गुणत्रयविभागयोग
सम्बन्ध—तेरहवें अध्यायमें “क्षेत्र” और “क्षेत्रज्ञ”के लक्षणोंका निर्देश करके उन दोनोंके ज्ञानको ही ज्ञान बतलाया और उसके अनुसार क्षेत्रके स्वरूप, स्वभाव, विकार और उसके तत्त्वोंकी उत्पत्तिके क्रम आदि तथा क्षेत्रज्ञके स्वरूप और उसके प्रभावका वर्णन किया। वहाँ उन्नीसवें श्लोकसे प्रकृति-पुरुषके नामसे प्रकरण आरम्भ करके गुणोंको प्रकृतिजन्य बतलाया और इक्कीसवें श्लोकमें यह बात भी कही कि पुरुषके बार-बार अच्छी-बुरी योनियोंमें जन्म होनेमें गुणोंका संग ही हेतु है। गुणोंके भिन्न-भिन्न स्वरूप क्या हैं, ये जीवात्माको कैसे शरीरमें बाँधते हैं, किस गुणके संगसे किस योनिमें जन्म होता है, गुणोंसे छूटनेके उपाय क्या हैं, गुणोंसे छूटे हुए पुरुषोंके लक्षण तथा आचरण कैसे होते हैं—ये सब बातें जाननेकी स्वाभाविक ही इच्छा होती है; अतएव इसी विषयका स्पष्टीकरण करनेके लिये इस चौदहवें अध्यायका आरम्भ किया गया है। तेरहवें अध्यायमें वर्णित ज्ञानको ही स्पष्ट करके चौदहवें अध्यायमें विस्तारपूर्वक समझाना है, इसलिये पहले भगवान् दो श्लोकोंमें उस ज्ञानका महत्त्व बतलाकर उसके पुनः वर्णनकी प्रतिज्ञा करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार ज्ञानको फिरसे कहनेकी प्रतिज्ञा करके और उसके महत्त्वका निरूपण करके अब भगवान् उस ज्ञानका वर्णन आरम्भ करते हुए दो श्लोकोंमें प्रकृति और पुरुषसे समस्त जगत्की उत्पत्ति बतलाते हैं—
सम्बन्ध—तेरहवें अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें जो यह बात कही थी कि गुणोंके संगसे ही इस जीवका अच्छी-बुरी योनियोंमें जन्म होता है। उसके अनुसार जीवोंका नाना प्रकारकी योनियोंमें जन्म लेनेकी बात तो चौथे श्लोकतक कही गयी किंतु वहाँ गुणोंकी कोई बात नहीं आयी। इसलिये अब वे गुण क्या हैं? उनका संग क्या है? किस गुणके संगसे अच्छी योनिमें और किस गुणके संगसे बुरी योनिमें जन्म होता है?— इन सब बातोंको स्पष्ट करनेके लिये इस प्रकरणका आरम्भ करते हुए भगवान् अब पाँचवेंसे आठवें श्लोकतक पहले उन तीनों गुणोंकी प्रकृतिसे उत्पत्ति और उनके विभिन्न नाम बतलाकर फिर उनके स्वरूप और उनके द्वारा जीवात्माके बन्धन-प्रकारका क्रमशः पृथक्-पृथक् वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—अब सत्त्वगुणका स्वरूप और उसके द्वारा जीवात्माके बाँधे जानेका प्रकार बतलाते हैं—
सम्बन्ध—अब रजोगुणका स्वरूप और उसके द्वारा जीवात्माको बाँधे जानेका प्रकार बतलाते हैं—
सम्बन्ध—अब तमोगुणका स्वरूप और उसके द्वारा जीवात्माके बाँधे जानेका प्रकार बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंके स्वरूपका और उनके द्वारा जीवात्माके बाँधे जानेका प्रकार बतलाकर अब उन तीन गुणोंका स्वाभाविक व्यापार बतलाते हैं—
सम्बन्ध—सत्त्व आदि तीनों गुण जिस समय अपने-अपने कार्यमें जीवको नियुक्त करते हैं, उस समय वे ऐसे करनेमें किस प्रकार समर्थ होते हैं—यह बात अगले श्लोकमें बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार अन्य दो गुणोंको दबाकर प्रत्येक गुणके बढ़नेकी बात कही गयी। अब प्रत्येक गुणकी वृद्धिके लक्षण जाननेकी इच्छा होनेपर सत्त्वगुणकी वृद्धिके लक्षण पहले बतलाये जाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार सत्त्वगुणकी वृद्धिके लक्षणोंका वर्णन करके अब रजोगुणकी वृद्धिके लक्षण बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार बढ़े हुए रजोगुणके लक्षणोंका वर्णन करके अब तमोगुणकी वृद्धिके लक्षण बतलाये जाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार तीनों गुणोंकी वृद्धिके भिन्न-भिन्न लक्षण बतलाकर अब दो श्लोकोंमें उन गुणोंमेंसे किस गुणकी वृद्धिके समय मरकर मनुष्य किस गतिको प्राप्त होता है, यह बतलाया जाता है—
सम्बन्ध—सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंकी वृद्धिमें मरनेके भिन्न-भिन्न फल बतलाये गये; इससे यह जाननेकी इच्छा होती है कि इस प्रकार कभी किसी गुणकी और कभी किसी गुणकी वृद्धि क्यों होती है? इसपर कहते हैं—
सम्बन्ध—ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें श्लोकोंमें सत्त्व, रज और तमोगुणकी वृद्धिके लक्षणोंका क्रमसे वर्णन किया गया; फिर सत्त्वादि गुणोंकी वृद्धिमें मरनेका पृथक्-पृथक् फल बतलाया गया। इसपर यह जाननेकी इच्छा होती है कि “ज्ञान” आदिकी उत्पत्तिको सत्त्व आदि गुणोंकी वृद्धिके लक्षण क्यों माना गया? अतएव कार्यकी उत्पत्तिसे कारणकी सत्ताको जान लेनेके लिये ज्ञान आदिकी उत्पत्तिमें सत्त्व आदि गुणोंको कारण बतलाते हैं—
सम्बन्ध—सत्त्वादि तीनों गुणोंके कार्य ज्ञान आदिका वर्णन करके अब सत्त्वगुणमें स्थिति कराने और रज तथा तमोगुणका त्याग करानेके लिये तीनों गुणोंमें स्थित पुरुषोंकी भिन्न-भिन्न गतियोंका प्रतिपादन करते हैं—
सम्बन्ध—तेरहवें अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें जो यह बात कही थी कि गुणोंका संग ही इस मनुष्यके अच्छी-बुरी योनियोंकी प्राप्तिरूप पुनर्जन्मका कारण है; उसीके अनुसार इस अध्यायमें पाँचवेंसे अठारहवें श्लोकतक गुणोंके स्वरूप तथा गुणोंके कार्यद्वारा बँधे हुए मनुष्योंकी गति आदिका विस्तारपूर्वक प्रतिपादन किया गया। इस वर्णनसे यह बात समझायी गयी कि मनुष्यको पहले तम और रजोगुणका त्याग करके सत्त्वगुणमें अपनी स्थिति करनी चाहिये; और उसके बाद सत्त्वगुणका भी त्याग करके गुणातीत हो जाना चाहिये। अतएव गुणातीत होनेके उपाय और गुणातीत अवस्थाका फल अगले दो श्लोकोंद्वारा बतलाया जाता है—
सम्बन्ध—इस प्रकार जीवन-अवस्थामें ही तीनों गुणोंसे अतीत होकर मनुष्य अमृतको प्राप्त हो जाता है—इस रहस्ययुक्त बातको सुनकर गुणातीत पुरुषके लक्षण, आचरण और गुणातीत बननेके उपाय जाननेकी इच्छासे अर्जुन पूछते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार अर्जुनके पूछनेपर भगवान् उनके प्रश्नोंमेंसे “लक्षण” और “आचरण” विषयक दो प्रश्नोंका उत्तर चार श्लोकोंद्वारा देते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार अर्जुनके दो प्रश्नोंका उत्तर देकर अब गुणातीत बननेके उपायविषयक तीसरे प्रश्नका उत्तर दिया जाता है। यद्यपि उन्नीसवें श्लोकमें भगवान्ने गुणातीत बननेका उपाय अपनेको अकर्ता समझकर निर्गुण-निराकार सच्चिदानन्दघन ब्रह्ममें नित्य-निरन्तर स्थित रहना बतला दिया था एवं उपर्युक्त चार श्लोकोंमें गुणातीतके जिन लक्षण और आचरणोंका वर्णन किया गया है—उनको आदर्श मानकर धारण करनेका अभ्यास भी गुणातीत बननेका उपाय माना जाता है; किन्तु अर्जुनने इन उपायोंसे भिन्न दूसरा कोई सरल उपाय जाननेकी इच्छासे प्रश्न किया था, इसलिये प्रश्नके अनुकूल भगवान् दूसरा सरल उपाय बतलाते हैं—
सम्बन्ध—उपर्युक्त श्लोकमें सगुण परमेश्वरकी उपासनाका फल निर्गुण-निराकार ब्रह्मकी प्राप्ति बतलाया गया तथा उन्नीसवें श्लोकमें गुणातीत-अवस्थाका फल भगवद्भावकी प्राप्ति एवं बीसवें श्लोकमें “अमृत”की प्राप्ति बतलाया गया । अतएव फलमें विषमताकी शंकाका निराकरण करनेके लिये सबकी एकताका प्रतिपादन करते हुए इस अध्यायका उपसंहार करते हैं—