ग्रन्थ
16दैवासुरसम्पद्विभागयोग

दैवासुरसम्पद्विभागयोग

Daivasura-Sampad-Vibhaga-Yoga
Divine and Demoniac Natures
24 verses · 23 printed blockspp. 669688 · Srimad Bhagavad Gita — Tattva-Vivechaniसाधारण भाषाटीका 23 · साधक-संजीवनी 24 · श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्य 24 · श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीका 23
1श्रीभगवान्
श्रीभगवान् उवाच
श्रीभगवानुवाच अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः। दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥ 1॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
श्रीभगवान् बोले—भयका सर्वथा अभाव, अन्तःकरणकी पूर्ण निर्मलता, तत्त्वज्ञानके लिये ध्यानयोगमें निरन्तर दृढ़ स्थिति और सात्त्विक दान, इन्द्रियोंका दमन, भगवान्, देवता और गुरुजनोंकी पूजा तथा अग्निहोत्र आदि उत्तम कर्मोंका आचरण एवं वेद-शास्त्रोंका पठन-पाठन तथा भगवान्के नाम और गुणोंका कीर्तन, स्वधर्मपालनके लिये कष्टसहन और शरीर तथा इन्द्रियोंके सहित अन्तःकरणकी सरलता॥ 1॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—सातवें अध्यायके पन्द्रहवें श्लोकमें तथा नवें अध्यायके ग्यारहवें और बारहवें श्लोकोंमें भगवान्ने कहा था कि “आसुरी और राक्षसी प्रकृतिको धारण करनेवाले मूढ मेरा भजन नहीं करते, वरं मेरा तिरस्कार करते हैं।” तथा नवें अध्यायके तेरहवें और चौदहवें श्लोकोंमें कहा कि “दैवी प्रकृतिसे युक्त महात्माजन मुझे सब भूतोंका आदि और अविनाशी समझकर अनन्य प्रेमके साथ सब प्रकारसे निरन्तर मेरा भजन करते हैं।” परंतु दूसरा प्रसंग चलता रहनेके कारण वहाँ दैवी प्रकृति और आसुरी प्रकृतिके लक्षणोंका वर्णन नहीं किया जा सका। फिर पंद्रहवें अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि “जो ज्ञानी महात्मा मुझे “पुरुषोत्तम” जानते हैं, वे सब प्रकारसे मेरा भजन करते हैं।” इसपर स्वाभाविक ही भगवान्को पुरुषोत्तम जानकर सर्वभावसे उनका भजन करनेवाले दैवी प्रकृतियुक्त महात्मा पुरुषोंके और उनका भजन न करनेवाले आसुरी प्रकृतियुक्त अज्ञानी मनुष्योंके क्या-क्या लक्षण हैं?—यह जाननेकी इच्छा होती है। अतएव अब भगवान् दोनोंके लक्षण और स्वभावका विस्तारपूर्वक वर्णन करनेके लिये सोलहवाँ अध्याय आरम्भ करते हैं। इसमें पहले तीन श्लोकोंद्वारा दैवीसम्पद्से युक्त सात्त्विक पुरुषोंके स्वाभाविक लक्षणोंका विस्तारपूर्वक वर्णन किया जाता है—

2
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्। दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्॥ 2॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
मन, वाणी और शरीरसे किसी प्रकार भी किसीको कष्ट न देना, यथार्थ और प्रिय भाषण, अपना अपकार करनेवालेपर भी क्रोधका न होना, कर्मोंमें कर्तापनके अभिमानका त्याग, अन्तःकरणकी उपरति अर्थात् चित्तकी चंचलताका अभाव, किसीकी भी निन्दादि न करना, सब भूतप्राणियोंमें हेतुरहित दया, इन्द्रियोंका विषयोंके साथ संयोग होनेपर भी उनमें आसक्तिका न होना, कोमलता, लोक और शास्त्रसे विरुद्ध आचरणमें लज्जा और व्यर्थ
3
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता। भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत॥ 3॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
तेज, क्षमा, धैर्य, बाहरकी शुद्धि एवं किसीमें भी शत्रुभावका न होना और अपनेमें पूज्यताके अभिमानका अभाव—ये सब तो हे अर्जुन! दैवी सम्पदाको लेकर उत्पन्न हुए पुरुषके
4
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च। अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्॥ 4॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे पार्थ! दम्भ, घमण्ड और अभिमान तथा क्रोध, कठोरता और अज्ञान भी—ये सब आसुरी-सम्पदाको लेकर उत्पन्न हुए पुरुषके लक्षण हैं॥ 4॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार धारण करनेके योग्य दैवीसम्पद्से युक्त पुरुषके लक्षणोंका वर्णन करके अब त्याग करनेयोग्य आसुरीसम्पद्से युक्त पुरुषके लक्षण संक्षेपमें कहे जाते हैं—

5
दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता। मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव॥ 5॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
दैवी-सम्पदा मुक्तिके लिये और आसुरी-सम्पदा बाँधनेके लिये मानी गयी है। इसलिये हे अर्जुन! तू शोक मत कर, क्योंकि तू दैवी-सम्पदाको लेकर उत्पन्न हुआ है॥ 5॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार दैवीसम्पद् और आसुरीसम्पद्से युक्त पुरुषोंके लक्षणोंका वर्णन करके अब भगवान् दोनों सम्पदाओंका फल बतलाते हुए अर्जुनको दैवी-सम्पदासे युक्त बतलाकर आश्वासन देते हैं—

6
द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च। दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु॥ 6॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे अर्जुन! इस लोकमें भूतोंकी सृष्टि यानी मनुष्यसमुदाय दो ही प्रकारका है, एक तो दैवी प्रकृतिवाला और दूसरा आसुरी प्रकृतिवाला। उनमेंसे दैवी प्रकृतिवाला तो विस्तारपूर्वक कहा गया, अब तू आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्यसमुदायको भी विस्तारपूर्वक मुझसे
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस अध्यायके प्रारम्भमें और इसके पूर्व भी दैवी-सम्पदाका विस्तारसे वर्णन किया गया, परंतु आसुरी-सम्पदाका वर्णन अबतक बहुत संक्षेपसे ही हुआ। अतएव आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्योंके स्वभाव और आचार-व्यवहारका विस्तारपूर्वक वर्णन करनेके लिये अब भगवान् उसकी प्रस्तावना करते हैं—

7
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः। न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते॥ 7॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
आसुर स्वभाववाले मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्ति—इन दोनोंको ही नहीं जानते। इसलिये उनमें न तो बाहर-भीतरकी शुद्धि है, न श्रेष्ठ आचरण है और न सत्यभाषण ही है॥ 7॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्यसमुदायके लक्षण सुननेके लिये अर्जुनको सावधान करके अब भगवान् उनका वर्णन करते हैं—

8
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्। अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्॥ 8॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
वे आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्य कहा करते हैं कि जगत् आश्रयरहित, सर्वथा असत्य और बिना ईश्वरके, अपने-आप केवल स्त्री-पुरुषके संयोगसे उत्पन्न है, अतएव केवल काम ही इसका कारण है। इसके सिवा और क्या है?॥ 8॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—आसुर-स्वभाववालोंमें विवेक, शौच और सदाचार आदिका अभाव बतलाकर अब उनके नास्तिकभावका वर्णन करते हैं—

9
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः। प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः॥ 9॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
इस मिथ्या ज्ञानको अवलम्बन करके—जिनका स्वभाव नष्ट हो गया है तथा जिनकी बुद्धि मन्द है, वे सबका अपकार करनेवाले क्रूरकर्मी मनुष्य केवल जगत्के नाशके लिये ही
सम्बन्ध

सम्बन्ध—ऐसे नास्तिक सिद्धान्तके माननेवालोंके स्वभाव और आचरण कैसे होते हैं? इस जिज्ञासापर अब भगवान् अगले चार श्लोकोंमें उनके लक्षणोंका वर्णन करते हैं—

10
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः। मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ॥ 10॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
वे दम्भ, मान और मदसे युक्त मनुष्य किसी प्रकार भी पूर्ण न होनेवाली कामनाओंका आश्रय लेकर, अज्ञानसे मिथ्या सिद्धान्तोंको ग्रहण करके और भ्रष्ट आचरणोंको धारण करके
11
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः। कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः॥ 11॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
तथा वे मृत्युपर्यन्त रहनेवाली असंख्य चिन्ताओंका आश्रय लेनेवाले, विषयभोगोंके भोगनेमें तत्पर रहनेवाले और “इतना ही सुख है” इस प्रकार माननेवाले होते हैं॥ 11॥
12
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः। ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्॥ 12॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
वे आशाकी सैकड़ों फाँसियोंसे बँधे हुए मनुष्य काम-क्रोधके परायण होकर विषय-भोगोंके लिये अन्यायपूर्वक धनादि पदार्थोंको संग्रह करनेकी चेष्टा करते रहते हैं॥ 12॥
13
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्। इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्॥ 13॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
वे सोचा करते हैं कि मैंने आज यह प्राप्त कर लिया है और अब इस मनोरथको प्राप्त कर लूँगा। मेरे पास यह इतना धन है और फिर भी यह हो जायगा॥ 13॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—पिछले चार श्लोकोंमें आसुर-स्वभाववाले मनुष्योंके लक्षण और आचरण बतलाकर अब अगले चार श्लोकोंमें उनके “अहंता”, “ममता” और “मोह” युक्त संकल्पोंका निरूपण करते हुए उनकी दुर्गतिका वर्णन करते हैं—

14
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि। ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी॥ 14॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
वह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया और उन दूसरे शत्रुओंको भी मैं मार डालूँगा। मैं ईश्वर हूँ, ऐश्वर्यको भोगनेवाला हूँ। मैं सब सिद्धियोंसे युक्त हूँ और बलवान् तथा सुखी हूँ॥ 14॥
15–16Merged
आढ्येऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया। यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः॥ 15॥ अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः। प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ॥ 16॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
मैं बड़ा धनी और बड़े कुटुम्बवाला हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा और आमोद-प्रमोद करूँगा। इस प्रकार अज्ञानसे मोहित रहनेवाले तथा अनेक प्रकारसे भ्रमित चित्तवाले मोहरूप जालसे समावृत और विषयभोगोंमें अत्यन्त आसक्त आसुरलोग महान्
17
आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः। यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्॥ 17॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
वे अपने-आपको ही श्रेष्ठ माननेवाले घमण्डी पुरुष धन और मानके मदसे युक्त होकर केवल नाममात्रके यज्ञोंद्वारा पाखण्डसे शास्त्रविधि रहित यजन करते हैं॥ 17॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—पंद्रहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा था कि वे लोग “यज्ञ करूँगा” ऐसा कहते हैं; अतः अगले श्लोकमें उनके यज्ञका स्वरूप बतलाया जाता है—

18
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः। मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः॥ 18॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
वे अहंकार, बल, घमण्ड, कामना और क्रोधादिके परायण और दूसरोंकी निन्दा करनेवाले पुरुष अपने और दूसरोंके शरीरमें स्थित मुझ अन्तर्यामीसे द्वेष करनेवाले
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार आसुर-स्वभाववाले मनुष्योंके यज्ञका स्वरूप बतलाकर अब उनकी दुर्गतिके कारणरूप स्वभावका वर्णन करते हैं—

19
तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्। क्षिपाम्यजस्त्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु॥ 19॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
उन द्वेष करनेवाले पापाचारी और क्रूरकर्मी नराधमोंको मैं संसारमें बार-बार आसुरी
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार सातवेंसे अठारहवें श्लोकतक आसुरी स्वभाववालोंके दुर्गुण और दुराचार आदिका वर्णन करके अब उन दुर्गुण-दुराचारोंमें त्याज्य-बुद्धि करानेके लिये अगले दो श्लोकोंमें भगवान् वैसे लोगोंकी घोर निन्दा करते हुए उनकी दुर्गतिका वर्णन करते हैं—

20
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि। मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्॥ 20॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे अर्जुन! वे मूढ मुझको न प्राप्त होकर जन्म-जन्ममें आसुरी योनिको प्राप्त होते हैं, फिर उससे भी अति नीच गतिको ही प्राप्त होते हैं अर्थात् घोर नरकोंमें पड़ते हैं॥ 20॥
21
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥ 21॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
काम, क्रोध तथा लोभ—ये तीन प्रकारके नरकके द्वार आत्माका नाश करनेवाले अर्थात् उसको अधोगतिमें ले जानेवाले हैं। अतएव इन तीनोंको त्याग देना चाहिये॥ 21॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—आसुर-स्वभाववाले मनुष्योंको लगातार आसुरी योनियोंके और घोर नरकोंके प्राप्त होनेकी बात सुनकर यह जिज्ञासा हो सकती है कि उनके लिये इस दुर्गतिसे बचकर परमगतिको प्राप्त करनेका क्या उपाय है? इसपर अब दो श्लोकोंमें समस्त दुर्गतियोंके प्रधान कारणरूप आसुरी सम्पत्तिके त्रिविध दोषोंके त्याग करनेकी बात कहते हुए भगवान् परमगतिकी प्राप्तिका उपाय बतलाते हैं—

22
एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः। आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्॥ 22॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे अर्जुन! इन तीनों नरकके द्वारोंसे मुक्त पुरुष अपने कल्याणका आचरण करता है, इससे वह परमगतिको जाता है अर्थात् मुझको प्राप्त हो जाता है॥ 22॥
23
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः। न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥ 23॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो पुरुष शास्त्रविधिको त्यागकर अपनी इच्छासे मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धिको प्राप्त होता है, न परमगतिको और न सुखको ही॥ 23॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—जो उपर्युक्त दैवीसम्पदाका आचरण न करके अपनी मान्यताके अनुसार कर्म करता है वह परमगतिको प्राप्त होता है या नहीं? इसपर कहते हैं—

24
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥ 24॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
इससे तेरे लिये इस कर्तव्य और अकर्तव्यकी व्यवस्थामें शास्त्र ही प्रमाण है। ऐसा जानकर तू शास्त्रविधिसे नियत कर्म ही करनेयोग्य है॥ 24॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—शास्त्रविधिको त्यागकर किये जानेवाले मनमाने कर्म निष्फल होते हैं, यह बात सुनकर यह जिज्ञासा हो सकती है कि ऐसी स्थितिमें क्या करना चाहिये? इसपर कहते हैं—

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः॥
16.1श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीका