी कर्मोंका क्षय (मानना) सिद्ध नहीं होता।
तथा जो यह कहते हैं कि नित्यकर्म दुःखरूप होनेके कारण पूर्वकृत पापोंका फल ही है, उनका अपने स्वरूपसे अतिरिक्त और कोई फल नहीं है; क्योंकि श्रुतिमें उनका कोई फल नहीं बतलाया गया तथा उनका “विधान जीवननिर्वाह आदिके लिये किया गया है।” उनका कहना ठीक नहीं है; क्योंकि जो कर्म फल देनेके लिये प्रवृत्त नहीं हुए, उनका फल होना असम्भव है और नित्यकर्मके अनुष्ठानका परिश्रम, अन्य कर्मका फलविशेष है यह बात भी सिद्ध नहीं की जा सकेगी।
तुमने जो यह कहा कि पूर्वजन्मकृत पापकर्मोंका फल, नित्यकर्मोंके अनुष्ठानमें होनेवाले परिश्रमरूप दुःखके द्वारा भोगा जाता है, सो ठीक नहीं; क्योंकि मरनेके समय जो कर्म भविष्यमें फल देनेके लिये अङ्क
ुरित नहीं हुए उनका फल दूसरे कर्मोंद्वारा उत्पन्न हुए शरीरमें भोगा जाता है, यह कहना युक्तियुक्त नहीं है।
यदि ऐसा न हो तो स्वर्गरूप फलका भोग करनेके लिये अग्निहोत्रादि कर्मोंसे उत्पन्न हुए जन्ममें नरकके कारणभूत कर्मोंका फल भोगा जाना भी युक्तिविरुद्ध नहीं होगा।
इसके सिवा यह (नित्यकर्मके अनुष्ठानमें होने-वाला परिश्रमरूप दुःख) पापोंकी फलरूप दुःख-विशेष सिद्ध न हो सकनेके कारण भी तुम्हारा कहना ठीक नहीं है; क्योंकि भिन्न-भिन्न प्रकारके दुःख-साधनरूप फल देनेवाले, अनेक (सञ्चित) पापोंके होनेकी सम्भावना होते हुए भी नित्यकर्म अनुष्ठानके परिश्रममात्रको ही उन सबका फल मान लेनेपर शीतोष्णादि द्वन्द्वोंकी अथवा रोगादिकी पीड़ासे होने-वाले दुःखोंको पापोंका फल नहीं माना जा सकेगा; तथा यह हो भी कैसे सकता है कि नित्यकर्मके अनुष्ठानका परिश्रम ही पूर्वकृत पापोंका फल है, सिरपर पत्थर आदि ढोनेका दुःख उसका फल नहीं?
इसके सिवा, नित्यकर्मोंके अनुष्ठानसे होनेवाला परिश्रमरूप दुःख पूर्वकृत पापोंका फल है, यह कहना प्रकरणविरुद्ध भी है।
पू0—कैसे?
उ0—जो पूर्वकृत पाप, फल देनेके लिये अङ्कु रित नहीं हुए हैं, उसका क्षय नहीं हो सकता ऐसा प्रकरण है, उसमें तुमने फल देनेके लिये प्रस्तुत हुए पूर्वकृत पापोंका ही फल, नित्यकर्मोंके अनुष्ठानसे होनेवाला परिश्रमरूप दुःख बतलाया है, जो कर्म फल देनेके लिये प्रस्तुत नहीं हुए हैं उनका फल नहीं बतलाया।
यदि तुम यह मानते हो कि पूर्वकृत सभी पाप-कर्म फल देनेके लिये प्रवृत्त हो चुके हैं, तो फिर नित्यकर्मोंके अनुष्ठानका परिश्रमरूप दुःख ही उनका फल है, यह विशेषण देना अयुक्त ठहरता है। और नित्यकर्मविधायक शास्त्रको भी व्यर्थ माननेका प्रसङ्ग आ जाता है। क्योंकि फल देनेके लिये अङ्क ुरित हुए पापोंका तो उपभोगसे ही क्षय जो जायगा (उनके लिये नित्यकर्मोंकी क्या आवश्यकता है)।
इसके सिवा (वास्तवमें) वेद-विहित नित्यकर्मोंसे होनेवाला परिश्रमरूप दुःख यदि कर्मका फल हो तो वह उन (विहित नित्यकर्मों)-का ही फल होना चाहिये; क्योंकि वह व्यायाम आदिकी भाँति उनके ही अनुष्ठानसे होता हुआ दिखलायी देता है, अतः यह कल्पना करना कि “वह किसी अन्य कर्मका फल है” युक्तियुक्त नहीं है।
नित्यकर्मोंका विधान जीवनादिके लिये किया गया है इसलिये भी नित्यकर्मोंको प्रायश्चित्तकी भाँति पूर्वकृत पापोंका फल मानना युक्तियुक्त नहीं है। जिस पापकर्मके लिये जो प्रायश्चित्त विहित है, वह उस पापका फल नहीं है। तथापि यदि ऐसा मानें कि प्रायश्चित्तरूप दुःख (जिसके लिये प्रायश्चित्त किया जाय) उस पापरूप निमित्तका ही फल होता है, तो जीवनादिके लिये किये जानेवाले नित्यकर्मोंका परिश्रमरूप दुःख भी जीवन आदि हेतुओंका ही फल सिद्ध होगा; क्योंकि नित्य और प्रायश्चित्त ये दोनों ही किसी-न-किसी निमित्तसे किये जानेवाले हैं, इनमें कोई भेद नहीं है।
इसके सिवा दूसरा दोष यह भी है कि नित्यकर्मके परिश्रमकी और काम्य-अग्निहोत्रादि कर्मके परिश्रमकी समानता होनेके कारण, नित्यकर्मका परिश्रम ही पूर्वकृत पापका फल है, काम्य-कर्मानुष्ठानका परिश्रमरूप दुःख उसका फल नहीं है, ऐसा माननेके लिये कोई विशेष कारण नहीं है, अतः वह काम्यकर्मका परिश्रमरूप दुःख भी पूर्वकृत पापका ही फल माना जायगा।
ऐसा होनेसे “नित्यकर्मोंका फल नहीं बतलाया गया है और उनके अनुष्ठानका विधान किया गया है, उस विधानकी अन्य प्रकारसे उपपत्ति न होनेके कारण, नित्यकर्मोंके अनुष्ठानसे होनेवाला दुःख, पूर्वकृत पापोंका ही फल है”, इस प्रकारकी जो अर्थापत्तिकी कल्पना की गयी थी, उसका खण्डन हो गया।
इस तरह प्रकारान्तरसे नित्यकर्मोंके विधानकी अनुपपत्ति होनेसे और नित्यकर्मोंका अनुष्ठानसम्बन्धी परिश्रमरूप दुःखके सिवा दूसरा फल होता है, ऐसा अनुमान होनेसे भी (यह पक्ष खण्डित हो जाता है)।
इसके सिवा ऐसा माननेमें विरोध होनेके कारण भी (यह पक्ष कट जाता है)। नित्यकर्मोंका अनुष्ठान करते हुए दूसरे कर्मोंका फल भोगा जाता है, ऐसा मान लेनेसे यह कहना होता है कि वह उपभोग ही नित्यकर्मका फल है और साथ ही यह भी प्रतिपादन करते जाते हो कि नित्यकर्मका फल नहीं है; अतः यह कथन परस्पर विरुद्ध होता है।
इसके अतिरिक्त, (तुम्हारे मतानुसार) काम्य-अग्निहोत्रादिका अनुष्ठान करते हुए तन्त्रसे नित्य-अग्निहोत्रादि भी उन्हींके साथ अनुष्ठित हो जाते हैं। अतः उस परिश्रमरूप दुःखभोगसे ही काम्य-अग्निहोत्रादिका फल भी क्षीण हो जायगा; क्योंकि वह उसके अधीन है।
यदि ऐसा मानें कि काम्य-अग्निहोत्रादिका स्वर्गादि प्राप्तिरूप दूसरा ही फल होता है तो उनके अनुष्ठानमें होनेवाले परिश्रमरूप दुःखको भी नित्यकर्मके परिश्रमसे भिन्न मानना आवश्यक होगा। परंतु प्रत्यक्ष प्रमाणसे विरुद्ध होनेके कारण यह नहीं हो सकता। क्योंकि काम्यकर्मोंके अनुष्ठानसे होनेवाले परिश्रमरूप दुःखसे, केवल नित्यकर्म-अनुष्ठानमें होनेवाले परिश्रमरूप दुःखका भेद नहीं है।
इसके सिवा दूसरी बात यह भी है कि जो कर्म न विहित हो और न प्रतिषिद्ध हो, वही तत्काल फल देनेवाला होता है, शास्त्रविहित या प्रतिषिद्ध कर्म तत्काल फल देनेवाला नहीं होता। यदि ऐसा होता तो स्वर्ग आदि लोकोंका प्रतिपादन करनेमें और अदृष्ट फलोंके बतलानेमें शास्त्रकी प्रवृत्ति नहीं होती।
कर्मत्वमें किसी प्रकारका भेद न होनेपर तथा अंग और इतिकर्तव्यता आदिकी कोई विशेषता न होनेपर भी केवल नित्य-अग्निहोत्रादिका फल तो अनुष्ठान-जनित परिश्रमरूप दुःखके उपभोगसे क्षय हो जाता है और फलेच्छुकतामात्रकी अधिकतासे काम्य-अग्निहोत्रादिका स्वर्गादि महाफल होता है, ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती।
सुतरां नित्यकर्मोंका अदृष्ट फल नहीं होता यह बात कभी भी सिद्ध नहीं हो सकती। इसलिये यह सिद्ध हुआ कि अविद्यापूर्वक होनेवाले सभी शुभाशुभ कर्मोंका, अशेषतः नाश करनेवाला हेतु, विद्या (ज्ञान) ही है, नित्यकर्मका अनुष्ठान नहीं।
क्योंकि सभी कर्म अविद्या और कामनामूलक हैं। ऐसा ही हमने सिद्ध किया है कि अज्ञानीका विषय कर्म है और ज्ञानीका विषय सर्वकर्मसंन्यासपूर्वक ज्ञाननिष्ठा है।
“उभौ तौ न विजानीतः” “वेदाविनाशिनं नित्यम्” “ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्” “अज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्” “तत्त्ववित्तु” “गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते” “सर्वकर्माणि मनसा सन्न्यस्यास्ते” “नैव किञ्चित् करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्” इत्यादि वाक्योंके अर्थसे यही सिद्ध होता है कि अज्ञानी ही “मैं कर्म करता हूँ” ऐसा मानता है (ज्ञानी नहीं)।
आरुरुक्षुके लिये कर्म कर्तव्य बतलाये हैं और आरूढके लिये अर्थात् योगस्थ पुरुषके लिये उपशम कर्तव्य बतलाया है। तथा (ऐसा भी कहा है कि) “तीनों प्रकारके अज्ञानी भक्त भी उदार हैं, पर ज्ञानी तो मेरा स्वरूप ही है, ऐसा मैं मानता हूँ।”
कर्म करनेवाले सकाम अज्ञानी लोग आवागमन-को प्राप्त होते हैं और अनन्य भक्त नित्ययुक्त होकर चिन्तन करते हुए आत्मस्वरूप, आकाशके सदृश, मुझ निष्पाप परमात्माकी उपासना किया करते हैं।
“उनको मैं वह बुद्धियोग देता हूँ जिससे वे मुझे प्राप्त हो जाते हैं” इससे यह सिद्ध होता है कि कर्म करनेवाले अज्ञानी भगवान्को प्राप्त नहीं होते।
भगवदर्थ कर्म करनेवाले जो युक्ततम होनेपर भी कर्मी होनेके नाते अज्ञानी हैं, वे चित्तसमाधानसे लेकर कर्मफलत्यागपर्यन्त उत्तरोत्तर हीन बतलाये हुए साधनोंसे युक्त होते हैं।
तथा जो अनिर्देश्य अक्षरके उपासक हैं वे “अद्वेष्टा सर्वभूतानाम्” आदिसे लेकर, बारहवें अध्यायकी समाप्तिपर्यन्त बतलाये हुए साधनोंसे सम्पन्न और तेरहवें अध्यायसे लेकर तीन अध्यायोंमें बतलाये हुए ज्ञान-साधनोंसे भी युक्त होते हैं।
अधिष्ठानादि पाँच जिसके कारण हैं, ऐसे समस्त कर्मोंका जो संन्यास करनेवाले हैं, जो आत्माके एकत्व और अकर्तृत्वको जाननेवाले हैं, जो ज्ञानकी परानिष्ठामें स्थित हो गये हैं, जो भगवत्स्वरूप और आत्माके एकत्वज्ञानकी शरण हो चुके हैं, ऐसे भगवान्के तत्त्वको जाननेवाले परमहंस परिव्राजकोंको इष्ट-अनिष्ट और मिश्र—ऐसा त्रिविध कर्मफल नहीं मिलता। इनसे अन्य जो संन्यास न करनेवाले कर्म-परायण अज्ञानी हैं, उनको कर्मका फल अवश्य भोगना पड़ता है; यही गीताशास्त्रमें कहे हुए कर्तव्य और अकर्तव्यका विभाग है।
पू0—सभी कर्मोंको अविद्यामूलक मानना युक्ति-सङ्गत नहीं है।
उ0—नहीं, ब्रह्महत्यादि निषिद्ध कर्मोंकी भाँति (सभी कर्म अविद्यामूलक हैं) नित्यकर्म यद्यपि शास्त्रप्रतिपादित हैं तो भी वे अविद्यायुक्त पुरुषके ही कर्म हैं।
जैसे प्रतिषेध-शास्त्रसे कहे हुए भी अनर्थके कारणरूप ब्रह्महत्यादि निषिद्ध कर्म अविद्या और कामनादि दोषोंसे युक्त पुरुषके द्वारा ही हो सकते हैं; क्योंकि दूसरी तरह उनमें प्रवृत्ति नहीं हो सकती। उसी प्रकार नित्य-नैमित्तिक और काम्य आदि कर्म भी अविद्या और कामनासे युक्त मनुष्यसे ही हो सकते हैं।
पू0—परंतु आत्माको शरीरसे पृथक् समझे बिना नित्य-नैमित्तिक आदि कर्मोंमें प्रवृत्तिका होना असम्भव है।
उ0—यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि आत्मा जिसका कर्ता नहीं है ऐसे चलनरूप कर्ममें (अज्ञानियों-की) “मैं करता हूँ” ऐसी प्रवृत्ति देखी जाती है।
यदि कहो कि शरीर आदिमें जो अहंभाव है वह गौण है, मिथ्या नहीं है। तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि ऐसा माननेसे उनके कार्यमें भी गौणता सिद्ध होगी।
पू0—जैसे “हे पुत्र! तू मेरा आत्मा ही है” इस श्रुतिवाक्यके अनुसार, अपने पुत्रमें “अहंभाव” होता है तथा संसारमें भी जैसे “यह गौ मेरा प्राण ही है” इस प्रकार प्रिय वस्तुमें “अहंभाव” होता देखा जाता है, उसी प्रकार अपने शरीरादि संघातमें भी अहंभाव गौण ही है। यह प्रतीति मिथ्या नहीं है। मिथ्या प्रतीति तो वह है कि जो स्थाणु और पुरुषके भेदको न जानकर स्थाणुमें पुरुषकी प्रतीति होती है।
उ0—(यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि) गौण प्रयोग लुप्तोपमा शब्दद्वारा अधिकरणकी स्तुति करनेके लिये होता है, इसलिये गौण प्रतीतिसे मुख्यके कार्यकी सिद्धि नहीं होती।
जैसे कोई कहे कि देवदत्त सिंह है या बालक अग्नि है, तो उसका यह कहना, “देवदत्त सिंहके सदृश क्रूर और बालक अग्निके समान पिङ्गल (गौर) वर्ण”, इस प्रकारकी समानताके कारण देवदत्त और बालकरूप अधिष्ठानकी स्तुतिके लिये ही है। क्योंकि गौण शब्द या गौण ज्ञानसे कोई सिंहका कार्य (किसीको भक्षण कर जाना) या अग्निका कार्य (किसीको जला डालना) सिद्ध नहीं किया जा सकता। परंतु मिथ्या प्रत्ययका कार्य (जन्म-मरणरूप) अनर्थ, (मनुष्य) अनुभव कर रहा है।
इसके सिवा गौण प्रतीतिके विषयको मनुष्य ऐसा जानता भी है कि वास्तवमें यह देवदत्त सिंह नहीं है और यह बालक अग्नि नहीं है।
(यदि उपर्युक्त प्रकारसे शरीरादि संघातमें भी आत्मभाव गौण होता तो) शरीरादिके संघातरूप गौण आत्माद्वारा किये हुए कर्म, अहंभावके मुख्य विषय आत्माके किये हुए नहीं माने जाते। क्योंकि गौण सिंह (देवदत्त) और गौण अग्नि (बालक) द्वारा किये हुए कर्म मुख्य सिंह और अग्निके नहीं माने जाते। तथा उस क्रूरता और पिङ्गलताद्वारा कोई मुख्य सिंह और मुख्य अग्निका कार्य नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे केवल स्तुतिके लिये कहे हुए होनेसे हीनशक्ति हैं।
जिनकी स्तुति की जाती है वे (देवदत्त और बालक) भी यह जानते हैं कि “मैं सिंह नहीं हूँ”, “मैं अग्नि नहीं हूँ” तथा “सिंहका कर्म मेरा नहीं है”, “अग्निका कर्म मेरा नहीं है।” इसी प्रकार (यदि शरीर आदिमें गौण भावना होती तो) संघातके कर्म मुझ मुख्य आत्माके नहीं हैं—ऐसी ही प्रतीति होनी चाहिये थी, ऐसी नहीं कि “मैं कर्ता हूँ”, “मेरे कर्म हैं” (सुतरां यह सिद्ध हुआ कि शरीरमें आत्मभाव गौण नहीं, मिथ्या है)।
जो ऐसा कहते हैं कि अपने स्मृति, इच्छा और प्रयत्न इन कर्महेतुओंके द्वारा आत्मा कर्म किया करता है, उनका कथन ठीक नहीं; क्योंकि ये सब मिथ्या प्रतीतिपूर्वक ही होनेवाले हैं। अर्थात् स्मृति, इच्छा और प्रयत्न आदि सब मिथ्या प्रतीतिसे होनेवाले, इष्ट-अनिष्टरूप अनुभूत कर्मफलजनित संस्कारोंको लेकर ही होते हैं।
जिस प्रकार इस वर्तमान जन्ममें धर्म, अधर्म और उनके फलोंका अनुभव (सुख-दुःख) शरीरादि संघातमें आत्मबुद्धि और राग-द्वेषादिद्वारा किये हुए होते हैं, वैसे ही भूतपूर्व जन्ममें और उससे पहलेके जन्मोंमें भी थे। इस न्यायसे यह अनुमान करना चाहिये कि यह बीता हुआ और आगे होनेवाला (जन्म-मरणरूप) संसार अनादि एवं अविद्याकर्तृक ही है।
इससे यह सिद्ध होता है कि ज्ञाननिष्ठामें सर्व-कर्मोंके संन्याससे संसारकी आत्यन्तिक निवृत्ति हो जाती है; क्योंकि देहाभिमान अविद्यारूप है, अतः उसकी निवृत्ति हो जानेपर शरीरान्तरकी प्राप्ति न होनेके कारण (जन्म-मरणरूप) संसारकी प्राप्ति नहीं हो सकती।
शरीरादि संघातमें जो आत्माभिमान है वह अविद्यारूप है; क्योंकि संसारमें भी “मैं गौ आदिसे अन्य हूँ और गौ आदि वस्तुएँ मुझसे अन्य हैं” ऐसा जाननेवाला कोई भी मनुष्य उनमें ऐसी बुद्धि नहीं करता कि “यह मैं हूँ।”
न जाननेवाला ही स्थाणुमें पुरुषकी भ्रान्तिके समान अविवेकके कारण, शरीरादि संघातमें “मैं हूँ” ऐसा आत्मभाव कर सकता है; पर विवेकपूर्वक जाननेवाला नहीं कर सकता।
तथा पुत्रमें जो “हे पुत्र! तू मेरा आत्मा ही है” ऐसी आत्मबुद्धि है, वह जन्य-जनक-सम्बन्धके कारण होनेवाली गौण बुद्धि है, उस गौण आत्मा (पुत्र)-से भोजन आदिकी भाँति1 कोई मुख्य कार्य नहीं किया जा सकता। जैसे कि गौण सिंह और गौण अग्निरूप देवदत्त और बालकद्वारा, मुख्य सिंह और मुख्य अग्निका कार्य नहीं किया जा सकता।
पू0—स्वर्गादि अदृष्ट पदार्थोंके लिये कर्मोंका विधान करनेवाली श्रुतिका प्रमाणत्व होनेसे, यह सिद्ध होता है कि शरीर-इन्द्रिय आदि गौण आत्माओंके द्वारा मुख्य आत्माके कार्य किये जाते हैं।
उ0—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि उनका आत्मत्व अविद्याकर्तृक है। अर्थात् शरीर, इन्द्रिय आदि गौण आत्मा नहीं हैं (किंतु मिथ्या हैं)।
पू0—तो फिर (इनमें आत्मभाव) कैसे होता है?
उ0—मिथ्या प्रतीतिसे ही सङ्गरहित आत्माकी सङ्गति मानकर, इनसे आत्मभाव किया जाता है; क्योंकि उस मिथ्याप्रतीतिके रहते हुए ही उनमें आत्मभावकी सत्ता है, उसके अभावसे आत्मभावना-का भी अभाव हो जाता है।
अभिप्राय यह कि मूर्ख अज्ञानियोंका ही अज्ञान-कालमें “मैं बड़ा हूँ, मैं गौर हूँ” इस प्रकार शरीर-इन्द्रिय आदिके संघातमें आत्माभिमान देखा जाता है। परंतु “मैं शरीरादि संघातसे अलग हूँ” ऐसा समझनेवाले विवेकशीलोंकी, उस समय शरीरादि संघातमें अहंबुद्धि नहीं होती।
सुतरां, मिथ्याप्रतीतिके अभावसे देहात्मबुद्धिका अभाव हो जानेके कारण, यह सिद्ध होता है कि शरीरादिमें आत्मबुद्धि अविद्याकृत ही है, गौण नहीं।
जिनकी समानता और विशेषता अलग-अलग समझ ली गयी है, ऐसे सिंह और देवदत्तमें या अग्नि और बालक आदिमें ही गौण प्रतीति या गौण शब्दका प्रयोग हो सकता है; जिनकी समानता और विशेषता नहीं समझी गयी उनमें नहीं।
तुमने जो कहा कि श्रुतिको प्रमाणरूप माननेसे यह पक्ष सिद्ध होता है वह भी ठीक नहीं; क्योंकि उसकी प्रमाणता अदृष्टविषयक है। अर्थात् प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे उपलब्ध न होनेवाले अग्निहोत्रादिके, साध्य, साधन और सम्बन्धके विषयमें ही श्रुतिकी प्रमाणता है; प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे उपलब्ध हो जानेवाले विषयोंमें नहीं। क्योंकि श्रुतिकी प्रमाणता अदृष्ट विषयको दिखलानेके लिये ही है (अर्थात् अप्रत्यक्ष विषयको बतलाना ही उसका काम है)।
सुतरां देहादि-संघातमें, प्रत्यक्ष ही मिथ्या ज्ञानसे होनेवाली अहंप्रतीतिको, गौण मानना नहीं बन सकता।
क्योंकि “अग्नि ठण्डा है या अप्रकाशक है” ऐसा कहनेवाली सैकड़ों श्रुतियाँ भी प्रमाणरूप नहीं मानी जा सकतीं। यदि श्रुति ऐसा कहे कि “अग्नि ठण्डा है अथवा अप्रकाशक है” तो ऐसा मान लेना चाहिये कि श्रुतिको कोई और ही अर्थ अभीष्ट है। क्योंकि अन्य प्रकारसे उसकी प्रामाणिकता सिद्ध नहीं हो सकती। परंतु प्रत्यक्षादि अन्य प्रमाणोंके विरुद्ध या श्रुतिके अपने वचनोंके विरुद्ध श्रुतिके अर्थकी कल्पना करना उचित नहीं।
पू0—कर्म मिथ्या ज्ञानयुक्त पुरुषद्वारा ही किये जानेवाले हैं, ऐसा माननेसे वास्तवमें कर्ताका अभाव हो जानेके कारण श्रुतिकी अप्रमाणता (अनर्थकता) ही सिद्ध होती है ऐसा कहें तो?
उ0—नहीं, क्योंकि ब्रह्मविद्यामें उसकी सार्थकता सिद्ध होती है।
पू0—कर्मविधायक श्रुतिकी भाँति ब्रह्मविद्या-विधायक श्रुतिकी अप्रमाणताका प्रसङ्ग आ जायगा, ऐसा माने तो?
उ0—यह ठीक नहीं, क्योंकि उसका कोई बाधक प्रत्यय नहीं हो सकता। अर्थात् जैसे ब्रह्मविद्याविधायक श्रुतिद्वारा आत्मसाक्षात्कार हो जानेपर, देहादि संघातमें आत्मबुद्धि बाधित हो जाती है, वैसे आत्मामें ही होनेवाला आत्मभावका बोध किसीके द्वारा किसी भी कालमें किसी प्रकार भी बाधित नहीं किया जा सकता। क्योंकि वह आत्मज्ञान स्वयं ही फल है, उससे भिन्न किसी अन्य फलकी प्राप्ति नहीं है, जैसे अग्नि उष्ण और प्रकाशस्वरूप है।
इसके सिवा (वास्तवमें) कर्मविधायक श्रुति भी अप्रामाणिक नहीं है, क्योंकि वह पूर्व-पूर्व (स्वाभाविक) प्रवृत्तियोंको रोक-रोककर उत्तरोत्तर नयी-नयी (शास्त्रीय) प्रवृत्तिको उत्पन्न करती हुई (अन्तमें अन्तःकरणकी शुद्धिद्वारा साधकको) अन्तरात्माके सम्मुख करनेवाली प्रवृत्ति उत्पन्न करती है। अतः उपाय मिथ्या होते हुए भी, उपेयकी सत्यतासे, उसकी सत्यता ही है; जैसे कि विधिवाक्यके अन्तमें कहे जानेवाले अर्थवादवाक्योंकी सत्यता मानी जाती है।
लोकव्यवहारमें भी (देखा जाता है कि) उन्मत्त और बालक आदिको दूध आदि पिलानेके लिये चोटी बढ़ने आदिकी बात कही जाती है।
तथा आत्मज्ञान होनेसे पहले, देहाभिमाननिमित्तक प्रत्यक्षादि प्रमाणोंके प्रमाणत्वकी भाँति प्रकारान्तरमें स्थित (कर्मविधायक) श्रुतियोंकी साक्षात् प्रमाणता भी सिद्ध होती है।
तुम जो यह मानते हो कि आत्मा स्वयं क्रिया न करता हुआ भी संनिधिमात्रसे कर्म करता है, यही आत्माका मुख्य कर्तापन है। जैसे राजा स्वयं युद्ध न करते हुए भी संनिधिमात्रसे ही अन्य योद्धाओंके युद्ध करनेसे “राजा युद्ध करता है” ऐसे कहा जाता है तथा “वह जीत गया, हार गया” ऐसे भी कहा जाता है। इसी प्रकार सेनापति भी केवल वाणीसे ही आज्ञा करता है। फिर भी राजा और सेनापतिका उस क्रियाके फलसे सम्बन्ध होता देखा जाता है। तथा जैसे ऋत्विक्के कर्म यजमानके माने जाते हैं, वैसे ही देहादि संघातके कर्म आत्मकृत हो सकते हैं, क्योंकि उनका फल आत्माको ही मिलता है।
तथा जैसे भ्रामक (भ्रमण करानेवाला चुम्बक) स्वयं क्रिया नहीं करता, तो भी वह लोहेका चलाने-वाला है, इसलिये उसीका मुख्य कर्तापन है, वैसे ही आत्माका मुख्य कर्तापन है।
ऐसा मानना ठीक नहीं, क्योंकि ऐसा माननेसे न करनेवालेको कारक माननेका प्रसङ्ग आ जायगा।
यदि कहो कि कारक तो अनेक प्रकारके होते हैं, तो भी तुम्हारा कहना ठीक नहीं; क्योंकि राजा आदिका मुख्य कर्तापन भी देखा जाता है। अर्थात् राजा अपने निजी व्यापारद्वारा भी युद्ध करता है। तथा योद्धाओंसे युद्ध कराने और उन्हें धन देनेसे भी निःसन्देह उसका मुख्य कर्तापन है, उसी प्रकार जय-पराजय आदि फलभोगोंमें भी उसकी मुख्यता है।
वैसे ही यजमानका भी प्रधान आहुति स्वयं देनेके कारण और दक्षिणा देनेके कारण निःसन्देह मुख्य कर्तृत्व है।
इससे यह निश्चित होता है कि क्रियारहित वस्तुमें जो कर्तापनका उपचार है वह गौण है। यदि राजा और यजमान आदिमें स्वव्यापाररूप मुख्य कर्तापन न पाया जाता तो उनका संनिधिमात्रसे भी मुख्य कर्तापन माना जा सकता था, जैसे कि लोहेको चलानेमें चुम्बकका संनिधिमात्रसे मुख्य कर्तापन माना जाता है, परंतु चुम्बककी भाँति राजा और यजमानका स्वव्यापार उपलब्ध न होता हो— ऐसी बात नहीं है। सुतरां संनिधिमात्रसे जो कर्तापन है वह भी गौण ही है।
ऐसा होनेसे उसके फलका सम्बन्ध भी गौण ही होगा, क्योंकि गौण कर्ताद्वारा मुख्य कार्य नहीं किया जा सकता। अतः यह मिथ्या ही कहा जाता है कि “निष्क्रिय आत्मा देहादिकी क्रियासे कर्ता-भोक्ता हो जाता है।”
परंतु भ्रान्तिके कारण सब कुछ हो सकता है। जैसे कि स्वप्न और मायामें होता है। परंतु शरीरादिमें आत्मबुद्धिरूप अज्ञान-सन्ततिका विच्छेद हो जानेपर, सुषुप्ति और समाधि आदि अवस्थाओंमें कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि अनर्थ उपलब्ध नहीं होता।
इससे यह सिद्ध हुआ कि यह संसारभ्रम मिथ्या ज्ञान-निमित्तक ही है, वास्तविक नहीं, अतः पूर्ण तत्त्वज्ञानसे उसकी आत्यन्तिक निवृत्ति हो जाती है॥ 66॥
सर्वं गीताशास्त्रार्थम् उपसंहृत्य अस्मिन् अध्याये विशेषतः च अन्ते इह शास्त्रार्थ-दार्ढ्याय सङ्क्षेपत उपसंहारं कृत्वा अथ इदानीं शास्त्रसम्प्रदायविधिम् आह—
इस अठारहवें अध्यायमें समस्त गीताशास्त्रके अर्थका उपसंहार करके फिर विशेषरूपसे इस अन्तिम श्लोकमें शास्त्रके अभिप्रायको दृढ़ करनेके लिये संक्षेपसे उपसंहार करके, अब शास्त्र-सम्प्रदायकी विधि बतलाते हैं।
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इदं शास्त्रं ते तव हिताय मया उक्तं संसारविच्छित्तये अतपस्काय तपोरहिताय न वाच्यम् इति व्यवहितेन सम्बध्यते।
तपस्विने अपि अभक्ताय गुरुदेवभक्ति-रहिताय कदाचन कस्याञ्चिद् अपि अवस्थायां न वाच्यम्।
भक्तः तपस्वी अपि सन् अशुश्रूषुः यो भवति तस्मै अपि न वाच्यम्।
न च यो मां वासुदेवं प्राकृतं मनुष्यं मत्वा अभ्यसूयति
आत्मप्रशंसादिदोषाध्यारोपणेन मम ईश्वरत्वम् अजानन् न सहते असौ अपि अयोग्यः तस्मै अपि न वाच्यम्।
भगवति
भक्ताय
तपस्विने
शुश्रूषवे अनसूयवे च वाच्यं शास्त्रम् इति सामर्थ्याद् गम्यते।
तत्र मेधाविने तपस्विने वा इति अनयोः विकल्पदर्शनात् शुश्रूषाभक्तियुक्ताय तपस्विने तद्युक्ताय मेधाविने वा वाच्यम्। शुश्रूषाभक्ति-वियुक्ताय न तपस्विने न अपि मेधाविने वाच्यम्।
भगवति असूयायुक्ताय समस्तगुणवते अपि न वाच्यम् । गुरुशुश्रूषाभक्तिमते च वाच्यम् इति एष शास्त्रसम्प्रदायविधिः॥ 67॥
तेरे हितके लिये अर्थात् संसारका उच्छेद करनेके लिये, कहा हुआ यह शास्त्र, तपरहित मनुष्यको नहीं सुनाना चाहिये। इस प्रकार “वाच्यम्” इस व्यवधानयुक्त पदसे “न” का सम्बन्ध है।
तपस्वी होनेपर भी जो अभक्त हो अर्थात् गुरु या देवतामें भक्ति रखनेवाला न हो उसे कभी—किसी अवस्थामें भी नहीं सुनाना चाहिये।
भक्त और तपस्वी होकर भी जो शुश्रूषु (सुननेका इच्छुक) न हो उसे भी नहीं सुनाना चाहिये।
तथा जो मुझ वासुदेवको प्राकृत मनुष्य मान-कर, मुझमें दोष-दृष्टि करता हो, मुझे ईश्वर न जाननेसे, मुझमें आत्मप्रशंसादि दोषोंका अध्यारोप करके, मेरे ईश्वरत्वको सहन न कर सकता हो वह भी अयोग्य है, उसे भी (यह शास्त्र) नहीं सुनाना चाहिये।
अर्थापत्तिसे यह निश्चय होता है कि यह शास्त्र भगवान्में भक्ति रखनेवाले, तपस्वी, शुश्रूषायुक्त और दोष-दृष्टिरहित पुरुषको ही सुनाना चाहिये।
अन्य स्मृतियोंमें मेधावीको या तपस्वीको, इस प्रकार इन दोनोंका विकल्प देखा जाता है, इसलिये यह समझना चाहिये कि शुश्रूषा और भक्तियुक्त तपस्वीको अथवा इन तीनों गुणोंसे युक्त मेधावीको यह शास्त्र सुनाना चाहिये। शुश्रूषा और भक्तिसे रहित तपस्वी या मेधावी किसीको भी नहीं सुनाना चाहिये।
भगवान्में दोष-दृष्टि रखनेवाला तो यदि सर्वगुण-सम्पन्न हो, तो भी उसे नहीं सुनाना चाहिये। गुरु-शुश्रूषा और भक्ति-युक्त पुरुषको ही सुनाना चाहिये। इस प्रकार यह शास्त्र-सम्प्रदायकी विधि है॥ 67॥
सम्प्रदायस्य कर्तुः फलम् इदानीम् आह—
अब इस शास्त्र-परम्पराको चलानेवालोंके लिये फल बतलाते हैं—
य
इमं यथोक्तं परमं निःश्रेयसार्थं केशवार्जुनयोः संवादरूपं ग्रन्थं गुह्यं गोप्यं मद्भक्तेषु
अभिधास्यति
मयि
भक्तिमत्सु वक्ष्यति ग्रन्थतः अर्थतः च स्थापयिष्यति इत्यर्थः। यथा त्वयि मया।
भक्तेः पुनः ग्रहणात् तद्भक्तिमात्रेण केवलेन शास्त्रसम्प्रदाने पात्रं भवति इति गम्यते।
कथम् अभिधास्यति इति उच्यते—
भक्तिं मयि परां कृत्वा भगवतः परमगुरोः शुश्रूषा मया क्रियते इति एवं कृत्वा इत्यर्थः। तस्य इदं फलं माम् एव एष्यति मुच्यते एव अत्र संशयो न कर्तव्यः॥ 68॥
जो मनुष्य, परम कल्याण जिसका फल है ऐसे इस उपर्युक्त कृष्णार्जुन-संवादरूप अत्यन्त गोप्य गीताग्रन्थको मुझमें भक्ति रखनेवाले भक्तोंमें सुनावेगा— ग्रन्थरूपसे या अर्थरूपसे स्थापित करेगा, अर्थात् जैसे मैंने तुझे सुनाया है वैसे ही सुनावेगा—
यहाँ भक्तिका पुनः ग्रहण होनेसे यह पाया जाता है कि मनुष्य केवल भगवान्की भक्तिसे ही शास्त्र प्रदानका पात्र हो जाता है।
कैसे सुनावेगा सो बतलाते हैं।
मुझमें पराभक्ति करके, अर्थात् परमगुरु भगवान्की मैं यह सेवा करता हूँ ऐसा समझकर, (जो इसे सुनावेगा) उसका यह फल है कि वह मुझे ही प्राप्त हो जायगा अर्थात् निःसंदेह मुक्त हो जायगा—इसमें संशय नहीं करना चाहिये॥ 68॥
किं च—
तथा—
न च तस्मात् शास्त्रसम्प्रदायकृतो मनुष्येषु मनुष्याणां मध्ये कश्चिद् मे मम प्रियकृत्तमः अतिशयेन प्रियकृत् ततः अन्यः प्रियकृत्तमो न अस्ति एव इत्यर्थो वर्तमानेषु। न च भविता भविष्यति अपि काले तस्माद् द्वितीयः अन्यः प्रियतरो भुवि लोके अस्मिन्॥ 69॥
उस गीताशास्त्रकी परम्परा चलानेवाले भक्तसे बढ़कर, मेरा अधिक प्रिय कार्य करनेवाला, मनुष्योंमें, कोई भी नहीं है। अर्थात् वह मेरा अतिशय प्रिय करनेवाला है, वर्तमान मनुष्योंमें उससे बढ़कर प्रियतम कार्य करनेवाला और कोई नहीं है, तथा भविष्यमें भी इस भूलोकमें उससे बढ़कर प्रियतर कोई दूसरा नहीं होगा॥ 69॥
यः अपि—
जो भी कोई—
अध्येष्यते च पठिष्यति य इमं धर्म्यं धर्माद् अनपेतं संवादरूपं ग्रन्थम् आवयोः तेन इदं कृतं स्यात्। ज्ञानयज्ञेन विधिजपोपांशुमानसानां यज्ञानां ज्ञानयज्ञो मानसत्वाद् विशिष्टतम इति अतः तेन ज्ञानयज्ञेन गीताशास्त्रस्य अध्ययनं स्तूयते।
फलविधिः एव वा देवतादिविषयज्ञान-यज्ञफलतुल्यम् अस्य फलं भवति इति।
तेन अध्ययनेन अहम् इष्टः पूजितः स्यां भवेयम् इति मे मम मतिः निश्चयः॥ 70॥
जो मनुष्य, हम दोनोंके संवादरूप इस धर्मयुक्त गीताग्रन्थको पढ़ेगा, उसके द्वारा यह होगा कि मैं ज्ञानयज्ञसे (पूजित होऊँगा), विधियज्ञ, जपयज्ञ, उपांशुयज्ञ और मानसयज्ञ—इन चार यज्ञोंमें ज्ञानयज्ञ मानस है इसलिये श्रेष्ठतम है। अतः उस ज्ञानयज्ञकी समानतासे गीताशास्त्रके अध्ययनकी स्तुति करते हैं।
अथवा यों समझो कि यह फलविधि है, यानी इसका फल देवतादिविषयक ज्ञानयज्ञके समान होता है।
उस अध्ययनसे मैं (ज्ञानयज्ञद्वारा) पूजित होता हूँ, ऐसा मेरा निश्चय है॥ 70॥
अथ श्रोतुः इदं फलम्—
तथा श्रोताको यह (आगे बतलाया जानेवाला) फल मिलता है—
श्रद्धावान् श्रद्दधानः अनसूयः च असूयावर्जितः सन् इमं ग्रन्थं शृणुयादपि यो नरः अपि शब्दात् किमुत अर्थज्ञानवान् सः अपि पापाद् मुक्तः शुभान्
प्रशस्तान्
लोकान्
प्राप्नुयात् पुण्यकर्मणाम् अग्निहोत्रादिकर्मवताम्॥ 71॥
जो मनुष्य, इस ग्रन्थको श्रद्धायुक्त और दोष-दृष्टिरहित होकर केवल सुनता ही है, वह भी पापोंसे मुक्त होकर, पुण्यकारियोंके अर्थात् अग्निहोत्रादि श्रेष्ठकर्म करनेवालोंके, शुभ लोकोंको प्राप्त हो जाता है। “अपि” शब्दसे यह पाया जाता है कि अर्थ समझनेवालेकी तो बात ही क्या है?॥ 71॥
शिष्यस्य शास्त्रार्थग्रहणाग्रहणविवेकबुभुत्सया पृच्छति। तदग्रहणे ज्ञाते पुनः ग्राहयिष्यामि उपायान्तरेण अपि इति प्रष्टुः अभिप्रायः।
यत्नान्तरम् आस्थाय शिष्यः कृतार्थः कर्तव्य इति आचार्यधर्मः प्रदर्शितो भवति—
शिष्यने शास्त्रका अभिप्राय ग्रहण किया या नहीं; यह विवेचन करनेके लिये भगवान् पूछते हैं। इसमें पूछनेवालेका यह अभिप्राय है कि शास्त्रका अभिप्राय श्रोताने ग्रहण नहीं किया है—यह मालूम होनेपर, फिर किसी और उपायसे ग्रहण कराऊँगा।
इसके द्वारा आचार्यका यह कर्तव्य प्रदर्शित किया जाता है कि दूसरे उपायको स्वीकार करके किसी भी प्रकारसे शिष्यको कृतार्थ करना चाहिये—
कच्चित् किम् एतद् मया उक्तं श्रुतं श्रवणेन अवधारितं पार्थ किं त्वया एकाग्रेण चेतसा चित्तेन किं वा प्रमादितम्।
कच्चिद्
अज्ञानसम्मोहः
अज्ञाननिमित्तः सम्मोहो विचित्तभावः अविवेकता स्वाभाविकः किं प्रनष्टः। यदर्थः अयं शास्त्रश्रवणायासः तव मम च उपदेष्ट ृत्वायासः प्रवृत्तः ते तव धनञ्जय॥ 72॥
हे पार्थ! क्या तूने मुझसे कहे हुए इस शास्त्रको एकाग्रचित्तसे सुना, सुनकर बुद्धिमें स्थिर किया? अथवा सुना-अनसुना कर दिया?
हे धनंजय! क्या तेरा अज्ञानजनित मोह— स्वाभाविक अविवेकता—चित्तका मूढ़भाव सर्वथा नष्ट हो गया, जिसके लिये कि तेरा यह शास्त्रश्रवण-विषयक परिश्रम और मेरा वक्तृत्वविषयक परिश्रम हुआ है॥ 72॥
अर्जुन बोला—
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नष्टो मोहः अज्ञानजः समस्तसंसारानर्थहेतुः सागर इव दुस्तरः। स्मृतिः च आत्मतत्त्वविषया लब्धा। यस्या लाभात् सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः। त्वत्प्रसादात् तव प्रसादाद् मया त्वत्प्रसादम् आश्रितेन अच्युत।
अनेन
मोहनाशप्रश्नप्रतिवचनेन
सर्व-शास्त्रार्थज्ञानफलम् एतावद् एव इति निश्चितं दर्शितं भवति यद् उत अज्ञानासम्मोहनाश आत्मस्मृतिलाभः च इति।
तथा च श्रुतौ “अनात्मवित् शोचामि” (छा0 उ0 7। 1। 3) इति उपन्यस्य आत्मज्ञाने सर्वग्रन्थिविप्रमोक्ष उक्तः।
“भिद्यते हृदयग्रन्थिः” (मु0 उ0 2। 2। 8) “तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः” (ई0 उ0 7) इति च मन्त्रवर्णः।
अथ इदानीं त्वच्छासने स्थितः अस्मि गतसन्देहो मुक्तसंशयः करिष्ये वचनं तव अहं त्वत्प्रसादात् कृतार्थो न मम कर्तव्यम् अस्ति इति अभिप्रायः॥ 73॥
हे अच्युत! मेरा अज्ञानजन्य मोह, जो कि समस्त संसाररूप अनर्थका कारण था और समुद्रकी भाँति दुस्तर था, नष्ट हो गया है। और हे अच्युत! आपकी कृपाके आश्रित होकर मैंने आपकी कृपासे आत्मविषयक ऐसी स्मृति भी प्राप्त कर ली है कि जिसके प्राप्त होनेसे समस्त ग्रन्थियाँ—संशय विच्छिन्न हो जाते हैं।
इस मोहनाशविषयक प्रश्नोत्तरसे यह बात निश्चितरूपसे दिखलायी गयी है कि जो यह अज्ञानजनित मोहका नाश और आत्मविषयक स्मृतिका लाभ है, बस, इतना ही समस्त शास्त्रोंके अर्थज्ञानका फल है।
इसी तरह (छान्दोग्य) श्रुतिमें भी “मैं आत्माको न जाननेवाला शोक करता हूँ” इस प्रकार प्रकरण उठाकर आत्मज्ञान होनेपर समस्त ग्रन्थियोंका विच्छेद बतलाया है।
तथा “हृदयकी ग्रन्थि विच्छिन्न हो जाती है” “वहाँ एकताका अनुभव करनेवालेको कैसा मोह और कैसा शोक?” इत्यादि मन्त्रवर्ण भी हैं।
अब मैं संशयरहित हुआ आपकी आज्ञाके अधीन खड़ा हूँ। मैं आपका कहना करूँगा। अभिप्राय यह है कि मैं आपकी कृपासे कृतार्थ हो गया हूँ (अब) मेरा कोई कर्तव्य शेष नहीं है॥ 73॥
परिसमाप्तः
शास्त्रार्थः
अथ
इदानीं कथासम्बन्धप्रदर्शनार्थं सञ्जय उवाच—
शास्त्रका अभिप्राय समाप्त हो चुका। अब कथाका सम्बन्ध दिखलानेके लिये संजय बोला—
इति एवम् अहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः संवादम् इमं यथोक्तम् अश्रौषं श्रुतवान् अस्मि अद्भुतम् अत्यन्तविस्मयकरं रोमहर्षणं रोमाञ्चकरम्॥ 74॥
इस प्रकार मैंने यह उपर्युक्त अद्भुत—अत्यन्त विस्मयकारक रोमाञ्च करनेवाला श्रीवासुदेवभगवान् और महात्मा अर्जुनका संवाद सुना॥ 74॥
तं च इमम्—
और इसे—
व्यासप्रसादात्
ततो
दिव्यचक्षुर्लाभात् श्रुतवान् एतं संवादं गुह्यम् अहं परं योगं योगार्थत्वात् संवादम् इमं योगम् एव वा योगेश्वरात् कृष्णात् साक्षात् कथयतः स्वयं न परम्परातः॥ 75॥
मैंने (भगवान्) व्यासजीकी कृपासे उनसे दिव्यचक्षु पाकर इस परम गुह्य संवादको और परम योगको (सुना) अथवा (यों समझो कि) योगविषयक होनेसे यह संवाद ही योग है, अतः इस संवादरूप योगको मैंने योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्णसे, साक्षात् स्वयं कहते हुए सुना है, परम्परासे नहीं॥ 75॥
हे राजन् धृतराष्ट्र संस्मृत्य संस्मृत्य संवादम् इमम् अद्भुतं केशवार्जुनयोः पुण्यं श्रवणाद् अपि पापहरं श्रुत्वा हृष्यामि च मुहुः मुहुः प्रतिक्षणम्॥ 76॥
हे राजन् धृतराष्ट्र! केशव और अर्जुनके इस (परम) पवित्र—सुननेमात्रसे पापोंका नाश करनेवाले, अद्भुत संवादको सुनकर और बारम्बार स्मरण करके, मैं प्रतिक्षण बारम्बार हर्षित हो रहा हूँ॥ 76॥
तत् च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपम् अत्यद्भुतं हरेः विश्वरूपं विस्मयो मे महान् हे राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः॥ 77॥
तथा हे राजन्! हरिके उस अति अद्भुत विश्वरूपको भी बारम्बार याद करके, मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है और मैं बारम्बार हर्षित हो रहा हूँ॥ 77॥
किं बहुना—
बहुत कहनेसे क्या?
यत्र यस्मिन् पक्षे योगेश्वरः सर्वयोगानाम् ईश्वरः तत्प्रभवत्वात् सर्वयोगबीजस्य च कृष्णो यत्र पार्थो यस्मिन् पक्षे धनुर्धरो गाण्डीवधन्वा तत्र श्रीः तस्मिन् पाण्डवानां पक्षे विजयः तत्र एव भूतिः श्रियो विशेषो विस्तारो भूतिः ध्रुवा अव्यभिचारिणी नीतिः नय इति एवं मतिः मम इति॥ 78॥
समाप्तिमगमदिदं गीताशास्त्रम्।
समस्त योग और उनके बीज उन्हींसे उत्पन्न हुए हैं, अतः भगवान् योगेश्वर हैं। जिस पक्षमें (वे) सब योगोंके ईश्वर श्रीकृष्ण हैं तथा जिस पक्षमें गाण्डीव धनुर्धारी पृथापुत्र अर्जुन है, उस पाण्डवोंके पक्षमें ही श्री, उसीमें विजय, उसीमें विभूति अर्थात् लक्ष्मीका विशेष विस्तार और वहीं अचल नीति है—ऐसा मेरा मत है॥ 78॥