आत्मसंयमयोग
सम्बन्ध—पाँचवें अध्यायके आरम्भमें अर्जुनने “कर्मसंन्यास” (सांख्ययोग) और “कर्मयोग” इन दोनोंमेंसे कौन-सा एक साधन मेरे लिये सुनिश्चित कल्याणप्रद है?—यह बतलानेके लिये भगवान्से प्रार्थना की थी। इसपर भगवान्ने दोनों साधनोंको कल्याणप्रद बतलाया और फलमें दोनोंकी समानता होनेपर भी साधनमें सुगमता होनेके कारण “कर्मसंन्यास” की अपेक्षा “कर्मयोग” की श्रेष्ठताका प्रतिपादन किया। तदनन्तर दोनों साधनोंके स्वरूप, उनकी विधि और उनके फलका भलीभाँति निरूपण करके दोनोंके लिये ही अत्यन्त उपयोगी एवं परमात्माकी प्राप्तिका प्रधान उपाय समझकर संक्षेपमें ध्यानयोगका भी वर्णन किया। परंतु दोनोंमेंसे कौन-सा साधन करना चाहिये, इस बातको न तो अर्जुनको स्पष्ट शब्दोंमें आज्ञा ही की गयी और न ध्यानयोगका ही अंग-प्रत्यंगोंसहित विस्तारसे वर्णन हुआ। इसलिये अब ध्यानयोगका अंगोंसहित विस्तृत वर्णन करनेके लिये छठे अध्यायका आरम्भ करते हैं और सबसे पहले अर्जुनको भक्तियुक्त कर्मयोगमें प्रवृत्त करनेके उद्देश्यसे कर्मयोगकी प्रशंसा करते हुए ही प्रकरणका आरम्भ करते हैं—
सम्बन्ध—पहले श्लोकमें भगवान्ने कर्मफलका आश्रय न लेकर कर्म करनेवालेको संन्यासी और योगी बतलाया। उसपर यह शंका हो सकती है कि यदि “संन्यास” और “योग” दोनों भिन्न-भिन्न स्थिति हैं तो उपर्युक्त साधक दोनोंसे सम्पन्न कैसे हो सकता है? अतः इस शंकाका निराकरण करनेके लिये दूसरे श्लोकमें “संन्यास” और “योग” की एकताका प्रतिपादन करते हैं—
सम्बन्ध—कर्मयोगकी प्रशंसा करके अब उसका साधन बतलाते हैं—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें “योगारूढ़” शब्द आया। उसका लक्षण जाननेकी आकांक्षा होनेपर योगारूढ़ पुरुषके लक्षण बतलाते हैं—
सम्बन्ध—परमपदकी प्राप्तिमें हेतुरूप योगारूढ़-अवस्थाका वर्णन करके अब उसे प्राप्त करनेके लिये उत्साहित करते हुए भगवान् मनुष्यका कर्तव्य बतलाते हैं—
सम्बन्ध—यह बात कही गयी कि मनुष्य आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है। अब उसीको स्पष्ट करनेके लिये यह बतलाते हैं कि किन लक्षणोंसे युक्त मनुष्य आप ही अपना मित्र है और किन लक्षणोंसे युक्त आप ही अपना शत्रु है—
सम्बन्ध—जिसने मन और इन्द्रियोंसहित शरीरको जीत लिया है, वह आप ही अपना मित्र क्यों है, इस बातको स्पष्ट करनेके लिये अब शरीर, इन्द्रिय और मनरूप आत्माको वशमें करनेका फल बतलाते हैं—
सम्बन्ध—मन-इन्द्रियोंके सहित शरीरको वशमें करनेका फल परमात्माकी प्राप्ति बतलाया गया। अतः परमात्माको प्राप्त हुए पुरुषके लक्षण जाननेकी इच्छा होनेपर अब दो श्लोकोंद्वारा उसके लक्षणोंका वर्णन करते हुए उसकी प्रशंसा करते हैं—
सम्बन्ध—छठे श्लोकमें यह बात कही गयी कि जिसने शरीर, इन्द्रिय और मनरूप आत्माको जीत लिया है, वह आप ही अपना मित्र है। फिर सातवें श्लोकमें उस “जितात्मा” पुरुषके लिये परमात्माको प्राप्त होना तथा आठवें और नवें श्लोकोंमें परमात्माको प्राप्त पुरुषके लक्षण बतलाकर उसकी प्रशंसा की गयी। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि जितात्मा पुरुषको परमात्माकी प्राप्तिके लिये क्या करना चाहिये, वह किस साधनसे परमात्माको शीघ्र प्राप्त कर सकता है, इसलिये ध्यानयोगका प्रकरण आरम्भ करते हैं—
सम्बन्ध—जितात्मा पुरुषको ध्यानयोगका साधन करनेके लिये कहा गया। अब उस ध्यानयोगका विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए पहले स्थान और आसनका वर्णन करते हैं।
सम्बन्ध—पवित्र स्थानमें आसन स्थापन करनेके बाद ध्यानयोगके साधकको क्या करना चाहिये, उसे बतलाते हैं—
सम्बन्ध—ऊपरके श्लोकमें आसनपर बैठकर ध्यानयोगका साधन करनेके लिये कहा गया। अब उसीका स्पष्टीकरण करनेके लिये आसनपर कैसे बैठना चाहिये, साधकका भाव कैसा होना चाहिये, उसे किन-किन नियमोंका पालन करना चाहिये और किस प्रकार किसका ध्यान करना चाहिये, इत्यादि बातें दो श्लोकोंमें बतलायी जाती हैं—
सम्बन्ध—उपर्युक्त प्रकारसे किये हुए ध्यानयोगके साधनका फल बतलाते हैं—
सम्बन्ध—ध्यानयोगका प्रकार और फल बतलाया गया; अब ध्यानयोगके लिये उपयोगी आहार, विहार और शयनादिके नियम किस प्रकारके होने चाहिये यह जाननेकी आकांक्षापर भगवान् उसे दो श्लोकोंमें कहते हैं—
सम्बन्ध—ध्यानयोगमें उपयोगी आहार-विहार आदि नियमोंका वर्णन करनेके बाद, अब निर्गुण निराकारके ध्यानयोगीकी अन्तिम स्थितिका लक्षण बतलाते हैं—
सम्बन्ध—वशमें किया हुआ चित्त ध्यानकालमें जब एकमात्र परमात्मामें ही अचल स्थित हो जाता है, उस समय उस चित्तकी कैसी अवस्था हो जाती है, यह जाननेकी आकांक्षा होनेपर कहते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार ध्यानयोगकी अन्तिम स्थितिको प्राप्त हुए पुरुषके और उसके जीते हुए चित्तके लक्षण बतला देनेके बाद, अब तीन श्लोकोंमें ध्यानयोगद्वारा सच्चिदानन्द परमात्माको प्राप्त पुरुषकी स्थितिका वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—बीसवें, इक्कीसवें और बाईसवें श्लोकोंमें परमात्माकी प्राप्तिरूप जिस स्थितिके महत्त्व और लक्षणोंका वर्णन किया गया, अब उस स्थितिका नाम बतलाते हुए उसे प्राप्त करनेके लिये प्रेरणा करते हैं—
सम्बन्ध—परमात्माको प्राप्त पुरुषकी स्थितिका नाम “योग” है, यह कहकर उसे प्राप्त करना निश्चित कर्तव्य बतलाया गया; अब दो श्लोकोंमें उसी स्थितिकी प्राप्तिके लिये अभेदरूपसे परमात्माके ध्यानयोगका साधन करनेकी रीति बतलाते हैं—
सम्बन्ध—मनको परमात्मामें स्थिर करके परमात्माके सिवा अन्य कुछ भी चिन्तन न करनेकी बात कही गयी; परन्तु यदि किसी साधकका चित्त पूर्वाभ्यासवश बलात् विषयोंकी ओर चला जाय तो उसे क्या करना चाहिये, इस जिज्ञासापर कहते हैं—
सम्बन्ध—चित्तको सब ओरसे हटाकर एक परमात्मामें ही स्थिर करनेसे क्या होगा, इसपर कहते हैं—
सम्बन्ध—परमात्माका अभेदरूपसे ध्यान करनेवाले ब्रह्मभूत योगीकी स्थिति बतलाकर, अब उसका फल बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार अभेदभावसे साधन करनेवाले सांख्ययोगीके ध्यानका और उसके फलका वर्णन करके अब उस साधकके व्यवहारकालकी स्थितिका वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार सांख्ययोगका साधन करनेवाले योगीका और उसकी सर्वत्र समदर्शनरूप अन्तिम स्थितिका वर्णन करनेके बाद, अब भक्तियोगका साधन करनेवाले योगीकी अन्तिम स्थितिका और उसके सर्वत्र भगवद्दर्शनका वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—सर्वत्र भगवद्दर्शनसे भगवान्के साक्षात्कारकी बात कहकर उस भगवत्-प्राप्त पुरुषके लक्षण और महत्त्वका निरूपण करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार भक्तियोगद्वारा भगवान्को प्राप्त हुए पुरुषके महत्त्वका प्रतिपादन करके अब सांख्ययोगद्वारा परमात्माको प्राप्त हुए पुरुषके समदर्शनका और महत्त्वका प्रतिपादन करते हैं—
सम्बन्ध—भगवान्के समतासम्बन्धी उपदेशको सुनकर अर्जुन मनकी चंचलताके कारण उसमें अपनी अचल स्थिति होना बहुत कठिन समझकर कह रहे हैं—
सम्बन्ध—समत्वयोगमें मनकी चंचलताको बाधक बतलाकर अब अर्जुन मनके निग्रहको अत्यन्त कठिन बतलाते हैं—
सम्बन्ध—मनोनिग्रहके सम्बन्धमें अर्जुनकी उक्तिको स्वीकार करते हुए भगवान् मनको वशमें करनेके उपाय बतलाते हैं—
सम्बन्ध—भगवान्ने मनको वशमें करनेके उपाय बतलाये। यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि मनको वशमें न किया जाय तो क्या हानि है? इसपर भगवान् कहते हैं—
सम्बन्ध—योगसिद्धिके लिये मनको वशमें करना परम आवश्यक बतलाया गया। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि जिसका मन वशमें नहीं है, किंतु योगमें श्रद्धा होनेके कारण जो भगवत्प्राप्तिके लिये साधन करता है, उसकी मरनेके बाद क्या गति होती है? इसीके लिये अर्जुन पूछते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार शंका उपस्थित करके, अब अर्जुन उसकी निवृत्तिके लिये भगवान्से प्रार्थना करते हैं—
सम्बन्ध—अर्जुनने यह बात पूछी थी कि वह योगसे विचलित हुआ साधक उभयभ्रष्ट होकर नष्ट तो नहीं हो जाता? भगवान् अब उसका उत्तर देते हैं—
सम्बन्ध—योगभ्रष्ट पुरुषकी दुर्गति तो नहीं होती, फिर उसकी क्या गति होती है। यह जाननेकी इच्छा होनेपर भगवान् कहते हैं—
सम्बन्ध—साधारण योगभ्रष्ट पुरुषोंकी गति बतलाकर अब आसक्तिरहित उच्च श्रेणीके योगभ्रष्ट पुरुषोंकी विशेष गतिका वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—योगिकुलमें जन्म लेनेवाले योगभ्रष्ट पुरुषकी उस जन्ममें जैसी परिस्थिति होती है, अब उसे बतलाते हैं—
सम्बन्ध—अब पवित्र श्रीमानोंके घरमें जन्म लेनेवाले योगभ्रष्ट पुरुषकी परिस्थितिका वर्णन करते हुए योगको जाननेकी इच्छाका महत्त्व बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार श्रीमानोंके घरमें जन्म लेनेवाले योगभ्रष्टकी गतिका वर्णन करके तथा योगके जिज्ञासुकी महिमा बतलाकर अब योगियोंके कुलमें जन्म लेनेवाले योगभ्रष्टकी गतिका पुनः प्रतिपादन करते हैं—
सम्बन्ध—योगभ्रष्टकी गतिका विषय समाप्त करके, अब भगवान् योगीकी महिमा कहते हुए अर्जुनको योगी बननेके लिये आज्ञा देते हैं—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें योगीको सर्वश्रेष्ठ बतलाकर भगवान्ने अर्जुनको योगी बननेके लिये कहा। किंतु ज्ञानयोग, ध्यानयोग, भक्तियोग और कर्मयोग आदि साधनोंमेंसे अर्जुनको कौन-सा साधन करना चाहिये? इस बातका स्पष्टीकरण नहीं किया। अतः अब भगवान् अपनेमें अनन्यप्रेम करनेवाले भक्त योगीकी प्रशंसा करते हुए अर्जुनको अपनी ओर आकर्षित करते हैं—