ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
सम्बन्ध—तीसरे अध्यायके चौथे श्लोकसे लेकर उनतीसवें श्लोकतक भगवान्ने बहुत प्रकारसे विहित कर्मोंके आचरणकी आवश्यकताका प्रतिपादन करके तीसवें श्लोकमें अर्जुनको भक्तिप्रधान कर्मयोगकी विधिसे ममता, आसक्ति और कामनाका सर्वथा त्याग करके भगवदर्पणबुद्धिसे कर्म करनेकी आज्ञा दी। उसके बाद इकतीसवेंसे पैंतीसवें श्लोकतक उस सिद्धान्तके अनुसार कर्म करनेवालोंकी प्रशंसा और न करनेवालोंकी निन्दा करके राग-द्वेषके वशमें न होनेके लिये कहते हुए स्वधर्मपालनपर जोर दिया। फिर छत्तीसवें श्लोकमें अर्जुनके पूछनेपर सैंतीसवेंसे अध्यायसमाप्तिपर्यन्त कामको सारे अनर्थोंका हेतु बतलाकर बुद्धिके द्वारा इन्द्रियों और मनको वशमें करके उसे मारनेकी आज्ञा दी; परंतु कर्मयोगका तत्त्व बड़ा ही गहन है, इसलिये अब भगवान् पुनः उसके सम्बन्धमें बहुत-सी बातें बतलानेके उद्देश्यसे उसीका प्रकरण आरम्भ करते हुए पहले तीन श्लोकोंमें उस कर्मयोगकी परम्परा बतलाकर उसकी अनादिता सिद्ध करते हुए प्रशंसा करते हैं—
सम्बन्ध—उपर्युक्त वर्णनसे मनुष्यको स्वाभाविक ही यह शंका हो सकती है कि भगवान् श्रीकृष्ण तो अभी द्वापरयुगमें प्रकट हुए हैं और सूर्यदेव, मनु एवं इक्ष्वाकु बहुत पहले हो चुके हैं; तब इन्होंने इस योगका उपदेश सूर्यके प्रति कैसे दिया? अतएव इसके समाधानके साथ ही भगवान्के अवतार-तत्त्वको भली प्रकार समझनेकी इच्छासे अर्जुन पूछते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार अर्जुनके पूछनेपर अपने अवतार-तत्त्वका रहस्य समझानेके लिये अपनी सर्वज्ञता प्रकट करते हुए भगवान् कहते हैं—
सम्बन्ध—भगवान्के मुखसे यह बात सुनकर कि अबतक मेरे बहुत-से जन्म हो चुके हैं, यह जाननेकी इच्छा होती है कि आपका जन्म किस प्रकार होता है और आपके जन्ममें तथा अन्य लोगोंके जन्ममें क्या भेद है। अतएव इस बातको समझानेके लिये भगवान् अपने जन्मका तत्त्व बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार भगवान्के मुखसे उनके जन्मका तत्त्व सुननेपर यह जिज्ञासा होती है कि आप किस-किस समय और किन-किन कारणोंसे इस प्रकार अवतार धारण करते हैं। इसपर भगवान् दो श्लोकोंमें अपने अवतारके अवसर, हेतु और उद्देश्य बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार भगवान् अपने दिव्य जन्मोंके अवसर, हेतु और उद्देश्यका वर्णन करके अब उन जन्मोंकी और उनमें किये जानेवाले कर्मोंकी दिव्यताको तत्त्वसे जाननेका फल बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार भगवान्के जन्म और कर्मोंको तत्त्वसे दिव्य समझ लेनेका जो फल बतलाया गया है, वह अनादि परम्परासे चला आ रहा है—इस बातको स्पष्ट करनेके लिये भगवान् कहते हैं—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकोंमें भगवान्ने यह बात कही कि मेरे जन्म और कर्मोंको जो दिव्य समझ लेते हैं, उन अनन्यप्रेमी भक्तोंको मेरी प्राप्ति हो जाती है; इसपर यह जिज्ञासा होती है कि उनको आप किस प्रकार और किस रूपमें मिलते हैं? इसपर कहते हैं—
सम्बन्ध—यदि यह बात है, तो फिर लोग भगवान्को न भजकर अन्य देवताओंकी उपासना क्यों करते हैं? इसपर कहते हैं—
सम्बन्ध—नवें श्लोकमें भगवान्के दिव्य जन्म और कर्मोंको तत्त्वसे जाननेका फल भगवान्की प्राप्ति बतलाया गया। उसके पूर्व भगवान्के जन्मकी दिव्यताका विषय तो भलीभाँति समझाया गया, किंतु भगवान्के कर्मोंकी दिव्यताका विषय स्पष्ट नहीं हुआ; इसलिये अब भगवान् दो श्लोकोंमें अपने सृष्टि-रचनादि कर्मोंमें कर्तापन, विषमता और स्पृहाका अभाव दिखलाकर उन कर्मोंकी दिव्यताका विषय समझाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार भगवान् अपने कर्मोंकी दिव्यता और उनका तत्त्व जाननेका महत्त्व बतलाकर, अब मुमुक्षु पुरुषोंके उदाहरणपूर्वक उसी प्रकार निष्कामभावसे कर्म करनेके लिये अर्जुनको आज्ञा देते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार अर्जुनको भगवान्ने निष्कामभावसे कर्म करनेकी आज्ञा दी। किंतु कर्म-अकर्मका तत्त्व समझे बिना मनुष्य निष्कामभावसे कर्म नहीं कर सकता; इसलिये अब भगवान् ममता, आसक्ति, फलेच्छा और अहंकारके बिना किये जानेवाले दिव्य कर्मोंका तत्त्व भलीभाँति समझानेके लिये कर्मतत्त्वकी दुर्विज्ञेयता और उसके जाननेका महत्त्व प्रकट करते हुए उसे कहनेकी प्रतिज्ञा करते हैं—
सम्बन्ध—यहाँ स्वभावतः मनुष्य मान सकता है कि शास्त्रविहित करनेयोग्य कर्मोंका नाम कर्म है और क्रियाओंका स्वरूपसे त्याग कर देना ही अकर्म है—इसमें मोहित होनेकी कौन-सी बात है और इन्हें जानना क्या है? किंतु इतना जान लेनेमात्रसे ही वास्तविक कर्म-अकर्मका निर्णय नहीं हो सकता, कर्मोंके तत्त्वको भलीभाँति समझनेकी आवश्यकता है। इस भावको स्पष्ट करनेके लिये भगवान् कहते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार श्रोताके अन्तःकरणमें रुचि और श्रद्धा उत्पन्न करनेके लिये कर्मतत्त्वको गहन एवं उसका जानना आवश्यक बतलाकर अब अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार भगवान् कर्मका तत्त्व समझाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्मदर्शनका महत्त्व बतलाकर अब पाँच श्लोकोंमें भिन्न-भिन्न शैलीसे उपर्युक्त कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्मदर्शनपूर्वक कर्म करनेवाले सिद्ध और साधक पुरुषोंकी असंगताका वर्णन करके उस विषयको स्पष्ट करते हैं—
सम्बन्ध—उपर्युक्त श्लोकोंमें यह बात कही गयी कि ममता, आसक्ति, फलेच्छा और अहंकारके बिना केवल लोकसंग्रहके लिये शास्त्रसम्मत यज्ञ, दान और तप आदि समस्त कर्म करता हुआ भी ज्ञानी पुरुष वास्तवमें कुछ भी नहीं करता। इसलिये वह कर्मबन्धनमें नहीं पड़ता। इसपर यह प्रश्न उठता है कि ज्ञानीको आदर्श मानकर उपर्युक्त प्रकारसे कर्म करनेवाले साधक तो नित्य-नैमित्तिक आदि कर्मोंका त्याग नहीं करते, निष्कामभावसे सब प्रकारके शास्त्रविहित कर्तव्यकर्मोंका अनुष्ठान करते रहते हैं—इस कारण वे किसी पापके भागी नहीं बनते; किंतु जो साधक शास्त्रविहित यज्ञ-दानादि कर्मोंका अनुष्ठान न करके केवल शरीरनिर्वाहमात्रके लिये आवश्यक शौच-स्नान और खान-पान आदि कर्म ही करता है, वह तो पापका भागी होता होगा। ऐसी शंकाकी निवृत्तिके लिये भगवान् कहते हैं—
सम्बन्ध—उपर्युक्त श्लोकोंमें यह बात सिद्ध की गयी कि परमात्माको प्राप्त सिद्ध महापुरुषोंका तो कर्म करने या न करनेसे कोई प्रयोजन नहीं रहता, तथा ज्ञानयोगके साधकका ग्रहण और त्याग शास्त्रसम्मत, आसक्तिरहित और ममतारहित होता है; अतः वे कर्म करते हुए या उनका त्याग करते हुए—सभी अवस्थाओंमें कर्मबन्धनसे सर्वथा मुक्त हैं। अब भगवान् यह बात दिखलाते हैं कि कर्ममें अकर्मदर्शनपूर्वक कर्म करनेवाला कर्मयोगी भी कर्मबन्धनमें नहीं पड़ता—
सम्बन्ध—यहाँ यह प्रश्न उठता है कि उपर्युक्त प्रकारसे किये हुए कर्म बन्धनके हेतु नहीं बनते, इतनी ही बात है या उनका और भी कुछ महत्त्व है। इसपर कहते हैं—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें यह बात कही गयी कि यज्ञके लिये कर्म करनेवाले पुरुषके समस्त कर्म विलीन हो जाते हैं। वहाँ केवल अग्निमें हविका हवन करना ही यज्ञ है और उसके सम्पादन करनेके लिये की जानेवाली क्रिया ही यज्ञके लिये कर्म करना है, इतनी ही बात नहीं है; वर्ण, आश्रम, स्वभाव और परिस्थितिके अनुसार जिसका जो कर्तव्य है; वही उसके लिये यज्ञ है और उसका पालन करनेके लिये आवश्यक क्रियाओंका निःस्वार्थबुद्धिसे लोकसंग्रहार्थ करना ही उस यज्ञके लिये कर्म करना है—इसी भावको सुस्पष्ट करनेके लिये अब भगवान् सात श्लोकोंमें भिन्न-भिन्न योगियोंद्वारा किये जानेवाले परमात्माकी प्राप्तिके साधनरूप शास्त्रविहित कर्तव्य-कर्मोंका विभिन्न यज्ञोंके नामसे वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार ब्रह्मकर्मरूप यज्ञका वर्णन करके अब अगले श्लोकमें देवपूजनरूप यज्ञका और आत्मा-परमात्माके अभेददर्शनरूप यज्ञका वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार दैवयज्ञ और अभेददर्शनरूप यज्ञका वर्णन करनेके अनन्तर अब इन्द्रियसंयमरूप यज्ञका और विषयहवनरूप यज्ञका वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—अब आत्मसंयमयोगरूप यज्ञका वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार समाधियोगके साधनको यज्ञका रूप देकर अब अगले श्लोकमें द्रव्ययज्ञ, तपोयज्ञ, योगयज्ञ और स्वाध्यायरूप ज्ञानयज्ञका संक्षेपमें वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—द्रव्ययज्ञादि चार प्रकारके यज्ञोंका संक्षेपमें वर्णन करके अब दो श्लोकोंमें प्राणायामरूप यज्ञोंका वर्णन करते हुए सब प्रकारके यज्ञ करनेवाले साधकोंकी प्रशंसा करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार यज्ञ करनेवाले साधकोंकी प्रशंसा करके अब उन यज्ञोंके करनेसे होनेवाले लाभ और न करनेसे होनेवाली हानि दिखलाकर भगवान् उपर्युक्त प्रकारसे यज्ञ करनेकी आवश्यकताका प्रतिपादन करते हैं—
सम्बन्ध—सोलहवें श्लोकमें भगवान्ने यह बात कही थी कि मैं तुम्हें वह कर्मतत्त्व बतलाऊँगा, जिसे जानकर तुम अशुभसे मुक्त हो जाओगे। उस प्रतिज्ञाके अनुसार अठारहवें श्लोकसे यहाँतक उस कर्मतत्त्वका वर्णन करके अब उसका उपसंहार करते हैं—
सम्बन्ध—उपर्युक्त प्रकरणमें भगवान्ने कई प्रकारके यज्ञोंका वर्णन किया और यह बात भी कही कि इनके सिवा और भी बहुत-से यज्ञ वेद-शास्त्रोंमें बतलाये गये हैं; इसलिये यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि उन यज्ञोंमेंसे कौन-सा यज्ञ श्रेष्ठ है। इसपर भगवान् कहते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार ज्ञानयज्ञकी और उसके फलरूप ज्ञानकी प्रशंसा करके अब भगवान् दो श्लोकोंमें ज्ञानको प्राप्त करनेके लिये अर्जुनको आज्ञा देते हुए उसकी प्राप्तिका मार्ग और उसका फल बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार गुरुजनोंसे तत्त्वज्ञान सीखनेकी विधि और उसका फल बतलाकर अब उसका माहात्म्य बतलाते हैं—
सम्बन्ध—कोई भी दृष्टान्त परमार्थविषयको पूर्णरूपसे नहीं समझा सकता, उसके एक अंशको ही समझानेके लिये उपयोगी होता है; अतएव पूर्वश्लोकमें बतलाये हुए ज्ञानके महत्त्वको अग्निके दृष्टान्तसे पुनः स्पष्ट करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार चौंतीसवें श्लोकसे यहाँतक तत्त्वज्ञानी महापुरुषोंकी सेवा आदि करके तत्त्वज्ञानको प्राप्त करनेके लिये कहकर भगवान्ने उसके फलका वर्णन करते हुए उसका माहात्म्य बतलाया। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि यह तत्त्वज्ञान ज्ञानी महापुरुषोंसे श्रवण करके विधिपूर्वक मनन और निदिध्यासनादि ज्ञानयोगके साधनोंद्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है या इसकी प्राप्तिका कोई दूसरा मार्ग भी है; इसपर अगले श्लोकमें पुनः उस ज्ञानकी महिमा प्रकट करते हुए भगवान् कर्मयोगके द्वारा भी वही ज्ञान अपने-आप प्राप्त होनेकी बात कहते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार तत्त्वज्ञानकी महिमा कहते हुए उसकी प्राप्तिके सांख्ययोग और कर्मयोग—दो उपाय बतलाकर, अब भगवान् उस ज्ञानकी प्राप्तिके पात्रका निरूपण करते हुए उस ज्ञानका फल परम शान्तिकी प्राप्ति बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार श्रद्धावान्को ज्ञानकी प्राप्ति और उस ज्ञानसे परम शान्तिकी प्राप्ति बतलाकर अब श्रद्धा और विवेकहीन संशयात्माकी निन्दा करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार अविवेक और अश्रद्धाके सहित संशयको ज्ञानप्राप्तिमें बाधक बतलाकर, अब विवेकद्वारा संशयका नाश करके कर्मयोगका अनुष्ठान करनेमें अर्जुनका उत्साह उत्पन्न करनेके लिये संशयरहित तथा वशमें किये हुए अन्तःकरणवाले कर्मयोगीकी प्रशंसा करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार कर्मयोगीकी प्रशंसा करके अब अर्जुनको कर्मयोगमें स्थित होकर युद्ध करनेकी आज्ञा देकर भगवान् इस अध्यायका उपसंहार करते हैं—