ग्रन्थ
4ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

Jnana-Karma-Sannyasa-Yoga
Knowledge and Renunciation of Action
42 verses · 41 printed blockspp. 192250 · Srimad Bhagavad Gita — Tattva-Vivechaniसाधारण भाषाटीका 41 · साधक-संजीवनी 40 · श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्य 42 · श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीका 41
1श्रीभगवान्
श्रीभगवान् उवाच
श्रीभगवानुवाच इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्। विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्॥ 1॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
श्रीभगवान् बोले—मैंने इस अविनाशी योगको सूर्यसे कहा था, सूर्यने अपने पुत्र वैवस्वत मनुसे कहा और मनुने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकुसे कहा॥ 1॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—तीसरे अध्यायके चौथे श्लोकसे लेकर उनतीसवें श्लोकतक भगवान्ने बहुत प्रकारसे विहित कर्मोंके आचरणकी आवश्यकताका प्रतिपादन करके तीसवें श्लोकमें अर्जुनको भक्तिप्रधान कर्मयोगकी विधिसे ममता, आसक्ति और कामनाका सर्वथा त्याग करके भगवदर्पणबुद्धिसे कर्म करनेकी आज्ञा दी। उसके बाद इकतीसवेंसे पैंतीसवें श्लोकतक उस सिद्धान्तके अनुसार कर्म करनेवालोंकी प्रशंसा और न करनेवालोंकी निन्दा करके राग-द्वेषके वशमें न होनेके लिये कहते हुए स्वधर्मपालनपर जोर दिया। फिर छत्तीसवें श्लोकमें अर्जुनके पूछनेपर सैंतीसवेंसे अध्यायसमाप्तिपर्यन्त कामको सारे अनर्थोंका हेतु बतलाकर बुद्धिके द्वारा इन्द्रियों और मनको वशमें करके उसे मारनेकी आज्ञा दी; परंतु कर्मयोगका तत्त्व बड़ा ही गहन है, इसलिये अब भगवान् पुनः उसके सम्बन्धमें बहुत-सी बातें बतलानेके उद्देश्यसे उसीका प्रकरण आरम्भ करते हुए पहले तीन श्लोकोंमें उस कर्मयोगकी परम्परा बतलाकर उसकी अनादिता सिद्ध करते हुए प्रशंसा करते हैं—

2
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः। स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप॥ 2॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे परन्तप अर्जुन! इस प्रकार परम्परासे प्राप्त इस योगको राजर्षियोंने जाना; किंतु उसके बाद वह योग बहुत कालसे इस पृथ्वीलोकमें लुप्तप्राय हो गया॥ 2॥
3
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः। भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्॥ 3॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है, इसलिये वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझको कहा है; क्योंकि यह बड़ा ही उत्तम रहस्य है अर्थात् गुप्त रखनेयोग्य विषय है॥ 3॥
4अर्जुन
अर्जुन उवाच अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः। कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥ 4॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
अर्जुन बोले—आपका जन्म तो अर्वाचीन—अभी हालका है और सूर्यका जन्म बहुत पुराना है अर्थात् कल्पके आदिमें हो चुका था; तब मैं इस बातको कैसे समझूँ कि आपहीने कल्पके
सम्बन्ध

सम्बन्ध—उपर्युक्त वर्णनसे मनुष्यको स्वाभाविक ही यह शंका हो सकती है कि भगवान् श्रीकृष्ण तो अभी द्वापरयुगमें प्रकट हुए हैं और सूर्यदेव, मनु एवं इक्ष्वाकु बहुत पहले हो चुके हैं; तब इन्होंने इस योगका उपदेश सूर्यके प्रति कैसे दिया? अतएव इसके समाधानके साथ ही भगवान्के अवतार-तत्त्वको भली प्रकार समझनेकी इच्छासे अर्जुन पूछते हैं—

5श्रीभगवान्
श्रीभगवान् उवाच
श्रीभगवानुवाच बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन। तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप॥ 5॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
श्रीभगवान् बोले—हे परन्तप अर्जुन! मेरे और तेरे बहुत-से जन्म हो चुके हैं। उन सबको
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार अर्जुनके पूछनेपर अपने अवतार-तत्त्वका रहस्य समझानेके लिये अपनी सर्वज्ञता प्रकट करते हुए भगवान् कहते हैं—

6
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥ 6॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
मैं अजन्मा और अविनाशी स्वरूप होते हुए भी तथा समस्त प्राणियोंका ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृतिको अधीन करके अपनी योगमायासे प्रकट होता हूँ॥ 6॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—भगवान्के मुखसे यह बात सुनकर कि अबतक मेरे बहुत-से जन्म हो चुके हैं, यह जाननेकी इच्छा होती है कि आपका जन्म किस प्रकार होता है और आपके जन्ममें तथा अन्य लोगोंके जन्ममें क्या भेद है। अतएव इस बातको समझानेके लिये भगवान् अपने जन्मका तत्त्व बतलाते हैं—

* उपसंहर विश्वात्मन्नदो
रूपमलौकिकम्। शङ्खचक्रगदापद्मश्रिया
इत्युक्त्वाऽऽसीद्धरिस्तूष्णीं
जुष्टं
चतुर्भुजम्॥
भगवानात्ममायया। पित्रोः सम्पश्यतोः सद्यो बभूव प्राकृतः शिशुः॥
(श्रीमद्भा0 10। 3। 30, 46)
“हे विश्वात्मन्! शंख, चक्र, गदा और पद्मकी शोभासे युक्त इस चार भुजाओंवाले अपने अलौकिक—दिव्यरूपको
अब छिपा लीजिये।”
“ऐसा कहकर भगवान् श्रीहरि चुप हो गये और माता-पिताके देखते-देखते अपनी मायासे तत्काल एक साधारण
बालक-से हो गये।”
7
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ 7॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे भारत! जब-जब धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूपको रचता हूँ अर्थात् साकाररूपसे लोगोंके सम्मुख प्रकट होता हूँ॥ 7॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार भगवान्के मुखसे उनके जन्मका तत्त्व सुननेपर यह जिज्ञासा होती है कि आप किस-किस समय और किन-किन कारणोंसे इस प्रकार अवतार धारण करते हैं। इसपर भगवान् दो श्लोकोंमें अपने अवतारके अवसर, हेतु और उद्देश्य बतलाते हैं—

8
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ 8॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
साधु पुरुषोंका उद्धार करनेके लिये, पाप-कर्म करनेवालोंका विनाश करनेके लिये और धर्मकी अच्छी तरहसे स्थापना करनेके लिये मैं युग-युगमें प्रकट हुआ करता हूँ॥ 8॥
9
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः। त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥ 9॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य अर्थात् निर्मल और अलौकिक हैं—इस प्रकार जो मनुष्य तत्त्वसे जान लेता है, वह शरीरको त्यागकर फिर जन्मको प्राप्त नहीं होता, किंतु मुझे ही प्राप्त
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार भगवान् अपने दिव्य जन्मोंके अवसर, हेतु और उद्देश्यका वर्णन करके अब उन जन्मोंकी और उनमें किये जानेवाले कर्मोंकी दिव्यताको तत्त्वसे जाननेका फल बतलाते हैं—

10
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः। बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥ 10॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
पहले भी, जिनके राग, भय और क्रोध सर्वथा नष्ट हो गये थे और जो मुझमें अनन्यप्रेमपूर्वक स्थित रहते थे, ऐसे मेरे आश्रित रहनेवाले बहुत-से भक्त उपर्युक्त ज्ञानरूप तपसे पवित्र होकर मेरे स्वरूपको प्राप्त हो चुके हैं॥ 10॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार भगवान्के जन्म और कर्मोंको तत्त्वसे दिव्य समझ लेनेका जो फल बतलाया गया है, वह अनादि परम्परासे चला आ रहा है—इस बातको स्पष्ट करनेके लिये भगवान् कहते हैं—

