मोक्षसंन्यासयोग
सम्बन्ध—दूसरे अध्यायके ग्यारहवें श्लोकसे गीताके उपदेशका आरम्भ हुआ। वहाँसे आरम्भ करके तीसवें श्लोकतक भगवान्ने ज्ञानयोगका उपदेश दिया और प्रसंगवश क्षात्रधर्मकी दृष्टिसे युद्ध करनेकी कर्तव्यताका प्रतिपादन करके उनतालीसवें श्लोकसे लेकर अध्यायकी समाप्तिपर्यन्त कर्मयोगका उपदेश दिया, उसके बाद तीसरे अध्यायसे सत्रहवें अध्यायतक कहीं ज्ञानयोगकी दृष्टिसे और कहीं कर्मयोगकी दृष्टिसे परमात्माकी प्राप्तिके बहुत-से साधन बतलाये। उन सबको सुननेके अनन्तर अब अर्जुन इस अठारहवें अध्यायमें समस्त अध्यायोंके उपदेशका सार जाननेके उद्देश्यसे भगवान्के सामने संन्यास यानी ज्ञानयोगका और त्याग यानी फलासक्तिके त्यागरूप कर्मयोगका तत्त्व भलीभाँति अलग-अलग जाननेकी इच्छा प्रकट करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार अर्जुनके पूछनेपर भगवान् अपना निश्चय प्रकट करनेके पहले संन्यास और त्यागके विषयमें दो श्लोकोंद्वारा अन्य विद्वानोंके भिन्न-भिन्न मत बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार संन्यास और त्यागके विषयोंमें विद्वानोंके भिन्न-भिन्न मत बतलाकर अब भगवान् त्यागके विषयमें अपना निश्चय बतलाना आरम्भ करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार त्यागका तत्त्व सुननेके लिये अर्जुनको सावधान करके अब भगवान् उस त्यागका स्वरूप बतलानेके लिये पहले दो श्लोकोंमें शास्त्रविहित शुभ कर्मोंको करनेके विषयमें अपना निश्चय बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार अपना सुनिश्चित मत बतलाकर अब भगवान् शास्त्रोंमें कहे हुए तामस, राजस और सात्त्विक इन तीन प्रकारके त्यागोंमें सात्त्विक त्याग ही वास्तविक त्याग है और वही कर्तव्य है; दूसरे दोनों त्याग वास्तविक त्याग नहीं हैं, अतः वे करनेयोग्य नहीं हैं—यह बात समझानेके लिये तथा अपने मतकी शास्त्रोंके साथ एकवाक्यता दिखलानेके लिये तीन श्लोकोंमें क्रमसे तीन प्रकारके त्यागोंके लक्षण बतलाते हुए पहले निकृष्ट कोटिके तामस त्यागके लक्षण बतलाते हैं—
सम्बन्ध—तामस त्यागका निरूपण करके अब राजस त्यागके लक्षण बतलाते हैं—
सम्बन्ध—अब उत्तम श्रेणीके सात्त्विक त्यागके लक्षण बतलाये जाते हैं—
सम्बन्ध—उपर्युक्त प्रकारसे सात्त्विक त्याग करनेवाले पुरुषका निषिद्ध और काम्य कर्मोंको स्वरूपसे छोड़नेमें और कर्तव्यकर्मोंके करनेमें कैसा भाव रहता है, इस जिज्ञासापर सात्त्विक त्यागी पुरुषकी अन्तिम स्थितिके लक्षण बतलाते हैं—
सम्बन्ध—उपर्युक्त श्लोकमें सात्त्विक त्यागीको यानी निष्कामभावसे कर्तव्यकर्मका अनुष्ठान करनेवाले कर्मयोगीको सच्चा त्यागी बतलाया। इसपर यह शंका होती है कि निषिद्ध और काम्य कर्मोंकी भाँति अन्य समस्त कर्मोंका स्वरूपसे त्याग कर देनेवाला मनुष्य भी तो सच्चा त्यागी हो सकता है, फिर केवल निष्कामभावसे कर्म करनेवालेको ही सच्चा त्यागी क्यों कहा गया। इसलिये कहते हैं—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें यह बात कही गयी कि “जो कर्मफलका त्यागी है, वही त्यागी है।” इसपर यह शंका हो सकती है कि कर्मोंका फल न चाहनेपर भी किये हुए कर्म अपना फल दिये बिना नष्ट नहीं हो सकते—जैसे बोया हुआ बीज समयपर अपने-आप वृक्षको उत्पन्न कर देता है, वैसे ही किये हुए कर्मोंका फल भी किसी-न-किसी जन्ममें सबको अवश्य भोगना पड़ता है; इसलिये केवल कर्मफलके त्यागसे मनुष्य त्यागी यानी “कर्मबन्धनसे रहित” कैसे हो सकता है? इस शंकाकी निवृत्तिके लिये कहते हैं—
सम्बन्ध—पहले श्लोकमें अर्जुनने संन्यास और त्यागका तत्त्व अलग-अलग जाननेकी इच्छा प्रकट की थी। उसका उत्तर देते हुए भगवान्ने दूसरे और तीसरे श्लोकोंमें इस विषयपर विद्वानोंके भिन्न-भिन्न मत बतलाकर अपने मतके अनुसार चौथे श्लोकसे बारहवें श्लोकतक त्यागका यानी कर्मयोगका तत्त्व भलीभाँति समझाया; अब संन्यासका यानी सांख्ययोगका तत्त्व समझानेके लिये पहले सांख्य-सिद्धान्तके अनुसार कर्मोंकी सिद्धिमें पाँच हेतु बतलाते हैं—
सम्बन्ध—अब उन पाँच हेतुओंके नाम बतलाये जाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार सांख्ययोगके सिद्धान्तसे समस्त कर्मोंकी सिद्धिके अधिष्ठानादि पाँच कारणोंका निरूपण करके अब, वास्तवमें आत्माका कर्मोंसे कोई सम्बन्ध नहीं है, आत्मा सर्वथा शुद्ध, निर्विकार और अकर्ता है—यह बात समझानेके लिये पहले आत्माको कर्ता माननेवालेकी निन्दा करते हैं—
सम्बन्ध—आत्मा सर्वथा शुद्ध, निर्विकार और अकर्ता है—यह बात समझानेके लिये आत्माको “कर्ता” माननेवालेकी निन्दा करके अब आत्माके यथार्थ स्वरूपको समझकर उसे अकर्ता समझनेवालेकी स्तुति करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार संन्यास (ज्ञानयोग) का तत्त्व समझानेके लिये आत्माके अकर्तापनका प्रतिपादन करके अब उसके अनुसार कर्मके अंग-प्रत्यंगोंको भलीभाँति समझानेके लिये कर्म-प्रेरणा और कर्मसंग्रहका प्रतिपादन करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार सांख्ययोगके सिद्धान्तसे कर्म-चोदना (कर्म-प्रेरणा) और कर्म-संग्रहका निरूपण करके अब तत्त्वज्ञानमें सहायक सात्त्विक भावको ग्रहण करानेके लिये और उसके विरोधी राजस, तामस भावोंका त्याग करानेके लिये उपर्युक्त कर्म-प्रेरणा और कर्म-संग्रहके नामसे बतलाये हुए ज्ञान आदिमेंसे ज्ञान, कर्म और कर्ताके सात्त्विक, राजस और तामस—इस प्रकार त्रिविध भेद क्रमसे बतलानेकी प्रस्तावना करते हैं—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें जो ज्ञान, कर्म और कर्ताके सात्त्विक, राजस और तामस भेद क्रमशः बतलानेकी प्रस्तावना की थी—उसके अनुसार पहले सात्त्विक ज्ञानके लक्षण बतलाते हैं—
सम्बन्ध—अब राजस ज्ञानके लक्षण बतलाते हैं—
सम्बन्ध—अब तामस ज्ञानका लक्षण बतलाते हैं—
सम्बन्ध—अब सात्त्विक कर्मके लक्षण बतलाते हैं—
सम्बन्ध—अब राजस कर्मके लक्षण बतलाते हैं—
सम्बन्ध—अब तामस कर्मके लक्षण बतलाते हैं—
सम्बन्ध—अब सात्त्विक कर्ताके लक्षण बतलाते हैं—
सम्बन्ध—अब राजस कर्ताके लक्षण बतलाते हैं—
सम्बन्ध—अब तामस कर्ताके लक्षण बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार तत्त्वज्ञानमें सहायक सात्त्विक भावको ग्रहण करानेके लिये और उसके विरोधी राजस-तामस भावोंका त्याग करानेके लिये कर्म-प्रेरणा और कर्मसंग्रहमेंसे ज्ञान, कर्म और कर्ताके सात्त्विक आदि तीन-तीन भेद क्रमसे बतलाकर अब बुद्धि और धृतिके सात्त्विक, राजस और तामस—इस प्रकार त्रिविध भेद क्रमशः बतलानेकी प्रस्तावना करते हैं—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें जो बुद्धि और धृतिके सात्त्विक, राजस और तामस तीन-तीन भेद क्रमशः बतलानेकी प्रस्तावना की है, उसके अनुसार पहले सात्त्विक बुद्धिके लक्षण बतलाते हैं—
सम्बन्ध—अब राजसी बुद्धिके लक्षण बतलाते हैं—
सम्बन्ध—अब तामसी बुद्धिके लक्षण बतलाते हैं—
सम्बन्ध—अब सात्त्विकी धृतिके लक्षण बतलाते हैं—
सम्बन्ध—अब राजसी धृतिके लक्षण बतलाते हैं—
सम्बन्ध—अब तामसी धृतिका लक्षण बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार सात्त्विकी बुद्धि और धृतिका ग्रहण तथा राजसी-तामसीका त्याग करानेके लिये बुद्धि और धृतिके सात्त्विक आदि तीन-तीन भेद क्रमसे बतलाकर अब, जिसके लिये मनुष्य समस्त कर्म करता है उस सुखके भी सात्त्विक, राजस और तामस—इस प्रकार तीन भेद क्रमसे बतलाना आरम्भ करते हुए पहले सात्त्विक सुखके लक्षणोंका निरूपण करते हैं—
सम्बन्ध—अब राजस सुखके लक्षण बतलाते हैं—
सम्बन्ध—अब तामस सुखका लक्षण बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार अठारहवें श्लोकसे वर्णित मुख्य-मुख्य पदार्थोंके सात्त्विक, राजस और तामस— ऐसे तीन-तीन भेद बतलाकर अब इस प्रकरणका उपसंहार करते हुए भगवान् सृष्टिके समस्त पदार्थोंको तीनों गुणोंसे युक्त बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस अध्यायके पहले श्लोकमें अर्जुनने संन्यास और त्यागका तत्त्व अलग-अलग जाननेकी इच्छा प्रकट की थी, अतः दोनोंका तत्त्व समझानेके लिये पहले इस विषयपर विद्वानोंकी सम्मति बतलाकर चौथेसे बारहवें श्लोकतक भगवान्ने अपने मतके अनुसार त्याग और त्यागीके लक्षण बतलाये। तदनन्तर तेरहवेंसे सत्रहवें श्लोकतक संन्यास (सांख्य)-के स्वरूपका निरूपण करके संन्यासमें सहायक सत्त्वगुणका ग्रहण और उसके विरोधी रज एवं तमका त्याग करानेके उद्देश्यसे अठारहवेंसे चालीसवें श्लोकतक गुणोंके अनुसार ज्ञान, कर्म और कर्ता आदि मुख्य-मुख्य पदार्थोंके भेद समझाये और अन्तमें समस्त सृष्टिको गुणोंसे युक्त बतलाकर उस विषयका उपसंहार किया।
