अक्षरब्रह्मयोग
सम्बन्ध—सातवें अध्यायमें पहलेसे तीसरे श्लोकतक भगवान्ने अपने समग्ररूपका तत्त्व सुननेके लिये अर्जुनको सावधान करते हुए, उसके कहनेकी प्रतिज्ञा और जाननेवालोंकी प्रशंसा की। फिर सत्ताईसवें श्लोकतक अनेक प्रकारसे उस तत्त्वको समझाकर न जाननेके कारणको भी भलीभाँति समझाया और अन्तमें ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञके सहित भगवान्के समग्ररूपको जाननेवाले भक्तकी महिमाका वर्णन करते हुए उस अध्यायका उपसंहार किया। उनतीसवें और तीसवें श्लोकोंमें वर्णित ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ—इन छहोंका तथा प्रयाणकालमें भगवान्को जाननेकी बातका रहस्य भलीभाँति न समझनेके कारण इस आठवें अध्यायके आरम्भमें पहले दो श्लोकोंमें अर्जुन उपर्युक्त सातों विषयोंको समझनेके लिये भगवान्से सात प्रश्न करते हैं—
सम्बन्ध—अर्जुनके सात प्रश्नोंमेंसे भगवान् अब पहले ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मविषयक तीन प्रश्नोंका उत्तर अगले श्लोकमें क्रमशः संक्षेपसे देते हैं—
सम्बन्ध—अब भगवान् अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञविषयक प्रश्नोंका उत्तर क्रमशः देते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार अर्जुनके छः प्रश्नोंका उत्तर देकर अब भगवान् अन्तकालसम्बन्धी सातवें प्रश्नका उत्तर आरम्भ करते हैं—
सम्बन्ध—यहाँ यह बात कही गयी कि भगवान्का स्मरण करते हुए मरनेवाला भगवान्को ही प्राप्त होता है। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि केवल भगवान्के स्मरणके सम्बन्धमें ही यह विशेष नियम है या सभीके सम्बन्धमें है? इसपर कहते हैं—
सम्बन्ध—अन्तकालमें जिसका स्मरण करते हुए मनुष्य मरता है, उसीको प्राप्त होता है; और अन्तकालमें प्रायः उसी भावका स्मरण होता है, जिसका जीवनमें अधिक स्मरण किया जाता है। यह निर्णय हो जानेपर भगवत्प्राप्ति चाहनेवालेके लिये अन्तकालमें भगवान्का स्मरण रखना अत्यन्त आवश्यक हो जाता है और अन्तकाल अचानक ही कब आ जाय, इसका कुछ पता नहीं है; अतएव अब भगवान् निरन्तर भजन करते हुए ही युद्ध करनेके लिये अर्जुनको आदेश करते हैं—
सम्बन्ध—पाँचवें श्लोकमें भगवान्का चिन्तन करते-करते मरनेवाले मनुष्योंकी गतिका वर्णन करके अर्जुनके सातवें प्रश्नका संक्षेपमें उत्तर दिया गया, अब उसी प्रश्नका विस्तारपूर्वक उत्तर देनेके लिये अभ्यासयोगके द्वारा मनको वशमें करके भगवान्के “अधियज्ञ” रूपका अर्थात् सगुण निराकार दिव्य अव्यक्त रूपका चिन्तन करनेवाले योगियोंकी अन्तकालीन गतिका तीन श्लोकोंद्वारा वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—दिव्यपुरुषकी प्राप्ति बतलाकर अब उसका स्वरूप बतलाते हैं—
सम्बन्ध—परम दिव्य पुरुषका स्वरूप बतलाकर अब साधनकी विधि और फल बतलाते हैं—
सम्बन्ध—पाँचवें श्लोकमें भगवान्का चिन्तन करते-करते मरनेवाले साधारण मनुष्यकी गतिका संक्षेपमें वर्णन किया गया, फिर आठवेंसे दसवें श्लोकतक भगवान्के “अधियज्ञ” नामक सगुण निराकार दिव्य अव्यक्त स्वरूपका चिन्तन करनेवाले योगियोंकी अन्तकालीन गतिके सम्बन्धमें बतलाया, अब ग्यारहवें श्लोकसे तेरहवेंतक परम अक्षर निर्गुण निराकार परब्रह्मकी उपासना करनेवाले योगियोंकी अन्तकालीन गतिका वर्णन करनेके लिये पहले उस अक्षर ब्रह्मकी प्रशंसा करके उसे बतलानेकी प्रतिज्ञा करते हैं—
सम्बन्ध—पूर्व श्लोकमें जिस विषयका वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा की थी, अब दो श्लोकोंमें उसीका वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार निराकार-सगुण परमेश्वरके और निर्गुण-निराकार ब्रह्मके उपासक योगियोंकी अन्तकालीन गतिका प्रकार और फल बतलाया गया; किंतु अन्तकालमें इस प्रकारका साधन वे ही पुरुष कर सकते हैं, जिन्होंने पहलेसे योगका अभ्यास करके मनको अपने आधीन कर लिया है। साधारण मनुष्यके द्वारा अन्तकालमें इस प्रकार सगुण-निराकारका और निर्गुण-निराकारका साधन किया जाना बहुत ही कठिन है, अतएव सुगमतासे परमेश्वरकी प्राप्तिका उपाय जाननेकी इच्छा होनेपर अब भगवान् अपने नित्य-निरन्तर स्मरणको अपनी प्राप्तिका सुगम उपाय बतलाते हैं—
सम्बन्ध—भगवान्के नित्य-निरन्तर चिन्तनसे भगवत्प्राप्तिकी सुलभताका प्रतिपादन किया, अब उनके पुनर्जन्म न होनेकी बात कहकर यह दिखलाते हैं कि भगवत्प्राप्त महापुरुषोंका भगवान्से फिर कभी वियोग नहीं होता—
सम्बन्ध—भगवत्प्राप्त महात्मा पुरुषोंका पुनर्जन्म नहीं होता, इस कथनसे यह प्रकट होता है कि दूसरे जीवोंका पुनर्जन्म होता है। अतः यहाँ यह जाननेकी इच्छा होती है कि किस लोकतक पहुँचे हुए जीवोंको वापस लौटना पड़ता है। इसपर भगवान् कहते हैं—
सम्बन्ध—ब्रह्मलोकपर्यन्त सब लोकोंको पुनरावर्ती बतलाया, परंतु वे पुनरावर्ती कैसे हैं—इस जिज्ञासापर अब भगवान् ब्रह्माके दिन-रातकी अवधिका वर्णन करके सब लोकोंकी अनित्यता सिद्ध करते हैं—
सम्बन्ध—ब्रह्माके दिन-रात्रिका परिमाण बतलाकर अब उस दिन और रातके आरम्भमें बार-बार होनेवाली समस्त भूतोंकी उत्पत्ति और प्रलयका वर्णन करते हुए उन सबकी अनित्यताका कथन करते हैं—
सम्बन्ध—यद्यपि ब्रह्माकी रात्रिके आरम्भमें समस्त भूत अव्यक्तमें लीन हो जाते हैं, तथापि जबतक वे परम पुरुष परमेश्वरको प्राप्त नहीं होते, तबतक उनका पुनर्जन्मसे पिंड नहीं छूटता, वे आवागमनके चक्करमें घूमते ही रहते हैं। इसी भावको दिखलानेके लिये भगवान् कहते हैं—
सम्बन्ध—ब्रह्माकी रात्रिके आरम्भमें जिस अव्यक्तमें समस्त भूत लीन होते हैं और दिनका आरम्भ होते ही जिससे उत्पन्न होते हैं, वही अव्यक्त सर्वश्रेष्ठ है? या उससे बढ़कर कोई दूसरा और है? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
सम्बन्ध—आठवें और दसवें श्लोकोंमें अधियज्ञकी उपासनाका फल परम दिव्य पुरुषकी प्राप्ति, तेरहवें श्लोकमें परम अक्षर निर्गुण ब्रह्मकी उपासनाका फल परमगतिकी प्राप्ति और चौदहवें श्लोकमें सगुण-साकार भगवान् श्रीकृष्णकी उपासनाका फल भगवान्की प्राप्ति बतलाया गया है। इससे तीनोंमें किसी प्रकारके भेदका भ्रम न हो जाय, इस उद्देश्यसे अब सबकी एकताका प्रतिपादन करते हुए उनकी प्राप्तिके बाद पुनर्जन्मका अभाव दिखलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार सनातन अव्यक्त पुरुषकी परमगति और परम धामके साथ एकता दिखलाकर, अब उस सनातन अव्यक्त परम पुरुषकी प्राप्तिका उपाय बतलाते हैं—
सम्बन्ध—अर्जुनके सातवें प्रश्नका उत्तर देते हुए भगवान्ने अन्तकालमें किस प्रकार मनुष्य परमात्माको प्राप्त होता है, यह बात भलीभाँति समझायी। प्रसंगवश यह बात भी कही कि भगवत्प्राप्ति न होनेपर ब्रह्मलोकतक पहुँचकर भी जीव आवागमनके चक्करसे नहीं छूटता। परन्तु वहाँ यह बात नहीं कही गयी कि जो वापस न लौटनेवाले स्थानको प्राप्त होते हैं, वे किस रास्तेसे और कैसे जाते हैं तथा इसी प्रकार जो वापस लौटनेवाले स्थानोंको प्राप्त होते हैं, वे किस रास्तेसे जाते हैं। अतः उन दोनों मार्गोंका वर्णन करनेके लिये भगवान् प्रस्तावना करते हैं—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें जिन दो मार्गोंका वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा की गयी, उनमेंसे जिस मार्गसे गये हुए साधक वापस नहीं लौटते, उसका वर्णन पहले किया जाता है—
सम्बन्ध—इस प्रकार वापस न लौटनेवालोंके मार्गका वर्णन करके अब जिस मार्गसे गये हुए साधक वापस लौटते हैं, उसका वर्णन किया जाता है—
सम्बन्ध—इस प्रकार उत्तरायण और दक्षिणायन—दोनों मार्गोंका वर्णन करके अब उन दोनोंको सनातन मार्ग बतलाकर इस विषयका उपसंहार करते हैं—
सम्बन्ध—अब उन दोनों मार्गोंको जाननेवाले योगीकी प्रशंसा करके अर्जुनको योगी बननेके लिये कहते हैं—
सम्बन्ध—भगवान्ने अर्जुनको योगयुक्त होनेके लिये कहा। अब योगयुक्त पुरुषकी महिमा और इस अध्यायमें वर्णित रहस्यको समझकर उसके अनुसार साधन करनेका फल बतलाते हुए इस अध्यायका उपसंहार करते हैं—