साङ्ख्ययोग
सम्बन्ध—पहले अध्यायमें गीतोक्त उपदेशकी प्रस्तावनाके रूपमें दोनों सेनाओंके महारथियों और उनकी शंखध्वनिका वर्णन करके अर्जुनका रथ दोनों सेनाओंके बीचमें खड़ा करनेकी बात कही गयी; उसके बाद दोनों सेनाओंमें स्थित स्वजनसमुदायको देखकर शोक और मोहके कारण युद्धसे अर्जुनके निवृत्त हो जानेकी और शस्त्र-अस्त्रोंको छोड़कर विषाद करते हुए बैठ जानेकी बात कहकर उस अध्यायकी समाप्ति की गयी। ऐसी स्थितिमें भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनसे क्या बात कही और किस प्रकार उसे युद्धके लिये पुनः तैयार किया; यह सब बतलानेकी आवश्यकता होनेपर संजय अर्जुनकी स्थितिका वर्णन करते हुए दूसरे अध्यायका आरम्भ करते हैं—
सम्बन्ध—भगवान्के इस प्रकार कहनेपर गुरुजनोंके साथ किये जानेवाले युद्धको अनुचित सिद्ध करते हुए दो श्लोकोंमें अर्जुन अपना निश्चय प्रकट करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार अपना निश्चय प्रकट कर देनेपर भी जब अर्जुनको सन्तोष नहीं हुआ और अपने निश्चयमें शंका उत्पन्न हो गयी, तब वे फिर कहने लगे—
सम्बन्ध—इस प्रकार कर्तव्यका निर्णय करनेमें अपनी असमर्थता प्रकट करनेके बाद अब अर्जुन भगवान्की शरण ग्रहण करके अपना निश्चित कर्तव्य बतलानेके लिये उनसे प्रार्थना करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार शिक्षा देनेके लिये भगवान्से प्रार्थना करके अब अर्जुन उस प्रार्थनाका हेतु बतलाते हुए अपने विचारोंको प्रकट करते हैं—
सम्बन्ध—इसके बाद अर्जुनने क्या किया, यह बतलाया जाता है—
सम्बन्ध—इस प्रकार अर्जुनके चुप हो जानेपर भगवान् श्रीकृष्णने क्या किया, इस जिज्ञासापर संजय कहते हैं—
सम्बन्ध—उपर्युक्त प्रकारसे चिन्तामग्न अर्जुनने जब भगवान्के शरण होकर अपने महान् शोककी निवृत्तिका उपाय पूछा और यह कहा कि इस लोक और परलोकका राज्यसुख इस शोककी निवृत्तिका उपाय नहीं है, तब अर्जुनको अधिकारी समझकर उसके शोक और मोहको सदाके लिये नष्ट करनेके उद्देश्यसे भगवान् पहले नित्य और अनित्य वस्तुके विवेचनपूर्वक सांख्ययोगकी दृष्टिसे भी युद्ध करना कर्तव्य है, ऐसा प्रतिपादन करते हुए सांख्यनिष्ठाका वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे यह बात कही कि जिन भीष्मादि स्वजनोंके लिये शोक करना उचित नहीं है, उनके लिये तुम शोक कर रहे हो। इसपर यह जाननेकी इच्छा होती है कि उनके लिये शोक करना किस कारणसे उचित नहीं है। अतः पहले भगवान् आत्माकी नित्यताका प्रतिपादन करके आत्मदृष्टिसे उनके लिये शोक करना अनुचित सिद्ध करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार आत्माकी नित्यताका प्रतिपादन करके अब उसकी निर्विकारताका प्रतिपादन करते हुए आत्माके लिये शोक करना अनुचित सिद्ध करते हैं—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकोंमें भगवान्ने आत्माकी नित्यता और निर्विकारता प्रतिपादन करके उसके लिये शोक करना अनुचित सिद्ध किया; उसे सुनकर यह जिज्ञासा होती है कि आत्मा नित्य और निर्विकार हो तो भी बन्धु-बान्धवादिके साथ होनेवाले संयोग-वियोगादिसे सुख-दुःखादिका प्रत्यक्ष अनुभव होता है, अतएव शोक हुए बिना कैसे रह सकता है? इसपर भगवान् सब प्रकारके संयोग-वियोगादिको अनित्य बतलाकर उनको सहन करनेकी आज्ञा देते हैं—
सम्बन्ध—इन सबको सहन करनेसे क्या लाभ होगा? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
