ग्रन्थ
15पुरुषोत्तमयोग

पुरुषोत्तमयोग

Purushottama-Yoga
The Supreme Person
20 verses · 20 printed blockspp. 190199 · Sadharan Bhashatikaसाधारण भाषाटीका 20 · साधक-संजीवनी 20 · श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्य 20 · श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीका 20
1श्रीभगवान्
श्रीभगवान् उवाच
श्रीभगवानुवाच ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्। छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
श्रीभगवान् बोले—आदिपुरुष परमेश्वररूप मूलवाले1 और ब्रह्मारूप मुख्य शाखावाले2 जिस संसाररूप पीपलके वृक्षको अविनाशी3 कहते हैं, तथा वेद जिसके पत्ते1 कहे गये हैं—उस संसाररूप वृक्षको जो पुरुष मूलसहित तत्त्वसे जानता है, वह वेदके तात्पर्यको जाननेवाला है2॥ 1॥
1. आदिपुरुष नारायण वासुदेवभगवान् ही नित्य और
अनन्त तथा सबके आधार होनेके कारण और सबसे ऊपर
नित्यधाममें सगुणरूपसे वास करनेके कारण ऊर्ध्व नामसे कहे
गये हैं और वे मायापति, सर्वशक्तिमान् परमेश्वर ही इस संसाररूप
वृक्षके कारण हैं, इसलिये इस संसार-वृक्षको “ऊर्ध्वमूलवाला”
कहते हैं।
2. उस आदिपुरुष परमेश्वरसे उत्पत्तिवाला होनेके कारण तथा
नित्यधामसे नीचे ब्रह्मलोकमें वास करनेके कारण, हिरण्यगर्भरूप
ब्रह्माको परमेश्वरकी अपेक्षा “अधः” कहा है और वही इस संसारका
विस्तार करनेवाला होनेसे इसकी मुख्य शाखा है, इसलिये इस
संसारवृक्षको “अधःशाखावाला” कहते हैं।
3. इस वृक्षका मूल कारण परमात्मा अविनाशी है तथा
अनादिकालसे इसकी परम्परा चली आती है, इसलिये इस
संसारवृक्षको “अविनाशी” कहते हैं।
2श्रीभगवान्
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः। अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
उस संसारवृक्षकी तीनों गुणोंरूप जलके द्वारा बढ़ी हुई एवं विषय3-भोगरूप कोंपलोंवाली देव, मनुष्य और तिर्यक् आदि योनिरूप शाखाएँ4 नीचे और ऊपर सर्वत्र फैली हुई हैं तथा मनुष्य- लोकमें1 कर्मोंके अनुसार बाँधनेवाली अहंता-ममता और वासनारूप जड़ें भी नीचे और ऊपर सभी लोकोंमें व्याप्त हो रही हैं॥ 2॥
1. इस वृक्षकी शाखारूप ब्रह्मासे प्रकट होनेवाले और यज्ञादिक
कर्मोंके द्वारा इस संसारवृक्षकी रक्षा और वृद्धि करनेवाले एवं
शोभाको बढ़ानेवाले होनेसे वेद “पत्ते” कहे गयेहैं।
2. भगवान्की योगमायासे उत्पन्न हुआ संसार क्षणभंगुर,
नाशवान् और दुःखरूप है, इसके चिन्तनको त्यागकर, केवल
परमेश्वरका ही नित्य-निरन्तर, अनन्यप्रेमसे चिन्तन करना “वेदके
तात्पर्यको जानना” है।
3. शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये पाँचों स्थूलदेह
और इन्द्रियोंकी अपेक्षा सूक्ष्म होनेके कारण उन शाखाओंकी
“कोंपलों” के रूपमें कहे गये हैं।
4. मुख्य शाखारूप ब्रह्मासे सम्पूर्ण लोकोंके सहित देव, मनुष्य
और तिर्यक् आदि योनियोंकी उत्पत्ति और विस्तार हुआ है,
इसलिये उनका यहाँ “शाखाओं” के रूपमें वर्णन किया है।
3श्रीभगवान्
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा। अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल- मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
इस संसारवृक्षका स्वरूप जैसा कहा है वैसा यहाँ विचारकालमें नहीं पाया जाता2, क्योंकि न तो इसका आदि है3 और न अन्त है4 तथा न इसकी अच्छी प्रकारसे स्थिति ही है1। इसलिये इस अहंता, ममता और वासनारूप अति दृढ़ मूलोंवाले संसाररूप पीपलके वृक्षको दृढ़ वैराग्यरूप2 शस्त्रद्वारा काटकर3—॥ 3॥
1. अहंता, ममता और वासनारूप मूलोंको केवल मनुष्ययोनिमें
कर्मोंके अनुसार बाँधनेवाली कहनेका कारण यह है कि अन्य
सब योनियोंमें तो केवल पूर्वकृत कर्मोंके फलको भोगनेका ही
अधिकार है और मनुष्ययोनिमें नवीन कर्मोंके करनेका भी
अधिकार है।
2. इस संसारका जैसा स्वरूप शास्त्रोंमें वर्णन किया गया है
और जैसा देखा-सुना जाता है, वैसा तत्त्वज्ञान होनेके पश्चात् नहीं
पाया जाता, जिस प्रकार आँख खुलनेके पश्चात् स्वप्नका संसार
नहीं पाया जाता।
3. इसका आदि नहीं है, यह कहनेका प्रयोजन यह है
कि इसकी परम्परा कबसे चली आती है, इसका कोई पता
नहीं है।
4. इसका अन्त नहीं है, यह कहनेका प्रयोजन यह है
कि इसकी परम्परा कबतक चलती रहेगी, इसका कोई पता नहीं है।
4श्रीभगवान्
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः। तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
उसके पश्चात् उस परम-पदरूप परमेश्वरको भलीभाँति खोजना चाहिये, जिसमें गये हुए पुरुष फिर लौटकर संसारमें नहीं आते और जिस परमेश्वरसे इस पुरातन संसारवृक्षकी प्रवृत्ति विस्तारको प्राप्त हुई है, उसी आदिपुरुष नारायणके मैं शरण हूँ— इस प्रकार दृढ़ निश्चय करके उस परमेश्वरका मनन और निदिध्यासन करना चाहिये॥ 4॥
1. इसकी अच्छी प्रकार स्थिति भी नहीं है, यह कहनेका
प्रयोजन यह है कि वास्तवमें यह क्षणभङ्गुर और नाशवान् है।
2. ब्रह्मलोकतकके भोग क्षणिक और नाशवान् हैं, ऐसा
समझकर, इस संसारके समस्त विषयभोगोंमें सत्ता, सुख, प्रीति
और रमणीयताका न भासना ही दृढ़ ““वैराग्यरूप शस्त्र”” है।
3. स्थावर, जङ्गमरूप यावन्मात्र संसारके चिन्तनका तथा
अनादिकालसे अज्ञानके द्वारा दृढ़ हुई अहंता, ममता और
वासनारूप मूलोंका त्याग करना ही संसारवृक्षका अवान्तर
“मूलोंके सहित काटना” है।
5श्रीभगवान्
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा- अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः। द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञै- र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
जिसका मान और मोह नष्ट हो गया है, जिन्होंने आसक्तिरूप दोषको जीत लिया है, जिनकी परमात्माके स्वरूपमें नित्य स्थिति है और जिनकी कामनाएँ पूर्णरूपसे नष्ट हो गयी हैं—वे सुख-दुःख नामक द्वन्द्वोंसे विमुक्त ज्ञानीजन उस अविनाशी परमपदको प्राप्त होते हैं॥ 5॥
6श्रीभगवान्
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः। यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
जिस परमपदको प्राप्त होकर मनुष्य लौटकर संसारमें नहीं आते, उस स्वयंप्रकाश परमपदको न सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चन्द्रमा और न अग्नि ही; वही मेरा परमधाम है*॥ 6॥
7श्रीभगवान्
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः। मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
इस देहमें यह सनातन जीवात्मा मेरा ही अंश है* और वही इन प्रकृतिमें स्थित मन और पाँचों इन्द्रियोंको आकर्षण करता है॥ 7॥
* “परमधाम” का अर्थ गीता अध्याय 8 श्लोक 21 में देखना
चाहिये।
8श्रीभगवान्
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः। गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
वायु गन्धके स्थानसे गन्धको जैसे ग्रहण करके ले जाता है, वैसे ही देहादिका स्वामी जीवात्मा भी जिस शरीरका त्याग करता है, उससे इन मनसहित इन्द्रियोंको ग्रहण करके फिर जिस शरीरको प्राप्त होता है—उसमें जाता है॥ 8॥
9श्रीभगवान्
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च। अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
यह जीवात्मा श्रोत्र, चक्षु और त्वचाको तथा रसना, घ्राण और मनको आश्रय करके—अर्थात् इन सबके सहारेसे ही विषयोंका सेवन करता है॥ 9॥
10श्रीभगवान्
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्। विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
शरीरको छोड़कर जाते हुएको अथवा शरीरमें स्थित हुएको अथवा विषयोंको भोगते हुएको इस प्रकार तीनों गुणोंसे युक्त हुएको भी अज्ञानीजन नहीं जानते, केवल ज्ञानरूप नेत्रोंवाले विवेकशील ज्ञानी ही तत्त्वसे जानते हैं॥ 10॥
* जैसे विभागरहित स्थित हुआ भी महाकाश घटोंमें पृथक्-
पृथक्की भाँति प्रतीत होता है, वैसे ही सब भूतोंमें एकीरूपसे
स्थित हुआ भी परमात्मा पृथक्-पृथक्की भाँति प्रतीत होता है, इसीसे
देहमें स्थित जीवात्माको भगवान्ने अपना “सनातन अंश” कहा है।
11श्रीभगवान्
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्। यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
यत्न करनेवाले योगीजन भी अपने हृदयमें स्थित इस आत्माको तत्त्वसे जानते हैं; किन्तु जिन्होंने अपने अन्तःकरणको शुद्ध नहीं किया है, ऐसे अज्ञानीजन तो यत्न करते रहनेपर भी इस आत्माको नहीं जानते॥ 11॥
12श्रीभगवान्
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्। यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
सूर्यमें स्थित जो तेज सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चन्द्रमामें है और जो अग्निमें है—उसको तू मेरा ही तेज जान॥ 12॥
13श्रीभगवान्
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा। पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
और मैं ही पृथ्वीमें प्रवेश करके अपनी शक्तिसे सब भूतोंको धारण करता हूँ और रसस्वरूप अर्थात् अमृतमय चन्द्रमा होकर सम्पूर्ण ओषधियोंको अर्थात् वनस्पतियोंको पुष्ट करता हूँ॥ 13॥
14श्रीभगवान्
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः। प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
मैं ही सब प्राणियोंके शरीरमें स्थित रहनेवाला प्राण और अपानसे संयुक्त वैश्वानर अग्निरूप होकर चार* प्रकारके अन्नको पचाता हूँ॥ 14॥
15श्रीभगवान्
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो- मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च। वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो- वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
मैं ही सब प्राणियोंके हृदयमें अन्तर्यामी- रूपसे स्थित हूँ तथा मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन1 होता है और सब वेदोंद्वारा मैं ही जाननेके योग्य2 हूँ तथा वेदान्तका कर्ता और वेदोंको जाननेवाला भी मैं ही हूँ॥ 15॥
* भक्ष्य, भोज्य, लेह्य और चोष्य—ऐसे चार प्रकारके
अन्न होते हैं, उनमें जो चबाकर खाया जाता है, वह “भक्ष्य” है—जैसे
रोटी आदि और जो निगला जाता है, वह “भोज्य” है—जैसे दूध
आदि तथा जो चाटा जाता है, वह “लेह्य” है—जैसे चटनी आदि और
जो चूसा जाता है, वह “चोष्य” है—जैसे ईख आदि।
16श्रीभगवान्
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च। क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
इस संसारमें नाशवान् और अविनाशी भी ये दो प्रकारके3 पुरुष हैं। इनमें सम्पूर्ण भूतप्राणियोंके शरीर तो नाशवान् और जीवात्मा अविनाशी कहा जाता है॥ 16॥
17श्रीभगवान्
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः। यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
इन दोनोंसे उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो तीनों लोकोंमें प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता है एवं अविनाशी परमेश्वर और परमात्मा— इस प्रकार कहा गया है॥ 17॥
18श्रीभगवान्
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः। अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
क्योंकि मैं नाशवान् जडवर्ग-क्षेत्रसे तो सर्वथा अतीत हूँ और अविनाशी जीवात्मासे भी उत्तम हूँ, इसलिये लोकमें और वेदमें भी पुरुषोत्तम नामसे प्रसिद्ध हूँ॥ 18॥
1. विचारके द्वारा बुद्धिमें रहनेवाले संशय-विपर्यय आदि
दोषोंको हटानेका नाम “अपोहन” है।
2. सर्ववेदोंका तात्पर्य परमेश्वरको जनानेका है, इसलिये सब
वेदोंद्वारा “जाननेके योग्य” एक परमेश्वर ही है।
3. गीता अध्याय 7 श्लोक 4-5 में जो अपरा और परा
प्रकृतिके नामसे कहे गये हैं तथा अ0 13 श्लोक 1 में जो क्षेत्र
और क्षेत्रज्ञके नामसे कहे गये हैं, उन्हीं दोनोंका यहाँ क्षर और
अक्षरके नामसे वर्णन किया है।
19श्रीभगवान्
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्। स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
भारत! जो ज्ञानी पुरुष मुझको इस प्रकार तत्त्वसे पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ पुरुष सब प्रकारसे निरन्तर मुझ वासुदेव परमेश्वरको ही भजता है॥ 19॥
20श्रीभगवान्
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ। एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
हे निष्पाप अर्जुन! इस प्रकार यह अति रहस्ययुक्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया, इसको तत्त्वसे जानकर मनुष्य ज्ञानवान् और कृतार्थ हो जाता है॥ 20॥
15.1साधारण भाषाटीका