आत्मसंयमयोग
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अतीतान्तराध्यायान्ते ध्यानयोगस्य सम्यग्दर्शनं प्रति अन्तरङ्गस्य सूत्रभूताः श्लोकाः “स्पर्शान्कृत्वा बहिः” इत्यादय उपदिष्टाः तेषां वृत्तिस्थानीयः अयं षष्ठः अध्याय आरभ्यते।
तत्र ध्यानयोगस्य बहिरङ्गं कर्म इति यावद् ध्यानयोगारोहणासमर्थः तावद् गृहस्थेन अधिकृतेन कर्तव्यं कर्म इति अतः तत् स्तौति।
ननु किमर्थं ध्यानयोगारोहणसीमाकरणं यावता
अनुष्ठेयम्
एव
विहितं
कर्म यावज्जीवम्।
न, “आरुरुक्षोः मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते” इति विशेषणाद् आरूढस्य च शमेन एव सम्बन्धकरणात्।
आरुरुक्षोः आरूढस्य च शमः कर्म च उभयं कर्तव्यत्वेन अभिप्रेतं चेत् स्यात् तदा आरुरुक्षोः आरूढस्य च इति शमकर्मविषयभेदेन विशेषणं विभागकरणं च अनर्थकं स्यात्।
तत्र आश्रमिणां कश्चिद् योगम् आरुरुक्षुः भवति आरूढः च कश्चिद् अन्ये न आरुरुक्षवो न च आरूढाः तान् अपेक्ष्य आरुरुक्षोः आरूढस्य च इति विशेषणं विभागकरणं च उपपद्यते एव इति चेत्।
न, “तस्यैव” इति वचनात्। पुनः योग-ग्रहणात् च “योगारूढस्य” इति य आसीत् पूर्वं योगम् आरुरुक्षुः तस्य एव आरूढस्य शम एव कर्तव्यं कारणं योगफलं प्रति उच्यते इति। अतो न यावज्जीवं कर्तव्यत्वप्राप्तिः कस्यचिद् अपि कर्मणः।
योगविभ्रष्टवचनात् च। गृहस्थस्य चेत् कर्मिणो योगो विहितः षष्ठे अध्याये स योगविभ्रष्टः अपि कर्मगतिं कर्मफलं प्राप्नोति इति तस्य नाशाशङ्का अनुपपन्ना स्यात्।
अवश्यं हि कृतं कर्म काम्यं नित्यं वा मोक्षस्य नित्यत्वाद् अनारभ्यत्वे स्वं फलम् आरभते एव।
नित्यस्य च कर्मणो वेदप्रमाणावबुद्धत्वात् फलेन भवितव्यम् इति अवोचाम अन्यथा वेदस्य आनर्थक्यप्रसङ्गाद् इति। न च कर्मणि सति उभयविभ्रष्टवचनम् अर्थवत् कर्मणो विभ्रंशकारणानुपपत्तेः।
कर्म कृतम् ईश्वरे संन्यस्य इति अतः कर्तरि कर्म फलं न आरभते इति चेत्।
न, ईश्वरे संन्यासस्य अधिकतरफल-हेतुत्वोपपत्तेः।
मोक्षाय एव इति चेत् स्वकर्मणां कृतानाम् ईश्वरे न्यासो मोक्षाय एव न फलान्तराय योगसहितो योगात् च विभ्रष्ट इति अतः तं प्रति नाशाशङ्का युक्ता एव इति चेत्।
न, “एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः” “ब्रह्मचारिव्रते स्थितः” इति कर्मसन्न्यासविधानात्।
न च अत्र ध्यानकाले स्त्रीसहायत्वाशङ्का येन एकाकित्वं विधीयते। न च गृहस्थस्य “निराशीरपरिग्रहः” इत्यादिवचनम् अनुकूलम् उभयविभ्रष्टप्रश्नानुपपत्तेः च।
“अनाश्रितः” इति अनेन कर्मिण एव सन्न्यासित्वं योगित्वं च उक्तं प्रतिषिद्धं च निरग्नेः अक्रियस्य च सन्न्यासित्वं योगित्वं च इति चेत्।
न, ध्यानयोगं प्रति बहिरङ्गस्य सतः कर्मणः फलाकाङ्क्षासन्न्यासस्तुतिपरत्वात्।
न केवलं निरग्निः अक्रिय एव सन्न्यासी योगी च किं तर्हि कर्मी अपि कर्मफलासङ्गं सन्न्यस्य कर्मयोगम् अनुतिष्ठन् सत्त्वशुद्ध्यर्थं स सन्न्यासी च योगी च भवति इति स्तूयते।
न च एकेन वाक्येन कर्मफलासङ्गसन्न्यास-स्तुतिः चतुर्थाश्रमप्रतिषेधः च उपपद्यते।
न च प्रसिद्धं निरग्नेः अक्रियस्य परमार्थ-सन्न्यासिनः
श्रुतिस्मृतिपुराणेतिहासयोग-शास्त्रविहितं सन्न्यासित्वं योगित्वं च प्रतिषेधति भगवान्। स्ववचनविरोधात् च।
“सर्वकर्माणि मनसा सन्न्यस्य” “नैव कुर्वन्न कारयन् आस्ते” “मौनी सन्तुष्टो येन केनचित्” “अनिकेतः स्थिरमतिः” “विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः” “सर्वारम्भपरित्यागी” इति च तत्र तत्र भगवता स्ववचनानि दर्शितानि तैः विरुध्येत चतुर्थाश्रमप्रतिषेधः।
तस्माद् मुनेः योगम् आरुरुक्षोः प्रतिपन्न-गार्हस्थ्यस्य
अग्निहोत्रादि
फलनिरपेक्षम् अनुष्ठीयमानं
ध्यानयोगारोहणसाधनत्वं सत्त्वशुद्धिद्वारेण प्रतिपद्यते।
इति स सन्न्यासी च योगी च इति स्तूयते—
यथार्थ ज्ञानके लिये जो अन्तरङ्ग साधन है उस ध्यानयोगके सूत्ररूप जिन “स्पर्शान्कृत्वा बहिः” इत्यादि श्लोकोंका पूर्वाध्यायके अन्तमें उपदेश किया है, उन श्लोकोंका व्याख्यारूप यह छठा अध्याय आरम्भ किया जाता है।
परंतु ध्यानयोगका बहिरङ्ग साधन कर्म है, इसलिये जबतक ध्यानयोगपर आरूढ होनेमें समर्थ न हो, तबतक अधिकारी गृहस्थको कर्म करना चाहिये, अतः उस (कर्म)-की स्तुति करते हैं।
पू0—ध्यानयोगपर आरूढ होनेतककी सीमा क्यों बाँधी गयी? जबतक जीवे तबतक विहित कर्मोंका अनुष्ठान तो सबको करते ही रहना चाहिये।
उ0—यह ठीक नहीं; क्योंकि “योगपर आरूढ़ होनेकी इच्छावाले मुनिके लिये कर्म कर्तव्य कहे गये हैं” ऐसा कहा है और योगारूढ योगीका केवल उपशमसे ही सम्बन्ध बतलाया गया है।
यदि आरुरुक्षु और आरूढ दोनोंहीके लिये शम और कर्म दोनों ही कर्तव्यरूपसे माने गये हों तो आरुरुक्षु और आरूढके शम और कर्म अलग-अलग विषय बतलाकर विशेषण देना और विभाग करना व्यर्थ होगा।
पू0—उन आश्रमवालोंमें कोई योगारूढ होनेकी इच्छावाला होता है और कोई आरूढ होता है, परंतु कुछ दूसरे न तो आरूढ होते हैं और न आरुरुक्षु ही होते हैं। उनकी अपेक्षासे “आरुरुक्षु” और “आरूढ” यह विशेषण देना और (उन दोनों प्रकारके योगियोंको साधारण श्रेणीके लोगोंसे पृथक् करके) उनका विभाग करना, ये दोनों बातें ही बन सकती हैं।
उ0—यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि “तस्यैव” इस पदका प्रयोग किया गया है। एवं “योगारूढस्य” इस विशेषणमें योग शब्द भी ग्रहण किया गया है। अर्थात् जो पहले योगका आरुरुक्षु था वही जब योगपर आरूढ हो गया तो उसी योगारूढका योग-फलकी प्राप्तिके लिये शम ही कारण यानी कर्तव्य बताया गया है। इसलिये किसी भी कर्मके लिये जीवनपर्यन्त कर्तव्यताकी प्राप्ति नहीं होती।
तथा योगभ्रष्टविषयक वर्णनसे भी यही बात सिद्ध होती है। अभिप्राय यह कि यदि कर्म करनेवाले गृहस्थके लिये भी छठे अध्यायमें कहा हुआ योग विहित हो, तो वह योगसे भ्रष्ट हुआ भी कर्मोंकी गतिको अर्थात् कर्मोंके फलको तो प्राप्त होता ही है, इसलिये उसके नाशकी आशङ्का युक्तियुक्त नहीं रह जाती।
क्योंकि नित्य होनेके कारण मोक्ष तो कर्मोंसे प्राप्त हो ही नहीं सकता। इसलिये किये हुए काम्य या नित्य कर्म अपने फलका आरम्भ अवश्य ही करेंगे।
नित्यकर्म भी वेदप्रमाणद्वारा विज्ञात होनेके कारण अवश्य ही फल देनेवाले होते हैं, नहीं तो वेदको निरर्थक माननेका प्रसङ्ग आ जाता है, यह पहले कह चुके हैं। कर्मोंके नाशक किसी हेतुकी कोई सम्भावना न होनेके कारण कर्मोंके रहते हुए (गृहस्थको) उभयभ्रष्ट कहना युक्तियुक्त नहीं हो सकता।
पू0—यदि ऐसा मानें कि “वे कर्म ईश्वरमें अर्पण करके” किये गये हैं, इसलिये वे कर्ताके लिये फलका आरम्भ नहीं करेंगे।
उ0—यह ठीक नहीं; क्योंकि ईश्वरमें अर्पण किये हुए कर्मोंका तो और भी अधिक फल देनेवाला होना ही युक्तिसंगत है।
पू0—यदि ऐसे मानें कि वे कर्म केवल मोक्षके लिये ही होते हैं अर्थात् अपने किये हुए कर्मोंका जो ईश्वरमें योगसहित (समतापूर्वक) संन्यास है वह केवल मोक्षके लिये ही होता है, दूसरे फलके लिये नहीं और वह उस योगसे (समत्वसे) भ्रष्ट हो गया है, अतः उसके लिये नाशकी आशङ्का ठीक ही है।
उ0—यह भी ठीक नहीं; क्योंकि “एकाकी यतचित्तात्मा
निराशीरपरिग्रहः”
“ब्रह्मचारिव्रते स्थितः” आदि वचनोंद्वारा कर्म-संन्यासका विधान किया गया है।
यहाँ ध्यानकालमें स्त्रीकी सहायताकी तो कोई आशङ्का नहीं होती कि जिससे गृहस्थके लिये एकाकीका विधान किया जाता। “निराशीरपरिग्रहः” इत्यादि वचन भी गृहस्थके अनुकूल नहीं है तथा उभयभ्रष्टविषयक प्रश्नकी उपपत्ति न होनेके कारण भी (उपर्युक्त मान्यता) ठीक नहीं है।
पू0—“अनाश्रितः” इस श्लोकसे कर्म करनेवालेको ही संन्यासी और योगी कहा है, अग्निरहित और क्रियारहितके संन्यासित्व और योगित्वका निषेध किया है।
उ0—यह कहना भी ठीक नहीं; क्योंकि यह श्लोक केवल ध्यानयोगके लिये बहिरंग साधनरूप कर्मोंके फलाकाङ्क्षासम्बन्धी संन्यासकी स्तुति करनेके निमित्त ही है।
केवल अग्निरहित और क्रियारहित ही संन्यासी और योगी होता है; ऐसा नहीं, किंतु जो कोई कर्म करनेवाला भी कर्मफल और आसक्तिको छोड़कर अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये कर्मयोगमें स्थित है वह भी संन्यासी और योगी है, इस प्रकार कर्मयोगीकी स्तुति की गयी है।
एक ही वाक्यसे कर्मफलविषयक आसक्तिके त्यागरूप संन्यासकी स्तुति और चतुर्थ आश्रमका प्रतिषेध नहीं बन सकता।
अग्निरहित और क्रियारहित वास्तविक संन्यासीका संन्यासित्व और योगित्व जो श्रुति, स्मृति, पुराण, इतिहास और योगशास्त्रसे विहित तथा सर्वत्र प्रसिद्ध है उसका भगवान् प्रतिषेध नहीं करते; क्योंकि इससे भगवान्के अपने कथनमें भी विरोध आता है।
अभिप्राय यह है कि “सब कर्मोंको मनसे छोड़कर” “न करता हुआ न करवाता हुआ रहता है” “मौन भाववाला जिस किस प्रकारसे भी सदा संतुष्ट” “बिना घर-द्वारवाला स्थिरबुद्धि” “जो पुरुष समस्त कामनाओंको छोड़कर निःस्पृह भावसे विचरता है” “समस्त आरम्भोंका त्यागी” इस प्रकार जगह-जगह भगवान्ने जो अपने वचन प्रदर्शित किये हैं, उनसे चतुर्थ आश्रमके प्रतिषेधका विरोध है।
इसलिये (यह सिद्ध हुआ कि) जो गृहस्थाश्रममें स्थित पुरुष योगारूढ होनेकी इच्छावाला और मननशील है, उसके फल न चाहकर अनुष्ठान किये हुए अग्निहोत्रादि कर्म अन्तःकरणकी शुद्धिद्वारा ध्यानयोगमें आरूढ होनेके साधन बन सकते हैं।
इसी भावसे “वह संन्यासी और योगी है” इस प्रकार उसकी स्तुति की जाती है—
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—
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अनाश्रितो न आश्रितः अनाश्रितः किं कर्मफलं कर्मणः फलं कर्मफलं यत् तद् अनाश्रितः कर्मफलतृष्णारहित इत्यर्थः।
यो हि कर्मफलतृष्णावान् स कर्मफलम् आश्रितो भवति अयं तु तद्विपरीतः अतः अनाश्रितः कर्मफलम्।
एवम्भूतः सन् कार्यं कर्तव्यं नित्यं काम्य-विपरीतम् अग्निहोत्रादिकं करोति निर्वर्तयति, यः कश्चिद् ईदृशः कर्मी स कर्म्यन्तरेभ्यो विशिष्यते इति एवम् अर्थम् आह स सन्न्यासी च योगी च इति।
सन्न्यासः परित्यागः स यस्य अस्ति स सन्न्यासी च योगी च योगः चित्तसमाधानं स यस्य अस्ति स योगी च इति एवंगुणसम्पन्नः अयं मन्तव्यः।
न केवलं निरग्निः अक्रिय एव सन्न्यासी योगी च इति मन्तव्यः।
निर्गता अग्नयः कर्माङ्गभूता यस्मात् स निरग्निः अक्रियः च अनग्निसाधना अपि अविद्यमानाः क्रियाः तपोदानादिका यस्य असौ अक्रियः॥ 1॥
जिसने आश्रय नहीं लिया हो, वह अनाश्रित है, किसका? कर्मफलका अर्थात् जो कर्मोंके फलका आश्रय न लेनेवाला कर्मफलकी तृष्णासे रहित है।
क्योंकि जो कर्मफलकी तृष्णावाला होता है वही कर्मफलका आश्रय लेता है, यह उससे विपरीत है, इसलिये कर्मफलका आश्रय न लेनेवाला है।
ऐसा (कर्मफलके आश्रयसे रहित) होकर जो पुरुष कर्तव्यकर्मोंको अर्थात् काम्यकर्मोंसे विपरीत नित्य अग्निहोत्रादि कर्मोंको पूरा करता है, ऐसा जो कोई कर्मी है वह दूसरे कर्मियोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ है, इसी अभिप्रायसे यह कहा है कि वह संन्यासी भी है और योगी भी है।
संन्यास नाम त्यागका है, वह जिसमें हो वही संन्यासी है और चित्तके समाधानका नाम योग है, वह जिसमें हो वही योगी है; अतः वह कर्मयोगी भी इन गुणोंसे सम्पन्न माना जाना चाहिये।
केवल अग्निरहित और क्रियारहित पुरुष ही संन्यासी और योगी है, ऐसा नहीं मानना चाहिये।
कर्मोंके अङ्गभूत गार्हपत्यादि अग्नि जिससे छूट गये हैं, वह निरग्नि है और बिना अग्निके होनेवाली तप-दानादि क्रिया भी जो नहीं करता वह अक्रिय है॥ 1॥
ननु च निरग्नेः अक्रियस्य एव श्रुतिस्मृति-योगशास्त्रेषु सन्न्यासित्वं योगित्वं च प्रसिद्धं कथम् इह साग्नेः सक्रियस्य सन्न्यासित्वं योगित्वं च अप्रसिद्धम् उच्यते इति।
न एष दोषः । कयाचिद् गुणवृत्त्या उभयस्य सम्पिपादयिषितत्वात्।
तत् कथम्?
कर्मफलसङ्कल्पसन्न्यासात्
सन्न्यासित्वं योगाङ्गत्वेन च कर्मानुष्ठानात् कर्मफलसङ्कल्पस्य वा चित्तविक्षेपहेतोः परित्यागाद् योगित्वं च इति गौणम् उभयम्।
न पुनः मुख्यं सन्न्यासित्वं योगित्वं च अभिप्रेतम् इति एतम् अर्थं दर्शयितुम् आह—
पू0—जब कि निरग्नि और अक्रिय पुरुषके लिये ही श्रुति, स्मृति और योगशास्त्रोंमें संन्यासित्व और योगित्व प्रसिद्ध है, तब यहाँ अग्नियुक्त और क्रियायुक्त पुरुषके लिये अप्रसिद्ध संन्यासित्व और योगित्वका प्रतिपादन कैसे किया जाता है?
उ0—यह दोष नहीं है; क्योंकि किसी एक गुणवृत्तिसे (किसी एक गुणविशेषको लेकर) संन्यासित्व और योगित्व—इन दोनों भावोंको उसमें (गृहस्थमें) सम्पादन करना भगवान्को इष्ट है।
पू0—वह कैसे?
उ0—कर्मफलके संकल्पोंका त्याग होनेसे “संन्यासित्व” है और योगके अङ्गरूपसे कर्मोंका अनुष्ठान होनेसे या चित्तविक्षेपके कारणरूप कर्मफलके संकल्पोंका परित्याग होनेसे “योगित्व” है, इस प्रकार दोनों भाव ही गौणरूपसे माने गये हैं।
इससे मुख्य संन्यासित्व और योगित्व इष्ट नहीं है। इसी भावको दिखलानेके लिये कहते हैं—
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यं सर्वकर्मतत्फलपरित्यागलक्षणं परमार्थ-सन्न्यासम् इति प्राहुः श्रुतिस्मृतिविदः, योगं कर्मानुष्ठानलक्षणं तं परमार्थसन्न्यासं विद्धि जानीहि हे पाण्डव।
कर्मयोगस्य प्रवृत्तिलक्षणस्य तद्विपरीतेन निवृत्तिलक्षणेन
परमार्थसन्न्यासेन
कीदृशं सामान्यम् अङ्गीकृत्य तद्भाव उच्यते इति अपेक्षायाम् इदम् उच्यते—
अस्ति परमार्थसन्न्यासेन सादृश्यं कर्तृद्वारकं कर्मयोगस्य। यो हि परमार्थसन्न्यासी स त्यक्त-सर्वकर्मसाधनतया सर्वकर्मतत्फलविषयं सङ्कल्पं प्रवृत्तिहेतुकामकारणं सन्न्यस्यति। अयम् अपि कर्मयोगी कर्म कुर्वाण एव फलविषयं सङ्कल्प सन्न्यस्यति इति एतम् अर्थं दर्शयन् आह—
न हि यस्माद् असन्न्यस्तसङ्कल्पः असन्न्यस्तः अपरित्यक्तः फलविषयः सङ्कल्पः अभिसन्धिः येन सः असन्न्यस्तसङ्कल्पः, कश्चन कश्चिद् अपि कर्मी योगी समाधानवान् भवति, न सम्भवति इत्यर्थः। फलसङ्कल्पस्य चित्तविक्षेपहेतुत्वात्।
तस्माद् यः कश्चन कर्मी सन्न्यस्तफलसङ्कल्पो भवेत् स योगी समाधानवान् अविक्षिप्तचित्तो भवेत् चित्तविक्षेपहेतोः फलसङ्कल्पस्य सन्न्यस्त-त्वाद् इति अभिप्रायः।
एवं परमार्थसन्न्यासकर्मयोगयोः कर्तृद्वारकं सन्न्याससामान्यम् अपेक्ष्य “यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव” इति कर्मयोगस्य स्तुत्यर्थं सन्न्यासत्वम् उक्तम्॥ 2॥
श्रुति-स्मृतिके ज्ञाता पुरुष सर्वकर्म और उनके फलके त्यागरूप जिस भावको वास्तविक संन्यास कहते हैं, हे पाण्डव! कर्मानुष्ठानरूप योगको (निष्काम कर्मयोगको) भी तू वही वास्तविक संन्यास जान।
प्रवृत्तिरूप कर्मयोगकी उससे विपरीत निवृत्तिरूप परमार्थ-संन्यासके साथ कैसी समानता स्वीकार करके एकता कही जाती है? ऐसा प्रश्न होनेपर यह कहा जाता है—
परमार्थ-संन्यासके साथ कर्मयोगकी कर्तृविषयक समानता है; क्योंकि जो परमार्थ-संन्यासी है वह सब कर्मसाधनोंका त्याग कर चुकता है, इसलिये सब कर्मोंका और उनके फलविषयक संकल्पोंका, जो कि प्रवृत्तिहेतुक कामके कारण हैं, त्याग करता है। और यह कर्मयोगी भी कर्म करता हुआ फलविषयक संकल्पोंका त्याग करता ही है (इस प्रकार दोनोंकी समानता है), इस अभिप्रायको दिखलाते हुए कहते हैं—
जिसने फलविषयक संकल्पोंका यानी इच्छाओंका त्याग न किया हो, ऐसा कोई भी कर्मी, योगी नहीं हो सकता। अर्थात् ऐसे पुरुषका चित्त समाधिस्थ होना सम्भव नहीं है; क्योंकि फलका संकल्प ही चित्तके विक्षेपका कारण है।
इसलिये जो कोई कर्मी फलविषयक संकल्पोंका त्याग कर देता है वही योगी होता है। अभिप्राय यह है कि चित्तविक्षेपका कारण जो फलविषयक संकल्प है उसके त्यागसे ही मनुष्य समाधानयुक्त यानी चित्तविक्षेपसे रहित योगी होता है।
इस प्रकार परमार्थ-संन्यासकी और कर्मयोगकी कर्त्ताके भावसे सम्बन्ध रखनेवाली जो त्यागविषयक समानता है, उसकी अपेक्षासे ही कर्मयोगकी स्तुति करनेके लिये “यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव” इस श्लोकमें उसे संन्यास बतलाया है॥ 2॥
ध्यानयोगस्य
फलनिरपेक्षः
कर्मयोगो बहिरङ्गं साधनम् इति तं सन्न्यासत्वेन स्तुत्वा अधुना
कर्मयोगस्य
ध्यानयोगसाधनत्वं दर्शयति—
फलेच्छासे रहित जो कर्मयोग है वह ध्यानयोगका बहिरंग साधन है, इस उद्देश्यसे उसकी संन्यासरूपसे स्तुति करके अब यह भाव दिखलाते हैं कि कर्मयोग ध्यानयोगका साधन है—
आरुरुक्षोः आरोढुम् इच्छतः अनारूढस्य ध्यानयोगे अवस्थातुम् अशक्तस्य एव इत्यर्थः, कस्य आरुरुक्षोः मुनेः कर्मफलसन्न्यासिन इत्यर्थः। किम् आरुरुक्षोः योगं कर्म कारणं साधनम् उच्यते।
योगारूढस्य पुनः तस्य एव शम उपशमः सर्वकर्मभ्यो निवृत्तिः कारणं योगारूढत्वस्य साधनम् उच्यते इत्यर्थः।
यावद् यावत् कर्मभ्य उपरमते तावत् तावद् निरायासस्य जितेन्द्रियस्य चित्तं समाधीयते। तथा सति स झटिति योगारूढो भवति।
तथा च उक्तं व्यासेन—
“नैतादृशं ब्राह्मणस्यास्ति वित्तं यथैकता समता सत्यता च। शीलं स्थितिर्दण्डनिधानमार्जवं ततस्ततश्चोपरमः क्रियाभ्यः॥” (महा0 शान्ति0 175। 37) इति ॥ 3॥
जो ध्यानयोगमें आरूढ़ नहीं—ध्यानयोगमें स्थित नहीं रह सकता है, ऐसे योगारूढ़ होनेकी इच्छावाले मुनि अर्थात् कर्मफलत्यागी पुरुषके लिये ध्यानयोगपर आरूढ़ होनेका साधन “कर्म” बतलाया गया है।
तथा वही जब योगारूढ़ हो जाता है तो उसके लिये योगारूढ़ता (ध्यानयोगमें सदा स्थित रहनेका) साधन शम—उपशम यानी “सर्व कर्मोंसे निवृत्त होना” बतलाया गया है।
(मनुष्य) जितना-जितना कर्मोंसे उपरत होता जाता है, उतना-उतना ही उस परिश्रमरहित जितेन्द्रिय पुरुषका चित्त समाहित होता जाता है। ऐसा होनेसे वह झटपट योगारूढ़ हो जाता है।
व्यासजीने भी यही कहा है कि “ब्राह्मणके लिये दूसरा ऐसा कोई धन नहीं है, जैसा कि एकता, समता, सत्यता, शील, स्थिति, अहिंसा, आर्जव और उन-उन क्रियाओंसे उपराम होना है”॥ 3॥
अथ इदानीं कदा योगारूढो भवति इति उच्यते—
साधक कब योगारूढ़ हो जाता है, यह अब बतलाते हैं—
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यदा समाधीयमानचित्तो योगी हि इन्द्रियार्थेषु इन्द्रियाणाम् अर्थाः शब्दादयः तेषु इन्द्रियार्थेषु कर्मसु
च
नित्यनैमित्तिककाम्यप्रतिषिद्धेषु प्रयोजनाभावबुद्ध्या न अनुषज्जते अनुषङ्गं कर्तव्यताबुद्धिं न करोति इत्यर्थः।
सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी सर्वान् सङ्कल्पान् इहा-मुत्रार्थकामहेतून् सन्यसितु शीलम् अस्य इति सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी, योगारूढः प्राप्तयोग इति एतत् तदा तस्मिन् काले उच्यते।
सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी इति वचनात् सर्वान् च कामान् सर्वाणि च कर्माणि सन्यसेद् इत्यर्थः।
सङ्कल्पमूला हि सर्वे कामाः—
“सङ्कल्पमूलः कामो वै यज्ञाः सङ्कल्पसम्भवाः।”
(मनु0 2। 3) “काम जानामि ते मूलं सङ्कल्पात् किल जायसे॥” “न त्वां सङ्कल्पयिष्यामि समूलो न भविष्यसि॥” (महा0 शान्ति0 177। 25) इत्यादिस्मृतेः।
सर्वकामपरित्यागे च सर्वकर्मसन्न्यासः सिद्धो भवति “स यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति यत्क्रतुर्भवति तत्कर्म कुरुते” (बृ0 उ0 4। 4। 5) इत्यादिश्रुतिभ्यः “यद्यद्धि कुरुते कर्म तत्तत्कामस्य चेष्टितम्” (मनु0 2। 4) इत्यादिस्मृतिभ्यः च।
न्यायात् च। न हि सर्वसङ्कल्पसन्न्यासे कश्चित् स्पन्दितुम् अपि शक्तः।
तस्मात् सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी इति वचनात् सर्वान् कामान् सर्वाणि कर्माणि च त्याजयति भगवान्॥ 4॥
चित्तका समाधान कर लेनेवाला योगी जब इन्द्रियोंके अर्थोंमें, अर्थात् इन्द्रियोंके विषय जो शब्दादि हैं उनमें एवं नित्य, नैमित्तिक, काम्य और निषिद्ध कर्मोंमें अपना कुछ भी प्रयोजन न देखकर आसक्त नहीं होता, उनमें आसक्ति यानी ये मुझे करने चाहिये ऐसी बुद्धि नहीं करता।
तब—उस समय वह सब संकल्पोंका त्यागी अर्थात् इस लोक और परलोकके भोगोंकी कामनाके कारणरूप सब संकल्पोंका त्याग करना जिसका स्वभाव हो चुका है, ऐसा पुरुष, योगारूढ़ यानी योगको प्राप्त हो चुका है, ऐसे कहा जाता है।
“सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी” इस कथनका यह आशय है कि सब कामनाओंको और समस्त कर्मोंको छोड़ देना चाहिये।
क्योंकि सब कामनाओंका मूल संकल्प ही है। स्मृतिमें भी कहा है कि—“कामका मूल कारण संकल्प ही है। समस्त यज्ञ संकल्पसे उत्पन्न होते हैं।” “हे काम! मैं तेरे मूल कारणको जानता हूँ। तू निःसन्देह संकल्पसे ही उत्पन्न होता है। मैं तेरा संकल्प नहीं करूँगा, अतः फिर तू मुझे प्राप्त नहीं होगा।”
सब कामनाओंके परित्यागसे ही सर्व कर्मोंका त्याग सिद्ध हो जाता है। यह बात “वह जैसी कामनावाला होता है वैसे ही निश्चयवाला होता है, जैसे निश्चयवाला होता है वही कर्म करता है” इत्यादि श्रुतिसे प्रमाणित है और “जीव जो-जो कर्म करता है वह सब कामकी ही चेष्टा है।” इत्यादि स्मृतिसे भी प्रमाणित है।
युक्तिसे भी यही बात सिद्ध होती है; क्योंकि सब संकल्पोंका त्याग कर देनेपर तो कोई जरा-सा हिल भी नहीं सकता।
सुतरां “सर्वसङ्कल्पसंन्न्यासी” कहकर भगवान् समस्त कामनाओंका और समस्त कर्मोंका त्याग कराते हैं॥ 4॥
यदा एवं योगारूढः तदा तेन आत्मा आत्मना उद्धृतो भवति संसाराद् अनर्थव्राताद् अतः—
जब मनुष्य इस प्रकार योगारूढ़ हो जाता है तब वह अनर्थोंके समूह इस संसारसमुद्रसे स्वयं अपना उद्धार कर लेता है, इसलिये—
उद्धरेत् संसारसागरे निमग्नम् आत्मना आत्मानं तत उद् ऊर्ध्वं हरेद् उद्धरेद् योगारूढतां आपादयेद् इत्यर्थः।
न आत्मानम् अवसादयेद् न अधो नयेद् न अधो गमयेत्।
आत्मा एव हि यस्माद् आत्मनो बन्धुः। न हि अन्यः कश्चिद् बन्धुः यः संसारमुक्तये भवति। बन्धुः अपि तावद् मोक्षं प्रति प्रतिकूल एव स्नेहादिबन्धनायतनत्वाद् तस्माद् युक्तम् अवधारणम् “आत्मा एव हि आत्मनो बन्धुः” इति।
आत्मा एव रिपुः शत्रुः यः अन्यः अपकारी बाह्यः शत्रुः सः अपि आत्मप्रयुक्त एव इति, युक्तम् एव अवधारणम् आत्मा एव रिपुः आत्मन इति॥ 5॥
संसार-सागरमें डूबे पड़े हुए अपने-आपको उस संसारसमुद्रसे आत्मबलके द्वारा ऊँचा उठा लेना चाहिये अर्थात् योगारूढ़ अवस्थाको प्राप्त कर लेना चाहिये।
अपना अधःपतन नहीं करना चाहिये अर्थात् अपने आत्माको नीचे नहीं गिरने देना चाहिये।
क्योंकि यह आप ही अपना बन्धु है। दूसरा कोई (ऐसा) बन्धु नहीं है जो संसारसे मुक्त करनेवाला हो। प्रेमादि भाव बन्धनके स्थान होनेके कारण सांसारिक बन्धु भी (वास्तवमें) मोक्षमार्गका तो विरोधी ही होता है। इसलिये निश्चयपूर्वक यह कहना ठीक ही है कि आप ही अपना बन्धु है।
तथा आप ही अपना शत्रु है। जो कोई दूसरा अनिष्ट करनेवाला बाह्य शत्रु है वह भी अपना ही बनाया हुआ होता है, इसलिये आप ही अपना शत्रु है, इस प्रकार केवल अपनेको ही शत्रु बतलाना भी ठीक ही है॥ 5॥
आत्मा एव बन्धुः आत्मा एव रिपुः आत्मन
इति
उक्तम्,
तत्र
किंलक्षण आत्मनो बन्धुः किंलक्षणो वा आत्मनो रिपुः इति उच्यते—
आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है यह बात कही गयी, उसमें किन लक्षणोंवाला पुरुष तो (आप ही) अपना मित्र होता है और कौन (आप ही) अपना शत्रु होता है? सो कहा जाता है—
बन्धुः आत्मा आत्मनः तस्य तस्य आत्मनः स आत्मा बन्धुः येन आत्मना आत्मा एव जितः
आत्मा
कार्यकरणसङ्घातो
येन वशीकृतो जितेन्द्रिय इत्यर्थः। अनात्मनः तु अजितात्मनः तु शत्रुत्वे शत्रुभावे वर्तेत आत्मा एव शत्रुवत्, तथा अनात्मा शत्रुः आत्मनः अपकारी तथा आत्मा आत्मनः अपकारे वर्तेत इत्यर्थः॥ 6॥
उस जीवात्माका तो वही आप मित्र है कि जिसने स्वयमेव कार्य-करणके समुदाय शरीररूप आत्माको अपने वशमें कर लिया हो अर्थात् जो जितेन्द्रिय हो। जिसने (कार्य-करणके संघात) शरीररूप आत्माको अपने वशमें नहीं किया उसका वह आप ही शत्रुकी भाँति शत्रुभावमें बर्तता है। अर्थात् जैसे दूसरा शत्रु अपना अनिष्ट करनेवाला होता है, वैसे ही वह आप ही अपना अनिष्ट करनेमें लगा रहता है॥ 6॥
जितात्मनः कार्यकरणादिसङ्घात आत्मा जितो येन स जितात्मा, तस्य जितात्मनः, प्रशान्तस्य प्रसन्नान्तःकरणस्य सतः सन्न्यासिनः परमात्मा समाहितः साक्षाद् आत्मभावेन वर्तते इत्यर्थः।
किं च शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा माने अपमाने च मानापमानयोः पूजापरिभवयोः॥ 7॥
जिसने मन, इन्द्रिय आदिके संघातरूप इस शरीरको अपने वशमें कर लिया है और जो प्रशान्त है— जिसका अन्तःकरण सदा प्रसन्न रहता है उस संन्यासीको भली प्रकारसे सर्वत्र परमात्मा प्राप्त है अर्थात् साक्षात् आत्मभावसे विद्यमान है।
तथा वह सर्दी-गर्मी और सुख-दुःखमें एवं मान और अपमानमें यानी पूजा और तिरस्कारमें भी (सम हो जाता है)॥ 7॥
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा ज्ञानं शास्त्रोक्तपदार्थानां परिज्ञानं विज्ञानं तु शास्त्रतो ज्ञातानां तथा एव स्वानुभवकरणं ताभ्यां ज्ञानविज्ञानाभ्यां तृप्तः सञ्जातालम्प्रत्यय आत्मा अन्तःकरणं यस्य स ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थः अप्रकम्प्यो भवति इत्यर्थः। विजितेन्द्रियः च। य ईदृशो युक्तः समाहित इति स उच्यते कथ्यते।
स योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनो लोष्टाश्म-काञ्चनानि समानि यस्य स समलोष्टाश्म-काञ्चनः॥ 8॥
शास्त्रोक्त पदार्थोंको समझनेका नाम “ज्ञान” है और शास्त्रसे समझे हुए भावोंको वैसे ही अपने अन्तःकरणमें प्रत्यक्ष अनुभव करनेका नाम “विज्ञान” है, ऐसे “ज्ञान” और “विज्ञान” से जिसका अन्तःकरण तृप्त है अर्थात् जिसके अन्तःकरणमें ऐसा विश्वास उत्पन्न हो गया है कि “बस” अब कुछ भी जानना बाकी नहीं है, ऐसा जो ज्ञान-विज्ञानसे तृप्त हुए अन्तःकरणवाला है तथा जो कूटस्थ यानी अविचल और जितेन्द्रिय हो जाता है, वह युक्त यानी समाहित (समाधिस्थ) कहा जाता है।
यह योगी मिट्टी, पत्थर और सुवर्णको समान समझने-वाला होता है अर्थात् उसकी दृष्टिमें मिट्टी, पत्थर और सोना सब समान हैं (एक ब्रह्मरूप है)॥ 8॥
किं च—
तथा—
सुहृदित्यादिश्लोकार्धम् एकं पदम्।
सुहृद् इति प्रत्युपकारम् अनपेक्ष्य उपकर्ता। मित्रं स्नेहवान्। अरिः शत्रुः। उदासीनो न कस्यचित्
पक्षं
भजते।
मध्यस्थो
यो विरुद्धयोः उभयोः हितैषी। द्वेष्य आत्मनः अप्रियः। बन्धुः सम्बन्धी इति एतेषु साधुषु शास्त्रानुवर्तिषु अपि च पापेषु प्रतिषिद्धकारिषु सर्वेषु एतेषु समबुद्धिः कः किंकर्मा इति अव्यापृतबुद्धिः इत्यर्थः। विशिष्यते विमुच्यते इति वा पाठान्तरम्। योगारूढानां सर्वेषाम् अयम् उत्तम इत्यर्थः॥ 9॥
“सुहृत्” शब्दसे लेकर आधा श्लोक एक पद है।
“सुहृत्”—प्रत्युपकार न चाहकर उपकार करनेवाला, “मित्र”—प्रेमी, “अरि”—शत्रु, “उदासीन”—पक्षपातरहित, “मध्यस्थ”—जो परस्पर विरोध करनेवाले दोनोंका हितैषी हो, “द्वेष्य”—अपना अप्रिय और “बन्धु”—अपना कुटुम्बी, इन सबमें तथा शास्त्रानुसार चलनेवाले श्रेष्ठ पुरुषोंमें और निषिद्ध कर्म करनेवाले पापियोंमें भी जो समबुद्धिवाला है, इन सबमें कौन कैसा क्या कर रहा है ऐसे विचारमें जिसकी बुद्धि नहीं लगती है वह श्रेष्ठ है। अर्थात् ऐसा योगी सब योगारूढ़ पुरुषोंमें उत्तम है। यहाँ “विशिष्यते” के स्थानमें “विमुच्यते” (मुक्त हो जाता है) ऐसा पाठान्तर भी है॥ 9॥
अत एवम् उत्तमफलप्राप्तये—
अतः ऐसे उत्तम फलकी प्राप्तिके लिये—
योगी ध्यायी युञ्जीत समादध्यात् सततं सर्वदा आत्मानम् अन्तःकरणं रहसि एकान्ते गिरिगुहादौ स्थितः सन् एकाकी असहायः।
रहसि स्थित एकाकी च इति विशेषणात् सन्न्यासं कृत्वा इत्यर्थः।
यतचित्तात्मा चित्तम् अन्तःकरणम् आत्मा देहः च संयतौ यस्य स यतचित्तात्मा निराशीः वीततृष्णः अपरिग्रहः च परिग्रहरहितः। संन्यासित्वे अपि त्यक्तसर्वपरिग्रहः सन् युञ्जीत इत्यर्थः॥ 10॥
ध्यान करनेवाला योगी अकेला—किसीको साथ न लेकर पहाड़की गुफा आदि एकान्त स्थानमें स्थित हुआ, निरन्तर अपने अन्तःकरणको ध्यानमें स्थिर किया करे।
“एकान्त स्थानमें स्थित हुआ” और “अकेला” इन विशेषणोंसे यह भाव पाया जाता है कि संन्यास ग्रहण करके योगका साधन करे।
जिसका चित्त—अन्तःकरण और आत्मा—शरीर (दोनों) जीते हुए हैं ऐसा यतचित्तात्मा, निराशी— तृष्णाहीन और संग्रहरहित होकर अर्थात् संन्यासी होनेपर भी सब संग्रहका त्याग करके योगका अभ्यास करे॥ 10॥
अथ इदानीं योगं युञ्जत आसनाहारविहारादीनां योगसाधनत्वेन नियमो वक्तव्यः प्राप्तयोगलक्षणं यत्फलादि च इति अत आरभ्यते। तत्र आसनम् एव तावत् प्रथमम् उच्यते—
योगाभ्यास करनेवालेके लिये योगके साधनरूप आसन, आहार और विहार आदिका नियम बतलाना उचित है एवं योगको प्राप्त हुए पुरुषका लक्षण और उसका फल आदि भी कहना चाहिये। इसलिये अब (यह प्रकरण) आरम्भ किया जाता है। उसमें पहले आसनका ही वर्णन करते हैं—
शुचौ शुद्धे विविक्ते स्वभावतः संस्कारतो वा देशे स्थाने, प्रतिष्ठाप्य स्थिरम् अचलम् आत्मन आसनं न अत्युच्छ्रितं न अतीव उच्छ्रितं न अपि अतिनीचं तत् च चैलाजिनकुशोत्तरम्, चैलम् अजिनं कुशाः च उत्तरे यस्मिन् आसने तद् आसनं चैलाजिनकुशोत्तरं पाठक्रमाद् विपरीतः अत्र क्रमः चैलादीनाम्॥ 11॥
शुद्ध स्थानमें अर्थात् जो स्वभावसे अथवा झाड़ने-बुहारने आदि संस्कारोंसे साफ किया हुआ पवित्र और एकान्त स्थान हो, उसमें अपने आसनको जो न अति ऊँचा हो और न अति नीचा हो और जिसपर क्रमसे वस्त्र, मृगचर्म और कुशा बिछाये गये हों, अविचलभावसे स्थापन करके। यहाँ पाठक्रमसे उन वस्त्रादिका क्रम उलटा समझना चाहिये अर्थात् पहले कुशा, उसपर मृगचर्म और फिर उसपर वस्त्र बिछावे॥ 11॥
प्रतिष्ठाप्य किम्—
(आसनको) स्थिर स्थापन करके क्या करे (सो कहते हैं)—
तत्र तस्मिन् आसने उपविश्य योगं युञ्ज्यात्।
कथम्, सर्वविषयेभ्य उपसंहृत्य एकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः चित्तं च इन्द्रियाणि च चित्तेन्द्रियाणि तेषां क्रियाः संयता तस्य स यतचित्तेन्द्रियक्रियः।
स किमर्थं योगं युञ्ज्याद् इति आह—
आत्मविशुद्धये अन्तःकरणस्य विशुद्ध्यर्थम् इति एतत्॥ 12॥
उस आसनपर बैठकर योगका साधन करे।
कैसे करे? मनको सब विषयोंसे हटाकर एकाग्र करके तथा यतचित्तेन्द्रियक्रिय यानी चित्त और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको जीतनेवाला होकर योगका साधन करे। जिसने मन और इन्द्रियोंकी क्रियाओंका संयम कर लिया हो उसको यतचित्तेन्द्रियक्रिय कहते हैं।
वह किसलिये योगका साधन करे? सो कहते हैं—
आत्मशुद्धिके लिये अर्थात् अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये करे॥ 12॥
बाह्यम् आसनम् उक्तम् अधुना शरीरधारणं कथम् इति उच्यते—
बाह्य आसनका वर्णन किया, अब शरीरको कैसे रखना चाहिये? सो कहते हैं—
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समं कायशिरोग्रीवं कायः च शिरः च ग्रीवा च कायशिरोग्रीवं तत् समं धारयन् अचलं च समं धारयतः चलनं सम्भवति अतो विशिनष्टि अचलम् इति। स्थिरः स्थिरो भूत्वा इत्यर्थः।
स्वं नासिकाग्रं सम्प्रेक्ष्य सम्यक् प्रेक्षणं दर्शनं कृत्वा इव।
इति इवशब्दो लुप्तो द्रष्टव्यः । न हि स्वनासिकाग्रसम्प्रेक्षणम् इह विधित्सितम्।
किं तर्हि चक्षुषोः दृष्टिसन्निपातः।
स च अन्तःकरणसमाधानापेक्षो विविक्षितः स्वनासिकाग्रसम्प्रेक्षणम् एव चेद् विवक्षितं मनः तत्र एव समाधीयते न आत्मनि।
आत्मनि हि मनसः समाधानं वक्ष्यति “आत्मसंस्थं मनः कृत्वा” इति। तस्माद् इवशब्दलोपेन अक्ष्णोः दृष्टिसन्निपात एव सम्प्रेक्ष्य इति उच्यते।
दिशः च अनवलोकयन् दिशां च अवलोकनम् अन्तरा अकुर्वन् इति एतत्॥ 13॥
काया, सिर और गरदनको सम और अचल भावसे धारण करके स्थिर होकर बैठे। समानभावसे धारण किये हुए कायादिका भी चलन होना सम्भव है, इसलिये “अचलम्” यह विशेषण दिया गया है।
तथा अपनी नासिकाके अग्रभागको देखता हुआ यानी मानो वह उधर ही अच्छी तरह देख रहा है। इस प्रकार दृष्टि करके।
यहाँ “संप्रेक्ष्य” के साथ “इव” शब्द लुप्त समझना चाहिये; क्योंकि यहाँ अपनी नासिकाके अग्रभागको देखनेका विधान करना अभिमत नहीं है।
तो क्या है? बस, नेत्रोंकी दृष्टिको (विषयोंकी ओरसे रोककर) वहाँ स्थापन करना ही इष्ट है।
वह (इस तरह दृष्टिस्थापना करना) भी अन्तःकरणके समाधानके लिये आवश्यक होनेके कारण भी अभीष्ट है। क्योंकि यदि अपनी नासिकाके अग्रभागको देखना ही विधेय माना जाय तो फिर मन वहीं स्थित होगा, आत्मामें नहीं।
परंतु (आगे चलकर) “आत्मसंस्थं मनः कृत्वा” इस पदसे आत्मामें ही मनको स्थित करना बतलायेंगे। इसलिये “इव” शब्दके लोपद्वारा नेत्रोंकी दृष्टिको नासिकाके अग्रभागपर लगाना ही “सम्प्रेक्ष्य” इस पदसे कहा गया।
इस प्रकार (नेत्रोंकी दृष्टिको नासिकाके अग्रभाग-पर लगाकर) तथा अन्य दिशाओंको न देखता हुआ अर्थात् बीच-बीचमें दिशाओंकी ओर दृष्टि न डालता हुआ॥ 13॥
किं च—
तथा—
प्रशान्तात्मा प्रकर्षेण शान्त आत्मा अन्तःकरणं यस्य सः अयं प्रशान्तात्मा विगतभीः विगतभयो ब्रह्मचारिव्रते स्थितो ब्रह्मचारिणो व्रतं ब्रह्मचर्यं गुरुशुश्रूषाभिक्षाभुक्त्यादि तस्मिन् स्थितः तदनुष्ठाता भवेद् इत्यर्थः। किं च मनः संयम्य मनसो वृत्तिः उपसंहृत्य इति एतद् मच्चित्तो मयि परमेश्वरे चित्तं यस्य सः अयं मच्चित्तो युक्तः समाहितः सन् आसीत उपविशेद् मत्परः अहं परो यस्य सः अयं मत्परः।
भवति कश्चिद् रागी स्त्रीचित्तो न तु स्त्रियम् एव परत्वेन गृह्णाति, किं तर्हि राजानं महादेवं वा अयं तु मच्चित्तो मत्परः च॥ 14॥
प्रशान्तात्मा—अच्छी प्रकारसे शान्त हुए अन्तः-करणवाला, विगतभी—निर्भय और ब्रह्मचारियोंके व्रतमें स्थित हुआ अर्थात् ब्रह्मचर्य, गुरुसेवा, भिक्षा-भोजन आदि जो ब्रह्मचारीके व्रत हैं उनमें स्थित हुआ उनका अनुष्ठान करनेवाला होकर और मनका संयम करके अर्थात् मनकी वृत्तियोंका उपसंहार करके तथा मुझमें चित्तवाला अर्थात् मुझ परमेश्वरमें ही जिसका चित्त लग गया है ऐसा मच्चित्त होकर तथा समाहितचित्त होकर और मुझे ही सर्वश्रेष्ठ माननेवाला, अर्थात् मैं ही जिसके मतमें सबसे श्रेष्ठ हूँ, ऐसा होकर बैठे।
कोई स्त्रीप्रेमी स्त्रीमें चित्तवाला हो सकता है; परंतु वह स्त्रीको सबसे श्रेष्ठ नहीं समझता। तो किसको समझता है? वह राजाको या महादेवको स्त्रीकी अपेक्षा श्रेष्ठ समझता है? परंतु यह साधक तो चित्त भी मुझमें ही रखता है और मुझे ही सबसे अधिक श्रेष्ठ भी समझता है॥ 14॥
अथ इदानीं योगफलम् उच्चते—
अब योगका फल कहा जाता है—
युञ्जन् समाधानं कुर्वन् एवं यथोक्तेन विधानेन सदा आत्मानं योगी नियतमानसो नियतं संयतं मानसं मनो यस्य सः अयं नियतमानसः, शान्तिम् उपरतिं निर्वाणपरमां निर्वाणं मोक्षः तत्परमा निष्ठा यस्याः शान्तेः सा निर्वाणपरमा तां निर्वाणपरमां मत्संस्थां मदधीनाम् अधिगच्छति प्राप्नोति॥ 15॥
नियत मनवाला योगी अर्थात् जिसका मन जीता हुआ है ऐसा योगी उपर्युक्त प्रकारसे सदा आत्माका समाधान करता हुआ अर्थात् मनको परमात्मामें स्थिर करता-करता मुझमें स्थित निर्वाणदायिनी शान्तिको—उपरतिको पाता है अर्थात् जिस शान्तिकी परमनिष्ठा—अन्तिम स्थिति मोक्ष है एवं जो मुझमें स्थित है—मेरे अधीन है ऐसी शान्तिको प्राप्त होता है॥ 15॥
इदानीं योगिन आहारादिनियम उच्यते—
अब योगीके आहार आदिके नियम कहे जाते हैं—
न अत्यश्नत आत्मसम्मितम् अन्नपरिमाणम् अतीत्य अश्नतः अत्यश्नतो न योगः अस्ति, न च एकान्तम् अनश्नतो योगः अस्ति “यदु ह वा आत्मसम्मितमन्नं तदवति तन्न हिनस्ति” “यद्भूयो हिनस्ति तद्यत्कनीयो न तदवति” (शतपथ) इति श्रुतेः।
तस्माद् योगी न आत्मसम्मिताद् अन्नाद् अधिकं न्यूनं वा अश्नीयात्।
अथ वा योगिनो योगशास्त्रे परिपठिताद् अन्नपरिमाणाद् अतिमात्रम् अश्नतो योगो न अस्ति।
उक्तं
हि
“अर्धमशनस्य
सव्यञ्जनस्य तृतीयमुदकस्य तु। वायोः सञ्चरणार्थं तु चतुर्थ-मवशेषयेत्॥” इत्यादि परिमाणम्।
तथा न च अतिस्वप्नशीलस्य योगो भवति न एव च अतिमात्रं जाग्रतो योगो भवति च अर्जुन॥ 16॥
अधिक खानेवालेका अर्थात् अपनी शक्तिका उल्लङ्घन करके शक्तिसे अधिक भोजन करनेवालेका योग सिद्ध नहीं होता और बिलकुल न खानेवालेका भी योग सिद्ध नहीं होता; क्योंकि यह श्रुति है कि “जो अपने शरीरकी शक्तिके अनुसार अन्न खाया जाता है वह रक्षा करता है, वह कष्ट नहीं देता (बिगाड़ नहीं करता); जो उससे अधिक होता है वह कष्ट देता है और जो प्रमाणसे कम होता है वह रक्षा नहीं करता।”
इसलिये योगीको चाहिये कि अपने लिये जितना उपयुक्त हो उससे कम या ज्यादा अन्न न खाय।
अथवा यह अर्थ समझो कि योगीके लिये योगशास्त्रमें बतलाया हुआ जो अन्नका परिमाण है उससे अधिक खानेवालेका योग सिद्ध नहीं होता।
वहाँ यह परिमाण बतलाया है कि “पेटका आधा भाग अर्थात् दो हिस्से तो शाक-पात आदि व्यञ्जनोंसहित भोजनसे और तीसरा हिस्सा जलसे पूर्ण करना चाहिये तथा चौथा वायुके आने-जानेके लिये खाली रखना चाहिये” इत्यादि।
तथा हे अर्जुन! न तो बहुत सोनेवालेका ही योग सिद्ध होता है और न अधिक जागनेवालेको ही योग-सिद्धि प्राप्त होती है॥ 16॥
कथं पुनः योगो भवति इति उच्यते—
तो फिर योग कैसे सिद्ध होता है? सो कहते हैं—
युक्ताहारविहारस्य आह्रियते इति आहारः अन्नं विहरणं विहारः पादक्रमः तौ युक्तौ नियतपरिमाणौ यस्य तथा युक्तचेष्टस्य युक्ता नियता चेष्टा यस्य कर्मसु तथा युक्तस्वप्नाव-बोधस्य युक्तौ स्वप्नः च अवबोधः च तौ नियतकालौ यस्य, तस्य युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु युक्तस्वप्नावबोधस्य योगिनो योगो भवति दुःखहा।
दुःखानि सर्वाणि हन्ति इति दुःखहा। सर्व-संसारदुःखक्षयकृद् योगो भवति इत्यर्थः॥ 17॥
जो खाया जाय वह आहार अर्थात् अन्न और चलना-फिरनारूप जो पैरोंकी क्रिया है वह विहार, यह दोनों जिसके नियमित परिमाणसे होते हैं और कर्मोंमें जिसकी चेष्टा नियमित परिमाणसे होती है, जिसका सोना और जागना नियत-कालमें यथायोग्य होता है, ऐसे यथायोग्य आहार-विहारवाले और कर्मोंमें यथायोग्य चेष्टा करनेवाले तथा यथायोग्य सोने और जागनेवाले योगीका दुःखनाशक योग सिद्ध हो जाता है।
सब दुःखोंको हरनेवालेका नाम “दुःखहा” है। ऐसा सब संसाररूप दुःखोंका नाश करनेवाला योग (उस योगीका) सिद्ध होता है यह अभिप्राय है॥ 17॥
अथ अधुना कदा युक्तो भवति इति उच्यते—
अब यह बतलाते हैं कि (साधक पुरुष) कब युक्त (समाधिस्थ) हो जाता है—
यदा विनियतं चित्तं विशेषेण नियतं संयतम् एकाग्रताम् आपन्नं चित्तम्, हित्वा बाह्यचिन्ताम् आत्मनि एव केवले अवतिष्ठते स्वात्मनि स्थितिं लभते इत्यर्थः।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो निर्गता दृष्टादृष्ट-विषयेभ्यः स्पृहा तृष्णा यस्य योगिनः स युक्तः समाहित इति उच्यते तदा तस्मिन् काले॥ 18॥
वशमें किया हुआ चित्त यानी विशेषरूपसे एकाग्रताको प्राप्त हुआ चित्त, जब बाह्य चिन्तनको छोड़कर केवल आत्मामें ही स्थित होता है—अपने स्वरूपमें स्थिति लाभ करता है।
तब—उस समय सब भोगोंकी लालसासे रहित हुआ योगी अर्थात् दृष्ट और अदृष्ट समस्त भोगोंसे जिसकी तृष्णा नष्ट हो गयी है ऐसा योगी युक्त है—समाधिस्थ (परमात्मामें स्थितिवाला) है, ऐसे कहा जाता है॥ 18॥
तस्य योगिनः समाहितं यत् चित्तं तस्य उपमा उच्यते—
उस योगीका जो समाधिस्थ चित्त है उसकी उपमा कही जाती है—
यथा दीपः प्रदीपो निवातस्थो निवाते वातवर्जिते देशे स्थितो न इङ्गते न चलति, सा उपमा उपमीयते अनया इति उपमा योगज्ञैः चित्तप्रचारदर्शिभिः स्मृता चिन्तिता योगिनो यतचित्तस्य संयतान्तःकरणस्य युञ्जतो योगम् अनुतिष्ठत आत्मनः समाधिम् अनुतिष्ठत इत्यर्थः॥ 19॥
जैसे वायुरहित स्थानमें रखा हुआ दीपक विचलित नहीं होता, वही उपमा आत्मध्यानका अभ्यास करनेवाले समाधिमें स्थित हुए योगीके जीते हुए अन्तःकरणकी, चित्त-गतिको प्रत्यक्ष देखनेवाले योगवेत्ता पुरुषोंने मानी है। जिससे किसीकी समानता की जाय उसका नाम उपमा है॥ 19॥
एवं
योगाभ्यासबलाद्
एकाग्रीभूतं निवातप्रदीपकल्पं सत्—
इस प्रकार योगाभ्यासके बलसे वायुरहित स्थानमें रखे हुए दीपककी भाँति एकाग्र किया हुआ—
यत्र यस्मिन् काले उपरमते चित्तम् उपरतिं गच्छति निरुद्धं सर्वतो निवारितप्रचारं योगसेवया योगानुष्ठानेन, यत्र च एव यस्मिन् च काले आत्मना समाधिपरिशुद्धेन अन्तःकरणेन आत्मा परं चैतन्यज्योतिःस्वरूपं पश्यन् उपलभमानः स्वे एव आत्मनि तुष्यति तुष्टिं भजते॥ 20॥
योगसाधनसे निरुद्ध किया हुआ, सब ओरसे चञ्चलतारहित किया हुआ, चित्त—जिस समय उपरत होता है—उपरतिको प्राप्त होता है। तथा जिस कालमें समाधिद्वारा अति निर्मल (स्वच्छ) हुए अन्तःकरणसे परम चैतन्य ज्योतिःस्वरूप आत्माका साक्षात् करता हुआ वह अपने-आपमें ही संतुष्ट हो जाता है—तृप्ति लाभ कर लेता है॥ 20॥
किं च—
तथा—
सुखम् आत्यन्तिकम् अत्यन्तम् एव भवति इति आत्यन्तिकम् अनन्तम् इत्यर्थः। यत् तद् बुद्धिग्राह्यं बुद्ध्या एव इन्द्रियनिरपेक्षया गृह्यते इति बुद्धिग्राह्यम् अतीन्द्रियम् इन्द्रियगोचरातीतम् अविषयजनितम् इत्यर्थः। वेत्ति तद् ईदृशं सुखम् अनुभवति यत्र यस्मिन् काले, न च एव अयं विद्वान् आत्मस्वरूपे स्थितः तस्माद् न एव चलति तत्त्वतः तत्त्वस्वरूपाद् न प्रच्यवते इत्यर्थः॥ 21॥
जो सुख अत्यन्त यानी अन्तसे रहित—अनन्त है, जो इन्द्रियोंकी कुछ भी अपेक्षा न करके केवल बुद्धिसे ही ग्रहण किया जानेयोग्य है, जो इन्द्रियोंकी पहुँचसे अतीत है यानी जो विषयजनित सुख नहीं है, ऐसे सुखको यह योगी जिस कालमें अनुभव कर लेता है, जिस कालमें अपने स्वरूपमें स्थित हुआ यह ज्ञानी उस तत्त्वसे—वास्तविक स्वरूपसे चलायमान नहीं होता—विचलित नहीं होता॥ 21॥
किं च—
तथा—
यं लब्ध्वा यम् आत्मलाभं लब्ध्वा प्राप्य च अपरम् अन्यल्लाभान्तरं ततः अधिकम् अस्ति इति न मन्यते चिन्तयति। किं च यस्मिन् आत्मतत्त्वे स्थितो दुःखेन शस्त्रनिपातादिलक्षणेन गुरुणा महता अपि न विचाल्यते॥ 22॥
जिस आत्मप्राप्तिरूप लाभको प्राप्त होकर उससे अधिक कोई दूसरा लाभ है ऐसा नहीं मानता, दूसरे लाभको स्मरण भी नहीं करता। एवं जिस आत्मतत्त्वमें स्थित हुआ योगी शस्त्राघात आदि बड़े भारी दुःखोंद्वारा भी विचलित नहीं किया जा सकता॥ 22॥
“यत्रोपरमते”
इत्याद्यारभ्य
यावद्भिः विशेषणैः विशिष्ट आत्मावस्थाविशेषो योग उक्तः—
“यत्रोपरमते” से लेकर यहाँतक समस्त विशेषणों-से विशिष्ट आत्माका अवस्थाविशेषरूप जो योग कहा गया है—
तं विद्याद् विजानीयाद् दुःखसंयोगवियोगम्, दुःखैः संयोगो दुःखसंयोगः तेन वियोगो दुःखसंयोगवियोगः तं दुःखसंयोगवियोगं योग इति एव सञ्ज्ञितं विपरीतलक्षणेन विद्याद् विजानीयाद् इत्यर्थः।
योगफलम् उपसंहृत्य पुनः अन्वारम्भेण योगस्य कर्तव्यता उच्यते, निश्चयानिर्वेदयोः योगसाधनत्वविधानार्थम्।
स यथोक्तफलो योगो निश्चयेन अध्यवसायेन योक्तव्यः अनिर्विण्णचेतसा।
न निर्विण्णम् अनिर्विण्णं किं तत् चेतः तेन निर्वेदरहितेन चेतसा चित्तेन इत्यर्थः॥ 23॥
उस योग नामक अवस्थाको दुःखोंके संयोगका वियोग समझना चाहिये। अभिप्राय यह कि दुःखोंसे संयोग होना “दुःखसंयोग” है, उससे वियोग हो जाना “दुःखोंके संयोगका वियोग” है, उस “दुःख-संयोग-वियोग” को “योग” ऐसे विपरीत नामसे कहा हुआ समझना चाहिये।
योग-फलका उपसंहार करके अब दृढ़ निश्चयको और योगविषयक रुचिको भी योगका साधन बतानेके लिये पुनः प्रकारान्तरसे योगकी कर्तव्यता बतायी जाती है—
वह उपर्युक्त फलवाला योग बिना उकताये हुए चित्तसे निश्चयपूर्वक करना चाहिये।
जिस चित्तमें निर्विण्णता (उद्वेग) न हो वह अनिर्विण्णचित्त है, ऐसे अनिर्विण्ण (न उकताये हुए) चित्तसे निश्चयपूर्वक योगका साधन करना चाहिये, यह अभिप्राय है॥ 23॥
किं च—
तथा—
सङ्कल्पप्रभवान् सङ्कल्पः प्रभवो येषां कामानां ते सङ्कल्पप्रभवाः कामाः तान् त्यक्त्वा परित्यज्य सर्वान् अशेषतो निर्लेपेन। किं च मनसा एव विवेकयुक्तेन इन्द्रियग्रामम् इन्द्रियसमुदायं विनियम्य नियमनं कृत्वा समन्ततः समन्तात्॥ 24॥
संकल्पसे उत्पन्न हुई समस्त कामनाओंको निःशेषतासे अर्थात् लेशमात्र भी शेष न रखते हुए निर्लेपभावसे छोड़कर, एवं विवेकयुक्त मनसे इन्द्रियोंके समुदायको सब ओरसे रोककर अर्थात् उनका संयम करके॥ 24॥
शनैः शनैः न सहसा उपरमेद् उपरतिं कुर्यात्।
कया, बुद्ध्या। किंविशिष्टया धृतिगृहीतया धृत्या धैर्येण गृहीतया धृतिगृहीतया धैर्येण युक्तया इत्यर्थः।
आत्मसंस्थम् आत्मनि संस्थितम् आत्मा एव सर्वं न ततः अन्यत् किञ्चिद् अस्ति इति एवम् आत्मसंस्थं मनः कृत्वा, न किञ्चिद् अपि चिन्तयेद् एष योगस्य परमो विधिः॥ 25॥
शनैः-शनैः अर्थात् सहसा नहीं, क्रम-क्रमसे उपरतिको प्राप्त करे।
किसके द्वारा? बुद्धिद्वारा । कैसी बुद्धिद्वारा? धैर्यसे धारण की हुई अर्थात् धैर्ययुक्त बुद्धिद्वारा।
तथा मनको आत्मामें स्थित करके अर्थात् “यह सब कुछ आत्मा ही है, उससे अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है” इस प्रकार मनको आत्मामें अचल करके अन्य किसी वस्तुका भी चिन्तन न करे। यह योगकी परम श्रेष्ठ विधि है॥ 25॥
तत्र एवम् आत्मसंस्थं मनः कर्तुं प्रवृत्तो योगी—
इस प्रकार मनको आत्मामें स्थित करनेमें लगा हुआ योगी—
यतो यतो यस्माद् यस्माद् निमित्तात् शब्दादेः निश्चरति निर्गच्छति स्वभावदोषाद् मनः चञ्चलम् अत्यर्थं चलम् अत एव अस्थिरं ततः ततः तस्मात् तस्मात् शब्दादेः निमित्ताद् नियम्य तत् तद् निमित्तं याथात्म्यनिरूपणेन आभासीकृत्य वैराग्यभावनया च एतद् मन आत्मनि एव वशं नयेद् आत्मवश्यताम् आपादयेत्। एवं योगाभ्यासबलाद्
योगिन
आत्मनि
एव प्रशाम्यति मनः॥ 26॥
स्वाभाविक दोषके कारण जो अत्यन्त चञ्चल है तथा इसीलिये जो अस्थिर है ऐसा मन जिस-जिस शब्दादि विषयके निमित्तसे विचलित होता है—बाहर जाता है, उस-उस शब्दादि विषयरूप निमित्तसे (इस मनको) रोककर एवं उस-उस विषयरूप निमित्तको यथार्थ तत्त्वनिरूपणद्वारा आभासमात्र दिखाकर, वैराग्यकी भावनासे इस मनका (बारंबार) आत्मामें ही निरोध करे अर्थात् इसे आत्माके ही वशीभूत किया करे। इस प्रकार योगाभ्यासके बलसे योगीका मन आत्मामें ही शान्त हो जाता है॥ 26॥
प्रशान्तमनसं प्रशान्तं मनो यस्य स प्रशान्तमनाः तं प्रशान्तमनसं हि एनं योगिनं सुखम् उत्तमम् निरतिशयम् उपैति उपगच्छति। शान्तरजसं प्रक्षीणमोहादिक्लेशरजसम् इत्यर्थः। ब्रह्मभूतं जीवन्मुक्तं ब्रह्म एव सर्वम् इति एवं निश्चयवन्तं ब्रह्मभूतम् अकल्मषम् अधर्मादिवर्जितम्॥ 27॥
क्योंकि जिसका मन भलीभाँति शान्त है, जिसका रजोगुण शान्त हो गया है अर्थात् जिसका मोहादि क्लेशरूप रजोगुण अच्छी प्रकार क्षीण हो चुका है, जो ब्रह्मरूप— जीवन्मुक्त अर्थात् “यह सब कुछ ब्रह्म ही है” ऐसे निश्चयवाला है एवं जो अधर्मादि दोषोंसे रहित है, उस योगीको निरतिशय उत्तम सुख प्राप्त होता है॥ 27॥
युञ्जन् एवं यथोक्तेन क्रमेण योगी योगान्त-रायवर्जितः सदा आत्मानं विगतकल्मषो विगत-पापः सुखेन अनायासेन ब्रह्मसंस्पर्शं ब्रह्मणा परेण संस्पर्शो यस्य तद् ब्रह्मसंस्पर्शं सुखम् अत्यन्तम् अन्तम् अतीत्य वर्तते इति अत्यन्तम् उत्कृष्टं निरतिशयम् अश्नुते व्याप्नोति॥ 28॥
योगविषयक विघ्नोंसे रहित हुआ विगतकल्मषनिष्पाप योगी उपर्युक्त क्रमसे सदा चित्तको समाहित करता हुआ, अनायास ही ब्रह्मप्राप्तिरूप निरतिशय—उत्कृष्ट सुखका अनुभव करता है अर्थात् जिसका परब्रह्मसे सम्बन्ध है और जो अन्तसे अतीत—अनन्त है ऐसे परम सुखको प्राप्त हो जाता है॥ 28॥
इदानीं योगस्य यत् फलं ब्रह्मैकत्वदर्शनं सर्वसंसारविच्छेदकारणं तत् प्रदर्श्यते—
अब, योगका फल जो कि समस्त संसारका विच्छेद करा देनेवाला ब्रह्मके साथ एकताका देखना है वह दिखलाया जाता है—
सर्वभूतस्थं सर्वेषु भूतेषु स्थितं स्वम् आत्मानं सर्वभूतानि च आत्मनि ब्रह्मादीनि स्तम्बपर्यन्तानि च सर्वभूतानि आत्मनि एकतां गतानि ईक्षते पश्यति योगयुक्तात्मा समाहितान्तःकरणः सर्वत्र-समदर्शनः सर्वेषु ब्रह्मादिस्थावरान्तेषु विषमेषु सर्वभूतेषु समं निर्विशेषं ब्रह्मात्मैकत्वविषयं दर्शनं ज्ञानं यस्य स सर्वत्रसमदर्शनः॥ 29॥
समाहित अन्तःकरणसे युक्त और सब जगह समदृष्टिवाला योगी—जिसका ब्रह्म और आत्माकी एकताको विषय करनेवाला ज्ञान, ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त समस्त विभक्त प्राणियोंमें भेदभावसे रहित—सम हो चुका है, ऐसा पुरुष—अपने आत्माको सब भूतोंमें स्थित (देखता है) और आत्मामें सब भूतोंको देखता है। अर्थात् ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त समस्त प्राणियोंको आत्मामें एकताको प्राप्त हुए देखता है॥ 29॥
एतस्य आत्मैकत्वदर्शनस्य फलम् उच्यते—
इस आत्माकी एकताके दर्शनका फल कहा जाता है—
यो मां पश्यति वासुदेवं सर्वस्य आत्मानं सर्वत्र सर्वेषु भूतेषु सर्वं च ब्रह्मादिभूतजातं मयि सर्वात्मनि पश्यति, तस्य एवम् आत्मैकत्वदर्शिनः अहम् ईश्वरो न प्रणश्यामि न परोक्षतां गमिष्यामि स च मे न प्रणश्यति स च विद्वान् मम वासुदेवस्य न प्रणश्यति न परोक्षीभवति। तस्य च मम च एकात्मकत्वात्।
स्वात्मा हि नाम आत्मनः प्रिय एव भवति यस्मात् च अहम् एव सर्वात्मैकत्वदर्शी॥ 30॥
जो सबके आत्मा मुझ वासुदेवको सब जगह अर्थात् सब भूतोंमें (व्यापक) देखता है और ब्रह्मा आदि समस्त प्राणियोंको मुझ सर्वात्मा (परमेश्वर)-में देखता है, इस प्रकार आत्माकी एकताको देखनेवाले उस ज्ञानीके लिये मैं ईश्वर कभी अदृश्य नहीं होता अर्थात् कभी अप्रत्यक्ष नहीं होता और वह ज्ञानी भी कभी मुझ वासुदेवसे अदृश्य—परोक्ष नहीं होता; क्योंकि उसका और मेरा स्वरूप एक ही है।
निःसंदेह अपना आत्मा अपना प्रिय ही होता है और जो सर्वात्मभावसे एकताको देखनेवाला है वह मैं ही हूँ॥ 30॥
इति एतत् पूर्वश्लोकार्थं सम्यग्दर्शनम् अनूद्य तत्फलं मोक्षः अभिधीयते। सर्वथा सर्वप्रकारैः वर्तमानः अपि सम्यग्दर्शी योगी मयि वैष्णवे परमे पदे वर्तते नित्यमुक्त एव स न मोक्षं प्रति केनचित् प्रतिबध्यते इत्यर्थः॥ 31॥
(एकत्व भावमें स्थित हुआ जो पुरुष सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित मुझ वासुदेवको भजता है) इस प्रकार पहले श्लोकके अर्थरूप यथार्थ ज्ञानका इस आधे श्लोकसे अनुवाद करके उसके फलस्वरूप मोक्षका विधान करते हैं। वह पूर्ण ज्ञानी—योगी सब प्रकारसे बर्तता हुआ भी वैष्णव परमपदरूप मुझ परमेश्वरमें ही बर्तता है अर्थात् वह सदा मुक्त ही है—उसके मोक्षको कोई भी रोक नहीं सकता॥ 31॥
किं च अन्यत्—
तथा और भी कहते हैं—
आत्मौपम्येन आत्मा स्वयम् एव उपमीयते [अनया] इति उपमा तस्या उपमाया भाव औपम्यम्।
तेन आत्मौपम्येन सर्वत्र सर्वभूतेषु समं तुल्यं पश्यति यः अर्जुन।
स च किं समं पश्यति इति उच्यते—
यथा मम सुखम् इष्टं तथा सर्वप्राणिनां सुखम् अनुकूलम्। वा शब्दः चार्थे। यदि वा यत् च दुःखं मम प्रतिकूलम् अनिष्टं यथा तथा सर्वप्राणिनां दुःखम् अनिष्टं प्रतिकूलम् इति एवम् आत्मौपम्येन सुखदुःखे अनुकूलप्रतिकूले तुल्यतया सर्वभूतेषु समं पश्यति, न कस्यचित् प्रतिकूलम् आचरति अहिंसक इत्यर्थः।
य एवम् अहिंसकः सम्यग्दर्शननिष्ठः स योगी परम उत्कृष्टो मतः अभिप्रेतः सर्वयोगिनां मध्ये॥ 32॥
आत्मा अर्थात् स्वयं आप और जिसके द्वारा उपमित किया जाय वह उपमा, उस उपमाके भावको (सादृश्यको) औपम्य कहते हैं।
हे अर्जुन! उस आत्मौपम्यद्वारा अर्थात् अपनी सदृशतासे जो योगी सर्वत्र—सब भूतोंमें तुल्य देखता है।
वह तुल्य क्या देखता है? सो कहते हैं—
जैसे मुझे सुख प्रिय है वैसे ही सभी प्राणियोंको सुख अनुकूल है और जैसे दुःख मुझे अप्रिय— प्रतिकूल है वैसे ही वह सब प्राणियोंको अप्रिय— प्रतिकूल है। इस प्रकार जो सब प्राणियोंमें अपने समान ही सुख और दुःखको तुल्यभावसे अनुकूल और प्रतिकूल देखता है, किसीके भी प्रतिकूल आचरण नहीं करता, यानी अहिंसक है। यहाँ “वा” शब्दका प्रयोग “च” के अर्थमें हुआ है।
जो इस प्रकारका अहिंसक पुरुष पूर्ण ज्ञानमें स्थित है वह योगी अन्य सब योगियोंमें परम उत्कृष्ट माना जाता है॥ 32॥
एतस्य यथोक्तस्य सम्यग्दर्शनलक्षणस्य योगस्य दुःखसम्पाद्यताम् आलक्ष्य शुश्रूषुः ध्रुवं तत्प्राप्त्युपायम्—
इस उपर्युक्त पूर्णज्ञानरूप योगको कठिनतासे सम्पादन किया जानेयोग्य समझकर उसकी प्राप्तिके निश्चित उपायको सुननेकी इच्छावाले अर्जुन बोले—
यः अयं योगः त्वया प्रोक्तः साम्येन समत्वेन हे मधुसूदन एतस्य योगस्य अहं न पश्यामि न उपलभे चञ्चलत्वाद् मनसः किं स्थिराम् अचलां स्थितिं प्रसिद्धम् एतत्॥ 33॥
हे मधुसूदन! आपने जो यह समत्वभावरूप योग कहा है, मनकी चञ्चलताके कारण मैं इस योगकी अचल स्थिति नहीं देखता हूँ—यह बात प्रसिद्ध है॥ 33॥
चञ्चलं हि मनः कृष्ण इति कृषतेः विलेखनार्थस्य रूपं भक्तजनपापादिदोषाकर्षणात् कृष्णः।
न केवलम् अत्यर्थं चञ्चलं प्रमाथि च प्रमथनशीलं प्रमथ्नाति शरीरम् इन्द्रियाणि च विक्षिपति परवशीकरोति।
किं च बलवद् न केनचिद् नियन्तुं शक्यम् किं च दृढं तन्तुनागवद् अच्छेद्यम्।
तस्य एवम्भूतस्य मनसः अहं निग्रहं निरोधं मन्ये वायोः इव। यथा वायोः दुष्करो निग्रहः ततः अपि मनसो दुष्करं मन्ये इति अभिप्रायः॥ 34॥
क्योंकि हे कृष्ण! यह मन बड़ा ही चञ्चल है। विलेखनके अर्थमें जो “कृष” धातु है उसका रूप “कृष्ण” है। भक्तजनोंके पापादि दोषोंको निवृत्त करनेवाले होनेके कारण भगवान्का नाम “कृष्ण” है।
यह मन केवल अत्यन्त चञ्चल है इतना ही नहीं, किंतु प्रमथनशील भी है अर्थात् शरीरको क्षुब्ध और इन्द्रियोंको विक्षिप्त यानी परवश कर देता है।
तथा बड़ा बलवान् है—किसीसे भी वशमें किया जाना अशक्य है। साथ ही यह बड़ा दृढ़ भी है। अर्थात् तन्तुनाग (गोह) नामक जलचर जीवकी भाँति अच्छेद्य है।
ऐसे लक्षणोंवाले इस मनका विरोध करना मैं वायुकी भाँति दुष्कर मानता हूँ। अभिप्राय यह कि जैसे वायुका रोकना दुष्कर है, उससे भी अधिक दुष्कर मैं मनका रोकना मानता हूँ॥ 34॥
एवम् एतद् यथा ब्रवीषि—
श्रीभगवान् बोले कि जैसे तू कहता है यह ठीक ऐसा ही है—
असंशयं न अस्ति संशयो मनो दुर्निग्रहं चलम् इत्यत्र हे महाबाहो। किन्तु अभ्यासेन तु अभ्यासो नाम चित्तभूमौ कस्याञ्चित् समानप्रत्ययावृत्तिः चित्तस्य।
वैराग्यं
नाम
दृष्टादृष्टेष्टभोगेषु दोषदर्शनाभ्यासाद् वैतृष्ण्यं तेन च वैराग्येण गृह्यते विक्षेपरूपः प्रचारः चित्तस्य। एवं तद् मनो गृह्यते निगृह्यते निरुध्यते इत्यर्थः॥ 35॥
हे महाबाहो! मन चञ्चल और कठिनतासे वशमें होनेवाला है इसमें (कोई) संदेह नहीं। किंतु अभ्याससे अर्थात् किसी चित्तभूमिमें एक समान वृत्तिकी बारंबार आवृत्ति करनेसे और दृष्ट तथा अदृष्ट प्रिय भोगोंमें बारंबार दोषदर्शनके अभ्यासद्वारा उत्पन्न हुए अनिच्छारूप वैराग्यसे चित्तके विक्षेपरूप प्रचार (चञ्चलता)-को रोका जा सकता है। अर्थात् इस प्रकार उस मनका निग्रह—निरोध किया जा सकता है॥ 35॥
यः पुनः असंयतात्मा तेन—
परंतु जिसका अन्तःकरण वशमें किया हुआ नहीं है उस—
असंयतात्मना अभ्यासवैराग्याभ्याम् असंयत आत्मा अन्तःकरणं यस्य सः अयम् असंयतात्मा तेन असंयतात्मना योगो दुष्प्रापो दुःखेन प्राप्यते इति मे मतिः।
यः तु पुनः वश्यात्मा अभ्यासवैराग्याभ्यां वश्यत्वम् आपादित आत्मा मनो यस्य सः अयं वश्यात्मा तेन वश्यात्मना तु यतता भूयः अपि प्रयत्नं कुर्वता शक्यः अवाप्तुं योग उपायतो यथोक्ताद् उपायात्॥ 36॥
मनको वशमें न करनेवाले पुरुषद्वारा अर्थात् जिसका अन्तःकरण अभ्यास और वैराग्यद्वारा संयत किया हुआ नहीं है ऐसे पुरुषद्वारा योग प्राप्त किया जाना कठिन है, अर्थात् उसको योग कठिनतासे प्राप्त हो सकता है—यह मेरा निश्चय है।
परंतु जो स्वाधीन मनवाला है—जिसका मन अभ्यास-वैराग्यद्वारा वशमें किया हुआ है और जो फिर भी बारंबार यत्न करता ही जाता है ऐसे पुरुषद्वारा पूर्वोक्त उपायोंसे यह योग प्राप्त किया जा सकता है॥ 36॥
तत्र योगाभ्यासाङ्गीकरणेन परलोकेहलोक-प्राप्तिनिमित्तानि कर्माणि सन्न्यस्तानि योग-सिद्धिफलं च मोक्षसाधनं सम्यग्दर्शनं न प्राप्तम् इति योगी योगमार्गाद् मरणकाले चलितचित्त इति तस्य नाशम् आशङ्क्य—
योगाभ्यासको स्वीकार करके जिसने इस लोक और परलोककी प्राप्तिके साधनरूप कर्मोंका तो त्याग कर दिया और योगसिद्धिका फल, मोक्षप्राप्तिका साधन पूर्ण ज्ञान जिसको मिला नहीं, ऐसे जिस योगीका चित्त अन्तकालमें योगमार्गसे विचलित हो गया हो, उस योगीके नाशकी आशङ्का करके अर्जुन पूछने लगे—
अयतिः अप्रयत्नवान् योगमार्गे श्रद्धया आस्तिक्यबुद्ध्या च उपेतो योगाद् अन्तकाले अपि चलितं मानसं मनो यस्य स चलितमानसो भ्रष्टस्मृतिः सः अप्राप्य योगसंसिद्धिं योगफलं सम्यग्दर्शनं कां गतिं हे कृष्ण गच्छति॥ 37॥
हे कृष्ण! जो साधक योगमार्गमें यत्न करनेवाला नहीं है, परंतु श्रद्धासे अर्थात् आस्तिक-बुद्धिसे युक्त है और अन्तकालमें जिसका मन योगसे चलायमान हो गया है वह चञ्चलचित्त भ्रष्ट स्मृतिवाला योगी योगकी सिद्धिको अर्थात् योगफलरूप पूर्ण ज्ञानको न पाकर किस गतिको प्राप्त होता है?॥ 37॥
कच्चित् किं न उभयविभ्रष्टः कर्ममार्गाद् योगमार्गात् च विभ्रष्टः सन् छिन्नाभ्रम् इव नश्यति किं वा न नश्यति अप्रतिष्ठो निराश्रयो हे महाबाहो विमूढः सन् ब्रह्मणः पथि ब्रह्मप्राप्तिमार्गे॥ 38॥
हे महाबाहो! वह आश्रयरहित और ब्रह्मप्राप्तिके मार्गमें मोहित हुआ पुरुष कर्ममार्ग और ज्ञानमार्ग दोनों ओरसे भ्रष्ट होकर क्या छिन्न-भिन्न हुए बादलकी भाँति नष्ट हो जाता है अथवा नष्ट नहीं होता?॥ 38॥
एतद् मे मम संशयं कृष्ण छेत्तुम् अपनेतुम् अर्हसि अशेषतः त्वदन्यः त्वत्तः अन्य ऋषिः देवो वा छेत्ता नाशयिता संशयस्य अस्य न हि यस्याद् उपपद्यते सम्भवति अतः त्वम् एव छेत्तुम् अर्हसि इत्यर्थः॥ 39॥
हे कृष्ण! मेरे इस संशयको निःशेषतासे काटनेके लिये अर्थात् नष्ट करनेके लिये आप ही समर्थ हैं, क्योंकि आपको छोड़कर दूसरा कोई ऋषि या देवता इस संशयका नाश करनेवाला सम्भव नहीं है। अतः आपको ही इसका नाश करना चाहिये, यह अभिप्राय है॥ 39॥
श्रीभगवान् बोले—
हे पार्थ न एव इह लोके न अमुत्र परस्मिन् वा लोके विनाशः तस्य विद्यते, न अस्ति नाशो नाम पूर्वस्माद् हीनजन्मप्राप्तिः स योगभ्रष्टस्य न अस्ति।
न हि यस्मात् कल्याणकृत् शुभकृत् कश्चिद् दुर्गतिं कुत्सितां गतिं हे तात तनोति आत्मानं पुत्ररूपेण इति पिता तात उच्यते, पिता एव पुत्र इति पुत्रः अपि तात उच्यते शिष्यः अपि पुत्र उच्यते, गच्छति॥ 40॥
हे पार्थ! उस योगभ्रष्ट पुरुषका इस लोकमें या परलोकमें कहीं भी नाश नहीं होता है। पहलेकी अपेक्षा हीन-जन्मकी प्राप्तिका नाम नाश है सो ऐसी अवस्था योगभ्रष्टकी नहीं होती।
क्योंकि हे तात! शुभ कार्य करनेवाला कोई भी मनुष्य दुर्गतिको अर्थात् नीच गतिको नहीं पाता। पिता पुत्ररूपसे आत्माका विस्तार करता है, अतः उसको “तात” कहते हैं तथा पिता ही पुत्ररूपसे उत्पन्न होता है अतः पुत्रको भी “तात” कहते हैं। शिष्य भी पुत्रके तुल्य है इसलिये उसको भी “तात” कहते हैं॥ 40॥
किं तु अस्य भवति—
तो फिर इस योगभ्रष्टका क्या होता है?—
योगमार्गे प्रवृत्तः सन्न्यासी सामर्थ्यात् प्राप्य गत्वा
पुण्यकृताम्
अश्वमेधादियाजिनां लोकान् तत्र च उषित्वा वासम् अनुभूय शाश्वतीः नित्याः समाः संवत्सरान् तद्भोगक्षये शुचीनां यथोक्तकारिणां श्रीमतां विभूतिमतां गेहे गृहे योगभ्रष्टः अभिजायते॥ 41॥
योगमार्गमें लगा हुआ योगभ्रष्ट संन्यासी पुण्यकर्म करनेवालोंके अर्थात् अश्वमेध आदि यज्ञ करनेवालोंके लोकोंमें जाकर, वहाँ बहुत कालतक अर्थात् अनन्त वर्षोंतक वास करके, उनके भोगका क्षय होनेपर शास्त्रोक्त कर्म करनेवाले शुद्ध और श्रीमान् पुरुषोंके घरमें जन्म लेता है। प्रकरणकी सामर्थ्यसे यहाँ योगभ्रष्टका अर्थ संन्यासी लिया गया है॥ 41॥
अथवा श्रीमतां कुलाद् अन्यस्मिन् योगिनाम् एव दरिद्राणां कुले भवति जायते धीमतां बुद्धिमताम्।
एतद् हि जन्म यद् दरिद्राणां योगिनां कुले दुर्लभतरं दुःखलभ्यतरं पूर्वम् अपेक्ष्य लोके जन्म यद् ईदृशं यथोक्तविशेषणे कुले॥ 42॥
अथवा श्रीमानोंके कुलसे अन्य जो बुद्धिमान् दरिद्र योगियोंका कुल है उसीमें जन्म ले लेता है।
परंतु ऐसा जन्म अर्थात् जो उपर्युक्त दरिद्र आदि विशेषणोंसे युक्त योगियोंके कुलमें उत्पन्न होना है, वह इस लोकमें पहले बतलाये हुए श्रीमानोंके कुलमें उत्पन्न होनेकी अपेक्षा अत्यन्त दुर्लभ है॥ 42॥
यस्मात्—
क्योंकि—
तत्र योगिनां कुले तं बुद्धिसंयोगं बुद्ध्या संयोगं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकं पूर्वस्मिन् देहे भवं पौर्वदेहिकम्, यतते च प्रयत्नं करोति ततः तस्मात् पूर्वकृतात् संस्काराद् भूयो बहुतरं संसिद्धौ संसिद्धिनिमित्तं हे कुरुनन्दन॥ 43॥
वहाँ योगियोंके कुलमें पहले शरीरमें होनेवाले उस बुद्धिके संयोगको पाता है—अर्थात् योगी-कुलमें जन्म लेते ही उसका पूर्वजन्ममें प्राप्त हुई बुद्धिसे सम्बन्ध हो जाता है और हे कुरुनन्दन! वह उस पूर्वकृत संस्कारके बलसे पूर्ण सिद्धि प्राप्त करनेके लिये फिर और भी अधिक प्रयत्न करता है॥ 43॥
कथं पूर्वदेहबुद्धिसंयोग इति तद् उच्यते—
पहले शरीरकी बुद्धिसे उसका संयोग कैसे होता है? सो कहते हैं—
यः पूर्वजन्मनि कृतः अभ्यासः स पूर्वाभ्यासः तेन एव बलवता ह्रियते हि यस्माद् अवशः अपि स योगभ्रष्टः।
न कृतं चेद् योगाभ्याससंस्काराद् बलवत्तरम् अधर्मादिलक्षणं कर्म तदा योगाभ्यासजनितेन संस्कारेण ह्रियते। अधर्मः चेद् बलवत्तरः कृतः
तेन
योगजः
अपि
संस्कारः अभिभूयते एव।
तत्क्षये तु योगजः संस्कारः स्वयम् एव कार्यम् आरभते, न दीर्घकालस्थस्य अपि विनाशः तस्य अस्ति इत्यर्थः।
जिज्ञासुः अपि योगस्य स्वरूपं ज्ञातुम् इच्छन् योगमार्गे प्रवृत्तः सन्न्यासी योगभ्रष्टः सामर्थ्यात् सः अपि शब्दब्रह्म वेदोक्तकर्मानुष्ठानफलम् अतिवर्तते अपाकरिष्यति किम् उत बुद्ध्वा यो योगं तन्निष्ठः अभ्यासं कुर्यात्॥ 44॥
क्योंकि वह योगभ्रष्ट पुरुष परवश हुआ भी पूर्वाभ्यासके द्वारा अर्थात् जो पहले जन्ममें किया हुआ अभ्यास है, उस अति बलवान् पूर्वाभ्यासके द्वारा योगकी ओर खींच लिया जाता है।
यदि योगाभ्यासके संस्कारोंकी अपेक्षा अधिक बलवान् अधर्मादि कर्म न किये हों तो वह योगाभ्यास-जनित संस्कारोंसे खिंच जाता है और यदि अधिक बलवान् अधर्म किया हुआ होता है तो उससे योगजन्य संस्कार भी दब ही जाते हैं।
परंतु उस पाप-कर्मका क्षय होनेपर योगजन्य संस्कार स्वयं ही अपना कार्य आरम्भ कर देता है। बहुत कालतक दबे रहनेपर भी उसका नाश नहीं होता।
जो योगका जिज्ञासु भी है अर्थात् जो योगके स्वरूपको जाननेकी इच्छा करके योगमार्गमें लगा हुआ योगभ्रष्ट संन्यासी है वह भी शब्दब्रह्मको अर्थात् वेदमें कहे हुए कर्मफलको अतिक्रम कर जाता है, फिर जो योगको जानकर उसमें स्थित हुआ अभ्यास करता है उसका तो कहना ही क्या है। यहाँ प्रसंगकी शक्तिसे जिज्ञासुका अर्थ संन्यासी किया गया है॥ 44॥
कुतः च योगित्वं श्रेय इति—
योगित्व श्रेष्ठ किस कारणसे है?—
प्रयत्नाद् यतमानः अधिकं यतमान इत्यर्थः तत्र योगी विद्वान् संशुद्धकिल्बिषो विशुद्ध-किल्बिषः संशुद्धपापः अनेकेषु जन्मसु किञ्चित् किञ्चित् संस्कारजातम् उपचित्य तेन उपचितेन अनेकजन्मकृतेन संसिद्धः अनेकजन्मसंसिद्धः ततो लब्धसम्यग्दर्शनः सन् याति परां प्रकृष्टां गतिम्॥ 45॥
जो प्रयत्नपूर्वक—अधिक साधनमें लगा हुआ है वह विद्वान् योगी विशुद्धकिल्बिष अर्थात् अनेक जन्मोंमें थोड़े-थोड़े संस्कारोंको एकत्रित कर उन अनेक जन्मोंके सञ्चित संस्कारोंसे पापरहित होकर, सिद्ध अवस्थाको प्राप्त हुआ—सम्यक् ज्ञानको प्राप्त करके परमगति—मोक्षको प्राप्त होता है॥ 45॥
यस्माद् एवं तस्मात्—
ऐसा होनेके कारण—
तपस्विभ्यः अधिको योगी ज्ञानिभ्यः अपि, ज्ञानम् अत्र शास्त्रपाण्डित्यं तद्वद्भ्यः अपि मतो ज्ञातः अधिकः श्रेष्ठ इति कर्मिभ्यः अग्निहोत्रादि कर्म तद्वद्भ्यः अधिको योगी विशिष्टो यस्मात् तस्माद् योगी भव अर्जुन॥ 46॥
तपस्वियों और ज्ञानियोंसे भी योगी अधिक है। यहाँ ज्ञान शास्त्र-विषयक पाण्डित्यका नाम है, उससे युक्त जो ज्ञानवान् हैं उनकी अपेक्षा योगी अधिक श्रेष्ठ है। तथा अग्निहोत्रादि कर्म करनेवालोंसे भी योगी अधिक श्रेष्ठ है, इसलिये हे अर्जुन! तू योगी हो॥ 46॥
योगिनाम् अपि सर्वेषां रुद्रादित्यादिध्यान-पराणां मध्ये मद्गतेन मयि वासुदेवे समाहितेन अन्तरात्मना अन्तःकरणेन श्रद्धावान् श्रद्दधानः सन् भजते सेवते यो मां स मे मम युक्ततमः अतिशयेन युक्तो मतः अभिप्रेत इति॥ 47॥
रुद्र, आदित्य आदि देवोंके ध्यानमें लगे हुए समस्त योगियोंसे भी जो योगी श्रद्धायुक्त हुआ मुझ वासुदेवमें अच्छी प्रकार स्थित किये हुए अन्तःकरणसे मुझे ही भजता है, उसे मैं युक्ततम अर्थात् अतिशय श्रेष्ठ योगी मानता हूँ॥ 47॥