ग्रन्थ
12भक्तियोग

भक्तियोग

Bhakti-Yoga
The Yoga of Devotion
20 verses · 18 printed blockspp. 561588 · Srimad Bhagavad Gita — Tattva-Vivechaniसाधारण भाषाटीका 18 · साधक-संजीवनी 17 · श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्य 20 · श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीका 18
1अर्जुन
अर्जुन उवाच एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते। ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः॥ 1॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
अर्जुन बोले—जो अनन्यप्रेमी भक्तजन पूर्वोक्त प्रकारसे निरन्तर आपके भजन-ध्यानमें लगे रहकर आप सगुणरूप परमेश्वरको और दूसरे जो केवल अविनाशी सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्मको ही अतिश्रेष्ठ भावसे भजते हैं—उन दोनों प्रकारके उपासकोंमें अति उत्तम योगवेत्ता
सम्बन्ध

सम्बन्ध—दूसरे अध्यायसे लेकर छठे अध्यायतक भगवान्ने जगह-जगह निर्गुण ब्रह्मकी और सगुण-साकार परमेश्वरकी उपासनाकी प्रशंसा की है। सातवें अध्यायसे ग्यारहवें अध्यायतक तो विशेषरूपसे सगुण-साकार भगवान्की उपासनाका महत्त्व दिखलाया है। इसीके साथ पाँचवें अध्यायमें सतरहवेंसे छब्बीसवें श्लोकतक, छठे अध्यायमें चौबीसवेंसे उनतीसवेंतक, आठवें अध्यायमें ग्यारहवेंसे तेरहवेंतक तथा इसके सिवा और भी कितनी ही जगह निर्गुण-निराकारकी उपासनाका महत्त्व भी दिखलाया है। आखिर ग्यारहवें अध्यायके अन्तमें सगुण-साकार भगवान्की अनन्य भक्तिका फल भगवत्प्राप्ति बतलाकर “मत्कर्मकृत्” से आरम्भ होनेवाले इस अन्तिम श्लोकमें सगुण-साकारस्वरूप भगवान्के भक्तकी विशेषरूपसे बड़ाई की। इसपर अर्जुनके मनमें यह जिज्ञासा हुई कि निर्गुण-निराकार ब्रह्मकी और सगुण-साकार भगवान्की उपासना करनेवाले दोनों प्रकारके उपासकोंमें उत्तम उपासक कौन है, इसी जिज्ञासाके अनुसार अर्जुन पूछ रहे हैं—

2श्रीभगवान्
श्रीभगवान् उवाच
श्रीभगवानुवाच मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते। श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः॥ 2॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
श्रीभगवान् बोले—मुझमें मनको एकाग्र करके निरन्तर मेरे भजन-ध्यानमें लगे हुए जो भक्तजन अतिशय श्रेष्ठ श्रद्धासे युक्त होकर मुझ सगुणरूप परमेश्वरको भजते हैं, वे मुझको योगियोंमें अति उत्तम योगी मान्य हैं॥ 2॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार अर्जुनके पूछनेपर उसके उत्तरमें भगवान् सगुण-साकारके उपासकोंको उत्तम बतलाते हैं—

3–4Merged
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते। सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्॥ 3॥ सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः। ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः॥ 4॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
परन्तु जो पुरुष इन्द्रियोंके समुदायको भली प्रकार वशमें करके मन-बुद्धिसे परे सर्वव्यापी, अकथनीय स्वरूप और सदा एकरस रहनेवाले, नित्य, अचल, निराकार, अविनाशी सच्चिदानन्दघन ब्रह्मको निरन्तर एकीभावसे ध्यान करते हुए भजते हैं, वे सम्पूर्ण भूतोंके हितमें रत और सबमें समान भाववाले योगी मुझको ही प्राप्त होते हैं॥ 3-4॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—पूर्व श्लोकमें सगुण-साकार परमेश्वरके उपासकोंको उत्तम योगवेत्ता बतलाया, इसपर यह जिज्ञासा हो सकती है कि तो क्या निर्गुण-निराकार ब्रह्मके उपासक उत्तम योगवेत्ता नहीं हैं? इसपर कहते हैं—

* या
दोहनेऽवहनने
मथनोपलेपप्रेङ्खेङ्खनार्भरुदितोक्षणमार्जनादौ।
गायन्ति चैनमनुरक्तधियोऽश्रुकण्ठ्यो धन्या व्रजस्त्रिय उरुक्रमचित्तयानाः॥
(श्रीमद्भागवत 10। 44। 15)
“जो गौओंका दूध दुहते समय, धान आदि कूटते समय, दही बिलोते समय, आँगन लीपते समय, बालकोंको पालनेमें
झुलाते समय, रोते हुए बच्चोंको लोरी देते समय, घरोंमें जल छिड़कते समय और झाड़ू देने आदि कर्मोंको करते समय,
प्रेमपूर्ण चित्तसे आँखोंमें आँसू भरकर गद्गद वाणीसे श्रीकृष्णका गान किया करती हैं—इस प्रकार सदा श्रीकृष्णमें ही चित्त
लगाये रखनेवाली वे व्रजवासिनी गोपरमणियाँ धन्य हैं।”
5
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् । अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते॥ 5॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
उन सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्ममें आसक्त चित्तवाले पुरुषोंके साधनमें परिश्रम विशेष है, क्योंकि देहाभिमानियोंके द्वारा अव्यक्तविषयक गति दुःखपूर्वक प्राप्त की
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार निर्गुण-उपासना और उसके फलका प्रतिपादन करनेके पश्चात् अब देहाभिमानियोंके लिये अव्यक्त गतिकी प्राप्तिको कठिन बतलाते हैं—

6
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्पराः। अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते॥ 6॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
परन्तु जो मेरे परायण रहनेवाले भक्तजन सम्पूर्ण कर्मोंको मुझमें अर्पण करके मुझ सगुणरूप परमेश्वरको ही अनन्य भक्तियोगसे निरन्तर चिन्तन करते हुए भजते हैं॥ 6॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार निर्गुण-निराकार ब्रह्मकी उपासनासे देहाभिमानियोंके लिये परमात्माकी प्राप्ति कठिन बतलानेके उपरान्त अब दो श्लोकोंद्वारा सगुण परमेश्वरकी उपासनासे परमेश्वरकी प्राप्ति शीघ्र और अनायास होनेकी बात कहते हैं—

7
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्। भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्॥ 7॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे अर्जुन! उन मुझमें चित्त लगानेवाले प्रेमी भक्तोंका मैं शीघ्र ही मृत्युरूप संसार-समुद्रसे
8
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय। निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥ 8॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
मुझमें मनको लगा और मुझमें ही बुद्धिको लगा; इसके उपरान्त तू मुझमें ही निवास करेगा,
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार पूर्व श्लोकोंमें निर्गुण-उपासनाकी अपेक्षा सगुण-उपासनाकी सुगमताका प्रतिपादन किया गया। इसलिये अब भगवान् अर्जुनको उसी प्रकार मन, बुद्धि लगाकर सगुण-उपासना करनेकी आज्ञा देते हैं—

9
अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम्। अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय॥ 9॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
यदि तू मनको मुझमें अचल स्थापन करनेके लिये समर्थ नहीं है तो हे अर्जुन! अभ्यासरूप योगके द्वारा मुझको प्राप्त होनेके लिये इच्छा कर॥ 9॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा हो सकती है कि यदि मैं उपर्युक्त प्रकारसे आपमें मन-बुद्धि न लगा सकूँ तो मुझे क्या करना चाहिये। इसपर कहते हैं—

10
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव। मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि॥ 10॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
यदि तू उपर्युक्त अभ्यासमें भी असमर्थ है तो केवल मेरे लिये कर्म करनेके ही परायण हो जा। इस प्रकार मेरे निमित्त कर्मोंको करता हुआ भी मेरी प्राप्तिरूप सिद्धिको ही प्राप्त
सम्बन्ध

सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि यदि इस प्रकार अभ्यासयोग भी मैं न कर सकूँ तो मुझे क्या करना चाहिये। इसपर कहते हैं—

11
अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः। सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्॥ 11॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
यदि मेरी प्राप्तिरूप योगके आश्रित होकर उपर्युक्त साधनको करनेमें भी तू असमर्थ है तो मन-बुद्धि आदिपर विजय प्राप्त करनेवाला होकर सब कर्मोंके फलका त्याग कर॥ 11॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—यहाँ अर्जुनको यह जिज्ञासा हो सकती है कि यदि उपर्युक्त प्रकारसे आपके लिये मैं कर्म भी न कर सकूँ तो मुझे क्या करना चाहिये। इसपर कहते हैं—

12
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते। ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ॥ 12॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
मर्मको न जानकर किये हुए अभ्याससे ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञानसे मुझ परमेश्वरके स्वरूपका ध्यान श्रेष्ठ है और ध्यानसे भी सब कर्मोंके फलका त्याग श्रेष्ठ है; क्योंकि त्यागसे तत्काल
सम्बन्ध

सम्बन्ध—छठे श्लोकसे आठवेंतक अनन्य ध्यानका फलसहित वर्णन करके नवेंसे ग्यारहवें श्लोकतक एक प्रकारके साधनमें असमर्थ होनेपर दूसरा साधन बतलाते हुए अन्तमें “सर्वकर्मफलत्याग” रूप साधनका वर्णन किया गया, इससे यह शंका हो सकती है कि “कर्मफलत्याग” रूप साधन पूर्वोक्त अन्य साधनोंकी अपेक्षा निम्न श्रेणीका होगा; अतः ऐसी शंकाको हटानेके लिये कर्मफलके त्यागका महत्त्व अगले श्लोकमें बतलाया जाता है—

13–14Merged
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥ 13॥ सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः। मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥ 14॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो पुरुष सब भूतोंमें द्वेषभावसे रहित, स्वार्थरहित सबका प्रेमी और हेतुरहित दयालु है तथा ममतासे रहित, अहंकारसे रहित, सुख-दुःखोंकी प्राप्तिमें सम और क्षमावान् है अर्थात् अपराध करनेवालेको भी अभय देनेवाला है; तथा जो योगी निरन्तर संतुष्ट है, मन-इन्द्रियोंसहित शरीरको वशमें किये हुए है और मुझमें दृढ़ निश्चयवाला है—वह मुझमें अर्पण किये हुए मन-बुद्धिवाला मेरा भक्त मुझको प्रिय है॥ 13-14॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—उपर्युक्त श्लोकोंमें भगवान्की प्राप्तिके लिये भक्तिके अंगभूत अलग-अलग साधन बतलाकर उनका फल परमेश्वरकी प्राप्ति बतलाया गया, अतएव भगवान्को प्राप्त हुए प्रेमी भक्तोंके लक्षण जाननेकी इच्छा होनेपर अब सात श्लोकोंमें भगवत्प्राप्त ज्ञानी भक्तोंके लक्षण बतलाये जाते हैं—

15
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः। हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥ 15॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जिससे कोई भी जीव उद्वेगको प्राप्त नहीं होता और जो स्वयं भी किसी जीवसे उद्वेगको प्राप्त नहीं होता; तथा जो हर्ष, अमर्ष, भय और उद्वेगादिसे रहित है—वह भक्त मुझको
16
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः। सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥ 16॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो पुरुष आकांक्षासे रहित, बाहर-भीतरसे शुद्ध, चतुर, पक्षपातसे रहित और दुःखोंसे छूटा हुआ है—वह सब आरम्भोंका त्यागी मेरा भक्त मुझको प्रिय है॥ 16॥
17
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति। शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः॥ 17॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मोंका त्यागी है—वह भक्तियुक्त पुरुष मुझको
18
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः। शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः॥ 18॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो शत्रु-मित्रमें और मान-अपमानमें सम है तथा सरदी, गरमी और सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंमें
19
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित्। अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः॥ 19॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो निन्दा-स्तुतिको समान समझनेवाला, मननशील और जिस किसी प्रकारसे भी शरीरका निर्वाह होनेमें सदा ही सन्तुष्ट है और रहनेके स्थानमें ममता और आसक्तिसे रहित है—वह स्थिरबुद्धि भक्तिमान् पुरुष मुझको प्रिय है॥ 19॥
20
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते। श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः॥ 20॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
परन्तु जो श्रद्धायुक्त पुरुष मेरे परायण होकर इस ऊपर कहे हुए धर्ममय अमृतको निष्काम प्रेम भावसे सेवन करते हैं, वे भक्त मुझको अतिशय प्रिय हैं॥ 20॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—परमात्माको प्राप्त हुए सिद्ध भक्तोंके लक्षण बतलाकर अब उन लक्षणोंको आदर्श मानकर बड़े प्रयत्नके साथ उनका भलीभाँति सेवन करनेवाले, परम श्रद्धालु, शरणागत भक्तोंकी प्रशंसा करनेके लिये उनको अपना अत्यन्त प्रिय बतलाकर भगवान् इस अध्यायका उपसंहार करते हैं—

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः॥
12.1श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीका