आत्मसंयमयोग
Atma-Samyama-Yoga
The Yoga of Self-Control
47 verses · 47 printed blockspp. 83–98 · Sadharan Bhashatikaसाधारण भाषाटीका 47 · साधक-संजीवनी 47 · श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्य 47 · श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीका 47
1श्रीभगवान्
श्रीभगवान् उवाच
श्रीभगवानुवाच
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।
स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
श्रीभगवान् बोले—जो पुरुष कर्मफलका आश्रय न लेकर करनेयोग्य कर्म करता है, वह संन्यासी तथा योगी है और केवल अग्निका त्याग करनेवाला संन्यासी नहीं है तथा केवल क्रियाओंका त्याग करनेवाला योगी नहीं है॥ 1॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
2श्रीभगवान्
यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव।
न ह्यसन्न्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
हे अर्जुन! जिसको संन्यास1 ऐसा कहते हैं, उसीको तू योग2 जान; क्योंकि संकल्पोंका त्याग न करनेवाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता॥ 2॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
3श्रीभगवान्
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
योगमें आरूढ़ होनेकी इच्छावाले मननशील पुरुषके लिये योगकी प्राप्तिमें निष्कामभावसे कर्म करना ही हेतु कहा जाता है और योगारूढ़ हो जानेपर उस योगारूढ़ पुरुषका जो सर्वसंकल्पोंका अभाव है, वही कल्याणमें हेतु कहा जाता है॥ 3॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
4श्रीभगवान्
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते।
सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी योगारूढस्तदोच्यते॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
जिस कालमें न तो इन्द्रियोंके भोगोंमें और न कर्मोंमें ही आसक्त होता है, उस कालमें सर्वसंकल्पोंका त्यागी पुरुष योगारूढ़ कहा जाता है॥ 4॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
5श्रीभगवान्
उद्धरेदात्मनात्मानं
नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
अपने द्वारा अपना संसार-समुद्रसे उद्धार करे और अपनेको अधोगतिमें न डाले; क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है॥ 5॥
1. -2. गीता अध्याय 3 श्लोक 3 की टिप्पणीमें इसका खुलासा
अर्थ लिखा है।
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
6श्रीभगवान्
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
जिस जीवात्माद्वारा मन और इन्द्रियोंसहित शरीर जीता हुआ है, उस जीवात्माका तो वह आप ही मित्र है और जिसके द्वारा मन तथा इन्द्रियोंसहित शरीर नहीं जीता गया है, उसके लिये वह आप ही शत्रुके सदृश शत्रुतामें बर्तता है॥ 6॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
7श्रीभगवान्
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
सरदी-गरमी और सुख-दुःखादिमें तथा मान और अपमानमें जिसके अन्तःकरणकी वृत्तियाँ भलीभाँति शान्त हैं, ऐसे स्वाधीन आत्मावाले पुरुषके ज्ञानमें सच्चिदानन्दघन परमात्मा सम्यक् प्रकारसे स्थित है अर्थात् उसके ज्ञानमें परमात्माके सिवा अन्य कुछ है ही नहीं॥ 7॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
8श्रीभगवान्
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
जिसका अन्तःकरण ज्ञान-विज्ञानसे तृप्त है, जिसकी स्थिति विकाररहित है, जिसकी इन्द्रियाँ भलीभाँति जीती हुई हैं और जिसके लिये मिट्टी, पत्थर और सुवर्ण समान हैं, वह योगी युक्त अर्थात् भगवत्प्राप्त है, ऐसे कहा जाता है॥ 8॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
9श्रीभगवान्
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु
।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
सुहृद्1, मित्र, वैरी, उदासीन2, मध्यस्थ3, द्वेष्य और बन्धुगणोंमें, धर्मात्माओंमें और पापियोंमें भी समानभाव रखनेवाला अत्यन्त श्रेष्ठ है॥ 9॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
10श्रीभगवान्
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
मन और इन्द्रियोंसहित शरीरको वशमें रखनेवाला, आशारहित और संग्रहरहित योगी अकेला ही एकान्त स्थानमें स्थित होकर आत्माको निरन्तर परमात्मामें लगावे॥ 10॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
11श्रीभगवान्
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
