ग्रन्थ
18मोक्षसंन्यासयोग

मोक्षसंन्यासयोग

Moksha-Sannyasa-Yoga
Liberation through Renunciation
78 verses · 74 printed blockspp. 11031264 · Sadhak Sanjivaniसाधारण भाषाटीका 75 · साधक-संजीवनी 74 · श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्य 78 · श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीका 75
1अर्जुन
अर्जुन उवाच
सन्न्यासस्य महाबाहो तत्त्वमि्छामि वेदितुम्।* त्यागस्यहृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन॥ 1॥*
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

अर्जुन उवाच

पदच्छेद
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व्याख्या
2 sections
श्रीभगवान्ने दूसरे अध्यायके उनतालीसवें श्लोकमें “एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु” पदोंसे जिस सांख्ययोग और कर्मयोगकी बात कही है, उसीको तीसरे अध्यायके तीसरे श्लोकमें सांख्यनिष्ठा और योगनिष्ठाके नामसे कहा है। उन दोनों निष्ठाओंके तत्त्वको अलग-अलग रूपसे ठीक जाननेकी इच्छा अर्जुनके मनमें थी। परन्तु जिस प्रकार भगवान्को सातवेंसे पंद्रहवें अध्यायतक दैवी-सम्पत्ति और आसुरी-सम्पत्तिको कहनेका अवसर प्राप्त नहीं हुआ, उसी प्रकार अर्जुनको भी तीसरेसे सत्रहवें अध्यायतक उन दोनों निष्ठाओंके विषयमें अपनी जिज्ञासा प्रकट करनेका अवसर प्राप्त नहीं हुआ। तीसरे अध्यायके तीसरे श्लोकमें दो निष्ठाओंको कहकर भगवान्ने चौथे अध्यायके पहले श्लोकमें बताया कि मैंने इस अविनाशी योगको सूर्यसे कहा था। इसपर अर्जुनने प्रश्न किया कि आपका जन्म तो अभीका है, फिर आपने सृष्टिके आदिमें सूर्यको कैसे उपदेश दिया? उत्तरमें भगवान्ने अपने अवतार और कर्मयोगके तत्त्वका वर्णन किया। चौथे अध्यायके ही चौंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनको ज्ञान प्राप्त करनेकी आज्ञा दी—“तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया” और बयालीसवें श्लोकमें योगमें स्थित होनेकी आज्ञा दी—“छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत” इन दो अलग-अलग आज्ञाओंके कारण अर्जुनने पाँचवें अध्यायके आरम्भमें दोनोंमें अपने लिये एक निश्चित कल्याणकारक साधन पूछा। उसके उत्तरमें भगवान्ने पाँचवें अध्यायका विषय पूरा कहकर अपनी ओरसे ही छठे अध्यायका विषय आरम्भ किया। छठे अध्यायके तैंतीसवें-चौंतीसवें श्लोकोंमें अर्जुनने मनकी चंचलताके विषयमें प्रश्न किया। उसका भगवान्ने बहुत संक्षेपसे उत्तर दिया। फिर अर्जुनने सैंतीसवेंसे उनतालीसवें श्लोकतक योगभ्रष्ट पुरुषकी गतिके विषयमें प्रश्न किया। उसका उत्तर देते हुए भगवान्ने छठे अध्यायका विषय समाप्त किया। छठे अध्यायके अन्तिम श्लोकमें भगवान्ने अपने भक्तको सम्पूर्ण योगियोंमें परम श्रेष्ठ बताया। उसीको लेकर भगवान्ने सातवें अध्यायका विषय आरम्भ किया और उसमें भक्तिका विशेष वर्णन किया। सातवें अध्यायके अन्तमें आये हुए ब्रह्म, अध्यात्म आदिको लेकर अर्जुनने आठवें अध्यायके आरम्भमें सात प्रश्न किये। उनमेंसे छः प्रश्नोंका उत्तर संक्षेपसे देकर अन्तकालीन गति-विषयक सातवें प्रश्नके उत्तरमें भगवान्ने विस्तारपूर्वक आठवें अध्यायका विषय कहा। फिर सातवें अध्यायमें जो विषय छूट गया था, उसी विषयका वर्णन नवें अध्यायमें तथा दसवें अध्यायमें ग्यारहवें श्लोकतक किया। दसवें अध्यायके नवें, दसवें और ग्यारहवें श्लोकमें भक्त और उनपर कृपाकी बात सुनकर अर्जुन बहुत प्रसन्न हुए और प्रभावित भी हुए। अतः अर्जुनने बारहवेंसे अठारहवें श्लोकतक भगवान्की स्तुति की और अपनी विभूतियोंको विस्तारसे कहनेके लिये प्रार्थना की। अपनी मुख्य-मुख्य विभूतियोंको कहते हुए भगवान्ने दसवें अध्यायके अन्तमें कहा कि “हे अर्जुन! तेरेको बहुत जाननेकी क्या जरूरत है? मैं सम्पूर्ण संसारको अपने एक अंशमें व्याप्त करके स्थित हूँ। इसी बातको लेकर ग्यारहवें अध्यायके आरम्भमें अर्जुनने भगवान्से अपना विश्वरूप दिखानेके लिये प्रार्थना की। अपना विश्वरूप दिखाकर भगवान्ने ग्यारहवें अध्यायके अन्तमें कहा कि अनन्य भक्तिसे मेरा दर्शन, ज्ञान और मेरेमें प्रवेश—ये तीनों हो जाते हैं। ग्यारहवें अध्यायके अन्तमें भगवान्ने भक्तिकी महिमा कही और उससे पहले (चौथे अध्यायके चौंतीसवेंसे सैंतीसवें श्लोकतक, पाँचवें अध्यायके तेरहवेंसे छब्बीसवें श्लोकतक, छठे अध्यायके चौबीसवेंसे अट्ठाईसवें श्लोकतक और आठवें अध्यायके ग्यारहवेंसे तेरहवें श्लोकतक) निर्गुण-तत्त्वकी उपासनाकी महिमा कही। उन दोनोंमें कौन श्रेष्ठ है—इस बातको अर्जुनने बारहवें अध्यायके आरम्भमें पूछा। उत्तरमें भगवान्ने बारहवें अध्यायमें भक्तिकी और तेरहवें-चौदहवें अध्यायोंमें निर्गुण-साधनाकी बात कही। चौदहवें अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें अर्जुनने गुणातीतके लक्षण, आचरण और गुणातीत होनेका उपाय पूछा तो भगवान्ने गुणातीतके लक्षण और आचरण बताकर अपनी अव्यभिचारिणी भक्तिको गुणातीत होनेका उपाय बताया। उसी-(अव्यभिचारिणी भक्ति-) के वर्णनमें भगवान्ने पंद्रहवें अध्यायका विषय कहा। पंद्रहवें अध्यायके अन्तमें “स सर्वविद् भजति मां सर्वभावेन भारत” पदोंसे यह बात कही कि दैवी-सम्पत्तिवाले पुरुष मेरा भजन करते हैं और अर्थान्तरमें आसुरी-सम्पत्तिवाले पुरुष मेरा भजन नहीं करते। इससे पहले भी सातवें अध्यायके पंद्रहवें श्लोकमें और नवें अध्यायके बारहवें- तेरहवें श्लोकोंमें संकेतरूपसे दैवी और आसुरी-सम्पत्तिका वर्णन हुआ था। अतः दैवी और आसुरी-सम्पत्तिका विस्तारसे वर्णन करनेके लिये सोलहवें अध्यायका आरम्भ हुआ। सोलहवें अध्यायके उपान्त्य श्लोकको लेकर अर्जुनने सत्रहवें अध्यायके आरम्भमें निष्ठाके विषयमें प्रश्न किया। उत्तरमें भगवान्ने तीन प्रकारकी श्रद्धाका वर्णन करते हुए अध्यायका विषय पूरा कर दिया। सत्रहवें अध्यायके बाद अब अर्जुन तीसरे अध्यायके तीसरे श्लोकमें कही दो निष्ठाओंके तत्त्वको अलग-अलग स्पष्ट जाननेके लिये भगवान्के सामने अपनी जिज्ञासा प्रकट करते हैं। व्याख्या—
सन्न्यासस्य महाबाहो ....... पृथक्केशि- निषूदन
यहाँ “महाबाहो” सम्बोधन सामर्थ्यका सूचक है। अर्जुनद्वारा इस सम्बोधनका प्रयोग करनेका भाव यह है कि आप सम्पूर्ण विषयोंको कहनेमें समर्थ हैं; अतः मेरी जिज्ञासाका समाधान आप इस प्रकार करें, जिससे मैं विषयको सरलतासे समझ सकूँ। “हृषीकेश” सम्बोधन अन्तर्यामीका वाचक है। इसके प्रयोगमें अर्जुनका भाव यह है कि मैं संन्यास और त्यागका तत्त्व जानना चाहता हूँ; अतः इस विषयमें जो-जो आवश्यक बातें हों, उनको आप (मेरे पूछे बिना भी) कह दें। “केशिनिषूदन” सम्बोधन विघ्नोंको दूर करनेवालेका सूचक है। इसके प्रयोगमें अर्जुनका भाव यह है कि जिस प्रकार आप अपने भक्तोंके सम्पूर्ण विघ्नोंको दूर कर देते हैं, उसी प्रकार मेरे भी सम्पूर्ण विघ्नोंको अर्थात् शंकाओं और संशयोंको दूर कर दें। जिज्ञासा प्रायः दो प्रकारसे प्रकट की जाती है— (1) अपने आचरणमें लानेके लिये और (2) सिद्धान्तको समझनेके लिये। जो केवल पढ़ाई करनेके लिये (सीखनेके लिये) सिद्धान्तको समझते हैं, वे केवल पुस्तकोंके विद्वान् बन सकते हैं और नयी पुस्तक भी बना सकते हैं, पर अपना कल्याण नहीं कर सकते*। अपना कल्याण तो वे ही कर सकते हैं, जो सिद्धान्तको समझकर उसके अनुसार अपना जीवन बनानेके लिये तत्पर हो जाते हैं। यहाँ अर्जुनकी जिज्ञासा भी केवल सिद्धान्तको जाननेके लिये ही नहीं है, प्रत्युत सिद्धान्तको जानकर उसके अनुसार अपना जीवन बनानेके लिये है। “एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये” (गीता 2। 39) में आये “सांख्य” पदको ही यहाँ “संन्यास” पदसे कहा गया है। भगवान्ने भी सांख्य और संन्यासको पर्यायवाची माना है; जैसे—पाँचवें अध्यायके दूसरे श्लोकमें “सन्न्यासः”, चौथे श्लोकमें “साङ्ख्ययोगौ”, पाँचवें श्लोकमें “यत्साङ्ख्यैः” और छठे श्लोकमें “सन्न्यासस्तु” पदोंका एक ही अर्थमें प्रयोग हुआ है। इसलिये यहाँ अर्जुनने सांख्यको ही संन्यास कहा है। इसी प्रकार “बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु” (गीता 2। 39) में आये “योग” पदको ही यहाँ “त्याग” पदसे कहा गया है। भगवान्ने भी योग (कर्मयोग) और त्यागको पर्यायवाची माना है; जैसे—दूसरे अध्यायके अड़तालीसवें श्लोकमें “संगं त्यक्त्वा” तथा इक्यावनवें श्लोकमें “फलं त्यक्त्वा”, तीसरे अध्यायके तीसरे श्लोकमें “कर्मयोगेन योगिनाम्”, चौथे अध्यायके बीसवें श्लोकमें “त्यक्त्वा कर्मफलासंगम्”, पाँचवें अध्यायके चौथे श्लोकमें “योगौ”, पाँचवें श्लोकमें “तद्योगैरपि गम्यते”, ग्यारहवें श्लोकमें “संगं त्यक्त्वा” तथा बारहवें श्लोकमें “कर्मफलं त्यक्त्वा”, बारहवें अध्यायके बारहवें श्लोकमें “त्यागात्” पदोंका एक ही अर्थमें प्रयोग हुआ है। इसलिये यहाँ अर्जुनने कर्मयोगको ही त्याग कहा है। अच्छी तरहसे रखनेका नाम “संन्यास” है—“सम्यक् न्यासः सन्न्यासः।” तात्पर्य है कि प्रकृतिकी चीज सर्वथा प्रकृतिमें देने (छोड़ देने) और विवेकद्वारा प्रकृतिसे अपना सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद कर लेनेका नाम “संन्यास” है। कर्म और फलकी आसक्तिको छोड़नेका नाम “त्याग” है। छठे अध्यायके चौथे श्लोकमें आया है कि जो कर्म और फलमें आसक्त नहीं होता, वह योगारूढ़ हो जाता है।
परिशिष्ट भाव
कर्मयोग और ज्ञानयोगके विषयमें अर्जुनने तीसरे अध्यायके आरम्भमें भगवान्को उलाहना दिया है, पाँचवें अध्यायके आरम्भमें यह जानना चाहा है कि दोनोंमें श्रेष्ठ कौन है, और यहाँ वे दोनोंका तत्त्व जानना चाहते हैं।
* अर्जुनकी इस जिज्ञासाके समाधानमें भगवान्ने जो-जो बातें कही हैं, उनके आधारपर अर्जुनके मनमें आयी अन्य
जिज्ञासाओंका भी अनुमान लगाया जा सकता है, जो इस प्रकार हैं—
(क) सन्न्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्—
(1) संन्यास किसे कहते हैं?—
किसी भी कर्मके साथ कर्तापनका भाव न रहना और बुद्धिका कहीं भी लिप्त न होना (18। 17)।
(2) संन्यासी कैसा होना चाहिये?—
रागरहित, अनहंवादी, धैर्य और उत्साहसे युक्त तथा सिद्धि-असिद्धिमें निर्विकार होना चाहिये (18। 26)।
(3) संन्यासका साधन कैसा होना चाहिये?—
सात्त्विकी बुद्धिवाला, वैराग्यवान्, एकान्तका सेवन करनेवाला, इन्द्रियोंका नियमन करनेवाला, शरीर-वाणी-मनको
संयत करनेवाला आदि होना चाहिये (18। 51—53)।
(4) संन्यासीके आचरण कैसे होने चाहिये?—
कर्तृत्वाभिमान और राग-द्वेषसे रहित होकर कर्म करना (18। 23)।
(5) संन्यासीका भाव कैसा होना चाहिये?—
सम्पूर्ण विभक्त प्राणियोंमें विभागरहित एक परमात्मतत्त्वको देखना (18। 20)।
(6) संन्यासका फल क्या होता है?—
परमात्मतत्त्वमें प्रविष्ट होना (18। 55)।
(ख) त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन—
(1) त्याग किसे कहते हैं?—
कर्म और कर्मफलकी आसक्तिका त्याग करके कर्तव्य-कर्म करना (18। 6)।
(2) त्यागी कैसा होना चाहिये?—
कर्मफलका त्यागी होना चाहिये (18। 11)।
(3) त्यागका साधन कैसा होना चाहिये?—
कर्म और फलकी आसक्तिका त्याग (18। 9)।
(4) त्यागीके आचरण कैसे होने चाहिये?—
अकुशल कर्मसे द्वेष न करना और कुशल कर्ममें आसक्त न होना (18। 10 पूर्वार्ध)।
(5) त्यागीका भाव कैसा होना चाहिये?—
कर्तव्यमात्र करना (18। 9)।
(6) त्यागका फल क्या होता है?—
परमात्मतत्त्वमें स्थित होना (18। 10 उत्तरार्ध) ।
* असत्को असत् जाननेपर भी तबतक सत्की प्राप्ति नहीं होती, जबतक मनुष्य सत्की प्राप्तिको ही अपने जीवनका
सर्वोपरि लक्ष्य नहीं बना लेता।
2–3श्रीभगवान्Merged
श्रीभगवान् उवाच
काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्न्यासं कवयो विदुःसर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः॥ 2॥ त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणःयज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति ापरे॥ 3॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

अर्जुनकी जिज्ञासाके उत्तरमें पहले भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें अन्य दार्शनिक विद्वानोंके चार मत बताते हैं। श्रीभगवानुवाच

पदच्छेद
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व्याख्या
13 sections
दार्शनिक विद्वानोंके चार मत हैं— 1-
काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्न्यासं कवयो विदुः
कई विद्वान् कहते हैं कि काम्य-कर्मोंके त्यागका नाम “संन्यास” है अर्थात् इष्टकी प्राप्ति और अनिष्टकी निवृत्तिके लिये जो कर्म किये जाते हैं, उनका त्याग करनेका नाम “संन्यास” है। 2-
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः
कई विद्वान् कहते हैं कि सम्पूर्ण कर्मोंके फलकी इच्छाका त्याग करनेका नाम “त्याग” है अर्थात् फल न चाहकर कर्तव्य-कर्मोंको करते रहनेका नाम “त्याग” है। 3-
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः
कई विद्वान् कहते हैं कि सम्पूर्ण कर्मोंको दोषकी तरह छोड़ देना चाहिये। 4-
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे
अन्य विद्वान् कहते हैं कि दूसरे सब कर्मोंका भले ही त्याग कर दें, पर यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये। उपर्युक्त चारों मतोंमें दो विभाग दिखायी देते हैं— पहला और तीसरा मत
संन्यास
(सांख्ययोग-)का है तथा दूसरा और चौथा मत
त्याग
(कर्मयोग-) का है। इन दो विभागोंमें भी थोड़ा-थोड़ा अन्तर है। पहले मतमें केवल काम्य-कर्मोंका त्याग है और तीसरे मतमें कर्ममात्रका त्याग है। ऐसे ही दूसरे मतमें कर्मोंके फलका त्याग है और चौथे मतमें यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंके त्यागका निषेध है। दार्शनिकोंके उपर्युक्त चार मतोंमें क्या-क्या कमियाँ हैं और उनकी अपेक्षा भगवान्के मतमें क्या-क्या विलक्षणताएँ हैं, इसका विवेचन इस प्रकार है— 1-
काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्न्यासम्
संन्यासके इस पहले मतमें केवल काम्य-कर्मोंका त्याग बताया गया है; परन्तु इसके अलावा भी नित्य, नैमित्तिक आदि आवश्यक कर्तव्य-कर्म बाकी रह जाते हैं1। अतः यह मत पूर्ण नहीं है; क्योंकि इसमें न तो कर्तृत्वका त्याग बताया है और न स्वरूपमें स्थिति ही बतायी है। परन्तु भगवान्के मतमें कर्मोंमें कर्तृत्वाभिमान नहीं रहता और स्वरूपमें स्थिति हो जाती है; जैसे—इसी अध्यायके सत्रहवें श्लोकमें
जिसमें अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धि कर्मफलमें लिप्त नहीं होती
ऐसा कहकर कर्तृत्वाभिमानका त्याग बताया है और
अगर वह सम्पूर्ण प्राणियोंको मार दे, तो भी न मारता है, न बँधता है
ऐसा कहकर स्वरूपमें स्थिति बतायी है। 2-
त्याज्यं दोषवदित्येके
संन्यासके इस दूसरे मतमें सब कर्मोंको दोषकी तरह छोड़नेकी बात है। परन्तु सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग कोई कर ही नहीं सकता (गीता—तीसरे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक) और कर्ममात्रका त्याग करनेसे जीवन-निर्वाह भी नहीं हो सकता (गीता—तीसरे अध्यायका आठवाँ श्लोक)। इसलिये भगवान्ने नियत कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेको राजस-तामस त्याग बताया है (अठारहवें अध्यायका सातवाँ-आठवाँ श्लोक)। 3-
सर्वकर्मफलत्यागम्
त्यागके इस पहले मतमें केवल फलका त्याग बताया है। यहाँ फलत्यागके अन्तर्गत केवल कामनाके त्यागकी ही बात आयी है2। ममता- आसक्तिके त्यागकी बात इसके अन्तर्गत नहीं ले सकते; क्योंकि ऐसा लेनेपर दार्शनिकों और भगवान्के मतोंमें कोई अन्तर नहीं रहेगा। भगवान्के मतमें कर्मकी आसक्ति और फलकी आसक्ति—दोनोंके ही त्यागकी बात आयी है— “संगं त्यक्त्वा फलानि च” (गीता 18। 6)। 4-
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यम्
त्याग अर्थात् कर्मयोगके इस दूसरे मतमें यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंका त्याग न करनेकी बात है। परन्तु इन तीनोंके अलावा वर्ण, आश्रम, परिस्थिति आदिको लेकर जितने कर्म आते हैं, उनको करने अथवा न करनेके विषयमें कुछ नहीं कहा गया है—यह इसमें अधूरापन है। भगवान्के मतमें इन कर्मोंका केवल त्याग ही नहीं करना चाहिये, प्रत्युत इनको न करते हों, तो जरूर करना चाहिये; और इनके अतिरिक्त तीर्थ, व्रत आदि कर्मोंको भी फल एवं आसक्तिका त्याग करके करना चाहिये (अठारहवें अध्यायका पाँचवाँ-छठा श्लोक)।
* “दोषवत्” पद व्याकरणके “वति” और “मतुप्” दोनों प्रत्ययोंसे बनता है; परन्तु दोनोंका अर्थ दो तरहका होता है। “वति”
प्रत्यय करनेसे “दोषवत्” पदका अर्थ होता है—कर्मोंको दोषकी तरह छोड़ देना चाहिये और “मतुप्” प्रत्यय करनेसे “दोषवत्”
पदका अर्थ होता है—दोषवाले कर्म छोड़ देने चाहिये। परन्तु यहाँ “वति” प्रत्ययका ही अर्थ लेना चाहिये, “मतुप्” प्रत्ययका
नहीं; क्योंकि “मतुप्” प्रत्ययका अर्थ भगवान्के मतके अनुसार है (गीता—अठारहवें अध्यायका अड़तालीसवाँ श्लोक),
दार्शनिकोंके मतके अनुसार नहीं।
दूसरा अन्तर यह है कि “वति” प्रत्यय अव्यय बनकर क्रियाका विशेषण होता है और “मतुप्” प्रत्यय कर्ता और कर्मका
विशेषण बनता है।
1-कर्म पाँच प्रकारके होते हैं—
(1) नित्यकर्म—शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार प्रतिदिन जो आवश्यक दैनिक कर्म किये जाते हैं, उनको “नित्यकर्म” कहते
हैं; जैसे—संध्या, गायत्री आदि।
(2) नैमित्तिक कर्म—देश, काल, परिस्थिति आदि किसी निमित्तको लेकर जो कर्म किये जाते हैं, उनको नैमित्तिक कर्म
कहते हैं, जैसे गंगा, प्रयाग, नैमिषारण्य, पुष्कर आदि तीर्थोंमें जाकर जो शास्त्रविहित कर्म किये जाते हैं, वे “देशकृत नैमित्तिक
कर्म” हैं; एकादशी, पूर्णिमा, अमावस्या, व्यतिपात, ग्रहण, होली, दीपावली, अक्षयतृतीया आदिके समय जो शास्त्रविहित कर्म
किये जाते हैं, वे “कालकृत नैमित्तिक कर्म” हैं; पुत्रके उत्पन्न होनेपर, पुत्र या पुत्रीका विवाह होनेपर, किसीकी मृत्यु होनेपर,
संत-महात्माओंका सत्संग मिलनेपर जो शास्त्रविहित कर्म किये जाते हैं, वे “परिस्थितिकृत नैमित्तिक कर्म” हैं।
(3) काम्य कर्म—हमारा मान-सम्मान हो जाय, लोगोंमें हमारी प्रसिद्धि हो जाय, हमारा पुत्र हो जाय, हमें बहुत-सा धन
मिल जाय, हमारी मनचाही हो जाय आदि इष्टकी प्राप्तिके लिये और हमारा रोग मिट जाय, आफत मिट जाय, कर्जा दूर
हो जाय आदि अनिष्टकी निवृत्तिके लिये जो शास्त्रीय अनुष्ठान किये जाते हैं, वे सब “काम्य कर्म” कहलाते हैं।
(4) प्रायश्चित्त कर्म—हमारे द्वारा बने हुए पापोंको दूर करनेके लिये जो कर्म किये जाते हैं, वे सब “प्रायश्चित्त कर्म”
कहलाते हैं। इसके दो भेद हैं—विशेष प्रायश्चित्त और सामान्य प्रायश्चित्त। जैसे, किसीके हाथसे चूहा, बिल्ली, कबूतर आदि
मर जाय तो इन ज्ञात पापोंको दूर करनेके लिये धर्मसिन्धु, निर्णयसिन्धु आदि धर्म-ग्रन्थोंमें बताये गये प्रायश्चित्त कर्मोंका
अनुष्ठान करना “विशेष प्रायश्चित्त कर्म” कहलाते हैं, और ज्ञात-अज्ञात सब पापोंको दूर करनेके लिये गंगास्नान, एकादशीव्रत,
नामजप, सेवा आदि जो शुभ-कर्म किये जाते हैं, वे “सामान्य प्रायश्चित्त कर्म” कहलाते हैं।
(5) आवश्यक कर्तव्य-कर्म—खेती, व्यापार,नौकरी आदि जीविकाके लिये और खाना-पीना, सोना-जागना आदि
शरीरके लिये जो कर्म किये जाते हैं, वे “आवश्यक कर्तव्य-कर्म” कहलाते हैं।
2-जहाँ फलके त्यागकी बात कही गयी है, वहाँ फलकी कामनाका त्याग ही समझना चाहिये; क्योंकि फलका त्याग
हो ही नहीं सकता। यह नियम है कि प्रत्येक कर्म फलके रूपमें परिणत होता है। जैसे, कोई खेती करता है तो वह अनाजका
त्याग कैसे करेगा? व्यापार करता है तो मुनाफेका त्याग कैसे करेगा? जैसे अनाज होना खेतीका फल है, वैसे ही अनाज
न होना भी खेतीका फल है। जैसे मुनाफा होना व्यापारका फल है, वैसे ही घाटा होना भी व्यापारका फल है। परन्तु कामनाका
त्याग करनेसे फलसे स्वतः सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है (गीता—अठारहवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक)। इसीलिये भगवान्ने
सिद्धि और असिद्धि दोनोंमें सम रहनेको योग अर्थात् समता कहा है (गीता—दूसरे अध्यायका अड़तालीसवाँ श्लोक);
क्योंकि सिद्धि और असिद्धि दोनों कर्मका फल है। सिद्धि और असिद्धिमें सम रहनेका तात्पर्य है—कर्मफलमें ममता-आसक्ति
न करना अथवा कर्मफलसे अपना सम्बन्ध न जोड़ना।
4श्रीभगवान्
निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तमत्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः॥ 4॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

पीछेके दो श्लोकोंमें दार्शनिक विद्वानोंके चार मत बतानेके बाद अब भगवान् आगेके तीन श्लोकोंमें पहले त्यागके विषयमें अपना मत बताते हैं।

पदच्छेद
श्लोकमें ढूँढ़नेके लिये हॉवर करें
व्याख्या
3 sections
[ इस श्लोकके पूर्वार्धकी व्याख्याके रूपमें भगवान्ने पाँचवें और छठे श्लोकमें अपना मत बताया है और उत्तरार्धकी व्याख्याके रूपमें सातवेंसे नवें श्लोकतक तीन प्रकारके त्यागका वर्णन किया है। जिस प्रकार शरीर और शरीरीका विवेक सभी योगियोंके लिये परम आवश्यक होनेके कारण भगवान्ने उसका वर्णन गीतामें सबसे पहले (दूसरे अध्यायके ग्यारहवेंसे तीसवें श्लोकतक) किया है, उसी प्रकार फलकी कामना और कर्मकी आसक्तिका त्याग सभी योगियोंके लिये अत्यन्त आवश्यक होनेके कारण यहाँ भगवान् “त्याग” का वर्णन सबसे पहले आरम्भ करते हैं।]
निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम
हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! अब मैं संन्यास और त्याग—दोनोंमेंसे पहले त्यागके विषयमें अपना मत कहता हूँ, उसको तुम सुनो।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः
हे पुरुषव्याघ्र! त्याग तीन तरहका कहा गया है—सात्त्विक, राजस और तामस। वास्तवमें भगवान्के मतमें सात्त्विक त्याग ही “त्याग” है; परन्तु उसके साथ राजस और तामस त्यागका भी वर्णन करनेका तात्पर्य यह है कि उनके बिना भगवान्के अभीष्ट सात्त्विक त्यागकी श्रेष्ठता स्पष्ट नहीं होती; क्योंकि परीक्षा या तुलना करके किसी भी वस्तुकी श्रेष्ठता सिद्ध करनेके लिये दूसरी वस्तुएँ सामने रखनी ही पड़ती हैं। तीन प्रकारका त्याग बतानेका तात्पर्य यह भी है कि साधक सात्त्विक त्यागको ग्रहण करे और राजस तथा तामस त्यागका त्याग करे।
5श्रीभगवान्
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्। यज्ञो दानं तपश्ैव पावनानि मनीषिणाम्॥ 5॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
पदच्छेद
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व्याख्या
4 sections
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्
यहाँ भगवान्ने दूसरोंके मत (तीसरा श्लोक)-को ठीक बताया है। भगवान् कठोर शब्दोंसे किसीके मतका खण्डन नहीं करते। आदर देनेके लिये भगवान् दूसरेके मतका वास्तविक अंश ले लेते हैं और उसमें अपना मत भी शामिल कर देते हैं। यहाँ भगवान्ने दूसरेके मतके अनुसार कहा कि यज्ञ, दान और तपरूप कर्म छोड़ने नहीं चाहिये। इसके साथ भगवान्ने अपना मत बताया कि इतना ही नहीं, प्रत्युत उनको न करते हों तो जरूर करना चाहिये—“कार्यमेव तत्।” कारण कि यज्ञ, दान और तप—तीनों कर्म मनीषियोंको पवित्र करनेवाले हैं।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्
यहाँ “चैव” पदका तात्पर्य है कि नित्य, नैमित्तिक, जीविका- सम्बन्धी, शरीर-सम्बन्धी आदि जितने भी कर्तव्य-कर्म हैं, उनको भी जरूर करना चाहिये; क्योंकि वे भी मनीषियोंको पवित्र करनेवाले हैं। जो मनुष्य समत्वबुद्धिसे युक्त होकर कर्मजन्य फलका त्याग कर देते हैं, वे मनीषी हैं—“कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः” (गीता 2। 51)। ऐसे मनीषियोंको वे यज्ञादि कर्म पवित्र करते हैं। परन्तु जो वास्तवमें मनीषी नहीं हैं, जिनकी इन्द्रियाँ वशमें नहीं हैं अर्थात् अपने सुखभोगके लिये ही जो यज्ञ, दानादि कर्म करते हैं, उनको वे कर्म पवित्र नहीं करते, प्रत्युत वे कर्म बन्धनकारक हो जाते हैं। इस श्लोकके पूर्वार्धमें
यज्ञदानतपःकर्म
ऐसा समासयुक्त पद दिया है और उत्तरार्धमें
यज्ञो दानं तपः
ऐसे अलग-अलग पद दिये हैं, इसका तात्पर्य है कि भगवान्ने समासयुक्त पदसे यह बताया है कि यज्ञ, दान और तपका त्याग नहीं करना चाहिये, प्रत्युत इनको जरूर करना चाहिये और अलग-अलग पदोंसे यह बताया है कि इनमेंसे एक-एक कर्म भी मनीषीको पवित्र करनेवाला है।
परिशिष्ट भाव
मनीषीका अर्थ है—विचारशील। जो कर्म अपनी कोई कामना न रखकर दूसरोंके हितके लिये किये जाते हैं, वे कर्म पवित्र करनेवाले हो जाते हैं अर्थात् दुर्गुण-दुराचार, पाप आदि मलको दूर करके महान् आनन्द देनेवाले हो जाते हैं। परन्तु वे ही कर्म अगर अपनी कामना रखकर और दूसरोंका अहित करनेके लिये किये जायँ तो वे अपवित्र करनेवाले अर्थात् लोक-परलोक दोनोंमें महान् दुःख देनेवाले हो जाते हैं।
6श्रीभगवान्
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि । कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्॥ 6॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
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व्याख्या
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एतान्यपि तु कर्माणि ........ निश्चितं मतमुत्तमम्
यहाँ “एतानि” पदसे पूर्वश्लोकमें कहे यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंकी तथा “अपि” पदसे शास्त्रविहित पठन-पाठन, खेती-व्यापार आदि जीविका-सम्बन्धी कर्म; शास्त्रकी मर्यादाके अनुसार खाना-पीना, उठना-बैठना, सोना-जागना आदि शारीरिक कर्म और परिस्थितिके अनुसार सामने आये अवश्य कर्तव्य-कर्म—इन सभी कर्मोंको लेना चाहिये। इन समस्त कर्मोंको आसक्ति और फलेच्छाका त्याग करके जरूर करना चाहिये। अपनी कामना, ममता और आसक्तिका त्याग करके कर्मोंको केवल प्राणिमात्रके हितके लिये करनेसे कर्मोंका प्रवाह संसारके लिये और योग अपने लिये हो जाता है। परन्तु कर्मोंको अपने लिये करनेसे कर्म बन्धनकारक हो जाते हैं—अपने व्यक्तित्वको नष्ट नहीं होने देते। गीतामें कहीं संग-(आसक्ति-) के त्यागकी बात आती है और कहीं कर्मोंके फलके त्यागकी बात आती है। इस श्लोकमें संग और फल—दोनोंके त्यागकी बात आयी है। इसका तात्पर्य यह है कि गीतामें जहाँ संगके त्यागकी बात कही है, वहाँ उसके साथ फलके त्यागकी बात भी समझ लेनी चाहिये और जहाँ फलके त्यागकी बात कही है, वहाँ उसके साथ संगके त्यागकी बात भी समझ लेनी चाहिये। यहाँ अर्जुनने त्यागके तत्त्वकी बात पूछी है; अतः भगवान्ने त्यागका यह तत्त्व बताया है कि संग (आसक्ति) और फल—दोनोंका ही त्याग करना चाहिये, जिससे साधकको यह जानकारी स्पष्ट हो जाय कि आसक्ति न तो कर्ममें रहनी चाहिये और न फलमें ही रहनी चाहिये। आसक्ति न रहनेसे मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर आदि कर्म करनेके औजारों- (करणों-)में तथा प्राप्त वस्तुओंमें ममता नहीं रहती (गीता— पाँचवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)। संग (आसक्ति या सम्बन्ध) सूक्ष्म होता है और फलेच्छा स्थूल होती है। संग या आसक्तिकी सूक्ष्मता वहाँतक है, जहाँ चेतन-स्वरूपने नाशवान्के साथ सम्बन्ध जोड़ा है। वहींसे आसक्ति पैदा होती है, जिससे जन्म- मरण आदि सब अनर्थ होते—“कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु” (गीता 13। 21)। आसक्तिका त्याग करनेसे नाशवान्के साथ जोड़े हुए सम्बन्धका विच्छेद हो जाता है और स्वतः-स्वाभाविक रहनेवाली असंगताका अनुभव हो जाता है। इस विषयमें एक और बात समझनेकी है कि कई दार्शनिक इस नाशवान् संसारको असत् मानते हैं; क्योंकि यह पहले भी नहीं था और पीछे भी नहीं रहेगा, इसलिये वर्तमानमें भी यह नहीं है; जैसे—स्वप्न। कई दार्शनिकोंका यह मत है कि संसार परिवर्तनशील है, हरदम बदलता रहता है, कभी एक रूप नहीं रहता; जैसे—अपना शरीर। कई यह मानते हैं कि परिवर्तनशील होनेपर भी संसारका कभी अभाव नहीं होता, प्रत्युत तत्त्वसे सदा रहता है; जैसे—जल (जल ही बर्फ, बादल, भाप और परमाणुरूपसे हो जाता है, पर स्वरूपसे वह मिटता नहीं)। इस तरह अनेक मतभेद हैं; किन्तु नाशवान् जडका अपने अविनाशी चेतन-स्वरूपके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है, इसमें किसी भी दार्शनिकका मतभेद नहीं है। “संगं त्यक्त्वा” पदोंसे भगवान्ने उसी सम्बन्धका त्याग कहा है। प्रकृति सत् है या असत् है अथवा सत्-असत्से विलक्षण है? अनादि-सान्त है या अनादि-अनन्त है? इस झगड़ेमें पड़कर साधकको अपना अमूल्य समय खर्च नहीं करना चाहिये, प्रत्युत इस प्रकृतिसे तथा प्रकृतिके कार्य शरीर-संसारसे अपना सम्बन्ध-विच्छेद करना चाहिये, जो कि स्वतः हो ही रहा है। स्वतः होनेवाले सम्बन्ध- विच्छेदका केवल अनुभव करना है कि शरीर तो प्रतिक्षण बदलता ही रहता है और स्वयं निर्विकाररूपसे सदा ज्यों- का-त्यों रहता है। अब प्रश्न यह होता है कि फल क्या है? प्रारब्ध- कर्मके अनुसार अभी हमें जो परिस्थिति, वस्तु, देश, काल आदि प्राप्त हैं, वह सब कर्मोंका “प्राप्त फल” है और भविष्यमें जो परिस्थिति, वस्तु आदि प्राप्त होनेवाली है, वह सब कर्मोंका “अप्राप्त फल” है। प्राप्त तथा अप्राप्त फलमें आसक्ति रहनेके कारण ही प्राप्तमें ममता और अप्राप्तकी कामना होती है। इसलिये भगवान्ने “त्यक्त्वा फलानि च”* कहकर फलोंका त्याग करनेकी बात कही है। कर्मफलका त्याग क्यों करना चाहिये? क्योंकि कर्मफल हमारे साथ रहनेवाला है ही नहीं। कारण यह है कि जिन कर्मोंसे फल बनता है, उन कर्मोंका आरम्भ और अन्त होता है; अतः उनका फल भी प्राप्त और नष्ट होनेवाला ही है। इसलिये कर्मफलका त्याग करना है। फलके त्यागमें वस्तुतः फलकी आसक्तिका, कामनाका ही त्याग करना है। वास्तवमें आसक्ति हमारे स्वरूपमें है नहीं, केवल मानी हुई है। दूसरी बात, जो अपना स्वरूप होता है, उसका त्याग नहीं होता; जैसे—प्रज्वलित अग्नि उष्णता और प्रकाशका त्याग नहीं कर सकती। जो चीज अपनी नहीं होती, उसका भी त्याग नहीं होता; जैसे—संसारमें अनेक वस्तुएँ पड़ी हैं; परन्तु उनका हम त्याग करें—ऐसा कहना भी नहीं बनता; क्योंकि वे वस्तुएँ हमारी हैं ही नहीं। इसलिये त्याग उसीका होता है, जो वास्तवमें अपना नहीं है, पर जिसको अपना मान लिया है। ऐसे ही प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीर आदि हमारे नहीं हैं, फिर भी उनको हम अपना मानते हैं, तो इस अपनेपनकी मान्यताका ही त्याग करना है। मनुष्यके सामने कर्तव्यरूपसे जो कर्म आ जाय, उसको फल और आसक्तिका त्याग करके सावधानीके साथ तत्परतापूर्वक करना चाहिये—“कर्तव्यानि।” कर्मयोगमें विधि-निषेधको लेकर
अमुक काम करना है और अमुक काम नहीं करना है
ऐसा विचार तो करना ही है; परन्तु
अमुक काम बड़ा है और अमुक काम छोटा है
ऐसा विचार नहीं करना है। कारण कि जहाँ कर्म और उसके फलसे अपना कोई सम्बन्ध ही नहीं है, वहाँ यह कर्म बड़ा है, यह कर्म छोटा है; इस कर्मका फल बड़ा है, इस कर्मका फल छोटा है—ऐसा विचार हो ही नहीं सकता। कर्मका बड़ा या छोटा होना फलकी इच्छाके कारण ही दीखता है, जब कि कर्मयोगमें फलेच्छाका त्याग होता है। कर्म करना राग-पूर्तिके लिये भी होता है और राग- निवृत्तिके लिये भी। कर्मयोगी राग-निवृत्तिके लिये अर्थात् करनेका राग मिटानेके लिये ही सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्म करता है—“आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते” (गीता 6। 3), “न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते” (गीता 3। 4)। अपने लिये कर्म करनेसे करनेका राग बढ़ता है। इसलिये कर्मयोगी कोई भी कर्म अपने लिये नहीं करता, प्रत्युत केवल दूसरोंके हितके लिये ही करता है। उसके स्थूलशरीरमें होनेवाली “क्रिया”, सूक्ष्मशरीरमें होनेवाला “परहित-चिन्तन” तथा कारणशरीरमें होनेवाली
स्थिरता
तीनों ही दूसरोंके हितके लिये होती हैं, अपने लिये नहीं। इसलिये उसका करनेका राग सुगमतासे मिट जाता है। परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें संसारका राग ही बाधक है। अतः राग मिटनेपर कर्मयोगीको परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति अपने- आप हो जाती है (गीता—चौथे अध्यायका अड़तीसवाँ श्लोक)। “कर्तव्य” शब्दका अर्थ होता है—जिसको हम कर सकते हैं तथा जिसको जरूर करना चाहिये और जिसको करनेसे उद्देश्यकी सिद्धि जरूर होती है। उद्देश्य वही कहलाता है, जो नित्यसिद्ध और अनुत्पन्न है अर्थात् जो अनादि है और जिसका कभी विनाश नहीं होता। उस उद्देश्यकी सिद्धि मनुष्यजन्ममें ही होती है और उसकी सिद्धिके लिये ही मनुष्यशरीर मिला है, न कि कर्मजन्य परिस्थितिरूप सुख-दुःख भोगनेके लिये। कर्मजन्य परिस्थिति वह होती है, जो उत्पन्न और नष्ट होती हो। वह परिस्थिति तो मनुष्यके अलावा पशु-पक्षी, कीट-पतंग, वृक्ष-लता, नारकीय-स्वर्गीय आदि योनियोंके प्राणियोंको भी मिलती है, जहाँ कर्तव्यका कोई प्रश्न ही नहीं है और जहाँ उद्देश्यकी पूर्तिका अधिकार भी नहीं है। भगवान्के द्वारा अपने मतको “निश्चितम्” कहनेका तात्पर्य है कि इस मतमें सन्देहकी कोई गुंजाइश नहीं है, यह मत अटल है अर्थात् यह किंचिन्मात्र भी इधर-उधर नहीं हो सकता; और “उत्तमम्” कहनेका तात्पर्य है कि इस मतमें शास्त्रीय दृष्टिसे कोई कमी नहीं है, प्रत्युत यह पूर्णताको प्राप्त करानेवाला है।
परिशिष्ट भाव
इस श्लोकमें कर्मासक्ति और फलासक्ति—दोनोंके त्यागकी बात आयी है। कर्मासक्ति और फलासक्ति ही खास बन्धन है, जिससे छूटनेपर ही मनुष्य योगारूढ़ होता है—“यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते.......” (गीता 6। 4)। शुभ कर्म भी निष्कामभाव होनेसे ही कल्याण करनेवाले होते हैं। अगर निष्कामभाव न हो तो शुभ कर्म भी बन्धनकारक होते हैं—“आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन” (गीता 8। 16)।
* यहाँ “फलानि” शब्दमें बहुवचन देनेका तात्पर्य है कि सकामभावसे कर्म करनेवालोंमें बहुत-से फलोंकी इच्छा होती है—
“बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्” (गीता 2। 41)। वे इस लोकमें सुख-आराम, मान-सम्मान, यश-प्रतिष्ठा
आदि चाहते हैं और परलोकमें स्वर्ग आदिकी प्राप्ति चाहते हैं। भगवान्के मतमें इन सभी फलोंकी इच्छाओंका त्याग है।
7श्रीभगवान्
नियतस्य तु सन्न्यासः कर्मणो नोपपद्यतेमोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः॥ 7॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

इसी अध्यायके चौथे श्लोकमें भगवान्ने तीन प्रकारके त्यागकी बात कही थी। अब आगेके तीन श्लोकोंमें उसी त्रिविध त्यागका वर्णन करते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
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[तीन तरहके त्यागका वर्णन भगवान् इसलिये करते हैं कि अर्जुन कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करना चाहते थे—“श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके” (गीता 2। 5); अतः त्रिविध त्याग बताकर अर्जुनको चेत कराना था, और आगेके लिये मनुष्यमात्रको यह बताना था कि नियत कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करना भगवान्को मान्य (अभीष्ट) नहीं है। भगवान् तो सात्त्विक त्यागको ही वास्तवमें त्याग मानते हैं। सात्त्विक त्यागसे संसारके सम्बन्धका सर्वथा विच्छेद हो जाता है। दूसरी बात, सत्रहवें अध्यायमें भी भगवान् गुणोंके अनुसार श्रद्धा, आहार आदिके तीन-तीन भेद कहकर आये हैं, इसलिये यहाँ भी अर्जुनद्वारा त्यागका तत्त्व पूछनेपर भगवान्ने त्यागके तीन भेद कहे हैं।]
नियतस्य तु सन्न्यासः कर्मणो नोपपद्यते
पूर्व- श्लोकमें भगवान्ने त्यागके विषयमें अपना जो निश्चित उत्तम मत बताया है, उससे यह तामस त्याग बिलकुल ही विपरीत है और सर्वथा निकृष्ट है, यह बतानेके लिये यहाँ “तु” पद आया है। नियत कर्मोंका त्याग करना कभी भी उचित नहीं है; क्योंकि वे तो अवश्यकर्तव्य हैं। बलिवैश्वदेव आदि यज्ञ करना, कोई अतिथि आ जाय तो गृहस्थ-धर्मके अनुसार उसको अन्न, जल आदि देना, विशेष पर्वमें या श्राद्ध- तर्पणके दिन ब्राह्मणोंको भोजन कराना और दक्षिणा देना, अपने वर्ण-आश्रमके अनुसार प्रातः और सायंकालमें सन्ध्या करना आदि कर्मोंको न मानना और न करना ही नियत कर्मोंका त्याग है।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः
ऐसे नियत कर्मोंको मूढ़तासे अर्थात् बिना विवेक-विचारके छोड़ देना तामस त्याग कहा जाता है। सत्संग, सभा, समिति आदिमें जाना आवश्यक था, पर आलस्यमें पड़े रहे, आराम करने लग गये अथवा सो गये; घरमें माता-पिता बीमार हैं, उनके लिये वैद्यको बुलाने या ओषधि लानेके लिये जा रहे थे, रास्तेमें कहींपर लोग ताश-चौपड़ आदि खेल रहे थे, उनको देखकर खुद भी खेलमें लग गये और वैद्यको बुलाना या ओषधि लाना भूल गये; कोर्टमें मुकदमा चल रहा है, उसमें हाजिर होनेके समय हँसी-दिल्लगी, खेल- तमाशा आदिमें लग गये और समय बीत गया; शरीरके लिये शौच-स्नान आदि जो आवश्यक कर्तव्य हैं, उनको आलस्य और प्रमादके कारण छोड़ दिया—यह सब तामस त्यागके उदाहरण हैं। शास्त्रोंने जिन कर्मोंको करनेकी आज्ञा दी है, वे सभी “विहित कर्म” कहलाते हैं। उन सम्पूर्ण विहित कर्मोंका पालन एक व्यक्ति कर ही नहीं सकता; क्योंकि शास्त्रोंमें सम्पूर्ण वारों तथा तिथियोंके व्रतका विधान आता है। यदि एक ही मनुष्य सब वारोंमें या सब तिथियोंमें व्रत करेगा तो फिर वह भोजन कब करेगा? इससे यह सिद्ध हुआ कि मनुष्यके लिये सभी विहित कर्म लागू नहीं होते। परन्तु उन विहित कर्मोंमें भी वर्ण, आश्रम और परिस्थितिके अनुसार जिसके लिये जो कर्तव्य आवश्यक होता है, उसके लिये वह “नियत कर्म” कहलाता है। जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—चारों वर्णोंमें जिस-जिस वर्णके लिये जीविका और शरीर-निर्वाह-सम्बन्धी जितने भी नियम हैं, उस-उस वर्णके लिये वे सभी “नियत कर्म” हैं। नियत कर्मोंका मोहपूर्वक त्याग करनेसे वह त्याग “तामस” हो जाता है तथा सुख और आरामके लिये त्याग करनेसे वह त्याग “राजस” हो जाता है। सुखेच्छा, फलेच्छा तथा आसक्तिका त्याग करके नियत कर्मोंको करनेसे वह त्याग “सात्त्विक” हो जाता है। तात्पर्य यह है कि मोहमें उलझ जाना तामस पुरुषका स्वभाव है, सुख-आराममें उलझ जाना राजस पुरुषका स्वभाव है और इन दोनोंसे रहित होकर सावधानीपूर्वक निष्कामभावसे कर्तव्य-कर्म करना सात्त्विक पुरुषका स्वभाव है। इस सात्त्विक स्वभाव अथवा सात्त्विक त्यागसे ही कर्म और कर्मफलसे सम्बन्ध- विच्छेद होता है, राजस और तामस त्यागसे नहीं; क्योंकि राजस और तामस त्याग वास्तवमें त्याग है ही नहीं। लोग सामान्य रीतिसे स्वरूपसे कर्मोंको छोड़ देनेको ही त्याग मानते हैं; क्योंकि उन्हें प्रत्यक्षमें वही त्याग दीखता है। कौन व्यक्ति कौन-सा काम किस भावसे कर रहा है, इसका उन्हें पता नहीं लगता। परन्तु भगवान् भीतरकी कामना-ममता-आसक्तिके त्यागको ही त्याग मानते हैं; क्योंकि ये ही जन्म-मरणके कारण हैं (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। यदि बाहरके त्यागको ही असली त्याग माना जाय तो सभी मरनेवालोंका कल्याण हो जाना चाहिये; क्योंकि उनकी तो सम्पूर्ण वस्तुएँ छूट जाती हैं; और तो क्या, अपना कहलानेवाला शरीर भी छूट जाता है और उनको वे वस्तुएँ प्रायः यादतक नहीं रहतीं! अतः भीतरका त्याग ही असली त्याग है। भीतरका त्याग होनेसे बाहरसे वस्तुएँ अपने पास रहें या न रहें, मनुष्य उनसे बँधता नहीं।
परिशिष्ट भाव
“विहित” की अपेक्षा “नियत” कर्ममें व्यक्तिकी विशेष जिम्मेवारी होती है। जैसे, किसीको पहरेपर खड़ा कर दिया अथवा जल पिलानेके लिये प्याऊपर बैठा दिया तो यह उसके लिये नियत कर्म हो गया, जिसकी उसपर विशेष जिम्मेवारी है। नियत कर्मके त्यागका ज्यादा दोष लगता है। नियतका त्याग करनेसे विप्लव होता है। अतः पैसे कम मिलें या ज्यादा, आराम कम मिले या ज्यादा, अपने नियत कर्मका कभी त्याग नहीं करना चाहिये। नियत कर्म न करनेके कारण ही आजकल समाजमें अव्यवस्था हो रही है। जिसकी जिस कामके लिये नियुक्ति कर दी, वह उस कामको नहीं करेगा तो क्या दशा होगी? नियतका मोहपूर्वक त्याग करना तामस है, जिसका फल अधोगतिकी प्राप्ति है—“अधो गच्छन्ति तामसाः” (गीता 14। 18)।
8श्रीभगवान्
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्कृत्वा राजसं त्यागं ैव त्यागफलं लभेत्॥ 8॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
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दुःखमित्येव यत्कर्म
यज्ञ, दान आदि शास्त्रीय नियत कर्मोंको करनेमें केवल दुःख ही भोगना पड़ता है और उनमें है ही क्या? क्योंकि उन कर्मोंको करनेके लिये अनेक नियमोंमें बँधना पड़ता है और खर्चा भी करना पड़ता है—इस प्रकार राजस पुरुषको उन कर्मोंमें केवल दुःख-ही-दुःख दीखता है। दुःख दीखनेका कारण यह है कि उनका परलोकपर, शास्त्रोंपर, शास्त्रविहित कर्मोंपर और उन कर्मोंके परिणामपर श्रद्धा- विश्वास नहीं होता।
कायक्लेशभयात्त्यजेत्
राजस मनुष्यको शास्त्र- मर्यादा और लोक-मर्यादाके अनुसार चलनेसे शरीरमें क्लेश अर्थात् परिश्रमका अनुभव होता है*। राजस मनुष्यको अपने वर्ण, आश्रम आदिके धर्मका पालन करनेमें और माता-पिता, गुरु, मालिक आदिकी आज्ञाका पालन करनेमें पराधीनता और दुःखका अनुभव होता है तथा उनकी आज्ञा भंग करके जैसी मरजी आये, वैसा करनेमें स्वाधीनता और सुखका अनुभव होता है। राजस मनुष्योंके विचार यह होते हैं कि “गृहस्थमें आराम नहीं मिलता, स्त्री-पुत्र आदि हमारे अनुकूल नहीं हैं अथवा सब कुटुम्बी मर गये हैं, घरमें काम करनेके लिये कोई रहा नहीं, खुदको तकलीफ उठानी कपड़ा आदि सब चीजें मुफ्तमें मिल जायँगी, परिश्रम नहीं करना पड़ेगा; कोई ऐसी सरकारी नौकरी मिल जाय, जिससे काम कम करना पड़े और रुपये आरामसे मिलते रहें, हम काम न करें तो भी उस नौकरीसे हमें कोई छुड़ा न सके, हम नौकरी छोड़ देंगे तो हमें पेंशन मिलती रहेगी”, इत्यादि। ऐसे विचारोंके कारण उन्हें घरका काम- धन्धा करना अच्छा नहीं लगता और वे उसका त्याग कर देते हैं। यहाँ शंका होती है कि ज्ञानप्राप्तिके साधनोंमें दुःख और दोषको बार-बार देखनेकी बात कही है (गीता— तेरहवें अध्यायका आठवाँ श्लोक) और यहाँ कर्मोंमें दुःख देखकर उनका त्याग करनेको राजस त्याग कहा है अर्थात् कर्मोंके त्यागका निषेध किया है—इन दोनों बातोंमें परस्पर विरोध प्रतीत होता है। इसका समाधान है कि वास्तवमें इन दोनोंमें विरोध नहीं है, प्रत्युत इन दोनोंका विषय अलग- अलग है। वहाँ (गीता—तेरहवें अध्यायके आठवें श्लोकमें) भोगोंमें दुःख और दोषको देखनेकी बात है और यहाँ नियत कर्तव्य-कर्मोंमें दुःखको देखनेकी बात है। इसलिये वहाँ भोगोंका त्याग करनेका विषय है और यहाँ कर्तव्य-कर्मोंका त्याग करनेका विषय है। भोगोंका तो त्याग करना चाहिये, पर कर्तव्य-कर्मोंका त्याग कभी नहीं करना चाहिये। कारण कि जिन भोगोंमें सुखबुद्धि और गुणबुद्धि हो रही है, उन भोगोंमें बार-बार दुःख और दोषको देखनेसे भोगोंसे वैराग्य होगा, जिससे परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति होगी; परन्तु नियत कर्तव्य-कर्मोंमें दुःख देखकर उन कर्मोंका त्याग करनेसे सदा पराधीनता और दुःख भोगना पड़ेगा— “यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः” (गीता 3। 9)। तात्पर्य यह हुआ कि भोगोंमें दुःख और दोष देखनेसे भोगासक्ति छूटेगी, जिससे कल्याण होगा और कर्तव्यमें दुःख देखनेसे कर्तव्य छूटेगा, जिससे पतन होगा। कर्तव्य-कर्मोंका त्याग करनेमें तो राजस और तामस— ये दो भेद होते हैं, पर परिणाम-(आलस्य, प्रमाद, अतिनिद्रा आदि-) में दोनों एक हो जाते हैं अर्थात् परिणाममें दोनों ही तामस हो जाते हैं, जिसका फल अधोगति होता है—“अधो गच्छन्ति तामसाः” (गीता 14। 18)। एक शंका यह भी हो सकती है कि सत्संग, भगवत्- कथा, भक्तचरित्र सुननेसे किसीको वैराग्य हो जाय तो वह प्रभुको पानेके लिये आवश्यक कर्तव्य-कर्मोंको भी छोड़ देता है और केवल भगवान्के भजनमें लग जाता है। इसलिये उसका वह कर्तव्य-कर्मोंका त्याग राजस कहा जाना चाहिये? ऐसी बात नहीं है। सांसारिक कर्मोंको छोड़कर जो भजनमें लग जाता है, उसका त्याग राजस या तामस नहीं हो सकता। कारण कि भगवान्को प्राप्त करना मनुष्य-जन्मका ध्येय है; अतः उस ध्येयकी सिद्धिके लिये कर्तव्य-कर्मोंका त्याग करना वास्तवमें कर्तव्यका त्याग करना नहीं है, प्रत्युत असली कर्तव्यको करना है। उस असली कर्तव्यको करते हुए आलस्य, प्रमाद आदि दोष नहीं आ सकते; क्योंकि उसकी रुचि भगवान्में रहती है। परन्तु राजस और तामस त्याग करनेवालोंमें आलस्य, प्रमाद आदि दोष आयेंगे ही; क्योंकि उसकी रुचि भोगोंमें रहती है।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्
त्यागका फल “शान्ति” है। राजस मनुष्य त्याग करके भी त्यागके फल-(शान्ति-) को नहीं पाता। कारण कि उसने जो त्याग किया है, वह अपने सुख-आरामके लिये ही किया है। ऐसा त्याग तो पशु-पक्षी आदि भी करते हैं। अपने सुख-आरामके लिये शुभ-कर्मोंका त्याग करनेसे राजस मनुष्यको शान्ति तो नहीं मिलती, पर शुभ-कर्मोंके त्यागका फल दण्डरूपसे जरूर भोगना पड़ता है।
परिशिष्ट भाव
त्यागका फल “शान्ति” है—“त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्” (गीता 12। 12) और रागका फल “दुःख” है—“रजसस्तु फलं दुःखम्” (गीता 14। 16)। राजस मनुष्यको त्यागका फल “शान्ति” तो नहीं मिलती, पर रागका फल “दुःख” तो मिलता ही है।
* क्लेशका अनुभव होनेमें शरीरकी ममता और आसक्ति ही कारण है।
9श्रीभगवान्
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन। सङ्गं त्यक्त्वा फलं ैव स त्यागः सात्त्विको मतः॥ 9॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
पदच्छेद
श्लोकमें ढूँढ़नेके लिये हॉवर करें
व्याख्या
2 sections
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियते- ऽर्जुन
यहाँ “कार्यम्” पदके साथ “इति” और “एव” ये दो अव्यय लगानेसे यह अर्थ निकलता है कि केवल कर्तव्यमात्र करना है। इसको करनेमें कोई फलासक्ति नहीं, कोई स्वार्थ नहीं और कोई क्रियाजन्य सुखभोग भी नहीं। इस प्रकार कर्तव्यमात्र करनेसे कर्ताका उस कर्मसे सम्बन्ध- विच्छेद हो जाता है। ऐसा होनेसे वह कर्म बन्धनकारक नहीं होता अर्थात् संसारके साथ सम्बन्ध नहीं जुड़ता। कर्म तथा उसके फलमें आसक्त होनेसे ही बन्धन होता है— “फले सक्तो निबध्यते” (गीता 5। 12)। शास्त्रविहित कर्मोंमें भी देश, काल, वर्ण, आश्रम, परिस्थितिके अनुसार जिस-जिस कर्ममें जिस-जिसकी नियुक्ति की जाती है, वे सब नियत कर्म कहलाते हैं; जैसे—साधुको ऐसा करना चाहिये, गृहस्थको ऐसा करना चाहिये, ब्राह्मणको अमुक काम करना चाहिये, क्षत्रियको अमुक काम करना चाहिये इत्यादि। उन कर्मोंको प्रमाद, आलस्य, उपेक्षा, उदासीनता आदि दोषोंसे रहित होकर तत्परता और उत्साहपूर्वक करना चाहिये। इसीलिये भगवान्ने कर्मयोगके प्रसंगमें जगह-जगह “समाचर” शब्द दिया है (गीता—तीसरे अध्यायका नवाँ और उन्नीसवाँ श्लोक)।
संगं त्यक्त्वा फलं चैव
संगके त्यागका तात्पर्य है कर्म करनेसे वह त्याग सात्त्विक हो जाता है। राजस त्यागमें कायक्लेशके भयसे और तामस त्यागमें मोहपूर्वक कर्मोंका स्वरूपसे त्याग किया जाता है; परन्तु सात्त्विक त्यागमें कर्मोंका स्वरूपसे त्याग नहीं किया जाता, प्रत्युत कर्मोंको सावधानी एवं तत्परतासे, विधिपूर्वक, निष्कामभावसे किया जाता है। सात्त्विक त्यागसे कर्म और कर्मफलरूप शरीर- संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। राजस और तामस त्यागमें कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेसे केवल बाहरसे कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद दीखता है; परन्तु वास्तवमें (भीतरसे) कि कर्म, कर्म करनेके औजार (साधन) आदिमें आसक्ति, प्रियता, ममता आदि न हो और फलके त्यागका तात्पर्य है कि कर्मके परिणामके साथ सम्बन्ध न हो अर्थात् फलकी इच्छा न हो। इन दोनोंका तात्पर्य है कि कर्म और फलमें आसक्ति तथा इच्छाका त्याग हो। “स त्यागः सात्त्विको मतः” 1—कर्म और फलमें आसक्ति तथा कामनाका त्याग करके कर्तव्यमात्र समझकर शरीरके कष्टके भयसे कर्मोंका त्याग करनेसे कर्म तो छूट जाते हैं, पर अपने सुख और आरामके साथ सम्बन्ध जुड़ा ही रहता है। ऐसे ही मोहपूर्वक कर्मोंका त्याग करनेसे कर्म तो छूट जाते हैं, पर मोहके साथ सम्बन्ध जुड़ा रहता है। तात्पर्य यह हुआ कि कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेपर बन्धन होता है और कर्मोंको तत्परतासे विधिपूर्वक करनेपर मुक्ति (सम्बन्ध-विच्छेद) होती है।
परिशिष्ट भाव
तमोगुणमें मूढ़ता (बेसमझी) है और रजोगुणमें स्वार्थबुद्धि है, पर सत्त्वगुणमें न मूढ़ता है, न स्वार्थबुद्धि है, प्रत्युत सम्बन्ध-विच्छेद है। सात्त्विक मनुष्य कर्तव्यमात्र समझकर सब नियत कर्म करता है। एक मार्मिक बात है कि कर्तव्यमात्र समझकर जो भी कर्म किया जाता है, उससे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। लौकिक साधन (कर्मयोग और ज्ञानयोग)-में शरीर-संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद मुख्य है। इसलिये साधकको प्रत्येक कर्म कर्तव्यमात्र समझकर करना चाहिये। स्वरूपसे कर्मोंका त्याग करनेसे तो बन्धन होता है, पर सम्बन्ध न जोड़कर कर्तव्यमात्र समझकर कर्म करनेसे मुक्ति होती है।2 यहाँ शंका हो सकती है कि प्रस्तुत श्लोकमें तो कर्म करनेकी बात आयी है, त्यागकी बात आयी ही नहीं, फिर यह “सात्त्विक त्याग” कैसे हुआ? इसका समाधान है कि सात्त्विक कर्तामें न मोह है, न स्वार्थ है, न आसक्ति है, न फलेच्छा है, केवल कर्तव्यमात्र है, इसलिये कर्मके साथ कर्ताका कुछ भी सम्बन्ध न होनेसे यह “त्याग” हुआ। कर्तव्यमात्र जड़-विभागमें ही रहा, चेतनके साथ सम्बन्ध नहीं हुआ। जब चेतन (शरीरी) शरीरके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, तब शरीरसे होनेवाले कर्मोंके साथ उसका सम्बन्ध जुड़ जाता है। अगर वह शरीरके साथ सम्बन्ध न जोड़े, केवल कर्तव्यमात्र करे तो उसका कर्मोंके साथ सम्बन्ध नहीं जुड़ेगा। शरीर-संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेके कारण इसका नाम “त्याग” हुआ। इसमें कर्म और फल दोनोंके साथ सम्बन्ध-विच्छेद है।
1-गीताभरमें जहाँ कहीं (सातवें अध्यायके बारहवें, चौदहवें अध्यायके पाँचवेंसे अठारहवें, और बाईसवें, सत्रहवें अध्यायके
पहले, दूसरे, आठवेंसे दसवें, ग्यारहवेंसे तेरहवें, सत्रहवेंसे बाईसवें और अठारहवें अध्यायके बीसवेंसे अट्ठाईसवें, तीसवेंसे
पैंतीसवें तथा सैंतीसवेंसे उनतालीसवें श्लोकोंमें) गुणोंका वर्णन हुआ है, वहाँ सत्त्व, रज और तम—यही क्रम रखा गया
है। केवल यहीं (18। 7—9में) व्यतिक्रम हुआ है अर्थात् तम, रज और सत्त्व—ऐसा क्रम रखा गया है। इसका कारण है—
(1) यदि छठे श्लोकके बाद ही (सातवें श्लोकमें) सात्त्विक त्यागका वर्णन करते तो भगवान्के निश्चित मतमें और
सात्त्विक त्यागमें पुनरुक्तिका दोष आ जाता। (2) किसी वस्तुकी उत्तमता तभी सिद्ध होती है, जब उसके पहले अनुत्तम
वस्तुका वर्णन किया जाय। इसलिये भगवान् सात्त्विक त्यागकी उत्तमता सिद्ध करनेके लिये पहले अनुत्तम तामस और राजस
त्यागका वर्णन करते हैं। (3) आगे दसवेंसे बारहवें श्लोकतक “सात्त्विक त्यागी” का वर्णन हुआ है। यदि सात्त्विक त्यागका
वर्णन सात्त्विक त्यागीके पास (नवें श्लोकमें) न देते तो तामस त्यागके पास होनेसे सात्त्विक त्यागीका सम्बन्ध न जुड़ता।
2-अलौकिक साधन (भक्तियोग)-में भगवान्से सम्बन्ध जोड़ना मुख्य है। इसलिये भक्तको जप, ध्यान, कीर्तन आदि
कर्तव्य समझकर नहीं करने चाहिये, प्रत्युत अपने प्रियतमका काम (सेवा-पूजन) समझकर उनकी प्रसन्नताके लिये प्रेमपूर्वक
करने चाहिये। भगवान्की हरेक वस्तु (नाम, रूप आदि) प्रिय लगनी चाहिये। भगवान्का काम करनेमें आनन्द आना चाहिये।
जैसे, दवा कर्तव्य समझकर ली जाती है, पर भोजन कर्तव्य समझकर नहीं किया जाता, प्रत्युत अपनी भूख मिटानेके लिये
किया जाता है। इसलिये भक्तको जप, ध्यान आदि कर्तव्यमात्र समझकर त्यागके उद्देश्यसे नहीं करने चाहिये, प्रत्युत
भगवान्के साथ सम्बन्ध जाग्रत् करनेके लिये करने चाहिये। अगर वह जप, ध्यान आदि भी कर्तव्य समझकर करेगा तो
भगवत्सम्बन्ध जाग्रत् नहीं होगा, प्रेमका उदय नहीं होगा।
10श्रीभगवान्
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जतेत्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः॥ 10॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

विच्छेद नहीं होता। इसका कारण यह है कि छठे श्लोकमें “एतानि” और “अपि तु” पदोंसे कहे गये यज्ञ, दान, तप आदि शास्त्रविहित कर्मोंके करनेमें और शास्त्रनिषिद्ध तथा काम्य कर्मोंका त्याग करनेमें क्या भाव होना चाहिये? यह आगेके श्लोकमें बताते हैं।

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व्याख्या
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न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म
जो शास्त्रविहित शुभ-कर्म फलकी कामनासे किये जाते हैं और परिणाममें जिनसे पुनर्जन्म होता है (गीता—दूसरे अध्यायके बयालीसवेंसे चौवालीसवें तक और नवें अध्यायका बीसवाँ-इक्कीसवाँ श्लोक) तथा जो शास्त्रनिषिद्ध पाप-कर्म हैं और परिणाममें जिनसे नीच योनियों तथा नरकोंमें जाना पड़ता है (गीता—सोलहवें अध्यायके सातवेंसे बीसवें श्लोकतक), वे सब-के-सब कर्म “अकुशल” कहलाते हैं। साधक ऐसे अकुशल कर्मोंका त्याग तो करता है, पर द्वेषपूर्वक नहीं। कारण कि द्वेषपूर्वक त्याग करनेसे कर्मोंसे तो सम्बन्ध छूट जाता है, पर द्वेषके साथ सम्बन्ध जुड़ जाता है, जो शास्त्रविहित काम्य-कर्मोंसे तथा शास्त्र-निषिद्ध पाप- कर्मोंसे भी भयंकर है।
कुशले नानुषज्जते
शास्त्रविहित कर्मोंमें भी जो वर्ण, आश्रम, परिस्थिति आदिके अनुसार नियत हैं और जो आसक्ति तथा फलेच्छाका त्याग करके किये जाते हैं तथा परिणाममें जिनसे मुक्ति होती है, ऐसे सभी कर्म “कुशल” कहलाते हैं। साधक ऐसे कुशल कर्मोंको करते हुए भी उनमें आसक्त नहीं होता।
त्यागी
कुशल कर्मोंके करनेमें जिसका राग नहीं होता और अकुशल कर्मोंके त्यागमें जिसका द्वेष नहीं होता, वही असली त्यागी है*। परन्तु वह त्याग पूर्णतया तब सिद्ध होता है, जब कर्मोंको करने अथवा न करनेसे अपनेमें कोई फरक न पड़े अर्थात् निरन्तर निर्लिप्तता बनी रहे (गीता— तीसरे अध्यायका अठारहवाँ और चौथे अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)। ऐसा होनेपर साधक योगारूढ़ हो जाता है (गीता—छठे अध्यायका चौथा श्लोक)।
मेधावी
जिसके सम्पूर्ण कार्य सांगोपांग होते हैं और संकल्प तथा कामनासे रहित होते हैं तथा ज्ञानरूप अग्निसे जिसने सम्पूर्ण कर्मोंको भस्म कर दिया है, उसे पण्डित भी पण्डित (मेधावी अथवा बुद्धिमान्) कहते हैं (गीता—चौथे अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)। कारण कि कर्मोंको करते हुए भी कर्मोंसे लिपायमान न होना बड़ी बुद्धिमत्ता है। इसी मेधावीको चौथे अध्यायके अठारहवें श्लोकमें “स बुद्धिमान्मनुष्येषु” पदोंसे सम्पूर्ण मनुष्योंमें बुद्धिमान् बताया गया है।
छिन्नसंशयः
उस त्यागी पुरुषमें कोई सन्देह नहीं रहता। तत्त्वमें अभिन्नभावसे स्थित रहनेके कारण उसमें किसी तरहका संदेह रहनेकी सम्भावना ही नहीं रहती। सन्देह तो वहीं रहता है, जहाँ अधूरा ज्ञान होता है अर्थात् कुछ जानते हैं और कुछ नहीं जानते।
सत्त्वसमाविष्टः
आसक्ति आदिका त्याग होनेसे उसकी अपने स्वरूपमें, चिन्मयतामें स्वतः स्थिति हो जाती है। इसलिये उसे “सत्त्वसमाविष्टः” कहा गया है। इसीको पाँचवें अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें “तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः” पदोंसे परमात्मामें स्थित बताया गया है।
परिशिष्ट भाव
इस श्लोकका तात्पर्य राग-द्वेषका त्याग करनेमें है। मनुष्यका स्वभाव है कि वह रागपूर्वक ग्रहण और द्वेषपूर्वक त्याग करता है। राग और द्वेष—दोनोंसे ही संसारसे सम्बन्ध जुड़ता है। भगवान् कहते हैं कि वास्तवमें वही मनुष्य श्रेष्ठ है जो शुभ कर्मका ग्रहण तो करता है, पर रागपूर्वक नहीं और अशुभ कर्मका त्याग तो करता है, पर द्वेषपूर्वक नहीं।
* दोषबुद्ध्योभयातीतो निषेधान्न निवर्तते। गुणबुद्ध्या च विहितं न करोति यथार्भकः॥ (श्रीमद्भा0 11। 7। 11)
“जो पुरुष अनुकूलता-प्रतिकूलतारूप द्वन्द्वोंसे ऊँचा उठ जाता है, वह शास्त्रनिषिद्ध कर्मोंका त्याग करता है, पर द्वेषबुद्धिसे
नहीं और शास्त्रविहित कर्मोंको करता है, पर गुणबुद्धिसे अर्थात् रागपूर्वक नहीं। जैसे घुटनोंके बलपर चलनेवाले बच्चेकी
निवृत्ति और प्रवृत्ति राग-द्वेषपूर्वक नहीं होती, वैसे ही उभयातीत पुरुषकी निवृत्ति और प्रवृत्ति भी राग-द्वेषपूर्वक नहीं होती
(बच्चेमें तो अज्ञता रहती है, पर राग-द्वेषसे रहित पुरुषमें विज्ञता रहती है)।”
11श्रीभगवान्
हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतःयस्तु कर्मफलत्यागीत्यागीत्यभिधीयते॥ 11॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

कर्मोंको करनेमें राग न हो और छोड़नेमें द्वेष न हो—इतनी झंझट क्यों की जाय? कर्मोंका सर्वथा ही त्याग क्यों न कर दिया जाय?—इस शंकाको दूर करनेके लिये आगेका श्लोक कहते हैं।

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व्याख्या
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न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः
देहधारी अर्थात् देहके साथ तादात्म्य रखनेवाले मनुष्योंके द्वारा कर्मोंका सर्वथा त्याग होना सम्भव नहीं है; क्योंकि शरीर प्रकृतिका कार्य है और प्रकृति स्वतः क्रियाशील है। अतः शरीरके साथ तादात्म्य (एकता) रखनेवाला क्रियासे रहित कैसे हो सकता है? हाँ, यह हो सकता है कि मनुष्य यज्ञ, दान, तप, तीर्थ आदि कर्मोंको छोड़ दे; परन्तु वह खाना-पीना, चलना-फिरना, आना- जाना, उठना-बैठना, सोना-जागना आदि आवश्यक शारीरिक क्रियाओंको कैसे छोड़ सकता है? दूसरी बात, भीतरसे कर्मोंका सम्बन्ध छोड़ना ही वास्तवमें छोड़ना है। बाहरसे सम्बन्ध नहीं छोड़ा जा सकता। यदि बाहरसे सम्बन्ध छोड़ भी दिया जाय तो वह कबतक छूटा रहेगा? जैसे कोई समाधि लगा ले तो उस समय बाहरकी क्रियाओंका सम्बन्ध छूट जाता है। परन्तु समाधि भी एक क्रिया है, एक कर्म है; क्योंकि इसमें प्रकृतिजन्य कारण-शरीरका सम्बन्ध रहता है। इसलिये समाधिसे भी व्युत्थान होता है। कोई भी देहधारी मनुष्य कर्मोंका स्वरूपसे सम्बन्ध- विच्छेद नहीं कर सकता (गीता—तीसरे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)। कर्मोंका आरम्भ किये बिना निष्कर्मता (योगनिष्ठा) प्राप्त नहीं होती और कर्मोंका त्याग करनेमात्रसे सिद्धि (सांख्यनिष्ठा) भी प्राप्त नहीं होती (गीता—तीसरे अध्यायका चौथा श्लोक)। मार्मिक बात पुरुष (चेतन) सदा निर्विकार और एकरस रहनेवाला है; परन्तु प्रकृति विकारी और सदा परिवर्तनशील है। जिसमें अच्छी रीतिसे क्रियाशीलता हो, उसको “प्रकृति” कहते हैं—“प्रकर्षेण करणं (भावे ल्युट्) इति प्रकृतिः।” उस प्रकृतिके कार्य शरीरके साथ जबतक पुरुष अपना सम्बन्ध (तादात्म्य) मानता रहेगा, तबतक वह कर्मोंका सर्वथा त्याग कर ही नहीं सकता। कारण कि शरीरमें अहंता-ममता होनेके कारण मनुष्य शरीरसे होनेवाली प्रत्येक क्रियाको अपनी क्रिया मानता है, इसलिये वह कभी किसी अवस्थामें भी क्रियारहित नहीं हो सकता। दूसरी बात, केवल पुरुषने ही प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ा है। प्रकृतिने पुरुषके साथ सम्बन्ध नहीं जोड़ा है। जहाँ विवेक रहता है, वहाँ पुरुषने विवेककी उपेक्षा करके प्रकृतिसे सम्बन्धकी सद्भावना कर ली अर्थात् सम्बन्धको सत्य मान लिया। सम्बन्धको सत्य माननेसे ही बन्धन हुआ है। वह सम्बन्ध दो तरहका होता है—अपनेको शरीर मानना और शरीरको अपना मानना। अपनेको शरीर माननेसे “अहंता” और शरीरको अपना माननेसे “ममता” होती है। इस अहंता-ममतारूप सम्बन्धका घनिष्ठ होना ही देहधारीका स्वरूप है। ऐसा देहधारी मनुष्य कर्मोंको सर्वथा नहीं छोड़ सकता।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते
जो किसी भी कर्म और फलके साथ अपना सम्बन्ध नहीं रखता, वही त्यागी है। जबतक मनुष्य कुशल-अकुशलके साथ, अच्छे-मन्देके साथ अपना सम्बन्ध रखता है, तबतक वह त्यागी नहीं है। यह पुरुष जिस प्राकृत क्रिया और पदार्थको अपना मानता है, उसमें उसकी प्रियता हो जाती है। उसी प्रियताका नाम है—आसक्ति। यह आसक्ति ही वर्तमानके कर्मोंको लेकर “कर्मासक्ति” और भविष्यमें मिलनेवाले फलकी इच्छाको लेकर “फलासक्ति” कहलाती है। जब मनुष्य फल-त्यागका उद्देश्य बना लेता है, तब उसके सब कर्म संसारके हितके लिये होने लगते हैं, अपने लिये नहीं। कारण कि उसको यह बात अच्छी तरहसे समझमें आ जाती है कि कर्म करनेकी सब-की-सब सामग्री संसारसे मिली है और संसारकी ही है, अपनी नहीं। इन कर्मोंका भी आदि और अन्त होता है तथा उनका फल भी उत्पन्न और नष्ट होनेवाला होता है; परन्तु स्वयं सदा निर्विकार रहता है; न उत्पन्न होता है, न नष्ट होता है और न कभी विकृत ही होता है। ऐसा विवेक होनेपर फलेच्छाका त्याग सुगमतासे हो जाता है। फलका त्याग करनेमें उस विवेकी मनुष्यमें कभी अभिमान भी नहीं आता; क्योंकि कर्म और उसका फल—दोनों ही अपनेसे प्रतिक्षण वियुक्त हो रहे हैं; अतः उनके साथ हमारा सम्बन्ध वास्तवमें है ही कहाँ? इसीलिये भगवान् कहते हैं कि जो कर्मफलका त्यागी है, वही त्यागी कहा जाता है। निर्विकारका विकारी कर्मफलके साथ सम्बन्ध कभी था नहीं, है नहीं, हो सकता नहीं और होनेकी सम्भावना भी नहीं है। केवल अविवेकके कारण सम्बन्ध माना हुआ था। उस अविवेकके मिटनेसे मनुष्यकी अभिधा अर्थात् उसका नाम “त्यागी” हो जाता है—“स त्यागीत्यभिधीयते।” माने हुए सम्बन्धके विषयमें दृष्टान्तरूपसे एक बात कही जाती है। एक व्यक्ति घर-परिवारको छोड़कर सच्चे हृदयसे साधु-संन्यासी हो जाता है तो उसके बाद घरवालोंकी कितनी ही उन्नति अथवा अवनति हो जाय अथवा सब-के-सब मर जायँ, उनका नामोनिशान भी न रहे, तो भी उसपर कोई असर नहीं पड़ता। इसमें विचार करें कि उस व्यक्तिका परिवारके साथ जो सम्बन्ध था, वह दोनों तरफसे माना हुआ था अर्थात् वह परिवारको अपना मानता था और परिवार उसको अपना मानता था। परन्तु पुरुष और प्रकृतिका सम्बन्ध केवल पुरुषकी तरफसे माना हुआ है, प्रकृतिकी तरफसे माना हुआ नहीं! जब दोनों तरफसे माना हुआ (व्यक्ति और परिवारका) सम्बन्ध भी एक तरफसे छोड़नेपर छूट जाता है, तब केवल एक तरफसे माना हुआ (पुरुष और प्रकृतिका) सम्बन्ध छोड़नेपर छूट जाय, इसमें कहना ही क्या है!
परिशिष्ट भाव
यह श्लोक कर्मयोगकी दृष्टिसे कहा गया है। कर्मयोगमें कर्मफलकी इच्छाका त्याग होता है और ज्ञानयोगमें कर्तृत्वाभिमानका त्याग होता है। “कर्मफलत्याग” का तात्पर्य है—कर्मफलकी इच्छाका त्याग। कारण कि कर्मफलका त्याग हो ही नहीं सकता, जैसे—शरीर भी कर्मफल है, फिर उसका त्याग कैसे होगा? भोजन करनेपर तृप्तिका त्याग कैसे होगा! खेती करनेपर अन्नका त्याग कैसे होगा? अतः साधकको कर्मफलकी इच्छाका त्याग करना है। फलेच्छाका त्याग करनेसे साधक सुखी-दुःखी नहीं होगा। इसलिये गीतामें फलेच्छाके त्यागको ही फलका त्याग कहा गया है। बाहरका त्याग वास्तवमें त्याग नहीं है, प्रत्युत भीतरका त्याग ही त्याग है। अगर कोई बाहरसे त्याग करके एकान्तमें चला जाय तो भी संसारका बीज शरीर तो उसके साथ है ही। मरनेवालेका अपने शरीरसहित सब वस्तुओंका त्याग हो जाता है, पर उससे मुक्ति नहीं होती। अतः हमारी कामना-ममता-आसक्ति ही बाँधनेवाले हैं, संसार नहीं। इसलिये अपने लिये कुछ न करनेसे कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है—“यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते” (गीता 4। 23)।
* यहाँ “देहभृता” पदको देहाभिमानी अर्थात् देहके साथ तादात्म्य माननेवाले सामान्य पुरुषोंका ही वाचक समझना चाहिये।
गुणातीत महापुरुषकी देहसे भी क्रियाएँ होती रहती हैं; परन्तु देहके साथ तादात्म्य न रहनेसे उसका उन क्रियाओंसे कोई सम्बन्ध
नहीं होता अर्थात् वह उन क्रियाओंका कर्ता नहीं बनता।
* यहाँ “तु” अव्ययका प्रयोग करनेका तात्पर्य है कि जो सामान्य संसारी पुरुष हैं, उनकी अपेक्षा कर्मफलका त्याग
करनेवाला पुरुष श्रेष्ठ है, विलक्षण है। कारण कि उसका उद्देश्य परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति करनेका अर्थात् अपना कल्याण
करनेका होता है।
12श्रीभगवान्
िष्टमिष्टं मिश्रं त्रिविधं कर्मणः फलम्भवत्यत्यागिनां प्रेत्य तु सन्न्यासिनां क्वचित्॥ 12॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

पूर्वश्लोकमें कहा गया कि कर्मफलका त्याग करनेवाला ही वास्तवमें त्यागी है। अगर मनुष्य कर्मफलका त्याग न करे तो क्या होता है—इसे आगेके श्लोकमें बताते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
4 sections
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्
कर्मका फल तीन तरहका होता है—इष्ट, अनिष्ट और मिश्र। जिस परिस्थितिको मनुष्य चाहता है, वह “इष्ट” कर्मफल है, जिस परिस्थितिको मनुष्य नहीं चाहता, वह “अनिष्ट” कर्मफल है और जिसमें कुछ भाग इष्टका तथा कुछ भाग अनिष्टका है, वह “मिश्र” कर्मफल है। वास्तवमें देखा जाय तो संसारमें प्रायः मिश्रित ही फल होता है; जैसे—धन होनेसे अनुकूल (इष्ट) और प्रतिकूल (अनिष्ट)—दोनों ही परिस्थितियाँ आती हैं; धनसे निर्वाह होता है—यह अनुकूलता है और टैक्स लगता है, धन नष्ट हो जाता है, छिन जाता है—यह प्रतिकूलता है। तात्पर्य है कि इष्टमें भी आंशिक अनिष्ट और अनिष्टमें भी आंशिक इष्ट रहता ही है। कारण कि सम्पूर्ण संसार त्रिगुणात्मक है (गीता—अठारहवें अध्यायका चालीसवाँ श्लोक); यहाँ जन्म भी दुःखालय (आठवें अध्यायका पन्द्रहवाँ श्लोक) और सुखरहित (नवें अध्यायका तैंतीसवाँ श्लोक) है। अतः चाहे इष्ट (अनुकूल) परिस्थिति हो, चाहे अनिष्ट प्रतिकूल होती ही नहीं। यहाँ इष्ट और अनिष्ट कहनेका मतलब यह है कि इष्टमें अनुकूलताकी और अनिष्टमें प्रतिकूलताकी प्रधानता होती है। वास्तवमें कर्मोंका फल मिश्रित ही होता है; क्योंकि कोई भी कर्म सर्वथा निर्दोष नहीं होता (अठारहवें अध्यायका अड़तालीसवाँ श्लोक)।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य
उपर्युक्त सभी फल अत्यागियोंको अर्थात् फलकी इच्छा रखकर कर्म करनेवालोंको ही मिलते हैं, संन्यासियोंको नहीं। कारण कि जितने भी कर्म होते हैं, वे सब प्रकृतिके द्वारा अर्थात् प्रकृतिके कार्य शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धिके द्वारा ही होते हैं तथा फलरूप परिस्थिति भी प्रकृतिके द्वारा ही बनती है। इसलिये कर्मोंका और उनके फलोंका सम्बन्ध केवल प्रकृतिके साथ है, “स्वयं-(चेतनस्वरूप-) के साथ नहीं। परन्तु जब “स्वयं” उनसे सम्बन्ध तोड़ लेता है, तो फिर वह भोगी नहीं बनता, प्रत्युत त्यागी हो जाता है। अत्यागीका मतलब है—पीछेके दो (दसवें-ग्यारहवें) श्लोकोंमें जिन त्यागियोंकी बात आयी है, उनके समान जो त्यागी नहीं है अर्थात् जिन्होंने कर्मफलका त्याग नहीं किया है, ऐसे अत्यागी मनुष्योंके सामने इष्ट, अनिष्ट और मिश्र—तीनों कर्मफल अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितिके रूपमें आते रहते हैं, जिनसे वे सुखी-दुःखी होते रहते हैं। उनसे सुखी-दुःखी होना ही वास्तवमें बन्धन है। वास्तवमें अनुकूलतासे सुखी होना ही प्रतिकूलतामें दुःखी होनेका कारण है; क्योंकि परिस्थितिजन्य सुख भोगनेवाला कभी दुःखसे बच ही नहीं सकता। जबतक वह सुख भोगता रहेगा, तबतक वह प्रतिकूल परिस्थितियोंमें दुःखी होता ही रहेगा। चिन्ता, शोक, भय, उद्वेग आदि उसको कभी छोड़ नहीं सकते और वह भी इनसे कभी छूट नहीं सकता। “प्रेत्य भवति” कहनेका तात्पर्य है कि जो कर्म- फलके त्यागी नहीं हैं, उनको इष्ट, अनिष्ट और मिश्र— ये तीनों कर्मफल मरनेके बाद जरूर मिलते हैं। परन्तु इसके साथ “न तु सन्न्यासिनां क्वचित्” पदोंमें कहा गया है कि जो कर्मफलके त्यागी हैं, उनको कहीं भी अर्थात् यहाँ और मरनेके बाद भी कर्मफल नहीं मिलता। इससे सिद्ध होता है कि अत्यागियोंको मरनेके बाद तो कर्मफल मिलता ही है, पर यहाँ जीते-जी भी कर्मफल मिल सकता है।
न तु सन्न्यासिनां क्वचित्
संन्यासियों- (त्यागियों-) को कहीं भी अर्थात् इस लोकमें या परलोकमें, इस जन्ममें या मरनेके बाद भी कर्मफल भोगना नहीं पड़ता। हाँ, पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मोंके अनुसार इस जन्ममें उनके सामने अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति तो आती है, पर वे अपने विवेकके बलसे उन परिस्थितियोंके भोगी नहीं बनते, उनसे सुखी-दुःखी नहीं होते अर्थात् सर्वथा निर्लिप्त रहते हैं। संन्यासियों अर्थात् त्यागियोंको फल क्यों नहीं भोगना पड़ता? कारण कि वे अपने लिये कुछ भी नहीं करते। उनको अच्छी तरहसे यह विवेक हो जाता है कि अपना जो सत्स्वरूप है, उसके लिये किसी भी क्रिया और वस्तुकी आवश्यकता है ही नहीं। अपने लिये पानेकी इच्छासे साधक कुछ भी करता है तो वह अपने व्यक्तित्वको ही स्थिर रखता है; क्योंकि वह संसारमात्रके हितसे अपना हित अलग मानता है। जब वह संसारमात्रके हितसे अपना हित अलग नहीं मानता अर्थात् सबके हितमें ही अपना हित मानता है, तब वह स्वतः “सर्वभूतहिते रताः” हो जाता है। फिर उसके स्थूलशरीरसे होनेवाली क्रियाएँ, सूक्ष्मशरीरसे होनेवाला परहित-चिन्तन और कारणशरीरसे होनेवाली स्थिरता—तीनों ही संसारके मात्र प्राणियोंके हितके लिये होती हैं। कारण कि शरीर आदि सब-की-सब सामग्री संसारसे अभिन्न है। उस सामग्रीसे अपना हित चाहता है—यही गलती होती है, जो कि अपनी परिच्छिन्नतामें हेतु है। यहाँ “सन्न्यासिनाम्” पदमें त्यागी (कर्मयोगी) और संन्यासी (सांख्ययोगी)—दोनोंकी एकता की गयी है; जैसे—कर्मयोगी कर्मोंसे असंग रहता है तो सांख्ययोगी भी कर्मोंसे सर्वथा निर्लिप्त रहता है। कर्मयोगी (निष्कामभावसे) कर्म करते हुए भी फलके साथ सम्बन्ध नहीं रखता तो सांख्ययोगी कर्ममात्रके साथ किंचित् भी सम्बन्ध नहीं रखता। कर्मयोगी फलसे सम्बन्ध-विच्छेद करता है अर्थात् ममताका त्याग करता है तो सांख्ययोगी कर्तृत्वाभिमान अर्थात् अहंताका त्याग करता है। ममताका त्याग होनेपर अहंताका भी स्वतः त्याग हो जाता है और अहंताका त्याग होनेपर ममताका भी स्वतः त्याग हो जाता है। इसलिये भगवान्ने कर्मयोगमें ममताके त्यागके बाद अहंताका त्याग बताया है—“निर्ममो निरहंकारः” (2। 71) और सांख्ययोगमें अहंताके त्यागके बाद ममताका त्याग बताया है—“अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्। विमुच्य निर्ममः.....” (18। 53)। इन दोनोंकी इस त्याग करनेकी प्रक्रियामें तो फरक है; परन्तु परिवर्तनशील प्रकृति और प्रकृतिका कार्य—इनमेंसे किसीके भी साथ इन दोनोंका सम्बन्ध नहीं रहता अर्थात् तत्त्वमें कर्मयोगी और सांख्ययोगी—दोनों एक हो जाते हैं। पहले अर्जुनने यह पूछा था कि मैं संन्यास और त्यागका तत्त्व जानना चाहता हूँ; अतः भगवान्ने यहाँ “सन्न्यासिनाम्” पदसे दोनोंका यह तत्त्व बताया कि कर्मयोगीका यह भाव रहता है कि अपना कुछ नहीं है, अपने लिये कुछ नहीं चाहिये और अपने लिये कुछ नहीं करना है। ऐसे ही सांख्ययोगीका यह भाव रहता है कि अपना कुछ नहीं है और अपने लिये कुछ नहीं चाहिये। सांख्ययोगी प्रकृति और प्रकृतिके कार्यके साथ किंचिन्मात्र भी अपना सम्बन्ध नहीं मानता, इसलिये उसके लिये
अपने लिये कुछ नहीं करना है
यह कहना ही नहीं बनता। यहाँ “त्यागिनाम्” पद न देकर “सन्न्यासिनाम्” पद देनेका यह तात्पर्य है कि जो निर्लिप्तता सांख्ययोगसे होती है, वही निर्लिप्तता त्यागसे अर्थात् कर्मयोगसे भी होती है (गीता— पाँचवें अध्यायका चौथा-पाँचवाँ श्लोक)। दूसरी बात, यहाँतक भगवान्ने कर्मयोगसे निर्लिप्तता बतायी, अब “सन्न्यासिनाम्” पद कहकर आगे सांख्ययोगसे निर्लिप्तता बतानेका बीज भी डाल देते हैं। कर्म-सम्बन्धी
विशेष बात
विशेष बात पुरुष और प्रकृति—ये दो हैं। इनमेंसे पुरुषमें कभी परिवर्तन नहीं होता और प्रकृति कभी परिवर्तनरहित नहीं होती। जब यह पुरुष प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है, तब प्रकृतिकी क्रिया पुरुषका “कर्म” बन जाती है; क्योंकि प्रकृतिके साथ सम्बन्ध माननेसे तादात्म्य हो जाता है। तादात्म्य होनेसे जो प्राकृत वस्तुएँ प्राप्त हैं, उनमें ममता होती है और उस ममताके कारण अप्राप्त वस्तुओंकी कामना होती है। इस प्रकार जबतक कामना, ममता और तादात्म्य रहता है, तबतक जो कुछ परिवर्तनरूप क्रिया होती है, उसका नाम “कर्म” है। तादात्म्यके टूटनेपर वही कर्म पुरुषके लिये “अकर्म” हो जाता है अर्थात् वह कर्म क्रियामात्र रह जाता है, उसमें फलजनकता नहीं रहती—यह “कर्ममें अकर्म” है। अकर्म- अवस्थामें अर्थात् स्वरूपका अनुभव होनेपर उस महापुरुषके शरीरसे जो क्रिया होती रहती है, वह “अकर्ममें कर्म” है (गीता—चौथे अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह हुआ कि अपने निर्लिप्त स्वरूपका अनुभव न होनेपर भी वास्तवमें सब क्रियाएँ प्रकृति और उसके कार्य शरीरमें होती हैं; परन्तु प्रकृति या शरीरसे अपनी पृथक्ताका अनुभव न होनेसे वे क्रियाएँ “कर्म” बन जाती हैं (गीता— तीसरे अध्यायका सत्ताईसवाँ और तेरहवें अध्यायका उनतीसवाँ श्लोक)। कर्म तीन तरहके होते हैं—क्रियमाण, संचित और प्रारब्ध। अभी वर्तमानमें जो कर्म किये जाते हैं, वे “क्रियमाण” कर्म कहलाते हैं*। वर्तमानसे पहले इस जन्ममें किये हुए अथवा पहलेके अनेक मनुष्यजन्मोंमें किये हुए जो कर्म संगृहीत हैं, वे “संचित” कर्म कहलाते हैं। संचितमेंसे जो कर्म फल देनेके लिये प्रस्तुत (उन्मुख) हो गये हैं अर्थात् जन्म, आयु और अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिके रूपमें परिणत होनेके लिये सामने आ गये हैं, वे “प्रारब्ध” कर्म कहलाते हैं। क्रियमाण कर्म क्रियमाण कर्म दो तरहके होते हैं—शुभ और अशुभ। जो कर्म शास्त्रानुसार विधि-विधानसे किये जाते हैं, वे शुभकर्म कहलाते हैं और काम, क्रोध, लोभ, आसक्ति आदिको लेकर जो शास्त्र-निषिद्ध कर्म किये जाते हैं, वे अशुभकर्म कहलाते हैं। शुभ अथवा अशुभ प्रत्येक क्रियमाण कर्मका एक तो फल-अंश बनता है और एक संस्कार-अंश। ये दोनों भिन्न-भिन्न हैं। क्रियमाण कर्मके फल-अंशके दो भेद हैं—दृष्ट और अदृष्ट। इनमेंसे दृष्टके भी दो भेद होते हैं— तात्कालिक और कालान्तरिक। जैसे, भोजन करते हुए जो रस आता है, सुख होता है, प्रसन्नता होती है और तृप्ति होती है—यह दृष्टका “तात्कालिक” फल है और भोजनके परिणाममें आयु, बल, आरोग्य आदिका बढ़ना— यह दृष्टका “कालान्तरिक” फल है। ऐसे ही जिसका अधिक मिर्च खानेका स्वभाव है, वह जब अधिक मिर्चवाले पदार्थ खाता है, तब उसको प्रसन्नता होती है, सुख होता है और मिर्चकी तीक्ष्णताके कारण मुँहमें, जीभमें जलन होती है, आँखोंसे और नाकसे पानी निकलता है, सिरसे पसीना निकलता है—यह दृष्टका “तात्कालिक” फल है और कुपथ्यके कारण परिणाममें पेटमें जलन और रोग, दुःख आदिका होना—यह दृष्टका “कालान्तरिक” फल है। इसी प्रकार अदृष्टके भी दो भेद होते हैं—लौकिक और पारलौकिक। जीते-जी ही फल मिल जाय—इस भावसे यज्ञ, दान, तप, तीर्थ, व्रत, मन्त्र-जप आदि शुभकर्मोंको विधि-विधानसे किया जाय और उसका कोई प्रबल प्रतिबन्ध न हो तो यहाँ ही पुत्र, धन, यश, प्रतिष्ठा आदि अनुकूलकी प्राप्ति होना और रोग, निर्धनता आदि प्रतिकूलकी निवृत्ति होना—यह अदृष्टका “लौकिक” फल है1 और मरनेके बाद स्वर्ग आदिकी प्राप्ति हो जाय—इस भावसे यथार्थ विधि-विधान और श्रद्धा-विश्वासपूर्वक जो यज्ञ, दान, तप आदि शुभकर्म किये जायँ तो मरनेके बाद स्वर्ग आदि लोकोंकी प्राप्ति होना—यह अदृष्टका “पारलौकिक” फल है। ऐसे ही डाका डालने, चोरी करने, मनुष्यकी हत्या करने आदि अशुभकर्मोंका फल यहाँ ही कैद, जुर्माना, फाँसी आदि होना—यह अदृष्टका “लौकिक” फल है और पापोंके कारण मरनेके बाद नरकोंमें जाना और पशु-पक्षी, कीट- पतंग आदि बनना—यह अदृष्टका “पारलौकिक” फल है। पाप-पुण्यके इस लौकिक और पारलौकिक फलके विषयमें एक बात और समझनेकी है कि जिन पापकर्मोंका फल यहीं कैद, जुर्माना, अपमान, निन्दा आदिके रूपमें भोग लिया है, उन पापोंका फल मरनेके बाद भोगना नहीं पड़ेगा। परन्तु व्यक्तिके पाप कितनी मात्राके थे और उनका भोग कितनी मात्रामें हुआ अर्थात् उन पापकर्मोंका फल उसने पूरा भोगा या अधूरा भोगा—इसका पूरा पता मनुष्यको नहीं लगता; क्योंकि मनुष्यके पास इसका कोई माप-तौल नहीं है। परन्तु भगवान्को इसका पूरा पता है; अतः उनके कानूनके अनुसार उन पापोंका फल यहाँ जितने अंशमें कम भोगा गया है, उतना इस जन्ममें या मरनेके बाद भोगना ही पड़ेगा। इसलिये मनुष्यको ऐसी शंका नहीं करनी चाहिये कि मेरा पाप तो कम था, पर दण्ड अधिक भोगना पड़ा अथवा मैंने पाप तो किया नहीं, पर दण्ड मुझे मिल गया! कारण कि यह सर्वज्ञ, सर्वसुहृद्, सर्वसमर्थ भगवान्का विधान है कि पापसे अधिक दण्ड कोई नहीं भोगता और जो दण्ड मिलता है, वह किसी-न-किसी पापका ही फल होता है2। इसी तरह धन-सम्पत्ति, मान, आदर, प्रशंसा, नीरोगता आदि अनुकूल परिस्थितिके रूपमें पुण्य-कर्मोंका जितना फल यहाँ भोग लिया है, उतना अंश तो यहाँ नष्ट हो ही गया और जितना बाकी रह गया है, वह परलोकमें फिर भोगा जा सकता है। यदि पुण्यकर्मोंका पूरा फल यहीं भोग लिया गया है तो पुण्य यहींपर समाप्त हो जायँगे। क्रियमाण-कर्मके संस्कार-अंशके भी दो भेद हैं—शुद्ध एवं पवित्र संस्कार और अशुद्ध एवं अपवित्र संस्कार। शास्त्रविहित कर्म करनेसे जो संस्कार पड़ते हैं, वे शुद्ध एवं पवित्र होते हैं और शास्त्र, नीति, लोकमर्यादाके विरुद्ध कर्म करनेसे जो संस्कार पड़ते हैं, वे अशुद्ध एवं अपवित्र होते हैं। इन दोनों शुद्ध और अशुद्ध संस्कारोंको लेकर स्वभाव (प्रकृति, आदत) बनता है। उन संस्कारोंमेंसे अशुद्ध अंशका सर्वथा नाश करनेपर स्वभाव शुद्ध, निर्मल, पवित्र हो जाता है; परन्तु जिन पूर्वकृत कर्मोंसे स्वभाव बना है, उन कर्मोंकी भिन्नताके कारण जीवन्मुक्त पुरुषोंके स्वभावोंमें भी भिन्नता रहती है। इन विभिन्न स्वभावोंके कारण ही उनके द्वारा विभिन्न कर्म होते हैं, पर वे कर्म दोषी नहीं होते, प्रत्युत सर्वथा शुद्ध होते हैं और उन कर्मोंसे दुनियाका कल्याण होता है। संस्कार-अंशसे जो स्वभाव बनता है, वह एक दृष्टिसे महान् प्रबल होता है—“स्वभावो मूर्ध्नि वर्तते”; अतः उसे मिटाया नहीं जा सकता*। इसी प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्णोंका जो स्वभाव है, उसमें कर्म करनेकी मुख्यता रहती है। इसलिये भगवान्ने अर्जुनसे कहा है कि जिस कर्मको तू मोहवश नहीं करना चाहता, उसको भी अपने स्वाभाविक कर्मसे बँधा हुआ परवश होकर करेगा (गीता—अठारहवें अध्यायका साठवाँ श्लोक)। अब इसमें विचार करनेकी एक बात है कि एक ओर तो स्वभावकी महान् प्रबलता है कि उसको कोई छोड़ ही नहीं सकता और दूसरी ओर मनुष्य-जन्मके उद्योगकी महान् प्रबलता है कि मनुष्य सब कुछ करनेमें स्वतन्त्र है। अतः इन दोनोंमें किसकी विजय होगी और किसकी पराजय होगी? इसमें विजय- पराजयकी बात नहीं है। अपनी-अपनी जगह दोनों ही प्रबल हैं। परन्तु यहाँ स्वभाव न छोड़नेकी जो बात है, वह जाति-विशेषके स्वभावकी बात है। तात्पर्य है कि जीव जिस वर्णमें जन्मा है, जैसा रज-वीर्य था, उसके अनुसार बना हुआ जो स्वभाव है, उसको कोई बदल नहीं सकता; अतः वह स्वभाव दोषी नहीं है, निर्दोष है। जैसे, ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्णोंका जो स्वभाव है, वह स्वभाव नहीं बदल सकता और उसको बदलनेकी आवश्यकता भी नहीं है तथा उसको बदलनेके लिये शास्त्र भी नहीं कहता। परन्तु उस स्वभावमें जो अशुद्ध-अंश (राग-द्वेष) है, उसको मिटानेकी सामर्थ्य भगवान्ने मनुष्यको दी है। अतः जिन दोषोंसे मनुष्यका स्वभाव अशुद्ध बना है, उन दोषोंको मिटाकर मनुष्य स्वतन्त्रतापूर्वक अपने स्वभावको शुद्ध बना सकता है। मनुष्य चाहे तो कर्मयोगकी दृष्टिसे अपने प्रयत्नसे राग-द्वेषको मिटाकर स्वभाव शुद्ध बना ले (गीता— तीसरे अध्यायका चौंतीसवाँ श्लोक), चाहे भक्तियोगकी दृष्टिसे सर्वथा भगवान्के शरण होकर अपना स्वभाव शुद्ध बना ले (गीता—अठारहवें अध्यायका बासठवाँ श्लोक)। इस प्रकार प्रकृति-(स्वभाव-) की प्रबलता भी सिद्ध हो गयी और मनुष्यकी स्वतन्त्रता भी सिद्ध हो गयी। तात्पर्य यह हुआ कि शुद्ध स्वभावको रखनेमें प्रकृतिकी प्रबलता है और अशुद्ध स्वभावको मिटानेमें मनुष्यकी स्वतन्त्रता है। जैसे, लोहेकी तलवारको पारस छुआ दिया जाय तो तलवार सोना बन जाती है; परन्तु उसकी मार, धार और आकार—ये तीनों नहीं बदलते। इस प्रकार सोना बनानेमें पारसकी प्रधानता रही और “मार-धार-आकार” में तलवारकी प्रधानता रही। ऐसे ही जिन लोगोंने अपने स्वभावको परम शुद्ध बना लिया है, उनके कर्म भी सर्वथा शुद्ध होते हैं। परन्तु स्वभावके शुद्ध होनेपर भी वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय, साधन-पद्धति, मान्यता आदिके अनुसार आपसमें उनके कर्मोंकी भिन्नता रहती है। जैसे, किसी ब्राह्मणको तत्त्वबोध हो जानेपर भी वह खान-पान आदिमें पवित्रता रखेगा और अपने हाथसे बनाया हुआ भोजन ही ग्रहण करेगा; क्योंकि उसके स्वभावमें पवित्रता है। परन्तु किसी हरिजन आदि साधारण वर्णवालेको तत्त्वबोध हो जाय तो वह खान-पान आदिमें पवित्रता नहीं रखेगा और दूसरोंकी जूठन भी खा लेगा; क्योंकि उसका स्वभाव ही ऐसा पड़ा हुआ है। पर ऐसा स्वभाव उसके लिये दोषी नहीं होगा। जीवका असत्के साथ सम्बन्ध जोड़नेका स्वभाव अनादि-कालसे बना हुआ है, जिसके कारण वह जन्म- मरणके चक्करमें पड़ा हुआ है और बार-बार ऊँच-नीच योनियोंमें जाता है। उस स्वभावको मनुष्य शुद्ध कर सकता है अर्थात् उसमें जो कामना, ममता और तादात्म्य है, उनको मिटा सकता है। कामना, ममता और तादात्म्यके मिटनेके बाद जो स्वभाव रहता है, वह स्वभाव दोषी नहीं रहता। इसलिये उस स्वभावको मिटाना नहीं है और मिटानेकी आवश्यकता भी नहीं है। जब मनुष्य अहंकारका आश्रय छोड़कर सर्वथा भगवान्के शरण हो जाता है, तब उसका स्वभाव शुद्ध हो जाता है; जैसे—लोहा पारसके स्पर्शसे शुद्ध सोना बन जाता है। स्वभाव शुद्ध होनेसे फिर वह स्वभावज कर्म करते हुए भी दोषी और पापी नहीं बनता (गीता—अठारहवें अध्यायका सैंतालीसवाँ श्लोक)। सर्वथा भगवान्के शरण होनेके बाद भक्तका प्रकृतिके साथ कोई सम्बन्ध नहीं रहता। फिर भक्तके जीवनमें भगवान्का स्वभाव काम करता है। भगवान् समस्त प्राणियोंके सुहृद् हैं—“सुहृदं सर्वभूतानाम्” (गीता 5। 29) तो भक्त भी समस्त प्राणियोंका सुहृद् हो जाता है— “सुहृदः सर्वदेहिनाम्” (श्रीमद्भा0 3। 25। 21)। इसी तरह कर्मयोगकी दृष्टिसे जब मनुष्य राग-द्वेषको मिटा देता है, तब उसके स्वभावकी शुद्धि हो जाती है, जिससे अपने स्वार्थका भाव मिटकर केवल दुनियाके हितका भाव स्वतः हो जाता है। जैसे भगवान्का स्वभाव प्राणिमात्रका हित करनेका है, ऐसे ही उसका स्वभाव भी प्राणिमात्रका हित करनेका हो जाता है। जब उसकी सब चेष्टाएँ प्राणिमात्रके हितमें हो जाती हैं, तब उसकी भगवान्की सर्वभूतसुहृत्ता- शक्तिके साथ एकता हो जाती है। उसके उस स्वभावमें भगवान्की सुहृत्ता-शक्ति कार्य करने लगती है। वास्तवमें भगवान्की वह सर्वभूतसुहृत्ता-शक्ति मनुष्य- मात्रके लिये समान रीतिसे खुली हुई है; परन्तु अपने अहंकार और राग-द्वेषके कारण उस शक्तिमें बाधा लग जाती है अर्थात् वह शक्ति कार्य नहीं करती। महापुरुषोंमें अहंकार (व्यक्तित्व) और राग-द्वेष नहीं रहते, इसलिये उनमें यह शक्ति कार्य करने लग जाती है। संचित कर्म अनेक मनुष्य-जन्मोंमें किये हुए जो कर्म (फल-अंश और संस्कार-अंश) अन्तःकरणमें संगृहीत रहते हैं, वे संचित कर्म कहलाते हैं। उनमें फल-अंशसे तो “प्रारब्ध” बनता है और संस्कार-अंशसे “स्फुरणा” होती रहती है। उन स्फुरणाओंमें भी वर्तमानमें किये गये जो नये क्रियमाण कर्म संचितमें भरती हुए हैं, प्रायः उनकी ही स्फुरणा होती है। कभी-कभी संचितमें भरती हुए पुराने कर्मोंकी स्फुरणा भी हो जाती है1; जैसे किसी बर्तनमें पहले प्याज डाल दें और उसके ऊपर क्रमशः गेहूँ, चना, ज्वार, बाजरा डाल दें तो निकालते समय जो सबसे पीछे डाला था, वही (बाजरा) सबसे पहले निकलेगा, पर बीचमें कभी-कभी प्याजका भी भभका आ जायगा। परन्तु यह दृष्टान्त पूरा नहीं घटता; क्योंकि प्याज, गेहूँ आदि सावयव पदार्थ हैं और संचित कर्म निरवयव हैं। यह दृष्टान्त केवल इतने ही अंशमें बतानेके लिये दिया है कि नये क्रियमाण कर्मोंकी स्फुरणा ज्यादा होती है और कभी-कभी पुराने कर्मोंकी भी स्फुरणा होती है। इसी तरह जब नींद आती है तो उसमें भी स्फुरणा होती है। नींदमें जाग्रत्-अवस्थाके दब जानेके कारण संचितकी वह स्फुरणा स्वप्नरूपसे दीखने लग जाती है, उसीको स्वप्नावस्था कहते हैं2। स्वप्नावस्थामें बुद्धिकी सावधानी न रहनेके कारण क्रम, व्यतिक्रम और अनुक्रम ये नहीं रहते। जैसे, शहर तो दिल्लीका दीखता है और बाजार बम्बईका तथा उस बाजारमें दूकानें कलकत्ताकी दीखती हैं, कोई जीवित आदमी दीख जाता है अथवा किसी मरे हुए आदमीसे मिलना हो जाता है, बातचीत हो जाती है, आदि-आदि। जाग्रत्-अवस्थामें हरेक मनुष्यके मनमें अनेक तरहकी स्फुरणाएँ होती रहती हैं। जब जाग्रत्-अवस्थामें शरीर, इन्द्रियाँ और मनपरसे बुद्धिका अधिकार हट जाता है, तब मनुष्य जैसा मनमें आता है, वैसा बोलने लगता है। इस तरह उचित-अनुचितका विचार करनेकी शक्ति काम न करनेसे वह “सीधा-सरल पागल” कहलाता है। परन्तु जिसके शरीर, इन्द्रियाँ और मनपर बुद्धिका अधिकार रहता है, वह जो उचित समझता है, वही बोलता है और जो अनुचित समझता है, वह नहीं बोलता। बुद्धि सावधान रहनेसे वह सावचेत रहता है, इसलिये वह “चतुर पागल” है! इस प्रकार मनुष्य जबतक परमात्मप्राप्ति नहीं कर लेता, तबतक वह अपनेको स्फुरणाओंसे बचा नहीं सकता। परमात्मप्राप्ति होनेपर बुरी स्फुरणाएँ सर्वथा मिट जाती हैं। इसलिये जीवन्मुक्त महापुरुषके मनमें अपवित्र बुरे विचार कभी आते ही नहीं। अगर उसके कहलानेवाले शरीरमें प्रारब्धवश (व्याधि आदि किसी कारणवश) कभी बेहोशी, उन्माद आदि हो जाता है तो उसमें भी वह न तो शास्त्रनिषिद्ध बोलता है और न शास्त्रनिषिद्ध कुछ करता ही है; क्योंकि अन्तःकरण शुद्ध हो जानेसे शास्त्रनिषिद्ध बोलना या करना उसके स्वभावमें नहीं रहता। प्रारब्ध कर्म संचितमेंसे जो कर्म फल देनेके लिये सम्मुख होते हैं, उन कर्मोंको प्रारब्ध कर्म कहते हैं*। प्रारब्ध कर्मोंका फल तो अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितिके रूपमें सामने आता है; परन्तु उन प्रारब्ध कर्मोंको भोगनेके लिये प्राणियोंकी प्रवृत्ति तीन प्रकारसे होती है—(1) स्वेच्छापूर्वक, (2) अनिच्छा-(दैवेच्छा-) पूर्वक और (3) परेच्छापूर्वक। उदाहरणार्थ— (1) किसी व्यापारीने माल खरीदा तो उसमें मुनाफा हो गया। ऐसे ही किसी दूसरे व्यापारीने माल खरीदा तो उसमें घाटा लग गया। इन दोनोंमें मुनाफा होना और घाटा लगना तो उनके शुभ-अशुभकर्मोंसे बने हुए प्रारब्धके फल हैं; परन्तु माल खरीदनेमें उनकी प्रवृत्ति स्वेच्छापूर्वक हुई है। (2) कोई सज्जन कहीं जा रहा था तो आगे आनेवाली नदीमें बाढ़के प्रवाहके कारण एक धनका टोकरा बहकर आया और उस सज्जनने उसे निकाल लिया। ऐसे ही कोई सज्जन कहीं जा रहा था तो उसपर वृक्षकी एक टहनी गिर पड़ी और उसको चोट लग गयी। इन दोनोंमें धनका मिलना और चोट लगना तो उनके शुभ- अशुभकर्मोंसे बने हुए प्रारब्धके फल हैं; परन्तु धनका टोकरा मिलना और वृक्षकी टहनी गिरना—यह प्रवृत्ति अनिच्छा-(दैवेच्छा-) पूर्वक हुई है। (3) किसी धनी व्यक्तिने किसी बच्चेको गोद ले लिया अर्थात् उसको पुत्र-रूपमें स्वीकार कर लिया, जिससे उसका सब धन उस बच्चेको मिल गया। ऐसे ही चोरोंने किसीका सब धन लूट लिया। इन दोनोंमें बच्चेको धन मिलना और चोरीमें धनका चला जाना तो उनके शुभ-अशुभकर्मोंसे बने हुए प्रारब्धके फल हैं; परन्तु गोदमें जाना और चोरी होना—यह प्रवृत्ति परेच्छापूर्वक हुई है। यहाँ एक बात और समझ लेनी चाहिये कि कर्मोंका फल “कर्म” नहीं होता, प्रत्युत “परिस्थिति” होती है अर्थात् प्रारब्ध कर्मोंका फल परिस्थितिरूपसे सामने आता है। अगर नये (क्रियमाण) कर्मको प्रारब्धका फल मान लिया जाय तो फिर “ऐसा करो, ऐसा मत करो”—यह शास्त्रोंका, गुरुजनोंका विधि-निषेध निरर्थक हो जायगा। दूसरी बात, पहले जैसे कर्म किये थे, उन्हींके अनुसार जन्म होगा और उन्हींके अनुसार कर्म होंगे तो वे कर्म फिर आगे नये कर्म पैदा कर देंगे, जिससे यह कर्म-परम्परा चलती ही रहेगी अर्थात् इसका कभी अन्त ही नहीं आयेगा। प्रारब्ध कर्मसे मिलनेवाले फलके दो भेद हैं—प्राप्त फल और अप्राप्त फल। अभी प्राणियोंके सामने जो अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति आ रही है, वह “प्राप्त” फल है और इसी जन्ममें जो अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति भविष्यमें आनेवाली है वह “अप्राप्त” फल है। क्रियमाण कर्मोंका जो फल-अंश संचितमें जमा रहता है, वही प्रारब्ध बनकर अनुकूल, प्रतिकूल और मिश्रित परिस्थितिके रूपमें मनुष्यके सामने आता है। अतः जबतक संचित कर्म रहते हैं, तबतक प्रारब्ध बनता ही रहता है और प्रारब्ध परिस्थितिके रूपमें परिणत होता ही रहता है। यह परिस्थिति मनुष्यको सुखी-दुःखी होनेके लिये बाध्य नहीं करती। सुखी-दुःखी होनेमें तो परिवर्तनशील परिस्थितिके साथ सम्बन्ध जोड़ना ही मुख्य कारण है। परिस्थितिके साथ सम्बन्ध जोड़ने अथवा न जोड़नेमें यह मनुष्य सर्वथा स्वाधीन है, पराधीन नहीं है। जो परिवर्तनशील परिस्थितिके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, वह अविवेकी पुरुष तो सुखी-दुःखी होता ही रहता है। परन्तु जो परिस्थितिके साथ सम्बन्ध नहीं मानता, वह विवेकी पुरुष कभी सुखी- दुःखी नहीं होता; अतः उसकी स्थिति स्वतः साम्यावस्थामें होती है, जो कि उसका स्वरूप है। कर्मोंमें मनुष्यके प्रारब्धकी प्रधानता है या पुरुषार्थकी? अथवा प्रारब्ध बलवान् है या पुरुषार्थ?—इस विषयमें बहुत-सी शंकाएँ हुआ करती हैं। उनके समाधानके लिये पहले यह समझ लेना जरूरी है कि प्रारब्ध और पुरुषार्थ क्या है? मनुष्यमें चार तरहकी चाहना हुआ करती है—एक धनकी, दूसरी धर्मकी, तीसरी भोगकी और चौथी मुक्तिकी। प्रचलित भाषामें इन्हीं चारोंको अर्थ, धर्म, काम और मोक्षके नामसे कहा जाता है— (1) अर्थ—धनको “अर्थ” कहते हैं। वह धन दो तरहका होता है—स्थावर और जंगम। सोना, चाँदी, रुपये, जमीन, जायदाद, मकान आदि स्थावर हैं और गाय, भैंस, घोड़ा, ऊँट, भेड़, बकरी आदि जंगम हैं। (2) धर्म—सकाम अथवा निष्कामभावसे जो यज्ञ, तप, दान, व्रत, तीर्थ आदि किये जाते हैं, उसको “धर्म” कहते हैं। (3) काम—सांसारिक सुख-भोगको “काम” कहते हैं। वह सुखभोग आठ तरहका होता है—शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, मान, बड़ाई और आराम। (क) शब्द—शब्द दो तरहका होता है—वर्णात्मक और ध्वन्यात्मक। व्याकरण, कोश, साहित्य, उपन्यास, गल्प, कहानी आदि “वर्णात्मक” शब्द हैं1। खाल, तार और फूँकके तीन बाजे और तालका आधा बाजा—ये साढ़े तीन प्रकारके बाजे “ध्वन्यात्मक” शब्दको प्रकट करनेवाले हैं2। इन वर्णात्मक और ध्वन्यात्मक शब्दोंको सुननेसे जो सुख मिलता है, वह शब्दका सुख है। (ख) स्पर्श—स्त्री, पुत्र, मित्र आदिके साथ मिलनेसे तथा ठण्डा, गरम, कोमल आदिसे अर्थात् उनका त्वचाके साथ संयोग होनेसे जो सुख होता है, वह स्पर्शका सुख है। (ग) रूप—नेत्रोंसे खेल, तमाशा, सिनेमा, बाजीगरी, वन, पहाड़, सरोवर, मकान आदिकी सुन्दरताको देखकर जो सुख होता है, वह रूपका सुख है। (घ) रस—मधुर (मीठा), अम्ल (खट्टा), लवण (नमकीन), कटु (कड़वा), तिक्त (तीखा) और कषाय (कसैला)—इन छः रसोंको चखनेसे जो सुख होता है, वह रसका सुख है। (ङ) गन्ध—नाकसे अतर, तेल, फुलेल, लवेण्डर, पुष्प आदि सुगन्धवाले और लहसुन, प्याज आदि दुर्गन्धवाले पदार्थोंको सूँघनेसे जो सुख होता है, वह गन्धका सुख है। (च) मान—शरीरका आदर-सत्कार होनेसे जो सुख होता है, वह मानका सुख है। (छ) बड़ाई—नामकी प्रशंसा, वाह-वाह होनेसे जो सुख होता है, वह बड़ाईका सुख है। (ज) आराम—शरीरसे परिश्रम न करनेसे अर्थात् निकम्मे पड़े रहनेसे जो सुख होता है, वह आरामका सुख है। (4) मोक्ष—आत्मसाक्षात्कार, तत्त्वज्ञान, कल्याण, उद्धार, मुक्ति, भगवद्दर्शन, भगवत्प्रेम आदिका नाम “मोक्ष” है। इन चारों (अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष)-में देखा जाय तो अर्थ और धर्म—दोनों ही परस्पर एक-दूसरेकी वृद्धि करनेवाले हैं अर्थात् अर्थसे धर्मकी और धर्मसे अर्थकी वृद्धि होती है। परन्तु धर्मका पालन कामनापूर्तिके लिये किया जाय तो वह धर्म भी कामनापूर्ति करके नष्ट हो जाता है और अर्थको कामनापूर्तिमें लगाया जाय तो वह अर्थ भी कामनापूर्ति करके नष्ट हो जाता है। तात्पर्य है कि कामना धर्म और अर्थ—दोनोंको खा जाती है। इसीलिये गीतामें भगवान्ने कामनाको “महाशन” (बहुत खानेवाला) बताते हुए उसके त्यागकी बात विशेषतासे कही है (तीसरे अध्यायके सैंतीसवेंसे तैंतालीसवें श्लोकतक)। यदि धर्मका अनुष्ठान कामनाका त्याग करके किया जाय तो वह अन्तःकरण शुद्ध करके मुक्त कर देता है। ऐसे ही धनको कामनाका त्याग करके दूसरोंके उपकारमें, हितमें, सुखमें खर्च किया जाय तो वह भी अन्तःकरण शुद्ध करके मुक्त कर देता है। अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष—इन चारोंमें “अर्थ” (धन) और “काम” (भोग)-की प्राप्तिमें प्रारब्धकी मुख्यता और पुरुषार्थकी गौणता है तथा “धर्म” और “मोक्ष” में पुरुषार्थकी मुख्यता और प्रारब्धकी गौणता है। प्रारब्ध और पुरुषार्थ—दोनोंका क्षेत्र अलग-अलग है और दोनों ही अपने-अपने क्षेत्रमें प्रधान हैं। इसलिये कहा है— संतोषस्त्रिषु कर्तव्यः स्वदारे भोजने धने। त्रिषु चैव न कर्तव्यः स्वाध्याये जपदानयोः॥ अर्थात् अपनी स्त्री, पुत्र, परिवार, भोजन और धनमें तो सन्तोष करना चाहिये और स्वाध्याय, पाठ-पूजा, नाम- जप, कीर्तन और दान करनेमें कभी सन्तोष नहीं करना चाहिये। तात्पर्य यह हुआ कि प्रारब्धके फल—धन और भोगमें तो सन्तोष करना चाहिये; क्योंकि वे प्रारब्धके अनुसार जितने मिलनेवाले हैं, उतने ही मिलेंगे, उससे अधिक नहीं। परन्तु धर्मका अनुष्ठान और अपना कल्याण करनेमें कभी सन्तोष नहीं करना चाहिये; क्योंकि यह नया पुरुषार्थ है और इसी पुरुषार्थके लिये मनुष्यशरीर मिला है। कर्मके दो भेद हैं—शुभ (पुण्य) और अशुभ (पाप)। शुभकर्मका फल अनुकूल परिस्थिति प्राप्त होना है और अशुभकर्मका फल प्रतिकूल परिस्थिति प्राप्त होना है। कर्म बाहरसे किये जाते हैं, इसलिये उन कर्मोंका फल भी बाहरकी परिस्थितिके रूपमें ही प्राप्त होता है। परन्तु उन परिस्थितियोंसे जो सुख-दुःख होते हैं, वे भीतर होते हैं। इसलिये उन परिस्थितियोंमें सुखी तथा दुःखी होना शुभाशुभकर्मोंका अर्थात् प्रारब्धका फल नहीं है, प्रत्युत अपनी मूर्खताका फल है। अगर वह मूर्खता चली जाय, भगवान्पर1 अथवा प्रारब्धपर2 विश्वास हो जाय तो प्रतिकूल-से-प्रतिकूल परिस्थिति आनेपर भी चित्तमें प्रसन्नता होगी, हर्ष होगा। कारण कि प्रतिकूल परिस्थितिमें पाप कटते हैं, आगे पाप न करनेमें सावधानी आती है और पापोंके नष्ट होनेसे अन्तःकरणकी शुद्धि होती है। साधकको अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितिका सदुपयोग करना चाहिये, दुरुपयोग नहीं। अनुकूल परिस्थिति आ जाय तो अनुकूल सामग्रीको दूसरोंके हितके लिये सेवाबुद्धिसे खर्च करना अनुकूल परिस्थितिका सदुपयोग है और उसका सुख-बुद्धिसे भोग करना दुरुपयोग है। ऐसे ही प्रतिकूल परिस्थिति आ जाय तो सुखकी इच्छाका त्याग करना और “मेरे पूर्वकृत पापोंका नाश करनेके लिये, भविष्यमें पाप न करनेकी सावधानी रखनेके लिये और मेरी उन्नति करनेके लिये ही प्रभु-कृपासे ऐसी परिस्थिति आयी है”—ऐसा समझकर परम प्रसन्न रहना प्रतिकूल परिस्थितिका सदुपयोग है और उससे दुःखी होना दुरुपयोग है। मनुष्यशरीर सुख-दुःख भोगनेके लिये नहीं है। सुख भोगनेके स्थान स्वर्गादिक हैं और दुःख भोगनेके स्थान नरक तथा चौरासी लाख योनियाँ हैं। इसलिये वे भोगयोनियाँ हैं और मनुष्य कर्मयोनि है। परन्तु यह कर्मयोनि उनके लिये है जो मनुष्यशरीरमें सावधान नहीं होते, केवल जन्म-मरणके सामान्य प्रवाहमें ही पड़े हुए हैं। वास्तवमें मनुष्यशरीर सुख-दुःखसे ऊँचा उठनेके लिये अर्थात् मुक्तिकी प्राप्तिके लिये ही मिला है। इसलिये इसको कर्मयोनि न कहकर “साधनयोनि” ही कहना चाहिये। प्रारब्ध-कर्मोंके फलस्वरूप जो अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थिति आती है, उन दोनोंमें अनुकूल परिस्थितिका स्वरूपसे त्याग करनेमें तो मनुष्य स्वतन्त्र है, पर प्रतिकूल परिस्थितिका स्वरूपसे त्याग करनेमें मनुष्य परतन्त्र है अर्थात् उसका स्वरूपसे त्याग नहीं किया जा सकता। कारण यह है कि अनुकूल परिस्थिति दूसरोंका हित करने, उन्हें सुख देनेके फलस्वरूप बनी है और प्रतिकूल परिस्थिति दूसरोंको दुःख देनेके फलस्वरूप बनी है। इसको एक दृष्टान्तसे इस प्रकार समझ सकते हैं— श्यामलालने रामलालको सौ रुपये उधार दिये। रामलालने वायदा किया कि अमुक महीने मैं ब्याजसहित रुपये लौटा दूँगा। महीना बीत गया, पर रामलालने रुपये नहीं लौटाये तो श्यामलाल रामलालके घर पहुँचा और बोला—“तुमने वायदेके अनुसार रुपये नहीं दिये! अब दो।” रामलालने कहा—“अभी मेरे पास रुपये नहीं हैं, परसों दे दूँगा।” श्यामलाल तीसरे दिन पहुँचा और बोला— “लाओ मेरे रुपये!” रामलालने कहा— “अभी मैं आपके पैसे नहीं जुटा सका, परसों आपके रुपये जरूर दूँगा।” तीसरे दिन फिर श्यामलाल पहुँचा और बोला—“रुपये दो!” तो रामलालने कहा—“कल जरूर दूँगा।” दूसरे दिन श्यामलाल फिर पहुँचा और बोला— “लाओ मेरे रुपये!” रामलालने कहा—“रुपये जुटे नहीं, मेरे पास रुपये हैं नहीं, तो मैं कहाँसे दूँ? परसों आना।” रामलालकी बातें सुनकर श्यामलालको गुस्सा आ गया और “परसों-परसों करता है, रुपये देता नहीं”—ऐसा कहकर उसने रामलालको पाँच जूते मार दिये। रामलालने कोर्टमें नालिश (शिकायत) कर दी। श्यामलालको बुलाया गया और पूछा गया—“तुमने इसके घरपर जाकर जूता मारा है?” तो श्यामलालने कहा—“हाँ साहब, मैंने जूता मारा है।” मैजिस्ट्रेटने पूछा—“क्यों मारा?” श्यामलालने कहा—“इसको मैंने रुपये दिये थे और इसने वायदा किया था कि मैं इस महीने रुपये लौटा दूँगा। महीना बीत जानेपर मैंने इसके घरपर जाकर रुपये माँगे तो कल-परसों,कल-परसों कहकर इसने मुझे बहुत तंग किया। इसपर मैंने गुस्सेमें आकर इसे पाँच जूते मार दिये। तो सरकार! पाँच जूतोंके पाँच रुपये काटकर शेष रुपये मुझे दिला दीजिये।” मैजिस्ट्रेटने हँसकर कहा—“यह फौजदारी कोर्ट है। यहाँ रुपये दिलानेका कायदा (नियम) नहीं है। यहाँ दण्ड देनेका कायदा है। इसलिये आपको जूता मारनेके बदलेमें कैद या जुर्माना भोगना ही पड़ेगा। आपको रुपये लेने हों तो दीवानी कोर्टमें जाकर नालिश करो, वहाँ रुपये दिलानेका कायदा है; क्योंकि वह विभाग अलग है।” इस तरह अशुभकर्मोंका फल जो प्रतिकूल परिस्थिति है, वह “फौजदारी” है, इसलिये उसका स्वरूपसे त्याग नहीं कर सकते और शुभकर्मोंका फल जो अनुकूल परिस्थिति है, वह “दीवानी” है, इसलिये उसका स्वरूपसे त्याग किया जा सकता है। इससे यह सिद्ध हुआ कि मनुष्यके शुभ-अशुभ- कर्मोंका विभाग अलग-अलग है। इसलिये शुभकर्मों (पुण्यों) और अशुभकर्मों-(पापों-)का अलग-अलग संग्रह होता है। स्वाभाविकरूपसे ये दोनों एक-दूसरेसे कटते नहीं अर्थात् पापोंसे पुण्य नहीं कटते और पुण्योंसे पाप नहीं कटते। हाँ, अगर मनुष्य पाप काटनेके उद्देश्यसे (प्रायश्चित्तरूपसे) शुभकर्म करता है, तो उसके पाप कट सकते हैं। संसारमें एक आदमी पुण्यात्मा है, सदाचारी है और दुःख पा रहा है तथा एक आदमी पापात्मा है, दुराचारी है और सुख भोग रहा है—इस बातको लेकर अच्छे-अच्छे पुरुषोंके भीतर भी यह शंका हो जाया करती है कि इसमें ईश्वरका न्याय कहाँ है*। इसका समाधान यह है कि अभी पुण्यात्मा जो दुःख पा रहा है, यह पूर्वके किसी जन्ममें किये हुए पापका फल है, अभी किये हुए पुण्यका नहीं। ऐसे ही अभी पापात्मा जो सुख भोग रहा है, यह भी पूर्वके किसी जन्ममें किये हुए पुण्यका फल है, अभी किये हुए पापका नहीं। इसमें एक तात्त्विक बात और है। कर्मोंके फलरूपमें जो अनुकूल परिस्थिति आती है, उससे सुख ही होता है और प्रतिकूल परिस्थिति आती है, उससे दुःख ही होता है—ऐसी बात है नहीं। जैसे, अनुकूल परिस्थिति आनेपर मनमें अभिमान होता है, छोटोंसे घृणा होती है, अपनेसे अधिक सम्पत्तिवालोंको देखकर उनसे ईर्ष्या होती है, असहिष्णुता होती है, अन्तःकरणमें जलन होती है और मनमें ऐसे दुर्भाव आते हैं कि उनकी सम्पत्ति कैसे नष्ट हो तथा वक्तपर उनको नीचा दिखानेकी चेष्टा भी होती है। इस तरह सुख-सामग्री और धन-सम्पत्ति पासमें रहनेपर भी वह सुखी नहीं हो सकता। परन्तु बाहरी सामग्रीको देखकर अन्य लोगोंको यह भ्रम होता है कि वह बड़ा सुखी है। ऐसे ही किसी विरक्त और त्यागी मनुष्यको देखकर भोग- सामग्रीवाले मनुष्यको उसपर दया आती है कि बेचारेके पास धन-सम्पत्ति आदि सामग्री नहीं है, बेचारा बड़ा दुःखी है! परन्तु वास्तवमें विरक्तके मनमें बड़ी शान्ति और बड़ी प्रसन्नता रहती है। वह शान्ति और प्रसन्नता धनके कारण किसी धनीमें नहीं रह सकती। इसलिये धनका होनामात्र सुख नहीं है और धनका अभावमात्र दुःख नहीं है। सुख नाम हृदयकी शान्ति और प्रसन्नताका है और दुःख नाम हृदयकी जलन और सन्तापका है। पुण्य और पापका फल भोगनेमें एक नियम नहीं है। पुण्य तो निष्कामभावसे भगवान्के अर्पण करनेसे समाप्त हो सकता है; परन्तु पाप भगवान्के अर्पण करनेसे समाप्त नहीं होता। पापका फल तो भोगना ही पड़ता है; क्योंकि भगवान्की आज्ञाके विरुद्ध किये हुए कर्म भगवान्के अर्पण कैसे हो सकते हैं? और अर्पण करनेवाला भी भगवान्के विरुद्ध कर्मोंको भगवान्के अर्पण कैसे कर सकता है? प्रत्युत भगवान्की आज्ञाके अनुसार किये हुए कर्म ही भगवान्के अर्पण होते हैं। इस विषयमें एक कहानी आती है। एक राजा अपनी प्रजासहित हरिद्वार गया। उसके साथमें सब तरहके लोग थे। उनमें एक चमार भी था। उस चमारने सोचा कि ये बनिये लोग बड़े चतुर होते हैं। ये अपनी बुद्धिमानीसे धनी बन गये हैं। अगर हम भी उनकी बुद्धिमानीके अनुसार चलें तो हम भी धनी बन जायँ! ऐसा विचार करके वह एक चतुर बनियेकी क्रियाओंपर निगरानी रखकर चलने लगा। जब हरिद्वारके ब्रह्मकुण्डमें पण्डा दान-पुण्यका संकल्प कराने लगा, तब उस बनियेने कहा—“मैंने अमुक ब्राह्मणको सौ रुपये उधार दिये थे, आज मैं उनको दानरूपमें श्रीकृष्णार्पण करता हूँ!” पण्डेने संकल्प भरवा दिया। चमारने देखा कि इसने एक कौड़ी भी नहीं दी और लोगोंमें प्रसिद्ध हो गया कि इसने सौ रुपयोंका दान कर दिया, कितना बुद्धिमान् है! मैं भी इससे कम नहीं रहूँगा। जब पण्डेने चमारसे संकल्प भरवाना शुरू किया, तब चमारने कहा—“अमुक बनियेने मुझे सौ रुपये उधार दिये थे तो उन सौ रुपयोंको मैं श्रीकृष्णार्पण करता हूँ।” उसकी ग्रामीण बोलीको पण्डा पूरी तरह समझा नहीं और संकल्प भरवा दिया। इससे चमार बड़ा खुश हो गया कि मैंने भी बनियेके समान सौ रुपयोंका दान-पुण्य कर दिया! सब घर पहुँचे। समयपर खेती हुई। ब्राह्मण और चमारके खेतोंमें खूब अनाज पैदा हुआ। ब्राह्मण देवताने बनियेसे कहा—“सेठ! आप चाहें तो सौ रुपयोंका अनाज ले लो, इससे आपको नफा भी हो सकता है। मुझे तो आपका कर्जा चुकाना है।” बनियेने कहा—“ब्राह्मण देवता! जब मैं हरिद्वार गया था, तब मैंने आपको उधार दिये हुए सौ रुपये दान कर दिये।” ब्राह्मण बोला—“सेठ! मैंने आपसे सौ रुपये उधार लिये हैं, दान नहीं लिये। इसलिये इन रुपयोंको मैं रखना नहीं चाहता, ब्याजसहित पूरा चुकाना चाहता हूँ।” सेठने कहा—“आप देना ही चाहते हैं तो अपनी बहन अथवा कन्याको दे सकते हैं। मैंने सौ रुपये भगवान्के अर्पण कर दिये हैं, इसलिये मैं तो लूँगा नहीं।” अब ब्राह्मण और क्या करता? वह अपने घर लौट गया। अब जिस बनियेसे चमारने सौ रुपये लिये थे, वह बनिया चमारके खेतमें पहुँचा और बोला—“लाओ मेरे रुपये। तुम्हारा अनाज हुआ है, सौ रुपयोंका अनाज ही दे दो।” चमारने सुन रखा था कि ब्राह्मणके देनेपर भी बनियेने उससे रुपये नहीं लिये। अतः उसने सोचा कि मैंने भी संकल्प कर रखा है तो मेरेको रुपये क्यों देने पड़ेंगे? ऐसा सोचकर चमार बनियेसे बोला—“मैंने तो अमुक सेठकी तरह गंगाजीमें खड़े होकर सब रुपये श्रीकृष्णार्पण कर दिये, तो मेरेको रुपये क्यों देने पड़ेंगे?” बनिया बोला—“तेरे अर्पण कर देनेसे कर्जा नहीं छूट सकता; क्योंकि तूने मेरेसे कर्जा लिया है तो तेरे छोड़नेसे कैसे छूट जायगा? मैं तो अपने सौ रुपये ब्याजसहित पूरे लूँगा; लाओ मेरे रुपये!” ऐसा कहकर उसने चमारसे अपने रुपयोंका अनाज ले लिया। इस कहानीसे यह सिद्ध होता है कि हमारेपर दूसरोंका जो कर्जा है, वह हमारे छोड़नेसे नहीं छूट सकता। ऐसे ही हम भगवदाज्ञानुसार शुभकर्मोंको तो भगवान्के अर्पण करके उनके बन्धनसे छूट सकते हैं, पर अशुभकर्मोंका फल तो हमारेको भोगना ही पड़ेगा। इसलिये शुभ और अशुभ- कर्मोंमें एक कायदा, कानून नहीं है। अगर ऐसा नियम बन जाय कि भगवान्के अर्पण करनेसे ऋण और पाप-कर्म छूट जायँ तो फिर सभी प्राणी मुक्त हो जायँ; परन्तु ऐसा सम्भव नहीं है। हाँ, इसमें एक मार्मिक बात है कि अपने- आपको सर्वथा भगवान्के अर्पित कर देनेपर अर्थात् सर्वथा भगवान्के शरण हो जानेपर पाप-पुण्य सर्वथा नष्ट हो जाते हैं (गीता—अठारहवें अध्यायका छाछठवाँ श्लोक)। दूसरी शंका यह होती है कि धन और भोगोंकी प्राप्ति प्रारब्ध कर्मके अनुसार होती है—ऐसी बात समझमें नहीं आती; क्योंकि हम देखते हैं कि इनकम-टैक्स, सेल्स-टैक्स आदिकी चोरी करते हैं तो धन बच जाता है और टैक्स पूरा देते हैं तो धन चला जाता है तो धनका आना-जाना प्रारब्धके अधीन कहाँ हुआ? यह तो चोरीके ही अधीन हुआ! इसका समाधान इस प्रकार है। वास्तवमें धन प्राप्त करना और भोग भोगना—इन दोनोंमें ही प्रारब्धकी प्रधानता है। परन्तु इन दोनोंमें भी किसीका धन-प्राप्तिका प्रारब्ध होता है, भोगका नहीं और किसीका भोगका प्रारब्ध होता है, धन- प्राप्तिका नहीं तथा किसीका धन और भोग दोनोंका ही प्रारब्ध होता है। जिसका धन-प्राप्तिका प्रारब्ध तो है, पर भोगका प्रारब्ध नहीं है, उसके पास लाखों रुपये रहनेपर भी बीमारीके कारण वैद्य, डॉक्टरके मना करनेपर वह भोगोंको भोग नहीं सकता, उसको खानेमें रूखा-सूखा ही मिलता है। जिसका भोगका प्रारब्ध तो है, पर धनका प्रारब्ध नहीं है, उसके पास धनका अभाव होनेपर भी उसके सुख-आराममें किसी तरहकी कमी नहीं रहती1। उसको किसीकी दयासे, मित्रतासे, काम-धंधा मिल जानेसे प्रारब्धके अनुसार जीवन- निर्वाहकी सामग्री मिलती रहती है। अगर धनका प्रारब्ध नहीं है तो चोरी करनेपर भी धन नहीं मिलेगा, प्रत्युत चोरी किसी प्रकारसे प्रकट हो जायगी तो बचा हुआ धन भी चला जायगा तथा दण्ड और मिलेगा। यहाँ दण्ड मिले या न मिले, पर परलोकमें तो दण्ड जरूर मिलेगा। उससे वह बच नहीं सकेगा। अगर प्रारब्धवश चोरी करनेसे धन मिल भी जाय तो भी उस धनका उपभोग नहीं हो सकेगा। वह धन बीमारीमें, चोरीमें, डाकेमें, मुकदमेमें, ठगाईमें चला जायगा। तात्पर्य यह है कि वह धन जितने दिन टिकनेवाला है, उतने ही दिन टिकेगा और फिर नष्ट हो जायगा। इतना ही नहीं, इनकम-टैक्स आदिकी चोरी करनेके जो संस्कार भीतर पड़े हैं, वे संस्कार जन्म-जन्मान्तरतक उसे चोरी करनेके लिये उकसाते रहेंगे और वह उनके कारण दण्ड पाता रहेगा। अगर धनका प्रारब्ध है तो कोई गोद ले लेगा अथवा मरता हुआ कोई व्यक्ति उसके नामसे वसीयतनामा लिख देगा अथवा मकान बनाते समय नींव खोदते ही जमीनमें गड़ा हुआ धन मिल जायगा, आदि-आदि। इस प्रकार प्रारब्धके अनुसार जो धन मिलनेवाला है, वह किसी-न-किसी कारणसे मिलेगा ही2। परन्तु मनुष्य प्रारब्धपर तो विश्वास करता नहीं, कम-से-कम अपने पुरुषार्थपर भी विश्वास नहीं करता कि हम मेहनतसे कमाकर खा लेंगे। इसी कारण उसकी चोरी आदि दुष्कर्मोंमें प्रवृत्ति हो जाती है, जिससे हृदयमें जलन रहती है, दूसरोंसे छिपाव करना पड़ता है, पकड़े जानेपर दण्ड पाना पड़ता है, आदि-आदि। अगर मनुष्य विश्वास और सन्तोष रखे तो हृदयमें महान् शान्ति, आनन्द, प्रसन्नता रहती है तथा आनेवाला धन भी आ जाता है और जितना जीनेका प्रारब्ध है, उतनी जीवन-निर्वाहकी सामग्री भी किसी-न-किसी तरह मिलती ही रहती है। जैसे व्यापारमें घाटा लगना, घरमें किसीकी मृत्यु होना, बिना कारण अपयश और अपमान होना आदि प्रतिकूल परिस्थितिको कोई भी नहीं चाहता, पर फिर भी वह आती ही है, ऐसे ही अनुकूल परिस्थिति भी आती ही है, उसको कोई रोक नहीं सकता। भागवतमें आया है— सुखमैन्द्रियकं राजन् स्वर्गे नरक एव च। देहिनां यद् यथा दुःखं तस्मान्नेच्छेत तद् बुधः॥ “राजन्! प्राणियोंको जैसे इच्छाके बिना प्रारब्धानुसार दुःख प्राप्त होते हैं, ऐसे ही इन्द्रियजन्य सुख स्वर्गमें और नरकमें भी प्राप्त होते हैं। अतः बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह उन सुखोंकी इच्छा न करे।” जैसे धन और भोगका प्रारब्ध अलग-अलग होता है अर्थात् किसीका धनका प्रारब्ध होता है और किसीका भोगका प्रारब्ध होता है, ऐसे ही धर्म और मोक्षका पुरुषार्थ भी अलग-अलग होता है अर्थात् कोई धर्मके लिये पुरुषार्थ करता है और कोई मोक्षके लिये पुरुषार्थ करता है। धर्मके अनुष्ठानमें शरीर, धन आदि वस्तुओंकी मुख्यता रहती है और मोक्षकी प्राप्तिमें भाव तथा विचारकी मुख्यता रहती है। एक “करना” होता है और एक “होना” होता है। दोनों विभाग अलग-अलग हैं। करनेकी चीज है—कर्तव्य और होनेकी चीज है—फल। मनुष्यका कर्म करनेमें अधिकार है, फलमें नहीं—“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” (गीता 2। 47)। तात्पर्य यह है कि होनेकी पूर्ति प्रारब्धके अनुसार अवश्य होती है, उसके लिये “यह होना चाहिये और यह नहीं होना चाहिये”—ऐसी इच्छा नहीं करनी चाहिये और करनेमें शास्त्र तथा लोक-मर्यादाके अनुसार कर्तव्य-कर्म करना चाहिये। “करना” पुरुषार्थके अधीन है और “होना” प्रारब्धके अधीन है। इसलिये मनुष्य करनेमें स्वाधीन है और होनेमें पराधीन है। मनुष्यकी उन्नतिमें खास बात है—“करनेमें सावधान रहे और होनेमें प्रसन्न रहे।” क्रियमाण, संचित और प्रारब्ध—तीनों कर्मोंसे मुक्त होनेका क्या उपाय है? प्रकृति और पुरुष—ये दो हैं। प्रकृति सदा क्रियाशील है, पर पुरुषमें कभी परिवर्तनरूप क्रिया नहीं होती। प्रकृतिसे अपना सम्बन्ध माननेवाला “प्रकृतिस्थ” पुरुष ही कर्ता-भोक्ता बनता है। जब वह प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेद कर लेता है अर्थात् अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है, तब उसपर कोई भी कर्म लागू नहीं होता। प्रारब्ध-सम्बन्धी अन्य बातें इस प्रकार हैं— (1) बोध हो जानेपर भी ज्ञानीका प्रारब्ध रहता है— यह कथन केवल अज्ञानियोंको समझानेमात्रके लिये है। कारण कि अनुकूल या प्रतिकूल घटनाका घट जाना ही प्रारब्ध है। प्राणीको सुखी या दुःखी करना प्रारब्धका काम नहीं है, प्रत्युत अज्ञानका काम है। अज्ञान मिटनेपर मनुष्य सुखी-दुःखी नहीं होता। उसे केवल अनुकूलता-प्रतिकूलताका ज्ञान होता है। ज्ञान होना दोषी नहीं है, प्रत्युत सुख-दुःखरूप विकार होना दोषी है। इसलिये वास्तवमें ज्ञानीका प्रारब्ध नहीं होता। (2) जैसा प्रारब्ध होता है, वैसी बुद्धि बन जाती है। जैसे, एक ही बाजारमें एक व्यापारी मालकी बिक्री कर देता है और एक व्यापारी माल खरीद लेता है। बादमें जब बाजार-भाव तेज हो जाता है, तब बिक्री करनेवाले व्यापारीको नुकसान होता है तथा खरीदनेवाले व्यापारीको नफा होता है; और जब बाजार-भाव मन्दा हो जाता है, तब बिक्री करनेवाले व्यापारीको नफा होता है तथा खरीदनेवाले व्यापारीको नुकसान होता है। अतः खरीदने और बेचनेकी बुद्धि प्रारब्धसे बनती है अर्थात् नफा या नुकसानका जैसा प्रारब्ध होता है, उसीके अनुसार पहले बुद्धि बन जाती है, जिससे प्रारब्धके अनुसार फल भुगताया जा सके। परन्तु खरीदने और बेचनेकी क्रिया न्याययुक्त की जाय अथवा अन्याययुक्त की जाय—इसमें मनुष्य स्वतन्त्र है; क्योंकि यह क्रियमाण (नया कर्म) है, प्रारब्ध नहीं। (3) एक आदमीके हाथसे गिलास गिरकर टूट गया तो यह उसकी असावधानी है या प्रारब्ध? कर्म करते समय तो सावधान रहना चाहिये, पर जो (अच्छा या बुरा) हो गया, उसे पूरी तरहसे प्रारब्ध— होनहार ही मानना चाहिये। उस समय जो यह कहते हैं कि यदि तू सावधानी रखता तो गिलास न टूटता—इससे यह समझना चाहिये कि अब आगेसे मुझे सावधानी रखनी है कि दुबारा ऐसी गलती न हो जाय। वास्तवमें जो हो गया, उसे असावधानी न मानकर होनहार मानना चाहिये। इसलिये करनेमें सावधान और होनेमें प्रसन्न रहे। (4) प्रारब्धसे होनेवाले और कुपथ्यसे होनेवाले रोगमें क्या फरक है? कुपथ्यजन्य रोग दवाईसे मिट सकता है; परन्तु प्रारब्धजन्य रोग दवाईसे नहीं मिटता। महामृत्युंजय आदिका जप और यज्ञ-यागादि अनुष्ठान करनेसे प्रारब्धजन्य रोग भी कट सकता है, अगर अनुष्ठान प्रबल हो तो। रोगके दो प्रकार हैं—आधि (मानसिक रोग) और व्याधि (शारीरिक रोग)। आधिके भी दो भेद हैं—एक तो शोक, चिन्ता आदि और दूसरा पागलपन। चिन्ता, शोक आदि तो अज्ञानसे होते हैं और पागलपन प्रारब्धसे होता है। अतः ज्ञान होनेपर चिन्ता-शोकादि तो मिट जाते हैं, पर प्रारब्धके अनुसार पागलपन हो सकता है। हाँ, पागलपन होनेपर भी ज्ञानीके द्वारा कोई अनुचित, शास्त्रनिषिद्ध क्रिया नहीं होती। (5) आकस्मिक मृत्यु और अकाल मृत्युमें क्या फरक है? कोई व्यक्ति साँप काटनेसे मर जाय, अचानक ऊपरसे गिरकर मर जाय, पानीमें डूबकर मर जाय, हार्टफेल होनेसे मर जाय, किसी दुर्घटना आदिसे मर जाय, तो यह उसकी “आकस्मिक मृत्यु” है। स्वाभाविक मृत्युकी तरह आकस्मिक मृत्यु भी प्रारब्धके अनुसार (आयु पूरी होनेपर) होती है। कोई व्यक्ति जानकर आत्महत्या कर ले अर्थात् फाँसी लगाकर, कुएँमें कूदकर, गाड़ीके नीचे आकर, छतसे कूदकर, जहर खाकर, शरीरमें आग लगाकर मर जाय, तो यह उसकी “अकाल मृत्यु” है। यह मृत्यु आयुके रहते हुए ही होती है। आत्महत्या करनेवालेको मनुष्यकी हत्याका पाप लगता है। अतः यह नया पाप-कर्म है, प्रारब्ध नहीं। मनुष्यशरीर परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है; अतः उसको आत्महत्या करके नष्ट करना बड़ा भारी पाप है। कई बार आत्महत्या करनेकी चेष्टा करनेपर भी मनुष्य बच जाता है, मरता नहीं। इसका कारण यह है कि उसका दूसरे मनुष्यके प्रारब्धके साथ सम्बन्ध जुड़ा हुआ रहता है; अतः उसके प्रारब्धके कारण वह बच जाता है। जैसे, भविष्यमें किसीका पुत्र होनेवाला है और वह आत्महत्या करनेका प्रयास करे तो उस (आगे होनेवाले) लड़केका प्रारब्ध उसको मरने नहीं देगा। अगर उस व्यक्तिके द्वारा भविष्यमें कोई विशेष अच्छा काम होनेवाला हो, लोगोंका उपकार होनेवाला हो अथवा इसी जन्ममें, इसी शरीरमें प्रारब्धका कोई उत्कट भोग (सुख-दुःख) आनेवाला हो, तो आत्महत्याका प्रयास करनेपर भी वह मरेगा नहीं। (6) एक आदमीने दूसरे आदमीको मार दिया तो यह उसने पिछले जन्मके वैरका बदला लिया और मरनेवालेने पुराने कर्मोंका फल पाया, फिर मारनेवालेका क्या दोष? मारनेवालेका दोष है। दण्ड देना शासकका काम है, सर्वसाधारणका नहीं। एक आदमीको दस बजे फाँसी मिलनी है। एक-दूसरे आदमीने उस (फाँसीकी सजा पानेवाले) आदमीको जल्लादोंके हाथोंसे छुड़ा लिया और ठीक दस बजे उसे कत्ल कर दिया! ऐसी हालतमें उस कत्ल करनेवाले आदमीको भी फाँसी होगी कि यह आज्ञा तो राज्यने जल्लादोंको दी थी, पर तुम्हें किसने आज्ञा दी थी? मारनेवालेको यह याद नहीं है कि मैं पूर्वजन्मका बदला ले रहा हूँ, फिर भी मारता है तो यह उसका दोष है। दूसरेको मारनेका अधिकार किसीको भी नहीं है। मरना कोई भी नहीं चाहता। दूसरेको मारना अपने विवेकका अनादर है। मनुष्यमात्रको विवेकशक्ति प्राप्त है और उस विवेकके अनुसार अच्छे या बुरे कार्य करनेमें वह स्वतन्त्र है। अतः विवेकका अनादर करके दूसरेको मारना अथवा मारनेकी नीयत रखना दोष है। यदि पूर्वजन्मका बदला एक-दूसरे ऐसे ही चुकाते रहें तो यह शृंखला कभी खत्म नहीं होगी और मनुष्य कभी मुक्त नहीं हो सकेगा। पिछले जन्मका बदला अन्य (साँप आदि) योनियोंमें लिया जा सकता है। मनुष्ययोनि बदला लेनेके लिये नहीं है। हाँ, यह हो सकता है कि पिछले जन्मका हत्यारा व्यक्ति हमें स्वाभाविक ही अच्छा नहीं लगेगा, बुरा लगेगा। परन्तु बुरे लगनेवाले व्यक्तिसे द्वेष करना या उसे कष्ट देना दोष है; क्योंकि यह नया कर्म है। जैसा प्रारब्ध है, उसीके अनुसार उसकी बुद्धि बन गयी, फिर दोष किस बातका? बुद्धिमें जो द्वेष है, उसके वशमें हो गया—यह दोष है। उसे चाहिये कि वह उसके वशमें न होकर विवेकका आदर करे। गीता भी कहती है कि बुद्धिमें जो राग-द्वेष रहते हैं (तीसरे अध्यायका चालीसवाँ श्लोक), उनके वशमें न हो—“तयोर्न वशमागच्छेत्” (3। 34)। (7) प्रारब्ध और भगवत्कृपामें क्या अन्तर है? इस जीवको जो कुछ मिलता है, वह प्रारब्धके अनुसार मिलता है, पर प्रारब्ध-विधानके विधाता स्वयं भगवान् हैं। कारण कि कर्म जड होनेसे स्वतन्त्र फल नहीं दे सकते, वे तो भगवान्के विधानसे ही फल देते हैं। जैसे, एक आदमी किसीके खेतमें दिनभर काम करता है तो उसको शामके समय कामके अनुसार पैसे मिलते हैं, पर मिलते हैं खेतके मालिकसे। पैसे तो काम करनेसे ही मिलते हैं, बिना काम किये पैसे मिलते हैं क्या? पैसे तो काम करनेसे ही मिलते हैं; परन्तु बिना मालिकके पैसा देगा कौन? यदि कोई जंगलमें जाकर दिनभर मेहनत करे तो क्या उसको पैसे मिल जायँगे? नहीं मिल सकते। उसमें यह देखा जायगा कि किसके कहनेसे काम किया और किसकी जिम्मेवारी रही। अगर कोई नौकर कामको बड़ी तत्परता, चतुरता और उत्साहसे करता है, पर करता है केवल मालिककी प्रसन्नताके लिये तो मालिक उसको मजदूरीसे अधिक पैसे भी दे देता है और तत्परता आदि गुणोंको देखकर उसको अपने खेतका हिस्सेदार भी बना देता है। ऐसे ही भगवान् मनुष्यको उसके कर्मोंके अनुसार फल देते हैं। अगर कोई मनुष्य भगवान्की आज्ञाके अनुसार, उन्हींकी प्रसन्नताके लिये सब कार्य करता है, उसे भगवान् दूसरोंकी अपेक्षा अधिक ही देते हैं; परन्तु जो भगवान्के सर्वथा समर्पित होकर सब कार्य करता है, उस भक्तके भगवान् भी भक्त बन जाते हैं!* संसारमें कोई भी नौकरको अपना मालिक नहीं बनाता; परन्तु भगवान् शरणागत भक्तको अपना मालिक बना लेते हैं। ऐसी उदारता केवल प्रभुमें ही है। ऐसे प्रभुके चरणोंकी शरण न होकर जो मनुष्य प्राकृत— उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंके पराधीन रहते हैं, उनकी बुद्धि सर्वथा ही भ्रष्ट हो चुकी है। वे इस बातको समझ ही नहीं सकते कि हमारे सामने प्रत्यक्ष उत्पन्न और नष्ट होनेवाले पदार्थ हमें कहाँतक सहारा दे सकते हैं।
क्रियमाण कर्म
फल-अंश
संस्कार-अंश
दृष्ट
अदृष्ट
तात्कालिक कालान्तरिक लौकिक
पारलौकिक
शुद्ध
अशुद्ध
* जो भी नये कर्म और उनके संस्कार बनते हैं, वे सब केवल मनुष्यजन्ममें ही बनते हैं (गीता—चौथे अध्यायका बारहवाँ
और पन्द्रहवें अध्यायका दूसरा श्लोक), पशु-पक्षी आदि योनियोंमें नहीं; क्योंकि वे योनियाँ केवल कर्मफल-भोगके लिये
ही मिलती हैं।
1-यहाँ दृष्टका “कालान्तरिक” फल और अदृष्टका “लौकिक” फल—दोनों फल एक समान ही दीखते हैं, फिर भी दोनोंमें
अन्तर है। जो “कालान्तरिक” फल है, वह सीधे मिलता है, प्रारब्ध बनकर नहीं; परन्तु जो “लौकिक” फल है, वह प्रारब्ध बनकर
ही मिलता है।
2-एक सुनी हुई घटना है। किसी गाँवमें एक सज्जन रहते थे। उनके घरके सामने एक सुनारका घर था। सुनारके पास
सोना आता रहता था और वह गढ़कर देता रहता था। ऐसे वह पैसे कमाता था। एक दिन उसके पास अधिक सोना जमा
हो गया। रात्रिमें पहरा लगानेवाले सिपाहीको इस बातका पता लग गया। उस पहरेदारने रात्रिमें उस सुनारको मार दिया और
जिस बक्सेमें सोना था, उसे उठाकर चल दिया। इसी बीच सामने रहनेवाले सज्जन लघुशंकाके लिये उठकर बाहर आये।
उन्होंने पहरेदारको पकड़ लिया कि तू इस बक्सेको कैसे ले जा रहा है? तो पहरेदारने कहा—“तू चुप रह, हल्ला मत कर।
इसमेंसे कुछ तू ले ले और कुछ मैं ले लूँ।” सज्जन बोले—“मैं कैसे ले लूँ? मैं चोर थोड़े ही हूँ!” पहरेदारने कहा—“देख, तू
समझ जा, मेरी बात मान ले, नहीं तो दुःख पायेगा।” पर वे सज्जन माने नहीं। तब पहरेदारने बक्सा नीचे रख दिया और उस
सज्जनको पकड़कर जोरसे सीटी बजा दी। सीटी सुनते ही और जगह पहरा लगानेवाले सिपाही दौड़कर वहाँ आ गये। उसने
सबसे कहा कि “यह इस घरसे बक्सा लेकर आया है और मैंने इसको पकड़ लिया है।” तब सिपाहियोंने घरमें घुसकर देखा
कि सुनार मरा पड़ा है। उन्होंने उस सज्जनको पकड़ लिया और राजकीय आदमियोंके हवाले कर दिया। जजके सामने बहस
हुई तो उस सज्जनने कहा कि “मैंने नहीं मारा है, उस पहरेदार सिपाहीने मारा है।” सब सिपाही आपसमें मिले हुए थे, उन्होंने
कहा कि “नहीं इसीने मारा है, हमने खुद रात्रिमें इसे पकड़ा है,” इत्यादि।
मुकदमा चला। चलते-चलते अन्तमें उस सज्जनके लिये फाँसीका हुक्म हुआ। फाँसीका हुक्म होते ही उस सज्जनके मुखसे
निकला—“देखो, सरासर अन्याय हो रहा है! भगवान्के दरबारमें कोई न्याय नहीं! मैंने मारा नहीं, मुझे दण्ड हो और जिसने
मारा है, वह बेदाग छूट जाय, जुर्माना भी नहीं; यह अन्याय है!” जजपर उसके वचनोंका असर पड़ा कि वास्तवमें यह सच्चा
बोल रहा है, इसकी किसी तरहसे जाँच होनी चाहिये। ऐसा विचार करके उस जजने एक षड्यन्त्र रचा।
सुबह होते ही एक आदमी रोता-चिल्लाता हुआ आया और बोला—“हमारे भाईकी हत्या हो गयी, सरकार! इसकी जाँच
होनी चाहिये।” तब जजने उसी सिपाहीको और कैदी सज्जनको मरे व्यक्तिकी लाश उठाकर लानेके लिये भेजा। दोनों उस
आदमीके साथ वहाँ गये, जहाँ लाश पड़ी थी। खाटपर लाशके ऊपर कपड़ा बिछा था। खून बिखरा पड़ा था। दोनोंने उस
खाटको उठाया और उठाकर ले चले। साथका दूसरा आदमी खबर देनेके बहाने दौड़कर आगे चला गया। तब चलते-चलते
सिपाहीने कैदीसे कहा—“देख, उस दिन तू मेरी बात मान लेता तो सोना मिल जाता और फाँसी भी नहीं होती, अब देख
लिया सच्चाईका फल?” कैदीने कहा—“मैंने तो अपना काम सच्चाईका ही किया था, फाँसी हो गयी तो हो गयी! हत्या
की तूने और दण्ड भोगना पड़ा मेरेको! भगवान्के यहाँ न्याय नहीं!”
खाटपर झूठमूठ मरे हुएके समान पड़ा हुआ आदमी उन दोनोंकी बातें सुन रहा था। जब जजके सामने खाट रखी गयी
तो खूनभरे कपड़ेको हटाकर वह उठ खड़ा हुआ और उसने सारी बात जजको बता दी कि रास्तेमें सिपाही यह बोला और कैदी
यह बोला। यह सुनकर जजको बड़ा आश्चर्य हुआ। सिपाही भी हक्का-बक्का रह गया। सिपाहीको पकड़कर कैद कर लिया
गया। परन्तु जजके मनमें सन्तोष नहीं हुआ। उसने कैदीको एकान्तमें बुलाकर कहा कि “इस मामलेमें तो मैं तुम्हें निर्दोष मानता हूँ,
पर सच-सच बताओ कि इस जन्ममें तुमने कोई हत्या की है क्या?” वह बोला—बहुत पहलेकी घटना है। एक दुष्ट था, जो
छिपकर मेरे घर मेरी स्त्रीके पास आया करता था। मैंने अपनी स्त्रीको तथा उसको अलग-अलग खूब समझाया। पर वह माना नहीं।
एक रात वह घरपर था और अचानक मैं आ गया। मेरेको गुस्सा आया हुआ था। मैंने तलवारसे उसका गला काट दिया और
घरके पीछे जो नदी है, उसमें फेंक दिया। इस घटनाका किसीको पता नहीं लगा। यह सुनकर जज बोला—तुम्हारेको इस समय
फाँसी होगी ही; मैंने भी सोचा कि मैंने किसीसे घूस (रिश्वत) नहीं खायी, कभी बेईमानी नहीं की, फिर मेरे हाथसे इसके लिये
फाँसीका हुक्म लिखा कैसे गया? अब सन्तोष हुआ। उसी पापका फल तुम्हें यह भोगना पड़ेगा। सिपाहीको अलग फाँसी होगी।”
[उस सज्जनने चोर सिपाहीको पकड़कर अपने कर्तव्यका पालन किया था। फिर उसको जो दण्ड मिला है, वह उसके
कर्तव्य-पालनका फल नहीं है, प्रत्युत उसने बहुत पहले जो हत्या की थी, उस हत्याका फल है। कारण कि मनुष्यको अपनी
रक्षा करनेका अधिकार है, मारनेका अधिकार नहीं। मारनेका अधिकार रक्षक क्षत्रियका, राजाका है। अतः कर्तव्यका पालन
करनेके कारण उस पाप-(हत्या-) का फल उसको यहीं मिल गया और परलोकके भयंकर दण्डसे उसका छुटकारा हो गया।
कारण कि इस लोकमें जो दण्ड भोग लिया जाता है, उसका थोड़ेमें ही छुटकारा हो जाता है, थोडे़में ही शुद्धि हो जाती है,
नहीं तो परलोकमें बड़ा भयंकर (ब्याजसहित) दण्ड भोगना पड़ता है।]
इस कहानीसे यह पता लगता है कि मनुष्यके कब किये हुए पापका फल कब मिलेगा—इसका कुछ पता नहीं।
भगवान्का विधान विचित्र है। जबतक पुराने पुण्य प्रबल रहते हैं, तबतक उग्र पापका फल भी तत्काल नहीं मिलता। जब
पुराने पुण्य खत्म होते हैं, तब उस पापकी बारी आती है। पापका फल (दण्ड) तो भोगना ही पड़ता है, चाहे इस जन्ममें भोगना
पड़े या जन्मान्तरमें।
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्। नाभुक्तं क्षीयते कर्म जन्मकोटिशतैरपि॥
* व्याघ्रस्तुष्यति कानने सुगहनां सिंहो गुहां सेवते हंसो वाञ्छति पद्मिनीं कुसुमितां गृध्रः श्मशाने स्थले।
साधुः सत्कृतिसाधुमेव भजते नीचोऽपि नीचं जनं या यस्य प्रकृतिः स्वभावजनिता केनापि न त्यज्यते॥
“व्याघ्र घने वनमें संतुष्ट रहता है, सिंह गहन गुफाका सेवन करता है, हंस खिली हुई कमलिनीको चाहता है, गीध श्मशान-
भूमिमें रहना पसंद करता है, सज्जन पुरुष अच्छे आचरणोंवाले सज्जन पुरुषोंमें और नीच पुरुष नीच लोगोंमें ही रहना चाहते
हैं। सच है, स्वभावसे पैदा हुई जिसकी जैसी प्रकृति है, उस प्रकृतिको कोई नहीं छोड़ता।
संचित कर्म
फल-अंश
संस्कार-अंश
प्रारब्ध
स्फुरणा
1-स्फुरणा संचितके अनुसार भी होती है और प्रारब्धके अनुसार भी। संचितके अनुसार जो स्फुरणा होती है, वह मनुष्यको
कर्म करनेके लिये बाध्य नहीं करती। परन्तु संचितकी स्फुरणामें भी यदि राग-द्वेष हो जायँ तो वह “संकल्प” बनकर मनुष्यको
कर्म करनेके लिये बाध्य कर सकती है। प्रारब्धके अनुसार जो स्फुरणा होती है, वह (फल-भोग करानेके लिये) मनुष्यको
कर्म करनेके लिये बाध्य करती है; परन्तु वह विहित कर्म करनेके लिये ही बाध्य करती है, निषिद्ध कर्म करनेके लिये नहीं।
कारण कि विवेकप्रधान मनुष्यशरीर निषिद्ध कर्म करनेके लिये नहीं है। अतः अपनी विवेकशक्तिको प्रबल करके निषिद्धका
त्याग करनेकी जिम्मेवारी मनुष्यपर है और ऐसा करनेमें वह स्वतन्त्र है।
2-जाग्रत्-अवस्थामें भी जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—तीनों अवस्थाएँ होती हैं; जैसे—मनुष्य जाग्रत्-अवस्थामें बड़ी
सावधानीसे काम करता है, तो यह जाग्रत्में जाग्रत्-अवस्था है। जाग्रत्-अवस्थामें मनुष्य जिस कामको करता है, उस कामके
अलावा अचानक जो दूसरी स्फुरणा होने लगती है, वह जाग्रत्में स्वप्न-अवस्था है। जाग्रत्-अवस्थामें कभी-कभी काम करते
हुए भी उस कामकी तथा पूर्वकर्मोंकी कोई भी स्फुरणा नहीं होती, बिलकुल वृत्तिरहित अवस्था हो जाती है, वह जाग्रत्में
सुषुप्ति-अवस्था है।
कर्म करनेका वेग ज्यादा रहनेसे जाग्रत्-अवस्थामें जाग्रत् और स्वप्न-अवस्था तो ज्यादा होती है, पर सुषुप्ति-अवस्था बहुत
थोड़ी होती है। अगर कोई साधक जाग्रत्की स्वाभाविक सुषुप्तिको स्थायी बना ले तो उसका साधन बहुत तेज हो जायगा;
क्योंकि जाग्रत्-सुषुप्तिमें साधकका परमात्माके साथ निरावरणरूपसे स्वतः सम्बन्ध होता है। ऐसे तो सुषुप्ति-अवस्थामें भी
संसारका सम्बन्ध टूट जाता है; परन्तु बुद्धि-वृत्ति अज्ञानमें लीन हो जानेसे स्वरूपका स्पष्ट अनुभव नहीं होता। जाग्रत्-सुषुप्तिमें
बुद्धि जाग्रत् रहनेसे स्वरूपका स्पष्ट अनुभव होता है।
यह जाग्रत्-सुषुप्ति समाधिसे भी विलक्षण है; क्योंकि यह स्वतः होती है और समाधिमें अभ्यासके द्वारा वृत्तियोंको एकाग्र
तथा निरुद्ध करना पड़ता है। इसलिये समाधिमें पुरुषार्थ साथमें रहनेके कारण शरीरमें स्थिति होती है; परन्तु जाग्रत्-सुषुप्तिमें
अभ्यास और अहंकारके बिना वृत्तियाँ स्वतः निरुद्ध होनेके कारण स्वरूपमें स्थिति होती है अर्थात् स्वरूपका अनुभव होता है।
प्रारब्ध कर्म
अनुकूल परिस्थिति
मिश्रित (अनुकूल-प्रतिकूल) परिस्थिति
प्रतिकूल परिस्थिति
स्वेच्छापूर्वक क्रिया (प्रवृत्ति) अनच्छिापूर्वक क्रिया परेच्छापूर्वक क्रिया
स्वेच्छापूर्वक क्रिया
अनिच्छापूर्वक क्रिया
परेच्छापूर्वक क्रिया
अनिच्छापूर्वक क्रिया
परेच्छापूर्वक क्रिया
स्वेच्छापूर्वक क्रिया
* “प्रकर्षेण आरब्धः प्रारब्धः” अर्थात् अच्छी तरहसे फल देनेके लिये जिसका आरम्भ हो चुका है, वह “प्रारब्ध” है।
1-वर्णात्मक शब्दमें भी दस रस होते हैं—शृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स, अद्भुत, शान्त और
वात्सल्य। ये दसों ही रस चित्त द्रवित होनेसे होते हैं। इन दसों रसोंका उपयोग भगवान्के लिये किया जाय तो ये सभी रस
कल्याण करनेवाले हो जाते हैं और इनसे सुख भोगा जाय तो ये सभी रस पतन करनेवाले हो जाते हैं।
2-ढोल, ढोलकी, तबला, पखावज, मृदंग आदि “खाल” के; सितार, सारंगी, मोरचंग आदि “तार” के; मशक, पेटी
(हारमोनियम), बाँसुरी, पूँगी आदि “फूँक” के और झाँझ, मंजीरा, करताल आदि “ताल” के बाजे हैं।
1-लालने ताडने मातुर्नाकारुण्यं यथार्भके। तद्वदेव महेशस्य नियन्तुर्गुणदोषयोः॥
“जिस प्रकार बच्चेका पालन करने और ताड़ना करने—दोनोंमें माताकी कहीं अकृपा नहीं होती, उसी प्रकार जीवोंके गुण-
दोषोंका नियन्त्रण करनेवाले परमेश्वरकी कहीं किसीपर अकृपा नहीं होती है।”
2-यद्भावि तद्भवत्येव यदभाव्यं न तद्भवेत्। इति निश्चितबुद्धीनां न चिन्ता बाधते क्वचित्॥ (नारदपुराण, पूर्व, 37। 47)
“जो होनेवाला है, वह होकर ही रहता है और जो नहीं होनेवाला है, वह कभी नहीं होता—ऐसा निश्चय जिनकी बुद्धिमें
होता है, उन्हें चिन्ता कभी नहीं सताती।”
* महाभारत, वनपर्वमें एक कथा आती है। एक दिन द्रौपदीने युधिष्ठिरजी महाराजसे कहा कि आप धर्मको छोड़कर एक
कदम भी आगे नहीं रखते, पर आप वनवासमें दुःख पा रहे हैं और दुर्योधन धर्मकी किंचिन्मात्र भी परवाह न करके केवल
स्वार्थ-परायण हो रहा है, पर वह राज्य कर रहा है, आरामसे रह रहा है और सुख भोग रहा है? ऐसी शंका करनेपर युधिष्ठिरजी
महाराजने कहा कि जो सुख पानेकी इच्छासे धर्मका पालन करते हैं, वे धर्मके तत्त्वको जानते ही नहीं! वे तो पशुओंकी तरह
सुख-भोगके लिये लोलुप और दुःखसे भयभीत रहते हैं, फिर बेचारे धर्मके तत्त्वको कैसे जानें! इसलिये मनुष्यकी मनुष्यता
इसीमें है कि वे अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितिकी परवाह न करके शास्त्रके आज्ञानुसार केवल अपने धर्म-(कर्तव्य-) का
पालन करते रहें।
1-सर्वथा त्यागीको भी अनुकूल वस्तुएँ बहुत मिलती हुई देखी जाती हैं (यह बात अलग है कि वह उन्हें स्वीकार न करे)।
त्यागमें तो एक और विलक्षणता भी है कि जो मनुष्य धनका त्याग कर देता है, जिसके मनमें धनका महत्त्व नहीं है और
अपनेको धनके अधीन नहीं मानता, उसके लिये धनका एक नया प्रारब्ध बन जाता है। कारण कि त्याग भी एक बड़ा भारी
पुण्य है, जिससे तत्काल एक नया प्रारब्ध बनता है।
धान नहीं धीणों नहीं, नहीं रुपैयो रोक। जीमण बैठे रामदास, आन मिलै सब थोक॥
2-प्राप्तव्यमर्थं लभते मनुष्यो दैवोऽपि तं लङ्घयितुं न शक्तः। तस्मान्न शोचामि न विस्मयो मे यदस्मदीयं न हि तत्परेषाम्॥
(पंचतन्त्र, मित्रसम्प्राप्ति 112)
“प्राप्त होनेवाला धन मनुष्यको मिलता ही है, दैव भी उसका उल्लंघन नहीं कर सकता। इसलिये न तो मैं शोक करता
हूँ और न मुझे विस्मय ही होता है; क्योंकि जो हमारा है, वह दूसरोंका नहीं हो सकता।”
(11। 8। 1)
13श्रीभगवान्
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मेसाङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्॥ 13॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

जिस प्रकार कर्मयोगमें कर्मोंका अपने साथ सम्बन्ध नहीं रहता, ऐसे ही सांख्यसिद्धान्तमें भी कर्मोंका अपने साथ किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता—इसका विवेचन आगे करते हैं।

पदच्छेद
श्लोकमें ढूँढ़नेके लिये हॉवर करें
व्याख्या
3 sections
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि
हे महाबाहो! जिसमें सम्पूर्ण कर्मोंका अन्त हो जाता है, ऐसे सांख्यसिद्धान्तमें सम्पूर्ण विहित और निषिद्ध कर्मोंके होनेमें पाँच हेतु बताये गये हैं। “स्वयं” (स्वरूप) उन कर्मोंमें हेतु नहीं है।
निबोध मे
इस अध्यायमें भगवान्ने जहाँ सांख्य- सिद्धान्तका वर्णन आरम्भ किया है, वहाँ “निबोध” क्रियाका प्रयोग किया है (इसी अध्यायका तेरहवाँ और पचासवाँ श्लोक), जबकि दूसरी जगह “शृणु” क्रियाका प्रयोग किया है (इसी अध्यायका चौथा, उन्नीसवाँ, उनतीसवाँ, छत्तीसवाँ, पैंतालीसवाँ और चौंसठवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह है कि सांख्यसिद्धान्तमें तो “निबोध” पदसे अच्छी तरह समझनेकी बात कही है और दूसरी जगह “शृणु” पदसे सुननेकी बात कही है। अतः सांख्यसिद्धान्तको गहरी रीतिसे समझना चाहिये। अगर उसे अपने-आप (स्वयं)- से गहरी रीतिसे समझा जाय, तो तत्काल तत्त्वका अनुभव हो जाता है।
साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्
कर्म चाहे शास्त्रविहित हों, चाहे शास्त्रनिषिद्ध हों, चाहे शारीरिक हों, चाहे मानसिक हों, चाहे वाचिक हों, चाहे स्थूल हों और चाहे सूक्ष्म हों—इन सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिके लिये पाँच हेतु कहे गये हैं। जब पुरुषका इन कर्मोंमें कर्तृत्व रहता है, तब कर्मसिद्धि और कर्मसंग्रह दोनों होते हैं और जब पुरुषका इन कर्मोंके होनेमें कर्तृत्व नहीं रहता, तब कर्मसिद्धि तो होती है, पर कर्मसंग्रह नहीं होता, प्रत्युत क्रियामात्र होती है। जैसे, संसारमात्रमें परिवर्तन होता है अर्थात् नदियाँ बहती हैं, वायु चलती है, वृक्ष बढ़ते हैं आदि-आदि क्रियाएँ होती रहती हैं, परन्तु इन क्रियाओंसे कर्मसंग्रह नहीं होता अर्थात् ये क्रियाएँ पाप-पुण्यजनक अथवा बन्धनकारक नहीं होतीं। तात्पर्य यह हुआ कि कर्तृत्वाभिमानसे ही कर्मसिद्धि और कर्मसंग्रह होता है। कर्तृत्वाभिमान मिटनेपर क्रियामात्रमें अधिष्ठान, करण, चेष्टा और दैव—ये चार हेतु ही होते हैं (गीता—इसी उनको यह समझाना था कि कर्मोंका ग्रहण और त्याग—दोनों ही कल्याणमें हेतु नहीं हैं। कल्याणमें हेतु तो परिवर्तनशील नाशवान् प्रकृतिसे अपरिवर्तनशील अविनाशी अपने स्वरूपका सम्बन्ध-विच्छेद ही है। उस अध्यायका चौदहवाँ श्लोक)। यहाँ सांख्यसिद्धान्तका वर्णन हो रहा है। सांख्यसिद्धान्तमें विवेक-विचारकी प्रधानता होती है, फिर भगवान्ने “सर्वकर्मणां सिद्धये” वाली कर्मोंकी बात यहाँ क्यों छेड़ी? कारण कि अर्जुनके सामने युद्धका प्रसंग है। क्षत्रिय होनेके नाते युद्ध उनका कर्तव्य-कर्म है। इसलिये कर्मयोगसे अथवा सांख्ययोगसे ऐसे कर्म करने चाहिये, जिससे कर्म करते हुए भी कर्मोंसे सर्वथा निर्लिप्त रहे—यह बात भगवान्को कहनी है। अर्जुनने सांख्यका तत्त्व पूछा है, इसलिये भगवान् सांख्यसिद्धान्तसे कर्म करनेकी बात कहना आरम्भ करते हैं। अर्जुन स्वरूपसे कर्मोंका त्याग करना चाहते थे; अतः सांख्ययोग। कर्मयोगमें तो फलका अर्थात् ममताका त्याग मुख्य है और सांख्ययोगमें अहंताका त्याग मुख्य है। परन्तु ममताके त्यागसे अहंताका और अहंताके त्यागसे ममताका त्याग स्वतः हो जाता है। कारण कि अहंतामें भी ममता होती है; जैसे—मेरी बात रहे, मेरी बात कट न जाय—यह मैंपनके साथ भी मेरापन है। इसलिये ममता-(मेरापन-)को छोड़नेसे अहंता (मैं-पन) छूट जाती है*। ऐसे ही पहले अहंता होती है, तब ममता होती है अर्थात् पहले “मैं” होता है, तब “मेरापन” होता है। परन्तु जहाँ अहंता-(मैंपन-)का ही त्याग कर दिया जायगा, वहाँ ममता (मेरापन) कैसे रहेगी? वह भी छूट ही जायगी।
परिशिष्ट भाव
आत्माको अकर्ता बतानेके लिये पाँच कारणोंका वर्णन करते हैं। इन पाँचोंमें कर्तृत्वका त्याग होनेपर कर्मोंका सर्वथा अन्त (सम्बन्ध-विच्छेद) हो जाता है।
* एवं स्वभक्तयो राजन् भगवान् भक्तभक्तिमान्। (श्रीमद्भा0 10। 86। 59)
14श्रीभगवान्
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं पृथग्विधम्। विविधाश् पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥ 14॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

विच्छेदकी दो प्रक्रियाएँ हैं—कर्मयोग और सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिमें पाँच हेतु कौन-से हैं? अब यह बताते हैं।

पदच्छेद
श्लोकमें ढूँढ़नेके लिये हॉवर करें
व्याख्या
5 sections
अधिष्ठानम्
शरीर और जिस देशमें यह शरीर स्थित है, वह देश—ये दोनों “अधिष्ठान” हैं।
कर्ता
सम्पूर्ण क्रियाएँ प्रकृति और प्रकृतिके कार्योंके द्वारा ही होती हैं। वे क्रियाएँ चाहे समष्टि हों, चाहे व्यष्टि हों; परन्तु उन क्रियाओंका कर्ता “स्वयं” नहीं है। केवल अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अर्थात् जिसको चेतन और जडका ज्ञान नहीं है—ऐसा अविवेकी पुरुष ही जब प्रकृतिसे होनेवाली क्रियाओंको अपनी मान लेता है, तब वह “कर्ता” बन जाता है*। ऐसा “कर्ता” ही कर्मोंकी सिद्धिमें हेतु बनता है।
करणं च पृथग्विधम्
कुल तेरह करण हैं। पाणि, पाद, वाक्, उपस्थ और पायु—ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ और श्रोत्र, चक्षु, त्वक्, रसना और घ्राण—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ— ये दस “बहिःकरण” हैं तथा मन, बुद्धि और अहंकार— ये तीन “अन्तःकरण” हैं।
विविधाश्च पृथक्चेष्टाः
उपर्युक्त तेरह करणोंकी अलग-अलग चेष्टाएँ होती हैं; जैसे—पाणि (हाथ)— आदान-प्रदान करना, पाद (पैर)—आना-जाना, चलना- फिरना, वाक्—बोलना, उपस्थ—मूत्रका त्याग करना, पायु (गुदा)—मलका त्याग करना, श्रोत्र—सुनना, चक्षु— देखना, त्वक्—स्पर्श करना, रसना—चखना, घ्राण— सूँघना, मन—मनन करना, बुद्धि—निश्चय करना और अहंकार—“मैं ऐसा हूँ”आदि अभिमान करना।
दैवं चैवात्र पञ्चमम्
कर्मोंकी सिद्धिमें पाँचवें हेतुका नाम “दैव” है। यहाँ दैव नाम संस्कारोंका है। मनुष्य जैसा कर्म करता है, वैसा ही संस्कार उसके अन्तःकरणपर पड़ता है। शुभ-कर्मका शुभ संस्कार पड़ता है और अशुभ- कर्मका अशुभ संस्कार पड़ता है। वे ही संस्कार आगे कर्म करनेकी स्फुरणा पैदा करते हैं। जिसमें जिस कर्मका संस्कार जितना अधिक होता है, उस कर्ममें वह उतनी ही सुगमतासे लग सकता है और जिस कर्मका विशेष संस्कार नहीं है, उसको करनेमें उसे कुछ परिश्रम पड़ सकता है। इसी प्रकार मनुष्य सुनता है, पुस्तकें पढ़ता है और विचार भी करता है तो वे भी अपने-अपने संस्कारोंके अनुसार ही करता है। तात्पर्य है कि मनुष्यके अन्तःकरणमें शुभ और अशुभ— जैसे संस्कार होते हैं, उन्हींके अनुसार कर्म करनेकी स्फुरणा होती है। इस श्लोकमें कर्मोंकी सिद्धिमें पाँच हेतु बताये गये हैं—अधिष्ठान, कर्ता, करण, चेष्टा और दैव। इसका कारण यह है कि आधारके बिना कोई भी काम कहाँ किया जायगा? इसलिये “अधिष्ठान” पद आया है। कर्ताके बिना क्रिया कौन करेगा? इसलिये “कर्ता” पद आया है। क्रिया करनेके साधन (करण) होनेसे ही तो कर्ता क्रिया करेगा, इसलिये “करण” पद आया है। करनेके साधन होनेपर भी क्रिया नहीं की जायगी तो कर्मसिद्धि कैसे होगी? इसलिये “चेष्टा” पद आया है। कर्ता अपने-अपने संस्कारोंके अनुसार ही क्रिया करेगा, संस्कारोंके विरुद्ध अथवा संस्कारोंके बिना क्रिया नहीं कर सकेगा, इसलिये “दैव” पद आया है। इस प्रकार इन पाँचोंके होनेसे ही कर्मसिद्धि होती है।
परिशिष्ट भाव
“कर्ता”—अहंकार अपरा प्रकृति है और जीव परा प्रकृति है। जीवका सम्बन्ध (सजातीयता) परमात्माके साथ है, पर वह अहंकारके साथ सम्बन्ध जोड़कर अपनेको कर्ता मान लेता है। “दैवम्”—अच्छे-बुरे संस्कार सबके भीतर रहते हैं—“सुमति कुमति सब कें उर रहहीं” (मानस, सुन्दर0 40। 3)। संग, शास्त्र और विचार—इन तीनोंसे अच्छे या बुरे संस्कारोंको बल मिलता है, जिससे नये कर्म होते हैं।
* साक्षात् परमात्माका अंश होनेसे इस जीवकी परमात्माके साथ स्वतःसिद्ध आत्मीयता है। उस परमात्मासे विमुख होकर
जीवने अहंताके साथ ममता कर ली, जिससे स्वयंको “मैं संसारी हूँ, मैं त्यागी हूँ, मैं विवेकी हूँ, मैं पढ़ा-लिखा समझदार
हूँ”—ऐसा व्यक्तित्व (मैंपन) प्रिय लगता है और यह छूट न जाय—इसका भय लगता है। यह अहंताके साथ ममता है। इसका
त्याग करनेके लिये कर्मयोगमें “मेरा कुछ नहीं है, मुझे कुछ नहीं चाहिये और मेरे लिये कुछ नहीं करना है” इसी भावसे संसारके
हितके लिये सब क्रियाएँ करे (कारण कि कर्मका सम्बन्ध “पर”के प्रति है, “स्व” के प्रति नहीं)। ऐसा करनेसे ममता छूट
जायगी। ममता छूटते ही अहंता भी सर्वथा छूट जायगी।
कर्मयोगमें स्थूलशरीरसे क्रिया, सूक्ष्मशरीरसे परहितचिन्तन और कारणशरीरसे स्थिरता (एकाग्रता)—ये तीनों ही
संसारके हितार्थ होते हैं। इसलिये दूसरोंके हितके लिये कर्म करते-करते सबके हितका चिन्तन होता है। हितका चिन्तन होते-
होते स्वतः ही स्थिरता आती है, उस स्थिरतामें अहंता और ममता दोनोंका त्याग होता है और त्याग होनेसे शान्ति मिलती है।
संसारके त्यागसे जो शान्ति मिलती है, वह स्वरूप अथवा साध्य नहीं है, प्रत्युत वह तो एक साधन है—“योगारूढस्य
तस्यैव शमः कारणमुच्यते” (गीता 6। 3)। परन्तु परमात्माकी प्राप्तिसे जो शान्ति मिलती है, वह साध्य है अर्थात् परमात्माका
स्वरूप है—“शान्तिं निर्वाणपरमाम्” (गीता 6। 15)।
अब साधकको सावधानी यह रखनी है कि वह उस साधनजन्य शान्तिका भोग न करे। भोग न करनेसे स्वतः
वास्तविकताकी अनुभूति हो जायगी और यदि भोग करेगा तो वहींपर अटक जायगा।
* सम्पूर्ण क्रियाएँ प्रकृतिके द्वारा ही होती हैं—इसका वर्णन गीतामें कई रीतियोंसे आता है; जैसे—
(1) सब कर्म प्रकृतिके द्वारा ही किये जाते हैं—“प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः” (13। 29), सम्पूर्ण कर्म
प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जाते हैं—“प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः” (3। 27)।
(2) गुण ही गुणोंमें बरतते हैं—“गुणा गुणेषु वर्तन्ते” (3। 28); द्रष्टा गुणोंके सिवाय अन्य किसीको कर्ता नहीं
देखता—“नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति” (14। 19)।
(3) सब इन्द्रियाँ अपने-अपने अर्थों-(विषयों-) में बरतती हैं—“इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्ते” (5। 9)।
(4) यहाँ (18। 14 में) कर्मोंकी सिद्धिमें अधिष्ठान आदि पाँच हेतु बताये गये हैं।
इन सबका तात्पर्य यह है कि प्रकृति और पुरुष—इन दोनोंमेंसे केवल प्रकृतिमें ही क्रियाएँ होती हैं, पुरुषमें नहीं। प्रकृतिके
साथ तादात्म्य करनेसे ही पुरुष उन क्रियाओंको अपनी मान लेता है। जैसे, कोई मनुष्य वायुयानमें बैठकर यह मान लेता है
कि मैं वायुयानद्वारा जा रहा हूँ, जबकि वास्तवमें वायुयान ही चलता है, मनुष्य नहीं। ऐसे ही पुरुष अपनेको प्रकृतिकी
क्रियाओंका कर्ता मान लेता है—“अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते” (3। 27)।
तत्त्वको जाननेवाला विवेकी पुरुष ऐसा अनुभव करता है कि सब क्रियाएँ प्रकृति और प्रकृतिके कार्यमें ही हो रही हैं,
इनमें मैं कुछ भी नहीं करता हूँ—“नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्” (5। 8)।
15श्रीभगवान्
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः। न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः॥ 15॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
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शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म.....पञ्चैते तस्य हेतवः
पीछेके (चौदहवें) श्लोकमें कर्मोंके होनेमें जो अधिष्ठान आदि पाँच हेतु बताये गये हैं, वे पाँचों हेतु इन पदोंमें आ जाते हैं; जैसे—“शरीर” पदमें अधिष्ठान आ गया, “वाक्” पदमें बहिःकरण और “मन” पदमें अन्तःकरण आ गया, “नरः” पदमें कर्ता आ गया और “प्रारभते” पदमें सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी चेष्टा आ गयी। अब रही “दैव” की बात। यह दैव अर्थात् संस्कार अन्तःकरणमें ही रहता है; परन्तु उसका स्पष्ट रीतिसे पता नहीं लगता। उसका पता तो उससे उत्पन्न हुई वृत्तियोंसे और उसके अनुसार किये हुए कर्मोंसे ही लगता है। मनुष्य शरीर, वाणी और मनसे जो कर्म आरम्भ करता है अर्थात् कहीं शरीरकी प्रधानतासे, कहीं वाणीकी प्रधानतासे और कहीं मनकी प्रधानतासे जो कर्म करता है, वह चाहे न्याय्य—शास्त्रविहित हो, चाहे विपरीत—शास्त्र-विरुद्ध हो, उसमें ये (पूर्वश्लोकमें आये) पाँच हेतु होते हैं। शरीर, वाणी और मन—इन तीनोंके द्वारा ही सम्पूर्ण कर्म होते हैं। इनके द्वारा किये गये कर्मोंको ही कायिक, वाचिक और मानसिक कर्मकी संज्ञा दी जाती है। इन तीनोंमें अशुद्धि आनेसे ही बन्धन होता है। इसीलिये इन तीनों-(शरीर, वाणी और मन-) की शुद्धिके लिये सत्रहवें अध्यायके चौदहवें, पन्द्रहवें और सोलहवें श्लोकमें क्रमशः कायिक, वाचिक और मानसिक तपका वर्णन किया गया है। तात्पर्य यह है कि शरीर, वाणी और मनसे कोई भी शास्त्रनिषिद्ध कर्म न किया जाय, केवल शास्त्रविहित कर्म ही किये जायँ, तो वह “तप” हो जाता है। सत्रहवें अध्यायके ही सत्रहवें श्लोकमें “अफलाकाङ्क्षिभिः” पद देकर यह बताया है कि निष्कामभावसे किया हुआ तप सात्त्विक होता है। सात्त्विक तप बाँधनेवाला नहीं होता, प्रत्युत मुक्ति देनेवाला होता है। परन्तु राजस-तामस तप बाँधनेवाले होते हैं। इन शरीर, वाणी आदिको अपना समझकर अपने लिये कर्म करनेसे ही इनमें अशुद्धि आती है, इसलिये इनको शुद्ध किये बिना केवल विचारसे बुद्धिके द्वारा सांख्यसिद्धान्तकी बातें तो समझमें आ सकती हैं; परन्तु
कर्मोंके साथ मेरा किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है
ऐसा स्पष्ट बोध नहीं हो सकता। ऐसी हालतमें साधक शरीर आदिको अपना न समझे और अपने लिये कोई कर्म न करे तो वे शरीरादि बहुत जल्दी शुद्ध हो जायँगे; अतः चाहे कर्मयोगकी दृष्टिसे इनको शुद्ध करके इनसे सम्बन्ध तोड़ ले, चाहे सांख्ययोगकी दृष्टिसे प्रबल विवेकके द्वारा इनसे सम्बन्ध तोड़ ले। दोनों ही साधनोंसे प्रकृति और प्रकृतिके कार्यके साथ अपने माने हुए सम्बन्धका विच्छेद हो जाता है और वास्तविक तत्त्वका अनुभव हो जाता है। जिस समष्टि-शक्तिसे संसारमात्रकी क्रियाएँ होती हैं, उसी समष्टि-शक्तिसे व्यष्टि शरीरकी क्रियाएँ भी स्वाभाविक होती हैं। विवेकको महत्त्व न देनेके कारण “स्वयं” उन क्रियाओंमेंसे खाना-पीना, उठना-बैठना, सोना-जगना आदि जिन क्रियाओंका कर्ता अपनेको मान लेता है, वहाँ कर्मसंग्रह होता है अर्थात् वे क्रियाएँ बाँधनेवाली हो जाती हैं। परन्तु जहाँ स्वयं अपनेको कर्ता नहीं मानता, वहाँ कर्मसंग्रह नहीं होता। वहाँ तो केवल क्रियामात्र होती है। इसलिये वे क्रियाएँ फलोत्पादक अर्थात् बाँधनेवाली नहीं होतीं। जैसे, बचपनसे जवान होना, श्वासका आना-जाना, भोजनका पाचन होना तथा रस आदि बन जाना आदि क्रियाएँ बिना कर्तृत्वाभिमानके प्रकृतिके द्वारा स्वतः- स्वाभाविक होती हैं और उनका कोई कर्मसंग्रह अर्थात् पाप-पुण्य नहीं होता। ऐसे ही कर्तृत्वाभिमान न रहनेपर
सभी क्रियाएँ प्रकृतिके द्वारा ही होती हैं
ऐसा स्पष्ट अनुभव हो जाता है।
परिशिष्ट भाव
मनमें राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि होना मानसिक कर्म हैं। “न्याय्यम्” पदका अर्थ है—सात्त्विक कर्म, शास्त्रविहित कर्म अथवा शुभ कर्म। “विपरीतम्” पदका अर्थ है— राजस-तामस कर्म, शास्त्रनिषिद्ध कर्म अथवा अशुभ कर्म। “न्याय्यं वा विपरीतं वा” पदोंका तात्पर्य है—मात्र कर्म।
16श्रीभगवान्
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः। पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः॥ 16॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

भगवान्ने सांख्यसिद्धान्त बतानेके लिये जो उपक्रम किया है, उसमें कर्मोंके होनेमें पाँच हेतु बतानेका क्या आशय है—इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
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तत्रैवं सति........पश्यति दुर्मतिः
जितने भी कर्म होते हैं, वे सब अधिष्ठान, कर्ता, करण, चेष्टा और दैव—इन पाँच हेतुओंसे ही होते हैं, अपने स्वरूपसे नहीं। परन्तु ऐसा होनेपर भी जो पुरुष अपने स्वरूपको कर्ता मान लेता है, उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है— “अकृतबुद्धित्वात्” अर्थात् उसने विवेक-विचारको महत्त्व नहीं दिया है। जड और चेतनका, प्रकृति और पुरुषका जो वास्तविक विवेक है, अलगाव है, उसकी तरफ उसने ध्यान नहीं दिया है। इसलिये उसकी बुद्धिमें दोष आ गया है। उस दोषके कारण वह अपनेको कर्ता मान लेता है। यहाँ आये “अकृतबुद्धित्वात्” और “दुर्मतिः” पदोंका समान अर्थ दीखते हुए भी इनमें थोड़ा फरक है। “अकृतबुद्धित्वात्” पद हेतुके रूपमें आया है और “दुर्मतिः” पद कर्ताके विशेषणके रूपमें आया है अर्थात् कर्ताके दुर्मति होनेमें अकृतबुद्धि ही हेतु है। तात्पर्य है कि बुद्धिको शुद्ध न करनेसे अर्थात् बुद्धिमें विवेक जाग्रत् न करनेसे ही वह दुर्मति है। अगर वह विवेकको जाग्रत् करता, तो वह दुर्मति नहीं रहता। केवल (शुद्ध) आत्मा कुछ नहीं करता—“न करोति न लिप्यते” (गीता 13। 31); परन्तु तादात्म्यके कारण
मैं नहीं करता हूँ
ऐसा बोध नहीं होता। बोध न होनेमें “अकृतबुद्धि” ही कारण है अर्थात् जिसने बुद्धिको शुद्ध नहीं किया है, वह दुर्मति ही अपनेको कर्ता मान लेता है; जब कि शुद्ध आत्मामें कर्तृत्व नहीं है। “केवलम्” पद कर्मयोग और सांख्ययोग—दोनोंमें ही आया है। प्रकृति और पुरुषके विवेकको लेकर कर्मयोग और सांख्ययोग चलते हैं। कर्मयोगमें सब क्रियाएँ शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके द्वारा ही होती हैं, पर उनके साथ सम्बन्ध नहीं जुड़ता अर्थात् उनमें ममता नहीं होती। ममता न होनेसे शरीर, मन आदिकी संसारके साथ जो एकता है, वह एकता अनुभवमें आ जाती है। एकताका अनुभव होते ही स्वरूपमें स्वतःसिद्ध स्थितिका अनुभव हो जाता है। इसलिये कर्मयोगमें “केवलैः” पद शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके साथ दिया गया है—“कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि” (गीता 5। 11)। सांख्ययोगमें विवेक-विचारकी प्रधानता है। जितने भी कर्म होते हैं, वे सब पाँच हेतुओंसे ही होते हैं, अपने स्वरूपसे नहीं। परन्तु अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अपनेको कर्ता मान लेता है। विवेकसे मोह मिट जाता है। मोह मिटनेसे वह अपनेको कर्ता कैसे मान सकता है? अर्थात् उसे अपने शुद्ध स्वरूपका अनुभव हो जाता है। इसलिये सांख्ययोगमें “केवलम्” पद स्वरूपके साथ दिया गया है—“केवलम् आत्मानम्”। अब इसमें एक बात विशेष ध्यान देनेकी है कि कर्मयोगमें “केवल” शब्द शरीर, मन आदिके साथ रहनेसे शरीर, मन, बुद्धि आदिके साथ “अहम्” भी संसारकी सेवामें लग जायगा तथा स्वरूप ज्यों-का-त्यों रह जायगा और सांख्ययोगमें स्वरूपके साथ “केवल” रहनेसे “मैं निर्लेप हूँ”, “मैं शुद्ध-बुद्ध-मुक्त हूँ” इस प्रकार सूक्ष्मरीतिसे “अहम्” की गंध रह जायगी।
मैं निर्लेप हूँ; मेरेमें कर्तृत्व नहीं है
ऐसी स्थिति बहुत कालतक रहनेसे यह “अहम्” भी अपने-आप गल जायगा अर्थात् अपने कारण प्रकृतिमें लीन हो जायगा।
परिशिष्ट भाव
सब कारकोंमें कर्ता मुख्य है। कर्तामें चेतनकी झलक आती है, अन्य कारकोंमें नहीं। वास्तवमें “कर्ता” नाम चेतनका नहीं है। यह माना हुआ कर्ता है—“अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते” (गीता 3। 27)। इसलिये भगवान्ने यहाँ अपने वास्तविक स्वरूपको कर्ता माननेवालेकी निन्दा की है कि उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है, वह दुर्मति है। कारण कि स्वरूपमें कर्तृत्व और भोक्तृत्व दोनों ही नहीं हैं—“शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते” (गीता 13। 31)। मूलमें ये नहीं हैं, तभी इनका त्याग होता है। ये कर्तृत्व-भोक्तृत्व न भगवान्के बनाये हुए हैं, न प्रकृतिके, प्रत्युत जीवके बनाये हुए हैं। वास्तवमें कर्ता कोई नहीं है; न तो चेतन कर्ता है और न जड़ कर्ता है। अगर कर्ता मानना ही पड़े तो वह जड़में ही माना जायगा। इसको भगवान्ने गीतामें कई प्रकारसे बताया है; जैसे—सम्पूर्ण क्रियाएँ प्रकृतिके द्वारा ही होती हैं अर्थात् प्रकृति कर्ता है (तेरहवें अध्यायका उनतीसवाँ श्लोक); सम्पूर्ण क्रियाएँ गुणोंके द्वारा होती हैं; गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं अर्थात् गुण कर्ता है (तीसरे अध्यायका सत्ताईसवाँ-अट्ठाईसवाँ और चौदहवें अध्यायका तेईसवाँ श्लोक); इन्द्रियाँ ही इन्द्रियोंके विषयोंमें बरत रही हैं अर्थात् इन्द्रियाँ कर्ता हैं ( पाँचवें अध्यायका नवाँ श्लोक)। तात्पर्य है कि कर्तृत्व प्रकृतिमें ही है, स्वरूपमें नहीं। इसीलिये अपने चेतन स्वरूपमें स्थित तत्त्वज्ञ महापुरुष “मैं कुछ भी नहीं करता हूँ” ऐसा अनुभव करता है—“नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्” (गीता 5। 8)। भगवान् भी कहते हैं कि जब मनुष्य गुणोंके सिवाय अन्य किसीको कर्ता नहीं देखता अर्थात् वह क्रियामात्रमें ऐसा अनुभव करता है कि गुणोंके सिवाय दूसरा कोई कर्ता नहीं है और अपनेको गुणोंसे बिलकुल असम्बद्ध अनुभव करता है, जो वास्तवमें है*, तब वह मेरे स्वरूपको प्राप्त हो जाता है (चौदहवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)। साधक खाने-पीने, सोने-जागने आदि लौकिक क्रियाओंको तो विचारद्वारा प्रकृतिमें होनेवाली सुगमतासे मान सकता है, पर वह जप, ध्यान, समाधि आदि पारमार्थिक क्रियाओंको अपने द्वारा होनेवाली तथा अपने लिये मानता है तो यह वास्तवमें साधकके लिये बाधक है। कारण कि ज्ञानयोगकी दृष्टिसे क्रिया चाहे ऊँची-से-ऊँची हो अथवा नीची-से-नीची, है वह एक जातिकी (प्राकृत) ही। लाठी घुमाना और माला फेरना—दोनों क्रियाएँ अलग-अलग होनेपर भी प्रकृतिमें ही हैं। तात्पर्य है कि खाने-पीने, सोने-जागने आदिसे लेकर जप, ध्यान, समाधितक सम्पूर्ण लौकिक-पारमार्थिक क्रियाएँ प्रकृतिमें ही हो रही हैं। प्रकृतिका सम्बन्ध किये बिना क्रिया सम्भव ही नहीं है। अतः साधकको चाहिये कि वह पारमार्थिक क्रियाओंका त्याग तो न करे, पर उनमें अपना कर्तृत्व न माने अर्थात् उनको अपने द्वारा होनेवाली तथा अपने लिये न माने। क्रिया चाहे लौकिक हो, चाहे पारमार्थिक हो, उसका महत्त्व वास्तवमें जड़ताका ही महत्त्व है। शास्त्रविहित होनेके कारण पारमार्थिक क्रियाओंका अन्तःकरणमें जो विशेष महत्त्व रहता है, वह भी जड़ताका ही महत्त्व होनेसे साधकके लिये बाधक है*। पारमार्थिक क्रियाओंका उद्देश्य परमात्मा रहनेसे वे कल्याणकारक हो जाती हैं। ज्यों-ज्यों क्रियाकी गौणता और भगवत्सम्बन्धकी मुख्यता होती है, त्यों-त्यों अधिक लाभ होता है। क्रियाकी मुख्यता होनेपर वर्षोंतक साधन करनेपर भी लाभ नहीं होता। अतः क्रियाका महत्त्व न होकर भगवान्में प्रियता होनी चाहिये। प्रियता ही भजन है, क्रिया नहीं। जिसकी बुद्धि विवेकरहित है अर्थात् जिसने विवेकको महत्त्व नहीं दिया है, वह दुर्मति है। बोधमें विवेक कारण है, बुद्धि नहीं। बुद्धि विवेकसे शुद्ध होती है। बुद्धिकी शुद्धिमें शुभ कर्म भी कुछ सहायक होते है, पर विवेक-विचारसे बुद्धिकी जैसी शुद्धि होती है, वैसी शुभ कर्मोंसे नहीं होती। विवेकको महत्त्व न देना जितना दोषी है, उतने मल- विक्षेप-आवरण दोषी नहीं हैं। विवेक अनादि और नित्य है। इसलिये मल-विक्षेप-आवरणके रहते हुए भी विवेक जाग्रत् हो सकता है। पापसे विवेक नष्ट नहीं होता, प्रत्युत विवेक जाग्रत् नहीं होता। विवेकको महत्त्व न देनेमें कारण है—क्रिया और पदार्थका महत्त्व। क्रिया और पदार्थको महत्त्व देनेवाला ही “दुर्मति” है।
* स्वरूप (आत्मा) गुणोंसे सर्वथा रहित है—“निर्गुणत्वात्” (गीता 13। 31)। गुण प्रकाश्य है, स्वरूप प्रकाशक है।
गुण परिवर्तनशील हैं, स्वरूप अपरिवर्तनशील है। गुण अनित्य हैं, स्वरूप नित्य है। स्वरूप निर्गुण होते हुए भी जब यह गुणोंका
संग कर लेता है, तब जन्म-मरणमें पड़ जाता है—“कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु” (गीता 13। 21)।
17श्रीभगवान्
यस्य ाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य लिप्यतेहत्वापि स इमाँल्लोकान् हन्तिनिबध्यते॥ 17॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

पूर्वश्लोकमें यह बताया कि शुद्ध स्वरूपको कर्ता देखनेवाला दुर्मति ठीक नहीं देखता। तो ठीक देखनेवाला कौन है—इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
8 sections
यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते
जिसमें
मैं करता हूँ
ऐसा अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धिमें
मेरेको फल मिलेगा
ऐसे स्वार्थ- भावका लेप नहीं है। इसको ऐसे समझना चाहिये—जैसे शास्त्रविहित और शास्त्रनिषिद्ध—ये सभी क्रियाएँ एक प्रकाशमें होती हैं और प्रकाशके ही आश्रित होती हैं; परन्तु प्रकाश किसी भी क्रियाका “कर्ता” नहीं बनता अर्थात् प्रकाश उन क्रियाओंको न करनेवाला है और न करानेवाला है। ऐसे ही स्वरूपकी सत्ताके बिना विहित और निषिद्ध—कोई भी क्रिया नहीं होती; परन्तु वह सत्ता उन क्रियाओंको न करनेवाली है और न करानेवाली है—ऐसा जिसको साक्षात् अनुभव हो जाता है, उसमें
मैं क्रियाओंको करनेवाला हूँ
अमुक चीज नहीं चाहिये”;
अमुक घटना होनी चाहिये, अमुक घटना नहीं होनी चाहिये
ऐसा बुद्धिमें लेप (द्वन्द्वमोह) नहीं रहता। अहंकृतभाव और बुद्धिमें लेप न रहनेसे उसके कर्तृत्व और भोक्तृत्व—दोनों नष्ट हो जाते हैं अर्थात् अपनेमें कर्तृत्व और भोक्तृत्व—ये दोनों ही नहीं हैं, इसका वास्तविक अनुभव हो जाता है। प्रकृतिका कार्य स्वतः-स्वाभाविक ही चल रहा है, परिवर्तित हो रहा है और अपना स्वरूप केवल उसका प्रकाशक है—ऐसा समझकर जो अपने स्वरूपमें स्थित रहता है, उसमें “मैं करता हूँ” ऐसा अहंकृतभाव नहीं होता; क्योंकि अहंकृतभाव प्रकृतिके कार्य शरीरको स्वीकार करनेसे ही होता है। अहंकृतभाव सर्वथा मिटनेपर उसकी बुद्धिमें “फल मेरेको मिले” ऐसा लेप भी नहीं होता अर्थात् फलकी कामना नहीं होती। अहंकृतभाव एक मनोवृत्ति है। मनोवृत्ति होते हुए भी यह भाव स्वयं-(कर्ता-)में रहता है; क्योंकि कर्तृत्व और अकर्तृत्व भाव स्वयं ही स्वीकार करता है।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते
वह इन सम्पूर्ण प्राणियोंको एक साथ मार डाले, तो भी वह मारता नहीं; क्योंकि उसमें कर्तृत्व नहीं है और वह बँधता भी नहीं; क्योंकि उसमें भोक्तृत्व नहीं है। तात्पर्य यह है कि उसका न क्रियाओंके साथ सम्बन्ध है और न फलके साथ सम्बन्ध है। वास्तवमें प्रकृति ही क्रिया और फलमें परिणत होती है। परन्तु इस वास्तविकताका अनुभव न होनेसे ही पुरुष (चेतन) कर्ता और भोक्ता बनता है। कारण कि जब अहंकारपूर्वक क्रिया होती है, तब कर्ता, करण और कर्म— तीनों मिलते हैं और तभी कर्मसंग्रह होता है। परन्तु जिसमें अहंकृतभाव नहीं रहा, केवल सबका प्रकाशक, आश्रय, सामान्य चेतन ही रहा, फिर वह कैसे किसको मारे? और कैसे किससे बँधे? उसका “मारना” और “बँधना” सम्भव ही नहीं है (गीता—दूसरे अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)। सम्पूर्ण प्राणियोंको मारना क्या है? जिसमें अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धिमें लेप नहीं है—ऐसे मनुष्यका शरीर जिस वर्ण और आश्रममें रहता है, उसके अनुसार उसके सामने जो परिस्थिति आ जाती है, उसमें प्रवृत्त होनेपर उसे पाप नहीं लगता। जैसे, किसी जीवन्मुक्त क्षत्रियके लिये स्वतः युद्धकी परिस्थिति प्राप्त हो जाय तो वह उसके अनुसार सबको मारकर भी न तो मारता है और न बँधता है। कारण कि उसमें अभिमान और स्वार्थभाव नहीं है। यहाँ अर्जुनके सामने भी युद्धका प्रसंग है। इसलिये भगवान्ने “हत्वापि” पदसे अर्जुनको युद्धके लिये प्रेरणा की है। “अपि” पदका भाव है—“कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः” (गीता 4। 20) “कर्मोंमें अच्छी तरह प्रवृत्त होनेपर भी वह कुछ नहीं करता।” “सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते” (गीता 6। 31) “सर्वथा बर्ताव करता हुआ भी वह योगी मेरेमें रहता है। “शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते” (गीता 13। 31) “शरीरमें स्थित होनेपर भी न करता है और न लिप्त होता है।” तात्पर्य यह है कि कर्मोंमें सांगोपांग प्रवृत्त होनेके समय और जिस समय कर्मोंमें प्रवृत्ति नहीं है, उस समय भी स्वरूपकी निर्विकल्पता ज्यों-की-त्यों रहती है अर्थात् क्रिया करनेसे अथवा क्रिया न करनेसे स्वरूपमें कुछ भी फरक नहीं पड़ता। कारण कि क्रिया- विभाग प्रकृतिमें है, स्वरूपमें नहीं। वास्तवमें यह अहंभाव (व्यक्तित्व) ही मनुष्यमें भिन्नता करनेवाला है। अहंभाव न रहनेसे परमात्माके साथ भिन्नताका कोई कारण ही नहीं है। फिर तो केवल सबका आश्रय, प्रकाशक सामान्य चेतन रहता है। वह न तो क्रियाका कर्ता बनता है और न फलका भोक्ता ही बनता है। क्रियाओंका कर्ता और फलका भोक्ता तो वह पहले भी नहीं था। केवल नाशवान् शरीरके साथ सम्बन्ध मानकर जिस अहंभावको स्वीकार किया है, उसी अहंभावसे उसमें कर्तापन और भोक्तापन आया है। “अहम्” दो प्रकारका होता है—“अहंस्फूर्ति और अहंकृति। गाढ़ नींदसे उठते ही सबसे पहले मनुष्यको अपने होनेपन-(सत्तामात्र-) का भान होता है, इसको “अहंस्फूर्ति” कहते हैं। इसके बाद वह अपनेमें
मैं अमुक नाम, वर्ण, आश्रम आदिका हूँ
ऐसा आरोप करता है, यही असत्का सम्बन्ध है। असत्के सम्बन्धसे अर्थात् शरीरके साथ तादात्म्य माननेसे शरीरकी क्रियाको लेकर
मैं करता हूँ
ऐसा भाव उत्पन्न होता है, इसको “अहंकृति” कहते हैं। “अहम्” को लेकर ही अपनेमें परिच्छिन्नता आती है। इसलिये अहंस्फूर्तिमें भी किंचित् परिच्छिन्नता (व्यक्तित्व) रह सकती है। परन्तु यह परिच्छिन्नता बन्धनकारक नहीं होती अर्थात् परिच्छिन्नता रहनेपर भी अहंस्फूर्ति दोषी नहीं होती। कारण कि अहंकृति अर्थात् कर्तृत्वके बिना अपनेमें गुण-दोषका आरोप नहीं होता। अहंकृति आनेसे ही अपनेमें गुण-दोषका आरोप होता है, जिससे शुभ-अशुभ कर्म बनते हैं। बोध होनेपर अहंस्फूर्तिमें जो परिच्छिन्नता है, वह जल जाती है और स्फूर्तिमात्र रह जाती है। ऐसी स्थितिमें मनुष्य न मारता है और न बँधता है। “न हन्ति न निबध्यते” (न मारता है और न बँधता है) का क्या भाव है? एक निर्विकल्प-अवस्था होती है और एक निर्विकल्प-बोध होता है। निर्विकल्प-अवस्था साधन- साध्य है और उसका उत्थान भी होता है अर्थात् वह एकरस नहीं रहती। इस निर्विकल्प-अवस्थासे भी असंगता होनेपर स्वतःसिद्ध निर्विकल्प-बोधका अनुभव होता है। निर्विकल्प- बोध साधन-साध्य नहीं है और उसमें निर्विकल्पता किसी भी अवस्थामें किंचिन्मात्र भी भंग नहीं होती। निर्विकल्प- बोधमें कभी परिवर्तन हुआ नहीं, होगा नहीं और होना सम्भव भी नहीं। तात्पर्य है कि उस निर्विकल्प-बोधमें कभी हलचल आदि नहीं होते, यही “न हन्ति न निबध्यते” का भाव है। अहंकृतभाव और बुद्धिमें लेप न रहनेका उपाय क्या है? क्रियारूपसे परिवर्तन केवल प्रकृतिमें ही होता है और उन क्रियाओंका भी आरम्भ और अन्त होता है तथा उन कर्मोंके फलरूपसे जो पदार्थ मिलते हैं, उनका भी संयोग- वियोग होता है। इस प्रकार क्रिया और पदार्थ—दोनोंके साथ संयोग-वियोग होता रहता है। संयोग-वियोग होनेपर भी स्वयं तो प्रकाशकरूपसे ज्यों-का-त्यों ही रहता है। विवेक-विचारसे ऐसा अनुभव होनेपर अहंकृतभाव और बुद्धिमें लेप नहीं रहता।
परिशिष्ट भाव
अहंकृतभाव नहीं होनेका तात्पर्य है—अहंतारहित होना और बुद्धि लिप्त नहीं होनेका तात्पर्य है—कामना, ममता और स्वार्थभावसे रहित होना। अर्जुनने कहा था कि इन आततायियोंको मारनेसे हमारेको पाप लगेगा—“पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः” (गीता 1। 36) और गुरुजनोंको मारनेसे पाप लगेगा—“गुरूनहत्वा हि महानुभावान्.......” (गीता 2। 5)। अतः यहाँ भगवान् कहते हैं कि इनको मारनेसे पाप लगनेकी तो बात ही क्या है, सम्पूर्ण प्राणियोंको मारनेसे भी पाप नहीं लगेगा, क्योंकि पाप लगनेमें हेतु अहंता और बुद्धिकी लिप्तता है। बुद्धि कामना, ममता और स्वार्थभावसे लिप्त होती है। गंगाजीमें कोई डूबकर मर जाता है तो गंगाजीको पाप नहीं लगता और कोई उसका जल पीता है, स्नान करता है, खेती करता है तो उससे गंगाजीको पुण्य नहीं लगता है। वर्षासे कई जीव मर जाते हैं और कइयोंको जीवन मिल जाता है, पर वर्षाको पाप-पुण्य नहीं लगते। कारण कि गंगाजीमें और वर्षामें अहंकृतभाव और बुद्धिका लेप नहीं है। अगर डॉक्टरमें कामना, ममता और स्वार्थबुद्धि न हो तो ऑपरेशनमें अंग काटनेपर भी उसको पाप नहीं लगता। अगर उसमें अहंकृतभाव भी न हो तो फिर पाप लगनेकी बात ही क्या है। ज्ञानयोगसे “अहंकृतभाव” का नाश होता है और कर्मयोगसे “बुद्धिकी लिप्तता” नष्ट होती है। दोनोंमेंसे किसी एकका नाश होनेपर दूसरा भी नष्ट हो जाता है। अहंकृतभावके कारण ही जीवमें भोग और मोक्षकी इच्छा पैदा होती है। अहंकृतभाव मिटनेसे भोगेच्छा भी मिट जाती है—“बुद्धिर्यस्य न लिप्यते”। भोगेच्छा मिटनेपर मोक्षकी इच्छा स्वतः पूरी हो जाती है; क्योंकि मोक्ष स्वतःसिद्ध है।
* भगवान्के लिये की गयी उपासनामें भगवान्की कृपा प्रधान होती है; अतः इसमें साधकका कर्तृत्व नहीं है। क्रिया, कर्म,
उपासना और विवेक—चारों अलग-अलग हैं। “क्रिया” किसीके भी साथ सम्बन्ध नहीं जोड़ती। “कर्म” अनुकूल-प्रतिकूल
परिस्थिति (फल)-के साथ सम्बन्ध जोड़ता है। “उपासना” भगवान्के साथ सम्बन्ध जोड़ती है। “विवेक” जड़-चेतनका सम्बन्ध-
विच्छेद करता है।
18श्रीभगवान्
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदनाकरणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः॥ 18॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

ज्ञान और प्रवृत्ति (क्रिया) दोषी नहीं होते, प्रत्युत कर्तृत्वाभिमान ही दोषी होता है; क्योंकि कर्तृत्वाभिमानसे ही कर्मसंग्रह होता है—यह बात आगेके श्लोकमें बताते हैं।

पदच्छेद
श्लोकमें ढूँढ़नेके लिये हॉवर करें
व्याख्या
3 sections
[इसी अध्यायके चौदहवें श्लोकमें भगवान्ने कर्मोंके बननेमें पाँच हेतु बताये—अधिष्ठान, कर्ता, करण, चेष्टा और दैव (संस्कार)। इन पाँचोंमें भी मूल हेतु है—कर्ता। इसी मूल हेतुको मिटानेके लिये भगवान्ने सोलहवें श्लोकमें कर्तृत्वभाव रखनेवालेकी बड़ी निन्दा की और सत्रहवें श्लोकमें कर्तृत्वभाव न रखनेवालेकी बड़ी प्रशंसा की। कर्तृत्वभाव बिलकुल न रहे, यह साफ-साफ समझानेके लिये ही अठारहवाँ श्लोक कहा गया है।]
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना
ज्ञान, ज्ञेय और परिज्ञाता—इन तीनोंसे कर्म-प्रेरणा होती है। “ज्ञान” को सबसे पहले कहनेमें यह भाव है कि हरेक मनुष्यकी कोई भी प्रवृत्ति होती है तो प्रवृत्तिसे पहले ज्ञान होता है। जैसे, जल पीनेकी प्रवृत्तिसे पहले प्यासका ज्ञान होता है, फिर वह जलसे प्यास बुझाता है। जल आदि जिस विषयका ज्ञान होता है, वह “ज्ञेय” कहलाता है और जिसको ज्ञान होता है, वह “परिज्ञाता” कहलाता है। ज्ञान, ज्ञेय और परिज्ञाता— तीनों होनेसे ही कर्म करनेकी प्रेरणा होती है। यदि इन तीनोंमेंसे एक भी न हो तो कर्म करनेकी प्रेरणा नहीं होती। “परिज्ञाता” उसको कहते हैं, जो “परितः” ज्ञाता है अर्थात् जो सब तरहकी क्रियाओंकी स्फुरणाका ज्ञाता है। वह केवल “ज्ञाता” मात्र है अर्थात् उसे क्रियाओंकी स्फुरणामात्रका ज्ञान होता है, उसमें अपने लिये कुछ चाहनेका अथवा उस क्रियाको करनेका अभिमान आदि बिलकुल नहीं होता। कोई भी क्रिया करनेकी स्फुरणा एक व्यक्तिविशेषमें ही होती है। इसलिये शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध— इन विषयोंको लेकर सुननेवाला, स्पर्श करनेवाला, देखनेवाला, चखनेवाला और सूँघनेवाला—इस तरह अनेक “कर्ता” हो सकते हैं; परन्तु उन सबको जाननेवाला एक ही रहता है, उसे ही यहाँ “परिज्ञाता” कहा है।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः
कर्मसंग्रहके तीन हेतु हैं—करण, कर्म तथा कर्ता। इन तीनोंके सहयोगसे कर्म पूरा होता है। जिन साधनोंसे कर्ता कर्म करता है, उन क्रिया करनेके साधनों-(इन्द्रियों आदि-)को “करण” कहते हैं। खाना-पीना, उठना-बैठना, चलना-फिरना, आना-जाना आदि जो चेष्टाएँ की जाती हैं, उनको “कर्म” कहते हैं। करण और क्रियासे अपना सम्बन्ध जोड़कर कर्म करनेवालेको “कर्ता” कहते हैं। इस प्रकार इन तीनोंके मिलनेसे ही कर्म बनता है। भगवान्को यहाँ खास बात यह बतानी है कि कर्मसंग्रह कैसे होता है? अर्थात् कर्म बाँधनेवाला कैसे होता है? कर्म बननेके तीन हेतु बताते हुए भगवान्का लक्ष्य मूल हेतु “कर्ता” को बतानेमें है; क्योंकि कर्मसंग्रहका खास सम्बन्ध कर्तासे है। यदि कर्तापन न हो तो कर्मसंग्रह नहीं होता, केवल क्रियामात्र होती है। कर्म-संग्रहमें “करण” हेतु नहीं है; क्योंकि करण कर्ताके अधीन होता है। कर्ता जैसा कर्म करना चाहता है, वैसा ही कर्म होता है, इसलिये “कर्म” भी कर्मसंग्रहमें खास हेतु नहीं है। सांख्यसिद्धान्तके अनुसार खास बाँधनेवाला है—अहंकृतभाव और इसीसे कर्मसंग्रह होता है। अहंकृतभाव न रहनेसे कर्मसंग्रह नहीं होता अर्थात् कर्म फलजनक नहीं होता। इस मूलका अर्थात् अहंकृतभावका ज्ञान करानेके लिये ही भगवान्ने करण और कर्मको पहले रखकर कर्ताको कर्मसंग्रहके पासमें रखा है, जिससे यह खयालमें आ जाय कि बाँधनेवाला “कर्ता” ही है।
परिशिष्ट भाव
अर्जुनने ज्ञानयोग और कर्मयोगका तत्त्व जाननेकी इच्छा प्रकट की थी (अठारहवें अध्यायका पहला श्लोक), इसलिये भगवान्ने बारहवें श्लोकतक कर्मयोगका वर्णन किया। फिर भगवान्ने ज्ञानयोगकी दृष्टिसे कर्मोंका विवेचन करते हुए पहले कर्मोंकी सिद्धिके लिये पाँच हेतु बताये (अठारहवें अध्यायका तेरहवाँ, चौदहवाँ तथा पन्द्रहवाँ श्लोक)। उसी बातको अब प्रकारान्तरसे कर्मप्रेरणा और कर्मसंग्रहके रूपमें वर्णन करते हैं। जब मनुष्यके भीतर अहंकार और लिप्तता रहती है, तब ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेयरूप त्रिपुटीसे “कर्मप्रेरणा” अर्थात् कर्म करनेमें प्रवृत्ति होती है कि मैं अमुक कार्य करूँगा तो मेरेको अमुक फल मिलेगा। कर्मप्रेरणा होनेसे “कर्मसंग्रह” अर्थात् पाप और पुण्यका संग्रह होता है। वे पाप और पुण्य-कर्म कैसे होते हैं—यह आगे बीसवें श्लोकसे विस्तारपूर्वक बतायेंगे।
19श्रीभगवान्
ज्ञानं कर्म कर्ता त्रिधैव गुणभेदतःप्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि॥ 19॥
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सम्बन्ध

गुणातीत होनेके उद्देश्यसे अब आगेके श्लोकसे त्रिगुणात्मक पदार्थोंका प्रकरण आरम्भ करते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
6 sections
प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने
जिस शास्त्रमें गुणोंके सम्बन्धसे प्रत्येक पदार्थके भिन्न-भिन्न भेदोंकी गणना की गयी है, उसी शास्त्रके अनुसार मैं तुम्हें ज्ञान, कर्म तथा कर्ताके भेद बता रहा हूँ।
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः
पीछेके श्लोकमें भगवान्ने कर्मकी प्रेरणा होनेमें तीन हेतु बताये तथा तीन ही हेतु कर्मके बननेमें बताये। इस प्रकार कर्मसंग्रह होनेतकमें कुल छः बातें बतायीं*। अब इस श्लोकमें भगवान् ज्ञान, कर्म तथा कर्ता—इन तीनोंका विवेचन करनेकी ही बात कहते हैं। कर्म-प्रेरक-विभागमेंसे विवेचन करनेके लिये केवल “ज्ञान” लिया गया है, क्योंकि किसी भी कर्मकी प्रेरणामें पहले ज्ञान ही होता है। ज्ञानके बाद ही कार्यका आरम्भ होता है। कर्मसंग्रह-विभागमेंसे केवल “कर्म” और “कर्ता” लिये गये हैं। यद्यपि कर्मके होनेमें कर्ता मुख्य है, तथापि साथमें कर्मको भी लेनेका कारण यह है कि कर्ता जब कर्म करता है, तभी कर्मसंग्रह होता है। अगर कर्ता कर्म न करे तो कर्मसंग्रह होगा ही नहीं। तात्पर्य यह हुआ कि कर्मप्रेरणामें “ज्ञान” तथा कर्मसंग्रहमें “कर्म” और “कर्ता” मुख्य हैं। इन तीनों—(ज्ञान, कर्म और कर्ता—)-के सात्त्विक होनेसे ही मनुष्य निर्लिप्त हो सकता है, राजस और तामस होनेसे नहीं। अतः यहाँ कर्मप्रेरक-विभागमें “ज्ञाता” और “ज्ञेय” को तथा कर्मसंग्रह- विभागमें “करण” को नहीं लिया गया है। कर्मप्रेरक-विभागके “ज्ञाता” और “ज्ञेय” का विवेचन क्यों नहीं किया? कारण कि ज्ञाता जब क्रियासे सम्बन्ध जोड़ता है, तब वह “कर्ता” कहलाता है और उस कर्ताके तीन (सात्त्विक, राजस और तामस) भेदोंके अन्तर्गत ही ज्ञाताके भी तीन भेद हो जाते हैं। परन्तु ज्ञाता जब ज्ञप्तिमात्र रहता है, तब उसके तीन भेद नहीं होते; क्योंकि उसमें गुणोंका संग नहीं है। गुणोंका संग होनेसे ही उसके तीन भेद होते हैं। इसलिये वृत्ति-ज्ञान ही सात्त्विक, राजस तथा तामस होता है। जिसे जाना जाय, उस विषयको “ज्ञेय” कहते हैं। जाननेके विषय अनेक हैं, इसलिये इसके अलग भेद नहीं किये गये। परन्तु जाननेयोग्य सब विषयोंका एकमात्र लक्ष्य “सुख” प्राप्त करना ही रहता है। जैसे, कोई विद्या पढ़ता है, कोई धन कमाता है, कोई अधिकार पानेकी चेष्टा करता है तो इन सब विषयोंको जानने, पानेकी चेष्टाका लक्ष्य एकमात्र “सुख” ही रहता है। विद्या पढ़नेमें यही भाव रहता है कि ज्यादा पढ़कर ज्यादा धन कमाऊँगा, मान पाऊँगा और उनसे मैं सुखी होऊँगा। ऐसे ही हरेक कर्मका लक्ष्य परम्परासे सुख ही रहता है। इसलिये भगवान्ने ज्ञेयके तीन भेद सात्त्विक, राजस और तामस “सुख” के नामसे आगे (छत्तीसवेंसे उनतालीसवें श्लोकतक) किये हैं। ऐसे ही भगवान्ने करणके भी तीन भेद नहीं किये; क्योंकि इन्द्रियाँ आदि जितने भी करण हैं, वे सब साधनमात्र हैं। इसलिये उनके तीन भेद नहीं होते। परन्तु इन सभी करणोंमें “बुद्धि” की ही प्रधानता है; क्योंकि मनुष्य करणोंसे जो कुछ भी काम करता है, उसको वह बुद्धिपूर्वक (विचारपूर्वक) ही करता है। इसलिये भगवान्ने करणके तीन भेद सात्त्विक, राजस और तामस “बुद्धि”के नामसे आगे (तीसवेंसे बत्तीसवें श्लोकतक) किये हैं। बुद्धिको दृढ़तासे रखनेमें “धृति” बुद्धिकी सहायक बनती है। ज्ञानयोगकी साधनामें भगवान्ने दो जगह (छठे अध्यायके पचीसवें तथा अठारहवें अध्यायके इक्यावनवें श्लोकमें) बुद्धिके साथ “धृति” पद भी दिया है। इससे यह मालूम देता है कि ज्ञानमार्गमें बुद्धिके साथ धृतिकी विशेष आवश्यकता है। इसलिये भगवान्ने धृतिके भी तीन भेद (तैंतीसवेंसे पैंतीसवें श्लोकतक) बताये हैं। “त्रिधैव” पदमें यह भाव है कि ये भेद तीन (सात्त्विक, राजस और तामस) ही होते हैं, कम और ज्यादा नहीं होते अर्थात् न दो होते हैं और न चार होते हैं। कारण कि सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण ही प्रकृतिसे उत्पन्न हैं—“सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः” (गीता 14। 5)। इसलिये इन तीनों गुणोंको लेकर तीन ही भेद होते हैं।
यथावत्
गुणसंख्यान-शास्त्रमें इस विषयका जैसा वर्णन हुआ है, वैसा-का-वैसा तुम्हें सुना रहा हूँ; अपनी तरफसे कुछ कम या अधिक करके नहीं सुना रहा हूँ।
शृणु
इस विषयको ध्यानसे सुनो। कारण कि सात्त्विक, राजस और तामस—इन तीनोंमेंसे “सात्त्विक” चीजें तो कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद करके परमात्मतत्त्वका बोध करानेवाली हैं, “राजस” चीजें जन्म-मरण देनेवाली हैं; और “तामस” चीजें पतन करनेवाली अर्थात् नरकों और नीच योनियोंमें ले जानेवाली हैं। इसलिये इनका वर्णन सुनकर सात्त्विक चीजोंको ग्रहण तथा राजस-तामस चीजोंका त्याग करना चाहिये।
तानि
इन ज्ञान आदिका तुम्हारे स्वरूपके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है। तुम्हारा स्वरूप तो सदा निर्लेप है।
अपि
इनके भेदोंको जाननेकी भी बड़ी भारी आवश्यकता है; क्योंकि इनको ठीक तरहसे जाननेपर “यस्य नाहंकृतो भावो ...... न हन्ति न निबध्यते” (18। 17)— इस श्लोकका ठीक अनुभव हो जायगा अर्थात् अपने स्वरूपका बोध हो जायगा।
* कर्मप्रेरणा तो सूक्ष्म है और कर्मसंग्रह स्थूल है अर्थात् ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता—ये तीनों सूक्ष्म सामग्री हैं तथा कर्म, करण
और कर्ता—ये तीनों स्थूल सामग्री हैं।
20श्रीभगवान्
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते। अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥ 20॥
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सम्बन्ध

अब भगवान् सात्त्विक ज्ञानका वर्णन करते हैं।

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व्याख्या
7 sections
सर्वभूतेषु येनैकं ........... अविभक्तं विभक्तेषु
व्यक्ति, वस्तु आदिमें जो “है” पन दीखता है, वह उन व्यक्ति, वस्तु आदिका नहीं है, प्रत्युत सबमें परिपूर्ण परमात्माका ही है। उन व्यक्ति, वस्तु आदिकी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं है; क्योंकि उनमें प्रतिक्षण परिवर्तन हो रहा है। कोई भी व्यक्ति, वस्तु आदि ऐसी नहीं है, जिसमें परिवर्तन न होता हो; परन्तु अपनी अज्ञता- (बेसमझी-)से उनकी सत्ता दीखती है। जब अज्ञता मिट जाती है, ज्ञान हो जाता है, तब साधककी दृष्टि उस अविनाशी तत्त्वकी तरफ ही जाती है, जिसकी सत्तासे यह सब सत्तावान् हो रहा है। ज्ञान होनेपर साधककी दृष्टि परिवर्तनशील वस्तुओंको भेदकर परिवर्तनरहित तत्त्वकी ओर ही जाती है (गीता— तेरहवें अध्यायका सत्ताईसवाँ श्लोक)। फिर वह विभक्त अर्थात् अलग-अलग वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, घटना आदिमें विभागरहित एक ही तत्त्वको देखता है (गीता— तेरहवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह है कि अलग-अलग वस्तु, व्यक्ति आदिका अलग-अलग ज्ञान और यथायोग्य अलग-अलग व्यवहार होते हुए भी वह इन विकारी वस्तुओंमें उस स्वतःसिद्ध निर्विकार एक तत्त्वको देखता है। उसके देखनेकी यही पहचान है कि उसके अन्तःकरणमें राग-द्वेष नहीं होते।
तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्
उस ज्ञानको तू सात्त्विक जान। परिवर्तनशील वस्तुओं, वृत्तियोंके सम्बन्धसे ही इसे “सात्त्विक ज्ञान” कहते हैं। सम्बन्धरहित होनेपर यही ज्ञान “वास्तविक बोध” कहलाता है, जिसको भगवान्ने सब साधनोंसे जाननेयोग्य ज्ञेय-तत्त्व बताया है—“ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते” (गीता 13। 12)। मार्मिक बात संसारका ज्ञान इन्द्रियोंसे होता है, इन्द्रियोंका ज्ञान बुद्धिसे होता है और बुद्धिका ज्ञान “मैं”से होता है। वह “मैं” बुद्धि, इन्द्रियाँ और विषय—इन तीनोंको जानता है। परन्तु उस “मैं” का भी एक प्रकाशक है, जिसमें “मैं”का भी भान होता है। वह प्रकाश सर्वदेशीय और असीम है, जबकि “मैं” एकदेशीय और सीमित है। उस प्रकाशमें जैसे “मैं” का भान होता है, वैसे ही “तू”, “यह” और “वह” का भी भान होता है। वह प्रकाश किसीका भी विषय नहीं है। वास्तवमें वह प्रकाश निर्गुण ही है; परन्तु व्यक्ति-विशेषमें रहनेवाला होनेसे (वृत्तियोंके सम्बन्धसे) उसे “सात्त्विक ज्ञान” कहते हैं। इस सात्त्विक ज्ञानको दूसरे ढंगसे इस प्रकार समझना चाहिये—“मैं”, “तू”, “यह” और
वह
ये चारों ही किसी प्रकाशमें काम करते हैं। इन चारोंके अन्तर्गत सम्पूर्ण प्राणी आ जाते हैं, जो विभक्त हैं; परन्तु इनका जो प्रकाशक है, वह अविभक्त (विभागरहित) है। बोलनेवाला “मैं”, उसके सामने सुननेवाला “तू” और पासवाला “यह” तथा दूरवाला “वह” कहा जाता है अर्थात् बोलनेवाला अपनेको “मैं” कहता है, सामनेवालेको “तू” कहता है, पासवालेको “यह” कहता है और दूरवालेको “वह” कहता है। जो “तू” बना हुआ था, वह “मैं” हो जाय तो “मैं” बना हुआ “तू” हो जायगा और “यह” तथा “वह” वही रहेंगे। इसी प्रकार “यह” कहलानेवाला अगर “मैं” बन जाय तो “तू” कहलानेवाला “यह” बन जायगा और “मैं” कहलानेवाला “तू” बन जायगा। “वह” परोक्ष होनेसे अपनी जगह ही रहा। अब “वह” कहलानेवाला “मैं” बन जायगा तो उसकी दृष्टिमें “मैं”, “तू” और “यह” कहलानेवाले सब “वह” हो जायँगे*। इस प्रकार “मैं”, “तू”, “यह” और
वह
ये चारों ही एक-दूसरेकी दृष्टिमें चारों ही बन सकते हैं। इससे यह सिद्ध हुआ कि “मैं”, “तू”, “यह” और
वह
ये सब परिवर्तनशील हैं अर्थात् टिकनेवाले नहीं हैं, वास्तविक नहीं हैं। अगर वास्तविक होते तो एक ही रहते। वास्तविक तो इन सबका प्रकाशक और आश्रय है, जिसके प्रकाशमें “मैं”, “तू”, “यह” और “वह” का भान हो रहा है। उस प्रकाशकमें “मैं”, “तू”, “यह” और
वह
ये चारों ही नहीं हैं, प्रत्युत उसीसे इन चारोंको सत्ता मिलती है। अपनी मान्यताके कारण “मैं”, “तू”, “यह”, “वह” का तो भान होता है, पर प्रकाशकका भान नहीं होता। वह प्रकाशक सबको प्रकाशित करता है, स्वयंप्रकाश-स्वरूप है और सदा ज्यों-का-त्यों रहता है। “मैं”, “तू”, “यह” और
वह
यह सब विभक्त प्राणियोंका स्वरूप है और जो वास्तविक प्रकाशक है, वह विभागरहित है। यही वास्तवमें “सात्त्विक ज्ञान” है। विभागवाली, परिवर्तनशील और नष्ट होनेवाली जितनी वस्तुएँ हैं, यह ज्ञान उन सबका प्रकाशक है और स्वयं भी निर्मल तथा विकाररहित है—“तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् प्रकाशकमनामयम्” (गीता 14। 6)। इसलिये इस ज्ञानको “सात्त्विक” कहा जाता है। वास्तवमें यह “सात्त्विक ज्ञान” प्रकाश्यकी दृष्टि- (सम्बन्ध-)से “प्रकाशक” और विभक्तकी दृष्टिसे “अविभक्त” कहा जाता है। प्रकाश्य और विभक्तसे रहित होनेपर तो यह निर्गुण, निरपेक्ष “वास्तविक ज्ञान” ही है।
परिशिष्ट भाव
जैसे साधारण मनुष्य शरीरमें अपनेको व्यापक मानता है, ऐसे ही साधक संसारमें परमात्माको व्यापक मानता है। जैसे शरीर और संसार एक हैं, ऐसे ही स्वयं और परमात्मा एक हैं। साधककी दृष्टिमें प्राणियोंकी भी सत्ता रहनेके कारण यह “सात्त्विक ज्ञान” (विवेक) कहा गया है। अगर उसकी दृष्टिमें प्राणियोंकी सत्ता न रहे, केवल अविनाशी सत्ता ही रहे तो यह गुणातीत “तत्त्वज्ञान” (ब्रह्मकी प्राप्ति) ही है। वह अविनाशी सत्ता सब जगह समानरूपसे विद्यमान है। उस सत्ताके साथ हमारी स्वाभाविक एकता है।
21श्रीभगवान्
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्॥ 21॥
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सम्बन्ध

अब राजस ज्ञानका वर्णन करते हैं।

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व्याख्या
2 sections
पृथक्त्वेन तु1 यज्ज्ञानं नानाभावान् पृथग्विधान्
राजस ज्ञानमें “राग” की मुख्यता होती है— “रजो रागात्मकं विद्धि” (गीता 14। 7)। रागका यह नियम है कि वह जिसमें आ जाता है, उसमें किसीके प्रति आसक्ति, प्रियता पैदा करा देता है और किसीके प्रति द्वेष पैदा करा देता है। इस रागके कारण ही मनुष्य, देवता, यक्ष-राक्षस, पशु-पक्षी, कीट-पतंग, वृक्ष-लता आदि जितने भी चर-अचर प्राणी हैं, उन प्राणियोंकी विभिन्न आकृति, स्वभाव, नाम, रूप, गुण आदिको लेकर राजस ज्ञानवाला मनुष्य उनमें रहनेवाली एक ही अविनाशी आत्माको तत्त्वसे अलग-अलग समझता है।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्
इसी तरह जिस ज्ञानसे मनुष्य अलग-अलग शरीरोंमें अन्तःकरण, स्वभाव, इन्द्रियाँ, प्राण आदिके सम्बन्धसे प्राणियोंको भी अलग-अलग मानता है, वह ज्ञान “राजस” कहलाता है। राजस ज्ञानमें जड-चेतनका विवेक नहीं होता।
परिशिष्ट भाव
क्रिया और पदार्थ—दोनोंको सत्ता देकर उनके साथ रागपूर्वक सम्बन्ध जोड़नेके कारण सब अलग-अलग दीखते हैं।
* उदाहरणके रूपमें—राम, श्याम, गोविन्द और गोपाल—ये चार व्यक्ति हैं। राम और श्याम एक-दूसरेके सामने हैं,
गोविन्द उनके पास है और गोपाल उनसे दूर है। राम अपनेको “मैं” कहता है, अपने सामनेवाले श्यामको “तू” कहता है, पासवाले
गोविन्दको “यह” कहता है और दूरवाले गोपालको “वह” कहता है। अब यदि श्याम अपनेको “मैं” कहे तो रामको वह “तू”
कहेगा, गोविन्दको “यह” कहेगा तथा गोपालको “वह” कहेगा। इसी तरह अगर गोविन्द अपनेको “मैं” कहे तो वह श्यामको
“यह” कहेगा और रामको “तू” कहेगा अथवा श्यामको “तू” और रामको “यह” कहेगा, तथा दूरवाले गोपालको “वह” कहेगा।
अब अगर गोपाल अपनेको “मैं” कहे तो वह राम,श्याम और गोविन्द—तीनोंको “वह” कहेगा। इस प्रकार राम, श्याम, गोविन्द
और गोपाल—ये चारों ही एक-दूसरेकी दृष्टिमें “मैं”, “तू”, “यह” और “वह” बन सकते हैं।
22श्रीभगवान्
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्। तत्त्वार्थवदल्पं तत्तामसमुदाहृतम्॥ 22॥
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अब तामस ज्ञानका वर्णन करते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
4 sections
यत्तु2कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तम्
तामस मनुष्य एक ही शरीरमें सम्पूर्णकी तरह आसक्त रहता है अर्थात् उत्पन्न और नष्ट होनेवाले इस पांचभौतिक शरीरको ही अपना स्वरूप मानता है। वह मानता है कि मैं ही छोटा बच्चा था, मैं ही जवान हूँ और मैं ही बूढ़ा हो जाऊँगा; मैं भोगी, बलवान् और सुखी हूँ; मैं धनी और बड़े कुटुम्बवाला हूँ; मेरे समान दूसरा कौन है; इत्यादि। ऐसी मान्यता मूढ़ताके कारण ही होती है— “इत्यज्ञानविमोहिताः” (16। 15)।
अहैतुकम्
तामस मनुष्यकी मान्यता युक्ति और शास्त्रप्रमाणसे विरुद्ध होती है। यह शरीर हरदम बदल रहा है, शरीरादि वस्तुमात्र अभावमें परिवर्तित हो रही है, दृश्यमात्र अदृश्य हो रहा है और इनमें तू सदा ज्यों- का-त्यों रहता है; अतः यह शरीर और तू एक कैसे हो सकते हैं?—इस प्रकारकी युक्तियोंको वह स्वीकार नहीं करता।
अतत्त्वार्थवदल्पं च
यह शरीर और मैं दोनों अलग-अलग हैं—इस वास्तविक ज्ञान-(विवेक) से वह रहित है। उसकी समझ अत्यन्त तुच्छ है अर्थात् तुच्छताकी प्राप्ति करानेवाली है। इसलिये इसको “ज्ञान” कहनेमें भगवान्को संकोच हुआ है। कारण कि तामस पुरुषमें मूढ़ताकी प्रधानता होती है। मूढ़ता और ज्ञानका आपसमें विरोध है। अतः भगवान्ने “ज्ञान” पद न देकर “यत्” और “तत्” पदसे ही काम चलाया है।
तत्तामसमुदाहृतम्
युक्तिरहित, अल्प और अत्यन्त तुच्छ समझको ही महत्त्व देना “तामस” कहा गया है। जब तामस समझ “ज्ञान” है ही नहीं और भगवान्को भी इसको “ज्ञान” कहनेमें संकोच हुआ है, तो फिर इसका वर्णन ही क्यों किया गया? कारण कि भगवान्ने उन्नीसवें श्लोकमें ज्ञानके त्रिविध भेद कहनेका उपक्रम किया है, इसलिये सात्त्विक और राजस-ज्ञानका वर्णन करनेके बाद तामस समझको भी कहनेकी आवश्यकता थी।
परिशिष्ट भाव
तामस ज्ञानमें आसुरी सम्पत्ति विशेष है। इस श्लोकमें “ज्ञान” शब्द न देनेका तात्पर्य है कि वास्तवमें यह ज्ञान नहीं है, प्रत्युत अज्ञान ही है। यह तामस मनुष्योंकी बुद्धि है, जिसको “पशुबुद्धि” कहा गया है— त्वं तु राजन् मरिष्येति पशुबुद्धिमिमां जहि। न जातः प्रागभूतोऽद्य देहवत्त्वं न नङ्क्ष्यसि॥ (श्रीशुकदेवजी बोले—) “हे राजन्! अब तुम यह पशुबुद्धि छोड़ दो कि मैं मर जाऊँगा। जैसे शरीर पहले नहीं था, पीछे पैदा हुआ और फिर मर जायगा, ऐसे तुम पहले नहीं थे, पीछे पैदा हुए और फिर मर जाओगे— यह बात नहीं है।”
1-यहाँ “तु” पद राजस ज्ञानको सात्त्विक ज्ञानसे भिन्न बतानेके लिये आया है।
2-इस श्लोकमें राजस ज्ञानसे भी तामस ज्ञानको भिन्न बतानेके लिये “तु” पद आया है।
(श्रीमद्भा0 12। 5। 2)
23श्रीभगवान्
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते॥ 23॥
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सम्बन्ध

अब भगवान् सात्त्विक कर्मका वर्णन करते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
1 section
नियतं सङ्गरहितम् ........सात्त्विक-मुच्यते
जिस व्यक्तिके लिये वर्ण और आश्रमके अनुसार जिस परिस्थितिमें और जिस समय शास्त्रोंने जैसा करनेके लिये कहा है, उसके लिये वह कर्म “नियत” हो जाता है। यहाँ “नियतम्” पदसे एक तो कर्मोंका स्वरूप बताया है और दूसरे, शास्त्रनिषिद्ध कर्मका निषेध किया है। “सङ्गरहितम्” पदका तात्पर्य है कि वह नियत-कर्म कर्तृत्वाभिमानसे रहित होकर किया जाय। कर्तृत्वाभिमानसे रहित कहनेका भाव है कि जैसे वृक्ष आदिमें मूढ़ता होनेके कारण उनको कर्तृत्वका भान नहीं होता, पर उनकी भी ऋतु आनेपर पत्तोंका झड़ना, नये पत्तोंका निकलना,शाखा कटनेपर घावका मिल जाना, शाखाओंका बढ़ना, फल- फूलका लगना आदि सभी क्रियाएँ समष्टि शक्तिके द्वारा अपने-आप ही होती हैं; ऐसे ही इन सभी शरीरोंका बढ़ना- घटना, खाना-पीना, चलना-फिरना आदि सभी क्रियाएँ भी समष्टि शक्तिके द्वारा अपने-आप हो रही हैं। इन क्रियाओंके साथ न अभी कोई सम्बन्ध है, न पहले कोई सम्बन्ध था और न आगे ही कोई सम्बन्ध होगा। इस प्रकार जब साधकको प्रत्यक्ष अनुभव हो जाता है, तो फिर उसमें कर्तृत्व नहीं रहता। कर्तृत्व न रहनेपर उसके द्वारा जो कर्म होता है, वह संगरहित अर्थात् कर्तृत्वाभिमानरहित ही होता है। यहाँ सांख्य-प्रकरणमें कर्तृत्वका त्याग मुख्य होनेसे और आगे “अरागद्वेषतः कृतम्” पदोंमें भी आसक्तिके त्यागकी बात आनेसे यहाँ “सङ्गरहितम्” पदका अर्थ कर्तृत्व- अभिमानरहित लिया गया है*। “अरागद्वेषतः कृतम्” पदोंका तात्पर्य है कि राग-द्वेषसे रहित हो करके कर्म किया जाय अर्थात् कर्मका ग्रहण रागपूर्वक न हो और कर्मका त्याग द्वेषपूर्वक न हो तथा कर्म करनेके जितने साधन (शरीर, इन्द्रियाँ, अन्तःकरण आदि) हैं, उनमें भी राग-द्वेष न हो। “अरागद्वेषतः” पदसे वर्तमानमें रागका अभाव बताया है और “अफलप्रेप्सुना” पदसे भविष्यमें रागका अभाव बताया है। तात्पर्य यह है कि भविष्यमें मिलनेवाले फलकी इच्छासे रहित मनुष्यके द्वारा कर्म किया जाय अर्थात् क्रिया और पदार्थोंसे निर्लिप्त रहते हुए असंगतापूर्वक कर्म किया जाय तो वह सात्त्विक कहा जाता है। इस सात्त्विक कर्ममें सात्त्विकता तभीतक है, जबतक अत्यन्त सूक्ष्मरूपसे भी प्रकृतिके साथ सम्बन्ध है। जब प्रकृतिसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, तब यह कर्म “अकर्म” हो जाता है।
* यहाँ संन्यास-(सांख्ययोग-) में “सङ्गरहितम्” पदसे कर्तृत्व-अभिमानसे रहित होनेकी बात आयी है और त्याग-
(कर्मयोग-) में “सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव” (18। 9) पदोंसे आसक्ति तथा फलेच्छासे रहित होनेकी बात आयी है। इसका
तात्पर्य यह है कि सांख्ययोगीका शरीरमें थोड़ा भी अभिमान रहेगा तो उसका शरीरके साथ सम्बन्ध बना रहेगा, जो कि
24श्रीभगवान्
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनःक्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्॥ 24॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

अब राजस कर्मका वर्णन करते हैं।

पदच्छेद
श्लोकमें ढूँढ़नेके लिये हॉवर करें
व्याख्या
5 sections
यत्तु कामेप्सुना कर्म
हम कर्म करेंगे तो हमें पदार्थ मिलेंगे, सुख-आराम मिलेगा, भोग मिलेंगे, आदर-सम्मान-बड़ाई मिलेगी आदि फलकी इच्छासे कर्म किया जाय।
साहंकारेण
लोगोंके सामने कर्म करनेसे लोग देखते हैं और वाह-वाह करते हैं तो अभिमान आता है और जहाँ लोग सामने नहीं होते, वहाँ (एकान्तमें) कर्म करनेसे दूसरोंकी अपेक्षा अपनेमें विलक्षणता, विशेषता देखकर अभिमान आता है। जैसे—दूसरे आदमी हमारी तरह सुचारुरूपसे सांगोपांग कार्य नहीं कर सकते; हमारेमें काम करनेकी जो योग्यता, विद्या, चतुरता आदि है, वह हरेक आदमीमें नहीं मिलेगी; हम जो भी काम करते हैं, उसको बहुत ही ईमानदारीसे और जल्दी करते हैं, आदि- आदि। इस प्रकार अहंकारपूर्वक किया गया कर्म राजस कहलाता है।
वा पुनः
आगे भविष्यमें मिलनेवाले फलको लेकर (फलेच्छापूर्वक) कर्म किया जाय अथवा वर्तमानमें अपनी विशेषताको लेकर (अहंकारपूर्वक) कर्म किया जाय—इन दोनों भावोंमेंसे एक भाव होनेपर भी वह कर्म राजस हो जाता है, यह बतानेके लिये यहाँ “वा पुनः” पद आये हैं। तात्पर्य है कि फलेच्छा और अहंकार—इन दोनोंमेंसे जब एक भाव होनेपर भी कर्म “राजस” हो जाता है, तब दोनों भाव होनेपर वह कर्म राजस हो ही जायगा।
क्रियते बहुलायासम्
कर्म करते समय हरेक व्यक्तिके शरीरमें परिश्रम तो होता ही है, पर जिस व्यक्तिमें शरीरके सुख-आरामकी इच्छा मुख्य होती है, उसको कर्म करते समय शरीरमें ज्यादा परिश्रम मालूम देता है। जिस व्यक्तिमें कर्मफलकी इच्छा तो मुख्य है, पर शारीरिक सुख-आरामकी इच्छा मुख्य नहीं है, अर्थात् सुख- आराम लेनेकी स्वाभाविक ही प्रकृति नहीं है, उसको कर्म करते हुए भी शरीरमें परिश्रम नहीं मालूम देता। कारण कि भीतरमें भोगों और संग्रहकी जोरदार कामना होनेसे उसकी वृत्ति कामनापूर्तिकी तरफ ही लगी रहती है; शरीरकी तरफ नहीं। तात्पर्य है कि शरीरके सुख-आरामकी मुख्यता होनेसे फलेच्छाकी अवहेलना हो जाती है और फलेच्छाकी मुख्यता होनेसे शरीरके सुख-आरामकी अवहेलना हो जाती है। लोगोंके सामने कर्म करते समय अहंकारजन्य सुखकी खुराक मिलनेसे और शरीरके सुख-आरामकी मुख्यता न होनेसे राजस मनुष्यको कर्म करनेमें परिश्रम नहीं मालूम देता। परन्तु एकान्तमें कर्म करते समय अहंकारजन्य सुखकी खुराक न मिलनेसे और शरीरके सुख-आरामकी मुख्यता होनेसे राजस मनुष्यको कर्म करनेमें ज्यादा परिश्रम मालूम देता है।
तद्राजसमुदाहृतम्
ऐसे फलकी इच्छावाले मनुष्यके द्वारा अहंकार और परिश्रमपूर्वक किया हुआ जो कर्म है, वह “राजस” कहा गया है।
परिशिष्ट भाव
राजस मनुष्य अपनी आवश्यकताओंको अधिक बढ़ा लेता है, जिससे प्रत्येक काममें उसको अधिक वस्तुओंकी जरूरत पड़ती है। अधिक वस्तुओंको जुटानेमें परिश्रम भी अधिक होता है। राजस मनुष्य कर्मोंका विस्तार अधिक करता है, इसलिये भी उसको परिश्रम अधिक होता है। शरीरमें राग रहनेके कारण राजस मनुष्य शरीरका आराम चाहता है, जिससे उसको थोड़े काममें भी अधिक परिश्रम मालूम देता है।
तत्त्वप्राप्तिमें बाधक होगा; परन्तु कर्मयोगीका शरीरमें थोड़ा अभिमान रह भी जायगा तो वह सांख्ययोगीकी तरह उतना बाधक
नहीं होगा। कारण कि (कोई भी कर्म अपने लिये न करनेसे) कर्मयोगीका कर्तृत्व-अभिमान केवल कर्तव्य-पालनके लिये
ही होता है अर्थात् वह जिस समय जो कार्य करता है, उसी समय उसमें तात्कालिक कर्तृत्व-अभिमान रहता है। कार्यका अन्त
होनेपर वह कर्तृत्व-अभिमान उसी कार्यमें लीन हो जाता है।
* राजस कर्मको सात्त्विक कर्मसे भिन्न बतानेके लिये यहाँ “तु” पदका प्रयोग हुआ है।
25श्रीभगवान्
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य पौरुषम्मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते॥ 25॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
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अब तामस कर्मका वर्णन करते हैं।

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व्याख्या
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अनुबन्धम्
जिसको फलकी कामना होती है, वह मनुष्य तो फलप्राप्तिके लिये विचारपूर्वक कर्म करता है, परन्तु तामस मनुष्यमें मूढ़ताकी प्रधानता होनेसे वह कर्म करनेमें विचार करता ही नहीं। इस कार्यको करनेसे मेरा तथा दूसरे प्राणियोंका अभी और परिणाममें कितना नुकसान होगा, कितना अहित होगा—इस अनुबन्ध अर्थात् परिणामको न देखकर वह कार्य आरम्भ कर देता है।
क्षयम्
इस कार्यको करनेसे अपने और दूसरोंके शरीरोंकी कितनी हानि होगी; धन और समयका कितना खर्चा होगा; इससे दुनियामें मेरा कितना अपमान, निन्दा, तिरस्कार आदि होगा, मेरा लोक-परलोक बिगड़ जायगा आदि नुकसानको न देखकर ही वह कार्य आरम्भ कर देता है।
हिंसाम्
इस कर्मसे कितने जीवोंकी हत्या होगी; कितने श्रेष्ठ व्यक्तियोंके सिद्धान्तों और मान्यताओंकी हत्या हो जायगी; दूसरे मनुष्योंकी मनुष्यताकी कितनी भारी हिंसा हो जायगी; अभीके और भावी जीवोंके शुद्ध भाव, आचरण, वेश-भूषा, खान-पान आदिकी कितनी भारी हिंसा हो जायगी; इससे मेरा और दुनियाका कितना अधःपतन होगा आदि हिंसाको न देखकर ही वह कार्य आरम्भ कर देता है।
अनवेक्ष्य च पौरुषम्
इस कामको करनेकी मेरेमें कितनी योग्यता है, कितना बल, सामर्थ्य है; मेरे पास कितना समय है, कितनी बुद्धि है, कितनी कला है, कितना ज्ञान है आदि अपने पौरुष-(पुरुषार्थ-) को न देखकर ही वह कार्य आरम्भ कर देता है।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते
तामस मनुष्य कर्म करते समय उसके परिणाम, उससे होनेवाले नुकसान, हिंसा और अपनी सामर्थ्यका कुछ भी विचार न करके, जब जैसा मनमें भाव आया, उसी समय बिना विवेक- विचारके वैसा ही कर बैठता है। इस प्रकार किया गया कर्म “तामस” कहलाता है।
परिशिष्ट भाव
तामस मनुष्य अपनी शक्ति, परिणाम आदिका विचार न करके मूढ़तासे काम करता है*। वह स्वाभाविक ही ऐसे काम करता है, जिनसे दूसरोंको बाधा पहुँचे; जैसे—रास्तेमें खड़े होकर बात करने लग जाना, रास्तेमें साइकिल खड़ी कर देना आदि। दूसरोंको लगनेवाली बाधाकी तरफ उसका ध्यान ही नहीं जाता। सात्त्विक स्वभाव स्वतः उत्थानकी तरफ जाता है, राजस स्वभावमें उन्नति रुक जाती है और तामस स्वभाव स्वतः पतनकी तरफ जाता है।
26श्रीभगवान्
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितःसिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते॥ 26॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
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अब भगवान् सात्त्विक कर्ताके लक्षण बताते हैं।

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मुक्तसंगः
जैसे सांख्ययोगीका कर्मोंके साथ राग नहीं होता, ऐसे सात्त्विक कर्ता भी रागरहित होता है। कामना, वासना, आसक्ति, स्पृहा, ममता आदिसे अपना सम्बन्ध जोड़नेके कारण ही वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ, परिस्थिति, घटना आदिमें आसक्ति, लिप्तता होती है। सात्त्विक कर्ता इस लिप्ततासे सर्वथा रहित होता है।
अनहंवादी
पदार्थ, वस्तु, परिस्थिति आदिको लेकर अपनेमें जो एक विशेषताका अनुभव करना है—यह अहंवदनशीलता है। यह अहंवदनशीलता आसुरी-सम्पत्ति होनेसे अत्यन्त निकृष्ट है। सात्त्विक कर्तामें यह अहंवदनशीलता, अभिमान तो रहता ही नहीं, प्रत्युत “मैं इन चीजोंका त्यागी हूँ, मेरेमें यह अभिमान नहीं है, मैं निर्विकार हूँ, मैं सम हूँ, मैं सर्वथा निष्काम हूँ, मैं संसारके सम्बन्धसे रहित हूँ”—इस तरहके अहंभावका भी उसमें अभाव रहता है।
धृत्युत्साहसमन्वितः
कर्तव्य-कर्म करते हुए विघ्न- बाधाएँ आ जायँ, उस कर्मका परिणाम ठीक न निकले, लोगोंमें निन्दा हो जाय, तो भी विघ्न-बाधा आदि न आनेपर जैसा धैर्य रहता है, वैसा ही धैर्य विघ्न-बाधा आनेपर भी नित्य-निरन्तर बना रहे—इसका नाम “धृति” है और सफलता-ही-सफलता मिलती चली जाय, उन्नति होती चली जाय, लोगोंमें मान, आदर, महिमा आदि बढ़ते चले जायँ—ऐसी स्थितिमें मनुष्यके मनमें जैसी उम्मेदवारी, सफलताके प्रति उत्साह रहता है, वैसी ही उम्मेदवारी इससे विपरीत अर्थात् असफलता, अवनति, निन्दा आदि हो जानेपर भी बनी रहे—इसका नाम “उत्साह” है। सात्त्विक कर्ता इस प्रकारकी धृति और उत्साहसे युक्त रहता है।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः
सिद्धि और असिद्धिमें अपनेमें कुछ भी विकार न आये, अपनेपर कुछ भी असर न पड़े अर्थात् कार्य ठीक तरहसे सांगोपांग पूर्ण हो जाय अथवा पूरा उद्योग करते हुए अपनी शक्ति, समझ, समय, सामर्थ्य आदिको पूरा लगाते हुए भी कार्य पूरा न हो; फल प्राप्त हो अथवा न हो, तो भी अपने अन्तःकरणमें प्रसन्नता और खिन्नता, हर्ष और शोकका न होना ही सिद्धि- असिद्धिमें निर्विकार रहना है।
कर्ता सात्त्विक उच्यते
ऐसा आसक्ति तथा अहंकारसे रहित, धैर्य तथा उत्साहसे युक्त और सिद्धि-असिद्धिमें निर्विकार कर्ता “सात्त्विक” कहा जाता है। इस श्लोकमें छः बातें बतायी गयी हैं—संग, अहंवदनशीलता, धृति, उत्साह, सिद्धि और असिद्धि। इनमेंसे पहली दो बातोंसे रहित, बीचकी दो बातोंसे युक्त और अन्तकी दो बातोंमें निर्विकार रहनेके लिये कहा गया है।
परिशिष्ट भाव
सिद्धि-असिद्धिमें निर्विकार, सम रहनेकी बात गीतामें तीन बार आयी है—“सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा” (2। 48), “समः सिद्धावसिद्धौ च” (4। 22) और यहाँ “सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः”। तात्पर्य है कि सिद्धि-असिद्धि हाथकी बात नहीं है, पर उसमें निर्विकार रहना हाथकी बात है। जो हाथकी बात है, उसको ठीक करना है। “अनहंवादी”—सात्त्विक मनुष्य “जैसा मैं कर सकता हूँ, वैसा दूसरा नहीं कर सकता”—इस तरह न तो बाहरसे बोलता है और न भीतरसे बोलता है। अपनेमें विशेषताका अनुभव करना ही भीतरसे बोलना है।
* बिना बिचारे जो करै, सो पाछे पछिताय।
काम बिगारै आपनो, जग में होत हँसाय॥
जग में होत हँसाय, चित्त में चैन न पावै।
खान पान सनमान, राग-रँग मन नहिं भावै॥
कह गिरधर कविराय करमगति टरत न टारे।
खटकत है जिय माहिं कियौ जो बिना बिचारे॥
27श्रीभगवान्
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः। हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः॥ 27॥
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अब राजस कर्ताके लक्षण बताते हैं।

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रागी
रागका स्वरूप रजोगुण होनेके कारण भगवान्ने राजस कर्ताके लक्षणोंमें सबसे पहले “रागी” पद दिया है। रागका अर्थ है—कर्मोंमें, कर्मोंके फलोंमें तथा वस्तु, पदार्थ आदिमें मनका खिंचाव होना, मनकी प्रियता होना। इन चीजोंका जिसपर रंग चढ़ जाता है, वह “रागी” होता है।
कर्मफलप्रेप्सुः
राजस मनुष्य कोई भी काम करेगा तो वह किसी फलकी चाहनाको लेकर ही करेगा; जैसे— मैं ऐसा-ऐसा अनुष्ठान कर रहा हूँ, दान दे रहा हूँ, उससे यहाँ धन, मान, बड़ाई आदि मिलेंगे और परलोकमें स्वर्गादिके भोग, सुख आदि मिलेंगे; मैं ऐसी-ऐसी दवाइयोंका सेवन कर रहा हूँ तो उनसे मेरा शरीर नीरोग रहेगा, आदि।
लुब्धः
राजस मनुष्यको जितना जो कुछ मिलता है, उसमें वह संतोष नहीं करता, प्रत्युत “जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई” की तरह “और मिलता रहे, और मिलता रहे” अर्थात् आदर, सत्कार, महिमा आदि अधिक-से- अधिक होते रहें; धन, पुत्र, परिवार आदि अधिक-से- अधिक बढ़ते रहें—इस प्रकारकी लाग लगी रहती है, लोभ लगा रहता है।
हिंसात्मकः
वह हिंसाके स्वभाववाला होता है। अपने स्वार्थके लिये वह दूसरोंके नुकसानकी, दुःखकी परवाह नहीं करता। वह ज्यों-ज्यों अधिक भोग-सामग्री इकट्ठी करके भोग भोगता है, त्यों-ही-त्यों दूसरे अभावग्रस्त लोगोंके हृदयमें जलन पैदा होती है। अतः दूसरोंके दुःखकी परवाह न करना तथा भोग भोगना हिंसा ही है। तामस कर्म (इसी अध्यायका पचीसवाँ श्लोक) और राजस कर्ता—दोनोंमें हिंसा बतानेका तात्पर्य यह है कि मूढ़ता रहनेके कारण तामस मनुष्यकी क्रियाएँ विवेकपूर्वक नहीं होतीं; अतः चलने-फिरने, उठने-बैठने आदिमें उसके द्वारा हिंसा होती है। राजस मनुष्य अपने सुखके लिये बढि़या-बढि़या भोग भोगता है तो उसको देखकर जिनको वे भोग नहीं मिलते, उनके हृदयमें जलन होती है, यह हिंसा उस भोग भोगनेवालेको ही लगती है। कारण कि कोई भी भोग बिना हिंसाके होता ही नहीं। तात्पर्य है कि तामस मनुष्यके द्वारा तो कर्ममें हिंसा होती है और राजस मनुष्य स्वयं हिंसात्मक होता है।
अशुचिः
रागी पुरुष भोग-बुद्धिसे जिन वस्तुओं, पदार्थों आदिका संग्रह करता है,वे सब चीजें अपवित्र हो जाती हैं। वह जहाँ रहता है, वहाँका वायुमण्डल अपवित्र हो जाता है। वह जिन कपड़ोंको पहनता है, उन कपड़ोंमें भी अपवित्रता आ जाती है। यही कारण है कि आसक्ति- ममतावाले मनुष्यके मरनेपर उसके कपड़े आदिको कोई रखना नहीं चाहता। जिस स्थानपर उसके शवको जलाया जाता है, वहाँ कोई भजन-ध्यान करना चाहे तो उसका मन नहीं लगेगा। वहाँ भूलसे कोई सो जायगा तो उसको प्रायः खराब-खराब स्वप्न आयेंगे। तात्पर्य यह है कि उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंकी तरफ आकृष्ट होते ही आसक्ति- ममतारूप मलिनता आने लगती है, जिससे मनुष्यका शरीर और शरीरकी हड्डियाँतक अधिक अपवित्र हो जाती हैं।
हर्षशोकान्वितः
उसके सामने दिनमें कितनी बार सफलता-विफलता, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति, घटना आदि आते रहते हैं, उनको लेकर वह हर्ष-शोक, राग- द्वेष, सुख-दुःख आदिमें ही उलझा रहता है।
कर्ता राजसः परिकीर्तितः
उपर्युक्त लक्षणोंवाला कर्ता “राजस” कहा गया है।
परिशिष्ट भाव
“हिंसात्मकः”—पहले तामस कर्ममें भी हिंसा बतायी गयी है, (इसी अध्यायका पचीसवाँ श्लोक); क्योंकि रजोगुण और तमोगुण—दोनों एक-दूसरेके नजदीक पड़ते हैं, पर सत्त्वगुण दोनोंसे दूर पड़ता है। रजोगुण रागात्मक होता है और तमोगुण मोहात्मक। रजोगुणमें तो होश और सावधानी रहती है, पर तमोगुणमें बेहोशी और असावधानी रहती है। राग, स्वार्थबुद्धि होनेसे जितनी हिंसा होती है, उतनी मोह होनेसे नहीं होती। इसलिये रजोगुणमें अधिक हिंसा होती है। राग, स्वार्थबुद्धिके कारण राजस मनुष्य “हिंसात्मक” हो जाता है। उसकी हिंसामें तल्लीनता हो जाती है।
28श्रीभगवान्
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठोऽनैष्कृतिकोऽलसः। विषादी दीर्घसूत्री कर्ता तामस उच्यते॥ 28॥
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अब तामस कर्ताके लक्षण बताते हैं।

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अयुक्तः
तमोगुण मनुष्यको मूढ़ बना देता है (गीता—चौदहवें अध्यायका आठवाँ श्लोक)। इस कारण किस समयमें कौन-सा काम करना चाहिये? किस तरह करनेसे हमें लाभ है और किस तरह करनेसे हमें हानि है?—इस विषयमें तामस मनुष्य सावधान नहीं रहता अर्थात् वह कर्तव्य और अकर्तव्यके विषयमें सोचता ही नहीं। इसलिये वह “अयुक्त” अर्थात् असावधान कहलाता है।
प्राकृतः
जिसने शास्त्र, सत्संग, अच्छी शिक्षा, उपदेश आदिसे न तो अपने जीवनको ठीक बनाया है और न अपने जीवनपर कुछ विचार ही किया है, माँ-बापसे जैसा पैदा हुआ है, वैसा-का-वैसा ही कोरा अर्थात् कर्तव्य-अकर्तव्यकी शिक्षासे रहित रहा है, ऐसा मनुष्य “प्राकृत” अर्थात् अशिक्षित कहलाता है।
स्तब्धः
तमोगुणकी प्रधानताके कारण उसके मन, वाणी और शरीरमें अकड़ रहती है। इसलिये वह अपने वर्ण-आश्रममें बड़े-बूढ़े माता, पिता, गुरु, आचार्य आदिके सामने कभी झुकता नहीं। वह मन, वाणी और शरीरसे कभी सरलता और नम्रताका व्यवहार नहीं करता, प्रत्युत कठोर व्यवहार करता है। ऐसा मनुष्य “स्तब्ध” अर्थात् ऐंठ- अकड़वाला कहलाता है।
शठः
तामस मनुष्य अपनी एक जिद होनेके कारण दूसरोंकी दी हुई अच्छी शिक्षाको, अच्छे विचारोंको नहीं मानता। उसको तो मूढ़ताके कारण अपने ही विचार अच्छे लगते हैं। इसलिये वह “शठ” अर्थात् जिद्दी कहलाता है*।
अनैष्कृतिकः
जिनसे कुछ उपकार पाया है, उनका प्रत्युपकार करनेका जिसका स्वभाव होता है, वह “नैष्कृतिक” कहलाता है। परन्तु तामस मनुष्य दूसरोंसे उपकार पा करके भी उनका उपकार नहीं करता, प्रत्युत उनका अपकार करता है, इसलिये वह “अनैष्कृतिक” कहलाता है।
अलसः
अपने वर्ण-आश्रमके अनुसार आवश्यक कर्तव्य-कर्म प्राप्त हो जानेपर भी तामस मनुष्यको मूढ़ताके कारण वह कर्म करना अच्छा नहीं लगता, प्रत्युत सांसारिक निरर्थक बातोंको पड़े-पड़े सोचते रहना अथवा नींदमें पड़े रहना अच्छा लगता है। इसलिये उसे आलसी कहा गया है।
विषादी
यद्यपि तामस मनुष्यमें यह विचार होता ही नहीं कि क्या कर्तव्य होता है और क्या अकर्तव्य होता है तथा निद्रा, आलस्य, प्रमाद आदिमें मेरी शक्तिका, मेरे जीवनके अमूल्य समयका कितना दुरुपयोग हो रहा है, तथापि अच्छे मार्गसे और कर्तव्यसे च्युत होनेसे उसके भीतर स्वाभाविक ही एक विषाद (दुःख, अशान्ति) होता रहता है। इसलिये उसे “विषादी” कहा गया है।
दीर्घसूत्री
अमुक काम किस तरीकेसे बढि़या और जल्दी हो सकता है—इस बातको वह सोचता ही नहीं। इसलिये वह किसी काममें अविवेकपूर्वक लग भी जाता है तो थोड़े समयमें होनेवाले काममें भी बहुत ज्यादा समय लगा देता है और उससे काम भी सुचारुरूपसे नहीं होता। ऐसा मनुष्य “दीर्घसूत्री” कहलाता है।
कर्ता तामस उच्यते
उपर्युक्त आठ लक्षणोंवाला कर्ता “तामस” कहलाता है। आदि भी सात्त्विक, राजस अथवा तामस होंगे। सात्त्विक कर्ता अपने कर्म, बुद्धि आदिको सात्त्विक बनाकर सात्त्विक सुखका अनुभव करते हुए असंगतापूर्वक परमात्मतत्त्वसे अभिन्न हो जाता है—“दुःखान्तं च निगच्छति” (गीता 18। 36)। कारण कि सात्त्विक कर्ताका ध्येय परमात्मा होता है। इसलिये वह कर्तृत्व-भोक्तृत्वसे रहित होकर चिन्मय तत्त्वसे अभिन्न हो जाता है; क्योंकि वह तात्त्विक स्वरूपसे अभिन्न ही था। परन्तु राजस-तामस कर्ता राजस-तामस कर्म, बुद्धि आदिके साथ तन्मय होकर राजस-तामस सुखमें लिप्त होता है। इसलिये वह परमात्मतत्त्वसे अभिन्न नहीं हो सकता। कारण कि राजस- तामस कर्ताका उद्देश्य परमात्मा नहीं होता और उसमें जडताका बन्धन भी अधिक होता है। अब यहाँ शंका हो सकती है कि कर्ताका सात्त्विक होना तो ठीक है, पर कर्म सात्त्विक कैसे होते हैं? इसका समाधान यह है कि जिस कर्मके साथ कर्ताका राग नहीं है, कर्तृत्वाभिमान नहीं है, लेप (फलेच्छा) नहीं है, वह कर्म सात्त्विक हो जाता है। ऐसे सात्त्विक कर्मसे अपना और दुनियाका बड़ा भला होता है। उस सात्त्विक कर्मका जिन-जिन वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ, वायुमण्डल आदिके साथ सम्बन्ध होता है, उन सबमें निर्मलता आ जाती है; क्योंकि निर्मलता सत्त्वगुणका स्वभाव है—“तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्” (गीता 14। 6)। दूसरी बात, पतंजलि महाराजने रजोगुणको क्रियात्मक ही माना है—“प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम्” (योगदर्शन 2। 18)। परन्तु गीता रजोगुणको क्रियात्मक मानते हुए भी मुख्यरूपसे
परिशिष्ट भाव
“विषादी” पद रजोगुणमें आना चाहिये, पर यहाँ तमोगुणमें आया है। तामस वृत्तिका विवेकसे विरोध है, इसलिये तामस मनुष्यमें विषाद अधिक होता है।
विशेष बात
विशेष बात छब्बीसवें, सत्ताईसवें और अट्ठाईसवें श्लोकमें जितनी बातें आयी हैं, वे सब कर्ताको लेकर ही कही गयी हैं। कर्ताके जैसे लक्षण होते हैं, उन्हींके अनुसार कर्म होते हैं। कर्ता जिन गुणोंको स्वीकार करता है, उन गुणोंके अनुसार ही कर्मोंका रूप होता है। कर्ता जिस साधनको करता है, वह साधन कर्ताका रूप हो जाता है। कर्ताके आगे जो करण होते हैं, वे भी कर्ताके अनुरूप होते हैं। तात्पर्य यह है कि जैसा कर्ता होता है, वैसे ही कर्म, करण आदि होते हैं। कर्ता सात्त्विक, राजस अथवा तामस होगा तो कर्म रागात्मक ही मानती है—“रजो रागात्मकं विद्धि” (14। 7)। वास्तवमें देखा जाय तो “राग” ही बाँधनेवाला है, “क्रिया” नहीं। गीतामें कर्म तीन प्रकारके बताये गये हैं—सात्त्विक, राजस और तामस (इसी अध्यायके तेईसवेंसे पचीसवें श्लोकतक)। कर्म करनेवालेका भाव सात्त्विक होगा तो वे कर्म “सात्त्विक” हो जायँगे, भाव राजस होगा तो वे कर्म “राजस” हो जायँगे और भाव तामस होगा तो वे कर्म “तामस” हो जायँगे। इसलिये भगवान्ने केवल क्रियाको रजोगुणी नहीं माना है।
* मूर्खस्य पंच चिह्नानि गर्वी दुर्वचनी तथा। हठी चाप्रियवादी च परोक्तं नैव मन्यते॥
29श्रीभगवान्
बुद्धेर्भेदं धृतेश्ैव गुणतस्त्रिविधं शृणु। प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय॥ 29॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

सभी कर्म विचारपूर्वक किये जाते हैं। उन कर्मोंके विचारमें बुद्धि और धृति—इन कर्मसंग्राहक करणोंकी प्रधानता होनेसे अब आगे उनके भेद बताते हैं।

पदच्छेद
श्लोकमें ढूँढ़नेके लिये हॉवर करें
व्याख्या
3 sections
[ इसी अध्यायके अठारहवें श्लोकमें कर्म- संग्रहके तीन हेतु बताये गये हैं—करण, कर्म और कर्ता। इनमेंसे कर्म करनेके जो इन्द्रियाँ आदि करण हैं, उनके सात्त्विक, राजस और तामस—ये तीन भेद नहीं होते। उन इन्द्रियोंमें बुद्धिकी ही प्रधानता रहती है और सभी इन्द्रियाँ बुद्धिके अनुसार ही काम करती हैं। इसलिये यहाँ बुद्धिके भेदसे करणोंके भेद बता रहे हैं। बुद्धिके निश्चयको, विचारको दृढ़तासे ठीक तरह रखनेवाली और अपने लक्ष्यसे विचलित न होने देनेवाली धारण- शक्तिका नाम धृति है। धारण-शक्ति अर्थात् धृतिके बिना बुद्धि अपने निश्चयपर दृढ़ नहीं रह सकती। इसलिये बुद्धिके साथ-ही-साथ धृतिके भी तीन भेद बताने आवश्यक हो गये*। मनुष्य जो कुछ भी करता है, बुद्धिपूर्वक ही करता है अर्थात् ठीक सोच-समझकर ही किसी कार्यमें प्रवृत्त होता है। उस कार्यमें प्रवृत्त होनेपर भी उसको धैर्यकी बड़ी भारी आवश्यकता होती है। उसकी बुद्धिमें विचार-शक्ति तेज है और उसे धारण करनेवाली शक्ति—धृति श्रेष्ठ है, तो उसकी बुद्धि अपने निश्चित किये हुए लक्ष्यसे विचलित नहीं होती। जब बुद्धि अपने लक्ष्यपर दृढ़ रहती है, तब मनुष्यका कार्य सिद्ध हो जाता है। अभी साधकोंके लिये कर्मप्रेरक और कर्म-संग्रहका जो प्रकरण चला है, उसमें ज्ञान, कर्म और कर्ताकी ही खास आवश्यकता है। ऐसे ही साधक अपनी साधनामें दृढ़ता- पूर्वक लगा रहे, इसके लिये बुद्धि और धृतिके भेदको जाननेकी विशेष आवश्यकता है; क्योंकि उनके भेदको ठीक जानकर ही वह संसारसे ऊँचा उठ सकता है। किस प्रकारकी बुद्धि और धृतिको धारण करके साधक संसारसे ऊँचा उठ सकता है और किस प्रकारकी बुद्धि और धृतिके रहनेसे उसे ऊँचा उठनेमें बाधा लग सकती है—यह जानना साधकके लिये बहुत जरूरी है। इसलिये भगवान्ने उन दोनोंके भेद बताये हैं। भेद बतानेमें भगवान्का भाव यह है कि सात्त्विकी बुद्धि और धृतिसे ही साधक ऊँचा उठ सकता है, राजसी- तामसी बुद्धि और धृतिसे नहीं।]
धनंजय
जब पाण्डवोंने राजसूय यज्ञ किया था, तब अर्जुन अनेक राजाओंको जीतकर बहुत-सा धन लेकर आये थे। इसीसे उनका नाम “धनंजय” पड़ा था। अब भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि अपनी साधनामें सात्त्विकी बुद्धि और धृतिको ग्रहण करके गुणातीत तत्त्वकी प्राप्ति करना ही वास्तविक धन है; इसलिये तुम इस वास्तविक धनको धारण करो, इसीमें तुम्हारे “धनंजय” नामकी सार्थकता है।
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु
भगवान् कहते हैं कि बुद्धि भी एक है और धृति भी एक है; परन्तु गुणोंकी प्रधानतासे उस बुद्धि और धृतिके भी सात्त्विक, राजस और तामस—ये तीन-तीन भेद हो जाते हैं। उनका मैं ठीक-ठीक विवेचन करूँगा और थोड़ेमें बहुत
विशेष बात
विशेष बात कहूँगा, उनको तुम मन लगाकर, ध्यान देकर ठीक तरहसे सुनो। धृति श्रोत्रादि करणोंमें नहीं आयी है। इसलिये भगवान् “चैव” पदका प्रयोग करके कह रहे हैं कि जैसे बुद्धिके तीन भेद बताऊँगा, ऐसे ही धृतिके भी तीन भेद बताऊँगा। साधारण दृष्टिसे देखनेपर तो धृति भी बुद्धिका ही एक गुण दीखती है। बुद्धिका एक गुण होते हुए भी धृति बुद्धिसे अलग और विलक्षण है; क्योंकि धृति स्वयं अर्थात् कर्तामें रहती है। उस धृतिके कारण ही मनुष्य बुद्धिका ठीक-ठीक उपयोग कर सकता है। धृति जितनी श्रेष्ठ अर्थात् सात्त्विकी होगी, साधककी (साधनमें) बुद्धि उतनी ही स्थिर रहेगी। साधनमें बुद्धिकी स्थिरताकी जितनी आवश्यकता है, उतनी आवश्यकता मनकी स्थिरताकी नहीं है। हाँ, एक अंशमें अणिमा आदि सिद्धियोंकी प्राप्तिमें मनकी स्थिरताकी आवश्यकता है; परन्तु पारमार्थिक उन्नतिमें तो बुद्धिके अपने उद्देश्यपर स्थिर रहनेकी ही ज्यादा आवश्यकता है1। साधककी बुद्धि भी सात्त्विकी हो और धृति भी सात्त्विकी हो, तभी साधक अपने साधनमें दृढ़तासे लगा रहेगा। इसलिये इन दोनोंके ही भेद जाननेकी आवश्यकता है। “पृथक्त्वेन”—उनके भेद अलग-अलग ठीक तरहसे कहूँगा अर्थात् बुद्धि और धृतिके विषयोंमें भी क्या-क्या भेद होते हैं, उनको भी कहूँगा। “प्रोच्यमानमशेषेण”—भगवान् कहते हैं कि बुद्धि और धृतिके विषयमें जाननेकी जो-जो आवश्यक बातें हैं, उन सबको मैं पूरा-पूरा कहूँगा, जिसके बाद फिर जानना बाकी नहीं रहेगा।
* सांख्ययोगमें तो बुद्धि और धृतिकी खास आवश्यकता है ही; परमात्मप्राप्तिके अन्य जितने भी साधन हैं, उन सबमें भी
बुद्धि और धृतिकी बड़ी भारी आवश्यकता है। इसलिये गीतामें बुद्धि और धृति—दोनोंको साथ-साथ कहा है; जैसे—“शनैः
शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया” (6। 25), और “बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च” (18। 51)।
30श्रीभगवान्
प्रवृत्तिं निवृत्तिं कार्याकार्ये भयाभयेबन्धं मोक्षं या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी॥ 30॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

अब भगवान् सात्त्विकी बुद्धिके लक्षण बताते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
5 sections
“प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च—साधकमात्रकी प्रवृत्ति और निवृत्ति—ये दो अवस्थाएँ होती हैं। कभी वह संसारका काम-धंधा करता है, तो यह प्रवृत्ति-अवस्था है और कभी संसारका काम-धंधा छोड़कर एकान्तमें भजन- ध्यान करता है, तो यह निवृत्ति-अवस्था है। परन्तु इन दोनोंमें सांसारिक कामनासहित प्रवृत्ति और वासनासहित निवृत्ति2—ये दोनों ही अवस्थाएँ “प्रवृत्ति” हैं अर्थात् संसारमें लगानेवाली हैं तथा सांसारिक कामनारहित प्रवृत्ति और वासनारहित निवृत्ति—ये दोनों ही अवस्थाएँ “निवृत्ति” हैं अर्थात् परमात्माकी तरफ ले जानेवाली हैं। इसलिये साधक इनको ठीक-ठीक जानकर कामना-वासनारहित प्रवृत्ति और निवृत्तिको ही ग्रहण करें। वास्तवमें गहरी दृष्टिसे देखा जाय तो कामना-वासना- रहित प्रवृत्ति और निवृत्ति भी यदि अपने सुख, आराम आदिके लिये की जायँ तो वे दोनों ही “प्रवृत्ति” हैं; क्योंकि वे दोनों ही बाँधनेवाली हैं अर्थात् उनसे अपना व्यक्तित्व नहीं मिटता। परन्तु यदि कामना-वासनारहित प्रवृत्ति और निवृत्ति— दोनों केवल दूसरोंके सुख, आराम और हितके लिये ही की जायँ, तो वे दोनों ही “निवृत्ति” हैं; क्योंकि उन दोनोंसे ही अपना व्यक्तित्व नहीं रहता। वह व्यक्तित्व कब नहीं रहता? जब प्रवृत्ति और निवृत्ति जिसके प्रकाशसे प्रकाशित होती हैं तथा जो प्रवृत्ति और निवृत्तिसे रहित है, उस प्रकाशक अर्थात् तत्त्वकी प्राप्तिके उद्देश्यसे ही प्रवृत्ति और निवृत्ति की जाय। प्रवृत्ति तो की जाय प्राणिमात्रकी सेवाके लिये और निवृत्ति की जाय परम विश्राम अर्थात् स्वरूप-स्थितिके लिये।
कार्याकार्ये
शास्त्र, वर्ण, आश्रमकी मर्यादाके अनुसार जो काम किया जाता है, वह “कार्य” है और शास्त्र आदिकी मर्यादासे विरुद्ध जो काम किया जाता है वह “अकार्य” है। जिसको हम कर सकते हैं, जिसको जरूर करना चाहिये और जिसको करनेसे जीवका जरूर कल्याण होता है, वह “कार्य” अर्थात् कर्तव्य कहलाता है और जिसको हमें नहीं करना चाहिये तथा जिससे जीवका बन्धन होता है, वह “अकार्य” अर्थात् अकर्तव्य कहलाता है। जिसको हम नहीं कर सकते, वह अकर्तव्य नहीं कहलाता, वह तो अपनी असामर्थ्य है।
भयाभये
भय और अभयके कारणको देखना चाहिये। जिस कर्मसे अभी और परिणाममें अपना और दुनियाका अनिष्ट होनेकी सम्भावना है, वह कर्म “भय” अर्थात् भयदायक है और जिस कर्मसे अभी और परिणाममें अपना और दुनियाका हित होनेकी सम्भावना है, वह कर्म “अभय” अर्थात् सबको अभय करनेवाला है। मनुष्य जब करनेलायक कार्यसे च्युत होकर अकार्यमें प्रवृत्त होता है, तब उसके मनमें अपनी मान-बड़ाईकी हानि और निन्दा-अपमान होनेकी आशंकासे भय पैदा होता है। परन्तु जो अपनी मर्यादासे कभी विचलित नहीं होता, अपने मनसे किसीका भी अनिष्ट नहीं चाहता और केवल परमात्मामें ही लगा रहता है, उसके मनमें सदा अभय बना रहता है। यह अभय ही मनुष्यको सर्वथा अभयपद— परमात्माको प्राप्त करा देता है।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति
जो बाहरसे तो यज्ञ, दान, तीर्थ, व्रत आदि उत्तम-से-उत्तम कार्य करता है; परन्तु भीतरसे असत्, जड, नाशवान् पदार्थोंको और स्वर्ग आदि लोकोंको चाहता है, उसके लिये वे सभी कर्म “बन्ध” अर्थात् बन्धनकारक ही हैं। केवल परमात्मासे ही सम्बन्ध रखना, परमात्माके सिवाय कभी किसी अवस्थामें असत् संसारके साथ लेशमात्र भी सम्बन्ध न रखना “मोक्ष” अर्थात् मोक्षदायक है। अपनेको जो वस्तुएँ नहीं मिली हैं, उनकी कामना होनेसे मनुष्य उनके अभावका अनुभव करता है। वह अपनेको उन वस्तुओंके परतन्त्र मानता है और वस्तुओंके मिलनेपर अपनेको स्वतन्त्र मानता है। वह समझता तो यह है कि मेरे पास वस्तुएँ होनेसे मैं स्वतन्त्र हो गया हूँ, पर हो जाता है उन वस्तुओंके परतन्त्र! वस्तुओंके अभाव और वस्तुओंके भाव—इन दोनोंकी परतन्त्रतामें इतना ही फर्क पड़ता है कि वस्तुओंके अभावमें परतन्त्रता दीखती है, खटकती है और वस्तुओंके होनेपर वस्तुओंकी परतन्त्रता परतन्त्रताके रूपमें दीखती ही नहीं; क्योंकि उस समय मनुष्य अन्धा हो जाता है। परन्तु हैं ये दोनों ही परतन्त्रता, और परतन्त्रता ही बन्धन है। अभावकी परतन्त्रता प्रकट विष है और भावकी परतन्त्रता छिपा हुआ मीठा विष है, पर हैं दोनों ही विष। विष तो मारनेवाला ही होता है। निष्कर्ष यह निकला कि सांसारिक वस्तुओंकी कामनासे ही बन्धन होता है और परमात्माके सिवाय किसी वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, देश, काल आदिकी कामना न होनेसे मुक्ति होती है*। यदि मनमें कामना है तो वस्तु पासमें हो तो बन्धन और पासमें न हो तो बन्धन! यदि मनमें कामना नहीं है तो वस्तु पासमें हो तो मुक्ति और पासमें न हो तो मुक्ति!
बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी
इस प्रकार जो प्रवृत्ति- निवृत्ति, कार्य-अकार्य, भय-अभय और बन्ध-मोक्षके वास्तविक तत्त्वको जानती है, वह बुद्धि सात्त्विकी है। इनके वास्तविक तत्त्वको जानना क्या है? प्रवृत्ति- निवृत्ति, कार्य-अकार्य, भय-अभय और बन्ध-मोक्ष— इनको गहरी रीतिसे समझकर, जिसके साथ वास्तवमें हमारा सम्बन्ध नहीं है, उस संसारके साथ सम्बन्ध न मानना और जिसके साथ हमारा स्वतःसिद्ध सम्बन्ध है, ऐसे (प्रवृत्ति-निवृत्ति आदिके आश्रय तथा प्रकाशक) परमात्माको तत्त्वसे ठीक-ठीक जानना—यही सात्त्विकी बुद्धिके द्वारा वास्तविक तत्त्वको ठीक-ठीक जानना है।
परिशिष्ट भाव
प्रवृत्ति और निवृत्तिको, कर्तव्य और अकर्तव्यको, भय और अभयको तथा बन्धन और मोक्षको—दोनोंको जाननेका तात्पर्य संसारके सम्बन्ध-विच्छेदसे ही है। अगर संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद न हो तो वह जानना वास्तवमें जानना नहीं है, प्रत्युत सीखना है। गीताका “सात्त्विक” गुणातीत करनेवाला, संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेवाला है। इसलिये इसमें बन्धन और मोक्षतकका विचार होता है—“बन्धं मोक्षं च या वेत्ति”। सात्त्विकी बुद्धिमें वह विवेक होता है, जो तत्त्वज्ञानमें परिणत होता है। विवेकवती बुद्धि “ब्रह्मलोककी प्राप्तितक सब बन्धन है”—ऐसा जानती है।
1-बुद्धिके द्वारा तो अपना ध्येय (लक्ष्य) ठीक-ठीक समझमें आता है और धृतिके द्वारा कर्ता स्वयं उस लक्ष्यपर दृढ़ रहता
है। साधक पहले कैसे ही भावों और आचरणोंवाला अर्थात् पापी-से-पापी और दुराचारी-से-दुराचारी क्यों न रहा हो, वह
भी “मुझे तो परमात्मप्राप्ति ही करनी है”—इस उद्देश्यपर दृढ़ रहता है, तो उसके सब पाप नष्ट हो जाते हैं (गीता—नवें
अध्यायका तीसवाँ श्लोक)।
2-प्रवृत्तिको छोड़कर कोई एकान्तमें भजन-ध्यान करता है तो वहाँ उसके सामने द्रव्य,पदार्थ तो नहीं हैं, पर “लोग मेरेको ज्ञानी,
ध्यानी, साधक समझेंगे, तो मेरा आदर-सत्कार होगा” इस प्रकार भीतर एक सूक्ष्म इच्छा रहती है, जिसे “वासना” कहते हैं।
* एक कामना होती है और एक आवश्यकता होती है। संसारकी कामना होती है और परमात्माकी आवश्यकता।
कामनाकी कभी पूर्ति होती ही नहीं, उसकी तो निवृत्ति होती है, पर आवश्यकताकी पूर्ति ही होती है।
परमात्माकी आवश्यकता भी संसारकी कामना होनेसे ही पैदा होती है। कामनाका अत्यन्त अभाव होनेपर आवश्यकता
रहती ही नहीं अर्थात् परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है।
31श्रीभगवान्
यया धर्ममधर्मं कार्यं ाकार्यमेव अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी॥ 31॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
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अब राजसी बुद्धिके लक्षण बताते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
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यया धर्ममधर्मं च
शास्त्रोंने जो कुछ भी विधान किया है, वह “धर्म” है अर्थात् शास्त्रोंने जिसकी आज्ञा दी है और जिससे परलोकमें सद्गति होती है, वह धर्म है। शास्त्रोंने जिसका निषेध किया है, वह “अधर्म” है अर्थात् शास्त्रोंने जिसकी आज्ञा नहीं दी है और जिससे परलोकमें दुर्गति होती है, वह अधर्म है। जैसे, अपने माता- पिता, बड़े-बूढ़ोंकी सेवा करनेमें, दूसरोंको सुख पहुँचानेमें, दूसरोंका हित करनेकी चेष्टामें अपने तन, मन, धन, योग्यता, पद, अधिकार, सामर्थ्य आदिको लगा देना “धर्म” है। ऐसे ही कुआँ-बावड़ी खुदवाना, धर्मशाला-औषधालय बनवाना, प्याऊ-सदावर्त चलाना; देश, ग्राम, मोहल्लेके अनाथ तथा गरीब बालकोंकी और समाजकी उन्नतिके लिये अपनी कहलानेवाली चीजोंको आवश्यकतानुसार उनकी ही समझकर निष्कामभावसे उदारतापूर्वक खर्च करना “धर्म” है। इसके विपरीत अपने स्वार्थ, सुख, आरामके लिये दूसरोंकी धन-सम्पत्ति, हक, पद, अधिकार छीनना; दूसरोंका अपकार, अहित, हत्या आदि करना; अपने तन, मन, धन, योग्यता, पद, अधिकार आदिके द्वारा दूसरोंको दुःख देना “अधर्म” है। वास्तवमें धर्म वह है, जो जीवका कल्याण कर दे और अधर्म वह है, जो जीवको बन्धनमें डाल दे।
कार्यं चाकार्यमेव च
वर्ण, आश्रम, देश, काल, लोक-मर्यादा, परिस्थिति आदिके अनुसार शास्त्रोंने हमारे लिये जिस कर्मको करनेकी आज्ञा दी है, वह कर्म हमारे लिये “कर्तव्य” है। अवसरपर प्राप्त हुए कर्तव्यका पालन न करना तथा न करनेलायक कामको करना “अकर्तव्य” है। जैसे, भिक्षा माँगना; यज्ञ, विवाह आदि कराना और उनमें दान-दक्षिणा लेना आदि कर्म ब्राह्मणके लिये तो कर्तव्य हैं, पर क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रके लिये अकर्तव्य हैं। इसी प्रकार शास्त्रोंने जिन-जिन वर्ण और आश्रमोंके लिये जो-जो कर्म बताये हैं, वे सब उन-उनके लिये कर्तव्य हैं और जिनके लिये निषेध किया है, उनके लिये वे सब अकर्तव्य हैं। जहाँ नौकरी करते हैं, वहाँ ईमानदारीसे अपना पूरा समय देना, कार्यको सुचारुरूपसे करना, जिस तरहसे मालिकका हित हो, ऐसा काम करना—ये सब कर्मचारियोंके लिये “कर्तव्य” हैं। अपने स्वार्थ, सुख और आराममें फँसकर कार्यमें पूरा समय न लगाना, कार्यको तत्परतासे न करना, थोड़ी-सी घूस (रिश्वत) मिलनेसे मालिकका बड़ा नुकसान कर देना, दस-पाँच रुपयोंके लिये मालिकका अहित कर देना—ये सब कर्मचारियोंके लिये “अकर्तव्य” हैं। राजकीय जितने अफसर हैं, उनको राज्यका प्रबन्ध करनेके लिये, सबका हित करनेके लिये ही ऊँचे पदपर रखा जाता है। इसीलिये अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके जिस प्रकार सब लोगोंका हित हो सकता है, सबको सुख, आराम, शान्ति मिल सकती है—ऐसे कामोंको करना उनके लिये “कर्तव्य” है। अपने तुच्छ स्वार्थमें आकर राज्यका नुकसान कर देना, लोगोंको दुःख देना आदि उनके लिये “अकर्तव्य” है। सात्त्विकी बुद्धिमें कही हुई प्रवृत्ति-निवृत्ति, भय- अभय और बन्ध-मोक्षको भी यहाँ “एव च” पदोंसे ले लेना चाहिये।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी
राग होनेसे राजसी बुद्धिमें स्वार्थ, पक्षपात, विषमता आदि दोष आ जाते हैं। इन दोषोंके रहते हुए बुद्धि धर्म-अधर्म, कार्य-अकार्य, भय-अभय, बन्ध-मोक्ष आदिके वास्तविक तत्त्वको ठीक-ठीक नहीं जान सकती। अतः किस वर्ण- आश्रमके लिये किस परिस्थितिमें कौन-सा धर्म कहा जाता है और कौन-सा अधर्म कहा जाता है? वह धर्म किस वर्ण-आश्रमके लिये कर्तव्य हो जाता है और किसके लिये अकर्तव्य हो जाता है; किससे भय होता है और किससे मनुष्य अभय हो जाता है? इन बातोंको जो बुद्धि ठीक- ठीक नहीं जान सकती, वह बुद्धि राजसी है। जब सांसारिक वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, क्रिया, पदार्थ आदिमें राग (आसक्ति) हो जाता है, तो वह राग दूसरोंके प्रति द्वेष पैदा करनेवाला हो जाता है। फिर जिसमें राग हो जाता है उसके दोषोंको और जिसमें द्वेष हो जाता है, उसके गुणोंको मनुष्य नहीं देख सकता। राग और द्वेष—इन दोनोंमें संसारके साथ सम्बन्ध जुड़ता है। संसारके साथ सम्बन्ध जुड़नेपर मनुष्य संसारको नहीं जान सकता। ऐसे ही परमात्मासे अलग रहनेपर मनुष्य परमात्माको नहीं जान सकता। संसारसे अलग होकर ही संसारको जान सकता है और परमात्मासे अभिन्न होकर ही परमात्माको जान सकता है। वह अभिन्नता चाहे प्रेमसे हो, चाहे ज्ञानसे हो। परमात्मासे अभिन्न होनेमें सात्त्विकी बुद्धि ही काम करती है; क्योंकि सात्त्विकी बुद्धिमें विवेकशक्ति जाग्रत् रहती है। परन्तु राजसी बुद्धिमें वह विवेकशक्ति रागके कारण धुँधली-सी रहती है। जैसे जलमें मिट्टी घुल जानेसे जलमें स्वच्छता, निर्मलता नहीं रहती, ऐसे ही बुद्धिमें रजोगुण आ जानेसे बुद्धिमें उतनी स्वच्छता, निर्मलता नहीं रहती। इसलिये धर्म-अधर्म आदिको समझनेमें कठिनता पड़ती है। राजसी बुद्धि होनेपर मनुष्य जिस-किसी विषयमें प्रवेश करता है, उसको उस विषयको समझनेमें कठिनता पड़ती है। उस विषयके गुण-दोषोंको ठीक-ठीक समझे बिना वह ग्रहण और त्यागको अपने आचरणमें नहीं ला सकता अर्थात् वह ग्राह्य वस्तुका ग्रहण नहीं कर सकता और त्याज्य वस्तुका त्याग नहीं कर सकता।
परिशिष्ट भाव
जो धर्म और अधर्मको तथा कर्तव्य और अकर्तव्यको भी ठीक तरहसे नहीं जानता, वह बन्धन और मोक्षको कैसे जानेगा? नहीं जान सकता। बुद्धि रागात्मिका होनेसे वह इनको ठीक तरहसे नहीं जानता; क्योंकि रागकी मुख्यता होनेसे वह विवेकको महत्त्व नहीं दे पाता। उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंका रंग चढ़नेसे उसका विवेक लुप्त हो जाता है।
32श्रीभगवान्
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृतासर्वार्थान्विपरीतांश् बुद्धिः सा पार्थ तामसी॥ 32॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
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अब तामसी बुद्धिके लक्षण बताते हैं।

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अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता
ईश्वरकी निन्दा करना; शास्त्र, वर्ण, आश्रम और लोक- मर्यादाके विपरीत काम करना; माता-पिताके साथ अच्छा बर्ताव न करना; सन्त-महात्मा, गुरु-आचार्य आदिका अपमान करना; झूठ, कपट, बेईमानी, जालसाजी, अभक्ष्य भोजन, परस्त्रीगमन आदि शास्त्रनिषिद्ध पाप-कर्मोंको धर्म मानना—यह सब अधर्मको “धर्म” मानना है। अपने शास्त्र, वर्ण, आश्रमकी मर्यादामें चलना; माता- पिताकी आज्ञाका पालन करना तथा उनकी तन-मन-धनसे सेवा करना; संत-महात्माओंके उपदेशोंके अनुसार अपना जीवन बनाना; धार्मिक ग्रन्थोंका पठन-पाठन करना; दूसरोंकी सेवा-उपकार करना; शुद्ध-पवित्र भोजन करना आदि शास्त्रविहित कर्मोंको उचित न मानना—यह धर्मको “अधर्म” मानना है। तामसी बुद्धिवाले मनुष्योंके विचार होते हैं कि “शास्त्रकारोंने, ब्राह्मणोंने अपनेको बड़ा बता दिया और तरह-तरहके नियम बनाकर लोगोंको बाँध दिया, जिससे भारत परतन्त्र हो गया; जबतक ये शास्त्र रहेंगे, ये धार्मिक पुस्तकें रहेंगी, तबतक भारतका उत्थान नहीं होगा, भारत परतन्त्रताकी बेड़ीमें ही जकड़ा हुआ रहेगा, आदि-आदि। इसलिये वे मर्यादाओंको तोड़नेमें ही धर्म मानते हैं।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च
आत्माको स्वरूप न मानकर शरीरको ही स्वरूप मानना; ईश्वरको न मान करके दृश्य जगत्को ही सच्चा मानना; दूसरोंको तुच्छ समझकर अपनेको ही सबसे बड़ा मानना; दूसरोंको मूर्ख समझकर अपनेको ही पढ़ा-लिखा, विद्वान् समझना; जितने संत- महात्मा हो गये हैं, उनकी मान्यताओंसे अपनी मान्यताको श्रेष्ठ मानना; सच्चे सुखकी तरफ ध्यान न देकर वर्तमानमें मिलनेवाले संयोगजन्य सुखको ही सच्चा मानना; न करनेयोग्य कार्यको ही अपना कर्तव्य समझना; अपवित्र वस्तुओंको ही पवित्र मानना—यह सम्पूर्ण चीजोंको उलटा मानना है।
बुद्धिः सा पार्थ तामसी
तमोगुणसे आवृत जो बुद्धि अधर्मको धर्म, धर्मको अधर्म और अच्छेको बुरा, सुलटेको उलटा मानती है, वह बुद्धि तामसी है। यह तामसी बुद्धि ही मनुष्यको अधोगतिमें ले जानेवाली है—“अधो गच्छन्ति तामसाः” (गीता 14। 18)। इसलिये अपना उद्धार चाहनेवालेको इसका सर्वथा त्याग कर देना चाहिये।
परिशिष्ट भाव
जिनकी बुद्धि तामसी होती है, उनको व्यवहारमें और परमार्थमें सब जगह उलटा ही दीखता है। इसका उदाहरण वर्तमान समयमें स्पष्ट दीखनेमें आ रहा है। जैसे—पशुओंके विनाशको “मांसका उत्पादन” कहा जाता है! गर्भपातरूपी महापापको और मनुष्यकी उत्पादक शक्तिके विनाशको “परिवार-कल्याण” कहा जाता है! स्त्रियोंकी उच्छृंखलताको, मर्यादाके नाशको “नारी-मुक्ति” कहा जाता है! पहले स्त्री घरकी स्वामिनी (गृहलक्ष्मी) होती थी, अब घरसे बाहर अनेक पुरुषोंकी दासता (नौकरी) करनेको “नारीकी स्वाधीनता” कहा जाता है! इस प्रकार पराधीनताको स्वाधीनताका लक्षण माना जाता है। नैतिक पतनको उन्नतिकी संज्ञा दी जाती है। पशुताको सभ्यताका चिह्न माना जाता है। धार्मिकताको साम्प्रदायिकता और धर्मविरुद्धको धर्म-निरपेक्ष कहा जाता है। जब विनाशकाल समीप आता है, तभी ऐसी विपरीत, तामसी बुद्धि पैदा होती है—“विनाशकाले विपरीतबुद्धिः”, “बुद्धिनाशात्प्रणश्यति” (गीता 2। 63)।
33श्रीभगवान्
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाःयोगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी॥ 33॥
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अब भगवान् सात्त्विकी धृतिके लक्षण बताते हैं।

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व्याख्या
2 sections
धृत्या यया धारयते.....योगेनाव्यभि- चारिण्या
सांसारिक लाभ-हानि, जय-पराजय, सुख- दुःख, आदर-निरादर, सिद्धि-असिद्धिमें सम रहनेका नाम “योग” (समता) है। परमात्माको चाहनेके साथ-साथ इस लोकमें सिद्धि, असिद्धि, वस्तु, पदार्थ, सत्कार, पूजा आदि और परलोकमें सुख-भोगको चाहना “व्यभिचार” है और इस लोक तथा परलोकके सुख, भोग, वस्तु, पदार्थ आदिकी किंचिन्मात्र भी इच्छा न रखकर केवल परमात्माको चाहना “अव्यभिचार” है। यह अव्यभिचार जिसमें होता है, वह धृति “अव्यभिचारिणी” कहलाती है। अपनी मान्यता, सिद्धान्त, लक्ष्य, भाव, क्रिया, वृत्ति, विचार आदिको दृढ़, अटल रखनेकी शक्तिका नाम “धृति” है। योग अर्थात् समतासे युक्त इस अव्यभिचारिणी धृतिके द्वारा मनुष्य मन, प्राण और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको धारण करता है। मनमें राग-द्वेषको लेकर होनेवाले चिन्तनसे रहित होना, मनको जहाँ लगाना चाहें, वहाँ लग जाना और जहाँसे हटाना चाहें, वहाँसे हट जाना आदि मनकी क्रियाओंको धृतिके द्वारा धारण करना है। प्राणायाम करते हुए रेचकमें पूरक न होना, पूरकमें रेचक न होना और बाह्य कुम्भकमें पूरक न होना तथा आभ्यन्तर कुम्भकमें रेचक न होना अर्थात् प्राणायामके नियमसे विरुद्ध श्वास-प्रश्वासोंका न होना ही धृतिके द्वारा प्राणोंकी क्रियाओंको धारण करना है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—इन विषयोंको लेकर इन्द्रियोंका उच्छृंखल न होना, जिस विषयमें जैसे प्रवृत्त होना चाहें, उसमें प्रवृत्त होना और जिस विषयसे निवृत्त होना चाहें, उससे निवृत्त होना ही धृतिके द्वारा इन्द्रियोंकी क्रियाओंको धारण करना है।
धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी
जिस धृतिसे मन, प्राण और इन्द्रियोंकी क्रियाओंपर आधिपत्य हो जाता है, हे पार्थ! वह धृति सात्त्विकी है।
परिशिष्ट भाव
जीव परमात्माका अंश है, इसलिये परमात्माके सिवाय कहीं भी जाना “व्यभिचार” है और केवल परमात्माकी तरफ चलना “अव्यभिचार” है। केवल परमात्माकी तरफ चलनेवाली धृति “अव्यभिचारिणी धृति” है।
34श्रीभगवान्
यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन। प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥ 34॥
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अब राजसी धृतिके लक्षण बताते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
1 section
यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या ........ सा पार्थ राजसी
राजसी धारण-शक्तिसे मनुष्य अपनी कामनापूर्तिके लिये धर्मका अनुष्ठान करता है, काम अर्थात् भोग-पदार्थोंको भोगता है और अर्थ अर्थात् धनका संग्रह करता है। अमावस्या, पूर्णिमा, व्यतिपात आदि अवसरोंपर दान करना, तीर्थोंमें अन्नदान करना; पर्वोंपर उत्सव मनाना; तीर्थयात्रा करना; धार्मिक संस्थाओंमें चन्दा-चिट्ठाके रूपमें कुछ चढ़ा देना; कभी कथा-कीर्तन, भागवत-सप्ताह आदि करवा लेना—यह सब केवल कामनापूर्तिके लिये करना ही “धर्म” को धारण करना है*। सांसारिक भोग-पदार्थ तो प्राप्त होने ही चाहिये; क्योंकि भोग-पदार्थोंसे ही सुख मिलता है, संसारमें कोई भी प्राणी ऐसा नहीं है, जो भोग-पदार्थोंकी कामना न करता हो; यदि मनुष्य भोगोंकी कामना न करे तो उसका जीवन ही व्यर्थ है—ऐसी धारणाके साथ भोग-पदार्थोंकी कामनापूर्तिमें ही लगे रहना “काम” को धारण करना है। धनके बिना दुनियामें किसीका भी काम नहीं चलता; धनसे ही धर्म होता है; यदि पासमें धन न हो तो आदमी धर्म कर ही नहीं सकता; जितने आयोजन किये जाते हैं, वे सब धनसे ही तो होते हैं; आज जितने आदमी बड़े कहलाते हैं, वे सब धनके कारण ही तो बड़े बने हैं; धन होनेसे ही लोग आदर-सम्मान करते हैं; जिसके पास धन नहीं होता, उसको संसारमें कोई पूछता ही नहीं; अतः धनका खूब संग्रह करना चाहिये—इस प्रकार धनमें ही रचे-पचे रहना “अर्थ” को धारण करना है। संसारमें अत्यन्त राग (आसक्ति) होनेके कारण राजस पुरुष शास्त्रकी मर्यादाके अनुसार जो कुछ भी शुभ काम करता है, उसमें उसकी यही कामना रहती है कि इस कर्मका मुझे इस लोकमें सुख, आराम, मान, सत्कार आदि मिले और परलोकमें सुख- भोग मिले। ऐसे फलकी कामनावाले तथा संसारमें अत्यन्त आसक्त मनुष्यकी धारण-शक्ति राजसी होती है।
* धर्मका अनुष्ठान धनके लिये किया जाय और धनका खर्चा धर्मके लिये किया जाय, तो धर्मसे धन और धनसे धर्म—
दोनों परस्पर बढ़ते रहते हैं। परन्तु धर्मका अनुष्ठान और धनका खर्चा केवल कामनापूर्तिके लिये ही किया जाय तो धर्म
(पुण्य) और धन—दोनों ही कामनापूर्ति करके नष्ट हो जाते हैं।
35श्रीभगवान्
यया स्वप्ं भयं शोकं विषादं मदमेव । न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी॥ 35॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
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अब तामसी धृतिके लक्षण बताते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
1 section
यया स्वप्नं भयं....सा पार्थ तामसी
तामसी धारण-शक्तिके द्वारा मनुष्य ज्यादा निद्रा, बाहर और भीतरका भय, चिन्ता, दुःख और घमण्ड—इनका त्याग नहीं करता, प्रत्युत इन सबमें रचा-पचा रहता है। वह कभी ज्यादा नींदमें पड़ा रहता है, कभी मृत्यु, बीमारी, अपयश, अपमान, स्वास्थ्य, धन आदिके भयसे भयभीत होता रहता है, कभी शोक-चिन्तामें डूबा रहता है, कभी दुःखमें मग्न रहता है और कभी अनुकूल पदार्थोंके मिलनेसे घमण्डमें चूर रहता है। निद्रा, भय, शोक आदिके सिवाय प्रमाद, अभिमान, अन्तःकरणवाला तामस मनुष्य निद्रा, भय, शोक आदि भावोंको छोड़ता ही नहीं। वह उनमें स्वाभाविक ही रचा- पचा रहता है। सात्त्विकी, राजसी और तामसी—इन तीनों धृतियोंके वर्णनमें राजसी और तामसी धृतिमें तो क्रमशः “फलाकाङ्क्षी” और “दुर्मेधाः” पदसे कर्ताका उल्लेख किया है, पर सात्त्विकी धृतिमें कर्ताका उल्लेख किया ही नहीं। इसका कारण यह है कि सात्त्विकी धृतिमें कर्ता निर्लिप्त रहता है अर्थात् उसमें कर्तृत्वका लेप नहीं होता; परन्तु राजसी और तामसी धृतिमें कर्ता लिप्त होता है। दम्भ, द्वेष, ईर्ष्या आदि दुर्गुणोंको तथा हिंसा, दूसरोंका अपकार करना, उनको कष्ट देना, उनके धनका किसी तरहसे अपहरण करना आदि दुराचारोंको भी “एव च” पदोंसे मान लेना चाहिये। इस प्रकार निद्रा, भय आदिको और दुर्गुण-दुराचारोंको पकड़े रहनेवाली अर्थात् उनको न छोड़नेवाली धृति तामसी होती है। भगवान्ने तैंतीसवें-चौंतीसवें श्लोकोंमें “धारयते” पदसे सात्त्विक और राजस मनुष्यके द्वारा क्रमशः सात्त्विकी और राजसी धृतिको धारण करनेकी बात कही है; परन्तु यहाँ तामस मनुष्यके द्वारा तामसी धृतिको धारण करनेकी बात नहीं कही। कारण यह है कि जिसकी बुद्धि बहुत ही दुष्टा है, जिसकी बुद्धिमें अज्ञता, मूढ़ता भरी हुई है, ऐसा मलिन
परिशिष्ट भाव
निद्रा, भय, चिन्ता, दुःख, घमण्ड आदि दोष तो रहेंगे ही, दूर हो ही नहीं सकते—ऐसा निश्चय करनेवाले मनुष्य “दुर्मेधा” हैं। ऐसे मनुष्योंका दोषोंको छोड़नेकी तरफ खयाल ही नहीं जाता, छोड़नेकी हिम्मत ही नहीं होती, प्रत्युत वे इनको स्वाभाविक ही धारण किये रहते हैं। अधिक निद्रा ही बाधक होती है। आवश्यक, यथायोग्य निद्रा बाधक नहीं होती (गीता—छठे अध्यायका सोलहवाँ-सत्रहवाँ श्लोक)।
विशेष बात
विशेष बात मानवशरीर विवेक-प्रधान है। मनुष्य जो कुछ करता है, उसे वह विचारपूर्वक ही करता है। वह ज्यों ही विचारपूर्वक काम करता है, त्यों ही विवेक ज्यादा स्पष्ट प्रकट होता है। सात्त्विक मनुष्यकी धृति- (धारणशक्ति-) में यह विवेक साफ-साफ प्रकट होता है कि मुझे तो केवल परमात्माकी तरफ ही चलना है। राजस मनुष्यकी धृतिमें संसारके पदार्थों और भोगोंमें रागकी प्रधानता होनेके कारण विवेक वैसा स्पष्ट नहीं होता; फिर भी इस लोकमें सुख-आराम, मान- आदर मिले और परलोकमें अच्छी गति मिले, भोग मिले—इस विषयमें विवेक काम करता है और आचरण भी मर्यादाके अनुसार ही होता है। परन्तु तामस मनुष्यकी धृतिमें विवेक बिलकुल ही दब जाता है। तामसभावोंमें उसकी इतनी दृढ़ता हो जाती है कि उसे उन भावोंको धारण करनेकी आवश्यकता ही नहीं रहती। वह तो निद्रा, भय आदि तामसभावोंमें ही रचा-पचा रहता है। पारमार्थिक मार्गमें क्रिया इतना काम नहीं करती, जितना अपना उद्देश्य काम करता है। स्थूल क्रियाकी प्रधानता स्थूलशरीरमें, चिन्तनकी प्रधानता सूक्ष्मशरीरमें और स्थिरताकी प्रधानता कारणशरीरमें होती है, यह सब क्रिया ही है। “क्रिया तो शरीरोंमें होती है, पर मेरेको तो केवल पारमार्थिक मार्गपर ही चलना है”—ऐसा उद्देश्य या लक्ष्य स्वयं-(चेतनस्वरूप-) में ही रहता है। स्वयंमें जैसा लक्ष्य होता है, उसके अनुसार स्वतः क्रियाएँ होती हैं। जो चीज स्वयंमें रहती है, वह कभी बदलती नहीं। उस लक्ष्यकी दृढ़ताके लिये सात्त्विकी बुद्धिकी आवश्यकता है और बुद्धिके निश्चयको अटल रखनेके लिये सात्त्विकी धृतिकी आवश्यकता है। इसलिये यहाँ तीसवेंसे पैंतीसवें श्लोकतक कुल छः श्लोकोंमें छः बार “पार्थ” सम्बोधनका प्रयोग करके भगवान् साधकमात्रके प्रतिनिधि अर्जुनको चेताते हैं कि “पृथानन्दन! लौकिक वस्तुओं और व्यक्तियोंके लिये चिन्ता न करके तुम अपने लक्ष्यको दृढ़तासे धारण किये रहो। अपनेमें कभी भी राजस-तामसभाव न आने पायें—इसके लिये निरन्तर सजग रहो!”
36–37श्रीभगवान्Merged
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभअभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं निगच्छति॥ 36॥ यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्॥ 37॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

मनुष्योंकी कर्मोंमें प्रवृत्ति सुखके लोभसे ही होती है अर्थात् सुख कर्म-संग्रहमें हेतु है। अतः आगेके चार श्लोकोंमें सुखके भेद बताते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
11 sections
भरतर्षभ
इस सम्बोधनको देनेमें भगवान्का भाव यह है कि भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! तुम राजस- तामस सुखोंमें लुब्ध, मोहित होनेवाले नहीं हो; क्योंकि तुम्हारे लिये राजस और तामस सुखपर विजय करना कोई बड़ी बात नहीं है। तुमने राजस सुखपर विजय भी कर ली है; क्योंकि स्वर्गकी उर्वशी-जैसी सुन्दरी अप्सराको भी तुमने ठुकरा दिया है। इसी प्रकार तुमने तामस सुखपर भी विजय कर ली है; क्योंकि प्राणिमात्रके लिये आवश्यक जो निद्राका तामस सुख है, उसको तुमने जीत लिया है। इसीसे तुम्हारा नाम “गुडाकेश” हुआ है।
सुखं तु इदानीम्
ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि और धृतिके तीन-तीन भेद बतानेके बाद यहाँ “तु” पदका प्रयोग करके भगवान् कहते हैं कि सुख भी तीन तरहका होता है। इसमें एक विशेष ध्यान देनेकी बात है कि आज पारमार्थिक मार्गपर चलनेवाले जितने भी साधक हैं, उन साधकोंकी ऊँची स्थिति न होनेमें अथवा उनको परमात्मतत्त्वका अनुभव न होनेमें अगर कोई विघ्न-बाधा है, तो वह है— सुखकी इच्छा। सात्त्विक सुख भी आसक्तिके कारण बन्धनकारक हो जाता है। तात्पर्य है कि अगर साधनजन्य—ध्यान और एकाग्रताका सुख भी लिया जाय, तो वह भी बन्धनकारक हो जाता है। इतना ही नहीं, अगर समाधिका सुख भी लिया जाय, तो वह भी परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें बाधक हो जाता है—“सुखसंगेन बध्नाति” (गीता 14। 6)। इस विषयमें कोई कहे कि परमात्मतत्त्वका सुख आ जाय तो क्या उस सुखको भी हम न लें? वास्तवमें परमात्मतत्त्वका सुख लिया नहीं जाता, प्रत्युत उस अक्षय सुखका स्वतः अनुभव होता है (गीता—पाँचवें अध्यायका इक्कीसवाँ और छठे अध्यायका इक्कीसवाँ तथा अट्ठाईसवाँ श्लोक)। साधनजन्य सुखका भोग न करनेसे वह अक्षय सुख स्वतः-स्वाभाविक प्राप्त हो जाता है। उस अक्षय सुखकी तरफ विशेष खयाल करानेके लिये भगवान् यहाँ “तु” पदका प्रयोग करते हैं। यहाँ “इदानीम्” कहनेका तात्पर्य है कि अर्जुन संन्यास और त्यागके तत्त्वको जानना चाहते हैं; अतः उनकी जिज्ञासाके उत्तरमें भगवान्ने त्याग, ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि और धृतिके तीन-तीन भेद बताये। परन्तु इन सबमें ध्येय तो सुखका ही रहता है। अतः भगवान् कहते हैं कि तुम उसी ध्येयकी सिद्धिके लिये सुखके भेद सुनो।
त्रिविधं शृणु मे
लोग रात-दिन राजस और तामस सुखमें लगे रहते हैं और उसीको वास्तविक सुख मानते हैं। इस कारण “सांसारिक भोगोंसे ऊँचा उठकर भी कोई सुख मिल सकता है; प्राणोंके मोहसे ऊँचा उठकर भी कोई सुख मिल सकता है; राजस और तामस सुखसे आगे भी कोई सात्त्विक सुख है; वे इन बातोंको समझ ही नहीं सकते। इसलिये भगवान् कहते हैं कि भैया! वह सुख तीन प्रकारका होता है, उनको तुम सुनो और उनमेंसे सात्त्विक सुखको ग्रहण करो और राजस-तामस सुखोंका त्याग करो। कारण कि सात्त्विक सुख परमात्माकी तरफ चलनेमें सहायता करनेवाला है और राजस-तामस सुख संसारमें फँसाकर पतन करनेवाले हैं।
अभ्यासाद्रमते यत्र
सात्त्विक सुखमें अभ्याससे रमण होता है। साधारण मनुष्योंको अभ्यासके बिना इस सुखका अनुभव नहीं होता। राजस और तामस सुखमें अभ्यास नहीं करना पड़ता। उसमें तो प्राणिमात्रका स्वतः- स्वाभाविक ही आकर्षण होता है। राजस-तामस सुखमें इन्द्रियोंका विषयोंकी ओर, मन- बुद्धिका भोग-संग्रहकी ओर तथा थकावट होनेपर निद्रा आदिकी ओर स्वतः आकर्षण होता है। विषयजन्य, अभिमानजन्य, प्रशंसाजन्य और निद्राजन्य सुख सभी प्राणियोंको स्वतः ही अच्छे लगते हैं। कुत्ते आदि जो नीच प्राणी हैं, उनका भी आदर करते हैं तो वे राजी होते हैं; और निरादर करते हैं तो नाराज हो जाते हैं, दुःखी हो जाते हैं। तात्पर्य यह है कि राजस और तामस सुखमें अभ्यासकी जरूरत नहीं है; क्योंकि इस सुखको सभी प्राणी अन्य योनियोंमें भी लेते आये हैं। इस सात्त्विक सुखमें अभ्यास क्या है? श्रवण-मनन भी अभ्यास है, शास्त्रोंको समझना भी अभ्यास है और राजसी-तामसी वृत्तियोंको हटाना भी अभ्यास है। जिस राजस और तामस सुखमें प्राणिमात्रकी स्वतः-स्वाभाविक प्रवृत्ति हो रही है, उससे भिन्न नयी प्रवृत्ति करनेका नाम “अभ्यास” है। सात्त्विक सुखमें अभ्यास करना तो आवश्यक है, पर रमण करना बाधक है। यहाँ “अभ्यासाद्रमते” पदका यह भाव नहीं है कि सात्त्विक सुखका भोग किया जाय, प्रत्युत सात्त्विक सुखमें अभ्याससे ही रुचि, प्रियता, प्रवृत्ति आदिके होनेको ही यहाँ रमण करना कहा गया है।
दुःखान्तं च निगच्छति
उस सात्त्विक सुखमें अभ्याससे ज्यों-ज्यों रुचि, प्रियता बढ़ती जाती है, त्यों- त्यों परिणाममें दुःखोंका नाश होता जाता है और प्रसन्नता, सुख तथा आनन्द बढ़ते जाते हैं (गीता—दूसरे अध्यायका पैंसठवाँ श्लोक)। “च” अव्यय देनेका तात्पर्य है कि जबतक सात्त्विक सुखमें रमण होगा अर्थात् साधक सात्त्विक सुख लेता रहेगा, तबतक दुःखोंका अत्यन्त अभाव नहीं होगा। कारण कि सात्त्विक सुख भी परमात्मविषयक बुद्धिकी प्रसन्नतासे पैदा हुआ है—“आत्मबुद्धिप्रसादजम्।” जो उत्पन्न होनेवाला होता है, वह जरूर नष्ट होता है। ऐसे सुखसे दुःखोंका अन्त कैसे होगा? इसलिये सात्त्विक सुखमें भी आसक्ति नहीं होनी चाहिये। सात्त्विक सुखसे भी ऊँचा उठनेसे मनुष्य दुःखोंके अन्तको प्राप्त हो जाता है, गुणातीत हो जाता है।
आत्मबुद्धिप्रसादजम्
जिस बुद्धिमें सांसारिक मान, बड़ाई, आदर, धन-संग्रह, विषयजन्य सुख आदिका महत्त्व नहीं रहता, केवल परमात्म-विषयक विचार ही रहता है, उस बुद्धिकी प्रसन्नता(गीता—दूसरे अध्यायका चौंसठवाँ श्लोक) अर्थात् स्वच्छतासे यह सात्त्विक सुख पैदा होता है। तात्पर्य है कि सांसारिक संयोगजन्य सुखसे सर्वथा उपरत होकर परमात्मामें बुद्धिके विलीन होनेपर जो सुख होता है, वह सुख सात्त्विक है।
यत्तदग्रे विषमिव
यहाँ “यत्तत्” कहनेका भाव यह है कि
यत्
जो सात्त्विक सुख है;
तत्
वह परोक्ष है अर्थात् उसका अभी अनुभव नहीं हुआ है। अभी तो उस सुखका केवल उद्देश्य बनाया है, जबकि राजस और तामस सुखका अभी अनुभव होता है। इसलिये अनुभवजन्य राजस और तामस सुखका त्याग करनेमें कठिनता आती है और लक्ष्यरूपमें जो सात्त्विक सुख है, उसकी प्राप्तिके लिये किया हुआ रसहीन परिश्रम (अभ्यास) आरम्भमें जहरकी तरह लगता है—“अग्रे विषमिव।” तात्पर्य यह है कि अनुभवजन्य राजस और तामस सुखका तो त्याग कर दिया और लक्ष्यवाला सात्त्विक सुख मिला नहीं—उसका रस अभी मिला नहीं; इसलिये वह सात्त्विक सुख आरम्भमें जहरकी तरह प्रतीत होता है। राजस और तामस सुखको अनेक योनियोंमें भोगते आये हैं और उसे इस जन्ममें भी भोगा है। उस भोगे हुए सुखकी स्मृति आनेसे राजस और तामस सुखमें स्वाभाविक ही मन लग जाता है। परन्तु सात्त्विक सुख उतना भोगा हुआ नहीं है; इसलिये इसमें जल्दी मन नहीं लगता। इस कारण सात्त्विक सुख आरम्भमें विषकी तरह लगता है। वास्तवमें सात्त्विक सुख विषकी तरह नहीं है, प्रत्युत राजस और तामस सुखका त्याग विषकी तरह होता है। जैसे, बालकको खेल-कूद छोड़कर पढ़ाईमें लगाया जाय तो उसको पढ़ाईमें कैदीकी तरह होकर अभ्यास करना पड़ता है। पढ़ाईमें मन नहीं लगता तथा इधर उच्छृंखलता, खेल-कूद छूट जाता है, तो उसको पढ़ाई विषकी तरह मालूम देती है। परन्तु वही बालक पढ़ता रहे और एक-दो परीक्षाओंमें पास हो जाय तो उसका पढ़ाईमें मन लग जाता है अर्थात् उसको पढ़ाई अच्छी लगने लग जाती है। तब उसकी पढ़ाईके अभ्याससे रुचि, प्रियता होने लगती है। वास्तवमें देखा जाय तो सात्त्विक सुख आरम्भमें विषकी तरह उन्हीं लोगोंके लिये होता है, जिनका राजस और तामस सुखमें राग है। परन्तु जिनको सांसारिक भोगोंसे स्वाभाविक वैराग्य है, जिनकी पारमार्थिक शास्त्राध्ययन, सत्संग, कथा-कीर्तन, साधन-भजन आदिमें स्वाभाविक रुचि है और जिनके ज्ञान, कर्म, बुद्धि और धृति सात्त्विक हैं, उन साधकोंको यह सात्त्विक सुख आरम्भसे ही अमृतकी तरह आनन्द देनेवाला होता है। उनको इसमें कष्ट, परिश्रम, कठिनता आदि मालूम ही नहीं देते।
परिणामेऽमृतोपमम्
साधन करनेसे साधकमें सत्त्वगुण आता है। सत्त्वगुणके आनेपर इन्द्रियों और अन्तःकरणमें स्वच्छता, निर्मलता, ज्ञानकी दीप्ति, शान्ति, निर्विकारता आदि सद्भाव-सद्गुण प्रकट हो जाते हैं*। इन सद्गुणोंका प्रकट होना ही सात्त्विक सुखका परिणाममें अमृतकी तरह होना है। इसका उपभोग न करनेसे अर्थात् इसमें रस न लेनेसे वास्तविक अक्षय सुखकी प्राप्ति हो जाती है (गीता—पाँचवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। परिणाममें सात्त्विक सुख राजस और तामस सुखसे ऊँचा उठाकर जडतासे सम्बन्ध-विच्छेद करा देता है और इसमें आसक्ति न होनेसे अन्तमें परमात्माकी प्राप्ति करा देता है। इसलिये यह परिणाममें अमृतकी तरह है।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तम्
सत्संग, स्वाध्याय, संकीर्तन, जप, ध्यान, चिन्तन आदिसे जो सुख होता है, वह मान, बड़ाई, आराम, रुपये, भोग आदि विषयेन्द्रिय-सम्बन्धका नहीं है और प्रमाद, आलस्य, निद्राका भी नहीं है। वह तो परमात्माके सम्बन्धका है। इसलिये वह सुख सात्त्विक कहा गया है।
परिशिष्ट भाव
चौदहवें अध्यायमें तो सात्त्विक सुखको बाँधनेवाला बताया था—“सुखसंगेन बध्नाति” (14। 6), पर यहाँ उसको दुःखोंका नाश करनेवाला बताते हैं—“दुःखान्तं च निगच्छति”। इसका तात्पर्य यह है कि सात्त्विक सुखमें रमण (भोग) करनेसे वह बाँधनेवाला हो जाता है अर्थात् गुणातीत नहीं होने देता। अगर रमण न करे तो वह सात्त्विक सुख दुःखोंका नाश करनेवाला हो जाता है। सुख भोगनेसे दुःखका नाश नहीं होता। भोगका त्याग करनेसे ही योग होता है। इसलिये सात्त्विक सुखसे भी असंगता होनी चाहिये। संग होनेसे बन्धनकारक रजोगुण आ जाता है। सत्त्वगुणमें रजोगुण आनेसे पतन होता है। विवेकको महत्त्व न देनेके कारण सात्त्विक सुख आरम्भमें विषकी तरह दीखता है। राजस मनुष्य विवेकको आदर नहीं देता। अतः सात्त्विक सुखका आरम्भमें विषकी तरह दीखना राजसपना है। तात्पर्य है कि सात्त्विक सुख दुःखदायी नहीं होता, प्रत्युत मनुष्यकी बुद्धिमें राजसपना होनेसे सात्त्विक सुख भी उसको विषकी तरह दुःखदायी दीखता है। उसका उद्देश्य तो सात्त्विक सुखका है, पर भीतर राजस भाव पड़ा है।
* सात्त्विक, राजस और तामस—ये तीनों गुण अन्तःकरणमें अमूर्तरूपसे रहते हैं। इनका पता वृत्तियोंसे ही लगता है,
जिसका वर्णन चौदहवें अध्यायमें ग्यारहवेंसे तेरहवें श्लोकतक हुआ है।
38श्रीभगवान्
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्॥ 38॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

