ग्रन्थ
1अर्जुनविषादयोग

अर्जुनविषादयोग

Arjuna-Vishada-Yoga
The Yoga of Arjuna's Despondency
47 verses · 41 printed blockspp. 3260 · Srimad Bhagavad Gita — Tattva-Vivechaniसाधारण भाषाटीका 40 · साधक-संजीवनी 38 · श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्य 38 · श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीका 41
1धृतराष्ट्र
धृतराष्ट्र उवाच धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः। मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय॥ 1॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
धृतराष्ट्र बोले—हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्रमें एकत्रित, युद्धकी इच्छावाले मेरे और पाण्डुके पुत्रोंने क्या किया?॥ 1॥
सम्बन्ध
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सम्बन्ध—पाण्डवोंके राजसूययज्ञमें उनके महान् ऐश्वर्यको देखकर दुर्योधनके मनमें बड़ी भारी जलन पैदा हो गयी और उन्होंने शकुनि आदिकी सम्मतिसे जुआ खेलनेके लिये युधिष्ठिरको बुलाया और छलसे उनको हराकर उनका सर्वस्व हर लिया। अन्तमें यह निश्चय हुआ कि युधिष्ठिरादि पाँचों भाई द्रौपदीसहित बारह वर्ष वनमें रहें और एक साल छिपकर रहें; इस प्रकार तेरह वर्षतक समस्त राज्यपर दुर्योधनका आधिपत्य रहे और पाण्डवोंके एक सालके अज्ञातवासका भेद न खुल जाय तो तेरह वर्षके बाद पाण्डवोंका राज्य उन्हें लौटा दिया जाय। इस निर्णयके अनुसार तेरह साल बितानेके बाद जब पाण्डवोंने अपना राज्य वापस माँगा तब दुर्योधनने साफ इनकार कर दिया। उन्हें समझानेके लिये द्रुपदके, ज्ञान और अवस्थामें वृद्ध पुरोहितको भेजा गया, परंतु उन्होंने कोई बात नहीं मानी। तब दोनों ओरसे युद्धकी तैयारी होने लगी।

भगवान् श्रीकृष्णको रण-निमन्त्रण देनेके लिये दुर्योधन द्वारका पहुँचे, उसी दिन अर्जुन भी वहाँ पहुँच गये। दोनोंने जाकर देखा—भगवान् अपने भवनमें सो रहे हैं। उन्हें सोते देखकर दुर्योधन उनके सिरहाने एक मूल्यवान् आसनपर जा बैठे और अर्जुन दोनों हाथ जोड़कर नम्रताके साथ उनके चरणोंके सामने खड़े हो गये। जागते ही श्रीकृष्णने अपने सामने अर्जुनको देखा और फिर पीछेकी ओर मुड़कर देखनेपर सिरहानेकी ओर बैठे हुए दुर्योधन दीख पडे़। भगवान् श्रीकृष्णने दोनोंका स्वागत-सत्कार किया और उनके आनेका कारण पूछा। तब दुर्योधनने कहा—“मुझमें और अर्जुनमें आपका एक-सा ही प्रेम है और हम दोनों ही आपके सम्बन्धी हैं; परंतु आपके पास पहले मैं आया हूँ, सज्जनोंका नियम है कि वे पहले आनेवालेकी सहायता किया करते हैं। सारे भूमण्डलमें आज आप ही सब सज्जनोंमें श्रेष्ठ और सम्माननीय हैं, इसलिये आपको मेरी ही सहायता करनी चाहिये।” भगवान्ने कहा—“निःसन्देह, आप पहले आये हैं; परंतु मैंने पहले अर्जुनको ही देखा है। इसलिये मैं दोनोंकी सहायता करूँगा। परंतु शास्त्रानुसार बालकोंकी इच्छा पहले पूरी की जाती है, इसलिये पहले अर्जुनकी इच्छा ही पूरी करनी चाहिये। मैं दो प्रकारसे सहायता करूँगा। एक ओर मेरी अत्यन्त बलशालिनी नारायणी-सेना रहेगी और दूसरी ओर मैं, युद्ध न करनेका प्रण करके, अकेला रहूँगा; मैं शस्त्रका प्रयोग नहीं करूँगा। अर्जुन! धर्मानुसार पहले तुम्हारी इच्छा पूर्ण होनी चाहिये; अतएव दोनोंमेंसे जिसे पसंद करो, माँग लो!” इसपर अर्जुनने शत्रुनाशन नारायण भगवान् श्रीकृष्णको माँग लिया। तब दुर्योधनने उनकी नारायणी-सेना माँग ली और उसे लेकर वे बड़ी प्रसन्नताके साथ हस्तिनापुरको लौट गये।

इसके बाद भगवान्ने अर्जुनसे पूछा—“अर्जुन! जब मैं युद्ध ही नहीं करूँगा, तब तुमने क्या समझकर नारायणी-सेनाको छोड़ दिया और मुझको स्वीकार किया?” अर्जुनने कहा—“भगवन्! आप अकेले ही सबका नाश करनेमें समर्थ हैं, तब मैं सेना लेकर क्या करता? इसके सिवा बहुत दिनोंसे मेरी इच्छा थी कि आप मेरे सारथि बनें, अब इस महायुद्धमें मेरी उस इच्छाको आप अवश्य पूर्ण कीजिये।” भक्तवत्सल भगवान्ने अर्जुनके इच्छानुसार उनके रथके घोड़े हाँकनेका काम स्वीकार किया। इसी प्रसंगके अनुसार भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुनके सारथि बने और युद्धारम्भके समय कुरुक्षेत्रमें उन्हें गीताका दिव्य उपदेश सुनाया। अस्तु।

दुर्योधन और अर्जुनके द्वारकासे वापस लौट आनेपर जिस समय दोनों ओरकी सेना एकत्र हो चुकी थी, उस समय भगवान् श्रीकृष्णने स्वयं हस्तिनापुर जाकर हर तरहसे दुर्योधनको समझानेकी चेष्टा की; परंतु उन्होंने स्पष्ट कह दिया—“मेरे जीते-जी पाण्डव कदापि राज्य नहीं पा सकते, यहाँतक कि सूईकी नोकभर भी जमीन मैं पाण्डवोंको नहीं दूँगा।” (महा0 उद्योग0 127। 22 से 25)। तब अपना न्यायोचित स्वत्व प्राप्त करनेके लिये माता कुन्तीकी आज्ञा और भगवान् श्रीकृष्णकी प्रेरणासे पाण्डवोंने धर्म समझकर युद्धके लिये निश्चय कर लिया।

जब दोनों ओरसे युद्धकी पूरी तैयारी हो गयी, तब भगवान् वेदव्यासजीने धृतराष्ट्रके समीप आकर उनसे कहा—“यदि तुम घोर संग्राम देखना चाहो तो मैं तुम्हें दिव्य नेत्र प्रदान कर सकता हूँ।” इसपर धृतराष्ट्रने कहा— “ब्रह्मर्षिश्रेष्ठ! मैं कुलके इस हत्याकाण्डको अपनी आखों देखना तो नहीं चाहता, परंतु युद्धका सारा वृत्तान्त भलीभाँति सुनना चाहता हूँ।” तब महर्षि वेदव्यासजीने संजयको दिव्यदृष्टि प्रदान करके धृतराष्ट्रसे कहा—“ये संजय तुम्हें युद्धका सब वृत्तान्त सुनावेंगे। युद्धकी समस्त घटनावलियोंको ये प्रत्यक्ष देख, सुन और जान सकेंगे। सामने या पीछेसे, दिनमें या रातमें, गुप्त या प्रकट, क्रियारूपमें परिणत या केवल मनमें आयी हुई, ऐसी कोई बात न होगी जो इनसे तनिक भी छिपी रह सकेगी। ये सब बातोंको ज्यों-की-त्यों जान लेंगे। इनके शरीरसे न तो कोई शस्त्र छू जायगा और न इन्हें जरा भी थकावट ही होगी।”

“यह “होनी” है, अवश्य होगी, इस सर्वनाशको कोई भी रोक नहीं सकेगा। अन्तमें धर्मकी जय होगी।”

महर्षि वेदव्यासजीके चले जानेके बाद धृतराष्ट्रके पूछनेपर संजय उन्हें पृथ्वीके विभिन्न द्वीपोंका वृत्तान्त सुनाते रहे, उसीमें उन्होंने भारतवर्षका भी वर्णन किया। तदनन्तर जब कौरव-पाण्डवोंका युद्ध आरम्भ हो गया और लगातार दस दिनोंतक युद्ध होनेपर पितामह भीष्म रणभूमिमें रथसे गिरा दिये गये, तब संजयने धृतराष्ट्रके पास आकर उन्हें अकस्मात् भीष्मके मारे जानेका समाचार सुनाया (महा0 भीष्म0 13)। उसे सुनकर धृतराष्ट्रको बड़ा ही दुःख हुआ और युद्धकी सारी बातें विस्तारपूर्वक सुनानेके लिये उन्होंने संजयसे कहा, तब संजयने दोनों ओरकी सेनाओंकी व्यूह-रचना आदिका विस्तृत वर्णन किया। इसके बाद धृतराष्ट्रने विशेष विस्तारके साथ आरम्भसे अबतककी पूरी घटनाएँ जाननेके लिये संजयसे प्रश्न किया। यहींसे श्रीमद्भगवद्गीताका पहला अध्याय आरम्भ होता है। महाभारत, भीष्मपर्वमें यह पचीसवाँ अध्याय है। इसके आरम्भमें धृतराष्ट्र संजयसे प्रश्न करते हैं—

2सञ्जय
संजय उवाच दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा। आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत्॥ 2॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
संजय बोले—उस समय राजा दुर्योधनने व्यूहरचनायुक्त पाण्डवोंकी सेनाको देखकर और द्रोणाचार्यके पास जाकर यह वचन कहा॥ 2॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—धृतराष्ट्रके पूछनेपर संजय कहते हैं—

3
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्। व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता॥ 3॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे आचार्य! आपके बुद्धिमान् शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्नद्वारा व्यूहाकार खड़ी की हुई पाण्डुपुत्रोंकी इस बड़ी भारी सेनाको देखिये॥ 3॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—द्रोणाचार्यके पास जाकर दुर्योधनने जो कुछ कहा, अब उसे बतलाते हैं—

4–6Merged
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि। युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः॥ 4॥ धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्। पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः॥ 5॥ युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्। सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥ 6॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
इस सेनामें बड़े-बड़े धनुषोंवाले तथा युद्धमें भीम और अर्जुनके समान शूरवीर सात्यकि और विराट तथा महारथी राजा द्रुपद, धृष्टकेतु और चेकितान तथा बलवान् काशिराज, पुरुजित्, कुन्तिभोज और मुनष्योंमें श्रेष्ठ शैब्य, पराक्रमी युधामन्यु तथा बलवान् उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु एवं द्रौपदीके पाँचों पुत्र—ये सभी महारथी हैं॥ 4—6॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—पाण्डव-सेनाकी व्यूहरचना दिखलाकर अब दुर्योधन तीन श्लोकोंद्वारा पाण्डव-सेनाके प्रमुख महारथियोंके नाम बतलाते हैं—

7
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम। नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान् ब्रवीमि ते॥ 7॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! अपने पक्षमें भी जो प्रधान हैं, उनको आप समझ लीजिये। आपकी जानकारीके लिये मेरी सेनाके जो-जो सेनापति हैं, उनको बतलाता हूँ॥ 7॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—पाण्डव-सेनाके प्रधान योद्धाओंके नाम बतलाकर अब दुर्योधन आचार्य द्रोणसे अपनी सेनाके प्रधान योद्धाओंको जान लेनेके लिये अनुरोध करते हैं—

8
भवान् भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः। अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च॥ 8॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
आप—द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्रामविजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्तका पुत्र भूरिश्रवा॥ 8॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अब दो श्लोकोंमें दुर्योधन अपने पक्षके प्रधान वीरोंके नाम बतलाते हुए अन्यान्य वीरोंके सहित उनकी प्रशंसा करते हैं—

9
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः। नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः॥ 9॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
और भी मेरे लिये जीवनकी आशा त्याग देनेवाले बहुत-से शूरवीर अनेक प्रकारके शस्त्रास्त्रोंसे सुसज्जित और सब-के-सब युद्धमें चतुर हैं॥ 9॥
10
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्। पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्॥ 10॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
भीष्मपितामहद्वारा रक्षित हमारी वह सेना सब प्रकारसे अजेय है और भीमद्वारा रक्षित इन
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अपने महारथी योद्धाओंकी प्रशंसा करके अब दुर्योधन दोनों सेनाओंकी तुलना करते हुए अपनी सेनाको पाण्डव-सेनाकी अपेक्षा अधिक शक्तिशालिनी और उत्तम बतलाते हैं—

(महा0, उद्योग0 55। 67)
(भीष्म0 51। 5)
11
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः। भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि॥ 11॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
इसलिये सब मोर्चोंपर अपनी-अपनी जगह स्थित रहते हुए आपलोग सभी निःसन्देह भीष्मपितामहकी ही सब ओरसे रक्षा करें॥ 11॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार भीष्मद्वारा संरक्षित अपनी सेनाको अजेय बताकर, अब दुर्योधन सब ओरसे भीष्मकी रक्षा करनेके लिये द्रोणाचार्य आदि समस्त महारथियोंसे अनुरोध करते हैं—

12
तस्य संजनयन् हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः। सिंहनादं विनद्योच्चैः शंखं दध्मौ प्रतापवान्॥ 12॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
कौरवोंमें वृद्ध बड़े प्रतापी पितामह भीष्मने उस दुर्योधनके हृदयमें हर्ष उत्पन्न करते हुए उच्च स्वरसे सिंहकी दहाड़के समान गरजकर शंख बजाया॥ 12॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—दुर्योधनके द्वारा अपने पक्षके महारथियोंकी विशेषरूपसे पितामह भीष्मकी प्रशंसा किये जानेका वर्णन सुनाकर अब संजय उसके बादकी घटनाओंका वर्णन करते हैं—

13
ततः शंखाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः। सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्॥ 13॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
इसके पश्चात् शंख और नगारे तथा ढोल, मृदंग और नरसिंघे आदि बाजे एक साथ ही बज उठे। उनका वह शब्द बड़ा भयंकर हुआ॥ 13॥
14
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ। माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतुः॥ 14॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
इसके अनन्तर सफेद घोड़ोंसे युक्त उत्तम रथमें बैठे हुए श्रीकृष्ण महाराज और अर्जुनने भी
सम्बन्ध

सम्बन्ध—धृतराष्ट्रने पूछा था कि युद्धके लिये एकत्र होनेके बाद मेरे और पाण्डुके पुत्रोंने क्या किया, इसके उत्तरमें संजयने अबतक धृतराष्ट्रके पक्षवालोंकी बात सुनायी; अब पाण्डवोंने क्या किया, उसे पाँच श्लोकोंमें बतलाते हैं—

15
पांचजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः। पौण्ड्रं दध्मौ महाशंखं भीमकर्मा वृकोदरः॥ 15॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
श्रीकृष्ण महाराजने पांचजन्य नामक, अर्जुनने देवदत्त नामक और भयानक कर्मवाले भीमसेनने पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया॥ 15॥
1-हृषीकाणीन्द्रियाण्याहुस्तेषामीशो यतो भवान्। हृषीकेशस्ततो विष्णो ख्यातो देवेषु केशव॥ (हरिवंश 279। 46)
विष्णो! हृषीक इन्द्रियोंको कहते हैं। आप उनके ईश (स्वामी) हैं, अतः केशव! आप देवताओंमें “हृषीकेश” नामसे
विख्यात हैं।
2-हर्षात् सुखात् सुखैश्वर्याद्धृषीकेशत्वमश्नुते। (महा0, उद्योग0 70। 9)
हर्ष (हृषी), सुख (क), सुखमय ऐश्वर्य (ईश) के कारण श्रीकृष्ण हृषीकेश-पदवीको प्राप्त हुए हैं।
16
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः। नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ॥ 16॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिरने अनन्तविजय नामक और नकुल तथा सहदेवने सुघोष और
17–18Merged
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः। धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः॥ 17॥ द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते। सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान्दध्मुः पृथक्पृथक्॥ 18॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
श्रेष्ठ धनुषवाले काशिराज और महारथी शिखण्डी एवं धृष्टद्युम्न तथा राजा विराट और अजेय सात्यकि, राजा द्रुपद एवं द्रौपदीके पाँचों पुत्र और बड़ी भुजावाले सुभद्रापुत्र अभिमन्यु— इन सभीने, हे राजन्! सब ओरसे अलग-अलग शंख बजाये॥ 17-18॥
19
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्। नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्॥ 19॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
और उस भयानक शब्दने आकाश और पृथ्वीको भी गुँजाते हुए धार्तराष्ट्रोंके यानी आपके
सम्बन्ध

सम्बन्ध—भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनके पश्चात् पाण्डव-सेनाके अन्यान्य शूरवीरोंद्वारा सब ओर शंख बजाये जानेकी बात कहकर अब उस शंखध्वनिका क्या परिणाम हुआ? उसे संजय बतलाते हैं—

20Split
अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः। प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः॥ 20॥ हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते।
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
सम्बन्ध

सम्बन्ध—पाण्डवोंकी शंखध्वनिसे कौरववीरोंके व्यथित होनेका वर्णन करके, अब चार श्लोकोंमें भगवान् श्रीकृष्णके प्रति कहे हुए अर्जुनके उत्साहपूर्ण वचनोंका वर्णन किया जाता है—

Ed. notethe first half of bg.1.21 is printed inside this block; its translation is printed with that verse
21अर्जुन
अर्जुन उवाच सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत॥ 21॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे राजन्! इसके बाद कपिध्वज अर्जुनने मोर्चा बाँधकर डटे हुए धृतराष्ट्र-सम्बन्धियोंको देखकर, उस शस्त्र चलनेकी तैयारीके समय धनुष उठाकर हृषीकेश श्रीकृष्ण महाराजसे यह वचन कहा—हे अच्युत! मेरे रथको दोनों सेनाओंके बीचमें खड़ा कीजिये॥ 20-21॥
22
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्। कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे॥ 22॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
और जबतक कि मैं युद्धक्षेत्रमें डटे हुए युद्धके अभिलाषी इन विपक्षी योद्धाओंको भली प्रकार देख लूँ कि इस युद्धरूप व्यापारमें मुझे किन-किनके साथ युद्ध करना योग्य है, तबतक
23
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः। धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः॥ 23॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
दुर्बुद्धि दुर्योधनका युद्धमें हित चाहनेवाले जो-जो ये राजालोग इस सेनामें आये हैं, इन युद्ध
24–25सञ्जयMerged
संजय उवाच एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत। सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्॥ 24॥ भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्। उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान् कुरूनिति॥ 25॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
संजय बोले—हे धृतराष्ट्र! अर्जुनद्वारा इस प्रकार कहे हुए महाराज श्रीकृष्णचन्द्रने दोनों सेनाओंके बीचमें भीष्म और द्रोणाचार्यके सामने तथा सम्पूर्ण राजाओंके सामने उत्तम रथको खड़ा करके इस प्रकार कहा कि हे पार्थ! युद्धके लिये जुटे हुए इन कौरवोंको देख॥ 24-25॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अर्जुनके इस प्रकार कहनेपर भगवान्ने क्या किया? अब दो श्लोकोंमें संजय उसका वर्णन करते हैं—

26Split
तत्रापश्यत्स्थितान् पार्थः पितृनथ पितामहान्। आचार्यान्मातुलान् भ्रातॄन् पुत्रान् पौत्रान् सखींस्तथा॥ 26॥ श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि।
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
इसके बाद पृथापुत्र अर्जुनने उन दोनों ही सेनाओंमें स्थित ताऊ-चाचोंको, दादों-परदादोंको, गुरुओंको, मामाओंको, भाइयोंको, पुत्रोंको, पौत्रोंको तथा मित्रोंको, ससुरोंको और सुहृदोंको
सम्बन्ध

सम्बन्ध—भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञा सुनकर अर्जुनने क्या किया? अब उसे बतलाते हैं—

Ed. notethe first half of bg.1.27 is printed inside this block; its translation is printed with that verse
27Split
तान् समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान् बन्धूनवस्थितान्॥ 27॥ कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्।
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
उन उपस्थित सम्पूर्ण बन्धुओंको देखकर वे कुन्तीपुत्र अर्जुन अत्यन्त करुणासे युक्त होकर शोक करते हुए यह बचन बोले॥ 27 वेंका उत्तरार्ध और 28 वेंका पूर्वार्ध॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार सबको देखनेके बाद अर्जुनने क्या किया? अब उसे बतलाते हैं—

Ed. notethe first half of bg.1.28 is printed inside this block; its translation is printed with that verse
28–29अर्जुनMerged
अर्जुन उवाच दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्॥ 28॥ सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति। वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते॥ 29॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
अर्जुन बोले—हे कृष्ण ! युद्धक्षेत्रमें डटे हुए युद्धके अभिलाषी इस स्वजन समुदायको देखकर मेरे अंग शिथिल हुए जा रहे हैं और मुख सूखा जा रहा है तथा मेरे शरीरमें कम्प एवं रोमांच हो रहा है॥ 28वेंका उत्तरार्ध और 29॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—बन्धुस्नेहके कारण अर्जुनकी कैसी स्थिति हुई, अब ढाई श्लोकोंमें अर्जुन स्वयं उसका वर्णन करते हैं—

30
गाण्डीवं स्त्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते। न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥ 30॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हाथसे गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी बहुत जल रही है तथा मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है, इसलिये मैं खड़ा रहनेको भी समर्थ नहीं हूँ॥ 30॥
31
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव। न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे॥ 31॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे केशव! मैं लक्षणोंको भी विपरीत ही देख रहा हूँ तथा युद्धमें स्वजन-समुदायको मारकर
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अपनी विषादयुक्त स्थितिका वर्णन करके अब अर्जुन अपने विचारोंके अनुसार युद्धका अनौचित्य सिद्ध करते हैं—

32
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च। किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा॥ 32॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे कृष्ण! मैं न तो विजय चाहता हूँ और न राज्य तथा सुखोंको ही। हे गोविन्द! हमें ऐसे राज्यसे क्या प्रयोजन है अथवा ऐसे भोगोंसे और जीवनसे भी क्या लाभ है?॥ 32॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अर्जुनने यह कहा कि स्वजनोंको मारनेसे किसी प्रकारका भी हित होनेकी सम्भावना नहीं है, अब फिर वे उसीकी पुष्टि करते हैं—

33
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च। त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च॥ 33॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हमें जिनके लिये राज्य, भोग और सुखादि अभीष्ट हैं, वे ही ये सब धन और जीवनकी
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अब अर्जुन स्वजनवधसे मिलनेवाले राज्य-भोगादिको न चाहनेका कारण दिखलाते हैं—

34
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः। मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा॥ 34॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
गुरुजन, ताऊ-चाचे, लड़के और उसी प्रकार दादे, मामे, ससुर, पौत्र, साले तथा और भी
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार युद्धका अनौचित्य दिखलाकर अब अर्जुन युद्धमें मरनेके लिये तैयार होकर आये हुए स्वजन-समुदायमें कौन-कौन हैं, उनका संक्षेपमें वर्णन करते हैं—

35
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन। अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते॥ 35॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे मधुसूदन! मुझे मारनेपर भी अथवा तीनों लोकोंके राज्यके लिये भी मैं इन सबको मारना नहीं चाहता; फिर पृथ्वीके लिये तो कहना ही क्या है?॥ 35॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—सेनामें उपस्थित शूरवीरोंके साथ अपना सम्बन्ध बतलाकर अब अर्जुन किसी भी हेतुसे इन्हें मारनेमें अपनी अनिच्छा प्रकट करते हैं—

36
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन। पापमेवाश्रयेदस्मान् हत्वैतानाततायिनः॥ 36॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे जनार्दन! धृतराष्ट्रके पुत्रोंको मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियोंको मारकर
सम्बन्ध

सम्बन्ध—यहाँ यदि यह पूछा जाय कि आप त्रिलोकीके राज्यके लिये भी उनको मारना क्यों नहीं चाहते, तो इसपर अर्जुन अपने सम्बन्धियोंको मारनेमें लाभका अभाव और पापकी सम्भावना बतलाकर अपनी बातको पुष्ट करते हैं—

(मनु0 8। 350-51)
(3। 19)
37
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान् स्वबान्धवान्। स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥ 37॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
अतएव हे माधव! अपने ही बान्धव धृतराष्ट्रके पुत्रोंको मारनेके लिये हम योग्य नहीं हैं; क्योंकि अपने ही कुटुम्बको मारकर हम कैसे सुखी होंगे?॥ 37॥
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सम्बन्ध—स्वजनोंको मारना सब प्रकारसे हानिकारक बतलाकर अब अर्जुन अपना मत प्रकट कर रहे हैं—

38–39Merged
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः। कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्॥ 38॥ कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्। कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन॥ 39॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
यद्यपि लोभसे भ्रष्टचित्त हुए ये लोग कुलके नाशसे उत्पन्न दोषको और मित्रोंसे विरोध करनेमें पापको नहीं देखते, तो भी हे जनार्दन! कुलके नाशसे उत्पन्न दोषको जाननेवाले हमलोगोंको इस पापसे हटनेके लिये क्यों नहीं विचार करना चाहिये॥ 38-39॥
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सम्बन्ध—यहाँ यह प्रश्न हो सकता है कि कुटुम्ब-नाशसे होनेवाला दोष तो दोनोंके लिये समान ही है; फिर यदि इस दोषपर विचार करके दुर्योधनादि युद्धसे नहीं हटते, तब तुम ही इतना विचार क्यों करते हो? अर्जुन दो श्लोकोंमें इस प्रश्नका उत्तर देते हैं—

40
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः। धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत॥ 40॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
कुलके नाशसे सनातन कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं, धर्मके नाश हो जानेपर सम्पूर्ण कुलमें
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सम्बन्ध—कुलके नाशसे कौन-कौन-से दोष उत्पन्न होते हैं, इसपर अर्जुन कहते हैं—

41
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः। स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः॥ 41॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे कृष्ण! पापके अधिक बढ़ जानेसे कुलकी स्त्रियाँ अत्यन्त दूषित हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय! स्त्रियोंके दूषित हो जानेपर वर्णसंकर उत्पन्न होता है॥ 41॥
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सम्बन्ध—इस प्रकार जब समस्त कुलमें पाप फैल जाता है तब क्या होता है, अर्जुन अब उसे बतलाते हैं—

42
सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च। पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥ 42॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
वर्णसंकर कुलघातियोंको और कुलको नरकमें ले जानेके लिये ही होता है। लुप्त हुई पिण्ड और जलकी क्रियावाले अर्थात् श्राद्ध और तर्पणसे वंचित इनके पितरलोग भी अधोगतिको
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सम्बन्ध—वर्णसंकर सन्तानके उत्पन्न होनेसे क्या-क्या हानियाँ होती हैं, अर्जुन अब उन्हें बतलाते हैं—

43
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः। उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः॥ 43॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
इन वर्णसंकरकारक दोषोंसे कुलघातियोंके सनातन कुल-धर्म और जाति-धर्म नष्ट हो
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सम्बन्ध—वर्णसंकरकारक दोषोंसे क्या हानि होती है, अब उसे बतलाते हैं—

44
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन। नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम॥ 44॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे जनार्दन! जिनका कुलधर्म नष्ट हो गया है, ऐसे मनुष्योंका अनिश्चित कालतक नरकमें
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सम्बन्ध—“कुलधर्म” और “जातिधर्म” के नाशसे क्या हानि है; अब इसपर कहते हैं—

45
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्। यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः॥ 45॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हा! शोक! हमलोग बुद्धिमान् होकर भी महान् पाप करनेको तैयार हो गये हैं, जो राज्य और सुखके लोभसे स्वजनोंको मारनेके लिये उद्यत हो गये हैं॥ 45॥
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सम्बन्ध—इस प्रकार स्वजन-वधसे होनेवाले महान् अनर्थका वर्णन करके अब अर्जुन युद्धके उद्योगरूप अपने कृत्यपर शोक प्रकट करते हैं—

46
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः। धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्॥ 46॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
यदि मुझ शस्त्ररहित एवं सामना न करनेवालेको शस्त्र हाथमें लिये हुए धृतराष्ट्रके पुत्र रणमें मार डालें तो वह मारना भी मेरे लिये अधिक कल्याणकारक होगा॥ 46॥
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सम्बन्ध—इस प्रकार पश्चात्ताप करनेके बाद अब अर्जुन अपना निर्णय सुनाते हैं—

47सञ्जय
संजय उवाच एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत्। विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः॥ 47॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
संजय बोले—रणभूमिमें शोकसे उद्विग्न मनवाला अर्जुन इस प्रकार कहकर, बाणसहित धनुषको त्यागकर रथके पिछले भागमें बैठ गया॥ 47॥ है, इसीसे इसके लिये “श्रीकृष्णार्जुनसंवादे.......योगो नाम” कहा गया है।
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सम्बन्ध—भगवान् श्रीकृष्णसे इतनी बात कहनेके बाद अर्जुनने क्या किया, इस जिज्ञासापर अर्जुनकी स्थिति बतलाते हुए संजय कहते हैं—

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः॥
1.1श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीका