ग्रन्थ
13क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग

क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग

Kshetra-Kshetrajna-Vibhaga-Yoga
The Field and its Knower
34 verses · 34 printed blockspp. 589624 · Srimad Bhagavad Gita — Tattva-Vivechaniसाधारण भाषाटीका 34 · साधक-संजीवनी 33 · श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्य 34 · श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीका 34
1श्रीभगवान्
श्रीभगवान् उवाच
श्रीभगवानुवाच इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते। एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥ 1॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
श्रीभगवान् बोले—हे अर्जुन! यह शरीर “क्षेत्र” इस नामसे कहा जाता है; और इसको जो जानता है, उसको “क्षेत्रज्ञ” इस नामसे उनके तत्त्वको जाननेवाले ज्ञानीजन कहते हैं॥ 1॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—बारहवें अध्यायके आरम्भमें अर्जुनने सगुण और निर्गुणके उपासकोंकी श्रेष्ठताके विषयमें प्रश्न किया था, उसका उत्तर देते हुए भगवान्ने दूसरे श्लोकमें संक्षेपमें सगुण उपासकोंकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन करके तीसरेसे पाँचवें श्लोकतक निर्गुण उपासनाका स्वरूप, उसका फल और देहाभिमानियोंके लिये उसके अनुष्ठानमें कठिनताका निरूपण किया। तदनन्तर छठेसे बीसवें श्लोकतक सगुण उपासनाका महत्त्व, फल, प्रकार और भगवद्भक्तोंके लक्षणोंका वर्णन करते-करते ही अध्यायकी समाप्ति हो गयी; निर्गुणका तत्त्व, महिमा और उसकी प्राप्तिके साधनोंको विस्तारपूर्वक नहीं समझाया गया। अतएव निर्गुण-निराकारका तत्त्व अर्थात् ज्ञानयोगका विषय भलीभाँति समझानेके लिये तेरहवें अध्यायका आरम्भ किया जाता है। इसमें पहले भगवान् क्षेत्र (शरीर) तथा क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के लक्षण बतलाते हैं—

2
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत। क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम॥ 2॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे अर्जुन! तू सब क्षेत्रोंमें क्षेत्रज्ञ अर्थात् जीवात्मा भी मुझे ही जान। और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका अर्थात् विकारसहित प्रकृतिका और पुरुषका जो तत्त्वसे जानना है, वह ज्ञान है—ऐसा मेरा
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके लक्षण बतलाकर अब क्षेत्रज्ञ और परमात्माकी एकता करते हुए ज्ञानके लक्षणका निरूपण करते हैं—

3
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत्। स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु॥ 3॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
वह क्षेत्र जो और जैसा है तथा जिन विकारोंवाला है, और जिस कारणसे जो हुआ है; तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जो और जिस प्रभाववाला है—वह सब संक्षेपमें मुझसे सुन॥ 3॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका पूर्ण ज्ञान हो जानेपर संसार-भ्रमका नाश हो जाता है और परमात्माकी प्राप्ति होती है, अतएव “क्षेत्र” और “क्षेत्रज्ञ”के स्वरूप आदिको भलीभाँति विभागपूर्वक समझानेके लिये भगवान् कहते हैं—

4
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्। ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः॥ 4॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका तत्त्व ऋषियोंद्वारा बहुत प्रकारसे कहा गया है और विविध वेदमन्त्रोंद्वारा भी विभागपूर्वक कहा गया है, तथा भलीभाँति निश्चय किये हुए युक्तियुक्त
सम्बन्ध

सम्बन्ध—तीसरे श्लोकमें “क्षेत्र” और “क्षेत्रज्ञ” के जिस तत्त्वको संक्षेपमें सुननेके लिये भगवान्ने अर्जुनसे कहा है—अब उसके विषयमें ऋषि, वेद और ब्रह्मसूत्रकी उक्तिका प्रमाण देकर भगवान् ऋषि, वेद और ब्रह्मसूत्रको आदर देते हैं—

5Split
महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च। इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः॥ 5॥*
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि और मूल प्रकृति भी; तथा दस इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच इन्द्रियोंके विषय अर्थात् शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—॥ 5॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार ऋषि, वेद और ब्रह्मसूत्रका प्रमाण देकर अब भगवान् तीसरे श्लोकमें “यत्”, पदसे कहे हुए “क्षेत्र” का और “यद्विकारि” पदसे कहे हुए उसके विकारोंका अगले दो श्लोकोंमें वर्णन करते हैं—

* इसीसे मिलता-जुलता वर्णन सांख्यकारिका और योगदर्शनमें भी आता है। जैसे—
मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त। (सांख्यकारिका 3)
षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः॥ (सांख्यकारिका 3)
अर्थात् एक मूल प्रकृति है, वह किसीकी विकृति (विकार) नहीं है। महत्तत्त्व, अहंकार और पंचतन्मात्राएँ (शब्द,
स्पर्श, रूप, रस और गन्धतन्मात्रा)—ये सात प्रकृति-विकृति हैं, अर्थात् ये सातों पंचभूतादिके कारण होनेसे “प्रकृति” भी
हैं और मूल प्रकृतिके कार्य होनेसे “विकृति” भी हैं। पंचज्ञानेन्द्रिय, पंचकर्मेन्द्रिय और मन—ये ग्यारह इन्द्रिय और
पंचमहाभूत—ये सोलह केवल विकृति (विकार) हैं, वे किसीकी प्रकृति अर्थात् कारण नहीं हैं। इनमें ग्यारह इन्द्रिय तो
अहंकारके तथा पंचस्थूल महाभूत पंचतन्मात्राओंके कार्य हैं; किन्तु पुरुष न किसीका कारण है और न किसीका कार्य है,
वह सर्वथा असंग है।
योगदर्शनमें कहा है—“विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणि।” (2। 19) विशेष यानी पंचज्ञानेन्द्रिय, पंचकर्मेन्द्रिय,
एक मन और पंच स्थूल भूत; अविशेष यानी अहंकार और पंचतन्मात्राएँ; लिंगमात्र यानी महत्तत्त्व और अलिंग यानी मूल
प्रकृति—ये चौबीस तत्त्व गुणोंकी अवस्थाविशेष हैं; इन्हींको “दृश्य” कहते हैं।
योगदर्शनमें जिसको “दृश्य” कहा है, उसीको गीतामें “क्षेत्र” कहा गया है।
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6
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः। एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्॥ 6॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
तथा इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, स्थूल देहका पिण्ड, चेतना और धृति—इस प्रकार विकारोंके सहित यह क्षेत्र संक्षेपमें कहा गया है॥ 6॥
7
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्। आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥ 7॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
श्रेष्ठताके अभिमानका अभाव, दम्भाचरणका अभाव, किसी भी प्राणीको किसी प्रकार भी न सताना, क्षमाभाव, मन-वाणी आदिकी सरलता, श्रद्धा-भक्तिसहित गुरुकी सेवा, बाहर-भीतरकी शुद्धि, अन्तःकरणकी स्थिरता और मन-इन्द्रियोंसहित शरीरका
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार क्षेत्रके स्वरूप और उसके विकारोंका वर्णन करनेके बाद अब जो दूसरे श्लोकमें यह बात कही थी कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका जो ज्ञान है, वही मेरे मतसे ज्ञान है—उस ज्ञानको प्राप्त करनेके साधनोंका “ज्ञान” के ही नामसे पाँच श्लोकोंद्वारा वर्णन करते हैं—

* “अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः।” (योगदर्शन 2। 35)
8
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च। जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥ 8॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
इस लोक और परलोकके सम्पूर्ण भोगोंमें आसक्तिका अभाव और अहंकारका भी अभाव; जन्म, मृत्यु, जरा और रोग आदिमें दुःख और दोषोंका बार-बार विचार
9
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु। नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु॥ 9॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
पुत्र, स्त्री, घर और धन आदिमें आसक्तिका अभाव; ममताका न होना तथा प्रिय और अप्रियकी प्राप्तिमें सदा ही चित्तका सम रहना॥ 9॥
10
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी। विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥ 10॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
मुझ परमेश्वरमें अनन्य योगके द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति तथा एकान्त और शुद्ध देशमें रहनेका स्वभाव और विषयासक्त मनुष्योंके समुदायमें प्रेमका न होना॥ 10॥
11
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्। एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा॥ 11॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
अध्यात्मज्ञानमें नित्य स्थिति और तत्त्वज्ञानके अर्थरूप परमात्माको ही देखना—यह सब ज्ञान है और जो इससे विपरीत है, वह अज्ञान है—ऐसा कहा है॥ 11॥
12
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते। अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते॥ 12॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो जाननेयोग्य है तथा जिसको जानकर मनुष्य परमानन्दको प्राप्त होता है, उसको भलीभाँति कहूँगा। वह अनादिवाला परमब्रह्म न सत् ही कहा जाता है, न असत् ही॥ 12॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार ज्ञानके साधनोंका “ज्ञान” के नामसे वर्णन सुननेपर यह जिज्ञासा हो सकती है कि इन साधनोंद्वारा प्राप्त “ज्ञान” से जाननेयोग्य वस्तु क्या है और उसे जान लेनेसे क्या होता है? उसका उत्तर देनेके लिये भगवान् अब जाननेके योग्य वस्तुके स्वरूपका वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा करते हुए उसके जाननेका फल “अमृतत्वकी प्राप्ति” बतलाकर छः श्लोकोंमें जाननेके योग्य परमात्माके स्वरूपका वर्णन करते हैं—

13Split
सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्। सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥ 13॥*
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
वह सब ओर हाथ-पैरवाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुखवाला तथा सब ओर कानवाला है। क्योंकि वह संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित है॥ 13॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार ज्ञेय तत्त्वके वर्णनकी प्रतिज्ञा करके उस तत्त्वका संक्षेपमें वर्णन किया गया; परंतु वह ज्ञेय तत्त्व बड़ा गहन है। अतः साधकोंको उसका ज्ञान करानेके लिये सर्वव्यापकत्वादि लक्षणोंके द्वारा उसीका पुनः विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं—

* यह श्लोक श्वेताश्वतरोपनिषद्में अक्षरशः आया है (3। 16)।
Ed. notethe first half of bg.13.14 is printed inside this block; its translation is printed with that verse
14
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्। असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च॥ 14॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
वह सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयोंको जाननेवाला है, परन्तु वास्तवमें सब इन्द्रियोंसे रहित है, तथा आसक्तिरहित होनेपर भी सबका धारण-पोषण करनेवाला और निर्गुण होनेपर भी
सम्बन्ध

सम्बन्ध—ज्ञेयस्वरूप परमात्माको सब ओरसे हाथ, पैर आदि समस्त इन्द्रियोंकी शक्तिवाला बतलानेके बाद अब उसके स्वरूपकी अलौकिकताका निरूपण करते हैं—

(श्वेताश्वतरोपनिषद् 3। 19)
15
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च। सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्॥ 15॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
वह चराचर सब भूतोंके बाहर-भीतर परिपूर्ण है, और चर-अचररूप भी वही है। और वह सूक्ष्म होनेसे अविज्ञेय है तथा अति समीपमें और दूरमें भी स्थित वही है॥ 15॥*
* श्रुतिमें भी कहा है—“तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके। तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः॥” (ईशोपनिषद् 5)
16
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्। भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च॥ 16॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
वह परमात्मा विभागरहित एक रूपसे आकाशके सदृश परिपूर्ण होनेपर भी चराचर सम्पूर्ण भूतोंमें विभक्त-सा स्थित प्रतीत होता है। तथा वह जाननेयोग्य परमात्मा विष्णुरूपसे भूतोंको धारण-पोषण करनेवाला और रुद्ररूपसे संहार करनेवाला तथा ब्रह्मारूपसे सबको उत्पन्न
अर्थात् वह चलता है और नहीं भी चलता है, वह दूर भी है और समीप भी है। वह इस सम्पूर्ण जगत्के भीतर
भी है और इन सबके बाहर भी है।
17
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते। ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्॥ 17॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
वह परब्रह्म ज्योतियोंका भी ज्योति एवं मायासे अत्यन्त परे कहा जाता है। वह परमात्मा बोधस्वरूप, जाननेके योग्य एवं तत्त्वज्ञानसे प्राप्त करनेयोग्य है और सबके हृदयमें विशेषरूपसे
18
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः। मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते॥ 18॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
इस प्रकार क्षेत्र तथा ज्ञान और जाननेयोग्य परमात्माका स्वरूप संक्षेपसे कहा गया। मेरा भक्त इसको तत्त्वसे जानकर मेरे स्वरूपको प्राप्त होता है॥ 18॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेयके स्वरूपका संक्षेपमें वर्णन करके अब इस प्रकरणको जाननेका फल बतलाते हैं।

19
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध ्यनादी उभावपि। विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्॥ 19॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
प्रकृति और पुरुष, इन दोनोंको ही तू अनादि जान और राग-द्वेषादि विकारोंको तथा त्रिगुणात्मक सम्पूर्ण पदार्थोंको भी प्रकृतिसे ही उत्पन्न जान॥ 19॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—तीसरे श्लोकमें भगवान्ने क्षेत्रके विषयमें चार बातें और क्षेत्रज्ञके विषयमें दो बातें संक्षेपमें सुननेके लिये अर्जुनसे कहा था, फिर विषय आरम्भ करते ही क्षेत्रके स्वरूपका और उसके विकारोंका वर्णन करनेके उपरान्त क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके तत्त्वको भलीभाँति जाननेके उपायभूत साधनोंका और जाननेके योग्य परमात्माके स्वरूपका वर्णन प्रसंगवश किया गया। इससे क्षेत्रके विषयमें उसके स्वभावका और किस कारणसे कौन कार्य उत्पन्न होता है, इस विषयका तथा प्रभावसहित क्षेत्रज्ञके स्वरूपका भी वर्णन नहीं हुआ। अतः अब उन सबका वर्णन करनेके लिये भगवान् पुनः प्रकृति और पुरुषके नामसे प्रकरण आरम्भ करते हैं। इसमें पहले प्रकृति-पुरुषकी अनादिताका प्रतिपादन करते हुए समस्त गुण और विकारोंको प्रकृतिजन्य बतलाते हैं—

20
कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते। पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते॥ 20॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
कार्य और करणको उत्पन्न करनेमें हेतु प्रकृति कही जाती है और जीवात्मा सुख-दुःखोंके भोक्तापनमें अर्थात् भोगनेमें हेतु कहा जाता है॥ 20॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—तीसरे श्लोकमें, जिससे जो उत्पन्न हुआ है, यह बात सुननेके लिये कहा गया था, उसका वर्णन पूर्व श्लोकके उत्तरार्द्धमें कुछ किया गया। अब उसीकी कुछ बात इस श्लोकके पूर्वार्द्धमें कहते हुए इसके उत्तरार्द्धमें और इक्कीसवें श्लोकमें प्रकृतिमें स्थित पुरुषके स्वरूपका वर्णन किया जाता है—

(सांख्यकारिका 22)
21
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्। कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥ 21॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
प्रकृतिमें स्थित ही पुरुष प्रकृतिसे उत्पन्न त्रिगुणात्मक पदार्थोंको भोगता है और इन गुणोंका संग ही इस जीवात्माके अच्छी-बुरी योनियोंमें जन्म लेनेका कारण है॥ 21॥
22
उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः। परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः॥ 22॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
इस देहमें स्थित यह आत्मा वास्तवमें परमात्मा ही है। वही साक्षी होनेसे उपद्रष्टा और यथार्थ सम्मति देनेवाला होनेसे अनुमन्ता, सबका धारण-पोषण करनेवाला होनेसे भर्ता, जीवरूपसे भोक्ता, ब्रह्मा आदिका भी स्वामी होनेसे महेश्वर और शुद्ध सच्चिदानन्दघन होनेसे परमात्मा—
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार प्रकृतिस्थ पुरुषके स्वरूपका वर्णन करनेके बाद अब जीवात्मा और परमात्माकी एकता करते हुए आत्माके गुणातीत स्वरूपका वर्णन करते हैं—

23
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह। सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते॥ 23॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
इस प्रकार पुरुषको और गुणोंके सहित प्रकृतिको जो मनुष्य तत्त्वसे जानता है, वह सब प्रकारसे कर्तव्य कर्म करता हुआ भी फिर नहीं जन्मता॥ 23॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार गुणोंके सहित प्रकृतिके और पुरुषके स्वरूपका वर्णन करनेके बाद अब उनको यथार्थ जाननेका फल बतलाते हैं—

24
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना। अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे॥ 24॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
उस परमात्माको कितने ही मनुष्य तो शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धिसे ध्यानके द्वारा हृदयमें देखते हैं; अन्य कितने ही ज्ञानयोगके द्वारा और दूसरे कितने ही कर्मयोगके द्वारा देखते हैं अर्थात् प्राप्त
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार गुणोंके सहित प्रकृति और पुरुषके ज्ञानका महत्त्व सुनकर यह इच्छा हो सकती है कि ऐसा ज्ञान कैसे होता है। इसलिये अब दो श्लोकोंद्वारा भिन्न-भिन्न अधिकारियोंके लिये तत्त्वज्ञानके भिन्न-भिन्न साधनोंका प्रतिपादन करते हैं—

25
अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते। तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः॥ 25॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
परन्तु इनसे दूसरे अर्थात् जो मन्द बुद्धिवाले पुरुष हैं, वे इस प्रकार न जानते हुए दूसरोंसे अर्थात् तत्त्वके जाननेवाले पुरुषोंसे सुनकर ही तदनुसार उपासना करते हैं और वे श्रवणपरायण पुरुष भी मृत्युरूप संसारसागरको निःसन्देह तर जाते हैं॥ 25॥
26
यावत्संजायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्। क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ॥ 26॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे अर्जुन! जितने भी स्थावर-जंगम प्राणी उत्पन्न होते हैं, उन सबको तू क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार परमात्मसम्बन्धी तत्त्वज्ञानके भिन्न-भिन्न साधनोंका प्रतिपादन करके अब तीसरे श्लोकमें जो “यादृक्” पदसे क्षेत्रके स्वभावको सुननेके लिये कहा था, उसके अनुसार भगवान् दो श्लोकोंद्वारा उस क्षेत्रको उत्पत्ति-विनाशशील बतलाकर उसके स्वभावका वर्णन करते हुए आत्माके यथार्थ तत्त्वको जाननेवालेकी प्रशंसा करते हैं—

27
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्। विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥ 27॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो पुरुष नष्ट होते हुए सब चराचर भूतोंमें परमेश्वरको नाशरहित और समभावसे स्थित
28
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्। न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्॥ 28॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
क्योंकि जो पुरुष सबमें समभावसे स्थित परमेश्वरको समान देखता हुआ अपने द्वारा अपनेको नष्ट नहीं करता, इससे वह परम गतिको प्राप्त होता है॥ 28॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—उपर्युक्त श्लोकमें यह कहा गया है कि उस परमेश्वरको जो सब भूतोंमें नाशरहित और समभावसे स्थित देखता है, वही ठीक देखता है; इस कथनकी सार्थकता दिखलाते हुए उसका फल परमगतिकी प्राप्ति बतलाते हैं—

29
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः। यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति॥ 29॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
और जो पुरुष सम्पूर्ण कर्मोंको सब प्रकारसे प्रकृतिके द्वारा ही किये जाते हुए देखता है और आत्माको अकर्ता देखता है, वही यथार्थ देखता है॥ 29॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार नित्य विज्ञानानन्दघन आत्मतत्त्वको सर्वत्र समभावसे देखनेका महत्त्व और फल बतलाकर अब अगले श्लोकमें उसे अकर्ता देखनेवालेकी महिमा कहते हैं—

30
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति। तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥ 30॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जिस क्षण यह पुरुष भूतोंके पृथक्-पृथक् भावको एक परमात्मामें ही स्थित तथा उस परमात्मासे ही सम्पूर्ण भूतोंका विस्तार देखता है, उसी क्षण वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्मको प्राप्त
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार आत्माको अकर्ता समझनेकी महिमा बतलाकर अब उसके एकत्वदर्शनका फल बतलाते हैं—

31
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः । शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते॥ 31॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे अर्जुन! अनादि होनेसे और निर्गुण होनेसे यह अविनाशी परमात्मा शरीरमें स्थित होनेपर भी वास्तवमें न तो कुछ करता है और न लिप्त ही होता है॥ 31॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार आत्माको सब प्राणियोंमें समभावसे स्थित, निर्विकार और अकर्ता बतलाया जानेपर यह शंका होती है कि समस्त शरीरोंमें रहता हुआ भी आत्मा उनके दोषोंसे निर्लिप्त और अकर्ता कैसे रह सकता है; इस शंकाका निवारण करनेके लिये अब भगवान्—तीसरे श्लोकमें जो “यत्प्रभावश्च” पदसे क्षेत्रज्ञका प्रभाव सुननेका संकेत किया गया था, उसके अनुसार—तीन श्लोकोंद्वारा आत्माके प्रभावका वर्णन करते हैं—

32
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते। सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते॥ 32॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जिस प्रकार सर्वत्र व्याप्त आकाश सूक्ष्म होनेके कारण लिप्त नहीं होता, वैसे ही देहमें सर्वत्र स्थित आत्मा निर्गुण होनेके कारण देहके गुणोंसे लिप्त नहीं होता॥ 32॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—शरीरमें स्थित होनेपर भी आत्मा क्यों नहीं लिप्त होता? इसपर कहते हैं—

33
यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः। क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत॥ 33॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे अर्जुन! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही आत्मा सम्पूर्ण क्षेत्रको प्रकाशित करता है॥ 33॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—शरीरमें स्थित होनेपर भी आत्मा कर्ता क्यों नहीं है? इसपर कहते हैं—

34
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा। भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्॥ 34॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
इस प्रकार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके भेदको तथा कार्यसहित प्रकृतिसे मुक्त होनेको जो पुरुष ज्ञान-नेत्रोंद्वारा तत्त्वसे जानते हैं, वे महात्माजन परम ब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं॥ 34॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—तीसरे श्लोकमें जिन छः बातोंको कहनेका भगवान्ने संकेत किया था, उनका वर्णन करके अब इस अध्यायमें वर्णित समस्त उपदेशको भलीभाँति समझनेका फल परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति बतलाते हुए अध्यायका उपसंहार करते हैं—

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः॥
13.1श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीका