दैवासुरसम्पद्विभागयोग
सम्बन्ध—सातवें अध्यायके पन्द्रहवें श्लोकमें तथा नवें अध्यायके ग्यारहवें और बारहवें श्लोकोंमें भगवान्ने कहा था कि “आसुरी और राक्षसी प्रकृतिको धारण करनेवाले मूढ मेरा भजन नहीं करते, वरं मेरा तिरस्कार करते हैं।” तथा नवें अध्यायके तेरहवें और चौदहवें श्लोकोंमें कहा कि “दैवी प्रकृतिसे युक्त महात्माजन मुझे सब भूतोंका आदि और अविनाशी समझकर अनन्य प्रेमके साथ सब प्रकारसे निरन्तर मेरा भजन करते हैं।” परंतु दूसरा प्रसंग चलता रहनेके कारण वहाँ दैवी प्रकृति और आसुरी प्रकृतिके लक्षणोंका वर्णन नहीं किया जा सका। फिर पंद्रहवें अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि “जो ज्ञानी महात्मा मुझे “पुरुषोत्तम” जानते हैं, वे सब प्रकारसे मेरा भजन करते हैं।” इसपर स्वाभाविक ही भगवान्को पुरुषोत्तम जानकर सर्वभावसे उनका भजन करनेवाले दैवी प्रकृतियुक्त महात्मा पुरुषोंके और उनका भजन न करनेवाले आसुरी प्रकृतियुक्त अज्ञानी मनुष्योंके क्या-क्या लक्षण हैं?—यह जाननेकी इच्छा होती है। अतएव अब भगवान् दोनोंके लक्षण और स्वभावका विस्तारपूर्वक वर्णन करनेके लिये सोलहवाँ अध्याय आरम्भ करते हैं। इसमें पहले तीन श्लोकोंद्वारा दैवीसम्पद्से युक्त सात्त्विक पुरुषोंके स्वाभाविक लक्षणोंका विस्तारपूर्वक वर्णन किया जाता है—
सम्बन्ध—इस प्रकार धारण करनेके योग्य दैवीसम्पद्से युक्त पुरुषके लक्षणोंका वर्णन करके अब त्याग करनेयोग्य आसुरीसम्पद्से युक्त पुरुषके लक्षण संक्षेपमें कहे जाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार दैवीसम्पद् और आसुरीसम्पद्से युक्त पुरुषोंके लक्षणोंका वर्णन करके अब भगवान् दोनों सम्पदाओंका फल बतलाते हुए अर्जुनको दैवी-सम्पदासे युक्त बतलाकर आश्वासन देते हैं—
सम्बन्ध—इस अध्यायके प्रारम्भमें और इसके पूर्व भी दैवी-सम्पदाका विस्तारसे वर्णन किया गया, परंतु आसुरी-सम्पदाका वर्णन अबतक बहुत संक्षेपसे ही हुआ। अतएव आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्योंके स्वभाव और आचार-व्यवहारका विस्तारपूर्वक वर्णन करनेके लिये अब भगवान् उसकी प्रस्तावना करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्यसमुदायके लक्षण सुननेके लिये अर्जुनको सावधान करके अब भगवान् उनका वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—आसुर-स्वभाववालोंमें विवेक, शौच और सदाचार आदिका अभाव बतलाकर अब उनके नास्तिकभावका वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—ऐसे नास्तिक सिद्धान्तके माननेवालोंके स्वभाव और आचरण कैसे होते हैं? इस जिज्ञासापर अब भगवान् अगले चार श्लोकोंमें उनके लक्षणोंका वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—पिछले चार श्लोकोंमें आसुर-स्वभाववाले मनुष्योंके लक्षण और आचरण बतलाकर अब अगले चार श्लोकोंमें उनके “अहंता”, “ममता” और “मोह” युक्त संकल्पोंका निरूपण करते हुए उनकी दुर्गतिका वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—पंद्रहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा था कि वे लोग “यज्ञ करूँगा” ऐसा कहते हैं; अतः अगले श्लोकमें उनके यज्ञका स्वरूप बतलाया जाता है—
सम्बन्ध—इस प्रकार आसुर-स्वभाववाले मनुष्योंके यज्ञका स्वरूप बतलाकर अब उनकी दुर्गतिके कारणरूप स्वभावका वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार सातवेंसे अठारहवें श्लोकतक आसुरी स्वभाववालोंके दुर्गुण और दुराचार आदिका वर्णन करके अब उन दुर्गुण-दुराचारोंमें त्याज्य-बुद्धि करानेके लिये अगले दो श्लोकोंमें भगवान् वैसे लोगोंकी घोर निन्दा करते हुए उनकी दुर्गतिका वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—आसुर-स्वभाववाले मनुष्योंको लगातार आसुरी योनियोंके और घोर नरकोंके प्राप्त होनेकी बात सुनकर यह जिज्ञासा हो सकती है कि उनके लिये इस दुर्गतिसे बचकर परमगतिको प्राप्त करनेका क्या उपाय है? इसपर अब दो श्लोकोंमें समस्त दुर्गतियोंके प्रधान कारणरूप आसुरी सम्पत्तिके त्रिविध दोषोंके त्याग करनेकी बात कहते हुए भगवान् परमगतिकी प्राप्तिका उपाय बतलाते हैं—
सम्बन्ध—जो उपर्युक्त दैवीसम्पदाका आचरण न करके अपनी मान्यताके अनुसार कर्म करता है वह परमगतिको प्राप्त होता है या नहीं? इसपर कहते हैं—
सम्बन्ध—शास्त्रविधिको त्यागकर किये जानेवाले मनमाने कर्म निष्फल होते हैं, यह बात सुनकर यह जिज्ञासा हो सकती है कि ऐसी स्थितिमें क्या करना चाहिये? इसपर कहते हैं—