अब राजस सुखका वर्णन करते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
4 sections
विषयेन्द्रियसंयोगात्
विषयों और इन्द्रियोंके संयोगसे होनेवाला जो सुख है, उसमें अभ्यास नहीं करना पड़ता। कारण कि यह प्राणी किसी भी योनिमें जाता है, वहाँ उसको विषयों और इन्द्रियोंके संयोगसे होनेवाला सुख मिलता ही है। शब्द, स्पर्श आदि पाँचों विषयोंका सुख पशु- पक्षी, कीट-पतंग आदि सभी प्राणियोंको मिलता है। अतः उस सुखमें प्राणिमात्रका स्वाभाविक अभ्यास रहता है। मनुष्यजीवनमें भी बचपनसे देखा जाय तो अनुकूलतामें राजी होना और प्रतिकूलतामें नाराज होना स्वाभाविक ही होता आया है। इसलिये इस राजस सुखमें अभ्यासकी जरूरत नहीं है।
यत्तदग्रेऽमृतोपमम्
राजस सुखको आरम्भमें अमृतकी तरह कहनेका भाव यह है कि सांसारिक विषयोंकी प्राप्तिकी सम्भावनाके समय मनमें जितना सुख होता है, उतना सुख मस्ती और राजीपन विषयोंके मिलनेपर नहीं रहता। मिलनेपर भी आरम्भमें (संयोग होते ही) जैसा सुख होता है, थोड़े समयके बाद वैसा सुख नहीं रहता और उस विषयको भोगते-भोगते जब भोगनेकी शक्ति क्षीण हो जाती है, उस समय सुख नहीं होता, प्रत्युत विषयभोगसे भी अगर विषयोंको भोगा जाय तो दुःख, जलन पैदा हो जाती है, चित्तमें सुख नहीं रहता, इसलिये यह राजस सुख आरम्भमें अमृतकी तरह दीखता है। अमृतकी तरह कहनेका दूसरा भाव यह है कि जब मन विषयोंमें खिंचता है,तब मनको वे विषय बड़े प्यारे लगते हैं। विषयों और भोगोंकी बातें सुननेमें जितना रस आता है, उतना भोगोंमें नहीं आता। इसलिये गीतामें आया है—“यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः” (2। 42); राजस पुरुष स्वर्गके भोगोंका सुख सुनते हैं तो उनको वह सुख बड़ा प्रिय लगता है और वे उसके लिये ललचा उठते हैं। तात्पर्य है कि वे स्वर्गके सुख दूरसे सुनकर ही बड़े प्रिय लगते हैं; परन्तु स्वर्गमें जाकर सुख भोगनेसे उनको उतना सुख नहीं मिलता और वह उतना प्रिय भी नहीं लगता!
परिणामे विषमिव
आरम्भमें विषय बड़े सुन्दर लगते हैं, उनमें बड़ा सुख मालूम देता है; परन्तु उनको भोगते-भोगते जब परिणाममें वह सुख नीरसतामें परिणत हो जाता है, उस सुखमें बिलकुल अरुचि हो जाती है, तब वही सुख जहरकी तरह मालूम देता है। संसारमें जितने प्राणी कैदमें पड़े हैं, जितने चौरासी लाख योनियों और नरकोंमें पड़े हैं, उसका कारण देखा जाय तो उन्होंने विषयोंका भोग किया है, उनसे सुख लिया है, इसीसे वे कैद, नरक आदिमें दुःख पा रहे हैं; क्योंकि राजस सुखका परिणाम दुःख होता ही है—“रजसस्तु फलं दुःखम्” (गीता 14। 16)। आज भी जो लोग घबरा रहे हैं, दुःखी हो रहे हैं, वे सब पदार्थोंके रागके कारण ही दुःख पा रहे हैं। जो धनी होकर फिर निर्धन हो गया है, वह जितना दुःखी और संतप्त है, उतना दुःख और सन्ताप स्वाभाविक निर्धनको नहीं है; क्योंकि उसके भीतर सुखके संस्कार अधिक नहीं पड़े हैं। परन्तु धनीने राजस सुख अधिक भोगा है, उसके भीतर सुखके संस्कार अधिक पड़े हैं, इसलिये उसको धनके अभावका दुःख ज्यादा है। जैसे, जो मनुष्य तरह- तरहकी सामग्री भोजन करनेवाला है, उसके भोजनमें कभी थोड़ी-सी भी कमी रह जाय तो उसको वह कमी बड़ी खटकती है कि आज भोजनमें चटनी नहीं है, खटाई नहीं है, मिठाई नहीं है, अमुक-अमुक चीज नहीं है—इस प्रकार नहीं-नहींका ही ताँता लगा रहता है। परन्तु साधारण आदमी बाजरेकी रूखी-सूखी रोटी खाकर भी मौजसे रहता है, उसको भोजनमें किसी चीजकी कमी खटकती ही नहीं। तात्पर्य यह हुआ कि पदार्थोंके संयोगसे जितना ज्यादा सुख लिया है, उतना ही उसके अभावका अनुभव होता है। अभावके अनुभवमें दुःख ही होता है। जिस पदार्थकी कामना होती है, उसकी प्राप्तिके लिये मनुष्य उद्योग करते हैं। उद्योग करनेपर भी वस्तु मिलेगी या नहीं मिलेगी, इसमें संदेह रहता है। वस्तु न मिले तो उसके अभावका दुःख होता है, और वस्तु मिल जाय तो उस वस्तुको और भी अधिक प्राप्त करनेकी इच्छा हो जाती है। इस प्रकार इच्छापूर्ति नयी इच्छाका कारण बन जाती है और इच्छापूर्ति तथा फिर इच्छाकी उत्पत्ति—यह चक्कर चलता ही रहता है, इसका कभी अन्त नहीं आता। तात्पर्य यह है कि इच्छा कभी मिटती नहीं और इच्छाके रहते हुए अभाव खटकता रहता है। यह अभाव ही विषकी तरह है अर्थात् दुःखदायी है। जब राजस सुख परिणाममें विषकी तरह है, तो फिर राजस सुख लेनेवाले जितने लोग हैं, उन सबको सुखभोगके अन्तमें मर जाना चाहिये? परन्तु राजस सुख विषकी तरह मारता नहीं, प्रत्युत विषकी तरह अरुचिकारक हो जाता है। उसमें पहले जैसी रुचि होती है, वैसी रुचि अन्तमें नहीं रहती अर्थात् वह सुख विषकी तरह हो जाता है, साक्षात् विष नहीं होता। राजस सुख विषकी तरह क्यों होता है? कारण कि विष तो एक जन्ममें ही मारता है, पर राजस सुख कई जन्मोंतक मारता है। राजस सुख लेनेवाला रागी पुरुष शुभ कर्म करके यदि स्वर्गमें भी चला जाता है, तो वहाँ भी उसको सुख, शान्ति नहीं मिलती। स्वर्गमें भी अपनेसे ऊँची श्रेणीवालोंको देखकर ईर्ष्या होती है कि ये हमारेसे ऊँचे क्यों हो गये! समान पदवालोंको देखकर दुःख होता है कि ये हमारे समान पदपर आकर क्यों बैठ गये! और नीची श्रेणीवालोंको देखकर अभिमान आता है कि हम इनसे ऊँचे हैं! इस प्रकार उसके मनमें ईर्ष्या, दुःख और अभिमान होते ही रहते हैं, फिर उसके मनमें सुख कहाँ और शान्ति कहाँ? इतना ही नहीं, पुण्योंके क्षीण हो जानेपर उसको पुनः मृत्युलोकमें आना पड़ता है—“क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति” (गीता 9। 21)। यहाँ आकर फिर शुभ-कर्म करता है और फिर स्वर्गमें जाता है। इस प्रकार जन्म- मरणके चक्करमें चढ़ा ही रहता है—“गतागतं कामकामा लभन्ते” (9। 21)। यदि वह रागके कारण पाप-कर्मोंमें लग जाता है तो परिणाममें चौरासी लाख योनियों और नरकोंमें पड़ता हुआ न जाने कितने जन्मोंतक जन्मता-मरता रहता है, जिसका कोई अन्त नहीं आता। इसलिये इस सुखको विषकी तरह कहा गया है।
तत्सुखं राजसं स्मृतम्
सात्त्विक सुखके लिये तो (सैंतीसवें श्लोकमें) “प्रोक्तम्” पद कहा है, पर राजस सुखके लिये यहाँ “स्मृतम्” पद कहनेका तात्पर्य है कि पहले भी मनुष्यने राजस सुखका फल दुःख पाया है; परन्तु रागके कारण वह संयोगकी तरफ पुनः ललचा उठता है। कारण कि संयोगका प्रभाव उसपर पड़ा हुआ है और परिणामके प्रभावको वह स्वीकार नहीं करता। अगर वह परिणामके प्रभावको स्वीकार कर ले, तो फिर वह राजस सुखमें फँसेगा नहीं। स्मृति, शास्त्र, पुराण आदिमें ऐसे बहुत-से इतिहास आते हैं, जिनमें मनुष्योंके द्वारा राजस सुखके कारण बहुत दुःख पानेकी बात आयी है। इसी बातको स्मरण करानेके लिये यहाँ “स्मृतम्” पद आया है। जिसकी वृत्ति जितनी सात्त्विक होती है, वह उतना ही हरेक विषयके परिणामकी तरफ देखता है। अभीके तात्कालिक सुखकी तरफ वह ध्यान नहीं देता। परंतु राजसी वृत्तिवाला परिणामकी तरफ देखता ही नहीं, उसकी वृत्ति तात्कालिक सुखकी तरफ ही जाती है। इसलिये वह संसारमें फँसा रहता है। राजस पुरुषको संसारका सम्बन्ध वर्तमानमें तो अच्छा मालूम देता है; परन्तु परिणाममें यह हानिकारक है—“ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते” (गीता 5। 22)। इसलिये साधकको संसारसे विरक्त हो जाना चाहिये; राजस सुखमें नहीं फँसना चाहिये।
परिशिष्ट भाव
सांसारिक भोगोंका सुख आरम्भमें अमृतकी तरह और परिणाममें विषकी तरह होता है। अविवेकी मनुष्य आरम्भको ही महत्त्व देता है। आरम्भ तो सदा रहता नहीं, पर उसकी कामना सदा रहती है, जो सम्पूर्ण दुःखोंका कारण है। परन्तु विवेकी मनुष्य आरम्भको न देखकर परिणामको देखता है, इसलिये वह भोगोंमें आसक्त नहीं होता—“न तेषु रमते बुधः” (गीता 5। 22)। परिणामको देखनेकी योग्यता मनुष्यमें ही है। परिणामको न देखना पशुता है। वास्तवमें आरम्भ (संयोग) मुख्य नहीं है, प्रत्युत अन्त (वियोग) ही मुख्य है। मनुष्य आरम्भकालको चाहता है, पर वह रहता नहीं; क्योंकि प्रत्येक संयोगका वियोग होता है—यह नियम है। आरम्भ अनित्य होता है, पर अन्त नित्य होता है। अनित्यकी इच्छासे ही दुःखोंकी उत्पत्ति होती है। संसारमात्रका वियोग ही नित्य है। परन्तु राजसी वृत्तिके कारण संयोग अच्छा मालूम देता है। अगर मनुष्य आरम्भकालके सुखको महत्त्व न दे तो दुःख कभी आयेगा ही नहीं। आरम्भको देखनेसे भोग होता है और परिणामको देखनेसे योग होता है। संसारके संयोगमें जो सुख प्रतीत होता है, उसमें दुःख भी मिला हुआ रहता है। परन्तु संसारके वियोगसे सुख- दुःखसे अतीत अखण्ड आनन्द प्राप्त होता है।
39श्रीभगवान्
यदग्रे ानुबन्धे सुखं मोहनमात्मनः। निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्॥ 39॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

अब तामस सुखका वर्णन करते हैं।

पदच्छेद
श्लोकमें ढूँढ़नेके लिये हॉवर करें
व्याख्या
2 sections
निद्रालस्यप्रमादोत्थम्
जब राग अत्यधिक बढ़ जाता है, तब वह तमोगुणका रूप धारण कर लेता है। इसीको मोह कहते हैं। इस मोह-(मूढता-)के कारण मनुष्यको अधिक सोना अच्छा लगता है। अधिक सोनेवाले मनुष्यको गाढ़ नींद नहीं आती। गाढ़ नींद न आनेसे तन्द्रा ज्यादा आती है और स्वप्न भी ज्यादा आते हैं। तन्द्रा और स्वप्नमें तामस मनुष्यका बहुत समय बरबाद हो जाता है। परन्तु तामस मनुष्यको इसीसे ही सुख मिलता है, इसलिये इस सुखको निद्रासे उत्पन्न बताया है। जब तमोगुण अधिक बढ़ जाता है, तब मनुष्यकी वृत्तियाँ भारी हो जाती हैं। फिर वह आलस्यमें समय बरबाद कर देता है। आवश्यक काम सामने आनेपर वह कह देता है कि “फिर कर लेंगे, अभी तो आराम कर रहे हैं।” इस प्रकार आलस्य- अवस्थामें उसको सुख मालूम देता है। परन्तु निकम्मा रहनेके कारण उसकी इन्द्रियों और अन्तःकरणमें शिथिलता आ जाती है, मनमें संसारका फालतू चिन्तन होता रहता है और मनमें अशान्ति, शोक, विषाद, चिन्ता, दुःख होते रहते हैं। जब इससे भी अधिक तमोगुण बढ़ जाता है, तब मनुष्य प्रमाद करने लग जाता है। वह प्रमाद दो तरहका होता है— अक्रिय प्रमाद और सक्रिय प्रमाद। घर, परिवार, शरीर आदिके आवश्यक कामोंको न करना और निठल्ले बैठे रहना “अक्रिय प्रमाद”* है। व्यर्थ क्रियाएँ (देखना, सुनना, सोचना आदि) करना; बीड़ी, सिगरेट, शराब, भाँग, तम्बाकू, खेल-तमाशा आदि दुर्व्यसनोंमें लगना और चोरी, डकैती, झूठ, कपट, बेईमानी, व्यभिचार, अभक्ष्य-भक्षण आदि दुराचारोंमें लगना “सक्रिय प्रमाद” है। प्रमादके कारण तामस पुरुषोंको निरर्थक समय बरबाद करनेमें तथा झूठ, कपट, बेईमानी आदि करनेमें सुख मिलता है। जैसे काम-धंधा करनेवाले पैसे (मजदूरी या वेतन) तो पूरे ले लेते हैं, पर काम पूरा और ठीक ढंगसे नहीं करते। चिकित्सकलोग रोगियोंका ठीक ढंगसे इलाज नहीं करते, जिससे रोगीलोग बार-बार आते रहें और पैसे देते रहें। दूध बेचनेवाले पैसोंके लोभमें दूधमें पानी मिलाकर बेचते हैं। पैसे अधिक देनेपर भी वे पानी मिलाना नहीं छोड़ते। ऐसे पापरूप प्रमादसे उनको घोर नरकोंकी प्राप्ति होती है। जब तमोगुणी प्रमाद-वृत्ति आती है, तब वह सत्त्वगुणके विवेक-ज्ञानको ढक देती है और जब तमोगुणी निद्रा- आलस्य-वृत्ति आती है, तब वह सत्त्वगुणके प्रकाशको ढक देती है। विवेक-ज्ञानके ढकनेपर प्रमाद होता है तथा प्रकाशके ढकनेपर आलस्य और निद्रा आती है। तामस पुरुषको निद्रा, आलस्य और प्रमाद—तीनोंसे सुख मिलता है, इसलिये तामस सुखको इन तीनोंसे उत्पन्न बताया गया है। निद्रा आवश्यक है। यद्यपि नींद तामसी है, तथापि नींदका जो बेहोशीपना है, वह त्याज्य है और जो विश्रामपना है, वह ग्राह्य है। परन्तु हरेक आदमी बेहोशीके बिना विश्रामपना ग्रहण नहीं कर सकता; अतः उनके लिये नींदका बेहोशीभाग भी ग्राह्य है। हाँ, जो साधना करके ऊँचे उठ गये हैं, उनको नींदके बेहोशीभागके बिना भी जाग्रत्-सुषुप्तिमें विश्राम मिल जाता है। कारण कि जाग्रत्-अवस्थामें संसारके चिन्तनका सर्वथा त्याग होकर परमात्मतत्त्वमें स्थिति हो जाती है तो महान् विश्राम, सुख मिलता है; इस स्थितिसे भी असंग होनेपर वास्तविक तत्त्वकी प्राप्ति हो जाती है। जो साधक हैं, उनको विश्रामके लिये नहीं सोना चाहिये। उनका तो यही भाव होना चाहिये कि पहले काम-धंधा करते हुए भगवान्का भजन करते थे, अब लेटे-लेटे भजन करना है। (2)
अतिनिद्रा
समयपर सोना और समयपर जागना युक्तनिद्रा है और अधिक सोना अतिनिद्रा है। अतिनिद्राके आदि और अन्तमें शरीरमें आलस्य भरा रहता है। शरीरमें भारीपन रहता है। अधिक नींद लेनेका स्वभाव होनेसे हरेक कार्यमें नींद आती रहती है। चौदहवें अध्यायके आठवें श्लोकमें भगवान्ने पहले प्रमादको, दूसरे नम्बरमें आलस्यको और तीसरे नम्बरमें
परिशिष्ट भाव
तामस मनुष्यमें मोह रहता है—“तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्” (गीता 14। 8)। मोह विवेकमें बाधक होता है। तामसी वृत्ति विवेक जाग्रत् नहीं होने देती। इसलिये तामस मनुष्यका विवेक मोहके कारण लुप्त हो जाता है, जिससे वह आरम्भ या अन्तको देखता ही नहीं।
विशेष बात
विशेष बात निद्रा दो प्रकारकी होती है—युक्तनिद्रा और अतिनिद्रा। (1) “युक्तनिद्रा”—निद्रामें एक विश्राम मिलता है। विश्रामसे शरीर, मन, बुद्धि, अन्तःकरणमें नीरोगता, स्फूर्ति, स्वच्छता, निर्मलता और ताजगी आती है। ताजगी आनेसे साधन-भजन करनेमें और सांसारिक काम करनेमें भी शक्ति मिलती है और उत्साह रहता है। इसलिये युक्तनिद्रा दोषी नहीं है, प्रत्युत सबके लिये आवश्यक है। भगवान्ने भी युक्तनिद्राको आवश्यक बताया है—“युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा” (गीता 6। 17)। ताजगीमात्रके लिये निद्रा साधकके लिये आवश्यक है। जिस साधकके रागपूर्वक सांसारिक संकल्प नहीं होते, उसको नींद बहुत जल्दी आ जाती है और जो ज्यादा संकल्पशील है, उसको नींद जल्दी नहीं आती। इससे यह सिद्ध हुआ कि संसारका जो सम्बन्ध है, वह निद्राका सुख भी नहीं लेने देता। निद्रा आवश्यक क्यों है? कारण कि निद्रामें जो स्थिर तत्त्व है, वह साधकको साधनमें प्रवृत्त करनेमें और सांसारिक कार्य करनेमें बल देता है, इसलिये निद्राको रखा है—“प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत।” परन्तु यहाँ पहले निद्राको, दूसरे नम्बरमें आलस्यको और तीसरे नम्बरमें प्रमादको रखा है— “निद्रालस्यप्रमादोत्थम्।” इस व्यतिक्रमका कारण यह है कि वहाँ इन तीनोंके द्वारा मनुष्यको बाँधनेका प्रसंग है और यहाँ मनुष्यका पतन करनेका प्रसंग है। बाँधनेके विषयमें प्रमाद सबसे अधिक बन्धनकारक है; अतः इसको सबसे पहले रखा है। कारण कि प्रमाद निषिद्ध आचरणोंमें प्रवृत्त करता है, जिससे अधोगति होती है। आलस्य केवल अच्छी प्रवृत्तिको रोकनेवाला होनेसे इसको दो नम्बरमें रखा है। निद्रा आवश्यक होनेसे बन्धनकारक नहीं है, प्रत्युत अतिनिद्रा ही बन्धनकारक है; अतः इसको तीसरे नम्बरमें रखा है। यहाँ उससे उलटा क्रम रखनेका अभिप्राय है कि सबके लिये आवश्यक होनेसे निद्रा इतना पतन करनेवाली नहीं है। निद्रासे अधिक आलस्य पतन करता है और आलस्यसे भी अधिक प्रमाद पतन करता है। कारण कि मनुष्य ज्यादा नींद लेगा तो वृक्ष आदि मूढ़ योनियोंकी प्राप्ति होगी; परन्तु आलस्य और प्रमाद करेगा तो कर्तव्यच्युत होकर दुराचार करनेसे नरकमें जाना पड़ेगा1। “यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः”—निद्रा, आलस्य और प्रमादसे उत्पन्न हुआ सुख आरम्भमें और परिणाममें अपनेको मोहित करनेवाला है। इस सुखमें न तो आरम्भमें विवेक रहता है और न परिणाममें विवेक रहता है अर्थात् यह सुख विवेकको जाग्रत् नहीं होने देता। पशु-पक्षी, कीट-पतंग आदिमें भी विवेक-शक्ति जाग्रत् न रहनेसे वे क्रियाके आरम्भ और परिणामको सोच नहीं पाते। ऐसे ही जिस सुखके कारण मनुष्य यह सोच ही नहीं सकता कि इस निद्रा आदिसे उत्पन्न हुए सुखका परिणाम हमारे लिये क्या होगा? उससे क्या लाभ होगा? क्या हानि होगी? क्या हित होगा? क्या अहित होगा? उस सुखको तामस कहा गया है— “तत्तामसमुदाहृतम्।” जाता है, तब वह सुख अमृतकी तरह हो जाता है— “परिणामेऽमृतोपमम्।” रागके कारण ही रजोगुणी सुख आरम्भमें अमृतकी तरह दीखता है। पर वह सुख परिणाममें प्राणीके लिये जहरकी तरह अनिष्टकारक अर्थात् महान् दुःखरूप हो जाता है। प्रकृतिजन्य सुखकी आसक्ति होनेपर दुःखकी परम्पराका कोई अन्त नहीं आता। जब वही राग तमोगुणका रूप धारण कर लेता है, तब मनुष्यकी वृत्तियाँ भारी हो जाती हैं। फिर मनुष्य नींद और आलस्यमें समय बरबाद कर देता है तथा आवश्यक कर्तव्यसे विमुख होकर अकर्तव्यमें लग जाता है। परन्तु तामस पुरुषको इन्हींमें सुख मालूम देता है। इसलिये यह तामस सुख आदि और अन्तमें मोहित करनेवाला है। (2) जो प्रतिक्षण अभावमें जा रहा है, वह वास्तवमें “नहीं” है। पर जो “नहीं” को प्रकाशित करनेवाला तथा विशेष बात (1) प्रकृति और पुरुष—दोनों अनादि हैं, और “ये दो हैं” इस प्रकार इनकी पृथक्ताका विवेक भी अनादि है। यह विवेक पुरुषमें ही रहता है, प्रकृतिमें नहीं। जब यह पुरुष इस विवेकका अनादर करके अविवेकके कारण प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है, तब इस सम्बन्धके कारण पुरुषमें राग पैदा हो जाता है2। जब राग बहुत सूक्ष्म रहता है, तब विवेक प्रबल रहता है। जब राग बढ़ जाता है, तब विवेक दब जाता है, मिटता नहीं। पर विवेक ठीक तरहसे जाग्रत् हो जाय तो फिर राग टिकता नहीं अर्थात् रागका अभाव हो जाता है और उस समय पुरुष मुक्त कहलाता है। उस रागके कारण मनुष्यकी प्रकृतिजन्य सुखमें आसक्ति हो जाती है। उस आसक्तिके रहते हुए जब मनुष्य किसी कारणवश सात्त्विक सुखको प्राप्त करना चाहता है, तब राजस और तामस सुखका त्याग करनेमें उसे कठिनता मालूम देती है—“यत्तदग्रे विषमिव।” परन्तु जब राग मिट उसका आधार है, वह वास्तवमें “है” तत्त्व है। उसी तत्त्वको “सच्चिदानन्द” कहते हैं। निरन्तर सत्तारूपसे रहनेके कारण उसे “सत्” कहते हैं, ज्ञानस्वरूप होनेके कारण उसे “चित्” कहते हैं और आनन्दस्वरूप होनेके कारण उसे “आनन्द” कहते हैं। उस सच्चिदानन्द परमात्माका ही अंश होनेसे यह प्राणी भी सच्चिदानन्दस्वरूप है। परन्तु जब प्राणी असत् वस्तुकी इच्छा करता है कि अमुक वस्तु मुझे मिले, तब उस इच्छासे वह स्वतःस्वाभाविक आनन्द—सुख ढक जाता है। जब असत् वस्तुकी इच्छा मिट जाती है, तब उस इच्छाके मिटते ही वह स्वतःस्वाभाविक सुख प्रकट हो जाता है। नित्य-निरन्तर रहनेवाला जो सुखरूप “तत्त्व” है, उसमें जब सात्त्विकी बुद्धि तल्लीन हो जाती है, तब बुद्धिमें स्वच्छता, निर्मलता आ जाती है। उस स्वच्छ और निर्मल बुद्धिसे अनुभवमें आनेवाला वह स्वाभाविक सुख ही सात्त्विक कहलाता है। बुद्धिसे भी जब सम्बन्ध छूट जाता है, तब वास्तविक सुख रह जाता है। सात्त्विकी बुद्धिके सम्बन्धसे ही उस सुखकी “सात्त्विक” संज्ञा होती है। बुद्धिसे सम्बन्ध छूटते ही उसकी “सात्त्विक” संज्ञा नहीं रहती। मनमें जब किसी वस्तुको प्राप्त करनेकी इच्छा होती है, तब वह वस्तु मनमें बस जाती है अर्थात् मन और बुद्धिका उसके साथ सम्बन्ध हो जाता है। जब वह मनोवांछित वस्तु मिल जाती है, तब वह वस्तु मनसे निकल जाती है अर्थात् वस्तुका मनमें जो खिंचाव था, वह निकल जाता है। उसके निकलते ही अर्थात् वस्तुसे सम्बन्ध- विच्छेद होते ही वस्तुके अभावका जो दुःख था, वह निवृत्त हो जाता है और नित्य रहनेवाले स्वतःसिद्ध सुखका तात्कालिक अनुभव हो जाता है। वास्तवमें यह सुख वस्तुके मिलनेसे नहीं हुआ है, प्रत्युत रागके तात्कालिक मिटनेसे हुआ है, पर राजस पुरुष भूलसे उस सुखको वस्तुके मिलनेसे होनेवाला मान लेता है। वास्तवमें देखा जाय तो वस्तुका संयोग बाहरसे होता है और प्रसन्नता भीतरसे होती है। भीतरसे जो प्रसन्नता होती है, वह बाहरके संयोगसे पैदा नहीं होती, प्रत्युत भीतर (मनमें) बसी हुई वस्तुके साथ जो सम्बन्ध था, उस वस्तुसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर पैदा होती है। तात्पर्य यह है वस्तुके मिलते ही अर्थात् बाहरसे वस्तुका संयोग होते ही भीतरसे उस वस्तुसे वियोग हो जाता है तो उस वियोगके कारण स्वाभाविक सुखका आभास होता है, इसीको निद्राका सुख कहते हैं। परन्तु बुद्धिकी मलिनतासे वह स्वाभाविक सुख जैसा है, वैसा अनुभवमें नहीं आता। तात्पर्य है कि बुद्धिके तमोगुणी होनेसे बुद्धिमें स्वच्छता नहीं रहती और स्वच्छता न रहनेसे वह सुख स्पष्ट अनुभवमें नहीं आता। इसलिये निद्राके सुखको तामस कहा गया है*। इन सबका तात्पर्य यह है कि सात्त्विक मनुष्यको संसारसे विमुख होकर तत्त्वमें बुद्धिके तल्लीन होनेसे सुख होता है; राजस मनुष्यको रागके कारण अन्तःकरणमें बसी हुई वस्तुके बाहर निकलनेसे सुख होता है और तामस मनुष्यको वस्तुओंके लिये किये जानेवाले कर्तव्य-कर्मोंकी विस्मृतिसे और निरर्थक क्रियाओंमें लगनेसे सुख होता है। इससे यह सिद्ध हुआ कि जो नित्य-निरन्तर रहनेवाला सुखरूप तत्त्व है, वह असत्के सम्बन्धसे आच्छादित रहता है। विवेकपूर्वक असत्से सम्बन्ध-विच्छेद हो जानेपर, रागवाली वस्तुओंके मनसे निकल जानेपर और बुद्धिके तमोगुणमें लीन हो जानेपर जो सुख होता है, वह उसी सुखका आभास है। तात्पर्य यह हुआ कि संसारसे विवेकपूर्वक विमुख होनेपर सात्त्विक सुख, भीतरसे वस्तुओंके निकलनेपर राजस सुख और मूढ़तासे निद्रा-आलस्यमें संसारको भूलनेपर तामस सुख ही नित्य रहनेवाले स्वाभाविक सुखका आभास हो जाता है। जब नींदमें बुद्धि तमोगुणमें लीन हो जाती है, तब बुद्धिकी स्थिरताको लेकर वह सुख प्रकट हो जाता है। कारण कि तमोगुणके प्रभावसे नींदमें जाग्रत् और स्वप्नके पदार्थोंकी विस्मृति हो जाती है। पदार्थोंकी स्मृति दुःखोंका कारण है। पदार्थोंकी विस्मृति होनेसे निद्रावस्थामें पदार्थोंका होता है; परन्तु वास्तविक सुख तो प्रकृतिजन्य पदार्थोंसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेदसे ही होता है। इन सुखोंमें जो प्रियता, आकर्षण और (सुखका) भोग है, वही पारमार्थिक उन्नतिमें बाधा देनेवाला और पतन करनेवाला है। इसलिये पारमार्थिक उन्नति चाहनेवाले साधकोंको इन तीनों सुखोंसे
* आलस्य और अक्रिय प्रमाद एक-जैसे दीखते हुए भी उनमें थोड़ा अन्तर है। आलस्यमें वृत्तियोंके भारी होनेसे सुख होता
है और अक्रिय प्रमादमें कर्तव्य-कर्मोंको छोड़नेसे सुख होता है।
1-तमोगुणकी वृत्ति जो प्रमाद है, वह तो अच्छी प्रवृत्तिको रोककर खेल-कूद आदि सामान्य फालतू क्रियाओंमें लगाता
है; परन्तु जब प्रमादके साथ राग मिल जाता है (जो कि रजोगुणका रूप है), तब उससे कामना पैदा हो जाती है। कामनासे
फिर अनेक तरहके पाप, अनर्थ होते हैं, जिनका परिणाम बड़ा भयंकर होता है।
2-रागसे अनेक विकार पैदा होते हैं, पर वे सब विकार प्रकृतिमें ही होते हैं, पुरुषमें नहीं। प्रकृतिके साथ तादात्म्य होनेसे
पुरुष प्रकृतिके उन विकारोंको अपनेमें मान लेता है तो यह पुरुष भोगी हो जाता है। परन्तु जब इसको यह बोध हो जाता
है कि विकार आते हैं और जाते हैं, उत्पन्न होते हैं और नष्ट होते हैं, पर विकारोंके आदि और अन्तको देखनेवाली अपनी
नित्य सत्ता ज्यों-की-त्यों ही रहती है, तब उस अवस्थामें पुरुष योगी हो जाता है।
* निद्राको तामस सुख कहनेका अभिप्राय यह है कि इसमें बुद्धि मोहित हो जाती है अर्थात् उसमें बेहोशी आ जाती है।
उस बेहोशीसे संसारकी सर्वथा विस्मृति हो जाती है और जाग्रत्-अवस्था सर्वथा दब जाती है, इसलिये इसको तामस सुख
कहा गया है। अगर इन्द्रियोंसहित बुद्धि मोहित न हो तो यही अवस्था “समाधि” हो जाती है। समाधिसे भी विश्राम मिलता
है। इस विश्राममें निद्रासे मिलनेवाली जो ताजगी है, वह मिल जाती है; परन्तु इस ताजगीका सुख लेनेसे गुणातीत नहीं होता।
गुणातीत तो समाधिके सुखसे असंग होनेसे ही होता है।
प्रकृति क्रियाशील, परिवर्तनशील है और परमात्मतत्त्व अपरिवर्तनशील, निर्विकार, शान्त, निश्चल है। निद्रावस्थामें उस
निश्चल तत्त्वमें स्थिति हो जाती है; परन्तु अन्तःकरणमें भोगोंका महत्त्व रहनेसे निद्राके बाद मनुष्यकी फिर भोग और संग्रहमें
ही रुचि हो जाती है और वह उसीमें लग जाता है। इस प्रकार रागके कारण मनुष्य उस निश्चल तत्त्वसे लाभ नहीं ले सकता
और निद्रासे केवल थकावट दूर कर लेता है। अगर वह भोग और ऐश्वर्यकी आसक्तिका सर्वथा त्याग कर दे तो उसकी
निद्रामें और निद्राके बाद भी स्वरूपमें स्वतः-स्वाभाविक अटल स्थिति रहेगी।
40श्रीभगवान्
तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः। सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः॥ 40॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

विच्छेद हो जाता है और सम्बन्ध-विच्छेद होते विच्छेद करना अत्यन्त आवश्यक है। बीसवेंसे उनतालीसवें श्लोकतक भगवान्ने गुणोंकी मुख्यताको लेकर ज्ञान, कर्म आदिके तीन-तीन भेद बताये। अब इनके सिवाय गुणोंको लेकर सृष्टिकी सम्पूर्ण वस्तुओंके भी तीन-तीन भेद होते हैं—इसका लक्ष्य कराते हुए भगवान् आगेके श्लोकमें प्रकरणका उपसंहार करते हैं।

पदच्छेद
श्लोकमें ढूँढ़नेके लिये हॉवर करें
व्याख्या
2 sections
[इस अध्यायके आरम्भमें अर्जुनने संन्यास और त्यागका तत्त्व जानना चाहा तो भगवान्ने पहले त्याग—कर्मयोगका वर्णन किया। उस प्रकरणका उपसंहार करते हुए भगवान्ने कहा कि जो त्यागी नहीं हैं, उनको अनिष्ट, इष्ट और मिश्र—यह तीन प्रकारका कर्मोंका फल मिलता है और जो संन्यासी हैं, उनको कभी नहीं मिलता। ऐसा कहकर तेरहवें श्लोकसे संन्यास—सांख्ययोगका प्रकरण आरम्भ करके पहले कर्मोंके होनेमें अधिष्ठानादि पाँच हेतु बताये। सोलहवें-सत्रहवें श्लोकोंमें कर्तृत्व माननेवालोंकी निन्दा और कर्तृत्वका त्याग करनेवालोंकी प्रशंसा की। अठारहवें श्लोकमें कर्म-प्रेरणा और कर्म-संग्रहका वर्णन किया। परन्तु जो वास्तविक तत्त्व है, वह न कर्म-प्रेरक है और न कर्म-संग्राहक। कर्म-प्रेरणा और कर्म-संग्रह तो प्रकृतिके गुणोंके साथ सम्बन्ध रखनेसे ही होते हैं। फिर गुणोंके अनुसार ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुखके तीन-तीन भेदोंका वर्णन किया। सुखका वर्णन करते हुए यह बताया कि प्रकृतिके साथ यत्किंचित् सम्बन्ध रखते हुए ऊँचा-से-ऊँचा जो सुख होता है, वह सात्त्विक होता है। परंतु जो स्वरूपका वास्तविक सुख है, वह गुणातीत है, विलक्षण है, अलौकिक है (गीता—छठे अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। सात्त्विक सुखको “आत्मबुद्धिप्रसादजम्” कहकर भगवान्ने उसको जन्य (उत्पन्न होनेवाला) बताया। जन्य वस्तु नित्य नहीं होती। इसलिये उसको जन्य बतानेका तात्पर्य है कि उस जन्य सुखसे भी ऊपर उठना है अर्थात् प्रकृति और प्रकृतिके तीनों गुणोंसे रहित होकर उस परमात्मतत्त्वको प्राप्त करना है, जो कि सबका अपना स्वाभाविक स्वरूप है। इसलिये कहते हैं—]
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः
यहाँ “पृथिव्याम्” पदसे मृत्युलोक और पृथ्वीके नीचेके अतल, वितल आदि सभी लोकोंका, “दिवि” पदसे स्वर्ग आदि लोकोंका, “देवेषु” पदको प्राणिमात्रके उपलक्षणके रूपमें उन-उन स्थानोंमें रहनेवाले मनुष्य, देवता, असुर, राक्षस, नाग, पशु, पक्षी, कीट, पतंग, वृक्ष आदि सभी चर-अचर प्राणियोंका, और “वा पुनः” पदोंसे अनन्त ब्रह्माण्डोंका संकेत किया गया है। तात्पर्य यह हुआ कि त्रिलोकी और अनन्त ब्रह्माण्ड तथा उनमें रहनेवाली कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है, जो प्रकृतिसे उत्पन्न इन तीनों गुणोंसे रहित हो अर्थात् सब-के-सब त्रिगुणात्मक हैं—“सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः।” प्रकृति और प्रकृतिका कार्य—यह सब-का-सब ही त्रिगुणात्मक और परिवर्तनशील है। इनसे सम्बन्ध जोड़नेसे ही बन्धन होता है और इनसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेसे ही मुक्ति होती है; क्योंकि स्वरूप असंग है। स्वरूप “स्व” है और प्रकृति “पर” है। प्रकृतिसे सम्बन्ध जुड़ते ही अहंकार पैदा हो जाता है, जो कि पराधीनताको पैदा करनेवाला है। यह एक विचित्र बात है कि अहंकारमें स्वाधीनता मालूम देती है, पर है वास्तवमें पराधीनता! कारण कि अहंकारसे प्रकृतिजन्य पदार्थोंमें आसक्ति, कामना आदि पैदा हो जाती है, जिससे पराधीनतामें भी स्वाधीनता दीखने लग जाती है। इसलिये प्रकृतिजन्य गुणोंसे रहित होना आवश्यक है। प्रकृतिजन्य गुणोंमें रजोगुण और तमोगुणका त्याग करके सत्त्वगुण बढ़ानेकी आवश्यकता है। सत्त्वगुणमें भी प्रसन्नता और विवेक तो आवश्यक है; परन्तु सात्त्विक सुख और ज्ञानकी आसक्ति नहीं होनी चाहिये; क्योंकि सुख और ज्ञानकी आसक्ति बाँधनेवाली है। इसलिये इनकी आसक्तिका त्याग करके सत्त्वगुणसे ऊँचा उठे। इससे ऊँचा उठनेके लिये ही यहाँ गुणोंका प्रकरण आया है। साधकको तो सात्त्विक ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख—इनपर ध्यान देकर इनके अनुरूप अपना जीवन बनाना चाहिये और सावधानीसे राजस- तामसका त्याग करना चाहिये। इनका त्याग करनेमें सावधानी ही साधन है। सावधानीसे सब साधन स्वतः प्रकट होते हैं। प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेमें सात्त्विकता बहुत आवश्यक है। कारण कि इसमें प्रकाश अर्थात् विवेक जाग्रत् रहता है, जिससे प्रकृतिसे मुक्त होनेमें बड़ी सहायता मिलती है। वास्तवमें तो इससे भी असंग होना है।
परिशिष्ट भाव
दसवें अध्यायमें भगवान्ने भक्ति (विश्वास)-की दृष्टिसे सम्पूर्ण वस्तुओंको अपनेसे उत्पन्न होनेवाली बताया था—“न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्” (10। 39)। यहाँ भगवान् ज्ञान (विवेक)- की दृष्टिसे सम्पूर्ण वस्तुओंको प्रकृतिजन्य गुणोंसे उत्पन्न होनेवाली बताते हैं। कारण कि विवेकीकी दृष्टिमें सत् और असत् दोनों रहते हैं, पर भक्तकी दृष्टिमें एक भगवान् ही रहते हैं—“सदसच्चाहमर्जुन” (गीता 9। 19)। विवेकमार्गमें असत्का, गुणोंका त्याग मुख्य है, पर भक्तिमार्गमें भगवान्का सम्बन्ध मुख्य है। “संसारकी कोई भी वस्तु तीनों गुणोंसे रहित नहीं है”—यह बात अज्ञानीकी दृष्टिमें है, तत्त्वज्ञानीकी दृष्टिमें नहीं। तत्त्वज्ञानीकी दृष्टि सत्तामात्र स्वरूपकी तरफ रहती है, जो स्वतः-स्वाभाविक निर्गुण है (गीता—तेरहवें अध्यायका इकतीसवाँ श्लोक)।
41श्रीभगवान्
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां परन्तपकर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥ 41॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

त्यागके प्रकरणमें भगवान्ने यह बताया कि नियत कर्मोंका त्याग करना उचित नहीं है। उनका मूढ़तापूर्वक त्याग करनेसे वह त्याग तामस हो जाता है; शारीरिक क्लेशके भयसे नियत कर्मोंका त्याग करनेसे वह त्याग राजस हो जाता है और फल एवं आसक्तिका त्याग करके नियत कर्मोंको करनेसे वह त्याग सात्त्विक हो जाता है (इसी अध्यायका सातवाँ, आठवाँ और नवाँ श्लोक)। सांख्ययोगकी दृष्टिसे सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिमें पाँच हेतु बताते हुए जहाँ सात्त्विक कर्मका वर्णन हुआ है, वहाँ नियत कर्मको कर्तृत्वाभिमानसे रहित, राग-द्वेषसे रहित और फलेच्छासे रहित मनुष्यके द्वारा किये जानेका उल्लेख किया है (इसी अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)। उन कर्मोंमें किस वर्णके लिये कौन-से कर्म नियत कर्म हैं और उन नियत कर्मोंको कैसे किया जाय—इसको बतानेके लिये और साथ ही भक्तियोगकी बात बतानेके लिये भगवान् आगेका प्रकरण आरम्भ करते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
2 sections
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप
यहाँ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—इन तीनोंके लिये एक पद और शूद्रोंके लिये अलग एक पद देनेका तात्पर्य यह है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—ये द्विजाति हैं और शूद्र द्विजाति नहीं है। इसलिये इनके कर्मोंका विभाग अलग- अलग है और कर्मोंके अनुसार शास्त्रीय अधिकार भी अलग-अलग है।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः
मनुष्य जो कुछ भी कर्म करता है, उसके अन्तःकरणमें उस कर्मके संस्कार पड़ते हैं और उन संस्कारोंके अनुसार उसका स्वभाव बनता है। इस प्रकार पहलेके अनेक जन्मोंमें किये हुए कर्मोंके संस्कारोंके अनुसार मनुष्यका जैसा स्वभाव होता है, उसीके अनुसार उसमें सत्त्व, रज और तम—तीनों गुणोंकी वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं। इन गुणवृत्तियोंके तारतम्यके अनुसार ही ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रके कर्मोंका विभाग किया गया है (गीता—चौथे अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। कारण कि मनुष्यमें जैसी गुणवृत्तियाँ होती हैं, वैसा ही वह कर्म करता है। आती है, वह सब साधन-सामग्री ही है। अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिको साधन-सामग्री बनाना
परिशिष्ट भाव
चौथे अध्यायमें भगवान्ने कहा है कि चारों वर्णोंकी रचना मैंने गुणों और कर्मोंके विभागपूर्वक की है—“गुणकर्मविभागशः” (4। 13) और यहाँ कहते हैं कि चारों वर्णोंके कर्म स्वभावसे उत्पन्न हुए तीनों गुणोंके द्वारा विभक्त किये गये हैं—“स्वभावप्रभवैर्गुणैः”। चौथे अध्यायमें तो चारों वर्णोंके पैदा होनेकी बात है और यहाँ चारों वर्णोंके कर्मोंकी बात है। तात्पर्य है, चौथे अध्यायमें भगवान्ने बताया कि चारों वर्णोंका जन्म पूर्वजन्मके गुणकर्मोंके अनुसार हुआ है और यहाँ बताते हैं कि जन्मके बाद चारों वर्णोंके अमुक-अमुक कर्म होने चाहिये, जिनके अनुसार उनकी आगे गति होगी।
विशेष बात
विशेष बात (1) कर्म दो तरहके होते हैं—(1) जन्मारम्भक कर्म और (2) भोगदायक कर्म। जिन कर्मोंसे ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म होता है, वे “जन्मारम्भक कर्म” कहलाते हैं और जिन कर्मोंसे सुख-दुःखका भोग होता है, वे “भोगदायक कर्म” कहलाते हैं। भोगदायक कर्म अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिको पैदा करते हैं, जिसको गीतामें अनिष्ट, इष्ट और मिश्र नामसे कहा गया है (अठारहवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक)। गहरी दृष्टिसे देखा जाय तो मात्र कर्म भोगदायक होते हैं अर्थात् जन्मारम्भक कर्मोंसे भी भोग होता है और भोगदायक कर्मोंसे भी भोग होता है। जैसे, जिसका उत्तम कुलमें जन्म होता है, उसका आदर होता है, सत्कार होता है और जिसका नीच कुलमें जन्म होता है, उसका निरादर होता है, तिरस्कार होता है। ऐसे ही अनुकूल परिस्थितिवालेका आदर होता है और प्रतिकूल परिस्थितिवालेका निरादर होता है। तात्पर्य है कि आदर और निरादररूपसे भोग तो जन्मारम्भक और भोगदायक—दोनों कर्मोंका होता है। परन्तु जन्मारम्भक कर्मोंसे जो जन्म होता है, उसमें आदर-निरादररूप भोग गौण होता है; क्योंकि आदर-निरादर कभी-कभी हुआ करते हैं, हरदम नहीं हुआ करते और भोगदायक कर्मोंसे जो अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति आती है, उसमें परिस्थितिका भोग मुख्य होता है; क्योंकि परिस्थिति हरदम आती रहती है। भोगदायक कर्मोंका सदुपयोग-दुरुपयोग करनेमें मनुष्यमात्र स्वतन्त्र है अर्थात् वह अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिसे सुखी-दुःखी भी हो सकता है और उसको साधन-सामग्री भी बना सकता है। जो अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिसे सुखी-दुःखी होते हैं, वे मूर्ख होते हैं और जो उसको साधन-सामग्री बनाते हैं, वे बुद्धिमान् साधक होते हैं। कारण कि मनुष्यजन्म परमात्माकी प्राप्तिके लिये ही मिला है; अतः इसमें जो भी अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति क्या है? अनुकूल परिस्थिति आ जाय तो उसको दूसरोंकी सेवामें, दूसरोंके सुख-आराममें लगा दे, और प्रतिकूल परिस्थिति आ जाय तो सुखकी इच्छाका त्याग कर दे। दूसरोंकी सेवा करना और सुखेच्छाका त्याग करना—ये दोनों साधन हैं। (2) शास्त्रोंमें आता है कि पुण्योंकी अधिकता होनेसे जीव स्वर्गमें जाता है और पापोंकी अधिकता होनेसे नरकोंमें जाता है तथा पुण्य-पाप समान होनेसे मनुष्य बनता है। इस दृष्टिसे किसी भी वर्ण, आश्रम, देश, वेश आदिका कोई भी मनुष्य सर्वथा पुण्यात्मा या पापात्मा नहीं हो सकता। पुण्य-पाप समान होनेपर जो मनुष्य बनता है, उसमें भी अगर देखा जाय तो पुण्य-पापोंका तारतम्य रहता है अर्थात् किसीके पुण्य अधिक होते हैं और किसीके पाप अधिक होते हैं*। ऐसे ही गुणोंका विभाग भी है। कुल मिलाकर सत्त्वगुणकी प्रधानतावाले ऊर्ध्वलोकमें जाते हैं, रजोगुणकी प्रधानतावाले मध्यलोक अर्थात् मनुष्यलोकमें आते हैं, और तमोगुणकी प्रधानतावाले अधोगतिमें जाते हैं। इन तीनोंमें भी गुणोंके तारतम्यसे अनेक तरहके भेद होते हैं। सत्त्वगुणकी प्रधानतासे ब्राह्मण, रजोगुणकी प्रधानता और सत्त्वगुणकी गौणतासे क्षत्रिय, रजोगुणकी प्रधानता और तमोगुणकी गौणतासे वैश्य तथा तमोगुणकी प्रधानतासे शूद्र होता है। यह तो सामान्य रीतिसे गुणोंकी बात बतायी। अब इनके अवान्तर तारतम्यका विचार करते हैं—रजोगुण- प्रधान मनुष्योंमें सत्त्वगुणकी प्रधानतावाले ब्राह्मण हुए। इन ब्राह्मणोंमें भी जन्मके भेदसे ऊँच-नीच ब्राह्मण माने जाते हैं और परिस्थितिरूपसे कर्मोंका फल भी कई तरहका आता है अर्थात् सब ब्राह्मणोंकी एक समान अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति नहीं आती। इस दृष्टिसे ब्राह्मणयोनिमें भी तीनों गुण मानने पड़ेंगे। ऐसे ही क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र भी जन्मसे ऊँच-नीच माने जाते हैं और अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति भी कई तरहकी आती है। इसलिये गीतामें कहा गया है कि तीनों लोकोंमें ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, जो तीनों गुणोंसे रहित हो (इसी अध्यायका चालीसवाँ श्लोक)। अब जो मनुष्येतर योनिवाले पशु-पक्षी आदि हैं, उनमें भी ऊँच-नीच माने जाते हैं; जैसे गाय आदि श्रेष्ठ माने जाते हैं और कुत्ता, गधा, सूअर आदि नीच माने जाते हैं। कबूतर आदि श्रेष्ठ माने जाते हैं और कौआ, चील आदि नीच माने जाते हैं। इन सबको अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति भी एक समान नहीं मिलती। तात्पर्य है कि ऊर्ध्वगति, मध्यगति और अधोगति- वालोंमें भी कई तरहके जाति-भेद और परिस्थिति-भेद होते हैं।
* जैसे परीक्षामें अनेक विषय होते हैं और उन विषयोंमेंसे किसी विषयमें कम और किसी विषयमें अधिक नम्बर मिलते
हैं। उन सभी विषयोंके नम्बरोंको मिलाकर कुल जितने नम्बर आते हैं, उनसे परीक्षाफल तैयार होता है। ऐसे ही प्रत्येक मनुष्यके
किसी विषयमें पुण्य अधिक होते हैं और किसी विषयमें पाप अधिक होते हैं, और कुल मिलाकर जितने पुण्य-पाप होते हैं,
उसके अनुसार उसको जन्म मिलता है। अगर अलग-अलग विषयोंमें सबके पुण्य-पाप समान होते, तो सभीको बराबर
अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति मिलती, पर ऐसा होता नहीं। इसलिये सभीके पुण्य-पापोंमें अनेक प्रकारका तारतम्य रहता है।
यही बात सत्त्वादि गुणोंके विषयमें भी समझनी चाहिये।
42श्रीभगवान्
शमो दमस्तपः शौं क्षान्तिरार्जवमेव च। ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥ 42॥
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अब भगवान् ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म बताते हैं।

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शमः
मनको जहाँ लगाना चाहें, वहाँ लग जाय और जहाँसे हटाना चाहें, वहाँसे हट जाय—इस प्रकार मनके निग्रहको “शम” कहते हैं।
दमः
जिस इन्द्रियसे जब जो काम करना चाहें, तब वह काम कर लें और जिस इन्द्रियको जब जहाँसे हटाना चाहें, तब वहाँसे हटा लें—इस प्रकार इन्द्रियोंको वशमें करना “दम” है।
तपः
गीतामें शरीर, वाणी और मनके तपका वर्णन आता है (सत्रहवें अध्यायका चौदहवाँ, पन्द्रहवाँ और सोलहवाँ श्लोक), उस तपको लेते हुए भी यहाँ वास्तवमें “तप” का अर्थ है—अपने धर्मका पालन करते हुए जो कष्ट हो अथवा कष्ट आ जाय, उसको प्रसन्नतापूर्वक सहना अर्थात् कष्टके आनेपर चित्तमें प्रसन्नताका होना।
शौचम्
अपने मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर आदिको पवित्रता रखना—इस प्रकार शौचाचार-सदाचारका ठीक पालन करनेका नाम “शौच” है।
क्षान्तिः
कोई कितना ही अपमान करे, निन्दा करे, दुःख दे और अपनेमें उसको दण्ड देनेकी योग्यता, बल, अधिकार भी हो, फिर भी उसको दण्ड न देकर उसके क्षमा माँगे बिना ही उसको प्रसन्नतापूर्वक क्षमा कर देनेका नाम “क्षान्ति” है।
आर्जवम्
शरीर, वाणी आदिके व्यवहारमें सरलता हो और मनमें छल, कपट, छिपाव आदि दुर्भाव न हों अर्थात् सीधा-सादापन हो, उसका नाम “आर्जव” है।
ज्ञानम्
वेद, शास्त्र, पुराण, इतिहास आदिका अच्छी तरह अध्ययन होना और उनके भावोंका ठीक तरहसे बोध होना तथा कर्तव्य-अकर्तव्यका बोध होना “ज्ञान” है।
विज्ञानम्
यज्ञमें स्त्रुक्, स्त्रुवा आदि वस्तुओंका किस अवसरपर किस विधिसे प्रयोग करना चाहिये—इसका अर्थात् यज्ञविधिका तथा अनुष्ठान आदिकी विधिका अनुभव कर लेने (अच्छी तरह करके देख लेने)-का नाम “विज्ञान” है।
आस्तिक्यम्
परमात्मा, वेदादि शास्त्र, परलोक आदिका हृदयमें आदर हो, श्रद्धा हो और उनकी सत्यतामें कभी सन्देह न हो तथा उनके अनुसार अपना आचरण हो, इसका नाम “आस्तिक्य” है।
ब्रह्मकर्म स्वभावजम्
ये शम, दम आदि ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म (गुण) हैं अर्थात् इन कर्मों-(गुणों-)को धारण करनेमें ब्राह्मणको परिश्रम नहीं पड़ता। जिन ब्राह्मणोंमें सत्त्वगुणकी प्रधानता है, जिनकी वंश- परम्परा परम शुद्ध है और जिनके पूर्वजन्मकृत कर्म भी शुद्ध हैं, ऐसे ब्राह्मणोंके लिये ही शम, दम आदि गुण स्वाभाविक होते हैं और उनमें किसी गुणके न होनेपर अथवा किसी गुणमें कमी होनेपर भी उसकी पूर्ति करना उन ब्राह्मणोंके लिये सहज होता है। चारों वर्णोंकी रचना गुणोंके तारतम्यसे की गयी है, इसलिये गुणोंके अनुसार उस-उस वर्णमें वे-वे कर्म स्वाभाविक प्रकट हो जाते हैं और दूसरे कर्म गौण हो जाते हैं। जैसे ब्राह्मणमें सत्त्वगुणकी प्रधानता होनेसे उसमें शम, दम आदि कर्म (गुण) स्वाभाविक आते हैं तथा जीविकाके कर्म गौण हो जाते हैं और दूसरे वर्णोंमें रजोगुण तथा तमोगुणकी प्रधानता होनेसे उन वर्णोंके जीविकाके कर्म भी स्वाभाविक कर्मोंमें सम्मिलित हो जाते हैं। इसी दृष्टिसे गीतामें ब्राह्मणके स्वभावज कर्मोंमें जीविकाके कर्म न कह करके शम, दम आदि कर्म (गुण) ही कहे गये हैं।
परिशिष्ट भाव
वर्ण-परम्परा ठीक हो तो ये गुण ब्राह्मणमें स्वाभाविक होते हैं। परन्तु वर्णसंकरता आनेपर ये गुण स्वाभाविक नहीं होते, इनमें कमी आ जाती है। पूर्वश्लोकमें “स्वभावप्रभवैर्गुणैः” कहा, इसलिये यहाँ स्वभावज कर्म बताते हैं। स्वभाव बननेमें पहले जन्म मुख्य है, फिर जन्मके बाद संग मुख्य है। संग, स्वाध्याय, अभ्यास आदिके कारण स्वभाव बदल जाता है।
43श्रीभगवान्
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे ाप्यपलायनम्। दानमीश्वरभावश् क्षात्रं कर्म स्वभावजम्॥ 43॥
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अब क्षत्रियके स्वाभाविक कर्म बताते हैं।

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शौर्यम्
मनमें अपने धर्मका पालन करनेकी तत्परता हो, धर्ममय युद्ध* प्राप्त होनेपर युद्धमें चोट लगने, अंग कट जाने, मर जाने आदिका किंचिन्मात्र भी भय न हो, घाव होनेपर भी मनमें प्रसन्नता और उत्साह रहे तथा सिर कटनेपर भी पहले-जैसे ही अस्त्र-शस्त्र चलाता रहे, इसका नाम “शौर्य” है।
तेजः
जिस प्रभाव या शक्तिके सामने पापी-दुराचारी मनुष्य भी पाप, दुराचार करनेमें हिचकते हैं, जिसके सामने लोगोंकी मर्यादाविरुद्ध चलनेकी हिम्मत नहीं होती अर्थात् लोग स्वाभाविक ही मर्यादामें चलते हैं, उसका नाम “तेज” है।
धृतिः
विपरीत-से-विपरीत अवस्थामें भी अपने धर्मसे विचलित न होने और शत्रुओंके द्वारा धर्म तथा नीतिसे विरुद्ध अनुचित व्यवहारसे सताये जानेपर भी धर्म तथा नीति-विरुद्ध कार्य न करके धैर्यपूर्वक उसी मर्यादामें चलनेका नाम “धृति” है।
दाक्ष्यम्
प्रजापर शासन करनेकी, प्रजाको यथा- योग्य व्यवस्थित रखनेकी और उसका संचालन करनेकी विशेष योग्यता, चतुराईका नाम “दाक्ष्य” है।
युद्धे चाप्यपलायनम्
युद्धमें कभी पीठ न दिखाना, मनमें कभी हार स्वीकार न करना, युद्ध छोड़कर कभी न भागना—यह युद्धमें “अपलायन” है।
दानम्
क्षत्रियलोग दान करते हैं तो देनेमें कमी नहीं रखते, बड़ी उदारतापूर्वक देते हैं। वर्तमानमें दान-पुण्य करनेका स्वभाव वैश्योंमें देखनेमें आता है; परन्तु वैश्यलोग देनेमें कसाकसी करते हैं अर्थात् इतनेसे ही काम चल जाय तो अधिक क्यों दिया जाय—ऐसा द्रव्यका लोभ उनमें रहता है। द्रव्यका लोभ रहनेसे धर्मका पालन करनेमें बाधा आ जाती है, कमी आ जाती है, जिससे सात्त्विक दान (गीता—सत्रहवें अध्यायका बीसवाँ श्लोक) देनेमें कठिनता पड़ती है। परन्तु क्षत्रियोंमें दानवीरता होती है। इसलिये यहाँ “दान” शब्द क्षत्रियोंके स्वभावमें आया है।
ईश्वरभावश्च
क्षत्रियोंमें स्वाभाविक ही शासन करनेकी प्रवृत्ति होती है। लोगोंके नीति, धर्म और मर्यादा- विरुद्ध आचरण देखनेपर उनके मनमें स्वाभाविक ही ऐसी बात आती है कि ये लोग ऐसा क्यों कर रहे हैं और उनको नीति, धर्मके अनुसार चलानेकी इच्छा होती है। अपने शासनद्वारा सबको अपनी-अपनी मर्यादाके अनुसार चलानेका भाव रहता है। इस ईश्वरभावमें अभिमान नहीं होता; क्योंकि क्षत्रियजातिमें नम्रता, सरलता आदि गुण देखनेमें आते हैं।
क्षात्रं कर्म स्वभावजम्
जो मात्र प्रजाकी दुःखोंसे रक्षा करे, उसका नाम “क्षत्रिय” है—“क्षतात् त्रायत इति क्षत्रियः।” उस क्षत्रियके जो स्वाभाविक कर्म हैं, वे क्षात्रकर्म कहलाते हैं।
परिशिष्ट भाव
क्षत्रिय (राजपूत) बड़े शूरवीर और तेजस्वी होते हैं। परन्तु ईर्ष्या-दोष होनेके कारण जिस राजाका राज्य हुआ, उसने अपने अधीन रहनेवाले राजपूतोंका उत्साह कम करनेकी चेष्टा की, उनकी उन्नति नहीं होने दी, जिससे कि वे प्रबल होकर राज्य न छीन लें। इस प्रकार ईर्ष्याके कारण आपसी फूट होनेसे तथा उत्साहमें कमी होनेसे ही विधर्मीलोग भारतपर अपना अधिकार करनेमें समर्थ हो सके।
* अपना युद्ध करनेका विचार भी नहीं है, कोई स्वार्थ भी नहीं है, पर परिस्थितिवशात् केवल कर्तव्यरूपसे प्राप्त हुआ है,
वह “धर्ममय युद्ध” है।
44श्रीभगवान्
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्। परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्॥ 44॥
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अब वैश्य और शूद्रके स्वाभाविक कर्म बताते हैं।

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कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्
खेती करना, गायोंकी रक्षा करना, उनकी वंश-वृद्धि करना और शुद्ध व्यापार करना—ये कर्म वैश्यमें स्वाभाविक होते हैं। शुद्ध व्यापार करनेका तात्पर्य है—जिस देशमें, जिस समय, जिस वस्तुकी आवश्यकता हो, लोगोंके हितकी भावनासे उस वस्तुको (जहाँ वह मिलती हो, वहाँसे ला करके) उसी देशमें पहुँचाना; प्रजाकी आवश्यक वस्तुओंके अभावकी पूर्ति कैसे हो, वस्तुओंके अभावमें कोई कष्ट न पाये—इस भावसे सच्चाईके साथ वस्तुओंका वितरण करना। भगवान् श्रीकृष्ण (नन्दबाबाको लेकर) अपनेको वैश्य ही मानते हैं*। इसलिये उन्होंने स्वयं गायों और बछड़ोंको चराया। मनु महाराजने वैश्य-वृत्तिमें “पशूनां रक्षणम्” (मनुस्मृति 1। 90) (पशुओंकी रक्षा करना)कहा है, पर यहाँ भगवान् (उपर्युक्त पदोंसे) अपने जाति-भाइयोंसे मानो यह कहते हैं कि तुमलोग सब पशुओंका पालन, उनकी रक्षा न कर सको तो कम-से-कम गायोंका पालन और उनकी रक्षा जरूर करना। गायोंकी वृद्धि न कर सको तो कोई बात नहीं; परन्तु उनकी रक्षा जरूर करना, जिससे हमारा गोधन घट न जाय। इसलिये वैश्य-समाजको चाहिये कि वह गायोंकी रक्षामें अपना तन-मन-धन लगा दे, उनकी रक्षा करनेमें अपनी शक्ति बचाकर न रखे। गोरक्षा-सम्बन्धी
विशेष बात
विशेष बात मनुष्योंके लिये गाय सब दृष्टियोंसे पालनीय है। गायसे अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थोंकी सिद्धि होती है। आजके अर्थप्रधान युगमें तो गाय अत्यन्त ही उपयोगी है। गोपालनसे, गायके दूध, घी, गोबर आदिसे धनकी वृद्धि होती है। हमारा देश कृषिप्रधान है। अतः यहाँ खेतीमें जितनी प्रधानता बैलोंकी है, उतनी प्रधानता अन्य किसीकी भी नहीं है। भैंसेके द्वारा भी खेती की जाती है, पर खेतीमें जितना काम बैल कर सकता है, उतना भैंसा नहीं कर सकता। भैंसा बलवान् तो होता है, पर वह धूप सहन नहीं कर सकता। धूपमें चलनेसे वह जीभ निकाल देता है, जबकि बैल धूपमें भी चलता रहता है। कारण कि भैंसेमें सात्त्विक बल नहीं होता, जबकि बैलमें सात्त्विक बल होता है। बैलोंकी अपेक्षा भैंसे कम भी होते हैं। ऐसे ही ऊँटसे भी खेती की जाती है, पर ऊँट भैंसेसे भी कम होते हैं और बहुत मँहगे होते हैं। खेती करनेवाला हरेक आदमी ऊँट नहीं खरीद सकता। आजकल अच्छे- अच्छे जवान बैल मारे जानेके कारण बैल भी मँहगे हो गये हैं, तो भी वे ऊँट जितने मँहगे नहीं हैं। यदि घरोंमें गायें रखी जायँ तो बैल घरोंमें ही पैदा हो जाते हैं, खरीदने नहीं पड़ते। विदेशी गायोंके जो बैल होते हैं, वे खेतीमें काम नहीं आ सकते; क्योंकि उनके कन्धे न होनेसे उनपर जुआ नहीं रखा जा सकता। गाय पवित्र होती है। उसके शरीरका स्पर्श करनेवाली हवा भी पवित्र होती है। गायके गोबर-गोमूत्र भी पवित्र होते हैं। गोबरसे लिपे हुए घरोंमें प्लेग, हैजा आदि भयंकर बीमारियाँ नहीं आतीं। इसके सिवाय युद्धके समय गोबरसे लिपे हुए मकानोंपर बमका उतना असर नहीं होता, जितना सीमेन्ट आदिसे बने हुए मकानोंपर होता है। गोबरमें जहर खींचनेकी विशेष शक्ति होती है। काशीमें कोई व्यक्ति साँप काटनेसे मर गया। लोग उसकी दाह-क्रिया करनेके लिये उसको गंगाके किनारे ले गये। वहाँपर एक साधु रहते थे। उन्होंने पूछा कि इस व्यक्तिको क्या हुआ? लोगोंने कहा कि यह साँप काटनेसे मरा है। साधुने कहा कि यह मरा नहीं है, तुमलोग गायका गोबर ले आओ। गोबर लाया गया। साधुने उस व्यक्तिकी नासिकाको छोड़कर उसके पूरे शरीरमें (नीचे-ऊपर) गोबरका लेप कर दिया। आधे घण्टेके बाद गोबरका फिर दूसरा लेप किया। इससे उस व्यक्तिके श्वास चलने लगे और वह जी उठा। हृदयके रोगोंको दूर करनेके लिये गोमूत्र बहुत उपयोगी है। छोटी बछड़ीका गोमूत्र रोज तोला-दो-तोला पीनेसे पेटके रोग दूर हो जाते हैं। एक सन्तको दमाकी शिकायत थी, उनको गोमूत्र-सेवनसे बहुत फायदा हुआ है। आजकल तो गोबर और गोमूत्रसे अनेक रोगोंकी दवाइयाँ बनायी जा रही हैं। गोबरसे गैस भी बनने लगी है। खेतोंमें गोबर-गोमूत्रकी खादसे जो अन्न पैदा होता है, वह भी पवित्र होता है। खेतोंमें गायोंके रहनेसे, गोबर और गोमूत्रसे जमीनकी जैसी पुष्टि होती है, वैसी पुष्टि विदेशी रासायनिक खादोंसे नहीं होती। जैसे, एक बार अंगूरकी खेती करनेवालेने बताया कि गोबरकी खाद डालनेसे अंगूरके गुच्छे जितने बड़े-बड़े होते हैं, उतने विदेशी खाद डालनेसे नहीं होते। विदेशी खाद डालनेसे कुछ ही वर्षोंमें जमीन खराब हो जाती है अर्थात् उसकी उपजाऊ-शक्ति नष्ट हो जाती है। परन्तु गोबर-गोमूत्रसे जमीनकी उपजाऊ- शक्ति ज्यों-की-त्यों बनी रहती है। विदेशोंमें रासायनिक खादसे बहुत-से खेत खराब हो गये हैं, जिन्हें उपजाऊ बनानेके लिये वे लोग भारतसे गोबर मँगवा रहे हैं और भारतसे गोबरके जहाज भरकर विदेशोंमें जा रहे हैं। हमारे देशकी गायें सौम्य और सात्त्विक होती हैं। अतः उनका दूध भी सात्त्विक होता है, जिसको पीनेसे बुद्धि तीक्ष्ण होती है और स्वभाव शान्त, सौम्य होता है। विदेशी गायोंका दूध तो ज्यादा होता है, पर उन गायोंमें गुस्सा बहुत होता है। अतः उनका दूध पीनेसे मनुष्यका स्वभाव क्रूर होता है। भैंसका दूध भी ज्यादा होता है, पर वह दूध सात्त्विक नहीं होता। उससे सात्त्विक बल नहीं आता। सैनिकोंके घोड़ोंको गायका दूध पिलाया जाता है, जिससे वे घोड़े बहुत तेज होते हैं। एक बार सैनिकोंने परीक्षाके लिये कुछ घोड़ोंको भैंसका दूध पिलाया, जिससे घोड़े खूब मोटे हो गये। परन्तु जब नदी पार करनेका काम पड़ा तो वे घोड़े पानीमें बैठ गये। भैंस पानीमें बैठा करती है; अतः वही स्वभाव घोड़ोंमें भी आ गया। ऊँटनीका दूध भी निकलता है, पर उस दूधका दही, मक्खन होता ही नहीं। उसका दूध तामसी होनेसे दुर्गति देनेवाला होता है। स्मृतियोंमें ऊँट, कुत्ता, गधा आदिको अस्पृश्य बताया गया है। सम्पूर्ण धार्मिक कार्योंमें गायकी मुख्यता है। जातकर्म, चूड़ाकर्म, उपनयन आदि सोलह संस्कारोंमें गायका, उसके दूध, घी, गोबर आदिका विशेष सम्बन्ध रहता है। गायके घीसे ही यज्ञ किया जाता है। स्थान-शुद्धिके लिये गोबरका ही चौका लगाया जाता है। श्राद्ध-कर्ममें गायके दूधकी खीर बनायी जाती है। नरकोंसे बचनेके लिये गोदान किया जाता है। धार्मिक कृत्योंमें “पंचगव्य” काममें लाया जाता है, जो गायके दूध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र—इन पाँचोंसे बनता है। कामनापूर्तिके लिये किये जानेवाले यज्ञोंमें गायका घी आदि काममें आता है। रघुवंशके चलनेमें गायकी ही प्रधानता थी। पौष्टिक, वीर्यवर्धक चीजोंमें भी गायके दूध और घीका मुख्य स्थान है। निष्कामभावसे गायकी सेवा करनेसे मुक्ति होती है। गायकी सेवा करनेमात्रसे अन्तःकरण निर्मल होता है। भगवान् श्रीकृष्णने भी बिना जूतीके गोचारणकी लीला की थी, इसलिये उनका नाम “गोपाल” पड़ा। प्राचीन-कालमें ऋषिलोग वनमें रहते हुए अपने पास गाय रखा करते थे। गायके दूध, घीसे उनकी बुद्धि प्रखर, विलक्षण होती थी, जिससे वे बड़े- बड़े ग्रन्थोंकी रचना किया करते थे। आजकल तो उन ग्रन्थोंको ठीक-ठीक समझनेवाले भी कम हैं। गायके दूध- घीसे वे दीर्घायु होते थे। इसलिये गायके घीका एक नाम “आयु” भी है। बड़े-बड़े राजालोग भी उन ऋषियोंके पास आते थे और उनकी सलाहसे राज्य चलाते थे। गोरक्षाके लिये बलिदान करनेवालोंकी कथाओंसे इतिहास, पुराण भरे पड़े हैं। बड़े भारी दुःखकी बात है कि आज हमारे देशमें पैसोंके लोभसे रोजाना हजारोंकी संख्यामें गायोंकी हत्या की जा रही है! अगर इसी तरह गो-हत्या चलती रही तो एक समय गोवंश समाप्त हो जायगा। जब गायें नहीं रहेंगी, तब क्या दशा होगी, कितनी आफतें आयेंगी—इसका अन्दाजा नहीं लगाया जा सकता। जब गायें खत्म हो जायँगी, तब गोबर नहीं रहेगा और गोबरकी खाद न रहनेसे जमीन भी उपजाऊ नहीं रहेगी। जमीनके उपजाऊ न रहनेसे खेती कैसे होगी? खेती न होनेसे अन्न तथा वस्त्र (कपास) कैसे मिलेगा? लोगोंको शरीर-निर्वाहके लिये अन्न-जल और वस्त्र भी मिलना मुश्किल हो जायगा। गाय और उसके दूध, घी, गोबर आदिके न रहनेसे प्रजा बहुत दुःखी हो जायगी। गोधनके अभावमें देश पराधीन और दुर्बल हो जायगा। वर्तमानमें भी अकाल, अनावृष्टि, भूकम्प, आपसी कलह आदिके होनेमें गायोंकी हत्या मुख्य कारण है। अतः अपनी पूरी शक्ति लगाकर हर हालतमें गायोंकी रक्षा करना, उनको कत्लखानोंमें जानेसे रोकना हमारा परम कर्तव्य है। गायोंकी रक्षाके लिये भाई-बहनोंको चाहिये कि वे गायोंका पालन करें, उनको अपने घरोंमें रखें। गायका ही दूध-घी खायें, भैंस आदिका नहीं। घरोंमें गोबर-गैसका प्रयोग किया जाय। गायोंकी रक्षाके उद्देश्यसे ही गोशालाएँ बनायी जायँ, दूधके उद्देश्यसे नहीं। जितनी गोचर-भूमियाँ हैं, उनकी रक्षा की जाय तथा सरकारसे और गोचर- भूमियाँ छुड़ाई जायँ। सरकारकी गोहत्या-नीतिका विरोध किया जाय और सरकारसे अनुरोध किया जाय कि वह देशकी रक्षाके लिये पूरे देशमें तत्काल पूर्णरूपसे गोहत्या बन्द करे। “परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्”—चारों वर्णोंकी सेवा करना, सेवाकी सामग्री तैयार करना और चारों वर्णोंके कार्योंमें कोई बाधा, अड़चन न आये, सबको सुख- आराम हो—इस भावसे अपनी बुद्धि, योग्यता, बलके द्वारा सबकी सेवा करना शूद्रका स्वाभाविक कर्म है। यहाँ एक शंका पैदा होती है कि भगवान्ने चारों वर्णोंकी उत्पत्तिमें सत्त्व, रज और तम—इन तीन गुणोंको कारण बताया। उसमें तमोगुणकी प्रधानतासे शूद्रकी उत्पत्ति बतायी और गीतामें जहाँ तमोगुणका वर्णन हुआ है, वहाँपर उसके अज्ञान, प्रमाद, आलस्य, निद्रा, अप्रकाश, अप्रवृत्ति और मोह—ये सात अवगुण बताये हैं (गीता— चौदहवें अध्यायका आठवाँ और तेरहवें अध्यायका सत्रहवाँ श्लोक)। अतः ऐसे तमोगुणकी प्रधानतावाले शूद्रसे सेवा कैसे होगी? क्योंकि वह आलस्य, प्रमाद आदिमें पड़ा रहेगा तो सेवा कैसे कर सकेगा? सेवा बहुत ऊँचे दर्जेकी चीज है। ऐसे ऊँचे कर्मका भगवान्ने शूद्रके लिये कैसे विधान किया? यदि इस शंकापर गुणोंकी दृष्टिसे विचार किया जाय तो गीतामें आया है कि सत्त्वगुणवाले ऊँचे लोकोंमें जाते हैं, रजोगुणवाले मरकर पीछे मध्यलोक अर्थात् मृत्युलोकमें जाते हैं और तमोगुणवाले अधोगतिमें जाते हैं (गीता—चौदहवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)। इसमें भी वास्तवमें देखा जाय तो रजोगुणके बढ़नेपर जो मरता है, वह कर्मप्रधान मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है—“रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते” (गीता 14। 15)। इन सबका तात्पर्य यह हुआ कि मनुष्यमात्र रजःप्रधान (रजोगुणकी प्रधानतावाला) है। रजःप्रधानवालोंमें जो सात्त्विक, राजस और तामस—तीन गुण होते हैं, उन तीनों गुणोंसे ही चारों वर्णोंकी रचना की गयी है। इसलिये कर्म करना सबमें मुख्य होता है और इसीको लेकर मनुष्योंको कर्मयोनि कहा गया है तथा गीतामें भी चारों वर्णोंके कर्मोंके लिये “स्वभावज कर्म”, “स्वभावनियत कर्म” आदि पद आये हैं। अतः शूद्रका परिचर्या अर्थात् सेवा करना “स्वभावज कर्म” है, जिसमें उसे परिश्रम नहीं होता। मनुष्यमात्र कर्मयोनि होनेपर भी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यमें विवेक-विचारका विशेष तारतम्य रहता है और शुद्धि भी रहती है; परन्तु शूद्रमें मोहकी प्रधानता रहनेसे उसमें विवेक बहुत दब जाता है। इस दृष्टिसे शूद्रके सेवा- कर्ममें विवेककी प्रधानता न होकर आज्ञापालनकी प्रधानता रहती है—“अग्या सम न सुसाहिब सेवा” (मानस 2। 301। 2)। इसलिये चारों वर्णोंकी आज्ञाके अनुसार सेवा जिस वर्णमें जन्म होता है, उन गुणोंके अनुसार ही उस वर्णके कर्म स्वाभाविक, सहज होते हैं; जैसे—ब्राह्मणके लिये शम, दम आदि; क्षत्रियके लिये शौर्य, तेज आदि; वैश्यके लिये खेती, गौरक्षा आदि और शूद्रके लिये सेवा—ये कर्म स्वतःस्वाभाविक होते हैं। तात्पर्य है कि चारों वर्णोंको इन कर्मोंको करनेमें परिश्रम नहीं होता; क्योंकि गुणोंके अनुसार स्वभाव और स्वभावके अनुसार उनके लिये कर्मोंका विधान है। इसलिये इन कर्मोंमें उनकी स्वाभाविक ही रुचि होती है। मनुष्य इन स्वाभाविक कर्मोंको जब अपने लिये अर्थात् अपने स्वार्थ, भोग और आरामके लिये करता है, तब वह उन कर्मोंसे बँध जाता है। जब उन्हीं कर्मोंको स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके निष्कामभावपूर्वक संसारके हितके लिये करता है, तब “कर्मयोग” हो जाता है और उन्हीं कर्मोंसे सब संसारमें व्यापक परमात्माका पूजन करता है अथवा भगवत्परायण होकर केवल भगवत्सम्बन्धी कर्म (जप, ध्यान, सत्संग, स्वाध्याय आदि) करता है, तब वह “भक्तियोग” हो जाता है। फिर प्रकृतिके गुणोंका सर्वथा करना, सुख-सुविधा जुटा देना शूद्रके लिये स्वाभाविक होता है। शूद्रोंके कर्म परिचर्यात्मक अर्थात् सेवास्वरूप होते हैं। उनके शारीरिक, सामाजिक, नागरिक, ग्रामणिक आदि सब-के-सब कर्म ठीक तरहसे सम्पन्न होते हैं, जिनसे चारों ही वर्णोंके जीवन-निर्वाहके लिये सुख-सुविधा, अनुकूलता और आवश्यकताकी पूर्ति होती है। स्वाभाविक कर्मोंका तात्पर्य चेतन जीवात्मा और जड प्रकृति—दोनोंका स्वभाव भिन्न-भिन्न है। चेतन स्वाभाविक ही निर्विकार अर्थात् परिवर्तनरहित है और प्रकृति स्वाभाविक ही विकारी अर्थात् परिवर्तनशील है। अतः इन दोनोंका स्वभाव भिन्न-भिन्न होनेसे इनका सम्बन्ध स्वाभाविक नहीं है; किंतु चेतनने प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध मानकर उस सम्बन्धकी सद्भावना कर ली है अर्थात् “सम्बन्ध है” ऐसा मान लिया है। इसीको गुणोंका संग कहते हैं, जो जीवात्माके अच्छी-बुरी योनियोंमें जन्म लेनेका कारण है—“कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु” (गीता 13। 21)। इस संगके कारण, गुणोंके तारतम्यसे जीवका ब्राह्मणादि वर्णमें जन्म होता है। गुणोंके तारतम्यसे रह जाता है, जिसमें सिद्ध महापुरुषके स्वरूपकी स्वतःसिद्ध स्वतन्त्रता, अखण्डता, निर्विकारताकी अनुभूति रह जाती है। ऐसा होनेपर भी उसके शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके द्वारा अपने-अपने वर्ण, आश्रमकी मर्यादाके अनुसार निर्लिप्ततापूर्वक शास्त्रविहित कर्म स्वाभाविक होते हैं, जो कि संसारमात्रके लिये आदर्श होते हैं। प्रभुकी तरफ आकृष्ट होनेसे प्रतिक्षण प्रेम बढ़ता रहता है, जो अनन्त आनन्दस्वरूप है। जाति जन्मसे मानी जाय या कर्मसे? ऊँच-नीच योनियोंमें जितने भी शरीर मिलते हैं, वे सब गुण और कर्मके अनुसार ही मिलते हैं। गुण और कर्मके अनुसार ही मनुष्यका जन्म होता है; इसलिये मनुष्यकी जाति जन्मसे ही मानी जाती है। अतः स्थूलशरीरकी दृष्टिसे विवाह, भोजन आदि कर्म जन्मकी प्रधानतासे ही करने चाहिये अर्थात् अपनी जाति या वर्णके अनुसार ही भोजन, विवाह आदि कर्म होने चाहिये। दूसरी बात, जिस प्राणीका सांसारिक भोग, धन, मान, आराम, सुख आदिका उद्देश्य रहता है, उसके लिये वर्णके अनुसार कर्तव्य-कर्म करना और वर्णकी मर्यादामें चलना आवश्यक हो जाता है। यदि वह वर्णकी मर्यादामें नहीं चलता, तो उसका पतन हो जाता है1। परन्तु जिसका उद्देश्य केवल परमात्मा ही है, संसारके भोग आदि नहीं, उसके लिये सत्संग, स्वाध्याय, जप, ध्यान, कथा, कीर्तन, परस्पर विचार-विनिमय आदि भगवत्सम्बन्धी काम मुख्य होते हैं। तात्पर्य है कि परमात्माकी प्राप्तिमें प्राणीके पारमार्थिक भाव, आचरण आदिकी मुख्यता है, जाति या वर्णकी नहीं। तीसरी बात, जिसका उद्देश्य परमात्माकी प्राप्तिका है, वह भगवत्सम्बन्धी कार्योंको मुख्यतासे करते हुए भी वर्ण- आश्रमके अनुसार अपने कर्तव्य-कर्मोंको पूजन-बुद्धिसे केवल भगवत्प्रीत्यर्थ ही करता है। आगे छियालीसवें श्लोकमें भगवान्ने बड़ी श्रेष्ठ बात बतायी है कि जिससे सम्पूर्ण संसार पैदा हुआ है और जिससे सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्माका ही लक्ष्य रखकर, उसके प्रीत्यर्थ ही पूजन-रूपसे अपने-अपने वर्णके अनुसार कर्म किये जायँ। इसमें मनुष्यमात्रका अधिकार है। देवता, असुर, पशु, पक्षी आदिका स्वतः अधिकार नहीं है; परन्तु उनके लिये भी परमात्माकी तरफसे निषेध नहीं है। कारण कि सभी परमात्माका अंश होनेसे परमात्माकी प्राप्तिके सभी अधिकारी हैं। प्राणिमात्रका भगवान्पर पूरा अधिकार है। इससे भी यह सिद्ध होता है कि आपसके व्यवहारमें अर्थात् रोटी, बेटी और शरीर आदिके साथ बर्ताव करनेमें तो “जन्म” की प्रधानता है और परमात्माकी प्राप्तिमें भाव, विवेक और “कर्म” की प्रधानता है। इसी आशयको लेकर भागवतकारने कहा है कि जिस मनुष्यके वर्णको बतानेवाला जो लक्षण कहा गया है, वह यदि दूसरे वर्णवालेमें भी मिले तो उसे भी उसी वर्णका समझ लेना चाहिये2। अभिप्राय यह है कि ब्राह्मणके शम-दम आदि जितने लक्षण हैं, वे लक्षण या गुण स्वाभाविक ही किसीमें हों तो जन्ममात्रसे नीचा होनेपर भी उसको नीचा नहीं मानना चाहिये। ऐसे ही महाभारतमें युधिष्ठिर और नहुषके संवादमें आया है कि जो शूद्र आचरणोंमें श्रेष्ठ है, उस शूद्रको शूद्र नहीं मानना चाहिये और जो ब्राह्मण ब्राह्मणोचित कर्मोंसे रहित है, उस ब्राह्मणको ब्राह्मण नहीं मानना चाहिये3 अर्थात् वहाँ कर्मोंकी ही प्रधानता ली गयी है, जन्मकी नहीं। शास्त्रोंमें जो ऐसे वचन आते हैं, उन सबका तात्पर्य है कि कोई भी नीच वर्णवाला साधारण-से-साधारण मनुष्य अपनी पारमार्थिक उन्नति कर सकता है, इसमें संदेहकी कोई बात नहीं है। इतना ही नहीं, वह उसी वर्णमें रहता हुआ शम, दम आदि जो सामान्य धर्म हैं, उनका सांगोपांग पालन करता हुआ अपनी श्रेष्ठताको प्रकट कर सकता है। जन्म तो पूर्वकर्मोंके अनुसार हुआ है, इसमें वह बेचारा क्या कर सकता है? परन्तु वहीं (नीच वर्णमें) रहकर भी वह अपनी नयी उन्नति कर सकता है। उस नयी उन्नतिमें प्रोत्साहित करनेके लिये ही शास्त्र-वचनोंका आशय मालूम देता है कि नीच वर्णवाला भी नयी उन्नति करनेमें हिम्मत न हारे। जो ऊँचे वर्णवाला होकर भी वर्णोचित काम नहीं करता, उसको भी अपने वर्णोचित काम करनेके लिये शास्त्रोंमें प्रोत्साहित किया है; जैसे— “ब्राह्मणस्य हि देहोऽयं क्षुद्रकामाय नेष्यते।” जिन ब्राह्मणोंका खान-पान, आचरण सर्वथा भ्रष्ट है, उन ब्राह्मणोंका वचनमात्रसे भी आदर नहीं करना चाहिये—ऐसा स्मृतिमें आया है4। परन्तु जिनके आचरण श्रेष्ठ हैं, जो भगवान्के भक्त हैं, उन ब्राह्मणोंकी भागवत आदि पुराणोंमें और महाभारत, रामायण आदि इतिहास- ग्रन्थोंमें बहुत महिमा गायी गयी है। भगवान्का भक्त चाहे कितनी ही नीची जातिका क्यों न हो, वह भक्तिहीन विद्वान् ब्राह्मणसे श्रेष्ठ है।* ब्राह्मणको विराट्रूप भगवान्का मुख, क्षत्रियको हाथ, वैश्यको ऊरु (मध्यभाग) और शूद्रको पैर बताया गया है। ब्राह्मणको मुख बतानेका तात्पर्य है कि उनके पास ज्ञानका संग्रह है, इसलिये चारों वर्णोंको पढ़ाना, अच्छी शिक्षा देना और उपदेश सुनाना—यह मुखका ही काम है। इस दृष्टिसे ब्राह्मण ऊँचे माने गये। क्षत्रियको हाथ बतानेका तात्पर्य है कि वे चारों वर्णोंकी शत्रुओंसे रक्षा करते हैं। रक्षा करना मुख्यरूपसे हाथोंका ही काम है; जैसे—शरीरमें फोड़ा-फुंसी आदि हो जाय तो हाथोंसे ही रक्षा की जाती है; शरीरपर चोट आती हो तो रक्षाके लिये हाथ ही आड़ देते हैं और अपनी रक्षाके लिये दूसरोंपर हाथोंसे ही चोट पहुँचायी जाती है; आदमी कहीं गिरता है तो पहले हाथ ही टिकते हैं। इसलिये क्षत्रिय हाथ हो गये। अराजकता फैल जानेपर तो जन, धन आदिकी रक्षा करना चारों वर्णोंका धर्म हो जाता है। वैश्यको मध्यभाग कहनेका तात्पर्य है कि जैसे पेटमें अन्न, जल, औषध आदि डाले जाते हैं तो उनसे शरीरके सम्पूर्ण अवयवोंको खुराक मिलती है और सभी अवयव पुष्ट होते हैं, ऐसे ही वस्तुओंका संग्रह करना, उनका यातायात करना, जहाँ जिस चीजकी कमी हो वहाँ पहुँचाना, प्रजाको किसी चीजका अभाव न होने देना वैश्यका काम है। पेटमें अन्न-जलका संग्रह सब शरीरके लिये होता है और साथमें पेटको भी पुष्टि मिल जाती है; क्योंकि मनुष्य केवल पेटके लिये पेट नहीं भरता। ऐसे ही वैश्य केवल दूसरोंके लिये ही संग्रह करे, केवल अपने लिये नहीं। वह ब्राह्मण आदिको दान देता है, क्षत्रियोंको टैक्स देता है, अपना पालन करता है और शूद्रोंको मेहनताना देता है। इस प्रकार वह सबका पालन करता है। यदि वह संग्रह नहीं करेगा, कृषि, गौरक्ष्य और वाणिज्य नहीं करेगा तो क्या देगा? शूद्रको चरण बतानेका तात्पर्य है कि जैसे चरण सारे शरीरको उठाये फिरते हैं और पूरे शरीरकी सेवा चरणोंसे ही होती है, ऐसे ही सेवाके आधारपर ही चारों वर्ण चलते हैं। शूद्र अपने सेवा-कर्मके द्वारा सबके आवश्यक कार्योंकी पूर्ति करता है। उपर्युक्त विवेचनमें एक ध्यान देनेकी बात है कि गीतामें चारों वर्णोंके उन स्वाभाविक कर्मोंका वर्णन है, जो कर्म स्वतः होते हैं अर्थात् उनको करनेमें अधिक परिश्रम नहीं पड़ता। चारों वर्णोंके लिये और भी दूसरे कर्मोंका विधान है, उनको स्मृति-ग्रन्थोंमें देखना चाहिये और उनके अनुसार अपने आचरण बनाने चाहिये(गीता—सोलहवें अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक)। वर्तमानमें चारों वर्णोंमें गड़बड़ी आ जानेपर भी यदि चारों वर्णोंके समुदायोंको इकट्ठा करके अलग-अलग समुदायमें देखा जाय तो ब्राह्मण-समुदायमें शम, दम आदि गुण जितने अधिक मिलेंगे, उतने क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र- समुदायमें नहीं मिलेंगे। क्षत्रिय-समुदायमें शौर्य, तेज आदि गुण जितने अधिक मिलेंगे, उतने ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र- समुदायमें नहीं मिलेंगे। वैश्य-समुदायमें व्यापार करना, धनका उपार्जन करना, धनको पचाना (धनका भभका ऊपरसे न दीखने देना) आदि गुण जितने अधिक मिलेंगे, उतने ब्राह्मण, क्षत्रिय और शूद्र-समुदायमें नहीं मिलेंगे। शूद्र-समुदायमें सेवा करनेकी प्रवृति जितनी अधिक मिलेगी, उतनी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य-समुदायमें नहीं मिलेगी। तात्पर्य यह है कि आज सभी वर्ण मर्यादारहित और उच्छृंखल होनेपर भी उनके स्वभावज कर्म उनके समुदायोंमें विशेषतासे देखनेमें आते हैं अर्थात् यह चीज व्यक्तिगत न दीखकर समुदायगत देखनेमें आती है। जो लोग शास्त्रके गहरे रहस्यको नहीं जानते, वे कह देते हैं कि ब्राह्मणोंके हाथमें कलम रही, इसलिये उन्होंने “ब्राह्मण सबसे श्रेष्ठ है” ऐसा लिखकर ब्राह्मणोंको सर्वोच्च कह दिया। जिनके पास राज्य था, उन्होंने ब्राह्मणोंसे कहा—क्यों महाराज! हमलोग कुछ नहीं हैं क्या? तो ब्राह्मणोंने कह दिया—नहीं-नहीं, ऐसी बात नहीं। आपलोग भी हैं, आपलोग दो नम्बरमें हैं। वैश्योंने ब्राह्मणोंसे कहा—क्यों महाराज! हमारे बिना कैसे जीविका चलेगी आपकी? ब्राह्मणोंने कहा—हाँ, हाँ, आपलोग तीसरे नम्बरमें हैं। जिनके पास न राज्य था, न धन था, वे ऊँचे उठने लगे तो ब्राह्मणोंने कह दिया—आपके भाग्यमें राज्य और धन लिखा नहीं है। आपलोग तो इन ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्योंकी सेवा करो। इसलिये चौथे नम्बरमें आपलोग हैं। इस तरह सबको भुलावेमें डालकर विद्या, राज्य और धनके प्रभावसे अपनी एकता करके चौथे वर्णको पददलित कर दिया—यह लिखनेवालोंका अपना स्वार्थ और अभिमान ही है। इसका समाधान यह है कि ब्राह्मणोंने कहीं भी अपने ब्राह्मण-धर्मके लिये ऐसा नहीं लिखा है कि ब्राह्मण सर्वोपरि हैं, इसलिये उनको बड़े आरामसे रहना चाहिये, धन- सम्पत्तिसे युक्त होकर मौज करनी चाहिये इत्यादि, प्रत्युत ब्राह्मणोंके लिये ऐसा लिखा है कि उनको त्याग करना चाहिये, कष्ट सहना चाहिये; तपश्चर्या करनी चाहिये। गृहस्थमें रहते हुए भी उनको धन-संग्रह नहीं करना चाहिये, अन्नका संग्रह भी थोड़ा ही होना चाहिये—कुम्भीधान्य अर्थात् एक घड़ा भरा हुआ अनाज हो, लौकिक भोगोंमें आसक्ति नहीं होनी चाहिये, और जीवन-निर्वाहके लिये किसीसे दान भी लिया जाय तो उसका काम करके अर्थात् यज्ञ, होम, जप, पाठ आदि करके ही लेना चाहिये। गोदान आदि लिया जाय तो उसका प्रायश्चित्त करना चाहिये। यदि कोई ब्राह्मणको श्राद्धका निमन्त्रण देना चाहे तो वह श्राद्धके पहले दिन दे, जिससे ब्राह्मण उसके पितरोंका अपनेमें आवाहन करके रात्रिमें ब्रह्मचर्य और संयमपूर्वक रह सके। दूसरे दिन वह यजमानके पितरोंका पिण्डदान, तर्पण ठीक विधि-विधानसे करवाये। उसके बाद वहाँ भोजन करे। निमन्त्रण भी एक ही यजमानका स्वीकार करे और भोजन भी एक ही घरका करे। श्राद्धका अन्न खानेके बाद गायत्री-जप आदि करके शुद्ध होना चाहिये। दान लेना, श्राद्धका भोजन करना ब्राह्मणके लिये ऊँचा दर्जा नहीं है। ब्राह्मणका ऊँचा दर्जा त्यागमें है। वे केवल यजमानके पितरोंका कल्याण करनेकी भावनासे ही श्राद्धका भोजन और दक्षिणा स्वीकार करते हैं, स्वार्थकी भावनासे नहीं; अतः यह भी उनका त्याग ही है। ब्राह्मणोंने अपनी जीविकाके लिये ऋत, अमृत, मृत, सत्यानृत और प्रमृत—ये पाँच वृत्तियाँ बतायी हैं*— (1) ऋत-वृत्ति सर्वोच्च वृत्ति मानी गयी है। इसको शिलोञ्छ या कपोत-वृत्ति भी कहते हैं। खेती करनेवाले खेतमेंसे धान काटकर ले जायँ, उसके बाद वहाँ जो अन्न (ऊमी, सिट्टा आदि) पृथ्वीपर गिरा पड़ा हो, वह भूदेवों (ब्राह्मणों)-का होता है; अतः उनको चुनकर अपना निर्वाह करना “शिलोञ्छवृत्ति” है अथवा धान्यमण्डीमें जहाँ धान्य तौला जाता है, वहाँ पृथ्वीपर गिरे हुए दाने भूदेवोंके होते हैं; अतः उनको चुनकर जीवन-निर्वाह करना “कपोतवृत्ति” है। (2) बिना याचना किये और बिना इशारा किये कोई यजमान आकर देता है तो निर्वाहमात्रकी वस्तु लेना “अमृत- वृत्ति” है। इसको “अयाचितवृत्ति” भी कहते हैं। (3) सुबह भिक्षाके लिये गाँवमें जाना और लोगोंको वार, तिथि, मुहूर्त आदि बताकर (इस रूपमें काम करके) भिक्षामें जो कुछ मिल जाय, उसीसे अपना जीवन-निर्वाह करना “मृत-वृत्ति” है। (4) व्यापार करके जीवन-निर्वाह करना “सत्यानृत- वृत्ति” है। (5) उपर्युक्त चारों वृत्तियोंसे जीवन-निर्वाह न हो तो खेती करे, पर वह भी कठोर विधि-विधानसे करे; जैसे— एक बैलसे हल न चलाये, धूपके समय हल न चलाये आदि, यह “प्रमृत-वृत्ति” है। उपर्युक्त वृत्तियोंमेंसे किसी भी वृत्तिसे निर्वाह किया जाय, उसमें पंचमहायज्ञ, अतिथि-सेवा करके यज्ञशेष भोजन करना चाहिये*। श्रीमद्भगवद्गीतापर विचार करते हैं तो ब्राह्मणके लिये पालनीय जो नौ स्वाभाविक धर्म बताये गये हैं, उनमें जीविका पैदा करनेवाला एक भी धर्म नहीं है। क्षत्रियके लिये सात स्वाभाविक धर्म बताये हैं। उनमें युद्ध करना और शासन करना—ये दो धर्म कुछ जीविका पैदा करनेवाले हैं। वैश्यके लिये तीन धर्म बताये हैं—खेती, गोरक्षा और व्यापार; ये तीनों ही जीविका पैदा करनेवाले हैं। शूद्रके लिये एक सेवा ही धर्म बताया है, जिसमें पैदा-ही-पैदा होती है। शूद्रके लिये खान-पान, जीवन-निर्वाह आदिमें भी बहुत छूट दी गयी है। भगवान्ने “स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः” (गीता 18। 45) पदोंसे कितनी विचित्र बात बतायी है कि शम, दम आदि नौ धर्मोंके पालनसे ब्राह्मणका जो कल्याण होता है, वही कल्याण शौर्य, तेज आदि सात धर्मोंके पालनसे क्षत्रियका होता है, वही कल्याण खेती, गोरक्षा और व्यापारके पालनसे वैश्यका होता है और वही कल्याण केवल सेवा करनेसे शूद्रका हो जाता है। आगे भगवान्ने एक विलक्षण बात बतायी है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र अपने-अपने वर्णोचित कर्मोंके द्वारा उस परमात्माका पूजन करके परम सिद्धिको प्राप्त हो जाते हैं—“स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः” (18। 46)। वास्तवमें कल्याण वर्णोचित कर्मोंसे नहीं होता, प्रत्युत निष्कामभावपूर्वक पूजनसे ही होता है। शूद्रका तो स्वाभाविक कर्म ही परिचर्यात्मक अर्थात् पूजनरूप है; अतः उसका पूजनके द्वारा पूजन होता है अर्थात् उसके द्वारा दुगुनी पूजा होती है! इसलिये उसका कल्याण जितनी जल्दी होगा, उतनी जल्दी ब्राह्मण आदिका नहीं होगा। शास्त्रकारोंने उद्धार करनेमें छोटेको ज्यादा प्यार दिया है; क्योंकि छोटा प्यारका पात्र होता है और बड़ा अधिकारका पात्र होता है। बड़ेपर चिन्ता-फिक्र ज्यादा रहती है, छोटेपर कुछ भी भार नहीं रहता। शूद्रको भाररहित करके उसकी जीविका बतायी गयी है और प्यार भी दिया गया है। वास्तवमें देखा जाय तो जो वर्ण-आश्रममें जितना ऊँचा होता है, उसके लिये शास्त्रोंके अनुसार उतने ही कठिन नियम होते हैं। उन नियमोंका सांगोपांग पालन करनेमें कठिनता अधिक मालूम देती है। परन्तु जो वर्ण-आश्रममें नीचा होता है, उसका कल्याण सुगमतासे हो जाता है। इस विषयमें विष्णुपुराणमें एक कथा आती है—एक बार बहुत-से ऋषि-मुनि मिलकर श्रेष्ठताका निर्णय करनेके लिये भगवान् वेदव्यासजीके पास गये। व्यासजीने सबको आदरपूर्वक बिठाया और स्वयं गंगामें स्नान करने चले गये। गंगामें स्नान करते हुए उन्होंने कहा—“कलियुग, तुम धन्य हो! स्त्रियो, तुम धन्य हो! शूद्रो, तुम धन्य हो! जब व्यासजी स्नान करके ऋषियोंके पास आये तो ऋषियोंने कहा—महाराज! आपने कलियुग, स्त्रियों और शूद्रोंको धन्यवाद कैसे दिया!” तो उन्होंने कहा कि कलियुगमें अपने धर्मका पालन करनेसे स्त्रियों और शूद्रोंका कल्याण जल्दी और सुगमतापूर्वक हो जाता है। यहाँ एक और बात सोचनेकी है कि जो अपने स्वार्थका काम करता है, वह समाजमें और संसारमें आदरका पात्र नहीं होता। समाजमें ही नहीं, घरमें भी जो व्यक्ति पेटू और चट्टू होता है, उसकी दूसरे निन्दा करते हैं। ब्राह्मणोंने स्वार्थ-दृष्टिसे अपने ही मुँहसे अपनी (ब्राह्मणोंकी) प्रशंसा, श्रेष्ठताकी बात नहीं कही है। उन्होंने ब्राह्मणोंके लिये त्याग ही बताया है। सात्त्विक मनुष्य अपनी प्रशंसा नहीं करते, प्रत्युत दूसरोंकी प्रशंसा, दूसरोंका आदर करते हैं। तात्पर्य है कि ब्राह्मणोंने कभी अपने स्वार्थ और अभिमानकी बात नहीं कही। यदि वे स्वार्थ और अभिमानकी बात कहते तो वे इतने आदरणीय नहीं होते, संसारमें और शास्त्रोंमें आदर न पाते। वे जो आदर पाते हैं, वह त्यागसे ही पाते हैं। इस प्रकार मनुष्यको शास्त्रोंका गहरा अध्ययन करके उपर्युक्त सभी बातोंको समझना चाहिये और ऋषि- मुनियोंपर, शास्त्रकारोंपर झूठा आक्षेप नहीं करना चाहिये। ऊँच-नीच वर्णोंमें प्राणियोंका जन्म मुख्यरूपसे गुणों और कर्मोंके अनुसार होता है—“चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः” (गीता 4। 13); परन्तु ऋणानुबन्ध, शाप, वरदान, संग आदि किसी कारणविशेषसे भी ऊँच- नीच वर्णोंमें जन्म हो जाता है। उन वर्णोंमें जन्म होनेपर भी वे अपने पूर्वस्वभावके अनुसार ही आचरण करते हैं। यही कारण है कि ऊँचे वर्णमें उत्पन्न होनेपर भी उनके नीच आचरण देखे जाते हैं, जैसे धुन्धुकारी आदि; और नीच वर्णमें उत्पन्न होनेपर भी वे महापुरुष होते हैं, जैसे विदुर, कबीर, रैदास आदि। आज जिस समुदायमें जातिगत, कुलपरम्परागत, समाजगत और व्यक्तिगत जो भी शास्त्र-विपरीत दोष आये हैं, उनको अपने विवेक-विचार, सत्संग, स्वाध्याय आदिके द्वारा दूर करके अपनेमें स्वच्छता, निर्मलता, पवित्रता लानी चाहिये, जिससे अपने मनुष्यजन्मका ध्येय सिद्ध हो सके।
* कृषिवाणिज्यगोरक्षं कुसीदं तुर्यमुच्यते। वार्ता चतुर्विधा तत्र वयं गोवृत्तयोऽनिशम्॥ (श्रीमद्भा0 10। 24। 21)
“वैश्योंकी वार्तावृत्ति चार प्रकारकी है—कृषि, वाणिज्य, गोरक्षा और ब्याज लेना। हमलोग उन चारोंमेंसे केवल गोपालन
ही सदासे करते आये हैं।”
(श्रीमद्भा0 11। 17। 42)
1-आचारहीनं न पुनन्ति वेदा यद्यप्यधीताः सह षड्भिरङ्गैः। छन्दांस्येनं मृत्युकाले त्यजन्ति नीडं शकुन्ता इव जातपक्षाः॥
(वसिष्ठस्मृति 6। 3)
“शिक्षा, कल्प, निरुक्त, छन्द, व्याकरण और ज्योतिष—इन छहों अंगोंसहित अध्ययन किये हुए वेद भी आचारहीन पुरुषको
पवित्र नहीं करते। पंख पैदा होनेपर पक्षी जैसे अपने घोंसलेको छोड़ देता है, ऐसे ही मृत्युसमयमें आचारहीन पुरुषको वेद छोड़
देते हैं।”
2-यस्य यल्लक्षणं प्रोक्तं पुंसो वर्णाभिव्यंजकम्। यदन्यत्रापि दृश्येत तत् तेनैव विनिर्दिशेत्॥ (श्रीमद्भा0 7। 11। 35)
3-शूद्रे तु यद् भवेल्लक्ष्म द्विजे तच्च न विद्यते। न वै शूद्रो भवेच्छूद्रो ब्राह्मणो न च ब्राह्मणः॥
यत्रैतल्लक्ष्यते सर्प वृत्तं स ब्राह्मणः स्मृतः। यत्रैतन्न भवेत् सर्प तं शूद्रमिति निर्दिशेत्॥
(महाभारत, वनपर्व 180। 25-26)
4-पाषण्डिनो विकर्मस्थान्बैडालव्रतिकाञ्छठान्। हैतुकान्बकवृत्तींश्च वाङ्मात्रेणापि नार्चयेत्॥
(मनुस्मृति 4। 30)
“पाखण्डी, विरुद्ध कर्म करनेवाले, बैडालव्रती, शठ, हेतुवादी, बकवृत्ति ब्राह्मणोंका वचनमात्रसे भी आदर न करे।”
न वार्यपि प्रयच्छेत्तु बैडालव्रतिके द्विजे। न बकव्रतिके विप्रे नावेदविदि धर्मवित्॥
(मनुस्मृति 4। 192)
“धर्मज्ञ गृहाश्रमी बैडालव्रती, बकव्रती और वेदको नहीं जाननेवाले ब्राह्मणके लिये पानी भी न दे।”
* (1) अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान् यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम्। तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते॥
(श्रीमद्भा0 3। 33। 7)
“अहो! वह चाण्डाल भी सर्वश्रेष्ठ है, जिसकी जीभके अग्रभागपर आपका नाम विराजता है। जो श्रेष्ठ पुरुष आपका
नाम उच्चारण करते हैं, उन्होंने तप, हवन, तीर्थस्नान, सदाचारका पालन और वेदाध्ययन—सब कुछ कर लिया।”
(2) विप्राद् द्विषड्गुणयुतादरविन्दनाभपादारविन्दविमुखाच्छ्वपचं वरिष्ठम्।
मन्ये तदर्पितमनोवचनेहितार्थप्राणं पुनाति स कुलं न तु भूरिमानः॥
(श्रीमद्भा0 7। 9। 10)
“मेरी समझसे बारह गुणोंसे युक्त ब्राह्मण भी यदि भगवान् कमलनाभके चरण-कमलोंसे विमुख हो तो वह चाण्डाल
श्रेष्ठ है, जिसने अपने मन, वचन, कर्म, धन और प्राणोंको भगवान्के अर्पण कर दिया है; क्योंकि वह चाण्डाल तो अपने
कुलतकको पवित्र कर देता है; परन्तु बड़प्पनका अभिमान रखनेवाला भगवद्विमुख ब्राह्मण अपनेको भी पवित्र नहीं कर
सकता।”
(3) चाण्डालोऽपि मुनेः श्रेष्ठो विष्णुभक्तिपरायणः। विष्णुभक्तिविहीनस्तु द्विजोऽपि श्वपचोऽधमः॥
(पद्मपुराण)
“हरिभक्तिमें लीन रहनेवाला चाण्डाल भी मुनिसे श्रेष्ठ है, और हरिभक्तिसे रहित ब्राह्मण चाण्डालसे भी अधम है।”
(4) अवैष्णवाद् द्विजाद् विप्र चाण्डालो वैष्णवो वरः॥ सगणः श्वपचो मुक्तो ब्राह्मणो नरकं व्रजेत्।
(ब्रह्मवैवर्त0, ब्रह्मा0 11। 39)
“अवैष्णव ब्राह्मणसे वैष्णव चाण्डाल श्रेष्ठ है; क्योंकि वह वैष्णव चाण्डाल अपने बन्धुगणोंसहित भव-बन्धनसे मुक्त
हो जाता है और वह अवैष्णव ब्राह्मण नरकमें पड़ता है।”
(5) न शूद्रा भगवद्भक्ता विप्रा भागवताः स्मृताः। सर्ववर्णेषु ते शूद्रा ये ह्यभक्ता जनार्दने॥ (महाभारत)
“यदि भगवद्भक्त शूद्र है तो वह शूद्र नहीं, परमश्रेष्ठ ब्राह्मण है। वास्तवमें सभी वर्णोंमें शूद्र वह है, जो भगवान्की
भक्तिसे रहित है।”
* ऋतामृताभ्यां जीवेत्तु मृतेन प्रमृतेन वा। सत्यानृताभ्यामपि वा न श्ववृत्त्या कदाचन॥ (मनुस्मृति 4। 4)
“ऋत, अमृत, मृत, प्रमृत और सत्यानृत—इनमेंसे किसी भी वृत्तिसे जीवन-निर्वाह करे; परन्तु श्ववृत्ति अर्थात् सेवावृत्तिसे
कभी भी जीवन-निर्वाह न करे।”
* ब्राह्मण और क्षत्रियके लिये यह निषेध आया है कि वह श्ववृत्ति अर्थात् सेवावृत्ति कभी न करे—“न श्ववृत्त्या कदाचन”
(मनु0 4। 4), “सेवा श्ववृत्तिराख्याता तस्मात्तां परिवर्जयेत्” (मनु0 4। 6)। वास्तवमें सेवावृत्तिका ही निषेध किया गया
है, सेवाका नहीं। माता-पिताकी तरह वे नीच-से-नीच वर्णकी नीची-से-नीची सेवा कर सकते हैं। नीच वर्णोंकी सेवा करनेमें
उनकी महत्ता ही है। इसलिये वृत्तिकी ही निन्दा की गयी है। मान, बड़ाई, उपार्जन आदि स्वार्थके लिये सेवा करनेकी निन्दा
है, स्वार्थका त्याग करके सेवा करनेकी निन्दा नहीं है।
45श्रीभगवान्
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरःस्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥ 45॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

विच्छेद हो जानेपर केवल एक परमात्मतत्त्व ही स्वभावज कर्मोंका वर्णन करनेका प्रयोजन क्या है—इसको अब आगेके दो श्लोकोंमें बताते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
2 sections
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः
गीताके अध्ययनसे ऐसा मालूम होता है कि मनुष्यकी जैसी स्वतःसिद्ध स्वाभाविक प्रकृति (स्वभाव) है, उसमें अगर वह कोई नयी उलझन पैदा न करे, राग- द्वेष न करे तो वह प्रकृति उसका स्वाभाविक ही कल्याण कर दे। तात्पर्य है कि प्रकृतिके द्वारा प्रवाहरूपसे अपने- आप होनेवाले जो स्वाभाविक कर्म हैं, उनका स्वार्थ- त्यागपूर्वक प्रीति और तत्परतासे आचरण करे; परन्तु कर्मोंके प्रवाहके साथ न राग हो, न द्वेष हो और न फलेच्छा हो। राग-द्वेष और फलेच्छासे रहित होकर क्रिया करनेसे “करनेका वेग” शान्त हो जाता है और कर्ममें आसक्ति न होनेसे नया वेग पैदा नहीं होता। इससे प्रकृतिके पदार्थों और क्रियाओंके साथ निर्लिप्तता (असंगता) आ जाती है। निर्लिप्तता होनेसे प्रकृतिकी क्रियाओंका प्रवाह कोई सम्बन्ध न रहनेसे साधककी अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती है, जो कि प्राणिमात्रकी स्वतः-स्वाभाविक है। अपने स्वरूपमें स्थिति होनेपर उसका परमात्माकी तरफ स्वाभाविक आकर्षण हो जाता है। परन्तु यह सब होता है कर्मोंमें “अभिरति” होनेसे, आसक्ति होनेसे नहीं। कर्मोंमें एक तो “अभिरति” होती है और एक “आसक्ति” होती है। अपने स्वाभाविक कर्मोंको केवल दूसरोंके हितके लिये तत्परता और उत्साहपूर्वक करनेसे अर्थात् केवल देनेके लिये कर्म करनेसे मनमें जो प्रसन्नता होती है, उसका नाम “अभिरति” है। फलकी इच्छासे कुछ करना अर्थात् कुछ पानेके लिये कर्म करना “आसक्ति” है। कर्मोंमें अभिरतिसे कल्याण होता है और आसक्तिसे बन्धन होता है। इस प्रकरणके “स्वे स्वे कर्मणि”,“स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य”,“स्वभावनियतं कर्म”,“सहजं कर्म” आदि पदोंमें “कर्म” शब्द एकवचनमें आया है। इसका तात्पर्य है कि मनुष्य प्रीति और तत्परतापूर्वक चाहे एक कर्म करे, चाहे अनेक कर्म करे, उसका उद्देश्य केवल परमात्मप्राप्ति होनेसे उसकी कर्तव्यनिष्ठा एक ही होती है। परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यको लेकर मनुष्य जितने भी कर्म करता है, वे सब कर्म अन्तमें उसी उद्देश्यमें ही लीन हो जाते हैं अर्थात् उसी उद्देश्यकी पूर्ति करनेवाले हो जाते हैं। जैसे गंगाजी हिमालयसे निकलकर गंगासागरतक जाती हैं तो नद, नदियाँ, झरने, सरोवर, वर्षाका जल—ये सभी उसकी धारामें मिलकर गंगासे एक हो जाते हैं, ऐसे ही उद्देश्यवालेके सभी कर्म उसके उद्देश्यमें मिल जाते हैं। परन्तु जिसकी कर्मोंमें आसक्ति है, वह एक कर्म करके अनेक फल चाहता है अथवा अनेक कर्म करके एक फल चाहता है; अतः उसका उद्देश्य एक परमात्माकी प्राप्तिका न होनेसे उसकी कर्तव्यनिष्ठा एक नहीं होती (गीता—दूसरे अध्यायका इकतालीसवाँ श्लोक)।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु
अपने कर्मोंमें प्रीतिपूर्वक तत्परतासे लगा हुआ मनुष्य परमात्माको जैसे प्राप्त होता है, वह सुनो अर्थात् कर्ममात्र परमात्मप्राप्तिका साधन है, इस बातको सुनो और सुन करके ठीक तरहसे समझो। क्या रुख है? क्या रुचि है?—ऐसे भाव होनेसे जो भी काम किया जाय, वह “सेवा” हो जाता है। सेव्यका वही काम पूजाबुद्धि, भगवद्बुद्धि, गुरुबुद्धि आदिसे किया जाय और पूज्यभावसे चन्दन लगाया जाय, पुष्प चढ़ाये जायँ, माला पहनायी जाय, आरती की जाय, तो वह काम “पूजन” हो जाता है। इससे सेव्यके चरणस्पर्श अथवा दर्शनमात्रसे चित्तकी प्रसन्नता, हृदयकी गद्गदता, शरीरका रोमांचित होना आदि होते हैं और सेव्यके प्रति विशेष भाव प्रकट होते हैं। उससे सेव्यकी सेवामें कुछ शिथिलता आ सकती है; परन्तु भावोंके बढ़नेपर अन्तःकरण- शुद्धि, भगवत्प्रेम, भगवद्दर्शन आदि हो जाते हैं। मालिकका समय-समयपर काम-धंधा करनेसे नौकरको पैसे मिल जाते हैं और सेव्यकी सेवा करनेसे सेवकको अन्तःकरण-शुद्धिपूर्वक भगवत्प्राप्ति हो जाती है; परन्तु पूजाभावके बढ़नेसे तो पूजकको तत्काल भगवत्प्राप्ति हो जाती है। तात्पर्य है कि चरणचाँपी तो नौकर भी करता है, पर उसको सेवाका आनन्द नहीं मिलता; क्योंकि उसकी दृष्टि पैसोंपर रहती है। परन्तु जो सेवाबुद्धिसे चरणचाँपी करता है, उसको सेवामें विशेष आनन्द मिलता है; क्योंकि उसकी दृष्टि सेव्यके सुखपर रहती है। पूजामें तो चरण छूनेमात्रसे शरीर रोमांचित हो जाता है और अन्तःकरणमें एक पारमार्थिक आनन्द होता है। उसकी दृष्टि पूज्यकी महत्तापर और अपनी लघुतापर रहती है। ऐसे देखा जाय तो नौकरके काम-धंधेसे मालिकको आराम मिलता है,
परिशिष्ट भाव
अपने वर्णके सिवाय जिसने जो-जो कर्म स्वीकार कर लिये हैं, वे सब भी “स्वे स्वे कर्मणि” के अन्तर्गत लेने चाहिये। जैसे, मनुष्य अपनेको वकील, नौकर, अध्यापक अथवा चिकित्सक आदि मानता है तो उसके कर्तव्यका प्रेमपूर्वक, आदरपूर्वक निःस्वार्थभावसे ठीक-ठीक पालन करना भी उसके लिये “स्वकर्म” है। मनुष्य स्वार्थबुद्धि, पक्षपात, कामना आदिको लेकर कर्म करता है तो वह “आसक्ति” होती है। वह प्रेमपूर्वक, निष्कामभावसे और लोकहितके लिये कर्म करता है तो वह “अभिरति” होती है। भगवान्ने कर्मोंमें “आसक्ति” का निषेध किया है—“न कर्मस्वनुषज्जते” (गीता 6। 4)। मनुष्य जाति आदिको लेकर न अपनेको ऊँचा समझे, न नीचा समझे, प्रत्युत घड़ीके पुर्जेकी तरह अपनी जगह ठीक कर्तव्यका पालन करे और दूसरेकी निन्दा, तिरस्कार न करे तथा अपना अभिमान भी न करे, तब “अभिरति” होगी। वास्तवमें “कर्म” की प्रधानता नहीं है, प्रत्युत “भाव” की प्रधानता है। कर्ताका भाव शुद्ध होगा तो वह कल्याण करनेवाला हो जायगा, चाहे कर्ता किसी वर्णका हो। “कर्म” में वर्णकी मुख्यता है और “भाव” में दैवी अथवा आसुरी- सम्पत्तिकी मुख्यता है। अतः दैवी-आसुरी-सम्पत्ति किसी वर्णको लेकर नहीं होती, प्रत्युत सबमें हो सकती है। दैवी- सम्पत्ति मोक्ष देनेवाली और आसुरी-सम्पत्ति बाँधनेवाली है। इसलिये अगर ब्राह्मणमें भी अभिमान हो तो वह आसुरी- सम्पत्तिवाला हो जायगा अर्थात् उसका पतन हो जायगा— नीच नीच सब तर गये, राम भजन लवलीन। जाति के अभिमान से, डूबे सभी कुलीन॥
विशेष बात
विशेष बात मालिककी सुख-सुविधाकी सामग्री जुटा देना, मालिकके दैनिक कार्योंमें अनुकूलता उपस्थित कर देना आदि कार्य तो वेतन लेनेवाला नौकर भी कर सकता है और करता भी है। परन्तु उसमें “क्रिया” की (कि इतना काम करना है) और “समय” की (कि इतने घंटे काम करना है) प्रधानता रहती है। इसलिये वह काम-धंधा “सेवा” नहीं बन पाता। यदि मालिकका वह काम-धन्धा आदरपूर्वक सेव्यबुद्धिसे, महत्त्वबुद्धिसे किया जाय तो वह “सेवा” हो जाता है। सेव्यबुद्धि, महत्त्वबुद्धि चाहे जन्मके सम्बन्धसे हो, चाहे विद्याके सम्बन्धसे; चाहे वर्ण-आश्रमके सम्बन्धसे हो; चाहे योग्यता, अधिकार, सद्गुण-सदाचारके सम्बन्धसे। जहाँ महत्त्वबुद्धि हो जाती है, वहाँ सेव्यको सुख-आराम कैसे मिले? सेव्यकी प्रसन्नता किस बातमें है? सेव्यका सेवामें सेव्यको विशेष आराम तथा सुख मिलता है और पूजामें पूजकके भावसे पूज्यको प्रसन्नता होती है। पूजामें शरीरके सुख-आरामकी प्रधानता नहीं होती। अपने स्वभावज कर्मोंके द्वारा पूजा करनेसे पूजकका भाव बढ़ जाता है तो उसके स्थूल, सूक्ष्म और कारणशरीरसे होनेवाली (चेष्टा, चिन्तन, समाधि आदि) सभी छोटी-बड़ी क्रियाएँ सब प्राणियोंमें व्यापक परमात्माकी पूजन-सामग्री बन जाती है। उसकी दैनिकचर्या अर्थात् खाना-पीना आदि सब क्रियाएँ भी पूजन-सामग्री बन जाती हैं। जैसे ज्ञानयोगीका “मैं कुछ भी नहीं करता हूँ” यह भाव हरदम बना रहता है, ऐसे ही अनेक प्रकारकी क्रियाएँ करनेपर भी भक्तके भीतर एक भगवद्भाव हरदम बना रहता है। उस भावकी गाढ़तामें उसका अहंभाव भी छूट जाता है।
46श्रीभगवान्
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥ 46॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
पदच्छेद
श्लोकमें ढूँढ़नेके लिये हॉवर करें
व्याख्या
3 sections
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्
जिस परमात्मासे संसार पैदा हुआ है, जिससे सम्पूर्ण संसारका संचालन होता है, जो सबका उत्पादक, आधार और प्रकाशक है और जो सबमें परिपूर्ण है अर्थात् जो परमात्मा अनन्त ब्रह्माण्डोंकी उत्पत्तिसे पहले भी था, जो अनन्त ब्रह्माण्डोंके लीन होनेपर भी रहेगा और अनन्त ब्रह्माण्डोंके रहते हुए भी जो रहता है तथा जो अनन्त ब्रह्माण्डोंमें व्याप्त है, उसी परमात्माका अपने-अपने स्वभावज (वर्णोचित स्वाभाविक) कर्मोंके द्वारा पूजन करना चाहिये।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य
मनुस्मृतिमें ब्राह्मणोंके लिये छः कर्म बताये गये हैं—स्वयं पढ़ना और दूसरोंको पढ़ाना, स्वयं यज्ञ करना और दूसरोंसे यज्ञ कराना तथा यज्ञ कराना और दान लेना—ये तीन कर्म जीविकाके हैं और पढ़ना, यज्ञ करना और दान देना—ये तीन कर्तव्यकर्म हैं)। उपर्युक्त शास्त्रनियत छः कर्म और शम-दम आदि नौ स्वभावज कर्म तथा इनके अतिरिक्त खाना-पीना, उठना-बैठना आदि जितने भी कर्म हैं, उन कर्मोंके द्वारा ब्राह्मण चारों वर्णोंमें व्याप्त परमात्माका पूजन करें। तात्पर्य है कि परमात्माकी आज्ञासे, उनकी प्रसन्नताके लिये ही भगवद्बुद्धिसे निष्कामभावपूर्वक सबकी सेवा करें। ऐसे ही क्षत्रियोंके लिये पाँच कर्म बताये गये हैं— प्रजाकी रक्षा करना, दान देना, यज्ञ करना, अध्ययन करना और विषयोंमें आसक्त न होना2। इन पाँच कर्मों तथा शौर्य, तेज आदि सात स्वभावज कर्मोंके द्वारा और खाना-पीना आदि सभी कर्मोंके द्वारा क्षत्रिय सर्वत्र व्यापक परमात्माका पूजन करें। वैश्य यज्ञ करना, अध्ययन करना, दान देना और ब्याज लेना तथा कृषि, गौरक्ष्य और वाणिज्य1—इन शास्त्र- नियत और स्वभावज कर्मोंके द्वारा और शूद्र शास्त्रविहित तथा स्वभावज कर्म सेवा2के द्वारा सर्वत्र व्यापक परमात्माका पूजन करें अर्थात् अपने शास्त्रविहित, स्वभावज और खाना-पीना, सोना-जागना आदि सभी कर्मोंके द्वारा भगवान्की आज्ञासे, भगवान्की प्रसन्नताके लिये, भगवद्बुद्धिसे निष्कामभावपूर्वक सबकी सेवा करें। शास्त्रोंमें मनुष्यके लिये अपने वर्ण और आश्रमके अनुसार जो-जो कर्तव्य-कर्म बताये गये हैं, वे सब संसाररूप परमात्माकी पूजाके लिये ही हैं। अगर साधक अपने कर्मोंके द्वारा भावसे उस परमात्माका पूजन करता है, तो उसकी मात्र क्रियाएँ परमात्माकी पूजा हो जाती हैं। जैसे, पितामह भीष्मने (अर्जुनके साथ युद्ध करते हुए) अर्जुनके सारथि बने हुए भगवान्की अपने युद्धरूप कर्मके द्वारा (बाणोंसे) पूजा की। भीष्मके बाणोंसे भगवान्का कवच टूट गया, जिससे भगवान्के शरीरमें घाव हो गये और हाथकी अंगुलियोंमें छोटे-छोटे बाण लगनेसे अंगुलियोंसे लगाम पकड़ना कठिन हो गया। ऐसी पूजा करके अन्तसमयमें शर-शय्यापर पड़े हुए पितामह भीष्म अपने बाणोंद्वारा पूजित भगवान्का ध्यान करते हैं—“युद्धमें मेरे तीखे बाणोंसे जिनका कवच टूट गया है, जिनकी त्वचा विच्छिन्न हो गयी है, परिश्रमके कारण जिनके मुखपर स्वेदकण सुशोभित हो रहे हैं, घोड़ोंकी टापोंसे उड़ी हुई रज जिनकी सुन्दर अलकावलिमें लगी हुई है, इस प्रकार बाणोंसे अलंकृत भगवान् कृष्णमें मेरे मन-बुद्धि लग जायँ3।” लौकिक और पारमार्थिक कर्मोंके द्वारा उस परमात्माका पूजन तो करना चाहिये, पर उन कर्मोंमें और उनको करनेके करणों-उपकरणोंमें ममता नहीं रखनी चाहिये। कारण कि जिन वस्तुओं, क्रियाओं आदिमें ममता हो जाती है, वे सभी चीजें अपवित्र हो जानेसे4 पूजा-सामग्री नहीं रहतीं (अपवित्र फल, फूल आदि भगवान्पर नहीं चढ़ते)। इसलिये “मेरे पास जो कुछ है, वह सब उस सर्वव्यापक परमात्माका ही है, मुझे तो केवल निमित्त बनकर उनकी दी हुई शक्तिसे उनका पूजन करना है”—इस भावसे जो कुछ किया जाय, वह सब-का-सब परमात्माका पूजन हो जाता है। इसके विपरीत उन क्रियाओं, वस्तुओं आदिको मनुष्य जितनी अपनी मान लेता है, उतनी ही वे (अपनी मानी हुई) क्रियाएँ, वस्तुएँ (अपवित्र होनेसे) परमात्माके पूजनसे वंचित रह जाती हैं।
सिद्धिं विन्दति मानवः
सिद्धिको प्राप्त होनेका तात्पर्य है कि अपने कर्मोंसे परमात्माका पूजन करनेवाला मनुष्य प्रकृतिके सम्बन्धसे रहित होकर स्वतः अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है। स्वरूपमें स्थित होनेपर पहले जो परमात्माके समर्पण किया था, उस संस्कारके कारण उसका प्रभुमें अनन्यप्रेम जाग्रत् हो जाता है। फिर उसके लिये कुछ भी पाना बाकी नहीं रहता। यहाँ “मानवः” पदका तात्पर्य केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास—इन वर्णों और आश्रमों आदिसे ही नहीं है, प्रत्युत हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, बौद्ध, पारसी, यहूदी आदि सभी जातियों और सम्प्रदायोंसे है। किसी भी जाति, सम्प्रदाय आदिके कोई भी व्यक्ति क्यों न हों, सब-के-सब ही परमात्माके पूजनके अधिकारी हैं; क्योंकि सभी परमात्माके अपने हैं। जैसे घरमें स्वभाव आदिके भेदसे अनेक तरहके बालक होते हैं, पर उन सबकी माँ एक ही होती है और उन बालकोंकी तरह-तरहकी जितनी भी क्रियाएँ होती हैं, उन सब क्रियाओंसे माँ प्रसन्न होती रहती है; क्योंकि उन बालकोंमें माँका अपनापन होता है। ऐसे ही भगवान्के सम्मुख हुए मनुष्योंकी सभी क्रियाओंको भगवान् अपना पूजन मान लेते हैं और प्रसन्न हो जाते हैं। इसी अध्यायके सत्तरवें श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा है कि कोई भी मनुष्य हम दोनोंके संवादका अध्ययन करेगा, उसके द्वारा मैं ज्ञानयज्ञसे पूजित हो जाऊँगा। इससे यह सिद्ध होता है कि कोई गीताका पाठ करे, अध्ययन करे तो उसको भगवान् अपना पूजन मान लेते हैं। ऐसे ही जो उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंसे विमुख होकर भगवान्के सम्मुख हो जाता है, उसकी क्रियाओंको भगवान् अपना पूजन मान लेते हैं। भक्त तो पहलेसे ही भगवान्के सम्मुख होकर अपने- आपको भगवान्के अर्पित कर देता है। स्वयंके अनन्यता- पूर्वक भगवान्के समर्पित हो जानेसे खाना-पीना, काम- धंधा आदि लौकिक और जप, ध्यान, सत्संग, स्वाध्याय आदि पारमार्थिक क्रियाएँ भी भगवान्के अर्पण हो जाती हैं। उसकी लौकिक-पारमार्थिक क्रियाओंमें केवल
परिशिष्ट भाव
यहाँ “यतः प्रवृत्तिर्भूतानाम्” पदोंमें आये “प्रवृत्तिः” पदका अर्थ “उत्पत्ति” लेना चाहिये; क्योंकि परमात्मासे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति तो होती है, पर क्रिया नहीं होती। क्रिया रजोगुणसे होती है—“लोभः प्रवृत्तिरारम्भः0” (गीता 14। 12) पन्द्रहवें अध्यायके चौथे श्लोकमें भी “प्रवृत्ति” पद “उत्पत्ति” अर्थमें आया है— “यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी”। यह संसार भगवान्का पहला अवतार है—“आद्योऽवतारः पुरुषः परस्य” (श्रीमद्भा0 2। 6। 41)। अतः यह संसार भगवान्की ही मूर्ति है, श्रीविग्रह है। जैसे मूर्तिमें हम भगवान्का पूजन करते हैं, पुष्प चढ़ाते हैं, चन्दन लगाते हैं तो हमारा भाव मूर्तिमें न होकर भगवान्में होता है अर्थात् हम मूर्तिकी पूजा न करके भगवान्की पूजा करते हैं, ऐसे ही हमें अपनी प्रत्येक क्रियासे संसाररूपमें भगवान्का पूजन करना है। श्रोता सुनकर वक्ताका पूजन करे, वक्ता सुनाकर श्रोताका पूजन करे—इस प्रकार सभी अपने-अपने कर्मोंके द्वारा एक-दूसरेका पूजन करें। दृष्टि भगवान्की तरफ ही हो, ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्णकी तरफ नहीं। भगवान् श्रीरामको ऋषि-मुनि प्रणाम करते हैं तो भगवान्के भावसे प्रणाम करते हैं, क्षत्रियके भावसे नहीं। पूजनमें खास बात है—सब कुछ भगवान्का और भगवान्के लिये ही है। जैसे गंगाजलसे गंगाका पूजन करते हैं, ऐसे ही भगवान्की वस्तुओंसे भगवान्का पूजन करना है। वास्तवमें सम्पूर्ण क्रियाएँ भगवान्का ही पूजन हैं, हमें केवल अपनी भूल मिटानी है। भगवान्की ही वस्तु भगवान्के अर्पित करनेसे अपनी स्वार्थबुद्धि, भोगबुद्धि, फलेच्छा मिट जायगी तथा अपनेमें सामर्थ्य भी भगवान्का ही माननेसे कर्तृत्व भी मिट जायगा और भगवत्प्राप्तिका अनुभव हो जायगा। वास्तवमें भगवद्भावसे संसारका पूजन मूर्तिपूजासे भी विशेष मूल्यवान् है। कारण कि मूर्तिका पूजन करनेसे मूर्ति प्रसन्न होती हुई नहीं दीखती, पर प्राणियोंकी सेवा करनेसे वे प्रत्यक्ष प्रसन्न (सुखी) होते हुए दीखते हैं। अगर व्यक्तियोंको भगवान्का स्वरूप मानकर कर्मोंसे और पदार्थोंसे उनकी सेवा की जाय तो संसार लुप्त हो जायगा और एकमात्र भगवान् रह जायँगे अर्थात् “सब कुछ भगवान् ही हैं”—इसका अनुभव हो जायगा। जैसे रस्सीमें साँपका भ्रम मिटनेपर साँप तो लुप्त हो जाता है, पर रस्सी तो रहती ही है, ऐसे ही भगवान्में जगत्का भ्रम मिटनेपर जगत् जगत्रूपसे लुप्त हो जाता है और भगवद्रूपसे रहता है। कारण कि जगत्की तो मान्यता है, पर “भगवान् हैं” यह वास्तविकता है। श्रीमद्भागवतमें भगवान् कहते हैं— नरेष्वभीक्ष्णं मद्भावं स्पर्धासूयातिरस्काराः साहङ्कारा “जब भक्तका सम्पूर्ण स्त्री-पुरुषोंमें निरन्तर मेरा ही भाव हो जाता है और उनमें मेरेको ही देखता है*, तब शीघ्र ही उसके चित्तसे ईर्ष्या, दोषदृष्टि, तिरस्कार आदि दोष अहंकारसहित दूर हो जाते हैं।” गीतामें भगवान्ने कहा है—“अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः” (10। 20) “सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तःकरणमें स्थित आत्मा भी मैं ही हूँ”। अतः भगवद्भावसे किसी प्राणीकी सेवा, आदर-सत्कार करेंगे तो वह भगवान्की ही सेवा होगी। अगर किसी प्राणीका अनादर-तिरस्कार करेंगे तो वह भगवान्का ही अनादर-तिरस्कार होगा— “कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः0” (17। 6)। जैसे ज्ञानमार्गमें गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं (“गुणा गुणेषु वर्तन्ते”), ऐसे ही भक्तिमार्गमें भगवान्की वस्तुओंसे भगवान्का ही पूजन हो रहा है। परन्तु दोनोंमें बड़ा अन्तर है। “गुणा गुणेषु वर्तन्ते” में जड़ताकी मुख्यता है, जिसका ज्ञानमार्गी त्याग करता है; परन्तु “स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य” में चिन्मयताकी मुख्यता है, जिसका भक्तिमार्गी ग्रहण करता है। इसलिये भक्तिमार्गमें जड़ता मिट जाती है, संसार संसाररूपसे छिप जाता है और भगवत्स्वरूपसे प्रकट हो जाता है; क्योंकि वास्तवमें भगवान् ही हैं। साधक अगर जगत्को जगत्रूपसे देखे तो उसकी “सेवा” करे और भगवद्रूपसे देखे तो उसका “पूजन” करे। अपने लिये कुछ नहीं करे। मात्र कर्म अपने लिये करना बन्धन है, संसारके लिये करना सेवा है और भगवान्के लिये करना पूजन है। पुंसो भावयतोऽचिरात्। वियन्ति हि॥
विशेष बात
विशेष बात कर्मयोगमें कर्मोंके द्वारा जडतासे असंगता होती है और भक्तियोगमें संसारसे असंगतापूर्वक परमात्माके प्रति पूज्यभाव होनेसे परमात्माकी सम्मुखता रहती है। कर्मयोगी तो अपने पास शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि जो कुछ संसारका जड-अंश है, उसको स्वार्थ, अभिमान, कामनाका त्याग करके संसारकी सेवामें लगा देता है। इससे अपनी मानी हुई चीजोंसे अपनापन छूटकर उनसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, और जो स्वतः- स्वाभाविक असंगता है, वह प्रकट हो जाती है। भक्त अपने वर्णोचित स्वाभाविक कर्मों और समय-समयपर किये गये पारमार्थिक कर्मों-(जप, ध्यान आदि-) के द्वारा सम्पूर्ण संसारमें व्याप्त परमात्माका पूजन करता है। इन दोनोंमें भावकी भिन्नता होनेसे इतना ही अन्तर हुआ कि कर्मयोगीकी सम्पूर्ण क्रियाओंका प्रवाह सबको सुख पहुँचानेमें लग जाता है, तो क्रियाओंको करनेका वेग मिटकर स्वयंमें असंगता आ जाती है; और भक्तकी सम्पूर्ण क्रियाएँ परमात्माकी पूजन-सामग्री बन जानेसे जडतासे विमुखता होकर भगवान्की सम्मुखता आ जाती है और प्रेम बढ़ जाता है। बाहरसे भेद देखनेमें आता है; परन्तु वास्तवमें कोई भेद नहीं रहता। कर्मयोगी और ज्ञानयोगी—ये दोनों अन्तमें एक हो जाते हैं। जैसे, कर्मयोगी कर्मोंके द्वारा जडताका त्याग करता है अर्थात् सेवाके द्वारा उसकी सभी क्रियाएँ संसारके अर्पण हो जाती हैं और स्वयं असंग हो जाता है और ज्ञानयोगी विचारके द्वारा जडताका त्याग करता है अर्थात् विचारके द्वारा उसकी सभी क्रियाएँ प्रकृतिके अर्पण हो जाती हैं और स्वयं असंग हो जाता है। तात्पर्य है कि दोनोंके अर्पण करनेके प्रकारमें अन्तर है, पर असंगतामें दोनों एक हो जाते हैं*। इस असंगतामें कर्मयोगी और ज्ञानयोगी—दोनों स्वतन्त्र हो जाते हैं। उनके लिये किंचिन्मात्र भी कर्मोंका बन्धन नहीं रहता। केवल कर्तव्य-पालनके लिये ही कर्तव्य-कर्म करनेसे कर्मयोगीके सम्पूर्ण कर्म लीन हो जाते हैं (गीता—चौथे अध्यायका तेईसवाँ श्लोक), और ज्ञानरूप अग्निसे ज्ञानयोगीके सम्पूर्ण कर्म भस्म हो जाते हैं (गीता—चौथे अध्यायका सैंतीसवाँ श्लोक)। परन्तु इस स्वतन्त्रतामें भी जिसको संतोष नहीं होता अर्थात् स्वतन्त्रतासे जिसको उपरति हो जाती है, उसमें भगवत्कृपासे प्रेम प्रकट हो सकता है।
1-अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा। दानं प्रतिग्रहं चैव ब्राह्मणानामकल्पयत्॥ (मनु0 1। 88)
2-प्रजानां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च। विषयेष्वप्रसक्तिश्च क्षत्रियस्य समासतः॥ (मनु0 1। 89)
1-पशूनां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च। वणिक्पथं कुसीदं च वैश्यस्य कृषिमेव च॥ (मनु0 1। 90)
2-एकमेव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत्। एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषामनसूयया॥ (मनु0 1। 91)
3-युधि तुरगरजोविधूम्रविष्वक्कचलुलितश्रमवार्यलङ्कृतास्ये। मम निशितशरैर्विभिद्यमानत्वचि विलसत्कवचेऽस्तु कृष्ण आत्मा॥
(श्रीमद्भा0 1। 9। 34)
4-“ममता मल जरि जाइ” (मानस 7। 117 क)
* ऐसे तो संसारसे असंग होना कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—इन तीनों योगोंके साधकोंके लिये आवश्यक है।
गीतामें “संगं त्यक्त्वा” (5। 11) पदोंसे कर्मयोगीको, “मुक्तसंगः” (18। 26) पदसे ज्ञानयोगीको और “संगवर्जितः” (11। 55)
पदसे भक्तियोगीको संगरहित होनेके लिये कहा गया है।
(श्रीमद्भा0 11। 29। 15)
47श्रीभगवान्
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥ 47॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

स्वभावज (सहज) कर्मोंको निष्कामभावपूर्वक और पूजाबुद्धिसे करते हुए उसमें कोई कमी रह भी जाय, तो भी उसमें साधकको हताश नहीं होना चाहिये—इसको आगेके दो श्लोकोंमें बताते हैं।

पदच्छेद
श्लोकमें ढूँढ़नेके लिये हॉवर करें
व्याख्या
2 sections
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्- स्वनुष्ठितात्
यहाँ “स्वधर्म” शब्दसे वर्ण-धर्म ही मुख्यतासे लिया गया है। परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यवाला मनुष्य “स्व” को अर्थात् अपनेको जो मानता है, उसका धर्म (कर्तव्य) “स्वधर्म” है। जैसे कोई अपनेको मनुष्य मानता है, तो मनुष्यताका पालन करना उसके लिये स्वधर्म है। ऐसे ही कर्मोंके अनुसार अपनेको कोई विद्यार्थी या अध्यापक मानता है तो पढ़ना या पढ़ाना उसका स्वधर्म हो जायगा। कोई अपनेको साधक मानता है, तो साधन करना उसका स्वधर्म हो जायगा। कोई अपनेको भक्त, जिज्ञासु और सेवक मानता है तो भक्ति, जिज्ञासा और सेवा उसका स्वधर्म हो जायगा। इस प्रकार जिसकी जिस कार्यमें नियुक्ति हुई है और जिसने जिस कार्यको स्वीकार किया है, उसके लिये उस कार्यको सांगोपांग करना स्वधर्म है। ऐसे ही मनुष्य जन्म और कर्मके अनुसार अपनेको जिस वर्ण और आश्रमका मानता है, उसके लिये उसी वर्ण और आश्रमका धर्म स्वधर्म हो जायगा। ब्राह्मणवर्णमें उत्पन्न हुआ अपनेको ब्राह्मण मानता है तो यज्ञ कराना, दान लेना, पढ़ाना आदि जीविका-सम्बन्धी कर्म उसके लिये स्वधर्म हैं। क्षत्रियके लिये युद्ध करना, ईश्वरभाव आदि; वैश्यके लिये कृषि, गौरक्षा, व्यापार आदि और शूद्रके लिये सेवा—ये जीविका-सम्बन्धी कर्म स्वधर्म हैं। ऐसा अपना स्वधर्म अगर दूसरोंके धर्मकी अपेक्षा गुणरहित है अर्थात् अपने स्वधर्ममें गुणोंकी कमी है, उसका अनुष्ठान करनेमें कमी रहती है तथा उसको कठिनतासे किया जाता है; परन्तु दूसरेका धर्म गुणोंसे परिपूर्ण है, दूसरेके धर्मका अनुष्ठान स्वधर्मका पालन करना ही सर्वश्रेष्ठ है। शास्त्रने जिस वर्णके लिये जिन कर्मोंका विधान किया है, उस वर्णके लिये वे कर्म “स्वधर्म” हैं और उन्हीं कर्मोंका जिस वर्णके लिये निषेध किया है, उस वर्णके लिये वे कर्म “परधर्म” हैं। जैसे यज्ञ कराना, दान लेना आदि कर्म ब्राह्मणके लिये शास्त्रकी आज्ञा होनेसे स्वधर्म हैं; परन्तु वे ही कर्म क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रके लिये शास्त्रका निषेध होनेसे परधर्म हैं। परन्तु आपत्कालको लेकर शास्त्रोंने जीविका-सम्बन्धी जिन कर्मोंका निषेध नहीं किया है, वे कर्म सभी वर्णोंके लिये स्वधर्म हो जाते हैं। जैसे आपत्कालमें अर्थात् आपत्तिके समय वैश्यके खेती, व्यापार आदि जीविका- सम्बन्धी कर्म ब्राह्मणके लिये भी स्वधर्म हो जाते हैं*। ब्राह्मणके शम, दम आदि जितने भी स्वभावज कर्म हैं, वे सामान्य धर्म होनेसे चारों वर्णोंके लिये स्वधर्म हैं। कारण कि उनका पालन करनेके लिये सभीको शास्त्रकी आज्ञा है। उनका किसीके लिये भी निषेध नहीं है। मनुष्य-शरीर केवल परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है। इस दृष्टिसे मनुष्यमात्र साधक है। अतः दैवी-सम्पत्तिके जितने भी सद्गुण-सदाचार हैं, वे सभीके अपने होनेसे मनुष्यमात्रके लिये स्वधर्म हैं। परन्तु आसुरी-सम्पत्तिके जितने भी दुर्गुण-दुराचार हैं, वे मनुष्यमात्रके लिये न तो स्वधर्म हैं और न परधर्म ही हैं; वे तो सभीके लिये निषिद्ध हैं, त्याज्य हैं; क्योंकि वे अधर्म हैं। दैवी-सम्पत्तिके गुणोंको धारण करनेमें और आसुरी-सम्पत्तिके पाप-कर्मोंका त्याग करनेमें सभी स्वतन्त्र हैं, सभी सबल हैं, सभी अधिकारी हैं; कोई भी परतन्त्र, निर्बल तथा अनधिकारी नहीं है। हाँ, यह बात अलग है कि कोई सद्गुण किसीके स्वभावके अनुकूल पड़ता है और कोई सद्गुण किसीके स्वभावके अनुकूल पड़ता है। जैसे, किसीके स्वभावमें दया मुख्य होती है और किसीके स्वभावमें उपेक्षा मुख्य होती है, किसीका स्वभाव स्वतः क्षमा करनेका होता है और किसीका स्वभाव माँगनेपर क्षमा करनेका होता है, किसीके स्वभावमें उदारता स्वाभाविक होती है और किसीके स्वभावमें उदारता विचारपूर्वक होती है, आदि। ऐसा भेद रह सकता है।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्
शास्त्रोंमें विहित और निषिद्ध—दो तरहके वचन आते हैं। उनमें विहित कर्म करनेकी आज्ञा है और निषिद्ध कर्म करनेका निषेध है। उन विहित कर्मोंमें भी शास्त्रोंने जिस वर्ण, आश्रम, देश, काल, घटना, परिस्थिति, वस्तु, संयोग, वियोग आदिको लेकर अलग-अलग जो कर्म नियुक्त किये हैं, उस वर्ण, आश्रम आदिके लिये वे “नियत कर्म” कहलाते हैं। सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंको लेकर जो स्वभाव बनता है, उस स्वभावके अनुसार जो कर्म नियत किये जाते हैं, वे “स्वभावनियत कर्म” कहलाते हैं। उन्हींको स्वभावप्रभव, स्वभावज, स्वधर्म, स्वकर्म और सहज कर्म कहा है। तात्पर्य यह है कि जिस वर्ण, जातिमें जन्म लेनेसे पहले इस जीवके जैसे गुण और कर्म रहे हैं, उन्हीं गुणों और कर्मोंके अनुसार उस वर्णमें उसका जन्म हुआ है। कर्म तो करनेपर समाप्त हो जाते हैं, पर गुण-रूपसे उनके संस्कार रहते हैं। जन्म होनेपर उन गुणोंके अनुसार ही उसमें गुण और पालनीय आचरण स्वाभाविक ही उत्पन्न होते हैं अर्थात् उनको न तो कहींसे लाना पड़ता है और न उनके लिये परिश्रम ही करना पड़ता है। इसलिये उनको स्वभावज और स्वभावनियत कहा है। यद्यपि “सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः” (गीता 18। 48) के अनुसार कर्ममात्रमें दोष आता ही है, तथापि स्वभावके अनुसार शास्त्रने जिस वर्णके लिये जिन कर्मोंकी आज्ञा दी है, उन कर्मोंको अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके केवल दूसरोंके हितकी दृष्टिसे किया जाय, तो उस वर्णके व्यक्तिको उन कर्मोंका दोष (पाप) नहीं लगता। ऐसे ही जो केवल शरीर-निर्वाहके लिये कर्म करता है, उसको भी पाप नहीं लगता—“शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्” (गीता 4। 21)।
परिशिष्ट भाव
स्वधर्मरूप कर्मको करनेसे पाप बन तो सकता है, पर लग नहीं सकता—“कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्”। पाप लगनेमें मुख्य कारण भाव है, क्रिया नहीं। अतः पाप कर्मोंसे नहीं लगता, प्रत्युत स्वार्थ और अभिमान आनेसे लगता है।
विशेष बात
विशेष बात यहाँ एक बड़ी भारी शंका पैदा होती है कि एक आदमी कसाईके घर पैदा होता है तो उसके लिये कसाईका कर्म सहज (साथ ही पैदा हुआ) है, स्वाभाविक है। स्वभावनियत कर्म करता हुआ मनुष्य पापको नहीं प्राप्त होता, तो क्या कसाईके कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये? अगर उसको कसाईके कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये, तो फिर निषिद्ध आचरण कैसे छूटेगा? कल्याण कैसे होगा? इसका समाधान है कि स्वभावनियत कर्म वह होता है, जो विहित हो, किसी रीतिसे निषिद्ध नहीं हो अर्थात् उससे किसीका भी अहित न होता हो। जो कर्म किसीके लिये भी अहितकारक होते हैं, वे सहज कर्ममें नहीं लिये जाते। वे कर्म आसक्ति, कामनाके कारण पैदा होते हैं। निषिद्ध कर्म चाहे इस जन्ममें बना हो, चाहे पूर्वजन्ममें बना हो, है वह दोषवाला ही। दोष-भाग त्याज्य होता है; क्योंकि दोष आसुरी-सम्पत्ति है और गुण दैवी-सम्पत्ति है। पहले जन्मके संस्कारोंसे भी दुर्गुण-दुराचारोंमें रुचि हो सकती है, पर वह रुचि दुर्गुण-दुराचार करनेमें बाध्य नहीं करती। विवेक, सद्विचार, सत्संग, शास्त्र आदिके द्वारा उस रुचिको मिटाया जा सकता है। युक्तिसे भी देखा जाय तो कोई भी प्राणी अपना अहित नहीं चाहता, अपनी हत्या नहीं चाहता। अतः किसीका अहित करनेका, हत्या करनेका अधिकार किसीको भी नहीं है। मनुष्य अपने लिये अच्छा काम चाहता है तो उसे दूसरोंके लिये भी अच्छा काम करना चाहिये। शास्त्रोंमें भी देखा जाय तो यही बात है कि जिसमें दोष होते हैं, पाप होते हैं, अन्याय होते हैं, वे कर्म “वैकृत” हैं, “प्राकृत” नहीं हैं अर्थात् वे विकारसे पैदा हुए हैं, स्वभावसे नहीं। तीसरे अध्यायमें अर्जुनने पूछा कि मनुष्य न चाहता हुआ भी किससे प्रेरित होकर पाप-कर्म करता है? तो भगवान्ने कहा कि कामनाके वशमें होकर ही मनुष्य पाप करता है (तीसरे अध्यायका छत्तीसवाँ-सैंतीसवाँ श्लोक)। कामनाको लेकर, क्रोधको लेकर, स्वार्थ और अभिमानको लेकर जो कर्म किये जाते हैं, वे कर्म शुद्ध नहीं होते, अशुद्ध होते हैं। परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यसे जो कर्म किये जाते हैं, उन कर्मोंमें भिन्नता तो रहती है, पर वे दोषी नहीं होते। ब्राह्मणके घर जन्म होगा तो ब्राह्मणोचित कर्म होंगे, शूद्रके घर जन्म होगा तो शूद्रोचित कर्म होंगे, पर दोषी-भाग किसीमें भी नहीं होगा। दोषी-भाग सहज नहीं है, स्वभावनियत नहीं है। दोषयुक्त कर्म स्वाभाविक हो सकते हैं, पर स्वभावनियत नहीं हो सकते। एक ब्राह्मणको परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जाय तो प्राप्ति होनेके बाद भी वह वैसी ही पवित्रतासे भोजन बनायेगा; जैसी पवित्रतासे ब्राह्मणको रहना चाहिये, वैसी ही पवित्रतासे रहेगा। ऐसे ही एक अन्त्यजको परमात्माकी प्राप्ति हो जाय तो वह जूठन भी खा लेगा; जैसे पहले रहता था, वैसे ही रहेगा। परन्तु ब्राह्मण ऐसा नहीं करेगा; क्योंकि पवित्रतासे भोजन करना उसका स्वभावनियत कर्म है, जबकि अन्त्यजके लिये जूठन खाना दोषी नहीं बताया गया है। इसलिये सिद्ध महापुरुषोंमें एक- एकसे विचित्र कर्म होते हैं, पर वे दोषी नहीं होते। उनका स्वभाव राग-द्वेषसे रहित होनेके कारण शुद्ध होता है। पहलेके किसी पाप-कर्मसे कसाईके घर जन्म हो गया तो वह जन्म पापका फल भोगनेके लिये हुआ है, पाप करनेके लिये नहीं। पापका फल जाति, आयु और भोग बताया गया है, नया कर्म नहीं बताया गया—“सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः” (योगदर्शन 2। 13)। कर्म करनेमें वह स्वतन्त्र है। यदि उसका चित्त शुद्ध हो जाय तो वह कसाई आदिका कर्म कर नहीं सकेगा। एक सन्तसे किसीने कहा कि अगर कोई अपना धर्म पशुओंको मारना ही मानता है तो वह क्या करे? तो उन सन्तने बड़ी दृढ़तासे कहा कि यदि वह अपने धर्मके अनुसार ही लगातार तीन वर्षतक पवित्रतापूर्वक भगवान्के नामका, अपने इष्टके नामका जप करे, तो फिर वह मार नहीं सकेगा। कारण कि उसका पूर्वजन्मका अथवा यहाँका जो स्वभाव पड़ा हुआ है, वह स्वभाव दोषी है। यदि सच्चे हृदयसे ठीक परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति चाहेगा तो वह कसाईका काम नहीं कर सकेगा। उससे अपने-आप ग्लानि होगी, उपरति होगी। बिना कहे-सुने उसमें सद्गुण स्वाभाविक आयेंगे। रामचरितमानसमें शबरीके प्रसंगमें आता है—भगवान् रामने शबरीसे कहा—“नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं॥” (3। 35। 4) फिर नौ प्रकारकी भक्ति कहकर अन्तमें भगवान्ने कहा—“सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें” (3। 36। 4)। तात्पर्य यह है कि भक्ति नौ प्रकारकी होती है, इसका शबरीको पता ही नहीं है; परन्तु शबरीमें सब प्रकारकी भक्ति स्वाभाविक ही थी। सत्संग, भजन, ध्यान आदि करनेसे जिन गुणोंका हमें ज्ञान नहीं है, वे गुण भी आ जाते हैं। जो केवल दूसरोंको सुनानेके लिये याद करते हैं, वे दूसरोंको तो बता देंगे, पर आचरणमें वे गुण तभी आयेंगे, जब अपना स्वभाव शुद्ध करके परमात्माकी तरफ चलेंगे। इसलिये मनुष्यको अपना स्वभाव और अपने कर्म शुद्ध, निर्मल बनाने चाहिये। इसमें कोई परतन्त्र नहीं है, कोई निर्बल नहीं है, कोई अयोग्य नहीं है, कोई अपात्र नहीं है। मनुष्यके मनमें ऐसा आता है कि मैं कर्तव्यका पालन करनेमें और सद्गुणोंको लानेमें असमर्थ हूँ। परन्तु वास्तवमें वह असमर्थ नहीं है। सांसारिक भोगोंकी आदत और पदार्थोंके संग्रहकी रुचि होनेसे ही असमर्थताका अनुभव होता है। उद्धारके योग्य समझकर ही भगवान्ने मनुष्य-शरीर दिया है। इसलिये अपने स्वभावका सुधार करके अपना उद्धार करनेमें प्रत्येक मनुष्य स्वतन्त्र है, सबल है, योग्य है, समर्थ है। स्वभावका सुधार करना असम्भव तो है ही नहीं, कठिन भी नहीं है। मनुष्यको मुक्तिका द्वार कहा गया है— “साधन धाम मोच्छ कर द्वारा” (मानस 7। 43। 4)। यदि स्वभावका सुधार करना असम्भव होता तो इसे मुक्तिका द्वार कैसे कहा जा सकता? अगर मनुष्य अपने स्वभावका सुधार न कर सके, तो फिर मनुष्यजीवनकी सार्थकता क्या हुई?
* स्त्री-पुरुषोंमें भगवान्को देखनेके लिये इसलिये कहा है कि हम अधिकतर स्त्री-पुरुषोंमें ही गुण-दोष देखते हैं, जिससे
उनमें भगवद्भाव नहीं होता। अतः स्त्री-पुरुषोंमें गुण-दोष न देखकर केवल भगवान्को देखनेसे सम्पूर्ण प्राणियों और पदार्थोंमें
सुगमतासे भगवद्भाव हो जायगा।
* आपत्तिके समय ब्राह्मण क्षात्रवृत्तिसे निर्वाह कर सकता है और ज्यादा आपत्ति (आफत) आ जाय तो वैश्यवृत्ति भी
कर सकता है; परन्तु वैश्यवृत्तिमें फरक यह रहेगा कि ब्राह्मण खेती करे तो सुबह और शाम ठण्डे समय हल चलाये और
दो बैलोंका ही हल चलाये, एक बैलका नहीं। ऐसे ही व्यापार करे तो रस-कसका व्यापार न करे अर्थात् चीनी, शक्कर,
घी, तेल, नमक आदिका व्यापार न करे।
ऐसे ही आफतके समय क्षत्रिय वैश्यकी वृत्ति—गौरक्ष्य, कृषि और वाणिज्य कर सकता है और वैश्य शूद्रकी वृत्ति
भी कर सकता है।
48श्रीभगवान्
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥ 48॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
पदच्छेद
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व्याख्या
3 sections
[पूर्वश्लोकमें यह कहा गया कि स्वभावके अनुसार शास्त्रोंने जो कर्म नियत किये हैं, उन कर्मोंको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता। इससे सिद्ध होता है कि स्वभावनियत कर्मोंमें भी पाप-क्रिया होती है। अगर पाप-क्रिया न होती तो “पापको प्राप्त नहीं होता” यह कहना नहीं बनता। अतः यहाँ भगवान् कहते हैं कि “जो सहज कर्म हैं, उनमें कोई दोष भी आ जाय तो भी उनका त्याग नहीं करना चाहिये; क्योंकि सब-के-सब कर्म धुएँसे अग्निकी तरह दोषसे आवृत हैं।”]
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्
स्वभावनियत कर्म सहज-कर्म कहलाते हैं; जैसे—ब्राह्मणके शम, दम आदि; क्षत्रियके शौर्य, तेज आदि; वैश्यके कृषि, गौरक्ष्य आदि और शूद्रके सेवा-कर्म—ये सभी सहज-कर्म हैं। जन्मके बाद शास्त्रोंने पूर्वके गुण और कर्मोंके अनुसार जिस वर्णके लिये जिन कर्मोंकी आज्ञा दी है, वे शास्त्रनियत कर्म भी सहज-कर्म कहलाते हैं; जैसे—ब्राह्मणके लिये यज्ञ करना और कराना, पढ़ना और पढ़ाना आदि; क्षत्रियके लिये यज्ञ करना, दान करना आदि; वैश्यके लिये यज्ञ करना आदि; और शूद्रके लिये सेवा। सहज कर्ममें ये दोष हैं— (1) परमात्मा और परमात्माका अंश—ये दोनों ही “स्व” हैं तथा प्रकृति और प्रकृतिका कार्य शरीर आदि— ये दोनों ही “पर” हैं। परन्तु परमात्माका अंश स्वयं प्रकृतिके वश होकर परतन्त्र हो जाता है अर्थात् क्रियामात्र प्रकृतिमें होती है और उस क्रियाको यह अपनेमें मान लेता है तो परतन्त्र हो जाता है। यह प्रकृतिके परतन्त्र होना ही महान् दोष है। (2) प्रत्येक कर्ममें कुछ-न-कुछ आनुषंगिक अनिवार्य हिंसा आदि दोष होते ही हैं। (3) कोई भी कर्म किया जाय, वह कर्म किसीके अनुकूल और किसीके प्रतिकूल होता ही है। किसीके प्रतिकूल होना भी दोष है। (4) प्रमाद आदि दोषोंके कारण कर्मके करनेमें कमी रह जाना अथवा करनेकी विधिमें भूल हो जाना भी दोष है। अपने सहज-कर्ममें दोष भी हो, तो भी उसको नहीं छोड़ना चाहिये। इसका तात्पर्य है कि जैसे ब्राह्मणके कर्म जितने सौम्य हैं, उतने ब्राह्मणेतर वर्णोंके कर्म सौम्य नहीं हैं। परन्तु सौम्य न होनेपर भी वे कर्म दोषी नहीं माने जाते अर्थात् ब्राह्मणके सहज कर्मोंकी अपेक्षा क्षत्रिय, वैश्य कमीका दोष नहीं लगता और अनिवार्य हिंसा आदि भी नहीं लगते, प्रत्युत उनका पालन करनेसे लाभ होता है। कारण कि वे कर्म उनके स्वभावके अनुकूल होनेसे करनेमें सुगम हैं और शास्त्रविहित हैं। ब्राह्मणके लिये भिक्षा बतायी गयी है। देखनेमें भिक्षा निर्दोष दीखती है, पर उसमें भी दोष आ जाते हैं। जैसे किसी गृहस्थके घरपर कोई भिक्षुक खड़ा है और उसी समय दूसरा भिक्षुक वहाँ आ जाता है तो गृहस्थको भार लगता है। भिक्षुकोंमें परस्पर ईर्ष्या होनेकी सम्भावना रहती है। भिक्षा देनेवालेके घरमें पूरी तैयारी नहीं है तो उसको भी दुःख होता है। यदि कोई गृहस्थ भिक्षा देना नहीं चाहता और उसके घरपर भिक्षुक चला जाय तो उसको बड़ा कष्ट होता है। अगर वह भिक्षा देता है तो खर्चा होता है और नहीं देता है तो भिक्षुक निराश होकर चला जाता है। इससे उस गृहस्थको पाप लगता है और बेचारा उसमें फँस जाता है। इस प्रकार यद्यपि भिक्षामें भी दोष होते हैं, तथापि ब्राह्मणको उसे छोड़ना नहीं चाहिये। क्षत्रियके लिये न्याययुक्त युद्ध प्राप्त हो जाय तो उसको करनेसे क्षत्रियको पाप नहीं लगता। यद्यपि युद्धरूप कर्ममें दोष हैं; क्योंकि उसमें मनुष्योंको मारना पड़ता है, तथापि क्षत्रियके लिये सहज और शास्त्रविहित होनेसे दोष नहीं लगता। ऐसे ही वैश्यके लिये खेती करना बताया गया है। खेती करनेमें बहुत-से जन्तुओंकी हिंसा होती है। परन्तु वैश्यके लिये सहज और शास्त्रविहित होनेसे हिंसाका इतना दोष नहीं लगता। इसलिये सहज कर्मोंको छोड़ना नहीं चाहिये। सहज कर्मोंको करनेमें दोष (पाप) नहीं लगता—यह बात ठीक है; परन्तु इन साधारण सहज कर्मोंसे मुक्ति कैसे हो जायगी? वास्तवमें मुक्ति होनेमें सहज कर्म बाधक नहीं हैं। कामना, आसक्ति, स्वार्थ, अभिमान आदिसे ही बन्धन होता है और पाप भी इन कामना आदिके कारणसे ही होते हैं। इसलिये मनुष्यको निष्कामभावपूर्वक भगवत्प्रीत्यर्थ सहज कर्मोंको करना चाहिये, तभी बन्धन छूटेगा।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः
जितने भी कर्म हैं, वे सब-के-सब सदोष ही हैं; जैसे—आग सुलगायी जाय तो आरम्भमें धुआँ होता ही है। कर्म करनेमें देश, काल, घटना, परिस्थिति आदिकी परतन्त्रता और दूसरोंकी प्रतिकूलता भी दोष है, परन्तु स्वभावके अनुसार शास्त्रोंने आज्ञा दी है। उस आज्ञाके अनुसार निष्कामभावपूर्वक कर्म करता हुआ मनुष्य पापका भागी नहीं होता। इसीसे भगवान् अर्जुनसे मानो यह कह रहे हैं कि “भैया! तू जिस युद्धरूप क्रियाको घोर कर्म मान रहा है, वह तेरा धर्म है; क्योंकि न्यायसे प्राप्त हुए युद्धको करना क्षत्रियोंका धर्म है, इसके सिवाय क्षत्रियके लिये दूसरा कोई श्रेयका साधन नहीं है” (गीता—दूसरे अध्यायका इकतीसवाँ श्लोक)।
परिशिष्ट भाव
निषिद्ध कर्ममें आसक्ति होनेसे अथवा निषिद्ध रीतिसे भोग भोगनेके कारण ही विहित कर्म कठिन प्रतीत होता है। वास्तवमें विहित कर्म सहज स्वाभाविक है, इसमें परिश्रम नहीं है। इकतालीसवें श्लोकसे यहाँतक “स्वकर्म”, “स्वधर्म” और “सहजकर्म” शब्दोंका प्रयोग हुआ है। इससे सिद्ध होता है कि गीता स्वकर्म और सहजकर्मको ही “स्वधर्म” मानती है। विहित कर्म करनेमें दोष तो होता है, पर कामना, सुखबुद्धि, भोगबुद्धि न रहनेसे दोष लगता नहीं। तात्पर्य है कि दोष लगना या न लगना कर्ताकी नीयतपर निर्भर है; जैसे—डॉक्टरकी नीयत ठीक हो, पैसोंका उद्देश्य न होकर सेवाका उद्देश्य हो तो ऑपरेशनमें रोगीका अंग काटनेपर भी उसको दोष नहीं लगता, प्रत्युत निःस्वार्थभाव और हितकी दृष्टि होनेसे पुण्य होता है।
49श्रीभगवान्
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहःनैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति॥ 49॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

अब भगवान् सांख्ययोगका प्रकरण आरम्भ करते हुए पहले सांख्ययोगके अधिकारीका वर्णन करते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
5 sections
संन्यास-(सांख्य-) योगका अधिकारी होनेसे ही सिद्धि होती है। अतः उसका अधिकारी कैसा होना चाहिये— यह बतानेके लिये श्लोकके पूर्वार्द्धमें तीन बातें बतायी हैं— (1)
असक्तबुद्धिः सर्वत्र
जिसकी बुद्धि सब जगह आसक्तिरहित है अर्थात् देश, काल, घटना, परिस्थिति, वस्तु, व्यक्ति, क्रिया, पदार्थ आदि किसीमें भी जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती। (2)
जितात्मा
जिसने शरीरपर अधिकार कर लिया है अर्थात् जो आलस्य, प्रमाद आदिसे शरीरके वशीभूत नहीं होता, प्रत्युत इसको अपने वशीभूत रखता है। तात्पर्य है कि वह किसी कार्यको अपने सिद्धान्तपूर्वक करना चाहता है तो उस कार्यमें शरीर तत्परतासे लग जाता है और किसी क्रिया, घटना, आदिसे हटना चाहता है तो वह वहाँसे हट जाता है। इस प्रकार जिसने शरीरपर विजय कर ली है, वह “जितात्मा” कहलाता है। (3)
विगतस्पृहः
जीवन-धारणमात्रके लिये जिनकी विशेष जरूरत होती है, उन चीजोंकी सूक्ष्म इच्छाका नाम “स्पृहा” है; जैसे—साग-पत्ती कुछ मिल जाय, रूखी-सूखी जी सकते हैं! जल पीये बिना हम कैसे रह सकते हैं! ठण्डीके दिनोंमें कपड़े बिलकुल न हों तो हम कैसे जी सकते हैं! सांख्ययोगका साधक इन जीवन-निर्वाह- सम्बन्धी आवश्यकताओंकी भी परवाह नहीं करता। तात्पर्य यह हुआ कि सांख्ययोगमें चलनेवालेको जडताका त्याग करना पड़ता है। उस जडताका त्याग करनेमें उपर्युक्त तीन बातें आयी हैं। असक्तबुद्धि होनेसे वह जितात्मा हो जाता है और जितात्मा होनेसे वह विगतस्पृह हो जाता है, तब वह सांख्ययोगका अधिकारी हो जाता है।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति
ऐसा असक्तबुद्धि, जितात्मा और विगतस्पृह पुरुष सांख्ययोगके द्वारा परम नैष्कर्म्यसिद्धिको अर्थात् नैष्कर्म्यरूप परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो जाता है। कारण कि क्रियामात्र प्रकृतिमें होती है और जब स्वयंका उस क्रियाके साथ लेशमात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता, तब कोई भी क्रिया और उसका फल उसपर किंचिन्मात्र भी लागू नहीं होता। अतः उसमें जो स्वाभाविक, स्वतःसिद्ध निष्कर्मता—निर्लिप्तता है, वह प्रकट हो जाती है।
परिशिष्ट भाव
नैष्कर्म्यसिद्धिका अर्थ है—कर्म सर्वथा अकर्म हो जायँ, कर्मोंके साथ बिलकुल सम्बन्ध न रहे, कर्म होते हुए भी लिप्तता न हो—“कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः” (गीता 4। 18)। कर्मोंको न करना नैष्कर्म्य (निष्कर्मता) नहीं है (गीता—तीसरे अध्यायका चौथा श्लोक), प्रत्युत कर्म करना तो साधकके लिये आवश्यक है (गीता—छठे अध्यायका तीसरा श्लोक)। “असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः”—यह कर्मयोगकी सिद्धि है (गीता—दूसरे अध्यायका इकहत्तरवाँ श्लोक), जिसके होनेपर कर्मयोगी सांख्ययोगमें जाता है (गीता—पाँचवें अध्यायका छठाँ श्लोक) और सांख्ययोगसे नैष्कर्म्यसिद्धि प्राप्त करता है। इस प्रकार कर्मयोगसे तो “नैष्कर्म्यसिद्धि” होती है—“न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते” (गीता 3। 4), पर भक्तियोगसे “परम नैष्कर्म्यसिद्धि” होती है। कर्मयोग और ज्ञानयोग तो “निष्ठा” है— “लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा0” (3। 3), पर कर्मयोग-ज्ञानयोगकी “परा निष्ठा” भक्तिसे ही होगी—“निष्ठा ज्ञानस्य या परा” (18। 50)। तात्पर्य है कि “परम नैष्कर्म्यसिद्धि” और “परा निष्ठा”—दोनों भक्तिसे होती हैं।
50श्रीभगवान्
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मेसमासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा॥ 50॥
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अब उस परम सिद्धिको प्राप्त करनेकी विधि बतानेकी प्रतिज्ञा करते हैं।

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व्याख्या
2 sections
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे
यहाँ “सिद्धि” नाम अन्तःकरणकी शुद्धिका है, जिसका वर्णन पूर्वश्लोकमें आये “असक्तबुद्धिः”, “जितात्मा” और “विगतस्पृहः” पदोंसे हुआ है। जिसका अन्तःकरण इतना शुद्ध हो गया है कि उसमें किंचिन्मात्र भी किसी प्रकारकी कामना, ममता और आसक्ति नहीं रही, उसके लिये कभी किंचिन्मात्र भी किसी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति आदिकी जरूरत नहीं पड़ती अर्थात् उसके लिये कुछ भी प्राप्त करना बाकी नहीं रहता। इसलिये इसको सिद्धि कहा है। लोकमें तो ऐसा कहा जाता है कि मनचाही चीज मिल गयी तो सिद्धि हो गयी, अणिमादि सिद्धियाँ मिल गयीं तो सिद्धि हो गयी। पर वास्तवमें यह सिद्धि नहीं है; क्योंकि इसमें पराधीनता होती है, किसी बातकी कमी रहती है और किसी वस्तु, परिस्थिति आदिकी जरूरत पड़ती है। अतः जिस सिद्धिमें किंचिन्मात्र भी कामना पैदा न हो, वही वास्तवमें सिद्धि है। जिस सिद्धिके मिलनेपर कामना बढ़ती रहे, वह सिद्धि वास्तवमें सिद्धि नहीं है, प्रत्युत एक बन्धन ही है। अन्तःकरणकी शुद्धिरूप सिद्धिको प्राप्त हुआ साधक ही ब्रह्मको प्राप्त होता है। वह जिस क्रमसे ब्रह्मको प्राप्त होता है, उसको मुझसे समझ—“निबोध मे।” कारण कि सांख्ययोगकी जो सार-सार बातें हैं, वे सांख्ययोगीके लिये अत्यन्त आवश्यक हैं और उन बातोंको समझनेकी बहुत जरूरत है। “निबोध” पदका तात्पर्य है कि सांख्ययोगमें क्रिया और सामग्रीकी प्रधानता नहीं है। किन्तु उस तत्त्वको समझनेकी प्रधानता है। इसी अध्यायके तेरहवें श्लोकमें भी सांख्ययोगीके विषयमें “निबोध” पद आया है।
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा
सांख्ययोगीकी जो आखिरी स्थिति है, जिससे बढ़कर साधककी कोई स्थिति नहीं हो सकती, वही ज्ञानकी परा निष्ठा कही जाती है। उस परा निष्ठाको अर्थात् ब्रह्मको सांख्ययोगका साधक जिस प्रकारसे प्राप्त होता है, उसको मैं संक्षेपसे कहूँगा अर्थात् उसकी सार-सार बातें कहूँगा।
परिशिष्ट भाव
यहाँ “सिद्धिम्” पदका अर्थ है—साधनरूप कर्मयोगसे होनेवाली अन्तःकरणकी पूर्ण शुद्धि, जिसकी प्राप्तिके बाद कर्मयोगी ज्ञानयोगमें अथवा भक्तियोगमें कहीं भी जा सकता है— तावत् कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता। मत्कथाश्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्न जायते॥ “तभीतक कर्म करना चाहिये, जबतक भोगोंसे वैराग्य न हो जाय अथवा जबतक मेरी लीला-कथाके श्रवण- कीर्तन आदिमें श्रद्धा न हो जाय।” अगर कर्मयोगीके भीतर ज्ञानके संस्कार हैं तो वह ज्ञानमें चला जायगा और अगर भक्तिके संस्कार हैं तो वह भक्तिमें चला जायगा। अगर किसी एकका आग्रह न हो तो कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनों “साधन” रूपसे भी हैं और “साध्य” रूपसे भी हैं। साधनरूपसे तो तीनों अलग-अलग हैं, पर साध्यरूपसे तीनों एक ही हैं। इसलिये गीतामें कहीं तो भगवान्ने भक्तिके द्वारा ज्ञानकी प्राप्ति अर्थात् साधन-भक्तिसे साध्य-ज्ञानकी प्राप्ति बतायी है—“मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी” (13। 10), “मां च योऽव्यभिचारेण.......ब्रह्मभूयाय कल्पते” (14। 26), और कहीं ज्ञानसे भक्तिकी प्राप्ति अर्थात् साधन-ज्ञानसे साध्य-भक्तिकी प्राप्ति बतायी है—“सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र......सर्वभूतहिते रताः” (12। 4), “ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा......मद्भक्तिं लभते पराम्” (18। 54)। भगवान्ने पहले “स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः” (18। 46)—इन पदोंसे कर्मयोगके द्वारा भक्तिकी सिद्धि बतायी और यहाँ “सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म” पदोंसे कर्मयोगके द्वारा ज्ञानयोगकी सिद्धि बताते हैं। पाँचवें अध्यायमें भी साधनरूप कर्मयोगसे ज्ञानयोगकी शीघ्र सिद्धि बतायी है—“योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति” (5। 6)।
(श्रीमद्भा0 11। 20। 9)
51–53श्रीभगवान्Merged
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य ॥ 51॥ विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः। ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥ 52॥ अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥ 53॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
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ज्ञानकी परा निष्ठा प्राप्त करनेके लिये किस साधन-सामग्रीकी आवश्यकता है, उसको आगेके तीन श्लोकोंमें बताते हैं।

पदच्छेद
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14 sections
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तः
जो सांख्ययोगी साधक परमात्मतत्त्वको प्राप्त करना चाहता है, उसकी बुद्धि विशुद्ध अर्थात् सात्त्विकी (गीता—इसी अध्यायका तीसवाँ श्लोक) हो। उसकी बुद्धिका विवेक साफ-साफ हो, उसमें किंचिन्मात्र भी सन्देह न हो। इस सांख्ययोगके प्रकरणमें सबसे पहले बुद्धिका नाम आया है। इसका तात्पर्य है कि सांख्ययोगीके लिये जिस विवेककी आवश्यकता है, वह विवेक बुद्धिमें ही प्रकट होता है। उस विवेकसे वह जडताका त्याग करता है।
वैराग्यं समुपाश्रितः
जैसे संसारीलोग रागपूर्वक वस्तु, व्यक्ति आदिके आश्रित रहते हैं, उनको अपना आश्रय, सहारा मानते हैं, ऐसे ही सांख्ययोगका साधक वैराग्यके आश्रित रहता है अर्थात् जनसमुदाय, स्थान आदिसे उसकी स्वाभाविक ही निर्लिप्तता बनी रहती है। लौकिक और पारलौकिक सम्पूर्ण भोगोंसे उसका दृढ़ वैराग्य होता है।
विविक्तसेवी
सांख्ययोगके साधकका स्वभाव, उसकी रुचि स्वतः-स्वाभाविक एकान्तमें रहनेकी होती है। एकान्त- सेवनकी रुचि होनी तो बढि़या है, पर उसका आग्रह नहीं होना चाहिये अर्थात् एकान्त न मिलनेपर मनमें विक्षेप, हलचल नहीं होनी चाहिये। आग्रह न होनेसे रुचि होनेपर भी एकान्त न मिले, प्रत्युत समुदाय मिले, खूब हल्ला- गुल्ला हो, तो भी साधक उकतायेगा नहीं अर्थात् सिद्धि- असिद्धिमें सम रहेगा। परन्तु आग्रह होगा तो वह उकता जायगा, उससे समुदाय सहा नहीं जायगा। अतः साधकका स्वभाव तो एकान्तमें रहनेका ही होना चाहिये, पर एकान्त न मिले तो उसके अन्तःकरणमें हलचल नहीं होनी चाहिये। कारण कि हलचल होनेसे अन्तःकरणमें संसारकी महत्ता आती है और संसारकी महत्ता आनेपर हलचल होती है, जो कि ध्यानयोगमें बाधक है।
एकान्तमें रहनेसे साधन अधिक होगा, मन भगवान्में अच्छी तरह लगेगा; अन्तःकरण निर्मल बनेगा
इन बातोंको लेकर मनमें जो प्रसन्नता होती है, वह साधनमें सहायक होती है। परन्तु “एकान्तमें हल्ला-गुल्ला करनेवाला कोई नहीं होगा; अतः वहाँ नींद अच्छी आयेगी, वहाँ किसी भी प्रकारसे बैठ जायँ तो कोई देखनेवाला नहीं होगा, वहाँ सब प्रकारसे आराम रहेगा, एकान्तमें रहनेसे लोग भी ज्यादा मान-बड़ाई, आदर करेंगे”—इन बातोंको लेकर मनमें जो प्रसन्नता होती साधकको इन सुख- सुविधाओंमें फँसना नहीं चाहिये, प्रत्युत इनसे सदा सावधान रहना चाहिये।
लघ्वाशी
साधकका स्वभाव स्वल्प अर्थात् नियमित और सात्त्विक भोजन करनेका हो। भोजनके विषयमें हित, मित और मेध्य—ये तीन बातें बतायी गयी हैं। “हित” का तात्पर्य है —भोजन शरीरके अनुकूल हो। “मित” का तात्पर्य है—भोजन न तो अधिक करे और न कम करे, प्रत्युत जितने भोजनसे शरीर-निर्वाह हो जाय, उतना भोजन करे (गीता—छठे अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)। भोजनसे शरीर पुष्ट हो जायगा— ऐसे भावसे भोजन न करे, प्रत्युत केवल औषधकी तरह क्षुधा-निवृत्तिके लिये ही भोजन करे, जिससे साधनमें विघ्न न पड़े। “मेध्य” का तात्पर्य है— भोजन पवित्र हो।
धृत्यात्मानं नियम्य च
सांसारिक कितने ही प्रलोभन सामने आनेपर भी बुद्धिको अपने ध्येय परमात्मतत्त्वसे विचलित न होने देना—ऐसी दृढ़ सात्त्विकी धृति (गीता— इसी अध्यायका तैंतीसवाँ श्लोक)-के द्वारा इन्द्रियोंका नियमन करे अर्थात् उनको मर्यादामें रखे। आठों पहर यह जागृति रहे कि इन्द्रियोंके द्वारा साधनके विरुद्ध कोई भी चेष्टा न हो।
यतवाक्कायमानसः
शरीर, वाणी और मनको संयत (वशमें) करना भी साधकके लिये बहुत जरूरी है (गीता—सत्रहवें अध्यायका चौदहवाँ, पंद्रहवाँ और सोलहवाँ श्लोक)। अतः वह शरीरसे वृथा न घूमे, देखने-सुननेके शौकसे कोई यात्रा न करे। वाणीसे वृथा बातचीत न करे, आवश्यक होनेपर ही बोले, असत्य न बोले, निन्दा-चुगली न करे। मनसे रागपूर्वक संसारका चिन्तन न करे, प्रत्युत परमात्माका चिन्तन करे।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा
ध्यानके समय बाहरके जितने सम्बन्ध हैं, जो कि विषयरूपसे आते हैं और जिनसे संयोगजन्य सुख होता है, उन शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—पाँचों विषयोंका स्वरूपसे ही त्याग कर देना चाहिये। कारण कि विषयोंका रागपूर्वक सेवन करनेवाला ध्यानयोगका साधन नहीं कर सकता। अगर विषयोंका रागपूर्वक सेवन करेगा तो ध्यानमें वृत्तियाँ (बहिर्मुख होनेसे) नहीं लगेंगी और विषयोंका चिन्तन होगा।
रागद्वेषौ व्युदस्य च
सांसारिक वस्तु महत्त्वशाली है, अपने काममें आनेवाली है, उपयोगी है—ऐसा जो भाव है, उसका नाम “राग” है। तात्पर्य है कि अन्तःकरणमें असत् वस्तुका जो रंग चढ़ा हुआ है, वह “राग” है। असत् वस्तु आदिमें राग रहते हुए कोई उनकी प्राप्तिमें बाधा डालता है, उसके प्रति द्वेष हो जाता है। असत् संसारके किसी अंशमें राग हो जाय तो दूसरे अंशमें द्वेष हो जाता है—यह नियम है। जैसे, शरीरमें राग हो जाय तो शरीरके अनुकूल वस्तुमात्रमें राग हो जाता है और प्रतिकूल वस्तुमात्रमें द्वेष हो जाता है। संसारके साथ रागसे भी सम्बन्ध जुड़ता है और द्वेषसे भी सम्बन्ध जुड़ता है। रागवाली बातका भी चिन्तन होता है और द्वेषवाली बातका भी चिन्तन होता है। इसलिये साधक न राग करे और न द्वेष करे।
ध्यानयोगपरो नित्यम्
साधक नित्य ही ध्यानयोगके परायण रहे अर्थात् ध्यानके सिवाय दूसरा कोई साधन न करे। ध्यानके समय तो ध्यान करे ही, व्यवहारके समय अर्थात् चलते-फिरते, खाते-पीते, काम-धंधा करते समय भी यह ध्यान (भाव) सदा बना रहे कि वास्तवमें एक परमात्माके सिवाय संसारकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं (गीता—इसी अध्यायका बीसवाँ श्लोक)।
अहंकारं बलं दर्पं ...... विमुच्य
गुणोंको लेकर अपनेमें जो एक विशेषता दीखती है, उसे “अहंकार” कहते हैं। जबर्दस्ती करके, विशेषतासे मनमानी करनेका जो आग्रह (हठ) होता है, उसे “बल” कहते हैं। जमीन- जायदाद आदि बाह्य चीजोंकी विशेषताको लेकर जो घमंड होता है, उसे “दर्प” कहते हैं। भोग, पदार्थ तथा अनुकूल परिस्थिति मिल जाय, इस इच्छाका नाम “काम” है। अपने स्वार्थ और अभिमानमें ठेस लगनेपर दूसरोंका अनिष्ट करनेके लिये जो जलनात्मक वृत्ति पैदा होती है, उसको “क्रोध” कहते हैं। भोग-बुद्धिसे, सुख-आरामबुद्धिसे चीजोंका जो संग्रह किया जाता है, उसे “परिग्रह”1 कहते हैं। साधक उपर्युक्त अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रह—इन सबका त्याग कर देता है।
निर्ममः
अपने पास निर्वाहमात्रकी जो वस्तुएँ हैं और कर्म करनेके शरीर, इन्द्रियाँ आदि जो साधन हैं, उनमें ममता अर्थात् अपनापन न हो2। अपना शरीर, वस्तु आदि जो हमें प्रिय लगते हैं, उनके बने रहनेकी इच्छा न होना “निर्मम” होना है। जिन व्यक्तियों और वस्तुओंको हम अपनी मानते हैं, वे आजसे सौ वर्ष पहले भी अपनी नहीं थीं और सौ वर्षके बाद भी अपनी नहीं रहेंगी। अतः जो अपनी नहीं रहेंगी, उनका उपयोग या सेवा तो कर सकते हैं, पर उनको अपनी मानकर अपने पास नहीं रख सकते। अगर उनको अपने पास नहीं रख सकते तो “वे अपने नहीं हैं” ऐसा माननेमें क्या बाधा है? उनको अपनी न माननेसे साधक निर्मम हो जाता है।
शान्तः
असत् संसारके साथ सम्बन्ध रखनेसे ही अन्तःकरणमें अशान्ति, हलचल आदि पैदा होते हैं। जडतासे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर अशान्ति कभी पासमें आती ही नहीं। फिर राग-द्वेष न रहनेसे साधक हरदम शान्त रहता है।
ब्रह्मभूयाय कल्पते
ममतारहित और शान्त मनुष्य (सांख्ययोगका साधक) परमात्मप्राप्तिका अधिकारी बन जाता है अर्थात् असत्का सर्वथा सम्बन्ध छूटते ही उसमें ब्रह्मप्राप्तिकी योग्यता, सामर्थ्य आ जाती है। कारण कि जबतक असत् पदार्थोंके साथ सम्बन्ध रहता है, तबतक परमात्मप्राप्तिकी सामर्थ्य नहीं आती।
= (जो) विशुद्ध (सात्त्विकी)
54श्रीभगवान्
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा शोचति काङ्क्षतिसमः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥ 54॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

उपर्युक्त साधन-सामग्रीसे निष्ठा प्राप्त हो जानेपर क्या होता है—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
5 sections
ब्रह्मभूतः
जब अन्तःकरणमें विनाश- शील वस्तुओंका महत्त्व मिट जाता है, तब अन्तःकरणकी अहंकार, घमंड आदि वृत्तियाँ शान्त हो जाती हैं अर्थात् उनका त्याग हो जाता है। फिर अपने पास जो वस्तुएँ हैं, उनमें भी ममता नहीं रहती। ममता न रहनेसे सुख और भोग-बुद्धिसे वस्तुओंका संग्रह नहीं होता। जब सुख और भोग-बुद्धि मिट जाती है, तब अन्तःकरणमें स्वतः- स्वाभाविक ही शान्ति आ जाती है। इस प्रकार साधक जब असत्से ऊपर उठ जाता है, तब वह ब्रह्मप्राप्तिका पात्र बन जाता है। पात्र बननेपर उसकी ब्रह्मभूत-अवस्था अपने-आप हो जाती है। इसके लिये उसको कुछ करना नहीं पड़ता। इस अवस्थामें “मैं ब्रह्मस्वरूप हूँ और ब्रह्म मेरा स्वरूप है” ऐसा उसको अपनी दृष्टिसे अनुभव हो जाता है। इसी अवस्थाको यहाँ (और गीता—पाँचवें अध्यायके चौबीसवें श्लोकमें भी) “ब्रह्मभूतः” पदसे कहा गया है।
प्रसन्नात्मा
जब अन्तःकरणमें असत् वस्तुओंका महत्त्व हो जाता है, तब उन वस्तुओंको प्राप्त करनेकी कामना पैदा हो जाती है। कामना पैदा होते ही अन्तःकरणकी शान्ति भंग हो जाती है और अशान्ति (हलचल) पैदा हो जाती है। परन्तु जब असत् वस्तुओंका महत्त्व मिट जाता है, तब साधकके चित्तमें स्वाभाविक ही प्रसन्नता रहती है। अप्रसन्नताका कारण मिट जानेसे फिर कभी अप्रसन्नता होती ही नहीं। कारण कि सांख्ययोगी साधकके अन्तःकरणमें अपनेसहित संसारका अभाव और परमात्मतत्त्वका भाव अटल रहता है।
न शोचति न काङ्क्षति
उस प्रसन्नताकी पहचान यह है कि वह शोक-चिन्ता नहीं करता। सांसारिक कितनी ही बड़ी हानि हो जाय, तो भी वह शोक नहीं करता और अमुक परिस्थिति प्राप्त हो जाय—ऐसी इच्छा भी नहीं करता। तात्पर्य है कि उत्पन्न और नष्ट होनेवाली तथा आने- जानेवाली परिवर्तनशील परिस्थिति, वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ आदिके बनने-बिगड़नेसे उसपर कोई असर ही नहीं पड़ता। जो परमात्मामें अटलरूपसे स्थित है, उसपर आने- जानेवाली परिस्थितियोंका असर हो ही कैसे सकता है?
समः सर्वेषु भूतेषु
जबतक साधकमें किंचिन्मात्र भी हर्ष-शोक, राग-द्वेष आदि द्वन्द्व रहते हैं, तबतक वह सर्वत्र व्याप्त परमात्माके साथ अभिन्नताका अनुभव नहीं कर सकता। अभिन्नताका अनुभव न होनेसे वह अपनेको सम्पूर्ण भूतोंमें सम नहीं देख सकता। परन्तु जब साधक हर्ष-शोकादि द्वन्द्वोंसे सर्वथा रहित हो जाता है, तब परमात्माके साथ स्वतः-स्वाभाविक अभिन्नता (जो कि सदासे ही थी)-का अनुभव हो जाता है। परमात्माके साथ अभिन्नता होनेसे, अपना कोई व्यक्तित्व* न रहनेसे अर्थात् “मैं हूँ” इस रूपसे अपनी कोई अलग सत्ता न रहनेसे वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें सम हो जाता है। जैसे परमात्मा सम्पूर्ण प्राणियोंमें सम है—“समोऽहं सर्वभूतेषु” (गीता—नवें अध्यायका उनतीसवाँ श्लोक), ऐसे ही वह भी सम्पूर्ण प्राणियोंमें सम हो जाता है। वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें सम किस प्रकार होता है? जैसे—मनोराज्य और स्वप्नमें जो नाना सृष्टि होती है, उसमें मन ही अनेक रूप धारण करता है अर्थात् वह सृष्टि मनोमयी होती है। मनोमयी होनेसे जैसे सब सृष्टिमें मन है और मनमें सब सृष्टि है, ऐसे ही सब प्राणियोंमें (आत्मरूपसे) वह है और उसमें सम्पूर्ण प्राणी हैं (गीता— छठे अध्यायका उनतीसवाँ श्लोक)। इसीको यहाँ “समः सर्वेषु भूतेषु” कहा है।
मद्भक्तिं लभते पराम्
जब समरूप परमात्माके साथ अभिन्नताका अनुभव होनेसे साधकका सर्वत्र समभाव हो जाता है, तब उसका परमात्मामें प्रतिक्षण वर्धमान एक विलक्षण आकर्षण, खिं चाव, अनुराग हो जाता है। उसीको यहाँ पराभक्ति कहा है। पाँचवें अध्यायके चौबीसवें श्लोकमें जैसे ब्रह्मभूत- अवस्थाके बाद ब्रह्मनिर्वाणकी प्राप्ति बतायी है—“स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति”, ऐसे ही यहाँ ब्रह्मभूत- अवस्थाके बाद पराभक्तिकी प्राप्ति बतायी है।
परिशिष्ट भाव
ज्ञानयोगके जिस साधकमें भक्तिके संस्कार होते हैं, जो अपने मतका आग्रह नहीं रखता, मुक्ति अर्थात् संसारसे सम्बन्ध-विच्छेदको ही सर्वोपरि नहीं मानता और भक्तिका खण्डन, निन्दा नहीं करता, उसको मुक्तिमें सन्तोष नहीं होता। अतः उसको मुक्ति प्राप्त होनेके बाद भक्ति (प्रेम)-की प्राप्ति हो जाती है। जो अपनी दृष्टिसे अर्थात् अपनी मान्यतासे ब्रह्मरूप बना हुआ है, ब्रह्म हुआ नहीं है, उसके लिये यहाँ “ब्रह्मभूतः” पद आया है। ब्रह्मभूत होनेके बाद जीवका ब्रह्मके साथ तात्त्विक सम्बन्ध (साधर्म्य) हो जाता है—“मम साधर्म्यमागताः” (गीता 14। 2)। तात्त्विक सम्बन्ध होना ही मुक्ति है। फिर सर्वत्र परिपूर्ण अनन्तब्रह्माण्डनायक परमात्मामें अपने- आपको विलीन (समर्पित) कर देनेसे परमात्माके साथ आत्मीय सम्बन्ध (अभिन्नता) हो जाता है—“ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्” (गीता 7। 18)। आत्मीय सम्बन्ध होना ही पराभक्ति (प्रेम)-की प्राप्ति है। ज्ञानमार्गमें जड़ताका त्याग मुख्य है। जड़ताका त्याग विवेकसाध्य है। विवेकपूर्वक जड़ताका त्याग करनेपर त्याज्य वस्तुका संस्कार शेष रह सकता है, जिससे दार्शनिक मतभेद पैदा होते हैं। परन्तु प्रेमकी प्राप्ति होनेपर त्याज्य वस्तुका संस्कार नहीं रहता; क्योंकि भक्त त्याग नहीं करता, प्रत्युत सबको भगवान्का स्वरूप मानता है—“सदसच्चाहम्” (गीता 9। 19)। प्रेमकी प्राप्ति विवेकसाध्य नहीं है, प्रत्युत विश्वाससाध्य है। विश्वासमें केवल भगवत्कृपापर ही भरोसा है। इसलिये जिसके भीतर भक्तिके संस्कार होते हैं, उसको भगवत्कृपा मुक्तिमें सन्तुष्ट नहीं होने देती, प्रत्युत मुक्तिके रस (अखण्डरस)-को फीका करके प्रेमका रस (अनन्तरस) प्रदान कर देती है। संसारके सम्बन्धसे अशान्ति होती है, इसलिये कर्मयोगमें संसारसे सम्बन्ध छूटनेपर “शान्त आनन्द” मिलता है। ज्ञानयोगमें निजस्वरूपमें स्थिति होनेसे निजानन्द अर्थात् “अखण्ड आनन्द” मिलता है। भक्तियोगमें भगवान्से अभिन्नता होनेपर परमानन्द अर्थात् “अनन्त आनन्द” (प्रतिक्षण वर्धमान प्रेम) मिलता है।
1-ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासी—इन सबके लिये तो स्वरूपसे ही परिग्रह-(संग्रह-) का त्याग है। अगर गृहस्थमें
भी कोई सुख-भोगबुद्धिसे संग्रह न करे, केवल दूसरोंकी सेवा, हितके लिये ही संग्रह करे तो वह भी परिग्रह नहीं है।
2-केवल सांसारिक व्यवहारके लिये वस्तुओंमें अपनापन करना दोषी नहीं है, प्रत्युत उनको सदाके लिये अपना मान लेना
दोषी है।
* व्यक्तित्व उसे कहते हैं, जिसमें मनुष्य अपनी सत्ता अलग मानता है और जिससे बन्धन होता है।
55श्रीभगवान्
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्ास्मि तत्त्वतःततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥ 55॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

अब आगेके श्लोकमें पराभक्तिका फल बताते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
6 sections
भक्त्या मामभिजानाति
जब परमात्म- तत्त्वमें आकर्षण, अनुराग हो जाता है, तब साधक स्वयं उस परमात्माके सर्वथा समर्पित हो जाता है, उस तत्त्वसे अभिन्न हो जाता है। फिर उसका अलग कोई (स्वतन्त्र) अस्तित्व नहीं रहता अर्थात् उसके अहंभावका अतिसूक्ष्म अंश भी नहीं रहता। इसलिये उसको प्रेमस्वरूपा प्रेमाभक्ति प्राप्त हो जाती है। उस भक्तिसे परमात्मतत्त्वका वास्तविक बोध हो जाता है। ब्रह्मभूत-अवस्था हो जानेपर संसारके सम्बन्धका तो सर्वथा त्याग हो जाता है, पर “मैं ब्रह्म हूँ, मैं शान्त हूँ, मैं निर्विकार हूँ”, ऐसा सूक्ष्म अहंभाव रह जाता है। यह अहंभाव जबतक रहता है, तबतक परिच्छिन्नता और पराधीनता रहती है। कारण कि यह अहंभाव प्रकृतिका कार्य है और प्रकृति “पर” है; इसलिये पराधीनता रहती है। परमात्माकी तरफ आकृष्ट होनेसे, पराभक्ति होनेसे ही यह अहंभाव मिटता है*। इस अहंभावके सर्वथा मिटनेसे ही तत्त्वका वास्तविक बोध होता है।
यावान्
सातवें अध्यायके आरम्भमें भगवान्ने अर्जुनको
समग्र
रूप सुननेकी आज्ञा दी कि मेरेमें जिसका मन आसक्त हो गया है, जिसको मेरा ही आश्रय है, वह अनन्यभावसे मेरे साथ दृढ़तापूर्वक सम्बन्ध रखते हुए मेरे जिस समग्ररूपको जान लेता है, उसको तुम सुनो। यही बात भगवान्ने सातवें अध्यायके अन्तमें कही कि जरा-मरणसे मुक्ति पानेके लिये जो मेरा आश्रय लेकर यत्न करते हैं, वे ब्रह्म, सम्पूर्ण अध्यात्म और सम्पूर्ण कर्मको अर्थात् सम्पूर्ण निर्गुण-विषयको जान लेते हैं और अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञके सहित मुझको अर्थात् सम्पूर्ण सगुण-विषयको जान लेते हैं। इस प्रकार निर्गुण और सगुणके सिवाय राम, कृष्ण, शिव, गणेश, शक्ति, सूर्य आदि अनेक रूपोंमें प्रकट होकर परमात्मा लीला करते हैं, उनको भी जान लेना—यही पराभक्तिसे “यावान्” अर्थात् समग्ररूपको जानना है।
यश्चास्मि तत्त्वतः
वे ही परमात्मा अनेक रूपोंमें, अनेक आकृतियोंमें, अनेक शक्तियोंको साथ लेकर, अनेक कार्य करनेके लिये बार-बार प्रकट होते हैं, और वे ही परमात्मा अनेक सम्प्रदायोंमें अपनी-अपनी भावनाके अनुसार अनेक इष्टदेवोंके रूपमें कहे जाते हैं। वास्तवमें परमात्मा एक ही हैं। इस प्रकार मैं जो हूँ—इसे तत्त्वसे जान लेता है।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्
ऐसा मुझे तत्त्वसे जानकर तत्काल1 मेरेमें प्रविष्ट हो जाता है अर्थात् मेरे साथ भिन्नताका जो भाव था, वह सर्वथा मिट जाता है। तत्त्वसे जाननेपर उसमें जो अनजानपना था, वह सर्वथा मिट जाता है और वह उस तत्त्वमें प्रविष्ट हो जाता है। यही पूर्णता है और इसीमें मनुष्यजन्मकी सार्थकता है। स्वतः है। परन्तु जब यह जीव प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है, तब वह परमात्मासे विमुख हो जाता है और उसका संसारमें आकर्षण हो जाता है। यह आकर्षण ही वासना, स्पृहा, कामना, आशा, तृष्णा आदि नामोंसे कहा जाता है। इस वासना आदिका जो विषय (प्रकृतिजन्य पदार्थ) है, वह क्षणभंगुर और परिवर्तनशील है तथा यह जीवात्मा स्वयं, नित्य और अपरिवर्तनशील है। परन्तु ऐसा होते हुए भी प्रकृतिके साथ तादात्म्य होनेसे यह परिवर्तनशीलमें आकृष्ट हो जाता है। इससे इसको मिलता तो कुछ नहीं, पर
कुछ मिलेगा
इस भ्रम, वासनाके कारण यह जन्म- मरणके चक्करमें पड़ा हुआ महान् दुःख पाता रहता है। इससे छूटनेके लिये भगवान्ने योग बताया है। वह योग जडतासे सम्बन्ध-विच्छेद करके परमात्माके साथ नित्ययोगका अनुभव करा देता है। गीतामें मुख्यरूपसे तीन योग कहे हैं—कर्मयोग, ज्ञान- योग और भक्तियोग। इन तीनोंपर विचार किया जाय तो भगवान्का प्रेम तीनों ही योगोंमें है। कर्मयोगमें उसको “कर्तव्यरति” कहते हैं अर्थात् वह रति कर्तव्यमें होती है— “स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः” (18। 45)। [कर्मयोगकी यह रति अन्तमें आत्मरतिमें परिणत हो जाती है (गीता—दूसरे अध्यायका पचपनवाँ और तीसरे अध्यायका सत्रहवाँ श्लोक) और जिस कर्मयोगीमें भक्तिके संस्कार हैं, उसकी यह रति भगवद्रतिमें परिणत हो जाती है।] ज्ञानयोगमें उसी प्रेमको “आत्मरति” कहते हैं अर्थात् वह रति स्वरूपमें होती है—“योऽन्तःसुखोऽन्तरारामः” (5। 24)। और भक्ति- योगमें उसी प्रेमको “भगवद्रति” कहते हैं अर्थात् वह रति भगवान्में होती है2—“तुष्यन्ति च रमन्ति च” (10। 9)। इस प्रकार इन तीनों योगोंमें रति होनेपर भी गीतामें
परिशिष्ट भाव
“मैं जितना हूँ और जो हूँ, (यावान् यश्चास्मि)—यह बात सगुणकी ही है; क्योंकि “यावान्- तावान्” निर्गुणमें हो सकता ही नहीं, प्रत्युत सगुणमें ही हो सकता है। चतुःश्लोकी भागवतमें भी भगवान्ने “यावान्” पदका प्रयोग करते हुए ब्रह्माजीसे कहा है— यावानहं यथाभावो यद्रूपगुणकर्मकः। तथैव “मैं जितना हूँ, जिस भाववाला हूँ, जिन रूप, गुण और कर्मोंवाला हूँ, उस मेरे (समग्ररूपके) तत्त्वका यथार्थ अनुभव तुम्हें मेरी कृपासे ज्यों-का-त्यों हो जाय।” “यावान् यश्चास्मि” का वर्णन भगवान्ने सातवें अध्यायके तीसवें श्लोकमें “साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः” पदोंमें किया था। इससे सगुणकी विशेषता तथा मुख्यता सिद्ध होती है। ज्ञानमार्गसे चलनेवालेको जब (ज्ञानोत्तरकालमें) भक्ति प्राप्त होती है तब उसमें तत्त्वसे जानना (ज्ञात्वा) और प्रविष्ट होना (विशते) —ये दो ही होते हैं, दर्शन नहीं होते। उनमें कोई कमी तो नहीं रहती, पर दर्शनकी इच्छा उनमें नहीं होती। परन्तु आरम्भसे ही भक्तिमार्गसे चलनेवालेको तत्त्वसे जानने (ज्ञातुम्) और प्रविष्ट होने (प्रवेष्टुम्)- के सिवाय भगवान्के दर्शन (द्रष्टुम्) भी होते हैं (गीता—ग्यारहवें अध्यायका चौवनवाँ श्लोक)। इसलिये ज्ञानमार्गी सन्तोंमें भगवत्प्रेम (भक्ति)-की बात तो आती है, पर दर्शनकी बात नहीं आती। जैसे विभिन्न मार्गोंसे आनेवाले व्यक्ति दरवाजेमें प्रविष्ट होनेपर एक साथ मिल जाते हैं, ऐसे ही विभिन्न योग- मार्गोंपर चलनेवाले साधक भगवान्में प्रविष्ट होनेपर (विशते) एक हो जाते हैं अर्थात् अहम्की सूक्ष्म गन्ध भी न रहनेसे उनमें कोई मतभेद नहीं रहता। प्रेमकी दो अवस्थाएँ होती हैं—(1) कभी भक्त प्रेममें डूब जाता है, तब प्रेमी और प्रेमास्पद दो नहीं रहते, एक हो जाते हैं और (2) कभी भक्तमें प्रेमका उछाल आता है, तब प्रेमी और प्रेमास्पद एक होते हुए भी लीलाके लिये दो हो जाते हैं। यहाँ पहली अवस्थाको बतानेके लिये “विशते” पद आया है। तत्त्वविज्ञानमस्तु ते मदनुग्रहात्॥
विशेष बात
विशेष बात जीवका परमात्मामें प्रेम (रति, प्रीति या आकर्षण) “भगवद्रति” की विशेषरूपसे महिमा गायी गयी है। तपस्वी, ज्ञानी और कर्मी—इन तीनोंसे भी योगी (समतावाला) श्रेष्ठ है (गीता—छठे अध्यायका छियालीसवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह है कि जडतासे सम्बन्ध रखते हुए बड़ा भारी तप करनेपर, बहुत-से शास्त्रोंका (अनेक प्रकारका) ज्ञान-सम्पादन करनेपर और यज्ञ, दान, तीर्थ आदिके बड़े-बड़े अनुष्ठान करनेपर जो कुछ प्राप्त होता है, वह सब अनित्य ही होता है, पर योगीको नित्य- तत्त्वकी प्राप्ति होती है। अतः तपस्वी, ज्ञानी और कर्मी— इन तीनोंसे “योगी” श्रेष्ठ है। इस प्रकारके कर्मयोगी, ज्ञानयोगी, हठयोगी, लययोगी आदि सब योगियोंमें भी भगवान्ने “भक्तियोगी” को सर्वश्रेष्ठ बताया है (गीता—छठे अध्यायका सैंतालीसवाँ श्लोक)। यही भक्तियोगी भगवान्के समग्ररूपको जान लेता है। सांख्ययोगी भी पराभक्तिके द्वारा उस समग्ररूपको जान लेता है। उसी समग्ररूपका वर्णन यहाँ “यावान्” पदसे हुआ है1। इस प्रकरणके आरम्भमें “अन्तःकरणकी शुद्धिरूप सिद्धिको प्राप्त हुआ साधक जिस प्रकार ब्रह्मको प्राप्त होता है”—यह कहनेकी प्रतिज्ञा की और बताया कि ध्यानयोगके परायण होनेसे वह वैराग्यको प्राप्त होता है। वैराग्यसे अहंकार आदिका त्याग करके ममतारहित होकर शान्त होता है। तब वह ब्रह्मप्राप्तिका पात्र होता है। पात्र होते ही उसकी ब्रह्मभूत-अवस्था हो जाती है। ब्रह्मभूत-अवस्था होनेपर संसारके सम्बन्धसे जो राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि द्वन्द्व होते थे, वे सर्वथा मिट जाते हैं तो वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें सम हो जाता है। सम होनेपर पराभक्ति प्राप्त हो जाती है। वह पराभक्ति ही वास्तविक प्रीति है। उस प्रीतिसे परमात्माके समग्ररूपका बोध हो जाता है। बोध होते ही उस तत्त्वमें प्रवेश हो जाता है—“विशते तदनन्तरम्।” अनन्यभक्तिसे तो मनुष्य भगवान्को तत्त्वसे जान सकता है, उनमें प्रविष्ट हो सकता है और उनके दर्शन भी कर सकता है (गीता—ग्यारहवें अध्यायका चौवनवाँ श्लोक); परन्तु सांख्ययोगी भगवान्को तत्त्वसे जानकर उनमें प्रविष्ट तो होता है, पर भगवान् उसको दर्शन देनेमें बाध्य नहीं होते। कारण कि उसकी साधना पहलेसे ही विवेक-प्रधान रही है, इसलिये उसको दर्शनकी इच्छा नहीं होती। दर्शन न होनेपर भी उसमें कोई कमी नहीं रहती; अतः कमी माननी नहीं चाहिये। यहाँ उस तत्त्वमें प्रविष्ट हो जाना ही अनिर्वचनीय प्रेमकी प्राप्ति है। इसी प्रेमको नारदभक्तिसूत्रमें प्रतिक्षण वर्धमान कहा है2। इस प्रेममें सर्वथा पूर्णता हो जाती है अर्थात् उसके लिये करना, जानना और पाना कुछ भी बाकी नहीं रहता। इसलिये न करनेका राग रहता है, न जाननेकी जिज्ञासा रहती है, न जीनेकी आशा रहती है, न मरनेका भय रहता है और न पानेका लालच ही रहता है। जबतक भगवान्में पराभक्ति अर्थात् परम प्रेम नहीं होता, तबतक ब्रह्मभूत-अवस्थामें भी “मैं ब्रह्म हूँ” यह सूक्ष्म अहंकार रहता है। जबतक लेशमात्र भी अहंकार रहता है, तबतक परिच्छिन्नताका अत्यन्त अभाव नहीं होता। परन्तु “मैं ब्रह्म हूँ” यह सूक्ष्म अहंभाव तबतक जन्म-मरणका कारण नहीं बनता, जबतक उसमें प्रकृतिजन्य गुणोंका संग नहीं होता; क्योंकि गुणोंका संग होनेसे ही बन्धन होता है— “कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु” (गीता 13। 21)। उदाहरणार्थ—गाढ़ नींदसे जगनेपर साधारण मनुष्यमात्रको सबसे पहले यह अनुभव होता है कि “मैं हूँ।” ऐसा अनुभव होते ही जब नाम, रूप, देश, काल, जाति आदिके साथ स्वयंका सम्बन्ध जुड़ जाता है, तब “मैं हूँ” यह अहंभाव शुभ-अशुभ कर्मोंका कारण बन जाता है, जिससे जन्म-मरणका चक्कर चल पड़ता है। परन्तु जो ऊँचे दर्जेका साधक होता है अर्थात् जिसकी निरन्तर ब्रह्मभूत- अवस्था रहती है, उसके सात्त्विक ज्ञान (इसी अध्यायका बीसवाँ श्लोक)-में सब जगह ही अपने स्वरूपका बोध रहता है। परन्तु जबतक साधकका सत्त्वगुणके साथ सम्बन्ध रहता है, तबतक नींदसे जगनेपर तत्काल “मैं ब्रह्म हूँ” अथवा “सब कुछ एक परमात्मा ही है”—ऐसी वृत्ति पकड़ी जाती है और मालूम होता है कि नींदमें यह वृत्ति छूट गयी थी, मानो उसकी भूल हो गयी थी और अब पीछे उस तत्त्वकी जागृति हो गयी है, स्मृति आ गयी है। गुणातीत हो जानेपर अर्थात् गुणोंसे सर्वथा सम्बन्ध- विच्छेद होनेपर विस्मृति और स्मृति—ऐसी दो अवस्थाएँ नहीं होतीं अर्थात् नींदमें भूल हो गयी और अब स्मृति आ गयी—ऐसा अनुभव नहीं होता, प्रत्युत नींद तो केवल अन्तःकरणमें आयी थी, अपनेमें नहीं, अपना स्वरूप तो ज्यों-का-त्यों रहा—ऐसा अनुभव रहता है। तात्पर्य यह है कि निद्राका आना और उससे जगना—ये दोनों प्रकृतिमें ही हैं, ऐसा उसका स्पष्ट अनुभव रहता है। इसी अवस्थाको चौदहवें अध्यायके बाईसवें श्लोकमें कहा है कि प्रकाश अर्थात् नींदसे जगना और मोह अर्थात् नींदका आना—इन दोनोंमें गुणातीत पुरुषके किंचिन्मात्र भी राग-द्वेष नहीं होते।
* प्रेम भगति जल बिनु रघुराई। अभिअंतर मल कबहुँ न जाई॥ (मानस 7। 49। 3)
1-जानने और प्राप्त करनेमें काल-भेद नहीं होता।
2-भगवान्में रति या प्रियता प्रकट होती है—अपनेपनसे। परमात्माके साथ जीवका अनादिकालसे स्वतःसिद्ध सम्बन्ध है।
अपनी चीज स्वतः प्रिय लगती है। अतः अपनापन प्रकट होते ही भगवान् स्वतः प्यारे लगते हैं। प्रियतामें कभी समाप्त न
होनेवाला अलौकिक, विलक्षण आनन्द है। वह आनन्द प्राप्त होनेपर मनुष्यमें स्वतः निर्विकारता आ जाती है। फिर काम, क्रोध,
लोभ, मद, मत्सर आदि कोई भी विकार पैदा हो ही नहीं सकता। पारमार्थिक आनन्द न मिलनेसे ही कामादि विकार पैदा
होते हैं अर्थात् आनन्द न मिलनेसे नाशवान् वस्तुओंसे सुख लेनेकी इच्छा होती है, जिससे सब विकार पैदा होते हैं।
उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंके साथ अपनापन करनेसे ही यह जीव भगवान्से विमुख हो जाता है। विमुखता होनेपर
भी भगवान्की प्रियता कभी मिट नहीं सकती। नास्तिक-से-नास्तिक भी आफत पड़नेपर पुकार उठता है कि कोई ईश्वर है
तो रक्षा करे!
1-गीतामें “यावान्” को ही “वासुदेवः सर्वम्” (7। 19) कहा है। उसी तत्त्वको सत्-असत्, परा-अपरा, पुरुष-प्रकृति,
क्षेत्रज्ञ-क्षेत्र आदि दो रूपोंमें बताया है और उसी तत्त्वको सत्-असत्से पर भी बताया है—“त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्”
(11। 37)। उस तत्त्वको गीतामें तीन रूपोंसे भी बताया है—अपरा, परा और अहम् (7। 5-6), क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ और माम्
(13। 1-2) एवं क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम (15। 16-17)। इन तीनोंके (आठवें अध्यायके आरम्भमें अर्जुनके पूछनेपर)
भगवान्ने छः भेद बताये हैं—“अपरा”—क्रिया और पदार्थ, “परा”—सामान्य जीव और कारक पुरुष, एवं “अहम्”—निर्गुण
और सगुण।
इन छः भेदोंको दृष्टान्तके रूपमें इस तरह समझें—जल-तत्त्व एक होनेपर भी उसके छः भेद हैं; उसमें परमाणुरूपसे जल
निर्गुण ब्रह्म है, भापरूपसे जल सगुण परमात्मा है, बादलरूपसे जल कारक पुरुष (ब्रह्मा) है, बूँदोंके रूपसे जल सामान्य
जीव है, वर्षारूपसे जल सृष्टि-रचनारूप क्रिया है, और बर्फरूपसे जल (पृथ्वी, जल, तेज, वायु आदि) पदार्थ है।
2-गुणरहितं कामनारहितं प्रतिक्षणवर्धमानमविच्छिन्नं सूक्ष्मतरमनुभवरूपम्। (नारदभक्तिसूत्र 54)
यह प्रेम गुणरहित है, कामनारहित है, प्रतिक्षण बढ़ता रहता है, विच्छेदरहित है, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर है और
अनुभवरूप है।
(श्रीमद्भा0 2। 9। 31)
56श्रीभगवान्
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः। मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥ 56॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

पहले श्लोकमें अर्जुनने संन्यास और त्यागके तत्त्वके विषयमें पूछा तो उसके उत्तरमें भगवान्ने चौथेसे बारहवें श्लोकतक कर्मयोगका और इकतालीसवेंसे अड़तालीसवें श्लोकतक कर्मयोगका तथा संक्षेपमें भक्तियोगका वर्णन किया; और तेरहवेंसे चालीसवें श्लोकतक विचारप्रधान सांख्ययोगका तथा उनचासवेंसे पचपनवें श्लोकतक ध्यान-प्रधान सांख्ययोगका एवं संक्षेपमें पराभक्तिकी प्राप्तिका वर्णन किया। अब भगवान् शरणागतिकी प्रधानतावाले भक्तियोगका वर्णन आरम्भ करते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
3 sections
मद्व्यपाश्रयः
कर्मोंका, कर्मोंके फलका, कर्मोंके पूरा होने अथवा न होनेका, किसी घटना, परिस्थिति, वस्तु, व्यक्ति आदिका आश्रय न हो। केवल मेरा ही आश्रय (सहारा) हो। इस तरह जो सर्वथा मेरे ही परायण हो जाता है, अपना स्वतन्त्र कुछ नहीं समझता, किसी भी वस्तुको अपनी नहीं मानता, सर्वथा मेरे आश्रित रहता है, ऐसे भक्तको अपने उद्धारके लिये कुछ करना नहीं पड़ता। उसका उद्धार मैं कर देता हूँ (गीता—बारहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक); उसको अपने जीवन-निर्वाह या साधन-सम्बन्धी किसी बातकी कमी नहीं रहती; सबकी मैं पूर्ति कर देता हूँ (गीता—नवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)—यह मेरा सदाका एक विधान है, नियम है, जो कि सर्वथा शरण हो जानेवाले हरेक प्राणीको प्राप्त हो सकता है (गीता—नवें अध्यायके तीसवेंसे बत्तीसवें श्लोकतक)।
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणः
यहाँ “कर्माणि” पदके साथ “सर्व” और “कुर्वाणः” पदके साथ “सदा” पद देनेका तात्पर्य है कि जिस ध्यानपरायण सांख्ययोगीने शरीर, वाणी और मनका संयमन कर लिया है अर्थात् जिसने शरीर आदिकी क्रियाओंको संकुचित कर लिया है और एकान्तमें रहकर सदा ध्यानयोगमें लगा रहता है, उसको जिस पदकी प्राप्ति होती है, उसी पदको लौकिक, पारलौकिक, सामाजिक, शारीरिक आदि सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मोंको हमेशा करते हुए भी मेरा आश्रय लेनेवाला भक्त मेरी कृपासे प्राप्त कर लेता है। हरेक व्यक्तिको यह बात तो समझमें आ जाती है कि जो एकान्तमें रहता है और साधन-भजन करता है, उसका कल्याण हो जाता है; परन्तु यह बात समझमें नहीं आती कि जो सदा मशीनकी तरह संसारका सब काम करता है, उसका कल्याण कैसे होगा? उसका कल्याण हो जाय, ऐसी कोई युक्ति नहीं दीखती; क्योंकि ऐसे तो सब लोग कर्म करते ही रहते हैं। इतना ही नहीं, मात्र जीव कर्म करते ही रहते हैं, पर उन सबका कल्याण होता हुआ दीखता नहीं और शास्त्र भी ऐसा कहता नहीं! इसके उत्तरमें भगवान् कहते हैं—“मत्प्रसादात्।” तात्पर्य यह है कि जिसने केवल मेरा ही आश्रय ले लिया है, उसका कल्याण मेरी कृपासे हो जायगा, कौन है मना करनेवाला! यद्यपि प्राणिमात्रपर भगवान्का अपनापन और कृपा सदा-सर्वदा स्वतःसिद्ध है, तथापि यह मनुष्य जबतक असत् संसारका आश्रय लेकर भगवान्से विमुख रहता है, तबतक भगवत्कृपा उसके लिये फलीभूत नहीं होती अर्थात् उसके काममें नहीं आती। परन्तु यह मनुष्य भगवान्का आश्रय लेकर ज्यों-ज्यों दूसरा आश्रय छोड़ता जाता है, त्यों-ही-त्यों भगवान्का आश्रय दृढ़ होता चला जाता है, और ज्यों-ज्यों भगवान्का आश्रय दृढ़ होता जाता है, त्यों- ही-त्यों भगवत्कृपाका अनुभव होता जाता है। जब सर्वथा भगवान्का आश्रय ले लेता है, तब उसे भगवान्की कृपाका पूर्ण अनुभव हो जाता है।
अवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्
स्वतःसिद्ध परमपदकी प्राप्ति अपने कर्मोंसे, अपने पुरुषार्थसे अथवा अपने साधनसे नहीं होती। यह तो केवल भगवत्कृपासे ही होती है। शाश्वत अव्ययपद सर्वोत्कृष्ट है। उसी परमपदको भक्तिमार्गमें परमधाम, सत्यलोक, वैकुण्ठलोक, गोलोक, साकेतलोक आदि कहते हैं और ज्ञानमार्गमें विदेह-कैवल्य, मुक्ति, स्वरूपस्थिति आदि कहते हैं। वह परमपद तत्त्वसे एक होते हुए भी मार्गों और उपासनाओंका भेद होनेसे उपासकोंकी दृष्टिसे भिन्न-भिन्न कहा जाता है (गीता— आठवें अध्यायका इक्कीसवाँ और चौदहवें अध्यायका सत्ताईसवाँ श्लोक)। भगवान्का चिन्मय लोक एक देश- विशेषमें होते हुए भी सब जगह व्यापकरूपसे परिपूर्ण है। जहाँ भगवान् हैं, वहीं उनका लोक भी है; क्योंकि भगवान् और उनका लोक तत्त्वसे एक ही हैं। भगवान् सर्वत्र विराजमान हैं; अतः उनका लोक भी सर्वत्र विराजमान (सर्वव्यापी) है। जब भक्तकी अनन्य निष्ठा सिद्ध हो जाती है, तब परिच्छिन्नताका अत्यन्त अभाव हो जाता है और वही लोक उसके सामने प्रकट हो जाता है अर्थात् उसे यहाँ जीते-जी ही उस लोककी दिव्य लीलाओंका अनुभव होने लगता है। परन्तु जिस भक्तकी ऐसी धारणा रहती है कि वह दिव्य लोक एक देश-विशेषमें ही है, तो उसे उस लोककी प्राप्ति शरीर छोड़नेपर ही होती है। उसे लेनेके लिये भगवान्के पार्षद आते हैं और कहीं-कहीं स्वयं भगवान् भी आते हैं।
परिशिष्ट भाव
ज्ञानयोगीके लिये तो भगवान्ने बताया कि वह सब विषयोंका त्याग करके संयमपूर्वक निरन्तर ध्यानके परायण रहे, तब वह अहंता, ममता, काम, क्रोध आदिका त्याग करके ब्रह्मप्राप्तिका पात्र होता है (अठारहवें अध्यायका इक्यावनवाँ, बावनवाँ और तिरपनवाँ श्लोक)। परन्तु भक्तके लिये यहाँ बताया कि वह अपने वर्ण-आश्रमके अनुसार सब विहित कर्मोंको सदा करते हुए भी मेरी कृपासे परमपदको प्राप्त हो जाता है; क्योंकि उसने मेरा आश्रय लिया है—“मद्व्यपाश्रयः”। तात्पर्य है कि भगवान्के चरणोंका आश्रय लेनेसे सुगमतासे कल्याण हो जाता है। भक्तको अपना कल्याण खुद नहीं करना पड़ता, प्रत्युत अपने बल, विद्या आदिका किं चिन्मात्र भी आश्रय न रखकर केवल विश्वासपूर्वक भगवान्का ही आश्रय लेना पड़ता है। फिर भगवत्कृपा ही उसका कल्याण कर देती है—“मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्।” भगवान् भी केवल भक्तके आश्रयको देखते हैं* उसके दोषोंको नहीं देखते। रामायणमें आया है— रहति न प्रभु चित चूक किएकी। करत सुरति सय बार हिए की॥ जन अवगुन प्रभु मान न काऊ। दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ॥ “मद्व्यपाश्रयः” का अर्थ है—मेरा विशेष आश्रय अर्थात् अनन्य आश्रय, जिसमें दूसरे किसीका किंचिन्मात्र भी आश्रय न हो। एक बानि करुनानिधान की। सो प्रिय जाकें गति न आन की॥
(बाल0 29। 3)
(उत्तर0 1। 3)
(मानस, अरण्य0 10। 4)
57श्रीभगवान्
चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्परःबुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥ 57॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

पूर्वश्लोकमें अपना सामान्य विधान (नियम) बताकर अब भगवान् आगेके श्लोकमें अर्जुनके लिये विशेषरूपसे आज्ञा देते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
9 sections
[इस श्लोकमें भगवान्ने चार बातें बतायी हैं— (1)
चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्न्यस्य
सम्पूर्ण कर्मोंको चित्तसे मेरे अर्पण कर दे। (2)
मत्परः
स्वयंको मेरे अर्पित कर दे। (3)
बुद्धियोगमुपाश्रित्य
समताका आश्रय लेकर संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद कर ले। (4)
मच्चितः सततं भव
निरन्तर मेरेमें चित्तवाला हो जा अर्थात् मेरे साथ अटल सम्बन्ध कर ले।]
चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्न्यस्य
चित्तसे कर्मोंको अर्पित करनेका तात्पर्य है कि मनुष्य चित्तसे यह दृढ़तासे मान ले कि मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर आदि और संसारके व्यक्ति, पदार्थ, घटना, परिस्थति आदि सब भगवान्के ही हैं। भगवान् ही इन सबके मालिक हैं। इनमेंसे कोई भी चीज किसीकी व्यक्तिगत नहीं है। केवल इन वस्तुओंका सदुपयोग करनेके लिये ही भगवान्ने व्यक्तिगत अधिकार दिया है। इस दिये हुए अधिकारको भी भगवान्के अर्पण कर देना है। शरीर, इन्द्रियाँ, मन आदिसे जो कुछ शास्त्रविहित सांसारिक या पारमार्थिक क्रियाएँ होती हैं, वे सब भगवान्की मरजीसे ही होती हैं। मनुष्य तो केवल अहंकारके कारण उनको अपनी मान लेता है। उन क्रियाओंमें जो अपनापन है, उसे भी भगवान्के अर्पण कर देना है; क्योंकि वह अपनापन केवल मूर्खतासे माना हुआ है, वास्तवमें है नहीं। इसलिये उनमें अपनेपनका भाव बिलकुल उठा देना चाहिये और उन सबपर भगवान्की मुहर लगा देनी चाहिये।
मत्परः
भगवान् ही मेरे परम आश्रय हैं, उनके सिवाय मेरा कुछ नहीं है, मेरेको करना भी कुछ नहीं है, पाना भी कुछ नहीं है, किसीसे लेना भी कुछ नहीं है अर्थात् देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदिसे मेरा किंचिन्मात्र कोई प्रयोजन नहीं है—ऐसा अनन्यभाव हो जाना ही भगवान्के परायण होना है। एक बात खास ध्यान देनेकी है—रुपये-पैसे, कुटुम्ब, शरीर आदिको मनुष्य अपना मानते हैं और मनमें यह समझते हैं कि हम इनके मालिक बन गये, हमारा इनपर आधिपत्य है; परन्तु वास्तवमें यह बात बिलकुल झूठी है, कोरा वहम है और बड़ा भारी धोखा है। जो किसी चीजको अपनी मान लेता है, वह उस चीजका गुलाम बन जाता है और वह चीज उसका मालिक बन जाती है। फिर उस चीजके बिना वह रह नहीं सकता। अतः जिन चीजोंको मनुष्य अपनी मान लेता है, वे सब उसपर चढ़ जाती हैं और वह तुच्छ हो जाता है। वह चीज चाहे रुपया हो, चाहे कुटुम्बी हो, चाहे शरीर हो, चाहे विद्या-बुद्धि आदि हो। ये सब चीजें प्राकृत हैं और अपनेसे भिन्न हैं, पर हैं। इनके अधीन होना ही पराधीन होना है। भगवान् स्वकीय हैं, अपने हैं। उनको मनुष्य अपना मानेगा, तो वे मनुष्यके वशमें हो जायँगे। भगवान्के हृदयमें भक्तका जितना आदर है, उतना आदर करनेवाला संसारमें दूसरा कोई नहीं है। भगवान् भक्तके दास हो जाते हैं और उसे अपना मुकुटमणि बना लेते हैं—“मैं तो हूँ भगतनका दास भगत मेरे मुकुटमणि”, परन्तु संसार मनुष्यका दास बनकर उसे अपना मुकुटमणि नहीं बनायेगा। वह तो उसे अपना दास बनाकर पददलित ही करेगा। इसलिये केवल भगवान्के शरण होकर सर्वथा उन्हींके परायण हो जाना चाहिये।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य
गीताभरमें देखा जाय तो समताकी बड़ी भारी महिमा है। मनुष्यमें एक समता आ गयी तो वह ज्ञानी, ध्यानी, योगी, भक्त आदि सब कुछ बन गया। परन्तु यदि उसमें समता नहीं आयी तो अच्छे-अच्छे लक्षण आनेपर भी भगवान् उसको पूर्णता नहीं मानते। वह समता मनुष्यमें स्वाभाविक रहती है। केवल आने-जानेवाली परिस्थितियोंके साथ मिलकर वह सुखी-दुःखी हो जाता है। इसलिये उनमें मनुष्य सावधान रहे कि आने-जानेवाली परिस्थितिके साथ मैं नहीं हूँ। सुख आया, अनुकूल परिस्थिति आयी तो भी मैं हूँ और सुख चला गया, अनुकूल परस्थिति चली गयी तो भी मैं हूँ। ऐसे ही दुःख आया, प्रतिकूल परस्थिति आयी तो भी मैं हूँ और दुःख चला गया, प्रतिकूल परिस्थिति चली गयी तो भी मैं हूँ। अतः सुख-दुःखमें, अनुकूलता-प्रतिकूलतामें, हानि-लाभमें मैं सदैव ज्यों-का-त्यों रहता हूँ। परिस्थितियोंके बदलनेपर भी मैं नहीं बदलता, सदा वही रहता हूँ। इस तरह अपने- आपमें स्थित रहे। अपने-आपमें स्थित रहनेसे सुख-दुःख आदिमें समता हो जायगी। यह समता ही भगवान्की आराधना है—“समत्वमाराधनमच्युतस्य” (विष्णुपुराण 1। 17। 90)। इसीलिये यहाँ भगवान् बुद्धियोग अर्थात् समताका आश्रय लेनेके लिये कहते हैं।
मच्चित्तः सततं भव
जो अपनेको सर्वथा भगवान्के समर्पित कर देता है, उसका चित्त भी सर्वथा भगवान्के चरणोंमें समर्पित हो जाता है। फिर उसपर भगवान्का जो स्वतः-स्वाभाविक अधिकार है, वह प्रकट हो जाता है और उसके चित्तमें स्वयं भगवान् आकर विराजमान हो जाते हैं। यही “मच्चित्तः” होना है। “मच्चित्तः” पदके साथ “सततम्” पद देनेका अर्थ है कि निरन्तर मेरेमें (भगवान्में) चित्तवाला हो जा। भगवान्का निरन्तर चिन्तन तभी होगा, जब “मैं भगवान्का हूँ” इस प्रकार अहंता भगवान्में लग जायगी। अहंता भगवान्में लग जानेपर चित्त स्वतः-स्वाभाविक भगवान्में लग जाता है। जैसे, शिष्य बननेपर “मैं गुरुका हूँ” इस प्रकार अहंता गुरुमें लग जानेपर गुरुकी याद निरन्तर बनी रहती है। गुरुका सम्बन्ध अहंतामें बैठ जानेके कारण इस सम्बन्धकी याद आये तो भी याद है और याद न आये तो भी याद है; क्योंकि स्वयं निरन्तर रहता है। इसमें भी देखा जाय तो गुरुके साथ उसने खुद सम्बन्ध जोड़ा है; परन्तु भगवान्के साथ इस जीवका स्वतःसिद्ध नित्य सम्बन्ध है। केवल संसारके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे ही नित्य सम्बन्धकी विस्मृति हुई है। उस विस्मृतिको मिटानेके लिये भगवान् कहते हैं कि निरन्तर मेरेमें चित्तवाला हो जा। साधक कोई भी सांसारिक काम-धंधा करे, तो उसमें यह एक सावधानी रखे कि अपने चित्तको उस काम-धंधेमें द्रवित न होने दे, चित्तको संसारके साथ घुलने-मिलने न दे अर्थात् तदाकार न होने दे, प्रत्युत उसमें अपने चित्तको कठोर रखे। परन्तु भगवन्नामका जप, कीर्तन, भगवत्कथा, भगवच्चिन्तन आदि भगवत्सम्बन्धी कार्योंमें चित्तको द्रवित करता रहे, तल्लीन करता रहे, उस रसमें चित्तको तरान्तर करता रहे1। इस प्रकार करते रहनेसे साधक बहुत जल्दी भगवान्में चित्तवाला हो जायगा। प्रेम-सम्बन्धी
परिशिष्ट भाव
पूर्वश्लोकमें शाश्वत पदकी प्राप्ति बताकर अब उसकी विधि बताते हैं कि वह कैसे प्राप्त होगा। साधकके लिये दो ही खास काम हैं—संसारके सम्बन्धका त्याग और भगवान्के साथ सम्बन्ध (प्रेम)। पूर्वश्लोकमें आये “मद्व्यपाश्रयः” पदमें भगवान्के साथ सम्बन्धकी मुख्यता है और इस श्लोकमें आये “बुद्धियोगमुपाश्रित्य” पदमें संसारसे सम्बन्ध-विच्छेदकी मुख्यता है। “बुद्धियोगमुपाश्रित्य” कहनेका तात्पर्य है कि संसारका सूक्ष्म सम्बन्ध भी न रहे—“दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय” (गीता 2। 49), किसीके प्रति किंचिन्मात्र भी राग-द्वेष न रहे। एकमात्र भगवान्का चिन्तन करनेसे समता (बुद्धियोग) स्वतः आ जाती है, इसलिये “मच्चित्तः सततं भव” कहा है।
विशेष बात
विशेष बात चित्तसे सब कर्म भगवान्के अर्पण करनेसे संसारसे नित्य-वियोग हो जाता है2 और भगवान्के परायण होनेसे नित्ययोग (प्रेम) हो जाता है। नित्ययोगमें योग, नित्ययोगमें वियोग, वियोगमें नित्ययोग और वियोगमें वियोग—ये चार अवस्थाएँ चित्तकी वृत्तियोंको लेकर होती हैं। इन चारों अवस्थाओंको इस प्रकार समझना चाहिये— जैसे, श्रीराधा और श्रीकृष्णका परस्पर मिलन होता है, तो यह “नित्ययोगमें योग” है। मिलन होनेपर भी श्रीजीमें ऐसा भाव आ जाता है कि प्रियतम कहीं चले गये हैं और वे एकदम कह उठतीं हैं कि “प्यारे! तुम कहाँ चले गये!” तो यह “नित्ययोगमें वियोग” है। श्यामसुन्दर सामने नहीं हैं, पर मनसे उन्हींका गाढ़ चिन्तन हो रहा है और वे मनसे प्रत्यक्ष मिलते हुए दीख रहे हैं, तो यह “वियोगमें नित्ययोग” है। श्यामसुन्दर थोड़े समयके लिये सामने नहीं आये, पर मनमें ऐसा भाव है कि बहुत समय बीत गया, श्यामसुन्दर मिले नहीं, क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? श्यामसुन्दर कैसे मिलें? तो यह “वियोगमें वियोग” है। वास्तवमें इन चारों अवस्थाओंमें भगवान्के साथ नित्ययोग ज्यों-का-त्यों बना रहता है, वियोग कभी होता ही नहीं, हो सकता ही नहीं और होनेकी संभावना भी नहीं। इसी नित्ययोगको “प्रेम” कहते हैं; क्योंकि प्रेममें प्रेमी और प्रेमास्पद दोनों अभिन्न रहते हैं। वहाँ भिन्नता कभी हो ही नहीं सकती। प्रेमका आदान-प्रदान करनेके लिये ही भक्त और भगवान्में संयोग-वियोगकी लीला हुआ करती है। यह प्रेम प्रतिक्षण वर्धमान किस प्रकार है? जब प्रेमी और प्रेमास्पद परस्पर मिलते हैं, तब “प्रियतम पहले चले गये थे, उनसे वियोग हो गया था; अब कहीं ये फिर न चले जायँ!”3 इस भावके कारण प्रेमास्पदके मिलनेमें तृप्ति नहीं होती, सन्तोष नहीं होता। वे चले जायँगे—इस बातको लेकर मन ज्यादा खिंचता है। इसलिये इस प्रेमको प्रतिक्षण वर्धमान बताया है। “प्रेम”-(भक्ति-)में चार प्रकारका रस अथवा रति होती है—दास्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य। इन रसोंमें दास्यसे सख्य, सख्यसे वात्सल्य और वात्सल्यसे माधुर्य- रस श्रेष्ठ है; क्योंकि इनमें क्रमशः भगवान्के ऐश्वर्यकी विस्मृति ज्यादा होती चली जाती है। परन्तु जब इन चारोंमेंसे कोई एक भी रस पूर्णतामें पहुँच जाता है, तब उसमें दूसरे रसोंकी कमी नहीं रहती अर्थात् उसमें सभी रस आ जाते हैं। जैसे, दास्यरस पूर्णतामें पहुँच जाता है तो उसमें सख्य, वात्सल्य और माधुर्य—तीनों रस आ जाते हैं। यही बात अन्य रसोंके विषयमें भी समझनी चाहिये। कारण यह है कि भगवान् पूर्ण हैं, उनका प्रेम भी पूर्ण है और परमात्माका अंश होनेसे जीव स्वयं भी पूर्ण है। अपूर्णता तो केवल संसारके सम्बन्धसे ही आती है। इसलिये भगवान्के साथ किसी भी रीतिसे रति हो जायगी तो वह पूर्ण हो जायगी, उसमें कोई कमी नहीं रहेगी। “दास्य” रतिमें भक्तका भगवान्के प्रति यह भाव रहता है कि भगवान् मेरे स्वामी हैं और मैं उनका सेवक हूँ। मेरेपर उनका पूरा अधिकार है। वे चाहे जो करें, चाहे जैसी परिस्थितिमें रखें और मेरेसे चाहे जैसा काम लें। मेरेपर अत्यधिक अपनापन होनेसे ही वे बिना मेरी सम्मति लिये ही मेरे लिये सब विधान करते हैं। “सख्य” रतिमें भक्तका भगवान्के प्रति यह भाव रहता है कि भगवान् मेरे सखा हैं और मैं उनका सखा हूँ। वे मेरे प्यारे हैं और मैं उनका प्यारा हूँ। उनका मेरेपर पूरा अधिकार है और मेरा उनपर पूरा अधिकार है। इसलिये मैं उनकी बात मानता हूँ, तो मेरी भी बात उनको माननी पड़ेगी। “वात्सल्य” रतिमें भक्तका अपनेमें स्वामिभाव रहता है कि मैं भगवान्की माता हूँ या उनका पिता हूँ अथवा उनका गुरु हूँ और वह तो हमारा बच्चा है अथवा शिष्य है; इसलिये उसका पालन-पोषण करना है। उसकी निगरानी भी रखनी है कि कहीं वह अपना नुकसान न कर ले; जैसे—नन्दबाबा और यशोदामैया कन्हैयाका खयाल रखते हैं और कन्हैया वनमें जाता है तो उसकी निगरानी रखनेके लिये दाऊजीको साथमें भेजते हैं! “माधुर्य”* रतिमें भक्तको भगवान्के ऐश्वर्यकी विशेष विस्मृति रहती है; अतः इस रतिमें भक्त भगवान्के साथ अपनी अभिन्नता (घनिष्ठ अपनापन) मानता है। अभिन्नता माननेसे “उनके लिये सुखदायी सामग्री जुटानी है, उन्हें सुख-आराम पहुँचाना है, उनको किसी तरहकी कोई तकलीफ न हो”—ऐसा भाव बना रहता है। प्रेम-रस अलौकिक है, चिन्मय है। इसका आस्वादन करनेवाले केवल भगवान् ही हैं। प्रेममें प्रेमी और प्रेमास्पद दोनों ही चिन्मय-तत्त्व होते हैं। कभी प्रेमी प्रेमास्पद बन जाता है और कभी प्रेमास्पद प्रेमी हो जाता है। अतः एक चिन्मय-तत्त्व ही प्रेमका आस्वादन करनेके लिये दो रूपोंमें हो जाता है। प्रेमके तत्त्वको न समझनेके कारण कुछ लोग सांसारिक कामको ही प्रेम कह देते हैं। उनका यह कहना बिलकुल गलत है; क्योंकि काम तो चौरासी लाख योनियोंके सम्पूर्ण जीवोंमें रहता है और उन जीवोंमें भी जो भूत, प्रेत, पिशाच होते हैं, उनमें काम (सुखभोगकी इच्छा) अत्यधिक होता है। परन्तु प्रेमके अधिकारी जीवन्मुक्त महापुरुष ही होते हैं। काममें लेने-ही-लेनेकी भावना होती है और प्रेममें देने-ही-देनेकी भावना होती है। काममें अपनी इन्द्रियोंको तृप्त करने—उनसे सुख भोगनेका भाव रहता है और प्रेममें अपने प्रेमास्पदको सुख पहुँचाने तथा सेवा-परायण रहनेका भाव रहता है। काम केवल शरीरको लेकर ही होता है और प्रेम स्थूलदृष्टिसे शरीरमें दीखते हुए भी वास्तवमें चिन्मय-तत्त्वसे ही होता है। काममें मोह (मूढ़भाव) रहता है और प्रेममें मोहकी गन्ध भी नहीं रहती। काममें संसार तथा संसारका दुःख भरा रहता है और प्रेममें मुक्ति तथा मुक्तिसे भी विलक्षण आनन्द रहता है। काममें जडता- (शरीर, इन्द्रियाँ आदि-) की मुख्यता रहती है और प्रेममें चिन्मयता-(चेतन स्वरूप-) की मुख्यता रहती है। काममें राग होता है और प्रेममें त्याग होता है। काममें परतन्त्रता होती है और प्रेममें परतन्त्रताका लेश भी नहीं होता अर्थात् सर्वथा स्वतन्त्रता होती है। काममें “वह मेरे काममें आ जाय” ऐसा भाव रहता है और प्रेममें “मैं उसके काममें आ जाऊँ” ऐसा भाव रहता है। काममें कामी भोग्य वस्तुका गुलाम बन जाता है और प्रेममें स्वयं भगवान् प्रेमीके गुलाम बन जाते हैं। कामका रस नीरसतामें बदलता है और प्रेमका रस आनन्दरूपसे प्रतिक्षण बढ़ता ही रहता है। काम खिन्नतासे पैदा होता है और प्रेम प्रेमास्पदकी प्रसन्नतासे प्रकट होता है। काममें अपनी प्रसन्नताका ही उद्देश्य रहता है और प्रेममें प्रेमास्पदकी प्रसन्नताका ही उद्देश्य रहता है। काम-मार्ग नरकोंकी तरफ ले जाता है और प्रेम-मार्ग भगवान्की तरफ ले जाता है। काममें दो होकर दो ही रहते हैं अर्थात् द्वैधीभाव (भिन्नता या भेद) कभी मिटता नहीं और प्रेममें एक होकर दो होते हैं अर्थात् अभिन्नता कभी मिटती नहीं*।
* ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। (गीता 4। 11)
1-काठिन्यं विषये कुर्याद् द्रवत्वं भगवत्पदे। उपायैः शास्त्रनिर्दिष्टैरनुक्षणमतो बुधः॥ (भक्तिरसायन 1। 32)
2-वास्तवमें संसारके साथ कभी संयोग हो नहीं सकता। उसका तो नित्य ही वियोग रहता है। जैसे, मनमें किसी वस्तुका
चिन्तन होता है, तो वह उस वस्तुका माना हुआ संयोग है, जिससे उस वस्तुके न मिलनेका दुःख होता है। जब वस्तु (बाहरसे)
मिल जाती है, तब उस वस्तुका भीतरसे वियोग हो जाता है, जिससे सुख होता है। ऐसे ही किसी कारणसे बाहरसे वस्तु चली
जाय, नष्ट हो जाय, तो मनसे उस वस्तुका संयोग होनेपर दुःख होता है और विवेक-विचारके द्वारा “यह वस्तु हमारी थी ही
नहीं, हमारी हो सकती ही नहीं” इस प्रकार वस्तुको मनसे निकाल देनेपर सुख होता है। तात्पर्य यह है कि भीतरसे संयोग माना
तो बाहरसे वियोग है और बाहरसे संयोग माना तो भीतरसे वियोग है। अतः वास्तवमें संसारके साथ नित्य वियोग ही रहता
है। मनुष्य केवल भूलसे संसारके साथ संयोग मान लेता है।
3-योग और वियोगमें प्रेम-रसकी वृद्धि होती है। यदि सदा योग ही रहे, वियोग न हो, तो प्रेम-रस बढ़ेगा नहीं, प्रत्युत
अखण्ड और एकरस रहेगा। अतः प्रेम-रसको बढ़ानेके लिये भगवान् अर्न्तधान भी हो जाते हैं।
* लोग प्रायः माधुर्यभावमें स्त्री-पुरुषका भाव ही समझते हैं; परन्तु यह भाव स्त्री-पुरुषके सम्बन्धमें ही होता है—यह नियम
नहीं है। माधुर्य नाम मधुरता अर्थात् मिठासका है और वह मिठास आती है भगवान्के साथ अभिन्नता होनेसे। वह अभिन्नता
जितनी अधिक होगी, मधुरता भी उतनी ही अधिक होगी। अतः दास्य, सख्य और वात्सल्यभावमेंसे किसी भी भावमें पूर्णता
होनेपर उसमें मधुरता कम नहीं रहेगी। भक्तिके सभी भावोंमें माधुर्यभाव रहता है।
अभेद और अभिन्नतामें भेद है। जिसमें केवल एक तत्त्व ही रह जाय, द्वैतभाव सर्वथा समाप्त हो जाय, उसका नाम
“अभेद” है और दो होते हुए भी एक रहनेका नाम “अभिन्नता” है; जैसे—दो मित्रोंमें भीतरसे घनिष्ठता होनेसे अभिन्नता रहती
है। अभिन्नता जितनी गाढ़ होती है, उतना ही माधुर्यरस प्रकट होता है। इसीको प्रेम-रस कहते हैं। भगवान् भी इस प्रेम-रसके
लोभी हैं। इस प्रेम-रसका आस्वादन करनेके लिये ही भगवान् एकसे अनेक रूपोंमें हो जाते हैं—“एकाकी न रमते”
(बृहदारण्यक0 1। 4। 3), “सदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति” (छान्दोग्य0 6। 2। 3)।
58श्रीभगवान्
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसिअथ चेत्त्वमहङ्कारा्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥ 58॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

पूर्वश्लोकमें दी हुई आज्ञाको अब भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें क्रमशः अन्वय और व्यतिरेक-रीतिसे दृढ़ करते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
4 sections
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादा- त्तरिष्यसि
भगवान् कहते हैं कि मेरेमें चित्तवाला होनेसे तू मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्न, बाधा, शोक, दुःख आदिको तर जायगा अर्थात् उनको दूर करनेके लिये तुझे कुछ भी प्रयास नहीं करना पड़ेगा। भगवद्भक्तने अपनी तरफसे सब कर्म भगवान्के अर्पण कर दिये, स्वयं भगवान्के अर्पित हो गया, समताके आश्रयसे संसारकी संयोगजन्य लोलुपतासे सर्वथा विमुख हो गया और भगवान्के साथ अटल सम्बन्ध जोड़ लिया। यह सब कुछ हो जानेपर भी वास्तविक तत्त्वकी प्राप्तिमें यदि कुछ कमी रह जाय या सांसारिक लोगोंकी अपेक्षा अपनेमें कुछ विशेषता देखकर अभिमान आ जाय अथवा इस प्रकारके कोई सूक्ष्म दोष रह जायँ, तो उन दोषोंको दूर करनेकी साधकपर कोई जिम्मेवारी नहीं रहती, प्रत्युत उन दोषोंको, विघ्न-बाधाओंको दूर करनेकी पूरी जिम्मेवारी भगवान्की हो जाती है। इसलिये भगवान् कहते हैं— “मत्प्रसादात्तरिष्यसि” अर्थात् मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्न- बाधाओंको तर जायगा। इसका तात्पर्य यह निकला कि भक्त अपनी तरफसे, उसको जितना समझमें आ जाय, उतना पूरी सावधानीके साथ कर ले, उसके बाद जो कुछ कमी रह जायगी, वह भगवान्की कृपासे पूरी हो जायगी। मनुष्यका अगर कुछ अपराध हुआ है तो वह यही हुआ है कि उसने संसारके साथ अपना सम्बन्ध मान लिया और भगवान्से विमुख हो गया। अब उस अपराधको दूर करनेके लिये वह अपनी ओरसे संसारका सम्बन्ध तोड़कर भगवान्के सम्मुख हो जाय। सम्मुख हो जानेपर जो कुछ कमी रह जायगी, वह भगवान्की कृपासे पूरी हो जायगी। अब आगेका सब काम भगवान् कर लेंगे। तात्पर्य यह हुआ कि भगवत्कृपा प्राप्त करनेमें संसारके साथ किंचित् भी सम्बन्ध मानना और भगवान्से विमुख हो जाना—यही बाधा थी। वह बाधा उसने मिटा दी तो अब पूर्णताकी प्राप्ति भगवत्कृपा अपने-आप करा देगी। जिसका प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीरादिके साथ सम्बन्ध है, उसपर ही शास्त्रोंका विधि-निषेध, अपने वर्ण- आश्रमके अनुसार कर्तव्यका पालन आदि नियम लागू होते हैं और उसको उन-उन नियमोंका पालन जरूर करना चाहिये। कारण कि प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीरादिके सम्बन्धको लेकर ही पाप-पुण्य होते हैं और उनका फल सुख-दुःख भी भोगना पड़ता है। इसलिये उसपर शास्त्रीय मर्यादा और नियम विशेषतासे लागू होते हैं। परन्तु जो प्रकृति और प्रकृतिके कार्यसे सर्वथा ही विमुख होकर भगवान्के सम्मुख हो जाता है, वह शास्त्रीय विधि-निषेध और वर्ण-आश्रमोंकी मर्यादाका दास नहीं रहता। वह विधि-निषेधसे भी ऊँचा उठ जाता है अर्थात् उसपर विधि-निषेध लागू नहीं होते; क्योंकि विधि-निषेधकी मुख्यता प्रकृतिके राज्यमें ही रहती है। प्रभुके राज्यमें तो शरणागतिकी ही मुख्यता रहती है। जीव साक्षात् परमात्माका अंश है (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक)। यदि वह केवल अपने अंशी परमात्माकी ही तरफ चलता है तो उसपर देव, ऋषि, प्राणी, माता-पिता आदि आप्तजन और दादा-परदादा आदि पितरोंका भी कोई ऋण नहीं रहता*; क्योंकि शुद्ध चेतन अंशने इनसे कभी कुछ लिया ही नहीं। लेना तभी बनता है, जब वह जड शरीरके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है और सम्बन्ध जोड़नेसे ही कमी आती है; नहीं तो उसमें कभी कमी आती ही नहीं—“नाभावो विद्यते सतः” (गीता 2। 16)। जब उसमें कभी कमी आती ही नहीं, तो फिर वह उनका ऋणी कैसे बन सकता है? यही सम्पूर्ण विघ्नोंको तरना है! साधन-कालमें जीवन-निर्वाहकी समस्या, शरीरमें रोग आदि अनेक विघ्न-बाधाएँ आती हैं; परन्तु उनके आनेपर भी भगवान्की कृपाका सहारा रहनेसे साधक विचलित नहीं होता। उसे तो उन विघ्न-बाधाओंमें भगवान्की विशेष कृपा ही दीखती है। इसलिये उसे विघ्न-बाधाएँ बाधारूपसे दीखती ही नहीं, प्रत्युत कृपारूपसे ही दीखती हैं। पारमार्थिक साधनमें विघ्न-बाधाओंके आनेकी तथा भगवत्प्राप्तिमें आड़ लगनेकी सम्भावना रहती है। इसके लिये भगवान् कहते हैं कि मेरा आश्रय लेनेवालेके दोनों काम मैं कर दूँगा अर्थात् अपनी कृपासे साधनकी सम्पूर्ण विघ्न-बाधाओंको भी दूर कर दूँगा और उस साधनके द्वारा अपनी प्राप्ति भी करा दूँगा।
अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि
भगवान् अत्यधिक कृपालुताके कारण आत्मीयतापूर्वक अर्जुनसे कह रहे हैं कि
अथ
पक्षान्तरमें मैंने जो कुछ कहा है, उसे न मानकर अगर अहंकारके कारण अर्थात् “मैं भी कुछ जानता हूँ, करता हूँ तथा मैं कुछ समझ सकता हूँ, कुछ कर सकता हूँ” आदि भावोंके कारण तू मेरी बात नहीं सुनेगा, मेरे इशारेके अनुसार नहीं चलेगा, मेरा कहना नहीं मानेगा, तो तेरा पतन हो जायगा—“विनङ्क्ष्यसि”। यद्यपि अर्जुनके लिये यह किंचिन्मात्र भी सम्भव नहीं है कि वह भगवान्की बात न सुने अथवा न माने, तथापि भगवान् कहते हैं कि
चेत्
अगर तू मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा पतन हो जायगा। तात्पर्य यह है कि अगर तू अज्ञता अर्थात् अनजानपनेसे मेरी बात न सुने अथवा किसी भूलके कारण न सुने, तो यह सब क्षम्य है; परन्तु यदि तू अहंकारसे मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा पतन हो जायगा; क्योंकि अहंकारसे मेरी बात न सुननेसे तेरा अभिमान बढ़ जायगा, जो सम्पूर्ण आसुरी-सम्पत्तिका मूल है। पहले चौथे अध्यायमें भगवान् स्वयं अपने श्रीमुखसे कहकर आये हैं कि तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है— “भक्तोऽसि मे सखा चेति” (4। 3) और फिर नवें अध्यायमें उन्होंने कहा है कि हे अर्जुन! तू प्रतिज्ञा कर कि मेरे भक्तका पतन नहीं होता—“कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति” (9। 31)। इससे सिद्ध हुआ कि अर्जुन भगवान्के भक्त हैं; अतः वे कभी भगवान्से विमुख नहीं हो सकते और उनका पतन भी कभी नहीं हो सकता। परन्तु वे अर्जुन भी यदि भगवान्की बात नहीं सुनेंगे तो भगवान्से विमुख हो जायँगे और भगवान्से विमुख होनेके कारण उनका भी पतन हो जायगा। तात्पर्य यह कि भगवान्से विमुख होनेके कारण ही प्राणीका पतन होता है अर्थात् वह जन्म-मरणके चक्करमें पड़ता है (गीता—नवें अध्यायका तीसरा और सोलहवें अध्यायका बीसवाँ श्लोक)। परम ध्येय है। दसवें अध्यायके ग्यारहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि मैं अपनी कृपासे भक्तोंके अन्तःकरणमें ज्ञान प्रकाशित कर देता हूँ, और ग्यारहवें अध्यायके सैंतालीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि मैंने अपनी कृपासे ही विराट्रूप
परिशिष्ट भाव
भक्तका काम केवल भगवान्का आश्रय लेना है, भगवान्का ही चिन्तन करना है। फिर उसके सब काम भगवान् ही करते हैं। भगवान् भक्तपर विशेष कृपा करके उसके साधनकी सम्पूर्ण विघ्न-बाधाओंको भी दूर कर देते हैं और अपनी प्राप्ति भी करा देते हैं—“योगक्षेमं वहाम्यहम्” (गीता 9। 22)। इसलिये ब्रह्मसूत्रमें आया है—विशेषानुग्रहश्च” (3। 4। 38) “भगवान्की भक्तिका अनुष्ठान करनेसे भगवान्का विशेष अनुग्रह होता है।” वास्तवमें मनुष्यपर भगवान्की कृपा तो है ही, पर भगवान्का आश्रय लेनेसे भक्तको उसका विशेष अनुभव होता है।
विशेष बात
विशेष बात इसी अध्यायके छप्पनवें श्लोकमें भगवान्ने प्रथम पुरुष “अवाप्नोति” का प्रयोग करके सामान्य रीतिसे सबके लिये कहा कि मेरी कृपासे परमपदकी प्राप्ति हो जाती है, और यहाँ मध्यम पुरुष “तरिष्यसि” का प्रयोग करके अर्जुनके लिये कहते हैं कि मेरी कृपासे तू सब विघ्न-बाधाओंको तर जायगा। इन दोनों बातोंका तात्पर्य यह है कि भगवान्की कृपामें जो शक्ति है, वह शक्ति किसी साधनमें नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं कि साधन न करें, प्रत्युत परमात्मप्राप्तिके लिये साधन करना मनुष्यका स्वाभाविक धर्म होना चाहिये; क्योंकि मनुष्य-जन्म केवल परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है। मनुष्य-जन्मको प्राप्त करके भी जो परमात्माको प्राप्त नहीं करता, वह यदि ऊँचे-से-ऊँचे लोकोंमें भी चला जाय, तो भी उसे लौटकर संसार- (जन्म-मरण-)में आना ही पड़ेगा* (गीता—आठवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)। इसलिये जब यह मनुष्य-शरीर प्राप्त हुआ है, तो फिर मनुष्यको जीते-जी ही भगवत्प्राप्ति कर लेनी चाहिये और जन्म-मरणसे रहित हो जाना चाहिये। कर्मयोगीके लिये भी भगवान्ने कहा है कि समतायुक्त पुरुष इस जीवित-अवस्थामें ही पुण्य और पाप—दोनोंसे रहित हो जाता है (गीता—दूसरे अध्यायका पचासवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह हुआ कि कर्म-बन्धनसे सर्वथा रहित होना अर्थात् जन्म-मरणसे रहित होना मनुष्यमात्रका दिखाया है। उसी कृपाको लेकर भगवान् यहाँ कहते हैं कि मेरी कृपासे परमपदकी प्राप्ति हो जायगी (इसी अध्यायका छप्पनवाँ श्लोक) और मेरी कृपासे ही सम्पूर्ण विघ्नोंको तर जायगा (इसी श्लोकमें)। परमपदको प्राप्त होनेपर किसी प्रकारकी विघ्न-बाधा सामने आनेकी सम्भावना ही नहीं रहती। फिर भी सम्पूर्ण विघ्न-बाधाओंको तरनेकी बात कहनेका तात्पर्य यह है कि अर्जुनके मनमें यह भय बैठा था कि युद्ध करनेसे मुझे पाप लगेगा; युद्धके कारण कुल-परम्पराके नष्ट होनेसे पितरोंका पतन हो जायगा और इस प्रकार अनर्थ-परम्परा बढ़ती ही जायगी; हमलोग राज्यके लोभमें आकर इस महान् पापको करनेके लिये तैयार हो गये हैं, इसलिये मैं शस्त्र छोड़कर बैठ जाऊँ और धृतराष्ट्रके पक्षके लोग मेरेको मार भी दें, तो भी मेरा कल्याण ही होगा (गीता—पहले अध्यायके छत्तीसवेंसे छियालीसवें श्लोकतक)। इन सभी बातोंको लेकर और अनेक जन्मोंके दोषोंको भी लेकर भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि मेरी कृपासे तू सब विघ्नोंको, पापोंको तर जायगा—“सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।” भगवान्ने बहुवचनमें “दुर्गाणि” पद देकर भी उसके साथ “सर्व” शब्द और जोड़ दिया है। इसका तात्पर्य यह है कि मेरी कृपासे तेरा किंचिन्मात्र भी पाप नहीं रहेगा; कोई भी बन्धन नहीं रहेगा और मेरी कृपासे सर्वथा शुद्ध होकर तू परमपदको प्राप्त हो जायगा।
* द्वैतं मोहाय बोधात्प्राग्जाते बोधे मनीषया। भक्त्यर्थं कल्पितं (स्वीकृतं) द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम्॥
पारमार्थिकमद्वैतं द्वैतं भजनहेतवे। तादृशी यदि भक्तिः स्यात्सा तु मुक्तिशताधिका॥
(बोधसार भक्ति0 42-43)
“बोधसे पहलेका द्वैत मोहमें डाल सकता है। परन्तु बोध हो जानेपर भक्तिके लिये स्वीकृत द्वैत अद्वैतसे भी अधिक सुन्दर
होता है।”
“वास्तविक तत्त्व तो अद्वैत ही है, पर भजनके लिये द्वैत है। ऐसी यदि भक्ति है तो वह भक्ति मुक्तिसे भी सौगुनी श्रेष्ठ है।”
* देवर्षिभूताप्तनृणां पितॄणां न किङ्करो नायमृणी च राजन्। सर्वात्मना यः शरणं शरण्यं गतो मुकुन्दं परिहृत्य कर्तम्॥
(श्रीमद्भा0 11। 5। 41)
“राजन्! जो सारे कार्योंको छोड़कर सम्पूर्णरूपसे शरणागतवत्सल भगवान्की शरणमें आ जाता है, वह देव, ऋषि, प्राणी,
कुटुम्बीजन और पितृगण—इनमेंसे किसीका भी ऋणी और सेवक नहीं रहता।”
59श्रीभगवान्
यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसेमिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति॥ 59॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
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व्याख्या
6 sections
यदहंकारमाश्रित्य
प्रकृतिसे ही महत्तत्त्व और महत्तत्त्वसे अहंकार पैदा हुआ है। उस अहंकारका ही एक विकृत अंश है—“मैं शरीर हूँ।” इस विकृत अहंकारका आश्रय लेनेवाला पुरुष कभी भी क्रियारहित नहीं हो सकता। कारण कि प्रकृति हरदम क्रियाशील है, बदलनेवाली है, इसलिये उसके आश्रित रहनेवाला कोई भी मनुष्य कर्म किये बिना नहीं रह सकता (गीता—तीसरे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)। जब मनुष्य अहंकारपूर्वक क्रियाशील प्रकृतिके वशमें हो जाता है, तो फिर वह यह कैसे कह सकता है कि मैं अमुक कर्म करूँगा और अमुक कर्म नहीं करूँगा अर्थात् प्रकृतिके परवश हुआ मनुष्य करना और न करना—इन दोनोंसे छूटेगा नहीं। कारण कि प्रकृतिके परवश हुए मनुष्यका तो “करना” भी कर्म है और “न करना” भी कर्म है। परन्तु जब मनुष्य प्रकृतिके परवश नहीं रहता, उससे निर्लिप्त हो जाता है (जो कि इसका वास्तविक स्वरूप है), तो फिर उसके लिये करना और न करना—ऐसा कहना ही नहीं बनता। तात्पर्य यह है कि जो प्रकृतिके साथ सम्बन्ध रखे और कर्म न करना चाहे, ऐसा उसके लिये सम्भव नहीं है। परन्तु जिसने प्रकृतिसे तो फिर यह मेरी शरणागति कहाँ रही? यह तो अहंकारकी शरणागति हो गयी! कारण कि वास्तविक शरणागत होनेपर “मैं यह करूँगा, यह नहीं करूँगा” ऐसा कहना ही नहीं बनता। भगवान्के शरणागत होनेपर तो भगवान् जैसा करायेंगे, वैसा ही करना होगा। इसी बातको लेकर भगवान्को हँसी आ गयी (दूसरे अध्यायका दसवाँ श्लोक)। परन्तु अर्जुनपर अत्यधिक कृपा और स्नेह होनेके कारण भगवान्ने उपदेश देना आरम्भ कर दिया, नहीं तो भगवान् वहींपर यह कह देते कि
जैसा चाहता है, वैसा कर
“यथेच्छसि तथा कुरु” (18। 63) परन्तु अर्जुनकी यह बात कि “मैं युद्ध नहीं करूँगा” भगवान्के भीतर खटक गयी। इसलिये भगवान्ने यहाँ अर्जुनके उन्हीं शब्दों—“न योत्स्ये” का प्रयोग करके यह कहा है कि तू अहंकारके ही शरण है, मेरे शरण नहीं। अगर तू मेरे शरण हो गया होता तो “युद्ध नहीं करूँगा” ऐसा कहना बन ही नहीं सकता था। मेरे शरण होता तो “मैं क्या करूँगा और क्या नहीं करूँगा” इसकी जिम्मेवारी मेरेपर होती। इसके अलावा मेरे शरणागत होनेपर यह प्रकृति भी तुझे बाध्य नहीं कर पाती (गीता—सातवें अध्यायका चौदहवाँ श्लोक)। शरण हो गया है, उसको कर्म करनेके लिये बाध्य नहीं होना पड़ता।
न योत्स्य इति मन्यसे
दूसरे अध्यायमें अर्जुनने भगवान्के शरण होकर शिक्षाकी प्रार्थना की—“शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्” (2। 7) और उसके बाद अर्जुनने साफ-साफ कह दिया कि
मैं युद्ध नहीं करूँगा
“न योत्स्ये” (2। 9)। यह बात भगवान्को अच्छी नहीं लगी। भगवान् मनमें सोचते हैं कि यह पहले तो मेरे शरण हो गया और फिर इसने मेरे कुछ कहे बिना ही अपनी यह त्रिगुणमयी माया अर्थात् प्रकृति उसीको बाध्य करती है, जो मेरे शरण नहीं हुआ है (गीता—सातवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक); क्योंकि यह नियम है कि प्रकृतिके प्रवाहमें पड़ा हुआ प्राणी प्रकृतिके गुणोंके द्वारा सदा ही परवश होता है। यह एक बड़ी मार्मिक बात है कि मनुष्य जिन प्राकृत पदार्थोंको अपना मान लेते हैं, उन पदार्थोंके सदा ही परवश (पराधीन) हो जाते हैं। वे वहम तो यह रखते हैं कि हम इन पदार्थोंके मालिक हैं, पर हो जाते हैं उनके गुलाम! परन्तु जिन पदार्थोंको अपना नहीं मानते, उन पदार्थोंके परवश नहीं होते। इसलिये मनुष्यको किसी भी प्राकृत पदार्थको अपना नहीं मानना चाहिये; क्योंकि वे वास्तवमें अपने हैं ही नहीं। अपने तो वास्तवमें केवल भगवान् ही हैं। उन भगवान्को अपना माननेसे मनुष्यकी परवशता सदाके लिये समाप्त हो जाती है। तात्पर्य यह हुआ कि मनुष्य पदार्थों और क्रियाओंको अपनी मानता है तो सर्वथा परतन्त्र हो जाता है, और भगवान्को अपना मानता है और उनके अनन्य शरण होता है तो सर्वथा स्वतन्त्र हो जाता है। प्रभुके शरणागत होनेपर परतन्त्रता लेशमात्र भी नहीं रहती—यह शरणागतिकी महिमा है। परन्तु जो प्रभुकी शरण न लेकर अहंकारकी शरण लेते हैं, वे मौतके मार्ग- (संसार-)में बह जाते हैं—“निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि” (9। 3)। इसी बातकी चेतावनी देते हुए भगवान् अर्जुनसे कह रहे हैं कि तू जो यह कहता है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, तो तेरा यह कहना, तेरी यह हेकड़ी चलेगी नहीं। तुझे क्षात्र-प्रकृतिके परवश होकर युद्ध करना ही पड़ेगा।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते
व्यवसाय अर्थात् निश्चय दो तरहका होता है—वास्तविक और अवास्तविक। परमात्माके साथ अपना जो नित्य सम्बन्ध है, उसका निश्चय करना तो वास्तविक है और प्रकृतिके साथ मिलकर प्राकृत पदार्थोंका निश्चय करना अवास्तविक है। जो निश्चय परमात्माको लेकर होता है, उसमें स्वयंकी प्रधानता रहती है और जो निश्चय प्रकृतिको लेकर होता है, उसमें अन्तःकरणकी प्रधानता रहती है। इसलिये भगवान् यहाँ अर्जुनसे कहते हैं कि अहंकारका अर्थात् प्रकृतिका आश्रय लेकर तू जो यह कह रहा है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, ऐसा तेरा (क्षात्र-प्रकृतिके विरुद्ध) निश्चय अवास्तविक अर्थात् मिथ्या है, झूठा है। आश्रय परमात्माका ही होना चाहिये, प्रकृति और प्रकृतिके कार्य संसारका नहीं। यदि प्राणी यह निश्चय कर लेता है कि मैं परमात्माका ही हूँ और मुझे केवल परमात्माकी तरफ ही चलना है, तो उसका यह निश्चय वास्तविक अर्थात् सत्य है, नित्य है। इस निश्चयकी महिमा भगवान्ने नवें अध्यायके तीसवें श्लोकमें की है कि अगर दुराचारी-से-दुराचारी मनुष्य भी अनन्यभावसे मेरा भजन करता है तो उसको दुराचारी नहीं मानना चाहिये, प्रत्युत साधु ही मानना चाहिये, क्योंकि वह वास्तविक निश्चय कर चुका है कि मैं भगवान्का ही हूँ और भगवान्का ही भजन करूँगा।
प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति
इन पदोंसे भगवान् कहते हैं कि तेरा क्षात्र-स्वभाव तुझे जबर्दस्ती युद्धमें लगा देगा। क्षत्रियका स्वभाव है—शूरवीरता, युद्धमें पीठ न दिखाना (गीता—इसी अध्यायका तैंतालीसवाँ श्लोक)। अतः धर्ममय युद्धका अवसर सामने आनेपर तू युद्ध किये बिना रह नहीं सकेगा।
परिशिष्ट भाव
पूर्वश्लोकमें यह बात आयी कि अहंकारके कारण “फल” ठीक नहीं होगा और इस श्लोकमें यह बात आयी कि अहंकारके कारण “क्रिया” ठीक नहीं होगी। तात्पर्य है कि सुनने या न सुननेसे पतन नहीं होगा, प्रत्युत अहंकारके कारण पतन होगा। कर्म करना या न करना बाधक नहीं है, प्रत्युत अहंकार बाधक है। भगवान्ने कहा कि मैं अपनी प्राप्ति भी करा दूँगा और तेरे विघ्नोंको भी दूर कर दूँगा (अठारहवें अध्यायका छप्पनवाँ और अट्ठावनवाँ श्लोक)। परन्तु इतना कहनेपर भी अर्जुन बोले नहीं, जब कि उनको वहाँ “करिष्ये वचनं तव” कह देना चाहिये था। तब भगवान् कहते हैं कि अगर तू भूलसे मेरी बात न सुने तो कोई बात नहीं, पर तू अहंकारसे मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा पतन हो जायगा। भगवान्का भाव है कि जैसे भक्तका सब काम (साधन और सिद्धि) मैं कर देता हूँ, ऐसे ही भक्तको भी चाहिये कि वह सब प्रकारसे मेरा ही आश्रय ले। परन्तु मेरा आश्रय न लेकर वह अहंकारका आश्रय लेगा तो उसका पतन हो जायगा। अहंकारका आश्रय लेनेसे “मद्व्यपाश्रय” नहीं होगा; क्योंकि मेरे आश्रयकी जगह मेरी अपरा प्रकृति “अहंकार” का आश्रय ले लिया। कर्तव्य कर्म (युद्ध)-में एक तो मैं लगाता हूँ और एक प्रकृति लगाती है। अगर तू मेरी बात नहीं मानेगा तो तेरी क्षात्र प्रकृति तेरेको युद्धमें लगायेगी। प्रकृति लगायेगी तो जिम्मेवारी तेरी होगी और मेरी बात सुनकर कर्तव्यमें लगेगा तो जिम्मेवारी मेरी होगी। तेरी जिम्मेवारी होनेसे तू बद्ध हो जायगा और मेरी जिम्मेवारी होनेसे तू मुक्त हो जायगा।
* येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिनस्त्वय्यस्तभावादविशुद्धबुद्धयः।
आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं ततः पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः॥ (श्रीमद्भा0 10। 2। 32)
“हे कमलनयन! जो लोग आपके चरणोंके शरण नहीं हैं और आपकी भक्तिसे रहित होनेके कारण जिनकी बुद्धि भी शुद्ध
नहीं है, वे अपनेको मुक्त तो मानते हैं, पर वास्तवमें वे बद्ध ही हैं। वे यदि कष्टपूर्वक साधन करके ऊँचे-ऊँचे पदपर भी पहुँच
जायँ, तो भी वहाँसे नीचे गिर जाते हैं।”
60श्रीभगवान्
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा। कर्तुं ेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्॥ 60॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

विच्छेद कर लिया है अथवा जो सर्वथा भगवान्के पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा कि प्रकृति तुझे कर्ममें लगा देगी, अब आगेके श्लोकमें उसीका विवेचन करते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
2 sections
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा
पूर्वजन्ममें जैसे कर्म और गुणोंकी वृत्तियाँ रही हैं, इस जन्ममें जैसे माता-पितासे पैदा हुए हैं अर्थात् माता- पिताके जैसे संस्कार रहे हैं, जन्मके बाद जैसा देखा-सुना है, जैसी शिक्षा प्राप्त हुई है और जैसे कर्म किये हैं—उन सबके मिलनेसे अपनी जो कर्म करनेकी एक आदत बनी है, वही कर्म तेरे लिये कल्याणकारी हो जायगा। कारण कि शास्त्र अथवा मेरी आज्ञासे कर्मोंको करनेसे, उन कर्मोंमें जो राग-द्वेष हैं, वे स्वाभाविक ही मिटते चले जायँगे; क्योंकि तेरी दृष्टि आज्ञाकी तरफ रहेगी, राग- द्वेषकी तरफ नहीं। अतः वे कर्म बन्धनकारक न होकर कल्याणकारक ही होंगे। उसका नाम स्वभाव है। इसको भगवान्ने स्वभावजन्य स्वकीय कर्म कहा है। इसीको स्वधर्म भी कहते हैं— “स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि” (गीता 2। 31)।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात् करिष्यस्यवशोऽपि तत्
स्वभावजन्य क्षात्र प्रकृतिसे बँधा हुआ तू मोहके कारण जो नहीं करना चाहता, उसको तू परवश होकर करेगा। स्वभावके अनुसार ही शास्त्रोंने कर्तव्य-पालनकी आज्ञा दी है। उस आज्ञामें यदि दूसरोंके कर्मोंकी अपेक्षा अपने कर्मोंमें कमियाँ अथवा दोष दीखते हों, तो भी वे दोष बाधक (पाप-जनक) नहीं होते—“श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्” (गीता 3। 35; 18। 47)। उस स्वभावज कर्म (क्षात्र-धर्म)-के अनुसार तू युद्ध करनेके लिये परवश है। युद्धरूप कर्तव्यको न करनेका तेरा विचार मूढ़तापूर्वक किया गया है। जो जीवन्मुक्त महापुरुष होते हैं, उनका स्वभाव सर्वथा शुद्ध होता है। अतः उनपर स्वभावका आधिपत्य नहीं रहता अर्थात् वे स्वभावके परवश नहीं होते; फिर भी वे किसी काममें प्रवृत्त होते हैं, तो अपनी प्रकृति- (स्वभाव-) के अनुसार ही काम करते हैं। परन्तु साधारण मनुष्य प्रकृतिके परवश होते हैं, इसलिये उनका स्वभाव उनको जबर्दस्ती कर्ममें लगा देता है (गीता—तीसरे अध्यायका तैंतीसवाँ श्लोक)। भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि तेरा क्षात्र-स्वभाव भी तुझे जबर्दस्ती युद्धमें लगा देगा; परन्तु उसका फल तेरे लिये बढि़या नहीं होगा। यदि तू शास्त्र या सन्त-महापुरुषोंकी आज्ञासे अथवा मेरी आज्ञासे युद्धरूप कर्म करेगा, तो
परिशिष्ट भाव
स्वभाव दो तरहका होता है—(1) विहित कर्मोंका स्वभाव और (2) निषिद्ध कर्मोंका स्वभाव। इनमें विहित कर्मोंका स्वभाव तो स्वतः होनेसे “स्व-स्वभाव” है, पर निषिद्ध कर्मोंका स्वभाव आगन्तुक होनेसे “पर-स्वभाव” है। विहित कर्मोंका स्वभाव तो सजातीय होनेसे जन्य नहीं है, पर निषिद्ध कर्मोंका स्वभाव विजातीय होनेसे जन्य (आसक्तिजन्य, कुसंगजन्य) है। मनुष्यका खास कर्तव्य है—अपना स्वभाव ठीक करना अर्थात् निषिद्ध कर्मोंके स्वभावका त्याग करके विहित कर्मोंके स्वभावके अनुसार आचरण करना। भगवान्ने विहित कर्मोंके स्वभावके अनुसार ही अपने वर्ण-धर्मका पालन करनेकी आज्ञा दी है। भगवान् कहते हैं कि चाहे कर्तव्यमात्र समझकर युद्ध कर, चाहे मेरी आज्ञा मानकर युद्ध कर, युद्ध तो तेरेको करना ही पड़ेगा। मेरा आश्रय न लेनेसे तेरा अहंकार रहेगा, जिससे विहित कर्म भी बाँधनेवाला हो जायगा। परन्तु मेरा आश्रय लेनेसे अहंकार नहीं रहेगा। अहंकार ही बाँधनेवाला होता है। जो प्रकृतिके परवश नहीं होता, जिसकी प्रकृति महान् शुद्ध होती है, ऐसा ज्ञानी महापुरुष भी जब प्रकृतिके अनुसार क्रिया करता है, फिर प्रकृतिके परवश हुआ तथा अशुद्ध प्रकृतिवाला मनुष्य प्रकृतिके विरुद्ध कर्म कैसे कर सकता है?
विशेष बात
विशेष बात गीतामें प्रकृतिकी परवशताकी बात सामान्यरूपसे कई जगह आयी है (जैसे—तीसरे अध्यायका पाँचवाँ, आठवें अध्यायका उन्नीसवाँ और नवें अध्यायका आठवाँ श्लोक आदि); परन्तु दो जगह प्रकृतिकी परवशताकी बात विशेषरूपसे आयी है—“प्रकृतिं यान्ति भूतानि” (3। 33) और यहाँ “प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति” (18। 59)*। इससे स्वभावकी प्रबलता ही सिद्ध होती है; क्योंकि कोई भी प्राणी जिस-किसी योनिमें भी जन्म लेता है, उसकी प्रकृति अर्थात् स्वभाव उसके साथमें रहता है। अगर उसका स्वभाव परम शुद्ध हो अर्थात् स्वभावमें सर्वथा असंगता हो तो उसका जन्म ही क्यों होगा? यदि उसका जन्म होगा तो उसमें स्वभावकी ही मुख्यता रहेगी—“कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु” (गीता 13। 21)। जब स्वभावकी ही मुख्यता अथवा परवशता रहेगी और प्रत्येक क्रिया स्वभावके अनुसार ही होगी, तो फिर शास्त्रोंका विधि-निषेध किसपर लागू होगा? गुरुजनोंकी शिक्षा किसके काम आयेगी? और मनुष्य दुर्गुण-दुराचारोंका त्याग करके सद्गुण-सदाचारोंमें कैसे प्रवृत्त होगा? उपर्युक्त प्रश्नोंका उत्तर यह है कि जैसे मनुष्य गंगाजीके प्रवाहको रोक तो नहीं सकता, पर उसके प्रवाहको मोड़ सकता है, घुमा सकता है। ऐसे ही मनुष्य अपने वर्णोचित स्वभावको छोड़ तो नहीं सकता, पर भगवत्प्राप्तिका उद्देश्य रखकर उसको राग-द्वेषसे रहित परम शुद्ध, निर्मल बना सकता है। तात्पर्य यह हुआ कि स्वभावको शुद्ध बनानेमें मनुष्यमात्र सर्वथा सबल और स्वतन्त्र है, निर्बल और परतन्त्र नहीं है। निर्बलता और परतन्त्रता तो केवल राग-द्वेष होनेसे प्रतीत होती है। अब इस स्वभावको सुधारनेके लिये भगवान्ने गीतामें कर्मयोग और भक्तियोगकी दृष्टिसे दो उपाय बताये हैं— (1) कर्मयोगकी दृष्टिसे—तीसरे अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने बताया है कि मनुष्यके खास शत्रु राग-द्वेष ही हैं। अतः राग-द्वेषके वशमें नहीं होना चाहिये अर्थात् राग-द्वेषको लेकर कोई भी कर्म नहीं करना चाहिये, प्रत्युत शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार ही प्रत्येक कर्म करना चाहिये। शास्त्रके आज्ञानुसार अर्थात् शिष्य गुरुकी, पुत्र माता-पिताकी, पत्नी पतिकी और नौकर मालिककी आज्ञाके अनुसार प्रसन्नतापूर्वक सब कर्म करता है तो उसमें राग-द्वेष नहीं रहते। कारण कि अपने मनके अनुसार कर्म करनेसे ही राग-द्वेष पुष्ट होते हैं। शास्त्र आदिकी आज्ञाके अनुसार कार्य करनेसे और कभी दूसरा नया कार्य करनेकी मनमें आ जानेपर भी शास्त्रकी आज्ञा न होनेसे हम वह कार्य नहीं करते तो उससे हमारा “राग” मिट जायगा; और कभी कार्यको न करनेकी मनमें आ जानेपर भी शास्त्रकी आज्ञा होनेसे हम वह कार्य प्रसन्नतापूर्वक करते हैं तो उससे हमारा “द्वेष” मिट जायगा। (2) भक्तियोगकी दृष्टिसे—जब मनुष्य ममतावाली वस्तुओंके सहित स्वयं भगवान्के शरण हो जाता है, तब उसके पास अपना करके कुछ नहीं रहता। वह भगवान्के हाथकी कठपुतली बन जाता है। फिर भगवान्की आज्ञाके अनुसार, उनकी इच्छाके अनुसार ही उसके द्वारा सब कार्य होते हैं, जिससे उसके स्वभावमें रहनेवाले राग-द्वेष मिट जाते हैं। तात्पर्य यह हुआ कि कर्मयोगमें राग-द्वेषके वशीभूत न होकर कार्य करनेसे स्वभाव शुद्ध हो जाता है(गीता— तीसरे अध्यायका चौंतीसवाँ श्लोक) और भक्तियोगमें भगवान्के सर्वथा अर्पित होनेसे स्वभाव शुद्ध हो जाता है (गीता— अठारहवें अध्यायका बासठवाँ श्लोक)। स्वभाव शुद्ध होनेसे बन्धनका कोई प्रश्न ही नहीं रहता। मनुष्य जो कुछ कर्म करता है, वह कभी राग-द्वेषके वशीभूत होकर करता है और कभी सिद्धान्तके अनुसार करता है। राग-द्वेषपूर्वक कर्म करनेसे राग-द्वेष दृढ़ हो जाते हैं और फिर मनुष्यका वैसा ही स्वभाव बन जाता है। सिद्धान्तके अनुसार कर्म करनेसे उसका सिद्धान्तके अनुसार ही करनेका स्वभाव बन जाता है। जो मनुष्य परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य रखकर शास्त्र और महापुरुषोंके सिद्धान्तके अनुसार कर्म करते हैं और जो परमात्माको प्राप्त हो गये हैं—उन दोनों-(साधकों और सिद्ध महापुरुषों-) के कर्म दुनियाके लिये आदर्श होते हैं, अनुकरणीय होते हैं (गीता—तीसरे अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)।
* ज्ञानयोगमें ज्ञानी प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेद कर लेता है, इसलिये उसके लिये प्रकृतिकी परवशताकी बात नहीं आयी है।
61श्रीभगवान्
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठतिभ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥ 61॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

जीव स्वयं परमात्माका अंश है और स्वभाव प्रकृतिका अंश है; स्वयं स्वतःसिद्ध है और स्वभाव खुदका बनाया हुआ है; स्वयं चेतन है और स्वभाव जड है—ऐसा होनेपर भी जीव स्वभावके परवश कैसे हो जाता है? इस प्रश्नके उत्तरमें भगवान् आगेका श्लोक कहते हैं।

पदच्छेद
श्लोकमें ढूँढ़नेके लिये हॉवर करें
व्याख्या
3 sections
ईश्वरः सर्वभूतानां ...... यन्त्रारूढानि मायया
इसका तात्पर्य यह है कि जो ईश्वर सबका शासक, नियामक, सबका भरण-पोषण करनेवाला और निरपेक्षरूपसे सबका संचालक है, वह अपनी शक्तिसे उन प्राणियोंको घुमाता है, जिन्होंने शरीरको “मैं” और “मेरा” मान रखा है। जैसे, विद्युत्-शक्तिसे संचालित यन्त्र—रेलपर कोई आरूढ़ हो जाता है, चढ़ जाता है तो उसको परवशतासे रेलके अनुसार ही जाना पड़ता है। परन्तु जब वह रेलपर आरूढ़ नहीं रहता, नीचे उतर जाता है, तब उसको रेलके अनुसार नहीं जाना पड़ता। ऐसे ही जबतक मनुष्य शरीररूपी यन्त्रके साथ “मैं” और
मेरे
पनका सम्बन्ध रखता है, तबतक ईश्वर उसको उसके स्वभावके* अनुसार संचालित करता रहता है और वह मनुष्य जन्म-मरणरूप संसारके चक्रमें घूमता रहता है। शरीरके साथ मैं-मेरेपनका सम्बन्ध होनेसे ही राग- द्वेष पैदा होते हैं, जिससे स्वभाव अशुद्ध हो जाता है। स्वभावके अशुद्ध होनेपर मनुष्य प्रकृति अर्थात् स्वभावके परवश हो जाता है। परन्तु शरीरसे सर्वथा सम्बन्ध- विच्छेद होनेपर जब स्वभाव राग-द्वेषसे रहित अर्थात् शुद्ध हो जाता है, तब प्रकृतिकी परवशता नहीं रहती। प्रकृति-(स्वभाव-)की परवशता न रहनेसे ईश्वरकी माया उसको संचालित नहीं करती। अब यहाँ यह शंका होती है कि जब ईश्वर ही हमारेको भ्रमण करवाता है, क्रिया करवाता है, तब यह काम करना चाहिये और यह काम नहीं करना चाहिये—ऐसी स्वतन्त्रता कहाँ रही? क्योंकि यन्त्रारूढ़ होनेके कारण हम यन्त्रके और यन्त्रके संचालक ईश्वरके अधीन हो गये, परतन्त्र हो गये, तो फिर यन्त्रका संचालक (प्रेरक) जैसा करायेगा, वैसा ही होगा? इसका समाधान इस प्रकार है— जैसे, बिजलीसे संचालित होनेवाले यन्त्र अनेक तरहके होते हैं। एक ही बिजलीसे संचालित होनेपर भी किसी यन्त्रमें बर्फ जम जाती है और किसी यन्त्रमें अग्नि जल जाती है अर्थात् उनमें एक-दूसरेसे बिलकुल विरुद्ध काम होता है। परन्तु बिजलीका यह आग्रह नहीं रहता कि मैं तो केवल बर्फ ही जमाऊँगी अथवा केवल अग्नि ही जलाऊँगी। यन्त्रोंका भी ऐसा आग्रह नहीं रहता कि हम तो केवल बर्फ ही जमायेंगे अथवा केवल अग्नि ही जलायेंगे, प्रत्युत यन्त्र बनानेवाले कारीगरने यन्त्रोंको जैसा बना दिया है, उसके अनुसार उनमें स्वाभाविक ही बर्फ जमती है और अग्नि जलती है। ऐसे ही मनुष्य, पशु, पक्षी, देवता, यक्ष, राक्षस आदि जितने भी प्राणी हैं, सब शरीररूपी यन्त्रोंपर चढ़े हुए हैं और उन सभी यन्त्रोंको ईश्वर संचालित करता है। उन अलग-अलग शरीरोंमें भी जिस शरीरमें जैसा स्वभाव है, उस स्वभावके अनुसार वे ईश्वरसे प्रेरणा पाते हैं और कार्य करते हैं। तात्पर्य यह है कि उन शरीरोंसे मैं-मेरेपनका सम्बन्ध माननेवालेका जैसा (अच्छा या मन्दा) स्वभाव होता है, उससे वैसी ही क्रियाएँ होती हैं। अच्छे स्वभाववाले (सज्जन) मनुष्यके द्वारा श्रेष्ठ क्रियाएँ होती हैं और मन्दे स्वभाववाले (दुष्ट) मनुष्यके द्वारा खराब क्रियाएँ होती हैं। इसलिये अच्छी या मन्दी क्रियाओंको करानेमें ईश्वरका हाथ नहीं है, प्रत्युत खुदके बनाये हुए अच्छे या मन्दे स्वभावका ही हाथ है। जैसे बिजली यन्त्रके स्वभावके अनुसार ही उसका संचालन करती है, ऐसे ही ईश्वर प्राणीके (शरीरमें स्थित) स्वभावके अनुसार उसका संचालन करते हैं। जैसा स्वभाव होगा, वैसे ही कर्म होंगे। इसमें एक बात विशेष ध्यान देनेकी है कि स्वभावको सुधारनेमें और बिगाड़नेमें सभी मनुष्य स्वतन्त्र हैं, कोई भी परतन्त्र नहीं है। परन्तु पशु, पक्षी, देवता, आदि जितने भी मनुष्येतर प्राणी हैं, उनमें अपने स्वभावको सुधारनेका न अधिकार है और न स्वतन्त्रता ही है। मनुष्य-शरीर अपना उद्धार करनेके लिये ही मिला है, इसलिये इसमें अपने स्वभावको सुधारनेका पूरा अधिकार है, पूरी स्वतन्त्रता है। उस स्वतन्त्रताका सदुपयोग करके स्वभाव सुधारनेमें और स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके स्वभाव बिगाड़नेमें मनुष्य स्वयं ही हेतु है। ईश्वर सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयदेशमें रहता है—यह कहनेका तात्पर्य है कि जैसे पृथ्वीमें सब जगह जल रहनेपर भी जहाँ कुआँ होता है, वहींसे जल प्राप्त होता है; ऐसे ही परमात्मा सब जगह समान रीतिसे परिपूर्ण होते हुए भी हृदयमें प्राप्त होते हैं अर्थात् हृदय सर्वव्यापी परमात्माकी प्राप्तिका विशेष स्थान है। ऐसे ही तीसरे अध्यायमें सर्वव्यापी परमात्माको यज्ञ-(निष्काम-कर्म-) में स्थित बताया गया है—“तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्” (गीता 3। 15)। द्वैतापत्ति होगी। इसका समाधान यह है कि परमात्माको अपनेमें माननेसे द्वैतापत्ति नहीं होती, प्रत्युत अहंकार- (
मैं
पन) को स्वीकार करनेसे जो अपनी अलग सत्ता प्रतीत होती है, उसीसे द्वैतापत्ति होती है। परमात्माको अपना और अपनेमें माननेसे तो परमात्मासे अभिन्नता होती है, जिससे प्रेम प्रकट होता है। जैसे, गंगाजीमें बाढ़ आ जानेसे उसका जल बहुत बढ़ जाता है और फिर पीछे वर्षा न होनेसे उसका जल पुनः कम हो जाता है; परन्तु उसका जो जल गड्ढेमें रह जाता है अर्थात् गंगाजीसे अलग हो जाता है, उसको “गंगोज्झ”
परिशिष्ट भाव
“भ्रामयन्” का तात्पर्य है कि संसारमात्रका संचालन भगवान्की ही शक्तिसे हो रहा है—“मत्तः सर्वं प्रवर्तते” (गीता 10। 8)। भगवान् प्राणियोंको उनके स्व-स्वभावके अनुसार कर्म करनेकी प्रेरणा तो करते हैं, पर उसमें अपना आग्रह नहीं रखते। भगवान्का आग्रह न होनेके कारण ही मनुष्य अपनी कामना-ममता-आसक्तिके वशीभूत होकर पुण्य अथवा पाप करता है और उनका फल भोगनेके लिये स्वर्गादि लोकोंमें अथवा नरकों और नीच योनियोंमें जाता है। परन्तु जो भगवान्के शरण हो जाता है, उसको भगवान् विशेष प्रेरणा करते हैं। अहंकार न रहनेसे वह जो कुछ करता है, भगवान्की प्रेरणाके अनुसार ही करता है।
विशेष बात
विशेष बात साधककी प्रायः यह भूल होती है कि वह भजन, कीर्तन, ध्यान आदि करते हुए भी “भगवान् दूर हैं; वे अभी नहीं मिलेंगे; यहाँ नहीं मिलेंगे; अभी मैं योग्य नहीं हूँ; भगवान्की कृपा नहीं है” आदि भावनाएँ बनाकर भगवान्की दूरीकी मान्यता ही दृढ़ करता रहता है। इस जगह साधकको यह सावधानी रखनी चाहिये कि जब भगवान् सभी प्राणियोंमें मौजूद हैं तो मेरेमें भी हैं। वे सर्वत्र व्यापक हैं तो मैं जो जप करता हूँ उस जपमें भी भगवान् हैं; मैं श्वास लेता हूँ तो उस श्वासमें भी भगवान् हैं; मेरे मनमें भी भगवान् हैं, बुद्धिमें भी भगवान् हैं; मैं जो “मैं-मैं” कहता हूँ, उस “मैं” में भी भगवान् हैं। उस “मैं” का जो आधार है, वह अपना स्वरूप भगवान्से अभिन्न है अर्थात् “मैं”- पन तो दूर है, पर भगवान् “मैं”-पनसे भी नजदीक हैं। इस प्रकार अपनेमें भगवान्को मानते हुए ही भजन, जप, ध्यान आदि करने चाहिये। अब शंका यह होती है कि अपनेमें परमात्माको माननेसे मैं और परमात्मा दो (अलग-अलग) हैं—यह कहते हैं। उस गंगोज्झको मदिराके समान महान् अपवित्र माना गया है। गंगाजीसे अलग होनेके कारण वह गंदा हो जाता है और उसमें अनेक कीटाणु पैदा हो जाते हैं, जो कि रोगोंके कारण हैं। परन्तु फिर कभी जोरकी बाढ़ आ जाती है, तो वह गंगोज्झ वापस गंगाजीमें मिल जाता है। गंगाजीमें मिलते ही उसकी एकदेशीयता, अपवित्रता, अशुद्धि आदि सभी दोष चले जाते हैं और वह पुनः महान् पवित्र गंगाजल बन जाता है। ऐसे ही यह मनुष्य जब अहंकारको स्वीकार करके परमात्मासे विमुख हो जाता है, तब इसमें परिच्छिन्नता, पराधीनता, जडता, विषमता, अभाव, अशान्ति, अपवित्रता आदि सभी दोष (विकार) आ जाते हैं। परन्तु जब यह अपने अंशी परमात्माके सम्मुख हो जाता है, उन्हींकी शरणमें चला जाता है अर्थात् अपना अलग कोई व्यक्तित्व नहीं रखता, तब उसमें आये हुए भिन्नता, पराधीनता आदि सभी दोष मिट जाते हैं। कारण कि स्वयं (चेतन स्वरूप-) में दोष नहीं हैं दोष तो अहंता-(मैं-पन) को स्वीकार करनेसे ही आते हैं।
* स्वभाव कारणशरीरमें रहता है। वही स्वभाव सूक्ष्म और स्थूल-शरीरमें प्रकट होता है।
62श्रीभगवान्
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारततत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥ 62॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

अब भगवान् यन्त्रारूढ़ हुए प्राणियोंकी परवशताको मिटानेका उपाय बताते हैं।

पदच्छेद
श्लोकमें ढूँढ़नेके लिये हॉवर करें
व्याख्या
7 sections
[मनुष्यमें प्रायः यह एक कमजोरी रहती है कि जब उसके सामने संत-महापुरुष विद्यमान रहते हैं, तब उसका उनपर श्रद्धा-विश्वास एवं महत्त्वबुद्धि नहीं होती*; परन्तु जब वे चले जाते हैं, तब पीछे वह रोता है, पश्चात्ताप करता है। ऐसे ही भगवान् अर्जुनके रथके घोड़े हाँकते हैं और उनकी आज्ञाका पालन करते हैं। वे ही भगवान् जब अर्जुनसे कहते हैं कि शरणागत भक्त मेरी कृपासे शाश्वत पदको प्राप्त हो जाता है; और तू भी मेरेमें चित्तवाला होकर मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्नोंको तर जायगा, तब अर्जुन कुछ बोले ही नहीं। इससे यह सम्भावना भी हो सकती है कि भगवान्के वचनोंपर अर्जुनको पूरा विश्वास न हुआ हो। इसी दृष्टिसे भगवान्को यहाँ अर्जुनके लिये अन्तर्यामी ईश्वरकी शरणमें जानेकी बात कहनी पड़ी।]
तमेव शरणं गच्छ
भगवान् कहते हैं कि जो सर्वव्यापक ईश्वर सबके हृदयमें विराजमान है और सबका संचालक है, तू उसीकी शरणमें चला जा। तात्पर्य है कि सांसारिक उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थ, वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदि किसीका किंचिन्मात्र भी आश्रय न लेकर केवल अविनाशी परमात्माका ही आश्रय ले ले। पूर्वश्लोकमें यह कहा गया कि मनुष्य जबतक शरीररूपी यन्त्रके साथ मैं-मेरापनका सम्बन्ध रखता है तबतक ईश्वर अपनी मायासे उसको घुमाता रहता है। अब यहाँ “एव” पदसे उसका निषेध करते हुए भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि शरीररूपी यन्त्रके साथ किंचिन्मात्र भी मैं- मेरापनका सम्बन्ध न रखकर तू केवल उस ईश्वरकी शरणमें चला जा।
सर्वभावेन
सर्वभावसे शरणमें जानेका तात्पर्य यह हुआ कि मनसे उसी परमात्माका चिन्तन हो, शारीरिक क्रियाओंसे उसीका पूजन हो, उसीका प्रेमपूर्वक भजन हो और उसके प्रत्येक विधानमें परम प्रसन्नता हो। वह विधान चाहे शरीर, इन्द्रियाँ, मन आदिके अनुकूल हो, चाहे प्रतिकूल हो, उसे भगवान्का ही किया हुआ मानकर खूब प्रसन्न हो जाय कि अहो! भगवान्की मेरेपर कितनी कृपा है कि मेरेसे बिना पूछे ही, मेरे मन, बुद्धि आदिके विपरीत जानते हुए भी केवल मेरे हितकी भावनासे, मेरा परम कल्याण करनेके लिये उन्होंने ऐसा विधान किया है!
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्
भगवान्ने पहले यह कह दिया था कि मेरी कृपासे शाश्वत पदकी प्राप्ति हो जाती है (छप्पनवाँ श्लोक) और मेरी कृपासे तू सम्पूर्ण विघ्नोंसे तर जायगा (अट्ठावनवाँ श्लोक)। वही बात यहाँ कहते हैं कि उस अन्तर्यामी परमात्माकी कृपासे तू परमशान्ति और शाश्वत स्थान-(पद-)को प्राप्त कर लेगा। गीतामें अविनाशी परमपदको ही “परा शान्ति” नामसे कहा गया है। परन्तु यहाँ भगवान्ने “परा शान्ति” और “शाश्वत स्थान” (परमपद)—दोनोंका प्रयोग एक साथ किया है। अतः यहाँ “परा शान्ति” का अर्थ संसारसे सर्वथा उपरति और “शाश्वत स्थान” का अर्थ परमपद लेना चाहिये। भगवान्ने “तमेव शरणं गच्छ” पदोंसे अर्जुनको सर्वव्यापी ईश्वरकी शरणमें जानेके लिये कहा है। इससे यह शंका हो सकती है कि क्या भगवान् श्रीकृष्ण ईश्वर नहीं हैं? क्योंकि अगर भगवान् श्रीकृष्ण ईश्वर होते, तो अर्जुनको
उसीकी शरणमें जा
ऐसा (परोक्ष रीतिसे) नहीं कहते। इसका समाधान यह है कि भगवान्ने सर्वव्यापक ईश्वरकी शरणागतिको तो “गुह्याद्गुह्यतरम्” (18। 63) अर्थात् गुह्यसे गुह्यतर कहा है, पर अपनी शरणागतिको “सर्वगुह्यतमम्” (18। 64) अर्थात् सबसे गुह्यतम कहा है। इससे सर्वव्यापक ईश्वरकी अपेक्षा भगवान् श्रीकृष्ण बड़े ही सिद्ध हुए। भगवान्ने पहले कहा है कि मैं अजन्मा, अविनाशी और सम्पूर्ण प्राणियोंका ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृतिको अधीन करके अपनी योगमायासे प्रकट होता हूँ (चौथे अध्यायका छठा श्लोक); मैं सम्पूर्ण यज्ञों और तपोंका भोक्ता हूँ, सम्पूर्ण लोकोंका महान् ईश्वर हूँ और सम्पूर्ण प्राणियोंका सुहृद् हूँ—ऐसा मुझे माननेसे शान्तिकी प्राप्ति होती है (पाँचवें अध्यायका उनतीसवाँ श्लोक); परन्तु जो मुझे सम्पूर्ण यज्ञोंका भोक्ता और सबका मालिक नहीं मानते, उनका पतन होता है (नवें अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक)। इस प्रकार अन्वय-व्यतिरेकसे भी भगवान् श्रीकृष्णका ईश्वरत्व सिद्ध हो जाता है। इस अध्यायमें “ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति” (18। 61) पदोंसे अन्तर्यामी ईश्वरको सब प्राणियोंके हृदयमें स्थित बताया है और पंद्रहवें अध्यायमें “सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः” (15। 15) पदोंसे अपनेको सबके हृदयमें स्थित बताया है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि अन्तर्यामी परमात्मा और भगवान् श्रीकृष्ण दो नहीं हैं, एक ही हैं। जब अन्तर्यामी परमात्मा और भगवान् श्रीकृष्ण एक ही हैं, तो फिर भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनको “तमेव शरणं गच्छ” क्यों कहा? इसका कारण यह है कि पहले छप्पनवें श्लोकमें भगवान्ने अपनी कृपासे शाश्वत अविनाशी पदकी प्राप्ति होनेकी बात कही और सत्तावनवें-अट्ठावनवें श्लोकोंमें अर्जुनको अपने परायण होनेकी आज्ञा देकर
मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्नोंको तर जायगा
यह बात कही। परन्तु अर्जुन कुछ बोले नहीं अर्थात् उन्होंने कुछ भी स्वीकार नहीं किया। इसपर भगवान्ने अर्जुनको धमकाया कि यदि अहंकारके कारण तू मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा पतन हो जायगा। उनसठवें और साठवें श्लोकमें कहा कि
मैं युद्ध नहीं करूँगा
इस प्रकार अहंकारका आश्रय लेकर किया हुआ तेरा निश्चय भी नहीं टिकेगा और तुझे स्वभावज कर्मोंके परवश होकर युद्ध करना ही पडे़गा। भगवान्के इतना कहनेपर भी अर्जुन कुछ बोले नहीं। अतः अन्तमें भगवान्को यह कहना पड़ा कि यदि तू मेरी शरणमें नहीं आना चाहता तो सबके हृदयमें स्थित जो अन्तर्यामी परमात्मा हैं, उसीकी शरणमें तू चला जा। वास्तवमें अन्तर्यामी ईश्वर और भगवान् श्रीकृष्ण सर्वथा अभिन्न हैं अर्थात् सबके हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान ईश्वर ही भगवान् श्रीकृष्ण हैं और भगवान् श्रीकृष्ण ही सबके हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान ईश्वर हैं।
परिशिष्ट भाव
जीव ईश्वरका ही अंश है, इसलिये भगवान् ईश्वरकी ही शरणमें जानेके लिये कहते हैं। ईश्वरके शरण होनेसे अहंकार नहीं रहता। जबतक जीव ईश्वरके वश (शरण)-में नहीं होता, तभीतक वह प्रकृतिके वशमें रहता है। वह जितना-जितना जड़ताकी ओर जाता है, उतनी-उतनी आसुरी-सम्पत्ति आती है और जितना-जितना चिन्मयताकी ओर जाता है, उतनी-उतनी दैवी-सम्पत्ति आती है।
* “अतिपरिचयादवज्ञा” अर्थात् जहाँ किसीसे अति परिचय होता है, वहाँ उसकी अवज्ञा होती है।
63श्रीभगवान्
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मयाविमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥ 63॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा कि तू उस अन्तर्यामी ईश्वरकी शरणमें चला जा। ऐसा कहनेपर भी अर्जुन कुछ नहीं बोले। इसलिये भगवान् आगेके श्लोकमें अर्जुनको चेतानेके लिये उन्हें स्वतन्त्रता प्रदान करते हैं।

पदच्छेद
श्लोकमें ढूँढ़नेके लिये हॉवर करें
व्याख्या
4 sections
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया
पूर्वश्लोकमें सर्वव्यापक अन्तर्यामी परमात्माकी जो शरणागति बतायी गयी है, उसीका लक्ष्य यहाँ “इति” गुह्यतर शरणागतिरूप ज्ञान मैंने तेरे लिये कह दिया है। कर्मयोग “गुह्य” है और अन्तर्यामी निराकार परमात्माकी शरणागति “गुह्यतर” है1।
विमृश्यैतदशेषेण
गुह्य-से-गुह्यतर शरणागतिरूप ज्ञान बताकर भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि मैंने पहले जो भक्तिकी बातें कही हैं, उनपर तुम अच्छी तरहसे विचार कर लेना। भगवान्ने इसी अध्यायके सत्तावनवें-अट्ठावनवें श्लोकोंमें अपनी भक्ति-(शरणागति-) की जो बातें कही हैं, उन्हें “एतत्” पदसे लेना चाहिये। गीतामें जहाँ-जहाँ भक्तिकी बातें आयी हैं, उन्हें “अशेषेण” पदसे लेना चाहिये2। “विमृश्यैतदशेषेण” कहनेमें भगवान्की अत्यधिक कृपालुताकी एक गूढ़ाभिसन्धि है कि कहीं अर्जुन मेरेसे विमुख न हो जाय, इसलिये यदि यह मेरी कही हुई बातोंकी तरफ विशेषतासे खयाल करेगा तो असली बात अवश्य ही इसकी समझमें आ जायगी और फिर यह मेरेसे विमुख नहीं होगा।
यथेच्छसि तथा कुरु
पहले कही सब बातोंपर पूरा-पूरा विचार करके फिर तेरी जैसी मरजी आये, वैसा कर। तू जैसा करना चाहता है, वैसा कर—ऐसा कहनेमें भी भगवान्की आत्मीयता, कृपालुता और हितैषिता ही प्रत्यक्ष दीख रही है। पहले “वक्ष्याम्यशेषतः” (7। 2), “इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे” (9। 1); “वक्ष्यामि हितकाम्यया” (10। 1) आदि श्लोकोंमें भगवान् अर्जुनके हितकी बात कहते आये हैं, पर इन वाक्योंमें भगवान्की अर्जुनपर “सामान्य कृपा” है। “न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि” (18। 58)—इस श्लोकमें अर्जुनको धमकानेमें भगवान्की “विशेष कृपा” और अपनेपनका भाव टपकता है। यहाँ “यथेच्छसि तथा कुरु” कहकर भगवान् जो अपनेपनका त्याग कर रहे हैं, इसमें तो भगवान्की “अत्यधिक कृपा” और आत्मीयता भरी हुई है। कारण कि भक्त भगवान्का धमकाया जाना तो सह सकता है, पर भगवान्का त्याग नहीं सह सकता। इसलिये “न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि” आदि कहनेपर भी अर्जुनपर इतना असर नहीं पड़ा जितना “यथेच्छसि तथा कुरु” कहनेपर पड़ा। इसे सुनकर अर्जुन घबरा गये कि भगवान् तो मेरा त्याग कर रहे हैं! क्योंकि मैंने यह बड़ी भारी गलती की कि भगवान्के द्वारा प्यारसे समझाने, अपनेपनसे धमकाने और अन्तर्यामीकी शरणागतिकी बात कहनेपर भी मैं कुछ बोला नहीं, जिससे भगवान्को
जैसी मरजी आये, वैसा कर
यह कहना पड़ा। अब तो मैं कुछ भी कहनेके लायक नहीं हूँ!—ऐसा सोचकर अर्जुन बड़े दुःखी हो जाते हैं, तब भगवान् अर्जुनके बिना पूछे ही सर्वगुह्यतम वचनोंको कहते हैं, जिसका वर्णन आगेके श्लोकमें है।
परिशिष्ट भाव
“यथेच्छसि तथा कुरु”—यह भगवान् त्याग करनेके लिये नहीं कहते हैं, प्रत्युत अपनी तरफ विशेषतासे खींचनेके लिये कहते हैं; जैसे—गेंद फेंकते हैं विशेषतासे पीछे लेनेके लिये, न कि त्याग करनेके लिये। तात्पर्य है कि पूर्वश्लोकमें अन्तर्यामी निराकार ईश्वरकी शरणागतिकी बात कहकर अब भगवान् अर्जुनको अपनी तरफ अर्थात् सगुण-साकारकी तरफ खींचना चाहते हैं, जिससे अर्जुन समग्रकी प्राप्तिसे रीता न रह जाय। निराकारमें साकार नहीं आता, पर साकारमें निराकार भी आ जाता है।
1-योगयुक्त बुद्धिवाले कर्मफलका त्याग करके अनामय पदको प्राप्त हो जाते हैं (दूसरे अध्यायका इक्यावनवाँ श्लोक);
जो प्राप्ति ज्ञानयोगसे होती है, वह प्राप्ति कर्मयोगसे हो जाती है (चौथे अध्यायका अड़तीसवाँ श्लोक); योगयुक्त मुनि बहुत
जल्दी परमात्माको प्राप्त हो जाता है (पाँचवें अध्यायका छठा श्लोक); कर्मफलका त्याग करनेपर सदा रहनेवाली शान्ति
प्राप्त होती है (पाँचवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक) आदि श्लोकोंसे कर्मयोग परमात्मप्राप्तिका स्वतन्त्र साधन सिद्ध होता है।
ऐसे कर्मयोगको “गुह्य” कहते हैं।
जडतासे सम्बन्ध-विच्छेद करके निराकार परमात्माके शरण हो जाना—यह कर्मयोगसे भी अधिक महत्त्वका है, इसलिये
इसे “गुह्यतर” कहते हैं।
सूर्यको मैंने ही उपदेश दिया था, वही मैं तेरेको कह रहा हूँ (चौथे अध्यायका तीसरा श्लोक); सम्पूर्ण जगत् मेरेसे ही
व्याप्त है (नवें अध्यायका चौथा श्लोक); क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम “पुरुषोत्तम” मैं ही हूँ (पन्द्रहवें अध्यायका
अठारहवाँ श्लोक) आदि बातोंमें भगवान्ने अपनी भगवत्ता प्रकट की है, इसलिये ये बातें “गुह्यतम” हैं।
तू केवल मेरी ही शरणमें आ जा, फिर तेरेको किंचिन्मात्र भी करना नहीं है, मैं तेरेको सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा, तू शोक-
चिन्ता मत कर (अठारहवें अध्यायका छाछठवाँ श्लोक)—इस प्रकार अपनी शरणागतिकी बात कहना “सर्वगुह्यतम” है।
जिसमें कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग आदि सब साधनोंका वर्णन होता है, उस योगशास्त्रको “परमगुह्य” कहा गया है
(अठारहवें अध्यायका अड़सठवाँ और पचहत्तरवाँ श्लोक)।
2-गीतामें भक्तिकी बातें इन श्लोकोंमें आयी हैं—सम्पूर्ण योगियोंमें भक्तियोगी श्रेष्ठ है (छठे अध्यायका सैंतालीसवाँ
श्लोक); मेरी शरण लेनेवाले मायाको तर जाते हैं (सातवें अध्यायका चौदहवाँ श्लोक); सब कुछ वासुदेव ही है—इस प्रकार
मेरी (भगवान्की) शरण लेनेवाले महात्मा अत्यन्त दुर्लभ हैं (सातवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक); अनन्य भक्तिसे मैं सुलभ
हूँ (आठवें अध्यायका चौदहवाँ श्लोक); अनन्यभक्तिसे परम पुरुषकी प्राप्ति होती है (आठवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक);
दैवी-सम्पत्तिके आश्रित महात्मालोग अनन्यमनसे मेरा भजन करते हैं (नवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक); दृढ़ निश्चयवाले भक्त
निरन्तर कीर्तन करते हुए तथा मुझे नमस्कार करते हुए भक्तिपूर्वक मेरी उपासना करते हैं (नवें अध्यायका चौदहवाँ श्लोक);
अनन्यभक्तका योगक्षेम मैं वहन करता हूँ (नवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक); भक्तद्वारा प्रेमपूर्वक अर्पित पत्र, पुष्प, फल
आदिको मैं खाता हूँ (नवें अध्यायका छब्बीसवाँ श्लोक); तू जो करता है, हवन करता है, दान देता है और तप करता है,
वह सब मेरे अर्पण कर (नवें अध्यायका सत्ताईसवाँ श्लोक); सब कर्म मेरे अर्पण कर दे तो तू शुभाशुभ फलरूप बन्धनसे
मुक्त हो जायगा (नवें अध्यायका अट्ठाईसवाँ श्लोक); मेरेमें मनवाला हो, मेरा भक्त हो, मेरा पूजन करनेवाला हो और मेरेको
नमस्कार कर (नवें अध्यायका चौंतीसवाँ श्लोक); सब प्रकारसे मेरेमें लगे हुए भक्तोंका अज्ञान मैं दूर कर देता हूँ, जिससे
वे मेरेको ही प्राप्त होते हैं (दसवें अध्यायका नवेंसे ग्यारहवें श्लोकतक); अनन्यभक्तिसे ही मैं देखा और जाना जा सकता
हूँ तथा मेरेमें प्रवेश किया जा सकता है (ग्यारहवें अध्यायका चौवनवाँ श्लोक); अनन्यभक्तिवाला पुरुष मेरेको ही प्राप्त होता
है (ग्यारहवें अध्यायका पचपनवाँ श्लोक); मेरा भजन करनेवाला भक्त अति उत्तम योगी है (बारहवें अध्यायका दूसरा
श्लोक); जो सब कर्मोंको मेरे अर्पण करके मेरे परायण हो गये हैं, उनका मैं बहुत जल्दी उद्धार करता हूँ (बारहवें अध्यायका
छठा-सातवाँ श्लोक); तू मेरेमें ही मन और बुद्धिको अर्पित कर दे तो मेरी प्राप्ति हो जायगी (बारहवें अध्यायका आठवाँ
श्लोक); अव्यभिचारी भक्तियोगसे मनुष्य गुणातीत हो जाता है (चौदहवें अध्यायका छब्बीसवाँ श्लोक); सर्वभावसे मेरा
भजन करनेवाला भक्त सर्ववित् है (पन्द्रहवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक), आदि-आदि।
64श्रीभगवान्
सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचःइष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्॥ 64॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

पूर्वश्लोकमें भगवान्ने “विमृश्यैतदशेषेण” पदसे अर्जुनको कहा कि मेरे इस पूरे उपदेशका सार निकाल लेना। परन्तु भगवान्के सम्पूर्ण उपदेशका सार निकाल लेना अर्जुनके वशकी बात नहीं थी; क्योंकि अपने उपदेशका सार निकालना जितना वक्ता जानता है, उतना श्रोता नहीं जानता। दूसरी बात, “जैसी मरजी आये, वैसा कर”—इस प्रकार भगवान्के मुखसे अपने त्यागकी बात सुनकर अर्जुन बहुत डर गये, इसलिये आगेके दो श्लोकोंमें भगवान् अपने प्रिय सखा अर्जुनको आश्वासन देते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
5 sections
सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः
पहले तिरसठवें श्लोकमें भगवान्ने गुह्य (कर्मयोगकी) और गुह्यतर (अन्तर्यामी निराकारकी शरणागतिकी) बात कही और “इदं तु ते गुह्यतमम्” (9। 1) तथा “इति गुह्यतमं शास्त्रम्” (15। 20)—इन पदोंसे गुह्यतम (अपने प्रभावकी) बात कह दी, पर सर्वगुह्यतम बात गीतामें पहले कहीं नहीं कही। अब यहाँ अर्जुनकी घबराहटको देखकर भगवान् कहते हैं कि मैं सर्वगुह्यतम अर्थात् सबसे अत्यन्त गोपनीय बात फिर कहूँगा, तू मेरे परम, सर्वश्रेष्ठ वचनोंको सुन। इस श्लोकमें “सर्वगुह्यतमम्” पदसे भगवान्ने बताया कि यह हरेकके सामने प्रकट करनेकी बात नहीं है और सड़सठवें श्लोकमें “इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन” पदसे भगवान्ने बताया कि इस बातको असहिष्णु और अभक्तसे कभी मत कहना। इस प्रकार दोनों तरफसे निषेध करके बीचमें (छियासठवें श्लोकमें)
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज
इस सर्वगुह्यतम बातको रखा है। दोनों तरफसे निषेध करनेका तात्पर्य है कि यह गीताभरमें अत्यन्त रहस्यमय खास उपदेश है।1 दूसरे अध्यायके सातवें श्लोकमें “धर्मसम्मूढचेताः” कहकर अर्जुन अपनेको धर्मका निर्णय करनेमें अयोग्य समझते हुए भगवान्से पूछते हैं, उनके शिष्य बनते हैं और शिक्षा देनेके लिये कहते हैं। अतः भगवान् यहाँ (छाछठवें श्लोकमें) कहते हैं कि तू धर्मके निर्णयका भार अपने ऊपर मत ले, वह भार मेरेपर छोड़ दे—मेरे ही अर्पण कर दे और अनन्यभावसे केवल मेरी शरणमें आ जा। फिर तेरेको जो पाप आदिका डर है, उन सब पापोंसे मैं तुझे मुक्त कर दूँगा। तू सब चिन्ताओंको छोड़ दे। यही भगवान्का “सर्वगुह्यतम परम वचन” है। “भूयः शृणु” का तात्पर्य है कि मैंने यही बात दूसरे शब्दोंमें पहले भी कही थी, पर तुमने ध्यान नहीं दिया। अतः मैं फिर वही बात कहता हूँ। अब इस बातपर तुम विशेषरूपसे ध्यान दो। यह सर्वगुह्यतमवाली बात भगवान्ने पहले “मत्परः.... मच्चित्तः सततं भव” (18। 57) और “मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि” (18। 58) पदोंसे कह दी थी; परन्तु “सर्वगुह्यतमम्” पद पहले नहीं कहा, और अर्जुनका भी उस बातपर लक्ष्य नहीं गया। इसलिये अब फिर उस बातपर अर्जुनका लक्ष्य करानेके लिये और उस बातका महत्त्व बतानेके लिये भगवान् यहाँ “सर्वगुह्यतमम्” पद देते हैं।
इष्टोऽसि मे दृढमिति
इससे पहले भगवान्ने कहा था कि जैसी मरजी आये, वैसा कर। जो अनुयायी है, आज्ञा-पालक है, शरणागत है, उसके लिये ऐसी बात कहनेके समान दूसरा क्या दण्ड दिया जा सकता है! अतः इस बातको सुनकर अर्जुनके मनमें भय पैदा हो गया कि भगवान् मेरा त्याग कर रहे हैं। उस भयको दूर करनेके लिये भगवान् यहाँ कहते हैं कि तुम मेरे अत्यन्त प्यारे मित्र हो2। यदि अर्जुनके मनमें भय या संदेह न होता, तो भगवान्को
तुम मेरे अत्यन्त प्यारे मित्र हो
यह कहकर सफाई देनेकी क्या जरूरत थी? सफाई देना तभी बनता है, जब दूसरेके मनमें भय हो, सन्देह हो, हलचल हो। “इष्टः” कहनेका दूसरा भाव यह है कि भगवान् अपने शरणागत भक्तको अपना इष्टदेव मान लेते हैं। भक्त सब कुछ छोड़कर केवल भगवान्को अपना इष्ट मानता है, तो भगवान् भी उसको अपना इष्ट मान लेते हैं; क्योंकि भक्तिके विषयमें भगवान्का यह कानून है—“ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्” (गीता 4। 11) अर्थात् जो भक्त जैसे मेरे शरण होते हैं, मैं भी उनको वैसे ही आश्रय देता हूँ। भगवान्की दृष्टिमें भक्तके समान और कोई श्रेष्ठ नहीं है। भागवतमें भगवान् उद्धवजीसे कहते हैं— “तुम्हारे-जैसे प्रेमी भक्त मुझे जितने प्यारे हैं, उतने प्यारे न ब्रह्माजी हैं, न शंकरजी हैं, न बलरामजी हैं; और तो क्या, मेरे शरीरमें निवास करनेवाली लक्ष्मीजी और मेरी आत्मा भी उतनी प्यारी नहीं है3।” “दृढम्” कहनेका तात्पर्य है कि जब तुमने एक बार कह दिया कि “मैं आपके शरण हूँ” (दूसरे अध्यायका सातवाँ श्लोक) तो अब तुम्हें बिलकुल भी भय नहीं करना चाहिये। कारण कि जो मेरी शरणमें आकर एक बार भी सच्चे हृदयसे कह देता है कि “मैं आपका ही हूँ” उसको मैं सम्पूर्ण प्राणियोंसे अभय (सुरक्षित) कर देता हूँ—यह मेरा व्रत है4।
ततो वक्ष्यामि ते हितम्
तू मेरा अत्यन्त प्यारा मित्र है, इसलिये अपने हृदयकी अत्यन्त गोपनीय और अपने दरबारकी श्रेष्ठ-से-श्रेष्ठ बात तुझे कहूँगा। दूसरी बात, मैं जो आगे शरणागतिकी बात कहूँगा, उसका यह तात्पर्य नहीं है कि मेरी शरणमें आनेसे मुझे कोई लाभ हो जायगा, प्रत्युत इसमें केवल तेरा ही हित होगा। इससे सिद्ध होता है कि प्राणिमात्रका हित केवल इसी बातमें है कि वह किसी दूसरेका सहारा न लेकर केवल भगवान्की ही शरण ले। भगवान्की शरण होनेके सिवाय जीवका कहीं भी, किंचिन्मात्र भी हित नहीं है। कारण यह है कि जीव साक्षात् परमात्माका अंश है। इसलिये वह परमात्माको छोड़कर किसीका भी सहारा लेगा तो वह सहारा टिकेगा नहीं। जब संसारकी कोई भी वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, अवस्था आदि स्थिर नहीं है, तो फिर उनका सहारा कैसे स्थिर रह सकता है? उनका सहारा तो रहेगा नहीं, पर चिन्ता, शोक, दुःख आदि रह जायँगे! जैसे, अग्निसे अंगार दूर हो जाता है तो वह काला कोयला बन जाता है—“कोयला होय नहीं उजला, सौ मन साबुन लगाय।” पर वही कोयला जब पुनः अग्निसे मिल जाता है, तब वह अंगार (अग्निरूप) बन जाता है और चमक उठता है। ऐसे ही यह जीव भगवान्से विमुख हो जाता है तो बार-बार जन्मता-मरता और दुःख पाता रहता है, पर जब यह भगवान्के सम्मुख हो जाता है अर्थात् अनन्यभावसे भगवान्की शरणमें हो जाता है, तब यह भगवत्स्वरूप बन जाता है और चमक उठता है, तथा संसारमात्रका कल्याण करनेवाला हो जाता है।
परिशिष्ट भाव
“तमेव शरणं गच्छ” (18। 62)—इसमें निराकारकी शरणागति है और “मामेकं शरणं व्रज” (18। 66)—इसमें साकारकी शरणागति है। निराकारकी शरणमें जानेसे मुक्ति हो जायगी; परन्तु साकारकी शरणमें जानेसे मुक्तिके साथ-साथ प्रेमकी भी प्राप्ति हो जायगी। इसलिये साकारकी शरणागति “सर्वगुह्यतम” है। भगवान् भक्तिके प्रसंगमें ही “परम वचन” कहते हैं। दसवें अध्यायके पहले श्लोकमें भी भगवान्ने कहा है—“शृणु मे परमं वचः”। अर्जुनने भगवान्से कहा था कि मैं आपका शिष्य हूँ—“शिष्यस्तेऽहम्” (2। 7), पर भगवान् कहते हैं कि तू मेरा इष्ट मित्र है—“इष्टोऽसि”! तात्पर्य है कि गुरु तो चेला बनाता है, पर भगवान् चेला न बनाकर अपना मित्र बनाते हैं! भगवान्की तो हरेक बात ही हित करनेवाली है, पर उसमें भी विशेष हितकी बात होनेसे भगवान् “ततो वक्ष्यामि ते हितम्” कहते हैं।
1-दसवें अध्यायके आरम्भमें भगवान्ने “भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः” कहा और यहाँ “सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे
परमं वचः” कहा। इन दोनोंमें केवल “एव महाबाहो” की जगह “सर्वगुह्यतमम्” पद आया है अर्थात् केवल छः अक्षर ही बदले
हैं, बाकी दस अक्षर वे-के-वे ही हैं। वहाँ “भूय एव महाबाहो” कहकर “मच्चित्ताः” (10। 9) कहते हैं और यहाँ “मच्चित्तः”
(18। 57-58) कहकर “सर्वगुह्यतमं भूयः” कहते हैं। परन्तु “मच्चित्ताः” और “मच्चित्तः” में थोड़ा फरक है। वहाँ “मच्चित्ताः”
में प्रथम पुरुषका प्रयोग करके सामान्य रीतिसे सबके लिये बात कही है, और यहाँ “मच्चित्तः” में मध्यम पुरुषका प्रयोग करके
अर्जुनके लिये विशेष आज्ञा दी है। वहाँ भी “मेरी कृपासे अज्ञान दूर हो जायगा” ऐसा कहा है और यहाँ भी “मेरी कृपासे तू
सब विघ्नोंको तर जायगा” ऐसा कहा है।
वहाँ “यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया” (10। 1) कहा है और यहाँ “ततो वक्ष्यामि ते हितम्” कहा है। वहाँ
“मन्मना भव......” (9। 34) कहकर अव्यवहितरूपसे (लगातार, पासमें ही) “भूय एव महाबाहो......” कहा है, और यहाँ
“सर्वगुह्यतमं भूयः......” कहकर अव्यवहितरूपसे “मन्मना भव......” (18। 65) कहा है।
जैसे “सर्वगुह्यतमम्” पद गीतामें एक ही बार आया है, ऐसे ही “सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज”—ऐसा वाक्य भी
एक ही बार आया है।
2-सासति करि पुनि करहिं पसाऊ। नाथ प्रभुन्ह कर सहज सुभाऊ॥ (मानस 1। 89। 2)
3-न तथा मे प्रियतम आत्मयोनिर्न शंकरः। न च संकर्षणो न श्रीर्नैवात्मा च यथा भवान्॥ (श्रीमद्भा0 11। 14। 15)
4-सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते। अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥ (वाल्मीकि0 6। 18। 33)
65श्रीभगवान्
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरुमामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥ 65॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
पदच्छेद
श्लोकमें ढूँढ़नेके लिये हॉवर करें
व्याख्या
5 sections
मद्भक्तः
साधकको सबसे पहले “मैं भगवान्का हूँ” इस प्रकार अपनी अहंता-(मैं-पन-) को बदल देना चाहिये। कारण कि बिना अहंताके बदले साधन सुगमतासे नहीं होता। अहंताके बदलनेपर साधन सुगमतासे, स्वाभाविक ही होने लगता है। अतः साधकको सबसे पहले “मद्भक्तः” होना चाहिये। किसीका शिष्य बननेपर व्यक्ति अपनी अहंताको बदल देता है कि “मैं तो गुरु महाराजका ही हूँ।” विवाह हो जानेपर कन्या अपनी अहंताको बदल देती है कि “मैं तो ससुरालकी ही हूँ”, और पिताके कुलका सम्बन्ध बिलकुल छूट जाता है। ऐसे ही साधकको अपनी अहंता बदल देनी चाहिये कि “मैं तो भगवान्का ही हूँ और भगवान् ही मेरे हैं; मैं संसारका नहीं हूँ और संसार मेरा नहीं है”। [अहंताके बदलनेपर ममता भी अपने-आप बदल जाती है।]
मन्मना भव
उपर्युक्त प्रकारसे अपनेको भगवान्का मान लेनेपर भगवान्में स्वाभाविक ही मन लगने लगता है। कारण कि जो अपना होता है, वह स्वाभाविक ही प्रिय लगता है और जहाँ प्रियता होती है, वहाँ स्वाभाविक ही मन लगता है। अतः भगवान्को अपना माननेसे भगवान् स्वाभाविक ही प्रिय लगते हैं। फिर मनसे स्वाभाविक ही भगवान्के नाम, गुण, प्रभाव, लीला आदिका चिन्तन होता है। भगवान्के नामका जप और स्वरूपका ध्यान बड़ी तत्परतासे और लगनपूर्वक होता है।
मद्याजी
अहंता बदल जानेपर अर्थात् अपने- आपको भगवान्का मान लेनेपर संसारका सब काम भगवान्की सेवाके रूपमें बदल जाता है अर्थात् साधक पहले जो संसारका काम करता था, वही काम अब भगवान्का काम हो जाता है। भगवान्का सम्बन्ध ज्यों-ज्यों दृढ़ होता जाता है, त्यों-ही-त्यों उसका सेवाभाव पूजाभावमें परिणत होता जाता है। फिर वह चाहे संसारका काम करे, चाहे घरका काम करे, चाहे शरीरका काम करे, चाहे ऊँचा-नीचा कोई भी काम करे, उसमें भगवान्की पूजाका ही भाव बना रहता है। उसकी यह दृढ़ धारणा हो जाती है कि भगवान्की पूजाके सिवाय मेरा कुछ भी काम नहीं है।
मां नमस्कुरु
भगवान्के चरणोंमें साष्टांग प्रणाम करके सर्वथा भगवान्के समर्पित हो जाय। मैं प्रभुके चरणोंमें ही पड़ा हुआ हूँ—ऐसा मनमें भाव रखते हुए जो कुछ अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति सामने आ जाय, उसमें भगवान्का मंगलमय विधान मानकर परम प्रसन्न रहे। भगवान्के द्वारा मेरे लिये जो कुछ भी विधान होगा, वह मंगलमय ही होगा। पूरी परिस्थिति मेरी समझमें आये या न आये—यह बात दूसरी है, पर भगवान्का विधान तो मेरे लिये कल्याणकारी ही है, इसमें कोई सन्देह नहीं। अतः जो कुछ होता है, वह मेरे कर्मोंका फल नहीं है, प्रत्युत भगवान्के द्वारा कृपा करके केवल मेरे हितके लिये भेजा हुआ विधान है। कारण कि भगवान् प्राणिमात्रके परम सुहृद् होनेसे जो कुछ विधान करते हैं, वह जीवोंके कल्याणके लिये ही करते हैं। इसलिये भगवान् अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति भेजकर प्राणियोंके पुण्य-पापोंका नाश करके, उन्हें परम शुद्ध बनाकर अपने चरणोंमें खींच रहे हैं—इस प्रकार दृढ़तासे भाव होना ही भगवान्के चरणोंमें नमस्कार करना है।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे
भगवान् कहते हैं कि इस प्रकार मेरा भक्त होनेसे, मेरेमें मनवाला होनेसे, मेरा पूजन करनेवाला होनेसे और मुझे नमस्कार करनेसे तू मेरेको ही प्राप्त होगा अर्थात् मेरेमें ही निवास करेगा*—ऐसी मैं सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ; क्योंकि तू मेरा प्यारा है। “प्रियोऽसि मे” कहनेका तात्पर्य है कि भगवान्का जीवमात्रपर अत्यधिक स्नेह है। अपना ही अंश होनेसे कोई भी जीव भगवान्को अप्रिय नहीं है। भगवान् जीवोंको चाहे चौरासी लाख योनियोंमें भेजें, चाहे नरकोंमें भेजें, उनका उद्देश्य जीवोंको पवित्र करनेका ही होता है। जीवोंके प्रति भगवान्का जो यह कृपापूर्ण विधान है, यह भगवान्के प्यारका ही द्योतक है। इसी बातको प्रकट करनेके लिये भगवान् अर्जुनको जीवमात्रका प्रतिनिधि बनाकर “प्रियोऽसि मे” वचन कहते हैं। जीवमात्र भगवान्को अत्यन्त प्रिय है। केवल जीव ही भगवान्से विमुख होकर प्रतिक्षण वियुक्त होनेवाले संसार- (धन-सम्पत्ति, कुटुम्बी, शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण आदि-) को अपना मानने लगता है, जबकि संसारने कभी जीवको अपना नहीं माना है। जीव ही अपनी तरफसे संसारसे सम्बन्ध जोड़ता है। संसार प्रतिक्षण परिवर्तनशील है और जीव नित्य अपरिवर्तनशील है। जीवसे यही गलती होती है कि वह प्रतिक्षण बदलनेवाले संसारके सम्बन्धको नित्य मान लेता है। यही कारण है कि सम्बन्धीके न रहनेपर भी उससे माना हुआ सम्बन्ध रहता है। यह माना हुआ सम्बन्ध ही अनर्थका हेतु है। इस सम्बन्धको मानने अथवा न माननेमें सभी स्वतन्त्र हैं। अतः इस माने हुए सम्बन्धका त्याग करके, जिनसे हमारा वास्तविक और नित्य-सम्बन्ध है, उन भगवान्की शरणमें चले जाना चाहिये।
परिशिष्ट भाव
अर्जुन भगवान्को प्राप्त ही हैं; अतः यहाँ “मामेवैष्यसि” कहनेका तात्पर्य है कि तेरेको समग्र (“माम्”)-की प्राप्ति हो जायगी, जिसके लिये भगवान्ने सातवें अध्यायके आरम्भमें कहा था—“असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु”। फिर तेरी मेरेसे आत्मीयता हो जायगी, जिसके लिये भगवान्ने सातवें अध्यायमें कहा था— “ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्” (7। 18), “प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः” (7। 17)।
* भगवान्का भक्त होना, उनमें मन लगाना, उनका पूजन करना और उन्हें नमस्कार करना—इन चारोंमें एक भी साधन
ठीक तरहसे होनेपर शेष तीनों साधन उसमें स्वतः आ जाते हैं।
66श्रीभगवान्
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रजअहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥ 66॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

पीछेके दो श्लोकोंमें अर्जुनको आश्वासन देकर अब भगवान् आगेके श्लोकमें अपने उपदेशकी अत्यन्त गोपनीय सार बात बताते हैं।

