पुरुषोत्तमयोग
यस्माद् मदधीनं कर्मिणां कर्मफलं ज्ञानिनां च ज्ञानफलम् अतो भक्तियोगेन मां ये सेवन्ते ते मत्प्रसादाद्
ज्ञानप्राप्तिक्रमेण
गुणातीता मोक्षं गच्छन्ति किमु वक्तव्यम् आत्मनः तत्त्वम् एव सम्यग् विजानन्त इति अतो भगवान् अर्जुनेन अपृष्टम् अपि आत्मनः तत्त्वं विवक्षुः उवाच— उर्ध्वमूलम् इत्यादि।
तत्र तावद् वृक्षरूपककल्पनया वैराग्यहेतोः संसारस्वरूपं वर्णयति विरक्तस्य हि संसाराद् भगवत्तत्त्वज्ञाने अधिकारो न अन्यस्य इति—
क्योंकि कर्म करनेवालोंका कर्मफल और ज्ञानियोंका ज्ञानफल मेरे अधीन है। इसलिये जो भक्तियोगसे मुझे भजते हैं, वे भी मेरी कृपासे गुणातीत होकर ज्ञान-प्राप्तिके क्रमसे, मोक्षलाभ करते हैं; तो फिर आत्मतत्त्वको यथार्थ जाननेवालोंके लिये तो कहना ही क्या है। सुतराम् अर्जुनके न पूछनेपर भी अपना तत्त्व कहनेकी इच्छासे भगवान् “ऊर्ध्वमूलम्” इत्यादि वचन बोले—
यहाँ पहले वैराग्यके लिये वृक्षस्वरूपकी कल्पना करके, संसारके स्वरूपका वर्णन करते हैं; क्योंकि संसारसे विरक्त हुए पुरुषको ही भगवान्का तत्त्व जाननेमें अधिकार है, अन्यको नहीं। अतः श्रीभगवान् बोले—
भाष्य20 paragraphs · खोलें
ऊर्ध्वमूलं कालतः सूक्ष्मत्वात् कारणत्वाद् नित्यत्वाद् महत्त्वात् च ऊर्ध्वम् उच्यते ब्रह्म अव्यक्तमायाशक्तिमत् तद् मूलम् अस्य इति सः अयं संसारवृक्ष ऊर्ध्वमूलः। श्रुतेः च—“ऊर्ध्वमूलो-ऽवाक्शाखः” (क0 उ0 2। 6। 1) इति।
पुराणे च—
“अव्यक्तमूलप्रभवस्तस्यैवानुग्रहोत्थितः ।
बुद्धिस्कन्धमयश्चैव इन्द्रियान्तरकोटरः॥
महाभूतविशाखश्च विषयैः पत्रवांस्तथा।
धर्माधर्मसुपुष्पश्च सुखदुःखफलोदयः॥
आजीव्यः सर्वभूतानां ब्रह्मवृक्षः सनातनः।
एतद्ब्रह्मवनं चैव ब्रह्माचरति नित्यशः॥
एतच्छित्त्वा च भित्त्वा च ज्ञानेन परमासिना।
ततश्चात्मरतिं प्राप्य तस्मान्नावर्तते पुनः॥” इत्यादि।
तम् ऊर्ध्वमूलं संसारमायामयं वृक्षम् अधःशाखं महदहङ्कारतन्मात्रादयः शाखा इव अस्य अधो भवन्ति इति सः अयम् अधःशाखः तम् अधःशाखं न श्वः अपि स्थाता इति अश्वत्थः तं क्षणप्रध्वसिनम् अश्वत्थं प्राहुः कथयन्ति अव्ययम्।
संसारमायामयम् अनादिकालप्रवृत्तत्वात् सः अयं संसारवृक्षः अव्ययः अनाद्यन्तदेहादि-सन्तानाश्रयो हि सुप्रसिद्धः तम् अव्ययम्।
तस्य एव संसारवृक्षस्य इदम् अन्यद् विशेषणम्।
छन्दांसि छादनाद् ऋग्यजुःसामलक्षणानि यस्य संसारवृक्षस्य पर्णानि इव पर्णानि। यथा वृक्षस्य परिरक्षणार्थानि
पर्णानि
तथा
वेदाः संसारवृक्षपरिरक्षणार्था
धर्माधर्मतद्धेतुफल-प्रकाशनार्थत्वात्।
यथाव्याख्यातं संसारवृक्षं समूलं यः तं वेद स वेदविद् वेदार्थविद् इत्यर्थः।
न हि संसारवृक्षाद् अस्मात् समूलाद् ज्ञेयः अन्यः अणुमात्रः अपि अवशिष्टः अस्ति अतः सर्वज्ञः स यो वेदार्थविद् इति समूलवृक्ष-ज्ञानं स्तौति॥ 1॥
(यह संसाररूप वृक्ष) ऊर्ध्वमूलवाला है। कालकी अपेक्षा भी सूक्ष्म, सबका कारण, नित्य और महान् होनेके कारण अव्यक्त-मायाशक्तियुक्त ब्रह्म सबसे ऊँचा कहा जाता है, वही इसका मूल है, इसलिये यह संसारवृक्ष ऊपरकी ओर मूलवाला है। “ऊपर मूल और नीचे शाखावाला” इस श्रुतिसे भी यही प्रमाणित होता है।
पुराणमें भी कहा है—
“अव्यक्तरूप मूलसे उत्पन्न हुआ; उसीके अनुग्रहसे बढ़ा हुआ, बुद्धिरूप प्रधान शाखासे युक्त,
बीच-बीचमें
इन्द्रियरूप
कोटरोंवाला, महाभूतरूप शाखा-प्रतिशाखाओंवाला, विषयरूप पत्तोंवाला, धर्म और अधर्मरूप सुन्दर पुष्पोंवाला तथा जिसमें सुख-दुःखरूप फल लगे हुए हैं ऐसा यह सब भूतोंका आजीव्य* सनातन ब्रह्मवृक्ष है। यही ब्रह्मवन है, इसीमें ब्रह्म सदा रहता है। ऐसे इसी ब्रह्मवृक्षका ज्ञानरूप श्रेष्ठ खड्गद्वारा छेदन-भेदन करके और आत्मामें प्रीतिलाभ करके फिर वहाँसे नहीं लौटता” इत्यादि।
ऐसे ऊपर मूल और नीचे शाखावाले इस मायामय संसारवृक्षको, अर्थात् महत्तत्त्व, अहंकार, तन्मात्रादि, शाखाकी भाँति जिसके नीचे हैं, ऐसे इस नीचेकी ओर शाखावाले और कलतक भी न रहनेवाले इस क्षणभङ्गुर अश्वत्थ वृक्षको अव्यय कहते हैं।
यह मायामय संसार, अनादि कालसे चला आ रहा है, इसीसे यह संसारवृक्ष अव्यय माना जाता है तथा यह आदि-अन्तसे रहित शरीर आदिकी परम्पराका आश्रय सुप्रसिद्ध है, अतः इसको अव्यय कहते हैं।
उस संसार-वृक्षका ही यह अन्य विशेषण (कहा जाता) है।
ऋक्, यजु और सामरूप वेद जिस संसारवृक्षके पत्तोंकी भाँति रक्षा करनेवाले होनेसे पत्ते हैं। जैसे पत्ते वृक्षकी रक्षा करनेवाले होते हैं, वैसे ही वेद धर्म-अधर्म, उनके कारण और फलको प्रकाशित करनेवाले होनेसे संसाररूप वृक्षकी रक्षा करनेवाले हैं।
ऐसा जो यह विस्तारपूर्वक बतलाया हुआ संसारवृक्ष है, इसको जो मूलके सहित जानता है, वह वेदको जाननेवाला अर्थात् वेदके अर्थको जाननेवाला है।
क्योंकि इस मूलसहित संसारवृक्षसे अतिरिक्त अन्य जाननेयोग्य वस्तु अणुमात्र भी नहीं है। सुतरां जो इस प्रकार वेदार्थको जाननेवाला है वह सर्वज्ञ है। इस प्रकार मूलसहित संसारवृक्षके ज्ञानकी स्तुति करते हैं॥ 1॥
तस्य एव संसारवृक्षस्य अपरा अवयवकल्पना उच्यते—
उसी संसारवृक्षके अन्य अङ्गोंकी कल्पना कही जाती है।
भाष्य2 paragraphs · खोलें
अधो मनुष्यादिभ्यो यावत् स्थावरम् ऊर्ध्वं च यावद् ब्रह्मा विश्वसृजो धर्म इति एतद् अन्तं यथाकर्म यथाश्रुतं ज्ञानकर्मफलानि तस्य वृक्षस्य शाखा इव शाखाः प्रसृताः प्रगता गुणप्रवृद्धा गुणैः सत्त्वरजस्तमोभिः प्रवृद्धा स्थूलीकृता उपादानभूतैः विषयप्रवाला विषयाः शब्दादयः प्रवाला इव देहादिकर्मफलेभ्यः शाखाभ्यः अङ्कु रीभवन्ति इव तेन विषयप्रवालाः शाखाः।
संसारवृक्षस्य परममूलम् उपादानं कारणं पूर्वम् उक्तम् अथ इदानीं कर्मफलजनितराग-द्वेषादिवासना मूलानि इव धर्माधर्मप्रवृत्ति-कारणानि अवान्तर्भावीनि तानि अधः च देवाद्यपेक्षया मूलानि अनुसन्ततानि अनुप्रविष्टानि कर्मानुबन्धीनि कर्म धर्माधर्मलक्षणम् अनुबन्धः पश्चाद्भावो येषाम् उद्भूतिम् अनुभवति इति तानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके विशेषतः अत्र हि मनुष्याणां कर्माधिकारः प्रसिद्धः॥ 2॥
अपने उपादान-कारणरूप सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंसे बढ़ी हुई—स्थूलभावको प्राप्त हुई और विषयरूपी कोंपलोंवाली, उस वृक्षकी बहुत-सी शाखाएँ, जो कि अपने-अपने कर्म और ज्ञानके अनुरूप—कर्म और ज्ञानकी फलस्वरूपा योनियाँ हैं, नीचेकी ओर मनुष्योंसे लेकर स्थावरपर्यन्त और ऊपरकी ओर धर्म यानी विश्वकर्ता ब्रह्मापर्यन्त वृक्षकी शाखाओंके समान फैली हुई हैं। कर्मफलरूप देहादि शाखाओंसे शब्दादि विषय कोंपलोंके समान अङ्कुरित-से होते हैं, इसलिये वे शरीरादिरूप शाखाएँ विषयरूपी कोंपलोंवाली हैं।
संसारवृक्षका परम मूल—उपादानकारण पहले बतलाया जा चुका है। अब कर्मफलजनित राग-द्वेष आदिकी वासनाएँ जो मूलके समान धर्माधर्मविषयक प्रवृत्तिका कारण और अवान्तरसे (आगे-पीछे) होनेवाली हैं (उनको कहते हैं)। वे मनुष्यलोकमें कर्मानुबन्धिनी वासनारूप मूलें देवादिकी अपेक्षा नीचे भी, अविच्छिन्नरूपसे फैली हुई हैं। पुण्य-पापरूप कर्म जिनका अनुबन्ध यानी पीछे-पीछे होनेवाला है, अर्थात् जिनकी उत्पत्तिका अनुवर्तन करनेवाला है, वे कर्मानुबन्धी कहलाती हैं। यहाँ मनुष्योंका ही विशेषरूपसे कर्ममें अधिकार प्रसिद्ध है (इसलिये वे मूलें मनुष्य-लोकमें कर्मानुबन्धिनी बतलायी गयी हैं)॥ 2॥
यः तु अयं वर्णितः संसारवृक्षः—
यह जो वर्णन किया हुआ संसारवृक्ष है—
न रूपम् अस्य इह यथा वर्णितं तथा न एव उपलभ्यते
स्वप्नमरीच्युदकमायागन्धर्वनगर-समत्वाद् दृष्टनष्टस्वरूपो हि स इति अत एव न अन्तो न पर्यन्तो निष्ठा समाप्तिः वा विद्यते।
तथा न च आदिः इत आरभ्य अयं प्रवृत्त इति न केनचिद् गम्यते। न च सम्प्रतिष्ठा स्थितिः मध्यम् अस्य न केनचिद् उपलभ्यते।
अश्वत्थम् एनं यथोक्तं सुविरूढमूलं सुष्ठु विरूढानि विरोहं गतानि मूलानि यस्य तम् एनं सुविरूढमूलम् असङ्गशस्त्रेण असङ्गः पुत्र-वित्तलोकैषणादिभ्यो व्युत्थानं तेन असङ्गशस्त्रेण दृढेन परमात्माभिमुख्यनिश्चयदृढीकृतेन पुनः पुनर्विवेकाभ्यासाश्मनिशितेन छित्त्वा संसार-वृक्षं सबीजम् उद्धृत्य॥ 3॥
इसका स्वरूप जैसा यहाँ वर्णन किया गया है, वैसा उपलब्ध नहीं होता; क्योंकि यह स्वप्नकी वस्तु, मृगतृष्णाके जल और मायारचित गन्धर्व-नगरके समान होनेसे, देखते-देखते नष्ट होनेवाला है। इसी कारण इसका अन्त अर्थात् अन्तिमावस्था—अवसान या समाप्ति भी नहीं है।
तथा इसका आदि भी नहीं है, अर्थात् यहाँसे आरम्भ होकर यह संसार चला है, ऐसा किसीसे नहीं जाना जा सकता और इसकी संप्रतिष्ठा—स्थिति भी नहीं है यानी आदि और अन्तके बीचकी अवस्था भी किसीको उपलब्ध नहीं होती।
इस उपर्युक्त सुविरूढमूल यानी जिसकी मूलें— जड़ें अत्यन्त दृढ़ हो गयी हैं—भली प्रकार संगठित हो चुकी हैं, ऐसे संसाररूप अश्वत्थको, असङ्गशस्त्रसे छेदन करके यानी पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणादिसे उपराम हो जाना ही “असङ्ग” है, ऐसे असङ्गशस्त्रसे जो कि परमात्माके सम्मुख होनारूप निश्चयसे दृढ़ किया हुआ है और बारंबार विवेकाभ्यासरूप पत्थरपर घिसकर पैना किया हुआ है, इस संसारवृक्षको बीजसहित उखाड़कर॥ 3॥
ततः पश्चात् पदं वैष्णवं तत्परिमार्गितव्यं परिमार्गणम् अन्वेषणं ज्ञातव्यम् इत्यर्थः यस्मिन् पदे गताः प्रविष्टा न निवर्तन्ति न आवर्तन्ते भूयः पुनः संसाराय।
कथं परिमार्गितव्यम् इति आह—
तम् एव च यः पदशब्देन उक्त आद्यम् आदौ भवं पुरुषं प्रपद्ये इति एवं परिमार्गितव्यं तच्छरणतया इत्यर्थः।
कः असौ पुरुष इति उच्यते—
यतो यस्मात् पुरुषात् संसारमायावृक्ष-प्रवृत्तिः प्रसृता निःसृता ऐन्द्रजालिकाद् इव माया पुराणी चिरन्तनी॥ 4॥
उसके पश्चात् उस परम वैष्णव-पदको खोजना चाहिये अर्थात् जानना चाहिये कि जिस पदमें पहुँचे हुए पुरुष, फिर संसारमें नहीं लौटते—पुनर्जन्म ग्रहण नहीं करते।
(उस पदको) कैसे खोजना चाहिये? सो कहते हैं—
जो पदशब्दसे कहा गया है, उसी आदिपुरुषकी मैं शरण हूँ, इस भावसे अर्थात् उसके शरणागत होकर खोजना चाहिये।
वह पुरुष कौन है, सो बतलाते हैं—
जिस पुरुषसे बाजीगरकी मायाके समान इस मायारचित संसारवृक्षकी सनातन प्रवृत्ति विस्तारको प्राप्त हुई है—प्रकट हुई है॥ 4॥
कथम्भूताः तत् पदं गच्छन्ति इति उच्यते—
उस परमपदको कैसे पुरुष प्राप्त करते हैं? सो कहते हैं—
निर्मानमोहा मानः च मोहः च मानमोहौ तौ निर्गतौ येभ्यः ते निर्मानमोहा मानमोह-वर्जिताः, जितसङ्गदोषाः सङ्ग एव दोषः सङ्गदोषो जितः सङ्गदोषो यैः ते जितसङ्गदोषाः, अध्यात्मनित्याः परमात्मस्वरूपालोचननित्याः तत्पराः, विनिवृत्तकामा विशेषतो निर्लेपेन निवृत्ताः कामा येषां ते विनिवृत्तकामाः, यतयः सन्न्यासिनो द्वन्द्वैः प्रियाप्रियादिभिः विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञः परित्यक्ता गच्छन्ति अमूढ मोहवर्जिताः पदम् अव्ययं तद् यथोक्तम्॥ 5॥
जो मान-मोहसे मुक्त हैं—जिनका अभिमान और अज्ञान नष्ट हो गया है, ऐसे जो मान-मोहसे रहित हैं, जो जितसङ्गदोष हैं—जिन्होंने आसक्तिरूप दोषको जीत लिया है, जो नित्य अध्यात्मविचारमें लगे हुए हैं—सदा परमात्माके स्वरूपकी आलोचना करनेमें तत्पर हैं, जो कामनासे रहित हैं—जिनकी समस्त कामनाएँ निर्लेपभावसे (मूलसहित) निवृत्त हो गयी हैं, ऐसे यति—संन्यासी जो कि सुख-दुःख नामक प्रिय और अप्रिय आदि द्वन्द्वोंसे छूटे हुए हैं, वे मोहरहित ज्ञानी, उस उपर्युक्त अविनाशी पदको पाते हैं॥ 5॥
तद् एव पदं पुनः विशिष्यते—
वही पद फिर अन्य विशेषणोंसे बतलाया जाता है—
तद् धाम इति व्यवहितेन धाम्ना सम्बन्धः।
धाम तेजोरूपं पदं न भासयते सूर्य आदित्यः सर्वावभासनशक्तिमत्त्वे अपि सति। तथा न शशाङ्कः चन्द्रो न पावको न अग्निः अपि।
यद् धाम वैष्णवं पदं गत्वा प्राप्य न निवर्तन्ते यत् च सूर्यादिः न भासयते तद् धाम पदं परमं मम विष्णोः॥ 6॥
“तत्” शब्दका आगेवाले—व्यवधानयुक्त “धाम” शब्दके साथ सम्बन्ध है।
उस तेजोमय धामकी यानी परमपदको, सूर्य— आदित्य सबको प्रकाशित करनेकी शक्तिवाला होनेपर भी प्रकाशित नहीं कर सकता। वैसे ही शशाङ्क—चन्द्रमा और पावक—अग्नि भी प्रकाशित नहीं कर सकता।
जिस परमधामको यानी वैष्णवपदको पाकर मनुष्य पीछे नहीं लौटते और जिसको सूर्यादि ज्योतियाँ प्रकाशित नहीं कर सकतीं, वह मुझ विष्णुका परमधाम— पद है॥ 6॥
“यद्गत्वा न निवर्तन्ते” इति उक्तम्। ननु सर्वा हि गतिः आगत्यन्ता संयोगा विप्रयोगान्ता इति हि प्रसिद्धं कथम् उच्यते तद्धामगतानां नास्ति निवृत्तिः इति।
शृणु तत्र कारणम्—
पू0—“जहाँ जाकर फिर नहीं लौटते” यह बात कही गयी। परंतु सभी गतियाँ, अन्तमें पुनरागमनयुक्त होती हैं और सभी संयोग अन्तमें वियोगवाले होते हैं, यह बात प्रसिद्ध है। फिर यह बात कैसे कही जाती है कि उस धामको प्राप्त हुए पुरुषोंका पुनरागमन नहीं होता?
उ0—उसमें जो कारण है वह सुन—
भाष्य7 paragraphs · खोलें
मम एव परमात्मनः अंशो भागः अवयव एकदेश इति अनर्थान्तरं जीवलोके जीवानां लोके संसारे जीवभूतो भोक्ता कर्ता इति प्रसिद्ध सनातनः।
यथा जलसूर्यकः सूर्यांशो जलनिमित्तापाये सूर्यम् एव गत्वा न निवर्तते तथा अयम् अपि अंशः तेन एव आत्मना सङ्गच्छति एवम् एव।
यथा वा घटाद्युपाधिपरिच्छिन्नो घटाद्याकाश आकाशांशः सन् घटादिनिमित्तापाये आकाशं प्राप्य न निवर्तते इति एवम् अत उपपन्नम् उक्तम् “यद्गत्वा न निवर्तन्ते” इति।
ननु निरवयवस्य परमात्मनः कुतः अवयव एकदेशः अंश इति। सावयवत्वे च विनाश-प्रसङ्गः अवयवविभागात्।
न एष दोषः अविद्याकृतोपाधिपरिच्छिन्न एकदेशः अंश इव कल्पितो यतः। दर्शितः च अयम् अर्थः क्षेत्राध्याये विस्तरशः।
स च जीवो मदंशत्वेन कल्पितः कथं संसरति उत्क्रामति च इति उच्यते—
मनःषष्ठानि इन्द्रियाणि श्रोत्रादीनि प्रकृतिस्थानि स्वस्थाने कर्णशष्कुल्यादौ प्रकृतौ स्थितानि कर्षति आकर्षति॥ 7॥
जीवलोकमें अर्थात् संसारमें, जो जीवरूप शक्ति, भोक्ता, कर्ता इत्यादि नामोंसे प्रसिद्ध है, वह मुझ परमात्माका ही सनातन अंश है, अर्थात् अंग, भाग, एकदेश जो भी कुछ कहो, एक ही अभिप्राय है।
जैसे जलमें प्रतीत होनेवाला सूर्यका अंश— प्रतिबिम्ब, जलरूप निमित्तका नाश होनेपर सूर्यको ही प्राप्त होकर फिर नहीं लौटता, वैसे ही उस परमात्माका यह अंश भी, उस परमात्मासे ही संयुक्त हो जाता है। फिर नहीं लौटता।
अथवा जैसे घट आदि उपाधिसे परिच्छिन्न घटादिका आकाश, आकाशका ही अंश है और वह घट आदि निमित्तके नाश होनेपर, आकाशको ही प्राप्त होकर फिर नहीं लौटता, वैसे ही इसके विषयमें भी समझना चाहिये। सुतरां “जहाँ जाकर नहीं लौटते” यह कहना उचित ही है।
पू0—अवयवरहित परमात्माका अवयव, एकदेश अथवा अंश, कैसे हो सकता है? और यदि उसे अवयवयुक्त मानें, तो उन अवयवोंका विभाग होनेसे परमात्माके नाशका प्रसङ्ग आ जायगा।
उ0—यह दोष नहीं है; क्योंकि अविद्याकृत उपाधिसे परिच्छिन्न, एकदेश ही अंशकी भाँति माना गया है। यह बात क्षेत्राध्यायमें विस्तारपूर्वक दिखलायी गयी है।
वह मेरा अंशरूप माना हुआ जीव, संसारमें कैसे आता है और कैसे शरीर छोड़कर जाता है, सो बतलाते हैं—
(यह जीवात्मा) मन जिनमें छठा है, ऐसी कर्णछिद्रादि अपने-अपने गोलकरूप प्रकृतियोंमें स्थित हुई, श्रोत्रादि इन्द्रियोंको आकर्षित करता है॥ 7॥
कस्मिन् काले—
किस कालमें (आकर्षित करता है)?
यत् च अपि यदा च अपि उत्क्रामति ईश्वरो देहादिसङ्घातस्वामी जीवः तदा कर्षति इति श्लोकस्य द्वितीयपादः अर्थवशात् प्राथम्येन सम्बध्यते।
यदा च पूर्वस्मात् शरीरात् शरीरान्तरम् अवाप्नोति तदा गृहीत्वा एतानि मनःषष्ठानि इन्द्रियाणि संयाति सम्यग् याति गच्छति।
किम् इव इति आह वायुः पवनो गन्धान् इव आशयात् पुष्पादेः॥ 8॥
जब यह देहादि-संघातका स्वामी जीवात्मा शरीरको छोड़कर जाता है, तब (इनको) आकर्षित करता है। पहले और इस श्लोकके अर्थकी संगतिके वशसे श्लोकके दूसरे पादकी व्याख्या पहले की गयी है।
तथा जब यह जीवात्मा, पहले शरीरसे (निकलकर) दूसरे शरीरको पाता है, तब मनसहित इन छः इन्द्रियोंको साथ लेकर जाता है।
कैसे लेकर जाता है? सो बतलाते हैं—जैसे वायु गन्धके स्थानोंसे यानी पुष्पादिसे गन्धको लेकर जाता है, वैसे ही॥ 8॥
कानि पुनः तानि इति—
वे (मनसहित छः इन्द्रियाँ) कौन-सी हैं?
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च त्वगिन्द्रियं रसनं घ्राणम् एव च मनः च षष्ठं प्रत्येकम् इन्द्रियेण सह अधिष्ठाय देहस्थो विषयान् शब्दादीन् उपसेवते॥ 9॥
यह शरीरमें स्थित (जीवात्मा) श्रोत्र, चक्षु, त्वचा, रसना और नासिका इनमेंसे प्रत्येक इन्द्रियको और उसके साथ छठे मनको, आश्रय बनाकर, शब्दादि विषयोंका सेवन किया करता है॥ 9॥
एवं देहगतं देहात्—
इस प्रकार इस देहधारी (जीवात्मा)-को शरीरसे—
उत्क्रामन्तं परित्यजन्तं देहं पूर्वोपात्तं स्थितं वा देहे तिष्ठन्तं भुञ्जानं वा शब्दादीन् च उपलभमानं गुणान्वितं
सुखदुःखमोहाख्यैः गुणैः अन्वितम् अनुगतं संयुक्तम् इत्यर्थः। एवम्भूतम् अपि एनम् अत्यन्तदर्शनगोचरप्राप्तं विमूढा
दृष्टादृष्टविषयभोगबलाकृष्टचेतस्तया अनेकधा मूढा न अनुपश्यन्ति अहो कष्टं वर्तते इति अनुक्रोशति च भगवान्।
ये तु पुनः प्रमाणजनितज्ञानचक्षुषः ते एनं पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषो विविक्तदृष्टय इत्यर्थः॥ 10॥
उत्क्रमण करते हुएको अर्थात् पहले प्राप्त किये शरीरको छोड़कर जाते हुएको, अथवा शरीरमें स्थित रहते हुएको, या शब्दादि विषयोंका भोग करते हुएको, या सुख-दुःख-मोह आदि गुणोंसे युक्त हुएको भी, यानी इस प्रकार अत्यन्त दर्शनगोचर होते हुए भी इस आत्माको मूढ़ लोग, जो कि दृष्ट और अदृष्ट विषयभोगोंकी लालसाके बलसे चित्त आकृष्ट हो जानेके कारण अनेक प्रकारसे मोहित हो रहे हैं, नहीं देखते, अहो! यह बड़े दुःखकी बात है, इस प्रकार भगवान् करुणा प्रकट करते हैं।
परंतु जो प्रमाणजनित ज्ञाननेत्रोंसे युक्त हैं अर्थात् विवेकदृष्टिवाले हैं, वे इसे देखते हैं॥ 10॥
केचित् तु—
और कई एक—
यतन्तः प्रयत्नं कुर्वन्तो
योगिनः च समाहितचित्ता एनं प्रकृतम् आत्मानं पश्यन्ति अयम् अहम् अस्मि इति उपलभन्ते आत्मनि स्वस्यां बुद्धौ अवस्थितम्।
यतन्तः अपि शास्त्रादिप्रमाणैः अकृतात्मानः असंस्कृतात्मानः तपसा इन्द्रियजयेन च दुश्चरिताद् अनुपरता अशान्तदर्पात्मानः प्रयत्नं कुर्वन्तः अपि न एनं पश्यन्ति अचेतसः अविवेकिनः॥ 11॥
प्रयत्न करनेवाले, समाहितचित्त योगीजन, इस आत्माको, जिसका कि प्रकरण चल रहा है, अपने अन्तःकरणमें स्थित देखते हैं अर्थात् “यही मैं हूँ” इस प्रकार आत्मस्वरूपका साक्षात् किया करते हैं।
परंतु जिन्होंने तप और इन्द्रियजय आदि साधनोंद्वारा अपने अन्तःकरणका संस्कार नहीं किया है, जो बुरे आचरणोंसे उपराम नहीं हुए हैं, जो अशान्त और घमण्डी हैं, वे अविवेकी पुरुष, शास्त्रादिके प्रमाणोंसे प्रयत्न करते हुए भी, इस आत्माको नहीं देख पाते॥ 11॥
यत् पदं सर्वस्य अवभासकम् अपि अग्न्यादित्यादिकं ज्योतिः न अवभासयते, यत्प्राप्ताः च मुमुक्षवः पुनः संसाराभिमुखा न निवर्तन्ते, यस्य च पदस्य उपाधिभेदम् अनुविधीयमाना जीवा घटाकाशादय इव आकाशस्य अंशाः, तस्य पदस्य सर्वात्मत्वं सर्वव्यवहारास्पदत्वं च विवक्षुः चतुर्भिः श्लोकैः विभूतिसङ
क्ष ेपम् आह भगवान्—
सबको प्रकाशित करनेवाली अग्नि, सूर्य आदि ज्योतियाँ भी जिस परमपदको प्रकाशित नहीं कर सकतीं, जिस परमपदको प्राप्त हुए मुमुक्षुजन फिर संसारकी ओर नहीं लौटते, जैसे घट आदिके आकाश महाकाशके अंश हैं, वैसे ही उपाधिजनित भेदसे विभिन्न हुए जीव, जिस परमपदके (कल्पित-भावसे) अंश हैं, उस परमपदका, सर्वात्मत्व और समस्त व्यवहारका आधारत्व बतलानेकी इच्छासे भगवान् चार श्लोकोंद्वारा संक्षेपसे विभूतियोंका वर्णन करते हैं—
भाष्य5 paragraphs · खोलें
यद् आदित्यगतम् आदित्याश्रयं किं तत्, तेजो दीप्तिः प्रकाशो जगद् भासयते प्रकाशयति अखिलं समस्तम्, यत् चन्द्रमसि शशभृति तेजः अवभासकं वर्तते, यत् च अग्नौ हुतवहे तत् तेजो विद्धि विजानीहि मामकं मदीयं मम विष्णोः तद् ज्योतिः।
अथवा यद् आदित्यगतं तेजः चैतन्यात्मकं ज्योतिः यत् चन्द्रमसि यत् च अग्नौ तत् तेजो विद्धि मामकं मदीयं मम विष्णोः तद् ज्योतिः।
ननु स्थावरेषु जङ्गमेषु च तत् समानं चैतन्यात्मकं ज्योतिः तत्र कथम् इदं विशेषणं यद् आदित्यगतम् इत्यादि।
न एष दोषः सत्त्वाधिक्याद् आधिक्योप-पत्तेः। आदित्यादिषु हि सत्त्वम् अत्यन्त-प्रकाशम् अत्यन्तभास्वरम् अतः तत्र एव आविस्तरं ज्योतिः इति तद् विशिष्यते, न तु तत्र एव तद् अधिकम् इति।
यथा हि लोके तुल्ये अपि मुखसंस्थाने न काष्ठकुड्यादौ मुखम् आविर्भवति आदर्शादौ तु स्वच्छे स्वच्छतरे च तारतम्येन आविर्भवति तद्वत्॥ 12॥
जो तेज-दीप्ति-प्रकाश सूर्यमें स्थित हुआ अर्थात् सूर्यके आश्रित हुआ समस्त जगत्को प्रकाशित करता है, जो प्रकाश करनेवाला तेज शशाङ्क—चन्द्रमामें स्थित है और जो अग्निमें वर्तमान है, उस तेजको तू मुझ विष्णुकी अपनी ज्योति समझ।
अथवा जो तेज यानी चैतन्यमय ज्योति, सूर्यमें स्थित है, तथा जो चन्द्रमा और अग्निमें स्थित है, उस तेजको तू मुझ विष्णुकी स्वकीय (चेतनमयी) ज्योति समझ।
पू0—वह चेतनमयी ज्योति तो चराचर, सभी पदार्थोंमें समानभावसे स्थित है, फिर यह विशेषता कैसे बतलायी कि “जो तेज सूर्यमें स्थित हैं” इत्यादि।
उ0—सत्त्व—स्वच्छताकी अधिकतासे उनमें अधिकता सम्भव होनेके कारण यह दोष नहीं है; क्योंकि सूर्य आदिमें सत्त्व—अत्यन्त प्रकाश अत्यन्त स्वच्छता है, अतः उनमें ही ब्रह्मज्योति अत्यन्त प्रत्यक्ष प्रतिभासित होती है, इसीसे उनकी विशेषता बतलायी गयी है। यह बात नहीं कि वहीं कुछ ब्रह्मज्योति अधिक है।
जैसे संसारमें देखा जाता है कि समान भावसे सम्मुख—सामने स्थित होनेपर भी, काष्ठ या भित्ति आदिमें मुखका प्रतिबिम्ब नहीं दीखता, पर दर्पण आदि पदार्थमें, जो जितना स्वच्छ और स्वच्छतर होता है उसमें उसी तारतम्यसे, स्वच्छ और स्वच्छतर दीखता है, वैसे ही (इस विषयमें समझो)॥ 12॥
किं च—
तथा—
गां पृथिवीम् आविश्य प्रविश्य धारयामि भूतानि जगद् अहम् ओजसा बलेन यद् बलं कामरागविवर्जितम् ऐश्वरं जगद्विधारणाय पृथिव्यां प्रविष्टं येन गुर्वी पृथिवी न अधः पतति न विदीर्यते च।
तथा च मन्त्रवर्णः—“येन द्यौरुग्रा पृथिवी च दृढा” (तै0 सं0 4। 1। 8) इति। “स दाधार पृथिवीम्” (तै0 सं0 4। 1। 8) इत्यादिः च। अतो गाम् आविश्य च भूतानि चराचराणि धारयामि इति युक्तम् उक्तम्।
किं च पृथिव्यां जाता ओषधीः सर्वा व्रीहियवाद्याः पुष्णामि पुष्टिमती रसस्वादुमतीः च करोमि सोमो भूत्वा रसात्मकः सोमः सर्व-रसात्मको रसस्वभावः सर्वरसानाम् आकरः सोमः स हि सर्वा ओषधीः स्वात्मरसानुप्रवेशेन पुष्णाति॥ 13॥
मैं पृथिवीमें प्रविष्ट होकर अपने उस बलसे, जो कि कामना और आसक्तिसे रहित मेरा ऐश्वर्य-बल जगत्को धारण करनेके लिये पृथिवीमें प्रविष्ट है, जिस बलके कारण भारवती पृथिवी नीचे नहीं गिरती और फटती भी नहीं, सारे जगत्को धारण करता हूँ।
यही बात वेदमन्त्र भी कहते हैं कि “जिससे द्युलोक और भारवती पृथिवी दृढ़ है” तथा “वह पृथिवीको धारण करता है” इत्यादि। अतः यह कहना ठीक ही है कि मैं पृथिवीमें प्रविष्ट होकर चराचर समस्त भूतप्राणियोंको धारण करता हूँ।
तथा मैं ही रसस्वरूप चन्द्रमा होकर पृथिवीमें उत्पन्न होनेवाली धान, जौ आदि समस्त ओषधियोंका पोषण करता हूँ अर्थात् उनको पुष्ट और स्वादयुक्त किया करता हूँ। जो सब रसोंका आत्मा है, रस ही जिसका स्वभाव है, जो समस्त रसोंकी खानि है वह सोम है, वही अपने रसका सञ्चार करके समस्त वनस्पतियोंका पोषण किया करता है॥ 13॥
किं च—
तथा—
अहम् एव वैश्वानर उदरस्थः अग्निः भूत्वा “अयम् अग्निर्वैश्वानरो योऽयमन्तः पुरुषे येनेदमन्नं पच्यते” (बृह0 उ0 5। 9। 1) इत्यादिश्रुतेः वैश्वानरः सन् प्राणिनां प्राणवतां देहम् आश्रितः प्रविष्टः
प्राणापानसमायुक्तः
प्राणापानाभ्यां समायुक्तः संयुक्तः पचामि पक्तिं करोमि चतुर्विधं चतुष्प्रकारम् अन्नम् अशनं भोज्यं भक्ष्यं चोष्यं लेह्यं च।
भोक्ता वैश्वानरः अग्निः भोज्यम् अन्नं सोमः तद् एतद् उभयम् अग्नीषोमौ सर्वम् इति पश्यतः अन्नदोषलेपो न भवति॥ 14॥
मैं ही, पेटमें रहनेवाला जठराग्नि होकर अर्थात् “यह अग्नि वैश्वानर है जो कि पुरुषके भीतर स्थित है और जिससे यह (खाया हुआ) अन्न पचता है” इत्यादि श्रुतियोंसे जिसका वर्णन किया गया है, वह वैश्वानर होकर, प्राणियोंके शरीरमें स्थित—प्रविष्ट होकर प्राण और अपानवायुसे संयुक्त हुआ भक्ष्य, भोज्य, लेह्य और चोष्य—ऐसे चार प्रकारके अन्नोंको पचाता हूँ।
वैश्वानर अग्नि खानेवाला है और सोम खाया जानेवाला अन्न है। सुतरां यह सारा जगत् अग्नि और सोमस्वरूप है, इस प्रकार देखनेवाला मनुष्य अन्नके दोषसे लिप्त नहीं होता॥ 14॥
किं च—
तथा—
सर्वस्य प्राणिजातस्य अहम् आत्मा सन् हृदि बुद्धौ सन्निविष्टः अतो मत्त आत्मनः सर्वप्राणिनां स्मृतिः ज्ञानं तदपोहनं च। येषां पुण्यकर्मिणां पुण्यकर्मानुरोधेन ज्ञानस्मृती भवतः तथा पापकर्मिणां पापकर्मानुरूपेण स्मृतिज्ञानयोः अपोहनं च अपायनम् अपगमनं च।
वेदैः च सर्वैः अहम् एव परमात्मा वेद्यो वेदितव्यो वेदान्तकृद् वेदान्तार्थसम्प्रदायकृद् इत्यर्थः। वेदविद् वेदार्थविद् एव च अहम्॥ 15॥
मैं समस्त प्राणिमात्रका आत्मा होकर उनके अन्तःकरणमें स्थित हूँ। इसलिये समस्त प्राणियोंके स्मृति, ज्ञान और उनका लोप भी मुझ आत्मासे ही किया जाता है, अर्थात् जिन पुण्यकर्मा प्राणियोंको उनके पुण्यकर्मोंके अनुसार ज्ञान और स्मृति प्राप्त होते हैं तथा जिन पापाचारियोंके ज्ञान और स्मृतिका उनके पापकर्मानुसार लोप होता है (वह मुझसे ही होता है)।
समस्त वेदोंद्वारा मैं परमात्मा ही जाननेयोग्य हूँ। तथा वेदान्तका कर्ता, अर्थात् वेदान्तार्थके सम्प्रदायका कर्ता और वेदके अर्थको समझनेवाला भी मैं ही हूँ॥ 15॥
भगवत ईश्वरस्य नारायणाख्यस्य विभूति-सङे
क्षप उक्तो विशिष्टोपाधिकृतो “यदादित्यगतं तेजः” इत्यादिना।
अथ अधुना तस्य एव क्षराक्षरोपाधि-प्रविभक्ततया निरुपाधिकस्य केवलस्य स्वरूप-निर्दिधारयिषया उत्तरश्लोका आरभ्यन्ते। तत्र सर्वम् एव अतीतानागतानन्तराध्यायार्थजातं त्रिधा राशीकृत्य आह—
“यदादित्यगतं तेजः” इत्यादि चार श्लोकोंद्वारा नारायण नामक भगवान् ईश्वरकी, विशेष—उत्तम उपाधियोंसे होनेवाली विभूतियाँ संक्षेपसे कही गयीं।
अब, क्षर और अक्षर—इन दोनों उपाधियोंसे अलग बतलाकर, उसी उपाधिरहित शुद्ध परमात्माके स्वरूपका निश्चय करनेकी इच्छासे अगले श्लोकोंका आरम्भ किया जाता है। उनमें पहलेके और आगे आनेवाले सभी अध्यायोंके समस्त अभिप्रायको तीन भेदोंमें विभक्त करके कहते हैं—
द्वौ इमौ पृथग् राशीकृतौ पुरुषौ इति उच्येते लोके संसारे क्षरः च क्षरति इति क्षरो विनाशी एको राशिः अपरः पुरुषः अक्षरः तद्विपरीतो भगवतो मायाशक्तिः क्षराख्यस्य पुरुषस्य उत्पत्तिबीजम् अनेकसंसारिजन्तुकामकर्मादि-संस्काराश्रयः अक्षरः पुरुष उच्यते।
कौ तौ पुरुषौ इति आह स्वयम् एव भगवान्—
क्षरः सर्वाणि भूतानि समस्तं विकारजातम् इत्यर्थः। कूटस्थः कूटो राशी राशिः इव स्थितः अथवा कूटो माया वञ्चना जिह्मता कुटिलता इति पर्याया अनेकमायादिप्रकारेण स्थितः कूटस्थः संसारबीजानन्त्याद् न क्षरति इति अक्षर उच्यते॥ 16॥
समुदायरूपसे पृथक् किये हुए ये दो भाव संसारमें पुरुष नामसे कहे जाते हैं। इनमेंसे एक समुदाय क्षीण होनेवाला—नाशवान् क्षर पुरुष है और दूसरा उससे विपरीत अक्षर पुरुष है, जो कि भगवान्की मायाशक्ति है, क्षर पुरुषकी उत्पत्तिका बीज है तथा अनेक संसारी जीवोंकी कामना और कर्म आदिके संस्कारोंका आश्रय है, वह अक्षर पुरुष कहलाता है।
वे दोनों पुरुष कौन हैं? सो भगवान् स्वयं ही बतलाते हैं—
समस्त भूत अर्थात् प्रकृतिका सारा विकार तो क्षर पुरुष है और कूटस्थ अर्थात् जो कूट—राशिकी भाँति स्थित है अथवा कूट नाम मायाका है जिसके वञ्चना, छल, कुटिलता आदि पर्याय हैं, उपर्युक्त माया आदि अनेक प्रकारसे जो स्थित है, वह कूटस्थ है। संसारका बीज, अन्तरहित होनेके कारण वह कूटस्थ नष्ट नहीं होता, अतः अक्षर कहा जाता है॥ 16॥
आभ्यां क्षराक्षराभ्यां विलक्षणः क्षराक्षरोपाधि-द्वयदोषेण
अस्पृष्टो
नित्यशुद्धबुद्धमुक्त-स्वभावः—
तथा जो क्षर और अक्षर—इन दोनोंसे विलक्षण है और क्षर-अक्षररूप दोनों उपाधियोंके दोषसे रहित है वह नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्तस्वभाववाला—
उत्तम उत्कृष्टतमः पुरुषः तु अन्यः अत्यन्त-विलक्षण आभ्यां परमात्मा इति परमः च असौ देहाद्यविद्याकृतात्मभ्य आत्मा च सर्वभूतानां प्रत्यक्चेतन इत्यतः परमात्मा इति उदाहृत उक्तो वेदान्तेषु।
स एव विशेष्यते—
यो लोकत्रयं भूर्भुवःस्वराख्यं स्वकीयया चैतन्यबलशक्त्या आविश्य प्रविश्य बिभर्ति स्वरूपसद्भावमात्रेण बिभर्ति धारयति अव्ययो न अस्य व्ययो विद्यते इति अव्यय ईश्वरः सर्वज्ञो नारायणाख्य ईशनशीलः॥ 17॥
उत्तम—अतिशय उत्कृष्ट पुरुष तो अन्य ही है। अर्थात् इन दोनोंसे अत्यन्त विलक्षण है, जो कि परमात्मा नामसे कहा गया है। वह ईश्वर अविद्याजनित शरीरादि आत्माओंकी अपेक्षा पर है और सब प्राणियोंका आत्मा यानी अन्तरात्मा है, इस कारण वेदान्तवाक्योंमें वह “परमात्मा” नामसे कहा गया है।
उसीका विशेषरूपसे निरूपण करते हैं—
जो पृथ्वी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग—इन तीनों लोकोंको, अपने चैतन्य-बलकी शक्तिसे उनमें प्रविष्ट होकर, केवल स्वरूप-सत्तामात्रसे उनको धारण करता है और जो अविनाशी ईश्वर है, अर्थात् जिसका कभी नाश न हो, ऐसा नारायण नामक सर्वज्ञ और सबका शासन करनेवाला है॥ 17॥
यथा व्याख्यातस्य ईश्वरस्य पुरुषोत्तम इति एतद् नाम प्रसिद्धं तस्य नामनिर्वचनप्रसिद्ध्या अर्थवत्त्वं नाम्नो दर्शयन् निरतिशयः अहम् ईश्वर इति आत्मानं दर्शयति भगवान्—
उपर्युक्त ईश्वरका “पुरुषोत्तम” यह नाम प्रसिद्ध है, उसका यह नाम किस कारणसे हुआ? इसकी हेतुसहित उपपत्ति बतलाकर, नामकी सार्थकता दिखलाते हुए भगवान् अपने स्वरूपको प्रकट करते हैं कि “मैं निरतिशय ईश्वर हूँ”—
यस्मात् क्षरम् अतीतः अहं संसारमायावृक्षम् अश्वत्थाख्यम् अतिक्रान्तः अहम् अक्षराद् अपि संसारवृक्षबीजभूताद् अपि च उत्तम उत्कृष्टतम ऊर्ध्वतमो वा, अतः क्षराक्षराभ्याम् उत्तमत्वाद् अस्मि भवामि लोके वेदे च प्रथितः प्रख्यातः पुरुषोत्तम इति एवं मां भक्तजना विदुः कवयः काव्यादिषु च इदं नाम निबध्नन्ति पुरुषोत्तम इति अनेन अभिधानेन अभिगृणन्ति॥ 18॥
क्योंकि मैं क्षरभावसे अतीत हूँ अर्थात् अश्वत्थ नामक मायामय संसारवृक्षका अतिक्रमण किये हुए हूँ और संसारवृक्षके बीजस्वरूप अक्षरसे (मूल प्रकृतिसे) भी उत्तम—अतिशय उत्कृष्ट अथवा अतिशय उच्च हूँ। इसीलिये अर्थात् क्षर और अक्षरसे उत्तम होनेके कारण लोक और वेदमें मैं पुरुषोत्तम नामसे विख्यात हूँ। भक्तजन मुझे इसी प्रकार जानते हैं और कविजन भी काव्यादिमें इसी नामका प्रयोग करते हैं अर्थात् “पुरुषोत्तम” इसी नामसे ही मेरा वर्णन करते हैं॥ 18॥
अथ इदानीं यथा निरुक्तम् आत्मानं यो वेद तस्य इदं फलम् उच्यते—
अब इस प्रकार बतलाये हुए आत्मतत्त्वको जो जानता है उसके लिये यह फल बतलाया जाता है—
यो माम् ईश्वरं यथोक्तविशेषणम् एवं यथोक्तेन प्रकारेण असम्मूढः सम्मोहवर्जितः सन् जानाति अयम् अहम् अस्मि इति पुरुषोत्तमं स सर्ववित् सर्वात्मना सर्वं वेत्ति इति सर्वज्ञः सर्वभूतस्थं भजति मां सर्वभावेन सर्वात्मचित्ततया हे भारत॥ 19॥
जो कोई अज्ञानसे रहित हुआ पुरुष, उपर्युक्त विशेषणोंसे युक्त मुझ पुरुषोत्तम ईश्वरको, ऊपर कहे हुए प्रकारसे यह जानता है कि “यह (पुरुषोत्तम) मैं हूँ, वह सर्वज्ञ है—वह सर्वात्मभावसे सबको जानता है, अतः सर्वज्ञ है और हे भारत! (वह) सब भूतोंमें स्थित मुझ परमात्माको ही सर्वभावसे—सबका आत्मा समझकर भजता है॥ 19॥
अस्मिन् अध्याये भगवत्तत्त्वज्ञानं मोक्षफलम् उक्त्वा अथ इदानीं तत् स्तौति—
इस अध्यायमें मोक्षरूप फलके देनेवाले भगवत्-तत्त्वज्ञानको कहकर अब उसकी स्तुति करते हैं—
भाष्य8 paragraphs · खोलें
इति एतद् गुह्यतमं गोप्यतमम् अत्यन्तरहस्यम् इति एतत्। किं तत् शास्त्रम्।
यद्यपि गीताख्यं समस्तं शास्त्रम् उच्यते तथापि अयम् एव अध्याय इह शास्त्रम् इति उच्यते स्तुत्यर्थं प्रकरणात्। सर्वो हि गीताशास्त्रार्थः अस्मिन् अध्याये समासेन उक्तो न केवलं सर्वः च वेदार्थ इह परिसमाप्तो “यस्तं वेद स वेदवित्” “वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः” इति च उक्तम्।
इदम् उक्तं कथितं मया हे अनघ अपाप। एतत् शास्त्रं यथादर्शितार्थं बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्याद् भवेद् न अन्यथा कृतकृत्यः च भारत।
कृतं कृत्यं कर्तव्यं येन स कृतकृत्यो विशिष्टजन्मप्रसूतेन ब्राह्मणेन यत् कर्तव्यं तत् सर्वं भगवत्तत्त्वे विदिते कृतं भवेद् इत्यर्थः। न च अन्यथा कर्तव्यं परिसमाप्यते कस्यचिद् इति अभिप्रायः।
“सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते” इति च उक्तम्।
“एतद्धि जन्मसामग्र्यं ब्राह्मणस्य विशेषतः।
प्राप्यैतत्कृतकृत्यो हि द्विजो भवति नान्यथा॥” (मनुस्मृति 12। 93) इति च मानवं वचनम्।
यत एतत् परमार्थतत्त्वं मत्तः श्रुतवान् असि ततः कृतार्थः त्वं भारत इति॥ 20॥
यह गुह्यतम—सबसे अधिक गोपनीय अर्थात् अत्यन्त गूढ़ रहस्य है। वह क्या है? शास्त्र।
यद्यपि सारी गीताका नाम ही शास्त्र कहा जाता है, परंतु यहाँ स्तुतिके लिये प्रकरणसे यह (पंद्रहवाँ) अध्याय ही “शास्त्र” नामसे कहा गया है। क्योंकि इस अध्यायमें केवल सारे गीताशास्त्रका अर्थ ही संक्षेपसे नहीं कहा गया है, किंतु इसमें समस्त वेदोंका अर्थ भी समाप्त हो गया है। यह कहा भी है कि “जो उसे जानता है वही वेदको जाननेवाला है” “समस्त वेदोंसे मैं ही जाननेयोग्य हूँ।”
हे निष्पाप अर्जुन! ऐसा यह (परम गोपनीय शास्त्र) मैंने कहा है। हे भारत! ऊपर दिखलाये हुए अर्थसे युक्त इस शास्त्रको जानकर ही, मनुष्य बुद्धिमान् और कृतकृत्य होता है, अन्य प्रकारसे नहीं।
अभिप्राय यह है कि जिसने करनेयोग्य सब कुछ कर लिया हो, वह कृतकृत्य है, अतः श्रेष्ठ कुलमें जन्म लेनेवाले ब्राह्मणद्वारा जो कुछ किया जानेयोग्य है, वह सब भगवान्का तत्त्व जान लेनेपर किया हुआ हो जाता है। अन्य प्रकारसे किसीके भी कर्तव्यकी समाप्ति नहीं होती।
कहा भी है कि “हे पार्थ! समस्त कर्म-समुदाय, ज्ञानमें सर्वथा समाप्त हो जाता है।”
तथा मनुका भी वचन है कि “विशेषरूपसे ब्राह्मणके जन्मकी यही पूर्णता है; क्योंकि इसीको प्राप्त करके द्विज कृतकृत्य होता है अन्य प्रकारसे नहीं।”
हे भारत! क्योंकि तूने मुझसे यह परमार्थतत्त्व सुना है, इसलिये तू कृतार्थ हो गया है॥ 20॥