11
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥ 11॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे अर्जुन! जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ; क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकारसे मेरे ही मार्गका अनुसरण करते हैं॥ 11॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकोंमें भगवान्ने यह बात कही कि मेरे जन्म और कर्मोंको जो दिव्य समझ लेते हैं, उन अनन्यप्रेमी भक्तोंको मेरी प्राप्ति हो जाती है; इसपर यह जिज्ञासा होती है कि उनको आप किस प्रकार और किस रूपमें मिलते हैं? इसपर कहते हैं—

12
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः। क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा॥ 12॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
इस मनुष्यलोकमें कर्मोंके फलको चाहनेवाले लोग देवताओंका पूजन किया करते हैं; क्योंकि उनको कर्मोंसे उत्पन्न होनेवाली सिद्धि शीघ्र मिल जाती है॥ 12॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—यदि यह बात है, तो फिर लोग भगवान्को न भजकर अन्य देवताओंकी उपासना क्यों करते हैं? इसपर कहते हैं—

13
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः। तस्य कर्तारमपि मां विद्ध ्यकर्तारमव्ययम्॥ 13॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—इन चार वर्णोंका समूह, गुण और कर्मोंके विभागपूर्वक मेरे द्वारा रचा गया है। इस प्रकार उस सृष्टि-रचनादि कर्मका कर्ता होनेपर भी मुझ अविनाशी परमेश्वरको तू वास्तवमें अकर्ता ही जान॥ 13॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—नवें श्लोकमें भगवान्के दिव्य जन्म और कर्मोंको तत्त्वसे जाननेका फल भगवान्की प्राप्ति बतलाया गया। उसके पूर्व भगवान्के जन्मकी दिव्यताका विषय तो भलीभाँति समझाया गया, किंतु भगवान्के कर्मोंकी दिव्यताका विषय स्पष्ट नहीं हुआ; इसलिये अब भगवान् दो श्लोकोंमें अपने सृष्टि-रचनादि कर्मोंमें कर्तापन, विषमता और स्पृहाका अभाव दिखलाकर उन कर्मोंकी दिव्यताका विषय समझाते हैं—

14
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा। इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते॥ 14॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
कर्मोंके फलमें मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिये मुझे कर्म लिप्त नहीं करते—इस प्रकार जो मुझे तत्त्वसे जान लेता है, वह भी कर्मोंसे नहीं बँधता॥ 14॥
15
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः। कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्॥ 15॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
पूर्वकालके मुमुक्षुओंने भी इस प्रकार जानकर ही कर्म किये हैं। इसलिये तू भी पूर्वजोंद्वारा सदासे किये जानेवाले कर्मोंको ही कर॥ 15॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार भगवान् अपने कर्मोंकी दिव्यता और उनका तत्त्व जाननेका महत्त्व बतलाकर, अब मुमुक्षु पुरुषोंके उदाहरणपूर्वक उसी प्रकार निष्कामभावसे कर्म करनेके लिये अर्जुनको आज्ञा देते हैं—

16
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः। तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥ 16॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
कर्म क्या है? और अकर्म क्या है?—इस प्रकार इसका निर्णय करनेमें बुद्धिमान् पुरुष भी मोहित हो जाते हैं। इसलिये वह कर्मतत्त्व मैं तुझे भलीभाँति समझाकर कहूँगा, जिसे जानकर तू अशुभसे अर्थात् कर्मबन्धनसे मुक्त हो जायगा॥ 16॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार अर्जुनको भगवान्ने निष्कामभावसे कर्म करनेकी आज्ञा दी। किंतु कर्म-अकर्मका तत्त्व समझे बिना मनुष्य निष्कामभावसे कर्म नहीं कर सकता; इसलिये अब भगवान् ममता, आसक्ति, फलेच्छा और अहंकारके बिना किये जानेवाले दिव्य कर्मोंका तत्त्व भलीभाँति समझानेके लिये कर्मतत्त्वकी दुर्विज्ञेयता और उसके जाननेका महत्त्व प्रकट करते हुए उसे कहनेकी प्रतिज्ञा करते हैं—

17
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः। अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥ 17॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
कर्मका स्वरूप भी जानना चाहिये और अकर्मका स्वरूप भी जानना चाहिये तथा विकर्मका स्वरूप भी जानना चाहिये; क्योंकि कर्मकी गति गहन है॥ 17॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—यहाँ स्वभावतः मनुष्य मान सकता है कि शास्त्रविहित करनेयोग्य कर्मोंका नाम कर्म है और क्रियाओंका स्वरूपसे त्याग कर देना ही अकर्म है—इसमें मोहित होनेकी कौन-सी बात है और इन्हें जानना क्या है? किंतु इतना जान लेनेमात्रसे ही वास्तविक कर्म-अकर्मका निर्णय नहीं हो सकता, कर्मोंके तत्त्वको भलीभाँति समझनेकी आवश्यकता है। इस भावको स्पष्ट करनेके लिये भगवान् कहते हैं—

18
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः। स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्॥ 18॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो मनुष्य कर्ममें अकर्म देखता है और जो अकर्ममें कर्म देखता है, वह मनुष्योंमें बुद्धिमान् है और वह योगी समस्त कर्मोंको करनेवाला है॥ 18॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार श्रोताके अन्तःकरणमें रुचि और श्रद्धा उत्पन्न करनेके लिये कर्मतत्त्वको गहन एवं उसका जानना आवश्यक बतलाकर अब अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार भगवान् कर्मका तत्त्व समझाते हैं—

19
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः। ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः॥ 19॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जिसके सम्पूर्ण शास्त्रसम्मत कर्म बिना कामना और संकल्पके होते हैं तथा जिसके समस्त कर्म ज्ञानरूप अग्निके द्वारा भस्म हो गये हैं, उस महापुरुषको ज्ञानीजन भी पण्डित कहते
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्मदर्शनका महत्त्व बतलाकर अब पाँच श्लोकोंमें भिन्न-भिन्न शैलीसे उपर्युक्त कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्मदर्शनपूर्वक कर्म करनेवाले सिद्ध और साधक पुरुषोंकी असंगताका वर्णन करके उस विषयको स्पष्ट करते हैं—

20
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः। कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः॥ 20॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो पुरुष समस्त कर्मोंमें और उनके फलमें आसक्तिका सर्वथा त्याग करके संसारके आश्रयसे रहित हो गया है और परमात्मामें नित्यतृप्त है, वह कर्मोंमें भलीभाँति बर्तता हुआ भी
21
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः। शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥ 21॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जिसका अन्तःकरण और इन्द्रियोंके सहित शरीर जीता हुआ है और जिसने समस्त भोगोंकी सामग्रीका परित्याग कर दिया है, ऐसा आशारहित पुरुष केवल शरीर-सम्बन्धी कर्म करता हुआ भी पापको नहीं प्राप्त होता॥ 21॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—उपर्युक्त श्लोकोंमें यह बात कही गयी कि ममता, आसक्ति, फलेच्छा और अहंकारके बिना केवल लोकसंग्रहके लिये शास्त्रसम्मत यज्ञ, दान और तप आदि समस्त कर्म करता हुआ भी ज्ञानी पुरुष वास्तवमें कुछ भी नहीं करता। इसलिये वह कर्मबन्धनमें नहीं पड़ता। इसपर यह प्रश्न उठता है कि ज्ञानीको आदर्श मानकर उपर्युक्त प्रकारसे कर्म करनेवाले साधक तो नित्य-नैमित्तिक आदि कर्मोंका त्याग नहीं करते, निष्कामभावसे सब प्रकारके शास्त्रविहित कर्तव्यकर्मोंका अनुष्ठान करते रहते हैं—इस कारण वे किसी पापके भागी नहीं बनते; किंतु जो साधक शास्त्रविहित यज्ञ-दानादि कर्मोंका अनुष्ठान न करके केवल शरीरनिर्वाहमात्रके लिये आवश्यक शौच-स्नान और खान-पान आदि कर्म ही करता है, वह तो पापका भागी होता होगा। ऐसी शंकाकी निवृत्तिके लिये भगवान् कहते हैं—

22
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः। समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते॥ 22॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो बिना इच्छाके अपने-आप प्राप्त हुए पदार्थमें सदा सन्तुष्ट रहता है, जिसमें ईर्ष्याका सर्वथा अभाव हो गया है, जो हर्ष-शोक आदि द्वन्द्वोंसे सर्वथा अतीत हो गया है—ऐसा सिद्धि और असिद्धिमें सम रहनेवाला कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी उनसे नहीं बँधता॥ 22॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—उपर्युक्त श्लोकोंमें यह बात सिद्ध की गयी कि परमात्माको प्राप्त सिद्ध महापुरुषोंका तो कर्म करने या न करनेसे कोई प्रयोजन नहीं रहता, तथा ज्ञानयोगके साधकका ग्रहण और त्याग शास्त्रसम्मत, आसक्तिरहित और ममतारहित होता है; अतः वे कर्म करते हुए या उनका त्याग करते हुए—सभी अवस्थाओंमें कर्मबन्धनसे सर्वथा मुक्त हैं। अब भगवान् यह बात दिखलाते हैं कि कर्ममें अकर्मदर्शनपूर्वक कर्म करनेवाला कर्मयोगी भी कर्मबन्धनमें नहीं पड़ता—

23
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते॥ 23॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जिसकी आसक्ति सर्वथा नष्ट हो गयी है, जो देहाभिमान और ममतासे रहित हो गया है, जिसका चित्त निरन्तर परमात्माके ज्ञानमें स्थित रहता है—ऐसे केवल यज्ञ-सम्पादनके लिये कर्म करनेवाले मनुष्यके सम्पूर्ण कर्म भलीभाँति विलीन हो जाते हैं॥ 23॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—यहाँ यह प्रश्न उठता है कि उपर्युक्त प्रकारसे किये हुए कर्म बन्धनके हेतु नहीं बनते, इतनी ही बात है या उनका और भी कुछ महत्त्व है। इसपर कहते हैं—

24
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥ 24॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जिस यज्ञमें अर्पण अर्थात् स्त्रुवा आदि भी ब्रह्म है और हवन किये जानेयोग्य द्रव्य भी ब्रह्म है तथा ब्रह्मरूप कर्ताके द्वारा ब्रह्मरूप अग्निमें आहुति देनारूप क्रिया भी ब्रह्म है—उस ब्रह्मकर्ममें स्थित रहनेवाले योगीद्वारा प्राप्त किये जानेयोग्य फल भी ब्रह्म ही है॥ 24॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें यह बात कही गयी कि यज्ञके लिये कर्म करनेवाले पुरुषके समस्त कर्म विलीन हो जाते हैं। वहाँ केवल अग्निमें हविका हवन करना ही यज्ञ है और उसके सम्पादन करनेके लिये की जानेवाली क्रिया ही यज्ञके लिये कर्म करना है, इतनी ही बात नहीं है; वर्ण, आश्रम, स्वभाव और परिस्थितिके अनुसार जिसका जो कर्तव्य है; वही उसके लिये यज्ञ है और उसका पालन करनेके लिये आवश्यक क्रियाओंका निःस्वार्थबुद्धिसे लोकसंग्रहार्थ करना ही उस यज्ञके लिये कर्म करना है—इसी भावको सुस्पष्ट करनेके लिये अब भगवान् सात श्लोकोंमें भिन्न-भिन्न योगियोंद्वारा किये जानेवाले परमात्माकी प्राप्तिके साधनरूप शास्त्रविहित कर्तव्य-कर्मोंका विभिन्न यज्ञोंके नामसे वर्णन करते हैं—

25
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते। ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति॥ 25॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
दूसरे योगीजन देवताओंके पूजनरूप यज्ञका ही भलीभाँति अनुष्ठान किया करते हैं और अन्य योगीजन परब्रह्म परमात्मारूप अग्निमें अभेददर्शनरूप यज्ञके द्वारा ही आत्मरूप यज्ञका
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार ब्रह्मकर्मरूप यज्ञका वर्णन करके अब अगले श्लोकमें देवपूजनरूप यज्ञका और आत्मा-परमात्माके अभेददर्शनरूप यज्ञका वर्णन करते हैं—

26
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति। शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति॥ 26॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
अन्य योगीजन श्रोत्र आदि समस्त इन्द्रियोंको संयमरूप अग्नियोंमें हवन किया करते हैं और दूसरे योगीलोग शब्दादि समस्त विषयोंको इन्द्रियरूप अग्नियोंमें हवन किया करते
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार दैवयज्ञ और अभेददर्शनरूप यज्ञका वर्णन करनेके अनन्तर अब इन्द्रियसंयमरूप यज्ञका और विषयहवनरूप यज्ञका वर्णन करते हैं—

27
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे। आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते॥ 27॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
दूसरे योगीजन इन्द्रियोंकी सम्पूर्ण क्रियाओंको और प्राणोंकी समस्त क्रियाओंको ज्ञानसे प्रकाशित आत्मसंयमयोगरूप अग्निमें हवन किया करते हैं॥ 27॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अब आत्मसंयमयोगरूप यज्ञका वर्णन करते हैं—

28
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे। स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः॥ 28॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
कई पुरुष द्रव्यसम्बन्धी यज्ञ करनेवाले हैं, कितने ही तपस्यारूप यज्ञ करनेवाले हैं तथा दूसरे कितने ही योगरूप यज्ञ करनेवाले हैं और कितने ही अहिंसादि तीक्ष्ण व्रतोंसे युक्त यत्नशील पुरुष स्वाध्यायरूप ज्ञानयज्ञ करनेवाले हैं॥ 28॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार समाधियोगके साधनको यज्ञका रूप देकर अब अगले श्लोकमें द्रव्ययज्ञ, तपोयज्ञ, योगयज्ञ और स्वाध्यायरूप ज्ञानयज्ञका संक्षेपमें वर्णन करते हैं—

(योग0 2। 30)
नियमाः।” (योग0 2। 32)
* आसन अनेकों प्रकारके हैं। उनमेंसे आत्मसंयम चाहनेवाले पुरुषके लिये सिद्धासन, पद्मासन और स्वस्तिकासन—
ये तीन बहुत उपयोगी माने गये हैं। इनमेंसे कोई-सा भी आसन हो; परंतु मेरुदण्ड, मस्तक और ग्रीवाको सीधा अवश्य
रखना चाहिये और दृष्टि नासिकाग्रपर अथवा भृकुटीके मध्यभागमें रखनी चाहिये। आलस्य न सतावे तो आँखें मूँदकर
भी बैठ सकते हैं। जो पुरुष जिस आसनसे सुखपूर्वक दीर्घकालतक बैठ सके, उसके लिये वही आसन उत्तम है।
(योग0 2। 51)
(योग0 3। 1)
(योग0 3। 2)
(योग0 3। 3)
29–30Merged
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे। प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥ 29॥ अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति। सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः॥ 30॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
दूसरे कितने ही योगीजन अपानवायुमें प्राणवायुको हवन करते हैं, वैसे ही अन्य योगीजन प्राणवायुमें अपानवायुको हवन करते हैं तथा अन्य कितने ही नियमित आहार करनेवाले प्राणायामपरायण पुरुष प्राण और अपानकी गतिको रोककर प्राणोंको प्राणोंमें ही हवन किया करते हैं। ये सभी साधक यज्ञोंद्वारा पापोंका नाश कर देनेवाले और
सम्बन्ध

सम्बन्ध—द्रव्ययज्ञादि चार प्रकारके यज्ञोंका संक्षेपमें वर्णन करके अब दो श्लोकोंमें प्राणायामरूप यज्ञोंका वर्णन करते हुए सब प्रकारके यज्ञ करनेवाले साधकोंकी प्रशंसा करते हैं—

31
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्। नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम॥ 31॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे कुरुश्रेष्ठ अर्जुन! यज्ञसे बचे हुए अमृतका अनुभव करनेवाले योगीजन सनातन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं। और यज्ञ न करनेवाले पुरुषके लिये तो यह मनुष्यलोक भी सुखदायक नहीं है, फिर परलोक कैसे सुखदायक हो सकता है?॥ 31॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार यज्ञ करनेवाले साधकोंकी प्रशंसा करके अब उन यज्ञोंके करनेसे होनेवाले लाभ और न करनेसे होनेवाली हानि दिखलाकर भगवान् उपर्युक्त प्रकारसे यज्ञ करनेकी आवश्यकताका प्रतिपादन करते हैं—

32
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे। कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे॥ 32॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
इसी प्रकार और भी बहुत तरहके यज्ञ वेदकी वाणीमें विस्तारसे कहे गये हैं। उन सबको तू मन, इन्द्रिय और शरीरकी क्रियाद्वारा सम्पन्न होनेवाले जान, इस प्रकार तत्त्वसे जानकर उनके अनुष्ठानद्वारा तू कर्मबन्धनसे सर्वथा मुक्त हो जायगा॥ 32॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—सोलहवें श्लोकमें भगवान्ने यह बात कही थी कि मैं तुम्हें वह कर्मतत्त्व बतलाऊँगा, जिसे जानकर तुम अशुभसे मुक्त हो जाओगे। उस प्रतिज्ञाके अनुसार अठारहवें श्लोकसे यहाँतक उस कर्मतत्त्वका वर्णन करके अब उसका उपसंहार करते हैं—

33
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप। सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते॥ 33॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे परन्तप अर्जुन! द्रव्यमय यज्ञकी अपेक्षा ज्ञानयज्ञ अत्यन्त श्रेष्ठ है, तथा यावन्मात्र सम्पूर्ण
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सम्बन्ध—उपर्युक्त प्रकरणमें भगवान्ने कई प्रकारके यज्ञोंका वर्णन किया और यह बात भी कही कि इनके सिवा और भी बहुत-से यज्ञ वेद-शास्त्रोंमें बतलाये गये हैं; इसलिये यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि उन यज्ञोंमेंसे कौन-सा यज्ञ श्रेष्ठ है। इसपर भगवान् कहते हैं—

34
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥ 34॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
उस ज्ञानको तू तत्त्वदर्शी ज्ञानियोंके पास जाकर समझ, उनको भलीभाँति दण्डवत् प्रणाम करनेसे, उनकी सेवा करनेसे और कपट छोड़कर सरलतापूर्वक प्रश्न करनेसे वे परमात्मतत्त्वको भलीभाँति जाननेवाले ज्ञानी महात्मा तुझे उस तत्त्वज्ञानका उपदेश करेंगे॥ 34॥
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सम्बन्ध—इस प्रकार ज्ञानयज्ञकी और उसके फलरूप ज्ञानकी प्रशंसा करके अब भगवान् दो श्लोकोंमें ज्ञानको प्राप्त करनेके लिये अर्जुनको आज्ञा देते हुए उसकी प्राप्तिका मार्ग और उसका फल बतलाते हैं—

(मुण्डकोपनिषद् 1। 2। 12)
35
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव। येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि॥ 35॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जिसको जानकर फिर तू इस प्रकार मोहको नहीं प्राप्त होगा तथा हे अर्जुन! जिस ज्ञानके द्वारा तू सम्पूर्ण भूतोंको निःशेषभावसे पहले अपनेमें और पीछे मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्मामें
(ईशावास्योपनिषद् 7)
36
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः। सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि॥ 36॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
यदि तू अन्य सब पापियोंसे भी अधिक पाप करनेवाला है; तो भी तू ज्ञानरूप नौकाद्वारा निःसंदेह सम्पूर्ण पाप-समुद्रसे भलीभाँति तर जायगा॥ 36॥
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सम्बन्ध—इस प्रकार गुरुजनोंसे तत्त्वज्ञान सीखनेकी विधि और उसका फल बतलाकर अब उसका माहात्म्य बतलाते हैं—

37
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन। ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा॥ 37॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
क्योंकि हे अर्जुन ! जैसे प्रज्वलित अर्ग्नि इंधनोंको भस्ममय कर देता है, वैसे ही ज्ञानरूप अग्नि सम्पूर्ण कर्मोंको भस्ममय कर देता है॥ 37॥
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सम्बन्ध—कोई भी दृष्टान्त परमार्थविषयको पूर्णरूपसे नहीं समझा सकता, उसके एक अंशको ही समझानेके लिये उपयोगी होता है; अतएव पूर्वश्लोकमें बतलाये हुए ज्ञानके महत्त्वको अग्निके दृष्टान्तसे पुनः स्पष्ट करते हैं—

(मुण्डकोपनिषद् 2। 2। 8)
38
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते। तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥ 38॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
इस संसारमें ज्ञानके समान पवित्र करनेवाला निःसंदेह कुछ भी नहीं है। उस ज्ञानको कितने ही कालसे कर्मयोगके द्वारा शुद्धान्तःकरण हुआ मनुष्य अपने-आप ही आत्मामें पा लेता
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सम्बन्ध—इस प्रकार चौंतीसवें श्लोकसे यहाँतक तत्त्वज्ञानी महापुरुषोंकी सेवा आदि करके तत्त्वज्ञानको प्राप्त करनेके लिये कहकर भगवान्ने उसके फलका वर्णन करते हुए उसका माहात्म्य बतलाया। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि यह तत्त्वज्ञान ज्ञानी महापुरुषोंसे श्रवण करके विधिपूर्वक मनन और निदिध्यासनादि ज्ञानयोगके साधनोंद्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है या इसकी प्राप्तिका कोई दूसरा मार्ग भी है; इसपर अगले श्लोकमें पुनः उस ज्ञानकी महिमा प्रकट करते हुए भगवान् कर्मयोगके द्वारा भी वही ज्ञान अपने-आप प्राप्त होनेकी बात कहते हैं—

39
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥ 39॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जितेन्द्रिय, साधनपरायण और श्रद्धावान् मनुष्य ज्ञानको प्राप्त होता है तथा ज्ञानको प्राप्त होकर वह बिना विलम्बके—तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप परम शान्तिको प्राप्त हो जाता है॥ 39॥
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सम्बन्ध—इस प्रकार तत्त्वज्ञानकी महिमा कहते हुए उसकी प्राप्तिके सांख्ययोग और कर्मयोग—दो उपाय बतलाकर, अब भगवान् उस ज्ञानकी प्राप्तिके पात्रका निरूपण करते हुए उस ज्ञानका फल परम शान्तिकी प्राप्ति बतलाते हैं—

40
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति। नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः॥ 40॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
विवेकहीन और श्रद्धारहित संशययुक्त मनुष्य परमार्थसे अवश्य भ्रष्ट हो जाता है। ऐसे संशययुक्त मनुष्यके लिये न यह लोक है, न परलोक है और न सुख ही है॥ 40॥
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सम्बन्ध—इस प्रकार श्रद्धावान्को ज्ञानकी प्राप्ति और उस ज्ञानसे परम शान्तिकी प्राप्ति बतलाकर अब श्रद्धा और विवेकहीन संशयात्माकी निन्दा करते हैं—

41
योगसन्न्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम्। आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय॥ 41॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे धनंजय! जिसने कर्मयोगकी विधिसे समस्त कर्मोंका परमात्मामें अर्पण कर दिया है और जिसने विवेकद्वारा समस्त संशयोंका नाश कर दिया है, ऐसे वशमें किये हुए अन्तःकरणवाले
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सम्बन्ध—इस प्रकार अविवेक और अश्रद्धाके सहित संशयको ज्ञानप्राप्तिमें बाधक बतलाकर, अब विवेकद्वारा संशयका नाश करके कर्मयोगका अनुष्ठान करनेमें अर्जुनका उत्साह उत्पन्न करनेके लिये संशयरहित तथा वशमें किये हुए अन्तःकरणवाले कर्मयोगीकी प्रशंसा करते हैं—

42
तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः। छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत॥ 42॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
इसलिये हे भरतवंशी अर्जुन! तू हृदयमें स्थित इस अज्ञानजनित अपने संशयका विवेकज्ञानरूप तलवारद्वारा छेदन करके समत्वरूप कर्मयोगमें स्थित हो जा और युद्धके लिये खड़ा हो
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सम्बन्ध—इस प्रकार कर्मयोगीकी प्रशंसा करके अब अर्जुनको कर्मयोगमें स्थित होकर युद्ध करनेकी आज्ञा देकर भगवान् इस अध्यायका उपसंहार करते हैं—

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः॥
4.1श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीका