गुणत्रयविभागयोग
श्रीभगवानुवाच
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जो भगवान्की सधर्मताको प्राप्त हो जाते हैं, वे तो महासर्गमें भी पैदा नहीं होते; परन्तु जो प्राणी महासर्गमें पैदा होते हैं, उनके उत्पन्न होनेकी क्या प्रक्रिया है—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
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पूर्वश्लोकमें समष्टि संसारकी उत्पत्तिकी बात बतायी, अब आगेके श्लोकमें व्यष्टि शरीरोंकी उत्पत्तिका वर्णन करते हैं।
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परमात्मा और उनकी शक्ति प्रकृतिके संयोगसे उत्पन्न होनेवाले जीव प्रकृतिजन्य गुणोंसे कैसे बँधते हैं— इस विषयका विवेचन आगेके श्लोकसे आरम्भ करते हैं।
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पूर्वश्लोकमें भगवान्ने सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंके द्वारा देहीके बाँधे जानेकी बात कही। उन
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रजोगुणका स्वरूप और उसके बाँधनेका प्रकार क्या है—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
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तमोगुणका स्वरूप और उसके बाँधनेका प्रकार क्या है—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
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बाँधनेसे पहले तीनों गुण क्या करते हैं—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
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एक-एक गुण मनुष्यपर कैसे विजय करता है—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
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विच्छेद हो चुका है, वे महासर्गमें भी उत्पन्न नहीं जब दो गुणोंको दबाकर एक गुण बढ़ता है, तब उस बढ़े हुए गुणके क्या लक्षण होते हैं—इसको बतानेके लिये पहले बढ़े हुए सत्त्वगुणके लक्षणोंका वर्णन करते हैं।
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बढ़े हुए रजोगुणके क्या लक्षण होते हैं—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
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बढ़े हुए तमोगुणके क्या लक्षण होते हैं—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
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तात्कालिक बढ़े हुए गुणोंकी वृत्तियोंका फल क्या होता है—इसे आगेके दो श्लोकोंमें बताते हैं।
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अन्तकालमें गुणोंके तात्कालिक बढ़नेपर मरनेवाले मनुष्योंकी ऐसी गतियाँ क्यों होती हैं—इसे आगेके श्लोकमें बताते हैं।
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पूर्वश्लोकमें भगवान्ने गुणोंकी तात्कालिक वृत्तियोंके बढ़नेपर जो गतियाँ होती हैं, उनके मूलमें सात्त्विक, राजस और तामस कर्म बताये। अब सात्त्विक, राजस और तामस कर्मोंके मूलमें गुणोंको बतानेके लिये भगवान् आगेका श्लोक कहते हैं।
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तात्कालिक गुणोंके बढ़नेपर मरनेवालोंकी गतिका वर्णन तो चौदहवें-पन्द्रहवें श्लोकोंमें कर दिया; परन्तु जिनके जीवनमें सत्त्वगुण, रजोगुण अथवा तमोगुणकी प्रधानता रहती है, उनकी (मरनेपर) क्या गति होती है—इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।
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पाँचवेंसे अठारहवें श्लोकतक प्रकृतिके कार्य गुणोंका परिचय देकर अब आगेके दो श्लोकोंमें स्वयंको तीनों गुणोंसे अतीत अनुभव करनेका वर्णन करते हैं।
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गुणातीत पुरुष दुःखोंसे मुक्त होकर अमरताको प्राप्त कर लेता है—ऐसा सुनकर अर्जुनके मनमें गुणातीत मनुष्यके लक्षण जाननेकी जिज्ञासा हुई। अतः वे आगेके श्लोकमें भगवान्से प्रश्न करते हैं। अर्जुन उवाच
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अर्जुनके प्रश्नोंमेंसे पहले प्रश्नके उत्तरमें भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें गुणातीत मनुष्यके लक्षणोंका वर्णन करते हैं। श्रीभगवानुवाच
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इक्कीसवें श्लोकमें अर्जुनने दूसरे प्रश्नके रूपमें गुणातीत मनुष्यके आचरण पूछे थे। उसका उत्तर अब आगेके दो श्लोकोंमें देते हैं।
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अर्जुनने तीसरे प्रश्नके रूपमें गुणातीत होनेका उपाय पूछा था। उसका उत्तर भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।
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उपासना तो करे भगवान्की और पात्र बन जाय ब्रह्मप्राप्तिका—यह कैसे? इसका उत्तर आगेके श्लोकमें देते हैं।