ग्रन्थ
8अक्षरब्रह्मयोग

अक्षरब्रह्मयोग

Akshara-Brahma-Yoga
The Imperishable Brahman
28 verses · 27 printed blockspp. 377412 · Srimad Bhagavad Gita — Tattva-Vivechaniसाधारण भाषाटीका 27 · साधक-संजीवनी 26 · श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्य 27 · श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीका 27
1अर्जुन
अर्जुन उवाच किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम। अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥ 1॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
अर्जुनने कहा—हे पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत नामसे क्या कहा गया है और अधिदैव किसको कहते हैं॥ 1॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—सातवें अध्यायमें पहलेसे तीसरे श्लोकतक भगवान्ने अपने समग्ररूपका तत्त्व सुननेके लिये अर्जुनको सावधान करते हुए, उसके कहनेकी प्रतिज्ञा और जाननेवालोंकी प्रशंसा की। फिर सत्ताईसवें श्लोकतक अनेक प्रकारसे उस तत्त्वको समझाकर न जाननेके कारणको भी भलीभाँति समझाया और अन्तमें ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञके सहित भगवान्के समग्ररूपको जाननेवाले भक्तकी महिमाका वर्णन करते हुए उस अध्यायका उपसंहार किया। उनतीसवें और तीसवें श्लोकोंमें वर्णित ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ—इन छहोंका तथा प्रयाणकालमें भगवान्को जाननेकी बातका रहस्य भलीभाँति न समझनेके कारण इस आठवें अध्यायके आरम्भमें पहले दो श्लोकोंमें अर्जुन उपर्युक्त सातों विषयोंको समझनेके लिये भगवान्से सात प्रश्न करते हैं—

2
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन। प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः॥.2॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे मधुसूदन! यहाँ अधियज्ञ कौन है? और वह इस शरीरमें कैसे है? तथा युक्तचित्तवाले पुरुषोंद्वारा अन्त समयमें आप किस प्रकार जाननेमें आते हैं॥ 2॥
Ed. notethe edition misprints this verse number with a stray point (॥.2॥); kept as printed
3श्रीभगवान्
श्रीभगवान् उवाच
श्रीभगवानुवाच अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते। भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः॥ 3॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
श्रीभगवान्ने कहा—परम अक्षर “ब्रह्म” है, अपना स्वरूप अर्थात् जीवात्मा “अध्यात्म” नामसे कहा जाता है तथा भूतोंके भावको उत्पन्न करनेवाला जो त्याग है, वह “कर्म” नामसे
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अर्जुनके सात प्रश्नोंमेंसे भगवान् अब पहले ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मविषयक तीन प्रश्नोंका उत्तर अगले श्लोकमें क्रमशः संक्षेपसे देते हैं—

(3। 76)
4
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्। अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर॥ 4॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
उत्पत्ति-विनाशधर्मवाले सब पदार्थ अधिभूत हैं, हिरण्यमय पुरुष अधिदैव है और हे देहधारियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! इस शरीरमें मैं वासुदेव ही अन्तर्यामीरूपसे अधियज्ञ हूँ॥ 4॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अब भगवान् अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञविषयक प्रश्नोंका उत्तर क्रमशः देते हैं—

5
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्। यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥ 5॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो पुरुष अन्तकालमें भी मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीरको त्याग कर जाता है, वह मेरे साक्षात् स्वरूपको प्राप्त होता है—इसमें कुछ भी संशय नहीं है॥ 5॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार अर्जुनके छः प्रश्नोंका उत्तर देकर अब भगवान् अन्तकालसम्बन्धी सातवें प्रश्नका उत्तर आरम्भ करते हैं—

6
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥ 6॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! यह मनुष्य अन्तकालमें जिस-जिस भी भावको स्मरण करता हुआ शरीरका त्याग करता है, उस-उसको ही प्राप्त होता है; क्योंकि वह सदा उसी भावसे भावित
सम्बन्ध

सम्बन्ध—यहाँ यह बात कही गयी कि भगवान्का स्मरण करते हुए मरनेवाला भगवान्को ही प्राप्त होता है। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि केवल भगवान्के स्मरणके सम्बन्धमें ही यह विशेष नियम है या सभीके सम्बन्धमें है? इसपर कहते हैं—

7
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च। मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ॥ 7॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
इसलिये हे अर्जुन! तू सब समयमें निरन्तर मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर। इस प्रकार मुझमें अर्पण किये हुए मन-बुद्धिसे युक्त होकर तू निःसन्देह मुझको ही प्राप्त होगा॥ 7॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अन्तकालमें जिसका स्मरण करते हुए मनुष्य मरता है, उसीको प्राप्त होता है; और अन्तकालमें प्रायः उसी भावका स्मरण होता है, जिसका जीवनमें अधिक स्मरण किया जाता है। यह निर्णय हो जानेपर भगवत्प्राप्ति चाहनेवालेके लिये अन्तकालमें भगवान्का स्मरण रखना अत्यन्त आवश्यक हो जाता है और अन्तकाल अचानक ही कब आ जाय, इसका कुछ पता नहीं है; अतएव अब भगवान् निरन्तर भजन करते हुए ही युद्ध करनेके लिये अर्जुनको आदेश करते हैं—

8
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना। परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्॥ 8॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे पार्थ! यह नियम है कि परमेश्वरके ध्यानके अभ्यासरूप योगसे युक्त, दूसरी ओर न जानेवाले चित्तसे निरन्तर चिन्तन करता हुआ मनुष्य परम प्रकाशस्वरूप दिव्य पुरुषको अर्थात्
सम्बन्ध

सम्बन्ध—पाँचवें श्लोकमें भगवान्का चिन्तन करते-करते मरनेवाले मनुष्योंकी गतिका वर्णन करके अर्जुनके सातवें प्रश्नका संक्षेपमें उत्तर दिया गया, अब उसी प्रश्नका विस्तारपूर्वक उत्तर देनेके लिये अभ्यासयोगके द्वारा मनको वशमें करके भगवान्के “अधियज्ञ” रूपका अर्थात् सगुण निराकार दिव्य अव्यक्त रूपका चिन्तन करनेवाले योगियोंकी अन्तकालीन गतिका तीन श्लोकोंद्वारा वर्णन करते हैं—

9
कविं पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः। सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्॥ 9॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो पुरुष सर्वज्ञ, अनादि, सबके नियन्ता, सूक्ष्मसे भी अति सूक्ष्म, सबके धारण-पोषण करनेवाले अचिन्त्यस्वरूप, सूर्यके सदृश नित्य चेतन प्रकाशरूप और अविद्यासे अति परे, शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमेश्वरका स्मरण करता है॥ 9॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—दिव्यपुरुषकी प्राप्ति बतलाकर अब उसका स्वरूप बतलाते हैं—

10
प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव। भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्॥ 10॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
वह भक्तियुक्त पुरुष अन्तकालमें भी योगबलसे भृकुटीके मध्यमें प्राणको अच्छी प्रकार स्थापित करके, फिर निश्चल मनसे स्मरण करता हुआ उस दिव्यस्वरूप परम पुरुष परमात्माको
सम्बन्ध

सम्बन्ध—परम दिव्य पुरुषका स्वरूप बतलाकर अब साधनकी विधि और फल बतलाते हैं—

* श्वेताश्वतरोपनिषद्में इससे मिलता-जुलता मन्त्र है—
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्।
तमेव विदित्वाऽति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥ (3। 8)
“वह पुरुष जो सूर्यके सदृश प्रकाशस्वरूप, महान् और अज्ञानान्धकारसे परे है, इसको मैं जानता हूँ। उसको जानकर
ही अधिकारी मृत्युको लाँघता है। परमात्माकी प्राप्तिके लिये दूसरा मार्ग नहीं है।”
11
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः। यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये॥ 11॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
वेदके जाननेवाले विद्वान् जिस सच्चिदानन्दघनरूप परमपदको अविनाशी कहते हैं, आसक्तिरहित यत्नशील संन्यासी महात्माजन जिसमें प्रवेश करते हैं और जिस परमपदको चाहनेवाले ब्रह्मचारीलोग ब्रह्मचर्यका आचरण करते हैं, उस परम पदको मैं तेरे लिये संक्षेपसे
सम्बन्ध

सम्बन्ध—पाँचवें श्लोकमें भगवान्का चिन्तन करते-करते मरनेवाले साधारण मनुष्यकी गतिका संक्षेपमें वर्णन किया गया, फिर आठवेंसे दसवें श्लोकतक भगवान्के “अधियज्ञ” नामक सगुण निराकार दिव्य अव्यक्त स्वरूपका चिन्तन करनेवाले योगियोंकी अन्तकालीन गतिके सम्बन्धमें बतलाया, अब ग्यारहवें श्लोकसे तेरहवेंतक परम अक्षर निर्गुण निराकार परब्रह्मकी उपासना करनेवाले योगियोंकी अन्तकालीन गतिका वर्णन करनेके लिये पहले उस अक्षर ब्रह्मकी प्रशंसा करके उसे बतलानेकी प्रतिज्ञा करते हैं—

(पू0 खं0 आ0 का0 अ0 238। 6)
* छठे अध्यायके चौदहवें श्लोककी व्याख्या देखनी चाहिये।
12–13Merged
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च। मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्॥ 12॥ ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्। यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्॥ 13॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
सब इन्द्रियोंके द्वारोंको रोककर तथा मनको हृद्देशमें स्थिर करके, फिर उस जीते हुए मनके द्वारा प्राणको मस्तकमें स्थापित करके, परमात्मसम्बन्धी योगधारणामें स्थित होकर जो पुरुष “ॐ” इस एक अक्षररूप ब्रह्मको उच्चारण करता हुआ और उसके अर्थस्वरूप मुझ निर्गुण ब्रह्मका चिन्तन करता हुआ शरीरको त्याग कर जाता है, वह पुरुष परमगतिको
सम्बन्ध

सम्बन्ध—पूर्व श्लोकमें जिस विषयका वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा की थी, अब दो श्लोकोंमें उसीका वर्णन करते हैं—

* कठोपनिषद्में भी इस श्लोकसे मिलता-जुलता मन्त्र आया है—
सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपा ्ँ सि सर्वाणि च यद्वदन्ति।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पद ्ँ संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत्॥
(1। 2। 15)
“सारे वेद जिस पदका वर्णन करते हैं, समस्त तपोंको जिसकी प्राप्तिके साधन बतलाते हैं तथा जिसकी इच्छा रखनेवाले
ब्रह्मचारी ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं, उस पदको मैं तुम्हें संक्षेपसे बताता हूँ—“ओम्” यही वह पद है।”
(1। 2। 16)
(योगदर्शन 1। 27-28)
14
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः। तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥ 14॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे अर्जुन! जो पुरुष मुझमें अनन्यचित्त होकर सदा ही निरन्तर मुझ पुरुषोत्तमको स्मरण करता है, उस नित्य-निरन्तर मुझमें युक्त हुए योगीके लिये मैं सुलभ हूँ, अर्थात् उसे सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ॥ 14॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार निराकार-सगुण परमेश्वरके और निर्गुण-निराकार ब्रह्मके उपासक योगियोंकी अन्तकालीन गतिका प्रकार और फल बतलाया गया; किंतु अन्तकालमें इस प्रकारका साधन वे ही पुरुष कर सकते हैं, जिन्होंने पहलेसे योगका अभ्यास करके मनको अपने आधीन कर लिया है। साधारण मनुष्यके द्वारा अन्तकालमें इस प्रकार सगुण-निराकारका और निर्गुण-निराकारका साधन किया जाना बहुत ही कठिन है, अतएव सुगमतासे परमेश्वरकी प्राप्तिका उपाय जाननेकी इच्छा होनेपर अब भगवान् अपने नित्य-निरन्तर स्मरणको अपनी प्राप्तिका सुगम उपाय बतलाते हैं—

15
मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्। नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः॥ 15॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
परम सिद्धिको प्राप्त महात्माजन मुझको प्राप्त होकर दुःखोंके घर एवं क्षणभंगुर पुनर्जन्मको
सम्बन्ध

सम्बन्ध—भगवान्के नित्य-निरन्तर चिन्तनसे भगवत्प्राप्तिकी सुलभताका प्रतिपादन किया, अब उनके पुनर्जन्म न होनेकी बात कहकर यह दिखलाते हैं कि भगवत्प्राप्त महापुरुषोंका भगवान्से फिर कभी वियोग नहीं होता—

16
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन। मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते॥ 16॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे अर्जुन! ब्रह्मलोकपर्यन्त सब लोक पुनरावर्ती हैं, परंतु हे कुन्तीपुत्र! मुझको प्राप्त होकर पुनर्जन्म नहीं होता; क्योंकि मैं कालातीत हूँ और ये सब ब्रह्मादिके लोक कालके द्वारा सीमित होनेसे अनित्य हैं॥ 16॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—भगवत्प्राप्त महात्मा पुरुषोंका पुनर्जन्म नहीं होता, इस कथनसे यह प्रकट होता है कि दूसरे जीवोंका पुनर्जन्म होता है। अतः यहाँ यह जाननेकी इच्छा होती है कि किस लोकतक पहुँचे हुए जीवोंको वापस लौटना पड़ता है। इसपर भगवान् कहते हैं—

17
सहस्त्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः। रात्रिं युगसहस्त्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः॥ 17॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
ब्रह्माका जो एक दिन है, उसको एक हजार चतुर्युगीतककी अवधिवाला और रात्रिको भी एक हजार चतुर्युगीतककी अवधिवाली जो पुरुष तत्त्वसे जानते हैं, वे योगीजन कालके
सम्बन्ध

सम्बन्ध—ब्रह्मलोकपर्यन्त सब लोकोंको पुनरावर्ती बतलाया, परंतु वे पुनरावर्ती कैसे हैं—इस जिज्ञासापर अब भगवान् ब्रह्माके दिन-रातकी अवधिका वर्णन करके सब लोकोंकी अनित्यता सिद्ध करते हैं—

कलियुग—
4,32,000 वर्ष
द्वापर—
8,64,000वर्ष (कलियुगसे दुगुना)
त्रेता—
12,96,000 वर्ष (कलियुगसे तिगुना)
सत्ययुग—
17,28,000 वर्ष (कलियुगसे चौगुना)
कुल जोड़—
43,20,000वर्ष
18
अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे। रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके॥ 18॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
सम्पूर्ण चराचर भूतगण ब्रह्माके दिनके प्रवेशकालमें अव्यक्तसे अर्थात् ब्रह्माके सूक्ष्म शरीरसे उत्पन्न होते हैं और ब्रह्माकी रात्रिके प्रवेशकालमें उस अव्यक्त नामक ब्रह्माके
सम्बन्ध

सम्बन्ध—ब्रह्माके दिन-रात्रिका परिमाण बतलाकर अब उस दिन और रातके आरम्भमें बार-बार होनेवाली समस्त भूतोंकी उत्पत्ति और प्रलयका वर्णन करते हुए उन सबकी अनित्यताका कथन करते हैं—

19
भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते। रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे॥ 19॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे पार्थ! वही यह भूतसमुदाय उत्पन्न हो-होकर प्रकृतिके वशमें हुआ रात्रिके प्रवेशकालमें लीन होता है और दिनके प्रवेशकालमें फिर उत्पन्न होता है॥ 19॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—यद्यपि ब्रह्माकी रात्रिके आरम्भमें समस्त भूत अव्यक्तमें लीन हो जाते हैं, तथापि जबतक वे परम पुरुष परमेश्वरको प्राप्त नहीं होते, तबतक उनका पुनर्जन्मसे पिंड नहीं छूटता, वे आवागमनके चक्करमें घूमते ही रहते हैं। इसी भावको दिखलानेके लिये भगवान् कहते हैं—

20
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः। यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति॥ 20॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
उस अव्यक्तसे भी अति परे दूसरा अर्थात् विलक्षण जो सनातन अव्यक्त भाव है, वह परम दिव्य पुरुष सब भूतोंके नष्ट होनेपर भी नष्ट नहीं होता॥ 20॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—ब्रह्माकी रात्रिके आरम्भमें जिस अव्यक्तमें समस्त भूत लीन होते हैं और दिनका आरम्भ होते ही जिससे उत्पन्न होते हैं, वही अव्यक्त सर्वश्रेष्ठ है? या उससे बढ़कर कोई दूसरा और है? इस जिज्ञासापर कहते हैं—

21
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्। यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥ 21॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जो अव्यक्त “अक्षर” इस नामसे कहा गया है, उसी अक्षर नामक अव्यक्तभावको परमगति कहते हैं तथा जिस सनातन अव्यक्तभावको प्राप्त होकर मनुष्य वापस नहीं आते, वह मेरा परम धाम है॥ 21॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—आठवें और दसवें श्लोकोंमें अधियज्ञकी उपासनाका फल परम दिव्य पुरुषकी प्राप्ति, तेरहवें श्लोकमें परम अक्षर निर्गुण ब्रह्मकी उपासनाका फल परमगतिकी प्राप्ति और चौदहवें श्लोकमें सगुण-साकार भगवान् श्रीकृष्णकी उपासनाका फल भगवान्की प्राप्ति बतलाया गया है। इससे तीनोंमें किसी प्रकारके भेदका भ्रम न हो जाय, इस उद्देश्यसे अब सबकी एकताका प्रतिपादन करते हुए उनकी प्राप्तिके बाद पुनर्जन्मका अभाव दिखलाते हैं—

22
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया। यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्॥ 22॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे पार्थ! जिस परमात्माके अन्तर्गत सर्वभूत हैं और जिस सच्चिदानन्दघन परमात्मासे यह सब जगत् परिपूर्ण है, वह सनातन अव्यक्त परम पुरुष तो अनन्यभक्तिसे ही प्राप्त होने योग्य है॥ 22॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार सनातन अव्यक्त पुरुषकी परमगति और परम धामके साथ एकता दिखलाकर, अब उस सनातन अव्यक्त परम पुरुषकी प्राप्तिका उपाय बतलाते हैं—

23
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः। प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ॥ 23॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे अर्जुन! जिस कालमें शरीर त्यागकर गये हुए योगीजन तो वापस न लौटनेवाली गतिको और जिस कालमें गये हुए वापस लौटनेवाली गतिको ही प्राप्त होते हैं, उस कालको अर्थात्
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अर्जुनके सातवें प्रश्नका उत्तर देते हुए भगवान्ने अन्तकालमें किस प्रकार मनुष्य परमात्माको प्राप्त होता है, यह बात भलीभाँति समझायी। प्रसंगवश यह बात भी कही कि भगवत्प्राप्ति न होनेपर ब्रह्मलोकतक पहुँचकर भी जीव आवागमनके चक्करसे नहीं छूटता। परन्तु वहाँ यह बात नहीं कही गयी कि जो वापस न लौटनेवाले स्थानको प्राप्त होते हैं, वे किस रास्तेसे और कैसे जाते हैं तथा इसी प्रकार जो वापस लौटनेवाले स्थानोंको प्राप्त होते हैं, वे किस रास्तेसे जाते हैं। अतः उन दोनों मार्गोंका वर्णन करनेके लिये भगवान् प्रस्तावना करते हैं—

24
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्। तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः॥ 24॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जिस मार्गमें ज्योतिर्मय अग्नि अभिमानी देवता है, दिनका अभिमानी देवता है, शुक्लपक्षका अभिमानी देवता है और उत्तरायणके छः महीनोंका अभिमानी देवता है, उस मार्गमें मरकर गये हुए ब्रह्मवेत्ता योगीजन उपर्युक्त देवताओंद्वारा क्रमसे ले जाये जाकर ब्रह्मको प्राप्त
सम्बन्ध

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें जिन दो मार्गोंका वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा की गयी, उनमेंसे जिस मार्गसे गये हुए साधक वापस नहीं लौटते, उसका वर्णन पहले किया जाता है—

25
धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम्। तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते॥ 25॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
जिस मार्गमें धूमाभिमानी देवता है, रात्रि-अभिमानी देवता है तथा कृष्णपक्षका अभिमानी देवता है और दक्षिणायनके छः महीनोंका अभिमानी देवता है, उस मार्गमें मरकर गया हुआ सकाम कर्म करनेवाला योगी उपर्युक्त देवताओंद्वारा क्रमसे ले गया हुआ चन्द्रमाकी ज्योतिको प्राप्त होकर स्वर्गमें अपने शुभकर्मोंका फल भोगकर वापस आता है॥ 25॥
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार वापस न लौटनेवालोंके मार्गका वर्णन करके अब जिस मार्गसे गये हुए साधक वापस लौटते हैं, उसका वर्णन किया जाता है—

26
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते। एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः॥ 26॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
क्योंकि जगत्के ये दो प्रकारके—शुक्ल और कृष्ण अर्थात् देवयान और पितृयान मार्ग सनातन माने गये हैं। इनमें एकके द्वारा गया हुआ—जिससे वापस नहीं लौटना पड़ता, उस परम गतिको प्राप्त होता है और दूसरेके द्वारा गया हुआ फिर वापस आता है अर्थात् जन्म-मृत्युको
सम्बन्ध

सम्बन्ध—इस प्रकार उत्तरायण और दक्षिणायन—दोनों मार्गोंका वर्णन करके अब उन दोनोंको सनातन मार्ग बतलाकर इस विषयका उपसंहार करते हैं—

27
नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन। तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन॥ 27॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
हे पार्थ! इस प्रकार इन दोनों मार्गोंको तत्त्वसे जानकर कोई भी योगी मोहित नहीं होता। इस कारण हे अर्जुन! तू सब कालमें समबुद्धिरूप योगसे युक्त हो अर्थात् निरन्तर मेरी प्राप्तिके
सम्बन्ध

सम्बन्ध—अब उन दोनों मार्गोंको जाननेवाले योगीकी प्रशंसा करके अर्जुनको योगी बननेके लिये कहते हैं—

28
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्। अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्॥ 28॥
श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीकाJayadayal Goyandka
योगी पुरुष इस रहस्यको तत्त्वसे जानकर वेदोंके पढ़नेमें तथा यज्ञ, तप और दानादिके करनेमें जो पुण्यफल कहा है, उस सबको निःसन्देह उल्लंघन कर जाता है और सनातन
सम्बन्ध

सम्बन्ध—भगवान्ने अर्जुनको योगयुक्त होनेके लिये कहा। अब योगयुक्त पुरुषकी महिमा और इस अध्यायमें वर्णित रहस्यको समझकर उसके अनुसार साधन करनेका फल बतलाते हुए इस अध्यायका उपसंहार करते हैं—

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः॥
8.1श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीका