कर्मयोग
सम्बन्ध—दूसरे अध्यायमें भगवान्ने “अशोच्यानन्वशोचस्त्वम्” (2। 11) से लेकर “देही नित्यमवध्योऽयम्” (2। 30) तक आत्मतत्त्वका निरूपण करते हुए सांख्ययोगका प्रतिपादन किया और “बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु” (2। 39) से लेकर “तदा योगमवाप्स्यसि” (2। 53) तक समबुद्धिरूप कर्मयोगका वर्णन किया। इसके पश्चात् चौवनवें श्लोकसे अध्यायकी समाप्तिपर्यन्त अर्जुनके पूछनेपर भगवान्ने समबुद्धिरूप कर्मयोगके द्वारा परमेश्वरको प्राप्त हुए स्थितप्रज्ञ सिद्ध पुरुषके लक्षण, आचरण और महत्त्वका प्रतिपादन किया। वहाँ कर्मयोगकी महिमा कहते हुए भगवान्ने सैंतालीसवें और अड़तालीसवें श्लोकोंमें कर्मयोगका स्वरूप बतलाकर अर्जुनको कर्म करनेके लिये कहा; उनचासवेंमें समबुद्धिरूप कर्मयोगकी अपेक्षा सकाम कर्मका स्थान बहुत ही नीचा बतलाया, पचासवेंमें समबुद्धियुक्त पुरुषकी प्रशंसा करके अर्जुनको कर्मयोगमें लगनेके लिये कहा, इक्यावनवेंमें समबुद्धियुक्त ज्ञानी पुरुषको अनामय पदकी प्राप्ति बतलायी। इस प्रसंगको सुनकर अर्जुन उसका यथार्थ अभिप्राय निश्चित नहीं कर सके। “बुद्धि” शब्दका अर्थ “ज्ञान” मान लेनेसे उन्हें भ्रम हो गया, भगवान्के वचनोंमें “कर्म” की अपेक्षा “ज्ञान” की प्रशंसा प्रतीत होने लगी; एवं वे वचन उनको स्पष्ट न दिखायी देकर मिले हुए-से जान पड़ने लगे। अतएव भगवान्से उनका स्पष्टीकरण करवानेकी और अपने लिये निश्चित श्रेयःसाधन जाननेकी इच्छासे अर्जुन पूछते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार अर्जुनके पूछनेपर भगवान् उनका निश्चित कर्तव्य भक्तिप्रधान कर्मयोग बतलानेके उद्देश्यसे पहले उनके प्रश्नका उत्तर देते हुए यह दिखलाते हैं कि मेरे वचन “व्यामिश्र” अर्थात् “मिले हुए” नहीं हैं वरं सर्वथा स्पष्ट और अलग-अलग हैं—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने जो यह बात कही है कि सांख्यनिष्ठा ज्ञानयोगके साधनसे होती है और योगनिष्ठा कर्मयोगके साधनसे होती है, उसी बातको सिद्ध करनेके लिये अब यह दिखलाते हैं कि कर्तव्यकर्मोंका स्वरूपतः त्याग किसी भी निष्ठाका हेतु नहीं है—
सम्बन्ध—इस प्रकार कर्मयोगीके लिये कर्तव्यकर्मोंके न करनेको योगनिष्ठाकी प्राप्तिमें बाधक और सांख्ययोगीके लिये सिद्धिकी प्राप्तिमें केवल स्वरूपसे बाहरी कर्मोंके त्यागको गौण बतलाकर, अब अर्जुनको कर्तव्यकर्मोंमें प्रवृत्त करनेके उद्देश्यसे भिन्न-भिन्न हेतुओंसे कर्म करनेकी आवश्यकता सिद्ध करनेके लिये पहले कर्मोंके सर्वथा त्यागको अशक्य बतलाते हैं—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें यह बात कही गयी कि कोई भी मनुष्य क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रहता; इसपर यह शंका होती है कि इन्द्रियोंकी क्रियाओंको हठसे रोककर भी तो मनुष्य कर्मोंका त्याग कर सकता है? अतः ऊपरसे इन्द्रियोंकी क्रियाओंका त्याग कर देना कर्मोंका त्याग नहीं है, यह भाव दिखलानेके लिये भगवान् कहते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार केवल ऊपरसे इन्द्रियोंको विषयोंसे हटा लेनेको मिथ्याचार बतलाकर, अब आसक्तिका त्याग करके इन्द्रियोंद्वारा निष्कामभावसे कर्तव्यकर्म करनेवाले योगीकी प्रशंसा करते हैं—
सम्बन्ध—अर्जुनने जो यह पूछा था कि आप मुझे घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं, उसके उत्तरमें ऊपरसे कर्मोंका त्याग करनेवाले मिथ्याचारीकी निन्दा और कर्मयोगीकी प्रशंसा करके अब उन्हें कर्म करनेके लिये आज्ञा देते हैं—
सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि शास्त्रविहित यज्ञ, दान और तप आदि शुभ कर्म भी तो बन्धनके हेतु माने गये हैं; फिर कर्म न करनेकी अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ कैसे है? इसपर कहते हैं—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने यह बात कही कि यज्ञके निमित्त कर्म करनेवाला मनुष्य कर्मोंसे नहीं बँधता; इसलिये यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि यज्ञ किसको कहते हैं, उसे क्यों करना चाहिये और उसके लिये कर्म करनेवाला मनुष्य कैसे नहीं बँधता। अतएव इन बातोंको समझानेके लिये भगवान् ब्रह्माजीके वचनोंका प्रमाण देकर कहते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार ब्रह्माजीके वचनोंका प्रमाण देकर भगवान्ने यज्ञादि कर्मोंकी कर्तव्यताका प्रतिपादन किया और साथ ही उनका पालन न करनेवालेको चोर बतलाकर उसकी निन्दा की; अब उन कर्तव्यकर्मोंका आचरण करनेवाले पुरुषोंकी प्रशंसा करते हुए उनसे विपरीत केवल शरीरपोषणके लिये ही कर्म करनेवाले पापियोंकी निन्दा करते हैं—
सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि यज्ञ न करनेसे क्या हानि है? इसपर सृष्टिचक्रको सुरक्षित रखनेके लिये यज्ञकी आवश्यकताका प्रतिपादन करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार सृष्टिचक्रकी स्थिति यज्ञपर निर्भर बतलाकर और परमात्माको यज्ञमें प्रतिष्ठित कहकर अब उस यज्ञरूप स्वधर्मके पालनकी अवश्यकर्तव्यता सिद्ध करनेके लिये उस सृष्टिचक्रके अनुकूल न चलनेवालेकी यानी अपना कर्तव्य-पालन न करनेवालेकी निन्दा करते हैं—
सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि उपर्युक्त प्रकारसे सृष्टिचक्रके अनुसार चलनेका दायित्व किस श्रेणीके मनुष्योंपर है? इसपर परमात्माको प्राप्त सिद्ध महापुरुषके सिवा इस सृष्टिसे सम्बन्ध रखनेवाले सभी मनुष्योंपर अपने-अपने कर्तव्यपालनका दायित्व है—यह भाव दिखलानेके लिये दो श्लोकोंमें ज्ञानी महापुरुषके लिये कर्तव्यका अभाव और उसका हेतु बतलाते हैं—
सम्बन्ध—यहाँतक भगवान्ने बहुत-से हेतु बतलाकर यह बात सिद्ध की कि जबतक मनुष्यको परम श्रेयरूप परमात्माकी प्राप्ति न हो जाय, तबतक उसके लिये स्वधर्मका पालन करना अर्थात् अपने वर्णाश्रमके अनुसार विहित कर्मोंका अनुष्ठान निःस्वार्थभावसे करना अवश्यकर्तव्य है और परमात्माको प्राप्त हुए पुरुषके लिये किसी प्रकारका कर्तव्य न रहनेपर भी उसके मन-इन्द्रियोंद्वारा लोकसंग्रहके लिये प्रारब्धानुसार कर्म होते हैं। अब उपर्युक्त वर्णनका लक्ष्य कराते हुए भगवान् अर्जुनको अनासक्तभावसे कर्तव्यकर्म करनेके लिये आज्ञा देते हैं—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने जो यह बात कही कि आसक्तिसे रहित होकर कर्म करनेवाला मनुष्य परमात्माको प्राप्त हो जाता है, उसी बातको पुष्ट करनेके लिये जनकादिका प्रमाण देकर पुनः अर्जुनके लिये कर्म करना उचित बतलाते हैं—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अर्जुनको लोकसंग्रहकी ओर देखते हुए कर्मोंका करना उचित बतलाया; इसपर यह जिज्ञासा होती है कि कर्म करनेसे किस प्रकार लोकसंग्रह होता है? अतः यही बात समझानेके लिये कहते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार श्रेष्ठ महापुरुषोंके आचरणोंको लोकसंग्रहमें हेतु बतलाकर अब भगवान् तीन श्लोकोंमें अपना उदाहरण देकर वर्णाश्रमके अनुसार विहित कर्मोंके करनेकी अवश्यकर्तव्यताका प्रतिपादन करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार तीन श्लोकोंमें कर्मोंको सावधानीके साथ न करने और उनका त्याग करनेके कारण होनेवाले परिणामका अपने उदाहरणसे वर्णन करके, लोकसंग्रहकी दृष्टिसे सबके लिये विहित कर्मोंकी अवश्यकर्तव्यताका प्रतिपादन करनेके अनन्तर अब भगवान् उपर्युक्त लोकसंग्रहकी दृष्टिसे ज्ञानीको कर्म करनेके लिये प्रेरणा करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार दो श्लोकोंमें ज्ञानीके लिये लोकसंग्रहको लक्ष्यमें रखते हुए शास्त्रविहित कर्म करनेकी प्रेरणा करके अब दो श्लोकोंमें कर्मासक्त जनसमुदायकी अपेक्षा सांख्ययोगीकी विलक्षणताका प्रतिपादन करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार कर्मासक्त मनुष्योंकी और सांख्ययोगीकी स्थितिका भेद बतलाकर अब आत्मतत्त्वको पूर्णतया समझानेवाले महापुरुषके लिये यह प्रेरणा की जाती है कि वह कर्मासक्त अज्ञानी मनुष्योंको विचलित न करे—
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सम्बन्ध—अर्जुनकी प्रार्थनाके अनुसार भगवान्ने उसे एक निश्चित कल्याणकारक साधन बतलानेके उद्देश्यसे चौथे श्लोकसे लेकर यहाँतक यह बात सिद्ध की कि मनुष्य किसी भी स्थितिमें क्यों न हो, उसे अपने वर्ण, आश्रम, स्वभाव और परिस्थितिके अनुरूप विहित कर्म करते ही रहना चाहिये। इस बातको सिद्ध करनेके लिये पूर्वश्लोकोंमें भगवान्ने क्रमशः निम्नलिखित बातें कही हैं—
1. कर्म किये बिना नैष्कर्म्यसिद्धिरूप कर्मनिष्ठा नहीं मिलती (3। 4)।
2. कर्मोंका त्याग कर देनेमात्रसे ज्ञाननिष्ठा सिद्ध नहीं होती (3। 4)।
3. एक क्षणके लिये भी मनुष्य सर्वथा कर्म किये बिना नहीं रह सकता (3। 5)।
4. बाहरसे कर्मोंका त्याग करके मनसे विषयोंका चिन्तन करते रहना मिथ्याचार है (3। 6)।
5. मन-इन्द्रियोंको वशमें करके निष्कामभावसे कर्म करनेवाला श्रेष्ठ है (3। 7)।
6. कर्म न करनेकी अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है (3। 8)।
7. बिना कर्म किये शरीरनिर्वाह भी नहीं हो सकता (3। 8)।
8. यज्ञके लिये किये जानेवाले कर्म बन्धन करनेवाले नहीं, बल्कि मुक्तिके कारण हैं (3। 9)।
9. कर्म करनेके लिये प्रजापतिकी आज्ञा है और निःस्वार्थभावसे उसका पालन करनेसे श्रेयकी प्राप्ति
होती है (3। 10, 11)।
10. कर्तव्यका पालन किये बिना भोगोंका उपभोग करनेवाला चोर है (3। 12) ।
11. कर्तव्य-पालन करके यज्ञशेषसे शरीरनिर्वाहके लिये भोजनादि करनेवाला सब पापोंसे छूट जाता है (3। 13)।
12. जो यज्ञादि न करके केवल शरीरपालनके लिये भोजन पकाता है, वह पापी है (3। 13)।
13. कर्तव्यकर्मके त्यागद्वारा सृष्टिचक्रमें बाधा पहुँचानेवाले मनुष्यका जीवन व्यर्थ और पापमय है (3। 16)।
14. अनासक्तभावसे कर्म करनेसे परमात्माकी प्राप्ति होती है (3। 19)।
15. पूर्वकालमें जनकादिने भी कर्मोंद्वारा ही सिद्धि प्राप्त की थी (3। 20)।
16. दूसरे मनुष्य श्रेष्ठ महापुरुषका अनुकरण करते हैं, इसलिये श्रेष्ठ महापुरुषको कर्म करना चाहिये (3। 21)।
17. भगवान्को कुछ भी कर्तव्य नहीं है, तो भी वे लोकसंग्रहके लिये कर्म करते हैं (3। 22)।
18. ज्ञानीके लिये कोई कर्तव्य नहीं है, तो भी उसे लोकसंग्रहके लिये कर्म करना चाहिये (3। 25)।
19. ज्ञानीको स्वयं विहित कर्मोंका त्याग करके या कर्मत्यागका उपदेश देकर किसी प्रकार भी लोगोंको
कर्तव्यकर्मसे विचलित न करना चाहिये वरं स्वयं कर्म करना और दूसरोंसे करवाना चाहिये (3। 26)।
20. ज्ञानी महापुरुषको उचित है कि विहित कर्मोंका स्वरूपतः त्याग करनेका उपदेश देकर कर्मासक्त
मनुष्योंको विचलित न करे (3 । 29)।
इस प्रकार कर्मोंकी अवश्यकर्तव्यताका प्रतिपादन करके अब भगवान् अर्जुनकी दूसरे श्लोकमें की हुई प्रार्थनाके अनुसार उसे परम कल्याणकी प्राप्तिका ऐकान्तिक और सर्वश्रेष्ठ निश्चित साधन बतलाते हुए युद्धके लिये आज्ञा देते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार अर्जुनको उनके कल्याणका निश्चित साधन बतलाते हुए भगवान् उन्हें युद्ध करनेकी आज्ञा देकर अब उसका अनुष्ठान करनेके फलका वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार भगवान् अपने उपर्युक्त मतका अनुष्ठान करनेका फल बतलाकर अब उसके अनुसार न चलनेमें हानि बतलाते हैं—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें यह बात कही गयी कि भगवान्के मतके अनुसार न चलनेवाला नष्ट हो जाता है; इसपर यह जिज्ञासा होती है कि यदि कोई भगवान्के मतके अनुसार कर्म न करके हठपूर्वक कर्मोंका सर्वथा त्याग कर दे तो क्या हानि है? इसपर कहते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार सबको प्रकृतिके अनुसार कर्म करने पड़ते हैं, तो फिर कर्मबन्धनसे छूटनेके लिये मनुष्यको क्या करना चाहिये? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
सम्बन्ध—यहाँ अर्जुनके मनमें यह बात आ सकती है कि मैं यह युद्धरूप घोर कर्म न करके यदि भिक्षावृत्तिसे अपना निर्वाह करता हुआ शान्तिमय कर्मोंमें लगा रहूँ तो सहज ही राग-द्वेषसे छूट सकता हूँ, फिर आप मुझे युद्ध करनेके लिये आज्ञा क्यों दे रहे हैं? इसपर भगवान् कहते हैं—
सम्बन्ध—मनुष्यका स्वधर्म पालन करनेमें ही कल्याण है, परधर्मका सेवन और निषिद्धकर्मोंका आचरण करनेमें सब प्रकारसे हानि है। इस बातको भलीभाँति समझ लेनेके बाद भी मनुष्य अपने इच्छा, विचार और धर्मके विरुद्ध पापाचारमें किस कारण प्रवृत्त हो जाते हैं—इस बातके जाननेकी इच्छासे अर्जुन पूछते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार अर्जुनके पूछनेपर भगवान् श्रीकृष्ण कहने लगे—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें समस्त अनर्थोंका मूल और इस मनुष्यको बिना इच्छाके पापोंमें लगानेवाला वैरी कामको बतलाया। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि यह काम मनुष्यको किस प्रकार पापोंमें प्रवृत्त करता है? अतः अब तीन श्लोकोंद्वारा यह समझाते हैं कि यह मनुष्यके ज्ञानको आच्छादित करके उसे अन्धा बनाकर पापोंके गड्ढेमें ढकेल देता है—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें “तेन” पद “काम”का और “इदम्” पद “ज्ञान” का वाचक है—इस बातको स्पष्ट करते हुए उस कामको अग्निकी भाँति कभी पूर्ण न होनेवाला बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार कामके द्वारा ज्ञानको आवृत बतलाकर अब उसे मारनेका उपाय बतलानेके उद्देश्यसे उसके वासस्थान और उसके द्वारा जीवात्माके मोहित किये जानेका प्रकार बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार कामरूप वैरीके अत्याचारका और वह जहाँ छिपा रहकर अत्याचार करता है, उन वासस्थानोंका परिचय कराकर, अब भगवान् उस कामरूप वैरीको मारनेकी युक्ति बतलाते हुए उसे मार डालनेके लिये अर्जुनको आज्ञा देते हैं—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें इन्द्रियोंको वशमें करके कामरूप शत्रुको मारनेके लिये कहा गया। इसपर यह शंका होती है कि जब इन्द्रिय, मन और बुद्धिपर कामका अधिकार है और उनके द्वारा कामने जीवात्माको मोहित कर रखा है तो ऐसी स्थितिमें वह इन्द्रियोंको वशमें करके कामको कैसे मार सकता है। इस शंकाको दूर करनेके लिये भगवान् आत्माके यथार्थ स्वरूपका लक्ष्य कराते हुए आत्मबलकी स्मृति कराते हैं—
सम्बन्ध—अब भगवान् पूर्वश्लोकके वर्णनानुसार आत्माको सर्वश्रेष्ठ समझकर कामरूप वैरीको मारनेके लिये आज्ञा देते हैं—