ग्रन्थ
3कर्मयोग

कर्मयोग

Karma-Yoga
The Yoga of Action
43 verses · 42 printed blockspp. 133191 · Srimad Bhagavad Gita — Tattva-Vivechaniसाधारण भाषाटीका 42 · साधक-संजीवनी 37 · श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्य 43 · श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीका 42
1अर्जुन
अर्जुन उवाच ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन। तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥ 1॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
अर्जुन बोले—हे जनार्दन! यदि आपको कर्मकी अपेक्षा ज्ञान श्रेष्ठ मान्य है तो फिर हे केशव! मुझे भयंकर कर्ममें क्यों लगाते हैं?॥ 1॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—दूसरे अध्यायमें भगवान्ने “अशोच्यानन्वशोचस्त्वम्” (2। 11) से लेकर “देही नित्यमवध्योऽयम्” (2। 30) तक आत्मतत्त्वका निरूपण करते हुए सांख्ययोगका प्रतिपादन किया और “बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु” (2। 39) से लेकर “तदा योगमवाप्स्यसि” (2। 53) तक समबुद्धिरूप कर्मयोगका वर्णन किया। इसके पश्चात् चौवनवें श्लोकसे अध्यायकी समाप्तिपर्यन्त अर्जुनके पूछनेपर भगवान्ने समबुद्धिरूप कर्मयोगके द्वारा परमेश्वरको प्राप्त हुए स्थितप्रज्ञ सिद्ध पुरुषके लक्षण, आचरण और महत्त्वका प्रतिपादन किया। वहाँ कर्मयोगकी महिमा कहते हुए भगवान्ने सैंतालीसवें और अड़तालीसवें श्लोकोंमें कर्मयोगका स्वरूप बतलाकर अर्जुनको कर्म करनेके लिये कहा; उनचासवेंमें समबुद्धिरूप कर्मयोगकी अपेक्षा सकाम कर्मका स्थान बहुत ही नीचा बतलाया, पचासवेंमें समबुद्धियुक्त पुरुषकी प्रशंसा करके अर्जुनको कर्मयोगमें लगनेके लिये कहा, इक्यावनवेंमें समबुद्धियुक्त ज्ञानी पुरुषको अनामय पदकी प्राप्ति बतलायी। इस प्रसंगको सुनकर अर्जुन उसका यथार्थ अभिप्राय निश्चित नहीं कर सके। “बुद्धि” शब्दका अर्थ “ज्ञान” मान लेनेसे उन्हें भ्रम हो गया, भगवान्के वचनोंमें “कर्म” की अपेक्षा “ज्ञान” की प्रशंसा प्रतीत होने लगी; एवं वे वचन उनको स्पष्ट न दिखायी देकर मिले हुए-से जान पड़ने लगे। अतएव भगवान्से उनका स्पष्टीकरण करवानेकी और अपने लिये निश्चित श्रेयःसाधन जाननेकी इच्छासे अर्जुन पूछते हैं—

2
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे। तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्॥ 2॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
आप मिले हुए-से वचनोंसे मेरी बुद्धिको मानो मोहित कर रहे हैं। इसलिये उस एक बातको निश्चित करके कहिये जिससे मैं कल्याणको प्राप्त हो जाऊँ॥ 2॥
3श्रीभगवान्
श्रीभगवान् उवाच
श्रीभगवानुवाच लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ। ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्॥ 3॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
श्रीभगवान् बोले—हे निष्पाप! इस लोकमें दो प्रकारकी निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गयी है। उनमेंसे सांख्ययोगियोंकी निष्ठा तो ज्ञानयोगसे और योगियोंकी निष्ठा कर्मयोगसे
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार अर्जुनके पूछनेपर भगवान् उनका निश्चित कर्तव्य भक्तिप्रधान कर्मयोग बतलानेके उद्देश्यसे पहले उनके प्रश्नका उत्तर देते हुए यह दिखलाते हैं कि मेरे वचन “व्यामिश्र” अर्थात् “मिले हुए” नहीं हैं वरं सर्वथा स्पष्ट और अलग-अलग हैं—

4
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते। न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति॥ 4॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
मनुष्य न तो कर्मोंका आरम्भ किये बिना निष्कर्मताको यानी योगनिष्ठाको प्राप्त होता है और न कर्मोंके केवल त्यागमात्रसे सिद्धि यानी सांख्यनिष्ठाको ही प्राप्त होता है॥ 4॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने जो यह बात कही है कि सांख्यनिष्ठा ज्ञानयोगके साधनसे होती है और योगनिष्ठा कर्मयोगके साधनसे होती है, उसी बातको सिद्ध करनेके लिये अब यह दिखलाते हैं कि कर्तव्यकर्मोंका स्वरूपतः त्याग किसी भी निष्ठाका हेतु नहीं है—

5
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्। कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥ 5॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
निःसन्देह कोई भी मनुष्य किसी भी कालमें क्षणमात्र भी बिना कर्म किये नहीं रहता; क्योंकि सारा मनुष्यसमुदाय प्रकृतिजनित गुणोंद्वारा परवश हुआ कर्म करनेके लिये बाध्य किया
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार कर्मयोगीके लिये कर्तव्यकर्मोंके न करनेको योगनिष्ठाकी प्राप्तिमें बाधक और सांख्ययोगीके लिये सिद्धिकी प्राप्तिमें केवल स्वरूपसे बाहरी कर्मोंके त्यागको गौण बतलाकर, अब अर्जुनको कर्तव्यकर्मोंमें प्रवृत्त करनेके उद्देश्यसे भिन्न-भिन्न हेतुओंसे कर्म करनेकी आवश्यकता सिद्ध करनेके लिये पहले कर्मोंके सर्वथा त्यागको अशक्य बतलाते हैं—

6
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्। इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥ 6॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो मूढबुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियोंको हठपूर्वक ऊपरसे रोककर मनसे उन इन्द्रियोंके विषयोंका चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात् दम्भी कहा जाता है॥ 6॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें यह बात कही गयी कि कोई भी मनुष्य क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रहता; इसपर यह शंका होती है कि इन्द्रियोंकी क्रियाओंको हठसे रोककर भी तो मनुष्य कर्मोंका त्याग कर सकता है? अतः ऊपरसे इन्द्रियोंकी क्रियाओंका त्याग कर देना कर्मोंका त्याग नहीं है, यह भाव दिखलानेके लिये भगवान् कहते हैं—

7
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन। कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते॥ 7॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
किंतु हे अर्जुन! जो पुरुष मनसे इन्द्रियोंको वशमें करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियोंद्वारा कर्मयोगका आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है॥ 7॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार केवल ऊपरसे इन्द्रियोंको विषयोंसे हटा लेनेको मिथ्याचार बतलाकर, अब आसक्तिका त्याग करके इन्द्रियोंद्वारा निष्कामभावसे कर्तव्यकर्म करनेवाले योगीकी प्रशंसा करते हैं—

8
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः। शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध ्येदकर्मणः॥ 8॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
तू शास्त्रविहित कर्तव्यकर्म कर; क्योंकि कर्म न करनेकी अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करनेसे तेरा शरीर-निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा॥ 8॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अर्जुनने जो यह पूछा था कि आप मुझे घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं, उसके उत्तरमें ऊपरसे कर्मोंका त्याग करनेवाले मिथ्याचारीकी निन्दा और कर्मयोगीकी प्रशंसा करके अब उन्हें कर्म करनेके लिये आज्ञा देते हैं—

9
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः। तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर॥ 9॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
यज्ञके निमित्त किये जानेवाले कर्मोंसे अतिरिक्त दूसरे कर्मोंमें लगा हुआ ही यह मनुष्यसमुदाय कर्मोंसे बँधता है। इसलिये हे अर्जुन! तू आसक्तिसे रहित होकर उस यज्ञके निमित्त
सम्बन्ध

सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि शास्त्रविहित यज्ञ, दान और तप आदि शुभ कर्म भी तो बन्धनके हेतु माने गये हैं; फिर कर्म न करनेकी अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ कैसे है? इसपर कहते हैं—

10
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्॥ 10॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
प्रजापति ब्रह्माने कल्पके आदिमें यज्ञसहित प्रजाओंको रचकर उनसे कहा कि तुमलोग इस यज्ञके द्वारा वृद्धिको प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुमलोगोंको इच्छित भोग प्रदान करनेवाला
सम्बन्ध

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने यह बात कही कि यज्ञके निमित्त कर्म करनेवाला मनुष्य कर्मोंसे नहीं बँधता; इसलिये यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि यज्ञ किसको कहते हैं, उसे क्यों करना चाहिये और उसके लिये कर्म करनेवाला मनुष्य कैसे नहीं बँधता। अतएव इन बातोंको समझानेके लिये भगवान् ब्रह्माजीके वचनोंका प्रमाण देकर कहते हैं—

