पुरुषोत्तमयोग
सम्बन्ध—चौदहवें अध्यायमें पाँचवेंसे अठारहवें श्लोकतक तीनों गुणोंके स्वरूप, उनके कार्य एवं उनकी बन्धनकारिताका और बँधे हुए मनुष्योंकी उत्तम, मध्यम और अधम गति आदिका विस्तारपूर्वक वर्णन करके उन्नीसवें और बीसवें श्लोकोंमें उन गुणोंसे अतीत होनेका उपाय और फल बतलाया गया। उसके बाद अर्जुनके पूछनेपर बाईसवेंसे पचीसवें श्लोकतक गुणातीत पुरुषके लक्षणों और आचरणोंका वर्णन करके छब्बीसवें श्लोकमें सगुण परमेश्वरके अव्यभिचारी भक्तियोगको गुणोंसे अतीत होकर ब्रह्मप्राप्तिके लिये योग्य बननेका सरल उपाय बतलाया गया, अतएव भगवान्में अव्यभिचारी भक्तियोगरूप अनन्यप्रेम उत्पन्न करानेके उद्देश्यसे अब उस सगुण परमेश्वर पुरुषोत्तमभगवान्के गुण, प्रभाव और स्वरूपका एवं गुणोंसे अतीत होनेमें प्रधान साधन वैराग्य और भगवत्-शरणागतिका वर्णन करनेके लिये पंद्रहवें अध्यायका आरम्भ किया जाता है। यहाँ पहले संसारमें वैराग्य उत्पन्न करानेके उद्देश्यसे तीन श्लोकोंद्वारा संसारका वर्णन वृक्षके रूपमें करते हुए वैराग्यरूप शस्त्रद्वारा उसका छेदन करनेके लिये कहते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार वैराग्यरूप शस्त्रद्वारा संसारका छेदन करके क्या करना चाहिये, अब इसे बतलाते हैं—
सम्बन्ध—अब उपर्युक्त प्रकारसे आदिपुरुष परमपदस्वरूप परमेश्वरकी शरण होकर उसको प्राप्त हो जानेवाले पुरुषोंके लक्षण बतलाये जाते हैं—
सम्बन्ध—उपर्युक्त लक्षणोंवाले पुरुष जिसे प्राप्त करते हैं, वह अविनाशी पद कैसा है? ऐसी जिज्ञासा होनेपर उस परमेश्वरके स्वरूपभूत परमपदकी महिमा कहते हैं—
सम्बन्ध—पहलेसे तीसरे श्लोकतक संसारवृक्षके नामसे क्षर पुरुषका वर्णन किया, उसमें जीवरूप अक्षर पुरुषके बन्धनका हेतु उसके द्वारा मनुष्ययोनिमें अहंता, ममता और आसक्तिपूर्वक किये हुए कर्मोंको बताया तथा उस बन्धनसे छूटनेका उपाय सृष्टिकर्ता आदि पुरुषकी शरण ग्रहण करना बताया। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि उपर्युक्त प्रकारसे बँधे हुए जीवका क्या स्वरूप है? और उसका वास्तविक स्वरूप क्या है? उसे कौन कैसे जानता है? अतः इन सब बातोंका स्पष्टीकरण करनेके लिये पहले जीवका स्वरूप बतलाते हैं—
सम्बन्ध—यह जीवात्मा मनसहित छः इन्द्रियोंको किस समय, किस प्रकार और किसलिये आकर्षित करता है तथा वे मनसहित छः इन्द्रियाँ कौन-कौन हैं—ऐसी जिज्ञासा होनेपर अब दो श्लोकोंमें इसका उत्तर दिया जाता है—
सम्बन्ध—जीवात्माको तीनों गुणोंसे सम्बद्ध, एक शरीरको छोड़कर दूसरे शरीरमें जानेवाला और शरीरमें रहकर विषयोंका सेवन करनेवाला कहा गया। अतएव यह जिज्ञासा होती है कि ऐसे आत्माको कौन कैसे जानता है और कौन नहीं जानता? इसपर दो श्लोकोंमें भगवान् कहते हैं—
सम्बन्ध—छठे श्लोकपर दो शंकाएँ होती हैं—पहली यह कि सबके प्रकाशक सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि आदि तेजोमय पदार्थ परमात्माको क्यों नहीं प्रकाशित कर सकते और दूसरी यह कि परमधामको प्राप्त होनेके बाद पुरुष वापस क्यों नहीं लौटते? इनमेंसे दूसरी शंकाके उत्तरमें सातवें श्लोकमें जीवात्माको परमेश्वरका सनातन अंश बतलाकर ग्यारहवें श्लोकतक उसके स्वरूप, स्वभाव और व्यवहारका वर्णन करते हुए उसका यथार्थ स्वरूप जाननेवालोंकी महिमा कही गयी। अब पहली शंकाका उत्तर देनेके लिये भगवान् बारहवेंसे पंद्रहवें श्लोकतक गुण, प्रभाव और ऐश्वर्यसहित अपने स्वरूपका वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार दसवें अध्यायके इकतालीसवें श्लोकके भावानुसार सम्पूर्ण प्रकाशनशक्ति, धारणशक्ति, पोषणशक्ति और पाचनशक्ति आदि समस्त शक्तियोंको अपनी शक्तिका एक अंश बतलाकर—अर्थात् जैसे पंखा चलाकर वायुका विस्तार करनेमें, बत्ती जलाकर प्रकाश फैलानेमें, चक्की घुमानेमें, जल आदिको गरम करनेमें तथा रेडियो आदिके द्वारा शब्दका प्राकट्य करनेमें एक ही बिजलीकी शक्तिका अंश सब कार्य करता है, वैसे ही सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि आदिके द्वारा सबको प्रकाशित करनेमें, पृथ्वी आदिके द्वारा सबको धारण करनेमें, चन्द्रमाके द्वारा सबका पोषण करनेमें तथा वैश्वानरके द्वारा अन्नको पचानेमें मेरी ही शक्तिका एक अंश सब कुछ करता है—यह बात कहकर अब भगवान् अपने सर्वान्तर्यामित्व और सर्वज्ञत्व आदि गुणोंसे युक्त स्वरूपका वर्णन करते हुए सब प्रकारसे जाननेयोग्य अपनेको बतलाते हैं—
सम्बन्ध—पहलेसे छठे श्लोकतक वृक्षरूपसे संसारका, दृढ़ वैराग्यके द्वारा उसके छेदनका, परमेश्वरकी शरणमें जानेका, परमात्माको प्राप्त होनेवाले पुरुषोंके लक्षणोंका और परमधामस्वरूप परमेश्वरकी महिमाका वर्णन करते हुए अश्वत्थ वृक्षरूप क्षर पुरुषका प्रकरण पूरा किया गया। तदनन्तर सातवें श्लोकसे “जीव” शब्दवाच्य उपासक अक्षर पुरुषका प्रकरण आरम्भ करके उसके स्वरूप, शक्ति, स्वभाव और व्यवहारका वर्णन करके एवं उसे जाननेवालोंकी महिमा कहते हुए ग्यारहवें श्लोकतक उस प्रकरणको पूरा किया। फिर बारहवें श्लोकसे उपास्यदेव “पुरुषोत्तम”का प्रकरण आरम्भ करके पंद्रहवेंतक उसके गुण, प्रभाव और स्वरूपका वर्णन करते हुए उस प्रकरणको भी पूरा किया। अब अध्यायकी समाप्तितक पूर्वोक्त तीनों प्रकरणोंका सार संक्षेपमें बतलानेके लिये अगले श्लोकमें क्षर और अक्षर पुरुषका स्वरूप बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार क्षर और अक्षर पुरुषका स्वरूप बतलाकर अब उन दोनोंसे श्रेष्ठ पुरुषोत्तम भगवान्के स्वरूपका और पुरुषोत्तम होनेके कारणका वर्णन दो श्लोकोंमें करते हैं—
सम्बन्ध—अब ऊपर कहे हुए प्रकारसे भगवान्को पुरुषोत्तम समझनेवाले पुरुषकी महिमा और लक्षण बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार भगवान्को पुरुषोत्तम जाननेवाले पुरुषकी महिमाका वर्णन करके अब इस अध्यायमें वर्णित विषयको गुह्यतम बतलाकर उसे जाननेका फल वर्णन करते हुए इस अध्यायका उपसंहार करते हैं—