परिशिष्ट भाव
इस अध्यायके आरम्भमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा था कि मैं वह विज्ञानसहित ज्ञान कहूँगा, जिससे तू मेरे समग्ररूपको जान जायगा और जिसको जाननेके बाद फिर कुछ भी जानना बाकी नहीं रहेगा। फिर उन्नीसवें श्लोकमें भगवान्ने “वासुदेवः सर्वम्” कहकर अपने समग्ररूपका संक्षेपसे वर्णन किया। अब अध्यायके अन्तमें भगवान् उसका खुलासा करते हैं। साधकका जन्म तो हो चुका है और व्याधि अवश्यम्भावी नहीं है; परन्तु वृद्धावस्था और मृत्यु—ये दोनों अवश्यम्भावी हैं और इनसे मनुष्यको अधिक दुःख होता है। इसलिये यहाँ “जरामरणमोक्षाय” कहनेका तात्पर्य है कि भगवान्का आश्रय लेनेवाले भक्त जरा और मरण—दोनोंसे मुक्त हो जाते हैं अर्थात् उनको शरीरके रहते हुए वृद्धावस्थाका भी दुःख नहीं होता और गतिके विषयमें भी दुःख नहीं होता कि मरनेके बाद हमारी क्या गति होगी? वे भगवान्का आश्रय लेकर प्रयत्न करते हैं, इसलिये वे परा-अपराके सहित भगवान्के समग्ररूपको जान लेते हैं अर्थात् विज्ञानसहित ज्ञानको जान लेते हैं। यद्यपि कर्मयोगी और ज्ञानयोगी भी जन्म-मरणसे मुक्त हो जाते हैं, पर भक्त जरा-मरणसे मुक्त होनेके साथ- साथ भगवान्के समग्ररूपको भी जान लेते हैं। कारण कि कर्मयोगी और ज्ञानयोगीकी तो आरम्भसे ही अपने साधनकी निष्ठा होती है (गीता—तीसरे अध्यायका तीसरा श्लोक), पर भक्त आरम्भसे ही भगवन्निष्ठ अर्थात् भगवत्परायण होता है। भगवन्निष्ठ होनेसे भगवान् कृपा करके उसको अपने समग्ररूपका ज्ञान करा देते हैं। इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने कहा था कि कोई एक ही (विरला) मनुष्य मेरे समग्ररूपको जानता है— “कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः”। यहाँ बताते हैं कि जो मेरे शरण हो जाता है, वह मेरे समग्ररूपको जान लेता है। अतः भगवान्के समग्ररूप-(विज्ञानसहित ज्ञान-) को जाननेकी मुख्य साधना है—शरणागति (मामाश्रित्य)। कारण कि समग्रका ज्ञान विचारसे नहीं होता, प्रत्युत श्रद्धा-विश्वासपूर्वक शरणागत होनेपर भगवत्कृपासे ही होता है। इसलिये भगवान्ने सातवें अध्यायके आरम्भमें “मदाश्रयः” कहकर अन्तमें “मामाश्रित्य” पदसे उसका उपसंहार किया है। ब्रह्म (निर्गुण-निराकार), कृत्स्न अध्यात्म (अनन्त योनियोंके अनन्त जीव) तथा अखिल कर्म (उत्पत्ति- स्थिति-प्रलय आदिकी सम्पूर्ण क्रियाएँ)—यह “ज्ञान” का विभाग है। इस विभागमें निर्गुणकी मुख्यता है। अधिभूत (अपने शरीरसहित सम्पूर्ण पांचभौतिक जगत्), अधिदैव (मन-इन्द्रियोंके अधिष्ठातृ देवतासहित ब्रह्माजी आदि सभी देवता) तथा अधियज्ञ (अन्तर्यामी विष्णु और उनके सभी रूप)—यह “विज्ञान” का विभाग है। इस विभागमें सगुणकी मुख्यता है। अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञके “सहित” कहनेका तात्पर्य है कि सत्-असत्, परा-अपरा सब कुछ भगवान् ही हैं। भगवान्के सिवाय किंचिन्मात्र भी कुछ नहीं है। सत्-असत्को अलग-अलग करनेसे ज्ञानमार्ग होता है—“नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। उभयोरपि.......” (गीता 2। 16) और एक करनेसे भक्तिमार्ग होता है— “सदसच्चाहमर्जुन” (गीता 9। 19)। “ब्रह्म” की बात पहले पाँचवें अध्यायमें तेरहवेंसे छब्बीसवें श्लोकतक कही गयी है। “कृत्स्न अध्यात्म” की बात पहले छठे अध्यायके उनतीसवें श्लोकमें “सर्वभूतस्थमात्मानम्” पदसे कही गयी है। “अखिल कर्म” की बात पहले चौथे अध्यायके अठारहवें, तेईसवें और तैंतीसवें श्लोकमें क्रमशः “कृत्स्नकर्मकृत्”, “कर्म समग्रम्” और “सर्वं कर्माखिलम्” पदसे कही गयी है। अभाव कर्मका होता है, आत्मा या ब्रह्मका नहीं। न्यायमें आता है कि किसी वस्तुके भावका ज्ञान जिस इन्द्रियसे होता है, उसी इन्द्रियसे उसके अभावका और जातिका ज्ञान भी होता है। अतः मनुष्य जिस ज्ञानसे कर्मोंको जानता है (कर्म चाखिलम्), उसी ज्ञानसे कर्मोंके अभावको अर्थात् अकर्मको भी जानता है— “कर्मण्यकर्म यः पश्येत्” (गीता 4। 18)। ब्रह्म, आत्मा और अकर्म—तीनों एक ही हैं; ऐसा जानना ही “ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्” पदोंका तात्पर्य है। “कर्म” सीमित है, कर्मसे व्यापक “अध्यात्म” है और अध्यात्मसे व्यापक “ब्रह्म” है। परन्तु “माम्” (समग्र) उस ब्रह्मसे भी श्रेष्ठ है; क्योंकि ब्रह्मके अन्तर्गत तो समग्र नहीं आता, पर समग्रके अन्तर्गत ब्रह्म आ जाता है। “अध्यात्म” के साथ “कृत्स्न” शब्द देनेका तात्पर्य है—जिनको भगवान्ने अपनी परा प्रकृति बताया है, वे अनेक रूपसे दीखनेवाले सम्पूर्ण जीव। “कर्म” के साथ “अखिल” शब्द देनेका तात्पर्य है—जिनके फलस्वरूप जीव अनेक योनियोंमें और अनेक लोकोंमें जाता है, वे शुभ-अशुभ सम्पूर्ण कर्म, परन्तु “ब्रह्म” के साथ “कृत्स्न” या “अखिल” शब्द न देनेका तात्पर्य है कि ब्रह्म अनेक नहीं है, प्रत्युत एक ही है। गीतामें भगवान्ने दो निष्ठाएँ बतायी हैं—कर्मयोग और ज्ञानयोग। ये दोनों ही निष्ठाएँ लौकिक हैं—“लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा” (गीता 3। 3); परन्तु भक्तियोग अलौकिक निष्ठा है। कारण कि कर्मयोगमें “क्षर” (संसार) की प्रधानता है और ज्ञानयोगमें “अक्षर” (जीवात्मा) की प्रधानता है। क्षर और अक्षर—दोनों ही लोकमें हैं— “द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च” (गीता 15। 16) इसलिये कर्मयोग और ज्ञानयोग—दोनों लौकिक निष्ठाएँ हैं। परन्तु भक्तियोगमें “परमात्मा” की प्रधानता है, जो क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम है (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका सत्रहवाँ, अठारहवाँ श्लोक)। इसलिये भक्तियोग अलौकिक निष्ठा है। भगवान्के समग्ररूपमें ब्रह्म, अध्यात्म तथा कर्म—इनमें लौकिक निष्ठा (कर्मयोग तथा ज्ञानयोग) की बात आयी है* और अधिभूत, अधिदैव तथा अधियज्ञ—इनमें अलौकिक निष्ठा-(भक्तियोग-) की बात आयी है। “ज्ञान” लौकिक है—“न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते”1 (गीता 4। 38) और “विज्ञान” अलौकिक है। लौकिक तथा अलौकिक—दोनों ही समग्र भगवान्के रूप हैं—“वासुदेवः सर्वम्”। “लोक” शब्दमें जड़ भी है और चेतन भी। केवल जड़ अथवा केवल चेतनका वाचक “लोक” शब्द नहीं हो सकता। अतः “लौकिक” में जड़ और चेतन दोनों आते हैं, पर “अलौकिक” में केवल चेतन ही आता है; क्योंकि अलौकिक सदा चिन्मय ही होता है। परन्तु “समग्र” में लौकिक और अलौकिक—दोनों आ जाते हैं। यहाँ एक विशेष ध्यान देनेकी बात है कि निर्गुण-निराकार “ब्रह्म” का नाम भगवान्के समग्ररूपके अन्तर्गत आया है। लोगोंमें प्रायः इस बातकी प्रसिद्धि है कि “निर्गुण-निराकार ब्रह्मके अन्तर्गत ही सगुण ईश्वर है। ब्रह्म मायारहित है और ईश्वर मायासहित है। अतः ब्रह्मके एक अंशमें ईश्वर है।” वास्तवमें ऐसा मानना शास्त्रसम्मत एवं युक्तिसंगत नहीं है; क्योंकि जब ब्रह्ममें माया है ही नहीं तो फिर मायासहित ईश्वर ब्रह्मके अन्तर्गत कैसे हुआ? ब्रह्ममें माया कहाँसे आयी? परन्तु गीतामें भगवान् कह रहे हैं कि मेरे समग्ररूपके एक अंशमें ब्रह्म है! इसलिये भगवान्ने अपनेको ब्रह्मका आधार बताया है—“ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्” (गीता 14। 27) “मैं ब्रह्मकी प्रतिष्ठा हूँ” तथा “मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना” (गीता 9। 4) “यह सब संसार मेरे अव्यक्त स्वरूपसे व्याप्त है।” भगवान्के इस कथनका तात्पर्य है कि ब्रह्मका अंश मैं नहीं हूँ, प्रत्युत मेरा अंश ब्रह्म है। अतः निष्पक्ष विचार करनेसे ऐसा दीखता है कि गीतामें ब्रह्मकी मुख्यता नहीं है, प्रत्युत ईश्वरकी मुख्यता है। पूर्ण तत्त्व समग्र ही है। समग्रमें सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार सब आ जाते हैं। वास्तवमें देखा जाय तो समग्ररूप सगुणका ही हो सकता है; क्योंकि सगुण शब्दके अन्तर्गत तो निर्गुण आ सकता है, पर निर्गुण शब्दके अन्तर्गत सगुण नहीं आ सकता। कारण कि सगुणमें निर्गुणका निषेध नहीं है, जबकि निर्गुणमें गुणोंका निषेध है। अतः निर्गुणमें समग्र शब्द लग ही नहीं सकता। इसलिये यहाँ “अध्यात्म” और “कर्म” के साथ तो क्रमशः “कृत्स्न” और “अखिल” शब्द आये हैं, जो समग्रताके वाचक हैं, पर “ब्रह्म” के साथ समग्रताका वाचक कोई शब्द कहीं भी नहीं आया है। अतः समग्रता सगुणमें ही है, निर्गुणमें नहीं। प्रश्न—ब्रह्म, अध्यात्म और कर्म—ये तीनों लौकिक कैसे हैं? उत्तर—भगवान्ने ब्रह्मको “अक्षर” कहा है—“अक्षरं ब्रह्म परमम्” (गीता 8। 3) और जीवको भी “अक्षर” कहा है—“द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च” (गीता 15। 16)। जीव और ब्रह्म—दोनों एक हैं—“अयमात्मा ब्रह्म” (माण्डूक्य0 1)। प्रकृति-(शरीर-) के साथ सम्बन्ध होनेसे जो “जीव” (अध्यात्म) है2, वही प्रकृतिके साथ सम्बन्ध न होनेसे सामान्य “ब्रह्म” है। अतः गीताके अनुसार जैसे जीव लोकमें है, ऐसे ही ब्रह्म भी लोकमें है अर्थात् ब्रह्म लौकिक निष्ठा-(कर्मयोग तथा ज्ञानयोग-) से प्रापणीय तत्त्व है। “अध्यात्म” अर्थात् जीवने जगत्को धारण किया हुआ है—“ययेदं धार्यते जगत्” (गीता 7। 5)। जीवकी अपनी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। इसलिये जगत्के संगसे जीव भी जगत् अर्थात् लौकिक हो जाता है। (गीता—इसी अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। लोकमें होनेके कारण भी जीव लौकिक है—“ममैवांशो जीवलोके” (गीता 15। 7), “द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च” (गीता 15। 16)। “कर्म” दो प्रकारसे होते हैं—सकामभावसे और निष्कामभावसे। ये दोनों ही प्रकारके कर्म लोकमें होनेसे लौकिक है3। प्रश्न—अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ—ये तीनों अलौकिक कैसे हैं? उत्तर—“अधिभूत” अर्थात् सम्पूर्ण पांचभौतिक जगत् तत्त्वसे भगवान्का ही स्वरूप होनेसे अलौकिक है—“अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन” (गीता 9। 19) “अमृत और मृत्यु तथा सत् और असत् भी मैं ही हूँ”1। भगवान्ने अर्जुनको जो विराट्रूप दिखाया था, वह भी दिव्य अर्थात् अलौकिक था2। वह दिव्य विराट्रूप भगवान्ने अपने ही दिव्य शरीरके एक अंगमें दिखाया था3। अतः भगवान्का ही विराट्रूप होनेसे यह पांचभौतिक जगत् भी अलौकिक ही है4। भगवान्ने संसारमें अपनी विभूतियोंको भी दिव्य अर्थात् अलौकिक कहा है—“दिव्या ह्यात्मविभूतयः” (गीता 10। 19), “मम दिव्यानां विभूतीनाम्” (10। 40)5। परन्तु जीवको अज्ञानवश अपनी बुद्धिसे (राग-द्वेषके कारण) यह जगत् लौकिक दीखता है। इसलिये अज्ञान मिटनेपर जड़ता रहती ही नहीं, केवल चिन्मयता रहती है। “अधिदैव” अर्थात् ब्रह्माजी आदि सभी देवता अलौकिक हैं। “अधियज्ञ” अर्थात् अन्तर्यामी भगवान् सबके हृदयमें रहते हुए भी निर्लिप्त होनेके कारण अलौकिक हैं6। भगवान्ने “साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञम्” पदोंमें अपनेको अधिभूत, अधिदैव तथा अधियज्ञके सहित जाननेकी बात कही है। इससे सिद्ध होता है कि परमात्माके सहित होनेसे ही ये तीनों अलौकिक हैं, अन्यथा लौकिक ही हैं। जबतक भगवान्के साथ सम्बन्ध नहीं होता, तबतक सब लौकिक ही होता है; परन्तु भगवान्के साथ सम्बन्ध होनेसे सब अलौकिक हो जाता है। इसलिये अपना उद्योग मुख्य होनेसे कर्मयोग तथा ज्ञानयोग “लौकिक निष्ठा” है और भगवान्का आश्रय मुख्य होनेसे भक्तियोग “अलौकिक निष्ठा” है। वास्तवमें लौकिक कोई तत्त्व नहीं है। वास्तविक तत्त्व तो अलौकिक ही है। परन्तु साधककी दृष्टिसे लौकिक और अलौकिक—ये दो भेद कहे गये हैं। तात्पर्य है कि लौकिक-अलौकिकका विभाग अज्ञानवश होनेवाले राग- द्वेषके कारण ही है। राग-द्वेष न हों तो सब कुछ अलौकिक, चिन्मय, दिव्य ही है—“वासुदेवः सर्वम्”। कारण कि लौकिककी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं है। राग-द्वेषके कारण ही लौकिककी सत्ता और महत्ता दीखती है। राग-द्वेषके कारण ही जीवने भगवत्स्वरूप संसारको भी लौकिक बना दिया और खुद भी लौकिक बन गया! विज्ञानसहित ज्ञानका अर्थात् भगवान्के समग्ररूपका वर्णन करनेका तात्पर्य यही है कि जड़-चेतन, सत्-असत्, परा-अपरा, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ आदि जो कुछ भी है, वह सब भगवान्का ही स्वरूप है। इसलिये भगवान्ने यहाँ समग्ररूपवर्णनके आदि और अन्तमें “माम्” पद दिया है, जो समग्रका वाचक है— “मामाश्रित्य” (7। 29) और “मां ते विदुः” (7। 30)। भगवान्ने कर्मोंकी गति (तत्त्व)-को गहन बताया है—“गहना कर्मणो गतिः” (गीता 4। 17), पर भक्त उसको भी जान लेता है। कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म (चौथे अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)—दोनोंको भक्त जान लेता है। तात्पर्य है कि वह कर्मको भी जान लेता है और कर्मयोगको भी जान लेता है। कर्मयोगी तो कर्मयोगको ही जानता है और ज्ञानयोगी ज्ञानयोगको ही जानता है, पर भक्त भगवत्कृपासे कर्मयोग और ज्ञानयोग—दोनोंको ही जान लेता है। इसी अध्यायके पहले श्लोकमें आये “योगं युञ्जन्मदाश्रयः” को यहाँ “मामाश्रित्य यतन्ति ये” पदोंसे और “मय्यासक्तमनाः” को यहाँ “युक्तचेतसः” पदसे कहा गया है। तात्पर्य है कि मेरा आश्रय लेनेसे भक्तको कर्मयोग तथा ज्ञानयोगकी भी सिद्धि हो जाती है अर्थात् वे दोनोंके फल (लक्ष्य) रूप ब्रह्मको भी जान लेते हैं—“ते ब्रह्म तद्विदुः” और मेरे समग्ररूपको भी जान लेते हैं—“मां ते विदुः।” “प्रयाणकालेऽपि” में “अपि” पद देनेका तात्पर्य है कि वे भक्त मेरेको पहले भी जानते हैं और अन्तकालमें भी जानते हैं अर्थात् उनका ज्ञान कभी लुप्त नहीं होता। ऐसे भक्त “युक्तचेता” हो जाते हैं अर्थात् उनके मनकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती, प्रत्युत केवल भगवान् ही रहते हैं। भगवान्के साथ उनकी अभिन्नता (नित्ययोग) होनेसे न वे भगवान्से वियुक्त होते हैं, न भगवान् उनसे वियुक्त होते हैं। ऐसे युक्तचेता भक्त अन्तकालमें कुछ भी चिन्तन होनेपर भी योगभ्रष्ट नहीं होते, प्रत्युत भगवान्को ही प्राप्त होते हैं—“प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः।” कारण कि उन भक्तोंकी दृष्टिमें जब भगवान्के सिवाय किंचिन्मात्र भी कुछ नहीं है, तो फिर उनका मन भगवान्को छोड़कर कहाँ जायगा ? क्यों जायगा? कैसे जायगा? उनके मनमें कुछ भी चिन्तन होगा तो भगवान्का ही चिन्तन होगा, फिर उनका मन विचलित कैसे होगा और मनके विचलित हुए बिना वह योगभ्रष्ट कैसे होगा? कारण कि करणसापेक्ष साधनमें योगसे मनके विचलित होनेपर ही मनुष्य योगभ्रष्ट होता है—“योगाच्चलितमानसः” (गीता 6। 37); परन्तु सब जगह भगवान्को देखनेवालेका भगवान्से नित्ययोग रहता है। भगवान्के कुछ भक्त तो मुक्ति चाहते हैं—“जरामरणमोक्षाय” और कुछ भक्त प्रेम चाहते हैं—“मां ते विदुर्युक्तचेतसः”। मुक्ति चाहनेवाले भक्त कर्मयोग और ज्ञानयोग (ब्रह्म, अध्यात्म और कर्म)-को जान लेते हैं, पर प्रेम चाहनेवाले भक्त स्वयं समग्र भगवान्को जान लेते हैं—“मां विदुः।” भगवान् अपने प्रेमी भक्तोंको कर्मयोग (बुद्धियोग) और ज्ञानयोग—दोनों प्रदान कर देते हैं (गीता—दसवें अध्यायका दसवाँ-ग्यारहवाँ श्लोक)। जरा-मरणरूप बन्धन और मुक्ति—दोनों ही लौकिक हैं, पर प्रेम अलौकिक है। यद्यपि साधन-भक्ति भी लौकिक है, तथापि उद्देश्य अलौकिक होनेसे वह अलौकिक साध्य-भक्तिमें चली जाती है—“भक्त्या संजातया भक्त्या” (श्रीमद्भा0 11। 3। 31)। इस प्रकार ॐ, तत्, सत्—इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्रूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें “ज्ञानविज्ञानयोग” नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ 7॥ इस सातवें अध्यायमें ज्ञान और विज्ञानका वर्णन किया गया है। भगवान् इस सम्पूर्ण जगत्के महाकारण हैं—ऐसा दृढ़तापूर्वक मानना “ज्ञान” है। ऐसे ही भगवान्के सिवाय कुछ भी नहीं है—ऐसा अनुभव हो जाना “विज्ञान” है। ज्ञान और विज्ञानसे परमात्माके साथ नित्ययोगका अनुभव हो जाता है अर्थात् “मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं” इस परम प्रेमरूप नित्य-सम्बन्धकी जागृति हो जाती है। इसलिये इस सातवें अध्यायका नाम “ज्ञानविज्ञानयोग” रखा गया है। सातवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच (1)इस अध्यायमें “अथ सप्तमोऽध्यायः” के तीन, “श्रीभगवानुवाच” के दो, श्लोकोंके चार सौ छः और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका योग चार सौ चौबीस है। (2) “अथ सप्तमोऽध्यायः” के सात “श्रीभगवानुवाच” सातवें अध्यायका सार भगवान्की दो प्रकृतियाँ हैं—अपरा और परा। संसार “अपरा” प्रकृति है और जीव “परा” प्रकृति है। अपरा प्रकृति जड़ तथा निरन्तर परिवर्तनशील है और परा प्रकृति चेतन तथा नित्य अपरिवर्तनशील है। भगवान्ने अपरा और परा— दोनोंको अपनी ही प्रकृति अर्थात् स्वभाव बताया है—“इतीयं मे” (7। 4), “मे पराम्” (7। 5)। भगवान्का स्वभाव होनेसे अपरा प्रकृतिकी स्वतन्त्र (भगवान्से अलग) सत्ता नहीं है; परन्तु जीव (परा प्रकृति) अपराको सत्ता और महत्ता देकर उसके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है। यह सम्बन्ध जीव दो प्रकारसे मानता है—(1) अहंतापूर्वक; जैसे—मैं शरीर हूँ और (2) ममतापूर्वक; जैसे—शरीर मेरा है। यह माना हुआ सम्बन्ध ही सम्पूर्ण प्राणियोंके उत्पन्न होनेमें कारण है—“कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु” (गीता 13। 21)। वास्तवमें सम्पूर्ण जगत्के कर्ता, कारण तथा कार्य एक भगवान् ही हैं। भगवान्के सिवाय दूसरा कोई है ही नहीं— “मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति” (7। 7)। यह सिद्धान्त है कि सत्ता एक ही होती है, दो नहीं होती। अतः एक भगवान् ही अनेक रूपोंमें प्रकट हुए हैं। आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी—ये पाँच महाभूत तथा इनके कार्य शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये पाँच विषय—इन सबके मूल कारण भगवान् ही हैं। भगवान् ही सम्पूर्ण प्राणियोंके अनादि तथा अविनाशी बीज हैं। तात्पर्य है कि सृष्टिमें जो कुछ भी क्रिया, पदार्थ, भाव आदि देखने-सुनने-समझनेमें आते हैं, उन सबके बीज (मूल कारण) एकमात्र भगवान् ही हैं। कारण ही कार्यरूपमें परिणत होता है।* अतः कारणकी तो स्वतन्त्र सत्ता होती है, पर कार्यकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं होती। इसलिये अगर कोई साधक कार्यमें भगवान्को प्राप्त करना चाहे तो उसको भगवान् नहीं मिलेंगे—“न त्वहं तेषु ते मयि” (7। 12)। जो सबके कारणरूप भगवान्के शरण होते हैं, उन्हींको भगवान् मिलते हैं। परन्तु जो कारणरूप भगवान्के शरण न होकर कार्यरूप सत्त्वादि गुणोंमें उलझ जाते हैं, वे जन्म- मरणके चक्रमें पड़े रहते हैं। ऐसे मनुष्य कार्यरूप शरीर-संसारके सम्बन्धसे होनेवाली कामनाओंकी पूर्तिके लिये देवताओंकी शरण लेते हैं, क्योंकि वे अलौकिक भगवान्को साधारण मनुष्यकी तरह लौकिक मानते हैं। परन्तु जो मनुष्य तीनों गुणोंसे मोहित नहीं होते, वे भगवान्की शरण लेते हैं। ऐसे भक्तोंके चार भेद होते हैं—अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी। इन शरणागत भक्तोंमें भी जो “सब कुछ भगवान् ही हैं”—इस प्रकार भगवान्के शरण हो जाता है, वह महात्मा भक्त मुक्त पुरुषोंसे भी श्रेष्ठ होनेके कारण अत्यन्त दुर्लभ है। वह महात्मा भक्त भगवान्की कृपासे परा-अपरासहित भगवान्के समग्ररूपको के सात, श्लोकोंके नौ सौ साठ और पुष्पिकाके अड़तालीस अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका योग एक हजार बाईस है। इस अध्यायके सभी श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं। (3) इस अध्यायमें एक उवाच है—“श्रीभगवानुवाच”। सातवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द इस अध्यायके तीस श्लोकोंमेंसे—छठे श्लोकके तृतीय चरणमें और चौदहवें श्लोकके प्रथम चरणमें “नगण” प्रयुक्त होनेसे “न-विपुला”; ग्यारहवें श्लोकके तृतीय चरणमें और पचीसवें श्लोकके प्रथम चरणमें “मगण” प्रयुक्त होनेसे “म-विपुला”; सत्रहवें श्लोकके प्रथम चरणमें “रगण” प्रयुक्त होनेसे “र-विपुला”; तथा उन्नीसवें और बीसवें श्लोकके तृतीय चरणमें “भगण” प्रयुक्त होनेसे “भ- विपुला” संज्ञावाले छन्द हैं। शेष तेईस श्लोक ठीक “पथ्यावक्त्र” अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं। जान लेता है, जिसको जाननेपर फिर कुछ भी जानना शेष नहीं रहता; क्योंकि उसके सिवाय अन्य चीज कोई है ही नहीं। उसका भगवान्के साथ आत्मीय सम्बन्ध हो जाता है, जिससे प्रतिक्षण वर्धमान प्रेमकी प्राप्ति (जागृति) हो जाती है। इस प्रेमकी जागृतिमें ही मनुष्यजन्मकी पूर्णता है। एक अपरा प्रकृति है, एक परा प्रकृति है और एक परा-अपराके मालिक परमात्मा हैं। सम्पूर्ण शरीर-संसार (अधिभूत) अपरा प्रकृतिके अन्तर्गत और सम्पूर्ण शरीरी (कृत्स्न अध्यात्म) परा प्रकृतिके अन्तर्गत आते हैं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि मात्र शरीर (संसार) भी एक हैं और मात्र शरीरी (जीव) भी एक हैं तथा अपरा और परा— ये दोनों जिसकी शक्तियाँ हैं, वे परमात्मा भी एक हैं। अतः शरीरोंकी दृष्टिसे, आत्माकी दृष्टिसे और परमात्माकी दृष्टिसे— तीनों ही दृष्टियोंसे हम सब एक हैं, अनेक नहीं हैं—“नेह नानास्ति किञ्चन” (कठ0 2। 1। 11, बृहदा0 4। 4। 19)। सम्पूर्ण शरीरोंमें एकता स्वीकार करनेपर किसी भी प्राणीसे राग अथवा द्वेष नहीं होगा और सम्पूर्ण प्राणियोंके हितका भाव होगा। ऐसा होनेसे “कर्मयोग” सुगमतापूर्वक स्वतः सिद्ध हो जायगा। कारण कि जब अपनेसे भिन्न दूसरा कोई है ही नहीं और व्यक्तिगत अपना कुछ है ही नहीं तो फिर अपने पास जो भी वस्तु है, उसमें ममता नहीं होगी और जो वस्तु नहीं है, उसकी कामना नहीं होगी। ममता और कामना न होनेपर अपने पास जो भी वस्तु है, वह स्वतः दूसरोंकी सेवामें लगेगी। सम्पूर्ण जीवोंमें एकता स्वीकार करनेपर सर्वत्र आत्मभाव अथवा ब्रह्मभाव हो जायगा—“सर्वं खल्विदं ब्रह्म” (छान्दोग्य0 3। 14। 1), “आत्मैवेदं सर्वम्” (छान्दोग्य0 7। 25। 2)। ऐसा होनेसे “ज्ञानयोग” सुगमतापूर्वक स्वतः सिद्ध हो जायगा। कारण कि अनेक रूपसे जो जीव है, वही एक रूपसे ब्रह्म है अर्थात् जीव और ब्रह्म एक ही हैं—“अयमात्मा ब्रह्म” (माण्डूक्य0 1)। अपरा और परा—इन दोनों प्रकृतियोंकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है; क्योंकि ये दोनों भगवान्की शक्तियाँ, स्वभाव होनेसे भगवत्स्वरूप ही हैं। ऐसा स्वीकार करनेसे सर्वत्र भगवद्भाव हो जायगा। “वासुदेवः सर्वम्” (7। 19)। ऐसा होनेसे “भक्तियोग” सुगमतापूर्वक स्वतः सिद्ध हो जायगा। कारण कि “सब कुछ भगवान् ही हैं”—यही वास्तविक शरणागति है। तात्पर्य यह निकला कि जगत्, जीव और परमात्मा—तीनोंकी दृष्टिसे हम सब एक समान हैं। इस समताको गीताने “योग” कहा है—“समत्वं योग उच्यते” (गीता 2। 48)। भेद (विषमता) केवल व्यवहारके लिये है, जो अनिवार्य है; क्योंकि व्यवहारमें समता सम्भव ही नहीं है। अतः साधककी दृष्टि (भावना) सम होनी चाहिये—“सर्वत्र समदर्शनः” (गीता 6। 29), “पण्डिताः समदर्शिनः” (गीता 5। 18), “समबुद्धिर्विशिष्यते” (गीता 6। 9), “सर्वत्र समबुद्धयः” (गीता 12। 4)। व्यवहारकी भिन्नता तो स्वाभाविक है, पर भावकी भिन्नता मनुष्यने अपने राग-द्वेषसे पैदा की है। राग-द्वेषके कारण ही मनुष्यने जगत्, जीव और परमात्मा—तीनोंमें अनेक भेद पैदा कर लिये हैं, जो इसके जन्म- मरणका कारण है—“मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति” (कठ0 2। 1। 11)। जो किसीको भी पराया मानता है, किसीका भी बुरा चाहता, देखता तथा करता है और संसारसे कुछ भी चाहता है, वह न तो कर्मयोगी हो सकता है, न ज्ञानयोगी हो सकता है और न भक्तियोगी ही हो सकता है। जगत्, जीव और परमात्मा—इन तीनोंपर विचार करें तो स्वतन्त्र सत्ता एक परमात्माकी ही है। जगत् और जीवकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। जगत्को जीवने ही धारण किया है—“ययेदं धार्यते जगत्” (7। 5) अर्थात् जगत्को सत्ता जीवने ही दी है, इसलिये जगत्की स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। जीव परमात्माका ही अंश है—“ममैवांशो जीवलोके” (गीता 15। 7), इसलिये खुद जीवकी भी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। तात्पर्य है कि जगत्की सत्ता जीवके अधीन है और जीवकी सत्ता परमात्माके अधीन है, इसलिये एक परमात्माके सिवाय अन्य कुछ नहीं है—“सदसच्चाहमर्जुन” (गीता 9। 19)। जगत् और जीव—दोनों परमात्मामें ही भासित हो रहे हैं।
* उपासना सगुण-निराकारसे शुरू होती है—इसीलिये भगवान्ने इस (सातवें) अध्यायके अट्ठाईसवें श्लोकमें “सगुण-
निराकार” का वर्णन किया है। फिर उनतीसवें श्लोकमें “निर्गुण-निराकार” का और तीसवें श्लोकमें “सगुण-साकार” का
वर्णन किया है। इस प्रकार यहाँ तो तीनों स्वरूपोंका एक-एक श्लोकमें वर्णन किया गया है, पर आगे आठवें अध्यायमें
इन तीनोंका तीन-तीन श्लोकोंमें वर्णन किया गया है, जैसे—आठवें अध्यायके आठवें, नवें और दसवें श्लोकमें “सगुण-
निराकार”की उपासनाका; ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें श्लोकमें “निर्गुण-निराकार” की उपासनाका तथा चौदहवें, पंद्रहवें
और सोलहवें श्लोकमें “सगुण-साकार” की उपासनाका विशद वर्णन किया गया है।
1-सगुण-निर्गुणका भेद तो उपासनाकी दृष्टिसे है। वास्तवमें इन दोनों उपासनाओंमें उपास्यतत्त्व एक ही है। उपासना
साधककी रुचि, विश्वास और योग्यताके अनुसार होती है। अतः साधकोंकी भिन्न-भिन्न रुचि, विश्वास और योग्यता होनेके
कारण उपासनाएँ भी भिन्न-भिन्न होती हैं। परन्तु सम्पूर्ण उपासनाओंसे अन्तमें एक ही उपास्यतत्त्वकी प्राप्ति होती है। उस
उपास्यतत्त्वको ही “समग्र ब्रह्म” कहते हैं।
2-अद्वैतवीथीपथिकैरुपास्याः स्वाराज्यसिंहासनलब्धदीक्षाः। शठेन केनापि वयं हठेन दासीकृता गोपवधूविटेन॥
“अद्वैतमार्गके अनुयायियोंद्वारा पूज्य तथा स्वाराज्यरूपी सिंहासनपर प्रतिष्ठित होनेका अधिकार प्राप्त किये हुए हमें
गोपियोंके पीछे-पीछे फिरनेवाले किसी धूर्तने हठपूर्वक अपने चरणोंका गुलाम बना लिया!”
* “अध्यात्म” से ज्ञानयोग और “कर्म” से कर्मयोग लेना चाहिये। ज्ञानयोग और कर्मयोग—दोनोंसे “ब्रह्म” की प्राप्ति होती
है (गीता—पाँचवें अध्यायका चौथा-पाँचवाँ श्लोक)।
भक्तिका प्रसंग होनेसे यहाँ भगवान्ने ज्ञानयोग और कर्मयोगका विस्तारसे वर्णन नहीं किया। इनका विस्तारसे वर्णन
पिछले (दूसरेसे छठे) अध्यायोंमें कर चुके हैं।
1-यहाँ “पवित्रमिह” के अन्तर्गत आया “इह” शब्द लोकका वाचक है।
2-बँध्यो बिषय सनेह ते, ताते कहियै जीव। अलख अजोणी आप है, हरिया न्यारौ थीव॥
3-लोकमें होनेवाले सकाम-कर्म—“यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।” (गीता 3। 9), “क्षिप्रं हि मानुषे लोके
सिद्धिर्भवति कर्मजा॥” (गीता 4। 12); “कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके” (गीता 15। 2)।
लोकमें होनेवाले निष्काम-कर्म—“लोकेऽस्मिन्द्विविधा ........ योगिनाम्॥” (गीता 3। 3)।
वास्तवमें कर्म सकाम या निष्काम नहीं होते, प्रत्युत कर्ता सकाम या निष्काम होता है। अतः सकाम-निष्कामभाव
कर्तामें रहते हैं।
1-मनसा वचसा दृष्ट्या गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियैः। अहमेव न मत्तोऽन्यदिति बुध्यध्वमंजसा॥
(श्रीमद्भा0 11। 13। 24)
“मनसे, वाणीसे, दृष्टिसे तथा अन्य इन्द्रियोंसे भी जो कुछ ग्रहण किया जाता है, वह सब मैं ही हूँ। अतः मेरे सिवाय
और कुछ भी नहीं है—यह सिद्धान्त आपलोग विचारपूर्वक शीघ्र समझ लें, स्वीकार कर लें।
2-“नानाविधानि दिव्यानि” (गीता 11। 5), “अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्” (11। 10), “दिव्यमाल्याम्बरधरं
दिव्यगन्धानुलेपनम्” (11। 11), “पश्यामि देवांस्तव देव देहे......सर्वानुरगांश्च दिव्यान्” (11। 15)।
3-भगवान्के वचन हैं—“इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं...... मम देहे” (11। 7)।
संजयके वचन हैं—“तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं...... अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे” (11। 13)।
अर्जुनके वचन हैं—“पश्यामि देवांस्तव देव देहे” (11। 15)।
4-खं वायुमग्निं सलिलं महीं च
ज्योतींषि सत्त्वानि दिशो द्रुमादीन्।
सरित्समुद्रांश्च
हरेः
शरीरं
यत् किंच भूतं प्रणमेदनन्यः॥
(श्रीमद्भा0 11। 2। 41)
“आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, ग्रह-नक्षत्र, जीव-जन्तु, दिशाएँ, वृक्ष, नदियाँ, समुद्र—सब-के-सब भगवान्के
ही शरीर हैं—ऐसा मानकर भक्त सभीको अनन्यभावसे प्रणाम करता है।”
भूद्वीपवर्षसरिदद्रिनभःसमुद्रपातालदिङ्नरकभागणलोकसंस्था
।
गीता मया तव नृपाद्भुतमीश्वरस्य स्थूलं वपुः सकलजीवनिकायधाम॥
(श्रीमद्भा0 5। 26। 40)
“परीक्षित्! मैंने तुमसे पृथ्वी, उसके अन्तर्गत द्वीप, वर्ष, नदी, पर्वत, आकाश, समुद्र, पाताल, दिशा, नरक, ज्योतिर्गण
और लोकोंकी स्थितिका वर्णन किया। यही भगवान्का अति अद्भुत स्थूल रूप है, जो समस्त जीवसमुदायका आश्रय है।”
5-अर्जुनने भी विभूतियोंको दिव्य कहा है—“वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः” (10। 16)।
द्वा
सुपर्णा
सयुजा
सखाया
समानं
वृक्षं
परिषस्वजाते।
तयोरन्यः
पिप्पलं
स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो
अभिचाकशीति॥
(मुण्डक0 3। 1। 1; श्वेताश्वतर0 4। 6)
6-“एक साथ रहनेवाले तथा परस्पर सखाभाव रखनेवाले दो पक्षी—जीवात्मा और परमात्मा एक ही वृक्ष—शरीरका
आश्रय लेकर रहते हैं। उन दोनोंमेंसे एक (जीवात्मा) तो उस वृक्षके कर्मफलोंका स्वाद ले-लेकर उपभोग करता है, पर दूसरा
(परमात्मा) उपभोग न करता हुआ केवल प्रकाशित करता है।”
* भगवान् कार्यरूपमें परिणत नहीं होते, प्रत्युत कार्यरूपसे प्रकट होते हैं।
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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः॥