वहाँ त्यागका स्वरूप बतलाते समय भगवान्ने यह बात कही थी कि नियत कर्मका स्वरूपसे त्याग उचित नहीं है (18। 7) अपितु नियत कर्मोंको आसक्ति और फलके त्यागपूर्वक करते रहना ही वास्तविक त्याग है (18। 9), किंतु वहाँ यह बात नहीं बतलायी कि किसके लिये कौन-सा कर्म नियत है। अतएव अब संक्षेपमें नियत कर्मोंका स्वरूप, त्यागके नामसे वर्णित कर्मयोगमें भक्तिका सहयोग और उसका फल परम सिद्धिकी प्राप्ति बतलानेके लिये पुनः उसी त्यागरूप कर्मयोगका प्रकरण आरम्भ करते हुए ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंके स्वाभाविक नियत कर्म बतलानेकी प्रस्तावना करते हैं—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें की हुई प्रस्तावनाके अनुसार पहले ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार ब्राह्मणोंके स्वाभाविक कर्म बतलाकर अब क्षत्रियोंके स्वाभाविक कर्म बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार क्षत्रियोंके स्वाभाविक कर्मोंका वर्णन करके अब वैश्य और शूद्रोंके स्वाभाविक कर्म बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार चारों वर्णोंके स्वाभाविक कर्मोंका वर्णन करके अब भक्तियुक्त कर्मयोगका स्वरूप और फल बतलानेके लिये, उन कर्मोंका किस प्रकार आचरण करनेसे मनुष्य अनायास परम सिद्धिको प्राप्त कर लेता है—यह बात दो श्लोकोंमें बतलाते हैं—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें यह बात कही गयी कि मनुष्य अपने स्वाभाविक कर्मोंद्वारा परमेश्वरकी पूजा करके परमसिद्धिको पा लेता है; इसपर यह शंका होती है कि यदि कोई क्षत्रिय अपने युद्धादि क्रूर कर्मोंको न करके ब्राह्मणोंकी भाँति अध्यापनादि शान्तिमय कर्मोंसे अपना निर्वाह करके परमात्माको प्राप्त करनेकी चेष्टा करे या इसी तरह कोई वैश्य या शूद्र अपने कर्मोंको उच्च वर्णोंके कर्मोंसे हीन समझकर उनका त्याग कर दे और अपनेसे ऊँचे वर्णकी वृत्तिसे अपना निर्वाह करके परमात्माको प्राप्त करनेका प्रयत्न करे तो उचित है या नहीं? इसपर दूसरेके धर्मकी अपेक्षा स्वधर्मको श्रेष्ठ बतलाकर उसके त्यागका निषेध करते हैं—
सम्बन्ध—अर्जुनकी जिज्ञासाके अनुसार त्याग और संन्यासके तत्त्वको समझानेके लिये भगवान्ने चौथेसे बारहवें श्लोकतक त्यागका विषय कहा और तेरहवेंसे चालीसवें श्लोकतक संन्यास यानी सांख्यका निरूपण किया। फिर इकतालीसवें श्लोकसे यहाँतक कर्मयोगरूप त्यागका तत्त्व समझानेके लिये स्वाभाविक कर्मोंका स्वरूप और उनकी अवश्यकर्तव्यताका निर्देश करके तथा कर्मयोगमें भक्तिका सहयोग दिखलाकर उसका फल भगवत्प्राप्ति बतलाया। किन्तु वहाँ संन्यासके प्रकरणमें यह बात नहीं कही गयी कि संन्यासका क्या फल होता है और कर्मोंमें कर्तापनका अभिमान त्यागकर उपासनाके सहित सांख्ययोगका किस प्रकार साधन करना चाहिये? अतः यहाँ उपासनाके सहित विवेक और वैराग्यपूर्वक एकान्तमें रहकर साधन करनेकी विधि और उसका फल बतलानेके लिये पुनः सांख्ययोगका प्रकरण आरम्भ करते हैं—
सम्बन्ध—उपर्युक्त श्लोकमें यह बात कही गयी कि संन्यासके द्वारा मनुष्य परम नैष्कर्म्यसिद्धिको प्राप्त होता है; इसपर यह जिज्ञासा होती है कि उस संन्यास (सांख्ययोग)-का क्या स्वरूप है और उसके द्वारा मनुष्य किस क्रमसे सिद्धिको प्राप्त होकर ब्रह्मको प्राप्त होता है? अतः इन सब बातोंको बतलानेकी प्रस्तावना करते हुए भगवान् अर्जुनको सुननेके लिये सावधान करते हैं—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें की हुई प्रस्तावनाके अनुसार अब तीन श्लोकोंमें अंग-प्रत्यंगोंके सहित ज्ञानयोगका वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार अंग-प्रत्यंगोंसहित संन्यासका यानी सांख्ययोगका स्वरूप बतलाकर अब उस साधनद्वारा ब्रह्मभावको प्राप्त हुए योगीके लक्षण और उसे ज्ञानयोगकी परानिष्ठारूप परा भक्तिका प्राप्त होना बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार ब्रह्मभूत योगीको परा भक्तिकी प्राप्ति बतलाकर अब उसका फल बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार अर्जुनकी जिज्ञासाके अनुसार त्यागका यानी कर्मयोगका और संन्यासका यानी सांख्ययोगका तत्त्व अलग-अलग समझाकर यहाँतक उस प्रकरणको समाप्त कर दिया; किन्तु इस वर्णनमें भगवान्ने यह बात नहीं कही कि दोनोंमेंसे तुम्हारे लिये अमुक साधन कर्तव्य है, अतएव अर्जुनको भक्तिप्रधान कर्मयोग ग्रहण करानेके उद्देश्यसे अब भक्तिप्रधान कर्मयोगकी महिमा कहते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार भक्तिप्रधान कर्मयोगीकी महिमाका वर्णन करके अब अर्जुनको वैसा बननेके लिये आज्ञा देते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार भगवान् अर्जुनको भक्तिप्रधान कर्मयोगी बननेकी आज्ञा देकर अब उस आज्ञाके पालन करनेका फल बतलाते हुए उसे न माननेमें बहुत बड़ी हानि दिखलाते हैं—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें जो अहंकारवश भगवान्की आज्ञाको न माननेसे नष्ट हो जानेकी बात कही है, उसीकी पुष्टि करनेके लिये अब भगवान् दो श्लोकोंद्वारा अर्जुनकी मान्यतामें दोष दिखलाते हैं—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकोंमें कर्म करनेमें मनुष्यको स्वभावके अधीन बतलाया गया; इसपर यह शंका हो सकती है कि प्रकृति या स्वभाव जड है, वह किसीको अपने वशमें कैसे कर सकता है? इसलिये भगवान् कहते हैं—
सम्बन्ध—उपर्युक्त श्लोकमें यह बात सिद्ध की गयी कि मनुष्य कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेमें स्वतन्त्र नहीं है, उसे अपने स्वभावके वश होकर स्वाभाविक कर्मोंमें प्रवृत्त होना ही पड़ता है, क्योंकि सर्वशक्तिमान् सर्वान्तर्यामी परमेश्वर स्वयं सब प्राणियोंके हृदयमें स्थित होकर उनकी प्रकृतिके अनुसार उनको भ्रमण कराते हैं और उनकी प्रेरणाका प्रतिवाद करना मनुष्यके लिये अशक्य है। इसपर यह प्रश्न उठता है कि यदि ऐसी ही बात है तो फिर कर्मबन्धनसे छूटकर परम शान्तिलाभ करनेके लिये मनुष्यको क्या करना चाहिये? इसपर भगवान् अर्जुनको उसका कर्तव्य बतलाते हुए कहते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार अर्जुनको अन्तर्यामी परमेश्वरकी शरण ग्रहण करनेके लिये आज्ञा देकर अब भगवान् उक्त उपदेशका उपसंहार करते हुए कहते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार अर्जुनको सारे उपदेशपर विचार करके अपना कर्तव्य निर्धारित करनेके लिये कहे जानेपर भी जब अर्जुनने कुछ भी उत्तर नहीं दिया और वे अपनेको अनधिकारी तथा कर्तव्य निश्चय करनेमें असमर्थ समझकर खिन्नचित्त और चकित-से हो गये, तब सबके हृदयकी बात जाननेवाले अन्तर्यामी भगवान् स्वयं ही अर्जुनपर दया करके उसे समस्त गीताके उपदेशका सार बतलानेका विचार करके कहने लगे—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें जिस सर्वगुह्यतम बातको कहनेकी भगवान्ने प्रतिज्ञा की, उसे अब कहते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार भगवान् गीताके उपदेशका उपसंहार करके अब उस उपदेशके अध्यापन और अध्ययन आदिका माहात्म्य बतलानेके लिये पहले अनधिकारीके लक्षण बतलाकर उसे गीताका उपदेश सुनानेका निषेध करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार गीतोक्त उपदेशके अनधिकारीके लक्षण बतलाकर अब भगवान् दो श्लोकोंद्वारा अपने भक्तोंमें इस उपदेशके वर्णनका फल और माहात्म्य बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार उपर्युक्त दो श्लोकोंमें गीताशास्त्रका श्रद्धा-भक्तिपूर्वक भगवद्भक्तोंमें विस्तार करनेका फल और माहात्म्य बतलाया; किन्तु सभी मनुष्य इस कार्यको नहीं कर सकते, इसका अधिकारी तो कोई विरला ही होता है। इसलिये अब गीताशास्त्रके अध्ययनका माहात्म्य बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार गीताशास्त्रके अध्ययनका माहात्म्य बतलाकर, अब जो उपर्युक्त प्रकारसे अध्ययन करनेमें असमर्थ हैं—ऐसे मनुष्योंके लिये उसके श्रवणका फल बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार गीताशास्त्रके कथन, पठन और श्रवणका माहात्म्य बतलाकर अब भगवान् स्वयं सब कुछ जानते हुए भी अर्जुनको सचेत करनेके लिये उससे उसकी स्थिति पूछते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार भगवान्के पूछनेपर अब अर्जुन भगवान्से कृतज्ञता प्रकट करते हुए अपनी स्थितिका वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार धृतराष्ट्रके प्रश्नानुसार भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादरूप गीताशास्त्रका वर्णन करके अब उसका उपसंहार करते हुए संजय दो श्लोकोंमें धृतराष्ट्रके सामने गीताका महत्त्व प्रकट करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार अतिदुर्लभ गीताशास्त्रके सुननेका महत्त्व प्रकट करके अब संजय अपनी स्थितिका वर्णन करते हुए उस उपदेशकी स्मृतिका महत्त्व प्रकट करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार गीताशास्त्रकी स्मृतिका महत्त्व बतलाकर अब संजय अपनी स्थितिका वर्णन करते हुए भगवान्के विराट्स्वरूपकी स्मृतिका महत्त्व दिखलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार अपनी स्थितिका वर्णन करते हुए गीताके उपदेशकी और भगवान्के अद्भुत रूपकी स्मृतिका महत्त्व प्रकट करके, अब संजय धृतराष्ट्रसे पाण्डवोंकी विजयकी निश्चित सम्भावना प्रकट करते हुए इस अध्यायका उपसंहार करते हैं—