ग्रन्थ
8अक्षरब्रह्मयोग

अक्षरब्रह्मयोग

Akshara-Brahma-Yoga
The Imperishable Brahman
28 verses · 27 printed blockspp. 211225 · Srimad Bhagavad Gita Shankarabhashyaसाधारण भाषाटीका 27 · साधक-संजीवनी 26 · श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्य 27 · श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीका 27
1–2अर्जुनMerged
अर्जुन उवाच— किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम। अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥ 1॥ अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन। प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः॥ 2॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
हे पुरुषोत्तम! वह ब्रह्मतत्त्व क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत किसको कहते हैं? अधिदैव किसको कहते हैं? हे मधुसूदन! इस देहमें अधियज्ञ कौन है और कैसे है तथा संयतचित्तवाले योगियोंद्वारा आप मरणकालमें किस प्रकार जाने जा सकते हैं?॥ 1-2॥
सम्बन्ध
संस्कृत

“ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नम्” इत्यादिना भगवता अर्जुनस्य प्रश्नबीजानि उपदिष्टानि अतः तत्प्रश्नार्थम्—

हिन्दी

“ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नम्” इत्यादि वचनोंसे (पूर्वाध्यायमें) भगवान्ने अर्जुनके लिये प्रश्नके बीजोंका उपदेश किया था, अतः उन प्रश्नोंको पूछनेके लिये अर्जुन बोले—

भाष्य
संस्कृत

एषां प्रश्नानां यथाक्रमं निर्णयाय—

हिन्दी

इन प्रश्नोंका क्रमसे निर्णय करनेके लिये श्रीभगवान् बोले—

3श्रीभगवान्
श्रीभगवान् उवाच
श्रीभगवानुवाच— अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते। भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसञ्ज्ञितः॥ 3॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
भाष्य
5 paragraphs · खोलें
संस्कृत

अक्षरं न क्षरति इति परमात्मा “तस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि” (बृह0 उ0 3। 8। 9) इति श्रुतेः।

ओङ्कारस्य च “ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म” इति परेण विशेषणाद् अग्रहणं परमम् इति च निरतिशये ब्रह्मणि अक्षरे उपपन्नतरं विशेषणम्।

तस्य एव परस्य ब्रह्मणः प्रतिदेहं प्रत्यगात्मभावः स्वभावः। स्वभावः अध्यात्मम् उच्यते।

आत्मानं देहम् अधिकृत्य प्रत्यगात्मतया प्रवृत्तं परमार्थब्रह्मावसानं वस्तु स्वभावः अध्यात्मम् उच्यते अध्यात्मशब्देन अभिधीयते।

भूतभावोद्भवकरो भूतानां भावो भूतभावः तस्य उद्भवो भूतभावोद्भवः तं करोति इति भूतभावोद्भवकरो भूतवस्तूत्पत्तिकरः इत्यर्थः विसर्गो विसर्जनं देवतोद्देशेन चरुपुरोडाशादेः द्रव्यस्य परित्यागः स एष विसर्गलक्षणो यज्ञः, कर्मसञ्ज्ञितः कर्मशब्दित इति एतत्। एतस्माद् हि बीजभूताद् वृष्ट्यादिक्रमेण स्थावरजङ्गमानि भूतानि उद्भवन्ति॥ 3॥

हिन्दी

परम अक्षर ब्रह्म है अर्थात् “हे गार्गि! इस अक्षरके शासनमें ही यह सूर्य और चन्द्रमा धारण किये हुए स्थित हैं” इत्यादि श्रुतियोंसे जिसका वर्णन किया गया है, जो कभी नष्ट नहीं होता वह परमात्मा ही “ब्रह्म” है।

“परम” विशेषणसे युक्त होनेके कारण यहाँ अक्षर शब्दसे “ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म” इस वाक्यमें वर्णित ओंकारका ग्रहण नहीं किया गया है; क्योंकि “परम” वह विशेषण निरतिशय अक्षर ब्रह्ममें ही अधिक सम्भव—युक्तियुक्त है।

उसी परब्रह्मका जो प्रत्येक शरीरमें अन्तरात्मभाव है उसका नाम स्वभाव है, वह स्वभाव ही “अध्यात्म” कहलाता है।

अभिप्राय यह कि आत्मा यानी शरीरको आश्रय बनाकर जो अन्तरात्मभावसे उसमें रहनेवाला है और परिणाममें जो परमार्थ ब्रह्म ही है वही तत्त्व स्वभाव है, उसे ही अध्यात्म कहते हैं अर्थात् वही अध्यात्म नामसे कहा जाता है।

“भूतभाव-उद्भव-कर” अर्थात् भूतोंकी सत्ता “भूतभाव” है। उसका उद्भव (उत्पत्ति) “भूतभावोद्भव” है, उसको करनेवाला “भूतभावोद्भवकर” यानी भूतवस्तुको उत्पन्न करनेवाला, ऐसा जो विसर्ग अर्थात् देवोंके उद्देश्यसे चरु, पुरोडाश आदि (हवन करने योग्य) द्रव्योंका त्याग करना है, वह त्यागरूप यज्ञ, कर्म नामसे कहा जाता है, इस बीजरूप यज्ञसे ही वृष्टि आदिके क्रमसे स्थावर-जङ्गम समस्त भूतप्राणी उत्पन्न होते हैं॥ 3॥

4
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्। अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर॥ 4॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
भाष्य
संस्कृत

अधिभूतं प्राणिजातम् अधिकृत्य भवति इति। कः असौ क्षरः क्षरति इति क्षरो विनाशी भावो यत्किञ्चिद् जनिमद् वस्तु इत्यर्थः।

पुरुषः पूर्णम् अनेन सर्वम् इति पुरि शयनाद् वा पुरुष आदित्यान्तर्गतो हिरण्यगर्भः सर्व-प्राणिकरणानाम् अनुग्राहकः सः अधिदैवतम्।

अधियज्ञः

सर्वयज्ञाभिमानिनी

देवता विष्ण्वाख्या “यज्ञो वै विष्णुः” इति श्रुतेः। स हि विष्णुः अहम् एव अत्र अस्मिन् देहे यो यज्ञः तस्य अहम् अधियज्ञः, यज्ञो हि देहनिर्वर्त्यत्वेन देहसमवायी इति देहाधिकरणो भवति, देहभृतां वर॥ 4॥

हिन्दी

जो प्राणिमात्रको आश्रित किये होता है उसका नाम अधिभूत है। वह कौन है? क्षर—जो कि क्षय होता है ऐसा विनाशी भाव यानी जो कुछ भी उत्पत्तिशील पदार्थ हैं वे सब-के-सब अधिभूत हैं।

पुरुष अर्थात् जिससे यह सब जगत् परिपूर्ण है अथवा जो शरीररूप पुरमें रहनेवाला होनेसे पुरुष कहलाता है, वह सब प्राणियोंके इन्द्रियादि करणोंका अनुग्राहक सूर्यलोकमें रहनेवाला हिरण्यगर्भ अधिदैवत है।

“यज्ञ ही विष्णु है” इस श्रुतिके अनुसार सब यज्ञोंका अधिष्ठाता जो विष्णुनामक देवता है वह अधियज्ञ है। हे देहधारियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! इस देहमें जो यज्ञ है उसका अधिष्ठाता वह विष्णुरूप “अधियज्ञ” मैं ही हूँ। यज्ञ शरीरसे ही सिद्ध होता है, अतः यज्ञका शरीरसे नित्य सम्बन्ध है, इसलिये वह शरीरमें रहनेवाला माना जाता है॥ 4॥

5
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्। यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥ 5॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
भाष्य
संस्कृत

अन्तकाले च मरणकाले माम् एव परमेश्वरं विष्णुं स्मरन् मुक्त्वा परित्यज्य कलेवरं शरीरं यः प्रयाति गच्छति स मद्भावं वैष्णवं तत्त्वं याति, न अस्ति न विद्यते अत्र अस्मिन् अर्थे संशयो याति वा न वा इति॥ 5॥

हिन्दी

और जो पुरुष अन्तकालमें—मरणकालमें मुझ परमेश्वर—विष्णुका ही स्मरण करता हुआ शरीर छोड़कर जाता है, वह मेरे भावको अर्थात् विष्णुके परम तत्त्वको प्राप्त होता है। इस विषयमें प्राप्त होता है या नहीं, ऐसा कोई संशय नहीं है॥ 5॥

6
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥ 6॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

न मद्विषय एव अयं नियमः किं तर्हि—

हिन्दी

केवल मेरे विषयमें ही यह नियम नहीं है, किंतु—

भाष्य
संस्कृत

यं यं वा अपि यं यं भावं देवताविशेषं स्मरन् चिन्तयन् त्यजति परित्यजति अन्ते प्राणवियोगकाले कलेवरम्, तं तम् एव स्मृतं भावम् एव एति न अन्यं कौन्तेय सदा सर्वदा तद्भावभावितः तस्मिन् भावः तद्भावः स भावितः स्मर्यमाणतया अभ्यस्तो येन स तद्भावभावितः सन्॥ 6॥

हिन्दी

हे कुन्तीपुत्र! प्राणवियोगके समय (यह जीव) जिस-जिस भी भावका अर्थात् (जिस किसी भी) देवताविशेषका चिन्तन करता हुआ शरीर छोड़ता है, उस भावसे भावित हुआ वह पुरुष सदा उस स्मरण किये हुए भावको ही प्राप्त होता है, अन्यको नहीं। उपास्य देवविषयक भावनाका नाम “तद्भाव” है, वह जिसने भावित यानी बारंबार चिन्तन करनेके द्वारा अभ्यस्त किया हो, उसका नाम “तद्भावभावित” है, ऐसा होता हुआ (उसीको प्राप्त होता है)॥ 6॥

7
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च। मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयः ॥ 7॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

यस्माद् एवम् अन्त्या भावना देहान्तरप्राप्तौ कारणम्—

हिन्दी

क्योंकि इस प्रकार अन्तकालकी भावना ही अन्य शरीरकी प्राप्तिका कारण है—

भाष्य
संस्कृत

तस्मात् सर्वेषु कालेषु माम् अनुस्मर यथाशास्त्रं युध्य च युद्धं च स्वधर्मं कुरु मयि वासुदेवे अर्पिते मनोबुद्धी यस्य तव स त्वं मय्यर्पितमनोबुद्धिः सन् माम् एव यथास्मृतम् एष्यसि आगमिष्यसि असंशयो न संशयो अत्र विद्यते॥ 7॥

हिन्दी

इसलिये तू हर समय मेरा स्मरण कर और शास्त्राज्ञानुसार स्वधर्मरूप युद्ध भी कर। इस प्रकार मुझ वासुदेवमें जिसके मन-बुद्धि अर्पित हैं, ऐसा तू मुझमें अर्पित किये हुए मन-बुद्धिवाला होकर मुझको ही अर्थात् मेरे यथाचिन्तित स्वरूपको ही प्राप्त हो जायगा, इसमें संशय नहीं है॥ 7॥

8
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना। परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्॥ 8॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

किं च—

हिन्दी

तथा—

भाष्य
संस्कृत

अभ्यासयोगयुक्तेन, मयि चित्तसमर्पण-विषयभूते एकस्मिन् तुल्यप्रत्ययावृत्तिलक्षणो विलक्षणप्रत्ययानन्तरितः अभ्यासः स च अभ्यासो योगः तेन युक्तं तत्र एव व्यावृतं योगिनः चेतः तेन चेतसा न अन्यगामिना न अन्यत्र विषयान्तरे गन्तुं शीलम् अस्य इति न अन्यगामि तेन नान्यगामिना परमं निरतिशयं पुरुषं दिव्यं दिवि सूर्यमण्डले भवं याति गच्छति हे पार्थ, अनुचिन्तयन् शास्त्राचार्योपदेशम् अनुध्यायन् इति एतत्॥ 8॥

हिन्दी

हे पार्थ! अभ्यासयोगयुक्त अनन्यगामी चित्तद्वारा, अर्थात् चित्तसमर्पणके आश्रयभूत मुझ एक परमात्मामें ही विजातीय प्रतीतियोंके व्यवधानसे रहित तुल्य प्रतीतिकी आवृत्तिका नाम “अभ्यास” है, वह अभ्यास ही योग है, ऐसे अभ्यासरूप योगसे युक्त, उस एक ही आलम्बनमें लगा हुआ, विषयान्तरमें न जानेवाला जो योगीका चित्त है उस चित्तद्वारा, शास्त्र और आचार्यके उपदेशानुसार चिन्तन करता हुआ योगी परम निरतिशय—दिव्य पुरुषको—जो आकाशस्थ सूर्यमण्डलमें परम पुरुष है—उसको प्राप्त होता है॥ 8॥

9
कविं पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः। सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्॥ 9॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

किं विशिष्टं च पुरुषं याति, इति उच्यते—

हिन्दी

किन लक्षणोंसे युक्त परम पुरुषको (योगी) प्राप्त होता है? इसपर कहते हैं—

भाष्य
संस्कृत

कविं क्रान्तदर्शिनं सर्वज्ञं पुराणं चिरन्तनम् अनुशासितारं सर्वस्य जगतः प्रशासितारम् अणोः सूक्ष्माद् अपि अणीयांसं सूक्ष्मतरम् अनुस्मरेद् अनुचिन्तयेद् यः कश्चित् सर्वस्य कर्मफलजातस्य धातारं विचित्रतया प्राणिभ्यो विभक्तारं विभज्य दातारम् अचिन्त्यरूपं न अस्य रूपं नियतं विद्यमानम् अपि केनचित् चिन्तयितुं शक्यते इति अचिन्त्यरूपः तम् आदित्यवर्णम् आदित्यस्य इव नित्यचैतन्यप्रकाशो वर्णो यस्य तम् आदित्यवर्णं तमसः परस्ताद् अज्ञानलक्षणाद् मोहान्धकारात् परम्।