पदच्छेद
श्लोकमें ढूँढ़नेके लिये हॉवर करें
व्याख्या
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सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज
भगवान् कहते हैं कि सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय, धर्मके निर्णयका विचार छोड़कर अर्थात् क्या करना है और क्या नहीं करना है—इसको छोड़कर केवल एक मेरी ही शरणमें आ जा। स्वयं भगवान्के शरणागत हो जाना—यह सम्पूर्ण साधनोंका सार है। इसमें शरणागत भक्तको अपने लिये कुछ भी करना शेष नहीं रहता; जैसे—पतिव्रताका अपना कोई काम नहीं रहता। वह अपने शरीरकी सार-सँभाल भी पतिके नाते, पतिके लिये ही करती है। वह घर, कुटुम्ब, वस्तु, पुत्र-पुत्री और अपने कहलानेवाले शरीरको भी अपना नहीं मानती, प्रत्युत पतिदेवका ही मानती है। तात्पर्य यह हुआ कि जिस प्रकार पतिव्रता पतिके परायण होकर पतिके गोत्रमें ही अपना गोत्र मिला देती है और पतिके ही घरपर रहती है, उसी प्रकार शरणागत भक्त भी शरीरको लेकर माने जानेवाले गोत्र, जाति, नाम आदिको भगवान्के चरणोंमें अर्पण करके निर्भय, निःशोक, निश्चिन्त और निःशंक हो जाता है। गीताके अनुसार यहाँ “धर्म” शब्द कर्तव्य-कर्मका वाचक है। कारण कि इसी अध्यायके इकतालीसवेंसे चौवालीसवें श्लोकतक “स्वभावज कर्म” शब्द आये हैं, फिर सैंतालीसवें श्लोकके पूर्वार्धमें “स्वधर्म” शब्द आया है। उसके बाद, सैंतालीसवें श्लोकके ही उत्तरार्धमें तथा (प्रकरणके अन्तमें) अड़तालीसवें श्लोकमें “कर्म” शब्द आया है। तात्पर्य यह हुआ कि आदि और अन्तमें “कर्म” शब्द आया है और बीचमें “स्वधर्म” शब्द आया है तो इससे स्वतः ही “धर्म” शब्द कर्तव्य-कर्मका वाचक सिद्ध हो जाता है। अब यहाँ प्रश्न यह होता है कि “सर्वधर्मान्परित्यज्य” पदसे क्या धर्म अर्थात् कर्तव्य-कर्मका स्वरूपसे त्याग माना जाय? इसका उत्तर यह है कि धर्मका स्वरूपसे त्याग करना न तो गीताके अनुसार ठीक है और न यहाँके प्रसंगके अनुसार ही ठीक है; क्योंकि भगवान्की यह बात सुनकर अर्जुनने कर्तव्य-कर्मका त्याग नहीं किया है, प्रत्युत “करिष्ये वचनं तव” (18। 73) कहकर भगवान्की आज्ञाके अनुसार कर्तव्य-कर्मका पालन करना स्वीकार किया है। केवल स्वीकार ही नहीं किया है, प्रत्युत अपने क्षात्रधर्मके अनुसार युद्ध भी किया है। अतः उपर्युक्त पदमें धर्म अर्थात् कर्तव्यका त्याग करनेकी बात नहीं है। भगवान् भी कर्तव्यके त्यागकी बात कैसे कह सकते हैं! भगवान्ने इसी अध्यायके छठे श्लोकमें कहा है कि यज्ञ, दान, तप और अपने-अपने वर्ण-आश्रमोंके जो कर्तव्य हैं, उनका कभी त्याग नहीं करना चाहिये, प्रत्युत उनको जरूर करना चाहिये*। गीताका पूरा अध्ययन करनेसे यह मालूम होता है कि मनुष्यको किसी भी हालतमें कर्तव्य-कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये। अर्जुन तो युद्धरूप कर्तव्य-कर्म छोड़कर भिक्षा माँगना श्रेष्ठ समझते थे (दूसरे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक); परन्तु भगवान्ने इसका निषेध किया (दूसरे अध्यायके इकतीसवेंसे अड़तीसवें श्लोकतक)। इससे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ स्वरूपसे धर्मोंका त्याग नहीं है। अब विचार यह करना है कि यहाँ सम्पूर्ण धर्मोंके त्यागसे क्या लेना चाहिये? गीताके अनुसार सम्पूर्ण धर्मों अर्थात् कर्मोंको भगवान्के अर्पण करना ही सर्वश्रेष्ठ धर्म है। इसमें सम्पूर्ण धर्मोंके आश्रयका त्याग करना और केवल भगवान्का आश्रय लेना—दोनों बातें सिद्ध हो जाती हैं। धर्मका आश्रय लेनेवाले बार-बार जन्म-मरणको प्राप्त होते हैं—“एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते” (गीता 9। 21)। इसलिये धर्मका आश्रय छोड़कर भगवान्का ही आश्रय लेनेपर फिर अपने धर्मका निर्णय करनेकी जरूरत नहीं रहती। आगे अर्जुनके जीवनमें ऐसा हुआ भी है। अर्जुनका कर्णके साथ युद्ध हो रहा था। इस बीच कर्णके रथका चक्का पृथ्वीमें धँस गया। कर्ण रथसे नीचे उतरकर रथके चक्केको निकालनेका उद्योग करने लगा और अर्जुनसे बोला कि “जबतक मैं यह चक्का निकाल न लूँ, तबतक तुम ठहर जाओ; क्योंकि तुम रथपर हो और मैं रथसे रहित हूँ और दूसरे कार्यमें लगा हुआ हूँ। ऐसे समय रथीको उचित है कि उसपर बाण न छोड़े। तुम सहस्त्रार्जुनके समान शस्त्र और शास्त्रके ज्ञाता हो और धर्मको जाननेवाले हो, इसलिये मेरे ऊपर प्रहार करना उचित नहीं है।” कर्णकी बात सुनकर अर्जुनने बाण नहीं चलाया। तब भगवान्ने कर्णसे कहा कि “तुम्हारे-जैसे आततायीको किसी तरहसे मार देना धर्म ही है, पाप नहीं* और अभी-अभी तुम छः महारथियोंने मिलकर अकेले अभिमन्युको घेरकर उसे मार डाला। अतः धर्मकी दुहाई देनेसे कोई लाभ नहीं है। हाँ, यह सौभाग्यकी बात है कि इस समय तुम्हें धर्मकी बात याद आ रही है, पर जो स्वयं धर्मका पालन नहीं करता, उसे धर्मकी दुहाई देनेका कोई अधिकार नहीं है।” ऐसा कहकर भगवान्ने अर्जुनको बाण चलानेकी आज्ञा दी तो अर्जुनने बाण चलाना आरम्भ कर दिया। इस प्रकार यदि अर्जुन अपनी बुद्धिसे धर्मका निर्णय करते तो भूल कर बैठते; अतः उन्होंने धर्मका निर्णय भगवान्पर ही रखा और भगवान्ने धर्मका निर्णय किया भी। अर्जुनके मनमें सन्देह था कि हमलोगोंके लिये युद्ध करना श्रेष्ठ है अथवा युद्ध न करना श्रेष्ठ है (दूसरे अध्यायका छठा श्लोक)। यदि हम युद्ध करते हैं तो अपने कुटुम्बका नाश होता है और अपने कुटुम्बका नाश करना बड़ा भारी पाप है। इससे तो अनर्थ-परम्परा ही बढ़ेगी (पहले अध्यायके चालीसवेंसे चौवालीसवें श्लोकतक)। दूसरी तरफ हमलोग देखते हैं तो क्षत्रियके लिये युद्धसे बढ़कर श्रेयका कोई साधन नहीं है। अतः भगवान् कहते हैं कि क्या करना है और क्या नहीं करना है, क्या धर्म है और क्या अधर्म है, इस पचड़ेमें तू क्यों पड़ता है? तू धर्मके निर्णयका भार मेरेपर छोड़ दे। यही “सर्वधर्मान्परित्यज्य” का तात्पर्य है।
मामेकं शरणं व्रज
इन पदोंमें “एकम्” पद “माम्” का विशेषण नहीं हो सकता; क्योंकि “माम्” (भगवान्) एक ही हैं, अनेक नहीं। इसलिये “एकम्” पदका अर्थ “अनन्य” लेना ही ठीक बैठता है। दूसरी बात, अर्जुनने “तदेकं वद निश्चित्य” (3। 2) और “यच्छ्रेय एतयोरेकम्” (5। 1) पदोंमें भी “एकम्” पदसे सांख्य और कर्मयोगके विषयमें एक निश्चित श्रेयका साधन पूछा है। उसी “एकम्” पदको लेकर भगवान् यहाँ यह बताना चाहते हैं कि सांख्ययोग, कर्मयोग आदि जितने भी भगवत्प्राप्तिके साधन हैं, उन सम्पूर्ण साधनोंमें मुख्य साधन एक अनन्य शरणागति ही है। गीतामें अर्जुनने अपने कल्याणके साधनके विषयमें कई तरहके प्रश्न किये और भगवान्ने उनके उत्तर भी दिये। वे सब साधन होते हुए भी गीताके पूर्वापरको देखनेसे यह बात स्पष्ट दीखती है कि सम्पूर्ण साधनोंका सार और शिरोमणि साधन भगवान्के अनन्यशरण होना ही है। भगवान्ने गीतामें जगह-जगह अनन्यभक्तिकी बहुत महिमा गायी है। जैसे, दुस्तर मायाको सुगमतासे तरनेका उपाय अनन्य शरणागति ही है1 (सातवें अध्यायका चौदहवाँ श्लोक); अनन्यचेताके लिये मैं सुलभ हूँ 2 (आठवें अध्यायका चौदहवाँ श्लोक); परम पुरुषकी प्राप्ति अनन्य भक्तिसे ही होती है (आठवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक); अनन्य भक्तोंका योगक्षेम मैं वहन करता हूँ (नवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक); अनन्य भक्तिसे ही भगवान्को जाना, देखा तथा प्राप्त किया जा सकता है (ग्यारहवें अध्यायका चौवनवाँ श्लोक); अनन्य भक्तोंका मैं बहुत जल्दी उद्धार करता हूँ (बारहवें अध्यायका छठा-सातवाँ श्लोक); गुणातीत होनेका उपाय अनन्यभक्ति ही है (चौदहवें अध्यायका छब्बीसवाँ श्लोक)। इस प्रकार अनन्य भक्तिकी महिमा गाकर भगवान् यहाँ पूरी गीताका सार बताते हैं— “मामेकं शरणं व्रज।” तात्पर्य है कि उपाय और उपेय, साधन और साध्य मैं ही हूँ। “मामेकं शरणं व्रज” का तात्पर्य मन-बुद्धिके द्वारा शरणागतिको स्वीकार करना नहीं है, प्रत्युत स्वयंको भगवान्की शरणमें जाना है। कारण कि स्वयंके शरण होनेपर मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर आदि भी उसीमें आ जाते हैं, अलग नहीं रहते।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः
यहाँ कोई ऐसा मान सकता है कि पहले अध्यायमें अर्जुनने जो युद्धसे पाप होनेकी बातें कही थीं, उन पापोंसे छुटकारा दिलानेका प्रलोभन भगवान्ने दिया है। परन्तु यह मान्यता युक्तिसंगत नहीं है; क्योंकि जब अर्जुन सर्वथा भगवान्के शरण हो गये हैं, तब उनके पाप कैसे रह सकते हैं 3 और उनके लिये प्रलोभन कैसे दिया जा सकता है अर्थात् उनके लिये प्रलोभन देना बनता ही नहीं। हाँ, पापोंसे मुक्त करनेका प्रलोभन देना हो तो वह शरणागत होनेके पहले ही दिया जा सकता है, शरणागत होनेके बाद नहीं।
मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा
इसका भाव यह है कि जब तू सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय छोड़कर मेरी शरणमें आ गया और शरण होनेके बाद भी तुम्हारे भावों, वृत्तियों, आचरणों आदिमें फरक नहीं पड़ा अर्थात् उनमें सुधार नहीं हुआ; भगवत्प्रेम, भगवद्दर्शन आदि नहीं हुए और अपनेमें अयोग्यता, अनधिकारिता, निर्बलता आदि मालूम होती है, तो भी उनको लेकर तुम चिन्ता या भय मत करो। कारण कि जब तुम मेरी अनन्य-शरण हो गये तो वह कमी तुम्हारी कमी कैसे रही? उसका सुधार करना तुम्हारा काम कैसे रहा? वह कमी मेरी कमी है। अब उस कमीको दूर करना, उसका सुधार करना मेरा काम रहा। तुम्हारा तो बस, एक ही काम है; वह काम है—निर्भय, निःशोक, निश्चिन्त और निःशंक होकर मेरे चरणोंमें पड़े रहना4! परन्तु अगर तेरेमें भय, चिन्ता, वहम आदि दोष आ जायँगे तो वे शरणागतिमें बाधक हो जायँगे और सब भार तेरेपर आ जायगा। शरण होकर अपनेपर भार लेना शरणागतिमें कलंक है। जैसे, विभीषण भगवान् रामके चरणोंकी शरण हो जाते हैं, तो फिर विभीषणके दोषको भगवान् अपना ही दोष मानते हैं। एक समय विभीषणजी समुद्रके इस पार आये। वहाँ विप्रघोष नामक गाँवमें उनसे एक अज्ञात ब्रह्महत्या हो गयी। इसपर वहाँके ब्राह्मणोंने इकट्ठे होकर विभीषणको खूब मारा-पीटा, पर वे मरे नहीं। फिर ब्राह्मणोंने उन्हें जंजीरोंसे बाँधकर जमीनके भीतर एक गुफामें ले जाकर बंद कर दिया। रामजीको विभीषणके कैद होनेका पता लगा तो वे पुष्पकविमानके द्वारा तत्काल विप्रघोष नामक गाँवमें पहुँच गये और वहाँ विभीषणका पता लगाकर उनके पास गये। ब्राह्मणोंने रामजीका बहुत आदर-सत्कार किया और कहा कि “महाराज! इसने ब्रह्महत्या कर दी है। इसको हमने बहुत मारा, पर यह मरा नहीं।” भगवान् रामने कहा कि “हे ब्राह्मणो! विभीषणको मैंने कल्पतककी आयु और राज्य दे रखा है, वह कैसे मारा जा सकता है! और उसको मारनेकी जरूरत ही क्या है? वह तो मेरा भक्त है। भक्तके लिये मैं स्वयं मरनेको तैयार हूँ। दासके अपराधकी जिम्मेवारी वास्तवमें उसके मालिकपर ही होती है अर्थात् मालिक ही उसके दण्डका पात्र होता है। अतः विभीषणके बदलेमें आपलोग मेरेको ही दण्ड दें1।” भगवान्की यह शरणागतवत्सलता देखकर सब ब्राह्मण आश्चर्य करने लगे और उन सबने भगवान्की शरण ले ली। तात्पर्य यह हुआ कि
मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं
इस अपनेपनके समान योग्यता, पात्रता, अधिकारिता आदि कुछ भी नहीं है। यह सम्पूर्ण साधनोंका सार है। छोटा-सा बच्चा भी अपनेपनके बलपर ही आधी रातमें सारे घरको नचाता है अर्थात् जब वह रातमें रोता है तो सारे घरवाले उठ जाते हैं और उसे राजी करते हैं। इसलिये शरणागत भक्तको अपनी योग्यता आदिकी तरफ न देखकर भगवान्के साथ अपनेपनकी तरफ ही देखते रहना चाहिये। “मा शुचः” का तात्पर्य है— (1) मेरे शरण होकर तू चिन्ता करता है, यह मेरे प्रति अपराध है, तेरा अभिमान है और शरणागतिमें कलंक है। मेरे शरण होकर भी मेरा पूरा विश्वास, भरोसा न रखना ही मेरे प्रति अपराध है। अपने दोषोंको लेकर चिन्ता करना वास्तवमें अपने बलका अभिमान है; क्योंकि दोषोंको मिटानेमें अपनी सामर्थ्य मालूम देनेसे ही उनको मिटानेकी चिन्ता होती है। हाँ, अगर दोषोंको मिटानेमें चिन्ता न होकर दुःख होता है तो दुःख होना इतना दोषी नहीं है। जैसे, छोटे बालकके पास कुत्ता आता है तो वह कुत्तेको देखकर रोता है, चिन्ता नहीं करता। ऐसे ही दोषोंका न सुहाना दोष नहीं है, प्रत्युत चिन्ता करना दोष है। चिन्ता करनेका अर्थ यही होता है कि भीतरमें अपने छिपे हुए बलका आश्रय है2 और यही तेरा अभिमान है। मेरा भक्त होकर भी तू चिन्ता करता है तो तेरी चिन्ता दूर कहाँ होगी? लोग भी देखेंगे तो यही कहेंगे कि यह भगवान्का भक्त है और चिन्ता करता है! भगवान् इसकी चिन्ता नहीं मिटाते! तू मेरा विश्वास न करके चिन्ता करता है तो विश्वासकी कमी तो है तेरी और कलंक आता है मेरेपर, मेरी शरणागतिपर। इसको तू छोड़ दे। (2) तेरे भाव, वृत्तियाँ, आचरण शुद्ध नहीं हुए हैं तो भी तू इनकी चिन्ता मत कर। इनकी चिन्ता मैं करूँगा। (3) दूसरे अध्यायके सातवें श्लोकमें अर्जुन भगवान्के शरण हो जाते हैं और फिर आठवें श्लोकमें कहते हैं कि इस भूमण्डलका धन-धान्यसे सम्पन्न निष्कण्टक राज्य मिलनेपर अथवा देवताओंका आधिपत्य मिलनेपर भी इन्द्रियोंको सुखानेवाला मेरा शोक दूर नहीं हो सकता। भगवान् मानो कह रहे हैं कि तेरा कहना ठीक ही है; क्योंकि भौतिक नाशवान् पदार्थोंके सम्बन्धसे किसीका शोक कभी दूर हुआ नहीं, हो सकता नहीं और होनेकी सम्भावना भी नहीं। परन्तु मेरे शरण होकर जो तू शोक करता है, यह तेरी बड़ी भारी गलती है। तू मेरे शरण होकर भी भार अपने सिरपर ले रहा है। (4) शरणागत होनेके बाद भक्तको लोक-परलोक, सद्गत-दुर्गति आदि किसी भी बातकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये। इस विषयमें किसी भक्तने कहा है— दिवि वा भुवि वा ममास्तु वासो नरके वा नरकान्तक प्रकामम्। अवधीरितशारदारविन्दौ चरणौ ते मरणेऽपि चिन्तयामि॥ “हे नरकासुरका अन्त करनेवाले प्रभो! आप मेरेको चाहे स्वर्गमें रखें, चाहे भूमण्डलपर रखें और चाहे यथेच्छ नरकमें रखें अर्थात् आप जहाँ रखना चाहें, वहाँ रखें। जो कुछ करना चाहें, वह करें। इस विषयमें मेरा कुछ भी कहना नहीं है। मेरी तो एक यही माँग है कि शरद्-ऋतुके कमलकी शोभाको तिरस्कृत करनेवाले आपके अति सुन्दर चरणोंका मृत्यु-जैसी भयंकर अवस्थामें भी चिन्तन करता रहूँ; आपके चरणोंको भूलूँ नहीं।” शरणागति-सम्बन्धी
परिशिष्ट भाव
भगवान्के साथ कर्मयोगीका “नित्य” सम्बन्ध होता है, ज्ञानयोगीका “तात्त्विक” सम्बन्ध होता है और शरणागत भक्तका “आत्मीय” सम्बन्ध होता है। नित्य सम्बन्धमें संसारके अनित्य सम्बन्धका त्याग है, तात्त्विक सम्बन्धमें तत्त्वके साथ एकता (तत्त्वबोध) है और आत्मीय सम्बन्धमें भगवान्के साथ अभिन्नता (प्रेम) है। नित्य-सम्बन्धमें शान्तरस है, तात्त्विक सम्बन्धमें अखण्डरस है और आत्मीय सम्बन्धमें अनन्तरस है। अनन्तरसकी प्राप्ति हुए बिना जीवकी भूख सर्वथा नहीं मिटती। अनन्तरसकी प्राप्ति शरणागतिसे होती है। इसलिये शरणागति सर्वगुह्यतम एवं सर्वश्रेष्ठ साधन है। “सर्वधर्मान्परित्यज्य” पदका अर्थ “सम्पूर्ण धर्मोंका स्वरूपसे त्याग” नहीं है, प्रत्युत “सम्पूर्ण धर्मोंके आश्रयका त्याग” है। तात्पर्य है कि किसी भी धर्म (कर्तव्य कर्म)-का आश्रय न हो। जैसे, पहले अध्यायमें आया है—“त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च” (1। 33)। वहाँ भी “प्राणांस्त्यक्त्वा” का अर्थ “प्राणोंका त्याग” न लेकर “प्राणोंके आश्रय (आशा)-का त्याग” ही लिया जा सकता है; क्योंकि प्राणोंका त्याग करके कोई युद्धमें कैसे खड़ा होगा? असम्भव बात है। इसी तरह पहले अध्यायके नवें श्लोकमें आया है—“अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः” तो इसका अर्थ यह नहीं है कि बहुत-से अन्य शूरवीर अपने जीवनका त्याग करके खड़े हैं। इसका अर्थ है कि वे शूरवीर अपने जीवनकी आशाका त्याग करके खड़े हैं अर्थात् उनको अपने जीवनकी परवाह नहीं है। अतः यहाँ भी “सर्वधर्मान्परित्यज्य” पदका अर्थ “धर्मोंके आश्रयका त्याग” लेना चाहिये। जैसे शूरवीरोंको अपने प्राणोंकी अथवा अपने जीवनकी परवाह नहीं है, ऐसे ही भक्तको दूसरे धर्मोंकी परवाह नहीं है। उसकी दृष्टिमें दूसरे धर्मों (कर्तव्य कर्मों)-का महत्त्व नहीं है। कारण कि भगवान्की शरणागतिका जितना महत्त्व है, उतना धर्मोंका महत्त्व नहीं है। धर्म (कर्तव्य-कर्म)-में जड़ताका और शरणागतिमें चिन्मयताका सम्बन्ध रहता है। कर्तव्य कर्म अपने वर्णाश्रमको लेकर होता है; अतः उसमें शरीरकी मुख्यता रहती है। परन्तु शरणागति स्वयंको लेकर होती है; अतः उसमें भगवान्की मुख्यता रहती है। “मामेकं शरणं व्रज” का तात्पर्य है—बाहरसे (व्यवहारमें) सबके साथ प्रेम, आदर-सत्कारका व्यवहार करनेपर भी भीतरसे किसीकी गरज न हो, किसीका आश्रय न हो, केवल भगवान्का ही आश्रय हो— यह बिनती रघुबीर गुर्साइं। और आस-बिस्वास-भरोसो, हरौ जीव-जड़ताई॥ एक भरोसो एक बल एक आस बिस्वास। एक राम घन स्याम हित चातक तुलसीदास॥ वास्तवमें पूर्ण शरणागति भगवान् ही प्रदान करते हैं। जैसे छोटा बालक अपना हाथ ऊँचा करता है तो माँ उसको उठा लेती है, ऐसे ही भक्त अपनी शक्तिसे भगवान्के सम्मुख होता है, शरणागतिकी तैयारी करता है तो भगवान् उसको पूर्ण शरणागति दे देते हैं। अर्जुन पापोंसे छूटना चाहते थे, इसलिये भगवान्ने भी पापोंसे मुक्त करनेकी बात कही है; क्योंकि भगवान्का स्वभाव है—“ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्” (गीता 4। 11)। वास्तवमें केवल पापोंसे मुक्ति ही शरणागतिका फल नहीं है। अनन्य शरणागतिसे मनुष्य भगवान्से अभिन्न होकर अनन्तरसको प्राप्त कर सकता है! इसलिये साधकको पापोंसे अथवा दुःखोंसे मुक्ति पानेकी इच्छा न रखकर केवल भगवान्के शरणागत हो जाना चाहिये। कुछ भी चाहनेसे कुछ (अन्तवाला) ही मिलता है, पर कुछ भी न चाहनेसे सब कुछ (अनन्त) मिलता है! भगवान् भी शरणागत भक्तके वशमें हो जाते हैं, उसके ऋणी हो जाते हैं। यह शरणागति गीताका सार है, जिसको भगवान्ने विशेष कृपा करके कहा है। इस शरणागतिमें ही गीताके उपदेशकी पूर्णता होती है। इसके बिना गीता अधूरी रहती! इसलिये अर्जुनके द्वारा “करिष्ये वचनं तव” कहकर पूर्ण शरणागति स्वीकार करनेपर फिर भगवान् नहीं बोले।
विशेष बात
विशेष बात शरणागत भक्त “मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं” इस भावको दृढ़तासे पकड़ लेता है, स्वीकार कर लेता है तो उसके भय, शोक, चिन्ता, शंका आदि दोषोंकी जड़ कट जाती अर्थात् दोषोंका आधार मिट जाता है। कारण कि भक्तिकी दृष्टिसे सभी दोष भगवान्की विमुखतापर ही टिके रहते हैं। भगवान्के सम्मुख होनेपर भी संसार और शरीरके आश्रयके संस्कार रहते हैं, जो भगवान्के सम्बन्धकी दृढ़ता होनेपर मिट जाते हैं1। उनके मिटनेपर सब दोष भी मिट जाते हैं। सम्बन्धका दृढ़ होना क्या है? भय, शोक, चिन्ता, शंका, परीक्षा और विपरीत भावनाका न होना ही सम्बन्धका दृढ़ होना है। अब इनपर विचार करें। (1) निर्भय होना—आचरणोंकी कमी होनेसे भीतरसे भय पैदा होता है और साँप, बिच्छू, बाघ आदिसे बाहरसे भय पैदा होता है। शरणागत भक्तके ये दोनों ही प्रकारके भय मिट जाते हैं। इतना ही नहीं, पतंजलि महाराजने जिस मृत्युके भयको पाँचवाँ क्लेश माना है2 और जो बड़े-बड़े विद्वानोंको भी होता है3, वह भय भी सर्वथा मिट जाता है4। अब मेरी वृत्तियाँ खराब हो जायँगी! —ऐसा भयका भाव भी साधकको भीतरसे ही निकाल देना चाहिये; क्योंकि “मैं भगवान्की कृपामें तरान्तर हो गया हूँ, अब मेरेको किसी बातका भय नहीं है। इन वृत्तियोंको मेरी माननेसे ही मैं इनको शुद्ध नहीं कर सका; क्योंकि इनको मेरी मानना ही मलिनता है—“ममता मल जरि जाइ” (मानस 7। 117 क)। अतः अब मैं कभी भी इनको मेरी नहीं मानूँगा। जब वृत्तियाँ मेरी हैं ही नहीं तो मेरेको भय किस बातका? अब तो केवल भगवान्की कृपा-ही- कृपा है! भगवान्की कृपा ही सर्वत्र परिपूर्ण हो रही है! यह बड़ी खुशीकी, बड़ी प्रसन्नताकी बात है!” कई ऐसी शंका करते हैं कि भगवान्के शरण होकर उनका भजन करनेसे तो द्वैत हो जायगा अर्थात् भगवान् और भक्त—ये दो हो जायँगे और दूसरेसे भय होता है— “द्वितीयाद्वै भयं भवति” (बृहदारण्यक0 1। 4। 2)। पर यह शंका निराधार है। भय द्वितीयसे तो होता है, पर आत्मीयसे भय नहीं होता अर्थात् भय दूसरेसे होता है, अपनेसे नहीं। प्रकृति और प्रकृतिका कार्य शरीर-संसार द्वितीय है, इसलिये इनसे सम्बन्ध रखनेपर ही भय होता है; क्योंकि इनके साथ सदा सम्बन्ध रह ही नहीं सकता। कारण यह है कि प्रकृति और पुरुषका स्वभाव सर्वथा भिन्न-भिन्न है; जैसे एक जड है और एक चेतन, एक विकारी है और एक निर्विकारी, एक परिवर्तनशील है और एक अपरिवर्तनशील, एक प्रकाश्य है और एक प्रकाशक, इत्यादि। भगवान् द्वितीय नहीं हैं। वे तो आत्मीय हैं; क्योंकि जीव उनका सनातन अंश है, उनका स्वरूप है। अतः भगवान्के शरण होनेपर उनसे भय कैसे हो सकता है? प्रत्युत उनके शरण होनेपर मनुष्य सदाके लिये अभय हो जाता है। स्थूल दृष्टिसे देखा जाय तो बच्चेको माँसे दूर रहनेपर भय होता है, पर माँकी गोदमें चले जानेपर उसका भय मिट जाता है; क्योंकि माँ उसकी अपनी है। भगवान्का भक्त इससे विलक्षण होता है। कारण कि बच्चे और माँमें तो भेदभाव दीखता है, पर भक्त और भगवान्में भेदभाव सम्भव ही नहीं है। (2) निःशोक होना—जो बात बीत चुकी है, उसको लेकर शोक होता है। बीती हुई बातको लेकर शोक करना बड़ी भारी भूल है; क्योंकि जो हुआ है, वह अवश्यम्भावी था और जो नहीं होनेवाला है, वह कभी हो ही नहीं सकता तथा अभी जो हो रहा है, वह ठीक-ठीक (वास्तविक) होनेवाला ही हो रहा है, फिर उसमें शोक करनेकी कोई बात ही नहीं है1। प्रभुके इस मंगलमय विधानको जानकर शरणागत भक्त सदा निःशोक रहता है; शोक उसके पास कभी आता ही नहीं। (3) निश्चिन्त होना—जब भक्त अपनी मानी हुई वस्तुओंसहित अपने-आपको भगवान्के समर्पित कर देता है, तब उसको लौकिक-पारलौकिक किंचिन्मात्र भी चिन्ता नहीं होती अर्थात् अभी जीवन-निर्वाह कैसे होगा? कहाँ रहना होगा? मेरी क्या दशा होगी? क्या गति होगी? आदि चिन्ताएँ बिलकुल नहीं रहतीं2। भगवान्के शरण होनेपर शरणागत भक्तमें यह एक बात आती है कि “अगर मेरा जीवन प्रभुके लायक सुन्दर और शुद्ध नहीं बना तो भक्तोंकी बात मेरे आचरणमें कहाँ आयी? अर्थात् नहीं आयी; क्योंकि मेरी वृत्तियाँ ठीक नहीं रहतीं।” वास्तवमें “मेरी वृत्तियाँ हैं” ऐसा मानना ही दोष है, वृत्तियाँ उतनी दोषी नहीं हैं। मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर आदिमें जो मेरापन है—यही गलती है; क्योंकि जब मैं भगवान्के शरण हो गया और जब सब कुछ उनके अर्पण कर दिया, तो फिर मन, बुद्धि आदि मेरे कहाँ रहे? इसलिये शरणागतको मन, बुद्धि आदिकी अशुद्धिकी चिन्ता कभी नहीं करनी चाहिये अर्थात् मेरी वृत्तियाँ ठीक नहीं हैं—ऐसा भाव कभी नहीं लाना चाहिये। किसी कारणवश अचानक ऐसी वृत्तियाँ आ भी जायँ तो आर्तभावसे “हे मेरे नाथ! हे मेरे प्रभो! बचाओ! बचाओ!! बचाओ!!!” ऐसे प्रभुको पुकारना चाहिये; क्योंकि वे मेरे स्वामी हैं, मेरे सर्वसमर्थ प्रभु हैं तो अब मैं चिन्ता क्यों करूँ? और भगवान्ने भी कह दिया है कि “तू चिन्ता मत कर” (मा शुचः)। अतः निश्चिन्त होकर मनसे भगवान्के चरणोंमें गिर जाय और भगवान्से कह दे—“हे नाथ! यह सब आपके हाथकी बात है, आप जानें।” सर्वसमर्थ प्रभुके शरण भी हो गये और चिन्ता भी करें—ये दोनों बातें बड़ी विरोधी हैं; क्योंकि शरण हो गये तो चिन्ता कैसी? और चिन्ता होती है तो शरणागति कैसी? इसलिये शरणागतको ऐसा सोचना चाहिये कि जब भगवान् यह कहते हैं कि “मैं सम्पूर्ण पापोंसे छुड़ा दूँगा”, तो क्या ऐसी वृत्तियोंसे छूटनेके लिये मेरेको कुछ करना पड़ेगा? मैं तो बस, आपका हूँ। हे भगवन्! मेरेमें वृत्तियोंको अपना माननेका भाव कभी आये ही नहीं। हे नाथ! शरीर, इन्द्रियाँ, प्राण, मन, बुद्धि—ये कभी मेरे दीखें ही नहीं। परन्तु हे नाथ! सब कुछ आपको देनेपर भी ये शरीर आदि कभी-कभी मेरे दीख जाते हैं; अब इस अपराधसे मेरेको आप ही छुड़ाइये—ऐसा कहकर निश्चिन्त हो जाय। (4) निःशंक होना—भगवान्के सम्बन्धमें कभी यह सन्देह न करे कि मैं भगवान्का हुआ या नहीं? भगवान्ने मुझे स्वीकार किया या नहीं? प्रत्युत इस बातको देखे कि “मैं तो अनादिकालसे भगवान्का ही था, भगवान्का ही हूँ और आगे भी सदा भगवान्का ही रहूँगा। मैंने ही अपनी मूर्खतासे अपनेको भगवान्से अलग—विमुख मान लिया था। परन्तु मैं अपनेको भगवान्से कितना ही अलग मान लूँ तो भी उनसे अलग हो सकता ही नहीं और होना सम्भव भी नहीं। अगर मैं भगवान्से अलग होना भी चाहूँ, तो भी अलग कैसे हो सकता हूँ?” क्योंकि भगवान्ने कहा है कि यह जीव मेरा ही अंश है—“मम एव अंशः” (गीता 15। 7)। इस प्रकार “मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं”—इस वास्तविकताकी स्मृति आते ही शंकाएँ—सन्देह मिट जाते हैं, शंकाओं—सन्देहोंके लिये किंचिन्मात्र भी गुंजाइश नहीं रहती। (5) परीक्षा न करना—भगवान्के शरण होकर ऐसी परीक्षा न करे कि “जब मैं भगवान्के शरण हो गया हूँ तो मेरेमें ऐसे-ऐसे लक्षण घटने चाहिये। यदि ऐसे-ऐसे लक्षण मेरेमें नहीं हैं तो मैं भगवान्के शरण कहाँ हुआ?” प्रत्युत “अद्वेष्टा” आदि (गीता—बारहवें अध्यायके तेरहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक) गुणोंकी अपनेमें कमी दीखे तो आश्चर्य करे कि मेरेमें यह कमी कैसे रह गयी!* ऐसा भाव आते ही यह कमी नहीं रहेगी, मिट जायगी। कारण कि यह उसका प्रत्यक्ष अनुभव है कि पहले अद्वेष्टा आदि गुण जितने कम थे, उतने कम अब नहीं हैं। शरणागत होनेपर भक्तोंके जितने भी लक्षण हैं, वे सब बिना प्रयत्न किये आते हैं। (6) विपरीत धारणा न करना—भगवान्के शरणागत भक्तमें यह विपरीत धारणा भी कैसे हो सकती है कि “मैं भगवान्का नहीं हूँ”; क्योंकि यह मेरे मानने अथवा न माननेपर निर्भर नहीं है। भगवान्का और मेरा परस्पर जो सम्बन्ध है, वह अटूट है, अखण्ड है, नित्य है। मैंने इस सम्बन्धकी तरफ खयाल नहीं किया, यह मेरी गलती थी। अब वह गलती मिट गयी, तो फिर विपरीत धारणा हो ही कैसे सकती है? जो मनुष्य सच्चे हृदयसे प्रभुकी शरणागतिको स्वीकार कर लेता है, उसमें भय, शोक, चिन्ता आदि दोष नहीं रहते। उसका शरणभाव स्वतः ही दृढ़ होता चला जाता है; जैसे— विवाह होनेके बाद कन्याका अपने पिताके घरसे सम्बन्ध- विच्छेद और पतिके घरसे सम्बन्ध स्वतः ही दृढ़ होता चला जाता है। वह सम्बन्ध यहाँतक दृढ़ हो जाता है कि जब वह कन्या दादी-परदादी बन जाती है, तब उसको स्वप्नमें भी यह भाव नहीं आता कि मैं यहाँकी नहीं हूँ। उसके मनमें यह भाव दृढ़ हो जाता है कि मैं तो यहाँकी ही हूँ और ये सब मेरे ही हैं। जब उसके पौत्रकी स्त्री आती है और घरमें उद्दण्डता करती है, खटपट मचाती है तो वह (दादी) कहती है कि इस परायी जायी छोकरीने मेरा घर बिगाड़ दिया! पर उस बूढ़ी दादीको यह बात याद ही नहीं आती कि मैं भी तो परायी जायी (पराये घरमें जन्मी) हूँ। तात्पर्य यह हुआ कि जब बनावटी सम्बन्धमें भी इतनी दृढ़ता हो सकती है, तब भगवान्के ही अंश इस प्राणीका भगवान्के साथ जो नित्य सम्बन्ध है, वह दृढ़ हो जाय—इसमें आश्चर्य ही क्या है! वास्तवमें भगवान्के सम्बन्धकी दृढ़ताके लिये केवल संसारके माने हुए सम्बन्धोंका त्याग करनेकी ही आवश्यकता है। सच्चे हृदयसे प्रभुके चरणोंकी शरण होनेपर उस शरणागत भक्तमें यदि किसी भाव, आचरण आदिकी किंचित् कमी रह जाय, कभी विपरीत वृत्ति पैदा हो जाय अथवा किसी परिस्थितिमें पड़कर (परवशतासे) कभी किंचित् कोई दुष्कर्म हो जाय, तो उसके हृदयमें जलन पैदा हो जायगी। इसलिये उसके लिये अन्य कोई प्रायश्चित्त करनेकी आवश्यकता नहीं है। भगवान् कृपा करके उसके उस पापको सर्वथा नष्ट कर देते हैं1। भगवान् भक्तके अपनेपनको ही देखते हैं, गुणों और अवगुणोंको नहीं2 अर्थात् भगवान्को भक्तके दोष दीखते ही नहीं, उनको तो केवल भक्तके साथ जो अपनापन है, वही दीखता है। कारण कि स्वरूपसे भक्त सदासे ही भगवान्का है। दोष आगन्तुक होनेसे आते-जाते रहते हैं और वह नित्य-निरन्तर ज्यों-का-त्यों ही रहता है। इसलिये भगवान्की दृष्टि सदा इस वास्तविकतापर ही जमी रहती है। जैसे, कीचड़ आदिसे सना हुआ बच्चा जब माँके सामने आता है, तब माँकी दृष्टि केवल अपने बच्चेकी तरफ जाती है बच्चेके मैलेकी तरफ नहीं जाती। बच्चेकी दृष्टि भी मैलेकी तरफ नहीं जाती। माँ साफ करे या न करे, पर बच्चेकी दृष्टिमें तो मैला है ही नहीं, उसकी दृष्टिमें तो केवल माँ ही है। द्रौपदीके मनमें कितना द्वेष और क्रोध भरा हुआ था कि जब दुःशासनके खूनसे अपने केश धोऊँगी, तभी केशोंको बाँधूँगी! परन्तु द्रौपदी जब भी भगवान्को पुकारती है, भगवान् चट आ जाते हैं; क्योंकि भगवान्के साथ द्रौपदीका गाढ़ अपनापन था। भगवान्के साथ अपनापन होनेमें दो भाव रहते हैं— (1) भगवान् मेरे हैं और (2) मैं भगवान्का हूँ। इन दोनोंमें भगवान्का सम्बन्ध समान रीतिसे रहते हुए भी “भगवान् मेरे हैं”—इस भावमें भगवान्से अपनी अनुकूलताकी इच्छा हो सकती है कि “भगवान् मेरे हैं तो मेरी इच्छाकी पूर्ति क्यों नहीं करते?” परन्तु “मैं भगवान्का हूँ” इस भावमें भगवान्से अपनी अनुकूलताकी इच्छा नहीं हो सकती; क्योंकि “मैं भगवान्का हूँ तो भगवान् मेरे लिये जैसा ठीक समझें, वैसा ही निःसंकोच होकर करें”। इसलिये साधकको चाहिये कि वह भगवान्की ही मरजीमें सर्वथा अपनी मरजी मिला दे, भगवान्पर अपना किंचित् भी आधिपत्य न माने, प्रत्युत अपनेपर उनका पूरा आधिपत्य माने। कहीं भी भगवान् हमारे मनकी करें तो उसमें संकोच हो कि मेरे लिये भगवान्को ऐसा करना पड़ा! यदि अपने मनकी बात पूरी होनेसे संकोच नहीं होता, प्रत्युत संतोष होता है तो यह शरणागति नहीं है। शरणागत भक्त शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धिके प्रतिकूल परिस्थितिमें भी भगवान्की मरजी समझकर प्रसन्न रहता है। शरणागत भक्तको अपने लिये कभी किंचिन्मात्र भी कुछ करना शेष नहीं रहता; क्योंकि उसने सम्पूर्ण ममतावाली वस्तुओंसहित अपने-आपको भगवान्के समर्पित कर दिया, जो वास्तवमें प्रभुका ही था। अब करने, कराने आदिका सब काम भगवान्का ही रह गया। ऐसी अवस्थामें वह कठिन- से-कठिन और भयंकर-से-भयंकर घटना, परिस्थितिमें भी अपनेपर प्रभुकी महान् कृपा देखकर सदा प्रसन्न रहता है, मस्त रहता है। जैसे, गरुडजीके पूछनेपर काकभुशुण्डिजीने अपने पूर्वजन्मके ब्राह्मण-शरीरकी कथा सुनायी, जिसमें लोमश ऋषिने शाप देकर उन्हें (ब्राह्मणको) पक्षियोंमें नीच चाण्डाल पक्षी (कौआ) बना दिया; परन्तु काकभुशुण्डिजीके मनमें न कुछ भय हुआ और न कुछ दीनता ही आयी। उन्होंने उसमें भगवान्का शुद्ध विधान ही समझा। केवल समझा ही नहीं, प्रत्युत मन-ही-मन बोल उठे—“उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन” (मानस 7। 113। 1)। ऐसा भयंकर शाप मिलनेपर भी जब काकभुशुण्डिजीकी प्रसन्नतामें कोई कमी नहीं आयी, तब लोमश ऋषिने उनको भगवान्का प्यारा भक्त समझकर अपने पास बुलाया और बालक रामजीका ध्यान बताया। फिर भगवान्की कथा सुनायी और अत्यन्त प्रसन्न होकर काकभुशुण्डिजीके सिरपर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया—“मेरी कृपासे तुम्हारे हृदयमें अबाध, अखण्ड रामभक्ति रहेगी। तुम रामजीके प्यारे हो जाओगे। तुम सम्पूर्ण गुणोंकी खान बन जाओगे। जिस रूपकी इच्छा करोगे, वह रूप धारण कर लोगे। जिस स्थानपर तुम रहोगे, उसमें एक योजनपर्यन्त मायाका कण्टक किंचिन्मात्र भी नहीं आयेगा” आदि-आदि। इस प्रकार बहुत-से आशीर्वाद देते ही आकाशवाणी हुई कि “हे ऋषे! तुमने जो कुछ कहा, वह सब सच्चा होगा, यह मन, वाणी, कर्मसे मेरा भक्त है।” इन्हीं बातोंको लेकर भगवान्के विधानमें सदा प्रसन्न रहनेवाले काकभुशुण्डिजीने कहा है— भगति पच्छ हठ करि रहेउँ दीन्हि महा रिषि साप। मुनि दुर्लभ बर पायउँ देखहु भजन प्रताप॥ यहाँ “भजन प्रताप” शब्दोंका अर्थ है—भगवान्के विधानमें हर समय प्रसन्न रहना। विपरीत-से-विपरीत अवस्थामें भी प्रेमी भक्तकी प्रसन्नता अधिक-से-अधिक बढ़ती रहती है; क्योंकि प्रेमका स्वरूप ही प्रतिक्षण वर्धमान है। यह नियम है कि जो चीज अपनी होती है, वह सदा ही अपनेको प्यारी लगती है। भगवान् सम्पूर्ण जीवोंको अपना प्रिय मानते हैं—“सब मम प्रिय सब मम उपजाए” (मानस 7। 86। 2) और इस जीवको भी प्रभु स्वतः ही प्रिय लगते हैं। हाँ, यह बात दूसरी है कि यह जीव परिवर्तनशील संसार और शरीरको भूलसे अपना मानकर अपने प्यारे प्रभुसे विमुख हो जाता है। इसके विमुख होनेपर भी भगवान्ने अपनी तरफसे किसी भी जीवका त्याग नहीं किया है और न कभी त्याग कर ही सकते हैं। कारण कि जीव सदासे साक्षात् भगवान्का ही अंश है। इसलिये सम्पूर्ण जीवोंके साथ भगवान्की आत्मीयता अक्षुण्ण, अखण्डितरूपसे स्वाभाविक ही बनी हुई है। इसीसे वे मात्र जीवोंपर कृपा करनेके लिये अर्थात् भक्तोंकी रक्षा, दुष्टोंका विनाश और धर्मकी स्थापना—इन तीन बातोंके लिये समय-समयपर अवतार लेते हैं (गीता—चौथे अध्यायका आठवाँ श्लोक)। इन तीनों बातोंमें केवल भगवान्की आत्मीयता ही टपक रही है, नहीं तो भक्तोंकी रक्षा, दुष्टोंका विनाश और धर्मकी स्थापनासे भगवान्का क्या प्रयोजन सिद्ध होता है? अर्थात् कुछ भी प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। भगवान् तो ये तीनों ही काम केवल प्राणिमात्रके कल्याणके लिये ही करते हैं। इससे भी प्राणिमात्रके साथ भगवान्की स्वाभाविक आत्मीयता, कृपालुता, प्रियता, हितैषिता, सुहृत्ता और निरपेक्ष उदारता ही सिद्ध होती है, और यहाँ भी इसी दृष्टिसे अर्जुनसे कहते हैं—“मद्भक्तो भव, मन्मना भव, मद्याजी भव, मां नमस्कुरु।” इन चारों बातोंमें भगवान्का तात्पर्य केवल जीवको अपने सम्मुख करानेमें ही है, जिससे सम्पूर्ण जीव असत् पदार्थोंसे विमुख हो जायँ; क्योंकि दुःख, संताप, बार-बार जन्मना-मरना, मात्र विपत्ति आदिमें मुख्य हेतु भगवान्से विमुख होना ही है। भगवान् जो कुछ भी विधान करते हैं, वह संसारमात्रके सम्पूर्ण जीवोंके कल्याणके लिये ही करते हैं—बस, भगवान्की इस कृपाकी तरफ जीवकी दृष्टि हो जाय, तो फिर उसके लिये क्या करना बाकी रहा? जीवोंके हितके लिये भगवान्के हृदयमें एक तड़फन है, इसीलिये भगवान् “सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज” वाली अत्यन्त गोपनीय बात कह देते हैं। कारण कि भगवान् जीवमात्रको अपना मित्र मानते हैं— “सुहृदं सर्वभूतानाम्” (5। 29) और उन्हें यह स्वतन्त्रता देते हैं कि वे कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग आदि जितने भी साधन हैं, उनमेंसे किसी भी साधनके द्वारा सुगमतापूर्वक मेरी प्राप्ति कर सकते हैं और दुःख, संताप आदिको सदाके लिये समूल नष्ट कर सकते हैं। वास्तवमें जीवका उद्धार केवल भगवत्कृपासे ही होता है। कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, अष्टांगयोग, लययोग, हठयोग, राजयोग, मन्त्रयोग आदि जितने भी साधन हैं, वे सब-के-सब भगवान्के द्वारा और भगवत्तत्त्वको जाननेवाले महापुरुषोंके द्वारा ही प्रकट किये गये हैं1। अतः इन सब साधनोंमें भगवत्कृपा ही ओत-प्रोत है। साधन करनेमें तो साधक निमित्तमात्र होता है, पर साधनकी सिद्धिमें भगवत्कृपा ही मुख्य है। शरणागत भक्तको तो ऐसी चिन्ता भी कभी नहीं करनी चाहिये कि अभी भगवान्के दर्शन नहीं हुए, भगवान्के चरणोंमें प्रेम नहीं हुआ, अभी वृत्तियाँ शुद्ध नहीं र्हुइं, आदि। इस प्रकारकी चिन्ताएँ करना मानो बँदरीका बच्चा बनना है। बँदरीका बच्चा स्वयं ही बँदरीको पकड़े रहता है। बँदरी कूदे-फाँदे, किधर भी जाय, बच्चा स्वयं बँदरीसे चिपका रहता है। भक्तको तो अपनी सब चिन्ताएँ भगवान्पर ही छोड़ देनी चाहिये अर्थात् भगवान् दर्शन दें या न दें, प्रेम दें या न दें, वृत्तियोंको ठीक करें या न करें, हमें शुद्ध बनायें या न बनायें—यह सब भगवान्की मरजीपर छोड़ देना चाहिये। उसे तो बिल्लीका बच्चा बनना चाहिये। बिल्लीका बच्चा अपनी माँपर निर्भर रहता है। बिल्ली चाहे जहाँ रखे, चाहे जहाँ ले जाय। बिल्ली अपनी मरजीसे बच्चेको उठाकर ले जाती है तो वह पैर समेट लेता है। ऐसे ही शरणागत भक्त संसारकी तरफसे अपने हाथ-पैर समेटकर2 केवल भगवान्का चिन्तन, नाम-जप आदि करते हुए भगवान्की तरफ ही देखता रहता है। भगवान्का जो विधान है, उसमें परम प्रसन्न रहता है, अपने मनकी कुछ भी नहीं लगाता। जैसे, कुम्हार पहले मिट्टीको सिरपर उठाकर लाता है तो कुम्हारकी मरजी, फिर उस मिट्टीको गीला करके उसे रौंदता है तो कुम्हारकी मरजी, फिर चक्केपर चढ़ाकर घुमाता है तो कुम्हारकी मरजी। मिट्टी कभी कुछ नहीं कहती कि तुम घड़ा बनाओ, सकोरा बनाओ, मटकी बनाओ। कुम्हार चाहे जो बनाये, उसकी मरजी है। ऐसे ही शरणागत भक्त अपनी कुछ भी मरजी, मनकी बात नहीं रखता। वह जितना अधिक निश्चिन्त और निर्भय होता है, भगवत्कृपा उसको अपने-आप उतना ही अधिक अपने अनुकूल बना लेती है और जितनी वह चिन्ता करता है, अपना बल मानता है, उतना ही वह आती हुई भगवत्कृपामें बाधा लगाता है अर्थात् शरणागत होनेपर भगवान्की ओरसे जो विलक्षण, विचित्र, अखण्ड, अटूट कृपा आती है, अपनी चिन्ता करनेसे उस कृपामें बाधा लग जाती है। जैसे धीवर (मछुआ) मछलियोंको पकड़नेके लिये नदीमें जाल डालता है तो जालके भीतर आनेवाली सब मछलियाँ पकड़ी जाती हैं; परन्तु जो मछली जाल डालनेवाले मछुएके चरणोंके पास आ जाती है, वह नहीं पकड़ी जाती। ऐसे ही भगवान्की माया-(संसार-) में ममता करके जीव फँस जाते हैं और जन्मते-मरते रहते हैं; परन्तु जो जीव मायापति भगवान्के चरणोंकी शरण हो जाते हैं, वे मायाको तर जाते हैं—“मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते” (गीता 7। 14)। इस दृष्टान्तका एक ही अंश ग्रहण करना चाहिये; क्योंकि धीवरका तो मछलियोंको जालमें फँसानेका भाव होता है; परन्तु भगवान्का जीवोंको मायामें फँसानेका किंचिन्मात्र भी भाव नहीं होता। भगवान्का भाव तो जीवोंको मायाजालसे मुक्त करके अपने शरण लेनेका होता है, तभी तो वे कहते हैं— “मामेकं शरणं व्रज।” जीव संयोगजन्य सुखकी लोलुपतासे खुद ही मायामें फँस जाते हैं। जैसे चलती हुई चक्कीके भीतर आनेवाले सभी दाने पिस जाते हैं;* परन्तु जिसके आधारपर चक्की चलती है, उस कीलके आस-पास रहनेवाले दाने ज्यों-के-त्यों साबूत रह जाते हैं। ऐसे ही जन्म-मरणरूप संसारकी चलती हुई चक्कीमें पड़े हुए सब-के-सब जीव पिस जाते हैं अर्थात् दुःख पाते हैं; परन्तु जिसके आधारपर संसार-चक्र चलता है, उन भगवान्के चरणोंका सहारा लेनेवाला जीव पिसनेसे बच जाता है—“कोई हरिजन ऊबरे, कील माकड़ी पास।” परन्तु यह दृष्टान्त भी पूरा नहीं घटता; क्योंकि दाने तो स्वाभाविक ही कीलके पास रह जाते हैं। वे बचनेका कोई उपाय नहीं करते। परन्तु भगवान्के भक्त संसारसे विमुख होकर प्रभुके चरणोंका आश्रय लेते हैं। तात्पर्य यह है कि जो भगवान्का अंश होकर भी संसारको अपना मानता है अथवा संसारसे कुछ चाहता है, वही जन्म- मरणरूप चक्रमें पड़कर दुःख भोगता है। संसार और भगवान्—इन दोनोंका सम्बन्ध दो तरहका होता है। संसारका सम्बन्ध केवल माना हुआ है और भगवान्का सम्बन्ध वास्तविक है। संसारका सम्बन्ध तो मनुष्यको पराधीन बनाता है, गुलाम बनाता है, पर भगवान्का सम्बन्ध मनुष्यको स्वाधीन बनाता है, चिन्मय बनाता है और बनाता है भगवान्का भी मालिक! किसी बातको लेकर अपनेमें कुछ भी विशेषता दीखती है, यही वास्तवमें पराधीनता है। यदि मनुष्य विद्या, बुद्धि, धन-सम्पत्ति, त्याग, वैराग्य आदि किसी बातको लेकर अपनी विशेषता मानता है तो यह उस विद्या आदिकी पराधीनता, दासता ही है। जैसे, कोई धनको लेकर अपनेमें विशेषता मानता है तो यह विशेषता वास्तवमें धनकी ही हुई, खुदकी नहीं। वह अपनेको धनका मालिक मानता है, पर वास्तवमें वह धनका गुलाम है। संसारका यह कायदा है कि सांसारिक पदार्थोंको लेकर जो अपनेमें कुछ विशेषता मानता है, उसको ये सांसारिक पदार्थ तुच्छ बना देते हैं, पद-दलित कर देते हैं। परन्तु जो भगवान्के आश्रित होकर सदा भगवान्पर ही निर्भर रहता है, उसको अपनी कुछ विशेषता दीखती ही नहीं, प्रत्युत भगवान्की ही अलौकिकता, विलक्षणता, विचित्रता दीखती है। भगवान् चाहे उसको अपना मुकुटमणि बना लें और चाहे अपना मालिक बना लें, तो भी उसको अपनेमें कुछ भी विशेषता नहीं दीखती। प्रभुका यह कायदा है कि जिस भक्तको अपनेमें कुछ भी विशेषता नहीं दीखती, अपनेमें किसी बातका अभिमान नहीं होता, उस भक्तमें भगवान्की विलक्षणता उतर आती है। किसी-किसीमें यहाँतक विलक्षणता उतर आती है कि उसके शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि प्राकृत पदार्थ भी चिन्मय बन जाते हैं। उनमें जडताका अत्यन्त अभाव हो जाता है। ऐसे भगवान्के कई प्रेमी भक्त भगवान्में ही समा गये, अन्तमें उनके शरीर नहीं मिले। जैसे मीराबाई शरीरसहित भगवान्के श्रीविग्रहमें लीन हो गयीं। केवल पहचानके लिये उनकी साड़ीका छोटा-सा छोर श्रीविग्रहके मुखमें रह गया और कुछ नहीं बचा। ऐसे ही सन्त श्रीतुकारामजी शरीरसहित वैकुण्ठ चले गये। ज्ञानमार्गमें शरीर चिन्मय नहीं होता; क्योंकि ज्ञानी असत्से सम्बन्ध-विच्छेद करके, असत्से अलग होकर स्वयं चिन्मय तत्त्वमें स्थित हो जाता है। परन्तु जब भक्त भगवान्के सम्मुख होता है, तब उसके शरीर, इन्द्रियाँ, मन, प्राण आदि सभी भगवान्के सम्मुख हो जाते हैं। तात्पर्य यह हुआ कि जिनकी दृष्टि केवल चिन्मय तत्त्वपर ही है अर्थात् जिनकी दृष्टिमें चिन्मय तत्त्वसे भिन्न जडताकी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं होती, तो वह चिन्मयता उनके शरीर आदिमें भी उतर आती है और वे शरीर आदि चिन्मय हो जाते हैं। हाँ, लोगोंकी दृष्टिमें तो उनके शरीरमें जडता दीखती है, पर वास्तवमें उनके शरीर चिन्मय ही होते हैं। भगवान्के सर्वथा शरण हो जानेपर शरणागतके लिये भगवान्की कृपा तो विशेषतासे प्रकट होती ही है, पर मात्र संसारका स्नेहपूर्वक पालन करनेवाली और भगवान्से अभिन्न रहनेवाली वात्सल्यमयी माता लक्ष्मीका प्रभु- शरणागतपर कितना अधिक स्नेह होता है, वे कितना अधिक प्यार करती हैं, इसका कोई भी वर्णन नहीं कर सकता। लौकिक व्यवहारमें भी देखनेमें आता है कि पतिव्रता स्त्रीको पितृभक्त पुत्र बहुत प्यारा लगता है। दूसरी बात, प्रेमभावसे परिपूरित प्रभु जब अपने भक्तको देखनेके लिये गरुडपर बैठकर पधारते हैं, तब माता लक्ष्मी भी प्रभुके साथ गरुडपर बैठकर आती हैं, जिस गरुडकी पाँखोंसे सामवेदके मन्त्रोंका गान होता रहता है! परन्तु कोई भगवान्को न चाहकर केवल माता लक्ष्मीको ही चाहता है, तो उसके स्नेहके कारण माता लक्ष्मी आ तो जाती हैं, पर उनका वाहन दिवान्ध उल्लू होता है। ऐसे वाहनवाली लक्ष्मीको प्राप्त करके मनुष्य भी मदान्ध हो जाता है। अगर उस माँको कोई भोग्या समझ लेता है तो उसका बड़ा भारी पतन हो जाता है; क्योंकि वह तो अपनी माँको ही कुदृष्टिसे देखता है, इसलिये वह महान् अधम है। तीसरी बात, जहाँ केवल भगवान्का प्रेम होता है, वहाँ तो भगवान्से अभिन्न रहनेवाली लक्ष्मी भगवान्के साथ आ ही जाती हैं, पर जहाँ केवल लक्ष्मीकी चाहना है, वहाँ लक्ष्मीके साथ भगवान् भी आ जायँ—यह नियम नहीं है। शरणागतिके विषयमें एक कथा आती है। सीताजी, रामजी और हनुमान्जी जंगलमें एक वृक्षके नीचे बैठे थे। उस वृक्षकी शाखाओं और टहनियोंपर एक लता छायी हुई थी। लताके कोमल-कोमल तन्तु फैल रहे थे। उन तन्तुओंमें कहींपर नयी-नयी कोपलें निकल रही थीं और कहींपर ताम्रवर्णके पत्ते निकल रहे थे। पुष्प और पत्तोंसे लता छायी हुई थी। उससे वृक्षकी सुन्दर शोभा हो रही थी। वृक्ष बहुत ही सुहावना लग रहा था। उस वृक्षकी शोभाको देखकर भगवान् श्रीराम हनुमान्जीसे बोले—“देखो हनुमान्! यह लता कितनी सुन्दर है! वृक्षके चारों ओर कैसी छायी हुई है! यह लता अपने सुन्दर-सुन्दर फल, सुगन्धित फूल और हरी-हरी पत्तियोंसे इस वृक्षकी कैसी शोभा बढ़ा रही है! इससे जंगलके अन्य सब वृक्षोंसे यह वृक्ष कितना सुन्दर दीख रहा है! इतना ही नहीं, इस वृक्षके कारण ही सारे जंगलकी शोभा हो रही है। इस लताके कारण ही पशु-पक्षी इस वृक्षका आश्रय लेते हैं। धन्य है यह लता!” भगवान् श्रीरामके मुखसे लताकी प्रशंसा सुनकर सीताजी हनुमान्जीसे बोलीं—“देखो बेटा हनुमान्! तुमने खयाल किया कि नहीं? देखो, इस लताका ऊपर चढ़ जाना, फूल-पत्तोंसे छा जाना, तन्तुओंका फैल जाना—ये सब वृक्षके आश्रित हैं, वृक्षके कारण ही हैं। इस लताकी शोभा भी वृक्षके ही कारण है। इसलिये मूलमें महिमा तो वृक्षकी ही है। आधार तो वृक्ष ही है। वृक्षके सहारे बिना लता स्वयं क्या कर सकती है? कैसे छा सकती है? अब बोलो हनुमान्! तुम्हीं बताओ, महिमा वृक्षकी ही हुई न?” रामजीने कहा—“क्यों हनुमान्! यह महिमा तो लताकी ही हुई न?” हनुमान्जी बोले—“हमें तो तीसरी ही बात सूझती है।” सीताजीने पूछा—“वह क्या है बेटा?” हनुमान्जीने कहा—“माँ! वृक्ष और लताकी छाया बड़ी सुन्दर है। इसलिये हमें तो इन दोनोंकी छायामें रहना ही अच्छा लगता है अर्थात् हमें तो आप दोनोंकी छाया- (चरणोंके आश्रय-) में रहना ही अच्छा लगता है!” सेवक सुत पति मातु भरोसें। रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें॥ ऐसे ही भगवान् और उनकी दिव्य आह्लादिनी शक्ति— दोनों ही एक-दूसरेकी शोभा बढ़ाते हैं। परन्तु कोई तो उन दोनोंको श्रेष्ठ बताता है, कोई केवल भगवान्को श्रेष्ठ बताता है और कोई केवल उनकी आह्लादिनी शक्तिको श्रेष्ठ बताता है। शरणागत भक्तके लिये तो प्रभु और उनकी आह्लादिनी शक्ति—दोनोंका आश्रय ही श्रेष्ठ है। एक बार एक प्रज्ञाचक्षु (नेत्रहीन) संत हाथमें लाठी पकड़े हुए यमुनाके किनारे-किनारे चले जा रहे थे। नदीमें बाढ़ आयी हुई थी। उससे एक जगह यमुनाका किनारा पानीमें गिर पड़ा तो बाबाजी भी पानीमें गिर पड़े। हाथसे लाठी छूट गयी थी। दीखता तो था ही नहीं, अब तैरें तो किधर तैरें? भगवान्की शरणागतिकी बात याद आते ही प्रयासरहित होकर शरीरको ढीला छोड़ दिया तो उनको ऐसा लगा कि किसीने हाथ पकड़कर किनारेपर डाल दिया। वहाँ दूसरी कोई लाठी हाथमें आ गयी और उसके सहारे वे चल पड़े। तात्पर्य यह है कि जो भगवान्के शरण होकर भगवान्पर निर्भर रहता है, उसको अपने लिये करना कुछ नहीं रहता। भगवान्के विधानसे जो हो जाय, उसीमें वह प्रसन्न रहता है। बहुत-सी भेड़-बकरियाँ जंगलमें चरने गयीं। उनमेंसे एक बकरी चरते-चरते एक लतामें उलझ गयी। उसको उस लतामेंसे निकलनेमें बहुत देर लगी, तबतक अन्य सब भेड़-बकरियाँ अपने घर पहुँच गयीं। अँधेरा भी हो रहा था। वह बकरी घूमते-घूमते एक सरोवरके किनारे पहुँची। वहाँ किनारेकी गीली जमीनपर सिंहका एक चरण-चिह्न अंकित था। वह उस चरण-चिह्नके शरण होकर उसके पास बैठ गयी। रातमें जंगली सियार, भेडि़या, बाघ आदि प्राणी बकरीको खानेके लिये पासमें आये तो उस बकरीने बता दिया कि “पहले देख लेना कि मैं किसके शरणमें हूँ, तब मुझे खाना!” वे चिह्नको देखकर कहने लगे— “अरे, यह तो सिंहके चरण-चिह्नके शरण है, जल्दी भागो यहाँसे! सिंह आ जायगा तो हमको मार डालेगा।” इस प्रकार सभी प्राणी भयभीत होकर भाग गये। अन्तमें जिसका चरण-चिह्न था, वह सिंह स्वयं आया और बकरीसे बोला—“तू जंगलमें अकेली कैसे बैठी है?” बकरीने कहा—“यह चरण-चिह्न देख लेना, फिर बात करना। जिसका यह चरण-चिह्न है, उसीके मैं शरण हुए बैठी हूँ।” सिंहने देखा कि “ओह! यह तो मेरा ही चरण- चिह्न है, यह बकरी तो मेरे ही शरण हुई!” सिंहने बकरीको आश्वासन दिया कि अब तुम डरो मत, निर्भय होकर रहो। रातमें जब जल पीनेके लिये हाथी आया तो सिंहने हाथीसे कहा—“तू इस बकरीको अपनी पीठपर चढ़ा ले। इसको जंगलमें चराकर लाया कर और हरदम अपनी पीठपर ही रखा कर, नहीं तो तू जानता नहीं कि मैं कौन हूँ? मार डालूँगा!” सिंहकी बात सुनकर हाथी थर-थर काँपने लगा। उसने अपनी सूँड़से झट बकरीको पीठपर चढ़ा लिया। अब वह बकरी निर्भय होकर हाथीकी पीठपर बैठे-बैठे ही वृक्षोंकी ऊपरकी कोंपलें खाया करती और मस्त रहती। खोज पकड़ सैंठे रहो, धणी मिलेंगे आय। अजया गज मस्तक चढ़े, निर्भय कोंपल खाय॥ ऐसे ही जब मनुष्य भगवान्के शरण हो जाता है, उनके चरणोंका सहारा ले लेता है, तब वह सम्पूर्ण प्राणियोंसे, विघ्न-बाधाओंसे निर्भय हो जाता है। उसको कोई भी भयभीत नहीं कर सकता, उसका कोई भी कुछ बिगाड़ नहीं सकता। जो जाको शरणो गहै, ताकहँ ताकी लाज। उलटे जल मछली चले, बह्यो जात गजराज॥ भगवान्के साथ काम, भय, द्वेष, क्रोध, स्नेह आदिसे भी सम्बन्ध क्यों न जोड़ा जाय, वह भी जीवका कल्याण करनेवाला ही होता है*। तात्पर्य यह हुआ कि काम, भय, द्वेष आदि किसी तरहसे भी जिनका भगवान्के साथ सम्बन्ध जुड़ गया, उनका तो उद्धार हो ही गया, पर जिन्होंने किसी तरहसे भी भगवान्के साथ सम्बन्ध नहीं जोड़ा, उदासीन ही रहे, वे भगवत्प्राप्तिसे वंचित रह गये! भगवान्के अनन्य भक्तोंके लिये नारदजीने कहा है— नास्ति तेषु जातिविद्यारूपकुलधनक्रियादिभेदः। “उन भक्तोंमें जाति, विद्या, रूप, कुल, धन, क्रिया आदिका भेद नहीं है।” तात्पर्य यह है कि स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरको लेकर सांसारिक जितने भी जाति, विद्या आदि भेद हो सकते हैं, वे सब उनपर लागू नहीं होते जो सर्वथा भगवान्के अर्पित हो गये हैं1। कारण कि वे अच्युत भगवान्के ही हैं— “यतस्तदीयाः” (नारदभक्तिसूत्र 73), संसारके नहीं। अच्युत भगवान्के होनेसे वे “अच्युत गोत्र” के ही कहलाते हैं2। शरणागतिका रहस्य शरणागतिका रहस्य क्या है—इसको वास्तवमें भगवान् ही जानते हैं। फिर भी अपनी समझमें आयी बात कहनेकी चेष्टा की जाती है; क्योंकि हरेक आदमी जो बात कहता है, उससे वह अपनी बुद्धिका ही परिचय देता है। पाठकोंसे प्रार्थना है कि वे यहाँ आयी बातोंका उलटा अर्थ न निकालें; क्योंकि प्रायः लोग किसी तात्त्विक रहस्यवाली बातको गहराईसे समझे बिना उसका उलटा अर्थ जल्दी निकाल लेते हैं, इसलिये ऐसी बातको कहने-सुननेके पात्र बहुत कम होते हैं। भगवान्ने गीतामें शरणागतिके विषयमें दो बातें बतायी हैं— (1) “मामेकं शरणं व्रज” (18। 66) “अनन्यभावसे केवल मेरी शरणमें आ जा”। (2) “स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत” (15। 19) “वह सर्वज्ञ पुरुष सर्वभावसे मेरा भजन करता है”, “तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत” (18। 62) “तू सर्वभावसे उस परमात्माकी शरणमें जा।” हम भगवान्के शरण कैसे हो जायँ? केवल एक भगवान्के शरण हो जायँ अर्थात् भगवान्के गुण, ऐश्वर्य आदिकी तरफ दृष्टि न रखें और सर्वभावसे भगवान्के शरण हो जायँ अर्थात् साथमें अपनी कोई सांसारिक कामना न रखें। केवल एक भगवान्के शरण होनेका रहस्य यह है कि भगवान्के अनन्त गुण हैं, प्रभाव हैं, तत्त्व हैं, रहस्य हैं, महिमा है, लीलाएँ हैं, नाम हैं, धाम हैं; भगवान्का अनन्त ऐश्वर्य है, माधुर्य है, सौन्दर्य है—इन विभूतियोंकी तरफ शरणागत भक्त देखता ही नहीं। उसका यही एक भाव रहता है कि “मैं केवल भगवान्का हूँ और केवल भगवान् ही मेरे हैं।” अगर वह गुण, प्रभाव आदिकी तरफ देखकर भगवान्की शरण लेता है, तो वास्तवमें वह गुण, प्रभाव आदिके ही शरण हुआ, भगवान्के शरण नहीं हुआ। परन्तु इन बातोंका उलटा अर्थ न लगा लें। उलटा अर्थ लगाना क्या है? भगवान्के गुण, प्रभाव, नाम, धाम, ऐश्वर्य, माधुर्य, सौन्दर्य आदिको मानना ही नहीं है, इनकी तरफ जाना ही नहीं है। अब कुछ करना है ही नहीं, न भजन करना है, न भगवान्के गुण, प्रभाव, लीला आदि सुननी है, न भगवान्के धाममें जाना है—यह उलटा अर्थ लगाना है। इनका ऐसा अर्थ लगाना महान् अनर्थ करना है। केवल एक भगवान्के शरण होनेका तात्पर्य है— केवल भगवान् मेरे हैं। अब वे ऐश्वर्य-सम्पन्न हैं तो बड़ी अच्छी बात और उनमें कुछ भी ऐश्वर्य नहीं है तो बड़ी अच्छी बात। वे बड़े दयालु हैं तो बड़ी अच्छी बात और इतने निष्ठुर, कठोर हैं कि उनके समान दुनियामें कोई कठोर है ही नहीं, तो बड़ी अच्छी बात। उनका बड़ा भारी प्रभाव है तो बड़ी अच्छी बात और उनमें कोई प्रभाव नहीं है तो बड़ी अच्छी बात। शरणागतमें इन बातोंकी कोई परवाह नहीं होती। उसका तो एक ही भाव रहता है कि भगवान् जैसे भी हैं, मेरे हैं*। भगवान्की इन बातोंकी परवाह न होनेसे भगवान्का ऐश्वर्य, माधुर्य, सौन्दर्य, गुण, प्रभाव आदि चले जायँगे, ऐसी बात नहीं है। पर हम उनकी परवाह नहीं करेंगे, तो हमारी असली शरणागति होगी। जहाँ गुण, प्रभाव आदिको लेकर भगवान्के शरण होते हैं, वहाँ केवल भगवान्के शरण नहीं होते, प्रत्युत गुण, प्रभाव आदिके ही शरण होते हैं; जैसे—कोई रुपयोंवाले आदमीका आदर करे तो वास्तवमें वह आदर उस आदमीका नहीं, रुपयोंका है। किसी मिनिस्टरका कितना ही आदर किया जाय तो वह आदर उसका नहीं, मिनिस्टरी-(पद-) का है। किसी बलवान् व्यक्तिका आदर किया जाय तो वह उसके बलका आदर है, उसका खुदका आदर नहीं है। परन्तु अगर कोई केवल व्यक्ति-(धनी आदि-) का आदर करे तो इससे धनीका धन या मिनिस्टरकी मिनिस्टरी चली जायगी—यह बात नहीं है। वह तो रहेगी ही। ऐसे ही केवल भगवान्के शरण होनेसे भगवान्के गुण, प्रभाव आदि चले जायँगे—ऐसी बात नहीं है। परन्तु हमारी दृष्टि तो केवल भगवान्पर ही रहनी चाहिये, उनके गुणों आदिपर नहीं। सप्तर्षियोंने जब पार्वतीजीके सामने शिवजीके अनेक अवगुणोंका और विष्णुके अनेक सद्गुणोंका वर्णन करते हुए उनको शिवजीका त्याग करनेके लिये कहा, तब पार्वतीजीने उनको यही उत्तर दिया— महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम। जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम॥ ऐसी ही बात गोपियोंने भी उद्धवजीसे कही थी— ऊधौ! मन माने की बात। दाख छोहारा छाडि़ अमृतफल, बिषकीरा बिष खात॥ जो चकोर को दै कपूर कोउ, तजि अंगार अघात। मधुप करत घर कोरे काठमें, बँधत कमल के पात॥ ज्यों पतंग हित जान आपनो, दीपक सों लपटात। “सूरदास” जाको मन जासों, ताको सोइ सुहात॥ भगवान्के प्रभाव आदिकी तरफ देखनेवालेको, उससे प्रेम करनेवालेको मुक्ति, ऐश्वर्य आदि तो मिल सकता है, पर भगवान् नहीं मिल सकते। भगवान्के प्रभावकी तरफ न देखनेवाला भगवत्प्रेमी भक्त ही भगवान्को पा सकता है। इतना ही नहीं, वह प्रेमी-भक्त भगवान्को बाँध भी सकता है, उनकी बिक्री भी कर सकता है! भगवान् देखते हैं कि वह मेरेसे प्रेम करता है, मेरे प्रभावकी तरफ देखतातक नहीं, तो भगवान्के मनमें उसका बड़ा आदर होता है। प्रभावकी तरफ देखना यह सिद्ध करता है कि हमारेमें कुछ पानेकी कामना है। हमारे मनमें उस कामनावाले पदार्थका आदर है। जबतक हमारे मनमें कामना है, तबतक हम प्रभावको देखते हैं। अगर हमारे मनमें कोई कामना न रहे तो भगवान्के प्रभाव, ऐश्वर्यकी तरफ हमारी दृष्टि नहीं जायगी। केवल भगवान्की तरफ दृष्टि होगी तो हम भगवान्के शरण हो जायँगे, भगवान्के अपने हो जायँगे। पूतना राक्षसीने जहर लगाकर स्तन मुखमें दिया तो उसको भगवान्ने माताकी गति दे दी* अर्थात् जो मुक्ति यशोदा मैयाको मिले, वह मुक्ति पूतनाको मिल गयी। जो मुखमें जहर देती है, उसे तो भगवान्ने मुक्ति दे दी। अब जो रोजाना दूध पिलाती है, उस मैयाको भगवान् क्या दें? तो अनन्त जीवोंको मुक्ति देनेवाले भगवान् मैयाके अधीन हो गये, उन्हें अपने-आपको ही दे दिया! मैयाके इतने वशीभूत हो गये कि मैया छड़ी दिखाती है तो वे डरकर रोने लग जाते हैं! कारण कि मैयाकी भगवान्के प्रभाव, ऐश्वर्यकी तरफ दृष्टि ही नहीं है। इस प्रकार जो भगवान्से मुक्ति चाहता है, उसे भगवान् मुक्ति दे देते हैं, पर जो कुछ भी नहीं चाहता, उसे भगवान् अपने-आपको ही दे देते हैं। सर्वभावसे भगवान्के शरण होनेका रहस्य यह है कि हमारा शरीर अच्छा है, इन्द्रियाँ वशमें हैं, मन शुद्ध-निर्मल है, बुद्धिसे हम ठीक जानते हैं, हम पढ़े-लिखे हैं, हम यशस्वी हैं, हमारा संसारमें मान है—इस प्रकार “हम भी कुछ हैं” ऐसा मानकर भगवान्के शरण होना शरणागति नहीं है। भगवान्के शरण होनेके बाद शरणागतको ऐसा विचार भी नहीं करना चाहिये कि हमारा शरीर ऐसा होना चाहिये; हमारी बुद्धि ऐसी होनी चाहिये; हमारा मन ऐसा होना चाहिये; हमारा ऐसा ध्यान लगना चाहिये; हमारी ऐसी भावना होनी चाहिये; हमारे जीवनमें ऐसे-ऐसे लक्षण आने चाहिये; हमारे ऐसे आचरण होने चाहिये; हमारेमें ऐसा प्रेम होना चाहिये कि कथा-कीर्तन सुननेपर आँसू बहने लगें, कण्ठ गद्गद हो जाय; पर ऐसा हमारे जीवनमें हुआ ही नहीं तो हम भगवान्के शरण कैसे हुए? आदि-आदि। ये बातें अनन्य शरणागतिकी कसौटी नहीं हैं। जो अनन्य शरण हो जाता है, वह यह देखता ही नहीं कि शरीर बीमार है कि स्वस्थ है? मन चंचल है कि स्थिर है? बुद्धिमें जानकारी है कि अनजानपना है? अपनेमें मूर्खता है कि विद्वत्ता है? योग्यता है कि अयोग्यता है? आदि। इन सबकी तरफ वह स्वप्नमें भी नहीं देखता; क्योंकि उसकी दृष्टिमें ये सब चीजें कूड़ा-करकट हैं, जिन्हें अपने साथ नहीं लेना है। यदि इन चीजोंकी तरफ देखेगा तो अभिमान ही बढ़ेगा कि मैं भगवान्का शरणागत भक्त हूँ अथवा निराश होना पड़ेगा कि मैं भगवान्के शरण तो हो गया, पर भक्तोंके गुण (गीता—बारहवें अध्यायके तेरहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक) तो मेरेमें आये ही नहीं। तात्पर्य यह हुआ कि अगर अपनेमें भक्तोंके गुण दिखायी देंगे तो उनका अभिमान हो जायगा और अगर नहीं दिखायी देंगे तो निराशा हो जायगी। इसलिये यही अच्छा है कि भगवान्के शरण होनेके बाद इन गुणोंकी तरफ भूलकर भी नहीं देखें। इसका यह उलटा अर्थ न लगा लें कि हम चाहे वैर-विरोध करें, चाहे द्वेष करें, चाहे ममता करें, चाहे जो कुछ करें? यह अर्थ बिलकुल नहीं है। तात्पर्य है कि इन गुणोंकी तरफ खयाल ही नहीं होना चाहिये। भगवान्के शरण होनेवाले भक्तमें ये सब-के-सब गुण अपने-आप ही आयेंगे, पर इनके आने या न आनेसे उसको कोई मतलब नहीं रखना चाहिये। अपनेमें ऐसी कसौटी नहीं लगानी चाहिये कि अपनेमें ये गुण या लक्षण हैं या नहीं। सच्चा शरणागत भक्त तो भगवान्के गुणोंकी तरफ भी नहीं देखता और अपने गुणोंकी तरफ भी नहीं देखता। वह भगवान्के ऊँचे-ऊँचे प्रेमियोंकी तरफ भी नहीं देखता कि ऊँचे प्रेमी ऐसे-ऐसे होते हैं, तत्त्वको जाननेवाले जीवन्मुक्त ऐसे-ऐसे होते हैं। प्रायः लोग ऐसी कसौटी लगाते हैं कि यह भगवान्का भजन करता है तो बीमार कैसे हो गया? भगवान्का भक्त हो गया तो उसको बुखार क्यों आ गया? उसपर दुःख क्यों आ गया? उसका बेटा क्यों मर गया? उसका धन क्यों चला गया? उसका संसारमें अपयश क्यों हो गया? उसका निरादर क्यों हो गया? आदि-आदि। ऐसी कसौटी लगाना बिलकुल फालतू बात है, बड़े नीचे दर्जेकी बात है। ऐसे लोगोंको क्या समझायें। वे सत्संगके नजदीक ही नहीं आये, इसीलिये उनको इस बातका पता ही नहीं है कि भक्ति क्या होती है? शरणागति क्या होती है? वे इन बातोंको समझ ही नहीं सकते। परन्तु इसका अर्थ यह भी नहीं है कि भगवान्का भक्त दरिद्र होता ही है, उसका संसारमें अपमान होता ही है, उसकी निन्दा होती ही है। शरणागत भक्तको तो निन्दा-प्रशंसा, रोग-नीरोग-अवस्था आदिसे कोई मतलब ही नहीं होता। इनकी तरफ वह देखता ही नहीं। वह यही देखता है कि मैं हूँ और भगवान् हैं, बस। अब संसारमें क्या है, क्या नहीं है, त्रिलोकीमें क्या है, क्या नहीं है, प्रभु ऐसे हैं, वे उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करनेवाले हैं—इन बातोंकी तरफ उसकी दृष्टि जाती ही नहीं। किसीने एक सन्तसे पूछा—“आप किस भगवान्के भक्त हैं? जो उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय करते हैं, उनके भक्त हैं क्या?” तो उस सन्तने उत्तर दिया—“हमारे भगवान्का तो उत्पत्ति, स्थिति, प्रलयके साथ कोई सम्बन्ध है ही नहीं। यह तो हमारे प्रभुका एक ऐश्वर्य है। यह कोई विशेष बात नहीं है।” शरणागत भक्तको ऐसा होना चाहिये। ऐश्वर्य आदिकी तरफ उसकी दृष्टि ही नहीं होनी चाहिये। ऋषिकेशमें गंगाजीके किनारे शामको सत्संग हो रहा था। गरमी पड़ रही थी। उधरसे गंगाजीकी ठण्डी हवाकी लहर आयी तो एक सज्जनने कहा—“कैसी ठण्डी हवाकी लहर आ रही है!” पास बैठे दूसरे सज्जनने उनसे कहा— “हवाको देखनेके लिये तुम्हें समय कैसे मिल गया? यह ठण्डी हवा आयी, यह गरम हवा आयी—इस तरफ तुम्हारा खयाल कैसे चला गया?” भगवान्के भजनमें लगे हो तो हवा ठण्डी आयी या गरम आयी, सुख आया या दुःख आया—इस तरफ जबतक खयाल है, तबतक भगवान्की तरफ खयाल कहाँ? इसी विषयमें हमने एक कहानी सुनी है। कहानी तो नीचे दर्जेकी है पर उसका निष्कर्ष बड़ा अच्छा है। एक कुलटा स्त्री थी। उसको किसी पुरुषसे संकेत मिला कि इस समय अमुक स्थानपर तुम आ जाना। अतः वह समयपर अपने प्रेमीके पास जा रही थी। रास्तेमें एक मस्जिद पड़ती थी। मस्जिदकी दीवारें छोटी-छोटी थीं। दीवारके पास ही वहाँका मौलवी झुककर नमाज पढ़ रहा था। वह कुलटा अनजानेमें उसके ऊपर पैर रखकर निकल गयी। मौलवीको बड़ा गुस्सा आया कि कैसी औरत है यह! इसने मेरेपर जूतीसहित पैर रखकर मेरेको नापाक (अशुद्ध) बना दिया! वह वहीं बैठकर उसको देखता रहा कि कब आयेगी। जब वह कुलटा पीछे लौटकर आयी, तब मौलवीने उसको धमकाया कि “कैसी बेअक्ल हो तुम! हम परवरदिगारकी बंदगीमें बैठे थे, नमाज पढ़ रहे थे और तुम हमारेपर पैर रखकर चली गयी!” तब वह बोली— मैं नर-राची ना लखी, तुम कस लख्यो सुजान। पढि़ कुरान बौरा भया, राच्यो नहिं रहमान॥ अर्थात् एक पुरुषके ध्यानमें रहनेके कारण मेरेको इसका पता ही नहीं लगा कि सामने दीवार है या कोई मनुष्य है, पर तू तो भगवान्के ध्यानमें था, फिर तूने मेरेको कैसे पहचान लिया कि वह यही थी? तू केवल कुरान पढ़-पढ़कर बावला हो गया है। अगर तू भगवान्के ध्यानमें रचा हुआ होता तो क्या मुझे पहचान लेता? कौन आया, कैसे आया, मनुष्य था कि पशु-पक्षी था, क्या था, क्या नहीं था, कौन ऊपर आया, कौन नीचे आया, किसने पैर रखा—इधर तेरा खयाल ही क्यों जाता? तात्पर्य है कि एक भगवान्को छोड़कर किसीकी तरफ ध्यान ही कैसे जाय? दूसरी बातोंका पता ही कैसे लगे? जबतक दूसरी बातोंका पता लगता है, तबतक वह शरण कहाँ हुआ? कौरव-पाण्डव जब बालक थे, तब वे अस्त्र-शस्त्र सीख रहे थे। सीखकर जब तैयार हो गये, तब उनकी परीक्षा ली गयी। एक वृक्षपर एक बनावटी चिडि़या बैठा दी गयी और सबसे कहा गया कि उस चिडि़याके कण्ठपर तीर मारकर दिखाओ। एक-एक करके सभी आने लगे। गुरुजी पहले सबसे अलग-अलग पूछते कि बताओ, तुम्हें वहाँ क्या दीख रहा है? कोई कहता कि हमें तो वृक्ष दीखता है, कोई कहता कि हमें तो टहनी दीखती है, कोई कहता कि हमें तो चिडि़या दीखती है, चोंच भी दीखती है, पंख भी दीखते हैं। ऐसा कहनेवालोंको वहाँसे हटा दिया गया। जब अर्जुनकी बारी आयी, तब उनसे पूछा गया कि तुमको क्या दीखता है, तो अर्जुनने कहा कि मेरेको तो केवल कण्ठ ही दीखता है, और कुछ भी नहीं दीखता। तब अर्जुनसे बाण मारनेके लिये कहा गया। अर्जुनने अपने बाणसे उस चिडि़याका कण्ठ वेध दिया; क्योंकि उनकी लक्ष्यपर दृष्टि ठीक थी। अगर चिडि़या दीखती है, वृक्ष, टहनी आदि दीखते हैं तो लक्ष्य कहाँ सधा है? अभी तो दृष्टि फैली हुई है। लक्ष्य होनेपर तो वही दीखेगा, जो लक्ष्य होगा। लक्ष्यके सिवाय दूसरा कुछ दीखेगा ही नहीं। इसी प्रकार जबतक मनुष्यका लक्ष्य एक नहीं हुआ है, तबतक वह अनन्य कैसे हुआ? अव्यभिचारी “अनन्ययोग” होना चाहिये—“मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी” (गीता 13। 10)। “अन्ययोग” नहीं होना चाहिये अर्थात् शरीर, मन, बुद्धि, अहम् आदिकी सहायता नहीं होनी चाहिये। वहाँ तो केवल एक भगवान् ही होने चाहिये। गोस्वामी तुलसीदासजी महाराजसे किसीने कहा— “आप जिन रामललाकी भक्ति करते हैं, वे तो बारह कलाके अवतार हैं, पर सूरदासजी जिन भगवान् कृष्णकी भक्ति करते हैं, वे सोलह कलाके अवतार हैं।” यह सुनते ही गोस्वामीजी महाराज उसके चरणोंमें गिर पड़े और बोले—“ओह! आपने बड़ी भारी कृपा कर दी! मैं तो रामको दशरथजीके लाड़ले कुँवर समझकर ही भक्ति करता था। अब पता लगा कि वे बारह कलाके अवतार हैं! इतने बड़े हैं वे? आपने आज नयी बात बताकर बड़ा उपकार किया।” अब कृष्ण सोलह कलाके अवतार हैं—यह बात उन्होंने सुनी ही नहीं, इस तरफ उनका ध्यान ही नहीं गया। भगवान्के प्रति भक्तोंके अलग-अलग भाव होते हैं। कोई कहता है कि दशरथजीकी गोदमें खेलनेवाले जो रामलला हैं, वे ही हमारे इष्ट हैं—“इष्टदेव मम बालक रामा” (मानस 7। 75। 3); राजाधिराज रामचन्द्रजी नहीं, छोटा-सा रामलला। कोई भक्त कहता है कि हमारे इष्ट तो लड्डूगोपाल हैं, नन्दके लाला हैं। वे भक्त अपने रामललाको, नन्दललाको सन्तोंसे आशीर्वाद दिलाते हैं, तो भगवान्को यह बहुत प्यारा लगता है। तात्पर्य है कि भक्तोंकी दृष्टि भगवान्के ऐश्वर्यकी तरफ जाती ही नहीं। या ब्रजरज की परस से, मुकति मिलत है चार। वा रज को नित गोपिका, डारत डगर बुहार॥ आँगनकी जिस रजमें कन्हैया खेलते हैं, वह रज कोई ले ले तो उसको चारों प्रकारकी मुक्ति मिल जाय। पर यशोदा मैया उसी रजको बुहारकर बाहर फेंक देती हैं। मैयाके लिये तो वह कूड़ा-करकट है। अब मुक्ति किसको चाहिये? मैयाकी केवल कन्हैयाकी तरफ ही दृष्टि है। न तो कन्हैयाके ऐश्वर्यकी तरफ दृष्टि है और न योग्यताकी तरफ ही दृष्टि है। सन्तोंने कहा है कि अगर भगवान्से मिलना हो तो साथमें साथी भी नहीं होना चाहिये और सामान भी नहीं होना चाहिये अर्थात् साथी और सामानके बिना उनसे मिलो। जब साथी, सहारा साथमें है, तो तुम क्या मिले भगवान्से? और मन, बुद्धि, विद्या, धन आदि सामान साथमें बँधा रहेगा तो उसका परदा (व्यवधान) रहेगा। परदेमें मिलन थोड़े ही होता है! वहाँ तो कपड़ेका भी व्यवधान होता है। कपड़ा ही नहीं, माला भी आड़में आ जाय तो मिलन क्या हुआ? इसलिये साथमें कोई साथी और सामान न हो; फिर भगवान्से जो मिलन होगा, वह बड़ा विलक्षण और दिव्य होगा। एक महात्माजीको खेतमें काम करनेवाला एक व्रजवासी ग्वाला मिल गया। वह भगवान्का भक्त था। महात्माजीने उससे पूछा—“तुम क्या करते हो?” उसने कहा—“हम तो अपने लाला कन्हैयाका काम करते हैं।” महात्माजीने कहा—“हम भगवान्के अनन्य भक्त हैं, तुम क्या हो?” उसने कहा—“हम फनन्य भक्त हैं।” महात्माजीने पूछा— “फनन्य भक्त क्या होता है?” तो उसने भी पूछा—“अनन्य भक्त क्या होता है?” महात्माजीने कहा—“अनन्य भक्त वह होता है जो सूर्य, शक्ति, गणेश, ब्रह्मा आदि किसीको भी न माने, केवल हमारे कन्हैयाको ही माने।” उसने कहा— “बाबाजी, हम तो इन ससुरोंका नाम भी नहीं जानते कि ये क्या होते हैं, क्या नहीं होते; हमें इनका पता ही नहीं है; तो हम फनन्य हो गये कि नहीं?” इस प्रकार ब्रह्म क्या होता है? आत्मा क्या होती है? सगुण और निर्गुण क्या होता है? साकार और निराकार क्या होता है? आदि बातोंकी तरफ शरणागत भक्तकी दृष्टि ही नहीं जानी चाहिये। व्रजकी एक बात है। एक सन्त कुएँपर किसीसे बात कर रहे थे कि ब्रह्म है, परमात्मा है, जीवात्मा है आदि। वहाँ एक गोपी जल भरने आयी। उसने कान लगाया कि बाबाजी क्या बात कर रहे हैं। जब वह गोपी दूसरी गोपीसे मिली तो उससे पूछा—“अरी सखी! यह ब्रह्म क्या होता है?” उसने कहा—“हमारे लालाका ही कोई अड़ोसी- पड़ोसी, सगा-सम्बन्धी होगा! हमलोग तो जानती नहीं सखी! ये लोग उसीकी धुनमें लगे हैं न? इसलिये सब जानते हैं। हमारे तो एक नन्दके लाला ही हैं। कोई काम हो तो नन्दबाबासे कह देंगी, गिरिराजसे कह देंगी कि महाराज! आप कृपा करो। कन्हैया तो भोला-भाला है, वह क्या समझेगा और क्या करेगा? कन्हैयासे क्या मिलेगा? अरी सखी! वह कन्हैया हमारा है, और क्या मिलेगा? हम भी अकेली हैं और वह कन्हैया भी अकेला है। हमारे पास भी कुछ सामान नहीं और उसके पास भी कुछ सामान नहीं, बिलकुल नंग-धड़ंग बाबा—“नगन मूरति बाल गुपालकी, कतरनी बरनी जग-जालकी।” अब ऐसे कन्हैयासे क्या मिलेगा? यशोदा मैया दाऊजीसे कहती हैं—“देख दाऊ! यह कन्हैया बहुत भोला-भाला है, तू इसका खयाल रखा कर कि कहीं यह जंगलमें दूर न चला जाय।” दाऊजी कहते हैं— “मैया! यह कन्हैया बड़ा चंचल है। जंगलमें मेरे साथ चलते-चलते कोई साँपका बिल देखता है तो उसमें हाथ डाल देता है, अब इसे कोई साँप काट ले तो?” मैया कहती है—“बेटा! अभी वह छोटा-सा अबोध बालक है, तू बड़ा है, इसलिये इसकी निगाह रखा कर।” अब दाऊ भैया और सब ग्वाल-बाल कन्हैयाकी निगाह रखते हैं। ग्वाल-बालोंसे कोई कहे कि कन्हैया तो सब दुनियाका पालन करता है, तो वे यही कहेंगे कि तुम्हारा ऐसा भगवान् होगा, जो सब दुनियाका पालन करता होगा। हमारा तो ऐसा नहीं है। हमारा छोटा-सा कन्हैया दुनियाका क्या पालन करेगा? एक बाबाजीकी गोपियोंसे बातचीत चली। वे बाबाजी बात करते-करते कहने लगे कि कृष्ण इतने ऐश्वर्यशाली हैं, उनका इतना माधुर्य है, उनके पास ऐश्वर्यका इतना खजाना है, आदि। तो गोपियाँ कहने लगीं—“महाराज! उस खजानेकी चाबी तो हमारे पास है! कन्हैयाके पास क्या है? उसके पास तो कुछ भी नहीं है। कोई उससे माँगेगा तो वह कहाँसे देगा?” इसलिये किसीको कुछ चाहिये तो वह कन्हैयाके पास न जाये। कन्हैयाके पास, उसकी शरणमें तो वही जाये, जिसको कभी कुछ नहीं चाहिये। किसी भी अवस्थामें कुछ भी चाहनेका भाव न हो अर्थात् विपत्ति, मौत आदिकी अवस्थामें भी “मेरी थोड़ी सहायता कर दो, रक्षा कर दो” ऐसा भाव भी नहीं हो! भगवान् श्रीरामसे वाल्मीकिजी कहते हैं— जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु। बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु॥ कुछ भी चाहनेका भाव न होनेसे भगवान् स्वाभाविक ही प्यारे लगते हैं, मीठे लगते हैं—“तुम्ह सन सहज सनेहु।” जिसमें चाह नहीं है, वह भगवान्का खास घर है— “सो राउर निज गेहु।” यदि चाहना भी साथमें रखें और भगवान्को भी साथमें रखें तो वह भगवान्का खास घर नहीं है। भगवान्के साथ “सहज” स्नेह हो, स्नेहमें कोई मिलावट न हो अर्थात् कुछ भी चाहना न हो। जहाँ कुछ भी चाहना हो जाय, वहाँ प्रेम कैसा? वहाँ तो आसक्ति, वासना, मोह, ममता ही होते हैं। इसलिये गोपियाँ सावधान करती हुई कहती हैं— मा यात पान्थाः पथिभीमरथ्यां दिगम्बरः कोऽपि तमालनीलः। विन्यस्तहस्तोऽपि नितम्बबिम्बे धूतः समाकर्षति चित्तवित्तम्॥ “अरे पथिको! उस गलीसे मत जाना, वह बड़ी भयावनी है। वहाँ अपने नितम्बविम्बपर दोनों हाथ रखे जो तमालके समान नीले रंगका एक नंग-धड़ंग बालक खड़ा है, वह केवल देखनेमात्रका अवधूत है। वास्तवमें तो वह अपने पासमेंसे होकर निकलनेवाले किसी भी पथिकके चित्तरूपी धनको लूटे बिना नहीं रहता।” वह जो काला-काला नंग-धड़ंग बालक खड़ा है न? उससे तुम लुट जाओगे, रीते रह जाओगे! वह ऐसा चोर है कि सब खत्म कर देगा। उधर जाना ही मत, पहले ही खयाल रखना। अगर चले गये तो फिर सदाके लिये ही चले गये! इसलिये कोई अच्छी तरहसे जीना चाहे तो उधर मत जाय। उसका नाम कृष्ण है न? कृष्ण कहते हैं खींचने- वालेको। एक बार खींच ले तो फिर छोड़े ही नहीं। उससे पहचान न हो, तबतक तो ठीक है। अगर उससे पहचान हो गयी तो फिर मामला खत्म। फिर किसी कामके नहीं रहोगे, त्रिलोकीभरमें निकम्मे हो जाओगे! “नारायन” बौरी भई डोलै, रही न काहू काम की। जाहि लगन लगी घनस्याम की॥ हाँ, जो किसी कामका नहीं होता, वह सबके लिये सब कामका होता है। परन्तु उसको किसी कामसे कोई मतलब नहीं होता। शरणागत भक्तको भजन भी करना नहीं पड़ता। उसके द्वारा स्वतः-स्वाभाविक भजन होता है। भगवान्का नाम उसे स्वाभाविक ही बड़ा मीठा, प्यारा लगता है। अगर कोई पूछे कि तुम श्वास क्यों लेते हो? यह हवाको भीतर-बाहर करनेका क्या धंधा शुरू कर रखा है? तो यही कहेंगे कि भाई! यह धंधा नहीं है, इसके बिना हम जी ही नहीं सकते। ऐसे ही शरणागत भक्त भजनके बिना रह ही नहीं सकता। जिसको सब कुछ अर्पण कर दिया, उसके विस्मरणमें परम व्याकुलता, महान् छटपटाहट होने लगती है—“तद्विस्मरणे परमव्याकुलतेति” (नारदभक्तिसूत्र 19)। ऐसे भक्तसे अगर कोई कहे कि आधे क्षणके लिये भगवान्को भूल जानेसे त्रिलोकीका राज्य मिलेगा, तो वह इसे भी ठुकरा देगा। भागवतमें आया है— त्रिभुवनविभवहेतवेऽप्यकुण्ठ- स्मृतिरजितात्मसुरादिभिर्विमृग्यात् । न चलति भगवत्पदारविन्दा- ल्लवनिमिषार्धमपि यः स वैष्णवाग्र्यः॥ “तीनों लोकोंके समस्त ऐश्वर्यके लिये भी उन देवदुर्लभ भगवच्चरणकमलोंका जो आधे निमेषके लिये भी त्याग नहीं कर सकते, वे ही श्रेष्ठ भगवद्भक्त हैं।” न पारमेष्ठ्यं न महेन्द्रधिष्ण्यं न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम्। न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा मय्यर्पितात्मेच्छति मद् विनान्यत्॥ भगवान् कहते हैं कि “स्वयंको मेरे अर्पित करनेवाला भक्त मुझे छोड़कर ब्रह्माका पद, इन्द्रका पद, सम्पूर्ण पृथ्वीका राज्य, पातालादि लोकोंका राज्य, योगकी समस्त सिद्धियाँ और मोक्षको भी नहीं चाहता।” भरतजी कहते हैं— अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान। जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन॥
* तीसरे अध्यायमें तो भगवान्ने कर्तव्य-कर्मको न छोड़नेके लिये प्रकरण-का-प्रकरण ही कहा है—कर्मोंका त्याग करनेसे
न तो निष्कर्मताकी प्राप्ति होती है और न सिद्धि ही होती है (चौथा श्लोक); कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्थामें क्षणमात्र
भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता (पाँचवाँ श्लोक); जो बाहरसे कर्मोंका त्याग करके भीतरसे विषयोंका चिन्तन करता है,
वह मिथ्याचारी है (छठाँ श्लोक); जो मन-इन्द्रियोंको वशमें करके कर्तव्य-कर्म करता है, वही श्रेष्ठ है (सातवाँ श्लोक);
कर्म किये बिना शरीरका निर्वाह भी नहीं होता, इसलिये कर्म करना चाहिये (आठवाँ श्लोक); बन्धनके भयसे भी कर्मोंका
त्याग करना उचित नहीं है; क्योंकि केवल कर्तव्य-पालनके लिये कर्म करना बन्धनकारक नहीं है, प्रत्युत कर्तव्य-कर्मकी
परम्परा सुरक्षित रखनेके सिवाय अपने लिये कुछ भी कर्म करना ही बन्धनकारक है (नवाँ श्लोक); ब्रह्माजीने कर्तव्यसहित
प्रजाकी रचना करके कहा कि इस कर्तव्य-कर्मसे ही तुमलोगोंकी वृद्धि होगी और यही कर्तव्य-कर्म तुमलोगोंको कर्तव्य-
सामग्री देनेवाला होगा (दसवाँ श्लोक); मनुष्य और देवता दोनों ही कर्तव्यका पालन करते हुए कल्याणको प्राप्त होंगे
(ग्यारहवाँ श्लोक); जो कर्तव्यका पालन किये बिना प्राप्त सामग्रीका उपभोग करता है, वह चोर है (बारहवाँ श्लोक); कर्तव्य-
कर्म करके अपना निर्वाह करनेवाला सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है और जो केवल अपने लिये ही कर्म करता है, वह पापी पापका
ही भक्षण करता है। (तेरहवाँ श्लोक); कर्तव्य-पालनसे ही सृष्टिचक्र चलता है; परन्तु जो सृष्टिमें रहकर अपने कर्तव्यका पालन
नहीं करता, उसका जीना व्यर्थ है (सोलहवाँ श्लोक); आसक्तिसे रहित होकर कर्तव्य-कर्म करनेवाला मनुष्य परमात्माको प्राप्त हो
जाता है (उन्नीसवाँ श्लोक); जनकादि ज्ञानिजन भी कर्तव्य-कर्म करनेसे सिद्धिको प्राप्त हुए हैं; लोकसंग्रहकी दृष्टिसे भी
कर्तव्य-कर्म करना चाहिये (बीसवाँ श्लोक); भगवान् अपना उदाहरण देते हुए कहते हैं कि अगर मैं सावधान रहकर कर्तव्य-
कर्म न करूँ तो मैं वर्ण-संकरताका उत्पादक और लोकोंका नाश करनेवाला बनूँ (तेईसवेंसे चौबीसवें श्लोकतक); ज्ञानी
पुरुषको भी आसक्तिरहित होकर आस्तिक अज्ञानीकी तरह अपना कर्तव्य-कर्म करना चाहिये (पचीसवाँ श्लोक); ज्ञानीको
चाहिये कि वह अज्ञानियोंमें बुद्धिभेद पैदा न करके अपने कर्तव्यका अच्छी तरहसे पालन करते हुए उनसे भी वैसे ही कराये
(छब्बीसवाँ श्लोक)। इस प्रकार तीसरे अध्यायमें भगवान्ने कर्तव्य-कर्मोंका पालन करनेमें बड़ा जोर दिया है।
* आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन्। नाततायिवधे दोषो हन्तुर्भवति कश्चन॥ (मनु0 8। 350-351)
“अपना अनिष्ट करनेके लिये आते हुए आततायीको बिना विचार किये ही मार डालना चाहिये। आततायीको मारनेसे
मारनेवालेको कुछ भी दोष नहीं लगता।”
1-इस श्लोकमें “एव” पद “अनन्यता” का ही वाचक है।
2-इस श्लोकमें “अनन्यचेताः” पद अनन्य आश्रयका वाचक है।
3-सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥ (मानस 5। 44। 1)
4-काहू के बल भजन कौ, काहू के आचार। “व्यास” भरोसे कुँवरि के, सोवत पाँव पसार॥
1-वरं ममैव मरणं मद्भक्तो हन्यतेकथम्। राज्यमायुर्मया दत्तं तथैव स भविष्यति॥
भृत्यापराधे सर्वत्र स्वामिनो दण्ड
इष्यते। रामवाक्यं द्विजाः श्रुत्वा विस्मयादिदमब्रुवन्॥
(पद्मपुराण, पाताल0 104। 150-151)
2-कौरवोंकी सभामें द्रौपदीका चीर खींचा गया तो द्रौपदी अपनी साड़ीको हाथोंसे, दाँतोंसे पकड़ती है और भगवान्को
पुकारती है। अपने बलका आश्रय रखते हुए भगवान्को पुकारनेसे भगवान्के आनेमें देरी लगती है। परन्तु जब द्रौपदी अपना
उद्योग सर्वथा छोड़कर भगवान्पर ही निर्भर हो जाती है, तब दुःशासन चीरको खींच-खींचकर थक जाता है और चीरोंका
ढेर लग जाता है, पर द्रौपदीका कोई भी अंग उघड़ता नहीं।
1-भगवान्के सम्बन्धकी दृढ़ता होनेपर जब संसार-शरीरका आश्रय सर्वथा नहीं रहता, तब जीनेकी आशा, मरनेका भय,
करनेका राग और पानेका लालच—ये चारों ही नहीं रहते।
2-अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः। (योगदर्शन 2। 3)
3-स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः। (योगदर्शन 2। 9)
4-तथा न ते माधव तावकाः क्वचिद् भ्रश्यन्ति मार्गात्त्वयि बद्धसौहृदाः। त्वयाभिगुप्ता विचरन्ति निर्भया विनायकानीकपमूर्धसु प्रभो॥
(श्रीमद्भा0 10। 2। 33)
“भगवन्! जो आपके भक्त हैं, जिन्होंने आपके चरणोंमें अपनी सच्ची प्रीति जोड़ रखी है, वे कभी ज्ञानाभिमानियोंकी तरह
अपने साधनसे गिरते नहीं। प्रभो! वे बड़े-बड़े विघ्न डालनेवाली सेनाके सरदारोंके सिरपर पैर रखकर निर्भय होकर विचरते
हैं, कोई भी विघ्न उनके मार्गमें रुकावट नहीं डाल सकते।”
1-(1) राम कीन्ह चाहहिं सोइ होई। करै अन्यथा अस नहिं कोई॥ (मानस 1। 128। 1)
(2) होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥ (मानस 1। 52। 4)
2-चिन्ता दीनदयालको, मो मन सदा अनन्द। जायो सो प्रतिपालसी, रामदास गोविन्द॥
* इसे समझनेके लिये एक ग्रामीण कहानी है। एक माँके तीन लड़के थे। दो लड़के बड़े थे और काम-धंधा करते थे।
तीसरा लड़का सीधा-सादा और भोला था। उनकी माँ मर गयी। दोनों बड़े भाइयोंने छोटे भाईसे कहा कि माँके फूल
(अस्थियाँ) गंगाजीमें डाल दे, इतना काम तू कर दे। उसने कहा—“बहुत ठीक है।” वह माँके फूल लेकर अपने घरसे चला।
घरसे गंगाजी 300 कोस दूर थीं। पैदल रास्ता चलते-चलते वह थक गया तो किसीसे पूछा—भैया! गंगाजी कितनी दूर
हैं? वह बोला—तुम तो 150 कोस आये हो, अभी 150 कोस गंगाजी और आगे हैं। उसने सोचा कि गंगाजी कब पहुँचूँगा
और फिर लौटकर कब आऊँगा! ऐसे दुःखी होकर उसने वे हड्डियाँ जंगलमें ही फेंक दीं और गाँवके पाससे वर्षाका मीठा
जल बर्तनमें भर लिया; क्योंकि गंगाजी जाते हैं तो लौटते समय गंगाजल लाते हैं। फिर वह वहाँसे पीछे चला आया और
अपने गाँव पहुँच गया। बड़े भाई सोचने लगे कि अगर यह गंगाजी जाकर आता तो इतने दिनोंमें नहीं आ सकता था, यह
गंगाजी गया ही नहीं। बड़े भाइयोंने उससे पूछा—तू गंगाजी जाकर आया है क्या? उसने कहा—हाँ, गंगाजी जाकर आया
हूँ; ठीक गंगाजीके ब्रह्मकुण्डमें फूल डालकर वहाँसे गंगाजीका यह जल लाया हूँ। ऐसे वह झूठ बोल गया। भाइयोंने समझ
लिया कि यह ठीक नहीं बोल रहा है, इसलिये वे चुप हो गये।
दूसरे दिन नींदसे उठकर एक भाई छोटे भाईसे बोला—अरे भाई! तू सच्ची बात बता दे, क्या तू गंगाजी हो आया और
फूल ठीक गंगाजीमें डाल दिये। उसने कहा—हाँ, बिलकुल गंगाजी जाकर आया हूँ। बड़े भाईने कहा—देख, रातको स्वप्नमें
मेरेको माँ मिली थीं और माँने मेरेसे कहा कि इसने तो मेरेको गंगाजी पहुँचाया ही नहीं, बीचमें ही डालकर आ गया। अब
तू ही बता कि माँकी बात सच्ची या तेरी बात सच्ची? छोटा भाई बोला—माँ इधर ही क्यों आयी, उधर क्यों नहीं गयी?
अर्थात् 150 कोस तो मैंने पहुँचा ही दिया था, यहाँ न आकर उधर ही चली जाती तो ठीक गंगाजी पहुँच जाती।
इस कहानीका तात्पर्य यह हुआ कि भगवान्के शरण होनेके बाद यह कसौटी कसते हैं—परीक्षा करते हैं कि “भक्तोंके,
सन्तोंके लक्षण मेरेमें नहीं आये तो मैं भगवान्के शरण नहीं हुआ”—यह माँ उलटी क्यों आयी, सुलटी ही क्यों नहीं गयी
कि “जब मैं भगवान्के शरण हो गया तो अब इन लक्षणोंकी कमी क्यों रह गयी? मेरेमें ये लक्षण क्यों नहीं आये?” ऐसी
मान्यतासे तो साधक शरणागत हो जायगा और पूर्णता भी हो जायगी। परन्तु यह मान्यता करेगा कि “मेरेमें ऐसे लक्षण नहीं
आये तो मैं शरण नहीं हुआ” तो धोखा हो जायगा!
(मानस 7। 114 ख)
1-स्वपादमूलं भजतः प्रियस्य त्यक्तान्यभावस्य हरिः परेशः। विकर्म यच्चोत्पतितं कथंञ्चिद् धुनोति सर्वं हृदि सन्निविष्टः॥
(श्रीमद्भा0 11। 5। 42)
“जो प्रेमी भक्त भगवान्के चरणोंका अनन्यभावसे भजन करता है, उसके द्वारा यदि अकस्मात् कोई पाप-कर्म बन भी
जाय तो उसके हृदयमें विराजमान परमपुरुष भगवान् श्रीहरि उसे सर्वथा नष्ट कर देते हैं।”
2-रहति न प्रभु चित चूक किए की। करत सुरति सय बार हिए की॥ (मानस 1। 29। 3)
1-हेतु रहित जग जुग उपकारी। तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी॥ (मानस 7। 47। 3)
2-भक्त जो कुछ काम करता है, उसको भगवान्का ही समझकर, भगवान्की ही शक्ति मानकर, भगवान्के ही लिये करता
है, अपने लिये किंचिन्मात्र भी नहीं करता—यही उसका हाथ-पैर समेटना है।
* चलती चक्की देखकर दिया कबीरा रोय। दो पाटनमें आयके साबुत बचा न कोय॥
(मानस 4। 3। 2)
* (1) कामाद् द्वेषाद् भयात् स्नेहाद् यथा भक्त्येश्वरे मनः। आवेश्य तदघं हित्वा बहवस्तद्गतिं गताः॥
गोप्यः कामाद् भयात् कंसो द्वेषाच्चैद्यादयो
नृपाः। सम्बन्धाद् वृष्णयः स्नेहाद् यूयं भक्त्या वयं विभो॥
(श्रीमद्भा0 7। 1। 29-30)
“एक नहीं, अनेक मनुष्य कामसे, द्वेषसे, भयसे और स्नेहसे अपने मनको भगवान्में लगाकर तथा अपने सारे पाप धोकर
वैसे ही भगवान्को प्राप्त हुए हैं, जैसे भक्त भक्तिसे। जैसे गोपियोंने कामसे, कंसने भयसे, शिशुपाल-दन्तवक्त्र आदि राजाओंने
द्वेषसे, यदुवंशियोंने परिवारके सम्बन्धसे, तुमलोगों-(युधिष्ठिर आदि-) ने स्नेहसे और हमलोगों-(नारद आदि-) ने भक्तिसे
अपने मनको भगवान्में लगाया है।”
(2) सत्संगेन हि दैतेया यातुधाना मृगाः खगाः। गन्धर्वाप्सरसो नागाः सिद्धाश्चारणगुह्यकाः॥
विद्याधरा मनुष्येषु वैश्याः शूद्राः स्त्रियोऽन्त्यजाः। रजस्तमः प्रकृतयस्तस्मिंस्तस्मिन् युगेऽनघ॥
बहवो मत्पदं
प्राप्तास्त्वाष्ट्रकायाधवादयः। वृषपर्वा बलिर्बाणो मयश्चाथ विभीषणः॥
सुग्रीवो हनुमानृक्षो गजो गृध्रो वणिक्पथः। व्याधः कुब्जा व्रजे गोप्यो यज्ञपत्न्यस्तथापरे॥
ते नाधीतश्रुतिगणा
नोपासितमहत्तमाः। अव्रतातप्ततपसः
सत्संगान्मामुपागताः॥
(श्रीमद्भा0 11। 12। 3—7)
भगवान् कहते हैं—“निष्पाप उद्धवजी! यह एक युगकी नहीं, सभी युगोंकी एक-सी बात है। सत्संग अर्थात् मेरे
सम्बन्धद्वारा ही दैत्य-राक्षस, पशु-पक्षी, गन्धर्व-अप्सरा, नाग-सिद्ध, चारण-गुह्यक और विद्याधरोंको मेरी प्राप्ति हुई है।
(नारदभक्तिसूत्र 72)
मनुष्योंमें वैश्य, शूद्र, स्त्री और अन्त्यज आदि रजोगुणी-तमोगुणी प्रकृतिके बहुत-से जीवोंने मेरा परमपद प्राप्त किया है।
वृत्रासुर, प्रह्लाद, वृषपर्वा, बलि, बाणासुर, मयदानव, विभीषण, सुग्रीव, हनुमान्, जाम्बवान्, गजेन्द्र, जटायु, तुलाधार वैश्य,
धर्मव्याध, कुब्जा, व्रजकी गोपियाँ, यज्ञपत्नियाँ और दूसरे लोग भी सत्संगके प्रभावसे ही मुझे प्राप्त कर सके हैं।
उन लोगोंने न तो वेदोंका स्वाध्याय किया था और न विधिपूर्वक महापुरुषोंकी उपासना ही की थी। इसी प्रकार उन्होंने
कृच्छ्रचान्द्रायण आदि व्रत और कोई तपस्या भी नहीं की थी। बस, केवल सत्संग—मेरे सम्बन्धके प्रभावसे ही वे मुझे प्राप्त हो गये।
1-(1) पुंस्त्वे स्त्रीत्वे विशेषो वा जातिनामाश्रमादयः। न कारणं मद्भजने भक्तिरेव हि कारणम्॥ (अध्यात्म0, अरण्य0 10। 20)
“मेरे भजनमें पुरुष-स्त्रीका भेद अथवा जाति, नाम और आश्रम कारण नहीं है, प्रत्युत मेरी भक्ति ही एकमात्र कारण है।”
(2) किं जन्मना सकलवर्णजनोत्तमेन किं विद्यया सकलशास्त्रविचारवत्या।
यस्यास्ति चेतसि सदा परमेशभक्तिः कोऽन्यस्ततस्त्रिभुवने पुरुषोऽस्ति धन्यः॥ (ब्र0 सं0 भ0 17)
“सम्पूर्ण वर्णोंमें उत्तम वर्ण (ब्राह्मण-कुल)-में जन्म होनेसे क्या हुआ? सम्पूर्ण शास्त्रोंके गहरे अध्ययनसे क्या हुआ?
अर्थात् कुछ नहीं हुआ जिसके हृदयमें भगवान्की भक्ति विराजमान है, इस त्रिलोकीमें उसके समान दूसरा कौन मनुष्य धन्य
हो सकता है?”
(3) व्याधस्याचरणं ध्रुवस्य च वयो विद्या गजेन्द्रस्य का का जातिर्विदुरस्य यादवपतेरुग्रस्य किं पौरुषम्।
कुब्जायाः किमु नाम रूपमधिकं किं तत्सुदाम्नो धनं भक्त्या तुष्यति केवलं न च गुणैर्भक्तिप्रियो माधवः॥
(पद्यावली 8)
“व्याधका कौन-सा श्रेष्ठ आचरण था? ध्रुवकी कौन-सी बड़ी उम्र थी? गजेन्द्रके पास कौन-सी विद्या थी? विदुरकी
कौन-सी ऊँची जाति थी? यदुपति उग्रसेनका कौन-सा पराक्रम था? कुब्जाका कौन-सा सुन्दर रूप था? सुदामाके पास
कौन-सा धन था? फिर भी उन लोगोंको भगवान्की प्राप्ति हो गयी। कारण कि भगवान्को केवल भक्ति ही प्यारी है। वे
केवल भक्तिसे ही सन्तुष्ट होते हैं, आचरण, विद्या आदि गुणोंसे नहीं।
2-पितृगोत्री यथा कन्या स्वामिगोत्रेण गोत्रिका। श्रीरामभक्तिमात्रेणाच्युतगोत्रेण गोत्रकः॥ (नारदपांचरात्र)
(मानस 1। 80)
* (1) असुन्दरः सुन्दरशेखरो वा गुणैर्विहीनो गुणिनां वरो वा। द्वेषी मयि स्यात् करुणाम्बुधिर्वा श्यामः स एवाद्य गतिर्ममायम्॥
“मेरे प्रियतम श्रीकृष्ण असुन्दर हों या सुन्दर-शिरोमणि हों, गुणहीन हों या गुणियोंमें श्रेष्ठ हों, मेरे प्रति द्वेष रखते हों
या करुणासिन्धु-रूपसे कृपा करते हों, वे चाहे जैसे हों, मेरी तो वे ही एकमात्र गति हैं।”
(2) आश्लिष्य वा पादरतां पिनष्टु मामदर्शनान्मर्महतां करोतु वा। यथा तथा वा विदधातु लम्पटो मत्प्राणनाथस्तु स एव नापरः॥
(शिक्षाष्टक 8)
“वे चाहे मुझे हृदयसे लगाकर हर्षित करें या चरणोंमें लिपटे हुए मुझे पैरोंतले रौंद डालें अथवा दर्शन न देकर मर्माहत
ही करें। वे परम स्वतन्त्र श्रीकृष्ण जैसे चाहें, वैसे करें, मेरे तो वे ही प्राणनाथ हैं, दूसरा कोई नहीं।”
* (1) अहो बकी यं स्तनकालकूटं जिघांसयापाययदप्यसाध्वी। लेभे गतिं धात्र्युचितां ततोऽन्यं कं वा दयालुं शरणं व्रजेम॥
(श्रीमद्भा0 3। 2। 23)
“अहो! इस पापिनी पूतनाने जिन्हें मार डालनेकी इच्छासे अपने स्तनोंपर लगाया हुआ कालकूट विष पिलाकर भी वह
गति प्राप्त की, जो धात्रीको मिलनी चाहिये, उनके अलावा और कौन दयालु है, जिसकी शरणमें जायँ?”
(2) गई मारन पूतना कुच कालकूट लगाइ। मातुकी गति दई ताहि कृपालु जादवराइ॥ (विनय-पत्रिका 214। 2)
(मानस 2। 131)
(श्रीमद्भा0 11। 14। 14)
(श्रीमद्भा0 11। 2। 53)
(मानस 2। 204)
(विनय-पत्रिका 103)
(दोहावली 277)
67श्रीभगवान्
इदं ते ातपस्काय ाभक्ताय कदाचन ाशुश्रूषवे वा्यं च मां योऽभ्यसूयति॥ 67॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

अब पूर्वश्लोकमें कहे अत्यन्त गोपनीय वचनको अनधिकारियोंके सामने कहनेका निषेध करते हैं।

पदच्छेद
श्लोकमें ढूँढ़नेके लिये हॉवर करें
व्याख्या
7 sections
इदं ते नातपस्काय
पूर्वश्लोकमें आये
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज
इस सर्वगुह्यतम वचनके लिये यहाँ “इदम्” पद आया है। अपने कर्तव्यका पालन करते हुए स्वाभाविक जो कष्ट आ जाय, विपरीत परिस्थिति आ जाय, उसको प्रसन्नतापूर्वक सहनेका नाम “तप” है। तपके बिना अन्तःकरणमें पवित्रता नहीं आती और पवित्रता आये बिना अच्छी बातें धारण नहीं होतीं। इसलिये भगवान् कहते हैं कि जो तपस्वी नहीं है, उसको यह सर्वगुह्यतम रहस्य नहीं कहना चाहिये। जो सहिष्णु अर्थात् सहनशील नहीं है, वह भी अतपस्वी है। अतः उसको भी यह सर्वगुह्यतम रहस्य नहीं कहना चाहिये। यह सहिष्णुता चार प्रकारकी होती है— (1) द्वन्द्वसहिष्णुता—राग-द्वेष, हर्ष-शोक, सुख- दुःख, मान-अपमान, निन्दा-स्तुति आदि द्वन्द्वोंसे रहित “द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञैः” (गीता 15। 5)। (2) वेगसहिष्णुता—काम, क्रोध, लोभ, द्वेष आदिके वेगोंको उत्पन्न न होने देना—“कामक्रोधोद्भवं वेगम्” (गीता 5। 23)। (3) परमतसहिष्णुता—दूसरोंके मतकी महिमा सुनकर अपने मतमें सन्देह न होना और उनके मतसे उद्विग्न न होना*—“एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति” (गीता 5। 5)। (4) परोत्कर्षसहिष्णुता—अपनेमें योग्यता, अधिकार, पद, त्याग, तपस्या आदिकी कमी है, तो भी दूसरोंकी योग्यता, अधिकार आदिकी प्रशंसा सुनकर अपनेमें कुछ भी विकार न होना—“विमत्सरः” (गीता 4। 22); “हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तः” (गीता 12। 15)। ये चारों सहिष्णुताएँ सिद्धोंकी हैं। ये सहिष्णुताएँ जिसका लक्ष्य हों, वही तपस्वी है और जिसका लक्ष्य न हों, वही अतपस्वी है। ऐसे अतपस्वी अर्थात् असहिष्णु1को सर्वगुह्यतम रहस्य न सुनानेका मतलब है कि
सम्पूर्ण धर्मोंको मेरेमें अर्पण करके तू अनन्यभावसे मेरी शरण आ जा
इस बातको सुनकर उसके मनमें कोई विपरीत भावना या दोष आ जाय, तो वह मेरी इस सर्वगुह्यतम बातको सह नहीं सकेगा और इसका निरादर करेगा, जिससे उसका पतन हो जायगा। दूसरा भाव यह है कि जिसका अपनी वृत्तियों, आचरणों, भावों आदिको शुद्ध करनेका उद्देश्य नहीं है, वह यदि मेरी
तू मेरी शरणमें आ जा, तो मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा, तू चिन्ता मत कर
इन बातोंको सुनेगा तो “मैं चिन्ता क्यों करूँ? चिन्ता भगवान् करेंगे” ऐसा उलटा समझकर दुर्गुण-दुराचारोंमें लग जायगा और अपना अहित कर लेगा। इससे मेरी सर्वगुह्यतम बातका दुरुपयोग होगा। अतः इसे कुपात्रको कभी मत सुनाना।
नाभक्ताय कदाचन
जो भक्तिसे रहित है, जिसका भगवान्पर भरोसा, श्रद्धा-विश्वास नहीं है, उसको भी यह बात मत कहना; क्योंकि श्रद्धा-विश्वास और भक्ति न होनेसे उसकी यह विपरीत धारणा हो सकती है कि “भगवान् तो आत्मश्लाघी हैं, स्वार्थी हैं और दूसरोंको वशमें करना चाहते हैं। जो दूसरोंको अपनी आज्ञामें चलाना चाहता है, वह दूसरोंको क्या निहाल करेगा? उसके शरण होनेसे क्या लाभ?” आदि-आदि। इस प्रकार दुर्भाव करके वह अपना पतन कर लेगा। इसलिये ऐसे अभक्तको कभी मत कहना।
न चाशुश्रूषवे वाच्यम्
जो इस रहस्यको सुनना नहीं चाहता, इसकी उपेक्षा करता है, उसको भी कभी मत सुनाना; क्योंकि बिना रुचिके, जबर्दस्ती सुनानेसे वह इस बातका तिरस्कार करेगा, उसको सुनना अच्छा नहीं लगेगा, उसका मन इस बातको फेंकेगा। यह भी उसके द्वारा एक अपराध होगा। अपराध करनेवालेका भला नहीं होता। अतः जो सुनना नहीं चाहता, उसको मत सुनाना।
न च मां योऽभ्यसूयति
जो गुणोंमें दोषारोपण करता है, उसको भी मत सुनाना; क्योंकि उसका अन्तःकरण अत्यधिक मलिन होनेके कारण वह भगवान्की बात सुनकर उलटे उनमें दोषारोपण ही करेगा। दोषदृष्टि रहनेसे मनुष्य महान् लाभसे वंचित हो जाता है और अपना पतन कर लेता है। अतः दोषदृष्टि करना बड़ा भारी दोष है। यह दोष श्रद्धालुओंमें भी रहता है। इसलिये साधकको सावधान होकर इस भयंकर दोषसे बचते रहना चाहिये। भगवान्ने भी (गीता—तीसरे अध्यायके इकतीसवें श्लोकमें) जहाँ अपना मत बताया, वहाँ “श्रद्धावन्तः अनसूयन्तः” पदोंसे यह बात कही कि श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टिसे रहित मनुष्य कर्मोंसे छूट जाता है। ऐसे ही गीताके माहात्म्य (इसी अध्यायके इकहत्तरवें श्लोक)-में भी “श्रद्धावाननसूयश्च” पदोंसे यह बताया कि श्रद्धावान् और दोषदृष्टिसे रहित मनुष्य केवल गीताको सुननेमात्रसे वैकुण्ठ आदि लोकोंको चला जाता है। इस गोपनीय रहस्यको दूसरोंसे मत कहना—यह कहनेका तात्पर्य दूसरोंको इस गोपनीय तत्त्वसे वंचित रखना नहीं है, प्रत्युत जिसकी भगवान् और उनके वचनोंपर श्रद्धा-भक्ति नहीं है, वह भगवान्को स्वार्थी समझकर (जैसे साधारण मनुष्य अपने स्वार्थके लिये ही किसीको स्वीकार करते हैं), भगवान्पर दोषारोपण करके महान् पतनकी तरफ न चला जाय, इसलिये उसको कहनेका निषेध किया है।
परिशिष्ट भाव
भगवान्ने अभक्तको और दोषदृष्टिवालेको सर्वगुह्यतम वचन न कहनेपर विशेष जोर दिया है। अभक्त और दोषदृष्टिवालेको कहनेमें जितना दोष है, उतना दोष अतपस्वी और सुनना न चाहनेवालेको कहनेमें नहीं है; क्योंकि अभक्त और दोषदृष्टिवालेमें विपरीत बुद्धि है। “अभक्त” का अर्थ है—भक्तिका विरोधी। जिसमें भक्तिका अभाव है, उसको यहाँ “अभक्त” नहीं कहा गया है। जो भक्त है, उसमें भी बेसमझीसे असूया-दोष आ सकता है2, पर भक्तिके कारण वह दोष स्वतः मिट जाता है। “अशुश्रूषवे” का अर्थ है—जो अहंकारके कारण नहीं सुनना चाहता। जो बेसमझीसे नहीं सुनना चाहता, उसको यहाँ “अशुश्रूषवे” नहीं कहा गया है।
* आपसमें मतभेद होना और अपने मतके अनुसार साधन करके जीवन बनाना दोष नहीं है, प्रत्युत दूसरोंका मत बुरा लगना,
उनके मतका खण्डन करना, उनके मतसे घृणा करना ही दोष है।
1-असहिष्णुता और असूयामें थोड़ा अन्तर है। दूसरोंकी विशेषताको न सहना “असहिष्णुता” है और दूसरोंके गुणोंमें दोष
देखना “असूया” है।
2-श्रद्धा होनेपर भी साथमें असूया-दोष रह सकता है, इसीलिये भगवान्ने श्रद्धाके साथ-साथ असूया-दोषसे रहित होनेकी
बात भी कही है—“श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तः” (गीता 3। 31), “श्रद्धावाननसूयश्च” (गीता 18। 71)।
68श्रीभगवान्
य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यतिभक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥ 68॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

गीताजीका यह प्रभाव है कि जो इसका प्रचार करेगा, उससे बढ़कर मेरा प्यारा कोई नहीं होगा—यह बात भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें बताते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
5 sections
भक्तिं मयि परां कृत्वा
जो मेरेमें पराभक्ति करके इस गीताको कहता है। इसका तात्पर्य है कि जो रुपये, मान-बड़ाई, भेंट-पूजा, आदर-सत्कार आदि किसी भी वस्तुके लिये नहीं कहता, प्रत्युत भगवान्में भक्ति हो जाय, भगवद्भावोंका मनन हो जाय, इन भावोंका प्रचार हो जाय, इनकी आवृत्ति हो जाय, सुनकर लोगोंका दुःख, जलन, सन्ताप आदि दूर हो जाय, सबका कल्याण हो जाय— ऐसे उद्देश्यसे कहता है। इस प्रकार भगवान्की भक्तिका उद्देश्य रखकर कहना ही पराभक्ति करके कहना है। इसी अध्यायके चौवनवें श्लोकमें कही गयी और इस श्लोकमें कही गयी पराभक्तिमें अन्तर है। वहाँ “मद्भक्तिं लभते पराम्” पदोंसे कहा गया है कि ब्रह्मभूत होनेके बाद सांख्ययोगी पराभक्तिको प्राप्त हो जाता है अर्थात् भगवान्से जो अनादिकालका सम्बन्ध है, उसकी स्मृति हो जाती है। परन्तु यहाँ सांसारिक मान-बड़ाई आदि किसीकी भी किंचिन्मात्र कामना न रखकर केवल भगवद्भक्तिकी, भगवत्प्रेमकी अभिलाषा रखना पराभक्ति है, इसलिये यहाँ “भक्तिं मयि परां कृत्वा”
मेरेमें पराभक्ति करके
ऐसा कहा गया है।
य इदं परमं गुह्यम्
इन पदोंसे पूरी गीताका परमगुह्य संवाद लेना चाहिये, जो कि गीता-ग्रन्थ कहलाता है। “परमं गुह्यम्” पदोंमें ही गुह्य, गुह्यतर, गुह्यतम और सर्वगुह्यतम—ये सब बातें आ जाती हैं।
मद्भक्तेष्वभिधास्यति
जिसकी भगवान् और उनके वचनोंमें पूज्यबुद्धि है, आदरबुद्धि है, श्रद्धा-विश्वास है और सुनना चाहता है, वह भक्त हो गया। ऐसे मेरे भक्तोंमें जो इस संवादको कहेगा, वह मेरेको प्राप्त होगा। पीछेके श्लोकमें “नाभक्ताय” पदमें एकवचन दिया और यहाँ “मद्भक्तेषु” पदमें बहुवचन दिया। इसका तात्पर्य है कि जहाँ बहुत-से श्रोता सुनते हों, वहाँ पहले बताये दोषोंवाला कोई व्यक्ति बैठा हो तो वक्ताके लिये पहले कहा निषेध लागू नहीं पड़ेगा; क्योंकि वक्ता केवल उस (दोषी) व्यक्तिको गीता सुनाता ही नहीं। जैसे कोई कबूतरोंको अनाजके दाने डालता है और कबूतर दाने चुगते हैं। यदि उनमें कोई कौआ आकर दाने चुगने लग जाय तो उसको उड़ाया थोड़े ही जा सकता है! क्योंकि दाना डालनेवालेका लक्ष्य कबूतरोंको दाना डालना ही रहता है, कौओंको नहीं। ऐसे ही कोई गीताका प्रवचन कर रहा है और उस प्रवचनको सुननेके लिये बीचमें कोई नया व्यक्ति आ जाय अथवा कोई उठकर चल दे तो वक्ताका ध्यान उसकी तरफ नहीं रहता। वक्ताका ध्यान तो सुननेवाले लोगोंकी तरफ होता है और उन्हींको वह सुनाता है।
मामेवैष्यत्यसंशयः
अगर गीता सुनानेवालेका केवल मेरा ही उद्देश्य होगा तो वह मेरेको प्राप्त हो जायगा, इसमें कोई सन्देहकी बात नहीं है। कारण कि गीताकी यह एक विचित्र कला है कि मनुष्य अपने स्वाभाविक कर्मोंसे भी परमात्माका निष्कामभावपूर्वक पूजन करता हुआ परमात्माको प्राप्त हो जाता है (इसी अध्यायका छियालीसवाँ श्लोक) और जो खाना-पीना, शौच-स्नान आदि शारीरिक कार्योंको भी भगवान्के अर्पण कर देता है, वह भी शुभ-अशुभ फलरूप कर्मबन्धनसे मुक्त होकर भगवान्को प्राप्त हो जाता है (नवें अध्यायका सत्ताईसवाँ-अट्ठाईसवाँ श्लोक)। तो फिर जो केवल भगवान्की भक्तिका लक्ष्य करके गीताका प्रचार करता है, वह भगवान्को प्राप्त हो जाय, इसमें कहना ही क्या है!
69श्रीभगवान्
तस्मामनुष्येषु कश्िन्मे प्रियकृत्तमःभविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि॥ 69॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
पदच्छेद
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न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रिय- कृत्तमः
जो अपनेमें लौकिक-पारलौकिक प्राकृत पदार्थोंकी महत्ता, लिप्सा, आवश्यकता रखता है और रखना चाहता है, वह पराभक्ति (इसी अध्यायका अड़सठवाँ श्लोक)-के अन्तर्गत नहीं आ सकता। पराभक्तिके अन्तर्गत वही आ सकता है, जिसका प्राकृत पदार्थोंको प्राप्त करनेका किंचिन्मात्र भी उद्देश्य नहीं है और जो भगवत्प्राप्ति, भगवद्दर्शन, भगवत्प्रेम आदि पारमार्थिक उद्देश्य रखकर गीताके अनुसार ही अपना जीवन बनाना चाहता है। ऐसा पुरुष ही भगवद्गीताके प्रचारका अधिकारी होता है। यदि उसमें कभी मान-बड़ाई आदिकी इच्छा आ भी जाय तो वह टिकेगी नहीं; क्योंकि मान-बड़ाई आदि प्राप्त करना उसका उद्देश्य नहीं है। भगवान्के भक्तोंमें गीताका प्रचार करनेवाले उपर्युक्त अधिकारी मनुष्यके लिये ही “तस्मात्” पद देकर भगवान् कहते हैं कि मनुष्योंमें उसके समान मेरा प्रियकृत्तम अर्थात् अत्यन्त प्रिय कार्य करनेवाला कोई भी नहीं है; क्योंकि गीताप्रचारके समान दूसरा मेरा कोई प्रिय कार्य है ही नहीं। “प्रियकृत्तमः” पदमें जो “कृत्” पद आया है, उसका तात्पर्य है कि गीताका प्रचार करनेमें उसका अपना कोई स्वार्थ नहीं है, मान-बड़ाई, आदर-सत्कार आदिकी कोई कामना नहीं हैः केवल भगवत्प्रीत्यर्थ गीताके भावोंका प्रचार करता है। इसलिये वह प्रियकृत्तम—भगवान्का अत्यन्त प्रिय कार्य करनेवाला है। मनुष्योंमें प्रियकृत्तम कहनेका तात्पर्य है कि भगवान्का अत्यन्त प्यारा बननेके लिये मनुष्योंको ही अधिकार है। संसारमें कामनाओंकी पूर्ति कर लेना कोई महत्त्वकी, बहादुरीकी बात नहीं है। देवता, पशु-पक्षी, नारकीय जीव, कीट-पतंग, वृक्ष-लता आदि सभी योनियोंमें कामनाकी पूर्ति करनेका अवसर मिलता है; परन्तु कामनाका त्याग करके परमात्माकी प्राप्ति करनेका अवसर तो केवल मनुष्ययोनिमें ही मिलता है। इस मनुष्ययोनिको प्राप्त करके परमात्माकी प्राप्ति करनेमें, परमात्माका अत्यन्त प्यारा बननेमें ही मनुष्यजन्मकी सफलता है।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि
जिसमें अपनी मान-बड़ाईकी वासना है, कुछ स्वार्थभाव भी है और जिसका अपना उद्धार करनेका तथा गीताके अनुसार जीवन बनानेका उद्देश्य वैसा (प्रियकृत्तमके समान) नहीं बना है; परन्तु जिसके हृदयमें गीताका विशेष आदर है और गीताका पाठ करवाना, गीता कण्ठस्थ करवाना, गीता मुद्रित करवाकर उसकी सस्ती बिक्री करना आदि किसी तरहसे गीताका प्रचार करता है और लोगोंको गीतामें लगाता है, उसके समान पृथ्वी-मण्डलपर मेरा दूसरा कोई प्रियतर नहीं होगा। अपने धर्म, सम्प्रदाय, सिद्धान्त आदिका प्रचार करनेवाला व्यक्ति भगवान्का प्रिय तो हो सकता है, पर प्रियतर नहीं होगा। प्रियतर तो किसी तरहसे गीताका प्रचार करनेवाला ही होगा। भगवद्गीतामें अपना उद्धार करनेकी ऐसी-ऐसी विलक्षण, सुगम और सरल युक्तियाँ बतायी गयी हैं, जिनको मनुष्य- मात्र अपने आचरणोंमें ला सकता है। तात्पर्य यह है कि जो गीताका आदर करता है, ऐसा मनुष्य हिंदू, मुसलमान, ईसाई, यहूदी, पारसी, बौद्ध आदि किसी भी धर्मको माननेवाला क्यों न हो; किसी भी देश, वेश, वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिका क्यों न हो; अपनी रुचिके अनुसार किसी भी शैली, उपाय, सिद्धान्त, साधनको माननेवाला क्यों न हो, वह यदि अपना किसी तरहका आग्रह न रखकर, पक्षपात-विषमताको छोड़कर, किसी भी प्राणीको दुःख पहुँचानेवाली चेष्टाका त्याग करके, मनमें किसी भी लौकिक-पारलौकिक उत्पन्न और नष्ट होनेवाली वस्तुकी कामना न रखकर, अपना सम्प्रदाय, अपनी टोली बनानेका उद्देश्य न रखकर, केवल अपने कल्याणका उद्देश्य रखकर गीताके अनुसार चलता है (अकर्तव्यका सर्वथा त्याग करके प्राप्त परिस्थितिके अनुसार अपने कर्तव्यका लोकहितार्थ, निष्कामभावपूर्वक पालन करता है), तो वह भी जीविका-सम्बन्धी और खाना-पीना, सोना-जागना आदि शरीर-सम्बन्धी सब काम करते हुए परमात्माकी प्राप्ति कर सकता है, महान् आनन्द, महान् सुखको (गीता—छठे अध्यायका बाईसवाँ श्लोक) प्राप्त कर सकता है। गीता वेश, आश्रम, अवस्था, क्रिया आदिका परिवर्तन करनेके लिये नहीं कहती, प्रत्युत परिमार्जन करनेके लिये कहती है अर्थात् केवल अपने भाव और उद्देश्यको शुद्ध बनानेके लिये कहती है। गीताकी ऐसी युक्तियोंको जो भगवान्की तरफ चलनेवाले भक्तोंमें कहेगा, उससे उन भक्तोंको पारमार्थिक मार्गमें बढ़नेकी युक्तियाँ मिलेंगी, शंकाओंका समाधान होगा, साधनकी उलझनें सुलझेंगी, पारमार्थिक मार्गकी बाधाएँ दूर होंगी, जिससे वे उत्साहसे सुगमतापूर्वक बहुत ही जल्दी अपने लक्ष्यको प्राप्त कर सकेंगे। इसलिये वह भगवान्को सबसे अधिक प्यारा होगा; क्योंकि भगवान् जीवके उद्धारसे बड़े राजी होते हैं, प्रसन्न होते हैं।
परिशिष्ट भाव
गीताकी शिक्षासे मनुष्यमात्रका प्रत्येक परिस्थितिमें सुगमतासे कल्याण हो सकता है, इसलिये भगवान् इसके प्रचारकी विशेष महिमा कहते हैं। गीताने युद्ध-जैसी परिस्थितिमें भी कल्याण होनेकी बात कही है— “सुखदुःखे समे कृत्वा0” (2। 38), “यत्करोषि यदश्नासि0” (9। 27), “स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य0” (18। 46) आदि। जब युद्ध-जैसी परिस्थिति (घोर कर्म)-में भी कल्याण हो सकता है, तो फिर अन्य परिस्थितिमें कैसे नहीं होगा? जो मनुष्य भगवान्का प्यारा हो जाता है, उसको कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनों योग प्राप्त हो जाते हैं।
70श्रीभगवान्
अध्येष्यते य इमं धर्म्यं संवादमावयोः। ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः॥ 70॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

जिसमें गीताका प्रचार करनेकी योग्यता नहीं है, वह क्या करे? इसको भगवान् आगेके श्लोकमें बताते हैं।

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व्याख्या
3 sections
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवाद- मावयोः
तुम्हारा और हमारा यह संवाद शास्त्रों, सिद्धान्तोंके साररूप धर्मसे युक्त है। यह बहुत विचित्र बात है कि परस्पर साथ रहते हुए तुम्हारे-हमारे बहुत वर्ष बीत गये; परन्तु हम दोनोंका ऐसा संवाद कभी नहीं हुआ! ऐसा धर्ममय संवाद तो कोई विलक्षण, अलौकिक अवसर आनेपर ही होता है। जबतक मनुष्यकी संसारसे उकताहट न हो, वैराग्य या उपरति न हो और हृदयमें जोरदार हलचल न मची हो, तबतक उसकी असली जिज्ञासा जाग्रत् नहीं होती। किसी कारणवश जब यह मनुष्य अपने कर्तव्यका निर्णय करनेके लिये व्याकुल हो जाता है, जब अपने कल्याणके लिये कोई रास्ता नहीं दीखता, बिना समाधानके और कोई भी अच्छी नहीं लगती, एकमात्र हृदयका सन्देह दूर करनेकी धुन (चटपटी) लग जाती है, एक ही जोरदार जिज्ञासा होती है और दूसरी तरफसे मन सर्वथा हट जाता है, तब यह मनुष्य जहाँसे प्रकाश और समाधान मिलनेकी सम्भावना होती है, वहाँ अपना हृदय खोलकर बात पूछता है, प्रार्थना करता है, शरण हो जाता है, शिष्य हो जाता है। पूछनेवालेके मनमें जैसी-जैसी उत्कण्ठा बढ़ती है, कहनेवालेके मनमें वैसी-वैसी बड़ी विचित्रता और विलक्षणतासे समाधान करनेवाली बातें पैदा होती हैं। जैसे दूध पीनेके समय बछड़ा जब गायके थनोंपर मुँहसे बार-बार धक्का मारता है और थनोंसे दूध खींचता है, तब गायके शरीरमें रहनेवाला दूध थनोंमें एकदम उतर आता है। ऐसे ही मनमें जोरदार जिज्ञासा होनेसे जब जिज्ञासु बार-बार प्रश्न करता है, तब कहनेवालेके मनमें नये-नये उत्तर पैदा होते हैं। सुननेवालेको ज्यों-ज्यों नयी बातें मिलती हैं, त्यों-त्यों उसमें सुननेकी नयी-नयी उत्कण्ठा पैदा होती रहती है। ऐसा होनेपर ही वक्ता और श्रोता—इन दोनोंका संवाद बढि़या होता है। अर्जुनने ऐसी उत्कण्ठासे पहले कभी बात नहीं पूछी और भगवान्के मनमें भी ऐसी बातें कहनेकी कभी नहीं आयी। परन्तु जब अर्जुनने जिज्ञासापूर्वक “स्थितप्रज्ञस्य का भाषा ......” (2। 54)—यहाँसे पूछना प्रारम्भ किया, वहींसे उन दोनोंका प्रश्नोत्तररूपसे संवाद प्रारम्भ हुआ है। इसमें वेदों तथा उपनिषदोंका सार और भगवान्के हृदयका असली भाव है, जिसको धारण करनेसे मनुष्य भयंकर- से-भयंकर परिस्थितिमें भी अपने मनुष्यजन्मके ध्येयको सुगमतापूर्वक सिद्ध कर सकता है। प्रतिकूल-से-प्रतिकूल परिस्थिति आनेपर भी घबराये नहीं, प्रत्युत प्रतिकूल परिस्थितिका आदर करते हुए उसका सदुपयोग करे अर्थात् अनुकूलताकी इच्छाका त्याग करे; क्योंकि प्रतिकूलता पहले किये पापोंका नाश करने और आगे अनुकूलताकी इच्छाका त्याग करनेके लिये ही आती है। अनुकूलताकी इच्छा जितनी ज्यादा होगी, उतनी ही प्रतिकूल अवस्था भयंकर होगी। अनुकूलताकी इच्छाका ज्यों-ज्यों त्याग होता जायगा, त्यों-त्यों अनुकूलताका राग और प्रतिकूलताका भय मिटता जायगा। राग और भय—दोनोंके मिटनेसे समता आ जायगी। समता परमात्माका साक्षात् स्वरूप है। गीतामें समताकी बात विशेषतासे बतायी गयी है और गीताने इसीको योग कहा है। इस प्रकार कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, ध्यानयोग, प्राणायाम आदिकी विलक्षण-विलक्षण बातोंका इसमें वर्णन हुआ है। “अध्येष्यते” का तात्पर्य है कि इस संवादको कोई ज्यों-ज्यों पढ़ेगा, पाठ करेगा, याद करेगा, उसके भावोंको समझनेका प्रयास करेगा, त्यों-ही-त्यों उसके हृदयमें उत्कण्ठा बढ़ेगी। वह ज्यों-ज्यों समझेगा, त्यों-त्यों उसकी शंकाका समाधान होगा। ज्यों-ज्यों समाधान होगा, त्यों-त्यों इसमें अधिक रुचि पैदा होगी। ज्यों-ज्यों रुचि अधिक पैदा होगी, त्यों-त्यों गहरे भाव उसकी समझमें आयेंगे और फिर वे भाव उसके आचरणोंमें, क्रियाओंमें, बर्तावमें आने लगेंगे। आदरपूर्वक आचरण करनेसे वह गीताकी मूर्ति बन जायगा, उसका जीवन गीतारूपी साँचेमें ढल जायगा अर्थात् वह चलती-फिरती भगवद्गीता हो जायगी। उसको देखकर लोगोंको गीताकी याद आने लगेगी; जैसे निषादराज गुहको देखकर माताओंको और दूसरे लोगोंको लखनलालकी याद आती है*।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्याम्
यज्ञ दो प्रकारके होते हैं—द्रव्ययज्ञ और ज्ञानयज्ञ। जो यज्ञ पदार्थों और क्रियाओंकी प्रधानतासे किया जाता है, वह “द्रव्ययज्ञ” कहलाता है और उत्कण्ठासे केवल अपनी आवश्यक वास्तविकताको जाननेके लिये जो प्रश्न किये जाते हैं, विज्ञ पुरुषोंद्वारा उनका समाधान किया जाता है, उनपर गहरा विचार किया जाता है, विचारके अनुसार अपनी वास्तविक स्थितिका अनुभव किया जाता है तथा वास्तविक तत्त्वको जानकर ज्ञात-ज्ञातव्य हो जाता है, वह “ज्ञानयज्ञ” कहलाता है। परन्तु यहाँ भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि तुम्हारे-हमारे संवादका कोई पाठ करेगा तो मैं उसके द्वारा भी ज्ञानयज्ञसे पूजित हो जाऊँगा। इसमें कारण यह है कि जैसे प्रेमी भक्तको कोई भगवान्की बात सुनाये, उसकी याद दिलाये तो वह बड़ा प्रसन्न होता है, ऐसे ही कोई गीताका पाठ करे, अभ्यास करे तो भगवान्को अपने अनन्य भक्तकी, उसकी उत्कण्ठापूर्वक जिज्ञासाकी और उसे दिये हुए उपदेशकी याद आ जाती है और वे बड़े प्रसन्न होते हैं एवं उस पाठ, अभ्यास आदिको ज्ञानयज्ञ मानकर उससे पूजित होते हैं। कारण कि पाठ, अभ्यास आदि करनेवालेके हृदयमें उसके भावोंके अनुसार भगवान्का नित्यज्ञान विशेषतासे स्फुरित होने लगता है।
इति मे मतिः
ऐसा कहनेका तात्पर्य है कि जब कोई गीताका पाठ करता है तो मैं उसको सुनता हूँ; क्योंकि मैं सब जगह रहता हूँ—“मया ततमिदं सर्वम्” (गीता 9। 4) और सब जगह ही मेरे कान हैं—“सर्वतः- श्रुतिमल्लोके” (गीता 13। 13)। अतः उस पाठको सुनते ही मेरे हृदयमें विशेषतासे ज्ञान, प्रेम, दया आदिका समुद्र लहराने लगता है और गीतोपदेशकी यादमें मेरी बुद्धि सराबोर हो जाती है। वह पूजन करता है—ऐसी बात नहीं है, वह तो पाठ करता है; परन्तु मैं उससे पूजित हो जाता हूँ अर्थात् उसको ज्ञानयज्ञका फल मिल जाता है। दूसरा भाव यह है कि पाठ करनेवाला यदि उतने गहरे भावोंमें नहीं उतरता, केवल पाठमात्र या यादमात्र करता है तो भी उससे मेरे हृदयमें तेरे और मेरे सारे संवादकी (उत्कण्ठापूर्वक किये गये तेरे प्रश्नोंकी और मेरे दिये हुए गहरे वास्तविक उत्तरोंकी) एक गहरी मीठी-मीठी स्मृति बार-बार आने लगती है। इस प्रकार गीताका अध्ययन करनेवाला मेरी बड़ी भारी सेवा करता है, ऐसा मैं मान लेता हूँ। विदेशमें किसी जगह एक जलसा हो रहा था। उसमें बहुत-से लोग इकट्ठे हुए थे। एक पादरी उस जलसेमें एक लड़केको ले आया। वह लड़का पहले नाटकमें काम किया करता था। पादरीने उस लड़केको दस-पन्द्रह मिनटका एक बहुत बढि़या व्याख्यान सिखाया। साथ ही ढंगसे उठना, बैठना, खड़े होना, इधर-उधर ऐसा-ऐसा देखना आदि व्याख्यानकी कला भी सिखायी। व्याख्यानमें बड़े ऊँचे दर्जेकी अंग्रेजीका प्रयोग किया गया था। व्याख्यानका विषय भी बहुत गहरा था। पादरीने व्याख्यान देनेके लिये उस बालकको मेजपर खड़ा कर दिया। बच्चा खड़ा हो गया और बड़े मिजाजसे दायें-बायें देखने लगा और बोलनेकी जैसी-जैसी रिवाज है, वैसे-वैसे सम्बोधन देकर बोलने लगा। वह नाटकमें रहा हुआ था, उसको बोलना आता ही था; अतः वह गंभीरतासे, मानो अर्थोंको समझते हुएकी मुद्रामें ऐसा विलक्षण बोला कि जितने सदस्य बैठे थे, वे सब अपनी-अपनी कुर्सियोंपर उछलने लगे। सदस्य इतने प्रसन्न हुए कि व्याख्यान पूरा होते ही वे रुपयोंकी बौछार करने लगे। अब वह बालक सभाके ऊपर-ही-ऊपर घुमाया जाने लगा। उसको सब लोग अपने-अपने कन्धोंपर लेने लगे। परन्तु उस बालकको यह पता ही नहीं था कि मैंने क्या कहा है! वह तो बेचारा ज्यादा पढ़ा-लिखा न होनेसे अंग्रेजीके भावोंको भी पूरा नहीं समझता था, पर सभावाले सभी लोग समझते थे। इसी प्रकार कोई गीताका अध्ययन करता है, पाठ करता है तो वह भले ही उसके अर्थको, भावोंको न समझे, पर भगवान् तो उसके अर्थको, भावोंको समझते हैं। इसलिये भगवान् कहते हैं कि मैं उसके अध्ययनरूप, पाठरूप ज्ञानयज्ञसे पूजित हो जाता हूँ। सभामें जैसे बालकके व्याख्यानसे सभापति तो खुश हुआ ही, पर उसके साथ-साथ सभासद् भी बड़े खुश हुए और उत्साहपूर्वक बच्चेका आदर करने लगे, ऐसे ही गीता पाठ करनेवालेसे भगवान् ज्ञानयज्ञसे पूजित होते हैं तथा स्वयं वहाँ निवास करते हैं, साथ-ही-साथ प्रयाग आदि तीर्थ, देवता, ऋषि, योगी, दिव्य नाग, गोपाल, गोपिकाएँ, नारद, उद्धव आदि भी वहाँ निवास करते हैं*।
परिशिष्ट भाव
भगवान् ज्ञानयज्ञको द्रव्यमय यज्ञसे भी श्रेष्ठ मानते हैं—“श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप” (गीता 4। 33)। जब गीताके अध्ययनका ही इतना माहात्म्य है तो फिर उसके अनुसार आचरण करनेका तो कहना ही क्या?
* जानि लखन सम देहिं असीसा। जिअहु सुखी सय लाख बरीसा॥
निरखि निषादु नगर नर नारी। भए सुखी जनु लखनु निहारी॥ (मानस 2। 196। 3)
71श्रीभगवान्
श्रद्धावाननसूयश् शृणुयादपि यो नरः। सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्॥ 71॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

जो गीताका प्रचार और अध्ययन भी न कर सके, वह क्या करे? इसके लिये आगेके श्लोकमें उपाय बताते हैं।

पदच्छेद
श्लोकमें ढूँढ़नेके लिये हॉवर करें
व्याख्या
1 section
श्रद्धावाननसूयश्च .................... पुण्य- कर्मणाम्
गीताकी बातोंको जैसा सुन ले, उसको प्रत्यक्षसे भी बढ़कर पूज्यभावसहित वैसा-का-वैसा मानने- वालेका नाम “श्रद्धावान्” है और उन बातोंमें कहीं भी, किसी भी विषयमें किंचिन्मात्र भी कमी न देखनेवालेका नाम “अनसूयः” है। ऐसा श्रद्धावान् और दोषदृष्टिसे रहित मनुष्य गीताको केवल सुन भी ले, तो वह भी शरीर छूटनेपर सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर पुण्यकारियोंके शुभ लोकोंको प्राप्त कर लेता है। यहाँ दो बार “अपि” पद देनेका तात्पर्य है कि जो गीताका प्रचार करता है, अध्ययन करता है, उसके लिये तो कहना ही क्या है! पर जो सुन भी लेता है, वह मनुष्य भी शरीर छूटनेपर शुभ लोकोंको प्राप्त हो जाता है। मनुष्यकी वाणीमें प्रायः भ्रम, प्रमाद, लिप्सा और करणापाटव—ये चार दोष होते हैं*। अतः मनुष्यकी वाणी सर्वथा निर्दोष नहीं हो सकती। परन्तु भगवान्की दिव्य वाणीमें इन चारोंमेंसे कोई भी दोष नहीं रह सकता; क्योंकि भगवान् निर्दोषताकी परावधि हैं अर्थात् भगवान्से बढ़कर निर्दोषता किसीमें कभी होती ही नहीं। इसलिये भगवान्के वचनोंमें किसी प्रकारके संशयकी सम्भावना ही नहीं है। अतः गीता सुननेवालेको कोई विषय समझमें कम आये, विचारद्वारा कोई बात न जँचे, तो समझना चाहिये कि इस विषयको समझनेमें मेरी बुद्धिकी कमी है, मैं समझ नहीं पा रहा हूँ—इस भावको दृढ़तासे धारण करनेपर असूया- दोष मिट जाता है। भगवान्में अत्यधिक श्रद्धा-विश्वासपूर्वक भक्ति होनेपर भी असूया-दोष नहीं रहता। चैतन्य महाप्रभुका एक भक्त था। वह रोज गीताका पाठ करते हुए मस्त हो जाता था, गद्गद हो जाता था और रोने लगता था। वह शुद्ध पाठ नहीं करता था। उसके पाठमें अशुद्धियाँ आती थीं। उसके विषयमें किसीने चैतन्य महाप्रभुसे शिकायत कर दी कि “देखिये प्रभु! वह बड़ा पाखण्ड करता है; पाठ तो शुद्ध करता नहीं और रोता रहता है।” चैतन्य महाप्रभुने उसको अपने पास बुलाकर पूछा— “तुम गीताका पाठ करते हो, तो क्या उसका अर्थ जानते हो!” उसने कहा—“नहीं प्रभु!” फिर पूछा—“तो फिर तुम रोते क्यों हो!” उसने कहा—“मैं जब “अर्जुन उवाच” पढ़ता हूँ; तो अर्जुन भगवान्से पूछ रहे हैं—“ऐसा मेरेको प्रत्यक्ष दीखता है और जब मैं “श्रीभगवानुवाच” पढ़ता हूँ, तो भगवान् अर्जुनके प्रश्नोंका उत्तर दे रहे हैं—ऐसा मेरेको प्रत्यक्ष दीखता है। इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनका आपसमें संवाद हो रहा है—ऐसा प्रत्यक्ष दीखता है; परन्तु अर्जुन क्या पूछते हैं और भगवान् क्या उत्तर देते हैं, यह मेरी समझमें नहीं आता। मैं तो उन दोनोंके दर्शन कर-करके राजी होता हूँ।” उसकी ऐसी श्रद्धा-भक्ति देखकर चैतन्य महाप्रभु बहुत प्रसन्न हुए। इस प्रकारकी श्रद्धा-भक्तिवाला मनुष्य गीताको केवल सुन भी ले, तो उसकी मुक्तिमें कोई सन्देह नहीं रहता। वह शरीर छूटनेपर सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर पुण्यकारियोंके शुभ लोकोंको प्राप्त हो जाता है। यहाँ “पुण्यकर्मणाम्” पदसे सकामभावपूर्वक यज्ञ, अनुष्ठान आदि पुण्य-कर्म करनेवालोंको नहीं लेना चाहिये; क्योंकि भगवान्ने उनको ऊँचा नहीं माना है, प्रत्युत उनके बारेमें कहा है कि वे बार-बार आवागमनको प्राप्त होते हैं (गीता—नवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। यहाँ उन पुण्यकर्मा भक्तोंको लेना चाहिये, जिनको भगवान्का प्रेम, दर्शन आदिकी प्राप्ति होती है। ऐसे पुण्यकर्मा भक्तोंको अपने-अपने इष्टके अनुसार वैकुण्ठ, साकेत, गोलोक, कैलास आदि जिन दिव्य लोकोंकी प्राप्ति होती है, असूया- दोषरहित श्रद्धावान् पुरुषको गीता सुननेमात्रसे उन लोकोंकी प्राप्ति हो जाती है।
परिशिष्ट भाव
“शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्”—श्रद्धा-भक्तिके तारतम्यसे गीताको सुननेमें तारतम्य रहता है और सुननेके तारतम्यसे श्रोताका स्वर्गादि लोकोंसे लेकर भगवल्लोकतक अधिकार हो जाता है अर्थात् अधिक श्रद्धा- भक्ति होगी तो वह भगवान्के धामको प्राप्त हो जायगा और कम श्रद्धा-भक्ति होगी तो वह अन्य लोकोंको प्राप्त हो जायगा। गीताके अध्ययन और श्रवणकी तो बात ही क्या है, गीताको रखनेमात्रका भी बड़ा माहात्म्य है! एक सिपाही था। वह रातके समय कहींसे अपने घर आ रहा था। रास्तेमें उसने चन्द्रमाके प्रकाशमें एक वृक्षके नीचे एक सुन्दर स्त्री देखी। उसने उस स्त्रीसे बातचीत की तो उस स्त्रीने कहा—मैं आ जाऊँ क्या? सिपाहीने कहा—हाँ, आ जा। सिपाहीके ऐसा कहनेपर वह स्त्री, जो वास्तवमें चुड़ैल थी, उसके पीछे आ गयी। अब वह रोज रातमें उस सिपाहीके पास आती, उसके साथ सोती, उसका संग करती और सबेरे चली जाती। इस तरह वह उस सिपाहीका शोषण करने लगी अर्थात् उसका खून चूसकर उसकी शक्ति क्षीण करने लगी। एक बार रातमें वे दोनों लेट गये, पर बत्ती जलती रह गयी तो सिपाहीने उससे कहा कि तू बत्ती बन्द कर दे। उसने लेटे-लेटे ही अपना हाथ लम्बा करके बत्ती बन्द कर दी। अब सिपाहीको पता लगा कि यह कोई सामान्य स्त्री नहीं है, यह तो चुड़ैल है! वह बहुत घबराया। चुड़ैलने उसको धमकी दी कि अगर तू किसीको मेरे बारेमें बतायेगा तो मैं तेरेको मार डालूँगी। इस तरह वह रोज रातमें आती और सबेरे चली जाती। सिपाहीका शरीर दिन-प्रतिदिन सूखता जा रहा था। लोग उससे पूछते कि भैया! तुम इतने क्यों सूखते जा रहे हो? क्या बात है, बताओ तो सही! परन्तु चुड़ैलके डरके मारे वह किसीको कुछ बताता नहीं था। एक दिन वह दुकानसे दवाई लाने गया। दुकानदारने दवाईकी पुडि़या बाँधकर दे दी। सिपाही उस पुडि़याको जेबमें डालकर घर चला आया। रातके समय जब वह चुड़ैल आयी, तब वह दूरसे ही खड़े-खड़े बोली कि तेरी जेबमें जो पुडि़या है, उसको निकालकर फेंक दे। सिपाहीको विश्वास हो गया कि इस पुडि़यामें जरूर कुछ करामात है, तभी तो आज यह चुड़ैल मेरे पास नहीं आ रही है! सिपाहीने उससे कहा कि मैं पुडि़या नहीं फेकूँगा। चुड़ैलने बहुत कहा, पर सिपाहीने उसकी बात मानी नहीं। जब चुड़ैलका उसपर वश नहीं चला, तब वह चली गयी। सिपाहीने जेबमेंसे पुडि़याको निकालकर देखा तो वह गीताका फटा हुआ पन्ना था! इस तरह गीताका प्रभाव देखकर वह सिपाही हर समय अपनी जेबमें गीता रखने लगा। वह चुड़ैल फिर कभी उसके पास नहीं आयी।
* गीतायाः पुस्तकं यत्र यत्र पाठः प्रवर्तते। तत्र सर्वाणि तीर्थानि प्रयागादीनि तत्र वै॥
सर्वे देवाश्च ऋषयो योगिनः पन्नगाश्च ये।
गोपाला गोपिका वापि नारदोद्धवपार्षदैः। सहायो जायते शीघ्रं यत्र गीता प्रवर्तते॥
यत्र गीताविचारश्च पठनं पाठनं श्रुतम्। तत्राहं निश्चितं पृथ्वि निवसामि सदैव हि॥
* (1) वक्ता जिस विषयका प्रतिपादन करता है, उस विषयमें वह बिलकुल निःसन्देह न हो, इसे “भ्रम” कहते हैं;
(2) वक्ता विवेचनमें आलस्य, उपेक्षा, उदासीनता, तत्परताकी कमी, लोग समझें या न समझें—इसकी बेपरवाह करता है,
इसे “प्रमाद” कहते हैं; (3) वक्ताकी रुपये-पैसे, मान-बड़ाई, आदर-सत्कार, सुख-आराम आदि लौकिक-पारलौकिक कुछ भी
पानेकी इच्छा है, इसे “लिप्सा” कहते हैं और (4) वक्ता जिन इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, वाणी आदिसे अपने भाव प्रकट करता है,
उन करणोंमें पटुता, कुशलता नहीं है और वह श्रोताकी भाषा, भाव, योग्यताको नहीं जानता, इसे “करणापाटव” कहते हैं।
72श्रीभगवान्
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसाकच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय॥ 72॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
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पूर्वश्लोकमें गीता सुननेका माहात्म्य बताकर अब अर्जुनकी क्या स्थिति है, क्या दशा है, आदि सब कुछ जानते हुए भी भगवान् भगवद्गीता-श्रवणके माहात्म्यको सबके सामने प्रकट करनेके उद्देश्यसे आगेके श्लोकमें अर्जुनसे प्रश्न करते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
3 sections
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा
“एतत्” शब्द अत्यन्त समीपका वाचक होता है और यहाँ अत्यन्त समीप इकहत्तरवाँ श्लोक है। उनहत्तरवें-सत्तरवें श्लोकोंमें जो गीताका प्रचार और अध्ययन करनेवालेकी महिमा कही है, उस प्रचार और अध्ययनका तो अर्जुनके सामने कोई प्रश्न ही नहीं था। इसलिये पीछेके (इकहत्तरवें) श्लोकका लक्ष्य करके भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि
मनुष्य श्रद्धापूर्वक और दोषदृष्टिरहित होकर गीता सुने
यह बात तुमने ध्यानपूर्वक सुनी कि नहीं? अर्थात् तुमने श्रद्धापूर्वक और दोषदृष्टिरहित होकर गीता सुनी कि नहीं? “एकाग्रेण चेतसा” कहनेका तात्पर्य है कि गीतामें भी जिस अत्यन्त गोपनीय रहस्यको अभी पहले चौंसठवें श्लोकमें कहनेकी प्रतिज्ञा की, सड़सठवें श्लोकमें “इदं ते नातपस्काय” कहकर निषेध किया और मेरे वचनोंमें जिसको मैंने परम वचन कहा, उस सर्वगुह्यतम शरणागतिकी बात (छाछठवाँ श्लोक)-को तुमने ध्यानपूर्वक सुना कि नहीं? उसपर खयाल किया कि नहीं?
कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय
भगवान् दूसरा प्रश्न करते हैं कि तुम्हारा अज्ञानसे उत्पन्न हुआ मोह नष्ट हुआ कि नहीं? अगर मोह नष्ट हो गया तो तुमने मेरा उपदेश सुन लिया और अगर मोह नष्ट नहीं हुआ तो तुमने मेरा यह रहस्यमय उपदेश एकाग्रतासे सुना ही नहीं; क्योंकि यह एकदम पक्का नियम है कि जो दोषदृष्टिसे रहित होकर श्रद्धापूर्वक गीताके उपदेशको सुनता है, उसका मोह नष्ट हो ही जाता है। “पार्थ” सम्बोधन देकर भगवान् अपनेपनसे, बहुत प्यारसे पूछ रहे हैं कि तुम्हारा मोह नष्ट हुआ कि नहीं? पहले अध्यायके पचीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने अर्जुनको सुननेके उन्मुख करनेके लिये “पार्थ” सम्बोधन देकर सबसे प्रथम बोलना आरम्भ किया और कहा कि हे पार्थ! युद्धके लिये इकट्ठे हुए इन कुटुम्बियोंको देखो। ऐसा कहनेका तात्पर्य यह था कि अर्जुनके अन्तःकरणमें छिपा हुआ जो कौटुम्बिक मोह है, वह जाग्रत् हो जाय और उस मोहसे छूटनेके लिये उनको चटपटी लग जाय, जिससे वे केवल मेरे सम्मुख होकर सुननेके लिये तत्पर हो जायँ। अब यहाँ उसी मोहके दूर होनेकी बातका उपसंहार करते हुए भगवान् “पार्थ” सम्बोधन देते हैं। “धनंजय” सम्बोधन देकर भगवान् कहते हैं कि तुम लौकिक धनको लेकर धनंजय (राजाओंके धनको जीतने- वाले) बने हो। अब इस वास्तविक तत्त्वरूप धनको प्राप्त करके अपने मोहका नाश कर लो और सच्चे अर्थोंमें “धनंजय” बन जाओ।
73अर्जुन
अर्जुन उवाच
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत। स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव॥ 73॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
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पूर्वश्लोकमें भगवान्ने जो प्रश्न किया था, उसका उत्तर अर्जुन आगेके श्लोकमें देते हैं। अर्जुन उवाच

पदच्छेद
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व्याख्या
4 sections
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादा- न्मयाच्युत
अर्जुनने यहाँ भगवान्के लिये “अच्युत” सम्बोधनका प्रयोग किया है। इसका तात्पर्य है कि जीव तो च्युत हो जाता है अर्थात् अपने स्वरूपसे विमुख हो जाता है तथा पतनकी तरफ चला जाता है; परन्तु भगवान् कभी भी च्युत नहीं होते। वे सदा एकरस रहते हैं। इसी बातका द्योतन करनेके लिये गीतामें अर्जुनने कुल तीन बार “अच्युत” सम्बोधन दिया है। पहली बार (गीता—पहले अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें) “अच्युत” सम्बोधनसे अर्जुनने भगवान्से कहा कि दोनों सेनाओंके बीचमें मेरा रथ खड़ा करो। ऐसी आज्ञा देनेपर भी भगवान्में कोई फर्क नहीं पड़ा। दूसरी बार (ग्यारहवें अध्यायके बयालीसवें श्लोकमें) इस सम्बोधनसे अर्जुनने भगवान्के विश्वरूपकी स्तुति-प्रार्थना की, तो भगवान्में कोई फर्क नहीं पड़ा। अन्तिम बार यहाँ (तिहत्तरवें श्लोकमें) इस सम्बोधनसे अर्जुन संदेहरहित होकर कहते हैं कि अब मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगा, तो भगवान्में कोई फरक नहीं पड़ा। तात्पर्य यह हुआ कि अर्जुनकी तो आदि, मध्य और अन्तमें तीन प्रकारकी अवस्थाएँ र्हुइं, पर भगवान्की आदि, मध्य और अन्तमें एक ही अवस्था रही अर्थात् वे एकरस ही बने रहे। दूसरे अध्यायमें अर्जुनने “शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्” (2। 7) कहकर भगवान्की शरणागति स्वीकार की थी। इस श्लोकमें उस शरणागतिकी पूर्णता होती है। दसवें अध्यायके अन्तमें भगवान्ने अर्जुनसे यह कहा कि “तेरेको बहुत जाननेकी क्या जरूरत है, मैं सम्पूर्ण संसारको एक अंशमें व्याप्त करके स्थित हूँ!” इस बातको सुनते ही अर्जुनके मनमें एक विशेष भाव पैदा हुआ कि भगवान् कितने विलक्षण हैं! भगवान्की विलक्षणताकी ओर लक्ष्य जानेसे अर्जुनको एक प्रकाश मिला। उस प्रकाशकी प्रसन्नतामें अर्जुनके मुखसे यह बात निकल पड़ी कि
मेरा मोह चला गया
“मोहोऽयं विगतो मम” (11। 1)। परन्तु भगवान्के विराट्रूपको देखकर जब अर्जुनके हृदयमें भयके कारण हलचल पैदा हो गयी, तब भगवान्ने कहा कि यह तुम्हारा मूढ़भाव है, तुम व्यथित और मोहित मत होओ—“मा ते व्यथा मा च विमूढभावः” (11। 49)। इससे सिद्ध होता है कि अर्जुनका मोह तब नष्ट नहीं हुआ था। अब यहाँ सर्वज्ञ भगवान्के पूछनेपर अर्जुन कह रहे हैं कि मेरा मोह नष्ट हो गया है और मुझे तत्त्वकी अनादि स्मृति प्राप्त हो गयी—“नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा”1। अन्तःकरणकी स्मृति और तत्त्वकी स्मृतिमें बड़ा अन्तर है। प्रमाणसे प्रमेयका ज्ञान होता है2 परन्तु परमात्मतत्त्व अप्रमेय है। अतः परमात्मा प्रमाणसे व्याप्य नहीं हो सकता अर्थात् परमात्मा प्रमाणके अन्तर्गत आनेवाला तत्त्व नहीं है। परन्तु संसार सब-का-सब प्रमाणके अन्तर्गत आनेवाला है और प्रमाण प्रमाताके अन्तर्गत आनेवाला है।3 प्रमाता एक होता है और प्रमाण अनेक होते हैं। प्रमाणोंके बारेमें कई प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम—ये तीन मुख्य प्रमाण मानते हैं; कई प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द—ये चार प्रमाण मानते हैं और कई इन चारोंके सिवाय अर्थापत्ति, अनुपलब्धि और ऐतिह्य—ये तीन प्रमाण और भी मानते हैं। इस प्रकार प्रमाणोंके माननेमें अनेक मतभेद हैं; परन्तु प्रमाताके विषयमें किसीका कोई मतभेद नहीं है। ये प्रत्यक्ष, अनुमान आदि प्रमाण वृत्तिरूप होते हैं; परन्तु प्रमाता वृत्तिरूप नहीं होता, वह तो स्वयं अनुभवरूप होता है। अब इस “स्मृति” शब्दकी जहाँ व्याख्या की गयी है, वहाँ उसके ये लक्षण बताये हैं— (1) अनुभूतविषयासम्प्रमोषः स्मृतिः। “अनुभूत विषयका न छिपना अर्थात् प्रकट हो जाना स्मृति है।” (2) संस्कारमात्रजन्यं ज्ञानं स्मृतिः। (तर्कसंग्रह) “संस्कारमात्रसे जन्य हो और ज्ञान हो, उसको स्मृति कहते हैं।” यह स्मृति अन्तःकरणकी एक “वृत्ति” है। यह वृत्ति प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति—पाँच प्रकारकी होती है तथा हर प्रकारकी वृत्तिके दो भेद होते हैं—क्लिष्ट और अक्लिष्ट। संसारकी वृत्तिरूप स्मृति “क्लिष्ट” होती है अर्थात् बाँधनेवाली होती है और भगवत्सम्बन्धी वृत्तिरूप स्मृति “अक्लिष्ट” होती है अर्थात् क्लेशको दूर करनेवाली होती है। इन सब वृत्तियोंका कारण “अविद्या” है। परन्तु परमात्मा अविद्यासे रहित है। इसलिये परमात्माकी स्मृति “स्वयं”से ही होती है, वृत्ति या करणसे नहीं। जब परमात्माकी स्मृति जाग्रत् होती है तो फिर उसकी कभी विस्मृति नहीं होती, जबकि अन्तःकरणकी वृत्तिमें स्मृति और विस्मृति—दोनों होती हैं। परमात्मतत्त्वकी विस्मृति या भूल तो असत् संसारको सत्ता और महत्ता देनेसे ही हुई है। यह विस्मृति अनादिकालसे है। अनादिकालसे होनेपर भी इसका अन्त हो जाता है। जब इसका अन्त हो जाता है और अपने स्वरूपकी स्मृति जाग्रत् होती है, तब इसको “स्मृतिर्लब्धा” कहते हैं अर्थात् असत्के सम्बन्धके कारण जो स्मृति सुषुप्तिरूपसे थी, वह जाग्रत् हो गयी। जैसे एक आदमी सोया हुआ है और एक मुर्दा पड़ा हुआ है—इन दोनोंमें महान् अन्तर है, ऐसे ही अन्तःकरणकी स्मृति-विस्मृति दोनों ही मुर्देकी तरह जड हैं, पर स्वरूपकी स्मृति सुप्त है, जड नहीं। केवल जडका आदर करनेसे सोये हुएकी तरह ऊपरसे वह स्मृति लुप्त रहती है अर्थात् आवृत रहती है। उस आवरणके न रहनेपर उस स्मृतिका प्राकट्य हो जाता है तो उसे “स्मृतिर्लब्धा” कहते हैं अर्थात् पहलेसे जो तत्त्व मौजूद है, उसका प्रकट होना “स्मृति” है और आवरण हटनेका नाम “लब्धा” है। साधकोंकी रुचिके अनुसार उसी स्मृतिके तीन भेद हो जाते हैं—(1) कर्मयोग अर्थात् निष्कामभावकी स्मृति, (2) ज्ञानयोग अर्थात् अपने स्वरूपकी स्मृति और (3) भक्तियोग अर्थात् भगवान्के सम्बन्धकी स्मृति। इस प्रकार इन तीनों योगोंकी स्मृति जाग्रत् हो जाती है; क्योंकि ये तीनों योग स्वतःसिद्ध और नित्य हैं। ये तीनों योग जब वृत्तिके विषय होते हैं, तब ये साधन कहलाते हैं; परन्तु स्वरूपसे ये तीनों नित्य हैं। इसलिये नित्यकी प्राप्तिको स्मृति कहते हैं। तात्पर्य यह हुआ कि इन साधनोंकी विस्मृति हुई है, अभाव नहीं हुआ है। असत् संसारके पदार्थोंको आदर देनेसे अर्थात् उनको सत्ता और महत्ता देनेसे राग पैदा हुआ—यह “कर्मयोग” की विस्मृति (आवरण) है। असत् पदार्थोंके सम्बन्धसे अपने स्वरूपकी विमुखता हुई अर्थात् अज्ञान हुआ—यह “ज्ञान- योग”की विस्मृति है। अपना स्वरूप साक्षात् परमात्माका अंश है। इस परमात्मासे विमुख होकर संसारके सम्मुख होनेसे संसारमें आसक्ति हो गयी। उस आसक्तिसे प्रेम ढक गया—यह “भक्तियोग” की विस्मृति है। स्वरूपकी विस्मृति अर्थात् विमुखताका नाश होना यहाँ “स्मृति” है। उस स्मृतिका प्राप्त होना अप्राप्तका प्राप्त होना नहीं है, प्रत्युत नित्यप्राप्तका प्राप्त होना है। नित्य स्वरूपकी प्राप्ति होनेपर फिर उसकी विस्मृति होना सम्भव नहीं है; क्योंकि स्वरूपमें कभी परिवर्तन हुआ नहीं। वह सदा निर्विकार और एकरस रहता है। परन्तु वृत्तिरूप स्मृतिकी विस्मृति हो सकती है; क्योंकि वह प्रकृतिका कार्य होनेसे परिवर्तनशील है। इन सबका तात्पर्य यह हुआ कि संसार तथा शरीरके साथ अपने स्वरूपको मिला हुआ समझना “विस्मृति” है और संसार तथा शरीरसे अलग होकर अपने स्वरूपका अनुभव करना “स्मृति” है। अपने स्वरूपकी स्मृति स्वयंसे होती है। इसमें करण आदिकी अपेक्षा नहीं होती; जैसे— मनुष्यको अपने होनेपनका जो ज्ञान होता है, उसमें किसी प्रमाणकी आवश्यकता नहीं होती। जिसमें करण आदिकी अपेक्षा होती है, वह स्मृति अन्तःकरणकी एक वृत्ति ही है। स्मृति तत्काल प्राप्त होती है। इसकी प्राप्तिमें देरी अथवा परिश्रम नहीं है। कर्ण कुन्तीके पुत्र थे। परन्तु जन्मके बाद जब कुन्तीने उनका त्याग कर दिया, तब अधिरथ नामक सूतकी पत्नी राधाने उनका पालन-पोषण किया। इससे वे राधाको ही अपनी माँ मानने लगे। जब सूर्यदेवसे उनको यह पता लगा कि वास्तवमें मेरी माँ कुन्ती है, तब उनको स्मृति प्राप्त हो गयी। अब
मैं कुन्तीका पुत्र हूँ
ऐसी स्मृति प्राप्त होनेमें कितना समय लगा? कितना परिश्रम या अभ्यास करना पड़ा? कितना जोर आया? पहले उधर लक्ष्य नहीं था, अब उधर लक्ष्य हो गया—केवल इतनी ही बात है। स्वरूप निष्काम है, शुद्ध-बुद्ध-मुक्त है और भगवान्का है। स्वरूपकी विस्मृति अर्थात् विमुखतासे ही जीव सकाम, बद्ध और सांसारिक होता है। ऐसे स्वरूपकी स्मृति वृत्तिकी अपेक्षा नहीं रखती अर्थात् अन्तःकरणकी वृत्तिसे स्वरूपकी स्मृति जाग्रत् होना सम्भव नहीं है। स्मृति तभी जाग्रत् होगी, जब अन्तःकरणसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होगा। स्मृति अपने ही द्वारा अपने-आपमें जाग्रत् होती है। अतः स्मृतिकी प्राप्तिके लिये किसीके सहयोगकी या अभ्यासकी जरूरत नहीं है। कारण कि जडताकी सहायताके बिना अभ्यास नहीं होता, जबकि स्वरूपके साथ जडताका लेशमात्र भी सम्बन्ध नहीं है। स्मृति अनुभवसिद्ध है, अभ्याससाध्य नहीं है। इसलिये एक बार स्मृति जाग्रत् होनेपर फिर उसकी पुनरावृत्ति नहीं करनी पड़ती। स्मृति भगवान्की कृपासे जाग्रत् होती है। कृपा होती है भगवान्के सम्मुख होनेपर और भगवान्की सम्मुखता होती है संसारमात्रसे विमुख होनेपर। जैसे अर्जुनने कहा कि मैं केवल आपकी आज्ञाका ही पालन करूँगा—“करिष्ये वचनं तव”, ऐसे ही संसारका आश्रय छोड़कर केवल भगवान्के शरण होकर कह दे कि “हे नाथ! अब मैं केवल आपकी आज्ञाका ही पालन करूँगा।” तात्पर्य है कि इस स्मृतिकी लब्धिमें साधककी सम्मुखता और भगवान्की कृपा ही कारण है। इसलिये अर्जुनने स्मृतिके प्राप्त होनेमें केवल भगवान्की कृपाको ही माना है। भगवान्की कृपा तो मात्र प्राणियोंपर अपार- अटूट-अखण्डरूपसे है। जब मनुष्य भगवान्के सम्मुख हो जाता है, तब उसको उस कृपाका अनुभव हो जाता है। “त्वत्प्रसादात् मयाच्युत” पदोंसे अर्जुन कह रहे हैं कि आपने विशेषतासे जो सर्वगुह्यतम तत्त्व बताया, उसकी मुझे विशेषतासे स्मृति आ गयी कि मैं आपका ही था, आपका ही हूँ और आपका ही रहूँगा। यह जो स्मृति आ गयी है, यह मेरी एकाग्रतासे सुननेकी प्रवृत्तिसे नहीं आयी है अर्थात् यह मेरे एकाग्रतासे सुननेका फल नहीं है, प्रत्युत यह स्मृति तो आपकी कृपासे ही आयी है। पहले मैंने शरण होकर शिक्षा देनेकी प्रार्थना की थी और फिर यह कहा था कि मैं युद्ध नहीं करूँगा परन्तु मेरेको जबतक वास्तविकताका बोध नहीं हुआ, तबतक आप मेरे पीछे पड़े ही रहे। इसमें तो आपकी कृपा ही कारण है। मेरेको जैसा सम्मुख होना चाहिये, वैसा मैं सम्मुख नहीं हुआ हूँ; परन्तु आपने बिना कारण मेरेपर कृपा की अर्थात् मेरेपर कृपा करनेके लिये आप अपनी कृपाके परवश हो गये, वशीभूत हो गये और बिना पूछे ही आपने शरणागतिकी सर्वगुह्यतम बात कह दी (इसी अध्यायका चौंसठवाँ, पैंसठवाँ, छाछठवाँ श्लोक)। उसी अहैतुकी कृपासे मेरा मोह नष्ट हुआ है।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव
अर्जुन कहते हैं कि मूलमें मेरा जो यह सन्देह था कि युद्ध करूँ या न करूँ (“न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयः” 2। 6), वह मेरा सन्देह सर्वथा नष्ट हो गया है और मैं अपनी वास्तविकतामें स्थित हो गया हूँ। वह संदेह ऐसा नष्ट हो गया है कि न तो युद्ध करनेकी मनमें रही और न युद्ध न करनेकी ही मनमें रही। अब तो यही एक मनमें रही है कि आप जैसा कहें, वैसा मैं करूँ अर्थात् अब तो बस, आपकी आज्ञाका ही पालन करूँगा—“करिष्ये वचनं तव।” अब मेरेको युद्ध करने अथवा न करनेसे किसी तरहका किंचिन्मात्र भी प्रयोजन नहीं है। अब तो आपकी आज्ञाके अनुसार लोकसंग्रहार्थ युद्ध आदि जो कर्तव्य-कर्म होगा, वह करूँगा। अब एक ध्यान देनेकी बात है कि पहले कुटुम्बका स्मरण होनेसे अर्जुनको मोह हुआ था। उस मोहके वर्णनमें भगवान्ने यह प्रक्रिया बतायी थी कि विषयोंके चिन्तनसे आसक्ति, आसक्तिसे कामना, कामनासे क्रोध, क्रोधसे मोह, मोहसे स्मृतिभ्रंश, स्मृतिभ्रंशसे बुद्धिनाश और बुद्धिनाशसे पतन होता है (गीता—दूसरे अध्यायका बासठवाँ-तिरसठवाँ श्लोक)। अर्जुन भी यहाँ उसी प्रक्रियाको याद दिलाते हुए कहते हैं कि मेरा मोह नष्ट हो गया है और मोहसे जो स्मृति भ्रष्ट होती है, वह स्मृति मिल गयी है—“नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा।” स्मृति नष्ट होनेसे बुद्धिनाश हो जाता है, इसके उत्तरमें अर्जुन कहते हैं कि मेरा सन्देह चला गया है—“गतसन्देहः।” बुद्धिनाशसे पतन होता है, उसके उत्तरमें कहते हैं कि मैं अपनी स्वाभाविक स्थितिमें स्थित हूँ— “स्थितोऽस्मि।” इस प्रकार उस प्रक्रियाको बतानेमें अर्जुनका तात्पर्य है कि मैंने आपके मुखसे ध्यानपूर्वक गीता सुनी है, तभी तो आपने सम्मोहका कहाँ प्रयोग किया है और सम्मोहकी परम्परा कहाँ कही है, वह भी मेरेको याद है। परन्तु मेरे मोहका नाश होनेमें तो आपकी कृपा ही कारण है। यद्यपि वहाँका और यहाँका—दोनोंका विषय भिन्न- भिन्न प्रतीत होता है; क्योंकि वहाँ विषयोंके चिन्तन करने आदि क्रमसे सम्मोह होनेकी बात है और यहाँ सम्मोह मूल अज्ञानका वाचक है, फिर भी गहरा विचार किया जाय तो भिन्नता नहीं दीखेगी। वहाँका विषय ही यहाँ आया है। दूसरे अध्यायके इकसठवेंसे तिरसठवें श्लोकतक भगवान्ने यह बात बतायी कि इन्द्रियोंको वशमें करके अर्थात् संसारसे सर्वथा विमुख होकर केवल मेरे परायण होनेसे बुद्धि स्थिर हो जाती है। परन्तु मेरे परायण न होनेसे मनमें स्वाभाविक ही विषयोंका चिन्तन होता है। विषयोंका चिन्तन होनेसे पतन ही होता है; क्योंकि यह आसुरी- सम्पत्ति है। परन्तु यहाँ उत्थानकी बात बतायी है कि संसारसे विमुख होकर भगवान्के सम्मुख होनेसे मोह नष्ट हो जाता है; क्योंकि यह दैवी-सम्पत्ति है। तात्पर्य यह हुआ कि वहाँ भगवान्से विमुख होकर इन्द्रियों और विषयोंके परायण होना पतनमें हेतु है और यहाँ भगवान्के सम्मुख होनेपर भगवान्के साथ वास्तविक सम्बन्धकी स्मृति आनेमें भगवत्कृपा ही हेतु है। भगवत्कृपासे जो काम होता है, वह श्रवण, मनन, निदिध्यासन, ध्यान, समाधि आदि साधनोंसे नहीं होता। कारण कि अपना पुरुषार्थ मानकर जो भी साधन किया जाता है, उस साधनमें अपना सूक्ष्म व्यक्तित्व अर्थात् अहंभाव रहता है। वह व्यक्तित्व साधनमें अपना पुरुषार्थ न मानकर केवल भगवत्कृपा माननेसे ही मिटता है। मार्मिक बात अर्जुनने कहा कि मुझे स्मृति मिल गयी—“स्मृतिर्लब्धा।” तो विस्मृति किसी कारणसे हुई? जीवने असत्के साथ तादात्म्य मानकर असत्की मुख्यता मान ली, इसीसे अपने सत्-स्वरूपकी विस्मृति हो गयी। विस्मृति होनेसे इसने असत्की कमीको अपनी कमी मान ली, अपनेको शरीर मानने (मैं-पन) तथा शरीरको अपना मानने (मेरापन-) के कारण इसने असत् शरीरकी उत्पत्ति और विनाशको अपनी उत्पत्ति और विनाश मान लिया एवं जिससे शरीर पैदा हुआ, उसीको अपना उत्पादक मान लिया! अब कोई प्रश्न करे कि भूल पहले हुई कि असत्का सम्बन्ध पहले हुआ? अर्थात् भूलसे असत्का सम्बन्ध हुआ कि असत्के सम्बन्धसे भूल हुई? तो इसका उत्तर है कि अनादिकालसे जन्म-मरणके चक्करमें पड़े हुए जीवको जन्म-मरणसे छुड़ाकर सदाके लिये महान् सुखी करनेके लिये अर्थात् केवल अपनी प्राप्ति करानेके लिये भगवान्ने जीवको मनुष्य-शरीर दिया। भगवान्का अकेलेमें मन नहीं लगा—“एकाकी न रमते” (बृहदारण्यक 1। 4। 3), इसलिये उन्होंने अपने साथ खेलनेके लिये मनुष्यशरीरकी रचना की। खेल तभी होता है, जब दोनों तरफके खिलाड़ी स्वतन्त्र होते हैं। अतः भगवान्ने मनुष्यशरीर देनेके साथ- साथ इसे स्वतन्त्रता भी दी और विवेक (सत्-असत्का ज्ञान) भी दिया। दूसरी बात, अगर इसे स्वतन्त्रता और विवेक न मिलता, तो यह पशुकी तरह ही होता, इसमें मनुष्यताकी किंचिन्मात्र भी कोई विशेषता नहीं होती। इस विवेकके कारण असत्को असत् जानकर भी मनुष्यने मिली हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग किया और असत्में (संसारके भोग और संग्रहके सुखमें) आसक्त हो गया। असत्में आसक्त होनेसे ही भूल हुई है। असत्को असत् जानकर भी यह उसमें आसक्त क्यों होता है? कारण कि असत्के सम्बन्धसे प्रतीत होनेवाले तात्कालिक सुखकी तरफ तो यह दृष्टि रखता है, पर उसका परिणाम क्या होगा, उस तरफ अपनी दृष्टि रखता ही नहीं। (जो परिणामकी तरफ दृष्टि रखते हैं, साधक होते हैं और जो परिणामकी तरफ दृष्टि नहीं रखते, वे संसारी होते हैं।) इसलिये असत्के सम्बन्धसे ही भूल पैदा हुई है। इसका पता कैसे लगता है? जब यह अपने अनुभवमें आनेवाले असत्की आसक्तिका त्याग करके परमात्माके सम्मुख हो जाता है, तब यह भूल मिट करके स्मृति जाग्रत् हो जाती है, इससे सिद्ध हुआ कि परमात्मासे विमुख होकर जाने हुए असत्में आसक्ति होनेसे ही यह भूल हुई है। असत्को महत्त्व देनेसे होनेवाली भूल स्वाभाविक नहीं है। इसको मनुष्यने खुद पैदा किया है। जो चीज स्वाभाविक होती है, उसमें परिवर्तन भले ही हो, पर उसका अत्यन्त अभाव नहीं होता। परन्तु भूलका अत्यन्त अभाव होता है। इससे यह सिद्ध होता है कि इस भूलको मनुष्यने खुद उत्पन्न किया है; क्योंकि जो वस्तु मिटनेवाली होती है, वह उत्पन्न होनेवाली ही होती है। इसलिये इस भूलको मिटानेका दायित्व भी मनुष्यपर ही है, जिसको वह सुगमतापूर्वक मिटा सकता है। तात्पर्य है कि अपने ही द्वारा उत्पन्न की हुई इस भूलको मिटानेमें मनुष्यमात्र समर्थ और सबल है। भूलको मिटानेकी सामर्थ्य भगवान्ने पूरी दे रखी है। भूल मिटते ही अपने वास्तविक स्वरूपकी स्मृति अपने-आपमें ही जाग्रत् हो जाती है और मनुष्य सदाके लिये कृतकृत्य, ज्ञात-ज्ञातव्य और प्राप्त-प्राप्तव्य हो जाता है। अबतक मनुष्यने अनेक बार जन्म लिया है और अनेक बार कई वस्तुओं, व्यक्तियों, परिस्थितियों, अवस्थाओं, घटनाओं आदिका मनुष्यको संयोग हुआ है; परन्तु उन सभीका उससे वियोग हो गया और वह स्वयं वही रहा। कारण कि वियोगका संयोग अवश्यम्भावी नहीं है, पर संयोगका वियोग अवश्यम्भावी है। इससे सिद्ध हुआ कि संसारसे वियोग-ही-वियोग है, संयोग है ही नहीं। अनादिकालसे वस्तुओं आदिका निरन्तर वियोग ही होता चला आ रहा है, इसलिये वियोग ही सच्चा है। इस प्रकार संसारसे सर्वथा वियोगका अनुभव हो जाना ही “योग” है—“तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्” (गीता 6। 23)। यह योग नित्यसिद्ध है। स्वरूप अथवा परमात्माके साथ हमारा नित्ययोग है* और शरीर-संसारके साथ नित्यवियोग है। संसारके संयोगकी सद्भावना होनेसे ही वास्तवमें नित्ययोग अनुभवमें नहीं आता। सद्भावना मिटते ही नित्ययोगका अनुभव हो जाता है, जिसका कभी वियोग हुआ ही नहीं। संसारसे संयोग मानना ही “विस्मृति” है और संसारसे नित्यवियोगका अनुभव होना अर्थात् वास्तवमें संसारके साथ मेरा संयोग था नहीं, है नहीं, होगा नहीं और हो सकता भी नहीं—ऐसा अनुभव होना ही “स्मृति” है।
परिशिष्ट भाव
लौकिक स्मृति तो विस्मृतिकी अपेक्षासे कही जाती है, पर अलौकिक तत्त्वकी स्मृति विस्मृतिकी अपेक्षासे नहीं है, प्रत्युत अनुभवरूप है। इस तत्त्वकी निरपेक्ष स्मृति अर्थात् अनुभवको ही यहाँ “स्मृतिर्लब्धा” कहा गया है। वास्तवमें तत्त्वकी विस्मृति नहीं होती, प्रत्युत विमुखता होती है। तात्पर्य है कि पहले ज्ञान था, फिर उसकी विस्मृति हो गयी—इस तरह तत्त्वकी विस्मृति नहीं होती1। अगर ऐसी विस्मृति मानें तो स्मृति होनेके बाद फिर विस्मृति हो जायगी! इसलिये गीतामें आया है—“यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहम्” (4। 35) अर्थात् उसको जान लेनेके बाद फिर मोह नहीं होता। अभावरूप असत्को भावरूप मानकर महत्त्व देनेसे तत्त्वकी तरफसे वृत्ति हट गयी—इसीको विस्मृति कहते हैं। वृत्तिका हटना और वृत्तिका लगना—यह भी साधककी दृष्टिसे है, तत्त्वकी दृष्टिसे नहीं। तत्त्वकी तरफसे वृत्ति हटनेपर अथवा विमुखता होनेपर भी तत्त्व ज्यों-का-त्यों ही है। अभावरूप असत्को अभावरूप ही मान लें तो भावरूप तत्त्व स्वतः ज्यों-का-त्यों रह जायगा। विचार दो तरहका होता है। एक विचार करना होता है और एक विचार उदय होता है। जो विचार किया जाता है, उसमें तो क्रिया है, पर जो विचार उदय होता है, उसमें क्रिया नहीं है। विचार करनेमें तो बुद्धिकी प्रधानता रहती है, पर विचार उदय होनेपर बुद्धिसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। अतः तत्त्वबोध विचार करनेसे नहीं होता, प्रत्युत विचार उदय होनेसे होता है। तात्पर्य है कि तत्त्वप्राप्तिके उद्देश्यसे सत्-असत्का विचार करते-करते जब असत् छूट जाता है, तब “संसार है ही नहीं, हुआ ही नहीं, होगा ही नहीं, होना सम्भव ही नहीं”—इस विचारका उदय होता है। विचारका उदय होते ही विवेक बोधमें परिणत हो जाता है अर्थात् संसार लुप्त हो जाता है और तत्त्व प्रकट हो जाता है; मानी हुई चीज मिट जाती है और वास्तविकता रह जाती है। विचारका उदय होनेको यहाँ “स्मृतिर्लब्धा” कहा गया है। अपरा प्रकृति भगवान्की है। परन्तु हमने गलती यह की है कि अपराके साथ सम्बन्ध जोड़ लिया अर्थात् उसको अपना और अपने लिये मान लिया। यह सम्बन्ध हमने ही जोड़ा है और इसको छोड़नेकी जिम्मेवारी भी हमारेपर ही है। अपराके साथ सम्बन्ध माननेसे ही भगवान्के नित्य-सम्बन्धकी विस्मृति हुई है और हम बन्धनमें पड़े हैं। इसलिये अपराके सम्बन्ध-विच्छेदसे ही हमारा कल्याण होगा। अपरासे सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये “शरीर मेरा और मेरे लिये नहीं है”—इस विवेकको महत्त्व देना है। विवेकको महत्त्व देनेसे “अपरा मेरी और मेरे लिये है ही नहीं”— यह स्मृति प्राप्त हो जाती है। अर्जुनको द्वैत अथवा अद्वैत तत्त्वका अनुभव नहीं हुआ है, प्रत्युत द्वैत-अद्वैतसे अतीत वास्तविक तत्त्वका अनुभव हुआ है। कारण कि द्वैत-अद्वैत तो मोह हैं2, जबकि अर्जुनका मोह नष्ट हो गया है। जीव अनादिकालसे स्वतः परमात्माका है, केवल संसारके आश्रयका त्याग करना है। अर्जुनको मुख्य रूपसे भक्तियोगकी स्मृति हुई है। कर्मयोग तथा ज्ञानयोग तो साधन हैं, पर भक्तियोग साध्य है। इसलिये भक्तियोगकी स्मृति ही वास्तविक है। भक्तियोगकी स्मृति है—“वासुदेवः सर्वम्” अर्थात् सब कुछ भगवान् ही हैं। “वासुदेवः सर्वम्” का अनुभव करना “स्मृतिर्लब्धा” है। यह अनुभव केवल भगवत्कृपासे ही होता है—“त्वत्प्रसादात्”। वचन सीमित होते हैं, पर कृपा असीम होती है। चिन्तनमें तो कर्तृत्व होता है, पर स्मृतिमें कर्तृत्व नहीं है। कारण कि चिन्तन मनसे होता है, मनसे परे बुद्धि है, बुद्धिसे परे अहम् है और अहम्से परे स्वरूप है, उस स्वरूपमें स्मृति होती है। चिन्तन तो हम करते हैं, पर स्मृतिमें केवल उधर दृष्टि होती है। विस्मृतिके समय भी तत्त्व तो वैसा-का वैसा ही है। तत्त्वमें विस्मृति नहीं है, इसलिये उधर दृष्टि होते ही स्मृति हो जाती है। “स्थितोऽस्मि गतसन्देहः”—पहले क्षात्रधर्मकी दृष्टिसे युद्ध करना ठीक दीखता था, फिर गुरुजनोंके सामने आनेसे युद्ध करना पाप दीखने लगा; परन्तु स्मृति प्राप्त होते ही सब उलझनें मिट गयीं। मैं क्या करूँ? युद्ध करूँ कि नहीं करूँ?—यह सन्देह, संशय, शंका कुछ नहीं रही। मेरे लिये अब कुछ करना बाकी नहीं रहा, प्रत्युत केवल आपकी आज्ञाका पालन करना बाकी रहा—“करिष्ये वचनं तव”। यही शरणागति है।
(योगदर्शन 1। 11)
1-यहाँ अर्जुनका सांसारिक (गीता—दूसरे अध्यायका बावनवाँ श्लोक) और शास्त्रीय (गीता—दूसरे अध्यायका
तिरपनवाँ श्लोक)—दोनों प्रकारका मोह नष्ट हुआ है।
2-हमें जो संसारका ज्ञान होता है, वह प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंके द्वारा ही होता है; क्योंकि संसार विवेक-विचारका विषय
है। परन्तु जो विवेक-विचारका विषय नहीं है, प्रत्युत विवेक-विचारका प्रकाशक है, उसको विवेक-विचारद्वारा नहीं जान
सकते। कारण कि जो वस्तु प्रकाश्य होती है, वह प्रकाशकको प्रकाशित करनेमें असमर्थ होती है। इसलिये जो सबका
प्रकाशक और आश्रय है, वह परमात्मतत्त्व श्रद्धा-विश्वासका विषय है, विचारका नहीं।
जिन लोगोंकी शास्त्रोंपर श्रद्धा होती है, वे शास्त्रोंसे परमात्माको मान लेते हैं अथवा जिनकी तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त अनुभवी
भगवत्प्रेमी सन्त-महापुरुषोंपर श्रद्धा होती है, वे उनके वचनोंसे परमात्माको मान लेते हैं, स्वीकार कर लेते हैं। इसमें उनका
अन्तःकरण और इन्द्रियाँ प्रमाण नहीं हैं। इसमें तो शास्त्र और सन्त-महापुरुष ही प्रमाण हैं। जो श्रद्धालु और आस्तिक हैं,
उनके लिये तो शास्त्र और सन्त-महापुरुष प्रमाण हो सकते हैं, पर जो अश्रद्धालु और नास्तिक हैं, उनके लिये शास्त्र और
सन्त-महापुरुष प्रमाण नहीं हो सकते। तात्पर्य यह हुआ कि इन्द्रियों और अन्तःकरणका जो विषय है, वह तो प्रत्यक्ष-प्रमाण
है और अनुमान आदि जो प्रमाण हैं, वे प्रत्यक्षमूलक युक्ति-प्रमाण हैं। परन्तु सन्त-महापुरुष और शास्त्र-प्रमाणमें तो केवल
श्रद्धा ही मुख्य हेतु है।
3-जिससे जाना जाता है, वह “प्रमाण” होता है; जिसका ज्ञान होता है, वह “प्रमेय” होता है और जो जाननेवाला है, वह
“प्रमाता” होता है अर्थात् इन्द्रियाँ एवं अन्तःकरण “प्रमाण” हैं, संसार “प्रमेय” है और स्वयं (चेतन) “प्रमाता” है।
* कर्मयोग तथा ज्ञानयोगमें स्वरूपके साथ नित्ययोग है और भक्तियोगमें भगवान्के साथ नित्ययोग है।
1-ज्ञान होनेपर नयापन कुछ नहीं दीखता अर्थात् पहले अज्ञान था, अब ज्ञान हो गया—ऐसा नहीं दीखता। ज्ञान होनेपर
ऐसा अनुभव होता है कि ज्ञान तो सदासे ही था, केवल मेरी दृष्टि उधर नहीं थी। अगर पहले अज्ञान था, पीछे ज्ञान हो गया—
ऐसा मानें तो ज्ञानमें सादिपना आ जायगा, जबकि ज्ञान सादि नहीं है, अनादि है। जो सादि होता है, वह सान्त होता है और
जो अनादि होता है, वह अनन्त होता है।
2-“द्वैताद्वैतमहामोहः” (माहेश्वरतन्त्र)
“अहो माया महामोहौ द्वैताद्वैतविकल्पना॥” (अवधूतगीता 1। 61)
74सञ्जय
सञ्जय उवाच
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य महात्मनःसंवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्॥ 74॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

पहले अध्यायके बीसवें श्लोकमें “अथ” पदसे श्रीकृष्णार्जुनसंवादके रूपमें गीताका आरम्भ हुआ था, अब आगेके श्लोकमें “इति” पदसे उसकी समाप्ति करते हुए संजय इस संवादकी महिमा गाते हैं। सञ्जय उवाच

पदच्छेद
श्लोकमें ढूँढ़नेके लिये हॉवर करें
व्याख्या
2 sections
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः
संजय कहते हैं कि इस तरह मैंने भगवान् वासुदेव और महात्मा पृथानन्दन अर्जुनका यह संवाद सुना, जो कि अत्यन्त अद्भुत, विलक्षण है और इसकी यादमात्र हर्षके मारे रोमांचित करनेवाली है। यहाँ “इति” पदका तात्पर्य है कि पहले अध्यायके बीसवें श्लोकमें “अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः” पदोंसे संजय श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादरूप गीताका आरम्भ करते हैं और यहाँ “इति” पदसे उस संवादकी समाप्ति करते हैं। अर्जुनके लिये “महात्मनः” विशेषण देनेका तात्पर्य है कि अर्जुन कितने महान् विलक्षण पुरुष हैं, जिनकी आज्ञाका पालन स्वयं भगवान् करते हैं! अर्जुन कहते हैं कि हे अच्युत! मेरे रथको दोनों सेनाओंके बीचमें खड़ा कर दो (गीता—पहले अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक), तो भगवान् दोनों सेनाओंके बीचमें रथको खड़ा कर देते हैं (गीता—पहले अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक)। गीतामें अर्जुन जहाँ-जहाँ प्रश्न करते हैं, वहाँ-वहाँ भगवान् बड़े प्यारसे और बड़ी विलक्षण रीतिसे प्रायः विस्तारपूर्वक उत्तर देते हैं। इस प्रकार महात्मा अर्जुनके और भगवान् वासुदेवके संवादको मैंने सुना है।
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्
इस संवादमें अद्भुत और रोमहर्षणपना क्या है? शास्त्रोंमें प्रायः ऐसी बात आती है कि संसारकी निवृत्ति करनेसे ही मनुष्य पारमार्थिक मार्गपर चल सकता है और उसका कल्याण हो सकता है। मनुष्योंमें भी प्रायः ऐसी ही धारणा बैठी हुई है कि घर, कुटुम्ब आदिको छोड़कर साधु-संन्यासी होनेसे ही कल्याण होता है। परन्तु गीता कहती है कि कोई भी परिस्थिति, अवस्था, घटना, देश, काल आदि क्यों न हो, उसीके सदुपयोगसे मनुष्यका कल्याण हो सकता है। इतना ही नहीं, वह परिस्थिति बढि़या-से-बढि़या हो या घटिया-से-घटिया, सौम्य-से-सौम्य हो या घोर-से-घोर विहित युद्ध-जैसी प्रवृत्ति हो, जिसमें दिनभर मनुष्योंका गला काटना पड़ता है, उसमें भी मनुष्यका कल्याण हो सकता है, मुक्ति हो सकती है*। कारण कि जन्म-मरणरूप बन्धनमें संसारका राग ही कारण है (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। उस रागको मिटानेमें परिस्थितिका सदुपयोग करना ही हेतु है अर्थात् जो पुरुष परिस्थितिमें राग-द्वेष न करके अपने कर्तव्यका पालन करता है, वह सुखपूर्वक मुक्त हो जाता है (गीता— पाँचवें अध्यायका तीसरा श्लोक)। यही इस संवादमें अद्भुतपना है। भगवान्का स्वयं अवतार लेकर मनुष्य-जैसा काम करते हुए अपने-आपको प्रकट कर देना और “मेरी शरणमें आ जा” यह अत्यन्त गोपनीय रहस्यकी बात कह देना—यही संवादमें रोमहर्षण करनेवाला, प्रसन्न करनेवाला, आनन्द देनेवाला है।
परिशिष्ट भाव
गीतामें “महात्मा” शब्द केवल भक्तोंके लिये आया है। यहाँ संजयने अर्जुनको भी “महात्मा” कहा है; क्योंकि वे अर्जुनको भक्त ही मानते हैं। भगवान्ने भी कहा है—“भक्तोऽसि मे” (गीता 4। 3)।
* जब हर एक परिस्थितिसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेसे ही कल्याण होता है, तब तो प्राकृत परिस्थितिका घटिया या बढि़या
होना कोई महत्त्व नहीं रखता। हाँ, उससे अलग होनेके उपाय (कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग आदि) अलग-अलग हो सकते
हैं। परन्तु इनमें राग मिटाना ही खास उपाय है; क्योंकि राग मिटनेसे द्वेष मिट जाता है और राग-द्वेषके मिटनेसे संसारसे
सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होना ही मुक्ति है।
वास्तवमें जो बद्ध होता है, वह मुक्त नहीं होता और जो मुक्त होता है, वह मुक्त क्या होगा? क्योंकि वह तो मुक्त ही
है। तो फिर मुक्त होना क्या है? वास्तवमें मुक्त होते हुए भी जिस बन्धनको स्वीकार किया है, उस बन्धनसे छूटनेका नाम
ही मुक्त होना है।
75सञ्जय
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्। योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्॥ 75॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

पारमार्थिक मार्गमें सच्चे साधकको जिस-किसीसे लाभ होता है, उसकी वह कृतज्ञता प्रकट करता ही है। अतः संजय भी आगेके तीन श्लोकोंमें व्यासजीकी कृतज्ञता प्रकट करते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
4 sections
व्यासप्रसादात् श्रुतवान्
संजयने जब भगवान् श्रीकृष्ण और महात्मा अर्जुनका पूरा संवाद सुना, तब वे बड़े प्रसन्न हुए। अब उसी प्रसन्नतामें वे कह रहे हैं कि ऐसा परम गोपनीय योग मैंने भगवान् व्यासजीकी कृपासे सुना! व्यासजीकी कृपासे सुननेका तात्पर्य यह है कि भगवान्ने “यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया” (10। 1), “इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्” (18। 64), “मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे” (18। 65), “अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः” (18। 66) आदि-आदि प्यारे वचनोंसे अपना हृदय खोलकर अर्जुनसे जो बातें कही हैं, उन बातोंको सुननेमें केवल व्यासदेवजीकी कृपा ही है अर्थात् वे सब बातें मैंने व्यासजीकी कृपासे ही सुनी हैं।
एतद् गुह्यं परं योगम्
समस्त योगोंके महान् ईश्वरके द्वारा कहा जानेसे यह गीताशास्त्र “योग” अर्थात् योगशास्त्र है। यह गीताशास्त्र अत्यन्त श्रेष्ठ और गोपनीय है। इसके समान श्रेष्ठ और गोपनीय दूसरा कोई संवाद देखने-सुननेमें नहीं आता। जीवका भगवान्के साथ जो नित्य-सम्बन्ध है, उसका नाम “योग” है। उस नित्ययोगकी पहचान करानेके लिये कर्मयोग, ज्ञानयोग आदि योग कहे गये हैं। उन योगोंके समुदायका वर्णन गीतामें होनेसे गीता भी “योग” अर्थात् योगशास्त्र है।
योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्
संजयके आनन्दकी कोई सीमा नहीं रही है। इसलिये वे हर्षोल्लासमें भरकर कह रहे हैं कि इस योगको मैंने समस्त योगोंके महान् ईश्वर साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णके मुखसे सुना है। संजयको
योगेश्वरात् , कृष्णात् , साक्षात्, कथयतः, स्वयम्
ये पाँच शब्द कहनेकी क्या आवश्यकता थी? संजय इन शब्दोंका प्रयोग करके यह कहना चाहते हैं कि मैंने यह संवाद परम्परासे नहीं सुना है और किसीने मुझे सुनाया हो—ऐसी बात भी नहीं है; इसको तो मैंने खुद भगवान्के कहते-कहते सुना है!
परिशिष्ट भाव
अर्जुनने “त्वत्प्रासादात्” कहा है (18। 73) और संजयने “व्यासप्रसादात्” कहा है। अर्जुनको भगवान्की कृपासे दिव्य दृष्टि मिली थी और संजयको व्यासजीकी कृपासे।
76सञ्जय
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्। केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि मुहुर्मुहुः॥ 76॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
पदच्छेद
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व्याख्या
2 sections
राजन्संस्मृत्य ...... मुहुर्मुहुः
संजय कहते हैं कि हे महाराज! भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनका यह बहुत अलौकिक, विलक्षण संवाद हुआ है। इसमें कितना रहस्य भरा हुआ है कि घोर-से-घोर युद्धरूप क्रिया करते हुए भी ऊँची-से-ऊँची पारमार्थिक सिद्धि हो सकती है! मनुष्यमात्र हरेक परिस्थितिमें अपना उद्धार कर सकता है। इस प्रकारके संवादको याद कर-करके मैं बड़ा हर्षित हो रहा हूँ, प्रसन्न हो रहा हूँ। श्रीभगवान् और अर्जुनके इस अद्भुत संवादकी महिमा भी बहुत विलक्षण है। भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन सदा साथमें रहनेपर भी इन दोनोंका ऐसा संवाद कभी नहीं हुआ। युद्धके समय अर्जुन घबरा गये; क्योंकि एक तरफ तो उनको कुटुम्बका मोह तंग कर रहा था और दूसरी तरफ वे क्षात्रधर्मकी दृष्टिसे युद्ध करना अवश्य कर्तव्य समझते थे। मनुष्यकी जब किसी एक सिद्धान्तपर, एक मतपर स्थिति नहीं होती, तब उसकी व्याकुलता बड़ी विचित्र होती है1। अर्जुन भी
युद्ध करना श्रेष्ठ है या युद्ध न करना श्रेष्ठ है
इन दोनोंमेंसे एक निश्चित निर्णय नहीं कर सके। इसी व्याकुलताके कारण अर्जुन भगवान्की तरफ खिं च गये, उनके सम्मुख हो गये। सम्मुख होनेसे भगवान्की कृपा उनको विशेषतासे प्राप्त हुई। अर्जुनकी अनन्य भावना, उत्कण्ठाके कारण भगवान् योगमें स्थित हो गये अर्थात् ऐश्वर्य आदिमें स्थित न रहकर केवल अपने प्रेम-तत्त्वमें सराबोर हो गये और उसी स्थितिमें अर्जुनको समझाया। इस प्रकार उत्कट अभिलाषासम्पन्न अर्जुन और अलौकिक अटलयोगमें स्थित भगवान्के संवादकी क्या महिमा कहें? उसकी महिमाको कहनेमें कोई भी समर्थ नहीं है।
परिशिष्ट भाव
भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनके इस संवादमें जो तत्त्व भरा हुआ है, वह किसी ग्रन्थ, महात्मा आदिसे सुननेको नहीं मिला। यह भगवान् और उनके भक्तका बड़ा विलक्षण संवाद है। इतनी स्पष्ट बातें और जगह पढ़ने-सुननेको मिलती नहीं। इस संवादमें युद्ध-जैसे घोर कर्मसे भी कल्याण होनेकी बात कही गयी है। हरेक वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिका मनुष्य हरेक परिस्थितिमें अपना कल्याण कर सकता है—यह बात इस संवादसे मिलती है। इसलिये यह संवाद बड़ा अद्भुत है—“संवादमिममद्भुतम्”। केवल संवादमें ही इतनी विलक्षणता है, फिर इसके अनुसार आचरण करनेका तो कहना ही क्या है! भगवान् श्रीकृष्णकी वाणी बड़ी विचित्र है2, उसमें भी भगवान्ने योगमें स्थित होकर गीता कही है3, फिर इसकी विचित्रता-विलक्षणताका तो कहना ही क्या है! भगवान्के द्वारा कौरव-सभामें होनेवाले राजनीतिक व्याख्यानमें भी इतनी विलक्षणता थी कि ऋषि-मुनि उसको सुननेके लिये जाते हैं*, फिर यह (गीता) तो पारमार्थिक संवाद है! श्रीमद्भागवतमें भी जब उद्धवजीने देखा कि भगवान् प्रश्नोंका उत्तर बड़ी विलक्षण रीतिसे देते हैं, तब उन्होंने एक साथ पैंतीस प्रश्न कर दिये (श्रीमद्भा0 ग्यारहवाँ स्कन्ध, उन्नीसवाँ अध्याय, अट्ठाईसवेंसे बत्तीसवें श्लोकतक)! “हृष्यामि च मुहुर्मुहुः—कर्म-ज्ञान-भक्तिकी ऐसी विलक्षण बातें और जगह सुननेको मिली ही नहीं, इसलिये इनको सुनकर संजय बार-बार हर्षित होते हैं। संजय भगवान्को जाननेवाले थे। धृतराष्ट्रके द्वारा इसका कारण पूछे जानेपर संजयने उनको बताया था— मायां न सेवे भद्रं ते न वृथा धर्ममाचरे। शुद्धभावं गतो भक्त्या शास्त्राद् वेद्मि जनार्दनम्॥ “महाराज! आपका कल्याण हो। मैं कभी माया (छल-कपट)-का सेवन नहीं करता। व्यर्थ (पाखण्डपूर्ण) धर्मका आचरण नहीं करता। भगवान्की भक्तिसे मेरा अन्तःकरण शुद्ध हो गया है; अतः मैं शास्त्रके वचनोंसे भगवान् श्रीकृष्णके स्वरूपको यथावत् जानता हूँ।” इस प्रकार पहले तो संजय शास्त्रके वचनोंसे भगवान्को जानते थे, पर अब वे साक्षात् भगवान्के वचनोंसे उनको जान गये!
1-आजकल मनुष्योंमें पारमार्थिक बातोंको जाननेकी जो विशेष व्याकुलता नहीं दिखायी देती, उसका कारण है कि वे
धन, कुटुम्ब, मान, बड़ाई, वर्ण, आश्रम, विद्या, बुद्धि, भोग, ऐश्वर्य आदि क्षणिक सुखोंको लेकर संतोष करते रहते हैं।
इससे उनकी (वास्तविकताको जाननेकी) व्याकुलता दब जाती है।
2-वाचं तां वचनार्हस्य शिक्षाक्षरसमन्विताम्। अश्रौषमहमिष्टार्थां पश्चाद्धृदयहारिणीम्॥
(महाभारत, उद्योग0 59। 17)
“(संजय बोले—) तत्पश्चात् मैंने बातचीतमें कुशल भगवान् श्रीकृष्णकी वह वाणी सुनी, जिसका एक-एक अक्षर
शिक्षाप्रद था। वह अभीष्ट अर्थका प्रतिपादन करनेवाली तथा मनको आकर्षित कर लेनेवाली थी।”
3-न शक्यं तन्मया भूयस्तथा वक्तुमशेषतः। परं हि ब्रह्म कथितं योगयुक्तेन तन्मया॥
(महाभारत, आश्व0 16। 12-13)
“(भगवान् बोले—) वह सब-का-सब उसी रूपमें फिर दुहरा देना अब मेरे वशकी बात भी नहीं है। उस समय योगयुक्त
होकर मैंने परमात्मतत्त्वका वर्णन किया था।”
(महाभारत, उद्योग0 69। 5)
77सञ्जय
संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः। विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः॥ 77॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
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1 section
तच्च संस्मृत्य ..... पुनः पुनः
संजयने पीछेके श्लोकमें भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादको तो “अद्भुत” बताया, पर यहाँ भगवान्के विराट्रूपको “अत्यन्त अद्भुत” बताते हैं। इसका तात्पर्य है कि संवादको तो अब भी पढ़ सकते हैं, उसपर विचार कर सकते हैं, पर उस विराट्रूपके दर्शन अब नहीं हो सकते। अतः वह रूप अत्यन्त अद्भुत है। ग्यारहवें अध्यायके नवें श्लोकमें संजयने भगवान्को “महायोगेश्वरः” कहा था। यहाँ “विस्मयो मे महान्” पदोंसे कहते हैं कि ऐसे महायोगेश्वर भगवान्के रूपको याद करनेसे महान् विस्मय होगा ही। दूसरी बात, अर्जुनको तो भगवान्ने कृपासे द्रवित होकर विश्वरूप दिखाया, पर मेरेको तो व्यासजीकी कृपासे देखनेको मिल गया! यद्यपि भगवान्ने रामावतारमें कौसल्या अम्बाको विराट्रूप दिखाया और कृष्णावतारमें यशोदा मैयाको तथा कौरव- सभामें दुर्योधन आदिको विराट्रूप दिखाया तथापि वह रूप ऐसा अद्भुत नहीं था कि जिसकी दाढ़ोंमें बड़े-बड़े योद्धालोग फँसे हुए हैं और दोनों सेनाओंका महान् संहार हो रहा है। इस प्रकारके अत्यन्त अद्भुत रूपको याद करके संजय कहते हैं कि राजन्! यह सब तो व्यासजी महाराजकी कृपासे ही मेरेको देखनेको मिला है। नहीं तो ऐसा रूप मेरे-जैसेको कहाँ देखनेको मिलता?
परिशिष्ट भाव
भगवान्ने अपना विराट्रूप सीमित दिखाया था। अगर अर्जुन न घबराते तो भगवान् और भी रूप दिखाते। पर उतनेसे ही संजय बड़ा आश्चर्य कर रहे हैं। भगवान्के विषयमें पहले तो संजयने शास्त्रमें पढ़ा, फिर अद्भुत संवाद सुना और फिर अति अद्भुत विराट्रूप देखा। तात्पर्य है कि शास्त्रकी अपेक्षा श्रीकृष्णार्जुन-संवाद अद्भुत था और संवादकी अपेक्षा भी विराट्रूप अद्भुत था। इसलिये संजयने संवादको अद्भुत कहा—“संवादमिममद्भुतम्” (18। 76) और विराट्रूपको अत्यन्त अद्भुत कहा—“रूपमत्यद्भुतम्”।
* धर्मार्थसहिता वाचः श्रोतुमिच्छाम माधव॥ त्वयोच्यमानाः कुरुषु राजमध्ये परन्तप।
(महाभारत, उद्योग0 83। 68-69)
“(परशुरामजी बोले—) शत्रुओंको संताप देनेवाले माधव! वहाँ कौरवों तथा अन्य राजाओंकी मण्डलीमें आपके द्वारा
कही जानेवाली धर्म और अर्थसे युक्त बातोंको हम सुनना चाहते हैं।”
78सञ्जय
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरःतत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥ 78॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

गीताके आरम्भमें धृतराष्ट्रका गूढ़ाभिसन्धिरूप प्रश्न था कि युद्धका परिणाम क्या होगा? अर्थात् मेरे पुत्रोंकी विजय होगी या पाण्डुपुत्रोंकी? आगेके श्लोकमें संजय धृतराष्ट्रके उसी प्रश्नका उत्तर देते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
4 sections
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः
संजय कहते हैं कि राजन्! जहाँ अर्जुनका संरक्षण करनेवाले, उनको सम्मति देनेवाले, सम्पूर्ण योगोंके महान् ईश्वर, महान् बलशाली, महान् ऐश्वर्यवान्, महान् विद्यावान्, महान् चतुर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और जहाँ भगवान्की आज्ञाका पालन करनेवाले, भगवान्के प्रिय सखा तथा भक्त गाण्डीव- धनुर्धारी अर्जुन हैं, उसी पक्षमें श्री, विजय, विभूति और अचल नीति—ये सभी हैं और मेरी सम्मति भी उधर ही है। भगवान्ने जब अर्जुनको दिव्य दृष्टि दी, उस समय संजयने भगवान्को “महायोगेश्वरः”* कहा था, अब उसी महायोगेश्वरकी याद दिलाते हुए यहाँ “योगेश्वरः” कहते हैं। वे सम्पूर्ण योगोंके ईश्वर (मालिक) भगवान् कृष्ण तो प्रेरक हैं और उनकी आज्ञाका पालन करनेवाले धनुर्धारी अर्जुन प्रेर्य हैं। गीतामें भगवान्के लिये “महायोगेश्वर”, “योगेश्वर” आदि शब्दोंका प्रयोग हुआ है। इनका तात्पर्य है कि भगवान् सब योगियोंको सिखानेवाले हैं। भगवान्को खुद सीखना नहीं पड़ता; क्योंकि उनका योग स्वतःसिद्ध है। सर्वज्ञता, ऐश्वर्य, सौन्दर्य, माधुर्य आदि जितने भी वैभवशाली गुण हैं, वे सब-के-सब भगवान्में स्वतः रहते हैं, वे गुण भगवान्में नित्य रहते हैं, असीम रहते हैं। जैसे पिताका पिता, फिर पिताका पिता—यह परम्परा अन्तमें जाकर परम-पिता परमात्मामें समाप्त होती है, ऐसे ही जितने भी गुण हैं, उन सबकी समाप्ति परमात्मामें ही होती है। पहले अध्यायमें जब युद्धकी घोषणाका प्रसंग आया, तब कौरवपक्षमें सबसे पहले भीष्मजीने शंख बजाया। भीष्मजी कौरवसेनाके अधिपति थे, इसलिये उनका शंख बजाना उचित ही था। परन्तु भगवान् श्रीकृष्ण तो पाण्डव- सेनामें सारथि बने हुए हैं और सबसे पहले शंख बजाकर युद्धकी घोषणा करते हैं! लौकिक दृष्टिसे देखा जाय तो सबसे पहले शंख बजानेका भगवान्का कोई अधिकार नहीं दीखता। फिर भी वे शंख बजाते हैं तो इससे सिद्ध होता है कि पाण्डव-सेनामें सबसे मुख्य भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं और दूसरे नम्बरमें अर्जुन हैं। इसलिये इन दोनोंने पाण्डव- सेनामें सबसे पहले शंख बजाये। तात्पर्य यह हुआ कि संजयने जैसे आरम्भमें (शंखवादनक्रियामें) दोनोंकी मुख्यता प्रकट की, ऐसे ही यहाँ अन्तमें भी इन दोनोंका नाम लेकर दोनोंकी मुख्यता प्रकट करते हैं। गीताभरमें “पार्थ” सम्बोधनकी अड़तीस बार आवृत्ति हुई है। अर्जुनके लिये इतनी संख्यामें और कोई सम्बोधन नहीं आया है। इससे मालूम होता है कि भगवान्को “पार्थ” सम्बोधन ज्यादा प्रिय लगता है। इसी रीतिसे अर्जुनको भी “कृष्ण” सम्बोधन ज्यादा प्रिय लगता है। इसलिये गीतामें “कृष्ण” सम्बोधनकी आवृत्ति नौ बार हुई है। भगवान्के सम्बोधनोंमें इतनी संख्यामें दूसरे किसी भी सम्बोधनकी आवृत्ति नहीं हुई है। अन्तमें गीताका उपसंहार करते हुए संजयने भी “कृष्ण” और “पार्थ” ये दोनों नाम लिये हैं।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम
लक्ष्मी, शोभा, सम्पत्ति—ये सब “श्री” शब्दके अन्तर्गत हैं। जहाँ श्रीपति भगवान् कृष्ण हैं, वहाँ श्री रहेगी ही। “विजय” नाम अर्जुनका भी है और शूरवीरता आदिका भी। जहाँ विजयरूप अर्जुन होंगे, वहाँ शूरवीरता, उत्साह आदि क्षात्र-ऐश्वर्य रहेंगे ही। ऐसे ही जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण होंगे, वहाँ
विभूति
ऐश्वर्य, महत्ता, प्रभाव, सामर्थ्य आदि सब- के-सब भगवद्गुण रहेंगे ही; और जहाँ धर्मात्मा अर्जुन होंगे, वहाँ
ध्रुवा नीति
अटल नीति, न्याय, धर्म आदि रहेंगे ही। वास्तवमें श्री, विजय, विभूति और ध्रुवा नीति—ये सब गुण भगवान्में और अर्जुनमें हरदम विद्यमान रहते हैं। उपर्युक्त दो विभाग तो मुख्यताको लेकर किये गये हैं। योगेश्वर श्रीकृष्ण और धनुर्धारी अर्जुन—ये दोनों जहाँ रहेंगे, वहाँ अनन्त ऐश्वर्य, अनन्त माधुर्य, अनन्त सौशील्य, अनन्त सौजन्य, अनन्त सौन्दर्य आदि दिव्य गुण रहेंगे ही। धृतराष्ट्रका विजयकी गूढ़ाभिसन्धिरूप जो प्रश्न है, उसका उत्तर संजय यहाँ सम्यक् रीतिसे दे रहे हैं। तात्पर्य है कि पाण्डुपुत्रोंकी विजय निश्चित है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। ज्ञानयज्ञः सुसम्पन्नः प्रीतये पार्थसारथेः। अंगीकरोतु तत्सर्वं मुकुन्दो भक्तवत्सलः॥ नेत्रवेदखयुग्मे हि बहुधान्ये च वत्सरे*। संजीवनी मुमुक्षूणां माधवे पूर्णतामियात्॥ इस प्रकार ॐ, तत्, सत्—इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्रूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें “मोक्षसन्न्यासयोग” नामक अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ 18॥ जिसमें मोक्षका भी संन्यास अर्थात् त्याग हो जाता है, ऐसी भगवद्भक्तिका वर्णन मुख्य होनेके कारण इस अध्यायका नाम “मोक्षसंन्यासयोग” रखा गया है। अठारहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच (1) इस अध्यायमें “अथाष्टादशोऽध्यायः” के तीन, “अर्जुन उवाच” आदि पदोंके आठ, श्लोकोंके नौ सौ नवासी और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका योग एक हजार तेरह है। (2) इस अध्यायमें “अथाष्टादशोऽध्यायः” के सात, “अर्जुन उवाच” आदि पदोंके पचीस, श्लोकोंके दो हजार चार सौ छियानबे और पुष्पिकाके अड़तालीस अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका योग दो हजार पाँच सौ छिहत्तर है। इस अध्यायके सभी श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं। (3) इस अध्यायमें चार उवाच हैं—दो “अर्जुन उवाच”, एक “श्रीभगवानुवाच” और एक “संजय उवाच”। अठारहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द इस अध्यायके अठहत्तर श्लोकोंमेंसे बारहवें, छियालीसवें और बावनवें श्लोकके प्रथम चरणमें “मगण” प्रयुक्त होनेसे “म-विपुला”; तेईसवें, बत्तीसवें, सैंतीसवें, इकतालीसवें, पैंतालीसवें, छप्पनवें और सत्तरवें श्लोकके प्रथम चरणमें “नगण” प्रयुक्त होनेसे “न-विपुला”; तैंतीसवें, छत्तीसवें, सैंतालीसवें और पचहत्तरवें श्लोकके प्रथम चरणमें “भगण” प्रयुक्त होनेसे “भ-विपुला”; तेरहवें श्लोकके तृतीय चरणमें “मगण” प्रयुक्त होनेसे “म-विपुला”; छब्बीसवें श्लोकके तृतीय चरणमें “रगण” प्रयुक्त होनेसे “र-विपुला”; अड़तीसवें और चौंसठवें श्लोकके तृतीय चरणमें “नगण” प्रयुक्त होनेसे “न-विपुला”; उनचासवें श्लोकके प्रथम चरणमें “मगण” प्रयुक्त होनेसे “म-विपुला”; और तृतीय चरणमें “भगण” प्रयुक्त होनेसे “भ-विपुला” संज्ञावाले छन्द हैं। शेष उनसठ श्लोक ठीक “पथ्यावक्त्र” अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।
* योगीश्वर अर्थात् योगियोंके ईश्वर होना तो सरल बात है पर योगेश्वर अर्थात् सम्पूर्ण योगोंके ईश्वर होना आखिरी हद
है—“सा काष्ठा सा परा गतिः।”
* विक्रमसंवत्सरे 2042 (दो हजार बयालीस)।
18.1साधक-संजीवनी