ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
यः अयं योगः अध्यायद्वयेन उक्तो ज्ञाननिष्ठालक्षणः ससन्न्यासः कर्मयोगोपायः, यस्मिन् वेदार्थः परिसमाप्तः प्रवृत्तिलक्षणो निवृत्तिलक्षणः च, गीतासु च सर्वासु अयम् एव योगो विवक्षितो भगवता अतः परिसमाप्तं वेदार्थं मन्वानः तं वंशकथनेन स्तौति श्रीभगवान्—
कर्मयोग जिसका उपाय है ऐसा जो यह संन्याससहित ज्ञाननिष्ठारूप योग पूर्वके दो अध्यायोंमें (दूसरे और तीसरेमें) कहा गया है, जिसमें कि वेदका प्रवृत्तिधर्मरूप और निवृत्तिधर्मरूप दोनों प्रकारका सम्पूर्ण तात्पर्य आ जाता है, आगे सारी गीतामें भी भगवान्को “योग” शब्दसे यही (ज्ञानयोग) विवक्षित है, इसलिये वेदके अर्थको (ज्ञानयोगमें) परिसमाप्त यानी पूर्णरूपसे आ गया समझकर भगवान् वंशपरम्पराकथनसे उस (ज्ञाननिष्ठारूप योग)-की स्तुति करते हैं—
श्रीभगवान् बोले—
इमम् अध्यायद्वयेन उक्तं योगं विवस्वते आदित्याय सर्गादौ प्रोक्तवान् अहं जगत्परि-पालयितॄणां क्षत्रियाणां बलाधानाय। तेन योग-बलेन युक्ताः समर्था भवन्ति ब्रह्म परिरक्षितुम्। ब्रह्मक्षत्रपरिपालिते जगत्परिपालयितुम् अलम्।
अव्ययम् अव्ययफलत्वात्। न हि अस्य सम्यग्दर्शननिष्ठालक्षणस्य मोक्षाख्यं फलं व्येति।
स च विवस्वान् मनवे प्राह मनुः इक्ष्वाकवे स्वपुत्राय आदिराजाय अब्रवीत्॥ 1॥
जगत्-प्रतिपालक क्षत्रियोंमें बल स्थापन करनेके लिये मैंने उक्त दो अध्यायोंमें कहे हुए इस योगको पहले सृष्टिके आदिकालमें सूर्यसे कहा था; (क्योंकि) उस योगबलसे युक्त हुए क्षत्रिय, ब्रह्मत्वकी रक्षा करनेमें समर्थ होते हैं तथा ब्राह्मण और क्षत्रियोंका पालन ठीक तरह हो जानेपर ये दोनों सब जगत्का पालन अनायास कर सकते हैं।
इस योगका फल अविनाशी है, इसलिये यह अव्यय है; क्योंकि इस सम्यक् ज्ञाननिष्ठारूप योगका मोक्षरूप फल कभी नष्ट नहीं होता।
उस सूर्यने यह योग अपने पुत्र मनुसे कहा और मनुने अपने पुत्र सबसे पहले राजा बननेवाले इक्ष्वाकुसे कहा॥ 1॥
एवं क्षत्रियपरम्पराप्राप्तम् इमं राजर्षयो राजानः च ते ऋषयः च राजर्षयो विदुः इमं योगम्।
स योगः कालेन इह महता दीर्घेण नष्टो विच्छिन्नसम्प्रदायः संवृत्तो हे परन्तप, आत्मनो विपक्षभूताः पर उच्यन्ते तान् शौर्यतेजो-गभस्तिभिः भानुः इव तापयति इति परन्तपः शत्रुतापन इत्यर्थः॥ 2॥
इस प्रकार क्षत्रियोंकी परम्परासे प्राप्त हुए इस योगको राजर्षियोंने—जो कि राजा और ऋषि दोनों थे—जाना।
हे परंतप! (अब) वह योग इस मनुष्यलोकमें बहुत कालसे नष्ट हो गया है। अर्थात् उसकी सम्प्रदाय-परम्परा टूट गयी है। अपने विपक्षियोंको पर कहते हैं, उन्हें जो शौर्यरूप तेजकी किरणोंके द्वारा सूर्यके समान तपता है वह पपातप यानी शत्रुओंको तपानेवाला कहा जाता है॥ 2॥
दुर्बलान् अजितेन्द्रियान् प्राप्य नष्टं योगम् इमम् उपलभ्य लोकं च अपुरुषार्थसम्बन्धिनम्—
अजितेन्द्रिय और दुर्बल मनुष्योंके हाथमें पड़कर यह योग नष्ट हो गया है, यह देखकर और साथ ही लोगोंको पुरुषार्थरहित हुए देखकर—
स एव अयं मया ते तुभ्यम् अद्य इदानीं योगः प्रोक्तः पुरातनः। भक्तः असि मे सखा च असि इति। रहस्यं हि यस्माद् एतद् उत्तमं योगो ज्ञानम् इत्यर्थः॥ 3॥
वही यह पुराना योग, यह सोचकर कि तू मेरा भक्त और मित्र है, अब मैंने तुझसे कहा है; क्योंकि यह ज्ञानरूप योग बड़ा ही उत्तम रहस्य है॥ 3॥
भगवता विप्रतिषिद्धम् उक्तम् इति मा भूत् कस्यचिद् बुद्धिः इति परिहारार्थं चोद्यम् इव कुर्वन्—
भगवान्ने असङ्गत कहा, ऐसी धारणा किसीकी न हो जाय, अतः उसको दूर करनेके लिये शङ्का करता हुआ-सा—
अर्जुन बोले—
अपरम् अर्वाग् वसुदेवगृहे भवतो जन्म, परं पूर्वं सर्गादौ जन्म उत्पत्तिः विवस्वत आदित्यस्य।
तत् कथम् एतद् विजानीयाम् अविरुद्धार्थतया यः त्वम् एव आदौ प्रोक्तवान् इमं योगम्, स एव त्वम् इदानीं मह्यं प्रोक्तवान् असि इति॥ 4॥
आपका जन्म तो अर्वाचीन है अर्थात् अभी वसुदेवके घरमें हुआ है और सूर्यकी उत्पत्ति पहले सृष्टिके आदिमें हुई थी।
तब मैं इस बातको अविरुद्धार्थयुक्त (सुसङ्गत) कैसे समझूँ कि जिन आपने इस योगको आदिकालमें कहा था, वही आप मुझसे कह रहे हैं॥ 4॥
या वासुदेवे अनीश्वरासर्वज्ञाशङ्का मूर्खाणां तां परिहरन् श्रीभगवानुवाच यदर्थो हि अर्जुनस्य प्रश्नः—
भगवान् श्रीवासुदेवके विषयमें मूर्खोंकी जो ऐसी शङ्का है कि ये ईश्वर नहीं हैं, सर्वज्ञ नहीं हैं तथा जिस शङ्काको दूर करनेके लिये ही अर्जुनका यह प्रश्न है, उसका निवारण करते हुए श्रीभगवान् बोले—
बहूनि मे मम व्यतीतानि अतिक्रान्तानि जन्मानि तव च हे अर्जुन तानि अहं वेद जाने सर्वाणि न त्वं वेत्थ जानीषे, धर्माधर्मादिप्रतिबद्ध-ज्ञानशक्तित्वात्।
अहं पुनः नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावत्वाद् अनावरणज्ञानशक्तिः इति वेद अहं हे परन्तप॥ 5॥
हे अर्जुन! मेरे और तेरे पहले बहुत जन्म हो चुके हैं। उन सबको मैं जानता हूँ, तू नहीं जानता; क्योंकि पुण्य-पाप आदिके संस्कारोंसे तेरी ज्ञानशक्ति आच्छादित हो रही है।
परंतु मैं तो नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त-स्वभाववाला हूँ, इस कारण मेरी ज्ञानशक्ति आवरणरहित है, इसलिये हे परन्तप! मैं (सब कुछ) जानता हूँ॥ 5॥
कथं तर्हि तव नित्येश्वरस्य धर्माधर्माभावे अपि जन्म इति उच्यते—
तो फिर आप नित्य ईश्वरका पुण्य-पापसे सम्बन्ध न होनेपर भी जन्म कैसे होता है? इसपर कहा जाता है—
अजः अपि जन्मरहितः अपि सन् तथा अव्ययात्मा अक्षीणज्ञानशक्तिस्वभावः अपि सन् तथा भूतानां ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानाम् ईश्वर ईशनशीलः अपि सन्, प्रकृतिं स्वां मम वैष्णवीं मायां त्रिगुणात्मिकां यस्या वशे सर्वं जगद् वर्तते यया मोहितं सत् स्वम् आत्मानं वासुदेवं न जानाति, तां प्रकृतिं स्वाम् अधिष्ठाय वशीकृत्य सम्भवामि देहवान् इव भवामि जात इव आत्ममायया आत्मनो मायया न परमार्थतो लोकवत्॥ 6॥
यद्यपि मैं अजन्मा—जन्मरहित, अव्ययात्मा— अक्षीण ज्ञानशक्ति -स्वभाववाला और ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त सम्पूर्ण भूतोंका नियमन करनेवाला ईश्वर भी हूँ, तो भी अपनी त्रिगुणात्मिका वैष्णवी मायाको, जिसके वशमें सब जगत् बर्तता है और जिससे मोहित हुआ मनुष्य वासुदेवरूप अपने-आपको नहीं जानता, उस अपनी प्रकृतिको अपने वशमें रखकर केवल अपनी लीलासे ही शरीरवाला-सा जन्म लिया हुआ-सा हो जाता हूँ; अन्य लोगोंकी भाँति वास्तवमें जन्म नहीं लेता॥ 6॥
तत् च जन्म कदा किमर्थं च इति उच्यते।
वह जन्म कब और किसलिये होता है? सो कहते हैं—
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिः हानिः वर्णा-श्रमादिलक्षणस्य प्राणिनाम् अभ्युदयनिःश्रेयस-साधनस्य भवति भारत, अभ्युत्थानम् उद्भवः अधर्मस्य
तदा
आत्मानं
सृजामि
अहं मायया॥ 7॥
हे भारत! वर्णाश्रम आदि जिसके लक्षण हैं एवं प्राणियोंकी उन्नति और परम कल्याणका जो साधन है, उस धर्मकी जब-जब हानि होती है और अधर्मका अभ्युत्थान अर्थात् उन्नति होती है, तब-तब ही मैं मायासे अपने स्वरूपको रचता हूँ॥ 7॥
किमर्थम्—
किसलिये?—
परित्राणाय परिरक्षणाय साधूनां सन्मार्गस्थानां विनाशाय च दुष्कृतां पापकारिणाम्। किं च धर्मसंस्थापनार्थाय धर्मस्य सम्यक् स्थापनं तदर्थं सम्भवामि युगे युगे प्रतियुगम्॥ 8॥
सत्-मार्गमें स्थित साधुओंका परित्राण अर्थात् (उनकी) रक्षा करनेके लिये, पापकर्म करनेवाले दुष्टोंका नाश करनेके लिये और धर्मकी अच्छी प्रकार स्थापना करनेके लिये मैं युग-युगमें अर्थात् प्रत्येक युगमें प्रकट हुआ करता हूँ॥ 8॥
तत्—
वह—
जन्म मायारूपम्, कर्म च साधुपरित्राणादि, मे मम दिव्यम् अप्राकृतम् ऐश्वरम् एवं यथोक्तं यो वेत्ति तत्त्वतः तत्त्वेन यथावत्।
त्यक्त्वा देहम् इमं पुनर्जन्म पुनरुत्पत्तिं न एति न प्राप्नोति माम् एति आगच्छति स मुच्यते हे अर्जुन॥ 9॥
मेरा मायामय जन्म और साधुरक्षण आदि कर्म दिव्य हैं, अर्थात् अलौकिक हैं—यानी केवल ईश्वरशक्तिसे ही होनेवाले हैं। इस प्रकार जो तत्त्वसे यथार्थ जानता है।
हे अर्जुन! वह इस शरीरको छोड़कर पुनर्जन्म अर्थात् पुनः उत्पत्तिको प्राप्त नहीं होता, (बल्कि) मेरे पास आ जाता है अर्थात् मुक्त हो जाता है॥ 9॥
न एष मोक्षमार्ग इदानीं प्रवृत्तः किं तर्हि पूर्वम् अपि—
यह मोक्ष-मार्ग अभी आरम्भ हुआ है, ऐसी बात नहीं, किंतु पहले भी—
वीतरागभयक्रोधा रागः च भयं च क्रोधः च वीता विगता येभ्यः ते वीतरागभयक्रोधाः, मन्मया ब्रह्मविद ईश्वराभेददर्शिनः, माम् एव परमेश्वरम् उपाश्रिताः केवलज्ञाननिष्ठा इत्यर्थः। बहवः अनेके ज्ञानतपसा ज्ञानम् एव च परमात्मविषयं तपः तेन ज्ञानतपसा पूताः परां शुद्धिं गताः सन्तो मद्भावम् ईश्वरभावं मोक्षम् आगताः समनुप्राप्ताः।
इतरतपोनिरपेक्षज्ञाननिष्ठा इति अस्य लिङ्गं ज्ञानतपसा इति विशेषणम्॥ 10॥
जिनके राग, भय और क्रोध—चले गये हैं ऐसे रागादि दोषोंसे रहित, ईश्वरमें तन्मय हुए—ईश्वरसे अपना अभेद समझनेवाले—ब्रह्मवेत्ता और मुझ परमेश्वरके ही आश्रित—केवल ज्ञाननिष्ठामें स्थित ऐसे बहुत-से महापुरुष परमात्मविषयक ज्ञानरूप तपसे परमशुद्धिको प्राप्त होकर मुझ ईश्वरके भावको—मोक्षको प्राप्त हो गये हैं।
“ज्ञानतपसा” यह विशेषण इस बातका द्योतक है कि ज्ञाननिष्ठा अन्य तपोंकी अपेक्षा नहीं रखती॥ 10॥
तव तर्हि रागद्वेषौ स्तः येन केभ्यश्चिद् एव आत्मभावं प्रयच्छसि न सर्वेभ्य इति उच्यते—
तब क्या आपमें रागद्वेष हैं, जिससे कि आप किसी-किसीको ही आत्मभाव प्रदान करते हैं, सबको नहीं करते! इसपर कहते हैं—
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ये यथा येन प्रकारेण येन प्रयोजनेन यत्फलार्थितया मां प्रपद्यन्ते, तान् तथा एव तत्फलदानेन भजामि अनुगृह्णामि अहम् इति एतत्। तेषां मोक्षं प्रति अनर्थित्वात्।
न हि एकस्य मुमुक्षुत्वं फलार्थित्वं च युगपत् सम्भवति।
अतो ये फलार्थिनः तान् फलप्रदानेन, ये यथोक्तकारिणः तु अफलार्थिनो मुमुक्षवः च तान् ज्ञानप्रदानेन, ये ज्ञानिनः सन्न्यासिनो मुमुक्षवः च तान् मोक्षप्रदानेन; तथा आर्तान् आर्तिहरणेन इति एवं यथा प्रपद्यन्ते ये तान् तथा एव भजामि इत्यर्थः।
न पुनः रागद्वेषनिमित्तं मोहनिमित्तं वा कञ्चिद् भजामि।
सर्वथा अपि* सर्वावस्थस्य मम ईश्वरस्य वर्त्म मार्गम् अनुवर्तन्ते मनुष्याः। यत्फलार्थितया यस्मिन् कर्मणि अधिकृता ये प्रयतन्ते ते मनुष्या उच्यन्ते हे पार्थ सर्वशः सर्वप्रकारैः॥ 11॥
जो भक्त जिस प्रकारसे—जिस प्रयोजनसे—जिस फलप्राप्तिकी इच्छासे मुझे भजते हैं, उनको मैं उसी प्रकार भजता हूँ अर्थात् उनकी कामनाके अनुसार ही फल देकर मैं उनपर अनुग्रह करता हूँ, क्योंकि उन्हें मोक्षकी इच्छा नहीं होती।
एक ही पुरुषमें मुमुक्षुत्व और फलार्थित्व (फलकी इच्छा करना) यह दोनों एक साथ नहीं हो सकते।
इसलिये जो फलकी इच्छावाले हैं उन्हें फल देकर, जो फलको न चाहते हुए शास्त्रोक्त प्रकारसे कर्म करनेवाले और मुमुक्षु हैं, उनको ज्ञान देकर, जो ज्ञानी, संन्यासी और मुमुक्षु हैं, उन्हें मोक्ष देकर तथा आर्तोंका दुःख दूर करके, इस प्रकार जो जिस तरहसे मुझे भजते हैं, उनको मैं भी वैसे ही भजता हूँ।
राग-द्वेषके कारण या मोहके कारण तो मैं किसीको भी नहीं भजता।
हे पार्थ! मनुष्य सब तरहसे बर्तते हुए भी सर्वत्र स्थित मुझ ईश्वरके ही मार्गका सब प्रकारसे अनुसरण करते हैं, जो जिस फलकी इच्छासे जिस कर्मके अधिकारी बने हुए (उस कर्मके अनुरूप) प्रयत्न करते हैं, वे ही मनुष्य कहे जाते हैं॥ 11॥
यदि तव ईश्वरस्य रागादिदोषाभावात् सर्वप्राणिषु अनुजिघृक्षायां तुल्यायां सर्वफल-प्रदानसमर्थे च त्वयि सति, वासुदेवः सर्वम् इति ज्ञानेन एव मुमुक्षवः सन्तः कस्मात् त्वाम् एव सर्वे न प्रतिपद्यन्ते इति शृणु तत्र कारणम्—
यदि रागादि दोषोंका अभाव होनेके कारण सभी प्राणियोंपर आप ईश्वरकी दया समान है एवं आप सब फल देनेमें समर्थ भी हैं तो फिर सभी मनुष्य मुमुक्षु होकर—यह सारा विश्व वासुदेवरूप है—इस प्रकारके ज्ञानसे केवल आपको ही क्यों नहीं भजते? इसका कारण सुन—
काङ्क्षन्तः अभीप्सन्तः कर्मणां सिद्धिं फल-निष्पत्तिं प्रार्थयन्तः, यजन्त इह अस्मिन् लोके देवता इन्द्राग्न्याद्याः—
“अथ योऽन्यां देवतामुपास्तेऽन्योऽसावन्योऽह-मस्मीति न स वेद यथा पशुरेवं स देवानाम्” (बृ0 उ0 1। 4। 10) इति श्रुतेः।
तेषां हि भिन्नदेवतायाजिनां फलाकाङ्क्षिणां क्षिप्रं शीघं्र हि यस्मात् मानुषे लोके, मनुष्यलोके हि शास्त्राधिकारः।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके इति विशेषणाद् अन्येषु अपि कर्मफलसिद्धिं दर्शयति भगवान्।
मानुषे लोके वर्णाश्रमादिकर्माधिकार इति विशेषः, तेषां वर्णाश्रमाद्यधिकारिकर्मणां फल-सिद्धिः क्षिप्रं भवति कर्मजा कर्मणो जाता॥ 12॥
कर्मोंकी सिद्धि चाहनेवाले अर्थात् फलप्राप्तिकी कामना करनेवाले मनुष्य इस लोकमें इन्द्र, अग्नि आदि देवोंकी पूजा किया करते हैं।
श्रुतिमें कहा है कि “जो अन्य देवताकी इस भावसे उपासना करता है कि वह (देवता) दूसरा है और मैं (उपासक) दूसरा हूँ वह कुछ नहीं जानता, जैसे पशु होता है वैसे ही वह देवताओंका पशु है।”
ऐसे उन भिन्नरूपसे देवताओंका पूजन करनेवाले फलेच्छुक मनुष्योंकी इस मनुष्यलोकमें (कर्मसे उत्पन्न हुई) सिद्धि शीघ्र ही हो जाती है; क्योंकि मनुष्य-लोकमें शास्त्रका अधिकार है (यह विशेषता है)।
“क्षिप्रं हि मानुषे लोके” इस वाक्यमें क्षिप्र विशेषणसे भगवान् अन्य लोकोंमें भी कर्मफलकी सिद्धि दिखलाते हैं।
पर मनुष्य-लोकमें वर्ण-आश्रम आदिके कर्मोंका अधिकार है, यह विशेषता है। उन वर्णाश्रम आदिमें अधिकार रखनेवालोंके कर्मोंकी कर्मजनित फलसिद्धि शीघ्र होती है॥ 12॥
मानुषे एव लोके वर्णाश्रमादिकर्माधिकारो न अन्येषु लोकेषु इति नियमः किन्निमित्त इति।
अथवा वर्णाश्रमादिप्रविभागोपेता मनुष्या मम वर्त्म अनुवर्तन्ते सर्वश इति उक्तं कस्मात् पुनः कारणाद् नियमेन तव एव वर्त्म अनुवर्तन्ते न अन्यस्य इति उच्यते—
मनुष्यलोकमें ही वर्णाश्रम आदिके कर्मोंका अधिकार है, अन्य लोकोंमें नहीं, यह नियम किस कारणसे है? यह बतानेके लिये (अगला श्लोक कहते हैं)—
अथवा वर्णाश्रम आदि विभागसे युक्त हुए मनुष्य सब प्रकारसे मेरे मार्गके अनुसार बर्तते हैं—ऐसा आपने कहा, सो नियमपूर्वक वे आपके ही मार्गका अनुसरण क्यों करते हैं, दूसरेके मार्गका क्यों नहीं करते? इसपर कहते हैं—
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चातुर्वर्ण्यं चत्वार एव वर्णाः चातुर्वर्ण्यं मया ईश्वरेण सृष्टम् उत्पादितम्, “ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत्” इत्यादिश्रुतेः, गुणकर्मविभागशो गुणविभागशः कर्मविभागशः च गुणाः सत्त्वरजस्तमांसि।
तत्र सात्त्विकस्य सत्त्वप्रधानस्य ब्राह्मणस्य शमो दमः तप इत्यादीनि कर्माणि।
सत्त्वोपसर्जनरजःप्रधानस्य
क्षत्रियस्य शौर्यतेजःप्रभृतीनि कर्माणि।
तमउपसर्जनरजःप्रधानस्य वैश्यस्य कृष्यादीनि कर्माणि।
रजउपसर्जनतमःप्रधानस्य शूद्रस्य शुश्रूषा एव कर्म।
इति एवं गुणकर्मविभागशः चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टम् इत्यर्थः।
तत् च इदं चातुर्वर्ण्यं न अन्येषु लोकेषु अतो मानुषे लोके इति विशेषणम्।
हन्त तर्हि चातुर्वर्ण्यसर्गादेः कर्मणः कर्तृत्वात् तत्फलेन युज्यसे अतो न त्वं नित्यमुक्तो नित्येश्वर इति उच्यते—
यद्यपि मायासंव्यवहारेण तस्य कर्मणः कर्तारम् अपि सन्तं मां परमार्थतो विद्धि अकर्तारम् अत एव अव्ययम् असंसारिणं च मां विद्धि॥ 13॥
(ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—इन) चारों वर्णोंका नाम चातुर्वर्ण्य है। सत्त्व, रज, तम—इन तीनों गुणोंके विभागसे तथा कर्मोंके विभागसे यह चारों वर्ण मुझ ईश्वरद्वारा रचे हुए—उत्पन्न किये हुए हैं। “ब्राह्मण इस पुरुषका मुख हुआ” इत्यादि श्रुतियोंसे यह प्रमाणित है।
उनमेंसे सात्त्विक—सत्त्वगुणप्रधान ब्राह्मणके शम, दम, तप इत्यादि कर्म हैं।
जिसमें सत्त्वगुण गौण है और रजोगुण प्रधान है, उस क्षत्रियके शूरवीरता, तेज प्रभृति कर्म हैं।
जिसमें तमोगुण गौण और रजोगुण प्रधान है, ऐसे वैश्यके कृषि आदि कर्म हैं।
तथा जिसमें रजोगुण गौण और तमोगुण प्रधान है, उस शूद्रका केवल सेवा ही कर्म है।
इस प्रकार गुण और कर्मोंके विभागसे चारों वर्ण मेरे द्वारा उत्पन्न किये गये हैं, यह अभिप्राय है।
ऐसी यह चार वर्णोंकी अलग-अलग व्यवस्था दूसरे लोकोंमें नहीं है, इसलिये (पूर्वश्लोकमें) “मानुषे लोके” यह विशेषण लगाया गया है।
यदि चातुर्वर्ण्यकी रचना अिाद कर्मके आप कर्ता हैं, तब तो उसके फलसे भी आपका सम्बन्ध होता ही होगा, इसलिये आप नित्यमुक्त और नित्य-ईश्वर भी नहीं हो सकते? इसपर कहा जाता है—
यद्यपि मायिक व्यवहारसे मैं उस कर्मका कर्ता हूँ, तो भी वास्तवमें मुझे तू अकर्ता ही जान; तथा इसीलिये मुझे अव्यय और असंसारी ही समझ॥ 13॥
येषां तु कर्मणां कर्तारं मां मन्यसे, परमार्थतः तेषाम् अकर्ता एव अहं यतः—
जिन कर्मोंका तू मुझे कर्ता मानता है, वास्तवमें मैं उनका अकर्ता ही हूँ, क्योंकि—
न मां तानि कर्माणि लिम्पन्ति देहाद्यारम्भ-कत्वेन अहङ्काराभावात्। न च तेषां कर्मणां फलेषु मे स्पृहा तृष्णा।
येषां तु संसारिणाम् अहं कर्ता इति अभिमानः, कर्मसु स्पृहा तत्फलेषु च, तान् कर्माणि लिम्पन्ति इति युक्तम्, तदभावाद् न मां कर्माणि लिम्पन्ति।
इति एवं यः अन्यः अपि माम् आत्मत्वेन अभिजानाति न अहं कर्ता न मे कर्मफले स्पृहा इति, स कर्मभिः न बध्यते। तस्य अपि न
देहाद्यारम्भकाणि
कर्माणि
भवन्ति इत्यर्थः॥ 14॥
मुझमें अहंकारका अभाव है, इसलिये वे कर्म देहादिकी उत्पत्तिके कारण बनकर मुझे लिप्त नहीं करते और उन कर्मोंके फलमें मेरी लालसा अर्थात् तृष्णा भी नहीं है।
जिन संसारी मनुष्योंका कर्मोंमें “मैं कर्ता हूँ” ऐसा अभिमान रहता है, एवं जिनकी उन कर्मोंमें और उनके फलोंमें लालसा रहती है, उनको कर्म लिप्त करते हैं यह ठीक है, परंतु उन दोनोंका अभाव होनेके कारण वे (कर्म) मुझे लिप्त नहीं कर सकते।
इस प्रकार जो कोई दूसरा भी मुझे आत्मरूपसे जान लेता है कि “मैं कर्मोंका कर्ता नहीं हूँ” “मेरी कर्मफलमें स्पृहा भी नहीं है” वह भी कर्मोंसे नहीं बँधता अर्थात् उसके भी कर्म देहादिके उत्पादक नहीं होते॥ 14॥
न अहं कर्ता न मे कर्मफले स्पृहा—
मैं न तो कर्मोंका कर्ता ही हूँ और न मुझे कर्मफलकी चाहना ही है—
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वः अपि अतिक्रान्तैः मुमुक्षुभिः, कुरु तेन कर्म एव त्वं न तूष्णीम् आसनं न अपि सन्न्यासः कर्तव्यः।
तस्मात् त्वं पूर्वैः अपि अनुष्ठितत्वाद् यदि अनात्मज्ञः त्वं तदा आत्मशुद्ध्यर्थं तत्त्ववित् चेद् लोकसङ्ग्रहार्थं पूर्वैः जनकादिभिः पूर्वतरं कृतं न अधुनातनं कृतं निर्वर्तितम्॥ 15॥
ऐसा समझकर ही पूर्वकालके मुमुक्षु पुरुषोंने भी कर्म किये थे। इसलिये तू भी कर्म ही कर। तेरे लिये चुपचाप बैठ रहना या संन्यास लेना यह दोनों ही कर्तव्य नहीं है।
क्योंकि पूर्वजोंने भी कर्मका आचरण किया है, इसलिये यदि तू आत्मज्ञानी नहीं है तब तो अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये और यदि तत्त्वज्ञानी है तो लोकसंग्रहके लिये जनकादि पूर्वजोंद्वारा सदासे किये हुए (प्रकारसे ही) कर्म कर, नये ढंगसे किये जानेवाले कर्म मत कर*॥ 15॥
तत्र कर्म चेत् कर्तव्यं त्वद्वचनाद् एव करोमि अहं किं विशेषितेन पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् इति, उच्यते यस्माद् महद् वैषम्यं कर्मणि, कथम्—
यदि कर्म ही कर्तव्य है तो मैं आपकी आज्ञासे ही करनेको तैयार हूँ फिर “पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्” विशेषण देनेकी क्या आवश्यकता है? इसपर कहते हैं कि कर्मके विषयमें बड़ी भारी विषमता है अर्थात् कर्मका विषय बड़ा गहन है। सो किस प्रकार—
किं कर्म किं च अकर्म इति कवयो मेधाविनः अपि अत्र अस्मिन् कर्मादिविषये मोहिता मोहं गताः। अतः ते तुभ्यम् अहं कर्म अकर्म च प्रवक्ष्यामि यद् ज्ञात्वा विदित्वा कर्मादि मोक्ष्यसे अशुभात् संसारात्॥ 16॥
कर्म क्या है और अकर्म क्या है, इस कर्मादिके विषयमें बड़े-बड़े बुद्धिमान् भी मोहित हो चुके हैं, इसलिये मैं तुझे वह कर्म और अकर्म बतलाऊँगा जिस कर्मादिको जानकर तू अशुभसे यानी संसारसे मुक्त हो जायगा॥ 16॥
न च एतत् त्वया मन्तव्यम्, कर्म नाम देहादिचेष्टा लोकप्रसिद्धम् अकर्म तदक्रिया तूष्णीम् आसनं किं तत्र बोद्धव्यम् इति। कस्मात्, उच्यते—
तुझे यह नहीं समझना चाहिये कि केवल देहादिकी चेष्टाका नाम कर्म है और उसे न करके चुपचाप बैठ रहनेका नाम अकर्म है, उसमें जाननेकी बात ही क्या है? यह तो लोकमें प्रसिद्ध ही है। क्यों (ऐसा नहीं समझना चाहिये?) इसपर कहते हैं—
कर्मणः शास्त्रविहितस्य हि यस्माद् अपि अस्ति बोद्धव्यं बोद्धव्यं च अस्ति एव विकर्मणः प्रतिषिद्धस्य तथा अकर्मणः च तूष्णीम्भावस्य बोद्धव्यम् अस्ति इति त्रिषु अपि अध्याहारः कर्तव्यः।
यस्माद् गहना विषमा दुर्ज्ञाना, कर्मण इति उपलक्षणार्थं कर्मादीनां कर्माकर्मविकर्मणां गतिः याथात्म्यं तत्त्वम् इत्यर्थः॥ 17॥
कर्मका—शास्त्रविहित क्रियाका भी (रहस्य) जानना चाहिये, विकर्मका—शास्त्रवर्जित कर्मका भी (रहस्य) जानना चाहिये और अकर्मका अर्थात् चुपचाप बैठ रहनेका भी (रहस्य) समझना चाहिये।
क्योंकि कर्मोंकी अर्थात् कर्म, अकर्म और विकर्मकी गति—उनका यथार्थ स्वरूप—तत्त्व बड़ा गहन है, समझनेमें बड़ा ही कठिन है॥ 17॥
किं पुनः तत्त्वं कर्मादेः यद् बोद्धव्यं वक्ष्यामि इति प्रतिज्ञातम् उच्यते—
कर्मादिका वह तत्त्व क्या है जो कि जाननेयोग्य है, जिसके लिये आपने यह प्रतिज्ञा की थी कि “कहूँगा”। इसपर कहते हैं—
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कर्मणि कर्म क्रियते इति व्यापारमात्रं तस्मिन् कर्मणि अकर्म कर्माभावं यः पश्येद् अकर्मणि
च
कर्माभावे
कर्तृतन्त्रत्वात् प्रवृत्तिनिवृत्त्योः वस्तु अप्राप्य एव हि सर्व एव क्रियाकारकादिव्यवहारः अविद्याभूमौ एव कर्म यः पश्येत् पश्यति।
स बुद्धिमान् मनुष्येषु स युक्तो योगी कृत्स्नकर्मकृत् समस्तकर्मकृत् च स इति स्तूयते कर्माकर्मणोः इतरेतरदर्शी।
ननु किम् इदं विरुद्धम् उच्यते “कर्मणि अकर्म यः पश्येद् इति अकर्मणि च कर्म इति।” न हि कर्म अकर्म स्याद् अकर्म वा कर्म तत्र विरुद्धं कथं पश्येद् द्रष्टा।
ननु अकर्म एव परमार्थतः सत् कर्मवद् अवभासते मूढदृष्टेः लोकस्य तथा कर्म एव अकर्मवत् तत्र यथाभूतदर्शनार्थम् आह भगवान् “कर्मणि अकर्म यः पश्येत्” इत्यादि। अतो न विरुद्धम्। बुद्धिमत्त्वाद्युपपत्तेः च। बोद्धव्यम् इति च यथा भूतदर्शनम् उच्यते।
न च विपरीतज्ञानाद् अशुभाद् मोक्षणं स्यात् “यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्” इति च उक्तम्।
तस्मात् कर्माकर्मणी विपर्ययेण गृहीते प्राणिभिः तद्विपर्ययग्रहणनिवृत्त्यर्थं भगवतो वचनम् “कर्मणि अकर्म यः” इत्यादि।
न च अत्र कर्माधिकरणम् अकर्म अस्ति कुण्डे बदराणि इव न अपि अकर्माधिकरणं कर्म अस्ति कर्माभावत्वाद् अकर्मणः।
अतो विपरीतगृहीते एव कर्माकर्मणी लौकिकैः यथा मृगतृष्णिकायाम् उदकं शुक्तिकायां वा रजतम्।
ननु कर्म कर्म एव सर्वेषां न क्वचिद् व्यभिचरति।
तद् न, नौस्थस्य नावि गच्छन्त्यां तटस्थेषु अगतिषु नगेषु प्रतिकूलगतिदर्शनाद् दूरेषु चक्षुषा असन्निकृष्टेषु गच्छत्सु गत्यभावदर्शनात्।
एवम् इह अपि अकर्मणि अहं करोमि इति कर्मदर्शनं कर्मणि च अकर्मदर्शनं विपरीतदर्शनं येन तन्निराकरणार्थम् उच्यते “कर्मणि अकर्म यः पश्येत्” इत्यादि।
तद् एतद् उक्तप्रतिवचनम् अपि असकृद् अत्यन्तविपरीतदर्शनभाविततया मोमुह्यमानो लोकः श्रुतम् अपि असकृत् तत्त्वं विस्मृत्य मिथ्याप्रसङ्गम् अवतार्य अवतार्य चोदयति इति पुनः पुनः उत्तरम् आह भगवान् दुर्विज्ञेयत्वं च आलक्ष्य वस्तुनः।
“अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयम्” “न जायते म्रियते” इत्यादिना आत्मनि कर्माभावः श्रुतिस्मृति-न्यायप्रसिद्ध उक्तो वक्ष्यमाणः च।
तस्मिन् आत्मनि कर्माभावे अकर्मणि कर्मविपरीतदर्शनम् अत्यन्तनिरूढम्।
यतः “किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः।”
देहाद्याश्रयं कर्म आत्मनि अध्यारोप्य अहं कर्ता मम एतत् कर्म मया अस्य फलं भोक्तव्यम् इति च।
तथा अहं तूष्णीं भवामि येन अहं निरायासः अकर्मा सुखी स्याम् इति कार्यकरणाश्रय-व्यापारोपरमं तत्कृतं च सुखित्वम् आत्मनि अध्यारोप्य न करोमि किञ्चित् तूष्णीं सुखम् आसम् इति अभिमन्यते लोकः।
तत्र इदं लोकस्य विपरीतदर्शनापनयनाय आह भगवान् “कर्मणि अकर्म यः पश्येत्” इत्यादि।
अत्र च कर्म कर्म एव सत् कार्यकरणाश्रयं कर्मरहिते अविक्रिये आत्मनि सर्वैः अध्यस्तं यतः पण्डितः अपि अहं करोमि इति मन्यते।
अत आत्मसमवेततया सर्वलोकप्रसिद्धे कर्मणि नदीकूलस्थेषु इव वृक्षेषु गतिः प्रातिलोम्येन अकर्म कर्माभावं यथाभूतं गत्यभावम् इव वृक्षेषु यः पश्येत्,
अकर्मणि च कार्यकरणव्यापारोपरमे कर्मवद् आत्मनि अध्यारोपिते तूष्णीम् अकुर्वन् सुखम् आस इति अहङ्काराभिसन्धिहेतुत्वात् तस्मिन् अकर्मणि च कर्म यः पश्येत्।
य एवं कर्माकर्मविभागज्ञः स बुद्धिमान् पण्डितो मनुष्येषु स युक्तो योगी कृत्स्नकर्मकृत् च सः अशुभाद् मोक्षितः कृतकृत्यो भवति इत्यर्थः।
अयं श्लोकः अन्यथा व्याख्यातः कैश्चित्, कथम्, नित्यानां किल कर्मणाम् ईश्वरार्थे अनुष्ठीयमानानां तत्फलाभावाद् अकर्माणि तानि उच्यन्ते गौण्या वृत्त्या। तेषां च अकरणम् अकर्म तत् च प्रत्यवायफलत्वात् कर्म उच्यते गौण्या एव वृत्त्या।
तत्र नित्ये कर्मणि अकर्म यः पश्येत् फला-भावात्, यथा धेनुः अपि गौः अगौः उच्यते क्षीराख्यं फलं न प्रयच्छति इति तद्वत्। तथा नित्याकरणे तु अकर्मणि च कर्म यः पश्येद् नरकादिप्रत्यवायफलं प्रयच्छति इति।
न एतद् युक्तं व्याख्यानम् एवं ज्ञानाद् अशुभाद् मोक्षानुपपत्तेः यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।” इति भगवता उक्तं वचनं बाध्येत।
कथम्, नित्यानाम् अनुष्ठानाद् अशुभात् स्याद् नाम मोक्षणं न तु तेषां फलाभावज्ञानात्। न हि नित्यानां फलाभावज्ञानम् अशुभमुक्तिफलत्वेन चोदितं नित्यकर्मज्ञानं वा। न च भगवता एव इह उक्तम्।
एतेन अकर्मणि कर्मदर्शनं प्रत्युक्तम्। न हि अकर्मणि कर्म इति दर्शनं कर्तव्यतया इह चोद्यते, नित्यस्य तु कर्तव्यतामात्रम्।
न च अकरणाद् नित्यस्य प्रत्यवायो भवति इति विज्ञानात् किञ्चित् फलं स्यात्। न अपि नित्याकरणं ज्ञेयत्वेन चोदितम्।
न अपि कर्म अकर्म इति मिथ्यादर्शनाद् अशुभाद् मोक्षणं बुद्धिमत्त्वं युक्तता कृत्स्नकर्म-कृत्त्वादि च फलम् उपपद्यते स्तुतिः वा।
मिथ्याज्ञानम् एव हि साक्षाद् अशुभरूपं कुतः अन्यस्माद् अशुभाद् मोक्षणम्, न हि तमः तमसो निवर्तकं भवति।
ननु कर्मणि यद् अकर्मदर्शनम् अकर्मणि वा कर्मदर्शनं न तद् मिथ्याज्ञानं किं तर्हि गौणं फलभावाभावनिमित्तम्।
न, कर्माकर्मविज्ञानाद् अपि गौणात् फलस्य अश्रवणात्। न अपि श्रुतहान्यश्रुतपरिकल्पनया कश्चिद् विशेषो लभ्यते।
स्वशब्देन अपि शक्यं वक्तुं नित्यकर्मणां फलं न अस्ति अकरणात् च तेषां नरकपातः स्याद् इति। तत्र व्याजेन परव्यामोहरूपेण कर्मणि अकर्म यः पश्येद् इत्यादिना किम्।
तत्र एवं व्याचक्षाणेन भगवता उक्तं वाक्यं लोकव्यामोहार्थम् इति व्यक्तं कल्पितं स्यात्।
न च एतत् छद्मरूपेण वाक्येन रक्षणीयं वस्तु, न अपि शब्दान्तरेण पुनः पुनः उच्यमानं सुबोध स्याद् इत्येवं वक्तुं युक्तम्।
“कर्मण्येवाधिकारस्ते” इति अत्र हि स्फुटतर उक्तः अर्थो न पुनः वक्तव्यो भवति।
सर्वत्र च प्रशस्तं बोद्धव्यं च कर्तव्यम् एव न निष्प्रयोजनं बोद्धव्यम् इति उच्यते।
न च मिथ्याज्ञानं बोद्धव्यं भवति तत्प्रत्युपस्थापितं वा वस्त्वाभासम्।
न अपि नित्यानाम् अकरणाद् अभावात् प्रत्यवायभावोत्पत्तिः “नासतो विद्यते भावः” इति वचनात्। “कथमसतः सज्जायेत” (छा0 उ0 6। 2। 2) इति च दर्शितम्।
असतः सज्जन्मप्रतिषेधाद् असतः सदुत्पत्तिं ब्रुवता असद् एव सद् भवेत् सत् च असद् भवेद् इति उक्तं स्यात्। तत् च अयुक्तं सर्वप्रमाणविरोधात्।
न च निष्फलं विदध्यात् कर्म शास्त्रं दुःखस्वरूपत्वाद् दुःखस्य च बुद्धिपूर्वकतया कार्यत्वानुपपत्तेः।
तदकरणे च नरकपाताभ्युपगमे अनर्थाय एव उभयथा अपि करणे अकरणे च शास्त्रं निष्फलं कल्पितं स्यात्।
स्वाभ्युपगमविरोधः च नित्यं निष्फलं कर्म इति अभ्युपगम्य मोक्षफलाय इति ब्रुवतः।
तस्माद् यथाश्रुत एव अर्थः “कर्मणि अकर्म यः” इत्यादेः, तथा च व्याख्यातः अस्माभिः श्लोकः॥ 18॥
जो कुछ किया जाय उस चेष्टामात्रका नाम कर्म है। उस कर्ममें जो अकर्म देखता है, अर्थात् कर्मका अभाव देखता है तथा अकर्ममें—शरीरादिकी चेष्टाके अभावमें जो कर्म देखता है। अर्थात् कर्मका करना और न करना दोनों ही कर्ताके अधीन हैं। तथा आत्मतत्त्वकी प्राप्तिसे पूर्व अज्ञानावस्थामें ही सब क्रिया-कारक आदि व्यवहार है, (इसीलिये कर्मका त्याग भी कर्म ही है*) इस प्रकार जो अकर्ममें कर्म देखता है।
वह मनुष्योंमें बुद्धिमान् है, वह योगी है और वह समस्त कर्मोंको करनेवाला है, इस प्रकार कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म देखनेवालेकी स्तुति की जाती है।
पू0—“जो कर्ममें अकर्म देखता है और अकर्ममें कर्म देखता है, यह विरुद्ध बात किस भावसे कही जा रही है?” क्योंकि कर्म तो अकर्म नहीं हो सकता और अकर्म कर्म नहीं हो सकता, तब देखनेवाला विरुद्ध कैसे देखे?
उ0—वास्तवमें जो अकर्म है वही मूढमति लोगोंको कर्मके सदृश भास रहा है और उसी तरह कर्म अकर्मके सदृश भास रहा है, उसमें यथार्थ तत्त्व देखनेके लिये भगवान्ने “कर्मणि अकर्म यः पश्येत्” इत्यादि वाक्य कहे हैं, इसलिये (उनका कहना) विरुद्ध नहीं है; क्योंकि बुद्धिमान् आदि विशेषण भी तभी सम्भव हो सकते हैं। इसके सिवा यथार्थ ज्ञानको ही जाननेयोग्य कहा जा सकता है (मिथ्या ज्ञानको नहीं)।
तथा “जिसको जानकर अशुभसे मुक्त हो जायगा।” यह भी कहा है सो विपरीत ज्ञानद्वारा (जन्म-मरणरूप) अशुभसे मुक्ति नहीं हो सकती।
सुतरां प्राणियोंने जो कर्म और अकर्मको विपरीतरूपसे समझ रखा है, उस विपरीत ज्ञानको हटानेके लिये ही भगवान्के “कर्मण्यकर्म यः” इत्यादि वचन हैं।
यहाँ “कुण्डेमें बेरोंकी तरह” कर्मका आधार अकर्म नहीं है और उसी तरह अकर्मका आधार कर्म भी नहीं है; क्योंकि कर्मके अभावका नाम अकर्म है।
इसलिये (यही सिद्ध हुआ कि) मृगतृष्णामें जलकी भाँति एवं सीपमें चाँदीकी तरह लोगोंने कर्म और अकर्मको विपरीत मान रखा है।
पू0—कर्मको सब कर्म ही मानते हैं, इसमें कभी फेरफार नहीं होता।
उ0—यह बात नहीं, क्योंकि नाव चलते समय नौकामें बैठे हुए पुरुषको तटके अचल वृक्षोंमें प्रतिकूल गति दीखती है अर्थात् वे वृक्ष उलटे चलते हुए दीखते हैं और जो (नक्षत्रादि) पदार्थ नेत्रोंके पास नहीं होते, बहुत दूर होते हैं, उन चलते हुए पदार्थोंमें भी गतिका अभाव दीख पड़ता है अर्थात् वे अचल दीखते हैं।
इसी तरह यहाँ भी अकर्ममें (क्रियारहित आत्मामें) “मैं करता हूँ” यह कर्मका देखना और (त्यागरूप) कर्ममें (मैं कुछ नहीं करता इस) अकर्मका देखना ऐसे विपरीत देखना होता है, अतः उसका निराकरण करनेके लिये “कर्मणि अकर्म यः पश्येत्” इत्यादि वचन भगवान् कहते हैं।
यद्यपि यह विषय अनेक बार शंका-समाधानोंद्वारा सिद्ध किया जा चुका है तो भी अत्यन्त विपरीत ज्ञानकी भावनासे अत्यन्त मोहित हुए लोग अनेक बार सुने हुए तत्त्वको भी भूलकर मिथ्या प्रसंग ला-लाकर शंका करने लग जाते हैं, इसलिये तथा आत्मतत्त्वको दुर्विज्ञेय समझकर भगवान् पुनः-पुनः उत्तर देते हैं।
श्रुति, स्मृति और न्यायसिद्ध जो आत्मामें कर्मोंका अभाव है वह “अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयम्” “न जायते म्रियते” इत्यादि श्लोकोंसे कहा जा चुका और आगे भी कहा जायगा।
उस क्रियारहित आत्मामें अर्थात् अकर्ममें कर्मका देखनारूप जो विपरीत दर्शन है, यह लोगोंमें अत्यन्त स्वाभाविक-सा हो गया है।
क्योंकि “कर्म क्या है और अकर्म क्या है, इस विषयमें बुद्धिमान् भी मोहित हैं।”
अर्थात् देह-इन्द्रियादिसे होनेवाले कर्मोंका आत्मामें अध्यारोप करके “मैं कर्ता हूँ” “मेरा यह कर्म है” “मुझे इसका फल भोगना है” इस प्रकार (लोग मानते हैं।)
तथा “मैं चुप होकर बैठता हूँ जिससे कि परिश्रमरहित और कर्मरहित होकर सुखी हो जाऊँ” इस प्रकार देह-इन्द्रियोंके व्यापारकी उपरामताका और उससे होनेवाले सुखीपनका आत्मामें अध्यारोप करके “मैं कुछ भी नहीं करता हूँ” “चुपचाप सुखसे बैठा हूँ” इस प्रकार लोग मानते हैं।
लोगोंके इस विपरीत ज्ञानको हटानेके लिये “कर्मणि अकर्म यः पश्येत्” इत्यादि वचन भगवान्ने कहे हैं।
यहाँ देहेन्द्रियादिके आश्रयसे होनेवाला कर्म यद्यपि क्रियारूप है तो भी उसका लोगोंने कर्मरहित अविक्रिय आत्मामें अध्यारोप कर रखा है; क्योंकि शास्त्रज्ञ विद्वान् भी “मैं करता हूँ” ऐसा मान बैठता है।
अतः नदी-तीरस्थ वृक्षोंमें भ्रमसे प्रतिकूल गति प्रतीत होनेकी भाँति अज्ञानसे आत्माके नित्य सम्बन्धी माने जाकर जो लोकमें कर्म नामसे प्रसिद्ध हो रहे हैं, उन कर्मोंमें वस्तुतः नदी-तीरस्थ वृक्षोंमें गतिका अभाव देखनेकी भाँति जो अकर्म देखता है अर्थात् कर्माभाव देखता है,
तथा कर्मकी भाँति आत्मामें अज्ञानसे आरोपित किये हुए शरीर, इन्द्रिय आदिकी उपरामतारूप अकर्ममें, अर्थात् क्रियाके त्यागमें भी “मैं कुछ न करता हुआ चुपचाप सुखपूर्वक बैठा हूँ” इस अहंकारका सम्बन्ध होनेके कारण जो कर्म देखता है यानी उस त्यागको भी जो कर्म समझता है।
इस प्रकार जो कर्म और अकर्मके विभागको (तत्त्वसे) जाननेवाला है, वह मनुष्योंमें बुद्धिमान्— पण्डित है, वह युक्त—योगी है और सम्पूर्ण कर्म करनेवाला भी वही है अर्थात् वह पुण्य-पापरूप अशुभसे मुक्त हुआ कृतकृत्य है।
कई टीकाकार इस श्लोककी दूसरी तरहसे ही व्याख्या करते हैं। कैसे? ईश्वरके लिये किये जानेवाले जो (पञ्चमहायज्ञादि) नित्यकर्म हैं, उनका फल नहीं मिलता इस कारण वे गौणी वृत्तिसे अकर्म कहे जाते हैं? (इसी प्रकार) उन नित्यकर्मोंके न करनेका नाम अकर्म है, वह भी पापरूप फलके देनेवाला होनेके कारण गौणरूपसे ही कर्म कहा जाता है।
जैसे कोई गौ ब्यायी हुई होनेपर भी यदि दूधरूप फल नहीं देती तो वह अगौ कह दी जाती है, वैसे ही नित्यकर्ममें, उसके फलका अभाव होनेके कारण जो अकर्म देखता है और नित्यकर्मका न करनारूप जो अकर्म है उसमें कर्म देखता है; क्योंकि वह नरकादि विपरीत फल देनेवाला है।
यह व्याख्या ठीक नहीं है क्योंकि इस प्रकार जाननेसे अशुभसे मुक्ति नहीं हो सकती अर्थात् जन्म-मरण-बन्धन नहीं टूट सकता। अतः यह अर्थ मान लेनेसे भगवान्के कहे हुए ये वचन कि “जिसको जानकर तू अशुभसे मुक्त हो जायगा।” कट जायँगे।
क्योंकि नित्यकर्मोंके अनुष्ठानसे तो शायद अशुभसे छुटकारा हो भी जाय, परंतु उन नित्यकर्मोंका फल नहीं होता, इस ज्ञानसे तो मोक्ष हो ही नहीं सकता। क्योंकि नित्यकर्मोंका फल नहीं होता, यह ज्ञान या नित्यकर्मोंका ज्ञान अशुभसे मुक्त कर देनेवाला है, ऐसा शास्त्रोंमें कहीं नहीं कहा और न भगवान्ने ही गीताशास्त्रमें कहीं ऐसा कहा है।
इसी युक्तिसे (उनके बतलाये हुए) अकर्ममें कर्मदर्शनका भी खण्डन हो जाता है। क्योंकि यहाँ (गीतामें) नित्यकर्मोंके अभावरूप अकर्ममें कर्म देखनेको कहीं कर्तव्यरूपसे विधान नहीं किया, केवल नित्यकर्मकी कर्तव्यताका विधान है।
इसके सिवा “नित्यकर्म न करनेसे पाप होता है” ऐसा जान लेनेसे ही कोई फल नहीं हो सकता। और यह नित्यकर्मका न करनारूप अकर्म शास्त्रोंमें कोई जाननेयोग्य विषय भी नहीं बताया गया है।
तथा इस प्रकार दूसरे टीकाकारोंके माने हुए “कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्मदर्शन” रूप इस मिथ्यादर्शनसे “अशुभसे मुक्ति” “बुद्धिमत्ता” “युक्तता” “सर्व-कर्मकर्तृत्व” इत्यादि फल भी सम्भव नहीं और ऐसे मिथ्याज्ञानकी स्तुति भी नहीं बन सकती।
जब कि मिथ्याज्ञान स्वयं ही अशुभरूप है, तब वह दूसरे अशुभसे किसीको कैसे मुक्त कर सकेगा? क्योंकि अन्धकार (कभी) अन्धकारका नाशक नहीं हो सकता।
पू0—यहाँ जो कर्ममें अकर्म देखना और अकर्ममें कर्म देखना (उन टीकाकारोंने) बतलाया है, वह मिथ्याज्ञान नहीं है किंतु फलके होने और न होनेके निमित्तसे गौणरूपसे देखना है।
उ0—यह कहना भी ठीक नहीं; क्योंकि गौणरूपसे कर्मको अकर्म और अकर्मको कर्म जान लेनेसे भी कोई लाभ नहीं सुना गया। इसके सिवा श्रुतिसिद्ध बातको छोड़कर श्रुतिविरुद्ध बातकी कल्पना करनेमें कोई विशेषता भी नहीं दिखलायी देती।
(भगवान्को यदि यही अभीष्ट होता तो वे) उसी प्रकारके शब्दोंसे भी स्पष्ट कह सकते थे कि “नित्य-कर्मोंका कोई फल नहीं है और उनके न करनेसे नरक-प्राप्ति होती है।” फिर इस प्रकार “कर्ममें जो अकर्म देखता है” इत्यादि दूसरोंको मोहित करनेवाले मायायुक्त वचन कहनेसे क्या प्रयोजन था।
इस प्रकार उपर्युक्त अर्थ करनेवालोंका तो स्पष्ट ही यह मानना हुआ कि “भगवान्द्वारा कहे हुए वचन संसारको मोहित करनेके लिये हैं।”
इसके सिवा न तो यह कहना ही उचित है कि यह नित्यकर्म-अनुष्ठानरूप विषय मायायुक्त वचनोंसे गुप्त रखनेयोग्य है और न यही कहना ठीक है कि (यह विषय बड़ा गहन है इसलिये) बारंबार दूसरे-दूसरे शब्दोंद्वारा कहनेसे सुबोध होगा।
क्योंकि “कर्मण्येवाधिकारस्ते” इस श्लोकमें स्पष्ट कहे हुए अर्थको फिर कहनेकी आवश्यकता नहीं होती।
तथा सभी जगह जो बात करनेयोग्य होती है, वही प्रशंसनीय और जाननेयोग्य बतलायी जाती है। निरर्थक बातको “जाननेयोग्य है” ऐसा नहीं कहा जाता।
मिथ्याज्ञान या उसके द्वारा स्थापित की हुई आभासमात्र वस्तु जाननेयोग्य नहीं हो सकती।
इसके सिवा नित्यकर्मोंके न करनेरूप अभावसे प्रत्यवायरूप भावकी उत्पत्ति भी नहीं हो सकती। क्योंकि “नासतो विद्यते भावः” इत्यादि भगवान्के वाक्य हैं तथा “असत्से सत् कैसे उत्पन्न हो सकता है?” इत्यादि श्रुतिवाक्य भी पहले दिखलाये जा चुके हैं।
इस प्रकार असत्से सत्की उत्पत्तिका निषेध कर दिया जानेपर भी जो असत्से सत्की उत्पत्ति बतलाते हैं, उनका तो यह कहना हुआ कि असत् तो सत् होता है और सत् असत् होता है, परंतु यह सब प्रमाणोंसे विरुद्ध होनेके कारण अयुक्त है।
तथा शास्त्र भी निरर्थक कर्मोंका विधान नहीं कर सकता, क्योंकि सभी कर्म (परिश्रमकी दृष्टिसे) दुःखरूप हैं और जान-बूझकर (बिना प्रयोजन) किसीका भी दुःखमें प्रवृत्त होना सम्भव नहीं।
तथा उन नित्यकर्मोंको न करनेसे नरकप्राप्ति होती है, ऐसा शास्त्रका आशय मान लेनेपर तो यह मानना हुआ कि कर्म करने और न करनेमें दोनों प्रकारसे शास्त्र अनर्थका ही कारण है, अतः व्यर्थ है।
इसके सिवा, “नित्यकर्मोंका फल नहीं है”, ऐसा मानकर फिर उनको मोक्षरूप फलके देनेवाला कहनेसे उन व्याख्याकारोंके मतमें स्ववचोविरोध भी होता है।
सुतरां “कर्मणि अकर्म यः पश्येत्” इत्यादि श्लोकका अर्थ जैसा (गुरुपरम्परासे) सुना गया है, वही ठीक है और हमने भी उसीके अनुसार इस श्लोककी व्याख्या की है॥ 18॥
तद् एतत् कर्मणि अकर्मादिदर्शनं स्तूयते—
उपर्युक्त कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्मदर्शनकी स्तुति करते हैं—
यस्य यथोक्तदर्शिनः सर्वे यावन्तः समारम्भाः कर्माणि समारभ्यन्ते इति समारम्भाः काम-सङ्कल्पवर्जिताः कामैः तत्कारणैः च सङ्कल्पैः वर्जिता मुधा एव चेष्टामात्रा अनुष्ठीयन्ते, प्रवृत्तेन चेत् लोकसङ्ग्रहार्थं निवृत्तेन चेत् जीवनमात्रार्थम्,
तं ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं कर्मादौ अकर्मादिदर्शनं ज्ञानं तद् एव अग्निः तेन ज्ञानाग्निना दग्धानि शुभाशुभलक्षणानि कर्माणि यस्य तम् आहुः परमार्थतः पण्डितं बुधा ब्रह्मविदः॥ 19॥
जिनका प्रारम्भ किया जाता है उनका नाम समारम्भ है, इस व्युत्पत्तिसे सम्पूर्ण कर्मोंका नाम समारम्भ है। उपर्युक्त प्रकारसे “कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म” देखनेवाले जिस पुरुषके समस्त समारम्भ (कर्म) कामनासे और कामनाके कारणरूप संकल्पोंसे भी रहित हो जाते हैं अर्थात् जिसके द्वारा बिना ही किसी अपने प्रयोजनके—यदि वह प्रवृत्तिमार्गवाला है तो लोक-संग्रहके लिये और निवृत्तिमार्गवाला है तो जीवनयात्रा-निर्वाहके लिये—केवल चेष्टामात्र ही क्रिया होती है,
तथा कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्मदर्शनरूप ज्ञानाग्निसे जिसके पुण्य-पापरूप सम्पूर्ण कर्म दग्ध हो गये हैं, ऐसे ज्ञानाग्निदग्धकर्मा पुरुषको ब्रह्मवेत्ताजन वास्तवमें पण्डित कहते हैं॥ 19॥
यः तु अकर्मादिदर्शी सः अकर्मादिदर्शनाद् एव निष्कर्मा सन्न्यासी जीवनमात्रार्थचेष्टः सन् कर्मणि न प्रवर्तते यद्यपि प्राग् विवेकतः प्रवृत्तः।
यः तु प्रारब्धकर्मा सन् उत्तरकालम् उत्पन्नात्मसम्यग्दर्शनः स्यात् स कर्मणि प्रयोजनम् अपश्यन् ससाधनं कर्म परित्यजति एव।
स कुतश्चित् निमित्तात् कर्मपरित्यागासम्भवे सति कर्मणि तत्फले च सङ्गरहिततया स्वप्रयोजनाभावात् लोकसङ्ग्रहार्थं पूर्ववत् कर्मणि प्रवृत्तः अपि न एव किञ्चित् करोति।
ज्ञानाग्निदग्धकर्मत्वात् तदीयं कर्म अकर्म एव सम्पद्यते इति एतम् अर्थं दर्शयिष्यन् आह—
जो कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म देखनेवाला है, वह यदि विवेक होनेसे पूर्व कर्मोंमें लगा हो तो भी कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्मका ज्ञान हो जानेसे केवल जीवन-निर्वाहमात्रके लिये चेष्टा करता हुआ कर्मरहित संन्यासी ही हो जाता है, फिर उसकी कर्मोंमें प्रवृत्ति नहीं होती।
अर्थात् जो पहले कर्म करनेवाला हो और पीछे जिसको आत्माका सम्यक् ज्ञान हुआ हो, ऐसा पुरुष कर्मोंमें कोई प्रयोजन न देखकर साधनोंसहित कर्मोंका त्याग कर ही देता है।
परंतु किसी कारणसे कर्मोंका त्याग करना असम्भव होनेपर कोई ऐसा पुरुष यदि कर्मोंमें और उनके फलमें आसक्तिरहित होकर केवल लोकसंग्रहके लिये पहलेके सदृश कर्म करता रहता है तो भी निजका प्रयोजन न रहनेके कारण (वास्तवमें) वह कुछ भी नहीं करता।
क्योंकि ज्ञानरूप अग्निद्वारा भस्मीभूत हो जानेके कारण उसके कर्म अकर्म ही हो जाते हैं। इसी आशयको दिखानेकी इच्छासे भगवान् कहते हैं—
त्यक्त्वा कर्मसु अभिमानं फलासङ्गं च यथोक्तेन ज्ञानेन नित्यतृप्तो निराकाङ्क्षो विषयेषु इत्यर्थः।
निराश्रय आश्रयरहितः। आश्रयो नाम यदाश्रित्य पुरुषार्थं सिसाधयिषति, दृष्टादृष्टेष्ट-फलसाधनाश्रयरहित इत्यर्थः।
विदुषा क्रियमाणं कर्म परमार्थतः अकर्म एव तस्य निष्क्रियात्मदर्शनसम्पन्नत्वात्।
तेन एवं भूतेन प्रयोजनाभावात् ससाधनं कर्म परित्यक्तव्यम् एव इति प्राप्ते।
ततो निर्गमासम्भवात् लोकसङ्ग्रहचिकीर्षया शिष्टविगर्हणापरिजिहीर्षया वा पूर्ववत् कर्मणि अभिप्रवृत्तः अपि निष्क्रियात्मदर्शनसम्पन्नत्वाद् न एव किञ्चित् करोति सः॥ 20॥
उपर्युक्त ज्ञानके प्रभावसे कर्मोंमें अभिमान और फलासक्तिका त्याग करके जो नित्यतृप्त है अर्थात् विषय-कामनासे रहित हो गया है,
तथा आश्रयसे रहित है। जिस फलका आश्रय लेकर मनुष्य पुरुषार्थ सिद्ध करनेकी इच्छा किया करता है, उसका नाम आश्रय है, ऐसे इस लोक और परलोकके इष्टफल-साधनरूप आश्रयसे जो रहित है,
उस ज्ञानीद्वारा किये हुए कर्म वास्तवमें अकर्म ही हैं; क्योंकि वह निष्क्रिय आत्माके ज्ञानसे सम्पन्न है।
अपना कोई प्रयोजन न रहनेके कारण ऐसे पुरुषको साधनोंसहित कर्मोंका परित्याग कर ही देना चाहिये, ऐसी कर्तव्यता प्राप्त होनेपर भी।
उन कर्मोंसे निवृत्त होना असम्भव होनेके कारण लोकसंग्रहकी इच्छासे या श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा की जानेवाली निन्दाको दूर करनेकी इच्छासे यदि (कोई ज्ञानी) पहलेकी तरह कर्मोंमें प्रवृत्त है तो भी वह निष्क्रिय आत्माके ज्ञानसे सम्पन्न होनेके कारण वास्तवमें कुछ भी नहीं करता॥ 20॥
यः पुनः पूर्वोक्तविपरीतः प्राग् एव कर्मा-रम्भाद् ब्रह्मणि सर्वान्तरे प्रत्यगात्मनि निष्क्रिये सञ्जातात्मदर्शनः,
स
दृष्टादृष्टेष्टविषयाशीर्विवर्जिततया दृष्टादृष्टार्थे कर्मणि प्रयोजनम् अपश्यन् ससाधनं कर्म सन्न्यस्य शरीरयात्रामात्रचेष्टो यतिः ज्ञाननिष्ठो मुच्यते इति एतम् अर्थं दर्शयितुम् आह—
परंतु जो उससे विपरीत है अर्थात् उपर्युक्त प्रकारसे कर्म करनेवाला नहीं है, कर्मोंका आरम्भ करनेसे पहले (गृहस्थी न बनकर ब्रह्मचर्य आश्रममें) ही जिसका सबके अन्दर व्यापक अन्तरात्मारूप निष्क्रिय ब्रह्ममें आत्मभाव प्रत्यक्ष हो गया है,
वह केवल शरीरयात्राके लिये चेष्टा करनेवाला ज्ञान-निष्ठ यति, इस लोक और परलोकके समस्त इच्छित भोगोंको आशासे रहित होनेके कारण, इस लोक और परलोकके भोगरूप फल देनेवाले कर्मोंमें अपना कोई भी प्रयोजन न देखकर कर्मोंको और कर्मोंके साधनों-को त्यागकर मुक्त हो जाता है। इसी भावको दिखलानेके लिये (अगला श्लोक) कहते हैं—
भाष्य14 paragraphs · खोलें
निराशीः निर्गता आशिषो यस्मात् स निराशीः यतचित्तात्मा चित्तम् अन्तःकरणम् आत्मा बाह्यः कार्यकरणसङ्घातः तौ उभौ अपि यतौ संयतौ येन स यतचित्तात्मा, त्यक्तसर्वपरिग्रहः त्यक्तः सर्वः परिग्रहो येन स त्यक्तसर्वपरिग्रहः।
शारीरं शरीरस्थितिमात्रप्रयोजनं केवलं तत्र अपि अभिमानवर्धितं कर्म कुर्वन् न आप्नोति न प्राप्नोति किल्बिषम् अनिष्टरूपं पापं धर्मं च। धर्मः अपि मुमुक्षोः किल्बिषम् एव बन्धापादकत्वात्।
किं च शारीरं केवलं कर्म इत्यत्र किं शरीरनिर्वर्त्यं शारीरं कर्म अभिप्रेतम् आहोस्वित् शरीरस्थितिमात्रप्रयोजनं शारीरं कर्म इति।
किं च अतो यदि शरीरनिर्वर्त्यं शारीरं कर्म यदि वा शरीरस्थितिमात्रप्रयोजनं शारीरम् इति, उच्यते—
यदा शरीरनिर्वर्त्यं कर्म शारीरम् अभिप्रेतं स्यात् तदा दृष्टादृष्टप्रयोजनं कर्म प्रतिषिद्धम् अपि शरीरेण कुर्वन् न आप्नोति किल्बिषम् इति ब्रुवतो विरुद्धाभिधानं प्रसज्येत। शास्त्रीयं च कर्म दृष्टादृष्टप्रयोजनं शरीरेण कुर्वन् न आप्नोति किल्बिषम् इति अपि ब्रुवतः अप्राप्तप्रतिषेधप्रसङ्गः।
शारीरं कर्म कुर्वन् इति विशेषणात् केवलशब्दप्रयोगात् च वाङ्मनसनिर्वर्त्यं कर्म विधिप्रतिषेधविषयं धर्माधर्मशब्दवाच्यं कुर्वन् प्राप्नोति किल्बिषम् इति उक्तं स्यात्।
तत्र अपि वाङ्मनसाभ्यां विहितानुष्ठानपक्षे किल्बिषप्राप्तिवचनं
विरुद्धम्
आपद्येत। प्रतिषिद्धसेवापक्षे अपि भूतार्थानुवादमात्रम् अनर्थकं स्यात्।
यदा तु शरीरस्थितिमात्रप्रयोजनं शारीरं कर्म अभिप्रेतं भवेत् तदा दृष्टादृष्टप्रयोजनं कर्म विधिप्रतिषेधगम्यं
शरीरवाङ्मनसनिर्वर्त्यम् अन्यद् अकुर्वन् तैः एव शरीरादिभिः शरीर-स्थितिमात्रप्रयोजनं केवलशब्दप्रयोगाद् अहं करोमि इति अभिमानवर्जितः शरीरादिचेष्टामात्रं लोकदृष्ट्या कुर्वन् न आप्नोति किल्बिषम्।
एवम्भूतस्य पापशब्दवाच्यकिल्बिषप्राप्त्य-सम्भवात् किल्बिषं संसारं न आप्नोति।
ज्ञानाग्निदग्धसर्वकर्मत्वाद् अप्रतिबन्धेन मुच्यते एव इति।
पूर्वोक्तसम्यग्दर्शनफलानुवाद एव एषः। एवम् “शारीरं केवलं कर्म” इति अस्य अर्थपरिग्रहे निरवद्यं भवति॥ 21॥
जिसकी सम्पूर्ण आशाएँ दूर हो गयी हैं, वह “निराशीः” है, जिसने चित्त यानी अन्तःकरणको और आत्मा यानी बाह्य कार्य-करणके संघातरूप शरीरको— इन दोनोंको भली प्रकार अपने वशमें कर लिया है वह “यतचित्तात्मा” कहलाता है, जिसने समस्त परिग्रहका अर्थात् भोगोंकी सामग्रीका सर्वथा त्याग कर दिया है, वह “त्यक्तसर्वपरिग्रह” है।
ऐसा पुरुष केवल शरीरस्थितिमात्रके लिये किये जानेवाले और अभिमानरहित कर्मोंको करता हुआ पापको अर्थात् अनिष्टरूप पुण्य-पाप दोनोंको नहीं प्राप्त होता। बन्धनकारक होनेसे धर्म भी मुमुक्षुके लिये तो पाप ही है।
यहाँ “शारीरं केवलं कर्म” इस पदमें शरीरद्वारा होनेवाले कर्म शारीरिक कर्म माने गये हैं, या शरीर-निर्वाहमात्रके लिये किये जानेवाले कर्म शारीरिक कर्म माने गये हैं?
चाहे शरीरद्वारा होनेवाले कर्म शारीरिक कर्म माने जायँ या शरीरनिर्वाहमात्रके लिये किये जानेवाले कर्म “शारीरिक कर्म” माने जायँ, इस विवेचनसे क्या प्रयोजन है? इसपर कहते हैं—
जो शरीरद्वारा होनेवाले कर्मोंका नाम शारीरिक कर्म मान लिया जाय तो इस लोकमें या परलोकमें फल देनेवाले निषिद्ध कर्मोंको भी शरीरद्वारा करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता, ऐसा कहनेसे भगवान्के कथनमें विरुद्ध विधानका दोष आता है। और इस लोक या परलोकमें फल देनेवाले, शास्त्रविहित कर्मोंको शरीरद्वारा करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता, ऐसा कहनेसे भी बिना प्राप्त हुए दोषके प्रतिषेध करनेका प्रसङ्ग आ जाता है।
तथा “शारीरिक कर्म करता हुआ” इस विशेषणसे और “केवल” शब्दके प्रयोगसे (उपर्युक्त मान्यताके अनुसार) भगवान्का यह कहना हो जाता है कि (शरीरके सिवा) मन-वाणीद्वारा किये जानेवाले विहित और प्रतिषिद्ध कर्मोंको, जो कि धर्म और अधर्म नामसे कहे जाते हैं, करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त होता है।
उसमें भी “मन-वाणीद्वारा विहित कर्मोंको करता हुआ पापको प्राप्त होता है,” यह कहना तो विरुद्ध विधान होगा, और “निषिद्ध कर्मोंको करता हुआ पापको प्राप्त होता है,” यह कहना अनुवादमात्र होनेसे व्यर्थ होगा।
परंतु जब शरीरनिर्वाहमात्रके लिये किये जानेवाले कर्म शारीरिक कर्म मान लिये जायँगे, तब इसका यह अर्थ हो जायगा कि इस लोक या परलोकके भोग ही जिनका प्रयोजन है, जो विधि-निषेधात्मक शास्त्रोंद्वारा जाने जाते हैं, जो शरीर, मन या वाणीद्वारा किये जाते हैं, ऐसे अन्य कर्मोंको न करता हुआ उन शरीर, मन या वाणीसे केवल शरीरनिर्वाहके लिये आवश्यक कर्म लोकदृष्टिसे करता हुआ पुरुष किल्बिषको प्राप्त नहीं होता। यहाँ “केवल” शब्दके प्रयोगसे यह अभिप्राय है कि वह “मैं करता हूँ” इस अभिमानसे रहित होकर केवल लोकदृष्टिसे ही शरीर, वाणी आदिकी चेष्टामात्र करता है।
ऐसे पुरुषको पापरूप किल्बिष प्राप्त होना तो असम्भव है, इसलिये यहाँ यह समझना चाहिये कि वह किल्बिषको यानी संसारको प्राप्त नहीं होता।
ज्ञानरूप अग्निद्वारा उसके समस्त कर्मोंका नाश हो जानेके कारण वह बिना किसी प्रतिबन्धके मुक्त ही हो जाता है।
यह पहले कहे हुए यथार्थ आत्मज्ञानके फलका अनुवादमात्र है। “शारीरं केवलं कर्म” इस वाक्यका इस प्रकार अर्थ मान लेनेसे वह अर्थ निर्दोष सिद्ध होता है॥ 21॥
त्यक्तसर्वपरिग्रहस्य यतेः अन्नादेः शरीर-स्थितिहेतोः परिग्रहस्य अभावाद् याचनादिना शरीरस्थितौ कर्तव्यतायां प्राप्तायाम् अयाचित-मसङ्क्लृप्तमुपपन्नं यदृच्छया” (बोधा0 स्मृ0 21। 8। 12) इत्यादिना वचनेन अनुज्ञातं यतेः शरीर-स्थितिहेतोः अन्नादेः प्राप्तिद्वारम् आविष्कुर्वन् आह—
जिसने समस्त संग्रहका त्याग कर दिया है, ऐसे संन्यासीके पास शरीरनिर्वाहके कारणरूप अन्नादिका संग्रह नहीं होता, इसलिये उसको याचनादिद्वारा शरीरनिर्वाह करनेकी योग्यता प्राप्त हुई। इसपर “बिना याचना किये”, “बिना संकल्पके अथवा बिना इच्छा किये प्राप्त हुए” इत्यादि वचनोंसे जो शास्त्रमें संन्यासीके शरीरनिर्वाहके लिये अन्नादिकी प्राप्तिके द्वार बतलाये गये हैं, उनको प्रकट करते हुए कहते हैं—
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यदृच्छालाभसन्तुष्टः अप्रार्थितोपनतो लाभो यदृच्छालाभः तेन सन्तुष्टः सञ्जातालम्प्रत्ययः।
द्वन्द्वातीतो द्वन्द्वः शीतोष्णादिभिः हन्यमानः अपि अविषण्णचित्तो द्वन्द्वातीत उच्यते।
विमत्सरो विगतमत्सरो निर्वैरबुद्धिः समः तुल्यो यदृच्छालाभस्य सिद्धौ असिद्धौ च।
य एवम्भूतो यतिः अन्नादेः शरीरस्थितिहेतोः लाभालाभयोः समो हर्षविषादवर्जितः कर्मादौ अकर्मादिदर्शी यथाभूतात्मदर्शननिष्ठः शरीर-स्थितिमात्रप्रयोजने भिक्षाटनादिकर्मणि शरीरादि-निर्वर्त्ये न एव किञ्चित् करोमि अहम् गुणा गुणेषु वर्तन्ते” इति एवं सदा सम्परिचक्षाण आत्मनः कर्तृत्वाभावं पश्यन् न एव किञ्चिद् भिक्षाटनादिकं कर्म करोति।
लोकव्यवहारसामान्यदर्शनेन तु लौकिकैः आरोपितकर्तृत्वे भिक्षाटनादौ कर्मणि कर्ता भवति स्वानुभवेन तु शास्त्रप्रमाणादिजनितेन अकर्ता एव।
स एवं पराध्यारोपितकर्तृत्वः शरीरस्थिति-मात्रप्रयोजनं भिक्षाटनादिकं कर्म कृत्वा अपि न निबध्यते, बन्धहेतोः कर्मणः सहेतुकस्य ज्ञानाग्निना दग्धत्वाद् इति उक्तानुवाद एव एषः॥ 22॥
जो बिना माँगे अपने-आप मिले हुए पदार्थसे संतुष्ट है अर्थात् उसीमें जिसके मनका यह भाव हो जाता है कि यही पर्याप्त है,
जो द्वन्द्वोंसे अतीत है अर्थात् शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वोंसे सताये जानेपर भी जिसके चित्तमें विषाद नहीं होता,
जो ईर्ष्यासे रहित अर्थात् निर्वैर-बुद्धिवाला है और जो अपने-आप प्राप्त हुए लाभकी सिद्धि-असिद्धिमें भी सम रहता है,
जो ऐसा शरीरस्थितिके हेतुरूप अन्नादिके प्राप्त होने या न होनेमें भी हर्ष-शोकसे रहित, समदर्शी है और कर्मादिमें अकर्मादि देखनेवाला, यथार्थ आत्म-दर्शननिष्ठ एवं शरीरस्थितिमात्रके लिये किये जानेवाले और शरीरादिद्वारा होनेवाले भिक्षाटनादि कर्मोंमें भी मैं कुछ नहीं करता “गुण ही गुणोंमें बर्त रहे हैं” इस प्रकार सदा देखनेवाला है वह यति अपनेमें कर्तापनका अभाव देखनेसे अर्थात् आत्माको अकर्ता समझ लेनेसे वास्तवमें भिक्षाटनादि कुछ भी कर्म नहीं करता है।
ऐसा पुरुष लोकव्यवहारकी साधारण दृष्टिसे तो सांसारिक पुरुषोंद्वारा आरोपित किये हुए कर्तापनके कारण भिक्षाटनादि कर्मोंका कर्ता होता है। परंतु शास्त्रप्रमाण आदिसे उत्पन्न अपने अनुभवसे (वस्तुतः) वह अकर्ता ही रहता है।
इस प्रकार दूसरोंद्वारा जिसपर कर्तापनका अध्यारोप किया गया है, ऐसा वह पुरुष शरीर-निर्वाहमात्रके लिये किये जानेवाले भिक्षाटनादि कर्मोंको करता हुआ भी नहीं बँधता; क्योंकि ज्ञानरूप अग्निद्वारा उसके (समस्त) बन्धनकारक कर्म हेतुसहित भस्म हो चुके हैं। यह पहले कहे हुएका ही अनुवादमात्र है॥ 22॥
“त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गम्” इति अनेन श्लोकेन यः प्रारब्धकर्मा सन् यदा निष्क्रियब्रह्मात्मदर्शन-सम्पन्नः स्यात् तदा तस्य आत्मनः कर्तृकर्म-प्रयोजनाभावदर्शिनः कर्मपरित्यागे प्राप्ते कुतश्चिद् निमित्तात् तदसम्भवे सति पूर्ववत् तस्मिन् कर्मणि अभिप्रवृत्तः अपि न एव किञ्चित् करोति स इति कर्माभावः प्रदर्शितः। यस्य एवं कर्माभावो दर्शितः तस्य एव—
जो कर्म करना प्रारम्भ कर चुका है, ऐसा पुरुष जब कर्म करते-करते इस ज्ञानसे सम्पन्न हो जाता है कि “निष्क्रिय ब्रह्म ही आत्मा है” तब अपने कर्ता, कर्म और प्रयोजनादिका अभाव देखनेवाले उस पुरुषके लिये कर्मोंका त्याग कर देना ही उचित होता है। किंतु किसी कारणवश कर्मोंका त्याग करना असम्भव होनेपर यदि वह पहलेकी तरह उन कर्मोंमें लगा रहे तो भी, वास्तवमें कुछ भी नहीं करता। इस प्रकार “त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गम्” इस श्लोकसे (ज्ञानीके) कर्मोंका अभाव (अकर्मत्व) दिखलाया जा चुका है। जिस पुरुषके कर्मोंका इस प्रकार अभाव दिखाया गया है, उसीके (विषयमें अगला श्लोक कहते हैं)—
गतसङ्गस्य सर्वतो निवृत्तासक्तेः मुक्तस्य निवृत्तधर्माधर्मादिबन्धनस्य ज्ञानावस्थितचेतसो ज्ञाने एव अवस्थितं चेतो यस्य सः अयं ज्ञानावस्थितचेताः तस्य यज्ञाय यज्ञनिर्वृत्यर्थम् आचरतो निर्वर्तयतः कर्म समग्रं सहाग्रेण फलेन वर्तते इति समग्रं कर्म तत् समग्रं प्रविलीयते विनश्यति इत्यर्थः॥ 23॥
जिस पुरुषकी सब ओरसे आसक्ति निवृत्त हो चुकी है, जिसके पुण्य-पापरूप बन्धन छूट गये हैं, जिसका चित्त निरन्तर ज्ञानमें ही स्थित है, ऐसे केवल यज्ञसम्पादनके लिये ही कर्मोंका आचरण करनेवाले उस सङ्गहीन मुक्त और ज्ञानावस्थितचित्त पुरुषके समग्र कर्म विलीन हो जाते हैं। “अग्र” शब्द फलका वाचक है। उसके सहित कर्मोंको समग्र कर्म कहते हैं, अतः यह अभिप्राय हुआ कि उसके फलसहित समस्त कर्म नष्ट हो जाते हैं॥ 23॥
कस्मात् पुनः कारणात् क्रियमाणं कर्म स्वकार्यारम्भम् अकुर्वत् समग्रं प्रविलीयते इति उच्यते यतः—
किये जानेवाले कर्म अपना कार्य आरम्भ किये बिना ही (कुछ फल दिये बिना ही) किस कारणसे फलसहित विलीन हो जाते हैं? इसपर कहते हैं—
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ब्रह्म अर्पणं येन करणेन ब्रह्मविद् हविः अग्नौ अर्पयति तद् ब्रह्म एव इति पश्यति तस्य आत्मव्यतिरेकेण अभावं पश्यति।
यथा शुक्तिकायां रजताभावं पश्यति तद् उच्यते ब्रह्म एव अर्पणम् इति, यथा यद् रजतं तत् शुक्तिका एव इति। ब्रह्म, अर्पणम् इति असमस्ते पदे।
यद् अर्पणबुद्ध्या गृह्यते लोके तद् अस्य ब्रह्मविदो ब्रह्म एव इत्यर्थः।
ब्रह्म हविः तथा यद् हविर्बुद्ध्या गृह्यमाणं तद् ब्रह्म एव अस्य।
तथा ब्रह्माग्नौ इति समस्तं पदम्।
अग्निः अपि ब्रह्म एव यत्र हूयते ब्रह्मणा कर्त्रा ब्रह्म एव कर्ता इत्यर्थः। यत् तेन हुतं हवनक्रिया तद् ब्रह्म एव।
यत् तेन गन्तव्यं फलं तद् अपि ब्रह्म एव। ब्रह्मकर्मसमाधिना, ब्रह्म एव कर्म ब्रह्मकर्म तस्मिन् समाधिः यस्य स ब्रह्मकर्मसमाधिः तेन ब्रह्मकर्मसमाधिना ब्रह्म एव गन्तव्यम्।
एवं लोकसङ्ग्रहं चिकीर्षुणा अपि क्रियमाणं कर्म परमार्थतः अकर्म ब्रह्मबुद्ध्युपमृदितत्वात्।
एवं सति निवृत्तकर्मणः अपि सर्वकर्म-सन्न्यासिनः सम्यग्दर्शनस्तुत्यर्थं यज्ञत्वसम्पादनं ज्ञानस्य सुतराम् उपपद्यते, यद् अर्पणादि अधि-यज्ञे प्रसिद्धं तद् अस्य अध्यात्मं ब्रह्म एव परमार्थदर्शिन इति।
अन्यथा सर्वस्य ब्रह्मत्वे अर्पणादीनाम् एव विशेषतो ब्रह्मत्वाभिधानम् अनर्थकं स्यात्।
तस्माद् ब्रह्म एव इदं सर्वम् इति अभिजानतो विदुषः सर्वकर्माभावः।
कारकबुद्ध्यभावात् च। न हि कारकबुद्धि-रहितं यज्ञाख्यं कर्म दृष्टम्।
सर्वम् एव अग्निहोत्रादिकं कर्म शब्दसमर्पित-देवताविशेषसम्प्रदानादिकारकबुद्धिमत् कर्त्र-भिमानफलाभिसन्धिमत् च दृष्टम्।
न उपमृदितक्रियाकारकफलभेदबुद्धिमत् कर्तृत्वाभिमानफलाभिसन्धिरहितं वा।
इदं तु ब्रह्मबुद्ध्युपमृदितार्पणादिकारक-क्रियाफलभेदबुद्धि कर्म अतः अकर्म एव तत्।
तथा च दर्शितम् “कर्मण्यकर्म यः पश्येत्” “कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः” “गुणा गुणेषु वर्तन्ते” “नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्” इत्यादिभिः।
तथा च दर्शयन् तत्र तत्र क्रियाकारकफल-भेदबुद्ध्युपमर्दं करोति।
दृष्टा च काम्याग्निहोत्रादौ कामोपमर्देन काम्याग्निहोत्रादिहानिः।
तथा मतिपूर्वकामतिपूर्वकादीनां कर्मणां कार्यविशेषस्य आरम्भकत्वं दृष्टम्।
तथा इह अपि ब्रह्मबुद्ध्युपमृदितार्पणादि-कारकक्रियाफलभेदबुद्धेः बाह्यचेष्टामात्रेण कर्म अपि विदुषः अकर्म सम्पद्यते। अत उक्तं समग्रं प्रविलीयते इति।
अत्र केचिद् आहुः यद् ब्रह्म तदर्पणादीनि। ब्रह्म एव किल अर्पणादिना पञ्चविधेन कारकात्मना व्यवस्थितं सत् तद् एव कर्म करोति। तत्र न अर्पणादिबुद्धिः निवर्त्यते किं तु अर्पणादिषु ब्रह्मबुद्धिः आधीयते। यथा प्रतिमादौ विष्ण्वादिबुद्धिः यथा वा नामादौ ब्रह्मबुद्धिः इति।
सत्यम् एवम् अपि स्याद् यदि ज्ञानयज्ञस्तुत्यर्थं प्रकरणं न स्यात्।
अत्र तु सम्यग्दर्शनं ज्ञानयज्ञशब्दितम् अनेकान्
यज्ञशब्दितान्
क्रियाविशेषान् उपन्यस्य “श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः” इति ज्ञानं स्तौति।
अत्र च समर्थम् इदं वचनं ब्रह्मार्पणम् इत्यादि ज्ञानस्य यज्ञत्वसम्पादने अन्यथा सर्वस्य ब्रह्मत्वे अर्पणादीनाम् एव विशेषतो ब्रह्मत्वाभिधानम् अनर्थकं स्यात्।
ये तु अर्पणादिषु प्रतिमायां विष्णुदृष्टिवद् ब्रह्मदृष्टिः क्षिप्यते नामादिषु इव च इति ब्रुवते न तेषां ब्रह्मविद्या उक्ता इह विवक्षिता स्याद् अर्पणादिविषयत्वाद् ज्ञानस्य।
न च दृष्टिसम्पादनज्ञानेन मोक्षफलं प्राप्यते “ब्रह्मैव तेन गन्तव्यम्” इति च उच्यते। विरुद्धं च सम्यग्दर्शनम् अन्तरेण मोक्षफलं प्राप्यते इति।
प्रकृतविरोधः च। सम्यग्दर्शनं च प्रकृतम्। “कर्मण्यकर्म यः पश्येत्” इत्यत्र अन्ते च सम्यग्दर्शनं तस्य एव उपसंहारात्।
“श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः” “ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिम्” इत्यादिना सम्यग्दर्शनस्तुतिम् एव कुर्वन् उपक्षीणः अध्यायः।
तत्र अकस्माद् अर्पणादौ ब्रह्मदृष्टिः अप्रकरणे प्रतिमायाम् इव विष्णुदृष्टिः उच्यते इति अनुपपन्नम्।
तस्माद्
यथाव्याख्यातार्थ
एव
अयं श्लोकः॥ 24॥
ब्रह्मवेत्ता पुरुष जिस साधनद्वारा अग्निमें हवि अर्पण करता है, उस साधनको ब्रह्मरूप ही देखा करता है, अर्थात् आत्माके सिवा उसका अभाव देखता है।
जैसे (सीपको जाननेवाला) सीपमें चाँदीका अभाव देखता है, “ब्रह्म ही अर्पण है” इस पदसे भी वही बात कही जाती है। अर्थात् जैसे यह समझता है कि जो चाँदीके रूपमें दीख रही है वह सीप ही है। (वैसे ही ब्रह्मवेत्ता भी समझता है कि जो अर्पण दीखता है वह ब्रह्म ही है) ब्रह्म और अर्पण—यह दोनों पद अलग-अलग हैं।
अभिप्राय यह कि संसारमें जो अर्पण माने जाते हैं वे स्त्रुक्, स्त्रुव आदि सब पदार्थ उस ब्रह्मवेत्ताकी दृष्टिमें ब्रह्म ही हैं।
वैसे ही जो वस्तु हविरूपसे मानी जाती है वह भी उसकी दृष्टिमें ब्रह्म ही होता है।
“ब्रह्माग्नौ” यह पद समासयुक्त है।
इसलिये यह अर्थ हुआ कि ब्रह्मरूप कर्ताद्वारा जिसमें हवन किया जाता है वह अग्नि भी ब्रह्म ही है और वह कर्ता भी ब्रह्म ही है और जो उसके द्वारा हवनरूप क्रिया की जाती है वह भी ब्रह्म ही है।
उस ब्रह्मकर्ममें स्थित हुए पुरुषद्वारा प्राप्त करनेयोग्य जो फल है वह भी ब्रह्म ही है। अर्थात् ब्रह्मरूप कर्ममें जिसके चित्तका समाधान हो चुका है उस पुरुषद्वारा प्राप्त किये जानेयोग्य जो फल है वह भी ब्रह्म ही है।
इस प्रकार लोकसंग्रह करना चाहनेवाले पुरुषद्वारा किये हुए कर्म भी ब्रह्मबुद्धिसे बाधित होनेके कारण अर्थात् फल उत्पन्न करनेकी शक्तिसे रहित कर दिये जानेके कारण वास्तवमें अकर्म ही हैं।
ऐसा अर्थ मान लेनेपर कर्मोंको छोड़ देनेवाले कर्म संन्यासीके ज्ञानको भी यथार्थ ज्ञानकी स्तुतिके लिये यज्ञरूप समझना भली प्रकार बन सकता है, अधियज्ञमें जो स्त्रुवादि वस्तुएँ प्रसिद्ध हैं वे सब इस यथार्थ ज्ञानी संन्यासीके (सम्यक्-ज्ञानरूप) अध्यात्मयज्ञमें ब्रह्म ही हैं।
उपर्युक्त अर्थ नहीं माननेसे वास्तवमें सब ही ब्रह्मरूप होनेके कारण केवल स्त्रुव आदिको ही विशेषतासे ब्रह्मरूप बतलाना व्यर्थ होगा।
सुतरां “यह सब कुछ ब्रह्म ही है” इस प्रकार समझनेवाले ज्ञानीके लिये वास्तवमें सब कर्मोंका अभाव ही हो जाता है।
तथा उसके अन्तःकरणमें (क्रिया, फल आदि) कारकसम्बन्धी भेदबुद्धिका अभाव होनेके कारण भी यही सिद्ध होता है; क्योंकि कोई भी यज्ञ नामक कर्म कारकसम्बन्धी भेदबुद्धिसे रहित नहीं देखा गया।
अभिप्राय यह है कि अग्निहोत्रादि सभी कर्म, (इन्द्राय, वरुणाय आदि) शब्दोंद्वारा हवि आदि द्रव्य जिनके अर्पण किये जाते हैं, उन देवताविशेषरूप सम्प्रदान आदि कारकबुद्धिवाले तथा कर्तापनके अभिमानसे और फलकी इच्छासे युक्त देखे गये हैं।
जिसमेंसे क्रिया, कारक और फलसम्बन्धी भेदबुद्धि नष्ट हो गयी हो तथा जो कर्तापनके अभिमानसे और फलकी इच्छासे रहित हो ऐसा यज्ञ नहीं देखा गया।
परंतु यह उपर्युक्त कर्म तो ऐसा है कि जिसमें सर्वत्र ब्रह्मबुद्धि हो जानेके कारण, अर्पणादि कारक, क्रिया और फलसम्बन्धी भेदबुद्धि नष्ट हो गयी है। इसलिये यह अकर्म ही है।
यही
बात,
“कर्मण्यकर्म
यः
पश्येत्” “कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः” “गुणा गुणेषु वर्तन्ते” “नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्” इत्यादि श्लोकोंद्वारा भी दिखलायी गयी है।
और इसी प्रकार दिखलाते हुए भगवान् जगह-जगह क्रिया, कारक और फलसम्बन्धी भेदबुद्धिका निषेध कर रहे हैं।
देखा भी गया है कि सकाम अग्निहोत्रादिमें कामना न रहनेपर वे सकाम अग्निहोत्रादि नहीं रहते। (उनकी सकामता नष्ट हो जाती है।)
तथा यह भी देखा गया है कि जान-बूझकर किये हुए और अनजानमें किये हुए कर्म भिन्न-भिन्न कार्योंके आरम्भक होते हैं अर्थात् उनका फल अलग-अलग होता है।
वैसे ही यहाँ भी जिस पुरुषकी सर्वत्र ब्रह्मबुद्धि हो जानेसे (स्त्रुव, हवि आदिमें) क्रिया, कारक और फलसम्बन्धी भेदबुद्धि नष्ट हो गयी है, उस ज्ञानी पुरुषके बाह्य चेष्टामात्रसे होनेवाले कर्म भी अकर्म हो जाते हैं। इसीलिये कहा है कि “उसके फलसहित कर्म विलीन हो जाते हैं।”
इस विषयमें कोई-कोई टीकाकार कहते हैं कि जो ब्रह्म है वही स्त्रुव आदि है अर्थात् ब्रह्म ही स्त्रुव आदि पाँच प्रकारके कारकोंके रूपमें स्थित है और वही कर्म किया करता है, (उनके सिद्धान्तानुसार) उपर्युक्त यज्ञमें स्त्रुव आदि बुद्धि निवृत्त नहीं की जाती; किंतु स्त्रुव आदिमें ब्रह्मबुद्धि स्थापित की जाती है, जैसे कि मूर्ति आदिमें विष्णु आदि देवबुद्धि या नाम आदिमें ब्रह्मबुद्धि की जाती है।
ठीक है, यदि यह प्रकरण ज्ञानयज्ञकी स्तुतिके लिये न होता तो यह अर्थ भी हो सकता था।
परंतु इस प्रकरणमें तो यज्ञ नामसे कहे जानेवाले अलग-अलग बहुत-से क्रिया-भेदोंको कहकर फिर “द्रव्यमय यज्ञकी अपेक्षा ज्ञानयज्ञ कल्याणकर है” इस कथनद्वारा ज्ञानयज्ञ शब्दसे कथित सम्यक् दर्शनकी स्तुति करते हैं।
तथा इस प्रकरणमें जो “ब्रह्मार्पणम्” इत्यादि वचन है, यह ज्ञानको यज्ञरूपसे सम्पादन करनेमें समर्थ भी है, नहीं तो वास्तवमें सब कुछ ब्रह्मरूप होनेके कारण केवल अर्पण (स्त्रुव) आदिको ही अलग करके ब्रह्मरूपसे विधान करना व्यर्थ होगा।
जो ऐसा कहते हैं कि यहाँ मूर्तिमें विष्णु आदिकी दृष्टिके सदृश या नामादिमें ब्रह्मबुद्धिकी भाँति अर्पण (स्रुव) आदि यज्ञकी सामग्रीमें ब्रह्मबुद्धि स्थापन करायी गयी है, उनकी दृष्टिसे सम्भवतः इस प्रकरणमें ब्रह्मविद्या नहीं कही गयी है; क्योंकि (उनके मतानुसार) ज्ञानका विषय स्त्रुव आदि यज्ञकी सामग्री ही है, ब्रह्म नहीं।
इस प्रकार केवल ब्रह्मदृष्टि सम्पादनरूप ज्ञानसे मोक्षरूप फल नहीं मिल सकता और यहाँ (स्पष्ट ही) यह कहा है कि उसके द्वारा प्राप्त किया जानेवाला फल ब्रह्म ही है, फिर बिना यथार्थ ज्ञानके मोक्षरूप फल मिलता है—यह कहना सर्वथा विपरीत है।
इसके सिवा (ऐसा मान लेनेसे) प्रकरणमें भी विरोध आता है। अभिप्राय यह है कि “जो कर्ममें अकर्म देखता है” इस प्रकार यहाँ आरम्भमें सम्यक् ज्ञानका ही प्रकरण है तथा उसीमें उपसंहार होनेके कारण अन्तमें भी यथार्थ ज्ञानका ही प्रकरण है।
क्योंकि “द्रव्यमय यज्ञकी अपेक्षा ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठतर है” “ज्ञानको पाकर परम शान्तिको तुरन्त ही प्राप्त हो जाता है” इत्यादि वचनोंसे यथार्थ ज्ञानकी स्तुति करते हुए ही यह अध्याय समाप्त हुआ है।
फिर बिना प्रकरण अकस्मात् मूर्तिमें विष्णुदृष्टिकी भाँति स्त्रुव आदिमें ब्रह्मदृष्टिका विधान बतलाना उपयुक्त नहीं।
सुतरां जिस प्रकार इसकी व्याख्या की गयी है इस श्लोकका अर्थ वैसा ही है॥ 24॥
तत्र अधुना सम्यग्दर्शनस्य यज्ञत्वं सम्पाद्य तत्स्तुत्यर्थम् अन्ये अपि यज्ञा उपक्षिप्यन्ते दैवम् एव इत्यादिना—
उपर्युक्त श्लोकमें यथार्थ ज्ञानको यज्ञरूपसे सम्पादन करके अब उसकी स्तुति करनेके लिये “दैवम् एव” इत्यादि श्लोकोंसे दूसरे-दूसरे यज्ञोंका भी उल्लेख किया जाता है—
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दैवम् एव देवा इज्यन्ते येन यज्ञेन असौ दैवो यज्ञः तम् एव अपरे यज्ञं योगिनः कर्मिणः पर्युपासते कुर्वन्ति इत्यर्थः।
ब्रह्माग्नौ “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” (तैत्ति0 उ0 2। 1) “विज्ञानमानन्दं ब्रह्म” (बृह0 उ0 3। 9। 28) “यत्साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरः” (बृह0 उ0 3। 4। 1) इत्यादि-वचनोक्तम् अशनायादिसर्वसंसारधर्मवर्जितम्, नेति नेति इति निरस्ताशेषविशेषं ब्रह्मशब्देन उच्यते।
ब्रह्म च तद् अग्निः च स होमाधिकरणत्व-विवक्षया ब्रह्माग्निः तस्मिन् ब्रह्माग्नौ अपरे अन्ये ब्रह्मविदः, यज्ञं यज्ञशब्दवाच्य आत्मा आत्म-नामसु यज्ञशब्दस्य पाठात् तम् आत्मानं यज्ञं परमार्थतः परम् एव ब्रह्म सन्तं बुद्ध्याद्युपाधि-संयुक्तं अध्यस्तसर्वोपाधिधर्मकम् आहुतिरूपं यज्ञेन एव आत्मना एव उक्तलक्षणेन उपजुह्वति प्रक्षिपन्ति।
सोपाधिकस्य
आत्मनो
निरुपाधिकेन परब्रह्मस्वरूपेण एव यद् दर्शनं स तस्मिन् होमः तं कुर्वन्ति ब्रह्मात्मैकत्वदर्शननिष्ठाः सन्न्यासिन इत्यर्थः।
सः अयं सम्यग्दर्शनलक्षणो यज्ञो दैवयज्ञादिषु यज्ञेषु उपक्षिप्यते “ब्रह्मार्पणम्” इत्यादिश्लोकैः “श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप” इत्यादिना स्तुत्यर्थम्॥ 25॥
जिस यज्ञके द्वारा देवोंका पूजन किया जाता है वह देवसम्बन्धी यज्ञ है, अन्य (कितने ही) योगी अर्थात् कर्म करनेवाले लोग उस दैव-यज्ञका ही अनुष्ठान किया करते हैं।
अन्य (ब्रह्मवेत्ता पुरुष) ब्रह्माग्निमें (हवन करते हैं) अर्थात् “ब्रह्म सत्य-ज्ञान-अनन्तस्वरूप है” “विज्ञान और आनन्द ही ब्रह्म है” “जो साक्षात् अपरोक्ष (प्रत्यक्ष) है वह ब्रह्म है” “जो सर्वान्तर आत्मा है वह ब्रह्म है” इत्यादि वचनोंसे जिसका वर्णन किया गया है, जो भूख-प्यास आदि समस्त सांसारिक धर्मोंसे रहित है, जो “ऐसा नहीं” “ऐसा नहीं” इस प्रकार वेदवाक्योंद्वारा सब विशेषणोंसे परे बतलाया गया है, वह ब्रह्म शब्दसे कहा जाता है।
हवनका अधिकरण बतलानेके लिये उस ब्रह्मको ही यहाँ अग्नि कह दिया है। उस ब्रह्मरूप अग्निमें कितने ही ब्रह्मवेत्ता—ज्ञानी यज्ञद्वारा यज्ञको हवन करते हैं। आत्माके नामोंमें यज्ञ शब्दका पाठ होनेसे आत्माका नाम यज्ञ है जो कि वास्तवमें परब्रह्म ही है, परंतु बुद्धि आदि उपाधियोंसे युक्त हुआ उपाधियोंके धर्मोंको अपनेमें मान रहा है। उस आहुतिरूप आत्माको उपर्युक्त आत्माद्वारा ही हवन करते हैं।
सारांश यह कि उपाधियुक्त आत्माको जो उपाधि-रहित परब्रह्मरूपसे साक्षात् करना है, वही उसका उसमें हवन करना है; ब्रह्म और आत्माके एकत्वज्ञानमें स्थित हुए वे संन्यासी लोग ऐसा हवन किया करते हैं।
“श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप” इत्यादि श्लोकोंसे स्तुति करनेके लिये यह सम्यग्दर्शनरूप यज्ञ “ब्रह्मार्पणम्” इत्यादि श्लोकोंद्वारा दैवयज्ञ आदि यज्ञोंमें सम्मिलित किया जाता है॥ 25॥
श्रोत्रादीनि इन्द्रियाणि अन्ये योगिनः संयमाग्निषु प्रतीन्द्रियं संयमो भिद्यते इति बहुवचनम्। संयमा एव अग्नयः तेषु जुह्वति इन्द्रियसंयमम् एव कुर्वन्ति इत्यर्थः।
शब्दादीन् विषयान् अन्ये इन्द्रियाग्निषु जुह्वति इन्द्रियाणि एव अग्नयः तेषु इन्द्रियाग्निषु जुह्वति श्रोत्रादिभिः अविरुद्धविषयग्रहणं होमं मन्यन्ते॥ 26॥
अन्य योगीजन संयमरूप अग्नियोंमें श्रोत्रादि इन्द्रियोंका हवन करते हैं। संयम ही अग्नियाँ हैं, उन्हींमें हवन करते हैं अर्थात् इन्द्रियोंका संयम करते हैं। प्रत्येक इन्द्रियका संयम भिन्न-भिन्न है, इसलिये यहाँ बहुवचनका प्रयोग किया गया है।
अन्य (साधकलोग) इन्द्रियरूप अग्नियोंमें शब्दादि विषयोंका हवन करते हैं। इन्द्रियाँ ही अग्नियाँ हैं, उन इन्द्रियाग्नियोंमें हवन करते हैं अर्थात् उन श्रोत्रादि इन्द्रियोंद्वारा शास्त्रसम्मत विषयोंके ग्रहण करनेको ही होम मानते हैं॥ 26॥
किं च—
तथा—
सर्वाणि इन्द्रियकर्माणि इन्द्रियाणां कर्माणि इन्द्रियकर्माणि तथा प्राणकर्माणि प्राणो वायुः
आध्यात्मिकः
तत्
कर्माणि आकुञ्चनप्रसारणा-दीनि तानि च अपरे आत्मसंयमयोगाग्नौ आत्मनि संयम आत्मसंयमः स एव योगाग्निः तस्मिन् आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति प्रक्षिपन्ति ज्ञानदीपिते स्नेहेन इव प्रदीपिते विवेकविज्ञानेन उज्ज्वलभावम् आपादिते प्रविलापयन्ति इत्यर्थः॥ 27॥
दूसरे साधक इन्द्रियोंके सम्पूर्ण कर्मोंको और शरीरके भीतर रहनेवाला वायु जो प्राण कहलाता है, उसके “संकुचित होने”, “फैलने” आदि कर्मोंको, ज्ञानसे प्रकाशित हुई आत्मसंयमरूप योगाग्निमें हवन करते हैं। आत्मविषयक संयमका नाम आत्मसंयम है, वही यहाँ योगाग्नि है। घृतादि चिकनी वस्तुसे प्रज्वलित हुई अग्निकी भाँति विवेकविज्ञानसे उज्ज्वलताको प्राप्त हुई (धारणा-ध्यान-समाधिरूप) उस आत्म-संयम योगाग्निमें (वे प्राण और इन्द्रियोंके कर्मोंको) विलीन कर देते हैं॥ 27॥
द्रव्ययज्ञाः तीर्थेषु द्रव्यविनियोगं यज्ञबुद्ध्या कुर्वन्ति ये ते द्रव्ययज्ञाः।
तपोयज्ञा ये तपस्विनः ते तपोयज्ञाः, योगयज्ञाः प्राणायामप्रत्याहारादिलक्षणो योगो यज्ञो येषां ते योगयज्ञाः।
तथा अपरे स्वाध्यायज्ञानयज्ञाः च स्वाध्यायो यथाविधि ऋगाद्यभ्यासो यज्ञो येषां ते स्वाध्याययज्ञा ज्ञानयज्ञा ज्ञानं शास्त्रार्थपरिज्ञानं यज्ञो येषां ते ज्ञानयज्ञाः च।
यतयो यतनशीलाः संशितव्रताः सम्यक्शितानि तनूकृतानि तीक्ष्णीकृतानि व्रतानि येषां ते संशितव्रताः॥ 28॥
जो यज्ञबुद्धिसे तीर्थादिमें द्रव्य लगाते हैं वे द्रव्ययज्ञा यानी द्रव्य-सम्बन्धी यज्ञ करनेवाले हैं।
जो तपस्वी हैं वे तपोयज्ञा यानी तपरूप यज्ञ करनेवाले हैं। प्राणायाम-प्रत्याहाररूप योग ही जिनका यज्ञ है वे योगयज्ञा यानी योगरूप यज्ञ करनेवाले हैं।
वैसे ही अन्य कई स्वाध्याययज्ञ और ज्ञानयज्ञ करनेवाले भी हैं। जिनका यथाविधि ऋग्वेद आदिका अभ्यासरूप स्वाध्याय ही यज्ञ है, वे स्वाध्याययज्ञ करनेवाले हैं और शास्त्रोंका अर्थ जाननारूप ज्ञान जिनका यज्ञ है वे ज्ञानयज्ञ करनेवाले हैं।
इसी तरह कई यत्नशील संशित व्रतवाले हैं। जिनके व्रत-नियम अच्छी प्रकार तीक्ष्ण किये हुए यानी सूक्ष्म-शुद्ध किये हुए होते हैं वे पुरुष संशितव्रत कहलाते हैं॥ 28॥
किं च—
तथा—
अपाने अपानवृत्तौ जुह्वति प्रक्षिपन्ति प्राण प्राणवृत्तिं पूरकाख्यं प्राणायामं कुर्वन्ति इत्यर्थः।
प्राणे अपानं तथा अपरे जुह्वति रेचकाख्यं च प्राणायामं कुर्वन्ति इति एतत्।
प्राणापानगती मुखनासिकाभ्यां वायोः निर्गमनं प्राणस्य गतिः तद्विपर्ययेण अधोगमनम् अपानस्य ते प्राणापानगती एते रुद्ध्वा निरुध्य प्राणायामपरायणाः प्राणायामतत्पराः कुम्भकाख्यं प्राणायामं कुर्वन्ति इत्यर्थः॥ 29॥
(कोई) अपानवायुमें प्राणवायुका हवन करते हैं अर्थात् पूरक नामक प्राणायाम किया करते हैं।
वैसे ही अन्य कोई प्राणमें अपानका हवन करते हैं अर्थात् रेचक नामक प्राणायाम किया करते हैं।
मुख और नासिकाके द्वारा वायुका बाहर निकलना प्राणकी गति है और उसके विपरीत (पेटमें) नीचेकी ओर जाना अपानकी गति है। उन प्राण और अपान दोनोंकी गतियोंको रोककर कोई अन्य लोग प्राणायाम-परायण होते हैं अर्थात् प्राणायाममें तत्पर हुए वे केवल कुम्भक नामक प्राणायाम किया करते हैं॥ 29॥
किं च—
तथा—
अपरे नियताहारा नियतः परिमित आहारो येषां ते नियताहाराः सन्तः, प्राणान् वायुभेदान् प्राणेषु एव जुह्वति
यस्य यस्य वायोः जयः क्रियते इतरान् वायुभेदान् तस्मिन् तस्मिन् जुह्वति ते तत्र प्रविष्टा इव भवन्ति।
सर्वे अपि एते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः यज्ञैः यथोक्तैः क्षपितो नाशितः कल्मषो येषां ते यज्ञक्षपितकल्मषाः॥ 30॥
अन्य कितने ही नियताहारी अर्थात् जिनका आहार नियमित किया हुआ है ऐसे परिमित भोजन करनेवाले प्राणोंको यानी वायुके भिन्न-भिन्न भेदोंको प्राणोंमें ही हवन किया करते हैं।
भाव यह है कि वे जिस-जिस वायुको जीत लेते हैं उसीमें वायुके दूसरे भेदोंको हवन कर देते हैं यानी वे सब वायु-भेद उसमें विलीन-से हो जाते हैं।
ये सभी पुरुष यज्ञोंको जाननेवाले और यज्ञोंद्वारा निष्पाप हो गये होते हैं अर्थात् उपर्युक्त यज्ञोंद्वारा जिनके सब पाप नष्ट हो गये हैं, वे “यज्ञक्षपितकल्मष” कहलाते हैं॥ 30॥
एवं यथोक्तान् यज्ञान् निर्वर्त्य—
इस प्रकार उपर्युक्त यज्ञोंका सम्पादन करके—
यज्ञशिष्टामृतभुजो यज्ञानां शिष्टं यज्ञशिष्टं यज्ञशिष्टं च तद् अमृतं च यज्ञशिष्टामृतं तद् भुञ्जते इति यज्ञशिष्टामृतभुजो यथोक्तान् यज्ञान् कृत्वा तच्छिष्टेन कालेन यथाविधि चोदितम् अन्नम् अमृताख्यं भुञ्जते इति यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति गच्छन्ति ब्रह्म सनातनं
चिरन्तनम्।
मुमुक्षवः चेत् कालातिक्रमापेक्षया इति सामर्थ्याद् गम्यते।
न अयं लोकः सर्वप्राणिसाधारणः अपि अस्ति यथोक्तानां यज्ञानाम् एकः अपि यज्ञो यस्य न अस्ति स अयज्ञः तस्य कुतः अन्यो विशिष्टसाधनसाध्यः कुरुसत्तम॥ 31॥
यज्ञोंके शेषका नाम यज्ञशिष्ट है, वही अमृत है उसको जो भोगते हैं, वे यज्ञशिष्ट अमृतभोजी हैं। उपर्युक्त यज्ञोंको करके उससे बचे हुए समयद्वारा यथाविधि प्राप्त अमृतरूप विहित अन्नको भक्षण करनेवाले यज्ञशिष्ट अमृतभोजी पुरुष, सनातन यानी चिरन्तन ब्रह्मको प्राप्त होते हैं।
यहाँ यान्ति इस गतिविषयक शब्दकी शक्तिसे यह पाया जाता है कि यदि यज्ञ करनेवाले मुमुक्षु होते हैं तो कालातिक्रमकी अपेक्षासे (मरनेके बाद कितने ही कालतक ब्रह्मलोकमें रहकर फिर प्रलयके समय ब्रह्मको प्राप्त होते हैं)।
हे कुरुश्रेष्ठ! जो मनुष्य उपर्युक्त यज्ञोंमेंसे एक भी यज्ञ नहीं करता, उस यज्ञरहित पुरुषको, सब प्राणियोंके लिये जो साधारण है, ऐसा यह लोक भी नहीं मिलता, फिर विशेष साधनोंद्वारा प्राप्त होनेवाला अन्य लोक तो मिल ही कैसे सकता है?॥ 31॥
एवं यथोक्ता बहुविधा बहुप्रकारा यज्ञा वितता विस्तीर्णा ब्रह्मणो वेदस्य मुखे द्वारे।
वेदद्वारेण अवगम्यमाना ब्रह्मणो मुखे वितता उच्यन्ते, तद् यथा “वाचि हि प्राणं जुहुम” इत्यादयः।
कर्मजान् कायिकवाचिकमानसकर्मोद्भवान् विद्धि तान् सर्वान् अनात्मजान्। निर्व्यापारो हि आत्मा।
अत एवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे अशुभात्। न मद्व्यापारा इमे निर्व्यापारः अहम् उदासीन इति एवं ज्ञात्वा अस्मात् सम्यग्दर्शनाद् मोक्ष्यसे संसारबन्धनाद् इत्यर्थः॥ 32॥
इसी प्रकार उपर्युक्त बहुत प्रकारके यज्ञ ब्रह्मके यानी वेदके मुखमें विस्तृत हैं।
वेदद्वारा ही सब यज्ञ जाननेमें आते हैं इसी अभिप्राय-से “ब्रह्मके मुखमें विस्तारित हैं” ऐसा कहा है। जैसे “हम वाणीमें ही प्राणोंको हवन करते हैं” इत्यादि (इसी तरह अन्य सब यज्ञोंका भी वेदमें विधान है)।
उन सब यज्ञोंको तू कर्मज—कायिक, वाचिक और मानसिक क्रियाद्वारा ही होनेवाले जान, वे यज्ञ आत्मासे होनेवाले नहीं हैं, क्योंकि आत्मा हलन-चलन आदि क्रियाओंसे रहित है।
सुतरां इस प्रकार जानकर तू अशुभसे मुक्त हो जायगा अर्थात् यह सब कर्म मेरे द्वारा सम्पादित नहीं हैं, मैं तो निष्क्रिय और उदासीन हूँ, इस प्रकार जानकर इस सम्यक् ज्ञानके प्रभावसे तू संसार-बन्धनसे मुक्त हो जायगा॥ 32॥
“ब्रह्मार्पणम्” इत्यादिश्लोकेन सम्यग्दर्शनस्य यज्ञत्वं सम्पादितं यज्ञाः च अनेके उपदिष्टाः तैः सिद्धपुरुषार्थप्रयोजनैः ज्ञानं स्तूयते। कथम्—
“ब्रह्मार्पणम्” इत्यादि श्लोकद्वारा यथार्थ ज्ञानको यज्ञरूपसे सम्पादन किया, फिर बहुत-से यज्ञोंका वर्णन किया। अब पुरुषका इच्छित प्रयोजन जिन यज्ञोंसे सिद्ध होता है, उन उपर्युक्त अन्य यज्ञोंकी अपेक्षा ज्ञानयज्ञकी स्तुति करते हैं। कैसे? सो कहते हैं—
श्रेयान् द्रव्यमयाद् द्रव्यसाधनसाध्याद् यज्ञाद् ज्ञानयज्ञो हे परन्तप।
द्रव्यमयो हि यज्ञः फलस्य आरम्भको ज्ञानयज्ञो न फलारम्भकः अतः श्रेयान् प्रशस्यतरः।
कथं यतः सर्वं कर्म समस्तम् अखिलम् अप्रतिबद्धं पार्थ ज्ञाने मोक्षसाधने सर्वतःसम्प्लुतोदक-स्थानीये परिसमाप्यते अन्तर्भवति इत्यर्थः।
“यथा कृताय विजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनं सर्वं तदभिसमेति यत्किं च प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत्स वेद” (छा0 उ0 4। 1। 4) इति श्रुतेः॥ 33॥
हे परन्तप! द्रव्यमय यज्ञकी अपेक्षा अर्थात् द्रव्यरूप साधनद्वारा सिद्ध होनेवाले यज्ञकी अपेक्षा ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठतर है।
क्योंकि द्रव्यमय यज्ञ फलका आरम्भ करनेवाला है और ज्ञानयज्ञ (जन्मादि) फल देनेवाला नहीं है। इसलिये वह श्रेष्ठतर अर्थात् अधिक प्रशंसनीय है।
क्योंकि हे पार्थ! सब-के-सब कर्म मोक्षसाधनरूप ज्ञानमें, जो कि सब ओरसे परिपूर्ण जलाशयके समान है, समाप्त हो जाते हैं अर्थात् उन सबका ज्ञानमें अन्तर्भाव हो जाता है।
“जैसे (चौपड़के खेलमें कृतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग ऐसे नामवाले जो चार पासे होते हैं उनमेंसे) कृतयुग नामक पासेको जीत लेनेपर नीचेवाले सब पासे अपने-आप ही जीत लिये जाते हैं, ऐसे ही जिसको वह रैक्व जानता है उस ब्रह्मको जो कोई भी जान लेता है, प्रजा जो कुछ भी अच्छे कर्म करती है उन सबका फल उसे अपने-आप ही मिल जाता है।” इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है॥ 33॥
तद् एतद् विशिष्टं ज्ञानं तर्हि केन प्राप्यते इति उच्यते—
इस प्रकारसे श्रेष्ठ बतलाया हुआ वह ज्ञान किस उपायसे मिलता है? सो कहते हैं—
तद् विद्धि विजानीहि येन विधिना प्राप्ते इति आचार्यान् अभिगम्य प्रणिपातेन प्रकर्षेण नीचैः पतनं प्रणिपातो दीर्घनमस्कारः तेन कथं बन्धः कथं मोक्षः का विद्या का च अविद्या इति परिप्रश्नेन सेवया गुरुशुश्रूषया।
एवम् आदिना प्रश्रयेण आवर्जिता आचार्या उपदेक्ष्यन्ति कथयिष्यन्ति ते ज्ञानं यथोक्त-विशेषणम्, ज्ञानिनः।
ज्ञानवन्तः अपि केचिद् यथावत् तत्त्व-दर्शनशीला अपरे न अतो विशिनष्टि तत्त्वदर्शिन इति।
ये सम्यग्दर्शिनः तैः उपदिष्टं ज्ञानं कार्यक्षमं भवति न इतरद् इति भगवतो मतम्॥ 34॥
वह ज्ञान जिस विधिसे प्राप्त होता है वह तू जान यानी सुन! आचार्यके समीप जाकर भलीभाँति दण्डवत् प्रणाम करनेसे एवं “किस तरह बन्धन हुआ?” “कैसे मुक्ति होगी?” “विद्या क्या है?” “अविद्या क्या है?” इस प्रकार (निष्कपट भावसे) प्रश्न करनेसे और गुरुकी यथायोग्य सेवा करनेसे (वह ज्ञान प्राप्त होता है)।
अभिप्राय यह कि इस प्रकार सेवा और विनय आदिसे प्रसन्न हुए तत्त्वदर्शी ज्ञानी आचार्य तुझे उपर्युक्त विशेषणोंवाले ज्ञानका उपदेश करेंगे।
ज्ञानवान् भी कोई-कोई ही यथार्थ तत्त्वको जाननेवाले होते हैं, सब नहीं होते। इसलिये ज्ञानीके साथ “तत्त्वदर्शी” यह विशेषण लगाया है।
इससे भगवान्का यह अभिप्राय है कि जो यथार्थ तत्त्वको जाननेवाले होते हैं, उनके द्वारा उपदेश किया हुआ ही ज्ञान अपने कार्यको सिद्ध करनेमें समर्थ होता है दूसरा नहीं॥ 34॥
तथा च सति इदम् अपि समर्थं वचनम्—
ऐसा होनेपर यह कहना भी ठीक है—
यद् ज्ञात्वा यद् ज्ञानं तैः उपदिष्टम् अधिगम्य प्राप्य पुनः भूयो मोहम् एवं यथा इदानीं मोहं गतः असि पुनः एवं न यास्यसि हे पाण्डव।
किं च येन ज्ञानेन भूतानि अशेषेण ब्रह्मादीनि स्तम्बपर्यन्तानि द्रक्ष्यसि साक्षाद् आत्मनि प्रत्यगात्मनि मत्संस्थानि इमानि भूतानि इति, अथो अपि मयि वासुदेवे परमेश्वरे च इमानि इति, क्षेत्रज्ञेश्वरैकत्वं सर्वोपनिषत्प्रसिद्धं द्रक्ष्यसि इत्यर्थः॥
हे पाण्डव! उनके द्वारा बतलाये हुए जिस ज्ञानको पाकर फिर तू इस प्रकार मोहको प्राप्त नहीं होगा, जैसे कि अब हो रहा है।
तथा जिस ज्ञानके द्वारा तू सम्पूर्णतासे सब भूतोंको अर्थात् ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त समस्त प्राणियोंको “यह सब भूत मुझमें स्थित हैं” इस प्रकार साक्षात् अपने अन्तरात्मामें ही देखेगा और मुझ वासुदेव परमेश्वरमें भी इन सब भूतोंको देखेगा। अर्थात् सभी उपनिषदोंमें जो जीवात्मा और ईश्वरकी एकता प्रसिद्ध है उसको प्रत्यक्ष अनुभव करेगा॥ 35॥
किं च एतस्य ज्ञानस्य माहात्म्यम्—
इस ज्ञानका माहात्म्य क्या है (सो सुन)—
अपि चेद् असि पापेभ्यः पापकृद्भ्यः सर्वेभ्य अतिशयेन पापकृत् पापकृत्तमः, सर्वं ज्ञानप्लवेन एव ज्ञानम् एव प्लवं कृत्वा वृजिनं वृजिनार्णवं पापं सन्तरिष्यसि, धर्मः अपि इह मुमुक्षोः पापम् उच्यते॥ 36॥
यदि तू पाप करनेवाले सब पापियोंसे अधिक पाप करनेवाला—अति पापी भी है तो भी ज्ञानरूप नौकाद्वारा अर्थात् ज्ञानको ही नौका बनाकर समस्त पापरूप समुद्रसे अच्छी तरह पार उतर जायगा। यहाँ मुमुक्षुके लिये धर्म भी पाप ही कहा जाता है॥ 36॥
ज्ञानं कथं नाशयति पापम् इति सदृष्टान्तम् उच्यते—
ज्ञान पापको किस प्रकार नष्ट कर देता है सो दृष्टान्तसहित कहते हैं—
यथा एधांसि काष्ठानि समिद्धः सम्यग् इद्धो दीप्तः अग्निः भस्मसाद् भस्मीभावं कुरुते अर्जुन, ज्ञानम् एव अग्निः ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा निर्बीजीकरोति इत्यर्थः।
न हि साक्षाद् एव ज्ञानाग्निः कर्माणि इन्धनवद् भस्मीकर्तुं शक्नोति, तस्मात् सम्यग्दर्शनं सर्वकर्मणां निर्बीजत्वे कारणम् इति अभिप्रायः।
सामर्थ्याद् येन कर्मणा शरीरम् आरब्धं तत् प्रवृत्तफलत्वाद् उपभोगेन एव क्षीयते।
अतो यानि अप्रवृत्तफलानि ज्ञानोत्पत्तेः प्राक् कृतानि ज्ञानसहभावीनि च अतीतानेकजन्मकृतानि च तानि एव सर्वाणि भस्मसात् कुरुते॥ 37॥
हे अर्जुन! जैसे अच्छी प्रकारसे प्रदीप्त यानी प्रज्वलित हुआ अर्ग्नि इंधनको अर्थात् काष्ठके समूहको भस्मरूप कर देता है, वैसे ही ज्ञानरूप अग्नि सब कर्मोंको भस्मरूप कर देता है, अर्थात् निर्बीज कर देता है।
क्योंर्कि इंधनकी भाँति ज्ञानरूप अग्नि कर्मोंको साक्षात् भस्मरूप नहीं कर सकता; इसलिये इसका यही अभिप्राय है कि यथार्थ ज्ञान सब कर्मोंको निर्बीज करनेका हेतु है।
जिस कर्मसे शरीर उत्पन्न हुआ है, वह फल देनेके लिये प्रवृत्त हो चुका, इसलिये उसका नाश तो उपभोगद्वारा ही होगा। यह युक्तिसिद्ध बात है।
अतः इस जन्ममें ज्ञानकी उत्पत्तिसे पहले और ज्ञानके साथ-साथ किये हुए एवं पुराने अनेक जन्मोंमें किये हुए, जो कर्म अभीतक फल देनेके लिये प्रवृत्त नहीं हुए हैं, उन सब कर्मोंको ही ज्ञानाग्नि भस्म करता है (प्रारब्ध-कर्मोंको नहीं)॥ 37॥
यत एवम् अतः—
क्योंकि ज्ञानका इतना प्रभाव है इसलिये—
न हि ज्ञानेन सदृशं तुल्यं पवित्रं पावनं शुद्धिकरम् इह विद्यते।
तद् ज्ञानं स्वयम् एव योगसंसिद्धो योगेन कर्मयोगेन समाधियोगेन च संसिद्धः संस्कृतो योग्यताम् आपन्नो मुमुक्षुः कालेन महता आत्मनि विन्दति लभते इत्यर्थः॥ 38॥
ज्ञानके समान पवित्र करनेवाला—शुद्ध करनेवाला इस लोकमें (दूसरा कोई) नहीं है।
कर्मयोग या समाधियोगद्वारा बहुत कालमें भली प्रकार शुद्धान्तःकरण हुआ अर्थात् वैसी योग्यताको प्राप्त हुआ मुमुक्षु स्वयं अपने आत्मामें ही उस ज्ञानको पाता है यानी साक्षात् किया करता है॥ 38॥
येन एकान्तेन ज्ञानप्राप्तिः भवति स उपाय उपदिश्यते—
जिसके द्वारा निश्चय ही ज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है वह उपाय बतलाया जाता है—
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श्रद्धावान् श्रद्धालुः लभते ज्ञानम्।
श्रद्धालुत्वे अपि भवति कश्चिद् मन्दप्रस्थानः अत आह तत्परो गुरूपासनादौ अभियुक्तः, ज्ञानलब्ध्युपाये।
श्रद्धावान् तत्परः अपि अजितेन्द्रियः स्याद् इति अत आह संयतेन्द्रियः संयतानि विषयेभ्यो निवर्तितानि यस्य इन्द्रियाणि स संयतेन्द्रियः।
य एवम्भूतः श्रद्धावान् तत्परः संयतेन्द्रियः च सः अवश्यं ज्ञानं लभते।
प्रणिपातादिः तु बाह्यः अनैकान्तिकः अपि भवति मायावित्वादिसम्भवाद् न तु तत् श्रद्धा-वत्त्वादौ इति एकान्ततो ज्ञानलब्ध्युपायः।
किं पुनः ज्ञानलाभात् स्याद् इति उच्यते—
ज्ञानं लब्ध्वा परां मोक्षाख्यां शान्तिम् उपरतिम् अचिरेण क्षिप्रम् एव अधिगच्छति।
सम्यग्दर्शनात् क्षिप्रं मोक्षो भवति इति सर्वशास्त्रन्यायप्रसिद्धः सुनिश्चितः अर्थः॥ 39॥
श्रद्धावान्—श्रद्धालु मनुष्य ज्ञान प्राप्त किया करता है।
श्रद्धालु होकर भी तो कोई मन्द प्रयत्नवाला हो सकता है, इसलिये कहते हैं कि तत्पर अर्थात् ज्ञानप्राप्तिके गुरुशुश्रूषादि उपायोंमें जो अच्छी प्रकार लगा हुआ हो।
श्रद्धावान् और तत्पर होकर भी कोई अजितेन्द्रिय हो सकता है, इसलिये कहते हैं कि संयतेन्द्रिय भी होना चाहिये। जिसकी इन्द्रियाँ वशमें की हुई हों यानी विषयोंसे निवृत्त कर ली गयी हों, वह संयतेन्द्रिय कहलाता है।
जो इस प्रकार श्रद्धावान्, तत्पर और संयतेन्द्रिय भी होता है वह अवश्य ही ज्ञानको प्राप्त कर लेता है।
जो दण्डवत्-प्रणामादि उपाय हैं वे तो बाह्य हैं, और कपटी मनुष्यद्वारा भी किये जा सकते हैं, इसलिये वे (ज्ञानरूप फल उत्पन्न करनेमें) अनिश्चित भी हो सकते हैं। परंतु श्रद्धालुता आदि उपायोंमें कपट नहीं चल सकता, इसलिये ये निश्चयरूपसे ज्ञानप्राप्तिके उपाय हैं।
ज्ञानप्राप्तिसे क्या होगा? सो (उत्तरार्धमें) कहते हैं—
ज्ञानको प्राप्त होकर मनुष्य मोक्षरूप परम शान्तिको यानी उपरामताको बहुत शीघ्र—तत्काल ही प्राप्त हो जाता है।
यथार्थ ज्ञानसे तुरंत ही मोक्ष हो जाता है; यह सब शास्त्रों और युक्तियोंसे सिद्ध सुनिश्चित बात है॥ 39॥
अत्र संशयो न कर्तव्यः पापिष्ठो हि संशयः, कथम्, उच्यते—
इस विषयमें संशय नहीं करना चाहिये, क्योंकि संशय बड़ा पापी है। कैसे? सो कहते हैं—
अज्ञः च अनात्मज्ञः अश्रद्दधानः च संशयात्मा च विनश्यति।
अज्ञाश्रद्दधानौ यद्यपि विनश्यतः तथापि न तथा यथा संशयात्मा, संशयात्मा तु पापिष्ठः सर्वेषाम्।
कथम्, न अयं साधारणः अपि लोकः अस्ति तथा न परो लोको न सुखम्, तत्र अपि संशयोपपत्तेः संशयात्मनः संशयचित्तस्य। तस्मात् संशयो न कर्तव्यः॥ 40॥
जो अज्ञ यानी आत्मज्ञानसे रहित है, जो अश्रद्धालु है और जो संशयात्मा है—ये तीनों नष्ट हो जाते हैं।
यद्यपि अज्ञानी और अश्रद्धालु भी नष्ट होते हैं; परंतु जैसा संशयात्मा नष्ट होता है, वैसे नहीं, क्योंकि इन सबमें संशयात्मा अधिक पापी है।
अधिक पापी कैसे है? (सो कहते हैं) संशयात्माको अर्थात् जिसके चित्तमें संशय है उस पुरुषको न तो यह साधारण मनुष्यलोक मिलता है, न परलोक मिलता है और न सुख ही मिलता है, क्योंकि वहाँ भी संशय होना सम्भव है, इसलिये संशय नहीं करना चाहिये॥ 40॥
कस्मात्—
कैसे?
योगसन्न्यस्तकर्माणं
परमार्थदर्शनलक्षणेन योगेन सन्न्यस्तानि कर्माणि येन परमार्थदर्शिना धर्माधर्माख्यानि तं योगसन्न्यस्तकर्माणम्।
कथं योगसन्न्यस्तकर्मा इति आह—
ज्ञानेन आत्मेश्वरैकत्वदर्शनलक्षणेन सञ्छिन्नः संशयो यस्य स ज्ञानसञ्छिन्नसंशयः।
य एवं योगसन्न्यस्तकर्मा तम् आत्मवन्तम् अप्रमत्तं गुणचेष्टारूपेण दृष्टानि कर्माणि न निबध्नन्ति अनिष्टादिरूपं फलं न आरभन्ते हे धनञ्जय॥ 41॥
जिस परमार्थदर्शी पुरुषने परमार्थज्ञानरूप योगके द्वारा पुण्य-पापरूप सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग कर दिया हो, वह योगसंन्यस्तकर्मा है। (उसको कर्म नहीं बाँधते।)
वह योगसंन्यस्तकर्मा कैसे है? सो कहते हैं—
आत्मा और ईश्वरकी एकता-दर्शनरूप ज्ञानद्वारा जिसका संशय अच्छी प्रकार नष्ट हो चुका है, वह “ज्ञानसंछिन्नसंशय” कहलाता है। (इसीलिये वह योगसंन्यस्तकर्मा है।)
जो इस प्रकार योगसंन्यस्तकर्मा है, उस आत्मवान् यानी आत्मबलसे युक्त प्रमादरहित पुरुषको हे धनंजय! (गुण ही गुणोंमें बर्तते हैं इस प्रकार) गुणोंकी चेष्टामात्रके रूपमें समझे हुए कर्म नहीं बाँधते, अर्थात् इष्ट, अनिष्ट और मिश्र—इन तीन प्रकारके फलोंका भोग नहीं करा सकते॥ 41॥
यस्मात् कर्मयोगानुष्ठानाद् अशुद्धिक्षय-हेतुकज्ञानसञ्छिन्नसंशयो न निबध्यते, कर्मभिः ज्ञानाग्निदग्धकर्मत्वाद्
एव।
यस्मात्
च ज्ञानकर्मानुष्ठानविषये संशयवान् विनश्यति—
क्योंकि कर्मयोगका अनुष्ठान करनेसे अन्तःकरणकी अशुद्धिका क्षय हो जानेपर उत्पन्न होनेवाले आत्मज्ञानसे जिसका संशय नष्ट हो गया है ऐसा पुरुष तो ज्ञानाग्निद्वारा उसके कर्म दग्ध हो जानेके कारण कर्मोंसे नहीं बँधता; तथा ज्ञानयोग और कर्मयोगके अनुष्ठानमें संशय रखनेवाला नष्ट हो जाता है—
तस्मात् पापिष्ठम् अज्ञानसम्भूतम् अज्ञानाद् अविवेकाद् जातं हृत्स्थं हृदि बुद्धौ स्थितं ज्ञानासिना शोकमोहादिदोषहरं सम्यग्दर्शनं ज्ञानं तद् एव असिः खड्गः तेन ज्ञानासिना आत्मनः स्वस्य।
आत्मविषयत्वात् संशयस्य।
न हि परस्य संशयः परेण छेत्तव्यतां प्राप्तो येन स्वस्य इति विशिष्यते अत आत्मविषयः अपि स्वस्य एव भवति।
छित्त्वा एनं संशयं स्वविनाशहेतुभूतं योगं सम्यग्दर्शनोपायकर्मानुष्ठानम् आतिष्ठ कुरु इत्यर्थः। उत्तिष्ठ इदानीं युद्धाय भारत इति॥ 42॥
इसलिये अज्ञान यानी अविवेकसे उत्पन्न और अन्तःकरणमें रहनेवाले (अपने नाशकके हेतुभूत) इस अत्यन्त पापी अपने संशयको ज्ञानखड्गद्वारा अर्थात् शोक-मोह आदि दोनोंका नाश करनेवाला यथार्थ दर्शनरूप जो ज्ञान है वही खड्ग है उस स्वरूपज्ञानरूप खड्गद्वारा (छेदन करके कर्मयोगमें स्थित हो)।
यहाँ संशय आत्मविषयक है इसलिये (उसके साथ “आत्मनः” विशेषण दिया गया है)।
क्योंकि एकका संशय दूसरेके द्वारा छेदन करनेकी शङ्का यहाँ प्राप्त नहीं होती जिससे कि (ऐसी शङ्काको दूर करनेके उद्देश्यसे) “आत्मनः” विशेषण दिया जावे, अतः (यही समझना चाहिये कि) आत्मविषयक होनेसे भी अपना कहा जा सकता है। (सुतरां संशयको “अपना” बतलाना असंगत नहीं है।)
अतः अपने नाशके कारणरूप इस संशयको (उपर्युक्त प्रकारसे) काटकर पूर्ण ज्ञानकी प्राप्तिके उपायरूप कर्मयोगमें स्थित हो और हे भारत! अब युद्धके लिये खड़ा हो जा॥ 42॥