सम्बन्ध—बारहवें और तेरहवें श्लोकोंमें भगवान्ने आत्माकी नित्यता और निर्विकारताका प्रतिपादन किया तथा चौदहवें श्लोकमें इन्द्रियोंके साथ विषयोंके संयोगोंको अनित्य बतलाया, किंतु आत्मा क्यों नित्य है और ये संयोग क्यों अनित्य हैं? इसका स्पष्टीकरण नहीं किया गया; अतएव इस श्लोकमें भगवान् नित्य और अनित्य वस्तुके विवेचनकी रीति बतलानेके लिये दोनोंके लक्षण बतलाते हैं—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें जिस “सत्” तत्त्वके लिये यह कहा गया है कि “उसका अभाव नहीं है”, वह “सत्” तत्त्व क्या है—इस जिज्ञासापर कहते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार “सत्” तत्त्वकी व्याख्या हो जानेके अनन्तर पूर्वोक्त “असत्” वस्तु क्या है, इस जिज्ञासापर कहते हैं—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने आत्माकी नित्यता और निर्विकारताका प्रतिपादन करके अर्जुनको युद्धके लिये आज्ञा दी, किंतु अर्जुनने जो यह बात कही थी कि “मैं इनको मारना नहीं चाहता और यदि वे मुझे मार डालें तो वह मेरे लिये क्षेमकर होगा” उसका स्पष्ट समाधान नहीं किया। अतः अगले श्लोकोंमें “आत्माको मरने या मारनेवाला मानना अज्ञान है”, यह कहकर उसका समाधान करते हैं—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें यह कहा कि आत्मा किसीके द्वारा नहीं मारा जाता, इसपर यह जिज्ञासा होती है कि आत्मा किसीके द्वारा नहीं मारा जाता, इसमें क्या कारण है? इसके उत्तरमें भगवान् आत्मामें सब प्रकारके विकारोंका अभाव बतलाते हुए उसके स्वरूपका प्रतिपादन करते हैं—
सम्बन्ध—उन्नीसवें श्लोकमें भगवान्ने यह बात कही कि आत्मा न तो किसीको मारता है और न किसीके द्वारा मारा जाता है; उसके अनुसार बीसवें श्लोकमें उसे विकाररहित बतलाकर इस बातका प्रतिपादन किया कि वह क्यों नहीं मारा जाता। अब अगले श्लोकमें यह बतलाते हैं कि वह किसीको मारता क्यों नहीं?—
सम्बन्ध—यहाँ यह शंका होती है कि आत्मा नित्य और अविनाशी है—उसका कभी नाश नहीं हो सकता, अतः उसके लिये शोक करना नहीं बन सकता और शरीर नाशवान् है—उसका नाश होना अवश्यम्भावी है, अतः उसके लिये भी शोक करना नहीं बनता—यह सर्वथा ठीक है। किंतु आत्माका जो एक शरीरसे सम्बन्ध छूटकर दूसरे शरीरसे सम्बन्ध होता है उसमें उसे अत्यन्त कष्ट होता है; अतः उसके लिये शोक करना कैसे अनुचित है? इसपर कहते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार एक शरीरसे दूसरे शरीरके प्राप्त होनेमें शोक करना अनुचित सिद्ध करके, अब भगवान् आत्माका स्वरूप दुर्विज्ञेय होनेके कारण पुनः तीन श्लोकोंद्वारा प्रकारान्तरसे उसकी नित्यता, निराकारता और निर्विकारताका प्रतिपादन करते हुए उसके विनाशकी आशंकासे शोक करना अनुचित सिद्ध करते हैं—
सम्बन्ध—उपर्युक्त श्लोकोंमें भगवान्ने आत्माको अजन्मा और अविनाशी बतलाकर उसके लिये शोक करना अनुचित सिद्ध किया; अब दो श्लोकोंद्वारा आत्माको औपचारिकरूपसे जन्मने-मरनेवाला माननेपर भी उसके लिये शोक करना अनुचित है, ऐसा सिद्ध करते हैं—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकोंद्वारा जो आत्माको नित्य, अजन्मा, अविनाशी मानते हैं और जो सदा जन्मने-मरनेवाला मानते हैं, उन दोनोंके मतसे ही आत्माके लिये शोक करना नहीं बनता—यह बात सिद्ध की गयी। अब अगले श्लोकमें यह सिद्ध करते हैं कि प्राणियोंके शरीरोंको उद्देश्य करके भी शोक करना नहीं बनता—
