ग्रन्थ
17श्रद्धात्रयविभागयोग

श्रद्धात्रयविभागयोग

Shraddhatraya-Vibhaga-Yoga
The Threefold Faith
28 verses · 28 printed blockspp. 208217 · Sadharan Bhashatikaसाधारण भाषाटीका 28 · साधक-संजीवनी 27 · श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्य 28 · श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीका 28
1अर्जुन
अर्जुन उवाच ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः। तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
अर्जुन बोले—हे कृष्ण! जो मनुष्य शास्त्रविधिको त्यागकर श्रद्धासे युक्त हुए देवादिका पूजन करते हैं, उनकी स्थिति फिर कौन-सी है? सात्त्विकी है अथवा राजसी किंवा तामसी?॥ 1॥
2श्रीभगवान्
श्रीभगवान् उवाच
श्रीभगवानुवाच त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा। सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
श्रीभगवान् बोले—मनुष्योंकी वह शास्त्रीय संस्कारोंसे रहित केवल स्वभावसे उत्पन्न श्रद्धा* सात्त्विकी और राजसी तथा तामसी—ऐसे तीनों प्रकारकी ही होती है। उसको तू मुझसे सुन॥ 2॥
* अनन्त जन्मोंमें किये हुए कर्मोंके सञ्चित संस्कारसे उत्पन्न
हुई श्रद्धा “स्वभावजा” श्रद्धा कही जाती है।
3श्रीभगवान्
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
हे भारत! सभी मनुष्योंकी श्रद्धा उनके अन्तः- करणके अनुरूप होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिये जो पुरुष जैसी श्रद्धावाला है, वह स्वयं भी वही है॥ 3॥
4श्रीभगवान्
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः। प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
सात्त्विक पुरुष देवोंको पूजते हैं, राजस पुरुष यक्ष और राक्षसोंको तथा अन्य जो तामस मनुष्य हैं, वे प्रेत और भूतगणोंको पूजते हैं॥ 4॥
5श्रीभगवान्
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः। दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
जो मनुष्य शास्त्रविधिसे रहित केवल मनःकल्पित घोर तपको तपते हैं तथा दम्भ और अहंकारसे युक्त एवं कामना, आसक्ति और बलके अभिमानसे भी युक्त हैं॥ 5॥
6श्रीभगवान्
कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः। मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
जो शरीररूपसे स्थित भूतसमुदायको और अन्तः- करणमें स्थित मुझ परमात्माको भी कृश करनेवाले हैं1, उन अज्ञानियोंको तू आसुर-स्वभाववाले जान॥ 6॥
7श्रीभगवान्
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः। यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
भोजन भी सबको अपनी-अपनी प्रकृतिके अनुसार तीन प्रकारका प्रिय होता है। और वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी तीन-तीन प्रकारके होते हैं। उनके इस पृथक् -पृथक् भेदको तू मुझसे सुन॥ 7॥
8श्रीभगवान्
आयुःसत्त्वबलारोग्य- सुखप्रीतिविवर्धनाः । रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या- आहाराः सात्त्विकप्रियाः॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीतिको बढ़ाने- वाले, रसयुक्त, चिकने और स्थिर रहनेवाले2 तथा स्वभावसे ही मनको प्रिय—ऐसे आहार अर्थात् भोजन करनेके पदार्थ सात्त्विक पुरुषको प्रिय होते हैं॥ 8॥
1. शास्त्रसे विरुद्ध उपवासादि घोर आचरणोंद्वारा शरीरको
सुखाना एवं भगवान्के अंशस्वरूप जीवात्माको क्लेश देना,
भूतसमुदायको और अन्तर्यामी परमात्माको “कृश करना” है।
2. जिस भोजनका सार शरीरमें बहुत कालतक रहता है,
उसको “स्थिर रहनेवाला” कहते हैं।
9श्रीभगवान्
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः। आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
कड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, बहुत गरम, तीखे, रूखे, दाहकारक और दुःख, चिन्ता तथा रोगोंको उत्पन्न करनेवाले आहार अर्थात् भोजन करनेके पदार्थ राजस पुरुषको प्रिय होते हैं॥ 9॥
10श्रीभगवान्
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्। उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गन्धयुक्त, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो अपवित्र भी है, वह भोजन तामस पुरुषको प्रिय होता है॥ 10॥
11श्रीभगवान्
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते। यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
जो शास्त्रविधिसे नियत, यज्ञ करना ही कर्तव्य है—इस प्रकार मनको समाधान करके, फल न चाहने- वाले पुरुषोंद्वारा किया जाता है, वह सात्त्विक है॥ 11॥
12श्रीभगवान्
अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्। इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
परन्तु हे अर्जुन! केवल दम्भाचरणके लिये अथवा फलको भी दृष्टिमें रखकर जो यज्ञ किया जाता है, उस यज्ञको तू राजस जान॥ 12॥
13श्रीभगवान्
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्। श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
शास्त्रविधिसे हीन, अन्नदानसे रहित, बिना मन्त्रोंके, बिना दक्षिणाके और बिना श्रद्धाके किये जानेवाले यज्ञको तामस यज्ञ कहते हैं॥ 13॥
14श्रीभगवान्
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्। ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
देवता, ब्राह्मण, गुरु1 और ज्ञानीजनोंका पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा—यह शरीर-सम्बन्धी तप कहा जाता है॥ 14॥
15श्रीभगवान्
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
जो उद्वेग न करनेवाला, प्रिय और हितकारक एवं यथार्थ भाषण है2 तथा जो वेद-शास्त्रोंके पठनका एवं परमेश्वरके नाम-जपका अभ्यास है— वही वाणी-सम्बन्धी तप कहा जाता है॥ 15॥
16श्रीभगवान्
मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः। भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
मनकी प्रसन्नता, शान्तभाव, भगवच्चिन्तन करनेका स्वभाव, मनका निग्रह और अन्तःकरणके भावोंकी भलीभाँति पवित्रता—इस प्रकार यह मनसम्बन्धी तप कहा जाता है॥ 16॥
1. यहाँ “गुरु” शब्दसे माता, पिता, आचार्य और वृद्ध एवं अपनेसे
जो किसी प्रकार भी बड़े हों, उन सबको समझना चाहिये।
2. मन और इन्द्रियोंद्वारा जैसा अनुभव किया हो, ठीक वैसा
ही कहनेका नाम “यथार्थ भाषण” है।
17श्रीभगवान्
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः। अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
फलको न चाहनेवाले योगी पुरुषोंद्वारा परम श्रद्धासे किये हुए उस पूर्वोक्त तीन प्रकारके तपको सात्त्विक कहते हैं॥ 17॥
18श्रीभगवान्
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्। क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
जो तप सत्कार, मान और पूजाके लिये तथा अन्य किसी स्वार्थके लिये भी स्वभावसे या पाखण्डसे किया जाता है, वह अनिश्चित* एवं क्षणिक फलवाला तप यहाँ राजस कहा गया है॥ 18॥
19श्रीभगवान्
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः। परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
जो तप मूढ़तापूर्वक हठसे, मन, वाणी और शरीरकी पीड़ाके सहित अथवा दूसरेका अनिष्ट करनेके लिये किया जाता है—वह तप तामस कहा गया है॥ 19॥
* “अनिश्चित फलवाला” उसको कहते हैं कि जिसका फल
होने-न-होनेमें शंका हो।
20श्रीभगवान्
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे। देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
दान देना ही कर्तव्य है—ऐसे भावसे जो दान देश1 तथा काल2 और पात्रके3 प्राप्त होनेपर उपकार न करनेवालेके प्रति दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है॥ 20॥
21श्रीभगवान्
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः। दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
किन्तु जो दान क्लेशपूर्वक4 तथा प्रत्युपकारके प्रयोजनसे अथवा फलको दृष्टिमें* रखकर फिर दिया जाता है, वह दान राजस कहा गया है॥ 21॥
1.-2. जिस देश-कालमें जिस वस्तुका अभाव हो, वही देश-
काल, उस वस्तुद्वारा प्राणियोंकी सेवा करनेके लिये योग्य समझा
जाता है।
3. भूखे, अनाथ, दुःखी, रोगी और असमर्थ तथा भिक्षुक आदि
तो अन्न, वस्त्र और ओषधि एवं जिस वस्तुका जिसके पास अभाव
हो, उस वस्तुद्वारा सेवा करनेके लिये योग्य पात्र समझे जाते हैं और
श्रेष्ठ आचरणोंवाले विद्वान् ब्राह्मणजन धनादि सब प्रकारके पदार्थोंद्वारा
सेवा करनेके लिये योग्य पात्र समझे जाते हैं।
4. जैसे प्रायः वर्तमान समयके चन्दे-चिट्ठे आदिमें धन दिया
जाता है।
22श्रीभगवान्
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते। असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
जो दान बिना सत्कारके अथवा तिरस्कारपूर्वक अयोग्य देश-कालमें और कुपात्रके प्रति दिया जाता है, वह दान तामस कहा गया है॥ 22॥
23श्रीभगवान्
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः। ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
ॐ, तत्, सत्—ऐसे यह तीन प्रकारका सच्चिदानन्दघन ब्रह्मका नाम कहा है; उसीसे सृष्टिके आदिकालमें ब्राह्मण और वेद तथा यज्ञादि रचे गये॥ 23॥
24श्रीभगवान्
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः। प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम्॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
इसलिये वेद-मन्त्रोंका उच्चारण करनेवाले श्रेष्ठ पुरुषोंकी शास्त्रविधिसे नियत यज्ञ, दान और तपरूप क्रियाएँ सदा “ॐ” इस परमात्माके नामको उच्चारण करके ही आरम्भ होती हैं॥ 24॥
25श्रीभगवान्
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः। दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
तत् अर्थात् “तत्” नामसे कहे जानेवाले परमात्माका ही यह सब है—इस भावसे फलको न चाहकर नाना प्रकारकी यज्ञ, तपरूप क्रियाएँ तथा दानरूप क्रियाएँ कल्याणकी इच्छावाले पुरुषोंद्वारा की जाती हैं॥ 25॥
*अर्थात् मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा और स्वर्गादिकी प्राप्तिके लिये
अथवा रोगादिकी निवृत्तिके लिये।
26श्रीभगवान्
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते। प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
“सत्”—इस प्रकार यह परमात्माका नाम सत्यभावमें और श्रेष्ठभावमें प्रयोग किया जाता है तथा हे पार्थ! उत्तम कर्ममें भी “सत्” शब्दका प्रयोग किया जाता है॥ 26॥
27श्रीभगवान्
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते। कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
तथा यज्ञ, तप और दानमें जो स्थिति है, वह भी “सत्” इस प्रकार कही जाती है और उस परमात्माके लिये किया हुआ कर्म निश्चयपूर्वक सत्—ऐसे कहा जाता है॥ 27॥
28श्रीभगवान्
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्। असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥
साधारण भाषाटीकाtranslation
हे अर्जुन! बिना श्रद्धाके किया हुआ हवन, दिया हुआ दान एवं तपा हुआ तप और जो कुछ भी किया हुआ शुभ कर्म है—वह समस्त “असत्”—इस प्रकार कहा जाता है; इसलिये वह न तो इस लोकमें लाभदायक है और न मरनेके बाद ही॥ 28॥
17.1साधारण भाषाटीका