क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
Kshetra-Kshetrajna-Vibhaga-Yoga
The Field and its Knower
34 verses · 34 printed blockspp. 168–180 · Sadharan Bhashatikaसाधारण भाषाटीका 34 · साधक-संजीवनी 33 · श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्य 34 · श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीका 34
1श्रीभगवान्
श्रीभगवान् उवाच
श्रीभगवानुवाच
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
श्रीभगवान् बोले—हे अर्जुन! यह शरीर “क्षेत्र”1 इस नामसे कहा जाता है और इसको जो जानता है, उसको “क्षेत्रज्ञ” इस नामसे उनके तत्त्वको जाननेवाले ज्ञानीजन कहते हैं॥ 1॥
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2श्रीभगवान्
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
हे अर्जुन! तू सब क्षेत्रोंमें क्षेत्रज्ञ अर्थात् जीवात्मा भी मुझे ही जान2 और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञको अर्थात् विकारसहित प्रकृतिका और पुरुषका जो तत्त्वसे जानना है*, वह ज्ञान है—ऐसा मेरा मत है॥ 2॥
1. जैसे खेतमें बोये हुए बीजोंका उनके अनुरूप फल समयपर
प्रकट होता है, वैसे ही इसमें बोये हुए कर्मोंके संस्काररूप बीजोंका
फल समयपर प्रकट होता है, इसलिये इसका नाम “क्षेत्र” ऐसा कहा है।
2. गीता अध्याय 15 श्लोक 7 और उसकी टिप्पणी देखनी चाहिये।
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3श्रीभगवान्
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत्।
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
वह क्षेत्र जो और जैसा है तथा जिन विकारोंवाला है, और जिस कारणसे जो हुआ है; तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जो और जिस प्रभाववाला है—वह सब संक्षेपमें मुझसे सुन॥ 3॥
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4श्रीभगवान्
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्।
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव
हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका तत्त्व ऋषियोंद्वारा बहुत प्रकारसे कहा गया है और विविध वेदमन्त्रोंद्वारा भी विभागपूर्वक कहा गया है तथा भलीभाँति निश्चय किये हुए युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्रके पदोंद्वारा भी कहा गया है॥ 4॥
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5श्रीभगवान्
महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि और मूल प्रकृति भी तथा दस इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच इन्द्रियोंके विषय अर्थात् शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—॥ 5॥
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6श्रीभगवान्
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
तथा इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, स्थूल देहका पिण्ड चेतना1 और धृति2—इस प्रकार विकारों3 के सहित यह क्षेत्र संक्षेपमें कहा गया॥ 6॥
* गीता अध्याय 13 श्लोक 23 और उसकी टिप्पणी देखनी चाहिये।
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7श्रीभगवान्
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
श्रेष्ठताके अभिमानका अभाव, दम्भाचरणका अभाव, किसी भी प्राणीको किसी प्रकार भी न सताना, क्षमाभाव, मन-वाणी आदिकी सरलता, श्रद्धा-भक्तिसहित गुरुकी सेवा, बाहर-भीतरकी शुद्धि,4 अन्तःकरणकी स्थिरता और मन-इन्द्रियोंसहित शरीरका निग्रह॥ 7॥
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8श्रीभगवान्
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
इस लोक और परलोकके सम्पूर्ण भोगोंमें आसक्तिका अभाव और अहंकारका भी अभाव, जन्म, मृत्यु, जरा और रोग आदिमें दुःख और दोषोंका बार-बार विचार करना॥ 8॥
1. शरीर और अन्तःकरणकी एक प्रकारकी चेतन-शक्ति।
2. गीता अध्याय 18 श्लोक 34 से 35 तक देखना चाहिये।
3. पाँचवें श्लोकमें कहा हुआ तो क्षेत्रका स्वरूप समझना चाहिये
और इस श्लोकमें कहे हुए इच्छादि क्षेत्रक विकार समझने चाहिये।
4. सत्यतापूर्वक शुद्ध व्यवहारसे द्रव्यकी और उसके अन्नसे
आहारकी तथा यथायोग्य बर्तावसे आचरणोंकी और जल-
मृत्तिकादिसे शरीरकी शुद्धिको बाहरकी शुद्धि कहते हैं तथा राग,
द्वेष और कपट आदि विकारोंका नाश होकर अन्तःकरणका
स्वच्छ हो जाना भीतरकी शुद्धि कही जाती है।
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9श्रीभगवान्
असक्तिरनभिष्वङ्गः
पुत्रदारगृहादिषु।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
पुत्र, स्त्री, घर और धन आदिमें आसक्तिका अभाव, ममताका न होना तथा प्रिय और अप्रियकी प्राप्तिमें सदा ही चित्तका सम रहना॥ 9॥
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10श्रीभगवान्
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि
॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
मुझ परमेश्वरमें अनन्य योगके द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति* तथा एकान्त और शुद्ध देशमें रहनेका स्वभाव और विषयासक्त मनुष्योंके समुदायमें प्रेमका न होना॥ 10॥
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11श्रीभगवान्
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
अध्यात्मज्ञानमें1 नित्यस्थिति और तत्त्वज्ञानके अर्थरूप परमात्माको ही देखना—यह सब ज्ञान2 है और जो इससे विपरीत है, वह अज्ञान3 है—ऐसा कहा है॥ 11॥
* केवल एक सर्वशक्तिमान् परमेश्वरको ही अपना स्वामी
मानते हुए स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके, श्रद्धा और
भावके सहित परमप्रेमसे भगवान्का निरन्तर चिन्तन करना
“अव्यभिचारिणी” भक्ति है।
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12श्रीभगवान्
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते।
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
जो जाननेयोग्य है तथा जिसको जानकर मनुष्य परमानन्दको प्राप्त होता है, उसको भलीभाँति कहूँगा। वह अनादिवाला परमब्रह्म न सत् ही कहा जाता है, न असत् ही॥ 12॥
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13श्रीभगवान्
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
वह सब ओर हाथ-पैरवाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुखवाला तथा सब ओर कानवाला है। क्योंकि वह संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित है1॥ 13॥
1. जिस ज्ञानके द्वारा आत्मवस्तु और अनात्मवस्तु जानी जाय,
उस ज्ञानका नाम “अध्यात्मज्ञान” है।
2. इस अध्यायके श्लोक 7 से लेकर यहाँतक जो साधन कहे
हैं, वे सब तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिमें हेतु होनेसे “ज्ञान” नामसे कहे गये हैं।
3. ऊपर कहे हुए ज्ञानके साधनोंसे विपरीत जो मान, दम्भ,
हिंसा आदि हैं, वे अज्ञानकी वृद्धिमें हेतु होनेसे “अज्ञान” नामसे
कहे गये हैं।
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14श्रीभगवान्
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
वह सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयोंको जाननेवाला है, परन्तु वास्तवमें सब इन्द्रियोंसे रहित है तथा आसक्ति- रहित होनेपर भी सबका धारण-पोषण करनेवाला और निर्गुण होनेपर भी गुणोंको भोगनेवाला है॥ 14॥
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15श्रीभगवान्
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
वह चराचर सब भूतोंके बाहर-भीतर परिपूर्ण है और चर-अचर भी वही है। और वह सूक्ष्म होनेसे अविज्ञेय2 है तथा अति समीपमें3 और दूरमें4 भी स्थित वही है॥ 15॥
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16श्रीभगवान्
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्।
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
वह परमात्मा विभागरहित एक रूपसे आकाशके सदृश परिपूर्ण होनेपर भी चराचर सम्पूर्ण भूतोंमें विभक्त-सा स्थित प्रतीत होता है1 तथा वह जाननेयोग्य परमात्मा विष्णुरूपसे भूतोंको धारण- पोषण करनेवाला और रुद्ररूपसे संहार करनेवाला तथा ब्रह्मारूपसे सबको उत्पन्न करनेवाला है॥ 16॥
1. आकाश जिस प्रकार वायु, अग्नि, जल और पृथ्वीका
कारणरूप होनेसे उनको व्याप्त करके स्थित है, वैसे ही परमात्मा
भी सबका कारणरूप होनेसे सम्पूर्ण चराचर जगत्को व्याप्त
करके स्थित है।
2. जैसे सूर्यकी किरणोंमें स्थित हुआ जल सूक्ष्म होनेसे
साधारण मनुष्योंके जाननेमें नहीं आता है, वैसे ही सर्वव्यापी
परमात्मा भी सूक्ष्म होनेसे साधारण मनुष्योंके जाननेमें नहीं आता है।
3. वह परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण और सबका आत्मा होनेसे
अत्यन्त समीप है।
4. श्रद्धारहित, अज्ञानी पुरुषोंके लिये न जाननेके कारण बहुत
दूर है।
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17श्रीभगवान्
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
वह परब्रह्म ज्योतियोंका भी ज्योति2 एवं मायासे अत्यन्त परे कहा जाता है। वह परमात्मा बोधस्वरूप, जाननेके योग्य एवं तत्त्वज्ञानसे प्राप्त करनेयोग्य है और सबके हृदयमें विशेषरूपसे स्थित है॥ 17॥
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18श्रीभगवान्
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
इस प्रकार क्षेत्र1 तथा ज्ञान2 और जाननेयोग्य परमात्माका स्वरूप3 संक्षेपसे कहा गया। मेरा भक्त इसको तत्त्वसे जानकर मेरे स्वरूपको प्राप्त होता है॥ 18॥
1. जैसे महाकाश विभागरहित स्थित हुआ भी घड़ोंमें पृथक्-
पृथक्के सदृश प्रतीत होता है, वैसे ही परमात्मा सब भूतोंमें एकरूपसे
स्थित हुआ भी पृथक्-पृथक्की भाँति प्रतीत होता है।
2. गीता अध्याय 15 श्लोक 12 में देखना चाहिये।
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19श्रीभगवान्
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
प्रकृति और पुरुष—इन दोनोंको ही तू अनादि जान और राग-द्वेषादि विकारोंको तथा त्रिगुणात्मक सम्पूर्ण पदार्थोंको भी प्रकृतिसे ही उत्पन्न जान॥ 19॥
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20श्रीभगवान्
कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
कार्य4 और करण5को उत्पन्न करनेमें हेतु प्रकृति कही जाती है और जीवात्मा सुख-दुःखोंके भोक्तापनमें अर्थात् भोगनेमें हेतु कहा जाता है॥ 20॥
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21श्रीभगवान्
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्।
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
प्रकृतिमें1 स्थित ही पुरुष प्रकृतिसे उत्पन्न त्रिगुणात्मक पदार्थोंको भोगता है और इन गुणोंका संग ही इस जीवात्माके अच्छी-बुरी योनियोंमें जन्म लेनेका कारण है2॥ 21॥
1. श्लोक 5-6 में विकारसहित क्षेत्रका स्वरूप कहा है।
2. श्लोक 7 से 11 तक ज्ञान अर्थात् ज्ञानका साधन कहा है।
3. श्लोक 12 से 17 तक ज्ञेयका स्वरूप कहा है।
4. आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी तथा शब्द, स्पर्श,
रूप, रस, गन्ध—इनका नाम “कार्य” है।
5. बुद्धि, अहंकार और मन तथा श्रोत्र, त्वचा, रसना, नेत्र और
घ्राण एवं वाक्, हस्त, पाद, उपस्थ और गुदा—इन 13 का नाम
“करण” है।
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22श्रीभगवान्
उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
इस देहमें स्थित यह आत्मा वास्तवमें परमात्मा ही है। वह साक्षी होनेसे उपद्रष्टा और यथार्थ सम्मति देनेवाला होनेसे अनुमन्ता, सबका धारण-पोषण करनेवाला होनेसे भर्ता, जीवरूपसे भोक्ता, ब्रह्मा आदिका भी स्वामी होनेसे महेश्वर और शुद्ध सच्चिदानन्दघन होनेसे परमात्मा— ऐसा कहा गया है॥ 22॥
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23श्रीभगवान्
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह।
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
इस प्रकार पुरुषको और गुणोंके सहित प्रकृतिको जो मनुष्य तत्त्वसे जानता है1, वह सब प्रकारसे कर्तव्यकर्म करता हुआ भी फिर नहीं जन्मता॥ 23॥
1. प्रकृति शब्दका अर्थ गीता अध्याय 7 श्लोक 14 में कही
हुई भगवान्की त्रिगुणमयी माया समझना चाहिये।
2. सत्त्वगुणके संगसे देवयोनिमें एवं रजोगुणके संगसे मनुष्य-
योनिमें और तमोगुणके संगसे पशु, पक्षी आदि नीच योनियोंमें
जन्म होता है।
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24श्रीभगवान्
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना।
अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
उस परमात्माको कितने ही मनुष्य तो शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धिसे ध्यानके2 द्वारा हृदयमें देखते हैं; अन्य कितने ही ज्ञानयोगके3 द्वारा और दूसरे कितने ही कर्मयोगके4 द्वारा देखते हैं अर्थात् प्राप्त करते हैं॥ 24॥
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25श्रीभगवान्
अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते।
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
परन्तु इनसे दूसरे अर्थात् जो मन्दबुद्धिवाले पुरुष हैं, वे इस प्रकार न जानते हुए दूसरोंसे अर्थात् तत्त्वके जाननेवाले पुरुषोंसे सुनकर ही तदनुसार उपासना करते हैं और वे श्रवणपरायण पुरुष भी मृत्युरूप संसार- सागरको निःसन्देह तर जाते हैं॥ 25॥
1. दृश्यमात्र सम्पूर्ण जगत् मायाका कार्य होनेसे क्षणभंगुर, नाशवान्,
जड और अनित्य है तथा जीवात्मा नित्य, चेतन, निर्विकार और
अविनाशी एवं शुद्ध, बोधस्वरूप, सच्चिदानन्दघन परमात्माका ही
सनातन अंश है, इस प्रकार समझकर सम्पूर्ण मायिक पदार्थोंके
संगका सर्वथा त्याग करके परमपुरुष परमात्मामें ही एकीभावसे
नित्य स्थित रहनेका नाम उनको “तत्त्वसे जानना” है।
2. जिसका वर्णन गीता अध्याय 6 में श्लोक 11 से 32 तक
विस्तारपूर्वक किया है।
3. जिसका वर्णन गीता अध्याय 2 में श्लोक 11 से 30 तक
विस्तारपूर्वक किया है।
4. जिसका वर्णन गीता अध्याय 2 में श्लोक 40 से अध्याय
समाप्तिपर्यन्त विस्तारपूर्वक किया है।
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26श्रीभगवान्
यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि
भरतर्षभ॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
हे अर्जुन! यावन्मात्र जितने भी स्थावर-जंगम प्राणी उत्पन्न होते हैं, उन सबको तू क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगसे ही उत्पन्न जान॥ 26॥
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27श्रीभगवान्
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
जो पुरुष नष्ट होते हुए सब चराचर भूतोंमें परमेश्वरको नाशरहित और समभावसे स्थित देखता है, वही यथार्थ देखता है॥ 27॥
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28श्रीभगवान्
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
क्योंकि जो पुरुष सबमें समभावसे स्थित परमेश्वरको समान देखता हुआ अपने द्वारा अपनेको नष्ट नहीं करता, इससे वह परम गतिको प्राप्त होता है॥ 28॥
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29श्रीभगवान्
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः।
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
और जो पुरुष सम्पूर्ण कर्मोंको सब प्रकारसे प्रकृतिके द्वारा ही किये जाते हुए देखता है और आत्माको अकर्ता देखता है, वही यथार्थ देखता है॥ 29॥
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30श्रीभगवान्
यदा
भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
जिस क्षण यह पुरुष भूतोंके पृथक्-पृथक् भावको एक परमात्मामें ही स्थित तथा उस परमात्मासे ही सम्पूर्ण भूतोंका विस्तार देखता है, उसी क्षण वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है॥ 30॥
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31श्रीभगवान्
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
हे अर्जुन! अनादि होनेसे और निर्गुण होनेसे यह अविनाशी परमात्मा शरीरमें स्थित होनेपर भी वास्तवमें न तो कुछ करता है और न लिप्त ही होता है॥ 31॥
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32श्रीभगवान्
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
जिस प्रकार सर्वत्र व्याप्त आकाश सूक्ष्म होनेके कारण लिप्त नहीं होता, वैसे ही देहमें सर्वत्र स्थित आत्मा निर्गुण होनेके कारण देहके गुणोंसे लिप्त नहीं होता॥32॥
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33श्रीभगवान्
यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
हे अर्जुन! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही आत्मा सम्पूर्ण क्षेत्रको प्रकाशित करता है॥ 33॥
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34श्रीभगवान्
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं
ज्ञानचक्षुषा।
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
इस प्रकार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके भेदको* तथा कार्यसहित प्रकृतिसे मुक्त होनेको जो पुरुष ज्ञान- नेत्रोंद्वारा तत्त्वसे जानते हैं, वे महात्माजन परम ब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं॥ 34॥
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