राजविद्याराजगुह्ययोग
सम्बन्ध—सातवें अध्यायके आरम्भमें भगवान्ने विज्ञानसहित ज्ञानका वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा की थी। उसके अनुसार उस विषयका वर्णन करते हुए अन्तमें ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञके सहित भगवान्को जाननेकी एवं अन्तकालके भगवच्चिन्तनकी बात कही। इसपर आठवें अध्यायमें अर्जुनने उन तत्त्वोंको और अन्तकालकी उपासनाके विषयको समझनेके लिये सात प्रश्न कर दिये। उनमेंसे छः प्रश्नोंका उत्तर तो भगवान्ने संक्षेपमें तीसरे और चौथे श्लोकोंमें दे दिया किंतु सातवें प्रश्नके उत्तरमें उन्होंने जिस उपदेशका आरम्भ किया उसमें सारा-का-सारा आठवाँ अध्याय पूरा हो गया। इस प्रकार सातवें अध्यायमें आरम्भ किये हुए विज्ञानसहित ज्ञानका सांगोपांग वर्णन न होनेके कारण उसी विषयको भलीभाँति समझानेके उद्देश्यसे भगवान् इस नवम अध्यायका आरम्भ करते हैं। तथा सातवें अध्यायमें वर्णित उपदेशके साथ इसका घनिष्ठ सम्बन्ध दिखलानेके लिये पहले श्लोकमें पुनः उसी विज्ञानसहित ज्ञानका वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा करते हैं—
सम्बन्ध—भगवान्ने जिस विज्ञानसहित ज्ञानके उपदेशकी प्रतिज्ञा की, उसके प्रति श्रद्धा, प्रेम, सुननेकी उत्कण्ठा और उस उपदेशके अनुसार आचरण करनेमें अत्यधिक उत्साह उत्पन्न करनेके लिये भगवान् अब उसका यथार्थ माहात्म्य सुनाते हैं—
सम्बन्ध—जब विज्ञानसहित ज्ञानकी इतनी महिमा है और इसका साधन भी इतना सुगम है तो फिर सभी मनुष्य इसे धारण क्यों नहीं करते? इस जिज्ञासापर अश्रद्धाको ही इसमें प्रधान कारण दिखलानेके लिये भगवान् अब इसपर श्रद्धा न करनेवाले मनुष्योंकी निन्दा करते हैं—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने जिस विज्ञानसहित ज्ञानका उपदेश करनेकी प्रतिज्ञा की थी तथा जिसका माहात्म्य वर्णन किया था, अब उसका आरम्भ करते हुए वे सबसे पहले दो श्लोकोंमें प्रभावके साथ अपने अव्यक्तस्वरूपका वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकोंमें भगवान्ने समस्त भूतोंको अपने अव्यक्तरूपसे व्याप्त और उसीमें स्थित बतलाया। अतः इस विषयको स्पष्ट जाननेकी इच्छा होनेपर अब दृष्टान्तद्वारा भगवान् उसका स्पष्टीकरण करते हैं—
सम्बन्ध—विज्ञानसहित ज्ञानका वर्णन करते हुए भगवान्ने यहाँतक प्रभावसहित अपने निराकारस्वरूपका तत्त्व समझानेके लिये उसकी व्यापकता, असंगता और निर्विकारताका प्रतिपादन किया। अब अपने भूतभावन स्वरूपका स्पष्टीकरण करते हुए सृष्टिरचनादि कर्मोंका तत्त्व समझानेके लिये पहले दो श्लोकोंद्वारा कल्पोंके अन्तमें सब भूतोंका प्रलय और कल्पोंके आदिमें उनकी उत्पत्तिका प्रकार बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार जगत्-रचनादि समस्त कर्म करते हुए भी भगवान् उन कर्मोंके बन्धनमें क्यों नहीं पड़ते, अब यही तत्त्व समझानेके लिये भगवान् कहते हैं—
सम्बन्ध—“उदासीनवदासीनम्” इस पदसे भगवान्में जो कर्तापनका अभाव दिखलाया गया, अब उसीको स्पष्ट करनेके लिये कहते हैं—
सम्बन्ध—अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार विज्ञानसहित ज्ञानका वर्णन करते हुए भगवान्ने चौथेसे छठे श्लोकतक प्रभावसहित सगुण-निराकार स्वरूपका तत्त्व समझाया। फिर सातवेंसे दसवें श्लोकतक सृष्टि-रचनादि समस्त कर्मोंमें अपनी असंगता और निर्विकारता दिखलाकर उन कर्मोंकी दिव्यताका तत्त्व बतलाया। अब अपने सगुण-साकार रूपका महत्त्व, उसकी भक्तिका प्रकार और उसके गुण और प्रभावका तत्त्व समझानेके लिये पहले दो श्लोकोंमें उसके प्रभावको न जाननेवाले असुर-प्रकृतिके मनुष्योंकी निन्दा करते हैं—
सम्बन्ध—भगवान्का प्रभाव न जाननेवाले आसुरी प्रकृतिके मनुष्योंकी निन्दा करके अब सगुणरूपकी भक्तिका तत्त्व समझानेके लिये भगवान्के प्रभावको जाननेवाले, दैवी प्रकृतिके आश्रित, उच्च श्रेणीके अनन्य भक्तोंके लक्षण बतलाते हैं—
सम्बन्ध—अब पूर्वश्लोकमें वर्णित भगवत्प्रेमी भक्तोंके भजनका प्रकार बतलाते हैं—
सम्बन्ध—भगवान्के गुण, प्रभाव आदिको जाननेवाले अनन्यप्रेमी भक्तोंके भजनका प्रकार बतलाकर अब भगवान् उनसे भिन्न श्रेणीके उपासकोंकी उपासनाका प्रकार बतलाते हैं—
सम्बन्ध—समस्त विश्वकी उपासना भगवान्की ही उपासना कैसे है—यह स्पष्ट समझानेके लिये अब चार श्लोकोंद्वारा भगवान् इस बातका प्रतिपादन करते हैं कि समस्त जगत् मेरा ही स्वरूप है—
सम्बन्ध—तेरहवेंसे पंद्रहवें श्लोकतक अपने सगुण-निर्गुण और विराट्रूपकी उपासनाओंका वर्णन करके भगवान्ने उन्नीसवें श्लोकतक समस्त विश्वको अपना स्वरूप बतलाया। समस्त विश्व मेरा ही स्वरूप होनेके कारण इन्द्रादि अन्य देवोंकी उपासना भी प्रकारान्तरसे मेरी ही उपासना है, परंतु ऐसा न जानकर फलासक्तिपूर्वक पृथक्-पृथक् भावसे उपासना करनेवालोंको मेरी प्राप्ति न होकर विनाशी फल ही मिलता है। इसी बातको दिखलानेके लिये अब दो श्लोकोंमें भगवान् उस उपासनाका फलसहित वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—पहले दो श्लोकोंमें यज्ञद्वारा देवताओंका पूजन करनेवाले सकामी मनुष्योंके देवपूजनका फल आवागमन बतलाकर अब भगवान् उनसे भिन्न अपने अनन्य प्रेमी निष्काम भक्तोंकी उपासनाका फल उनका योगक्षेम वहन करना बतलाते हैं—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकोंमें भगवान्ने समस्त विश्वको अपना स्वरूप बताया फिर यज्ञोंद्वारा की जानेवाली देवपूजाको प्रकारान्तरसे अपनी ही पूजा बताकर उसका फल आवागमनके चक्रमें पड़ना और अपने अनन्य भक्तकी उपासनाका फल उसे अपनी प्राप्ति करा देना कैसे बताया? इसपर कहते हैं—
सम्बन्ध—अन्य देवताओंके पूजन करनेवालोंकी पूजा भगवान्की विधिपूर्वक पूजा नहीं है, यह कहकर अब वैसी पूजा करनेवाले मनुष्य भगवत्प्राप्तिरूप फलसे वंचित क्यों रहते हैं, इसका स्पष्टरूपसे निरूपण करते हैं—
सम्बन्ध—भगवान्के भक्त आवागमनको प्राप्त नहीं होते और अन्य देवताओंके उपासक आवागमनको प्राप्त होते हैं, इसका क्या कारण है? इस जिज्ञासापर उपास्यके स्वरूप और उपासकके भावसे उपासनाके फलमें भेद होनेका नियम बतलाते हैं—
सम्बन्ध—भगवान्की भक्तिका भगवत्प्राप्तिरूप महान् फल होनेपर भी उसके साधनमें कोई कठिनता नहीं है, बल्कि उसका साधन बहुत ही सुगम है—यही बात दिखलानेके लिये भगवान् कहते हैं—
सम्बन्ध—यदि ऐसी ही बात है तो मुझे क्या करना चाहिये, इस जिज्ञासापर भगवान् अर्जुनको उसका कर्तव्य बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार समस्त कर्मोंको आपके अर्पण करनेसे क्या होगा, इस जिज्ञासापर कहते हैं—
सम्बन्ध—उपर्युक्त प्रकारसे भगवान्की भक्ति करनेवालेको भगवान्की प्राप्ति होती है, दूसरोंको नहीं होती—इस कथनसे भगवान्में विषमताके दोषकी आशंका हो सकती है। अतएव उसका निवारण करते हुए भगवान् कहते हैं—
सम्बन्ध—भगवान् भजन करनेवालोंमें अपना समभाव प्रदर्शित करते हुए अब अगले दो श्लोकोंमें दुराचारीको भी शाश्वत शान्ति प्राप्त होनेकी घोषणा करके अपनी भक्तिकी विशेष महिमा दिखलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार सदाचारिता और दुराचारिताके कारण होनेवाली विषमताका अपनेमें अभाव दिखलाकर अब दो श्लोकोंमें भगवान् अच्छी-बुरी जातिके कारण होनेवाली विषमताका अपनेमें अभाव दिखलाते हुए शरणागतिरूप भक्तिका महत्त्व प्रतिपादन करके अर्जुनको भजन करनेकी आज्ञा देते हैं—
सम्बन्ध—पिछले श्लोकोंमें भगवान्ने अपने भजनका महत्त्व दिखलाया और अन्तमें अर्जुनको भजन करनेके लिये कहा। अतएव अब भगवान् अपने भजनका अर्थात् शरणागतिका प्रकार बतलाते हुए अध्यायकी समाप्ति करते हैं—