भक्तियोग
द्वितीयप्रभृतिषु
अध्यायेषु
विभूत्यन्तेषु परमात्मनो ब्रह्मणः अक्षरस्य विध्वस्तसर्व-विशेषणस्य उपासनम् उक्तम्।
सर्वयोगैश्वर्यसर्वज्ञानशक्तिमत्सत्त्वोपाधेः ईश्वरस्य तव च उपासनं तत्र तत्र उक्तम्।
विश्वरूपाध्याये तु ऐश्वरम् आद्यं समस्त-जगदात्मरूपं विश्वरूपं त्वदीयं दर्शितम् उपासना-र्थम् एव त्वया, तत् च दर्शयित्वा उक्तवान् असि “मत्कर्मकृत्” इत्यादि, अतः अहम् अनयोः उभयोः पक्षयोः विशिष्टतरबुभुत्सया त्वां पृच्छामि इति—
दूसरे अध्यायसे लेकर विभूतियोगतक अर्थात् दसवें अध्यायतक समस्त विशेषणोंसे रहित अक्षरब्रह्म परमात्माकी उपासनाका वर्णन किया गया है।
तथा उन्हीं अध्यायोंमें स्थान-स्थानपर सम्पूर्ण योग-ऐश्वर्य और सम्पूर्ण ज्ञान-शक्तिसे युक्त, सत्त्वगुणरूप उपाधिवाले आप परमेश्वरकी उपासनाका भी वर्णन किया गया है।
तथा विश्वरूप (एकादश) अध्यायमें आपने उपासनाके लिये ही मुझे सम्पूर्ण ऐश्वर्ययुक्त, सबका आदि और समस्त जगत्का आत्मारूप अपना विश्वरूप भी दिखलाया है और वह रूप दिखलाकर आपने “मेरे ही लिये कर्म करनेवाला हो” इत्यादि वचन भी कहे हैं। इसलिये इन दोनों पक्षोंमें कौन-सा पक्ष श्रेष्ठतर है, यह जाननेकी इच्छासे मैं आपसे पूछता हूँ। इस प्रकार अर्जुन बोले—
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एवम् इति अतीतानन्तरश्लोके उक्तम् अर्थं परामृशति, “मत्कर्मकृत्” इत्यादिना।
एवं सततयुक्ता नैरन्तर्येण भगवत्कर्मादौ यथोक्ते अर्थे समाहिताः सन्तः प्रवृत्ता इत्यर्थः। ये भक्ता अनन्यशरणाः सन्तः त्वां यथादर्शितं विश्वरूपं पर्युपासते ध्यायन्ति।
ये च अन्ये अपि त्यक्तसर्वैषणाः सन्न्यस्त-सर्वकर्माणो यथाविशेषितं ब्रह्म अक्षरं निरस्त-सर्वोपाधित्वाद् अव्यक्तम् अकरणगोचरम्। यद् हि लोके करणगोचरं तद् व्यक्तम् उच्यते अञ्जेः धातोः तत्कर्मकत्वाद् इदं तु अक्षरं तद्विपरीतम्, शिष्टैः च उच्यमानैः विशेषणैः विशिष्टं तद् ये च अपि पर्युपासते।
तेषाम् उभयेषां मध्ये के योगवित्तमाः के अतिशयेन योगविद इत्यर्थः॥ 1॥
“एवम्” शब्दसे जिसके आदिमें “मत्कर्मकृत्” यह पद है, उस पासमें ही कहे हुए श्लोकके अर्थका अर्थात् एकादश अध्यायके अन्तिम श्लोकमें कहे हुए अर्थका (अर्जुन) निर्देश करता है।
इस प्रकार निरन्तरतासे उपर्युक्त साधनोंमें अर्थात् भगवदर्थ कर्म करने आदिमें दत्तचित्त हुए—लगे हुए जो भक्त, अनन्य भावसे शरण होकर पूर्वदर्शित विश्वरूपधारी आप परमेश्वरकी उपासना करते हैं— उसीका ध्यान किया करते हैं।
तथा दूसरे जो समस्त वासनाओंका त्याग करनेवाले, सर्व-कर्म-संन्यासी (ज्ञानीजन) उपर्युक्त विशेषणोंसे युक्त परम अक्षर, जो समस्त उपाधियोंसे रहित होनेके कारण अव्यक्त है, ऐसे इन्द्रियादि करणोंसे अतीत ब्रह्मकी उपासना किया करते हैं। संसारमें जो इन्द्रियादि करणोंसे जाननेमें आनेवाला पदार्थ है वह व्यक्त कहा जाता है; क्योंकि “अञ्ज” धातुका अर्थ इन्द्रियगोचर होना ही है और यह अक्षर उससे विपरीत अकरणगोचर हैं एवं महापुरुषोंद्वारा कहे हुए विशेषणोंसे युक्त हैं, ऐसे ब्रह्मकी जो उपासना करते हैं।
उन दोनोंमें श्रेष्ठतर योगवेत्ता कौन हैं? अर्थात् अधिकतासे योग जाननेवाले कौन हैं?॥ 1॥
ये
तु
अक्षरोपासकाः
सम्यग्दर्शिनो निवृत्तैषणाः ते तावत् तिष्ठन्तु तान् प्रति यद् वक्तव्यं तद् उपरिष्टाद् वक्ष्यामः। ये तु इतरे—
श्रीभगवान् बोले—
जो कामनाओंसे रहित पूर्णज्ञानी अक्षरब्रह्मके उपासक हैं उनको अभी रहने दो, उनके प्रति जो कुछ कहना है वह आगे कहेंगे, परंतु जो दूसरे हैं—
मयि विश्वरूपे परमेश्वरे आवेश्य समाधाय मनो ये भक्ताः सन्तः, मां सर्वयोगेश्वराणाम् अधीश्वरं सर्वज्ञं विमुक्तरागादिक्लेशतिमिरदृष्टिम्, नित्ययुक्ता
अतीतानन्तराध्यायान्तोक्त-श्लोकार्थन्यायेन सततयुक्ताः सन्त उपासते श्रद्धया परया प्रकृष्टया उपेताः, ते मे मम मता अभिप्रेता युक्ततमा इति।
नैरन्तर्येण हि ते मच्चित्ततया अहोरात्रम् अतिवाहयन्ति अतो युक्तं तान् प्रति युक्ततमा इति वक्तुम्॥ 2॥
जो भक्त मुझ विश्वरूप परमेश्वरमें मनको समाधिस्थ करके सर्व योगेश्वरोंके अधीश्वर रागादि पञ्चक्लेशरूप अज्ञानदृष्टिसे रहित मुझ सर्वज्ञ परमेश्वरकी पिछले (एकादश) अध्यायके अन्तिम श्लोकके अर्थानुसार निरन्तर तत्पर हुए उत्तम श्रद्धासे युक्त होकर उपासना करते हैं, वे श्रेष्ठतम योगी हैं, यह मैं मानता हूँ।
क्योंकि वे लगातार मुझमें ही चित्त लगाकर रात-दिन व्यतीत करते हैं, अतः उनको युक्ततम कहना उचित ही है॥ 2॥
किम् इतरे युक्ततमा न भवन्ति, न, किं तु तान् प्रति यद् वक्तव्यं तत् शृणु—
तो क्या दूसरे युक्ततम नहीं हैं? यह बात नहीं, किंतु उनके विषयमें जो कुछ कहना है सो सुन—
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ये तु अक्षरम् अनिर्देश्यम् अव्यक्तत्वाद् अशब्दगोचरम् इति न निर्देष्टुं शक्यते अतः अनिर्देश्यम् अव्यक्तं न केन अपि प्रमाणेन व्यज्यते इति अव्यक्तं पर्युपासते परि समन्ताद् उपासते।
उपासनं नाम यथाशास्त्रम् उपास्यस्य अर्थस्य विषयीकरणेन सामीप्यम् उपगम्य तैलधारावत् समानप्रत्ययप्रवाहेण दीर्घकालं यद् आसनं तद् उपासनम् आचक्षते।
अक्षरस्य विशेषणम् आह—
सर्वत्रगं व्योमवद् व्यापि, अचिन्त्यम् च अव्यक्तत्वाद् अचिन्त्यम्। यद् हि करण-गोचरं तद् मनसा अपि चिन्त्यं तद्विपरीतत्वाद् अचिन्त्यम् अक्षरम् कूटस्थम्।
दृश्यमानगुणम् अन्तर्दोषं वस्तु कूटं कूटरूपं कूटसाक्ष्यम् इत्यादौ कूटशब्दः प्रसिद्धो लोके। तथा च अविद्यादि अनेकसंसारबीजम् अन्तर्दोषवद्
मायाव्याकृतादिशब्दवाच्यं “मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्” (श्वे0 उ0 4। 10) “मम माया दुरत्यया” इत्यादौ प्रसिद्धं यत् तत् कूटम्। तस्मिन् कूटे स्थितं कूटस्थं तदध्यक्षतया।
अथवा राशिः इव स्थितं कूटस्थम् अत एव अचलं यस्माद् अचलं तस्माद् ध्रुवं नित्यम् इत्यर्थः॥ 3॥
परंतु जो पुरुष उस अक्षरकी—जो कि अव्यक्त होनेके कारण शब्दका विषय न होनेसे किसी प्रकार भी बतलाया नहीं जा सकता इसलिये अनिर्देश्य है और किसी भी प्रमाणसे प्रत्यक्ष नहीं किया जा सकता इसलिये अव्यक्त है—सब प्रकारसे उपासना करते हैं।
उपास्य वस्तुको शास्त्रोक्त विधिसे बुद्धिका विषय बनाकर उसके समीप पहुँचकर तैलधाराके तुल्य समान वृत्तियोंके प्रवाहसे जो दीर्घकालतक उसमें स्थित रहना है, उसको “उपासना” कहते हैं—
उस अक्षरके विशेषण बतलाते हैं—
वह आकाशके समान सर्वव्यापक है और अव्यक्त होनेसे अचिन्त्य है; क्योंकि जो वस्तु इन्द्रियादि करणोंसे जाननेमें आती है उसीका मनसे भी चिन्तन किया जा सकता है। परंतु अक्षर उससे विपरीत होनेके कारण अचिन्त्य और कूटस्थ है।
जो वस्तु ऊपरसे गुणयुक्त प्रतीत होती हो और भीतर दोषोंसे भरी हो उसका नाम “कूट” है। संसारमें भी “कूटरूप” “कूटसाक्ष्य” इत्यादि प्रयोगोंमें कूट शब्द (इसी अर्थमें) प्रसिद्ध है। वैसे ही जो अविद्यादि अनेक संसारोंकी बीजभूत अन्तर्दोषोंसे युक्त प्रकृति “माया-अव्याकृत” आदि शब्दोंद्वारा कही जाती है एवं “प्रकृतिको तो माया और महेश्वरको मायापति समझना चाहिये” “मेरी माया दुस्तर है” इत्यादि श्रुति-स्मृतिके वचनोंमें जो माया नामसे प्रसिद्ध है, उसका नाम कूट है। उस कूट (नामक माया)-में जो उसका अधिष्ठातारूपसे स्थित हो रहा हो उसका नाम कूटस्थ है।
अथवा राशि—ढेरकी भाँति जो (कुछ भी क्रिया न करता हुआ) स्थित हो उसका नाम कूटस्थ है। इस प्रकार कूटस्थ होनेके कारण जो अचल है और अचल होनेके कारण ही जो ध्रुव अर्थात् नित्य है (उस ब्रह्मकी जो लोग उपासना करते हैं)॥ 3॥
सन्नियम्य सम्यग् नियम्य संहृत्य इन्द्रियग्रामं इन्द्रियसमुदायम्, सर्वत्र सर्वस्मिन् काले समबुद्धयः समा तुल्या बुद्धिः येषाम् इष्टानिष्टप्राप्तौ ते समबुद्धयः ते ये एवंविधाः ते प्राप्नुवन्ति माम् एव सर्वभूतहिते रताः।
न तु तेषां वक्तव्यं किञ्चिद् मां ते प्राप्नुवन्ति इति। “ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्” इति हि उक्तम्। नहि भगवत्स्वरूपाणां सतां युक्ततमत्वम् अयुक्ततमत्वं वा वाच्यम्॥ 4॥
तथा जो इन्द्रियोंके समुदायको भली प्रकार संयम करके—उन्हें विषयोंसे रोककर, सर्वत्र—सब समय समबुद्धिवाले होते हैं अर्थात् इष्ट और अनिष्टकी प्राप्तिमें जिनकी बुद्धि समान रहती है, ऐसे वे समस्त भूतोंके हितमें तत्पर अक्षरोपासक मुझे ही प्राप्त करते हैं।
उन अक्षर-उपासकोंके सम्बन्धमें “वे मुझे प्राप्त होते हैं” इस विषयमें तो कहना ही क्या है; क्योंकि “ज्ञानीको तो मैं अपना आत्मा ही समझता हूँ” यह पहले ही कहा जा चुका है। जो भगवत्स्वरूप ही हैं उन संतजनोंके विषयमें युक्ततम या अयुक्ततम कुछ भी कहना नहीं बन सकता॥ 4॥
किं तु—
किंतु—
क्लेशः अधिकतरो यद्यपि मत्कर्मादिपराणां क्लेशः अधिक एव क्लेशः अधिकतरः तु अक्षरात्मनां
परमार्थदर्शिनां
देहाभिमान-परित्यागनिमित्तः अव्यक्तासक्तचेतसाम् अव्यक्ते आसक्तं चेतो येषां ते अव्यक्तासक्तचेतसः तेषाम् अव्यक्तासक्तचेतसाम्।
अव्यक्ता हि यस्माद् या गतिः अक्षरात्मिका दुःखं सा देहवद्भिः देहाभिमानवद्भिः अवाप्यते अतः क्लेशः अधिकतरः। अक्षरोपासकानां यद् वर्तनं तद् उपरिष्टाद् वक्ष्यामः॥ 5॥
(उनको) क्लेश अधिकतर होता है। यद्यपि मेरे ही लिये कर्मादि करनेमें लगे हुए साधकोंको भी बहुत क्लेश होता है, परंतु जिनका चित्त अव्यक्तमें आसक्त है, उन अक्षरचिन्तक परमार्थदर्शियोंको तो देहाभिमानका परित्याग करना पड़ता है, इसलिये उन्हें और भी अधिक क्लेश उठाना पड़ता है।
क्योंकि जो अक्षरात्मिका अव्यक्तगति है वह देहाभिमानयुक्त पुरुषोंको बड़े कष्टसे प्राप्त होती है, अतः उनको अधिकतर क्लेश होता है। उन अक्षरोपासकोंका जैसा आचार-विचार-व्यवहार होता है वह आगे (“अद्वेष्टा” इत्यादि श्लोकोंसे) बतलायेंगे॥ 5॥
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि ईश्वरे सन्न्यस्य मत्परा अहं परो येषां ते मत्पराः सन्तः अनन्येन एव अविद्यमानम् अन्यद् आलम्बनं विश्वरूपं देवम् आत्मानं मुक्त्वा यस्य स अनन्यः तेन अनन्येन एव केवलेन योगेन समाधिना मां ध्यायन्तः चिन्तयन्त उपासते॥ 6॥
परंतु जो समस्त कर्मोंको मुझ ईश्वरके समर्पण करके मेरे परायण होकर अर्थात् मैं ही जिनकी परमगति हूँ ऐसे होकर केवल अनन्ययोगसे अर्थात् विश्वरूप आत्मदेवको छोड़कर जिसमें अन्य अवलम्बन नहीं है, ऐसे अनन्य समाधियोगसे ही मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं॥ 6॥
तेषां किम्—
उनका क्या होता है—
तेषां मदुपासनैकपराणाम् अहम् ईश्वरः समुद्धर्ता। कुत इति आह मृत्युसंसारसागरात्, मृत्युयुक्तः संसारो मृत्युसंसारः स एव सागर इव सागरो दुरुत्तरत्वात् तस्माद् मृत्युसंसारसागराद् अहं तेषां समुद्धर्ता भवामि न चिरात् किं तर्हि क्षिप्रम् एव हे पार्थ मयि आवेशितचेतसां मयि विश्वरूपे आवेशितं समाहितं प्रवेशितं चेतो येषां ते मयि आवेशितचेतसः तेषाम्॥ 7॥
हे पार्थ! मुझ विश्वरूप परमेश्वरमें ही जिनका चित्त समाहित है ऐसे केवल एक मुझ परमेश्वरकी उपासनामें ही लगे हुए उन भक्तोंका मैं ईश्वर उद्धार करनेवाला होता हूँ। किससे (उनका उद्धार करते हैं)? सो कहते हैं कि मृत्युयुक्त संसार-समुद्रसे। मृत्युयुक्त संसारका नाम मृत्युसंसार है, वही पार उतरनेमें कठिन होनेके कारण सागरकी भाँति सागर है, उससे मैं उनका विलम्बसे नहीं, किंतु शीघ्र ही उद्धार कर देता हूँ॥ 7॥
यत एवं तस्मात्—
जब कि यह बात है तो—
मयि एव विश्वरूपे ईश्वरे मनः सङ्कल्प-विकल्पात्मकम् आधत्स्व स्थापय, मयि एव अध्यवसायं कुर्वतीं बुद्धिम् आधत्स्व निवेशय।
ततः ते किं स्याद् इति शृणु—
निवसिष्यसि निवत्स्यसि निश्चयेन मदात्मना मयि निवासं करिष्यसि एव अतः शरीरपाताद् ऊर्ध्वं न संशयः संशयः अत्र न कर्त्तव्यः॥ 8॥
तू मुझ विश्वरूप ईश्वरमें ही अपने संकल्प-विकल्पात्मक मनको स्थिर कर और मुझमें ही निश्चय करनेवाली बुद्धिको स्थिर कर—लगा।
उससे तेरा क्या (लाभ) होगा सो सुन—
इसके पश्चात् अर्थात् शरीरका पतन होनेके उपरान्त तू निःसन्देह एकात्मभावसे मुझमें ही निवास करेगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं है अर्थात् इस विषयमें संशय नहीं करना चाहिये॥ 8॥
अथ एवं यथा अवोचाम तथा मयि चित्तं समाधातुं स्थापयितुं स्थिरम् अचलं न शक्नोषि चेत् ततः पश्चाद् अभ्यासयोगेन चित्तस्य एकस्मिन् आलम्बने सर्वतः समाहृत्य पुनः पुनः स्थापनम् अभ्यासः तत्पूर्वको योगः समाधानलक्षणः तेन अभ्यासयोगेन मां विश्वरूपम् इच्छ प्रार्थयस्व आप्तुं प्राप्तुं हे धनञ्जय॥ 9॥
यदि इस प्रकार यानी जैसे मैंने बतलाया है उस प्रकार तू मुझमें चित्तको अचल स्थापित नहीं कर सकता, तो फिर हे धनंजय! तू अभ्यासयोगके द्वारा—चित्तको सब ओरसे खींचकर बारंबार एक अवलम्बनमें लगानेका नाम अभ्यास है उससे युक्त जो समाधानरूप योग है, ऐसे अभ्यासयोगके द्वारा—मुझ—विश्वरूप परमेश्वरको प्राप्त करनेकी इच्छा कर॥ 9॥
अभ्यासे अपि असमर्थः असि अशक्तः असि तर्हि मत्कर्मपरमो भव, मदर्थं कर्म मत्कर्म तत्परमो मत्कर्मप्रधान इत्यर्थः। अभ्यासेन विना मदर्थम् अपि
कर्माणि
केवलं
कुर्वन्
सिद्धिं सत्त्वशुद्धियोगज्ञानप्राप्तिद्वारेण अवाप्स्यसि॥ 10॥
(यदि तू) अभ्यासमें भी असमर्थ है तो मेरे लिये कर्म करनेमें तत्पर हो—मदर्थकर्मका नाम मत्कर्म है, उसमें तत्पर हो अर्थात् मेरे लिये कर्म करनेको ही प्रधान समझनेवाला हो। अभ्यासके बिना केवल मेरे लिये कर्म करता हुआ भी तू अन्तःकरणकी शुद्धि और ज्ञानयोगकी प्राप्तिद्वारा परमसिद्धि प्राप्त कर लेगा॥ 10॥
अथ पुनः एतद् अपि यद् उक्तं मत्कर्मपरमत्वं तत् कर्तुम् अशक्तः असि मद्योगम् आश्रितो मयि क्रियमाणानि कर्माणि सन्न्यस्य यत्करणं तेषाम् अनुष्ठानं स मद्योगः तम् आश्रितः सन् सर्वकर्मफलत्यागं सर्वेषां कर्मणां फलसन्न्यासं सर्वकर्मफलत्यागं ततः अनन्तरं कुरु यतात्मवान् संयतचित्तः सन् इत्यर्थः॥ 11॥
परंतु यदि तू ऐसा करनेमें भी अर्थात् जैसा ऊपर कहा है, उस प्रकार मेरे लिये कर्म करनेके परायण होनेमें भी असमर्थ है तो फिर मद्योगके आश्रित होकर—किये जानेवाले समस्त कर्मोंको मुझमें समर्पण करके उनका अनुष्ठान करना मद्योग है। उसके आश्रित होकर—और संयतात्मा होकर अर्थात् वशीभूत मनवाला होकर समस्त कर्मोंके फलका त्याग कर॥ 11॥
इदानीं सर्वकर्मफलत्यागं स्तौति—
अब सर्व कर्मोंके फलत्यागकी स्तुति करते हैं—
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श्रेयो हि प्रशस्यतरं ज्ञानम् कस्मात्, अविवेक-पूर्वकाद् अभ्यासात् तस्माद् अपि ज्ञानाद् ज्ञान-पूर्वकं ध्यानं विशिष्यते। ज्ञानवतो ध्यानाद् अपि कर्मफलत्यागो विशिष्यते इति अनुषज्यते।*
एवं कर्मफत्यागात् पूर्वविशेषणवतः शान्तिः उपशमः सहेतुकस्य संसारस्य अनन्तरम् एव स्याद् न तु कालान्तरम् अपेक्षते।
अज्ञस्य कर्मणि प्रवृत्तस्य पूर्वोपदिष्टोपायानुष्ठा-नाशक्तौ सर्वकर्मणां फलत्यागः श्रेयः-साधनम् उपदिष्टम् न प्रथमम् एव, अतः च श्रेयो हि ज्ञानम् अभ्यासाद् इति उत्तरोत्तरविशिष्ट-त्वोपदेशेन सर्वकर्मफलत्यागः स्तूयते सम्पन्न-साधनानुष्ठानाशक्तौ अनुष्ठेयत्वेन श्रुतत्वात्।
केन साधर्म्येण स्तुतिः।
“यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते” (क0 उ0 6। 14) इति सर्वकामप्रहाणाद् अमृतत्वम् उक्तं तत् प्रसिद्धम्। कामाः च सर्वे श्रौतस्मार्तसर्वकर्मणां फलानि। तत्त्यागे च विदुषो ज्ञाननिष्ठस्य अनन्तरा एव शान्तिः इति।
सर्वकामत्यागसामान्यम् अज्ञकर्मफलत्यागस्य अस्ति इति तत्सामान्यात् सर्वकर्मफलत्याग-स्तुतिः इयं प्ररोचनार्था।
यथा अगस्त्येन ब्राह्मणेन समुद्रः पीत इति इदानीन्तना अपि ब्राह्मणा ब्राह्मणत्वसामान्यात् स्तूयन्ते।
एवं कर्मफलत्यागात् कर्मयोगस्य श्रेयः-साधनत्वम् अभिहितम्॥ 12॥
निःसन्देह ज्ञान श्रेष्ठतर है। किससे? अविवेकपूर्वक किये हुए अभ्याससे; उस ज्ञानसे भी ज्ञानपूर्वक ध्यान श्रेष्ठ है, और (इसी प्रकार) ज्ञानयुक्त ध्यानसे भी कर्मफलका त्याग अधिक श्रेष्ठ है।
पहले बतलाये हुए विशेषणोंसे युक्त पुरुषको इस कर्म-फल-त्यागसे तुरंत ही शान्ति हो जाती है, अर्थात् हेतुसहित समस्त संसारकी निवृत्ति तत्काल ही हो जाती है। कालान्तरकी अपेक्षा नहीं रहती।
कर्मोंमें लगे हुए अज्ञानीके लिये, पूर्वोक्त उपायोंका अनुष्ठान करनेमें असमर्थ होनेपर ही, सर्वकर्मोंके फलत्यागरूप कल्याणसाधनका उपदेश किया गया है, सबसे पहले नहीं। इसलिये “श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासात्” इत्यादिसे उत्तरोत्तर श्रेष्ठता बतलाकर सर्वकर्मोंके फलत्यागकी स्तुति करते हैं; क्योंकि उत्तम साधनोंका अनुष्ठान करनेमें असमर्थ होनेपर यह साधन भी अनुष्ठान करनेयोग्य माना गया है।
पू0—कौन-सी समानताके कारण यह स्तुति की गयी है?
उ0—जब (“इसके हृदयमें स्थित) समस्त कामनाएँ नष्ट हो जाती हैं” इस श्रुतिसे समस्त कामनाओंके नाशसे अमृतत्वकी प्राप्ति बतलायी गयी है, यह प्रसिद्ध है। समस्त श्रौत-स्मार्त-कर्मोंके फलोंका नाम “काम” है, उनके त्यागसे ज्ञाननिष्ठ विद्वान्को तुरंत ही शान्ति मिलती है।
अज्ञानीके कर्मफलत्यागमें भी सर्व कामनाओंका त्याग है ही, अतः इस सर्व कामनाओंके त्यागकी समानताके कारण रुचि उत्पन्न करनेके लिये यह सर्वकर्म-फलत्यागकी स्तुति की गयी।
जैसे “अगस्त्य ब्राह्मणने समुद्र पी लिया था” इसलिये आजकलके ब्राह्मणोंके भी ब्राह्मणत्वकी समानताके कारण स्तुति की जाती है।
इस प्रकार कर्मफलके त्यागसे कर्मयोगकी कल्याणसाधनता बतलायी गयी है॥ 12॥
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अत्र च आत्मेश्वरभेदम् आश्रित्य विश्वरूपे ईश्वरे चेतःसमाधानलक्षणो योग उक्त ईश्वरार्थं कर्मानुष्ठानादि च।
“अथैतदप्यशक्तोऽसि” इति अज्ञानकार्य-सूचनाद् न अभेददर्शिनः अक्षरोपासकस्य कर्मयोग उपपद्यते इति दर्शयति। तथा कर्मयोगिनः अक्षरोपासनानुपपत्तिं दर्शयति भगवान्।
“ते प्राप्नुवन्ति मामेव” इति अक्षरोपासकानां कैवल्यप्राप्तौ स्वातन्त्र्यम् उक्त्वा इतरेषां पारतन्त्र्यम् ईश्वराधीनतां दर्शितवान् “तेषामहं समुद्धर्ता” इति।
यदि हि ईश्वरस्य आत्मभूताः ते मता अभेददर्शित्वाद् अक्षररूपा एव ते इति समुद्धरणकर्मवचनं तान् प्रति अपेशलं स्यात्।
यस्मात् च अर्जुनस्य अत्यन्तम् एव हितैषी भगवान् तस्य सम्यग्दर्शनानन्वितं कर्मयोगं भेददृष्टिमन्तम् एव उपदिशति।
न च आत्मानम् ईश्वरं प्रमाणतो बुद्ध्वा कस्यचिद् गुणभावं जिगमिषति कश्चिद् विरोधात्।
तस्माद् अक्षरोपासकानां सम्यग्दर्शन-निष्ठानां सन्न्यासिनां त्यक्तसर्वैषणानाम् “अद्वेष्टा सर्वभूतानाम्” इत्यादिधर्मपूतं साक्षाद् अमृतत्व-कारणं वक्ष्यामि इति प्रवर्तते—
यहाँ आत्मा और ईश्वरके भेदको स्वीकार करके विश्वरूप ईश्वरमें चित्तका समाधान करनारूप योग कहा है और ईश्वरके लिये कर्म करने आदिका भी उपदेश किया है।
परंतु “अथैतदप्यशक्तोऽसि” इस कथनके द्वारा (कर्मयोगको) अज्ञानका कार्य सूचित करते हुए भगवान् यह दिखलाते हैं कि जो अव्यक्त अक्षरकी उपासना करनेवाले अभेददर्शी हैं उनके लिये कर्मयोग सम्भव नहीं है। साथ ही कर्मयोगियोंके लिये अक्षरकी उपासना असम्भव दिखलाते हैं।
इसके सिवाय (उन्होंने) “ते प्राप्नुवन्ति मामेव” इस कथनसे अक्षरकी उपासना करनेवालोंके लिये मोक्षप्राप्तिमें स्वतन्त्रता बतलाकर “तेषामहं समुद्धर्ता” इस कथनसे दूसरोंके लिये परतन्त्रता अर्थात् ईश्वराधीनता दिखलायी है।
क्योंकि यदि वे (कमयोगी भी) ईश्वरके स्वरूप ही माने गये हैं तब तो अभेददर्शी होनेके कारण वे अक्षरस्वरूप ही हुए, फिर उनके लिये उद्धार करनेका कथन असंगत होगा।
भगवान् अर्जुनके अत्यन्त ही हितैषी हैं, इसलिये उसको सम्यक्ज्ञानसे जो मिश्रित नहीं है, ऐसे भेददृष्टियुक्त केवल कर्मयोगका ही उपदेश करते हैं। (ज्ञानकर्मके समुच्चयका नहीं)।
तथा (यह भी युक्तिसिद्ध है कि) ईश्वरभाव और सेवकभाव परस्परविरुद्ध है इस कारण प्रमाणद्वारा आत्माको साक्षात् ईश्वररूप जान लेनेके बाद, कोई भी, किसीका सेवक बनना नहीं चाहता।
इसलिये जिन्होंने समस्त इच्छाओंका त्याग कर दिया है, ऐसे अक्षरोपासक यथार्थ ज्ञाननिष्ठ संन्यासियोंका जो साक्षात् मोक्षका कारणरूप “अद्वेष्टा सर्वभूतानाम्” इत्यादि धर्मसमूह है उसका वर्णन करूँगा, इस उद्देश्यसे भगवान् कहना आरम्भ करते हैं—
अद्वेष्टा सर्वभूतानां न द्वेष्टा आत्मनो दुःखहेतुम् अपि न किञ्चिद् द्वेष्टि सर्वाणि भूतानि आत्मत्वेन हि पश्यति।
मैत्रो मित्रभावो मैत्री मित्रतया वर्तते इति मैत्रः। करुण एव च करुणा कृपा दुःखितेषु दया तद्वान् करुणः सर्वभूताभयप्रदः सन्न्यासी इत्यर्थः।
निर्ममो
ममप्रत्ययवर्जितो
निरहङ्कारो निर्गताहम्प्रत्ययः समदुःखसुखः समे दुःखसुखे द्वेषरागयोः अप्रवर्तके यस्य स समदुःखसुखः।
क्षमी क्षमावान् आक्रुष्टः अभिहतो वा अविक्रिय एव आस्ते॥ 13॥
जो सब भूतोंमें द्वेषभावसे रहित है अर्थात् अपने लिये दुःख देनेवाले भी किसी प्राणीसे द्वेष नहीं करता, समस्त भूतोंको आत्मारूपसे ही देखता है।
तथा जो मित्रतासे युक्त है अर्थात् सबके साथ मित्रभावसे बर्तता है और करुणामय है—दीन-दुःखियोंपर दया करना करुणा है, उससे युक्त है, अभिप्राय यह कि जो सब भूतोंको अभय देनेवाला संन्यासी है।
तथा जो ममतासे रहित और अहंकारसे रहित है, एवं सुख-दुःखमें सम है अर्थात् सुख और दुःख जिसके अन्तःकरणमें राग-द्वेष उत्पन्न नहीं कर सकते।
जो क्षमावान् है अर्थात् किसीके द्वारा गाली दी जानेपर या पीटे जानेपर भी जो विकाररहित ही रहता है॥ 13॥
सन्तुष्टः सततं नित्यं देहस्थितिकारणस्य लाभे अलाभे च उत्पन्नालम्प्रत्ययः, तथा गुणवल्लाभे विपर्यये च सन्तुष्टः सततम्, योगी समाहितचित्तो यतात्मा संयतस्वभावो दृढ-निश्चयो दृढः स्थिरो निश्चयः अध्यवसायो यस्य आत्मतत्त्वविषये स दृढनिश्चयः।
मयि अर्पितमनोबुद्धिः सङ्कल्पात्मकं मनः अध्यवसायलक्षणा बुद्धिः ते मयि एव अर्पिते स्थापिते यस्य सन्न्यासिनः स मयि अर्पित-मनोबुद्धिः। य ईदृशो मद्भक्तः स मे प्रियः।
“प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः” इति सप्तमेऽध्याये सूचितं तद् इह प्रपञ्च्यते॥ 14॥
तथा जो सदा ही सन्तुष्ट है अर्थात् देह-स्थितिके कारणरूप पदार्थोंकी लाभ-हानिमें जिसके “जो कुछ होता है वही ठीक है” ऐसा “अलम्” भाव हो गया है, इस प्रकार जो गुणयुक्त वस्तुके लाभमें और उसकी हानिमें सदा ही सन्तुष्ट रहता है। तथा जो समाहितचित्त, जीते हुए स्वभाववाला और दृढ़ निश्चयवाला है अर्थात् आत्मतत्त्वके विषयमें जिसका निश्चय स्थिर हो चुका है।
तथा जो मुझमें अर्पण किये हुए मन-बुद्धिवाला है अर्थात् जिस संन्यासीका संकल्प-विकल्पात्मक मन और निश्चयात्मिका बुद्धि ये दोनों मुझमें समर्पित हैं—स्थापित हैं। जो ऐसा मेरा भक्त है वह मेरा प्यारा है।
“ज्ञानीको मैं अत्यन्त प्यारा हूँ और वह मुझे प्रिय है” इस प्रकार जो सप्तम अध्यायमें सूचित किया गया था उसीका यहाँ विस्तारपूर्वक वर्णन किया जाता है॥ 14॥
यस्मात् सन्न्यासिनो न उद्विजते न उद्वेगं गच्छति न सन्तप्यते न सङ्क्षुभ्यते लोकः। तथा लोकाद् न उद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोद्वेगैः हर्षः च अमर्षः च भयं च उद्वेगः च तैः हर्षामर्षभयोद्वेगैः मुक्तः। हर्षः
प्रियलाभे
अन्तःकरणस्य
उत्कर्षो रोमाञ्चनाश्रुपातादिलिङ्गः अमर्षः असहिष्णुता भयं त्रास उद्वेग उद्विग्नता तैः मुक्तो यः स च मे प्रियः॥ 15॥
जिस संन्यासीसे संसार उद्वेगको प्राप्त नहीं होता अर्थात् संतप्त—क्षुब्ध नहीं होता और जो स्वयं भी संसारसे उद्वेगयुक्त नहीं होता।
जो हर्ष, अमर्ष,भय और उद्वेगसे रहित है—प्रिय वस्तुके लाभसे अन्तःकरणमें जो उत्साह होता है, रोमाञ्च और अश्रुपात आदि जिसके चिह्न हैं उसका नाम “हर्ष” है, असहिष्णुताको “अमर्ष” कहते हैं, त्रासका नाम “भय” है और उद्विग्नता ही “उद्वेग” है इन सबसे जो मुक्त है वह मेरा प्यारा है॥ 15॥
देहेन्द्रियविषयसम्बन्धादिषु अपेक्षाविषयेषु अनपेक्षो निःस्पृहः, शुचिः बाह्येन आभ्यन्तरेण च शौचेन सम्पन्नः, दक्षः प्रत्युत्पन्नेषु कार्येषु सद्यो यथावत् प्रतिपत्तुं समर्थः।
उदासीनो न कस्यचिद् मित्रादेः पक्षं भजते यः स उदासीनो यतिः, गतव्यथो गतभयः।
सर्वारम्भपरित्यागी, आरभ्यन्ते इति आरम्भा इहामुत्रफलभोगार्थानि कामहेतूनि कर्माणि सर्वारम्भाः तान् परित्यक्तं शीलम् अस्य इति
सर्वारम्भपरित्यागी,
यो
मद्भक्तः स मे प्रियः॥ 16॥
जो शरीर, इन्द्रिय, विषय और उनके सम्बन्ध आदि स्पृहाके विषयोंमें अपेक्षारहित—निःस्पृह है, बाहर-भीतरकी शुद्धिसे सम्पन्न है, और चतुर अर्थात् अनेक कर्तव्योंके प्राप्त होनेपर उनमेंसे तुरंत ही यथार्थ कर्तव्यको निश्चित करनेमें समर्थ है।
तथा जो उदासीन अर्थात् किसी मित्र आदिका पक्षपात न करनेवाला संन्यासी है और गतव्यथ यानी निर्भय है।
तथा जो समस्त आरम्भोंका त्याग करनेवाला है—जो आरम्भ किये जायँ उनका नाम आरम्भ है, इसके अनुसार इस लोक और परलोकके फलभोगके लिये किये जानेवाले समस्त कामनाहेतुक कर्मोंका नाम सर्वारम्भ है, उन्हें त्यागनेका जिसका स्वभाव है ऐसा जो मेरा भक्त है वह मेरा प्यारा है॥ 16॥
किं च—
तथा—
यो न हृष्यति इष्टप्राप्तौ, न द्वेष्टि अनिष्टप्राप्तौ, न शोचति प्रियवियोगे, न च अप्राप्तं काङ्क्षति। शुभाशुभे कर्मणी परित्यक्तुं शीलम् अस्य इति शुभाशुभपरित्यागी, भक्तिमान् यः स मे प्रियः॥ 17॥
जो इष्ट वस्तुकी प्राप्तिमें हर्ष नहीं मानता, अनिष्टकी प्राप्तिमें द्वेष नहीं करता, प्रिय वस्तुका वियोग होनेपर शोक नहीं करता और अप्राप्त वस्तुकी आकाङ्क्षा नहीं करता, ऐसा जो शुभ और अशुभ कर्मोंका त्याग कर देनेवाला भक्तिमान् पुरुष है वह मेरा प्यारा है॥ 17॥
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः पूजापरिभवयोः शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सर्वत्र च सङ्गवर्जितः॥ 18॥
जो शत्रु-मित्रमें और मानापमानमें अर्थात् सत्कार और तिरस्कारमें समान रहता है एवं शीत-उष्ण और सुख-दुःखमें भी समभाववाला है तथा सर्वत्र आसक्तिसे रहित हो चुका है॥ 18॥
किं च—
तथा—
तुल्यनिन्दास्तुतिः निन्दा च स्तुतिः च निन्दास्तुती ते तुल्ये यस्य स तुल्यनिन्दास्तुतिः, मौनी मौनवान् संयतवाक्, सन्तुष्टो येन केनचित् शरीरस्थितिमात्रेण।
तथा च उक्तम्—
“येन केनचिदाच्छन्नो येन केनचिदाशितः।
यत्र क्वचनशायी स्यात्तं देवा ब्राह्मणं विदुः॥”
(महा0 शान्ति0 245। 12) इति।
किं च अनिकेतो निकेत आश्रयो निवासो नियतो न विद्यते यस्य सः अनिकेतः “अनागारः” इत्यादिस्मृत्यन्तरात्।
स्थिरमतिः
स्थिरा परमार्थवस्तुविषया मतिः यस्य स स्थिरमतिः भक्तिमान् मे प्रियो नरः॥ 19॥
जिसके लिये निन्दा और स्तुति दोनों बराबर हो गयी हैं, जो मुनि संयतवाक् है अर्थात् वाणी जिसके वशमें है तथा जो जिस किसी प्रकारसे भी शरीरस्थितिमात्रसे सन्तुष्ट है।
कहा भी है कि “जो जिस किसी (अन्य) मनुष्यद्वारा ही वस्त्रादिसे ढका जाता है, एवं जिस किसी (दूसरे)-के द्वारा ही जिसको भोजन कराया जाता है और जो जहाँ कहीं भी सोनेवाला होता है उसको देवता लोग ब्राह्मण समझते हैं।”
तथा जो स्थानसे रहित है अर्थात् जिसका कोई नियत निवासस्थान नहीं है, अन्य स्मृतियोंमें भी “अनागारः” इत्यादि वचनोंसे यही कहा है, तथा जो स्थिरबुद्धि है—जिसकी परमार्थविषयक बुद्धि स्थिर हो चुकी है, ऐसा भक्तिमान् पुरुष मेरा प्यारा है॥ 19॥
“अद्वेष्टा सर्वभूतानाम्” इत्यादिना अक्षरस्य उपासकानां निवृत्तसर्वैषणानां सन्न्यासिनां परमार्थज्ञाननिष्ठानां
धर्मजातं
प्रक्रान्तम् उपसंह्रियते—
समस्त तृष्णासे निवृत्त हुए, परमार्थज्ञाननिष्ठ अक्षरोपासक संन्यासियोंके “अद्वेष्टा सर्वभूतानाम्” इस श्लोकद्वारा प्रारम्भ किये हुए धर्मसमूहका उपसंहार किया जाता है—
ये तु सन्न्यासिनो धर्म्यामृतं धर्माद् अनपेतं धर्म्यं च तद् अमृतं च तद् अमृतत्वहेतुत्वाद् इदं यथोक्तम् “अद्वेष्टा सर्वभूतानाम्” इत्यादिना पर्युपासते अनुतिष्ठन्ति श्रद्दधानाः सन्तः मत्परमा यथोक्तः अहम् अक्षरात्मा परमो निरतिशया गतिः येषां ते मत्परमा मद् भक्ताः च उत्तमां परमार्थज्ञानलक्षणां भक्तिम् आश्रिताः ते अतीव मे प्रियाः।
“प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थम्” इति यत् सूचितं तद् व्याख्याय इह उपसंहृतं भक्ताः ते अतीव मे प्रिया इति।
यस्माद् धर्म्यामृतम् इदं यथोक्तम् अनुतिष्ठन् भगवतो विष्णोः परमेश्वरस्य अतीव मे प्रियो भवति तस्माद् इदं धर्म्यामृतं मुमुक्षुणा यत्नतः अनुष्ठेयं विष्णोः प्रियं परं धाम जिगमिषुणा इति वाक्यार्थः॥ 20॥
जो संन्यासी इस धर्ममय अमृतको अर्थात् जो धर्मसे ओतप्रोत है और अमृतत्वका हेतु होनेसे अमृत भी है, ऐसे इस “अद्वेष्टा सर्वभूतानाम्” इत्यादि श्लोकोंद्वारा ऊपर कहे हुए (उपदेश)-का श्रद्धालु होकर सेवन करते हैं—उसका अनुष्ठान करते हैं, वे मेरे परायण अर्थात् “मैं अक्षरस्वरूप परमात्मा ही जिनकी निरतिशय गति हूँ” ऐसे, यथार्थ ज्ञानरूप उत्तम भक्तिका अवलम्बन करनेवाले मेरे भक्त, मुझे अत्यन्त प्रिय हैं।
“प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थम्” इस प्रकार जो विषय सूत्ररूपसे कहा गया था यहाँ उसकी व्याख्या करके “भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः” इस वचनसे उसका उपसंहार किया गया है।
कहनेका अभिप्राय यह है कि इस यथोक्त धर्मयुक्त अमृतरूप उपदेशका अनुष्ठान करनेवाला मनुष्य मुझ साक्षात् परमेश्वर विष्णुभगवान्का अत्यन्त प्रिय हो जाता है, इसलिये विष्णुके प्यारे परमधामको प्राप्त करनेकी इच्छावाले मुमुक्षु पुरुषको इस धर्मयुक्त अमृतका यत्नपूर्वक अनुष्ठान करना चाहिये॥ 20॥