ग्रन्थ
16दैवासुरसम्पद्विभागयोग

दैवासुरसम्पद्विभागयोग

Daivasura-Sampad-Vibhaga-Yoga
Divine and Demoniac Natures
24 verses · 24 printed blockspp. 380391 · Srimad Bhagavad Gita Shankarabhashyaसाधारण भाषाटीका 23 · साधक-संजीवनी 24 · श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्य 24 · श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीका 23
1श्रीभगवान्
श्रीभगवान् उवाच
श्रीभगवानुवाच— अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः। दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥ 1॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

दैवी आसुरी राक्षसी च इति प्राणिनां प्रकृतयो नवमे अध्याये सूचिताः तासां विस्तरेण प्रदर्शनाय अभयं सत्त्वसंशुद्धिः इत्यादिः अध्याय आरभ्यते,

तत्र संसारमोक्षाय दैवी प्रकृतिः निबन्धनाय आसुरी राक्षसी च इति दैव्या आदानाय प्रदर्शनं क्रियते इतरयोः परिवर्जनाय,

हिन्दी

नवें अध्यायमें प्राणियोंकी दैवी, आसुरी और राक्षसी—ये तीन प्रकारकी प्रकृतियाँ बतलायी गयी हैं। उन्हें विस्तारपूर्वक दिखानेके लिये “अभयं सत्त्वसंशुद्धिः” इत्यादि (श्लोकोंसे युक्त सोलहवाँ) अध्याय आरम्भ किया जाता है।

उन तीनोंमें दैवी प्रकृति संसारसे मुक्त करनेवाली है, तथा आसुरी और राक्षसी प्रकृतियाँ बन्धन करनेवाली हैं, अतः यहाँ दैवी प्रकृति सम्पादन करनेके लिये और दूसरी दोनों त्यागनेके लिये दिखलायी जाती हैं— श्रीभगवान् बोले—

भाष्य
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संस्कृत

अभयम् अभीरुता सत्त्वसंशुद्धिः सत्त्वस्य अन्तःकरणस्य संव्यवहारेषु परवञ्चनमायानृता-दिपरिवर्जनं शुद्धभावेन व्यवहार इत्यर्थः।

ज्ञानयोगव्यवस्थितिः ज्ञानं शास्त्रत आचार्यतः च आत्मादिपदार्थानाम् अवगमः अवगतानाम् इन्द्रियाद्युपसंहारेण एकाग्रतया स्वात्मसंवेद्यता-पादनं योगः तयोः ज्ञानयोगयोः व्यवस्थितिः व्यवस्थानं तन्निष्ठता एषा प्रधाना दैवी सात्त्विकी सम्पत्।

यत्र च येषाम् अधिकृतानां या प्रकृतिः सम्भवति सात्त्विकी सा उच्यते—

दानं यथाशक्ति संविभागः अन्नादीनाम्।

दमः च बाह्यकरणानाम् उपशमः अन्तः-करणस्य उपशमं शान्तिं वक्ष्यति।

यज्ञः च श्रौतः अग्निहोत्रादिः, स्मार्तः च देवयज्ञादिः।

स्वाध्याय ऋग्वेदाद्यध्ययनम् अदृष्टार्थम्।

तपो वक्ष्यमाणं शरीरादि, आर्जवम् ऋजुत्वं सर्वदा॥ 1॥

हिन्दी

अभय—निर्भयता, सत्त्वसंशुद्धि—अन्तःकरणकी शुद्धि व्यवहारमें दूसरेके साथ ठगाई, कपट और झूठ आदि अवगुणोंको छोड़कर शुद्ध भावसे आचरण करना।

ज्ञान और योगमें निरन्तर स्थिति—शास्त्र और आचार्यसे आत्मादि पदार्थोंको जानना “ज्ञान” है और उन जाने हुए पदार्थोंका इन्द्रियादिके निग्रहसे (प्राप्त) एकाग्रताद्वारा अपने आत्मामें प्रत्यक्ष अनुभव कर लेना “योग” है। उन ज्ञान और योग दोनोंमें स्थिति अर्थात् स्थिर हो जाना—तन्मय हो जाना, यही प्रधान सात्त्विकी—दैवी संपद् है।

और भी जिन अधिकारियोंकी जिस विषयमें जो सात्त्विकी प्रकृति हो सकती है वह कही जाती है—

दान—अपनी शक्तिके अनुसार अन्नादि वस्तुओंका विभाग करना।

दम—बाह्य इन्द्रियोंका संयम। अन्तःकरणकी उपरामता तो शान्तिके नामसे आगे कही जायगी।

यज्ञ—अग्निहोत्रादि श्रौतयज्ञ और देवपूजनादि स्मार्तयज्ञ।

स्वाध्याय—अदृष्टलाभके लिये ऋक् आदि वेदोंका अध्ययन करना।

तप—शारीरिक आदि तप जो आगे बतलाया जायगा और आर्जव अर्थात् सदा सरलता सीधापन॥ 1॥

2
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्। दयाभूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्॥ 2॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

किं च—

हिन्दी

तथा—

भाष्य
संस्कृत

अहिंसा अहिंसनं प्राणिनां पीडावर्जनम्, सत्यम् अप्रियानृतवर्जितं यथाभूतार्थवचनम्।

अक्रोधः परैः आक्रुष्टस्य अभिहतस्य वा प्राप्तस्य क्रोधस्य उपशमनम्, त्यागः सन्न्यासः पूर्वं दानस्य उक्तत्वात्।

शान्तिः अन्तःकरणस्य उपशमः अपैशुनम् अपिशुनता परस्मै पररन्ध्रप्रकटीकरणं पैशुनं तदभावः अपैशुनम्।

दया कृपा भूतेषु दुःखितेषु, अलोलुप्त्वम् इन्द्रियाणां विषयसन्निधौ अविक्रिया, मार्दव मृदुता अक्रौर्यम्।

ह्रीः लज्जा अचापलम् असति प्रयोजने वाक्पाणिपादादीनाम् अव्यापारयितृत्वम्॥ 2॥

हिन्दी

अहिंसा—किसी भी प्राणीको कष्ट न देना, सत्य— अप्रियता और असत्यसे रहित यथार्थ वचन।

अक्रोध—दूसरोंके द्वारा गाली दी जाने या ताड़ना दी जानेपर उत्पन्न हुए क्रोधको शान्त कर लेना। त्याग—संन्यास (दान नहीं) क्योंकि दान पहले कहा जा चुका है।

शान्ति—अन्तःकरणका संकल्परहित होना, अपैशुन—अपिशुनता; किसी दूसरेके सामने पराये छिद्रोंको प्रकट करना पिशुनता (चुगली) है, उसका न होना अपिशुनता है।

भूतोंपर दया—दुखी प्राणियोंपर कृपा करना, अलोलुपता—विषयोंके साथ संयोग होनेपर भी इन्द्रियोंमें विकार न होना, मार्दव—कोमलता अर्थात् अक्रूरता।

ह्री—लज्जा और अचपलता—बिना प्रयोजन वाणी, हाथ, पैर आदिकी व्यर्थ क्रियाओंका न करना॥ 2॥

3
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता। भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत॥ 3॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

किं च—

हिन्दी

तथा—

भाष्य
8 paragraphs · खोलें
संस्कृत

तेजः प्रागल्भ्यं न त्वग्गता दीप्तिः, क्षमा आक्रुष्टस्य ताडितस्य वा अन्तर्विक्रियानुत्पत्तिः उत्पन्नायां विक्रियायां प्रशमनम् अक्रोध इति अवोचाम, इत्थं क्षमाया अक्रोधस्य च विशेषः।

धृतिः देहेन्द्रियेषु अवसादं प्राप्तेषु तस्य प्रतिषेधकः

अन्तःकरणवृत्तिविशेषो

येन उत्तम्भितानि करणानि देहः च न अवसीदन्ति।

शौचं द्विविधं मृज्जलकृतं बाह्यम् आभ्यन्तरं च मनोबुद्ध्योः नैर्मल्यं मायारागादिकालुष्याभाव-एवं द्विविधं शौचम्।

अद्रोहः परजिघांसाभावः अहिंसनम्।

नातिमानिता अत्यर्थं मानः अतिमानः स यस्य विद्यते सः अतिमानी तद्भावः अतिमानिता तदभावो नातिमानिता आत्मनः पूज्यतातिशय-भावनाभाव इत्यर्थः।

भवन्ति अभयादीनि एतदन्तानि सम्पदम् अभिजातस्य किंविशिष्टां सम्पदम्, दैवीं देवानां सम्पदम् अभिलक्ष्य जातस्य दैवविभूत्यर्हस्य भाविकल्याणस्य इत्यर्थो हे भारत॥ 3॥

हिन्दी

तेज—प्रागल्भ्य (तेजस्विता), चमड़ीकी चमक नहीं। क्षमा-गाली दी जाने या ताड़ना दी जानेपर भी अन्तःकरणमें विकार उत्पन्न न होना। उत्पन्न हुए विकारको शान्ति कर देना तो पहले अक्रोधके नामसे कह चुके हैं। क्षमा और अक्रोधका इतना ही भेद है।

धृति—शरीर और इन्द्रियादिमें थकावट उत्पन्न होनेपर, उस थकावटको हटानेवाली जो अन्तःकरणकी वृत्ति है, उसका नाम “धृति” है, जिसके द्वारा उत्साहित की हुई इन्द्रियाँ और शरीर कार्यमें नहीं थकते।

शौच—दो प्रकारकी शुद्धि, अर्थात् मिट्टी और जल आदिसे बाहरकी शुद्धि, एवं कपट और रागादिकी कालिमाका अभाव होकर मन-बुद्धिकी निर्मलतारूप भीतरकी शुद्धि, इस प्रकार दो तरहकी शुद्धि।

अद्रोह—दूसरेका घात करनेकी इच्छाका अभाव, यानी हिंसा न करना।

अतिमानिताका अभाव—अत्यन्त मानका नाम अतिमान है, वह जिसमें हो वह अतिमानी है, उसका भाव अतिमानिता है, उसका जो अभाव है वह “नातिमानिता” है, अर्थात् अपनेमें अतिशय पूज्य भावनाका न होना।

हे भारत! “अभय” से लेकर यहाँतकके ये सब लक्षण, सम्पत्तियुक्त उत्पन्न हुए पुरुषमें होते हैं। कैसी सम्पत्तिसे युक्त पुरुषमें होते हैं? जो दैवी सम्पत्तिको साथ लेकर उत्पन्न हुआ है, अर्थात् जो देवताओंकी विभूतिका योग्य पात्र है और भविष्यमें जिसका कल्याण होना निश्चित है, उस पुरुषके ये लक्षण होते हैं॥ 3॥

4
दम्भो दर्पोऽतिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च। अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्॥ 4॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

अथ इदानीम् आसुरी सम्पद् उच्यते—

हिन्दी

अब आगे आसुरी सम्पत्ति कही जाती है—

भाष्य
संस्कृत

दम्भो धर्मध्वजित्वम्, दर्पो धनस्वजनादि-निमित्त उत्सेकः, अतिमानः पूर्वोक्तः, क्रोधः च पारुष्यम् एव च परुषवचनं यथा काणं चक्षुष्मान्, विरूपं रूपवान् हीनाभिजनम् उत्तमाभिजन इत्यादि।

अज्ञानं च अविवेकज्ञानं मिथ्याप्रत्ययः कर्तव्याकर्तव्यादिविषयम् अभिजातस्य पार्थ। किम् अभिजातस्य इति आह—असुराणां सम्पद् आसुरी ताम् अभिजातस्य इत्यर्थः॥ 4॥

हिन्दी

दम्भ—धर्मध्वजीपन, दर्प—धन-परिवार आदिके निमित्तसे होनेवाला गर्व, अतिमान—पहले कही हुई अपनेमें अतिशय पूज्य भावना तथा क्रोध और पारुष्य यानी कठोर वचन जैसे (आक्षेपसे) कानेको अच्छे नेत्रोंवाला, कुरूपको रूपवान् और हीन जातिवालेको उत्तम जातिवाला बतलाना इत्यादि।

अज्ञान अर्थात् अविवेक—कर्तव्य और अकर्तव्यादिके विषयमें उलटा निश्चय करना। हे पार्थ! ये सब लक्षण, आसुरी सम्पत्तिको ग्रहण करके उत्पन्न हुए मनुष्यके हैं, अर्थात् जो असुरोंकी सम्पत्ति है उससे युक्त होकर उत्पन्न हुए मनुष्यके चिह्न हैं॥ 4॥

5
दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता। मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव॥ 5॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

अनयोः सम्पदोः कार्यम् उच्यते—

हिन्दी

इन दोनों सम्पत्तियोंका कार्य बतलाया जाता है—

भाष्य
संस्कृत

दैवी सम्पद् या सा विमोक्षाय संसारबन्धनात्, निबन्धाय नियतो बन्धो निबन्धः तदर्थम् आसुरी सम्पद् मता अभिप्रेता तथा राक्षसी।

तत्र एवम् उक्ते अर्जुनस्य अन्तर्गतं भावं किम् अहम् आसुरसम्पद्युक्तः किं वा दैवसम्पद्युक्त इति एवम् आलोचनारूपम् आलक्ष्य आह भगवान्—

मा शुचः शोकं मा कार्षीः सम्पदं दैवीम् अभिजातः असि अभिलक्ष्य जातः असि भावि-कल्याणः त्वम् असि इत्यर्थो हे पाण्डव॥ 5॥

हिन्दी

जो दैवी सम्पत्ति है, वह तो संसार-बन्धनसे मुक्त करनेके लिये है, तथा आसुरी और राक्षसी सम्पत्ति निःसन्देह बन्धनके लिये मानी गयी है। निश्चित बन्धनका नाम निबन्ध है, उसके लिये मानी गयी है।

इतना कहनेके उपरान्त अर्जुनके अन्तःकरणमें यह संशययुक्त विचार उत्पन्न हुआ देखकर कि “क्या मैं आसुरी सम्पत्तिसे युक्त हूँ अथवा दैवी सम्पत्तिसे” भगवान् बोले—

हे पाण्डव! शोक मत कर, तू दैवी सम्पत्तिको लेकर उत्पन्न हुआ है। अर्थात् भविष्यमें तेरा कल्याण होनेवाला है॥ 5॥

6
द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च। दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु॥ 6॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
भाष्य
संस्कृत

द्वौ द्विसङ्ख्याकौ भूतसर्गौ भूतानां मनुष्याणां सर्गौ सृष्टी भूतसर्गौ सृज्येते इति सर्गौ भूतानि एव सृज्यमानानि दैवासुरसम्पद्युक्तानि द्वौ भूतसर्गौ इति उच्येते।

“द्वयो ह प्राजापत्या देवाश्चासुराश्च” (बृह0 उ0 1। 3। 1) इति श्रुतेः लोके अस्मिन् संसारे इत्यर्थः। सर्वेषां द्वैविध्योपपत्तेः।

कौ तौ भूतसर्गौ इति, उच्येते प्रकृतौ एव दैव आसुर एव च।

उक्तयोः एव पुनरनुवादे प्रयोजनम् आह—

दैवी भूतसर्गः “अभयं

सत्त्वसंशुद्धिः” इत्यादिना विस्तरशो विस्तरप्रकारैः प्रोक्तः कथितो न तु आसुरो विस्तरशः अतः तत्परिवर्जनार्थम् आसुरं पार्थ मे मम वचनाद् उच्यमानं विस्तरशः शृणु अवधारय॥ 6॥

हिन्दी

इस संसारमें मनुष्योंकी दो सृष्टियाँ हैं। जिसकी रचना की जाय वह सृष्टि है, अतः दैवी सम्पत्ति और आसुरी सम्पत्तिसे युक्त रचे हुए प्राणी ही यहाँ भूत-सृष्टिके नामसे कहे जाते हैं।

“प्रजापतिकी दो संतानें हैं देव और असुर” इस श्रुतिसे भी यही बात सिद्ध होती है। क्योंकि इस संसारमें सभी प्राणियोंके दो प्रकार हो सकते हैं।

प्राणियोंकी वे दो प्रकारकी सृष्टियाँ कौन-सी हैं? इसपर कहते हैं कि इस प्रकरणमें कही हुई दैवी और आसुरी।

कही हुई दोनों सृष्टियोंका पुनः अनुवाद करनेका कारण बतलाते हैं—

दैवी सृष्टिका वर्णन तो “अभयं सत्त्वसंशुद्धिः” इत्यादि श्लोकोंद्वारा, विस्तारपूर्वक किया गया। परंतु आसुरी सृष्टिका वर्णन विस्तारसे नहीं हुआ। अतः हे पार्थ! उसका त्याग करनेके लिये, उस आसुरी सृष्टिको, तू मुझसे—मेरे वचनोंसे विस्तारपूर्वक सुन, यानी सुनकर निश्चय कर॥ 6॥

7
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः। न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते॥ 7॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

आ अध्यायपरिसमाप्तेः आसुरी सम्पत् प्राणिविशेषणत्वेन प्रदर्श्यते प्रत्यक्षीकरणेन च शक्यते अस्याः परिवर्जनं कर्तुम् इति—

हिन्दी

इस

अध्यायकी

समाप्तिपर्यन्त

प्राणियोंके विशेषणोंद्वारा आसुरी सम्पत्ति दिखलायी जाती है, क्योंकि प्रत्यक्ष कर लेनेसे ही उसका त्याग करना बन सकता है—

भाष्य
संस्कृत

प्रवृत्तिं च प्रवर्तनं यस्मिन् पुरुषार्थसाधने कर्तव्ये प्रवृत्तिः तां निवृत्तिं च तद्विपरीतां यस्माद् अनर्थहेतोः निवर्तितव्यं सा निवृत्तिः तां च जना आसुरा न विदुः न जानन्ति।

न केवलं प्रवृत्तिनिवृत्ती एव न विदुः न शौचं न अपि च आचारो न सत्यं तेषु विद्यते अशौचा अनाचारा मायाविनः अनृतवादिनो हि आसुराः॥ 7॥

हिन्दी

आसुरी स्वभाववाले मनुष्य, प्रवृत्तिको अर्थात् जिस किसी पुरुषार्थके साधनरूप कर्तव्यकार्यमें प्रवृत्त होना उचित है, उसमें प्रवृत्त होनेको और निवृत्तिको, अर्थात् उससे विपरीत जिस किसी अनर्थकारक कर्मसे निवृत्त होना उचित है, उससे निवृत्त होनेको भी नहीं जानते।

केवल प्रवृत्ति-निवृत्तिको नहीं जानते, इतना ही नहीं, उनमें न शुद्धि होती है, न सदाचार होता है और न सत्य ही होता है। यानी आसुरी प्रकृतिके मनुष्य अशुद्ध, दुराचारी, कपटी और मिथ्यावादी ही होते हैं॥ 7॥

8
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्। अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्॥ 8॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

किं च—

हिन्दी

तथा—

भाष्य
संस्कृत

असत्यं यथा वयम् अनृतप्रायाः तथा इदं जगत् सर्वम् असत्यम् अप्रतिष्ठं च न अस्य धर्माधर्मौ प्रतिष्ठा अतः अप्रतिष्ठं च इति ते आसुरा जना जगद् आहुः अनीश्वरं न च धर्माधर्म-सव्यपेक्षकः अस्य शासिता ईश्वरो विद्यते इति अतः अनीश्वरं जगद् आहुः।

किं च अपरस्परसम्भूतं कामप्रयुक्तयोः स्त्रीपुरुषयोः अन्योन्यसंयोगाद् जगत् सर्वं सम्भूतम्। किम् अन्यत् कामहैतुकं कामहेतुकम् एव कामहैतुकं किम् अन्यद् जगतः कारणं न किञ्चिद् अदृष्टं धर्माधर्मादि कारणान्तरं विद्यते जगतः काम एव प्राणिनां कारणम् इति लोकायतिकदृष्टिः इयम्॥ 8॥

हिन्दी

वे आसुर स्वभाववाले मनुष्य कहा करते हैं कि जैसे हम झूठसे भरे हुए हैं, वैसे ही यह सारा संसार भी झूठा और प्रतिष्ठारहित है, अर्थात् धर्म-अधर्म आदि इसका कोई आधार नहीं है, अतः निराधार है तथा अनीश्वर है, अर्थात् पुण्य-पापकी अपेक्षासे इसका शासन करनेवाला कोई स्वामी नहीं है, अतः यह जगत् बिना ईश्वरका है।

तथा कामसे प्रेरित हुए स्त्री-पुरुषोंका आपसमें संयोग हो जानेसे ही सारा जगत् उत्पन्न हुआ है, अतः इस जगत्का कारण काम ही है, दूसरा और क्या हो सकता है? अर्थात् (इसका) धर्म-अधर्मादि कोई दूसरा अदृष्ट कारण नहीं है, केवल काम ही प्राणियोंका कारण है। यह लोकायतिकोंकी* दृष्टि है॥ 8॥

9
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः। प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः॥ 9॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
भाष्य
संस्कृत

एतां दृष्टिम् अवष्टभ्य आश्रित्य नष्टात्मानो नष्टस्वभावा विभ्रष्टपरलोकसाधना अल्पबुद्धयो विषयविषया अल्पा एव बुद्धिः येषां ते अल्पबुद्धयः प्रभवन्ति उद्भवन्ति उग्रकर्माणः क्रूरकर्माणो

हिंसात्मकाः

क्षयाय

जगतः प्रभवन्ति इति सम्बन्धः। जगतः अहिताः शत्रव इत्यर्थः॥ 9॥

हिन्दी

इस दृष्टिका अवलम्बन—आश्रय लेकर जिनका स्वभाव नष्ट हो गया है, जो परलोकसाधनसे भ्रष्ट हो गये हैं, जो अल्पबुद्धि हैं—जिनकी बुद्धि केवल भोगोंको ही विषय करनेवाली है, ऐसे वे अल्पबुद्धि, उग्रकर्मा—क्रूर कर्म करनेवाले, हिंसापरायण संसारके शत्रु, संसारका नाश करनेके लिये ही उत्पन्न होते हैं॥ 9॥

10
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः। मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ॥ 10॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

ते च—

हिन्दी

तथा वे—

भाष्य
संस्कृत

कामम् इच्छाविशेषम् आश्रित्य अवष्टभ्य दुष्पूरम् अशक्यपूरणं दम्भमानमदान्विता दम्भः च मानः च मदः च दम्भमानमदाः तैः अन्विता दम्भमानमदान्विता मोहाद् अविवेकतो गृहीत्वा उपादाय असद्ग्राहान् अशुभनिश्चयान् प्रवर्तन्ते लोके अशुचिव्रता अशुचीनि व्रतानि येषां ते अशुचिव्रताः॥ 10॥

हिन्दी

कभी पूर्ण न की जा सकनेवाली दुष्पूर कामनाका—इच्छाविशेषका

आश्रय—अवलम्बन कर पाखण्ड, मान और मदसे युक्त हुए, अशुद्धाचारी— जिनके आचरण बहुत ही बुरे हैं, ऐसे मनुष्य मोहसे—अज्ञानसे मिथ्या आग्रहोंको, अर्थात् अशुभ सिद्धान्तोंको ग्रहण करके—स्वीकार करके संसारमें बर्तते हैं॥ 10॥

* शरीरको ही आत्मा माननेवाले एक सम्प्रदायविशेषका नाम “लोकायतिक” है।
11
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः। कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः॥ 11॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

किं च—

हिन्दी

तथा—

भाष्य
संस्कृत

चिन्ताम् अपरिमेयां च न परिमातुं शक्यते यस्याः चिन्ताया इयत्ता सा अपरिमेया ताम् अपरिमेयां प्रलयान्तां मरणान्ताम् उपाश्रिताः सदा चिन्तापरा इत्यर्थः कामोपभोगपरमाः कामयन्ते इति कामाः शब्दादयः तदुपभोगपरमाः, अयम् एव परमः पुरुषार्थो यः कामोपभोग इति एवं निश्चितात्मान एतावद् इति निश्चिताः॥ 11॥

हिन्दी

जिसकी इयत्ता न जानी जा सके, ऐसी अपरिमेय— अपार, प्रलयतक—मरणपर्यन्त रहनेवाली चिन्ताके आश्रित हुए, अर्थात् सदा चिन्ताग्रस्त हुए, तथा कामोपभोगके परायण—जिनकी कामना की जाय वे शब्दादि विषय काम हैं, उनके उपभोगमें तत्पर हुए— तथा विषयोंका उपभोग करना, बस यही परम पुरुषार्थ है, ऐसा निश्चय रखनेवाले॥ 11॥

12
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः। ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्॥ 12॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
भाष्य
संस्कृत

आशापाशशतैः आशा एव पाशाः तच्छतैः आशापाशशतैः बद्धा नियन्त्रिता सन्तः सर्वत आकृष्यमाणाः कामक्रोधपरायणाः कामक्रोधौ परम्

अयनं

पर

आश्रयो

येषां

ते कामक्रोधपरायणाः, ईहन्ते चेष्टन्ते कामभोगार्थं कामभोगप्रयोजनाय न धर्मार्थम् अन्यायेन अर्थसञ्चयान्

अर्थप्रचयान्

अन्यायेन परस्वापहरणादिना इत्यर्थः॥ 12॥

हिन्दी

तथा सैकड़ों आशारूप पाशोंसे बँधे हुए—जकड़े हुए, सब ओरसे खींचे जाते हुए, काम-क्रोधके परायण हुए अर्थात् काम-क्रोध ही जिनका परम अयन— आश्रय है, ऐसे काम-क्रोधपरायण पुरुष, धर्मके लिये नहीं, बल्कि भोग्य वस्तुओंका भोग करनेके लिये अन्यायपूर्वक अर्थात् दूसरेका सत्त्व हरण करना आदि अनेक पापमय युक्तियोंद्वारा धन-समुदायको इकट्ठा करनेकी चेष्टा किया करते हैं॥ 12॥

13
इदमद्य मया लब्धमिदं प्राप्स्ये मनोरथम्। इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्॥ 13॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

ईदृशः च तेषाम् अभिप्रायः—

हिन्दी

तथा उनका अभिप्राय ऐसा होता है कि—

भाष्य
संस्कृत

इदं द्रव्यम् अद्य इदानीं मया लब्धम् इदम् अन्यत् प्राप्स्ये मनोरथम् मनस्तुष्टिकरम् इदं च अस्ति इदम् अपि मे भविष्यति आगामिनि संवत्सरे पुनः धनं तेन अहं धनी विख्यातो भविष्यामि॥ 13॥

हिन्दी

आज इस समय तो मैंने यह द्रव्य प्राप्त किया है तथा अमुक मनोरथ—मनको संतुष्ट करनेवाला पदार्थ और प्राप्त करूँगा। इतना धन तो मेरे पास है और यह इतना धन मेरे पास अगले वर्षमें फिर हो जायगा, उससे मैं धनवान् विख्यात हो जाऊँगा॥ 13॥

14
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि। ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी॥ 14॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
भाष्य
संस्कृत

असौ देवदत्तनामा मया हतो दुर्जयः शत्रुः, हनिष्ये च अन्यान् वराकान् अपरान् अपि किम् एते करिष्यन्ति तपस्विनः सर्वथा अपि न अस्ति मत्तुल्य ईश्वरः अहम् अहं भोगी सर्वप्रकारेण च सिद्धः अहं सम्पन्नः पुत्रैः पौत्रैः नप्तृभिः न केवलं मानुषः अहं बलवान् सुखी च अहम् एव अन्ये तु भूमिभाराय अवतीर्णाः॥ 14॥

हिन्दी

अमुक देवदत्त नामक दुर्जय शत्रु तो मेरे द्वारा मारा जा चुका, अब दूसरे पामर निर्बल शत्रुओंको भी मैं मार डालूँगा, यह बेचारे गरीब मेरा क्या करेंगे जो किसी तरह भी मेरे समान नहीं हैं। मैं ईश्वर हूँ, भोगी हूँ, सब प्रकारसे सिद्ध हूँ तथा पुत्र-पौत्र और नातियोंसे सम्पन्न हूँ। मैं केवल साधारण मनुष्य ही नहीं हूँ, बल्कि बड़ा बलवान् और सुखी भी मैं ही हूँ, दूसरे सब तो भूमिपर भाररूप ही उत्पन्न हुए हैं॥ 14॥

15
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया। यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः॥ 15॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
भाष्य
संस्कृत

आढ्यो धनेन अभिजनेन अभिजनवान् सप्त-पुरुषं श्रोत्रियत्वादिसम्पन्नः तेन अपि न मम तुल्यः अस्ति कश्चित् कः अन्यः अस्ति सदृशः तुल्यो मया किं च यक्ष्ये यागेन अपि अन्यान् अभिभविष्यामि दास्यामि नटादिभ्यो मोदिष्ये हर्षं च अतिशयं प्राप्स्यामि इति एवम् अज्ञानेन विमोहिता अज्ञानविमोहिता विविधम् अविवेकभावम् आपन्नाः॥ 15॥

हिन्दी

मैं धनसे सम्पन्न हूँ और वंशकी अपेक्षासे अत्यन्त कुलीन हूँ, अर्थात् सात पीढि़योंसे श्रोत्रिय आदि गुणोंसे सम्पन्न हूँ। सुतरां धन और कुलमें भी मेरे समान दूसरा कौन है। अर्थात् कोई नहीं है। मैं यज्ञ करूँगा अर्थात् यज्ञद्वारा भी दूसरोंका अपमान करूँगा, नट आदिको धन दूँगा और मोद—अतिशय हर्षको प्राप्त होऊँगा; इस प्रकार वे मनुष्य अज्ञानसे मोहित अर्थात् नाना प्रकारकी अविवेकभावनासे युक्त होते हैं॥ 15॥

16
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः। प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ॥ 16॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
भाष्य
संस्कृत

अनेकचित्तविभ्रान्ता उक्त प्रकारैः अनेकैः चित्तैः विविधं भ्रान्ता अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृता मोहः अविवेकः अज्ञानं तद् एव जालम् इव आवरणात्मकत्वात् तेन समावृत्ताः प्रसक्ताः कामभोगेषु तत्र एव निषण्णाः सन्तः तेन उपचितकल्मषाः पतन्ति नरके अशुचौ वैतरण्यादौ॥ 16॥

हिन्दी

उपर्युक्त अनेक प्रकारके विचारोंसे भ्रान्तचित्त हुए और मोहरूप जालमें फँसे हुए, अर्थात् अविवेक ही मोह है, वह जालकी भाँति फँसानेवाला होनेसे जाल है, उसमें फँसे हुए तथा विषय-भोगोंमें अत्यन्त आसक्त हुए—उन्हींमें गहरे डूबे हुए मनुष्य उन भोगोंके द्वारा पापोंका सञ्चय करके वैतरणी आदि अशुद्ध नरकोंमें गिरते हैं॥ 16॥

17
आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः। यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्॥ 17॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
भाष्य
संस्कृत

आत्मसम्भाविताः सर्वगुणविशिष्टतया आत्मना एव सम्भाविता आत्मसम्भाविता न साधुभिः, स्तब्धा अप्रणतात्मानो धनमानमदान्विता धन-निमित्तो मानो मदः च ताभ्यां धनमान-मदाभ्याम् अन्विता यजन्ते नामयज्ञैः नाममात्रैः यज्ञैः ते दम्भेन धर्मध्वजितया अविधिपूर्वकं विहिताङ्गेतिकर्तव्यतारहितैः॥ 17॥

हिन्दी

और वे अपने-आपको सर्वगुणसम्पन्न मानकर, आप ही अपनेको बड़ा माननेवाले, साधु पुरुषोंद्वारा श्रेष्ठ न माने हुए, स्तब्ध—विनयरहित, धनमान-मदान्वित—धनहेतुक मान और मदसे युक्त पुरुष पाखण्डसे अर्थात् धर्मध्वजीपनसे, अविधिपूर्वक— विहित अंगकी कर्तव्यताके ज्ञानसे रहित केवल नाममात्रके यज्ञोंद्वारा पूजन किया करते हैं॥ 17॥

18
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः। मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः॥ 18॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
भाष्य
संस्कृत

अहङ्कारम् अहङ्करणम् अहङ्कारो विद्यमानैः अविद्यमानैः च गुणैः आत्मनि अध्यारोपितैः विशिष्टम् आत्मानम् अहम् इति मन्यते सः अहङ्कारः अविद्याख्यः कष्टतमः सर्वदोषाणां मूलं सर्वानर्थप्रवृत्तीनां च तथा बलं पराभिभव-निमित्तं कामरागान्वितं दर्पं दर्पो नाम यस्य उद्भवे धर्मम् अतिक्रामति सः अयम् अन्तः-करणाश्रयो दोषविशेषः।

कामं स्त्र्यादिविषयम् क्रोधम् अनिष्टविषयम् एतान् अन्यान् च महतो दोषान् संश्रिताः।

किं च ते माम् ईश्वरम् आत्मपरदेहेषु स्वदेहे परदेहेषु च तद्बुद्धिकर्मसाक्षिभूतं मां प्रद्विषन्तो

मच्छासनातिवर्तित्वं

प्रद्वेषः

तं कुर्वन्तः अभ्यसूयकाः सन्मार्गस्थानां गुणेषु असह-मानाः॥ 18॥

हिन्दी

अहंकार—“हम-हम” करनेका नाम अहंकार है, जिसके द्वारा अपनेमें आरोपित किये हुए विद्यमान और अविद्यमान गुणोंसे अपनेको युक्त मानकर मनुष्य “हम हैं” ऐसा मानता है, उसे अहंकार कहते हैं। यह अविद्या नामका बड़ा कठिन दोष समस्त दोषोंका और समस्त अनर्थमय प्रवृत्तियोंका मूल कारण है। कामना और आसक्तिसे युक्त, दूसरेका पराभव करनेके लिये होनेवाला बल, दर्प—जिसके उत्पन्न होनेपर मनुष्य धर्मको अतिक्रमण कर जाता है, अन्तःकरणके आश्रित उस दोषविशेषका नाम दर्प है।

तथा स्त्री आदिके विषयमें होनेवाला काम और किसी प्रकारका अनिष्ट होनेसे होनेवाला क्रोध, इन सब दोषोंको तथा अन्यान्य महान् दोषोंको भी अवलम्बन करनेवाले होते हैं।

इसके सिवा वे अपने और दूसरोंके शरीरमें स्थित, उनकी बुद्धि और कर्मके साक्षी, मुझ ईश्वरसे द्वेष करनेवाले होते हैं—मेरी आज्ञाको उल्लङ्घन करके चलना ही मुझसे द्वेष करना है, वे वैसा करनेवाले हैं और सन्मार्गमें स्थित पुरुषोंके गुणोंको सहन न करके, उनकी निन्दा करनेवाले होते हैं॥ 18॥

19
तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्। क्षिपाम्यजस्त्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु॥ 19॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
भाष्य
संस्कृत

तान् अहं सर्वान् सन्मार्गप्रतिपक्षभूतान् साधुद्वेषिणो द्विषतः च मां क्रूरान् संसारेषु एव नरकसंसरणमार्गेषु नराधमान् अधर्मदोषवत्त्वात् क्षिपामि प्रक्षिपामि अजस्त्रं सन्ततम् अशुभान् अशुभकर्मकारिण आसुरीषु एव क्रूरकर्मप्रायासु व्याघ्रसिंहादियोनिषु क्षिपामि इति अनेन सम्बन्धः॥ 19॥

हिन्दी

सन्मार्गके प्रतिपक्षी और मेरे तथा साधुपुरुषोंके साथ द्वेष करनेवाले उन सब अशुभकर्मकारी क्रूर नराधमोंको, मैं बारंबार संसारमें—नरक-प्राप्तिके मार्गमें जो प्रायः क्रूर कर्म करनेवाली व्याघ्र-सिंह आदि आसुरी योनियाँ हैं उनमें ही सदा गिराता हूँ; क्योंकि वे पापादि दोषोंसे युक्त हैं। “क्षिपामि” इस क्रियापदका, “योनिषु” के साथ सम्बन्ध है॥ 19॥

20
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि। मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्॥ 20॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
भाष्य
संस्कृत

आसुरीं योनिम् आपन्नाः प्रतिपन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि अविवेकिनः प्रतिजन्म तमोबहुलासु एव योनिषु जायमाना अधो गच्छन्तो मूढा माम् ईश्वरम् अप्राप्य अनासाद्य एव हे कौन्तेय ततः तस्मात् अपि यान्ति अधमां निकृष्टतमां गतिम्।

माम् अप्राप्य एव इति न मत्प्राप्तौ काचिद् अपि आशङ्का अस्ति अतो मच्छिष्टसाधुमार्गम् अप्राप्य इत्यर्थः॥ 20॥

हिन्दी

वे मूढ—अविवेकीजन, जन्म-जन्ममें यानी प्रत्येक जन्ममें आसुरी योनिको पाते हुए अर्थात् जिनमें तमो-गुणकी बहुलता है, ऐसी योनियोंमें जन्मते हुए, नीचे गिरते-गिरते मुझ ईश्वरको न पाकर, उन पूर्वप्राप्त योनियों-की अपेक्षा भी अधिक अधमगतिको प्राप्त होते हैं।

“मुझे प्राप्त न होकर” ऐसा कहनेका तात्पर्य यह है कि मेरे द्वारा कहे हुए श्रेष्ठ मार्गको भी न पाकर, क्योंकि मेरी प्राप्तिकी तो उनके लिये कोई आशङ्का ही नहीं है॥ 20॥

21
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥ 21॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

सर्वस्या आसुर्याः सम्पदः सङ्क्षेपः अयम् उच्यते, यस्मिन् त्रिविधे सर्व आसुरसम्पद्भेदः अनन्तः अपि अन्तर्भवति यत्परिहारेण परिहृतः च भवति, यद् मूल सर्वस्य अनर्थस्य तद् एतद् उच्यते—

हिन्दी

अब यह समस्त आसुरी सम्पत्तिका संक्षेप कहा जाता है। जिन (कामादि) तीन भेदोंमें, आसुरी सम्पत्तिके अनन्त भेद होनेपर भी सबका अन्तर्भाव हो जाता है, जिन तीनोंका नाश करनेसे सब दोषोंका नाश करना हो जाता है और जो सब अनर्थोंके मूल कारण हैं, उनका वर्णन किया जाता है—

भाष्य
संस्कृत

त्रिविधं त्रिप्रकारं नरकस्य प्राप्तौ इदं द्वारं नाशनम् आत्मनो यद् द्वारं प्रविशन् एव नश्यति आत्मा कस्मैचित् पुरुषार्थाय योग्यो न भवति इति एतद् अत उच्यते द्वारं नाशनम् आत्मनः इति।

किं तत्, कामः क्रोधः तथा लोभः तस्माद् एतत् त्रयं त्यजेत्। यत एतद् द्वारं नाशनम् आत्मनः तस्मात् कामादित्रयम् एतत् त्यजेत् त्यागस्तुतिः इयम्॥ 21॥

हिन्दी

आत्माका नाश करनेवाले, ये तीन प्रकारके दोष, नरकप्राप्तिके द्वार हैं। इनमें प्रवेश करनेमात्रसे ही आत्मा नष्ट हो जाता है, अर्थात् किसी पुरुषार्थके योग्य नहीं रहता। इसलिये ये तीनों आत्माका नाश करनेवाले द्वार कहलाते हैं।

वे कौन हैं? काम, क्रोध और लोभ। सुतरां इन तीनोंका त्याग कर देना चाहिये। क्योंकि ये काम आदि तीनों नरकद्वार आत्माका नाश करनेवाले हैं, इसलिये इनका त्याग कर देना चाहिये। यह त्यागकी स्तुति है॥ 21॥

22
एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः। आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्॥ 22॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
भाष्य
संस्कृत

एतैः विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैः तमसो नरकस्य दुःखमोहात्मकस्य द्वाराणि कामादयः तैः एतैः त्रिभिः विमुक्तो नर आचरति अनुतिष्ठति। किम्, आत्मनः श्रेयो यत्प्रतिबद्धः पूर्वं नाचरति तदपगमाद् आचरति ततः तदाचरणाद् याति परां गतिं मोक्षम् अपि इति॥ 22॥

हिन्दी

हे कुन्तीपुत्र! ये काम आदि दुःख और मोहरूप अन्धकारमय नरकके द्वार हैं इन तीनों अवगुणोंसे छूटा हुआ मनुष्य आचरण करता है—साधन करता है। क्या साधन करता है? आत्मकल्याणका साधन, पहले जिन कामादिके वशमें होनेसे नहीं करता था,अब उनका नाश हो जानेसे करता है, और उस साधनसे (वह) परमगति-को, अर्थात् मोक्षको भी प्राप्त कर लेता है॥ 22॥

23
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः। न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥ 23॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

सर्वस्य एतस्य आसुरसम्पत्परिवर्जनस्य श्रेय-आचरणस्य च शास्त्रं कारणम्, शास्त्रप्रमाणाद् उभयं शक्यं कर्तुं न अन्यथा अतः—

हिन्दी

इस समस्त आसुरी सम्पत्तिके त्यागका और कल्याणमय आचरणोंका, मूल कारण शास्त्र है, शास्त्रप्रमाणसे ही दोनों किये जा सकते हैं, अन्यथा नहीं, अतः—

भाष्य
संस्कृत

यः शास्त्रविधिं कर्तव्याकर्तव्यज्ञानकारणं विधिप्रतिषेधाख्यम् उत्सृज्य त्यक्त्वा वर्तते कामकारतः कामप्रयुक्तः सन् न स सिद्धिं पुरुषार्थयोग्यताम् अवाप्नोति। न अपि अस्मिन् लोके सुखम्, न अपि परां प्रकृष्टां गतिं स्वर्गं मोक्षं वा॥ 23॥

हिन्दी

जो मनुष्य शास्त्रके विधानको, अर्थात् कर्तव्य-अकर्तव्यके ज्ञानका कारण जो विधि-निषेध-बोधक आदेश है उसको, छोड़कर कामनासे प्रयुक्त हुआ बर्तता है, वह न तो सिद्धिको—पुरुषार्थकी योग्यताको पाता है, न इस लोकमें सुख पाता है और न परम गतिको अर्थात् स्वर्ग या मोक्षको ही पाता है॥ 23॥

24
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥ 24॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
भाष्य
संस्कृत

तस्मात् शास्त्रं प्रमाणं ज्ञानसाधनं ते तव कार्याकार्यव्यवस्थितौ कर्तव्याकर्तव्यव्यवस्थायाम् अतो ज्ञात्वा बुद्ध्वा शास्त्रविधानोक्तं विधिः विधानं शास्त्रेण विधानं शास्त्रविधानं कुर्याद् न कुर्याद् इति एवं लक्षणं तेन उक्तं स्वकर्म यत् तत् कर्तुम् इह अर्हसि। इह इति कर्माधिकारभूमिप्रदर्शनार्थम् इति॥ 24॥

हिन्दी

सुतरां कर्तव्य और अकर्तव्यकी व्यवस्थामें तेरे लिये शास्त्र ही प्रमाण है, अर्थात् ज्ञान प्राप्त करनेका साधन है। अतः शास्त्र-विधानसे कही हुई बातको समझकर यानी आज्ञाका नाम विधान है। शास्त्रद्वारा जो ऐसी आज्ञा दी जाय कि “यह कार्य कर, यह मत कर” वह शास्त्र-विधान है, उससे बताये हुए स्वकर्मको जानकर तुझे इस कर्मक्षेत्रमें कार्य करना उचित है। “इह” शब्द जिस भूमिमें कर्मोंका अधिकार है उसका लक्ष्य करवानेवाला है॥ 24॥

16.1श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्य