कर्मसंन्यासयोग
सम्बन्ध—तीसरे और चौथे अध्यायमें अर्जुनने भगवान्के श्रीमुखसे अनेकों प्रकारसे कर्मयोगकी प्रशंसा सुनी और उसके सम्पादनकी प्रेरणा तथा आज्ञा प्राप्त की। साथ ही यह भी सुना कि “कर्मयोगके द्वारा भगवत्स्वरूपका तत्त्वज्ञान अपने-आप ही हो जाता है” (4। 38); चौथे अध्यायके अन्तमें भी उन्हें भगवान्के द्वारा कर्मयोगके सम्पादनकी ही आज्ञा मिली। परंतु बीच-बीचमें उन्होंने भगवान्के श्रीमुखसे ही “ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविः”, “ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति”, “तद्विद्धि प्रणिपातेन” आदि वचनोंद्वारा ज्ञानयोग अर्थात् कर्मसंन्यासकी भी प्रशंसा सुनी। इससे अर्जुन यह निर्णय नहीं कर सके कि इन दोनोंमेंसे मेरे लिये कौन-सा साधन श्रेष्ठ है। अतएव अब भगवान्के श्रीमुखसे ही उसका निर्णय करानेके उद्देश्यसे अर्जुन उनसे प्रश्न करते हैं—
सम्बन्ध—अब भगवान् अर्जुनके इस प्रश्नका उत्तर देते हैं—
सम्बन्ध—सांख्ययोगकी अपेक्षा कर्मयोगको श्रेष्ठ बतलाया। अब उसी बातको सिद्ध करनेके लिये अगले श्लोकमें कर्मयोगीकी प्रशंसा करते हैं—
सम्बन्ध—साधनमें सुगम होनेके कारण सांख्ययोगकी अपेक्षा कर्मयोगको श्रेष्ठ सिद्ध करके अब भगवान् दूसरे श्लोकमें दोनों निष्ठाओंका जो एक ही फल निःश्रेयस—परम कल्याण बतला चुके हैं, उसीके अनुसार दो श्लोकोंमें दोनों निष्ठाओंकी फलमें एकताका प्रतिपादन करते हैं—
सम्बन्ध—सांख्ययोग और कर्मयोगके फलकी एकता बतलाकर अब कर्मयोगकी साधनविषयक विशेषताको स्पष्ट करते हैं—
सम्बन्ध—अब उपर्युक्त कर्मयोगीके लक्षणोंका वर्णन करते हुए उसके कर्मोंमें लिप्त न होनेकी बात कहते हैं—
सम्बन्ध—दूसरे श्लोकमें कर्मयोग और सांख्ययोगकी सूत्ररूपसे फलमें एकता बतलाकर सांख्ययोगकी अपेक्षा सुगमताके कारण कर्मयोगको श्रेष्ठ बतलाया। फिर तीसरे श्लोकमें कर्मयोगीकी प्रशंसा करके, चौथे और पाँचवें श्लोकोंमें दोनोंके फलकी एकताका और स्वतन्त्रताका भलीभाँति प्रतिपादन किया। तदनन्तर छठे श्लोकके पूर्वार्द्धमें कर्मयोगके बिना सांख्ययोगका सम्पादन कठिन बतलाकर उत्तरार्द्धमें कर्मयोगकी सुगमताका प्रतिपादन करते हुए सातवें श्लोकमें कर्मयोगीके लक्षण बतलाये। इससे यह बात सिद्ध हुई कि दोनों साधनोंका फल एक होनेपर भी दोनों साधन परस्पर भिन्न हैं। अतः दोनोंका स्वरूप जाननेकी इच्छा होनेसे भगवान् पहले, आठवें और नवें श्लोकोंमें सांख्ययोगीके व्यवहारकालके साधनका स्वरूप बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार सांख्ययोगीके साधनका स्वरूप बतलाकर अब दसवें और ग्यारहवें श्लोकोंमें कर्मयोगियोंके साधनका फलसहित स्वरूप बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकारसे कर्म करनेवाला भक्तिप्रधान कर्मयोगी पापोंसे लिप्त नहीं होता और कर्मप्रधान कर्मयोगीका अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है, यह सुननेपर इस बातकी जिज्ञासा होती है कि कर्मयोगका यह अन्तःकरण शुद्धिरूप इतना ही फल है, या इसके अतिरिक्त कुछ विशेष फल भी है? एवं इस प्रकार कर्म न करके सकामभावसे शुभकर्म करनेमें क्या हानि है? अतएव अब इसी बातको स्पष्टरूपसे समझानेके लिये भगवान् कहते हैं—
सम्बन्ध—यहाँ यह बात कही गयी कि “कर्मयोगी” कर्मफलसे न बँधकर परमात्माकी प्राप्तिरूप शान्तिको प्राप्त होता है और “सकामपुरुष” फलमें आसक्त होकर जन्म-मरणरूप बन्धनमें पड़ता है, किंतु यह नहीं बतलाया कि सांख्ययोगीका क्या होता है? अतएव अब सांख्ययोगीकी स्थिति बतलाते हैं—
सम्बन्ध—जबकि आत्मा वास्तवमें कर्म करनेवाला भी नहीं है और इन्द्रियादिसे करवानेवाला भी नहीं है, तो फिर सब मनुष्य अपनेको कर्मोंका कर्ता क्यों मानते हैं और वे कर्मफलके भागी क्यों होते हैं—
सम्बन्ध—जो साधक समस्त कर्मोंको और कर्मफलोंको भगवान्के अर्पण करके कर्मफलसे अपना सम्बन्ध-विच्छेद कर लेते हैं, उनके शुभाशुभ कर्मोंके फलके भागी क्या भगवान् होते हैं? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
सम्बन्ध—यथार्थ ज्ञानसे परमात्माकी प्राप्ति होती है, यह बात संक्षेपमें कहकर अब छब्बीसवें श्लोकतक ज्ञानयोगद्वारा परमात्माको प्राप्त होनेके साधन तथा परमात्माको प्राप्त सिद्ध पुरुषोंके लक्षण, आचरण, महत्त्व और स्थितिका वर्णन करनेके उद्देश्यसे पहले यहाँ ज्ञानयोगके एकान्त साधनद्वारा परमात्माकी प्राप्ति बतलाते हैं—
सम्बन्ध—परमात्माकी प्राप्तिका साधन बतलाकर अब परमात्माको प्राप्तसिद्ध पुरुषोंके “समभाव” का वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार तत्त्वज्ञानीके समभावका वर्णन करके अब समभावको ब्रह्मका स्वरूप बतलाते हुए उसमें स्थित महापुरुषोंकी महिमाका वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—अब निर्गुण निराकार सच्चिदानन्दघन ब्रह्मको प्राप्त समदर्शी सिद्ध पुरुषके लक्षण बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार ब्रह्ममें स्थित पुरुषके लक्षण बतलाये गये; अब ऐसी स्थिति प्राप्त करनेके साधन और उसके फलकी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार इन्द्रियोंके विषयोंमें आसक्तिके त्यागको परमात्माकी प्राप्तिमें हेतु बतलाकर अब इस श्लोकमें इन्द्रियोंके भोगोंको दुःखका कारण और अनित्य बतलाते हुए भगवान् उनमें आसक्तिरहित होनेके लिये संकेत करते हैं—
सम्बन्ध—विषयभोगोंको काम-क्रोधादिके निमित्तसे दुःखके हेतु बतलाकर अब मनुष्य-शरीरका महत्त्व दिखलाते हुए भगवान् काम-क्रोधादि दुर्जय शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर लेनेवाले पुरुषकी प्रशंसा करते हैं—
सम्बन्ध—उपर्युक्त प्रकारसे बाह्य विषयभोगोंको क्षणिक और दुःखोंका कारण समझकर तथा आसक्तिका त्याग करके जो काम-क्रोधपर विजय प्राप्त कर चुका है, अब ऐसे सांख्ययोगीकी अन्तिम स्थितिका फलसहित वर्णन किया जाता है—
सम्बन्ध—इस प्रकार जो परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो गये हैं, उन पुरुषोंके लक्षण दो श्लोकोंमें बतलाते हैं—
सम्बन्ध—कर्मयोग और सांख्ययोग—दोनों साधनोंद्वारा परमात्माकी प्राप्ति और परमात्माको प्राप्त महापुरुषोंके लक्षण कहे गये। उक्त दोनों ही प्रकारके साधकोंके लिये वैराग्यपूर्वक मन-इन्द्रियोंको वशमें करके ध्यानयोगका साधन करना उपयोगी है; अतः अब संक्षेपमें फलसहित ध्यानयोगका वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—अर्जुनके प्रश्नका उत्तर देते हुए भगवान्ने कर्मयोग और सांख्ययोगके स्वरूपका प्रतिपादन करके दोनों साधनोंद्वारा परमात्माकी प्राप्ति और सिद्ध पुरुषोंके लक्षण बतलाये। फिर दोनों निष्ठाओंके लिये उपयोगी होनेसे ध्यानयोगका भी संक्षेपमें वर्णन किया। अब जो मनुष्य इस प्रकार मन, इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त करके कर्मयोग, सांख्ययोग या ध्यानयोगका साधन करनेमें अपनेको समर्थ नहीं समझता हो, ऐसे साधकके लिये सुगमतासे परमपदकी प्राप्ति करानेवाले भक्तियोगका संक्षेपमें वर्णन करते हैं—