भक्तियोग
सम्बन्ध—दूसरे अध्यायसे लेकर छठे अध्यायतक भगवान्ने जगह-जगह निर्गुण ब्रह्मकी और सगुण-साकार परमेश्वरकी उपासनाकी प्रशंसा की है। सातवें अध्यायसे ग्यारहवें अध्यायतक तो विशेषरूपसे सगुण-साकार भगवान्की उपासनाका महत्त्व दिखलाया है। इसीके साथ पाँचवें अध्यायमें सतरहवेंसे छब्बीसवें श्लोकतक, छठे अध्यायमें चौबीसवेंसे उनतीसवेंतक, आठवें अध्यायमें ग्यारहवेंसे तेरहवेंतक तथा इसके सिवा और भी कितनी ही जगह निर्गुण-निराकारकी उपासनाका महत्त्व भी दिखलाया है। आखिर ग्यारहवें अध्यायके अन्तमें सगुण-साकार भगवान्की अनन्य भक्तिका फल भगवत्प्राप्ति बतलाकर “मत्कर्मकृत्” से आरम्भ होनेवाले इस अन्तिम श्लोकमें सगुण-साकारस्वरूप भगवान्के भक्तकी विशेषरूपसे बड़ाई की। इसपर अर्जुनके मनमें यह जिज्ञासा हुई कि निर्गुण-निराकार ब्रह्मकी और सगुण-साकार भगवान्की उपासना करनेवाले दोनों प्रकारके उपासकोंमें उत्तम उपासक कौन है, इसी जिज्ञासाके अनुसार अर्जुन पूछ रहे हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार अर्जुनके पूछनेपर उसके उत्तरमें भगवान् सगुण-साकारके उपासकोंको उत्तम बतलाते हैं—
सम्बन्ध—पूर्व श्लोकमें सगुण-साकार परमेश्वरके उपासकोंको उत्तम योगवेत्ता बतलाया, इसपर यह जिज्ञासा हो सकती है कि तो क्या निर्गुण-निराकार ब्रह्मके उपासक उत्तम योगवेत्ता नहीं हैं? इसपर कहते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार निर्गुण-उपासना और उसके फलका प्रतिपादन करनेके पश्चात् अब देहाभिमानियोंके लिये अव्यक्त गतिकी प्राप्तिको कठिन बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार निर्गुण-निराकार ब्रह्मकी उपासनासे देहाभिमानियोंके लिये परमात्माकी प्राप्ति कठिन बतलानेके उपरान्त अब दो श्लोकोंद्वारा सगुण परमेश्वरकी उपासनासे परमेश्वरकी प्राप्ति शीघ्र और अनायास होनेकी बात कहते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार पूर्व श्लोकोंमें निर्गुण-उपासनाकी अपेक्षा सगुण-उपासनाकी सुगमताका प्रतिपादन किया गया। इसलिये अब भगवान् अर्जुनको उसी प्रकार मन, बुद्धि लगाकर सगुण-उपासना करनेकी आज्ञा देते हैं—
सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा हो सकती है कि यदि मैं उपर्युक्त प्रकारसे आपमें मन-बुद्धि न लगा सकूँ तो मुझे क्या करना चाहिये। इसपर कहते हैं—
सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि यदि इस प्रकार अभ्यासयोग भी मैं न कर सकूँ तो मुझे क्या करना चाहिये। इसपर कहते हैं—
सम्बन्ध—यहाँ अर्जुनको यह जिज्ञासा हो सकती है कि यदि उपर्युक्त प्रकारसे आपके लिये मैं कर्म भी न कर सकूँ तो मुझे क्या करना चाहिये। इसपर कहते हैं—
सम्बन्ध—छठे श्लोकसे आठवेंतक अनन्य ध्यानका फलसहित वर्णन करके नवेंसे ग्यारहवें श्लोकतक एक प्रकारके साधनमें असमर्थ होनेपर दूसरा साधन बतलाते हुए अन्तमें “सर्वकर्मफलत्याग” रूप साधनका वर्णन किया गया, इससे यह शंका हो सकती है कि “कर्मफलत्याग” रूप साधन पूर्वोक्त अन्य साधनोंकी अपेक्षा निम्न श्रेणीका होगा; अतः ऐसी शंकाको हटानेके लिये कर्मफलके त्यागका महत्त्व अगले श्लोकमें बतलाया जाता है—
सम्बन्ध—उपर्युक्त श्लोकोंमें भगवान्की प्राप्तिके लिये भक्तिके अंगभूत अलग-अलग साधन बतलाकर उनका फल परमेश्वरकी प्राप्ति बतलाया गया, अतएव भगवान्को प्राप्त हुए प्रेमी भक्तोंके लक्षण जाननेकी इच्छा होनेपर अब सात श्लोकोंमें भगवत्प्राप्त ज्ञानी भक्तोंके लक्षण बतलाये जाते हैं—
सम्बन्ध—परमात्माको प्राप्त हुए सिद्ध भक्तोंके लक्षण बतलाकर अब उन लक्षणोंको आदर्श मानकर बड़े प्रयत्नके साथ उनका भलीभाँति सेवन करनेवाले, परम श्रद्धालु, शरणागत भक्तोंकी प्रशंसा करनेके लिये उनको अपना अत्यन्त प्रिय बतलाकर भगवान् इस अध्यायका उपसंहार करते हैं—