गुणत्रयविभागयोग
सर्वम् उत्पद्यमानं क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगाद् उत्पद्यते इति उक्तं तत् कथम् इति तत्प्रदर्शनार्थं “परं भूयः” इत्यादिः अध्याय आरभ्यते।
अथवा
ईश्वरपरतन्त्रयोः
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोः जगत्कारणत्वं न तु साङ्ख्यानाम् इव स्वतन्त्रयोः इति एवम् अर्थम्।
प्रकृतिस्थत्वं गुणेषु च सङ्गः संसारकारणम् इति उक्तं कस्मिन् गुणे कथं सङ्ग्रः के वा गुणाः कथं वा ते बध्नन्ति इति गुणेभ्यः च मोक्षणं कथं स्याद् मुक्तस्य च लक्षणं वक्तव्यम् इति एवम् अर्थं च—
उत्पन्न होनेवाली सभी वस्तुएँ क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगसे उत्पन्न होती हैं, यह बात कही गयी। सो वह किस प्रकारसे (उत्पन्न होती हैं?) यह दिखलानेके लिये “परं भूयः” इत्यादि श्लोकोंवाले चतुर्दश अध्यायका आरम्भ किया जाता है।
अथवा ईश्वरके अधीन रहकर ही क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ जगत्के कारण हैं, सांख्यवादियोंके मतानुसार स्वतन्त्रतासे नहीं। यह बात दिखलानेके लिये (यह अध्याय आरम्भ किया जाता है)।
तथा जो यह कहा कि प्रकृतिमें स्थित होना और गुणविषयक आसक्ति—यही संसारका कारण है, सो किस गुणमें किस प्रकारसे आसक्ति होती है? गुण कौन-से हैं? वे कैसे बाँधते हैं? गुणोंसे छुटकारा कैसे होता है? तथा मुक्तका लक्षण क्या है? यह सब बातें बतलानेके लिये भी इस अध्यायका आरम्भ किया जाता है—
श्रीभगवान् बोले—
परं ज्ञानम् इति व्यवहितेन सम्बन्धः।
भूयः पुनः पूर्वेषु सर्वेषु अध्यायेषु असकृद् उक्तम् अपि प्रवक्ष्यामि। तत् च परं परवस्तु-विषयत्वात्, किं तत्, ज्ञानं सर्वेषां ज्ञानानाम् उत्तमम् उत्तमफलत्वात्।
ज्ञानानाम् इति न अमानित्वादीनां किं तर्हि यज्ञादिज्ञेयवस्तुविषयाणाम् इति।
तानि न मोक्षाय इदं तु मोक्षाय इति परोत्तमशब्दाभ्यां स्तौति श्रोतृबुद्धिरुच्युत्पादना-र्थम्।
यद् ज्ञात्वा यद् ज्ञानम् ज्ञात्वा प्राप्य मुनयः सन्न्यासिनो मननशीलाः सर्वे परां सिद्धिं मोक्षाख्याम् इतः अस्माद् देहबन्धनाद् ऊर्ध्वं गताः प्राप्ताः॥ 1॥
“परम्” इस पदका दूरस्थ “ज्ञानम्” पदके साथ सम्बन्ध है।
समस्त ज्ञानोंमें उत्तम परम ज्ञानको अर्थात् जो पर वस्तुविषयक होनेसे परम है और उत्तम फलयुक्त होनेके कारण समस्त ज्ञानोंमें उत्तम है, उस परम उत्तम ज्ञानको, यद्यपि पहलेके सब अध्यायोंमें बार-बार कह आया हूँ, तो भी फिर भली प्रकार कहूँगा।
यहाँ “ज्ञानोंमेंसे” इस शब्दसे अमानित्वादि ज्ञान-साधनोंका ग्रहण नहीं है। किंतु यज्ञादि ज्ञेय वस्तुविषयक ज्ञानोंका ग्रहण है।
वे यज्ञादिविषयक ज्ञान मोक्षके लिये उपयुक्त नहीं हैं और यह (जो इस अध्यायमें बतलाया जाता है वह) मोक्षके लिये उपयुक्त है, इसलिये “परम” और “उत्तम” इन दोनों शब्दोंसे श्रोताकी बुद्धिमें रुचि उत्पन्न करनेके लिये इसकी स्तुति करते हैं।
जिस ज्ञानको जानकर—पाकर सब मननशील संन्यासीजन इस देहबन्धनसे मुक्त होनेके बाद मोक्षरूप परम सिद्धिको प्राप्त हुए हैं, (ऐसा परम ज्ञान कहूँगा)॥ 1॥
अस्याः च सिद्धेः ऐकान्तिकत्वं दर्शयति—
इस (ज्ञानद्वारा प्राप्त हुई) सिद्धिकी अव्यभिचारिता-नित्यता दिखलाते हैं—
इदं ज्ञानं यथोक्तम् उपाश्रित्य ज्ञानसाधनम् अनुष्ठाय इति एतत्। मम परमेश्वरस्य साधर्म्यं मत्स्वरूपताम् आगताः प्राप्ता इत्यर्थो न तु समानधर्मतां
साधर्म्यं
क्षेत्रज्ञेश्वरयोः भेदानभ्युपगमद् गीताशास्त्रे। फलवादः च अयं स्तुत्यर्थम् उच्यते। सर्गे अपि सृष्टिकाले अपि न उपजायन्ते न उत्पद्यन्ते प्रलये ब्रह्मणः अपि विनाशकाले न व्यथन्ति च व्यथां न आपद्यन्ते न च्यवन्ति इत्यर्थः॥ 2॥
इस उपर्युक्त ज्ञानका भलीभाँति आश्रय लेकर अर्थात् ज्ञानके साधनोंका अनुष्ठान करके, मुझ परमेश्वरकी समानताको—मेरे साथ एकरूपताको प्राप्त हुए पुरुष सृष्टिके उत्पत्तिकालमें भी फिर उत्पन्न नहीं होते और प्रलयकालमें—ब्रह्माके विनाशकालमें भी व्यथाको प्राप्त नहीं होते अर्थात् गिरते नहीं। यह फलका वर्णन ज्ञानकी स्तुतिके लिये किया गया है। यहाँ “साधर्म्य” का अर्थ “समानधर्मता” नहीं है; क्योंकि गीताशास्त्रमें क्षेत्रज्ञ और ईश्वरका भेद स्वीकार नहीं किया गया॥ 2॥
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोग ईदृशो भूतकारणम् इति आह—
अब यह बतलाते हैं कि इस प्रकारका क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका संयोग भूतोंका कारण है—
मम स्वभूता—मदीया माया त्रिगुणात्मिका प्रकृतिः योनिः सर्वभूतानां सर्वकार्येभ्यो महत्त्वाद् भरणात् च स्वविकाराणां महद् ब्रह्म इति योनिः एव विशिष्यते।
तस्मिन् महति ब्रह्मणि योनौ गर्भं हिरण्य-गर्भस्य जन्मनो बीजं सर्वभूतजन्मकारणं बीजं दधामि निक्षिपामि क्षेत्रक्षेत्रज्ञप्रकृतिद्वयशक्तिमान् ईश्वरः अहम् अविद्याक ामकर्मोपाधिस्वरूपानु-विधायिनं क्षेत्रज्ञं क्षेत्रेण संयोजयामि इत्यर्थः।
संभवः उत्पत्तिः सर्वभूतानां हिरण्यगर्भोत्पत्ति-द्वारेण ततः तस्माद् गर्भाधानाद् भवति हे भारत॥ 3॥
मुझ ईश्वरकी माया—त्रिगुणमयी प्रकृति, समस्त भूतोंकी योनि अर्थात् कारण है। समस्त कार्योंसे यानी उत्पत्तिशील वस्तुओंसे बड़ी होनेके कारण और अपने विकारोंको धारण करनेवाली होनेसे प्रकृति हो “महद् ब्रह्म” इस विशेषणसे विशेषित की गयी है।
उस महत् ब्रह्मरूप योनिमें, मैं—क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ इन दो प्रकृतिरूप शक्तियोंवाला ईश्वर, हिरण्यगर्भके जन्मके बीजरूप गर्भको, यानी सब भूतोंकी उत्पत्तिके कारणरूप बीजको स्थापित किया करता हूँ। अर्थात् अविद्या, कामना, कर्म और उपाधिके स्वरूपका अनुवर्तन करनेवाले क्षेत्रको क्षेत्रज्ञसे संयुक्त किया करता हूँ।
हे भारत! उस गर्भाधानसे हिरण्यगर्भकी उत्पत्ति-द्वारा समस्त भूतोंकी उत्पत्ति होती है॥ 3॥
देवपितृमनुष्यपशुमृगादिसर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयो देहसंस्थानलक्षणा मूर्छिताङ्गावयवा मूर्तयः सम्भवन्ति याः तासां मूर्तीनां ब्रह्म महत् सर्वावस्थं योनिः कारणम् अहम् ईशो बीजप्रदो गर्भाधानस्य कर्ता पिता॥ 4॥
हे कुन्तीपुत्र! देव, पितृ, मनुष्य, पशु और मृग आदि समस्त योनियोंमें जो मूर्तियाँ अर्थात् शरीराकार अलग-अलग अङ्गोंके अवयवोंकी रचनायुक्त व्यक्तियाँ उत्पन्न होती हैं, उन सब मूर्तियोंकी सब प्रकारसे स्थित महत् ब्रह्मरूप मेरी माया तो गर्भ धारण करनेवाली योनि है और मैं ईश्वर बीज प्रदान करनेवाला अर्थात् गर्भाधान करनेवाला पिता हूँ॥ 4॥
के गुणाः कथं बध्नन्ति इति उच्यते—
वे गुण कौन-कौन-से हैं और कैसे बाँधते हैं? सो कहते हैं—
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सत्त्वं रजः तम इति एवं नामानः, गुणा इति पारिभाषिकः शब्दो न रूपादिवद्द्रव्याश्रिताः। न च गुणगुणिनोः अन्यत्वम् अत्र विवक्षितम्।
तस्माद् गुणा इव नित्यपरतन्त्राः क्षेत्रज्ञं प्रति अविद्यात्मकत्वात् क्षेत्रज्ञं निबध्नन्ति इव तम् आस्पदीकृत्य आत्मानं प्रतिलभन्ते इति निबध्नन्ति इति उच्यते।
ते च प्रकृतिसंभवा भगवन्मायासंभवा निबध्नन्ति इव हे महाबाहो महान्तौ समर्थतरौ आजानुप्रलम्बौ बाहू यस्य स महाबाहुः हे महाबाहो देहे शरीरे देहिनं देहवन्तम् अव्ययम् अव्ययत्वं च उक्तम् “अनादित्वात्” इत्यादिश्लोके।
ननु देही न लिप्यते इति उक्तं तत् कथम् इह निबध्नन्ति इति अन्यथा उच्यते।
परिहृतम् अस्माभिः इवशब्देन निबध्नन्ति इव इति॥ 5॥
सत्त्व, रज और तम—ऐसे नामोंवाले ये तीन गुण हैं। “गुण” शब्द पारिभाषिक है। यहाँ रूप, रस आदिकी भाँति किसी द्रव्यके आश्रित गुणोंका ग्रहण नहीं है, तथा “गुण” और “गुणवान्” (प्रकृति)-का भेद भी यहाँ विवक्षित नहीं है।
जैसे रूपादि गुण द्रव्यके अधीन होते हैं वैसे ही ये सत्त्वादि गुण सदा क्षेत्रज्ञके अधीन हुए ही अविद्यात्मक होनेके कारण मानो क्षेत्रज्ञको बाँध लेते हैं। उस (क्षेत्रज्ञ)-को आश्रय बनाकर ही (ये गुण) अपना स्वरूप प्रकट करनेमें समर्थ होते हैं, अतः “बाँधते हैं” ऐसा कहा जाता है।
जिसकी भुजाएँ अतिशय सामर्थ्ययुक्त और जानु (घुटनों)-तक लंबी हों, उसका नाम महाबाहु है। हे महाबाहो! भगवान्की मायासे उत्पन्न ये तीनों गुण इस शरीरमें शरीरधारी अविनाशी क्षेत्रज्ञको मानो बाँध लेते हैं। क्षेत्रज्ञका “अविनाशित्व” “अनादित्वात्” इत्यादि श्लोकमें कहा ही है।
पू0—पहले यह कहा है कि देही—आत्मा लिप्त नहीं होता, फिर यहाँ यह विपरीत बात कैसे कही जाती है कि उसको गुण बाँधते हैं।
उ0—“इव” शब्दका अध्याहार करके हमने इस शङ्काका परिहार कर दिया है। अर्थात् वास्तवमें नहीं बाँधते, बाँधते हुए-से प्रतीत होते हैं॥ 5॥
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तत्र सत्त्वादीनां सत्त्वस्य एव तावद् लक्षणम् उच्यते—
निर्मलत्वात् स्फटिकमणिः इव प्रकाशकम् अनामयं निरुपद्रवं सत्त्वं तद् नि बध्नाति।
कथम्, सुखसङ्गेन सुखी अहम् इति विषयभूतस्य सुखस्य विषयिणि आत्मनि संश्लेषापादनं मृषा एव सुखे सञ्जनम् इति। सा एषा अविद्या।
न हि विषयधर्मो विषयिणो भवति। इच्छादि च धृत्यन्तं क्षेत्रस्य एव विषयस्य धर्म इति उक्तं भगवता।
अतः अविद्यया एव स्वकीयधर्मभूतया विषयविषय्यविवेकलक्षणया अस्वात्मभूते सुखे सञ्जयति इव सक्तम् इव करोति असुखिनं सुखिनम् इव। तथा ज्ञानसङ्गेन च।
ज्ञानम् इति सुखसाहचर्यात् क्षेत्रस्य एव अन्तःकरणस्य धर्मो न आत्मनः आत्म-धर्मत्वे
सङ्गानुपपत्तेः
बन्धानुपपत्तेः
च। सुखे इव ज्ञानादौ सङ्गो मन्तव्यो हे अनघ अव्यसन॥ 6॥
उन सत्त्व आदि तीन गुणोंमेंसे पहले सत्त्वगुणका लक्षण बतलाया जाता है—
सत्त्वगुण स्फटिक-मणिकी भाँति निर्मल होनेके कारण, प्रकाशशील और उपद्रवरहित है (तो भी) वह बाँधता है।
कैसे बाँधता है? सुखकी आसक्तिसे। (वास्तवमें) विषयरूप सुखका विषयी आत्माके साथ “मैं सुखी हूँ” इस प्रकार सम्बन्ध जोड़ देना यह आत्माको मिथ्या ही सुखमें नियुक्त कर देना है। यही अविद्या है।
क्योंकि विषयके धर्म विषयीके (कभी) नहीं होते और इच्छासे लेकर धृतिपर्यन्त सब धर्म विषयरूप क्षेत्रके ही हैं—ऐसा भगवान्ने कहा है।
सुतरां यह सिद्ध हुआ कि जो आरोपितभावसे आत्माकी स्वकीय धर्मरूपा हो रही है और विषय-विषयीका अज्ञान ही जिसका स्वरूप है, ऐसी अविद्याद्वारा ही सत्त्वगुण अनात्मस्वरूप सुखमें (आत्माको) मानो नियुक्त—आसक्त कर देता है, यानी जो (वास्तवमें) सुखके सम्बन्धसे रहित है, उसे सुखी-सा कर देता है। इसी प्रकार (यह सत्त्वगुण उसे) ज्ञानके सङ्गसे भी (बाँधता है)।
ज्ञान भी सुखका साथी होनेके कारण, क्षेत्र अर्थात् अन्तःकरणका ही धर्म है, आत्माका नहीं— क्योंकि आत्माका धर्म मान लेनेपर उसमें आसक्त होना और उसका बाँधना नहीं बन सकता। इसलिये हे निष्पाप! अर्थात् व्यसन-दोष-रहित अर्जुन! सुखकी भाँति ही ज्ञान आदिके “सङ्ग” को भी (बन्धन करनेवाला) समझना चाहिये॥ 6॥
रजो रागात्मकं रञ्जनाद् रागो गैरिकादिवद् रागात्मकं विद्धि जानीहि तृष्णासङ्गसमुद्भवं तृष्णा अप्राप्ताभिलाष आसङ्गः प्राप्ते विषये मनसः प्रीतिलक्षणः संश्लेषः, तृष्णासङ्गयोः समुद्भवं तृष्णासङ्गसमुद्भवम्।
तद् निबध्नाति तद् रजः कौन्तेय कर्मसङ्गेन दृष्टादृष्टार्थेषु कर्मसु सञ्जनं तत्परता कर्मसङ्गः तेन निबध्नाति रजो देहिनम्॥ 7॥
अप्राप्त वस्तुकी अभिलाषाका नाम “तृष्णा” है और प्राप्त विषयोंमें मनकी प्रीतिरूप स्नेहका नाम “आसक्ति” है, इन तृष्णा और आसक्तिकी उत्पत्तिके कारणरूप रजोगुणको रागात्मक जान। अर्थात् गेरू आदि रंगोंकी भाँति (पुरुषको विषयोंके साथ) उनमें आसक्त करके तद्रूप करनेवाला होनेसे, इसको तू रागरूप समझ।
हे कुन्तीपुत्र! वह रजोगुण, इस शरीरधारी क्षेत्रज्ञको कर्मासक्तिसे बाँधता है। दृष्ट और अदृष्ट फल देनेवाले जो कर्म हैं उनमें आसक्ति—तत्परताका नाम कर्मासक्ति है, उसके द्वारा बाँधता है॥ 7॥
तमः तृतीयो गुणः अज्ञानजम् अज्ञानाद् जातम् अज्ञानजं विद्धि मोहनं मोहकरम् अविवेककरं सर्वदेहिनां सर्वेषां देहवतां प्रमादालस्यनिद्राभिः प्रमादः च आलस्य च निद्रा च प्रमादालस्यनिद्राः ताभिः तत् तमो निबध्नाति भारत॥ 8॥
और समस्त देहधारियोंको मोहित करनेवाले तमोगुणको, यानी जीवोंके अन्तःकरणमें मोह—अविवेक उत्पन्न करनेवाले तम नामक तीसरे गुणको, तू अज्ञानसे उत्पन्न हुआ जान। हे भारत! वह तमोगुण, (जीवोंको) प्रमाद, आलस्य और निद्राके द्वारा बाँधा करता है॥ 8॥
पुनः गुणानां व्यापारः सङेक्षपत उच्यते—
फिर भी उन गुणोंका व्यापार संक्षेपसे बतलाया जाता है—
सत्त्वं सुखे सञ्जयति संश्लेषयति रजः कर्मणि हे भारत सञ्जयति* इति वर्तते। ज्ञानं सत्त्वकृतं विवेकम् आवृत्य आच्छाद्य तु तमः स्वेन आवरणात्मना प्रमादे सञ्जयति उत प्रमादो नाम प्राप्तकर्तव्याकरणम्॥ 9॥
हे भारत! सत्त्वगुण सुखमें नियुक्त करता है और रजोगुण कर्मोंमें नियुक्त किया करता है तथा तमोगुण सत्त्वगुणसे उत्पन्न हुए विवेक-ज्ञानको अपने आवरणात्मक स्वभावसे आच्छादित करके फिर प्रमादमें नियुक्त किया करता है। प्राप्त कर्तव्यको न करनेका नाम प्रमाद है॥ 9॥
उक्तं कार्यं कदा कुर्वन्ति गुणा इति उच्यते—
ये तीनों गुण उपर्युक्त कार्य कब करते हैं? सो कहते हैं—
रजः तमः च उभौ अपि अभिभूय सत्त्वं भवति उद्भवति वर्धते यदा तदा लब्धात्मकं सत्त्वं स्वकार्यं ज्ञानसुखादि आरभते हे भारत।
तथा रजोगुणः सत्त्वं तमः च एव उभौ अपि अभिभूय वर्धते यदा तदा कर्मतृष्णादि स्वकार्यम् आरभते।
तम आख्यो गुणः सत्त्वं रजः च उभौ अपि अभिभूय तथा एव वर्धते यदा तदा ज्ञानावरणादि स्वकार्यम् आरभते॥ 10॥
हे भारत! रजोगुण और तमोगुण—इन दोनोंको दबाकर जब सत्त्वगुण उन्नत होता है—बढ़ता है, तब वह अपने स्वरूपको प्राप्त हुआ सत्त्वगुण अपने कार्य-ज्ञान और सुखादिका आरम्भ किया करता है।
तथा सत्त्वगुण और तमोगुण—इन दोनोंको ही दबाकर जब रजोगुण बढ़ता है तब वह “कर्मोंमें तृष्णा आदि” अपने कार्यका आरम्भ किया करता है।
वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुण इन दोनोंको दबाकर जब तम नामक गुण बढ़ता है तब वह “ज्ञानको आच्छादित करना आदि” अपना कार्य आरम्भ किया करता है॥ 10॥
यदा यो गुणः उद्भूतो भवति तदा तस्य किं लिङ्गम् इति उच्यते—
जिस समय जो गुण बढ़ा हुआ रहता है, उस समय उसके क्या चिह्न होते हैं, सो बतलाते हैं—
सर्वद्वारेषु आत्मन उपलब्धिद्वाराणि श्रोत्रा-दीनि सर्वाणि करणानि तेषु सर्वद्वारेषु अन्तः-करणस्य बुद्धेः वृत्तिः प्रकाशो देहे अस्मिन् उपजायते। तद् एव ज्ञानं यदा एवं प्रकाशो ज्ञानाख्य उपजायते तदा ज्ञानप्रकाशेन लिङ्गेन विद्याद् विवृद्धम् उद्भूतं सत्त्वम् इति उत अपि॥ 11॥
जब इस शरीरके समस्त द्वारोंमें, यानी आत्माकी उपलब्धिके द्वारभूत जो श्रोत्रादि सब इन्द्रियाँ हैं उनमें, प्रकाश उत्पन्न हो—अन्तःकरण यानी बुद्धिकी वृत्तिका नाम “प्रकाश” है और यही “ज्ञान” है। यह ज्ञान नामक प्रकाश जब शरीरके समस्त द्वारोंमें उत्पन्न हो—तब इस ज्ञानके प्रकाशरूप चिह्नसे ही समझना चाहिये कि सत्त्वगुण बढ़ा है॥ 11॥
रजस उद्भूतस्य इदं चिह्नम्—
उत्पन्न हुए रजोगुणके चिह्न ये होते हैं—
लोभः परद्रव्यादित्सा, प्रवृत्तिः प्रवर्तनं सामान्यचेष्टा, आरम्भः, कस्य, कर्मणाम्। अशमः अनुपशमः, हर्षरागादिप्रवृत्तिः, स्पृहा सर्व-सामान्यवस्तुविषया तृष्णा, रजसि गुणे विवृद्धे एतानि लिङ्गानि जायन्ते हे भरतर्षभ॥ 12॥
हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ! लोभ—परद्रव्यको प्राप्त करनेकी इच्छा, प्रवृत्ति—सामान्यभावसे सांसारिक चेष्टा और कर्मोंका आरम्भ तथा अशान्ति—उपरामता-का अभाव, हर्ष और रागादिका प्रवृत्त होना तथा लालसा अर्थात् सामान्यभावसे समस्त वस्तुओंमें तृष्णा—ये सब चिह्न रजोगुणके बढ़नेपर उत्पन्न होते हैं॥ 12॥
अप्रकाशः अविवेकः अत्यन्तं अप्रवृत्तिः च प्रवृत्त्यभावः तत्कार्यं प्रमादो मोह एव च अविवेको मूढता इत्यर्थः। तमसि गुणे विवृद्धे एतानि लिङ्गानि जायन्ते हे कुरुनन्दन॥ 13॥
हे कुरुनन्दन! अप्रकाश अर्थात् अत्यन्त अविवेक, प्रवृत्तिका अभाव, उसका कार्य प्रमाद और मोह अर्थात् अविवेकरूप मूढ़ता—ये सब चिह्न तमोगुणकी वृद्धि होनेपर उत्पन्न होते हैं॥ 13॥
मरणद्वारेण अपि यत्फलं प्राप्यते तद् अपि सङ्गरागहेतुकं सर्वं गौणम् एव इति दर्शयन् आह—
मरण-समयकी अवस्थाके द्वारा जो फल मिलता है, वह सब भी आसक्ति और रागसे ही होनेवाला तथा गुणजन्य ही होता है, यह दिखानेके लिये कहते हैं—
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे उद्भूते तु प्रलयं मरणं याति प्रतिपद्यते देहभृद् आत्मा तदा उत्तमविदां महदादितत्त्वविदाम् इति एतत्। लोकान् अमलान् मलरहितान् प्रतिपद्यते प्राप्नोति इति एतत्॥ 14॥
जब यह शरीरधारी जीव, सत्त्वगुणकी वृद्धिमें मृत्युको प्राप्त होता है, तब उत्तम तत्त्वको जाननेवालोंके अर्थात् महत्तत्त्वादिको जाननेवालोंके निर्मल—मलरहित लोकोंको प्राप्त होता है॥ 14॥
रजसि गुणे विवृद्धे प्रलयं मरणं गत्वा प्राप्य कर्मसङ्गिषु कर्मासक्तियुक्तेषु मनुष्येषु जायते तथा तद्वद् एव प्रलीनो मृतः तमसि विवृद्धे मूढयोनिषु पश्वादियोनिषु जायते॥ 15॥
रजोगुणकी वृद्धिके समय मरनेपर कर्मसंगियोंमें अर्थात् कर्मोंमें आसक्त हुए मनुष्योंमें उत्पन्न होता है और वैसे ही तमोगुणके बढ़नेपर मरा हुआ मनुष्य मूढ़योनिमें अर्थात् पशु आदि योनियोंमें उत्पन्न होता है॥ 15॥
अतीतश्लोकार्थस्य एव सङेक्षप उच्यते—
पहले कहे हुए श्लोकोंके अर्थका ही सार कहा जाता है—
कर्मणः सुकृतस्य सात्त्विकस्य इत्यर्थः। आहुः शिष्टाः सात्त्विकम् एव निर्मलं फलम् इति। रजसः तु फलं दुःखं राजसस्य कर्मण इत्यर्थः। कर्माधिकारात् फलम् अपि दुःखम् एव कारणानुरूप्याद्
राजसम्
एव।
तथा अज्ञानं तमसः तामसस्य कर्मणः अधर्मस्य पूर्ववत्॥ 16॥
श्रेष्ठ पुरुषोंने शुभ कर्मका, अर्थात् सात्त्विक कर्मका फल सात्त्विक और निर्मल ही बतलाया है, तथा राजस कर्मका फल दुःख बतलाया है, अर्थात् कर्माधिकारसे राजस कर्मका फल भी अपने कारणके अनुसार दुःखरूप राजस ही होता है (ऐसा कहा है) और वैसे ही, तामसरूप अधर्मका—पापकर्मका फल अज्ञान बतलाया है॥ 16॥
किं च गुणेभ्यो भवति—
गुणोंसे क्या उत्पन्न होता है? (सो कहते हैं—)
सत्त्वाद् लब्धात्मकात् सञ्जायते समुत्पद्यते ज्ञानम्, रजसो लोभ एव च प्रमादमोहौ च उभौ तमसो भवतः अज्ञानम् एव च भवति॥ 17॥
उत्कर्षको प्राप्त हुए सत्त्वगुणसे ज्ञान उत्पन्न होता है और रजोगुणसे लोभ होता है तथा तमोगुणसे प्रमाद और मोह—ये दोनों होते हैं और अज्ञान भी होता है॥ 17॥
किं च—
तथा—
ऊर्ध्वं गच्छन्ति देवलोकादिषु उत्पद्यन्ते सत्त्वस्थाः सत्त्वगुणवृत्तस्थाः। मध्ये तिष्ठन्ति मनुष्येषु उत्पद्यन्ते राजसाः।
जघन्यगुणवृत्तस्था जघन्यः च असौ गुणः च जघन्यगुणः तमः तस्य वृत्तं निद्रालस्यादि तस्मिन् स्थिता जघन्यगुणवृत्तस्था मूढा अधो गच्छन्ति पश्वादिषु उत्पद्यन्ते तामसाः॥ 18॥
सत्त्वगुणमें यानी सात्त्विक भावोंमें स्थित पुरुष उच्च स्थानको जाते हैं अर्थात् देवलोक आदि उच्च लोकोंमें उत्पन्न होते हैं। और राजस पुरुष बीचमें रहते हैं अर्थात् मनुष्य-योनियोंमें उत्पन्न होते हैं।
तथा जघन्य गुणके आचरणोंमें स्थित हुए अर्थात् जो जघन्य—निन्दनीय गुण है,उस तमोगुणके कार्य— निद्रा और आलस्य आदिमें स्थित हुए मूढ़—तामसी पुरुष नीचे गिरते हैं—वे पशु, पक्षी आदि योनियोंमें उत्पन्न होते हैं॥ 18॥
पुरुषस्य प्रकृतिस्थत्वरूपेण मिथ्याज्ञानेन युक्तस्य भोग्येषु गुणेषु सुखदुःखमोहात्मकेषु सुखी दुःखी मूढः अहम् अस्मि इति एवंरूपो यः सङ्गः तत् कारणं पुरुषस्य सदसद्योनिजन्म-प्राप्तिलक्षणस्य संसारस्य, इति समासेन पूर्वाध्याये यद् उक्तं तद् इह “सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः” इत्यत आरभ्य गुणस्वरूपं गुणवृत्तं स्ववृत्तेन च गुणानां बन्धकत्वं गुणवृत्तनिबद्धस्य च पुरुषस्य या गतिः इति एतत्सर्वं मिथ्याज्ञानम् अज्ञानमूलं बन्धकारणं विस्तरेण उक्त्वा अधुना सम्यग्दर्शनाद् मोक्षो वक्तव्य इति आह भगवान्—
प्रकृतिमें स्थित होनारूप मिथ्याज्ञानसे युक्त पुरुषका सुख-दुःख-मोहात्मक भोगरूप गुणोंमें “मैं सुखी, दुःखी अथवा मूढ़ हूँ” इस प्रकारका जो सङ्ग है, वह सङ्ग ही इस पुरुषकी अच्छी-बुरी योनियोंमें जन्म-प्राप्तिरूप संसारका कारण है। यह बात जो पहले तेरहवें अध्यायमें संक्षेपसे कही थी, उसीको यहाँ “सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः” इस श्लोकसे लेकर (उपर्युक्त श्लोकतक) गुणोंका स्वरूप, गुणोंका कार्य, अपने कार्यद्वारा गुणोंका बन्धकत्व तथा गुणोंके कार्यद्वारा बँधे हुए पुरुषकी जो गति होती है, इन सब मिथ्याज्ञानरूप अज्ञानमूलक बन्धनके कारणोंको, विस्तारपूर्वक बतलाकर, अब यथार्थ ज्ञानसे मोक्ष (कैसे होता है सो) बतलाना चाहिये, इसलिये भगवान् बोले—
नान्यं
कार्यकरणविषयाकारपरिणतेभ्यो गुणेभ्यः कर्तारम् अन्यं यदा द्रष्टा विद्वान् सन् न अनुपश्यति। गुणा एव सर्वावस्थाः सर्वकर्मणां कर्तार इति एवं पश्यति। गुणेभ्यः च परं गुणव्यापारसाक्षिभूतं वेत्ति मद्भावं मम भावं स द्रष्टा अधिगच्छति॥ 19॥
जिस समय द्रष्टा पुरुष ज्ञानी होकर, कार्य, करण और विषयोंके आकारमें परिणत हुए गुणोंसे अतिरिक्त अन्य किसीको (भी) कर्ता नहीं देखता है, अर्थात् यही देखता है कि समस्त अवस्थाओंमें स्थित हुए गुण ही समस्त कर्मोंके कर्ता हैं तथा गुणोंके व्यापारके साक्षीरूप आत्माको गुणोंसे पर जानता है, तब वह द्रष्टा मेरे भावको प्राप्त होता है॥ 19॥
कथम् अधिगच्छति इति उच्यते—
कैसे प्राप्त होता है? सो बतलाते हैं—
गुणान् एतान् यथोक्तान् अतीत्य जीवन्
त्रीन् एव
अतिक्रम्य
मायोपाधिभूतान्, देही देहसमुद्भवान् देहोत्पत्तिबीजभूतान्, जन्ममृत्यु-जरादुःखैः, जन्म च मृत्युः च जरा च दुःखानि च तैः जीवन् एव विमुक्तः सन् विद्वान् अमृतम् अश्नुते। एवं मद्भावम् अधिगच्छति इत्यर्थः॥ 20॥
देहोत्पत्तिके
बीजभूत,
इन
मायोपाधिक पूर्वोक्त तीनों गुणोंका उल्लङ्घन कर, अर्थात् जीवितावस्थामें ही इनका अतिक्रम करके, यह देहधारी विद्वान् जीता हुआ ही जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और दुःखोंसे मुक्त होकर अमृतका अनुभव करता है। अभिप्राय यह कि इस प्रकार वह मेरे भावको प्राप्त हो जाता है॥ 20॥
जीवन् एव गुणान् अतीत्य अमृतम् अश्नुते इति प्रश्नबीजं प्रतिलभ्य—
(शरीरधारी जीव) “जीता हुआ ही गुणोंको अतिक्रम करके अमृतका अनुभव करता है” इस प्रश्नबीजको पाकर अर्जुन बोले—
कैः लिङ्गैः चिह्नैः त्रीन् एतान् व्याख्यातान् गुणान् अतीतः अतिक्रान्तो भवति प्रभो। किमाचारः कः अस्य आचार इति किमाचारः। कथं केन च प्रकारेण एतान् त्रीन् गुणान् अतिवर्तते॥ 21॥
हे प्रभो! इन पूर्ववर्णित तीनों गुणोंसे अतीत— पार हुआ पुरुष किन-किन लक्षणोंसे युक्त होता है? और वह कैसे आचरणवाला होता है अर्थात् उसके आचरण कैसे होते हैं? तथा किस प्रकारसे (किस उपायसे) मनुष्य इन तीनों गुणोंसे अतीत हो सकता है?॥ 21॥
गुणातीतस्य लक्षणं गुणातीतत्वोपायं च अर्जुनेन पृष्टः अस्मिन् श्लोके प्रश्नद्वयार्थं प्रतिवचनम्—श्रीभगवान् उवाच—यत् तावत् कैः लिङ्गैः युक्तो गुणातीतो भवति इति तत् शृणु—
इस (उपर्युक्त) श्लोकमें अर्जुनने गुणातीतके लक्षण और गुणातीत होनेका उपाय पूछा है, उन दोनों प्रश्नोंका उत्तर देनेके लिये श्रीभगवान् बोले कि पहले गुणातीत पुरुष किन-किन लक्षणोंसे युक्त होता है उसे सुन—
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प्रकाशं च सत्त्वकार्यं प्रवृत्तिं च रजःकार्यं मोहम् एव च तमःकार्यम् इति एतानि न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि सम्यग्विषयभावेन उद्भूतानि।
मम तामसः प्रत्ययो जातः तेन अहं मूढः तथा राजसी प्रवृत्तिः मम उत्पन्ना दुःखात्मिका तेन अहं रजसा प्रवर्तितः प्रचलितः स्वरूपात् कष्टं मम वर्तते यः अयं मत्स्वरूपावस्थानाद् भ्रंशः तथा सात्त्विको गुणः प्रकाशात्मा मां विवेकित्वम् आपादयन् सुखे च सञ्जयन् बध्नाति इति तानि द्वेष्टि असम्यग्दर्शित्वेन। तद् एवं गुणातीतो न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि।
यथा च सात्त्विकादिपुरुषः सात्त्विकादि-कार्याणि आत्मानं प्रति प्रकाश्य निवृत्तानि काङक्षति न तथा गुणातीतो निवृत्तानि काङक्षति इत्यर्थः।
एतद् न परप्रत्यक्षं लिङ्गं किं तर्हि स्वात्म-प्रत्यक्षत्वाद् आत्मविषयम् एव एतद् लक्षणम्। न हि स्वात्मविषयं द्वेषम् आकाङक्षां वा परः पश्यति॥ 22॥
सत्त्वगुणका कार्य प्रकाश, रजोगुणका कार्य प्रवृत्ति और तमोगुणका कार्य मोह, ये जब प्राप्त होते हैं अर्थात् भली प्रकार विषयभावसे उपलब्ध होते हैं, तब वह इनसे द्वेष नहीं किया करता।
अभिप्राय यह कि “मुझमें तामसभाव उत्पन्न हो गया, उससे मैं मोहित हो गया और दुःखरूप राजसी प्रवृत्ति मुझमें उत्पन्न हुई, उस राजसभावने मुझे प्रवृत्त कर दिया, इसने मुझे स्वरूपसे विचलित कर दिया, यह जो अपनी स्वरूप-स्थितिसे विचलित होना है, वह मेरे लिये बड़ा भारी दुःख है तथा प्रकाशमय सात्त्विक गुण, मुझे विवेकित्व प्रदान करके और सुखमें नियुक्त करके बाँधता है”, इस प्रकार साधारण मनुष्य अयथार्थदर्शी होनेके कारण उन गुणोंसे द्वेष किया करते हैं, परंतु गुणातीत पुरुष उनकी प्राप्ति होनेपर उनसे द्वेष नहीं करता।
तथा जैसे सात्त्विक, राजस और तामस पुरुष जब सात्त्विक आदि भाव अपना स्वरूप प्रत्यक्ष कराकर निवृत्त हो जाते हैं तब (पुनः) उनको चाहते हैं। वैसे गुणातीत उन निवृत्त हुए गुणोंके कार्योंको नहीं चाहता यह अभिप्राय है।
(परंतु ये सब लक्षण दूसरोंको प्रत्यक्ष होनेवाले नहीं हैं। तो कैसे हैं? अपने-आपको ही प्रत्यक्ष होनेके कारण ये स्वसंवेद्य ही हैं; क्योंकि अपने-आपमें होनेवाले द्वेष या आकांक्षाको दूसरा नहीं देख सकता॥ 22॥
अथ इदानीं गुणातीतः किमाचार इति प्रश्नस्य प्रतिवचनम् आह—
अब, गुणातीत पुरुष किस प्रकारके आचरणवाला होता है, इस प्रश्नका उत्तर देते हैं—
उदासीनवद् यथा उदासीनो न कस्यचित् पक्षं भजते तथा अयं गुणातीतत्वोपायमार्गे अवस्थित आसीन आत्मविद् गुणैः यः सन्न्यासी न विचाल्यते विवेकदर्शनावस्थातः।
तद् एतत् स्फुटीकरोति गुणाः कार्यकरण-विषयाकारपरिणता
अन्योन्यस्मिन्
वर्तन्ते इति यः अवतिष्ठति। छन्दोभङ्गभयात् परस्मै-पदप्रयोगः।
यः
अनुतिष्ठति
इति
वा पाठान्तरम्। न इङ्गते न चलति स्वरूपावस्थ एव भवति इत्यर्थः॥ 23॥
उदासीनकी भाँति स्थित हुआ, अर्थात् जैसे उदासीन पुरुष किसीका पक्ष नहीं लेता, उसी भावसे गुणातीत होनेके उपायरूप मार्गमें स्थित हुआ जो आत्मज्ञानी—संन्यासी, गुणोंद्वारा विवेकज्ञानकी स्थितिसे विचलित नहीं किया जा सकता।
इसीको स्पष्ट करते हैं कि कार्य-करण और विषयोंके आकारमें परिणत हुए गुण ही एकमें एक बर्त रहे हैं—जो ऐसा समझकर स्थित रहता है, चलायमान नहीं होता अर्थात् अविचलभावसे स्वरूपमें ही स्थित रहता है। यहाँ छन्दोभङ्ग होनेके भयसे “आत्मनेपद” (अवतिष्ठते) के स्थानमें “परस्मैपद” (अवतिष्ठति)-का प्रयोग किया गया है अथवा “योऽवतिष्ठति” के स्थानमें “योऽनुतिष्ठति” ऐसा पाठान्तर समझना चाहिये॥ 23॥
किं च—
तथा—
समदुःखसुखः समे दुःखसुखे यस्य स समदुःखसुखः। स्वस्थः स्वे आत्मनि स्थितः प्रसन्नः। समलोष्टाश्मकाञ्चनो लोष्टं च अश्मा च काञ्चनं च समानि यस्य स समलोष्टाश्म-काञ्चनः।
तुल्यप्रियाप्रियः प्रियं च अप्रियं च प्रियाप्रिये तुल्ये समे यस्य सः अयं तुल्यप्रियाप्रियः। धीरः
तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः धीमान्।
निन्दा
च आत्मसंस्तुतिः च तुल्ये निन्दात्मसंस्तुती यस्य यतेः स तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः॥ 24॥
जो सुख-दुःखमें समान है अर्थात् सुख और दुःख जिसको समान प्रतीत होते हैं, जो स्वस्थ अर्थात् अपने आत्मस्वरूपमें स्थित—प्रसन्न है, जो समलोष्टाश्मकाञ्चन है अर्थात् मिट्टी, पत्थर और सुवर्ण जिसके (विचारमें) समान हो गये हैं।
जो तुल्यप्रियाप्रिय है अर्थात् प्रिय और अप्रिय दोनोंहीको जो समान समझता है और जो धीर अर्थात् बुद्धिमान् है तथा जो तुल्यनिन्दात्मसंस्तुति है अर्थात् जिसके विचारमें अपनी निन्दा और स्तुति समान हो गयी है, ऐसा अपनी निन्दा-स्तुतिको समान समझनेवाला यति है॥ 24॥
किं च—
तथा—
मानापमानयोः तुल्यः समो निर्विकारः तुल्यो मित्रारिपक्षयोः, यद्यपि उदासीना भवन्ति केचित् स्वाभिप्रायेण तथापि पराभिप्रायेण मित्रारिपक्षयोः इव भवन्ति इति तुल्यो मित्रारिपक्षयोः इति आह।
सर्वारम्भपरित्यागी दृष्टादृष्टार्थानि कर्माणि आरभ्यन्ते इति आरम्भाः सर्वान् आरम्भान् परित्यक्तुं शीलम्
अस्य
इति
सर्वारम्भपरित्यागी देहधारणमात्रनिमित्तव्यतिरेकेण
सर्वकर्म-परित्यागी इत्यर्थः। गुणातीतः स उच्यते।
“उदासीनवत्” इत्यादि “गुणातीतः स उच्यते” इति एतद् अन्तम् उक्तं यावद् यत्नसाध्यं तावत् सन्न्यासिनः अनुष्ठेयं गुणातीतत्वसाधनं मुमुक्षोः स्थिरीभूतं तु स्वसंवेद्यं सद् गुणातीतस्य यतेः लक्षणं भवति इति॥ 25॥
जो मान और अपमानमें समान अर्थात् निर्विकार रहता है तथा मित्र और शत्रुपक्षके लिये तुल्य है। यद्यपि कोई-कोई पुरुष अपने विचारसे तो उदासीन होते हैं, परंतु दूसरोंकी समझसे वे मित्र या शत्रुपक्षवाले-से ही होते हैं, इसलिये कहते हैं कि जो मित्र और शत्रुपक्षके लिये तुल्य है।
तथा जो सारे आरम्भोंका त्याग करनेवाला है। दृष्ट और अदृष्ट फलके लिये किये जानेवाले कर्मोंका नाम “आरम्भ” है, ऐसे समस्त आरम्भोंका त्याग करनेका जिसका स्वभाव है वह “सर्वारम्भपरित्यागी” है अर्थात् जो केवल शरीरधारणके लिये आवश्यक कर्मोंके सिवा सारे कर्मोंका त्याग कर देनेवाला है, वह पुरुष “गुणातीत” कहलाता है।
“उदासीनवत्” यहाँसे लेकर “गुणातीतः स उच्यते” यहाँतक जो भाव बतलाये गये हैं, वे सब जबतक प्रयत्नसे सम्पादन करनेयोग्य रहते हैं, तबतक तो मुमुक्षु—संन्यासीके लिये अनुष्ठान करनेयोग्य गुणातीतत्व-प्राप्तिके साधन हैं और जब वे स्थिर हो जाते हैं, तो गुणातीत संन्यासीके स्वसंवेद्य लक्षण बन जाते हैं॥ 25॥
अधुना कथं च त्रीन् गुणान् अतिवर्तते इति प्रश्नस्य प्रतिवचनम् आह—
मनुष्य इन तीनों गुणोंसे किस प्रकार अतीत होता है? इस प्रश्नका उत्तर अब देते हैं—
मां च ईश्वरं नारायणं सर्वभूतहृदयाश्रितं यो यतिः कर्मी वा अव्यभिचारेण न कदाचिद् यो व्यभिचरति भक्तियोगेन भजनं भक्तिः सा एव योगः तेन भक्तियोगेन सेवते स गुणान् समतीत्य एतान् यथोक्तान् ब्रह्मभूयाय भवनं भूयो ब्रह्मभूयाय ब्रह्मभवनाय मोक्षाय कल्पते समर्थो भवति इत्यर्थः॥ 26॥
जो संन्यासी या कर्मयोगी सब भूतोंके हृदयमें स्थित मुझ परमेश्वर नारायणको, कभी व्यभिचरित (विचलित) न होनेवाले अव्यभिचारी भक्तियोगद्वारा सेवन करता है—भजनका नाम भक्ति है, वही योग है, उस भक्तियोगके द्वारा जो मेरी सेवा करता है— वह इन ऊपर कहे हुए गुणोंको अतिक्रमण करके ब्रह्मलोकको पानेके लिये, अर्थात् मोक्ष प्राप्त करनेके लिये योग्य समझा जाता है, अर्थात् (मोक्ष प्राप्त करनेमें) समर्थ होता है॥ 26॥
कुत एतद् इति उच्यते—
ऐसा क्यों होता है? सो बतलाते हैं—
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ब्रह्मणः परमात्मनो हि यस्मात् प्रतिष्ठा अहं प्रतितिष्ठति अस्मिन् इति प्रतिष्ठा अहं प्रत्यगात्मा।
कीदृशस्य ब्रह्मणः।
अमृतस्य
अविनाशिनः
अव्ययस्य अविकारिणः शाश्वतस्य च नित्यस्य धर्मस्य ज्ञानयोगधर्मप्राप्यस्य सुखस्य आनन्दरूपस्य ऐकान्तिकस्य अव्यभिचारिणः।
अमृतादिस्वभावस्य
परमात्मनः
प्रत्य-गात्मा प्रतिष्ठा सम्यग्ज्ञानेन परमात्मतया निश्चीयते। तद् एतत् “ब्रह्मभूयाय कल्पते” इति उक्तम्।
यया च ईश्वरशक्त्या भक्तानुग्रहादि-प्रयोजनाय ब्रह्म प्रतिष्ठते प्रवर्तते सा शक्तिः ब्रह्म एव अहं शक्तिशक्तिमतोः अनन्यत्वाद् इति अभिप्रायः।
अथवा ब्रह्मशब्दवाच्यत्वात् सविकल्पकं ब्रह्म तस्य ब्रह्मणो निर्विकल्पकः अहम् एव न अन्यः प्रतिष्ठा आश्रयः।
किंविशिष्टस्य,
अमृतस्य
अमरणधर्मकस्य
अव्ययस्य व्ययरहितस्य।
किं च शाश्वतस्य च नित्यस्य धर्मस्य ज्ञाननिष्ठालक्षणस्य
सुखस्य
तज्जनितस्य ऐकान्तिकस्य ऐकान्तनियतस्य च प्रतिष्ठा अहम् इति वर्तते॥ 27॥
क्योंकि ब्रह्म—परमात्माकी प्रतिष्ठा मैं हूँ। जिसमें प्रतिष्ठित हो वह प्रतिष्ठा है, इस व्युत्पत्तिके अनुसार मैं अन्तरात्मा (ब्रह्मकी) प्रतिष्ठा हूँ।
कैसे ब्रह्मकी? (सो कहते हैं—)
जो अमृत-अविनाशी, अव्यय-निर्विकार, शाश्वत-नित्य, धर्मस्वरूप—ज्ञानयोगरूप धर्मद्वारा प्राप्तव्य और एकान्तिक सुखस्वरूप अर्थात् व्यभिचाररहित आनन्दमय है उस ब्रह्मकी मैं प्रतिष्ठा हूँ।
अमृत आदि स्वभाववाले परमात्माकी प्रतिष्ठा अन्तरात्मा ही है; क्योंकि यथार्थ ज्ञानसे वही परमात्मा-रूपसे निश्चित होता है। यही बात “ब्रह्मभूयाय कल्पते” इस पदसे कही गयी है।
अभिप्राय यह है कि जिस ईश्वरीय शक्तिसे भक्तोंपर अनुग्रह आदि करनेके लिये ब्रह्म प्रवर्तित होता है, वह शक्ति, मैं ब्रह्म ही हूँ; क्योंकि शक्ति और शक्तिमान्में भेद नहीं होता।
अथवा (ऐसा समझना चाहिये कि) ब्रह्म-शब्दका वाच्य होनेके कारण यहाँ सगुण ब्रह्मका ग्रहण है, उस सगुण ब्रह्मका मैं निर्विकल्प—निर्गुण ब्रह्म ही प्रतिष्ठा-आश्रय हूँ, दूसरा कोई नहीं।
किन विशेषणोंसे युक्त सगुण ब्रह्मका?
जो अमृत अर्थात् मरण-धर्मसे रहित है और अविनाशी अर्थात् क्षय होनेसे रहित है, उसका।
तथा ज्ञाननिष्ठारूप शाश्वत-नित्य धर्मका और उससे होनेवाले ऐकान्तिक एकमात्र निश्चित परम आनन्दका भी, मैं ही आश्रय हूँ। “अहं प्रतिष्ठा” यह पद यहाँ अनुवृत्तिसे लिया गया है॥ 27॥