ग्रन्थ
1अर्जुनविषादयोग

अर्जुनविषादयोग

Arjuna-Vishada-Yoga
The Yoga of Arjuna's Despondency
47 verses · 38 printed blockspp. 1723 · Srimad Bhagavad Gita Shankarabhashyaसाधारण भाषाटीका 40 · साधक-संजीवनी 38 · श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्य 38 · श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीका 41
1धृतराष्ट्र
धृतराष्ट्र उवाच— धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः। मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥ 1॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
धृतराष्ट्र बोले—हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्रमें युद्धकी इच्छासे इकट्ठे होनेवाले मेरे और पाण्डुके पुत्रोंने क्या किया?॥ 1॥
2सञ्जय
सञ्जय उवाच— दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा। आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत्॥ 2॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
संजय बोले—उस समय राजा दुर्योधन पाण्डवोंकी सेनाको व्यूहरचनासे युक्त देखकर गुरु द्रोणके पास जाकर कहने लगा॥ 2॥
3
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्। व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता॥ 3॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
गुरुजी! आपके बुद्धिमान् शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्नद्वारा व्यूहरचनासे युक्त की हुई पाण्डवोंकी इस बड़ी भारी सेनाको देखिये॥ 3॥
4–6Merged
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि। युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः॥ 4॥ धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्। पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः॥ 5॥ युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्। सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥ 6॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
इस सेनामें महाधनुर्धर वीर, लड़नेमें भीम और अर्जुनके समान सात्यकि, विराट और महारथी द्रुपद, बलवान् धृष्टकेतु, चेकितान तथा काशिराज एवं नरश्रेष्ठ पुरुजित्, कुन्तिभोज और शैब्य, पराक्रमी युधामन्यु, बलवान् उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु और द्रौपदीके पाँचों पुत्र—ये सभी महारथी हैं॥ 4—6॥
7
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम। नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते॥ 7॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
हे द्विजोत्तम! हमारे पक्षके भी जो प्रधान हैं, उनको आप समझ लीजिये। आपकी जानकारीके लिये मैं उनके नाम बतलाता हूँ जो कि मेरी सेनाके नेता हैं॥ 7॥
8
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः। अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च॥ 8॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
आप, पितामह भीष्म, कर्ण और रणविजयी कृपाचार्य, वैसे ही अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्तका पुत्र (भूरिश्रवा)॥ 8॥
9
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः। नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः॥ 9॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
इनके सिवा अन्य भी बहुत-से शूरवीर मेरे लिये प्राण देनेको तैयार हैं, जो कि नाना प्रकारके शस्त्रास्त्रोंको धारण करनेवाले और सब-के-सब युद्धविद्यामें निपुण हैं॥ 9॥
10
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्। पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्॥ 10॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
ऐसी वह पितामह भीष्मद्वारा रक्षित हमारी सेना सब प्रकारसे अजेय है और भीमद्वारा रक्षित इन पाण्डवोंकी यह सेना सहज ही जीती जा सकती है॥ 10॥
11
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः। भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि॥ 11॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
अतः आपलोग सब-के-सब सभी मोरचोंपर अपनी-अपनी जगह डटे हुए, केवल पितामह भीष्मकी ही रक्षा करते रहें॥ 11॥
12
तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः। सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान्॥ 12॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
इसके बाद कुरुवंशियोंमें वृद्ध प्रतापी पितामह भीष्मने उस दुर्योधनके हृदयमें हर्ष उत्पन्न करते हुए उच्च स्वरसे सिंहके समान गर्जकर शङ्ख बजाया॥ 12॥
13
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः। सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्॥ 13॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
फिर एक साथ ही शङ्ख, नगारे, ढोल, मृदंग और रणसिंगा आदि बाजे बजे, वह शब्द बड़ा भयंकर हुआ॥ 13॥
14
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ। माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः॥ 14॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
फिर सफेद घोड़ोंसे युक्त बड़े भारी रथमें बैठे हुए श्रीकृष्ण और अर्जुनने भी अपने अलौकिक शङ्ख बजाये॥ 14॥
15
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः। पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः॥ 15॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
श्रीकृष्णने पाञ्चजन्यनामक और अर्जुनने देवदत्तनामक शङ्ख बजाया। भयानक कर्मकारी वृकोदर भीमने पौण्ड्रनामक अपना महान् शङ्ख बजाया॥ 15॥
16
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः। नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ॥ 16॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिरने अनन्तविजय, नकुलने सुघोष और सहदेवने मणिपुष्पकनामवाला शङ्ख बजाया॥ 16॥
17–18Merged
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः। धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः॥ 17॥ द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते। सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक् पृथक्॥ 18॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
हे पृथ्वीनाथ! महाधनुर्धारी काशिराज, महारथी शिखण्डी, धृष्टद्युम्न और विराट, अजेय सात्यकि, द्रुपद और द्रौपदीके पाँचों पुत्र तथा महाबाहु सुभद्रापुत्र अभिमन्यु—इन सबने भी सब ओरसे अलग-अलग शङ्ख बजाये॥ 17-18॥
19
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्। नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्॥ 19॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
वह भयंकर शब्द आकाश और पृथ्वीको गुँजाता हुआ धृतराष्ट्र-पुत्रोंके हृदय विदीर्ण करने लगा॥ 19॥
20Split
अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः। प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः॥ 2 0॥ हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते।
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
Ed. notethe first half of bg.1.21 is printed inside this block; its translation is printed with that verse
21–22अर्जुनMerged
अर्जुन उवाच— सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत॥ 21॥ यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्। कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे॥ 22॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
हे पृथ्वीनाथ! फिर उस शस्त्र चलनेकी तैयारीके समय युद्धके लिये सजकर डटे हुए धृतराष्ट्रपुत्रोंको देखकर कपिध्वज अर्जुन धनुष उठाकर श्रीकृष्णसे इस तरह कहने लगा कि हे अच्युत! जबतक मैं इन खड़े हुए युद्धेच्छुक वीरोंको भलीभाँति देखूँ कि इस रण-उद्योगमें मुझे किन-किनके साथ युद्ध करना है तबतक आप मेरे रथको दोनों सेनाओंके बीचमें खड़ा रखिये॥ 20—22॥
23
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः। धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः॥ 23॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
(मेरी यह प्रबल इच्छा है कि) दुर्मति दुर्योधनका युद्धमें भला चाहनेवाले जो ये राजालोग यहाँ आये हैं, उन युद्ध करनेवालोंको मैं भली प्रकार देखूँ॥ 23॥
24–25सञ्जयMerged
सञ्जय उवाच— एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत। सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्॥ 24॥ भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्। उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान्कुरूनिति॥ 25॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
संजय बोले—हे भारत! निद्राजित् अर्जुनद्वारा इस प्रकार प्रेरित हुए श्रीकृष्ण उस उत्तम रथको दोनों सेनाओंके बीचमें भीष्म और द्रोणाचार्यके तथा अन्य सब राजाओंके सामने खड़ा करके बोले, हे पार्थ! इन इकट्ठे हुए कौरवोंको देख॥ 24-25॥
26–29Merged
तत्रापश्यत्स्थितान् पार्थः पितॄनथ पितामहान्। आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा॥ 26॥ श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि। तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान्॥ 27॥ कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्। दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्॥ 28॥ सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति। वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते॥ 29॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
फिर वह पृथापुत्र अर्जुन वहाँ दोनों सेनाओंमें खड़े हुए अपने ताऊ, चाचोंको, दादोंको, गुरुओंको, मामोंको, भाइयोंको, पुत्रोंको, पौत्रोंको, मित्रोंको, ससुरोंको और सुहृद्वर्गको देखने लगा। वहाँ उन सभी कुटुम्बियोंको खड़े हुए देखकर अत्यन्त करुणासे घिरकर वह कुन्तीपुत्र अर्जुन शोक करता हुआ इस प्रकार कहने लगा, हे कृष्ण! सामने खड़े हुए युद्धेच्छुक स्वजन-समुदायको देखकर मेरे सब अङ्ग शिथिल हो रहे हैं, मुख सूख रहा है, मेरे शरीरमें कम्प और रोमाञ्च होते हैं॥ 26—29॥
30
गाण्डीवं स्त्रंसते हस्तात्त्वBैव परिदह्यते। न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥ 30॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
गाण्डीव धनुष हाथसे खिसक रहा है, त्वचा बहुत जलती है, साथ ही मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है, (अधिक क्या) मैं खड़ा रहनेमें भी समर्थ नहीं हूँ॥ 30॥
31
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव। न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे॥ 31॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
हे केशव! इसके सिवा और भी सब लक्षण मुझे विपरीत ही दिखायी देते हैं, युद्धमें अपने कुलको नष्ट करके मैं कल्याण नहीं देखता॥ 31॥
32
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च। किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा॥ 32॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
हे कृष्ण! मैं न विजय ही चाहता हूँ और न राज्य या सुख ही चाहता हूँ। हे गोविन्द! हमें राज्यसे, भोगोंसे या जीवित रहनेसे क्या प्रयोजन है!॥ 32॥
33–34Merged
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च। त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥ 33॥ आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः। मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा॥ 34॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
हमें जिनके लिये राज्य, भोग और सुख आदि इष्ट हैं, वे ये हमारे गुरु, ताऊ, चाचा, लड़के, दादा, मामा, ससुर, पोते, साले और अन्य कुटुम्बी लोग धन और प्राणोंको त्यागकर युद्धमें खड़े हैं॥ 33-34॥
35
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन। अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते॥ 35॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
हे मधुसूदन! मुझपर वार करते हुए भी इन सम्बन्धियोंको त्रिलोकीका राज्य पानेके लिये भी मैं मारना नहीं चाहता, फिर जरा-सी पृथ्वीके लिये तो कहना ही क्या है?॥ 35॥
36
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन। पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः ॥ 36॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
हे जनार्दन! इन धृतराष्ट्र-पुत्रोंको मारनेसे हमें क्या प्रसन्नता होगी? प्रत्युत इन आततायियोंको मारनेसे हमें पाप ही लगेगा॥ 36॥
37
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्। स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥ 37॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
इसलिये हे माधव! अपने कुटुम्बी धृतराष्ट्र-पुत्रोंको मारना हमें उचित नहीं है, क्योंकि अपने कुटुम्बको नष्ट करके हम कैसे सुखी होंगे?॥ 37॥
38
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः। कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्॥ 38॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
यद्यपि लोभके कारण जिनका चित्त भ्रष्ट हो चुका है, ऐसे ये कौरव कुलक्षयजनित दोषको और मित्रोंके साथ वैर करनेमें होनेवाले पापको नहीं देख रहे हैं॥ 38॥
39
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्। कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन॥ 39॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
तो भी हे जनार्दन! कुलनाशजन्य दोषको भली प्रकार जाननेवाले हमलोगोंको इस पापसे बचनेका उपाय क्यों नहीं खोजना चाहिये?॥ 39॥
40
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः। धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत॥ 40॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
(यह तो सिद्ध ही है कि) कुलका नाश होनेसे सनातन कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं और धर्मका नाश होनेसे सारे कुलको सब ओरसे पाप दबा लेता है॥ 40॥
41
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः। स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः॥ 41॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
हे कृष्ण! इस तरह पापसे घिर जानेपर उस कुलकी स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं, हे वार्ष्णेय! स्त्रियोंके दूषित होनेपर उस कुलमें वर्णसंकरता आ जाती है॥ 41॥
42
सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च। पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥ 42॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
वह वर्णसंकरता उन कुलघातियोंको और कुलको नरकमें ले जानेका कारण बनती है, क्योंकि उनके पितरलोग पिण्डक्रिया और जलक्रिया नष्ट हो जानेके कारण अपने स्थानसे पतित हो जाते हैं॥ 42॥
43
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः। उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः॥ 43॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
(इस प्रकार) वर्णसंकरताको उत्पन्न करनेवाले उपर्युक्त दोषोंसे उन कुलघातियोंके सनातन कुलधर्म और जातिधर्म नष्ट हो जाते हैं॥ 43॥
44
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन। नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम॥ 44॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
हे जनार्दन! जिनके कुलधर्म नष्ट हो चुके हैं, ऐसे मनुष्योंका निस्सन्देह नरकमें वास होता है, ऐसा हमने सुना है॥ 44॥
45
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्। यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः॥ 45॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
अहो! शोक है कि हमलोग बड़ा भारी पाप करनेका निश्चय कर बैठे हैं, जो कि इस राज्यसुखके लोभसे अपने कुटुम्बका नाश करनेके लिये तैयार हो गये हैं॥ 45॥
46
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः। धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्॥ 46॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
यदि मुझ शस्त्ररहित और सामना न करनेवालेको ये शस्त्रधारी धृतराष्ट्रपुत्र (दुर्योधन आदि) रणभूमिमें मार डालें तो वह मेरे लिये बहुत ही अच्छा हो॥ 46॥
47सञ्जय
सञ्जय उवाच— एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत्। विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः॥ 47॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
संजय बोले—उस रणभूमिमें वह अर्जुन इस प्रकार कहकर बाणोंसहित धनुषको छोड़ शोकाकुल चित्त हो रथके ऊपर (पहले सैन्य देखनेके लिये जहाँ खड़ा हुआ था वहीं) बैठ गया॥ 47॥
निषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादेऽर्जुनविषाद-
योगो नाम प्रथमोऽध्यायः॥ 1॥
1.1श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्य