तम् अनुचिन्तयन् याति इति पूर्वेण एव सम्बन्धः॥ 9॥

हिन्दी

जो पुरुष भूत, भविष्यत् और वर्तमानको जाननेवाले—सर्वज्ञ, पुरातन, सम्पूर्ण संसारके शासक और अणुसे भी अणु यानी सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर परमात्माका, जो कि सम्पूर्ण कर्मफलका विधायक अर्थात् विचित्ररूपसे विभाग करके सब प्राणियोंको उनके कर्मोंका फल देनेवाला है तथा अचिन्त्यस्वरूप अर्थात् जिसका स्वरूप नियत और विद्यमान होते हुए भी किसीके द्वारा चिन्तन न किया जा सके ऐसा है एवं सूर्यके समान वर्णवाला अर्थात् सूर्यके समान नित्य चेतन प्रकाशमय वर्णवाला है और अज्ञानरूप मोहमय अन्धकारसे सर्वथा अतीत है, उसका बारम्बार स्मरण करता है।

(वह) उसका स्मरण करता हुआ उसीको प्राप्त होता है, इस प्रकार पूर्वश्लोकसे सम्बन्ध है॥ 9॥

10
प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव। भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्॥ 10॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

किं च—

हिन्दी

तथा—

भाष्य
संस्कृत

प्रयाणकाले मरणकाले मनसा अचलेन चलनवर्जितेन भक्त्या युक्तो भजनं भक्तिः तया युक्तो योगबलेन च एव योगस्य बले योगबलं तेन

समाधिजसंस्कारप्रचयजनितचित्तस्थैर्य-लक्षणं योगबलं तेन च युक्त इत्यर्थः। पूर्वं हृदयपुण्डरीके वशीकृत्य चित्तम्, तत ऊर्ध्व-गामिन्या नाड्या भूमिजयक्रमेण भ्रुवोः मध्ये प्राणम् आवेश्य स्थापयित्वा, सम्यग् अप्रमत्तः सन् स एवं बुद्धिमान् योगी “कविं पुराणम्” इत्यादिलक्षणं तं परं पुरुषम् उपैति प्रतिपद्यते दिव्यं द्योतनात्मकम्॥ 10॥

हिन्दी

(जो योगी) अन्त समय—मृत्युकालमें भक्ति और योगबलसे युक्त हुआ—अर्थात् भजनका नाम भक्ति है उससे युक्त हुआ और समाधिजनित संस्कारोंके संग्रहसे उत्पन्न हुई चित्तस्थिरताका नाम योगबल है, उससे भी युक्त हुआ, चञ्चलतारहित—अचल मनसे, पहले हृदय-कमलमें चित्तको स्थिर करके, फिर ऊपरकी ओर जानेवाली नाड़ीद्वारा चित्तकी प्रत्येक भूमिको क्रमसे जय करता हुआ भ्रुकुटिके मध्यमें प्राणोंको स्थापन करके भली प्रकार सावधान हुआ (परमात्मस्वरूपका चिन्तन करता है) वह ऐसा बुद्धिमान् योगी “कविं पुराणम्” इत्यादि लक्षणोंवाले उस दिव्य—चेतनात्मक परम पुरुषको प्राप्त होता है॥ 10॥

11
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः। यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये॥ 11॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

पुनः अपि वक्ष्यमाणेन उपायेन प्रति-पित्सितस्य ब्रह्मणो वेदविद्वदनादिविशेषण-विशेष्यस्य अभिधानं करोति भगवान्—

हिन्दी

फिर भी भगवान् आगे बतलाये जानेवाले उपायोंसे प्राप्त होनेयोग्य और “वेदविदो वदन्ति” इत्यादि विशेषणोंद्वारा वर्णन किये जानेयोग्य ब्रह्मका प्रतिपादन करते हैं—

भाष्य
संस्कृत

यद् अक्षरं न क्षरति इति अक्षरम् अविनाशि वेदविदो वेदार्थज्ञा वदन्ति “तद्वा एतदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्ति” (बृह0 उ0 3। 8। 8) इति श्रुतेः। सर्वविशेषनिवर्तकत्वेन अभिवदन्ति “अस्थूलमनणु” (बृह0 उ0 3। 8। 8) इत्यादि।

किं च विशन्ति प्रविशन्ति सम्यग्दर्शनप्राप्तौ सत्यां यद् यतयो यतनशीलाः सन्न्यासिनो वीतरागा विगतो रागो येभ्यः ते वीतरागाः।

यत् च अक्षरम् इच्छन्तो ज्ञातुम् इति वाक्यशेषः। ब्रह्मचर्यं गुरौ चरन्ति।

तत् ते पदं तद् अक्षराख्यं पदं पदनीयं ते तुभ्यं सङ्ग्रहेण सङ्ग्रहः संक्षेपः तेन संक्षेपेण प्रवक्ष्ये कथयिष्यामि॥ 11॥

हिन्दी

“हे गार्गि! ब्राह्मणलोग उसी इस अक्षरका वर्णन किया करते हैं” इस श्रुतिके अनुसार वेदके परम अर्थको जाननेवाले विद्वान् जिस अक्षरका अर्थात् जिसका कभी नाश न हो, ऐसे परमात्माका “वह न स्थूल है, न सूक्ष्म है” इस प्रकार सब विशेषोंका निराकरण करके वर्णन किया करते हैं,

तथा जिनकी आसक्ति नष्ट हो चुकी है, ऐसे वीतराग, यत्नशील संन्यासी यथार्थ ज्ञानकी प्राप्ति हो जानेपर जिसमें प्रविष्ट होते हैं।

एवं जिस अक्षरको जानना* चाहनेवाले (साधक) गुरुकुलमें ब्रह्मचर्यव्रतका पालन किया करते हैं,

वह अक्षरनामक पद अर्थात् प्राप्त करनेयोग्य स्थान मैं तुझे संग्रहसे—संक्षेपसे बतलाता हूँ। संग्रह संक्षेपको कहते हैं॥ 11॥

* “ज्ञातुम्” शब्द मूल श्लोकमें नहीं है, इसको भाष्यकारने वाक्यशेष माना है।
12
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च। मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्॥ 12॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
4 paragraphs · खोलें
संस्कृत

“स यो ह वै तद्भगवन्मनुष्येषु प्रायणान्तमोङ्कार-मभिध्यायीत कतमं वाव स तेन लोकं जयतीति तस्मै स होवाच, एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोङ्कारः” इति उपक्रम्य “यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत” (प्र0 उ0 5। 1-2-5) इत्यादिना वचनेन,

“अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मात्” इति च उपक्रम्य “सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति। यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत्” (क0 उ0 1। 2। 14-15) इत्यादिभिः च वचनैः।

परस्य ब्रह्मणो वाचकरूपेण प्रतिमावत् प्रतीकरूपेण च परब्रह्मप्रतिपत्तिसाधनत्वेन मन्दमध्यमबुद्धीनां विवक्षितस्य ओङ्कारस्य उपासनं कालान्तरे मुक्तिफलम् उक्तं यत्,

तद् एव इह अपि “कविं पुराण-मनुशासितारम्” “यदक्षरं वेदविदो वदन्ति” इति च उपन्यस्तस्य परस्य ब्रह्मणः पूर्वोक्तरूपेण प्रति-पत्त्युपायभूतस्य ओङ्कारस्य कालान्तरमुक्ति-फलम् उपासनम्, योगधारणासहितं वक्तव्यं प्रसक्तानुप्रसक्तं च यत्किञ्चिद् इति एवमर्थ उत्तरो ग्रन्थ आरभ्यते—

हिन्दी

सत्यकामके यह पूछनेपर कि “हे भगवन्! मनुष्योंमेंसे वह जो कि मरणपर्यन्त ओंकारका भली प्रकार ध्यान करता रहता है वह उस साधनसे किस लोकको जीत लेता है? पिप्पलाद ऋषिने कहा कि हे सत्यकाम! यह ओंकार ही निःसंदेह परब्रह्म है और यही अपर ब्रह्म भी है।” इस प्रकार प्रसङ्ग आरम्भ करके फिर “जो कोई इस तीन मात्रावाले”ओम्” इस अक्षरद्वारा परम पुरुषकी उपासना करता रहता है।” इत्यादि वचनोंसे (प्रश्नोपनिषद्में),

तथा “जो धर्मसे विलक्षण है और अधर्मसे भी विलक्षण है” इस प्रकार प्रसङ्ग आरम्भ करके फिर “समस्त वेद जिस परमपदका वर्णन कर रहे हैं, समस्त तप जिसको बतला रहे हैं तथा जिस परमपदको चाहनेवाले ब्रह्मचर्यका पालन किया करते हैं, वह परमपद संक्षेपसे तुझे बतलाऊँगा; वह है “ओम्” ऐसा यह (एक अक्षर)।” इत्यादि वचनोंसे (कठोपनिषद्में)।

परब्रह्मका वाचक होनेसे एवं प्रतिमाकी भाँति उसका प्रतीक (चिह्न) होनेसे मन्द और मध्यम बुद्धिवाले साधकोंके लिये जो परब्रह्म-परमात्माकी प्राप्तिका साधनरूप माना गया है उस ओंकारकी कालान्तरमें मुक्तिरूप फल देनेवाली जो उपासना बतलायी गयी है,

यहाँ भी “कविं पुराणमनुशासितारम्” “यदक्षरं वेदविदो वदन्ति” इस प्रकार प्रतिपादन किये हुए परब्रह्मकी प्राप्तिका पूर्वोक्तरूपसे उपायभूत जो ओंकार है, उसकी कालान्तरमें मुक्तिरूप फल देनेवाली वही उपासना, योगधारणासहित कहनी है तथा उसके प्रसङ्ग और अनुप्रसङ्गमें आनेवाली बातें भी कहनी हैं। इसलिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है—

भाष्य
संस्कृत

सर्वद्वाराणि सर्वाणि च तानि द्वाराणि च सर्वद्वाराणि उपलब्धौ तानि सर्वाणि संयम्य संयमनं कृत्वा, मनो हृदि हृदयपुण्डरीके निरुध्य निरोधं कृत्वा निष्प्रचारम् आपाद्य, तत्र वशी-कृतेन मनसा हृदयाद् ऊर्ध्वगामिन्या नाड्या ऊर्ध्वम् आरह्य मूर्ध्नि आधाय आत्मनः प्राणम् आस्थितः प्रवृत्तो योगधारणां धारयितुम्॥ 12॥

हिन्दी

समस्त द्वारोंका अर्थात् विषयोंकी उपलब्धिके द्वाररूप जो समस्त इन्द्रियगोलक हैं उन सबका संयम करके एवं मनको हृदयकमलमें निरुद्ध करके अर्थात् संकल्प-विकल्पसे रहित करके, फिर वशमें किये हुए मनके सहारेसे हृदयसे ऊपर जानेवाली नाडीद्वारा ऊपर चढ़कर अपने प्राणोंको मस्तकमें स्थापन करके योगधारणाको धारण करनेके लिये प्रवृत्त हुआ साधक (परमगतिको प्राप्त होता है, इस प्रकार अगले श्लोकसे सम्बन्ध है)॥ 12॥

13
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्। यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्॥ 13॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

तत्र एव च धारयन्—

हिन्दी

उसी जगह (प्राणोंको) स्थिर रखते हुए—

भाष्य
संस्कृत

ओम् इति एकाक्षरं ब्रह्म ब्रह्मणः अभि-धानभूतम्

ओङ्कारं

व्याहरन्

उच्चारयन् तदर्थभूतं माम् ईश्वरम् अनुस्मरन् अनुचिन्तयन् यः प्रयाति म्रियते,

स त्यजन् परित्यजन् देहं शरीरं त्यजन् देहम् इति प्रयाणविशेषणार्थं देहत्यागेन प्रयाणम् आत्मनो न स्वरूपनाशेन इत्यर्थः। स एवं त्यजन् याति गच्छति परमां प्रकृष्टां गतिम्॥ 13॥

हिन्दी

“ओम्” इस एक अक्षररूप ब्रह्मका अर्थात् ब्रह्मके स्वरूपका लक्ष्य करानेवाले ओंकारका उच्चारण करता हुआ और उसके अर्थरूप मुझ ईश्वरका चिन्तन करता हुआ जो पुरुष शरीरको छोड़कर जाता है अर्थात् मरता है,

वह इस प्रकार शरीरको छोड़कर जानेवाला परम गतिको पाता है। यहाँ “त्यजन्देहम्” यह विशेषण “मरण” का लक्ष्य करानेके लिये है। अभिप्राय यह कि देहके त्यागसे ही आत्माका मरण है, स्वरूपके नाशसे नहीं॥ 13॥

14
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः। तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥ 14॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

किं च—

हिन्दी

तथा—

भाष्य
संस्कृत

अनन्यचेता न अन्यविषये चेतो यस्य सः अयम् अनन्यचेता योगी सततं सर्वदा यो मां परमेश्वरं स्मरति नित्यशः।

सततम् इति नैरन्तर्यम् उच्यते। नित्यश इति दीर्घकालत्वम् उच्यते। न षण्मासं संवत्सरं वा किं तर्हि यावज्जीवं नैरन्तर्येण यो मां स्मरति इत्यर्थः।

तस्य योगिनः अहं सुलभः सुखेन लभ्यः पार्थ नित्ययुक्तस्य सदा समाहितस्य योगिनः यत एवम् अतः अनन्यचेताः सन् मयि सदा समाहितो भवेत्॥ 14॥

हिन्दी

अनन्यचित्तवाला अर्थात् जिसका चित्त अन्य किसी भी विषयका चिन्तन नहीं करता, ऐसा जो योगी सर्वदा निरन्तर प्रतिदिन मुझ परमेश्वरका स्मरण किया करता है।

यहाँ “सततम्” इस शब्दसे निरन्तरताका कथन है और “नित्यशः” इस शब्दसे दीर्घकालका कथन है, अतः यह समझना चाहिये कि छः महीने या एक वर्ष ही नहीं किंतु जीवनपर्यन्त जो निरन्तर मेरा स्मरण करता है।

हे पार्थ! उस नित्य-समाधिस्थ योगीके लिये मैं सुलभ हूँ। अर्थात् उसको मैं अनायास प्राप्त हो जाता हूँ। जब कि यह बात है, इसलिये (मनुष्यको) अनन्य चित्तवाला होकर सदा ही मुझमें समाहितचित्त रहना चाहिये॥ 14॥

15
मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्। नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः॥ 15॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

तव सौलभ्येन किं स्यात्, इति उच्यते शृणु तद् मम सौलभ्येन यद् भवति—

हिन्दी

आपके सुलभ हो जानेसे क्या होगा? इसपर कहते हैं कि मेरी सुलभ प्राप्तिसे जो होता है, वह सुन—

भाष्य
संस्कृत

माम् उपेत्य माम् ईश्वरम् उपेत्य मद्भावम् आपाद्य पुनर्जन्म पुनरुत्पत्तिं न प्राप्नुवन्ति।

किंविशिष्टं पुनर्जन्म न प्राप्नुवन्ति इति तद्विशेषणम् आह—

दुःखालयं दुःखानाम् आध्यात्मिकादीनाम् आलयम् आश्रयम् आलीयन्ते यस्मिन् दुःखानि इति दुःखालयं जन्म। न केवल दुःखालयम् अशाश्वतम् अनवस्थितस्वरूपं च न आप्नुवन्ति ईदृशं पुनर्जन्म महात्मानो यतयः संसिद्धिं मोक्षाख्यां परमां प्रकृष्टां गताः प्राप्ताः। ये पुनः मां न प्राप्नुवन्ति ते पुनः आवर्तन्ते॥ 15॥

हिन्दी

मुझ ईश्वरको पाकर अर्थात् मेरे भावको प्राप्त करके फिर (वे महापुरुष) पुनर्जन्मको नहीं पाते।

किस प्रकारके पुनर्जन्मको नहीं पाते, यह स्पष्ट करनेके लिये उसके विशेषण बतलाते हैं—

आध्यात्मिक आदि तीनों प्रकारके दुःखोंका जो स्थान—आधार है अर्थात् समस्त दुःख जिसमें रहते हैं, केवल दुःखोंका स्थान ही नहीं जो अशाश्वत भी है अर्थात् जिसका स्वरूप स्थिर नहीं है, ऐसे पुनर्जन्मको मोक्षरूप परम श्रेष्ठ सिद्धिको प्राप्त हुए महात्मा—संन्यासीगण नहीं पाते। परंतु जो मुझे प्राप्त नहीं होते वे फिर संसारमें आते हैं॥ 15॥

16
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन। मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते॥ 16॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

किं पुनः त्वत्तः अन्यत् प्राप्ताः पुनः आवर्तन्ते इति उच्यते—

हिन्दी

तो क्या आपके सिवा अन्य स्थानको प्राप्त होनेवाले पुरुष फिर संसारमें आते हैं? इसपर कहा जाता है—

भाष्य
संस्कृत

आब्रह्मभुवनाद् भवन्ति यस्मिन् भूतानि इति भुवनं ब्रह्मभुवनं ब्रह्मलोक इत्यर्थः।

आब्रह्मभुवनात् सह ब्रह्मभुवनेन लोकाः सर्वे पुनरावर्तिनः पुनरावर्तनस्वभावा हे अर्जुन। माम् एकम् उपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म पुनरुत्पत्तिः न विद्यते॥ 16॥

हिन्दी

जिसमें प्राणी उत्पन्न होते और निवास करते हैं उसका नाम भुवन है, ब्रह्मलोक ब्रह्मभुवन कहलाता है।

हे अर्जुन! ब्रह्मलोकपर्यन्त अर्थात् ब्रह्मलोकसहित समस्त लोक पुनरावर्ती हैं अर्थात् जिनमें जाकर फिर संसारमें जन्म लेना पड़े, ऐसे हैं। परंतु हे कुन्तीपुत्र! केवल एक मुझे प्राप्त होनेपर फिर पुनर्जन्म—पुनरुत्पत्ति नहीं होती॥ 16॥

17
सहस्त्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः। रात्रिं युगसहस्त्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः॥ 17॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

ब्रह्मलोकसहिता

लोकाः

कस्मात् पुनरावर्तिनः, कालपरिच्छिन्नत्वात्, कथम्—

हिन्दी

ब्रह्मलोकसहित समस्त लोक पुनरावर्ती किस कारणसे हैं? कालसे परिच्छिन्न हैं इसलिये; कालसे परिच्छिन्न कैसे हैं?—

भाष्य
संस्कृत

सहस्त्रयुगपर्यन्तं सहस्त्रं युगानि पर्यन्तः पर्यव-सानं यस्य अह्नः तद् अहः सहस्त्रयुगपर्यन्तं ब्रह्मणः प्रजापतेः विराजो विदुः।

रात्रिम् अपि युगसहस्त्रान्ताम् अहःपरिमाणाम् एव।

के विदुः इति आह—

ते अहोरात्रविदः कालसङ्ख्याविदो जना इत्यर्थः। यत एवं कालपरिच्छिन्नाः ते अतः पुनरावर्तिनो लोकाः॥ 17॥

हिन्दी

ब्रह्मा—प्रजापति अर्थात् विराट्के एक दिनको, एक सहस्त्रयुगकी अवधिवाला अर्थात् जिसका एक सहस्त्रयुगमें अन्त हो, ऐसा समझते हैं।

तथा ब्रह्माकी रात्रिको भी सहस्त्रयुगकी अवधिवाली अर्थात् दिनके बराबर ही समझते हैं।

ऐसा कौन समझते हैं? सो कहते हैं—

वे दिन और रातके तत्त्वको जाननेवाले, अर्थात् कालके परिमाणको जाननेवाले योगीजन ऐसा जानते हैं। इस प्रकार कालसे परिच्छिन्न होनेके कारण वे सभी लोक पुनरावृत्तिवाले हैं॥ 17॥

18
अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे। रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्ज्ञके॥ 18॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

प्रजापतेः अहनि यद् भवति रात्रौ च तद् उच्यते—

हिन्दी

प्रजापतिके दिनमें और रात्रिमें जो कुछ होता है उसका वर्णन किया जाता है—

भाष्य
संस्कृत

अव्यक्ताद् अव्यक्तं प्रजापतेः स्वापावस्था तस्माद् अव्यक्ताद् व्यक्तयो व्यज्यन्ते इति व्यक्तयः स्थावरजङ्गमलक्षणाः सर्वाः प्रजाः प्रभवन्ति अभिव्यज्यन्ते, अह्न आगमः अहरागमः तस्मिन् अहरागमे काले ब्रह्मणः प्रबोधकाले।

तथा रात्र्यागमे ब्रह्मणः स्वापकाले प्रलीयन्ते सर्वा व्यक्तयः तत्र एव पूर्वोक्ते अव्यक्त-सञ्ज्ञके॥ 18॥

हिन्दी

दिनके आरम्भकालका नाम “अहरागम” है, ब्रह्माके दिनके आरम्भकालमें अर्थात् ब्रह्माके प्रबोधकालमें अव्यक्तसे—प्रजापतिकी निद्रावस्थासे समस्त व्यक्तियाँ— स्थावर-जङ्गमरूप समस्त प्रजाएँ उत्पन्न होती हैं— प्रकट होती हैं। जो व्यक्त—प्रकट होती है, उसका नाम व्यक्ति है।

तथा रात्रिके आनेपर—ब्रह्माके शयन करनेके समय उस पूर्वोक्त अव्यक्त नामक प्रजापतिकी निद्रावस्थामें ही समस्त प्राणी लीन हो जाते हैं॥ 18॥

19
भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते। रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे॥ 19॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

अकृताभ्यागमकृतविप्रणाशदोषपरिहारार्थम्, बन्धमोक्षशास्त्रप्रवृत्तिसाफल्यप्रदर्शनार्थम् अविद्यादि-क्लेशमूलकर्माशयवशात् च अवशो भूतग्रामो भूत्वा भूत्वा प्रलीयते इति अतः संसारे वैराग्यप्रदर्शनार्थं च इदम् आह—

हिन्दी

न किये कर्मोंका फल मिलना और किये हुए कर्मोंका फल न मिलना, इस दोषका परिहार करनेके लिये, बन्धन और मुक्तिका मार्ग बतलानेवाले शास्त्रवाक्योंकी सफलता दिखानेके लिये और “अविद्यादि पञ्च-क्लेशमूलक कर्मसंस्कारोंके वशमें पड़कर पराधीन हुआ प्राणी-समुदाय बारंबार उत्पन्न हो-होकर लय हो जाता है”—इस प्रकारके कथनसे संसारमें वैराग्य दिखलानेके लिये यह कहते हैं—

भाष्य
संस्कृत

भूतग्रामो भूतसमुदायः स्थावरजङ्गमलक्षणो यः पूर्वस्मिन् कल्पे आसीत् स एव अयं न अन्यो भूत्वा भूत्वा अहरागमे प्रलीयते पुनः पुनः रात्र्यागमे अह्नः क्षये अवशः अस्वतन्त्र एव पार्थ, प्रभवति अवश एव अहरागमे॥ 19॥

हिन्दी

जो पहले कल्पमें था, वही—दूसरा नहीं—यह स्थावर-जङ्गमरूप भूतोंका समुदाय ब्रह्माके दिनके आरम्भमें, बारंबार उत्पन्न हो-होकर दिनकी समाप्ति और रात्रिका प्रवेश होनेपर पराधीन हुआ ही बारंबार लय होता जाता है और फिर उसी प्रकार विवश होकर दिनके प्रवेशकालमें पुनः उत्पन्न होता जाता है॥ 19॥

20
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः। यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति॥ 20॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

यद् उपन्यस्तम् अक्षरं तस्य प्राप्त्युपायो निर्दिष्टः “ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म” इत्यादिना। अथ इदानीम् अक्षरस्य एव स्वरूपनिर्दिदिक्षया इदम् उच्यते अनेन योगमार्गेण इदं गन्तव्यम् इति—

हिन्दी

जिस अक्षरका पहले प्रतिपादन किया था उसकी प्राप्तिका उपाय “ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म” इत्यादि कथनसे बतला दिया। अब उसी अक्षरके स्वरूपका निर्देश करनेकी इच्छासे यह बतलाया जाता है कि “इस योगमार्गद्वारा अमुक वस्तु मिलती है”—

भाष्य
संस्कृत

परो व्यतिरिक्तो भिन्नः। कुतः तस्मात् पूर्वोक्तात्। तु शब्दः अक्षरस्य विवक्षितस्य अव्यक्ताद् वैलक्षण्यप्रदर्शनार्थः। भावः अक्षराख्यं परं ब्रह्म।

व्यतिरिक्तत्वे सति अपि सालक्षण्यप्रसङ्गः अस्ति इति तद्विनिवृत्त्यर्थम् आह—अन्य इति। अन्यो विलक्षणः स च अव्यक्तः अनिन्द्रय-गोचरः।

परः तस्माद् इति उक्तम्, कस्मात् पुनः परः,

पूर्वोक्ताद् भूतग्रामबीजभूताद् अविद्या-लक्षणाद् अव्यक्तात्। सनातनः चिरन्तनः यः स भावः सर्वेषु भूतेषु ब्रह्मादिषु नश्यत्सु न विनश्यति॥ 20॥

हिन्दी

“तु” शब्द यहाँ आगे वर्णन किये जानेवाले अक्षरकी उस पूर्वोक्त अव्यक्तसे विलक्षणता दिखलानेके लिये है। (वह अव्यक्त) भाव यानी अक्षरनामक परब्रह्म परमात्मा अत्यन्त भिन्न है। किससे? उस पहले कहे हुए अव्यक्तसे।

भिन्न होनेपर भी किसी प्रकार समानता हो सकती है? इस शंकाकी निवृत्तिके लिये कहते हैं कि वह इन्द्रियोंसे प्रत्यक्ष न होनेवाला अव्यक्तभाव अन्य— दूसरा है अर्थात् सर्वथा विलक्षण है।

उससे पर है ऐसा कहा, सो किससे पर है?

वह उस पूर्वोक्त भूत-समुदायके बीजभूत अविद्यारूप अव्यक्तसे परे है। ऐसा जो सनातन भाव अर्थात् सदासे होनेवाला भाव है, वह ब्रह्मादि समस्त प्राणियोंका नाश होनेपर भी नष्ट नहीं होता॥ 20॥

21
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्। यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥ 21॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
भाष्य
संस्कृत

यः असौ अव्यक्तः अक्षर इति उक्तः तम् एव अक्षरसञ्ज्ञकम् अव्यक्तं भावम् आहुः परमां प्रकृष्टां गतिम्। यं भावं प्राप्य गत्वा न निवर्तन्ते संसाराय तद् धाम स्थानं परम प्रकृष्टं मम विष्णोः परमं पदम् इत्यर्थः॥ 21॥

हिन्दी

जो वह “अव्यक्त” “अक्षर” ऐसे कहा गया है उसी अक्षर नामक अव्यक्तभावको परम—श्रेष्ठ गति कहते हैं। जिस परम भावको प्राप्त होकर (मनुष्य) फिर संसारमें नहीं लौटते, वह मेरा परम श्रेष्ठ स्थान है अर्थात् मुझ विष्णुका परमपद है॥ 21॥

22
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया। यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्॥ 22॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

तल्लब्धेः उपाय उच्यते—

हिन्दी

उस परमधामकी प्राप्तिका उपाय बतलाया जाता है—

भाष्य
संस्कृत

पुरुषः पुरि शयनात् पूर्णत्वाद् वा स परः पार्थ परो निरतिशयो यस्मात् पुरुषाद् न परं किञ्चित् स भक्त्या लभ्यः तु ज्ञानलक्षणया अनन्यया

आत्मविषयया—यस्य

पुरुषस्य अन्तःस्थानि मध्यस्थानि कार्यभूतानि भूतानि। कार्यं हि कारणस्य अन्तर्वर्ति भवति। येन पुरुषेण सर्वम् इदं जगत् ततं व्याप्तम् आकाशेन इव घटादि॥ 22॥

हिन्दी

शरीररूप पुरमें शयन करनेसे या सर्वत्र परिपूर्ण होनेसे परमात्माका नाम पुरुष है। हे पार्थ! वह निरतिशय परमपुरुष, जिससे पर (सूक्ष्म-श्रेष्ठ) अन्य कुछ भी नहीं है, जिस पुरुषके अन्तर्गत समस्त कार्यरूप भूत स्थित हैं—क्योंकि कार्य कारणके अन्तर्वर्ती हुआ करता है—और जिस पुरुषसे यह सारा संसार आकाशसे घट आदिकी भाँति व्याप्त है। ऐसा परमात्मा, अनन्य भक्तिसे अर्थात् आत्मविषयक ज्ञानरूप भक्तिसे प्राप्त होने योग्य है॥ 22॥

23
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः। प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ॥ 23॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

प्रकृतानां योगिनां प्रणवावेशितब्रह्मबुद्धीनां कालान्तरमुक्तिभाजां ब्रह्मप्रतिपत्तये उत्तरो मार्गो वक्तव्य इति यत्र काले इत्यादि विवक्षितार्थसमर्पणार्थम् उच्यते। आवृत्ति-मार्गोपन्यास इतरमार्गस्तुत्यर्थः—

हिन्दी

जिन्होंने ओंकारमें ब्रह्मबुद्धि सम्पादन की है, जिन्हें कालान्तरमें मुक्ति मिलनेवाली है तथा यहाँ जिनका प्रकरण चल रहा है, उन योगियोंकी ब्रह्मप्राप्तिके लिये आगेका मार्ग बताना चाहिये। अतः विवक्षित अर्थको बतलानेके लिये ही “यत्र काले” इत्यादि अगले श्लोक कहे जाते हैं। यहाँ पुनरावर्ती मार्गका वर्णन दूसरे मार्गकी स्तुति करनेके लिये किया गया है—

भाष्य
संस्कृत

यत्र काले प्रयाता इति व्यवहितेन सम्बन्धः।

यत्र यस्मिन् काले तु अनावृत्तिम् अपुनर्जन्म आवृत्तिं तद्विपरीतां च एव। योगिन इति योगिनः कर्मिणः च उच्यन्ते। कर्मिणः तु गुणतः “कर्मयोगेन योगिनाम्” इति विशेषणाद् योगिनः।

यत्र काले प्रयाता मृता योगिनः अनावृत्तिं यान्ति यत्र काले च प्रयाता आवृत्तिं यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ॥ 23॥

हिन्दी

“यत्र काले” इस पदका व्यवधानयुक्त “प्रयाताः” इस अगले पदसे सम्बन्ध है।

जिस कालमें अनावृत्तिको—अपुनर्जन्मको और जिस कालमें आवृत्तिको—उससे विपरीत पुनर्जन्मको योगी लोग पाते हैं। “योगिनः” इस पदसे कर्म करनेवाले कर्मी लोग भी योगी कहे गये हैं; क्योंकि “कर्मयोगेन योगिनाम्” इस विशेषणसे कर्मी भी किसी गुणविशेषसे योगी हैं।

तात्पर्य यह है कि हे अर्जुन! जिस कालमें मरे हुए योगी लोग पुनर्जन्मको नहीं पाते और जिस कालमें मरे हुए लोग पुनर्जन्म पाते हैं मैं अब उस कालका वर्णन करता हूँ॥ 23॥

24
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्। तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः॥ 24॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
भाष्य
संस्कृत

अग्निः कालाभिमानिनी देवता तथा ज्योतिः देवता एव कालाभिमानिनी। अथवा अग्निज्योतिषी यथाश्रुते एव देवते।

भूयसां तु निर्देशो “यत्र काले” “तं कालम्” इति आम्रवणवत्।

तथा अहर्देवता अहः शुक्लः शुक्ल-पक्षदेवता षण्मासा उत्तरायणं तत्र अपि देवता एव मार्गभूता इति स्थितः अन्यत्र न्यायः तत्र तस्मिन् मार्गे प्रयाता मृता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो ब्रह्मोपासनपरा जनाः। क्रमेण इति वाक्यशेषः।

न हि सद्योमुक्तिभाजां सम्यग्दर्शननिष्ठानां गतिः आगतिः वा क्वचिद् अस्ति “न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति” इति श्रुतेः ब्रह्मसंलीनप्राणा एव ते ब्रह्ममया ब्रह्मभूता एव ते॥ 24॥

हिन्दी

यहाँ अग्नि कालाभिमानी देवताका वाचक है तथा ज्योति भी कालाभिमानी देवताका ही वाचक है, अथवा अग्नि और ज्योति नामवाले दोनों प्रसिद्ध वैदिक देवता ही हैं।

जिस वनमें आमके पेड़ अधिक होते हैं उसको जैसे आमका वन कहते हैं, उसी प्रकार यहाँ कालाभिमानी देवताओंका वर्णन अधिक होनेसे “यत्र काले” “तं कालम्” इत्यादि कालवाचक शब्दोंका प्रयोग किया गया है।

(अभिप्राय यह कि जिस मार्गमें अग्निदेवता, ज्योतिदेवता,) दिनका देवता, शुक्ल-पक्षका देवता और उत्तरायणके छः महीनोंका देवता है उस मार्गमें (अर्थात् उपर्युक्त देवताओंके अधिकारमें) मरकर गये हुए ब्रह्मवेत्ता यानी ब्रह्मकी उपासनामें तत्पर हुए पुरुष क्रमसे ब्रह्मको प्राप्त होते हैं। यहाँ उत्तरायण मार्ग भी देवताका ही वाचक है; क्योंकि अन्यत्र (ब्रह्मसूत्रमें) भी यही न्याय माना गया है।

जो पूर्ण ज्ञाननिष्ठ सद्योमुक्तिके पात्र होते हैं उनका आना-जाना कहीं नहीं होता! श्रुति भी कहती है, “उसके प्राण निकलकर कहीं नहीं जाते।” वे तो “ब्रह्मसंलीनप्राण” अर्थात् ब्रह्ममय—ब्रह्मरूप ही हैं॥ 24॥

25
धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम्। तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते॥ 25॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
भाष्य
संस्कृत

धूमो रात्रिः धूमाभिमानिनी रात्र्यभिमानिनी च देवता। तथा कृष्णः कृष्णपक्षदेवता। षण्मासा दक्षिणायनम् इति च पूर्ववद् देवता एव। तत्र चन्द्रमसि भवं चान्द्रमसं ज्योतिः फलम् इष्टादिकारी योगी कर्मी प्राप्य भुक्त्वा तत्क्षयाद् निवर्तते॥ 25॥

हिन्दी

जिस मार्गमें धूम और रात्रि है अर्थात् धूमाभिमानी और रात्रि-अभिमानी देवता हैं तथा कृष्णपक्ष अर्थात् कृष्णपक्षका देवता है एवं दक्षिणायनके छः महीने हैं अर्थात् पूर्ववत् दक्षिणायन मार्गाभिमानी देवता है, उस मार्गमें (उन उपर्युक्त देवताओंके अधिकारमें मरकर) गया हुआ योगी अर्थात् इष्ट-पूर्त आदि कर्म करनेवाला कर्मी, चन्द्रमाकी ज्योतिको अर्थात् कर्मफलको प्राप्त होकर—भोगकर उस कर्मफलका क्षय होनेपर लौट आता है॥ 25॥

26
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते। एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः॥ 26॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
भाष्य
संस्कृत

शुक्लकृष्णे शुक्ला च कृष्णा च शुक्लकृष्णे। ज्ञानप्रकाशकत्वात्

शुक्ला

तदभावात् कृष्णा। एते शुक्लकृष्णे हि गती जगत इति अधिकृतानां ज्ञानकर्मणोः न जगतः सर्वस्य एव एते गती सम्भवतः शाश्वते नित्ये संसारस्य नित्यत्वाद् मते अभिप्रेते।

तत्र एकया शुक्लया याति अनावृत्तिम् अन्यया इतरया आवर्तते पुनः भूयः॥ 26॥

हिन्दी

शुक्ल और कृष्ण—ये दो मार्ग, अर्थात् जिसमें ज्ञानका प्रकाश है वह शुक्ल और जिसमें उसका अभाव है वह कृष्ण—ऐसे ये दोनों मार्ग जगत्के लिये नित्य— सदासे माने गये हैं; क्योंकि जगत् नित्य है। यहाँ जगत्-शब्दसे जो ज्ञानी और कर्मी उपर्युक्त गतिके अधिकारी हैं उन्हींको समझना चाहिये, क्योंकि सारे संसारके लिये यह गति सम्भव नहीं है।

उन दोनों मार्गोंमेंसे एक—शुक्लमार्गसे गया हुआ तो फिर लौटता नहीं है और दूसरे मार्गसे गया हुआ लौट आता है॥ 26॥

27
नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन। तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन॥ 27॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
भाष्य
संस्कृत

न एते यथोक्ते सृती मार्गौ पार्थ जानन् संसाराय एका अन्या मोक्षाय च इति योगी न मुह्यति कश्चन कश्चिद् अपि। तस्मात् सर्वेषु कालेषु योगयुक्तः समाहितो भव अर्जुन॥ 27॥

हिन्दी

हे पार्थ! इन उपर्युक्त दोनों मार्गोंको इस प्रकार जाननेवाला कि “एक पुनर्जन्मरूप संसारको देनेवाला है और दूसरा मोक्षका कारण है” कोई भी योगी मोहित नहीं होता। इसलिये हे अर्जुन! तू सब समय योगयुक्त हो अर्थात् समाधिस्थ हो॥ 27॥

28
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्। अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥ 28॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

शृणु योगस्य माहात्म्यम्—

हिन्दी

योगका माहात्म्य सुन—

भाष्य
संस्कृत

वेदेषु सम्यग् अधीतेषु यज्ञेषु च साद्गुण्येन अनुष्ठितेषु तपःसु च सुतप्तेषु दानेषु च सम्यग् दत्तेषु यद् एतेषु पुण्यफलं पुण्यस्य फलं पुण्यफलं प्रदिष्टं शास्त्रेण अत्येति अतीत्य गच्छति तत् सर्वं फलजातम् इदं विदित्वा सप्तप्रश्ननिर्णयद्वारेण उक्तं सम्यग् अवधार्य अनुष्ठाय योगी, परं प्रकृष्टम् ऐश्वरं स्थानम् उपैति प्रतिपद्यते, आद्यम् आदौ भवं कारणं ब्रह्म इत्यर्थः॥ 28॥

हिन्दी

इनको जानकर अर्थात् इन सात प्रश्नोंके निर्णयद्वारा कहे हुए रहस्यको यथार्थ समझकर और उसका अनुष्ठान करके योगी पुरुष, भलीभाँति पढ़े हुए वेद, श्रेष्ठ गुणोंसहित सम्पादन किये हुए यज्ञ, भली प्रकार किये हुए तप और यथार्थ पात्रको दिये हुए दान इन सबका शास्त्रोंने जो पुण्य-फल बतलाया है उस सबको अतिक्रम कर जाता है और आदिमें होनेवाले सबके कारणरूप परम श्रेष्ठ ऐश्वर-पदको अर्थात् ब्रह्मको पा लेता है॥ 28॥

8.1–2श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्य