क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
सम्बन्ध—बारहवें अध्यायके आरम्भमें अर्जुनने सगुण और निर्गुणके उपासकोंकी श्रेष्ठताके विषयमें प्रश्न किया था, उसका उत्तर देते हुए भगवान्ने दूसरे श्लोकमें संक्षेपमें सगुण उपासकोंकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन करके तीसरेसे पाँचवें श्लोकतक निर्गुण उपासनाका स्वरूप, उसका फल और देहाभिमानियोंके लिये उसके अनुष्ठानमें कठिनताका निरूपण किया। तदनन्तर छठेसे बीसवें श्लोकतक सगुण उपासनाका महत्त्व, फल, प्रकार और भगवद्भक्तोंके लक्षणोंका वर्णन करते-करते ही अध्यायकी समाप्ति हो गयी; निर्गुणका तत्त्व, महिमा और उसकी प्राप्तिके साधनोंको विस्तारपूर्वक नहीं समझाया गया। अतएव निर्गुण-निराकारका तत्त्व अर्थात् ज्ञानयोगका विषय भलीभाँति समझानेके लिये तेरहवें अध्यायका आरम्भ किया जाता है। इसमें पहले भगवान् क्षेत्र (शरीर) तथा क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के लक्षण बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके लक्षण बतलाकर अब क्षेत्रज्ञ और परमात्माकी एकता करते हुए ज्ञानके लक्षणका निरूपण करते हैं—
सम्बन्ध—क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका पूर्ण ज्ञान हो जानेपर संसार-भ्रमका नाश हो जाता है और परमात्माकी प्राप्ति होती है, अतएव “क्षेत्र” और “क्षेत्रज्ञ”के स्वरूप आदिको भलीभाँति विभागपूर्वक समझानेके लिये भगवान् कहते हैं—
सम्बन्ध—तीसरे श्लोकमें “क्षेत्र” और “क्षेत्रज्ञ” के जिस तत्त्वको संक्षेपमें सुननेके लिये भगवान्ने अर्जुनसे कहा है—अब उसके विषयमें ऋषि, वेद और ब्रह्मसूत्रकी उक्तिका प्रमाण देकर भगवान् ऋषि, वेद और ब्रह्मसूत्रको आदर देते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार ऋषि, वेद और ब्रह्मसूत्रका प्रमाण देकर अब भगवान् तीसरे श्लोकमें “यत्”, पदसे कहे हुए “क्षेत्र” का और “यद्विकारि” पदसे कहे हुए उसके विकारोंका अगले दो श्लोकोंमें वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार क्षेत्रके स्वरूप और उसके विकारोंका वर्णन करनेके बाद अब जो दूसरे श्लोकमें यह बात कही थी कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका जो ज्ञान है, वही मेरे मतसे ज्ञान है—उस ज्ञानको प्राप्त करनेके साधनोंका “ज्ञान” के ही नामसे पाँच श्लोकोंद्वारा वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार ज्ञानके साधनोंका “ज्ञान” के नामसे वर्णन सुननेपर यह जिज्ञासा हो सकती है कि इन साधनोंद्वारा प्राप्त “ज्ञान” से जाननेयोग्य वस्तु क्या है और उसे जान लेनेसे क्या होता है? उसका उत्तर देनेके लिये भगवान् अब जाननेके योग्य वस्तुके स्वरूपका वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा करते हुए उसके जाननेका फल “अमृतत्वकी प्राप्ति” बतलाकर छः श्लोकोंमें जाननेके योग्य परमात्माके स्वरूपका वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार ज्ञेय तत्त्वके वर्णनकी प्रतिज्ञा करके उस तत्त्वका संक्षेपमें वर्णन किया गया; परंतु वह ज्ञेय तत्त्व बड़ा गहन है। अतः साधकोंको उसका ज्ञान करानेके लिये सर्वव्यापकत्वादि लक्षणोंके द्वारा उसीका पुनः विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—ज्ञेयस्वरूप परमात्माको सब ओरसे हाथ, पैर आदि समस्त इन्द्रियोंकी शक्तिवाला बतलानेके बाद अब उसके स्वरूपकी अलौकिकताका निरूपण करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेयके स्वरूपका संक्षेपमें वर्णन करके अब इस प्रकरणको जाननेका फल बतलाते हैं।
सम्बन्ध—तीसरे श्लोकमें भगवान्ने क्षेत्रके विषयमें चार बातें और क्षेत्रज्ञके विषयमें दो बातें संक्षेपमें सुननेके लिये अर्जुनसे कहा था, फिर विषय आरम्भ करते ही क्षेत्रके स्वरूपका और उसके विकारोंका वर्णन करनेके उपरान्त क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके तत्त्वको भलीभाँति जाननेके उपायभूत साधनोंका और जाननेके योग्य परमात्माके स्वरूपका वर्णन प्रसंगवश किया गया। इससे क्षेत्रके विषयमें उसके स्वभावका और किस कारणसे कौन कार्य उत्पन्न होता है, इस विषयका तथा प्रभावसहित क्षेत्रज्ञके स्वरूपका भी वर्णन नहीं हुआ। अतः अब उन सबका वर्णन करनेके लिये भगवान् पुनः प्रकृति और पुरुषके नामसे प्रकरण आरम्भ करते हैं। इसमें पहले प्रकृति-पुरुषकी अनादिताका प्रतिपादन करते हुए समस्त गुण और विकारोंको प्रकृतिजन्य बतलाते हैं—
सम्बन्ध—तीसरे श्लोकमें, जिससे जो उत्पन्न हुआ है, यह बात सुननेके लिये कहा गया था, उसका वर्णन पूर्व श्लोकके उत्तरार्द्धमें कुछ किया गया। अब उसीकी कुछ बात इस श्लोकके पूर्वार्द्धमें कहते हुए इसके उत्तरार्द्धमें और इक्कीसवें श्लोकमें प्रकृतिमें स्थित पुरुषके स्वरूपका वर्णन किया जाता है—
सम्बन्ध—इस प्रकार प्रकृतिस्थ पुरुषके स्वरूपका वर्णन करनेके बाद अब जीवात्मा और परमात्माकी एकता करते हुए आत्माके गुणातीत स्वरूपका वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार गुणोंके सहित प्रकृतिके और पुरुषके स्वरूपका वर्णन करनेके बाद अब उनको यथार्थ जाननेका फल बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार गुणोंके सहित प्रकृति और पुरुषके ज्ञानका महत्त्व सुनकर यह इच्छा हो सकती है कि ऐसा ज्ञान कैसे होता है। इसलिये अब दो श्लोकोंद्वारा भिन्न-भिन्न अधिकारियोंके लिये तत्त्वज्ञानके भिन्न-भिन्न साधनोंका प्रतिपादन करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार परमात्मसम्बन्धी तत्त्वज्ञानके भिन्न-भिन्न साधनोंका प्रतिपादन करके अब तीसरे श्लोकमें जो “यादृक्” पदसे क्षेत्रके स्वभावको सुननेके लिये कहा था, उसके अनुसार भगवान् दो श्लोकोंद्वारा उस क्षेत्रको उत्पत्ति-विनाशशील बतलाकर उसके स्वभावका वर्णन करते हुए आत्माके यथार्थ तत्त्वको जाननेवालेकी प्रशंसा करते हैं—
सम्बन्ध—उपर्युक्त श्लोकमें यह कहा गया है कि उस परमेश्वरको जो सब भूतोंमें नाशरहित और समभावसे स्थित देखता है, वही ठीक देखता है; इस कथनकी सार्थकता दिखलाते हुए उसका फल परमगतिकी प्राप्ति बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार नित्य विज्ञानानन्दघन आत्मतत्त्वको सर्वत्र समभावसे देखनेका महत्त्व और फल बतलाकर अब अगले श्लोकमें उसे अकर्ता देखनेवालेकी महिमा कहते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार आत्माको अकर्ता समझनेकी महिमा बतलाकर अब उसके एकत्वदर्शनका फल बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार आत्माको सब प्राणियोंमें समभावसे स्थित, निर्विकार और अकर्ता बतलाया जानेपर यह शंका होती है कि समस्त शरीरोंमें रहता हुआ भी आत्मा उनके दोषोंसे निर्लिप्त और अकर्ता कैसे रह सकता है; इस शंकाका निवारण करनेके लिये अब भगवान्—तीसरे श्लोकमें जो “यत्प्रभावश्च” पदसे क्षेत्रज्ञका प्रभाव सुननेका संकेत किया गया था, उसके अनुसार—तीन श्लोकोंद्वारा आत्माके प्रभावका वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—शरीरमें स्थित होनेपर भी आत्मा क्यों नहीं लिप्त होता? इसपर कहते हैं—
सम्बन्ध—शरीरमें स्थित होनेपर भी आत्मा कर्ता क्यों नहीं है? इसपर कहते हैं—
सम्बन्ध—तीसरे श्लोकमें जिन छः बातोंको कहनेका भगवान्ने संकेत किया था, उनका वर्णन करके अब इस अध्यायमें वर्णित समस्त उपदेशको भलीभाँति समझनेका फल परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति बतलाते हुए अध्यायका उपसंहार करते हैं—