सम्बन्ध—आत्मतत्त्व अत्यन्त दुर्बोध होनेके कारण उसे समझानेके लिये भगवान्ने उपर्युक्त श्लोकोंद्वारा भिन्न-भिन्न प्रकारसे उसके स्वरूपका वर्णन किया; अब अगले श्लोकमें उस आत्मतत्त्वके दर्शन, वर्णन और श्रवणकी अलौकिकता और दुर्लभताका निरूपण करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार आत्मतत्त्वके दर्शन, वर्णन और श्रवणकी अलौकिकता और दुर्लभताका प्रतिपादन करके अब, “आत्मा नित्य ही अवध्य है; अतः किसी भी प्राणीके लिये शोक करना उचित नहीं है”—यह बतलाते हुए भगवान् सांख्ययोगके प्रकरणका उपसंहार करते हैं—
सम्बन्ध—यहाँतक भगवान्ने सांख्ययोगके अनुसार अनेक युक्तियोंद्वारा नित्य, शुद्ध, बुद्ध, सम, निर्विकार और अकर्ता आत्माके एकत्व, नित्यत्व, अविनाशित्व आदिका प्रतिपादन करके तथा शरीरोंको विनाशशील बतलाकर आत्माके या शरीरोंके लिये अथवा शरीर और आत्माके वियोगके लिये शोक करना अनुचित सिद्ध किया। साथ ही प्रसंगवश आत्माको जन्मने-मरनेवाला माननेपर भी शोक करनेके अनौचित्यका प्रतिपादन किया और अर्जुनको युद्ध करनेके लिये आज्ञा दी। अब सात श्लोकोंद्वारा क्षात्रधर्मके अनुसार शोक करना अनुचित सिद्ध करते हुए अर्जुनको युद्धके लिये उत्साहित करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार धर्ममय युद्ध करनेमें लाभ दिखलानेके बाद अब उसे न करनेमें हानि दिखलाते हुए भगवान् अर्जुनको युद्धके लिये उत्साहित करते हैं—
सम्बन्ध—उपर्युक्त बहुत-से हेतुओंको दिखलाकर युद्ध न करनेमें अनेक प्रकारकी हानियोंका वर्णन करनेके बाद अब भगवान् युद्ध करनेमें दोनों तरहसे लाभ दिखलाते हुए अर्जुनको युद्धके लिये तैयार होनेकी आज्ञा देते हैं—
सम्बन्ध—उपर्युक्त श्लोकमें भगवान्ने युद्धका फल राज्यसुख या स्वर्गकी प्राप्तितक बतलाया; किंतु अर्जुनने तो पहले ही कह दिया था कि इस लोकके राज्यकी तो बात ही क्या है, मैं तो त्रिलोकीके राज्यके लिये भी अपने कुलका नाश नहीं करना चाहता। अतः जिसे राज्यसुख और स्वर्गकी इच्छा न हो उसको किस प्रकार युद्ध करना चाहिये, यह बात अगले श्लोकमें बतलायी जाती है—
सम्बन्ध—यहाँतक भगवान्ने सांख्ययोगके सिद्धान्तसे तथा क्षात्रधर्मकी दृष्टिसे युद्धका औचित्य सिद्ध करके अर्जुनको समतापूर्वक युद्ध करनेके लिये आज्ञा दी; अब कर्मयोगके सिद्धान्तसे युद्धका औचित्य बतलानेके लिये कर्मयोगके वर्णनकी प्रस्तावना करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार कर्मयोगके वर्णनकी प्रस्तावना करके अब उसका रहस्यपूर्ण महत्त्व बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार कर्मयोगका महत्त्व बतलाकर अब उसके आचरणकी विधि बतलानेके लिये पहले उस कर्मयोगमें परम आवश्यक जो सिद्ध कर्मयोगीकी निश्चयात्मिका स्थायी समबुद्धि है, उसका और कर्मयोगमें बाधक जो सकाम मनुष्योंकी भिन्न-भिन्न बुद्धियाँ हैं, उनका भेद बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार कर्मयोगीके लिये अवश्य धारण करनेयोग्य निश्चयात्मिका बुद्धिका और त्याग करनेयोग्य सकाम मनुष्योंकी बुद्धियोंका स्वरूप बतलाकर अब तीन श्लोकोंमें सकामभावको त्याज्य बतलानेके लिये सकाम मनुष्योंके स्वभाव, सिद्धान्त और आचार-व्यवहारका वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार भोग और ऐश्वर्यमें आसक्त सकाम मनुष्योंमें निश्चयात्मिका बुद्धिके न होनेकी बात कहकर अब कर्मयोगका उपदेश देनेके उद्देश्यसे पहले भगवान् अर्जुनको उपर्युक्त भोग और ऐश्वर्यमें आसक्तिसे रहित होकर समभावसे सम्पन्न होनेके लिये कहते हैं—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें अर्जुनको यह बात कही गयी कि सब वेद तीनों गुणोंके कार्यका प्रतिपादन करनेवाले हैं और तुम तीनों गुणोंके कार्यरूप समस्त भोगोंमें और उनके साधनोंमें आसक्तिरहित हो जाओ। अब उसके फलस्वरूप ब्रह्मज्ञानका महत्त्व बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार समबुद्धिरूप कर्मयोगका और उसके फलका महत्त्व बतलाकर अब दो श्लोकोंमें भगवान् कर्मयोगका स्वरूप बतलाते हुए अर्जुनको कर्मयोगमें स्थित होकर कर्म करनेके लिये कहते हैं—
सम्बन्ध—उपर्युक्त श्लोकमें यह बात कही गयी कि तुमको न तो कर्मोंके फलका हेतु बनना चाहिये और न कर्म न करनेमें ही आसक्त होना चाहिये अर्थात् कर्मोंका त्याग भी नहीं करना चाहिये। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि तो फिर किस प्रकार कर्म करना चाहिये? इसलिये भगवान् कहते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार कर्मयोगकी प्रक्रिया बतलाकर अब सकामभावकी निन्दा और समभावरूप बुद्धियोगका महत्त्व प्रकट करते हुए भगवान् अर्जुनको उसका आश्रय लेनेके लिये आज्ञा देते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार अर्जुनको समताका आश्रय लेनेकी आज्ञा देकर अब दो श्लोकोंमें उस समतारूप बुद्धिसे युक्त महापुरुषोंकी प्रशंसा करते हुए भगवान् अर्जुनको कर्मयोगका अनुष्ठान करनेकी पुनः आज्ञा देकर उसका फल बतलाते हैं—
सम्बन्ध—भगवान्ने कर्मयोगके आचरणद्वारा अनामय पदकी प्राप्ति बतलायी; इसपर अर्जुनको यह जिज्ञासा हो सकती है कि अनामय परमपदकी प्राप्ति मुझे कब और कैसे होगी? इसके लिये भगवान् दो श्लोकोंमें कहते हैं—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकोंमें भगवान्ने यह बात कही कि जब तुम्हारी बुद्धि मोहरूपी दलदलको सर्वथा पार कर जायगी तथा तुम इस लोक और परलोकके समस्त भोगोंसे विरक्त हो जाओगे, तुम्हारी बुद्धि परमात्मामें निश्चल ठहर जायगी, तब तुम परमात्माको प्राप्त हो जाओगे। इसपर परमात्माको प्राप्त स्थितप्रज्ञ सिद्धयोगीके लक्षण और आचरण जाननेकी इच्छासे अर्जुन पूछते हैं—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें अर्जुनने परमात्माको प्राप्त हुए सिद्ध योगीके विषयमें चार बातें पूछी हैं; इन चारों बातोंका उत्तर भगवान्ने अध्यायकी समाप्तिपर्यन्त दिया है, बीचमें प्रसंगवश दूसरी बातें भी कही हैं। इस अगले श्लोकमें अर्जुनके पहले प्रश्नका उत्तर संक्षेपमें देते हैं—
सम्बन्ध—स्थितप्रज्ञके विषयमें अर्जुनने चार बातें पूछी हैं, उनमेंसे पहला प्रश्न इतना व्यापक है कि उसके बादके तीनों प्रश्नोंका उसमें अन्तर्भाव हो जाता है। इस दृष्टिसे तो अध्यायकी समाप्तिपर्यन्त उस एक ही प्रश्नका उत्तर है; पर अन्य तीन प्रश्नोंका भेद समझनेके लिये ऐसा समझना चाहिये कि अब दो श्लोकोंमें “स्थितप्रज्ञ कैसे बोलता है” इस दूसरे प्रश्नका उत्तर दिया जाता है—
सम्बन्ध—“स्थिरबुद्धिवाला योगी कैसे बोलता है?” इस दूसरे प्रश्नका उत्तर समाप्त करके अब भगवान् “वह कैसे बैठता है?” इस तीसरे प्रश्नका उत्तर देते हुए यह दिखलाते हैं कि स्थितप्रज्ञ पुरुषकी इन्द्रियोंका सर्वथा उसके वशमें हो जाना और आसक्तिसे रहित होकर अपने-अपने विषयोंसे उपरत हो जाना ही स्थितप्रज्ञ पुरुषका बैठना है—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें तीसरे प्रश्नका उत्तर देते हुए स्थितप्रज्ञके बैठनेका प्रकार बतलाकर अब उसमें होनेवाली शंकाओंका समाधान करनेके लिये अन्य प्रकारसे किये जानेवाले इन्द्रियसंयमकी अपेक्षा स्थितप्रज्ञके इन्द्रियसंयमकी विलक्षणता दिखलाते हैं—
सम्बन्ध—आसक्तिका नाश और इन्द्रियसंयम नहीं होनेसे क्या हानि है? इसपर कहते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार इन्द्रियसंयमकी आवश्यकताका प्रतिपादन करके अब भगवान् साधकका कर्तव्य बतलाते हुए पुनः इन्द्रियसंयमको स्थितप्रज्ञ-अवस्थाका हेतु बतलाते हैं—
सम्बन्ध—उपर्युक्त प्रकारसे मनसहित इन्द्रियोंको वशमें न करनेसे और भगवत्परायण न होनेसे क्या हानि है? यह बात अब दो श्लोकोंमें बतलायी जाती है—
सम्बन्ध—इस प्रकार मनसहित इन्द्रियोंको वशमें न करनेवाले मनुष्यके पतनका क्रम बतलाकर अब भगवान् “स्थितप्रज्ञ योगी कैसे चलता है” इस चौथे प्रश्नका उत्तर आरम्भ करते हुए पहले दो श्लोकोंमें जिसके मन और इन्द्रियाँ वशमें होते हैं, ऐसे साधकद्वारा विषयोंमें विचरण किये जानेका प्रकार और उसका फल बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार मन और इन्द्रियोंको वशमें करके अनासक्तभावसे इन्द्रियोंद्वारा व्यवहार करनेवाले साधकको सुख, शान्ति और स्थितप्रज्ञ-अवस्था प्राप्त होनेकी बात कहकर अब दो श्लोकोंद्वारा इससे विपरीत जिसके मन-इन्द्रिय जीते हुए नहीं हैं, ऐसे विषयासक्त मनुष्यमें सुख-शान्तिका अभाव दिखलाकर विषयोंके संगसे उसकी बुद्धिके विचलित हो जानेका प्रकार बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार अयुक्त पुरुषकी बुद्धिके विचलित होनेका प्रकार बतलाकर अब पुनः स्थितप्रज्ञ-अवस्थाकी प्राप्तिमें सब प्रकारसे इन्द्रियसंयमकी विशेष आवश्यकता सिद्ध करते हुए स्थितप्रज्ञ पुरुषकी अवस्थाका वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार मन और इन्द्रियोंके संयम न करनेमें हानि और संयम करनेमें लाभ दिखलाकर तथा स्थितप्रज्ञ अवस्था प्राप्त करनेके लिये राग-द्वेषके त्यागपूर्वक मनसहित इन्द्रियोंके संयमकी विशेष आवश्यकताका प्रतिपादन करके स्थितप्रज्ञ पुरुषकी अवस्थाका वर्णन किया। अब साधारण विषयासक्त मनुष्योंमें और मन-इन्द्रियोंका संयम करके परमात्माको प्राप्त हुए स्थिरबुद्धि संयमी महापुरुषमें क्या अन्तर है, इस बातको रात और दिनके दृष्टान्तसे समझाते हुए उनकी स्वाभाविक स्थितिका वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार रात्रिके रूपकसे ज्ञानी और अज्ञानियोंकी स्थितिका भेद दिखलाकर अब समुद्रकी उपमासे यह भाव दिखलाते हैं कि ज्ञानी परम शान्तिको प्राप्त होता है और भोगोंकी कामनावाला अज्ञानी मनुष्य शान्तिको प्राप्त नहीं होता—
सम्बन्ध—“स्थितप्रज्ञ कैसे चलता है?” अर्जुनका यह चौथा प्रश्न परमात्माको प्राप्त हुए पुरुषके विषयमें ही था; किंतु यह प्रश्न आचरणविषयक होनेके कारण उसके उत्तरमें श्लोक चौंसठसे यहाँतक किस प्रकार आचरण करनेवाला मनुष्य शीघ्र स्थितप्रज्ञ बन सकता है, कौन नहीं बन सकता और जब मनुष्य स्थितप्रज्ञ हो जाता है उस समय उसकी कैसी स्थिति होती है—ये सब बातें बतलायी गयीं। अब उस चौथे प्रश्नका स्पष्ट उत्तर देते हुए स्थितप्रज्ञ पुरुषके आचरणका प्रकार बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार अर्जुनके चारों प्रश्नोंका उत्तर देनेके अनन्तर अब स्थितप्रज्ञ पुरुषकी स्थितिका महत्त्व बतलाते हुए इस अध्यायका उपसंहार करते हैं—