11
देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः। परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥ 11॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
तुमलोग इस यज्ञके द्वारा देवताओंको उन्नत करो और वे देवता तुमलोगोंको उन्नत करें। इस प्रकार निःस्वार्थभावसे एक-दूसरेको उन्नत करते हुए तुमलोग परम कल्याणको प्राप्त हो
12
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः। तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥ 12॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
यज्ञके द्वारा बढ़ाये हुए देवता तुमलोगोंको बिना माँगे ही इच्छित भोग निश्चय ही देते रहेंगे। इस प्रकार उन देवताओंके द्वारा दिये हुए भोगोंको जो पुरुष उनको बिना दिये स्वयं भोगता
13
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः। भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥ 13॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
यज्ञसे बचे हुए अन्नको खानेवाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापोंसे मुक्त हो जाते हैं और जो पापीलोग अपना शरीरपोषण करनेके लिये ही अन्न पकाते हैं, वे तो पापको ही
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार ब्रह्माजीके वचनोंका प्रमाण देकर भगवान्ने यज्ञादि कर्मोंकी कर्तव्यताका प्रतिपादन किया और साथ ही उनका पालन न करनेवालेको चोर बतलाकर उसकी निन्दा की; अब उन कर्तव्यकर्मोंका आचरण करनेवाले पुरुषोंकी प्रशंसा करते हुए उनसे विपरीत केवल शरीरपोषणके लिये ही कर्म करनेवाले पापियोंकी निन्दा करते हैं—

* पाठो होमश्चातिथीनां सपर्या तर्पणं बलिः। अमी पञ्च महायज्ञा ब्रह्मयज्ञादिनामकाः॥
सत्-शास्त्रोंका पाठ (ब्रह्मयज्ञ या ऋषियज्ञ), हवन (देवयज्ञ), अतिथियोंकी सेवा (मनुष्ययज्ञ), श्राद्ध और तर्पण
(पितृयज्ञ), प्राणिमात्रके लिये आहार देकर उनकी सेवा करना (भूतयज्ञ)—ये पाँच महायज्ञ, ब्रह्मयज्ञ आदि नामोंसे
प्रसिद्ध हैं।
* कण्डनी पेषणी चुल्ली उदकुम्भी च मार्जनी। पञ्च सूना गृहस्थस्य वर्तन्तेऽहरहः सदा॥
14–15Merged
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः। यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥ 14॥ कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्। तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्॥ 15॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
सम्पूर्ण प्राणी अन्नसे उत्पन्न होते हैं, अन्नकी उत्पत्ति वृष्टिसे होती है, वृष्टि यज्ञसे होती है और यज्ञविहित कर्मोंसे उत्पन्न होनेवाला है। कर्मसमुदायको तू वेदसे उत्पन्न और वेदको अविनाशी परमात्मासे उत्पन्न हुआ जान। इससे सिद्ध होता है कि सर्वव्यापी परम अक्षर परमात्मा
सम्बन्ध

सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि यज्ञ न करनेसे क्या हानि है? इसपर सृष्टिचक्रको सुरक्षित रखनेके लिये यज्ञकी आवश्यकताका प्रतिपादन करते हैं—

* अघं स केवलं भुङ्क्ते यः पचत्यात्मकारणात्।
* जो मनुष्य अपने ही लिये भोजन पकाता है, वह केवल पापको ही खाता है।
16
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः। अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥ 16॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे पार्थ! जो पुरुष इस लोकमें इस प्रकार परम्परासे प्रचलित सृष्टिचक्रके अनुकूल नहीं बरतता अर्थात् अपने कर्तव्यका पालन नहीं करता, वह इन्द्रियोंके द्वारा भोगोंमें रमण करनेवाला
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार सृष्टिचक्रकी स्थिति यज्ञपर निर्भर बतलाकर और परमात्माको यज्ञमें प्रतिष्ठित कहकर अब उस यज्ञरूप स्वधर्मके पालनकी अवश्यकर्तव्यता सिद्ध करनेके लिये उस सृष्टिचक्रके अनुकूल न चलनेवालेकी यानी अपना कर्तव्य-पालन न करनेवालेकी निन्दा करते हैं—

17
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः। आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥ 17॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
परन्तु जो मनुष्य आत्मामें ही रमण करनेवाला और आत्मामें ही तृप्त तथा आत्मामें ही सन्तुष्ट हो उसके लिये कोई कर्तव्य नहीं है॥ 17॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि उपर्युक्त प्रकारसे सृष्टिचक्रके अनुसार चलनेका दायित्व किस श्रेणीके मनुष्योंपर है? इसपर परमात्माको प्राप्त सिद्ध महापुरुषके सिवा इस सृष्टिसे सम्बन्ध रखनेवाले सभी मनुष्योंपर अपने-अपने कर्तव्यपालनका दायित्व है—यह भाव दिखलानेके लिये दो श्लोकोंमें ज्ञानी महापुरुषके लिये कर्तव्यका अभाव और उसका हेतु बतलाते हैं—

18
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन। न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः॥ 18॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
उस महापुरुषका इस विश्वमें न तो कर्म करनेसे कोई प्रयोजन रहता है और न कर्मोंके न करनेसे ही कोई प्रयोजन रहता है। तथा सम्पूर्ण प्राणियोंमें भी इसका किंचिन्मात्र भी स्वार्थका
(1। 22)
19
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर। असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः॥ 19॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
इसलिये तू निरन्तर आसक्तिसे रहित होकर सदा कर्तव्यकर्मको भलीभाँति करता रह। क्योंकि आसक्तिसे रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्माको प्राप्त हो
सम्बन्ध

सम्बन्ध—यहाँतक भगवान्ने बहुत-से हेतु बतलाकर यह बात सिद्ध की कि जबतक मनुष्यको परम श्रेयरूप परमात्माकी प्राप्ति न हो जाय, तबतक उसके लिये स्वधर्मका पालन करना अर्थात् अपने वर्णाश्रमके अनुसार विहित कर्मोंका अनुष्ठान निःस्वार्थभावसे करना अवश्यकर्तव्य है और परमात्माको प्राप्त हुए पुरुषके लिये किसी प्रकारका कर्तव्य न रहनेपर भी उसके मन-इन्द्रियोंद्वारा लोकसंग्रहके लिये प्रारब्धानुसार कर्म होते हैं। अब उपर्युक्त वर्णनका लक्ष्य कराते हुए भगवान् अर्जुनको अनासक्तभावसे कर्तव्यकर्म करनेके लिये आज्ञा देते हैं—

20
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः। लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि॥ 20॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जनकादि ज्ञानीजन भी आसक्तिरहित कर्मद्वारा ही परम सिद्धिको प्राप्त हुए थे। इसलिये तथा लोकसंग्रहको देखते हुए भी तू कर्म करनेको ही योग्य है अर्थात् तुझे कर्म करना ही
सम्बन्ध

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने जो यह बात कही कि आसक्तिसे रहित होकर कर्म करनेवाला मनुष्य परमात्माको प्राप्त हो जाता है, उसी बातको पुष्ट करनेके लिये जनकादिका प्रमाण देकर पुनः अर्जुनके लिये कर्म करना उचित बतलाते हैं—

21
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ 21॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्यसमुदाय उसीके अनुसार बरतने लग
सम्बन्ध

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अर्जुनको लोकसंग्रहकी ओर देखते हुए कर्मोंका करना उचित बतलाया; इसपर यह जिज्ञासा होती है कि कर्म करनेसे किस प्रकार लोकसंग्रह होता है? अतः यही बात समझानेके लिये कहते हैं—

22
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन। नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥ 22॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे अर्जुन! मुझे इन तीनों लोकोंमें न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई भी प्राप्त करनेयोग्य वस्तु अप्राप्त है, तो भी मैं कर्ममें ही बरतता हूँ॥ 22॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार श्रेष्ठ महापुरुषोंके आचरणोंको लोकसंग्रहमें हेतु बतलाकर अब भगवान् तीन श्लोकोंमें अपना उदाहरण देकर वर्णाश्रमके अनुसार विहित कर्मोंके करनेकी अवश्यकर्तव्यताका प्रतिपादन करते हैं—

23
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥ 23॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
क्योंकि हे पार्थ! यदि कदाचित् मैं सावधान होकर कर्मोंमें न बरतूँ तो बड़ी हानि हो जाय; क्योंकि मनुष्य सब प्रकारसे मेरे ही मार्गका अनुसरण करते हैं॥ 23॥
24
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्। सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः॥ 24॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
इसलिये यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जायँ और मैं संकरताका करनेवाला होऊँ तथा इस समस्त प्रजाको नष्ट करनेवाला बनूँ॥ 24॥
25
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत। कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसङ्ग्रहम् ॥ 25॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे भारत! कर्ममें आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते हैं, आसक्तिरहित विद्वान् भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करे॥ 25॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार तीन श्लोकोंमें कर्मोंको सावधानीके साथ न करने और उनका त्याग करनेके कारण होनेवाले परिणामका अपने उदाहरणसे वर्णन करके, लोकसंग्रहकी दृष्टिसे सबके लिये विहित कर्मोंकी अवश्यकर्तव्यताका प्रतिपादन करनेके अनन्तर अब भगवान् उपर्युक्त लोकसंग्रहकी दृष्टिसे ज्ञानीको कर्म करनेके लिये प्रेरणा करते हैं—

26
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्। जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन्॥ 26॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
परमात्माके स्वरूपमें अटल स्थित हुए ज्ञानी पुरुषको चाहिये कि वह शास्त्रविहित कर्मोंमें आसक्तिवाले अज्ञानियोंकी बुद्धिमें भ्रम अर्थात् कर्मोंमें अश्रद्धा उत्पन्न न करे किंतु स्वयं शास्त्रविहित समस्त कर्म भलीभाँति करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवावे॥ 26॥
27
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥ 27॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
वास्तवमें सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जाते हैं तो भी जिसका अन्तःकरण अहंकारसे मोहित हो रहा है, ऐसा अज्ञानी “मैं कर्ता हूँ” ऐसा मानता है॥ 27॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार दो श्लोकोंमें ज्ञानीके लिये लोकसंग्रहको लक्ष्यमें रखते हुए शास्त्रविहित कर्म करनेकी प्रेरणा करके अब दो श्लोकोंमें कर्मासक्त जनसमुदायकी अपेक्षा सांख्ययोगीकी विलक्षणताका प्रतिपादन करते हैं—

28
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः। गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥ 28॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
परन्तु हे महाबाहो! गुणविभाग और कर्मविभागके तत्त्वको जाननेवाला ज्ञानयोगी सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं, ऐसा समझकर उनमें आसक्त नहीं होता॥ 28॥
29
प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु। तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्॥ 29॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
प्रकृतिके गुणोंसे अत्यन्त मोहित हुए मनुष्य गुणोंमें और कर्मोंमें आसक्त रहते हैं, उन पूर्णतया न समझनेवाले मन्दबुद्धि अज्ञानियोंको पूर्णतया जाननेवाला ज्ञानी विचलित न करे॥ 29॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार कर्मासक्त मनुष्योंकी और सांख्ययोगीकी स्थितिका भेद बतलाकर अब आत्मतत्त्वको पूर्णतया समझानेवाले महापुरुषके लिये यह प्रेरणा की जाती है कि वह कर्मासक्त अज्ञानी मनुष्योंको विचलित न करे—

30
मयि सर्वाणि कर्माणि सन्न्यस्याध्यात्मचेतसा। निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः॥ 30॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
मुझ अन्तर्यामी परमात्मामें लगे हुए चित्तद्वारा सम्पूर्ण कर्मोंको मुझमें अर्पण करके आशारहित, ममतारहित और सन्तापरहित होकर युद्ध कर॥ 30॥
सम्बन्ध
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सम्बन्ध—अर्जुनकी प्रार्थनाके अनुसार भगवान्ने उसे एक निश्चित कल्याणकारक साधन बतलानेके उद्देश्यसे चौथे श्लोकसे लेकर यहाँतक यह बात सिद्ध की कि मनुष्य किसी भी स्थितिमें क्यों न हो, उसे अपने वर्ण, आश्रम, स्वभाव और परिस्थितिके अनुरूप विहित कर्म करते ही रहना चाहिये। इस बातको सिद्ध करनेके लिये पूर्वश्लोकोंमें भगवान्ने क्रमशः निम्नलिखित बातें कही हैं—

1. कर्म किये बिना नैष्कर्म्यसिद्धिरूप कर्मनिष्ठा नहीं मिलती (3। 4)।

2. कर्मोंका त्याग कर देनेमात्रसे ज्ञाननिष्ठा सिद्ध नहीं होती (3। 4)।

3. एक क्षणके लिये भी मनुष्य सर्वथा कर्म किये बिना नहीं रह सकता (3। 5)।

4. बाहरसे कर्मोंका त्याग करके मनसे विषयोंका चिन्तन करते रहना मिथ्याचार है (3। 6)।

5. मन-इन्द्रियोंको वशमें करके निष्कामभावसे कर्म करनेवाला श्रेष्ठ है (3। 7)।

6. कर्म न करनेकी अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है (3। 8)।

7. बिना कर्म किये शरीरनिर्वाह भी नहीं हो सकता (3। 8)।

8. यज्ञके लिये किये जानेवाले कर्म बन्धन करनेवाले नहीं, बल्कि मुक्तिके कारण हैं (3। 9)।

9. कर्म करनेके लिये प्रजापतिकी आज्ञा है और निःस्वार्थभावसे उसका पालन करनेसे श्रेयकी प्राप्ति

होती है (3। 10, 11)।

10. कर्तव्यका पालन किये बिना भोगोंका उपभोग करनेवाला चोर है (3। 12) ।

11. कर्तव्य-पालन करके यज्ञशेषसे शरीरनिर्वाहके लिये भोजनादि करनेवाला सब पापोंसे छूट जाता है (3। 13)।

12. जो यज्ञादि न करके केवल शरीरपालनके लिये भोजन पकाता है, वह पापी है (3। 13)।

13. कर्तव्यकर्मके त्यागद्वारा सृष्टिचक्रमें बाधा पहुँचानेवाले मनुष्यका जीवन व्यर्थ और पापमय है (3। 16)।

14. अनासक्तभावसे कर्म करनेसे परमात्माकी प्राप्ति होती है (3। 19)।

15. पूर्वकालमें जनकादिने भी कर्मोंद्वारा ही सिद्धि प्राप्त की थी (3। 20)।

16. दूसरे मनुष्य श्रेष्ठ महापुरुषका अनुकरण करते हैं, इसलिये श्रेष्ठ महापुरुषको कर्म करना चाहिये (3। 21)।

17. भगवान्को कुछ भी कर्तव्य नहीं है, तो भी वे लोकसंग्रहके लिये कर्म करते हैं (3। 22)।

18. ज्ञानीके लिये कोई कर्तव्य नहीं है, तो भी उसे लोकसंग्रहके लिये कर्म करना चाहिये (3। 25)।

19. ज्ञानीको स्वयं विहित कर्मोंका त्याग करके या कर्मत्यागका उपदेश देकर किसी प्रकार भी लोगोंको

कर्तव्यकर्मसे विचलित न करना चाहिये वरं स्वयं कर्म करना और दूसरोंसे करवाना चाहिये (3। 26)।

20. ज्ञानी महापुरुषको उचित है कि विहित कर्मोंका स्वरूपतः त्याग करनेका उपदेश देकर कर्मासक्त

मनुष्योंको विचलित न करे (3 । 29)।

इस प्रकार कर्मोंकी अवश्यकर्तव्यताका प्रतिपादन करके अब भगवान् अर्जुनकी दूसरे श्लोकमें की हुई प्रार्थनाके अनुसार उसे परम कल्याणकी प्राप्तिका ऐकान्तिक और सर्वश्रेष्ठ निश्चित साधन बतलाते हुए युद्धके लिये आज्ञा देते हैं—

31
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः। श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः॥ 31॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो कोई मनुष्य दोषदृष्टिसे रहित और श्रद्धायुक्त होकर मेरे इस मतका सदा अनुसरण करते
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार अर्जुनको उनके कल्याणका निश्चित साधन बतलाते हुए भगवान् उन्हें युद्ध करनेकी आज्ञा देकर अब उसका अनुष्ठान करनेके फलका वर्णन करते हैं—

32
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्। सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः॥ 32॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
परन्तु जो मनुष्य मुझमें दोषारोपण करते हुए मेरे इस मतके अनुसार नहीं चलते हैं, उन मूर्खोंको तू सम्पूर्ण ज्ञानोंमें मोहित और नष्ट हुए ही समझ॥ 32॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार भगवान् अपने उपर्युक्त मतका अनुष्ठान करनेका फल बतलाकर अब उसके अनुसार न चलनेमें हानि बतलाते हैं—

33
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि। प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति॥ 33॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
सभी प्राणी प्रकृतिको प्राप्त होते हैं अर्थात् अपने स्वभावके परवश हुए कर्म करते हैं। ज्ञानवान् भी अपनी प्रकृतिके अनुसार चेष्टा करता है। फिर इसमें किसीका हठ क्या
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सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें यह बात कही गयी कि भगवान्के मतके अनुसार न चलनेवाला नष्ट हो जाता है; इसपर यह जिज्ञासा होती है कि यदि कोई भगवान्के मतके अनुसार कर्म न करके हठपूर्वक कर्मोंका सर्वथा त्याग कर दे तो क्या हानि है? इसपर कहते हैं—

34
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ। तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥ 34॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
इन्द्रिय-इन्द्रियके अर्थमें अर्थात् प्रत्येक इन्द्रियके विषयमें राग और द्वेष छिपे हुए स्थित हैं। मनुष्यको उन दोनोंके वशमें नहीं होना चाहिये, क्योंकि वे दोनों ही इसके कल्याणमार्गमें विघ्न करनेवाले महान् शत्रु हैं॥ 34॥
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सम्बन्ध—इस प्रकार सबको प्रकृतिके अनुसार कर्म करने पड़ते हैं, तो फिर कर्मबन्धनसे छूटनेके लिये मनुष्यको क्या करना चाहिये? इस जिज्ञासापर कहते हैं—

35
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥ 35॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
अच्छी प्रकार आचरणमें लाये हुए दूसरेके धर्मसे गुणरहित भी अपना धर्म अति उत्तम है। अपने धर्ममें तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरेका धर्म भयको देनेवाला है॥ 35॥
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सम्बन्ध—यहाँ अर्जुनके मनमें यह बात आ सकती है कि मैं यह युद्धरूप घोर कर्म न करके यदि भिक्षावृत्तिसे अपना निर्वाह करता हुआ शान्तिमय कर्मोंमें लगा रहूँ तो सहज ही राग-द्वेषसे छूट सकता हूँ, फिर आप मुझे युद्ध करनेके लिये आज्ञा क्यों दे रहे हैं? इसपर भगवान् कहते हैं—

(स्वर्गारोहण0 5। 63)
36अर्जुन
अर्जुन उवाच अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः। अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः॥ 36॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
अर्जुन बोले—हे कृष्ण! तो फिर यह मनुष्य स्वयं न चाहता हुआ भी बलात् लगाये हुएकी भाँति किससे प्रेरित होकर पापका आचरण करता है?॥ 36॥
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सम्बन्ध—मनुष्यका स्वधर्म पालन करनेमें ही कल्याण है, परधर्मका सेवन और निषिद्धकर्मोंका आचरण करनेमें सब प्रकारसे हानि है। इस बातको भलीभाँति समझ लेनेके बाद भी मनुष्य अपने इच्छा, विचार और धर्मके विरुद्ध पापाचारमें किस कारण प्रवृत्त हो जाते हैं—इस बातके जाननेकी इच्छासे अर्जुन पूछते हैं—

37श्रीभगवान्
श्रीभगवान् उवाच
श्रीभगवानुवाच काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः। महाशनो महापाप्मा विद्ध ्येनमिह वैरिणम्॥ 37॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
श्रीभगवान् बोले—रजोगुणसे उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है, यह बहुत खानेवाला अर्थात् भोगोंसे कभी न अघानेवाला और बड़ा पापी है, इसको ही तू इस विषयमें वैरी
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सम्बन्ध—इस प्रकार अर्जुनके पूछनेपर भगवान् श्रीकृष्ण कहने लगे—

* मनुस्मृतिमें भी यही बात कही है—
वरं स्वधर्मो विगुणो न पारक्यः स्वनुष्ठितः। परधर्मेण जीवन् हि सद्यः पतति जातितः॥ (10। 97)
“गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है, परंतु भलीभाँति पालन किया हुआ पर-धर्म श्रेष्ठ नहीं है। क्योंकि दूसरेके
धर्मसे जीवन धारण करनेवाला मनुष्य जातिसे तुरंत ही पतित हो जाता है।”
38
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च। यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्॥ 38॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जिस प्रकार धुएँसे अग्नि और मैलसे दर्पण ढका जाता है तथा जिस प्रकार जेरसे गर्भ ढका रहता है, वैसे ही उस कामके द्वारा यह ज्ञान ढका रहता है॥ 38॥
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सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें समस्त अनर्थोंका मूल और इस मनुष्यको बिना इच्छाके पापोंमें लगानेवाला वैरी कामको बतलाया। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि यह काम मनुष्यको किस प्रकार पापोंमें प्रवृत्त करता है? अतः अब तीन श्लोकोंद्वारा यह समझाते हैं कि यह मनुष्यके ज्ञानको आच्छादित करके उसे अन्धा बनाकर पापोंके गड्ढेमें ढकेल देता है—

39
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा। कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च॥ 39॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
और हे अर्जुन! इस अग्निके समान कभी न पूर्ण होनेवाले कामरूप ज्ञानियोंके नित्य वैरीके
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सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें “तेन” पद “काम”का और “इदम्” पद “ज्ञान” का वाचक है—इस बातको स्पष्ट करते हुए उस कामको अग्निकी भाँति कभी पूर्ण न होनेवाला बतलाते हैं—

(श्रीमद्भा0 9। 19। 14)
40
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते। एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्॥ 40॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि—ये सब इसके वासस्थान कहे जाते हैं। यह काम इन मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके द्वारा ही ज्ञानको आच्छादित करके जीवात्माको मोहित करता है॥ 40॥
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सम्बन्ध—इस प्रकार कामके द्वारा ज्ञानको आवृत बतलाकर अब उसे मारनेका उपाय बतलानेके उद्देश्यसे उसके वासस्थान और उसके द्वारा जीवात्माके मोहित किये जानेका प्रकार बतलाते हैं—

41
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ। पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्॥ 41॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
इसलिये हे अर्जुन! तू पहले इन्द्रियोंको वशमें करके इस ज्ञान और विज्ञानका नाश करनेवाले महान् पापी कामको अवश्य ही बलपूर्वक मार डाल॥ 41॥
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सम्बन्ध—इस प्रकार कामरूप वैरीके अत्याचारका और वह जहाँ छिपा रहकर अत्याचार करता है, उन वासस्थानोंका परिचय कराकर, अब भगवान् उस कामरूप वैरीको मारनेकी युक्ति बतलाते हुए उसे मार डालनेके लिये अर्जुनको आज्ञा देते हैं—

42
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः। मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥ 42॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
इन्द्रियोंको स्थूल शरीरसे पर यानी श्रेष्ठ, बलवान् और सूक्ष्म कहते हैं; इन इन्द्रियोंसे पर मन है, मनसे भी पर बुद्धि है और जो बुद्धिसे भी अत्यन्त पर है वह आत्मा है॥ 42॥
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सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें इन्द्रियोंको वशमें करके कामरूप शत्रुको मारनेके लिये कहा गया। इसपर यह शंका होती है कि जब इन्द्रिय, मन और बुद्धिपर कामका अधिकार है और उनके द्वारा कामने जीवात्माको मोहित कर रखा है तो ऐसी स्थितिमें वह इन्द्रियोंको वशमें करके कामको कैसे मार सकता है। इस शंकाको दूर करनेके लिये भगवान् आत्माके यथार्थ स्वरूपका लक्ष्य कराते हुए आत्मबलकी स्मृति कराते हैं—

1-आत्मान ँ्रथिनं विद्धि शरीर ँ्रथमेवतु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषया ँ्स्तेषु गोचरान्। आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं
भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः॥
(कठोपनिषद् 1। 3। 3-4)
“तू आत्माको रथी और शरीरको रथ जान तथा बुद्धिको सारथि और मनको लगाम समझ। विवेकी पुरुष इन्द्रियोंको
घोड़े बतलाते हैं और विषयोंको उनके मार्ग कहते हैं तथा शरीर, इन्द्रिय एवं मनसे युक्त आत्माको “भोक्ता” कहते हैं।”
2-यस्त्वविज्ञानवान् भवत्ययुक्तेन मनसा
सदा। तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः॥
यस्त्वविज्ञानवान् भवत्यमनस्कः सदाशुचिः। न स तत्पदमाप्नोति स ँ्सारं चाधिगच्छति॥
(कठोपनिषद् 1। 3। 5, 7)
“किंतु जो बुद्धिरूपी सारथि सर्वदा अविवेकी और असंयत चित्तसे युक्त होता है, उसके अधीन इन्द्रियाँ वैसे ही
नहीं रहतीं, जैसे सारथिके अधीन दुष्ट घोड़े।” “और जो (बुद्धिरूप सारथि) विज्ञानवान् नहीं है, जिसका मन निगृहीत
नहीं है और जो सदा अपवित्र है, वह उस पदको प्राप्त नहीं कर सकता वरं वह संसारको ही प्राप्त होता है।”
3-यस्तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा। तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः॥
यस्तु विज्ञानवान् भवति समनस्कः सदा शुचिः। स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते॥
(कठोपनिषद् 1। 3। 6, 8)
“परंतु जो बुद्धिरूपी सारथि विवेकशील (कुशल) सदा समाहितचित्त है, उसके अधीन इन्द्रियाँ वैसे ही रहती हैं,
जैसे सारथिके अधीन उत्तम शिक्षित घोडे़।”
“तथा जो विज्ञानवान् है, निगृहीत मनवाला है और सदा पवित्र रहता है, वह उस पदको प्राप्त कर लेता है, जहाँसे
फिर वह उत्पन्न नहीं होता यानी पुनर्जन्मको नहीं प्राप्त होता।”
43
एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना। जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्॥ 43॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
इस प्रकार बुद्धिसे पर अर्थात् सूक्ष्म, बलवान् और अत्यन्त श्रेष्ठ आत्माको जानकर और बुद्धिके द्वारा मनको वशमें करके हे महाबाहो! तू इस कामरूप दुर्जय शत्रुको मार डाल॥ 43॥
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सम्बन्ध—अब भगवान् पूर्वश्लोकके वर्णनानुसार आत्माको सर्वश्रेष्ठ समझकर कामरूप वैरीको मारनेके लिये आज्ञा देते हैं—

* इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः। मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान् परः॥
महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः
परः। पुरुषान्न परं किञ्चित् सा काष्ठा सा परा गतिः॥
(कठोपनिषद् 1। 3। 10-11)
“इन्द्रियोंकी अपेक्षा उनके अर्थ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धरूप तन्मात्राएँ) पर (श्रेष्ठ, सूक्ष्म और बलवान्)
हैं, अर्थोंसे मन पर है, मनसे बुद्धि पर है और बुद्धिसे भी महान् आत्मा (महत्तत्त्व समष्टि-बुद्धि) पर है। महत्तत्त्वसे
अव्यक्त (मूल प्रकृति) पर है और अव्यक्तसे पुरुष पर है। पुरुषसे पर और कुछ नहीं है, वही पराकाष्ठा (अन्तिम अवधि)
है और वही परम गति है।”
* एष सर्वेषु भूतेषु गूढोऽऽत्मा न प्रकाशते। दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः॥
(कठोपनिषद् 1। 3। 12)
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः॥
3.1श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीका