* “हृदि सर्वस्य विष्ठितम्” (गीता 13। 17), “सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टः” (गीता 15। 15), “ईश्वरः सर्वभूतानां
हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति” (गीता 18। 61)।
1-यहाँ जाननेका अर्थ है—दृढ़तापूर्वक मानना। मानना जाननेसे कमजोर नहीं होता। इसलिये दृढ़तासे मान लेना भी
जानना ही है।
2-हेतु रहित जग जुग उपकारी। तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी॥ (मानस 7। 47। 3)
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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः॥