श्रद्धात्रयविभागयोग
“तस्मात् शास्त्रं प्रमाणं ते” इति भगवद्वाक्याद् लब्धप्रश्नबीजः—
“तस्मात् शास्त्रं प्रमाणं ते” इस भगवद्वाक्यसे जिसको प्रश्नका बीज मिला है वह अर्जुन बोले—
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ये केचिद् अविशेषिता शास्त्रविधिं शास्त्र-विधानं
श्रुतिस्मृतिशास्त्रचोदनाम्
उत्सृज्य परित्यज्य यजन्ते देवादीन् पूजयन्ति श्रद्धया आस्तिक्यबुद्ध्या अन्विताः संयुक्ताः सन्तः।
श्रुतिलक्षणं स्मृतिलक्षणं वा कञ्चित् शास्त्रविधिम् अपश्यन्तो वृद्धव्यवहारदर्शनाद् एव श्रद्दधानतया ये देवादीन् पूजयन्ति ते इह “ये शास्त्रविधिम् उत्सृज्य यजन्ते श्रद्धया अन्विताः” इति एवं गृह्यन्ते। ये पुनः कञ्चित् शास्त्रविधिम् उपलभमाना एव तम् उत्सृज्य अयथाविधि देवादीन् पूजयन्ति ते इह “ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते” इति न परिगृह्यन्ते।
कस्मात्,
श्रद्धया अन्वितत्वविशेषणात्। देवादिपूजा-विधिपरं किञ्चित् शास्त्रं पश्यन्त एव तद् उत्सृज्य अश्रद्दधानतया तद्विहितायां देवादि-पूजायां श्रद्धया अन्विताः प्रवर्तन्ते इति न शक्यं कल्पयितुं यस्मात् तस्मात् पूर्वोक्ता एव “ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः” इति अत्र गृह्यन्ते।
तेषाम् एवम्भूतानां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वम् आहो रजः तमः किं सत्त्वं निष्ठा अवस्थानम् आहोस्विद् रजः अथवा तमः। एतद् उक्तं भवति या तेषां देवादिविषया पूजा सा किं सात्त्विकी आहोस्विद् राजसी उत तामसी इति॥ 1॥
जो कोई साधारण मनुष्य, शास्त्र-विधिको— शास्त्रकी आज्ञाको अर्थात् श्रुति-स्मृति आदि शास्त्रोंके विधानको छोड़कर श्रद्धासे अर्थात् आस्तिकबुद्धिसे युक्त यानी सम्पन्न होकर देवादिका पूजन करते हैं।
यहाँ “ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः” इस कथनसे श्रुतिरूप या स्मृतिरूप किसी भी शास्त्रके विधानको न जानकर, केवल वृद्ध व्यवहारको आदर्श मानकर, जो श्रद्धापूर्वक देवादिका पूजन करते हैं, वे ही मनुष्य ग्रहण किये गये हैं। किंतु जो मनुष्य कुछ शास्त्रविधिको जानते हुए भी, उसको छोड़कर अविधिपूर्वक देवादिका पूजन करते हैं, वे “ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते” इस कथनसे ग्रहण नहीं किये जा सकते।
पू0—किसलिये (ग्रहण नहीं किये जा सकते)?
उ0—श्रद्धासे युक्त हुए (पूजन करते हैं) ऐसा विशेषण दिया गया है इसलिये। क्योंकि देवादिके पूजाविषयक किसी भी शास्त्रको जानते हुए ही उसे अश्रद्धापूर्वक छोड़कर, उस शास्त्रद्वारा विधान की हुई देवादिकी पूजामें श्रद्धासे युक्त हुए बर्तते हैं, ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती। अतः पहले बतलाये हुए मनुष्य ही “ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः” इस कथनसे ग्रहण किये जाते हैं।
हे कृष्ण! इस प्रकारके उन मनुष्योंकी निष्ठा कौन-सी है? सात्त्विक है? राजस है अथवा तामस है? यानी उनकी स्थिति सात्त्विकी है या राजसी या तामसी है? कहनेका अभिप्राय यह है कि उनकी जो देवादिविषयक पूजा है, वह सात्त्विकी है? राजसी है? अथवा तामसी है?॥ 1॥
सामान्यविषयः अयं प्रश्नो न अप्रविभज्य प्रतिवचनम् अर्हति इति—
यह प्रश्न साधारण मनुष्योंके विषयमें है, अतः इसका उत्तर बिना विभाग किये देना उचित नहीं, इस अभिप्रायसे श्रीभगवान् बोले—
त्रिविधा
त्रिप्रकारा
भवति
श्रद्धा। यस्यां निष्ठायां त्वं पृच्छसि देहिनां सा स्वभावजा
जन्मान्तरकृतो
धर्मादिसंस्कारो मरणकाले अभिव्यक्तः स्वभाव उच्यते ततो जाता स्वभावजा। सात्त्विकी सत्त्वनिर्वृता देवपूजादिविषया,
राजसी
रजोनिर्वृता यक्षरक्षःपूजादिविषया, तामसी तमोनिर्वृता प्रेतपिशाचादिपूजाविषया एवं त्रिविधा ताम् उच्यमानां श्रद्धा शृणु॥ 2॥
जिस निष्ठाके विषयमें तू पूछता है, मनुष्योंकी वह स्वभावजन्य श्रद्धा अर्थात् जन्मान्तरमें किये हुए धर्म-अधर्म आदिके जो संस्कार मृत्युके समय प्रकट हुआ करते हैं उनके समुदायका नाम स्वभाव है, उससे उत्पन्न हुई श्रद्धा—तीन प्रकारकी होती है। सत्त्वगुणसे उत्पन्न हुई देवपूजादिविषयक श्रद्धा सात्त्विकी है, रजोगुणसे उत्पन्न हुई यक्ष-राक्षसादिकी पूजाविषयक श्रद्धा राजसी है और तमोगुणसे उत्पन्न हुई प्रेत-पिशाच आदिकी पूजाविषयक श्रद्धा तामसी है। ऐसे तीन प्रकारकी श्रद्धा होती है। उस आगे कही जानेवाली (तीन प्रकारकी) श्रद्धाको तू सुन॥ 2॥
सा एवं त्रिविधा भवति—
वह श्रद्धा इस तरह तीन प्रकारकी होती है—
सत्त्वानुरूपा
विशिष्टसंस्कारोपेतान्तः-करणानुरूपा सर्वस्य प्राणिजातस्य श्रद्धा भवति भारत।
यदि एवं ततः किं स्याद् इति उच्यते—
श्रद्धामयः श्रद्धाप्रायः अयं पुरुषः संसारी जीवः। कथं यो यच्छ्रद्धो या श्रद्धा यस्य जीवस्य स यच्छ्रद्धः स एव तच्छ्रद्धानुरूप एव स जीवः॥ 3॥
हे भारत! सभी प्राणियोंकी श्रद्धा (उनके) भिन्न-भिन्न संस्कारोंसे युक्त अन्तःकरणके अनुरूप होती है।
यदि ऐसा है तो उससे क्या होगा? इसपर कहते हैं—
यह पुरुष अर्थात् संसारी जीव श्रद्धामय है; क्योंकि जो जिस श्रद्धावाला है अर्थात् जिस जीवकी जैसी श्रद्धा है, वह स्वयं भी वही है, अर्थात् उस श्रद्धाके अनुरूप ही है॥ 3॥
ततः च कार्येण लिङ्गेन देवादिपूजया सत्त्वादिनिष्ठा अनुमेया इति आह—
इसलिये कार्यरूप चिह्नसे अर्थात् (उन श्रद्धाओंके कारण होनेवाली) देवादिकी पूजासे, सात्त्विक आदि निष्ठाओंका अनुमान कर लेना चाहिये, यह कहते हैं—
यजन्ते पूजयन्ति सात्त्विकाः सत्त्वनिष्ठा देवान् यक्षरक्षांसि राजसाः, प्रेतान् भूतगणान् च सप्तमातृकादीन् च अन्ये यजन्ते तामसा जनाः॥ 4॥
सात्त्विक निष्ठावाले पुरुष देवोंका पूजन करते हैं, राजसी पुरुष यक्ष और राक्षसोंका तथा अन्य जो तामसी मनुष्य हैं, वे प्रेतों और सप्तमातृकादि भूतगणोंका पूजन किया करते हैं॥ 4॥
एवं कार्यतो निर्णीताः सत्त्वादिनिष्ठाः शास्त्रविध्युत्सर्गे तत्र कश्चिद् एव सहस्त्रेषु देवपूजादितत्परः सत्त्वनिष्ठो भवति बाहुल्येन तु रजोनिष्ठाः तमोनिष्ठाः च एव प्राणिनो भवन्ति, कथम्—
इस प्रकार कार्यसे जिनकी सात्त्विकादि निष्ठाओंका निर्णय किया गया है, उन (स्वाभाविक श्रद्धावाले) हजारों मनुष्योंमें कोई एक ही शास्त्रविधिका त्याग होनेपर देवपूजादिके परायण, सात्त्विक निष्ठायुक्त होता है। अधिकांश मनुष्य तो राजसी और तामसी निष्ठावाले ही होते हैं। कैसे? (सो कहा जाता है—)
अशास्त्रविहितं न शास्त्रविहितम् अशास्त्र-विहितं घोरं पीडाकरं प्राणिनाम् आत्मनः च तपः तप्यन्ते निर्वर्तयन्ति ये तपो जनाः ते च दम्भाहङ्कारसंयुक्ता दम्भः च अहङ्कारः च दम्भाहङ्कारौ ताभ्यां संयुक्ता दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः कामः च रागः च कामरागौ तत्कृतं बलं कामरागबलं तेन अन्विताः कामरागबलैः वा अन्विताः॥ 5॥
जो मनुष्य, शास्त्रमें जिसका विधान नहीं है ऐसा, अशास्त्रविहित और घोर अर्थात् अन्य प्राणियोंको और अपने शरीरको भी पीड़ा पहुँचानेवाला, तप, दम्भ और अहंकार—इन दोनोंसे युक्त होकर तथा कामना और आसक्तिजनित बलसे युक्त होकर, अथवा कामना, आसक्ति और बलसे युक्त होकर तपते हैं॥ 5॥
कर्शयन्तः कृशीकुर्वन्तः शरीरस्थं भूतग्रामं करणसमुदायम् अचेतसः अविवेकिनो मां च एव
तत्कर्मबुद्धिसाक्षिभूतम्
अन्तःशरीरस्थं कर्शयन्तो मदनुशासनाकरणम् एव मत्कर्शनं तान् विद्धि आसुरनिश्चयान् आसुरो निश्चयो येषां ते आसुरनिश्चयाः तान् परिहरणार्थं विद्धि इति उपदेशः॥ 6॥
वे अविवेकी मनुष्य, शरीरमें स्थित इन्द्रियादि करणोंके रूपमें परिणत भूतसमुदायको और शरीरके भीतर अन्तरात्मारूपसे स्थित, उनके कर्म और बुद्धिके साक्षी, मुझ ईश्वरको भी, कृश (तंग) करते हुए—मेरी आज्ञाको न मानना ही मुझे कृश करना है, इस प्रकार मुझे कृश करते हुए (घोर तप करते हैं) उनको तू आसुरी निश्चयवाले जान। जिनका असुरोंका-सा निश्चय हो, वे आसुरी निश्चयवाले कहलाते हैं। उनका सङ्ग त्याग करनेके लिये तू उनको जान, यह उपदेश है॥ 6॥
आहाराणां च रस्यस्निग्धादिवर्गत्रयरूपेण भिन्नानां
यथाक्रमं
सात्त्विकराजसतामस-पुरुषप्रियत्वदर्शनम् इह क्रियते। रस्यस्निग्धा-दिषु आहारविशेषेषु आत्मनः प्रीत्यतिरेकेण लिङ्गेन सात्त्विकत्वं
राजसत्वं
तामसत्वं
च बुद्ध्वा रजस्तमोलिङ्गानाम् आहाराणां परिवर्जनार्थं सत्त्वलिङ्गानां च उपादानार्थम्, तथा यज्ञादीनाम् अपि सत्त्वादिगुणभेदेन त्रिविधत्वप्रतिपादनम् इह राजसतामसान् बुद्ध्वा कथं नु नाम परित्यजेत् सात्त्विकान् एव अनुतिष्ठेद् इति एवम् अर्थम्—
रसयुक्त और स्निग्ध आदि भोजनोंमें, अपनी रुचिकी अधिकतारूप लक्षणसे अपना सात्त्विकत्व, राजसत्व और तामसत्व जानकर, राजस और तामस चिह्नोंवाले आहारका त्याग और सात्त्विक चिह्नयुक्त आहारका ग्रहण करनेके लिये, यहाँ रस्य-स्निग्ध आदि (वाक्योंद्वारा वर्णित) तीन वर्गोंमें विभक्त हुए आहारमें, क्रमसे सात्त्विक, राजस और तामस पुरुषोंकी (पृथक्-पृथक्) रुचि दिखलायी जाती है। वैसे ही सात्त्विक आदि गुणोंके भेदसे यज्ञादिके भेदोंका प्रतिपादन भी यहाँ इसीलिये किया जाता है कि राजस और तामस यज्ञादिको जानकर किसी प्रकार लोग उनका त्याग कर दें और सात्त्विक यज्ञादिका अनुष्ठान किया करें—
आहारः तु अपि सर्वस्य भोक्तुः त्रिविधो भवति प्रिय इष्टः तथा यज्ञः तथा तपः तथा दानं तेषाम् आहारादीनां भेदम् इमं वक्ष्यमाणं शृणु॥ 7॥
भोजन करनेवाले सभी मनुष्योंको तीन प्रकारके आहार प्रिय—रुचिकर होते हैं। वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी (तीन-तीन प्रकारके होते हैं) उन आहारादिका यह आगे कहा जानेवाला भेद सुन॥ 7॥
आयुः च सत्त्वं च बलं च आरोग्यं च सुखं च प्रीतिः च तासां विवर्धना आयुः-सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ते च रस्या रसोपेताः स्निग्धाः स्नेहवन्तः स्थिराः चिरकाल-स्थायिनो देहे, हृद्या हृदयप्रिया आहाराः सात्त्विकप्रियाः सात्त्विकस्य इष्टाः॥ 8॥
आयु, बुद्धि, बल, आरोग्यता, सुख और प्रीति, इन सबको बढ़ानेवाले तथा रस्य—रसयुक्त, स्निग्ध— चिकने, स्थिर—शरीरमें बहुत कालतक (साररूपसे) रहनेवाले और हृद्य—हृदयको प्रिय लगनेवाले (ऐसे आहार भोजन करनेके पदार्थ) सात्त्विक पुरुषको प्रिय—इष्ट होते हैं॥ 8॥
कटुः अम्लो लवणः अत्युष्णः अतिशब्दः कट्वादिषु सर्वत्र योज्यः अतिकटुः अतितीक्ष्ण इति एवं कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिन आहारा
राजसस्य
इष्टा
दुःखशोकामयप्रदा दुःखं च शोकं च आमयं च प्रयच्छन्ति इति दुःखशोकामयप्रदाः॥ 9॥
कड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, अति उष्ण, तीक्ष्ण, रूखे और दाहकारक एवं दुःख, चिन्ता और रोगोंको उत्पन्न करनेवाले अर्थात् जो दुःख, शोक और रोगोंको उत्पन्न करते हों, ऐसे आहार राजस पुरुषको प्रिय होते हैं। यहाँ अति शब्द सबके साथ जोड़ना चाहिये, जैसे अति कड़वे, अत्यन्त खट्टे, अति तीक्ष्ण इत्यादि॥ 9॥
यातयामं मन्दपक्वं निर्वीर्यस्य गतरसेन उक्तत्वाद् गतरसं रसवियुक्तं पूति दुर्गन्धं पर्युषितं च पक्वं सद् रात्र्यन्तरितं च यद् उच्छिष्टम् अपि च भुक्तशिष्टम् अपि अमेध्यम् अयज्ञार्हं भोजनम् ईदृशं तामसप्रियम्॥ 10॥
यातयाम—अधपका, गतरस—रसरहित, पूति— दुर्गन्धयुक्त और बासी अर्थात् जिसको पके हुए एक रात बीत गयी हो, तथा उच्छिष्ट—खानेके पश्चात् बचा हुआ और अमेध्य—जो यज्ञके योग्य न हो, ऐसा भोजन तामसी मनुष्योंको प्रिय होता है। यहाँ, यातयामका अर्थ अधपका किया गया है; क्योंकि निर्वीर्य (सारहीन भोजनको “गतरस” शब्दसे कहा गया है॥ 10॥
अथ इदानीं यज्ञः त्रिविध उच्यते—
अब तीन प्रकारके यज्ञ बतलाये जाते हैं—
अफलाकाङ्क्षिभिः अफलार्थिभिः यज्ञो विधिदृष्टः शास्त्रचोदनादृष्टो यो यज्ञ इज्यते निर्वर्त्यते यष्टव्यम् एव इति यज्ञस्वरूपनिर्वर्तनम् एव कार्यम् इति मनः समाधाय न अनेन पुरुषार्थो मम कर्तव्य इति एवं निश्चित्य स सात्त्विको यज्ञ उच्यते॥ 11॥
फलकी इच्छा न करनेवाले पुरुषोंद्वारा, शास्त्रविधिसे नियत किये हुए जिस यज्ञका अनुष्ठान किया जाता है, तथा “यज्ञ करना ही यानी यज्ञके स्वरूपका सम्पादन करना ही कर्तव्य है” इस प्रकार मनका समाधान करके अर्थात् “इससे मुझे कोई पुरुषार्थ सिद्ध नहीं करना है” ऐसा निश्चय करके जो यज्ञ किया जाता है, वह सात्त्विक कहलाता है॥ 11॥
अभिसन्धाय उद्दिश्य फलं दम्भार्थम् अपि च एव यद् इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्॥ 12॥
हे भरतकुलमें श्रेष्ठ अर्जुन! जो यज्ञ फलके उद्देश्यसे और पाखण्ड करनेके लिये किया जाता है, उस यज्ञको तू राजसी समझ॥ 12॥
विधिहीनं यथाचोदितविपरीतम्, असृष्टान्नं ब्राह्मणेभ्यो न सृष्टं न दत्तम् अन्नं यस्मिन् यज्ञे स असृष्टान्नः तम् असृष्टान्नम्, मन्त्रहीनं मन्त्रतः स्वरतो वर्णतः च वियुक्तं मन्त्रहीनम्, अदक्षिणम् उक्तदक्षिणारहितं श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते तमोनिर्वृतं कथयन्ति॥ 13॥
जो यज्ञ शास्त्र-विधिसे रहित—शास्त्रोक्त प्रकारसे विपरीत और असृष्टान्न होता है अर्थात् जिस यज्ञमें ब्राह्मणोंको अन्न नहीं दिया जाता तथा जो मन्त्रहीन—मन्त्र, स्वर और वर्णसे रहित एवं बतलायी हुई दक्षिणा और श्रद्धासे भी रहित होता है, उस यज्ञको (श्रेष्ठ पुरुष) तामसी— तमोगुणसे किया हुआ बतलाते हैं॥ 13॥
अथ इदानीं तपः त्रिविधम् उच्यते—
अब तीन प्रकारका तप कहा जाता है—
देवाः च द्विजाः च गुरवः च प्राज्ञाः च देवद्विजगुरुप्राज्ञाः तेषां पूजनं देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचम् आर्जवम् ऋजुत्वं ब्रह्मचर्यम् अहिंसा च शरीरनिर्वर्त्यं शारीरं शरीरप्रधानः सर्वैः एव कार्य-करणैः कर्त्रादिभिः साध्यं शारीरं तप उच्यते। “पञ्चैते तस्य हेतवः” इति हि वक्ष्यति॥ 14॥
देव, ब्राह्मण, गुरु और बुद्धिमान्—ज्ञानी इन सबका पूजन, शौच—पवित्रता, आर्जव—सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा यह सब शरीरसम्बन्धी— शरीरद्वारा किये जानेवाले तप कहे जाते हैं; अर्थात् शरीर जिनमें प्रधान है, ऐसे समस्त कार्य और करणोंसे जो कर्ताद्वारा किये जायँ वे शरीरसम्बन्धी तप कहलाते हैं। आगे यह कहेंगे भी कि “उन (सब कर्मों)-के ये पाँच कारण हैं” इत्यादि॥ 14॥
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अनुद्वेगकरं प्राणिनाम् अदुःखकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् प्रियहिते दृष्टादृष्टार्थे। अनुद्वेगकरत्वादिभिः धर्मैः वाक्यं विशेष्यते। विशेषणधर्मसमुच्चयार्थः च शब्दः। परप्रत्याय-नार्थं प्रयुक्तस्य वाक्यस्य सत्यप्रियहितानुद्वेग-करत्वानाम् अन्यतमेन द्वाभ्यां त्रिभिः वा हीनता स्याद् यदि न तद् वाङ्मयं तपः।
यथा सत्यवाक्यस्य इतरेषाम् अन्यतमेन द्वाभ्यां त्रिभिः वा हीनतायां न वाङ्मयतपस्त्वम्। तथा प्रियवाक्यस्य अपि इतरेषाम् अन्यतमेन द्वाभ्यां त्रिभिः वा हीनस्य न वाङ्मयतपस्त्वम्। तथा हितवाक्यस्य अपि इतरेषाम् अन्यतमेन द्वाभ्यां त्रिभिः वा वियुक्तस्य न वाङ्मयतपस्त्वम्।
किं पुनः तत् तपः,
यत् सत्यं वाक्यम् अनुद्वेगकरं प्रियहितं च यत् तत् परमं तपो वाङ्मयम्। यथा शान्तो भव वत्स स्वाध्यायं योगं च अनुतिष्ठ तथा ते श्रेयो भविष्यति। स्वाध्यायाभ्यसनं च एव यथाविधि वाङ्मयं तप उच्यते॥ 15॥
जो वचन किसी प्राणीके अन्तःकरणमें उद्वेग-दुःख उत्पन्न करनेवाले नहीं हैं, तथा जो सत्य, प्रिय और हितकारक हैं; अर्थात् इस लोक और परलोकमें सर्वत्र हित करनेवाले हैं, यहाँ “उद्वेग न करनेवाले” इत्यादि लक्षणोंसे वाक्यको विशेषित किया गया है और “च” शब्द सब लक्षणोंका समुच्चय बतलानेके लिये है (अतः समझना चाहिये कि) दूसरेको किसी बातका बोध करानेके लिये कहे हुए वाक्यमें यदि सत्यता, प्रियता, हितकारिता और अनुद्विग्नता—इन सबका अथवा इनमेंसे किसी एक, दो या तीनका अभाव हो तो वह वाणीसम्बन्धी तप नहीं है।
जैसे सत्य वाक्य यदि अन्य एक, दो या तीन गुणोंसे हीन हो तो वह वाणीका तप नहीं है, वैसे ही प्रिय वचन भी यदि अन्य एक, दो या तीन गुणोंसे हीन हो तो वह वाणीसम्बन्धी तप नहीं है, तथा हितकारक वचन भी यदि अन्य एक, दो या तीन गुणोंसे हीन हो तो वह वाणीका तप नहीं है।
पू0—तो फिर वह वाणीका तप कौन-सा है?
उ0—जो वचन सत्य हो और उद्वेग करनेवाला न हो तथा प्रिय और हितकर भी हो, वह वाणीसम्बन्धी परम तप है। जैसे,“हे वत्स! तू शान्त हो स्वाध्याय और योगमें स्थित हो, इससे तेरा कल्याण होगा इत्यादि वचन हैं तथा यथाविधि स्वाध्यायका अभ्यास करना भी वाणीसम्बन्धी तप कहा जाता है॥ 15॥
मनःप्रसादो मनसः प्रशान्तिः स्वच्छतापादनं मनसः प्रसादः। सौम्यत्वं यत् सौमनस्यम् आहुः मुखादिप्रसादकार्या अन्तःकरणस्य वृत्तिः, मौनं वाक्संयमः अपि मनःसंयमपूर्वको भवति इति कार्येण कारणम् उच्यते मनःसंयमो मौनम् इति। आत्मविनिग्रहो मनोनिरोधः सर्वतः सामान्यरूप आत्मविनिग्रहो वाग्विषयस्य एव मनसः संयमो मौनम् इति विशेषः। भावसंशुद्धिः परैः व्यवहारकाले अमायावित्वं भावसंशुद्धिः इति एतत् तपो मानसम् उच्यते॥ 16॥
मनका प्रसाद अर्थात् मनकी परम शान्ति— स्वच्छता सम्पादन कर लेना, सौम्यता—जिसको सुमनसता कहते हैं वह मुखादिको प्रसन्न करनेवाली अन्तःकरणकी शुद्ध-वृत्ति, मौन—अन्तःकरणका संयम, क्योंकि वाणीका संयम भी मनःसंयमपूर्वक ही होता है, अतः कार्यसे कारण कहा जाता है, मनका निरोध अर्थात् सब ओरसे साधारणभावसे मनका निग्रह और भली प्रकार भावकी शुद्धि अर्थात् दूसरोंके साथ व्यवहार करनेमें छल-कपटसे रहित होना, यह मानसिक तप कहलाता है। केवल वाणीविषयक मनके संयमका नाम मौन है और सामान्यभावसे संयम करनेका नाम आत्मनिग्रह है— यह भेद है॥ 16॥
यथोक्तं कायिकं वाचिकं मानसं च तपः तप्तं नरैः सत्त्वादिभेदेन कथं त्रिविधं भवति इति उच्यते—
उपर्युक्त कायिक, वाचिक और मानसिक तप मनुष्योंद्वारा किये जानेपर, सात्त्विक आदि भेदोंसे तीन प्रकारके कैसे होते हैं? सो बतलाते हैं—
श्रद्धया आस्तिक्यबुद्ध्या परया प्रकृष्टया तप्तम् अनुष्ठितं तपः तत् प्रकृतं त्रिविधं त्रिप्रकारम् अधिष्ठानं नरैः अनुष्ठातृभिः अफलाकाङ्क्षिभिः फलाकाङ्क्षारहितैः युक्तैः समाहितैः यद् ईदृशं तपः तत् सात्त्विकं सत्त्वनिर्वृतं परिचक्षते कथयन्ति शिष्टाः॥ 17॥
जिसका प्रकरण चल रहा है वह, तीन प्रकारका कायिक, वाचिक और मानसिक तप, जो फलाकांक्षारहित और समाहितचित्त पुरुषोंद्वारा उत्तम श्रद्धापूर्वक—आस्तिकबुद्धिपूर्वक किया जाता है, ऐसे उस तपको श्रेष्ठ पुरुष सात्त्विक—सत्त्वगुणजनित कहते हैं॥ 17॥
सत्कारमानपूजार्थं सत्कारः साधुकारः साधुः अयं तपस्वी ब्राह्मण इति एवम् अर्थं मानो माननं प्रत्युत्थानाभिवादनादिः तदर्थं पूजा पादप्रक्षालनार्चनाशयितृत्वादिः तदर्थं च तपः सत्कारमानपूजार्थं दम्भेन च एव यत् क्रियते तपः तद् इह प्रोक्तं कथितं राजसं चलं कादा-चित्कफलत्वेन अध्रुवम्॥ 18॥
जो तप सत्कार, मान और पूजाके लिये किया जाता है—यह बड़ा श्रेष्ठ पुरुष है, तपस्वी है, ब्राह्मण है। इस प्रकार जो बड़ाई की जाती है उसका नाम सत्कार है। (आते देखकर) खड़े हो जाना तथा प्रणाम आदि करना—ऐसे सम्मानका नाम मान है। पैर धोना, अर्चन करना, भोजन कराना इत्यादिका नाम पूजा है। इन सबके लिये जो तप किया जाता है और जो दम्भसे किया जाता है, वह तप यहाँ राजसी कहा गया है। तथा अनिश्चित फलवाला होनेसे नाशवान् और अनित्य भी कहा गया है॥ 18॥
मूढग्राहेण अविवेकनिश्चयेन आत्मनः पीडया क्रियते यत् तपः परस्य उत्सादनार्थं विनाशार्थं वा तत् तामसं तप उदाहृतम्॥ 19॥
जो तप अपने शरीरको पीड़ा पहुँचाकर या दूसरेका बुरा करनेके लिये मूढ़तापूर्वक आग्रहसे अर्थात् अज्ञानपूर्वक निश्चयसे किया जाता है, वह तामसी तप कहा गया है॥ 19॥
इदानीं दानभेद उच्यते—
अब दानके भेद कहे जाते हैं—
दातव्यम् इति एवं मनः कृत्वा यद् दानं दीयते अनुपकारिणे प्रत्युपकारासमर्थाय समर्थाय अपि निरपेक्षं दीयते देशे पुण्ये कुरुक्षेत्रादौ काले सङ्क्रान्त्यादौ पात्रे च षडङ्गविद्वेदपारगे इत्यादौ तद् दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥ 20॥
जो दान “देना ही उचित है” मनमें ऐसा विचार करके अनुपकारीको, जो कि प्रत्युपकार करनेमें समर्थ न हो, यदि समर्थ हो तो भी जिससे प्रत्युपकार चाहा न गया हो, ऐसे अधिकारीको दिया जाता है तथा जो कुरुक्षेत्र आदि पुण्यभूमिमें, संक्रान्ति आदि पुण्यकालमें और छहों अङ्गोंके सहित वेदको जाननेवाले ब्राह्मण आदि श्रेष्ठ पात्रको दिया जाता है वह दान सात्त्विक कहा गया है॥ 20॥
यत् तु दानं प्रत्युपकारार्थं काले तु अयं मां प्रत्युपकरिष्यति इति एवम् अर्थं फलं वा अस्य दानस्य मे भविष्यति अदृष्टम् इति तद् उद्दिश्य पुनः दीयते च परिक्लिष्टं खेदसंयुक्तं तद् राजसं स्मृतम्॥ 21॥
जो दान प्रत्युपकारके लिये अर्थात् कालान्तरमें यह मेरा प्रत्युपकार करेगा, इस अभिप्रायसे अथवा इस दानसे मुझे परलोकमें फल मिलेगा ऐसे उद्देश्यसे क्लेश—खेदपूर्वक दिया जाता है, वह राजस कहा गया है॥ 21॥
अदेशकाले अपुण्ये देशे म्लेच्छाशुच्यादि-सङ्कीर्णे अकाले पुण्यहेतुत्वेन अप्रख्याते सङ्क्रान्त्यादिविशेषरहिते अपात्रेभ्यः च मूर्ख-तस्करादिभ्यो देशादिसम्पत्तौ च असत्कृतं प्रियवचनपादप्रक्षालनपूजादिरहितम् अवज्ञातं पात्रपरिभवयुक्तं यद् दानं तत् तामसम् उदाहृतम्॥ 22॥
जो दान अयोग्य देश-कालमें अर्थात् अशुद्ध वस्तुओं और म्लेच्छादिसे युक्त पापमय देशमें तथा पुण्यके हेतु बतलाये हुए संक्रान्ति आदि विशेषतासे रहित कालमें और मूर्ख, चोर आदि अपात्रोंको दिया जाता है तथा जो अच्छे देश-कालादिमें भी बिना सत्कार किये—प्रिय वचन, पाद-प्रक्षालन और पूजादि सम्मानसे रहित तथा पात्रका अपमान करते हुए दिया जाता है, वह तामस कहा गया है॥ 22॥
यज्ञदानतपःप्रभृतीनां साद्गुण्यकरणाय अयम् उपदेश उच्यते—
यज्ञ, दान और तप आदिको सद्गुणसम्पन्न बनानेके लिये यह उपदेश दिया जाता है—
ॐ तत्सद् इति एष निर्देशो निर्दिश्यते अनेन इति निर्देशः त्रिविधो नामनिर्देशो ब्रह्मणः स्मृतः चिन्तितो वेदान्तेषु ब्रह्मविद्भिः। ब्राह्मणाः तेन निर्देशेन त्रिविधेन वेदाः च यज्ञाः च विहिता निर्मिताः पुरा पूर्वम् इति निर्देशस्तुत्यर्थम् उच्यते॥ 23॥
ओम् तत् सत्—यह तीन प्रकारका ब्रह्मका निर्देश है। जिससे कोई वस्तु बतलायी जाय उसका नाम निर्देश है, अतः यह ब्रह्मका तीन प्रकारका नाम है, ऐसा वेदान्तमें ब्रह्मज्ञानियोंद्वारा माना गया है। पूर्वकालमें इस तीन प्रकारके नामसे ही ब्राह्मण, वेद और यज्ञ— ये सब रचे गये हैं। यह ब्रह्मके नामकी स्तुति करनेके लिये कहा जाता है॥ 23॥
तस्माद् ओम् इति उदाहृत्य उच्चार्य यज्ञदानतपःक्रिया यज्ञादिस्वरूपाः क्रियाः प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः शास्त्रचोदिताः सततं सर्वदा ब्रह्मवादिनां ब्रह्मवदनशीलानाम्॥ 24॥
इसलिये वेदका प्रवचन—पाठ करनेवाले ब्राह्मणोंकी शास्त्र-विधिसे कही हुई यज्ञ, दान और तपरूप क्रियाएँ ब्रह्मके “ओम्” इस नामका उच्चारण करके ही सर्वदा आरम्भ की जाती हैं॥ 24॥
तद् इति अनभिसन्धाय तद् इति ब्रह्माभिधानम् उच्चार्य अनभिसन्धाय च कर्मणः फलं यज्ञतपः-क्रिया यज्ञक्रियाः च तपःक्रियाः च यज्ञतपः-क्रिया दानक्रियाः च विविधाः क्षेत्रहिरण्य-प्रदानादिलक्षणाः क्रियन्ते निर्वर्त्यन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः मोक्षार्थिभिः मुमुक्षुभिः॥ 25॥
“तत्” ऐसे इस ब्रह्मके नामका उच्चारण करके और कर्मोंके फलको न चाहकर नाना प्रकारकी यज्ञ और तपरूप तथा दान अर्थात् भूमि, सोना आदिका दान करनारूप क्रियाएँ मोक्षको चाहनेवाले मुमुक्षु पुरुषोंद्वारा की जाती हैं॥ 25॥
ॐ तच्छब्दयोः विनियोग उक्तः अथ इदानीं सच्छब्दस्य विनियोगः कथ्यते—
ओम् और तत्-शब्दका प्रयोग तो कहा गया, अब सत्-शब्दका प्रयोग कहा जाता है—
सद्भावे असतः सद्भावे यथा अविद्यमानस्य पुत्रस्य जन्मनि तथा साधुभावे असद्वृत्तस्य असाधोः सद्वृत्तता साधुभावः तस्मिन् साधुभावे च सद् इति एतद् अभिधानं ब्रह्मणः प्रयुज्यते तत्र उच्यते अभिधीयते प्रशस्ते कर्मणि विवाहादौ च तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते प्रयुज्यते इति एतत्॥ 26॥
अविद्यमान वस्तुके सद्भावमें यानी जैसे अविद्यमान पुत्रादिके उत्पन्न होनेमें तथा साधुभावमें अर्थात् बुरे आचरणोंवाले असाधु पुरुषका जो सदाचारयुक्त हो जाना है, उसमें, “सत्” ऐसे इस ब्रह्मके नामका प्रयोग किया जाता है अर्थात् वहाँ “सत्” शब्द कहा जाता है तथा हे पार्थ! विवाह आदि माङ्गलिक कर्मोंमें भी “सत्” शब्द प्रयुक्त होता है अर्थात् (उनमें भी) “सत्” शब्दका प्रयोग किया जाता है॥ 26॥
यज्ञे यज्ञकर्मणि या स्थितिः तपसि च या स्थितिः दाने च या स्थितिः सा च सद् इति उच्यते विद्वद्भिः कर्म च एव तदर्थीयम् अथवा यस्य अभिधानत्रयं प्रकृतं तदर्थीयं यज्ञदान-तपोऽर्थीयम् ईश्वरार्थीयम् इति एतत्। सद् इति एव अभिधीयते। तद् एतद् यज्ञतप-आदिकर्म असात्त्विकं विगुणम् अपि श्रद्धापूर्वकं ब्रह्मणः अभिधानत्रयप्रयोगेण सगुणं सात्त्विकं सम्पादितं भवति॥ 27॥
जो यज्ञकर्ममें स्थिति है, जो तपमें स्थिति है और जो दानमें स्थिति है, वह भी “सत् है” ऐसा विद्वानोंद्वारा कहा जाता है। तथा उन यज्ञादिके लिये जो कर्म है अथवा जिसके तीन नामोंका प्रकरण चल रहा है, उस ईश्वरके लिये जो कर्म है, वह भी “सत् है” यही कहा जाता है। इस प्रकार किये हुए यज्ञ और तप आदि कर्म, यदि असात्त्विक और विगुण हों तो भी श्रद्धापूर्वक परमात्माके तीनों नामोंके प्रयोगसे सगुण और सात्त्विक बना लिये जाते हैं॥ 27॥
तत्र च सर्वत्र श्रद्धाप्रधानतया सर्वं सम्पाद्यते यस्मात् तस्मात्—
क्योंकि सभी जगह श्रद्धाकी प्रधानतासे ही सब कुछ किया जाता है, इसलिये—
अश्रद्धया हुतं हवनं कृतं दत्तं च ब्राह्मणेभ्यः अश्रद्धया, तपः तप्तम् अनुष्ठितम् अश्रद्धया, तथा अश्रद्धया एव कृतं यत् स्तुतिनमस्कारादि तत् सर्वम् असद् इति उच्यते मत्प्राप्तिसाधन-मार्गबाह्यत्वात् पार्थ। न च तद् बह्वायासम् अपि प्रेत्य फलाय नो अपि इहार्थं साधुभिः निन्दितत्वाद् इति॥ 28॥
बिना श्रद्धाके किया हुआ हवन, बिना श्रद्धाके ब्राह्मणोंको दिया हुआ दान, तपा हुआ तप तथा और भी जो कुछ बिना श्रद्धाके किया हुआ स्तुति— नमस्कारादि कर्म है वह सब, हे पार्थ! मेरी प्राप्तिके साधनमार्गसे बाह्य होनेके कारण असत् है, ऐसा कहा जाता है। क्योंकि वह बहुत परिश्रमयुक्त होनेपर भी साधु पुरुषोंद्वारा निन्दित होनेके कारण न तो मरनेके पश्चात् फल देनेवाला होता है और न इस लोकमें ही सुखदायक होता है॥ 28॥