शुद्ध भूमिमें, जिसके ऊपर क्रमशः कुशा, मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं, जो न बहुत ऊँचा है और न बहुत नीचा, ऐसे अपने आसनको स्थिर स्थापन करके—॥ 11॥
1. स्वार्थरहित सबका हित करनेवाला।
2. पक्षपातरहित।
3. दोनों ओरकी भलाई चाहनेवाला।
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
12श्रीभगवान्
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
उस आसनपर बैठकर चित्त और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको वशमें रखते हुए मनको एकाग्र करके अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये योगका अभ्यास करे॥ 12॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
13श्रीभगवान्
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
काया, सिर और गलेको समान एवं अचल धारण करके और स्थिर होकर, अपनी नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि जमाकर, अन्य दिशाओंको न देखता हुआ—॥ 13॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
14श्रीभगवान्
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
ब्रह्मचारीके व्रतमें स्थित, भयरहित तथा भलीभाँति शान्त अन्तःकरणवाला सावधान योगी मनको रोककर मुझमें चित्तवाला और मेरे परायण होकर स्थित होवे॥ 14॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
15श्रीभगवान्
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
वशमें किये हुए मनवाला योगी इस प्रकार आत्माको निरन्तर मुझ परमेश्वरके स्वरूपमें लगाता हुआ मुझमें रहनेवाली परमानन्दकी पराकाष्ठारूप शान्तिको प्राप्त होता है॥ 15॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
16श्रीभगवान्
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
हे अर्जुन! यह योग न तो बहुत खानेवालेका, न बिलकुल न खानेवालेका, न बहुत शयन करनेके स्वभाववालेका और न सदा जागनेवालेका ही सिद्ध होता है॥ 16॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
17श्रीभगवान्
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
दुःखोंका नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार-विहार करनेवालेका, कर्मोंमें यथायोग्य चेष्टा करनेवालेका और यथायोग्य सोने तथा जागनेवालेका ही सिद्ध होता है॥ 17॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
18श्रीभगवान्
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
अत्यन्त वशमें किया हुआ चित्त जिस कालमें परमात्मामें ही भलीभाँति स्थित हो जाता है, उस कालमें सम्पूर्ण भोगोंसे स्पृहारहित पुरुष योगयुक्त है, ऐसा कहा जाता है॥ 18॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
19श्रीभगवान्
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
जिस प्रकार वायुरहित स्थानमें स्थित दीपक चलाय- मान नहीं होता, वैसी ही उपमा परमात्माके ध्यानमें लगे हुए योगीके जीते हुए चित्तकी कही गयी है॥ 19॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
20श्रीभगवान्
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
योगके अभ्याससे निरुद्ध चित्त जिस अवस्थामें उपराम हो जाता है और जिस अवस्थामें परमात्माके ध्यानसे शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धिद्वारा परमात्माको साक्षात् करता हुआ सच्चिदानन्दघन परमात्मामें ही सन्तुष्ट रहता है॥ 20॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
21श्रीभगवान्
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
इन्द्रियोंसे अतीत, केवल शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धिद्वारा ग्रहण करनेयोग्य जो अनन्त आनन्द है; उसको जिस अवस्थामें अनुभव करता है और जिस अवस्थामें स्थित यह योगी परमात्माके स्वरूपसे विचलित होता ही नहीं॥ 21॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
22श्रीभगवान्
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
परमात्माकी प्राप्तिरूप जिस लाभको प्राप्त होकर उससे अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता और परमात्मप्राप्तिरूप जिस अवस्थामें स्थित योगी बड़े भारी दुःखसे भी चलायमान नहीं होता॥ 22॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
23श्रीभगवान्
तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
जो दुःखरूप संसारके संयोगसे रहित है तथा जिसका नाम योग है; उसको जानना चाहिये। वह योग न उकताये हुए अर्थात् धैर्य और उत्साहयुक्त चित्तसे निश्चयपूर्वक करना कर्तव्य है॥ 23॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
24श्रीभगवान्
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
संकल्पसे उत्पन्न होनेवाली सम्पूर्ण कामनाओंको निःशेषरूपसे त्यागकर और मनके द्वारा इन्द्रियोंके समुदायको सभी ओरसे भलीभाँति रोककर—॥ 24॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
25श्रीभगवान्
शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
क्रम-क्रमसे अभ्यास करता हुआ उपरतिको प्राप्त हो तथा धैर्ययुक्त बुद्धिके द्वारा मनको परमात्मामें स्थित करके परमात्माके सिवा और कुछ भी चिन्तन न करे॥ 25॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
26श्रीभगवान्
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
यह स्थिर न रहनेवाला और चञ्चल मन जिस- जिस शब्दादि विषयके निमित्तसे संसारमें विचरता है, उस-उस विषयसे रोककर यानी हटाकर इसे बार-बार परमात्मामें ही निरुद्ध करे॥ 26॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
27श्रीभगवान्
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
क्योंकि जिसका मन भली प्रकार शान्त है, जो पापसे रहित है और जिसका रजोगुण शान्त हो गया है, ऐसे इस सच्चिदानन्दघन ब्रह्मके साथ एकीभाव हुए योगीको उत्तम आनन्द प्राप्त होता है॥ 27॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
28श्रीभगवान्
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
वह पापरहित योगी इस प्रकार निरन्तर आत्माको परमात्मामें लगाता हुआ सुखपूर्वक परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिरूप अनन्त आनन्दका अनुभव करता है॥ 28॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
29श्रीभगवान्
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
सर्वव्यापी अनन्त चेतनमें एकीभावसे स्थितिरूप योगसे युक्त आत्मावाला तथा सबमें समभावसे देखनेवाला योगी आत्माको सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित और सम्पूर्ण भूतोंको आत्मामें कल्पित देखता है॥ 29॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
30श्रीभगवान्
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
जो पुरुष सम्पूर्ण भूतोंमें सबके आत्मरूप मुझ वासुदेवको ही व्यापक देखता है और सम्पूर्ण भूतोंको मुझ वासुदेवके अन्तर्गत* देखता है, उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता॥ 30॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
31श्रीभगवान्
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
जो पुरुष एकीभावमें स्थित होकर सम्पूर्ण भूतोंमें आत्मरूपसे स्थित मुझ सच्चिदानन्दघन वासुदेवको भजता है, वह योगी सब प्रकारसे बरतता हुआ भी मुझमें ही बरतता है॥ 31॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
32श्रीभगवान्
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
हे अर्जुन! जो योगी अपनी भाँति* सम्पूर्ण भूतोंमें सम देखता है और सुख अथवा दुःखको भी सबमें सम देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है॥ 32॥
* गीता अध्याय 9 श्लोक 6में देखना चाहिये।
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
33अर्जुन
अर्जुन उवाच
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम्॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
अर्जुन बोले—हे मधुसूदन! जो यह योग आपने समभावसे कहा है, मनके चञ्चल होनेसे मैं इसकी नित्य स्थितिको नहीं देखता हूँ॥ 33॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
34अर्जुन
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
क्योंकि हे श्रीकृष्ण! यह मन बड़ा चञ्चल, प्रमथन स्वभाववाला, बड़ा दृढ़ और बलवान् है। इसलिये उसका वशमें करना मैं वायुको रोकनेकी भाँति अत्यन्त दुष्कर मानता हूँ॥ 34॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
35श्रीभगवान्
श्रीभगवान् उवाच
श्रीभगवानुवाच
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
श्रीभगवान् बोले—हे महाबाहो! निःसन्देह मन चञ्चल और कठिनतासे वशमें होनेवाला है; परन्तु हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! यह अभ्यास* और वैराग्यसे वशमें होता है॥ 35॥
* जैसे मनुष्य अपने मस्तक, हाथ, पैर और गुदादिके साथ
ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र और म्लेच्छादिकोंका-सा बर्ताव करता हुआ
भी उनमें आत्मभाव अर्थात् अपनापन समान होनेसे सुख और
दुःखको समान ही देखता है, वैसे ही सब भूतोंमें देखना “अपनी
भाँति” सम देखना है।
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
36श्रीभगवान्
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
जिसका मन वशमें किया हुआ नहीं है, ऐसे पुरुषद्वारा योग दुष्प्राप्य है और वशमें किये हुए मनवाले प्रयत्नशील पुरुषद्वारा साधनसे उसका प्राप्त होना सहज है—यह मेरा मत है॥ 36॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
37अर्जुन
अर्जुन उवाच
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
अर्जुन बोले—हे श्रीकृष्ण! जो योगमें श्रद्धा रखनेवाला है; किन्तु संयमी नहीं है, इस कारण जिसका मन अन्तकालमें योगसे विचलित हो गया है, ऐसा साधक योगकी सिद्धिको अर्थात् भगवत्साक्षात्कारको न प्राप्त होकर किस गतिको प्राप्त होता है॥ 37॥
* गीता अध्याय 12 श्लोक 9 की टिप्पणीमें इसका विस्तार
देखना चाहिये।
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
38अर्जुन
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
हे महाबाहो! क्या वह भगवत्प्राप्तिके मार्गमें मोहित और आश्रयरहित पुरुष छिन्न-भिन्न बादलकी भाँति दोनों ओरसे भ्रष्ट होकर नष्ट तो नहीं हो जाता?॥ 38॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
39अर्जुन
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
हे श्रीकृष्ण! मेरे इस संशयको सम्पूर्णरूपसे छेदन करनेके लिये आप ही योग्य हैं, क्योंकि आपके सिवा दूसरा इस संशयका छेदन करनेवाला मिलना सम्भव नहीं है॥ 39॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
40श्रीभगवान्
श्रीभगवान् उवाच
श्रीभगवानुवाच
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
श्रीभगवान् बोले—हे पार्थ! उस पुरुषका न तो इस लोकमें नाश होता है और न परलोकमें ही। क्योंकि हे प्यारे! आत्मोद्धारके लिये अर्थात् भगवत्प्राप्तिके लिये कर्म करनेवाला कोई भी मनुष्य दुर्गतिको प्राप्त नहीं होता॥ 40॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
41श्रीभगवान्
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यवानोंके लोकोंको अर्थात् स्वर्गादि उत्तम लोकोंको प्राप्त होकर, उनमें बहुत वर्षोंतक निवास करके फिर शुद्ध आचरणवाले श्रीमान् पुरुषोंके घरमें जन्म लेता है॥ 41॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
42श्रीभगवान्
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
अथवा वैराग्यवान् पुरुष उन लोकोंमें न जाकर ज्ञानवान् योगियोंके ही कुलमें जन्म लेता है। परन्तु इस प्रकारका जो यह जन्म है, सो संसारमें निःसन्देह अत्यन्त दुर्लभ है॥ 42॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
43श्रीभगवान्
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
वहाँ उस पहले शरीरमें संग्रह किये हुए बुद्धि- संयोगको अर्थात् समबुद्धिरूप योगके संस्कारोंको अनायास ही प्राप्त हो जाता है और हे कुरुनन्दन! उसके प्रभावसे वह फिर परमात्माकी प्राप्तिरूप सिद्धिके लिये पहलेसे भी बढ़कर प्रयत्न करता है॥ 43॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
44श्रीभगवान्
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
वह* श्रीमानोंके घरमें जन्म लेनेवाला योगभ्रष्ट पराधीन हुआ भी उस पहलेके अभ्याससे ही निःसन्देह भगवान्की ओर आकर्षित किया जाता है, तथा समबुद्धिरूप योगका जिज्ञासु भी वेदमें कहे हुए सकाम कर्मोंके फलको उल्लंघन कर जाता है॥ 44॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
45श्रीभगवान्
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
परन्तु प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करनेवाला योगी तो पिछले अनेक जन्मोंके संस्कारबलसे इसी जन्ममें संसिद्ध होकर सम्पूर्ण पापोंसे रहित हो फिर तत्काल ही परमगतिको प्राप्त हो जाता है॥ 45॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
46श्रीभगवान्
तपस्विभ्योऽधिको
योगी
ज्ञानिभ्योऽपि
मतोऽधिकः।
कर्मिभ्यश्चाधिको
योगी
तस्माद्योगी
भवार्जुन॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
योगी तपस्वियोंसे श्रेष्ठ है, शास्त्रज्ञानियोंसे भी श्रेष्ठ माना गया है और सकाम कर्म करनेवालोंसे भी योगी श्रेष्ठ है; इससे हे अर्जुन! तू योगी हो॥ 46॥
* यहाँ “वह” शब्दसे श्रीमानोंके घरमें जन्म लेनेवाला योगभ्रष्ट
पुरुष समझना चाहिये।
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक
47श्रीभगवान्
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
सम्पूर्ण योगियोंमें भी जो श्रद्धावान् योगी मुझमें लगे हुए अन्तरात्मासे मुझको निरन्तर भजता है, वह योगी मुझे परम श्रेष्ठ मान्य है॥ 47॥
यही श्लोक अन्य संस्करणोंमेंझाँकनेको हॉवर · बसनेको क्लिक