ग्रन्थ
6आत्मसंयमयोग

आत्मसंयमयोग

Atma-Samyama-Yoga
The Yoga of Self-Control
47 verses · 47 printed blockspp. 288348 · Srimad Bhagavad Gita — Tattva-Vivechaniसाधारण भाषाटीका 47 · साधक-संजीवनी 47 · श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्य 47 · श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीका 47
1श्रीभगवान्
श्रीभगवान् उवाच
श्रीभगवानुवाच अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः। स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥ 1॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
श्रीभगवान् बोले—जो पुरुष कर्मफलका आश्रय न लेकर करनेयोग्य कर्म करता है, वह संन्यासी तथा योगी है; और केवल अग्निका त्याग करनेवाला संन्यासी नहीं है तथा केवल क्रियाओंका त्याग करनेवाला योगी नहीं है॥ 1॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—पाँचवें अध्यायके आरम्भमें अर्जुनने “कर्मसंन्यास” (सांख्ययोग) और “कर्मयोग” इन दोनोंमेंसे कौन-सा एक साधन मेरे लिये सुनिश्चित कल्याणप्रद है?—यह बतलानेके लिये भगवान्से प्रार्थना की थी। इसपर भगवान्ने दोनों साधनोंको कल्याणप्रद बतलाया और फलमें दोनोंकी समानता होनेपर भी साधनमें सुगमता होनेके कारण “कर्मसंन्यास” की अपेक्षा “कर्मयोग” की श्रेष्ठताका प्रतिपादन किया। तदनन्तर दोनों साधनोंके स्वरूप, उनकी विधि और उनके फलका भलीभाँति निरूपण करके दोनोंके लिये ही अत्यन्त उपयोगी एवं परमात्माकी प्राप्तिका प्रधान उपाय समझकर संक्षेपमें ध्यानयोगका भी वर्णन किया। परंतु दोनोंमेंसे कौन-सा साधन करना चाहिये, इस बातको न तो अर्जुनको स्पष्ट शब्दोंमें आज्ञा ही की गयी और न ध्यानयोगका ही अंग-प्रत्यंगोंसहित विस्तारसे वर्णन हुआ। इसलिये अब ध्यानयोगका अंगोंसहित विस्तृत वर्णन करनेके लिये छठे अध्यायका आरम्भ करते हैं और सबसे पहले अर्जुनको भक्तियुक्त कर्मयोगमें प्रवृत्त करनेके उद्देश्यसे कर्मयोगकी प्रशंसा करते हुए ही प्रकरणका आरम्भ करते हैं—

2
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव। न ह्यसन्न्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन॥ 2॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे अर्जुन! जिसको संन्यास ऐसा कहते हैं, उसीको तू योग जान। क्योंकि संकल्पोंका त्याग न करनेवाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता॥ 2॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—पहले श्लोकमें भगवान्ने कर्मफलका आश्रय न लेकर कर्म करनेवालेको संन्यासी और योगी बतलाया। उसपर यह शंका हो सकती है कि यदि “संन्यास” और “योग” दोनों भिन्न-भिन्न स्थिति हैं तो उपर्युक्त साधक दोनोंसे सम्पन्न कैसे हो सकता है? अतः इस शंकाका निराकरण करनेके लिये दूसरे श्लोकमें “संन्यास” और “योग” की एकताका प्रतिपादन करते हैं—

3
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते। योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥ 3॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
योगमें आरूढ़ होनेकी इच्छावाले मननशील पुरुषके लिये योगकी प्राप्तिमें निष्कामभावसे कर्म करना ही हेतु कहा जाता है और योगारूढ़ हो जानेपर उस योगारूढ़ पुरुषका जो सर्वसंकल्पोंका अभाव है वही कल्याणमें हेतु कहा जाता है॥ 3॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—कर्मयोगकी प्रशंसा करके अब उसका साधन बतलाते हैं—

4
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते। सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते॥ 4॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जिस कालमें न तो इन्द्रियोंके भोगोंमें और न कर्मोंमें ही आसक्त होता है, उस कालमें सर्वसंकल्पोंका त्यागी पुरुष योगारूढ़ कहा जाता है॥ 4॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें “योगारूढ़” शब्द आया। उसका लक्षण जाननेकी आकांक्षा होनेपर योगारूढ़ पुरुषके लक्षण बतलाते हैं—

5
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥ 5॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
अपने द्वारा अपना संसार-समुद्रसे उद्धार करे और अपनेको अधोगतिमें न डाले, क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है॥ 5॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—परमपदकी प्राप्तिमें हेतुरूप योगारूढ़-अवस्थाका वर्णन करके अब उसे प्राप्त करनेके लिये उत्साहित करते हुए भगवान् मनुष्यका कर्तव्य बतलाते हैं—

* असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः। ता ँ् स्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः॥ (ईशोपनिषद् 3)
“वे कूकर-शूकरादि योनि तथा नरकरूप असुरसम्बन्धी लोक अज्ञानरूप अन्धकारसे ढके हुए हैं। जो कोई भी आत्माका
हनन करनेवाले लोग हैं, वे मरनेपर उन असुर-लोकोंको प्राप्त होते हैं।”
6
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः। अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥ 6॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जिस जीवात्माद्वारा मन और इन्द्रियोंसहित शरीर जीता हुआ है, उस जीवात्माका तो वह आप ही मित्र है और जिसके द्वारा मन तथा इन्द्रियोंसहित शरीर नहीं जीता गया है, उसके लिये वह आप ही शत्रुके सदृश शत्रुतामें बर्तता है॥ 6॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—यह बात कही गयी कि मनुष्य आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है। अब उसीको स्पष्ट करनेके लिये यह बतलाते हैं कि किन लक्षणोंसे युक्त मनुष्य आप ही अपना मित्र है और किन लक्षणोंसे युक्त आप ही अपना शत्रु है—

7
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः। शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥ 7॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
सरदी-गरमी और सुख-दुःखादिमें तथा मान और अपमानमें जिसके अन्तःकरणकी वृत्तियाँ भलीभाँति शान्त हैं, ऐसे स्वाधीन आत्मावाले पुरुषके ज्ञानमें सच्चिदानन्दघन परमात्मा सम्यक् प्रकारसे स्थित हैं अर्थात् उसके ज्ञानमें परमात्माके सिवा अन्य कुछ है ही नहीं॥ 7॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—जिसने मन और इन्द्रियोंसहित शरीरको जीत लिया है, वह आप ही अपना मित्र क्यों है, इस बातको स्पष्ट करनेके लिये अब शरीर, इन्द्रिय और मनरूप आत्माको वशमें करनेका फल बतलाते हैं—

8
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः। युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः॥ 8॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जिसका अन्तःकरण ज्ञान-विज्ञानसे तृप्त है, जिसकी स्थिति विकाररहित है, जिसकी इन्द्रियाँ भलीभाँति जीती हुई हैं और जिसके लिये मिट्टी, पत्थर और सुवर्ण समान हैं, वह योगी युक्त अर्थात् भगवत्-प्राप्त है, ऐसे कहा जाता है॥ 8॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—मन-इन्द्रियोंके सहित शरीरको वशमें करनेका फल परमात्माकी प्राप्ति बतलाया गया। अतः परमात्माको प्राप्त हुए पुरुषके लक्षण जाननेकी इच्छा होनेपर अब दो श्लोकोंद्वारा उसके लक्षणोंका वर्णन करते हुए उसकी प्रशंसा करते हैं—

9
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु । साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते॥ 9॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
सुहृद्, मित्र, वैरी, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष्य और बन्धुगणोंमें, धर्मात्माओंमें और पापियोंमें भी समान भाव रखनेवाला अत्यन्त श्रेष्ठ है॥ 9॥
10
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः। एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥ 10॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
मन और इन्द्रियोंसहित शरीरको वशमें रखनेवाला, आशारहित और संग्रहरहित योगी अकेला ही एकान्त स्थानमें स्थित होकर आत्माको निरन्तर परमात्मामें लगावे॥ 10॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—छठे श्लोकमें यह बात कही गयी कि जिसने शरीर, इन्द्रिय और मनरूप आत्माको जीत लिया है, वह आप ही अपना मित्र है। फिर सातवें श्लोकमें उस “जितात्मा” पुरुषके लिये परमात्माको प्राप्त होना तथा आठवें और नवें श्लोकोंमें परमात्माको प्राप्त पुरुषके लक्षण बतलाकर उसकी प्रशंसा की गयी। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि जितात्मा पुरुषको परमात्माकी प्राप्तिके लिये क्या करना चाहिये, वह किस साधनसे परमात्माको शीघ्र प्राप्त कर सकता है, इसलिये ध्यानयोगका प्रकरण आरम्भ करते हैं—

11
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः। नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्॥ 11॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
शुद्ध भूमिमें, जिसके ऊपर क्रमशः कुशा, मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं, जो न बहुत ऊँचा है और न बहुत नीचा, ऐसे अपने आसनको स्थिर स्थापन करके—॥ 11॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—जितात्मा पुरुषको ध्यानयोगका साधन करनेके लिये कहा गया। अब उस ध्यानयोगका विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए पहले स्थान और आसनका वर्णन करते हैं।

12
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः। उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये॥ 12॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
उस आसनपर बैठकर चित्त और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको वशमें रखते हुए मनको एकाग्र करके अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये योगका अभ्यास करे॥ 12॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—पवित्र स्थानमें आसन स्थापन करनेके बाद ध्यानयोगके साधकको क्या करना चाहिये, उसे बतलाते हैं—

* मृगचर्म अपनी मौतसे मरे हुए मृगका होना चाहिये, जान-बूझकर मारे हुए मृगका नहीं। हिंसासे प्राप्त चर्म साधनमें
सहायक नहीं हो सकता।
13
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः। सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्॥ 13॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
काया, सिर और गलेको समान एवं अचल धारण करके और स्थिर* होकर, अपनी नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि जमाकर, अन्य दिशाओंको न देखता हुआ—॥ 13॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—ऊपरके श्लोकमें आसनपर बैठकर ध्यानयोगका साधन करनेके लिये कहा गया। अब उसीका स्पष्टीकरण करनेके लिये आसनपर कैसे बैठना चाहिये, साधकका भाव कैसा होना चाहिये, उसे किन-किन नियमोंका पालन करना चाहिये और किस प्रकार किसका ध्यान करना चाहिये, इत्यादि बातें दो श्लोकोंमें बतलायी जाती हैं—

* “स्थिरसुखमासनम्” (योग0 2। 46) “अधिक कालतक सुखपूर्वक स्थिर बैठा जाय उसे आसन कहते हैं।”
14
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः। मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥ 14॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
ब्रह्मचारीके व्रतमें स्थित, भयरहित तथा भलीभाँति शान्त अन्तःकरणवाला सावधान योगी मनको रोककर मुझमें चित्तवाला और मेरे परायण होकर स्थित होवे॥ 14॥
* वस्तुतः भगवान्के गुण, प्रभाव, तत्त्व और रहस्यके लिये यह कहना तो बन ही नहीं सकता कि वे यही और
इतने ही हैं। इस सम्बन्धमें जो कुछ भी कहा जाता है, सब सूर्यको दीपक दिखलानेके समान ही है। तथापि उनके गुणादिका
किंचित्-सा स्मरण, श्रवण और कीर्तन मनुष्यको पवित्रतम बनानेवाला है, इसीसे उनके गुणादिका शास्त्रकारगण वर्णन करते
हैं। उन्हीं शास्त्रोंके आधारपर उनके गुणादिको इस प्रकार समझना चाहिये—
अनन्त और असीम तथा अत्यन्त ही विलक्षण समता, शान्ति, दया, प्रेम, क्षमा, माधुर्य, वात्सल्य, गम्भीरता, उदारता,
सुहृदतादि भगवान्के “गुण” हैं। सम्पूर्ण बल, ऐश्वर्य, तेज, शक्ति, सामर्थ्य और असम्भवको भी सम्भव कर देना आदि
भगवान्के “प्रभाव” हैं। जैसे परमाणु, भाप, बादल, बूँदें और ओले आदि सब जल ही हैं, वैसे ही सगुण-निर्गुण, साकार-
निराकार, व्यक्त-अव्यक्त, जड-चेतन, स्थावर-जंगम, सत्-असत् आदि जो कुछ भी हैं तथा जो इससे भी परे है, वह
सब भगवान् ही है। यह “तत्त्व” है। भगवान्के दर्शन, भाषण, स्पर्श, चिन्तन, कीर्तन, अर्चन, वन्दन और स्तवन आदिसे
पापी भी परमपवित्र हो जाते हैं; अज, अविनाशी, सर्वलोकमहेश्वर, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, सर्वत्र समभावसे स्थित भगवान्
ही दिव्य अवतार धारण करके प्रकट होते हैं और उनके दिव्य गुण, प्रभाव, तत्त्व आदि वस्तुतः इतने अचिन्त्य, असीम
और दिव्य हैं कि उनके अपने सिवा उन्हें अन्य कोई जान ही नहीं सकता। यह उनका “रहस्य” है।
15
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः। शान्ि ंत निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति॥ 15॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
वशमें किये हुए मनवाला योगी इस प्रकार आत्माको निरन्तर मुझ परमेश्वरके स्वरूपमें लगाता हुआ मुझमें रहनेवाली परमानन्दकी पराकाष्ठारूप शान्तिको प्राप्त होता है॥ 15॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—उपर्युक्त प्रकारसे किये हुए ध्यानयोगके साधनका फल बतलाते हैं—

16
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः। न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥ 16॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे अर्जुन! यह योग न तो बहुत खानेवालेका, न बिलकुल न खानेवालेका, न बहुत शयन करनेके स्वभाववालेका और न सदा जागनेवालेका ही सिद्ध होता है॥ 16॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—ध्यानयोगका प्रकार और फल बतलाया गया; अब ध्यानयोगके लिये उपयोगी आहार, विहार और शयनादिके नियम किस प्रकारके होने चाहिये यह जाननेकी आकांक्षापर भगवान् उसे दो श्लोकोंमें कहते हैं—

17
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु। युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥ 17॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
दुःखोंका नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार-विहार करनेवालेका, कर्मोंमें यथायोग्य चेष्टा करनेवालेका और यथायोग्य सोने तथा जागनेवालेका ही सिद्ध होता है॥ 17॥
18
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते। निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥ 18॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
अत्यन्त वशमें किया हुआ चित्त जिस कालमें परमात्मामें ही भलीभाँति स्थित हो जाता है, उस कालमें सम्पूर्ण भोगोंसे स्पृहारहित पुरुष योगयुक्त है, ऐसा कहा जाता है॥ 18॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—ध्यानयोगमें उपयोगी आहार-विहार आदि नियमोंका वर्णन करनेके बाद, अब निर्गुण निराकारके ध्यानयोगीकी अन्तिम स्थितिका लक्षण बतलाते हैं—

19
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता। योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥ 19॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जिस प्रकार वायुरहित स्थानमें स्थित दीपक चलायमान नहीं होता, वैसी ही उपमा परमात्माके ध्यानमें लगे हुए योगीके जीते हुए चित्तकी कही गयी है॥ 19॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—वशमें किया हुआ चित्त ध्यानकालमें जब एकमात्र परमात्मामें ही अचल स्थित हो जाता है, उस समय उस चित्तकी कैसी अवस्था हो जाती है, यह जाननेकी आकांक्षा होनेपर कहते हैं—

20
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया। यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥ 20॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
योगके अभ्याससे निरुद्ध चित्त जिस अवस्थामें उपराम हो जाता है और जिस अवस्थामें परमात्माके ध्यानसे शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धिद्वारा परमात्माको साक्षात् करता हुआ सच्चिदानन्दघन
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार ध्यानयोगकी अन्तिम स्थितिको प्राप्त हुए पुरुषके और उसके जीते हुए चित्तके लक्षण बतला देनेके बाद, अब तीन श्लोकोंमें ध्यानयोगद्वारा सच्चिदानन्द परमात्माको प्राप्त पुरुषकी स्थितिका वर्णन करते हैं—

21
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्। वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः॥ 21॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
इन्द्रियोंसे अतीत, केवल शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धिद्वारा ग्रहण करनेयोग्य जो अनन्त आनन्द है; उसको जिस अवस्थामें अनुभव करता है और जिस अवस्थामें स्थित यह योगी परमात्माके
22
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः। यस्मिन् स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥ 22॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
परमात्माकी प्राप्तिरूप जिस लाभको प्राप्त होकर उससे अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता और परमात्मप्राप्तिरूप जिस अवस्थामें स्थित योगी बड़े भारी दुःखसे भी चलायमान
23
तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्। स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा॥ 23॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो दुःखरूप संसारके संयोगसे रहित है तथा जिसका नाम योग है, उसको जानना चाहिये। वह योग न उकताये हुए अर्थात् धैर्य और उत्साहयुक्त चित्तसे निश्चयपूर्वक करना कर्तव्य
सम्बन्ध

सम्बन्ध—बीसवें, इक्कीसवें और बाईसवें श्लोकोंमें परमात्माकी प्राप्तिरूप जिस स्थितिके महत्त्व और लक्षणोंका वर्णन किया गया, अब उस स्थितिका नाम बतलाते हुए उसे प्राप्त करनेके लिये प्रेरणा करते हैं—

24
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः। मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः॥ 24॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
संकल्पसे उत्पन्न होनेवाली सम्पूर्ण कामनाओंको निःशेषरूपसे त्यागकर और मनके द्वारा इन्द्रियोंके समुदायको सभी ओरसे भलीभाँति रोककर—॥ 24॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—परमात्माको प्राप्त पुरुषकी स्थितिका नाम “योग” है, यह कहकर उसे प्राप्त करना निश्चित कर्तव्य बतलाया गया; अब दो श्लोकोंमें उसी स्थितिकी प्राप्तिके लिये अभेदरूपसे परमात्माके ध्यानयोगका साधन करनेकी रीति बतलाते हैं—

25
शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया। आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥ 25॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
क्रम-क्रमसे अभ्यास करता हुआ उपरतिको प्राप्त हो तथा धैर्ययुक्त बुद्धिके द्वारा मनको परमात्मामें स्थित करके परमात्माके सिवा और कुछ भी चिन्तन न करे॥ 25॥
26
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्। ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥ 26॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
यह स्थिर न रहनेवाला और चंचल मन जिस-जिस शब्दादि विषयके निमित्तसे संसारमें विचरता है, उस-उस विषयसे रोककर यानी हटाकर इसे बार-बार परमात्मामें ही निरुद्ध करे॥ 26॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—मनको परमात्मामें स्थिर करके परमात्माके सिवा अन्य कुछ भी चिन्तन न करनेकी बात कही गयी; परन्तु यदि किसी साधकका चित्त पूर्वाभ्यासवश बलात् विषयोंकी ओर चला जाय तो उसे क्या करना चाहिये, इस जिज्ञासापर कहते हैं—

27
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्। उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्॥ 27॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
क्योंकि जिसका मन भली प्रकार शान्त है, जो पापसे रहित है और जिसका रजोगुण शान्त हो गया है, ऐसे इस सच्चिदानन्दघन ब्रह्मके साथ एकीभाव हुए योगीको उत्तम आनन्द प्राप्त
सम्बन्ध

सम्बन्ध—चित्तको सब ओरसे हटाकर एक परमात्मामें ही स्थिर करनेसे क्या होगा, इसपर कहते हैं—

28
युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी विगतकल्मषः। सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते॥ 28॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
वह पापरहित योगी इस प्रकार निरन्तर आत्माको परमात्मामें लगाता हुआ सुखपूर्वक परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिरूप अनन्त आनन्दका अनुभव करता है॥ 28॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—परमात्माका अभेदरूपसे ध्यान करनेवाले ब्रह्मभूत योगीकी स्थिति बतलाकर, अब उसका फल बतलाते हैं—

29
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि। ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥ 29॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
सर्वव्यापी अनन्त चेतनमें एकीभावसे स्थितिरूप योगसे युक्त आत्मावाला तथा सबमें समभावसे देखनेवाला योगी आत्माको सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित और सम्पूर्ण भूतोंको आत्मामें
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार अभेदभावसे साधन करनेवाले सांख्ययोगीके ध्यानका और उसके फलका वर्णन करके अब उस साधकके व्यवहारकालकी स्थितिका वर्णन करते हैं—

* इसी आशयका ईशोपनिषद्का यह मन्त्र है—
“यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति। सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥” (मन्त्र 6)
“परंतु जो सब प्राणियोंको आत्मामें और सब प्राणियोंमें आत्माको ही देखता है, वह फिर किसीसे घृणा नहीं करता।”
30
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥ 30॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो पुरुष सम्पूर्ण भूतोंमें सबके आत्मरूप मुझ वासुदेवको ही व्यापक देखता है और सम्पूर्ण भूतोंको मुझ वासुदेवके अन्तर्गत देखता है, उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार सांख्ययोगका साधन करनेवाले योगीका और उसकी सर्वत्र समदर्शनरूप अन्तिम स्थितिका वर्णन करनेके बाद, अब भक्तियोगका साधन करनेवाले योगीकी अन्तिम स्थितिका और उसके सर्वत्र भगवद्दर्शनका वर्णन करते हैं—

(10। 8)
“सीय
राममय
सब
जग
जानी।”
“करउँ
प्रनाम
जोरि
जुग
पानी॥”
* व्रजकी बात है। एक दिन यमुनाजीके तीरपर भगवान् श्रीकृष्ण अपने सखाओंके साथ भोजन करते-करते
बालकेलि करने लगे। कमरके कपड़ेमें बाँसुरी खोंस ली, बायीं बगलमें सींग और बेंत दबा ली, अंगुलियोंकी सन्धियोंमें
निम्बू आदिके अचार दबा लिये, हाथमें माखन-भातका कौर ले लिया और सबके बीच खड़े होकर और हँसीकी बातें
कहकर स्वयं हँसने तथा सब सखाओंको हँसाने लगे। ग्वालबाल सब-के-सब इस प्रेम-भोजमें तन्मय हो गये।
इधर बछड़े दूर निकल गये। तब भगवान् उन्हें खोजनेके लिये वैसे ही हाथमें भोजनका कौर लिये दौड़े। ब्रह्माजी
इस दृश्यको देखकर मोहित हो गये। उन्होंने बछड़े और बालकोंको हर लिया। ब्रह्माजीका काम जानकर, ग्वालबालों
और बछड़ोंकी माताओंको सन्तुष्ट रखने तथा ब्रह्माजीको छकानेके लिये भगवान् स्वयं वैसे-के-वैसे बछड़े और
बालक बन गये। जिस बछड़े और बालकका जैसा शरीर, जैसा हाथ-पैर, जैसे लकड़ी, जैसा सींग, बाँसुरी या
छींका था, जैसे गहने-कपड़े थे, जैसे स्वभाव, गुण, आकार, अवस्था और नाम आदि थे और जिसका जैसा
आहार-विहार था, वैसे ही बनकर सब जगत् “हरिमय” है—इस बातको सार्थक कर दिया। श्रीबलदेवजीने पहले कुछ
नहीं समझा फिर जब उन्होंने देखा कि ग्वालबालोंकी माताओंका अपने बच्चोंपर पहलेसे बहुत अधिक स्नेह बढ़ गया
है और जिन्होंने दूध पीना छोड़ दिया है, उन बछड़ोंपर भी गायें बहुत अधिक स्नेह करती हैं, तब उन्हें सन्देह हुआ
और उन्होंने पहचाननेकी नजरसे सबकी ओर देखा। तब उन्हें सभी बछड़े, उनके रक्षा करनेवाले गोपबालक तथा उनकी
सब सामग्रियाँ प्रत्यक्ष श्रीकृष्णरूप दीख पड़ीं और वे चकित हो गये।
आगे चलकर ब्रह्माजीने भी सबको श्रीकृष्णरूप ही देखा, तब उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति करके उनसे क्षमा
माँगी (श्रीमद्भागवत स्कन्ध 10, अध्याय 13)।
1-जित देखौं तित स्याममई है।
स्याम कुंज बन जमुना स्यामा, स्याम गगन घन घटा छई है॥
सब रंगनमें स्याम भरो है, लोग कहत यह बात नई है।
हौं बौरी, कै लोगन ही की स्याम पुतरिया बदल गई है॥
चंद्रसार रबिसार स्याम है, मृगमद सार काम बिजई है।
नीलकंठको कंठ स्याम है, मनहुँ स्यामता बेल बई है॥
श्रुतिको अच्छर स्याम देखियत, दीप सिखा पर स्यामतई है।
नर देवनकी कौन कथा है? अलख ब्रह्मछबि स्याममई है॥
2-गीता एकादश अध्याय देखिये।
3-भगवान् श्रीकृष्ण छोटे-से थे और अपनी विचित्र बाललीलासे माता यशोदा और व्रजवासी नर-नारियोंको अनुपम
सुख दे रहे थे। एक दिन आपने मिट्टी खा ली। मैयाने डाँटकर कहा, “क्यों रे ढीठ! तूने छिपकर मिट्टी क्यों खायी?”
भगवान्ने मुख फैलाकर कहा— “मैया! तुझे विश्वास नहीं होता तो तू मेरा मुख देख ले।” यशोदा तो देखकर चकित
हो गयीं। भगवान्के छोटे-से मुखड़ेमें माताने समस्त चराचर जीव, आकाश, दसों दिशाएँ, पर्वत, द्वीप, समुद्र, पृथ्वी, वायु,
अग्नि, चन्द्रमा, तारे, इन्द्रियोंके देवता, इन्द्रियाँ, मन, शब्दादि सब विषय, मायाके तीनों गुण, जीव, उनके विचित्र शरीर
और समस्त व्रजमण्डलको देखा। उन्होंने सोचा—मैं सपना तो नहीं देख रही हूँ? आखिर घबराकर प्रणाम करके उनके
शरणागत र्हुइं। तब श्रीकृष्णचन्द्रने पुनः अपनी मोहिनी माया फैला दी, माताका दुलार उमड़ उठा और अपने श्यामललाको
गोदमें उठाकर वे उनसे प्यार करने लगीं। (श्रीमद्भागवत, स्कन्ध 10, अध्याय 8)
4-काकभुशुण्डिजी भगवान् श्रीरामजीकी बाललीलाका आनन्द लूट रहे थे। एक दिन बालरूप श्रीरामजी घुटने और
हाथोंके बलसे काकभुशुण्डिजीको पकड़ने दौड़े। वे उड़ चले, भगवान्ने उन्हें पकड़नेको भुजा फैलायी। काकभुशुण्डिजी
उड़ते-उड़ते ब्रह्मलोकतक गये, वहाँ भी उन्होंने श्रीरामजीकी भुजाको अपने पीछे देखा। उनमें और श्रीरामजीकी भुजामें
दो अंगुलका बीच था। जहाँतक उनकी गति थी, वे गये, परन्तु रामजीकी भुजा पीछे ही रही। तब भुशुण्डिजीने व्याकुल
होकर आँखें मूँद लीं फिर आँखें खोलकर देखा तो अपनेको अवधपुरीमें पाया। श्रीरामजी हँसे और उनके हँसते ही ये
तुरंत उनके मुखमें प्रवेश कर गये। इसके आगेका वर्णन उन्हींकी वाणीमें सुनियेः—
उदर माझ सुनु अंडज
राया। देखेउँ
बहु
ब्रह्मांड
निकाया॥
अति बिचित्र तहँ लोक अनेका। रचना अधिक एक ते एका॥
कोटिन्ह चतुरानन
गौरीसा। अगनित उडगन रबि रजनीसा॥
अगनित लोकपाल जम
काला। अगनित भूधर भूमि बिसाला॥
सागर सरि सर बिपिन अपारा। नाना
भाँति
सृष्टि
बिस्तारा॥
सुर मुनि सिद्ध नाग नर किंनर। चारि
प्रकार
जीव
सचराचर॥
जो नहिं देखा नहिं सुना जो मनहूँ न समाइ।
सो सब अद्भुत देखेउँ बरनि कवन बिधि जाइ॥
एक एक ब्रह्मांड महुँ रहउँ बरष सत एक।
एहि बिधि देखत फिरउँ मैं अंड कटाह अनेक॥
लोक लोक प्रति भिन्न बिधाता। भिन्न विष्नु सिव मनु दिसित्राता॥
नर गंधर्ब भूत
बेताला। किंनर निसिचर पसु खग ब्याला॥
देव दनुज गन नाना
जाती। सकल जीव तहँ आनहिं भाँती॥
महि सरि सागर सर गिरि नाना। सब प्रपंच तहँ आनइ आना॥
अंडकोस प्रति प्रति निज रूपा। देखेउँ
अवधपुरी प्रति भुवन
जिनस
अनेक
अनूपा॥
निनारी। सरऊ भिन्न भिन्न नर नारी॥
दसरथ कौसल्या सुनु
ताता। बिबिध रूप भरतादिक भ्राता॥
प्रति ब्रह्मांड राम
अवतारा। देखउँ
बालबिनोद
अपारा॥
भिन्न भिन्न मैं दीख सबु अति बिचित्र हरिजान।
अगनित भुवन फिरेउँ प्रभु राम न देखउँ आन॥
सोइ सिसुपन सोइ सोभा सोइ कृपाल रघुबीर।
भुवन भुवन देखत फिरउँ प्रेरित मोह समीर॥
भ्रमत मोहि ब्रह्मांड
अनेका। बीते मनहुँ कल्प सत एका॥
फिरत फिरत निज आश्रमआयउँ। तहँ पुनि रहि कछु काल गवाँयउँ॥
निज प्रभु जन्म अवध सुनि पायउँ। निर्भर प्रेम हरषि उठि धायउँ॥
देखउँ जन्म महोत्सव
जाई। जेहि बिधि प्रथम कहा मैं गाई॥
राम उदर देखेउँ जग
नाना। देखत बनइ न जाइ बखाना॥
तहँ पुनि देखेउँ राम
सुजाना। मायापति
करउँ बिचार बहोरि
कृपाल
भगवाना॥
बहोरी। मोह कलिल ब्यापित मति मोरी॥
उभय घरी महँ मैं सब देखा। भयउँ भ्रमित मन मोह बिसेषा॥
देखि कृपाल बिकल मोहि बिहँसे तब रघुबीर।
बिहँसतही मुख बाहेर आयउँ सुनु मतिधीर॥
* मीराबाई आदि मध्यकालीन भक्तोंके जीवनमें ऐसे अर्चावतार हुए हैं।
31
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः। सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥ 31॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो पुरुष एकीभावमें स्थित होकर सम्पूर्ण भूतोंमें आत्मरूपसे स्थित मुझ सच्चिदानन्दघन वासुदेवको भजता है, वह योगी सब प्रकारसे बरतता हुआ भी मुझमें ही
सम्बन्ध

सम्बन्ध—सर्वत्र भगवद्दर्शनसे भगवान्के साक्षात्कारकी बात कहकर उस भगवत्-प्राप्त पुरुषके लक्षण और महत्त्वका निरूपण करते हैं—

32
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन। सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥ 32॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे अर्जुन! जो योगी अपनी भाँति सम्पूर्ण भूतोंमें सम देखता है और सुख अथवा दुःखको भी सबमें सम देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है॥ 32॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार भक्तियोगद्वारा भगवान्को प्राप्त हुए पुरुषके महत्त्वका प्रतिपादन करके अब सांख्ययोगद्वारा परमात्माको प्राप्त हुए पुरुषके समदर्शनका और महत्त्वका प्रतिपादन करते हैं—

* उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध। निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध॥
33अर्जुन
अर्जुन उवाच योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन। एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम्॥ 33॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
अर्जुन बोले—हे मधुसूदन! जो यह योग आपने समभावसे कहा है, मनके चंचल होनेसे मैं इसकी नित्य स्थितिको नहीं देखता हूँ॥ 33॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—भगवान्के समतासम्बन्धी उपदेशको सुनकर अर्जुन मनकी चंचलताके कारण उसमें अपनी अचल स्थिति होना बहुत कठिन समझकर कह रहे हैं—

34
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्। तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥ 34॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
क्योंकि हे श्रीकृष्ण! यह मन बड़ा चंचल, प्रमथन स्वभाववाला, बड़ा दृढ़ और बलवान् है। इसलिये उसका वशमें करना मैं वायुके रोकनेकी भाँति अत्यन्त दुष्कर
सम्बन्ध

सम्बन्ध—समत्वयोगमें मनकी चंचलताको बाधक बतलाकर अब अर्जुन मनके निग्रहको अत्यन्त कठिन बतलाते हैं—

35श्रीभगवान्Split
श्रीभगवान् उवाच
श्रीभगवानुवाच असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥ 35॥1
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
श्रीभगवान् बोले—हे महाबाहो! निःसन्देह मन चंचल और कठिनतासे वशमें होनेवाला है; परंतु हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! यह अभ्यास और वैराग्यसे वशमें होता है॥ 35॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—मनोनिग्रहके सम्बन्धमें अर्जुनकी उक्तिको स्वीकार करते हुए भगवान् मनको वशमें करनेके उपाय बतलाते हैं—

1-ठीक इसी आशयके सूत्र पातंजलयोगदर्शनमें हैं—
“अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः” (1। 12) “अभ्यास और वैराग्यसे चित्तवृत्तियोंका निरोध होता है।”
2-“तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः” (1। 13)। “उनमेंसे स्थितिके लिये प्रयत्न करनेका नाम अभ्यास है।”
1-“स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः।” (योगदर्शन 1। 14)
“किंतु वह अभ्यास लंबे समयतक, निरन्तर तथा सत्कारपूर्वक सेवन करनेसे दृढ़भूमि होता है।”
2-वैराग्यकी प्रायः इसीसे मिलती-जुलती व्याख्या महर्षि पतंजलिने योगदर्शनमें की है—
“दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् ।” (1 । 15)
“स्त्री, धन, भवन, मान, बड़ाई आदि इस लोकके और स्वर्गादि परलोकके सम्पूर्ण विषयोंमें तृष्णारहित हुए चित्तकी
जो वशीकार-अवस्था होती है, उसका नाम “वैराग्य” है।”
“तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम्।” (1। 16)
“प्रकृतिसे अत्यन्त विलक्षण पुरुषके ज्ञानसे तीनों गुणोंमें जो तृष्णाका अभाव हो जाना है, वह परवैराग्य या सर्वोत्तम
वैराग्य है।”
Ed. notethe first half of bg.6.36 is printed inside this block; its translation is printed with that verse
36
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः। वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः॥ 36॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जिसका मन वशमें किया हुआ नहीं है, ऐसे पुरुषद्वारा योग दुष्प्राप्य है और वशमें किये हुए मनवाले प्रयत्नशील पुरुषद्वारा साधनसे उसका प्राप्त होना सहज है—यह मेरा
सम्बन्ध

सम्बन्ध—भगवान्ने मनको वशमें करनेके उपाय बतलाये। यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि मनको वशमें न किया जाय तो क्या हानि है? इसपर भगवान् कहते हैं—

37अर्जुन
अर्जुन उवाच अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः। अप्राप्य योगसंसि ंद्ध कां गतिं कृष्ण गच्छति॥ 37॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
अर्जुन बोले—हे श्रीकृष्ण! जो योगमें श्रद्धा रखनेवाला है, किंतु संयमी नहीं है, इस कारण जिसका मन अन्तकालमें योगसे विचलित हो गया है, ऐसा साधक योगकी सिद्धिको अर्थात् भगवत्साक्षात्कारको न प्राप्त होकर किस गतिको प्राप्त होता है॥ 37॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—योगसिद्धिके लिये मनको वशमें करना परम आवश्यक बतलाया गया। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि जिसका मन वशमें नहीं है, किंतु योगमें श्रद्धा होनेके कारण जो भगवत्प्राप्तिके लिये साधन करता है, उसकी मरनेके बाद क्या गति होती है? इसीके लिये अर्जुन पूछते हैं—

38
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति। अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि॥ 38॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे महाबाहो! क्या वह भगवत्प्राप्तिके मार्गमें मोहित और आश्रयरहित पुरुष छिन्न-भिन्न बादलकी भाँति दोनों ओरसे भ्रष्ट होकर नष्ट तो नहीं हो जाता?॥ 38॥
39
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः। त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते॥ 39॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे श्रीकृष्ण! मेरे इस संशयको सम्पूर्णरूपसे छेदन करनेके लिये आप ही योग्य हैं, क्योंकि आपके सिवा दूसरा इस संशयका छेदन करनेवाला मिलना सम्भव नहीं है॥ 39॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार शंका उपस्थित करके, अब अर्जुन उसकी निवृत्तिके लिये भगवान्से प्रार्थना करते हैं—

40श्रीभगवान्
श्रीभगवान् उवाच
श्रीभगवानुवाच पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते। न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति॥ 40॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
श्रीभगवान् बोले—हे पार्थ! उस पुरुषका न तो इस लोकमें नाश होता है और न परलोकमें ही। क्योंकि हे प्यारे! आत्मोद्धारके लिये अर्थात् भगवत्प्राप्तिके लिये कर्म करनेवाला कोई भी मनुष्य दुर्गतिको प्राप्त नहीं होता॥ 40॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अर्जुनने यह बात पूछी थी कि वह योगसे विचलित हुआ साधक उभयभ्रष्ट होकर नष्ट तो नहीं हो जाता? भगवान् अब उसका उत्तर देते हैं—

41
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः। शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते॥ 41॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यवानोंके लोकोंको अर्थात् स्वर्गादि उत्तम लोकोंको प्राप्त होकर, उनमें बहुत वर्षोंतक निवास करके फिर शुद्ध आचरणवाले श्रीमान् पुरुषोंके घरमें जन्म
सम्बन्ध

सम्बन्ध—योगभ्रष्ट पुरुषकी दुर्गति तो नहीं होती, फिर उसकी क्या गति होती है। यह जाननेकी इच्छा होनेपर भगवान् कहते हैं—

42
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्। एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्॥ 42॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
अथवा वैराग्यवान् पुरुष उन लोकोंमें न जाकर ज्ञानवान् योगियोंके ही कुलमें जन्म लेता है। परंतु इस प्रकारका जो यह जन्म है सो संसारमें निःसन्देह अत्यन्त दुर्लभ है॥ 42॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—साधारण योगभ्रष्ट पुरुषोंकी गति बतलाकर अब आसक्तिरहित उच्च श्रेणीके योगभ्रष्ट पुरुषोंकी विशेष गतिका वर्णन करते हैं—

43
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्। यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन॥ 43॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
वहाँ उस पहले शरीरमें संग्रह किये हुए बुद्धि-संयोगको अर्थात् समबुद्धिरूप योगके संस्कारोंको अनायास ही प्राप्त हो जाता है और हे कुरुनन्दन! उसके प्रभावसे वह फिर परमात्माकी प्राप्तिरूप सिद्धिके लिये पहलेसे भी बढ़कर प्रयत्न करता है॥ 43॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—योगिकुलमें जन्म लेनेवाले योगभ्रष्ट पुरुषकी उस जन्ममें जैसी परिस्थिति होती है, अब उसे बतलाते हैं—

1-नास्याब्रह्मवित्कुले भवति। तरति शोकं तरति पाप्मानं गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति॥ (मुण्डक-उ0 3। 2। 9)
“इसके (ब्रह्मज्ञानीके) कुलमें कोई अब्रह्मवित् नहीं होता, वह शोक एवं पापसे तर जाता है। हृदयग्रन्थिसे विमुक्त होकर
अमर हो जाता है अर्थात् सदाके लिये जन्म-मृत्युसे छूट जाता है।
2-“महत्सङ्गस्तु दुर्लभोऽगम्योऽमोघश्च।” (नारदभक्तिसूत्र 39) “परंतु महात्माओंका संग दुर्लभ, अगम्य और अमोघ है।”
44
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः। जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते॥ 44॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
वह श्रीमानोंके घरमें जन्म लेनेवाला योगभ्रष्ट पराधीन हुआ भी उस पहलेके अभ्याससे ही निस्सन्देह भगवान्की ओर आकर्षित किया जाता है, तथा समबुद्धिरूप योगका जिज्ञासु भी वेदमें कहे हुए सकामकर्मोंके फलको उल्लंघन कर जाता है॥ 44॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अब पवित्र श्रीमानोंके घरमें जन्म लेनेवाले योगभ्रष्ट पुरुषकी परिस्थितिका वर्णन करते हुए योगको जाननेकी इच्छाका महत्त्व बतलाते हैं—

45
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः। अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्॥ 45॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
परन्तु प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करनेवाला योगी तो पिछले अनेक जन्मोंके संस्कारबलसे इसी जन्ममें संसिद्ध होकर सम्पूर्ण पापोंसे रहित हो फिर तत्काल ही परमगतिको प्राप्त हो
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार श्रीमानोंके घरमें जन्म लेनेवाले योगभ्रष्टकी गतिका वर्णन करके तथा योगके जिज्ञासुकी महिमा बतलाकर अब योगियोंके कुलमें जन्म लेनेवाले योगभ्रष्टकी गतिका पुनः प्रतिपादन करते हैं—

46
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः। कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन॥ 46॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
योगी तपस्वियोंसे श्रेष्ठ है, शास्त्रज्ञानियोंसे भी श्रेष्ठ माना गया है और सकामकर्म करनेवालोंसे भी योगी श्रेष्ठ है; इससे हे अर्जुन! तू योगी हो॥ 46॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—योगभ्रष्टकी गतिका विषय समाप्त करके, अब भगवान् योगीकी महिमा कहते हुए अर्जुनको योगी बननेके लिये आज्ञा देते हैं—

47
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना। श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥ 47॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
सम्पूर्ण योगियोंमें भी जो श्रद्धावान् योगी मुझमें लगे हुए अन्तरात्मासे मुझको निरन्तर भजता है, वह योगी मुझे परम श्रेष्ठ मान्य है॥ 47॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें योगीको सर्वश्रेष्ठ बतलाकर भगवान्ने अर्जुनको योगी बननेके लिये कहा। किंतु ज्ञानयोग, ध्यानयोग, भक्तियोग और कर्मयोग आदि साधनोंमेंसे अर्जुनको कौन-सा साधन करना चाहिये? इस बातका स्पष्टीकरण नहीं किया। अतः अब भगवान् अपनेमें अनन्यप्रेम करनेवाले भक्त योगीकी प्रशंसा करते हुए अर्जुनको अपनी ओर आकर्षित करते हैं—

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः॥
6.1श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीका