अर्जुनविषादयोग
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सम्बन्ध—पाण्डवोंके राजसूययज्ञमें उनके महान् ऐश्वर्यको देखकर दुर्योधनके मनमें बड़ी भारी जलन पैदा हो गयी और उन्होंने शकुनि आदिकी सम्मतिसे जुआ खेलनेके लिये युधिष्ठिरको बुलाया और छलसे उनको हराकर उनका सर्वस्व हर लिया। अन्तमें यह निश्चय हुआ कि युधिष्ठिरादि पाँचों भाई द्रौपदीसहित बारह वर्ष वनमें रहें और एक साल छिपकर रहें; इस प्रकार तेरह वर्षतक समस्त राज्यपर दुर्योधनका आधिपत्य रहे और पाण्डवोंके एक सालके अज्ञातवासका भेद न खुल जाय तो तेरह वर्षके बाद पाण्डवोंका राज्य उन्हें लौटा दिया जाय। इस निर्णयके अनुसार तेरह साल बितानेके बाद जब पाण्डवोंने अपना राज्य वापस माँगा तब दुर्योधनने साफ इनकार कर दिया। उन्हें समझानेके लिये द्रुपदके, ज्ञान और अवस्थामें वृद्ध पुरोहितको भेजा गया, परंतु उन्होंने कोई बात नहीं मानी। तब दोनों ओरसे युद्धकी तैयारी होने लगी।
भगवान् श्रीकृष्णको रण-निमन्त्रण देनेके लिये दुर्योधन द्वारका पहुँचे, उसी दिन अर्जुन भी वहाँ पहुँच गये। दोनोंने जाकर देखा—भगवान् अपने भवनमें सो रहे हैं। उन्हें सोते देखकर दुर्योधन उनके सिरहाने एक मूल्यवान् आसनपर जा बैठे और अर्जुन दोनों हाथ जोड़कर नम्रताके साथ उनके चरणोंके सामने खड़े हो गये। जागते ही श्रीकृष्णने अपने सामने अर्जुनको देखा और फिर पीछेकी ओर मुड़कर देखनेपर सिरहानेकी ओर बैठे हुए दुर्योधन दीख पडे़। भगवान् श्रीकृष्णने दोनोंका स्वागत-सत्कार किया और उनके आनेका कारण पूछा। तब दुर्योधनने कहा—“मुझमें और अर्जुनमें आपका एक-सा ही प्रेम है और हम दोनों ही आपके सम्बन्धी हैं; परंतु आपके पास पहले मैं आया हूँ, सज्जनोंका नियम है कि वे पहले आनेवालेकी सहायता किया करते हैं। सारे भूमण्डलमें आज आप ही सब सज्जनोंमें श्रेष्ठ और सम्माननीय हैं, इसलिये आपको मेरी ही सहायता करनी चाहिये।” भगवान्ने कहा—“निःसन्देह, आप पहले आये हैं; परंतु मैंने पहले अर्जुनको ही देखा है। इसलिये मैं दोनोंकी सहायता करूँगा। परंतु शास्त्रानुसार बालकोंकी इच्छा पहले पूरी की जाती है, इसलिये पहले अर्जुनकी इच्छा ही पूरी करनी चाहिये। मैं दो प्रकारसे सहायता करूँगा। एक ओर मेरी अत्यन्त बलशालिनी नारायणी-सेना रहेगी और दूसरी ओर मैं, युद्ध न करनेका प्रण करके, अकेला रहूँगा; मैं शस्त्रका प्रयोग नहीं करूँगा। अर्जुन! धर्मानुसार पहले तुम्हारी इच्छा पूर्ण होनी चाहिये; अतएव दोनोंमेंसे जिसे पसंद करो, माँग लो!” इसपर अर्जुनने शत्रुनाशन नारायण भगवान् श्रीकृष्णको माँग लिया। तब दुर्योधनने उनकी नारायणी-सेना माँग ली और उसे लेकर वे बड़ी प्रसन्नताके साथ हस्तिनापुरको लौट गये।
इसके बाद भगवान्ने अर्जुनसे पूछा—“अर्जुन! जब मैं युद्ध ही नहीं करूँगा, तब तुमने क्या समझकर नारायणी-सेनाको छोड़ दिया और मुझको स्वीकार किया?” अर्जुनने कहा—“भगवन्! आप अकेले ही सबका नाश करनेमें समर्थ हैं, तब मैं सेना लेकर क्या करता? इसके सिवा बहुत दिनोंसे मेरी इच्छा थी कि आप मेरे सारथि बनें, अब इस महायुद्धमें मेरी उस इच्छाको आप अवश्य पूर्ण कीजिये।” भक्तवत्सल भगवान्ने अर्जुनके इच्छानुसार उनके रथके घोड़े हाँकनेका काम स्वीकार किया। इसी प्रसंगके अनुसार भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुनके सारथि बने और युद्धारम्भके समय कुरुक्षेत्रमें उन्हें गीताका दिव्य उपदेश सुनाया। अस्तु।
दुर्योधन और अर्जुनके द्वारकासे वापस लौट आनेपर जिस समय दोनों ओरकी सेना एकत्र हो चुकी थी, उस समय भगवान् श्रीकृष्णने स्वयं हस्तिनापुर जाकर हर तरहसे दुर्योधनको समझानेकी चेष्टा की; परंतु उन्होंने स्पष्ट कह दिया—“मेरे जीते-जी पाण्डव कदापि राज्य नहीं पा सकते, यहाँतक कि सूईकी नोकभर भी जमीन मैं पाण्डवोंको नहीं दूँगा।” (महा0 उद्योग0 127। 22 से 25)। तब अपना न्यायोचित स्वत्व प्राप्त करनेके लिये माता कुन्तीकी आज्ञा और भगवान् श्रीकृष्णकी प्रेरणासे पाण्डवोंने धर्म समझकर युद्धके लिये निश्चय कर लिया।
जब दोनों ओरसे युद्धकी पूरी तैयारी हो गयी, तब भगवान् वेदव्यासजीने धृतराष्ट्रके समीप आकर उनसे कहा—“यदि तुम घोर संग्राम देखना चाहो तो मैं तुम्हें दिव्य नेत्र प्रदान कर सकता हूँ।” इसपर धृतराष्ट्रने कहा— “ब्रह्मर्षिश्रेष्ठ! मैं कुलके इस हत्याकाण्डको अपनी आखों देखना तो नहीं चाहता, परंतु युद्धका सारा वृत्तान्त भलीभाँति सुनना चाहता हूँ।” तब महर्षि वेदव्यासजीने संजयको दिव्यदृष्टि प्रदान करके धृतराष्ट्रसे कहा—“ये संजय तुम्हें युद्धका सब वृत्तान्त सुनावेंगे। युद्धकी समस्त घटनावलियोंको ये प्रत्यक्ष देख, सुन और जान सकेंगे। सामने या पीछेसे, दिनमें या रातमें, गुप्त या प्रकट, क्रियारूपमें परिणत या केवल मनमें आयी हुई, ऐसी कोई बात न होगी जो इनसे तनिक भी छिपी रह सकेगी। ये सब बातोंको ज्यों-की-त्यों जान लेंगे। इनके शरीरसे न तो कोई शस्त्र छू जायगा और न इन्हें जरा भी थकावट ही होगी।”
“यह “होनी” है, अवश्य होगी, इस सर्वनाशको कोई भी रोक नहीं सकेगा। अन्तमें धर्मकी जय होगी।”
महर्षि वेदव्यासजीके चले जानेके बाद धृतराष्ट्रके पूछनेपर संजय उन्हें पृथ्वीके विभिन्न द्वीपोंका वृत्तान्त सुनाते रहे, उसीमें उन्होंने भारतवर्षका भी वर्णन किया। तदनन्तर जब कौरव-पाण्डवोंका युद्ध आरम्भ हो गया और लगातार दस दिनोंतक युद्ध होनेपर पितामह भीष्म रणभूमिमें रथसे गिरा दिये गये, तब संजयने धृतराष्ट्रके पास आकर उन्हें अकस्मात् भीष्मके मारे जानेका समाचार सुनाया (महा0 भीष्म0 13)। उसे सुनकर धृतराष्ट्रको बड़ा ही दुःख हुआ और युद्धकी सारी बातें विस्तारपूर्वक सुनानेके लिये उन्होंने संजयसे कहा, तब संजयने दोनों ओरकी सेनाओंकी व्यूह-रचना आदिका विस्तृत वर्णन किया। इसके बाद धृतराष्ट्रने विशेष विस्तारके साथ आरम्भसे अबतककी पूरी घटनाएँ जाननेके लिये संजयसे प्रश्न किया। यहींसे श्रीमद्भगवद्गीताका पहला अध्याय आरम्भ होता है। महाभारत, भीष्मपर्वमें यह पचीसवाँ अध्याय है। इसके आरम्भमें धृतराष्ट्र संजयसे प्रश्न करते हैं—
सम्बन्ध—धृतराष्ट्रके पूछनेपर संजय कहते हैं—
सम्बन्ध—द्रोणाचार्यके पास जाकर दुर्योधनने जो कुछ कहा, अब उसे बतलाते हैं—
सम्बन्ध—पाण्डव-सेनाकी व्यूहरचना दिखलाकर अब दुर्योधन तीन श्लोकोंद्वारा पाण्डव-सेनाके प्रमुख महारथियोंके नाम बतलाते हैं—
सम्बन्ध—पाण्डव-सेनाके प्रधान योद्धाओंके नाम बतलाकर अब दुर्योधन आचार्य द्रोणसे अपनी सेनाके प्रधान योद्धाओंको जान लेनेके लिये अनुरोध करते हैं—
सम्बन्ध—अब दो श्लोकोंमें दुर्योधन अपने पक्षके प्रधान वीरोंके नाम बतलाते हुए अन्यान्य वीरोंके सहित उनकी प्रशंसा करते हैं—
सम्बन्ध—अपने महारथी योद्धाओंकी प्रशंसा करके अब दुर्योधन दोनों सेनाओंकी तुलना करते हुए अपनी सेनाको पाण्डव-सेनाकी अपेक्षा अधिक शक्तिशालिनी और उत्तम बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार भीष्मद्वारा संरक्षित अपनी सेनाको अजेय बताकर, अब दुर्योधन सब ओरसे भीष्मकी रक्षा करनेके लिये द्रोणाचार्य आदि समस्त महारथियोंसे अनुरोध करते हैं—
सम्बन्ध—दुर्योधनके द्वारा अपने पक्षके महारथियोंकी विशेषरूपसे पितामह भीष्मकी प्रशंसा किये जानेका वर्णन सुनाकर अब संजय उसके बादकी घटनाओंका वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—धृतराष्ट्रने पूछा था कि युद्धके लिये एकत्र होनेके बाद मेरे और पाण्डुके पुत्रोंने क्या किया, इसके उत्तरमें संजयने अबतक धृतराष्ट्रके पक्षवालोंकी बात सुनायी; अब पाण्डवोंने क्या किया, उसे पाँच श्लोकोंमें बतलाते हैं—
सम्बन्ध—भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनके पश्चात् पाण्डव-सेनाके अन्यान्य शूरवीरोंद्वारा सब ओर शंख बजाये जानेकी बात कहकर अब उस शंखध्वनिका क्या परिणाम हुआ? उसे संजय बतलाते हैं—
सम्बन्ध—पाण्डवोंकी शंखध्वनिसे कौरववीरोंके व्यथित होनेका वर्णन करके, अब चार श्लोकोंमें भगवान् श्रीकृष्णके प्रति कहे हुए अर्जुनके उत्साहपूर्ण वचनोंका वर्णन किया जाता है—
सम्बन्ध—अर्जुनके इस प्रकार कहनेपर भगवान्ने क्या किया? अब दो श्लोकोंमें संजय उसका वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञा सुनकर अर्जुनने क्या किया? अब उसे बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार सबको देखनेके बाद अर्जुनने क्या किया? अब उसे बतलाते हैं—
सम्बन्ध—बन्धुस्नेहके कारण अर्जुनकी कैसी स्थिति हुई, अब ढाई श्लोकोंमें अर्जुन स्वयं उसका वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—अपनी विषादयुक्त स्थितिका वर्णन करके अब अर्जुन अपने विचारोंके अनुसार युद्धका अनौचित्य सिद्ध करते हैं—
सम्बन्ध—अर्जुनने यह कहा कि स्वजनोंको मारनेसे किसी प्रकारका भी हित होनेकी सम्भावना नहीं है, अब फिर वे उसीकी पुष्टि करते हैं—
सम्बन्ध—अब अर्जुन स्वजनवधसे मिलनेवाले राज्य-भोगादिको न चाहनेका कारण दिखलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार युद्धका अनौचित्य दिखलाकर अब अर्जुन युद्धमें मरनेके लिये तैयार होकर आये हुए स्वजन-समुदायमें कौन-कौन हैं, उनका संक्षेपमें वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—सेनामें उपस्थित शूरवीरोंके साथ अपना सम्बन्ध बतलाकर अब अर्जुन किसी भी हेतुसे इन्हें मारनेमें अपनी अनिच्छा प्रकट करते हैं—
सम्बन्ध—यहाँ यदि यह पूछा जाय कि आप त्रिलोकीके राज्यके लिये भी उनको मारना क्यों नहीं चाहते, तो इसपर अर्जुन अपने सम्बन्धियोंको मारनेमें लाभका अभाव और पापकी सम्भावना बतलाकर अपनी बातको पुष्ट करते हैं—
सम्बन्ध—स्वजनोंको मारना सब प्रकारसे हानिकारक बतलाकर अब अर्जुन अपना मत प्रकट कर रहे हैं—
सम्बन्ध—यहाँ यह प्रश्न हो सकता है कि कुटुम्ब-नाशसे होनेवाला दोष तो दोनोंके लिये समान ही है; फिर यदि इस दोषपर विचार करके दुर्योधनादि युद्धसे नहीं हटते, तब तुम ही इतना विचार क्यों करते हो? अर्जुन दो श्लोकोंमें इस प्रश्नका उत्तर देते हैं—
सम्बन्ध—कुलके नाशसे कौन-कौन-से दोष उत्पन्न होते हैं, इसपर अर्जुन कहते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार जब समस्त कुलमें पाप फैल जाता है तब क्या होता है, अर्जुन अब उसे बतलाते हैं—
सम्बन्ध—वर्णसंकर सन्तानके उत्पन्न होनेसे क्या-क्या हानियाँ होती हैं, अर्जुन अब उन्हें बतलाते हैं—
सम्बन्ध—वर्णसंकरकारक दोषोंसे क्या हानि होती है, अब उसे बतलाते हैं—
सम्बन्ध—“कुलधर्म” और “जातिधर्म” के नाशसे क्या हानि है; अब इसपर कहते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार स्वजन-वधसे होनेवाले महान् अनर्थका वर्णन करके अब अर्जुन युद्धके उद्योगरूप अपने कृत्यपर शोक प्रकट करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार पश्चात्ताप करनेके बाद अब अर्जुन अपना निर्णय सुनाते हैं—
सम्बन्ध—भगवान् श्रीकृष्णसे इतनी बात कहनेके बाद अर्जुनने क्या किया, इस जिज्ञासापर अर्जुनकी स्थिति बतलाते हुए संजय कहते हैं—