ग्रन्थ
7ज्ञानविज्ञानयोग

ज्ञानविज्ञानयोग

Jnana-Vijnana-Yoga
Knowledge and Realisation
30 verses · 29 printed blockspp. 490578 · Sadhak Sanjivaniसाधारण भाषाटीका 29 · साधक-संजीवनी 29 · श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्य 30 · श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीका 29
1श्रीभगवान्
श्रीभगवान् उवाच
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः। असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥ 1॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

श्रीभगवानुवाच

पदच्छेद
श्लोकमें ढूँढ़नेके लिये हॉवर करें
व्याख्या
7 sections
श्रीभगवान्ने छठे अध्यायके छियालीसवें श्लोकमें योगीकी महिमा कही और सैंतालीसवें श्लोकमें कहा कि योगियोंमें भी जो मुझमें श्रद्धा-प्रेम करके मेरा भजन करते हैं, वे भक्त सर्वश्रेष्ठ हैं। भक्तोंको जैसे भगवान्की याद आती है तो वे उसमें तल्लीन हो जाते हैं—मस्त हो जाते हैं, ऐसे ही भगवान्के सामने भक्तोंका विशेष प्रसंग आता है तो भगवान् उसमें मस्त हो जाते हैं। इसी मस्तीमें सराबोर होते हुए भगवान् अर्जुनके बिना पूछे ही सातवें अध्यायका विषय अपनी तरफसे प्रारम्भ कर देते हैं। व्याख्या—
मय्यासक्तमनाः
मेरेमें ही जिसका मन आसक्त हो गया है अर्थात् अधिक स्नेहके कारण जिसका मन स्वाभाविक ही मेरेमें लग गया है, चिपक गया है, उसको मेरी याद करनी नहीं पड़ती, प्रत्युत स्वाभाविक मेरी याद आती है और विस्मृति कभी होती ही नहीं—ऐसा तू मेरेमें मनवाला हो। जिसका उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंका और शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्धका आकर्षण मिट गया है, जिसका इस लोकमें शरीरके आराम, आदर-सत्कार और नामकी बड़ाईमें तथा स्वर्गादि परलोकके भोगोंमें किंचिन्मात्र भी खिंचाव, आसक्ति या प्रियता नहीं है, प्रत्युत केवल मेरी तरफ ही खिंचाव है, ऐसे पुरुषका नाम “मय्यासक्तमनाः” है। साधक भगवान्में मन कैसे लगाये, जिससे वह “मय्यासक्तमनाः” हो जाय—इसके लिये दो उपाय बताये जाते हैं— (1) साधक जब सच्ची नीयतसे भगवान्के लिये ही जप-ध्यान करने बैठता है, तब भगवान् उसको अपना भजन मान लेते हैं। जैसे, कोई धनी आदमी किसी नौकरसे कह दे कि “तुम यहाँ बैठो, कोई काम होगा तो तुम्हारेको बता देंगे।” किसी दिन उस नौकरको मालिकने कोई काम नहीं बताया। वह नौकर दिनभर खाली बैठा रहा और शामको मालिकसे कहता है—“बाबू! मेरेको पैसे दीजिये।” मालिक कहता है—“तुम सारे दिन बैठे रहे, पैसे किस बातके?” वह नौकर कहता है—“बाबूजी! सारे दिन बैठा रहा, इस बातके!” इस तरह जब एक मनुष्यके लिये बैठनेवालेको भी पैसे मिलते हैं, तब जो केवल भगवान्में मन लगानेके लिये सच्ची लगनसे बैठता है, उसका बैठना क्या भगवान् निरर्थक मानेंगे? तात्पर्य यह हुआ कि जो भगवान्में मन लगानेके लिये भगवान्का आश्रय लेकर, भगवान्के ही भरोसे बैठता है, वह भगवान्की कृपासे भगवान्में मनवाला हो जाता है। (2) भगवान् सब जगह हैं तो यहाँ भी हैं; क्योंकि अगर यहाँ नहीं हैं तो भगवान् सब जगह हैं—यह कहना नहीं बनता। भगवान् सब समयमें हैं तो इस समय भी हैं; क्योंकि अगर इस समय नहीं हैं तो भगवान् सब समयमें हैं—यह कहना नहीं बनता। भगवान् सबमें हैं तो मेरेमें भी हैं; क्योंकि अगर मेरेमें नहीं हैं तो भगवान् सबमें हैं—यह कहना नहीं बनता। भगवान् सबके हैं तो मेरे भी हैं; क्योंकि अगर मेरे नहीं हैं तो भगवान् सबके हैं—यह कहना नहीं बनता। इसलिये भगवान् यहाँ हैं, अभी हैं, अपनेमें हैं और अपने हैं। कोई देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, घटना और क्रिया उनसे रहित नहीं है, उनसे रहित होना सम्भव ही नहीं है। इस बातको दृढ़तासे मानते हुए, भगवन्नाममें, प्राणमें, मनमें, बुद्धिमें, शरीरमें, शरीरके कण-कणमें परमात्मा हैं—इस भावकी जागृति रखते हुए नाम-जप करे तो साधक बहुत जल्दी भगवान्में मनवाला हो सकता है।
मदाश्रयः
जिसको केवल मेरी ही आशा है, मेरा ही भरोसा है, मेरा ही सहारा है, मेरा ही विश्वास है और जो सर्वथा मेरे ही आश्रित रहता है, वह “मदाश्रयः” है। किसी-न-किसीका आश्रय लेना इस जीवका स्वभाव है। परमात्माका अंश होनेसे यह जीव अपने अंशीको ढूँढ़ता है। परन्तु जबतक इसके लक्ष्यमें, उद्देश्यमें परमात्मा नहीं होते, तबतक यह शरीरके साथ सम्बन्ध जोड़े रहता है और शरीर जिसका अंश है, उस संसारकी तरफ खिंचता है। वह यह मानने लगता है कि इससे ही मेरेको कुछ मिलेगा, इसीसे मैं निहाल हो जाऊँगा, जो कुछ होगा, वह संसारसे ही होगा। परन्तु जब यह भगवान्को ही सर्वोपरि मान लेता है, तब यह भगवान्में आसक्त हो जाता है और भगवान्का ही आश्रय ले लेता है। संसारका अर्थात् धन, सम्पत्ति, वैभव, विद्या, बुद्धि, योग्यता, कुटुम्ब आदिका जो आश्रय है, वह नाशवान् है, मिटनेवाला है, स्थिर रहनेवाला नहीं है। वह सदा रहनेवाला नहीं है और सदाके लिये पूर्ति और तृप्ति करानेवाला भी नहीं है। परन्तु भगवान्का आश्रय कभी किंचिन्मात्र भी कम होनेवाला नहीं है; क्योंकि भगवान्का आश्रय पहले भी था, अभी भी है और आगे भी रहेगा। अतः आश्रय केवल भगवान्का ही लेना चाहिये। केवल भगवान्का ही आश्रय, अवलम्बन, आधार, सहारा हो। इसीका वाचक यहाँ “मदाश्रयः” पद है। भगवान् कहते हैं कि मन भी मेरेमें आसक्त हो जाय और आश्रय भी मेरा हो। मन आसक्त होता है—प्रेमसे और प्रेम होता है—अपनेपनसे। आश्रय लिया जाता है—बड़ेका, सर्वसमर्थका। सर्वसमर्थ तो हमारे प्रभु ही हैं। इसलिये उनका ही आश्रय लेना है और उनके प्रत्येक विधानमें प्रसन्न होना है कि मेरे मनके विरुद्ध विधान भेजकर प्रभु मेरी कितनी निगरानी रखते हैं! मेरा कितना खयाल रखते हैं कि मेरी सम्मति लिये बिना ही विधान करते हैं! ऐसे मेरे दयालु प्रभुका मेरेपर कितना अपनापन है! अतः मेरेको कभी किसी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति आदिकी किंचिन्मात्र भी आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार भगवान्के आश्रित रहना ही “मदाश्रयः” होना है।
योगं युञ्जन्
भगवान्के साथ जो स्वतःसिद्ध अखण्ड सम्बन्ध है, उस सम्बन्धको मानता हुआ तथा सिद्धि-असिद्धिमें सम रहता हुआ साधक जप, ध्यान, कीर्तन करनेमें, भगवान्की लीला और स्वरूपका चिन्तन करनेमें स्वाभाविक ही अटल भावसे लगा रहता है। उसकी चेष्टा स्वाभाविक ही भगवान्के अनुकूल होती है। यही “योगं युञ्जन्” कहनेका तात्पर्य है। जब साधक भगवान्में ही आसक्त मनवाला और भगवान्के ही आश्रयवाला होगा, तब वह अभ्यास क्या करेगा? कौन-सा योग करेगा? वह भगवत्सम्बन्धी अथवा संसार-सम्बन्धी जो भी कार्य करता है, वह सब योगका ही अभ्यास है। तात्पर्य है कि जिससे परमात्माका सम्बन्ध हो जाय, वह (लौकिक या पारमार्थिक) काम करता है और जिससे परमात्माका वियोग हो जाय, वह काम नहीं करता है।
असंशयं समग्रं माम्
जिसका मन भगवान्में आसक्त हो गया है, जो सर्वथा भगवान्के आश्रित हो गया है और जिसने भगवान्के सम्बन्धको स्वीकार कर लिया है—ऐसा पुरुष भगवान्के समग्ररूपको जान लेता है अर्थात् सगुण- निर्गुण, साकार-निराकार, अवतार-अवतारी और शिव, गणेश, सूर्य, विष्णु आदि जितने रूप हैं, उन सबको वह जान लेता है। भगवान् अपने भक्तकी बात कहते-कहते अघाते नहीं हैं और कहते हैं कि ज्ञानमार्गसे चलनेवाला तो मेरेको जान सकता है और प्राप्त कर सकता है; परंतु भक्तिसे तो मेरा भक्त समग्ररूपको जान सकता है और इष्टका अर्थात् जिस रूपसे मेरी उपासना करता है, उस रूपका दर्शन भी कर सकता है।
यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु
यहाँ “यथा”1 पदसे प्रकार बताया गया है कि तू जिस प्रकार जान सके, वह प्रकार भी कहूँगा, और “तत्”2 पदसे बताया गया है कि जिस तत्त्वको तू जान सकता है, उसका मैं वर्णन करता हूँ , तू सुन। छठे अध्यायके सैंतालीसवें श्लोकमें “श्रद्धावान् भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः” पदोंमें प्रथम पुरुष- (वह-) का प्रयोग करके सामान्य बात कही थी और यहाँ सातवाँ अध्याय आरम्भ करते हुए “यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु” पदोंमें मध्यम पुरुष-(तू-) का प्रयोग करके अर्जुनके लिये विशेषतासे कहते हैं कि तू जिस प्रकार मेरे समग्ररूपको जानेगा,वह मेरेसे सुन। इससे पहलेके छः अध्यायोंमें भगवान्के लिये “समग्र” शब्द नहीं आया है। चौथे अध्यायके तेईसवें श्लोकमें “यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते” पदोंमें कर्मके विशेषणके रूपमें “समग्र” शब्द आया है और यहाँ “समग्र” शब्द भगवान्के विशेषणके रूपमें आया है। “समग्र” शब्दमें भगवान्का तात्त्विक स्वरूप सब-का-सब आ जाता है, बाकी कुछ नहीं बचता। (2) परमात्माके साथ वास्तविक सम्बन्धका नाम “योगम्” है और उस सम्बन्धको अखण्डभावसे माननेका नाम “युञ्जन्” है। तात्पर्य यह है कि मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ आदिके साथ सम्बन्ध मानकर अपनेमें
मैं
रूपसे जो एक व्यक्तित्व मान रखा है, उसको न मानते हुए परमात्माके साथ जो अपनी वास्तविक अभिन्नता है, उसका अनुभव करता रहे। वास्तवमें “योगं युञ्जन्” की इतनी आवश्यकता नहीं है, जितनी आवश्यकता संसारकी आसक्ति और आश्रय छोड़नेकी है। संसारकी आसक्ति और आश्रय छोड़नेसे परमात्माका चिन्तन स्वतः-स्वाभाविक होगा और सम्पूर्ण क्रियाएँ निष्कामभावपूर्वक होने लगेंगी। फिर भगवान्को जाननेके लिये उसको कोई अभ्यास नहीं करना पड़ेगा। इसका तात्पर्य यह है कि जिसका संसारकी तरफ खिंचाव है और जिसके अन्तःकरणमें उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंका महत्त्व बैठा हुआ है, वह परमात्माके वास्तविक स्वरूपको नहीं जान सकता। कारण कि उसकी आसक्ति, कामना, महत्ता संसारमें है, जिससे संसारमें परमात्माके परिपूर्ण रहते हुए भी वह उनको नहीं जान सकता।
परिशिष्ट भाव
जिसका मन स्वाभाविक ही भगवान्की तरफ खिंच गया है, जो सर्वथा भगवान्के आश्रित हो गया है और जिसने भगवान्के साथ अपने स्वतःसिद्ध नित्ययोग-(आत्मीय सम्बन्ध-) को स्वीकार कर लिया है, वह भक्त भगवान्के समग्ररूपको जान लेता है। सब कुछ भगवान् ही हैं—यह भगवान्का समग्ररूप है। “मय्यासक्तमनाः” में प्रेमकी और “मदाश्रयः” में श्रद्धाकी मुख्यता है। “समग्रं माम्”—इसमें “समग्रम्” (समग्ररूप) विशेषण है और “माम्” (भगवान्) विशेष्य हैं। भक्तका सम्बन्ध विशेषणके साथ न होकर विशेष्यके साथ होता है। छठे अध्यायके अन्तमें “श्रद्धावान्भजते यो माम्” पदोंमें आये “माम्” का क्या स्वरूप है—इसको भगवान् यहाँ बताते हैं कि वह “माम्” मेरा समग्ररूप है। “यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु”—उस समग्ररूपका वर्णन मैं इस प्रकार, ढंग, युक्ति, शैलीसे करूँगा, जिससे तू मेरेको सुगमतापूर्वक यथार्थरूपसे जान लेगा। अर्जुनने पिछले अध्यायमें अपना संशय प्रकट किया था—“एतन्मे संशयं कृष्ण0” (6। 39), इसलिये भगवान् कहते हैं कि अब मैं वही बात कहूँगा, जिससे कोई संशय बाकी न रहे।
विशेष बात
विशेष बात (1) इस श्लोकमें “आसक्ति केवल मेरेमें ही हो, आश्रय भी केवल मेरा ही हो, फिर योगका अभ्यास किया जाय तो मेरे समग्ररूपको जान लेगा”—ऐसा कहनेमें भगवान्का तात्पर्य है कि अगर मनुष्यकी आसक्ति भोगोंमें है और आश्रय रुपये-पैसे, कुटुम्ब आदिका है तो कर्मयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग आदि किसी योगका अभ्यास करता हुआ भी मेरेको नहीं जान सकता। मेरे समग्ररूपको जाननेके लिये तो मेरेमें ही प्रेम हो, मेरा ही आश्रय हो। मेरेसे किसी भी कार्यपूर्तिकी इच्छा न हो। ऐसा होना चाहिये और ऐसा नहीं होना चाहिये—इस कामनाको छोड़कर, भगवान् जो करते हैं, वही होना चाहिये और भगवान् जो नहीं करना चाहते वह नहीं होना चाहिये— इस भावसे केवल मेरा आश्रय लेता है, वह मेरे समग्र रूपको जान लेता है। इसलिये भगवान् अर्जुनको कहते हैं कि तू “मय्यासक्तमनाः” और “मदाश्रयः” हो जा। मनुष्यका जब समाजके किसी बड़े व्यक्तिसे अपनापन हो जाता है, तब उसको एक प्रसन्नता होती है। ऐसे ही जब हमारे सदाके हितैषी और हमारे खास अंशी भगवान्में आत्मीयता जाग्रत् हो जाती है, तब हरदम प्रसन्नता रहते हुए एक अलौकिक, विलक्षण प्रेम प्रकट हो जाता है। फिर साधक स्वाभाविक ही भगवान्में मनवाला और भगवान्के आश्रित हो जाता है। शरणागतिके पर्याय आश्रय, अवलम्बन, अधीनता, प्रपत्ति और सहारा— ये सभी शब्द “शरणागति” के पर्यायवाचक होते हुए भी अपना अलग अर्थ रखते हैं; जैसे— (1) आश्रय—जैसे हम पृथ्वीके आधारके बिना जी ही नहीं सकते और उठना-बैठना आदि कुछ कर ही नहीं सकते, ऐसे ही प्रभुके आधारके बिना हम जी नहीं सकते और कुछ भी कर नहीं सकते। जीना और कुछ भी करना प्रभुके आधारसे ही होता है। इसीको “आश्रय” कहते हैं। (2) अवलम्बन—जैसे किसीके हाथकी हड्डी टूटनेपर डॉक्टरलोग उसपर पट्टी बाँधकर उसको गलेके सहारे लटका देते हैं तो वह हाथ गलेके अवलम्बित हो जाता है, ऐसे ही संसारसे निराश और अनाश्रित होकर भगवान्के गले पड़ने अर्थात् भगवान्को पकड़ लेनेका नाम “अवलम्बन” है। (3) अधीनता—अधीनता दो तरहसे होती है—1- कोई हमें जबर्दस्तीसे अधीन कर ले या पकड़ ले और 2-हम अपनी तरफसे किसीके अधीन हो जायँ या उसके दास बन जायँ। ऐसे ही अपना कुछ भी प्रयोजन न रखकर अर्थात् केवल भगवान्को लेकर ही अनन्यभावसे सर्वथा भगवान्का दास बन जाना और केवल भगवान्को ही अपना स्वामी मान लेना “अधीनता” है। (4) प्रपत्ति—जैसे कोई किसी समर्थके चरणोंमें लम्बा पड़ जाता है, ऐसे ही संसारकी तरफसे सर्वथा निराश होकर भगवान्के चरणोंमें गिर जाना “प्रपत्ति” (प्रपन्नता) है। (5) सहारा—जैसे जलमें डूबनेवालेको किसी वृक्ष, लता, रस्से आदिका आधार मिल जाय, ऐसे ही संसारमें बार-बार जन्म-मरणमें डूबनेके भयसे भगवान्का आधार ले लेना “सहारा” है। इस प्रकार उपर्युक्त सभी शब्दोंमें केवल शरणागतिका भाव प्रकट होता है। शरणागति तब होती है, जब भगवान्में ही आसक्ति हो और भगवान्का ही आश्रय हो अर्थात् भगवान्में ही मन लगे और भगवान्में ही बुद्धि लगे। अगर मनुष्य मन-बुद्धिसहित स्वयं भगवान्के आश्रित (समर्पित) हो जाय, तो शरणागतिके उपर्युक्त सब-के-सब भाव उसमें आ जाते हैं। मन और बुद्धिको अपने न मानकर “ये भगवान्के ही हैं” ऐसा दृढ़तासे मान लेनेसे साधक “मय्यासक्तमनाः” और “मदाश्रयः” हो जाता है। सांसारिक वस्तुमात्र प्रतिक्षण प्रलयकी तरफ जा रही है और किसी भी वस्तुसे अपना नित्य सम्बन्ध है ही नहीं—यह सबका अनुभव है। अगर इस अनुभवको महत्त्व दिया जाय अर्थात् मिटनेवाले सम्बन्धको अपना न माना जाय तो अपने कल्याणका उद्देश्य होनेसे भगवान्की शरणागति स्वतः आ जायगी। कारण कि यह स्वतः ही भगवान्का है। संसारके साथ सम्बन्ध केवल माना हुआ है (वास्तवमें सम्बन्ध है नहीं) और भगवान्से केवल विमुखता हुई है (वास्तवमें विमुखता है नहीं)। इसलिये माना हुआ सम्बन्ध छोड़नेपर भगवान्के साथ जो स्वतःसिद्ध सम्बन्ध है, वह प्रकट हो जाता है।
1-स्थूलसे लेकर सूक्ष्मतक वर्णन करना (जैसे—भूमिसे जल सूक्ष्म है, जलसे अग्नि सूक्ष्म है, अग्निसे वायु सूक्ष्म है
आदि)—यह “यथा” कहनेका तात्पर्य है। इस “यथा” अर्थात् प्रकारका वर्णन इसी अध्यायके चौथेसे सातवें श्लोकतक हुआ है।
2-जो कुछ कार्य (संसार) दीखता है, उसमें कारणरूपसे भगवान् ही हैं—यह “तत्” कहनेका तात्पर्य है। इसका वर्णन
इसी अध्यायके आठवेंसे बारहवें श्लोकतक हुआ है।
2श्रीभगवान्
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः। यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥ 2॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

पहले श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा था कि तू मेरे समग्र रूपको जैसा जानेगा, वह सुन। अब भगवान् आगेके श्लोकमें उसे सुनानेकी प्रतिज्ञा करते हैं।

पदच्छेद
श्लोकमें ढूँढ़नेके लिये हॉवर करें
व्याख्या
1 section
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्या- म्यशेषतः
भगवान् कहते हैं कि भैया अर्जुन! अब मैं विज्ञानसहित ज्ञान कहूँगा1, तुम्हें कहूँगा और मैं खुद कहूँगा तथा सम्पूर्णतासे कहूँगा। ऐसे तो हरेक आदमी हरेक गुरुसे मेरे स्वरूपके बारेमें सुनता है और उससे लाभ भी होता है; परन्तु तुम्हें मैं स्वयं कह रहा हूँ। स्वयं कौन? जो समग्र परमात्मा है, वह मैं स्वयं! मैं स्वयं मेरे स्वरूपका जैसा वर्णन कर सकता हूँ, वैसा दूसरे नहीं कर सकते; क्योंकि वे तो सुनकर और अपनी बुद्धिके अनुसार विचार करके ही कहते हैं2। उनकी बुद्धि समष्टि बुद्धिका एक छोटा- सा अंश है, वह कितना जान सकती है! वे तो पहले अनजान होकर फिर जानकार बनते हैं, पर मैं सदा अलुप्तज्ञान हूँ। मेरेमें अनजानपना न है, न कभी था, न होगा और न होना सम्भव ही है। इसलिये मैं तेरे लिये उस तत्त्वका वर्णन करूँगा, जिसको जाननेके बाद और कुछ जानना बाकी नहीं रहेगा। दसवें अध्यायके सोलहवें श्लोकमें अर्जुन कहते हैं कि आप अपनी सब-की-सब विभूतियोंको कहनेमें समर्थ हैं—“वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः” तो उसके उत्तरमें भगवान् कहते हैं कि मेरे विस्तारका अन्त नहीं है, इसलिये प्रधानतासे कहूँगा—“प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे” (10। 19)। फिर अन्तमें कहते हैं कि मेरी विभूतियोंका अन्त नहीं है—“नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परंतप” (10। 40)। यहाँ (7। 2 में) भगवान् कहते हैं कि मैं विज्ञानसहित ज्ञानको सम्पूर्णतासे कहूँगा, शेष नहीं रखूँगा—“अशेषतः।” इसका तात्पर्य यह समझना चाहिये कि मैं तत्त्वसे कहूँगा। तत्त्वसे कहनेके बाद कहना, जानना कुछ भी बाकी नहीं रहेगा। दसवें अध्यायमें विभूति और योगकी बात आयी कि भगवान्की विभूतियोंका और योगका अन्त नहीं है। अभिप्राय है कि विभूतियोंका अर्थात् भगवान्की जो अलग- अलग शक्तियाँ हैं, उनका और भगवान्के योगका अर्थात् सामर्थ्य, ऐश्वर्यका अन्त नहीं आता। रामचरितमानसमें कहा है— निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोइ। सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ॥ तात्पर्य है कि सगुण भगवान्का जो प्रभाव है, ऐश्वर्य है, उसका अन्त नहीं आता। जब अन्त ही नहीं आता, तब उसको जानना मनुष्यकी बुद्धिके बाहरकी बात है। परन्तु जो वास्तविक तत्त्व है, उसको मनुष्य सुगमतासे समझ सकता है। जैसे, सोनेके गहने कितने होते हैं? इसको मनुष्य नहीं जान सकता; क्योंकि गहनोंका अन्त नहीं है, परन्तु उन सब गहनोंमें तत्त्वसे एक सोना ही है, इसको तो मनुष्य जान ही सकता है। ऐसे ही परमात्माकी सम्पूर्ण विभूतियों और सामर्थ्यको कोई जान नहीं सकता; परन्तु उन सबमें तत्त्वसे एक परमात्मा ही हैं, इसको तो मनुष्य तत्त्वसे जान ही सकता है। परमात्माको तत्त्वसे जाननेपर उसकी समझ तत्त्वसे परिपूर्ण हो जाती है, बाकी नहीं रहती। जैसे, कोई कहे कि “मैंने जल पी लिया” तो इसका तात्पर्य यह नहीं कि अब संसारमें जल बाकी नहीं रहा। अतः जल पीनेसे जलका अन्त नहीं हुआ है, प्रत्युत हमारी प्यासका अन्त हुआ है। इसी तरहसे परमात्मतत्त्वको तत्त्वसे समझ लेनेपर परमात्मतत्त्वके ज्ञानका अन्त नहीं हुआ है, प्रत्युत हमारी अपनी जो समझ है, जिज्ञासा है, वह पूर्ण हुई है, उसका अन्त हुआ है, उसमें केवल परमात्मतत्त्व ही रह गया है। दसवें अध्यायके दूसरे श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि मेरे प्रकट होनेको देवता और महर्षि नहीं जानते और तीसरे श्लोकमें कहा है कि जो मुझे अज और अनादि जानता है, वह मनुष्योंमें असम्मूढ़ है और वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है। तो जिसे देवता और महर्षि नहीं जानते, उसे मनुष्य जान ले—यह कैसे हो सकता है? भगवान् अज और अनादि हैं, ऐसा दृढ़तासे मानना ही जानना है। मनुष्य भगवान्को अज और अनादि मान ही सकता है। परन्तु जैसे बालक अपनी माँके विवाहकी बरात नहीं देख सकता, ऐसे ही सब प्राणियोंके आदि तथा स्वयं अनादि भगवान्को देवता, ऋषि, महर्षि, तत्त्वज्ञ, जीवन्मुक्त आदि नहीं जान सकते। इसी प्रकार भगवान्के अवतार लेनेको, लीलाको, ऐश्वर्यको कोई जान नहीं सकता; क्योंकि वे अपार हैं, अगाध हैं, अनन्त हैं। परन्तु उनको तत्त्वसे तो जान ही सकते हैं। परमात्मतत्त्वको जाननेके लिये “ज्ञानयोग” में जानकारी- (जानने-) की प्रधानता रहती है और “भक्तियोग” में मान्यता-(मानने-) की प्रधानता रहती है। जो वास्तविक मान्यता होती है, वह बड़ी दृढ़ होती है। उसको कोई इधर- उधर नहीं कर सकता अर्थात् माननेवाला जबतक अपनी मान्यताको न छोड़े, तबतक उसकी मान्यताको कोई छुड़ा नहीं सकता। जैसे, मनुष्यने संसार और संसारके पदार्थोंको अपने लिये उपयोगी मान रखा है तो इस मान्यताको स्वयं छोड़े बिना दूसरा कोई छुड़ा नहीं सकता। परन्तु स्वयं इस बातको जान ले कि ये सब पदार्थ उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं तो इस मान्यताको मनुष्य छोड़ सकता है; क्योंकि यह मान्यता असत्य है, झूठी है। जब असत्य मान्यताको भी दूसरा कोई छुड़ा नहीं सकता, तब जो वास्तविक परमात्मा सबके मूलमें है, उसको कोई मान ले तो यह मान्यता कैसे छूट सकती है? क्योंकि यह मान्यता सत्य है। यह यथार्थ मान्यता ज्ञानसे कम नहीं होती, प्रत्युत ज्ञानके समान ही दृढ़ होती है। भक्तिमार्गमें मानना मुख्य होता है। जैसे, दसवें अध्यायके पहले श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा कि “हे महाबाहो अर्जुन! मैं तेरे हितके लिये परम (सर्वश्रेष्ठ) वचन कहता हूँ, तुम सुनो अर्थात् तुम इस वचनको मान लो।” वहाँ भक्तिका प्रकरण है; अतः वहाँ माननेकी बात कहते हैं। ज्ञानमार्गमें जानना मुख्य होता है। जैसे, चौदहवें अध्यायके पहले श्लोकमें भगवान्ने कहा कि “मैं फिर ज्ञानोंमें उत्तम और सर्वोत्कृष्ट ज्ञान कहता हूँ, जिसको जाननेसे सब-के-सब मुनि परम सिद्धिको प्राप्त हुए हैं।” वहाँ ज्ञानका प्रकरण है; अतः वहाँ जाननेकी बात कहते हैं। भक्तिमार्गमें मनुष्य मान करके जान लेता है और ज्ञानमार्गमें जान करके मान लेता है। अतः पूर्ण होनेपर दोनोंकी एकता हो जाती है। ज्ञान और विज्ञानसम्बन्धी
परिशिष्ट भाव
परा तथा अपरा प्रकृतिकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है—यह “ज्ञान” है और परा-अपरा सब कुछ भगवान् ही हैं—यह “विज्ञान” है। अतः अहम्सहित सब कुछ भगवान् ही हैं—यही विज्ञानसहित ज्ञान है। “ज्ञातव्यम्”—जिसको अवश्य जानना चाहिये और जो जाना जा सकता है, उसको “ज्ञातव्य” कहते हैं। विज्ञानसहित ज्ञानको अर्थात् भगवान्के समग्ररूपको जाननेके बाद फिर जाननेयोग्य कुछ भी शेष नहीं रहता अर्थात् जो यथार्थ तत्त्व जानना चाहता है, उसके लिये जानना कुछ भी बाकी नहीं रहता। कारण कि जब एक भगवान्के सिवाय किंचिन्मात्र भी कुछ है ही नहीं (इसी अध्यायका सातवाँ श्लोक), तो फिर जाननेयोग्य क्या बाकी रहेगा? यहाँ कोई कह सकता है कि “विज्ञानसहित ज्ञान” कहनेसे ज्ञानकी मुख्यता और विज्ञानकी गौणता हुई? परन्तु वास्तवमें ऐसी बात नहीं है। केवल “ज्ञान” से मुक्ति तो हो जाती है, पर प्रेमका अनन्त आनन्द तभी मिलता है, जब उसके साथ विज्ञान भी हो। “ज्ञान” धनकी तरह है और “विज्ञान” आकर्षण है। जैसे धनके आकर्षणमें जो सुख है, वह धनमें नहीं है, ऐसे ही “विज्ञान” (भक्ति) में जो आनन्द है, वह “ज्ञान” में नहीं है। “ज्ञान” में तो अखण्डरस है, पर “विज्ञान” में प्रतिक्षण वर्धमान रस है। इसलिये “विज्ञानसहित ज्ञान” कहनेमें भगवान्का लक्ष्य मुख्यरूपसे “विज्ञान” की तरफ ही है और उसीको भगवान् श्रेष्ठ बताना चाहते हैं; क्योंकि “विज्ञान” समग्रताका वाचक है।
विशेष बात
विशेष बात संसार भगवान्से ही पैदा होता है और उनमें ही लीन होता है, इसलिये भगवान् इस संसारके महाकारण हैं— ऐसा मानना “ज्ञान” है। भगवान्के सिवाय और कोई चीज है ही नहीं, सब कुछ भगवान् ही हैं, स्वयं भगवान् ही सब कुछ बने हुए हैं—ऐसा अनुभव हो जाना “विज्ञान” है। अपरा और परा प्रकृति मेरी है; इनके संयोगसे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है और मैं इस सम्पूर्ण जगत्का महाकारण हूँ (चौथेसे छठे श्लोकतक)—ऐसा कहकर भगवान्ने “ज्ञान” बताया। मेरे सिवाय अन्य कोई है ही नहीं, सूतके धागेमें उसी सूतकी बनी हुई मणियोंकी तरह सब कुछ मेरेमें ही ओतप्रोत है (सातवाँ श्लोक)—ऐसा कहकर भगवान्ने “विज्ञान” बताया। जलमें रस, चन्द्र-सूर्यमें प्रभा मैं हूँ इत्यादि; सम्पूर्ण भूतोंका सनातन बीज मैं हूँ; सात्त्विक, राजस और तामस भाव मेरेसे ही होते हैं (आठवेंसे बारहवें श्लोकतक)— ऐसा कहकर “ज्ञान” बताया। ये मेरेमें और मैं इनमें नहीं हूँ, अर्थात् सब कुछ मैं-ही-मैं हूँ; क्योंकि इनकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है (बारहवाँ श्लोक)—ऐसा कहकर “विज्ञान” बताया। जो मेरे सिवाय गुणोंकी अलग सत्ता मान लेता है, वह मोहित हो जाता है। परन्तु जो गुणोंसे मोहित न होकर अर्थात् ये गुण भगवान्से ही होते हैं और भगवान्में ही लीन होते हैं—ऐसा मानकर मेरे शरण होता है, वह गुणमयी मायाको तर जाता है। ऐसे मेरे शरण होनेवाले चार प्रकारके भक्त होते हैं—अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी (प्रेमी)। ये सभी उदार हैं; पर ज्ञानी अर्थात् प्रेमी मेरेको अत्यन्त प्रिय है और मेरी आत्मा ही है (तेरहवेंसे अठारहवें श्लोकतक)—ऐसा कहकर “ज्ञान” बताया। जिसको “सब कुछ वासुदेव ही है” ऐसा अनुभव हो जाता है, वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है (उन्नीसवाँ श्लोक)—ऐसा कहकर “विज्ञान” बताया। मेरेको न मानकर जो कामनाओंके कारण देवताओंके शरण हो जाते हैं, उनको अन्तवाला फल (जन्म-मरण) मिलता है और जो मेरे शरण हो जाते हैं, उनको मैं मिल जाता हूँ। जो मुझे अज-अविनाशी नहीं जानते, उनके सामने मैं प्रकट नहीं होता। मैं भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों कालोंको और उनमें रहनेवाले सम्पूर्ण प्राणियोंको जानता हूँ, पर मेरेको कोई नहीं जानता। जो द्वन्द्वमोहसे मोहित हो जाते हैं, वे बार-बार जन्म-मरणको प्राप्त होते हैं। जो एक निश्चय करके मेरे भजनमें लग जाते हैं, उनके पाप नष्ट हो जाते हैं तथा वे निर्द्वन्द्व हो जाते हैं (बीसवेंसे अट्ठाईसवें श्लोकतक)—ऐसा कहकर “ज्ञान” बताया। जो मेरा आश्रय लेते हैं, वे ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञको जान जाते हैं अर्थात् चर-अचर सब कुछ मैं ही हूँ, ऐसा उनको अनुभव हो जाता है (7। 29-30)— ऐसा कहकर “विज्ञान” बताया। “यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते”— विज्ञानसहित ज्ञानको जाननेके बाद जानना बाकी नहीं रहता। तात्पर्य है कि मेरे सिवाय संसारका मूल दूसरा कोई नहीं है, केवल मैं ही हूँ—“मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनंजय” (गीता 7। 7) और तत्त्वसे सब कुछ वासुदेव ही है— “वासुदेवः सर्वम्” (7। 19) और कोई है ही नहीं—ऐसा जान लेगा तो जानना बाकी कैसे रहेगा? क्योंकि इसके सिवाय दूसरा कुछ जाननेयोग्य है ही नहीं। यदि एक परमात्माको न जानकर संसारकी बहुत-सी विद्याओंको जान भी लिया तो वास्तवमें कुछ नहीं जाना है, कोरा परिश्रम ही किया है। “जानना कुछ बाकी नहीं रहता”—इसका तात्पर्य है कि इन्द्रियोंसे, मनसे, बुद्धिसे जो परमात्माको जानता है, वह वास्तवमें पूर्ण जानना नहीं है। कारण कि ये इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि प्राकृत हैं, इसलिये ये प्रकृतिसे अतीत तत्त्वको नहीं जान सकते। स्वयं जब परमात्माके शरण हो जाता है, तब स्वयं ही परमात्माको जानता है। इसलिये परमात्माको स्वयंसे ही जाना जा सकता है, मन-बुद्धि आदिसे नहीं।
(उत्तर0 73 ख)
1-मैं “विज्ञानसहित ज्ञान” सम्पूर्णतासे कहूँगा—इसमें विज्ञान ज्ञानका विशेषण है। विशेषण विशेष्यकी विशेषता
बतानेवाला होता है। इस दृष्टिसे विशेष्य व्यापक हुआ और विशेषण व्याप्य हुआ अर्थात् ज्ञान (विशेष्य) बड़ा हुआ और
विज्ञान (विशेषण) छोटा हुआ। परन्तु विज्ञानने ज्ञानकी विशेषता बता दी—इस दृष्टिसे विज्ञान बड़ा अर्थात् श्रेष्ठ हुआ। यहाँ
यह संसार भगवान्से ही उत्पन्न होता है और भगवान्में ही लीन होता है—ऐसा मानना ज्ञान है; और सब कुछ भगवान् ही
हैं, भगवान् ही सब कुछ बने हुए हैं, भगवान्के सिवाय कुछ है ही नहीं—ऐसा अनुभव हो जाना विज्ञान है। इसमें ज्ञान सामान्य
हुआ और विज्ञान विशेष हुआ।
2-जैसे, कोई वर्णन करता है तो वर्णन करनेवालेका जो स्वयंका अनुभव है, वह पूरा बुद्धिमें नहीं आता; बुद्धिमें जितना
आता है, उतना मनमें नहीं आता और जितना मनमें आता है, उतना कहनेमें नहीं आता। इस प्रकार जब उसका अपना अनुभव
भी पूरा कहनेमें नहीं आता अर्थात् वह अपने अनुभवको भी पूरा प्रकट नहीं कर सकता, तो फिर वह भगवान्की तरह कैसे
कह सकता है ?
3श्रीभगवान्
मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये। यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः॥ 3॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

भगवान्ने दूसरे श्लोकमें यह बताया कि मैं विज्ञानसहित ज्ञानको सम्पूर्णतासे कहूँगा, जिससे कुछ भी जानना बाकी नहीं रहता। जब जानना बाकी रहता ही नहीं, तो फिर सब मनुष्य उस तत्त्वको क्यों नहीं जान लेते? इसके उत्तरमें आगेका श्लोक कहते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
1 section
“मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये”1—हजारों मनुष्योंमें कोई एक ही मेरी प्राप्तिके लिये यत्न करता है। तात्पर्य है कि जिनमें मनुष्यपना है अर्थात् जिनमें पशुओंकी तरह खाना-पीना और ऐश- आराम करना नहीं है, वे ही वास्तवमें मनुष्य हैं। उन मनुष्योंमें भी जो नीति और धर्मपर चलनेवाले हैं, ऐसे मनुष्य हजारों हैं। उन हजारों मनुष्योंमें भी कोई एक ही सिद्धिके लिये2 यत्न करता है अर्थात् जिससे बढ़कर कोई लाभ नहीं, जिसमें दुःखका लेश भी नहीं और आनन्दकी किंचिन्मात्र भी कमी नहीं, कमीकी सम्भावना ही नहीं— ऐसे स्वतःसिद्ध नित्यतत्त्वकी प्राप्तिके लिये यत्न करता है। जो परलोकमें स्वर्ग आदिकी प्राप्ति नहीं चाहता और इस लोकमें धन, मान, भोग, कीर्ति आदि नहीं चाहता अर्थात् जो उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंमें नहीं अटकता और भोगे हुए भोगोंके तथा मान-बड़ाई, आदर-सत्कार आदिके संस्कार रहनेसे उन विषयोंका संग होनेपर, उन विषयोंमें रुचि होते रहनेपर भी जो अपनी मान्यता, उद्देश्य, विचार, सिद्धान्त आदिसे विचलित नहीं होता— ऐसा कोई एक पुरुष ही सिद्धिके लिये यत्न करता है। इससे सिद्ध होता है कि परमात्मप्राप्तिरूप सिद्धिके लिये यत्न करनेवाले अर्थात् दृढ़तासे उधर लगनेवाले बहुत कम मनुष्य होते हैं। परमात्मप्राप्तिकी तरफ न लगनेमें कारण है—भोग और संग्रहमें लगना। सांसारिक भोग-पदार्थोंमें केवल आरम्भमें ही सुख दीखता है। मनुष्य प्रायः तत्काल सुख देनेवाले साधनोंमें ही लगते हैं। उनका परिणाम क्या होगा—इसपर वे विचार करते ही नहीं। अगर वे भोग और ऐश्वर्यके परिणामपर विचार करने लग जायँ कि “भोग और संग्रहके अन्तमें कुछ नहीं मिलेगा, रीते रह जायँगे और उनकी प्राप्तिके लिये किये हुए पाप-कर्मोंके फलस्वरूप चौरासी लाख योनियों तथा नरकोंके रूपमें दुःख-ही-दुःख मिलेगा”, तो वे परमात्माके साधनमें लग जायँगे। दूसरा कारण यह है कि प्रायः लोग सांसारिक भोगोंमें ही लगे रहते हैं। उनमेंसे कुछ लोग संसारके भोगोंसे ऊँचे उठते भी हैं तो वे परलोकके स्वर्ग आदि भोग-भूमियोंकी प्राप्तिमें लग जाते हैं। परन्तु अपना कल्याण हो जाय, परमात्माकी प्राप्ति हो जाय—ऐसा दृढ़तासे विचार करके परमात्माकी तरफ लगनेवाले लोग बहुत कम होते हैं। इतिहासमें भी देखते हैं तो सकामभावसे तपस्या आदि साधन करनेवालोंके ही चरित्र विशेष आते हैं। कल्याणके लिये तत्परतासे साधन करनेवालोंके चरित्र बहुत ही कम आते हैं। वास्तवमें परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति कठिन या दुर्लभ नहीं है, प्रत्युत इधर सच्ची लगनसे तत्परतापूर्वक लगनेवाले बहुत कम हैं। इधर दृढ़तासे न लगनेमें संयोगजन्य सुखकी तरफ आकृष्ट होना और परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिके लिये भविष्यकी आशा3 रखना ही खास कारण है। प्रायः लोग इस (तीसरे) श्लोकको तत्त्वकी कठिनता बतानेवाला मानते हैं। परन्तु वास्तवमें यह श्लोक तत्त्वकी कठिनताके विषयमें नहीं है; क्योंकि परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति कठिन नहीं है, प्रत्युत तत्त्वप्राप्तिकी उत्कट अभिलाषा होना और अभिलाषाकी पूर्तिके लिये तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त महापुरुषोंका मिलना दुर्लभ है, कठिन है। यहाँ भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि “मैं कहूँगा और तू जानेगा”, तो अर्जुन-जैसा अपने श्रेयका प्रश्न करनेवाला और भगवान्- जैसा सर्वज्ञ कहनेवाला मिलना दुर्लभ है। वास्तवमें देखा जाय तो केवल उत्कट अभिलाषा होना ही दुर्लभ है। कारण कि अभिलाषा होनेपर उसको जनानेकी जिम्मेवारी भगवान्पर आ जाती है। यहाँ “तत्त्वतः” कहनेका तात्पर्य है कि वह मेरे सगुण- निर्गुण, साकार-निराकार, शिव, शक्ति, गणेश, सूर्य, विष्णु आदि रूपोंमें प्रकट होनेवाले और समय-समयपर तरह- तरहके अवतार लेनेवाले मुझको तत्त्वसे जान लेता है अर्थात् उसके जाननेमें किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं रहता और उसके अनुभवमें एक परमात्मतत्त्वके सिवाय संसारकी किंचिन्मात्र भी सत्ता नहीं रहती।
परिशिष्ट भाव
कर्मयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग आदि जितने साधन हैं, उन साधनोंसे (यत्न करते हुए) जो सिद्ध हो चुके हैं,ऐसे जीवन्मुक्त ज्ञानी महापुरुषोंमें भी “सब कुछ भगवान् ही हैं”—इस प्रकार भगवान्के समग्ररूपको यथार्थरूपसे अनुभव करनेवाले प्रेमी भक्त दुर्लभ हैं* (इसी अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)। “यततामपि सिद्धानाम्”—वे सिद्ध अर्थात् जीवन्मुक्त पुरुष अपनी स्थिति-(मुक्तावस्था-) से असन्तुष्ट हैं और उनके भीतर परमप्रेम-(अनन्तरस-) को प्राप्त करनेकी उत्कण्ठा है, भूख है। इसलिये ब्रह्मसूत्रमें आया है— “मुक्तोपसृप्यव्यपदेशात्” (1। 3। 2) “उस प्रेमस्वरूप भगवान्को मुक्त पुरुषोंके लिये भी प्राप्तव्य बताया गया है”। कारण यह है कि मुक्त होनेपर नाशवान् रसकी कामना तो मिट जाती है, पर अनन्तरसकी भूख नहीं मिटती। वह भूख भगवान्की कृपासे ही जाग्रत् होती है। तात्पर्य है कि जो भगवान्पर श्रद्धा-विश्वास रखते हुए साधन करते हैं, जिनके भीतर भक्तिके संस्कार हैं, उनको भगवान् ज्ञानमें सन्तुष्ट नहीं होने देते, उसमें टिकने नहीं देते और उनकी मुक्तिके रसको फीका कर देते हैं। सिद्ध (मुक्त) तो कर्मयोगी, ज्ञानयोगी,ध्यानयोगी आदि सभी हो सकते हैं, पर भगवान्के समग्ररूपको जाननेवाले सब नहीं होते। अतः “यततामपि सिद्धानाम्” पदोंका तात्पर्य है कि वे यत्न करते हुए अपनी पद्धतिसे सिद्ध तो हो गये, पर मेरे समग्ररूपको नहीं जान सके! कारण कि मेरे समग्ररूपको पराभक्तिसे ही जाना जा सकता है—“भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः” (गीता 18। 55)। “कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः”—यहाँ “माम्” पद समग्र परमात्माका वाचक है। भगवान्के समग्ररूपको भगवान्की कृपासे ही जाना जा सकता है, विचारसे नहीं (गीता—दसवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)। अर्जुनने भी गीता सुननेके बाद भगवान्से कहा है कि आपकी कृपासे मेरा मोह नष्ट हो गया और स्मृति प्राप्त हो गयी—“नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत” (18। 73)। जैसे दूध पिलाते समय गाय अपने बछड़ेको स्नेहपूर्वक चाटती है तो उससे बछड़ेकी जो पुष्टि होती है, वह केवल दूध पीनेसे नहीं होती। ऐसे ही भगवान्की कृपासे जो ज्ञान होता है, वह अपने विचारसे नहीं होता; क्योंकि विचार करनेमें स्वयंकी सत्ता रहती है। केवल निर्गुणको जाननेवाला परमात्माको तत्त्वसे नहीं जानता, प्रत्युत सगुण-निर्गुण दोनोंको (समग्रको) जाननेवाला ही परमात्माको तत्त्वसे जानता है। कर्मयोगसे “शान्त आनन्द” (शान्ति) की प्राप्ति होती है, क्योंकि संसारके साथ सम्बन्ध होनेसे ही अशान्ति होती है। कर्मयोगसे संसारका सम्बन्ध-विच्छेद होनेसे शान्ति प्राप्त हो जाती है—“त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्” (गीता 12। 12)। ज्ञानयोगसे “अखण्ड आनन्द” की प्राप्ति होती है। अखण्ड आनन्दको “निजानन्द” भी कहते हैं; क्योंकि यह अपने स्वरूपका आनन्द है। निजानन्दमें जीवका ब्रह्मके साथ साधर्म्य हो जाता है अर्थात् जैसे ब्रह्म सत्-चित्-आनन्दस्वरूप है, ऐसे ही जीव भी सत्-चित्-आनन्दस्वरूप हो जाता है—“मम साधर्म्यमागताः” (गीता 14। 2)। यद्यपि निजानन्दकी प्राप्ति होनेपर साधकमें कोई कमी नहीं रहती, फिर भी जिसके भीतर भक्तिके संस्कार हैं और भगवान्की कृपाका आश्रय है, उसको निजानन्दमें सन्तोष नहीं होता1। उसके भीतर “अनन्त आनन्द” की भूख रहती है। अतः भक्तियोगसे “अनन्त आनन्द” की प्राप्ति होती है। निजानन्द तो अंश-(स्वरूप-) का आनन्द है, पर अनन्त आनन्द अंशी-(भगवान्-) का आनन्द है। यह सिद्धान्त है कि वस्तुके आकर्षणमें जो सुख होता है, वह सुख वस्तुके ज्ञानमें नहीं होता। जैसे, रुपयोंके लोभमें जो सुख मिलता है, वह रुपयोंका ज्ञान होनेसे नहीं मिलता। रुपयोंका ज्ञान होनेसे उनका उपयोग करना तो आ जायगा, पर विशेष आकर्षण नहीं होगा। “और मिले, और मिले”—यह आकर्षण तो लोभ होनेसे ही होगा। रुपयोंका सुख तो लोभरूप दोषके कारण दीखता है, वास्तवमें है नहीं, पर भगवान्का आनन्द निर्दोष प्रेमके कारण है, जो वास्तवमें है। कारण कि भगवान्का ही अंश होनेसे जीवमें अंशी-(भगवान्-) का आकर्षण स्वतः है। यह सिद्धान्त है कि अंशका अंशीकी तरफ स्वतः आकर्षण होता है; जैसे—पृथ्वीका अंश होनेसे ऊपर फेंका गया पत्थर स्वतः पृथ्वीकी तरफ खिंचता है, अग्नि स्वतः सूर्यकी तरफ (ऊपर) खिंचती है2 नदियाँ स्वतः समुद्रकी तरफ खिंचती हैं, आदि। हमें भगवान्की आवश्यकता क्यों है?—इसपर विचार करें तो मालूम होता है कि हमारी कोई ऐसी आवश्यकता है, जिसको हम न तो अपने द्वारा पूरी कर सकते हैं और न संसारके द्वारा ही पूरी कर सकते हैं। दुःखोंका नाश करनेके लिये और परमशान्तिको प्राप्त करनेके लिये हमें भगवान्की आवश्यकता नहीं है। कारण कि अगर हम कामनाओंका सर्वथा त्याग कर दें तो स्वतः हमारे दुःखोंका नाश होकर परमशान्तिकी प्राप्ति हो जायगी— “त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्” अर्थात् हम मुक्त हो जायँगे। हमें परमप्रेमकी प्राप्तिके लिये ही भगवान्की आवश्यकता है; क्योंकि हम भगवान्के ही अंश हैं। जो मनुष्य सांसारिक दुःखोंसे छूटना चाहता है, पराधीनतासे छूटकर स्वाधीन होना चाहता है, उसकी मुक्ति हो जाती है। परन्तु जो मनुष्य संसारसे दुःखी होकर ऐसा सोचता है कि कोई तो अपना होता, जो मेरेको अपनी शरण लेकर, अपने गले लगाकर मेरे दुःख, सन्ताप, पाप, अभाव, भय, नीरसता आदिको हर लेता, उसको भक्ति प्राप्त हो जाती है। तात्पर्य यह हुआ कि मुक्ति पानेके लिये ईश्वरकी आवश्यकता नहीं है, प्रत्युत भक्ति पानेके लिये ईश्वरकी आवश्यकता है। जब मनुष्य इस बातको जान लेता है कि इतने बड़े संसारमें, अनन्त ब्रह्माण्डोंमें कोई भी वस्तु अपनी नहीं है, प्रत्युत जिसके एक अंशमें अनन्त ब्रह्माण्ड हैं, वही अपना है, तब उसके भीतर भगवान्की आवश्यकताका अनुभव होता है। कारण कि अपनी वस्तु वही हो सकती है, जो सदा हमारे साथ रहे और हम सदा उसके साथ रहें। जो कभी हमारेसे अलग न हो और हम कभी उससे अलग न हों। ऐसी वस्तु भगवान् ही हो सकते हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि जब मनुष्यको भगवान्की आवश्यकता है, तो फिर भगवान् मिलते क्यों नहीं? इसका कारण यह है कि मनुष्य भगवान्की प्राप्तिके बिना सुख-आरामसे रहता है, वह अपनी आवश्यकताको भूले रहता है। वह मिली हुई वस्तु, योग्यता और सामर्थ्यमें ही सन्तोष कर लेता है। अगर वह भगवान्की आवश्यकताका अनुभव करे, उनके बिना चैनसे न रह सके तो भगवान्की प्राप्तिमें देरी नहीं है। कारण कि जो नित्यप्राप्त है, उसकी प्राप्तिमें क्या देरी? भगवान् कोई वृक्ष तो हैं नहीं कि आज बोयेंगे और वर्षोंके बाद फल मिलेगा! वे तो सब देशमें, सब समयमें, सब वस्तुओंमें, सब अवस्थाओंमें, सब परिस्थितियोंमें ज्यों-के-त्यों विद्यमान हैं। हम ही उनसे विमुख हुए हैं, वे हमसे कभी विमुख नहीं हुए।
1-संख्यावाचक शब्दको यदि किसीका विशेषण बताया जाय, तो उस शब्दमें एकवचन ही होता है। यदि उसके योगमें
षष्ठी की जाय तो संख्यावाचक शब्दमें तीनों वचन होते हैं। यहाँ “मनुष्याणाम्” पदमें सहस्त्र संख्याके योगमें षष्ठी हुई है और
“सहस्त्राणि” पदमें निर्धारण अर्थमें सप्तमीका बहुवचन हुआ है। अतः “मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये” पदोंका अर्थ
हुआ—“मनुष्याणां सहस्त्राणि भगवति रुचिं कुर्वन्ति सहस्त्रेषु कश्चित् सिद्धये यतति च” “हजारों मनुष्य भगवान्में रुचि रखते
हैं, पर उन हजारोंमेंसे कोई एक सिद्धिके लिये यत्न करता है।”
2-स्वर्ग आदि लोकोंकी और अणिमा, महिमा, गरिमा आदि सिद्धियोंकी प्राप्ति वास्तवमें सिद्धि है ही नहीं, प्रत्युत वह
तो असिद्धि ही है; क्योंकि वह पतन करनेवाली अर्थात् बार-बार जन्म-मरण देनेवाली है (नवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)।
इसलिये यहाँ परमात्माकी प्राप्तिको ही सिद्धि कहा गया है।
3-परमात्मा सब देशमें, सब कालमें, सम्पूर्ण व्यक्तियोंमें, सब वस्तुओंमें, सब घटनाओंमें, सब परिस्थितियोंमें और सम्पूर्ण
क्रियाओंमें स्वतः परिपूर्णरूपसे मौजूद हैं; अतः उनकी प्राप्तिमें भविष्यका कोई कारण ही नहीं है। परमात्मतत्त्व कर्मजन्य नहीं
है। जो वस्तु कर्मजन्य होती है, वह भविष्यमें मिलती है। कारण कि जो वस्तु कर्मजन्य होती है, वह उत्पत्ति-विनाशवाली होती
है और उसमें देश, कालकी दूरी होती है; अतः उसीके लिये भविष्य होता है। मनुष्य यह विचार करे कि परमात्मा सब देशमें
हैं तो यहाँ भी हैं, जब यहाँ हैं तो कहीं जानेकी जरूरत नहीं। परमात्मा सब समयमें हैं तो अभी भी हैं, जब अभी हैं, तो भविष्य
क्यों? परमात्मा सबमें हैं तो मेरेमें भी हैं, जब मेरेमें हैं तो दूसरे किसीमें खोजनेकी पराधीनता नहीं। परमात्मा सबके हैं, तो
मेरे भी हैं; जब मेरे हैं तो मेरेको अत्यन्त प्यारे होने ही चाहिये; क्योंकि अपनी चीज सबको प्यारी होती ही है। साथ-ही-साथ
परमात्मा सर्वोत्कृष्ट हैं अर्थात् उनसे बढ़कर कोई है ही नहीं—ऐसा विश्वास होनेपर स्वतः ही मन खिंचेगा।
उपर्युक्त बातोंपर दृढ़ विश्वास हो जाय तो परमात्माकी आशा भविष्यका अवलम्बन करनेवाली नहीं होती; किन्तु
परमात्माको तत्काल प्राप्त करनेकी उत्कण्ठा हो जाती है।
* धर्मसील बिरक्त अरु ग्यानी। जीवनमुक्त
ब्रह्मपर
प्रानी॥
सब ते सो दुर्लभ
सुरराया। राम भगति रत गत मद माया॥ (मानस, उत्तर0 54। 3-4)
1-जो मुक्त हो जाता है, उसको तो स्वाभाविक ही सन्तोष हो जाता है, पर जिसके भीतर भक्तिके संस्कार हैं, उसको
सन्तोष नहीं होता। कारण कि भक्तिके संस्कारवालेपर भगवान् विशेष कृपा करते हैं और उसको कहीं अटकने नहीं देते।
2-यहाँ शंका हो सकती है कि रातको सूर्य नहीं रहता, फिर भी अग्नि रातको ऊपरकी तरफ क्यों जाती है? इसका
समाधान है कि रात हो या दिन, सूर्य कहीं भी रहे, वह सदा पृथ्वीसे ऊपर ही रहता है। इसलिये जैसे भारतके लोग सूर्यको
पृथ्वीसे ऊपर देखते हैं, ऐसे ही (पृथ्वीमण्डलपर भारतसे लगभग विपरीत दिशामें स्थित) अमेरिकाके लोग भी सूर्यको ऊपर
ही देखते हैं।
4–5श्रीभगवान्Merged
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव । अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥ 4॥ अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्। जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥ 5॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

दूसरे श्लोकमें भगवान्ने ज्ञान-विज्ञान कहनेकी प्रतिज्ञा की थी। उस प्रतिज्ञाके अनुसार अब भगवान् ज्ञान- विज्ञान कहनेका उपक्रम करते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
6 sections
[जो परिवर्तनशील है, कभी एकरूप नहीं रहता, उस जडका ही भगवान्ने अत्यन्त सूक्ष्मरूपसे “क्षर” नामसे वर्णन किया है—“क्षरः सर्वाणि भूतानि” (15। 16), फिर “भूमिरापोऽनलो वायुः .............. प्रकृतिरष्टधा” (7। 4)—इस श्लोकमें उसीको आठ भेदोंवाली “अपरा प्रकृति” के नामसे कहा है और फिर “महाभूता- न्यहङ्कारः....... पञ्च चेन्द्रियगोचराः” (13। 5)—इस श्लोकमें उसीके विस्तारसे चौबीस भेद बताये हैं।]
भूमिरापोऽनलो वायुः ....... विद्धि मे पराम्
परमात्मा सबके कारण हैं। वे प्रकृतिको लेकर सृष्टिकी रचना करते हैं*। जिस प्रकृतिको लेकर रचना करते हैं, उसका नाम “अपरा प्रकृति” है और अपना अंश जो जीव है, उसको भगवान् “परा प्रकृति” कहते हैं। अपरा प्रकृति निकृष्ट, जड और परिवर्तनशील है तथा परा प्रकृति श्रेष्ठ, चेतन और परिवर्तनरहित है। प्रत्येक मनुष्यका भिन्न-भिन्न स्वभाव होता है। जैसे स्वभावको मनुष्यसे अलग सिद्ध नहीं कर सकते, ऐसे ही परमात्माकी प्रकृतिको परमात्मासे अलग (स्वतन्त्र) सिद्ध नहीं कर सकते। यह प्रकृति प्रभुका ही एक स्वभाव है; इसलिये इसका नाम “प्रकृति” है। इसी प्रकार परमात्माका अंश होनेसे जीवको परमात्मासे भिन्न सिद्ध नहीं कर सकते; क्योंकि यह परमात्माका स्वरूप है। परमात्माका स्वरूप होनेपर भी केवल अपरा प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़नेके कारण इस जीवात्माको प्रकृति कहा गया है। अपरा प्रकृतिके सम्बन्धसे अपनेमें कृति (करना) माननेके कारण ही यह जीवरूप है। अगर यह अपनेमें कृति न माने तो यह परमात्मस्वरूप ही है; फिर इसकी जीव या प्रकृति संज्ञा नहीं रहती अर्थात् इसमें बन्धनकारक कर्तृत्व और भोक्तृत्व नहीं रहता (गीता—अठारहवें अध्यायका सत्रहवाँ श्लोक)। यहाँ अपरा प्रकृतिमें पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार—ये आठ शब्द लिये गये हैं। इनमेंसे अगर पाँच स्थूल भूतोंसे स्थूल सृष्टि मानी जाय तथा मन, बुद्धि और अहंकार—इन तीनोंसे सूक्ष्म सृष्टि मानी जाय तो इस वर्णनमें स्थूल और सूक्ष्म सृष्टि तो आ जाती है, पर कारणरूप प्रकृति इसमें नहीं आती। कारणरूप प्रकृतिके बिना प्रकृतिका वर्णन अधूरा रह जाता है। अतः आदरणीय टीकाकारोंने पाँच स्थूल भूतोंसे सूक्ष्म पंचतन्मात्राओं (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध)-को लिया है, जो कि पाँच स्थूल भूतोंकी कारण हैं। “मन” शब्दसे अहंकार लिया है, जो कि मनका कारण है। “बुद्धि” शब्दसे महत्तत्त्व (समष्टि बुद्धि) और “अहंकार” शब्दसे प्रकृति ली गयी है। इस प्रकार इन आठ शब्दोंका ऐसा अर्थ लेनेसे ही समष्टि अपरा प्रकृतिका पूरा वर्णन होता है; क्योंकि इसमें स्थूल, सूक्ष्म और कारण—ये तीनों समष्टि शरीर आ जाते हैं। शास्त्रोंमें इसी समष्टि प्रकृतिका “प्रकृति-विकृति”के नामसे वर्णन किया गया है*। परन्तु यहाँ एक बात ध्यान देनेकी है कि भगवान्ने यहाँ अपरा और परा प्रकृतिका वर्णन “प्रकृति-विकृति” की दृष्टिसे नहीं किया है। यदि भगवान् “प्रकृति-विकृति” की दृष्टिसे वर्णन करते तो चेतनको प्रकृतिके नामसे कहते ही नहीं; क्योंकि चेतन न तो प्रकृति है और न विकृति है। इससे सिद्ध होता है कि भगवान्ने यहाँ जड और चेतनका विभाग बतानेके लिये ही अपरा प्रकृतिके नामसे जडका और परा प्रकृतिके नामसे चेतनका वर्णन किया है। यहाँ यह आशय मालूम देता है कि पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—इन पाँच तत्त्वोंके स्थूलरूपसे स्थूल सृष्टि ली गयी है और इनका सूक्ष्मरूप जो पंचतन्मात्राएँ कही जाती हैं, उनसे सूक्ष्मसृष्टि ली गयी है। सूक्ष्मसृष्टिके अंग मन, बुद्धि और अहंकार हैं। अहंकार दो प्रकारका होता है—(1) “अहं-अहं” करके अन्तःकरणकी वृत्तिका नाम भी अहंकार है, जो कि करणरूप है। यह हुई “अपरा प्रकृति”, जिसका वर्णन यहाँ चौथे श्लोकमें हुआ है और (2)
अहम्
रूपसे व्यक्तित्व, एकदेशीयताका नाम भी अहंकार है, जो कि कर्तारूप है अर्थात् अपनेको क्रियाओंका करनेवाला मानता है। यह हुई “परा प्रकृति”, जिसका वर्णन यहाँ पाँचवें श्लोकमें हुआ है। यह अहंकार कारणशरीरमें तादात्म्यरूपसे रहता है। इस तादात्म्यमें एक जड-अंश है और एक चेतन-अंश है। इसमें जो जड-अंश है, वह कारण-शरीर है और उसमें जो अभिमान करता है, वह चेतन-अंश है। जबतक बोध नहीं होता, तबतक यह जड-चेतनके तादात्म्यवाला कारण- शरीरका “अहम्” कर्तारूपसे निरन्तर बना रहता है। सुषुप्तिके समय यह सुप्तरूपसे रहता है अर्थात् प्रकट नहीं होता। नींदसे जगनेपर “मैं सोया था, अब जाग्रत् हुआ हूँ” इस प्रकार “अहम्” की जागृति होती है। इसके बाद मन और बुद्धि जाग्रत् होते हैं; जैसे—मैं कहाँ हूँ, कैसे हूँ— यह मनकी जागृति हुई और मैं इस देशमें, इस समयमें हूँ— ऐसा निश्चय होना बुद्धिकी जागृति हुई। इस प्रकार नींदसे जगनेपर जिसका अनुभव होता है, वह “अहम्” परा प्रकृति है और वृत्तिरूप जो अहंकार है, वह अपरा प्रकृति है। इस अपरा प्रकृतिको प्रकाशित करनेवाला और आश्रय देनेवाला चेतन जब अपरा प्रकृतिको अपनी मान लेता है, तब वह जीवरूप परा प्रकृति होती है—“ययेदं धार्यते जगत्।” अगर यह परा प्रकृति अपरा प्रकृतिसे विमुख होकर परमात्माके ही सम्मुख हो जाय, परमात्माको ही अपना माने और अपरा प्रकृतिको कभी भी अपना न माने अर्थात् अपरा प्रकृतिसे सर्वथा सम्बन्धरहित होकर निर्लिप्तताका अनुभव कर ले तो इसको अपने स्वरूपका बोध हो जाता है। स्वरूपका बोध हो जानेपर परमात्माका प्रेम प्रकट हो जाता है*, जो कि पहले अपरा प्रकृतिसे सम्बन्ध रखनेसे आसक्ति और कामनाके रूपमें था। वह प्रेम अनन्त, अगाध, असीम, आनन्दरूप और प्रतिक्षण वर्धमान है। उसकी प्राप्ति होनेसे यह परा प्रकृति प्राप्त-प्राप्तव्य हो जाती है, अपने असंगरूपका अनुभव होनेसे ज्ञात-ज्ञातव्य हो जाती है और अपरा प्रकृतिको संसारमात्रकी सेवामें लगाकर संसारसे सर्वथा विमुख होनेसे कृतकृत्य हो जाती है। यही मानव-जीवनकी पूर्णता है, सफलता है। “प्रकृतिरष्टधा अपरेयम्” पदोंसे ऐसा मालूम देता है कि यहाँ जो आठ प्रकारकी अपरा प्रकृति कही गयी है, वह “व्यष्टि अपरा प्रकृति” है। इसका कारण यह है कि मनुष्यको व्यष्टि प्रकृति—शरीरसे ही बन्धन होता है, समष्टि प्रकृतिसे नहीं। कारण कि मनुष्य व्यष्टि शरीरके साथ अपनापन कर लेता है, जिससे बन्धन होता है। व्यष्टि कोई अलग तत्त्व नहीं है, प्रत्युत समष्टिका ही एक क्षुद्र अंश है। समष्टिसे माना हुआ सम्बन्ध ही व्यष्टि कहलाता है अर्थात् समष्टिके अंश शरीरके साथ जीव अपना सम्बन्ध मान लेता है, तो वह समष्टिका अंश शरीर ही “व्यष्टि” कहलाता है। व्यष्टिसे सम्बन्ध जोड़ना ही बन्धन है। इस बन्धनसे छुड़ानेके लिये भगवान्ने आठ प्रकारकी अपरा प्रकृतिका वर्णन करके कहा है कि जीवरूप परा प्रकृतिने ही इस अपरा प्रकृतिको धारण कर रखा है। यदि धारण न करे तो बन्धनका प्रश्न ही नहीं है। पंद्रहवें अध्यायके सातवें श्लोकमें भगवान्ने जीवात्माको अपना अंश कहा है—“ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।” परन्तु वह प्रकृतिमें स्थित रहनेवाले मन और पाँचों इन्द्रियोंको खींचता है अर्थात् उनको अपनी मानता है—“मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।” इसी तरह तेरहवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें भगवान्ने क्षेत्ररूपसे समष्टिका वर्णन करके छठे श्लोकमें व्यष्टिके विकारोंका वर्णन किया; क्योंकि ये विकार व्यष्टिके ही होते हैं, समष्टिके नहीं। इन सबसे यही सिद्ध हुआ कि व्यष्टिसे सम्बन्ध जोड़ना ही बाधक है। इस व्यष्टिसे सम्बन्ध तोड़नेके लिये ही यहाँ व्यष्टि अपरा प्रकृतिका वर्णन किया गया है, जो कि समष्टिका ही अंग है। व्यष्टि प्रकृति अर्थात् शरीर समष्टि सृष्टिमात्रके साथ सर्वथा अभिन्न है, भिन्न कभी हो ही नहीं सकता। वास्तवमें मूल प्रकृति कभी किसीकी बाधक या साधक (सहायक) नहीं होती। जब साधक उससे अपना सम्बन्ध नहीं मानता, तब तो वह सहायक हो जाती है, पर जब वह उससे अपना सम्बन्ध मान लेता है, तब वह बाधक हो जाती है; क्योंकि प्रकृतिके साथ सम्बन्ध माननेसे व्यष्टि अहंता (मैं-पन) पैदा होती है। यह अहंता ही बन्धनका कारण होती है। यहाँ “इतीयं मे” पदोंसे भगवान् यह चेता रहे हैं कि यह अपरा प्रकृति मेरी है। इसके साथ भूलसे अपनापन कर लेना ही बार-बार जन्म-मरणका कारण है; और जो भूल करता है, उसीपर भूलको मिटानेकी जिम्मेवारी होती है। अतः जीव इस अपराके साथ अपनापन न करे। अहंतामें भोगेच्छा और जिज्ञासा—ये दोनों रहती हैं। इनमेंसे भोगेच्छाको कर्मयोगके द्वारा मिटाया जाता है और जिज्ञासाको ज्ञानयोगके द्वारा पूरा किया जाता है। कर्मयोग और ज्ञानयोग—इन दोनोंमेंसे एकके भी सम्यक्तया पूर्ण होनेपर एक-दूसरेमें दोनों आ जाते हैं (गीता—पाँचवें अध्यायका चौथा-पाँचवाँ श्लोक) अर्थात् भोगेच्छाकी निवृत्ति होनेपर जिज्ञासाकी भी पूर्ति हो जाती है और जिज्ञासाकी पूर्ति होनेपर भोगेच्छाकी भी निवृत्ति हो जाती है। कर्मयोगमें भोगेच्छा मिटनेपर तथा ज्ञानयोगमें जिज्ञासाकी पूर्ति होनेपर असंगता स्वतः आ जाती है। उस असंगताका भी उपभोग न करनेपर वास्तविक बोध हो जाता है और मनुष्यका जन्म सर्वथा सार्थक हो जाता है।
जीवभूताम्
वास्तवमें यह जीवरूप नहीं है, प्रत्युत जीव बना हुआ है। यह तो स्वतः साक्षात् परमात्माका अंश है। केवल स्थूल, सूक्ष्म और कारणशरीररूप प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे ही यह जीव बना है। यह सम्बन्ध जोड़ता है—अपने सुखके लिये। यही सुख इसके जन्म-मरणरूप महान् दुःखका खास कारण है।
महाबाहो
हे अर्जुन! तुम बड़े शक्तिशाली हो, इसलिये तुम अपरा और परा प्रकृतिके भेदको समझनेमें समर्थ हो। अतः तुम इसको समझो—“विद्धि।” “ययेदं धार्यते जगत्”*—वास्तवमें यह जगत् जगद्रूप नहीं है, प्रत्युत भगवान्का ही स्वरूप है—“वासुदेवः सर्वम्” (7। 19), “सदसच्चाहम्” (9। 19)। केवल इस परा प्रकृति—जीवने इसको जगत्-रूपसे धारण कर रखा है अर्थात् जीव इस संसारकी स्वतन्त्र सत्ता मानकर अपने सुखके लिये इसका उपयोग करने लग गया। इसीसे जीवका बन्धन हुआ है। अगर जीव संसारकी स्वतन्त्र सत्ता न मानकर इसको केवल भगवत्स्वरूप ही माने तो उसका जन्म-मरणरूप बन्धन मिट जायगा। भगवान्की परा प्रकृति होकर भी जीवात्माने इस दृश्यमान जगत्को, जो कि अपरा प्रकृति है, धारण कर रखा है अर्थात् इस परिवर्तनशील, विकारी जगत्को स्थायी, सुन्दर और सुखप्रद मानकर “मैं” और
मेरे
रूपसे धारण कर रखा है। जिसकी भोगों और पदार्थोंमें जितनी आसक्ति है, आकर्षण है, उसको उतना ही संसार और शरीर स्थायी, सुन्दर और सुखप्रद मालूम देता है। पदार्थोंका संग्रह तथा उनका उपभोग करनेकी लालसा ही खास बाधक है। संग्रहसे अभिमानजन्य सुख होता है और भोगोंसे संयोगजन्य सुख होता है। इस सुखासक्तिसे ही जीवने जगत्को जगत्- रूपसे धारण कर रखा है। सुखासक्तिके कारण ही वह इस जगत्को भगवत्स्वरूपसे नहीं देख सकता। जैसे स्त्री वास्तवमें जनन-शक्ति है; परन्तु स्त्रीमें आसक्त पुरुष स्त्रीको मातृरूपसे नहीं देख सकता, ऐसे ही संसार वास्तवमें भगवत्स्वरूप है; परंतु संसारको अपना भोग्य माननेवाला भोगासक्त पुरुष संसारको भगवत्स्वरूप नहीं देख सकता। यह भोगासक्ति ही जगत्को धारण कराती है अर्थात् जगत्को धारण करानेमें हेतु है। दूसरी बात, मात्र मनुष्योंके शरीरोंकी उत्पत्ति रज- वीर्यसे ही होती है, जो कि स्वरूपसे स्वतः ही मलिन है। परंतु भोगोंमें आसक्त पुरुषोंकी उन शरीरोंमें मलिन बुद्धि नहीं होती, प्रत्युत रमणीय बुद्धि होती है। यह रमणीय बुद्धि ही जगत्को धारण कराती है। नदीके किनारे खड़े एक सन्तसे किसीने कहा कि “देखिये महाराज! यह नदीका जल बह रहा है और उस पुलपर मनुष्य बह रहे हैं।” सन्तने उससे कहा कि “देखो भाई! नदीका जल ही नहीं, खुद नदी भी बह रही है; और पुलपर मनुष्य ही नहीं, खुद पुल भी बह रहा है।” तात्पर्य यह हुआ कि ये नदी, पुल तथा मनुष्य बड़ी तेजीसे नाशकी तरफ जा रहे हैं। एक दिन न यह नदी रहेगी, न यह पुल रहेगा और न ये मनुष्य रहेंगे। ऐसे ही यह पृथ्वी भी बह रही है अर्थात् प्रलयकी तरफ जा रही है। इस प्रकार भावरूपसे दीखनेवाला यह सारा जगत् प्रतिक्षण अभावमें जा रहा है; परन्तु जीवने इसको भावरूपसे अर्थात् “है” रूपसे धारण (स्वीकार) कर रखा है। परा प्रकृतिकी (स्वरूपसे) उत्पत्ति नहीं होती; पर अपरा प्रकृतिके साथ तादात्म्य करनेके कारण यह शरीरकी उत्पत्तिको अपनी उत्पत्ति मान लेता है और शरीरके नाशको अपना नाश मान लेता है, जिससे यह जन्मता-मरता रहता है। अगर यह अपराके साथ सम्बन्ध न जोड़े, इससे विमुख हो जाय अर्थात् भावरूपसे इसको सत्ता न दे तो जगत् सत्-रूपसे दीख ही नहीं सकता। “इदम्” पदसे शरीर और संसार—दोनों लेने चाहिये; क्योंकि शरीर और संसार अलग-अलग नहीं हैं। तत्त्वतः (धातु चीज) एक ही है। शरीर और संसारका भेद केवल माना हुआ है, वास्तवमें अभेद ही है। इसलिये तेरहवें अध्यायमें भगवान्ने “इदं शरीरम्” पदोंसे शरीरको क्षेत्र बताया (तेरहवें अध्यायका पहला श्लोक); परन्तु जहाँ क्षेत्रका वर्णन किया है, वहाँ समष्टिका ही वर्णन हुआ है (तेरहवें अध्यायका पाँचवाँ श्लोक) और इच्छा-द्वेषादि विकार व्यष्टिके माने गये हैं (तेरहवें अध्यायका छठा श्लोक); क्योंकि इच्छा आदि विकार व्यष्टि प्राणीके ही होते हैं। तात्पर्य है कि समष्टि और व्यष्टि तत्त्वतः एक ही हैं। एक होते हुए भी अपनेको शरीर माननेसे “अहंता” और शरीरको अपना माननेसे “ममता” पैदा होती है, जिससे बन्धन होता है। अगर शरीर और संसारकी अभिन्नताका अथवा अपनी और भगवान्की अभिन्नताका साक्षात् अनुभव हो जाय तो अहंता और ममता स्वतः मिट जाती हैं। ये अहंता और ममता कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनोंसे ही मिटती हैं। कर्मयोगसे—“निर्ममो निरहङ्कारः” (गीता 2। 71), ज्ञानयोगसे—“अहङ्कारं ..... विमुच्य निर्ममः” (गीता 18। 53) और भक्तियोगसे “निर्ममो निरहङ्कारः” (गीता 12। 13)। तात्पर्य है कि जडताके साथ सम्बन्ध-विच्छेद होना चाहिये, जो कि केवल माना हुआ है। अतः विवेकपूर्वक न माननेसे अर्थात् वास्तविकताका अनुभव करनेसे वह माना हुआ सम्बन्ध मिट जाता है। प्राप्त और परमात्मा प्राप्त होनेपर भी अप्राप्त प्रतीत हो रहे हैं। संसारसे माना हुआ सम्बन्ध टूटते ही परमात्माके
परिशिष्ट भाव
जब चेतन अपरा प्रकृतिके साथ तादात्म्य कर लेता है अर्थात् “अहम्” के साथ एक होकर अपनेको “मैं हूँ” ऐसा मान लेता है, तब वह जीवरूप बनी हुई “परा प्रकृति” कहलाता है। “अहम्” (मैं) से इधर जगत् (अपरा प्रकृति) है और उधर परमात्मा हैं। परन्तु जीव उन परमात्माको स्वीकार न करके, प्रत्युत उनकी अपरा प्रकृतिको स्वीकार करके उसको जगत्-रूपसे धारण कर लेता है और जन्म-मरणरूप बन्धनमें पड़ जाता है। “अपरेयमितस्त्वन्याम्”—अपरासे अन्य परा है और परासे अन्य अपरा है। अपरा “अन्य” अर्थात् विजातीय है। अन्यको पकड़नेसे ही परा “जीव” बनी है—“जीवभूताम्”। अपरा (परिवर्तनशील) और परा (अपरिवर्तनशील)—दोनों ही भगवान्की प्रकृतियाँ अर्थात् शक्तियाँ हैं, स्वभाव हैं। भगवान्की शक्ति होनेसे दोनों भगवान्से अभिन्न हैं; क्योंकि शक्तिमान्के बिना शक्तिकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं होती। जैसे नख और केश निष्प्राण होनेपर भी हमारे प्राणयुक्त शरीरसे अलग नहीं हैं, ऐसे ही अपरा प्रकृति जड़ होनेपर भी चेतन भगवान्से अलग नहीं है—“सदसच्चाहमर्जुन” (गीता 9। 19)। इस प्रकार जब अपरा और परा—दोनों प्रकृतियाँ भगवान्का स्वरूप र्हुइं तो फिर भगवान्के सिवाय क्या शेष रहा? कुछ भी शेष नहीं रहा—“वासुदेवः सर्वम्” (गीता 7। 19)। तात्पर्य है कि अपरा और परा—दोनों प्रकृतियोंके सहित भगवान्का स्वरूप “समग्र” है अर्थात् परा-अपरा, सत्-असत्, जड़-चेतन सब कुछ भगवान् ही हैं। “ययेदं धार्यते जगत्” का तात्पर्य है कि संसार न तो भगवान्की दृष्टिमें है और न महात्माकी दृष्टिमें है, प्रत्युत जीवकी दृष्टि-(मान्यता-) में है। भगवान्की दृष्टिमें सत्-असत् सब कुछ वे ही हैं—“सदसच्चाहमर्जुन” (गीता 9। 19) और महात्माकी दृष्टिमें भी सब कुछ भगवान् ही हैं—“वासुदेवः सर्वम्”(गीता 7। 19)। जीवने ही राग-द्वेषके कारण जगत्को अपनी बुद्धिमें धारण कर रखा है। इसी बातको आगे पन्द्रहवें अध्यायके सातवें श्लोकमें “मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति” पदोंसे कहा गया है। जगत्को सत्ता देनेसे ही राग-द्वेष पैदा होते हैं। जीवने संसारकी सत्ता मान ली और सत्ता मानकर उसको महत्ता दे दी। महत्ता देनेसे कामना अर्थात् सुखभोगकी इच्छा पैदा हुई, जिससे जीव जन्म-मरणमें पड़ गया। तात्पर्य यह हुआ कि एक भगवान्के सिवाय दूसरी सत्ता माननेसे ही जीव संसार-बन्धनमें पड़ा है। अतः दूसरी सत्ता न माननेकी जिम्मेवारी जीवकी ही है। अगर वह संसारकी सत्ता न माने तो संसार है ही कहाँ? भगवान्ने पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहम्—इन आठोंको अपरा (जड़) प्रकृति कहा है1। अतः जैसे पृथ्वी जड़ और जाननेमें आनेवाली है, ऐसे ही अहम् भी जड़ और जाननेमें आनेवाला है। तात्पर्य है कि पृथ्वी, जल आदि आठों एक ही जातिके हैं2। अतः जिस जातिकी पृथ्वी है, उसी जातिका अहम् भी है अर्थात् अहम् भी मिट्टीके ढेलेकी तरह जड़ और दृश्य है। अतः भगवान्ने अहम्को एतत्तासे कहा है; जैसे—“एतद् यो वेत्ति” (गीता 13। 1)। “एतत्” (यह) कभी “अहम्” (मैं) नहीं होता; अतः अहम्को एतत्तासे कहनेका तात्पर्य है कि यह अपना स्वरूप नहीं है। परन्तु जब चेतन (जीव) इस अहम्के साथ अपना तादात्म्य मान लेता है, तब वह बँध जाता है—“अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते” (गीता 3। 27)। इसीको चिज्जड़ग्रन्थि कहते हैं। “अहङ्कार इतीयं मे”—यह धातुरूप अहंकार तो अपरा प्रकृतिका (जड़) है, पर “मैं हूँ”—यह ग्रन्थिरूप अहंकार केवल अपरा प्रकृति नहीं है, प्रत्युत इसमें परा प्रकृति (चेतन) भी मिली हुई है। तत्त्वज्ञान होनेपर यह जन्म-मरण देनेवाला ग्रन्थिरूप अहंकार तो नहीं रहता, पर अपरा प्रकृतिका धातुरूप अहंकार रहता है। क्रिया और पदार्थ न तो परा प्रकृतिमें हैं और न परमात्मामें हैं, प्रत्युत अपरा प्रकृतिमें हैं। अपरा प्रकृति क्रियारूप और पदार्थरूप है। परमात्मा प्रकृतिकी सहायतासे ही सृष्टि-रचना करते हैं। परा प्रकृति अर्थात् जीव क्रिया और पदार्थरूप अपरा प्रकृतिमें आसक्ति करके और उसका आश्रय लेकर बँध जाता है। अपराकी आसक्ति और उसका आश्रय लेना ही जगत्को धारण करना है। इसलिये भगवान्ने सातवें अध्यायके आरम्भमें ही “मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन् मदाश्रयः” पदोंसे अपनेमें आसक्ति (प्रेम) करने और अपना आश्रय लेनेकी बात कही है। अगर जीव अपरा प्रकृतिमें आसक्ति न रखे और उसका आश्रय न ले तो वह “मुक्त” हो जायगा। अगर वह भगवान्में आसक्ति (प्रेम) करे और उनका आश्रय ले तो वह “भक्त” हो जायगा। जगत्की स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। बाँधनेवाला जगत् तो जीवने ही बना रखा है। जीव जगत्को धारण करता है, इसीसे सुख-दुःख होते हैं, बन्धन होता है, चौरासी लाख योनियाँ, भूत, प्रेत, पिशाच, देवता आदि योनियाँ तथा नरकोंकी प्राप्ति होती है। सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण कोई बाधा नहीं देते; परन्तु इनका संग करनेसे जीव ऊर्ध्वगति, मध्यगति अथवा अधोगतिमें जाता है—“कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु” (गीता 13। 21)। गुणोंका संग जीव स्वयं करता है। अपरा प्रकृति किसीके साथ कोई सम्बन्ध नहीं करती। सम्बन्ध न प्रकृति करती है, न गुण करते हैं, न इन्द्रियाँ करती हैं, न मन करता है, न बुद्धि करती है। जीव स्वयं ही सम्बन्ध करता है, इसीलिये सुखी-दुःखी हो रहा है, जन्म-मरणमें जा रहा है। जीव स्वतन्त्र है; क्योंकि यह “परा” अर्थात् उत्कृष्ट प्रकृति है। अपरा प्रकृति तो बेचारी कुछ नहीं करती; क्योंकि उसमें चेतना और कामना नहीं है। उससे सम्बन्ध जोड़कर, उसका सदुपयोग-दुरुपयोग करके जीव ऊँच-नीच योनियोंमें जाता है, भटकता है। तात्पर्य है कि अपरिवर्तनशील होते हुए भी जीव विजातीय जगत्के साथ सम्बन्ध जोड़कर परिवर्तनशील जगत्-रूप हो जाता है1 (इसी अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। उसकी दृष्टि शरीरकी तरफ ही रहती है, अपने स्वरूपकी स्फुरणा होती ही नहीं! जो हमसे सर्वथा अलग है, उस जगत् अर्थात् शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि-अहम्के साथ अपनी एकता मान ली— यही जगत्को धारण करना है। वास्तवमें जगत् हमारा है ही नहीं; क्योंकि अगर हमारी चीज हमारेको मिल गयी होती तो हमारी कामनाएँ सदाके लिये मिट जातीं, हम निर्मम, निर्भय, निश्चिन्त, निष्काम हो जाते। परन्तु जगत् हमें ऐसी चीज नहीं दे सकता, जो हमारी हो अर्थात् जो हमसे कभी बिछुड़े नहीं। जो चीज वास्तवमें हमारी है, वह जगत्के द्वारा प्राप्त नहीं हो सकती, प्रत्युत जगत्के सम्बन्ध-विच्छेदसे प्राप्त हो सकती है। हमारी वस्तु है—परमात्मा। हम उस परमात्माके ही अंश हैं—“ममैवांशो जीवलोके” (गीता 15। 7)। उसकी प्राप्तिका उपाय (कर्मयोगकी दृष्टिसे) यह है कि जगत्से मिली हुई वस्तुओं-(शरीरादि-) को जगत्की ही सेवामें लगा दें और बदलेमें उससे कुछ भी आशा (फलेच्छा) न रखें। उससे कोई सम्बन्ध न जोड़ें, न क्रियाके साथ, न पदार्थके साथ। सेवा करनेकी अपेक्षा भी किसीको दुःख न देना श्रेष्ठ है। किसीको भी दुःख न देनेसे, किसीका भी अहित न करनेसे सेवा अपने-आप होने लगती है, करनी नहीं पड़ती2। अपने-आप होनेवाली क्रियाका अभिमान नहीं होता और उसके फलकी इच्छा भी नहीं होती। अभिमान और फलेच्छाका त्याग होनेपर हमें वह वस्तु मिल जाती है, जो वास्तवमें हमारी है। वास्तवमें अपरा प्रकृतिकी परमात्माके सिवाय अलग सत्ता है ही नहीं—“नासतो विद्यते भावः”। उसको विशेष सत्ता जीवने ही दी है। जैसे, रुपयोंकी अपनी कोई महत्ता नहीं है, हम ही लोभके कारण उसको महत्ता देते हैं। हम जिसको महत्ता देते हैं, उसीमें हमारा आकर्षण होता है। महत्ता तब देते हैं, जब दोषोंको स्वीकार करते हैं3। कामरूप दोषके कारण ही स्त्रीमें आकर्षण होता है, लोभ-रूप दोषके कारण ही धनमें आकर्षण होता है, मोह-रूप दोषके कारण ही कुटुम्ब-परिवारमें आकर्षण होता है, आदि। परन्तु दोषोंके साथ तादात्म्य होनेके कारण दोष दोषरूपसे नहीं दीखते और हमें इस बातका पता नहीं लगता कि हम ही उनको (अपरा प्रकृतिको) सत्ता और महत्ता दे रहे हैं। तादात्म्य मिटनेपर दोष तो रहते नहीं और गुण दीखते नहीं! अनन्त ब्रह्माण्डोंमें तीन लोक, चौदह भुवन, जड़-चेतन, स्थावर-जंगम, थलचर-जलचर-नभचर, जरायुज-अण्डज- स्वेदज-उद्भिज्ज, सात्त्विक-राजस-तामस, मनुष्य, देवता, पितर, गन्धर्व, पशु, पक्षी, कीट, पतंग, भूत-प्रेत-पिशाच, ब्रह्म- राक्षस आदि जो कुछ भी देखने, सुनने, पढ़ने तथा कल्पना करनेमें आता है, उसमें “परा” और “अपरा”—इन दो प्रकृतियोंके सिवाय कुछ भी नहीं है। जो देखने, सुनने, पढ़ने तथा कल्पना करनेमें आता है और जिन शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि-अहम्के द्वारा देखा, सुना, पढ़ा, सोचा जाता है, वह सब-का-सब “अपरा” है। परन्तु जो देखता, सुनता, पढ़ता, सोचता, जानता, मानता है, वह “परा” है। परा और अपरा—दोनों ही भगवान्की शक्तियाँ होनेसे भगवान्से अभिन्न अर्थात् भगवत्स्वरूप ही हैं। अतः अनन्त ब्रह्माण्डोंके भीतर तथा बाहर और अनन्त ब्रह्माण्डोंके रूपमें एक भगवान्के सिवाय किंचिन्मात्र भी कुछ नहीं है—“वासुदेवः सर्वम्” (7। 19), “सदसच्चाहमर्जुन” (9। 19)। संसारके सभी दर्शन, मत-मतान्तर आचार्योंको लेकर हैं, पर “वासुदेवः सर्वम्” किसी आचार्यका दर्शन, मत नहीं है, प्रत्युत साक्षात् भगवान्का अटल सिद्धान्त है, जिसके अन्तर्गत सभी दर्शन, मत-मतान्तर आ जाते हैं। “अपरा” (जगत्) को स्वतन्त्र सत्ता जीवने ही दी है—“ययेदं धार्यते जगत्”। “अपरा” भगवान्की है, पर उसको अर्थात् शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि-अहम्को अपना और अपने लिये मान लेनेसे ही जीव बन्धनमें पड़ा है। अतः साधकको अगर जगत् दीखता है तो यह उसकी व्यक्तिगत दृष्टि है। व्यक्तिगत दृष्टि सिद्धान्त नहीं होता। दीखना सीमित होता है, जबकि तत्त्व असीम है। जैसे, सूर्य थालीकी तरह दीखता है, पर वास्तवमें वह थालीके आकारका नहीं है, प्रत्युत पृथ्वीसे भी कई गुना अधिक बड़ा है! अगर साधकको जगत् दीखता है तो उसको निष्कामभावपूर्वक जगत्की सेवा करनी चाहिये। जगत्को अपना और अपने लिये मानना तथा उससे सुख लेना ही असाधन है, बन्धन है। कारण कि हमारे पास शरीर-इन्द्रियाँ-मन- बुद्धि आदि जो कुछ भी है, वह सब जगत्का है और जगत्के लिये है। अतः जगत्की वस्तुको जगत्की सेवामें लगानेसे जगत् जगत्-रूपसे नहीं दीखेगा, प्रत्युत भगवत्स्वरूप दीखने लगेगा, जो कि वास्तवमें है। तात्पर्य है कि साधक चाहे जगत्को माने, चाहे आत्माको माने, चाहे परमात्माको माने, किसीको भी मानकर वह साधन कर सकता है और अन्तिम तत्त्व “वासुदेवः सर्वम्” का अनुभव कर सकता है।
विशेष बात
विशेष बात जैसे गुरु-शिष्यका सम्बन्ध होता है, तो इसमें गुरु शिष्यको अपना शिष्य मानता है। शिष्य गुरुको अपना गुरु मानता है। इस प्रकार गुरु अलग है और शिष्य अलग है अर्थात् उन दोनोंकी अलग-अलग सत्ता दीखती है। परन्तु उन दोनोंके सम्बन्धसे एक तीसरी सत्ता प्रतीत होने लग जाती है, जिसको “सम्बन्धकी सत्ता” कहते हैं*। ऐसे ही साक्षात् परमात्माके अंश जीवने शरीर-संसारके साथ अपना सम्बन्ध मान लिया है। इस सम्बन्धके कारण एक तीसरी सत्ता प्रतीत होने लग जाती है, जिसको “मैं”-पन कहते हैं। सम्बन्धकी यह सत्ता (“मैं”-पन) केवल मानी हुई है, वास्तवमें है नहीं। जीव भूलसे इस माने हुए सम्बन्धको सत्य मान लेता है अर्थात् इसमें सद्भाव कर लेता है और बँध जाता है। इस प्रकार जीव संसारसे नहीं, प्रत्युत संसारसे माने हुए सम्बन्धसे ही बँधता है। गुरु और शिष्यमें तो दोनोंकी अलग-अलग सत्ता है और दोनों एक-दूसरेसे सम्बन्ध मानते हैं; परन्तु जीव (चेतन) और संसार (जड)—इन दोनोंमें केवल एक जीवकी ही वास्तविक सत्ता है और यही भूलसे संसारके साथ अपना सम्बन्ध मानता है। संसार प्रतिक्षण नष्ट हो रहा है; अतः उससे माना हुआ सम्बन्ध भी प्रतिक्षण स्वतः नष्ट हो रहा है। ऐसा होते हुए भी जबतक संसारमें सुख प्रतीत होता है, तबतक उससे माना हुआ सम्बन्ध स्थायी प्रतीत होता है। तात्पर्य यह है कि संसारसे माना हुआ सम्बन्ध सुखासक्तिपर ही टिका हुआ है। संसारसे सुखासक्तिपूर्वक माने हुए सम्बन्धके कारण ही संसार अप्राप्त होनेपर भी वास्तविक सम्बन्धका अथवा संसारकी अप्राप्ति और परमात्माकी प्राप्तिका अनुभव हो जाता है। “मैं”-पनको मिटानेके लिये साधक प्रकृति और प्रकृतिके कार्यको न तो अपना स्वरूप समझे, न उससे कुछ मिलनेकी इच्छा रखे और न ही अपने लिये कुछ करे। जो कुछ करे, वह सब केवल संसारकी सेवाके लिये ही करता रहे। तात्पर्य है कि जो कुछ प्रकृतिजन्य पदार्थ हैं, उन सबकी संसारके साथ एकता है; अतः उनको केवल संसारका मानकर संसारकी ही सेवामें लगाता रहे। इससे क्रिया और पदार्थोंका प्रवाह संसारकी तरफ हो जाता है और अपना स्वरूप अवशिष्ट रह जाता है अर्थात् अपने स्वरूपका बोध हो जाता है। यह कर्मयोग हुआ। ज्ञानयोगमें विवेक-विचारपूर्वक प्रकृतिके कार्य पदार्थों और क्रियाओंसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद करनेपर स्वरूपका बोध हो जाता है। इस प्रकार जडके सम्बन्धसे जो अहंता (“मैं”-पन) पैदा हुई थी, उसकी निवृत्ति हो जाती है। भक्तियोगमें “मैं केवल भगवान्का हूँ और केवल भगवान् ही मेरे हैं तथा मैं शरीर-संसारका नहीं हूँ और शरीर-संसार मेरे नहीं हैं”—ऐसी दृढ़ मान्यता करके भक्त संसारसे विमुख होकर केवल भगवत्परायण हो जाता है, जिससे संसारका सम्बन्ध स्वतः टूट जाता है और अहंताकी निवृत्ति हो जाती है। इस प्रकार कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—इन तीनोंमेंसे किसी एकका भी ठीक अनुष्ठान करनेपर जडतासे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होकर परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जाती है।
* कहीं तो प्रकृतिको लेकर भगवान् रचना करते हैं (गीता—नवें अध्यायका आठवाँ श्लोक) और कहीं भगवान्की
अध्यक्षतामें प्रकृति रचना करती है (गीता—नवें अध्यायका दसवाँ श्लोक)—इन दोनों ही रीतियोंसे गीतामें संसारकी
रचनाका वर्णन आता है।
* मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त। षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः॥
(सांख्यकारिका 3)
तात्पर्य है कि मूल प्रकृति तो किसीसे पैदा नहीं होती; अतः यह किसीकी भी विकृति (कार्य) नहीं है। मूल प्रकृतिसे
पैदा होनेके कारण महत्तत्त्व, अहंकार और पंचतन्मात्राएँ—ये सात पदार्थ “विकृति” भी हैं और शब्दादि पाँच विषयों तथा
दस इन्द्रियोंके कारण होनेसे “प्रकृति” भी हैं अर्थात् ये सातों पदार्थ “प्रकृति-विकृति” हैं। शब्दादि पाँच विषय, दस इन्द्रियाँ
और मन—ये सोलह पदार्थ केवल “विकृति” हैं; क्योंकि ये किसीकी भी प्रकृति (कारण) नहीं हैं अर्थात् इनसे कोई भी पदार्थ
पैदा नहीं होता।
चेतन न प्रकृति है और न विकृति ही है अर्थात् यह न तो किसीका कारण है और न कार्य।
* जिस साधकमें ज्ञानमार्गका विशेष महत्त्व होता है, उसमें परमात्माका प्रेम अपने स्वरूपके आकर्षणके रूपमें प्रकट
हो जायगा और जिस साधकमें भक्तिके संस्कार होते हैं, उसमें वह प्रभु-प्रेमके रूपमें प्रकट हो जायगा। यदि ज्ञानमार्गवाले
साधकका आग्रह नहीं होगा तो उसमें भी प्रभु-प्रेम प्रकट हो जायगा। वास्तवमें स्वरूप-बोध होनेपर ज्ञानमार्गीका आग्रह नहीं
रहता; अतः उसमें प्रभु-प्रेम प्रकट हो जाता है। इस दृष्टिसे अन्तमें दोनों (भक्तियोगी और ज्ञानयोगी) एक हो जाते हैं।
* गीतामें “जगत्” शब्द कहीं “परा” प्रकृतिका (7। 13), कहीं “अपरा” प्रकृतिका (7। 5) और कहीं “परा-अपरा” दोनों
प्रकृतियोंका वाचक है (7। 6)।
* गुरु-शिष्यके सम्बन्धमें गुरुका काम केवल शिष्यका हित करना है और शिष्यका काम केवल गुरुकी सेवा करना है।
इस प्रकार संसारमें माने हुए जितने भी सम्बन्ध हैं, सब केवल एक-दूसरेका हित या सेवा करनेके लिये ही हैं, अपने लिये नहीं।
1-पृथ्वी स्थूल है। पृथ्वीसे सूक्ष्म जल है। जलसे सूक्ष्म तेज है। तेजसे सूक्ष्म वायु है। वायुसे सूक्ष्म आकाश है। आकाशसे
सूक्ष्म मन है। मनसे सूक्ष्म बुद्धि है। बुद्धिसे सूक्ष्म अहम् है। अपरा प्रकृतिमें अहम् सबसे सूक्ष्म है। इस प्रकार भगवान्ने स्थूलसे
सूक्ष्मतक क्रमसे अपरा प्रकृतिका वर्णन किया है।
2-एक अनेकमें अनुगत हो तो उसे “जाति” कहते हैं। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहम्—इन आठोंमें
जातीय एकता तो है, पर स्वरूपकी एकता नहीं है अर्थात् जाति एक होनेपर भी इनका स्वरूप अलग-अलग है। इसीलिये
इसको “अष्टधा” कहा गया है। अपरा प्रकृतिका कार्य होनेसे यहाँ पृथ्वी, जल आदिको भी अपरा प्रकृति कहा गया है।
1-यहाँ “जगत्” शब्द परिवर्तनशीलका वाचक है—“गच्छतीति जगत्”।
2-किसीका भी अहित न करनेसे दो बातें होंगी—हम कुछ नहीं करेंगे, अगर कुछ करेंगे तो हमारेसे सेवा ही होगी। कुछ
न करना अथवा सेवा करना—इन दोनोंसे ही संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होता है। कारण कि कुछ न करनेमें कोई दोष होता
ही नहीं और अपने-आप सेवा होनेसे सब दोष मिट जाते हैं। जैसे भोजन करनेमें “मैं खाता हूँ”—इस प्रकार जो अभिमान होता
है, वह भोजन पचनेमें नहीं होता; क्योंकि वह अपने-आप पचता है। ऐसे ही सेवा अपने-आप होनेसे कर्तृत्वाभिमान और
फलासक्तिका त्याग स्वतः होता है।
3-संसारके सब सुख दोषजनित हैं। दोषोंको स्वीकार करनेसे ही सुख दीखता है। कामके कारण ही मनुष्य स्त्रीके बिना
नहीं रह सकता। लोभके कारण ही मनुष्य धनके बिना नहीं रह सकता। मोहके कारण ही मनुष्य परिवारके बिना नहीं रह
सकता। दोषके कारण ही उसको त्यागका महत्त्व नहीं दीखता।
6श्रीभगवान्
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारयअहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा॥ 6॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

पूर्वश्लोकमें भगवान्ने कहा कि परा प्रकृतिने अपरा प्रकृतिको धारण कर रखा है। उसीका स्पष्टीकरण करनेके लिये अब आगेका श्लोक कहते हैं।

पदच्छेद
श्लोकमें ढूँढ़नेके लिये हॉवर करें
व्याख्या
3 sections
“एतद्योनीनि भूतानि”*—जितने भी देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि जंगम और वृक्ष, लता, घास आदि स्थावर प्राणी हैं, वे सब-के-सब मेरी अपरा और परा प्रकृतिके सम्बन्धसे ही उत्पन्न होते हैं। तेरहवें अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके सम्बन्धसे सम्पूर्ण स्थावर-जंगम प्राणियोंकी उत्पत्ति बतायी है। यही बात सामान्य रीतिसे चौदहवें अध्यायके चौथे श्लोकमें भी बतायी है कि स्थावर, जंगम योनियोंमें उत्पन्न होनेवाले जितने शरीर हैं, वे सब प्रकृतिके हैं और उन शरीरोंमें जो बीज अर्थात् जीवात्मा है, वह मेरा अंश है। उसी बीज अर्थात् जीवात्माको भगवान्ने “परा प्रकृति” (सातवें अध्यायका पाँचवाँ श्लोक) और “अपना अंश” (पन्द्रहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक) कहा है।
सर्वाणीत्युपधारय
“स्वर्गलोक, मृत्युलोक, पाताललोक आदि सम्पूर्ण लोकोंके जितने भी स्थावर- जंगम प्राणी हैं, वे सब-के-सब अपरा और परा प्रकृतिके संयोगसे ही उत्पन्न होते हैं। तात्पर्य है कि परा प्रकृतिने अपराको अपना मान लिया है1, उसका संग कर लिया है, इसीसे सब प्राणी पैदा होते हैं—इसको तुम धारण करो अर्थात् ठीक तरहसे समझ लो अथवा मान लो।
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा
मात्र वस्तुओंको सत्ता-स्फूर्ति परमात्मासे ही मिलती है, इसलिये भगवान् कहते हैं कि मैं सम्पूर्ण जगत्का प्रभव (उत्पन्न करनेवाला) और प्रलय (लीन करनेवाला) हूँ। “प्रभवः” का तात्पर्य है कि मैं ही इस जगत्का निमित्तकारण हूँ; क्योंकि सम्पूर्ण सृष्टि मेरे संकल्पसे2 पैदा हुई है—“सदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति” (छान्दोग्य0 6। 2। 3)। जैसे घड़ा बनानेमें कुम्हार और सोनेके आभूषण बनानेमें सुनार ही निमित्तकारण है, ऐसे ही संसारमात्रकी उत्पत्तिमें भगवान् ही निमित्तकारण हैं। “प्रलयः” कहनेका तात्पर्य है कि इस जगत्का उपादान-कारण भी मैं ही हूँ; क्योंकि कार्यमात्र उपादान- कारणसे उत्पन्न होता है; उपादान-कारण-रूपसे ही रहता है और अन्तमें उपादान-कारणमें ही लीन हो जाता है। जैसे घड़ा बनानेमें मिट्टी उपादान-कारण है, ऐसे ही सृष्टिकी रचना करनेमें भगवान् ही उपादान-कारण हैं। जैसे घड़ा मिट्टीसे ही पैदा होता है, मिट्टीरूप ही रहता है और अन्तमें टूट करके घिसते-घिसते मिट्टी ही बन जाता है; और जैसे सोनेके यावन्मात्र आभूषण सोनेसे ही उत्पन्न होते हैं, सोनारूप ही रहते हैं और अन्तमें सोना ही रह जाते हैं, ऐसे ही यह संसार भगवान्से ही उत्पन्न होता है, भगवान्में ही रहता है और अन्तमें भगवान्में ही लीन हो जाता है। ऐसा जानना ही “ज्ञान” है। सब कुछ भगवत्स्वरूप है, भगवान्के सिवाय दूसरा कुछ है ही नहीं—ऐसा अनुभव हो जाना “विज्ञान” है। “कृत्स्नस्य जगतः” पदोंमें भगवान्ने अपनेको जड- चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्का प्रभव और प्रलय बताया है। इसमें जड-(अपरा प्रकृति-)का प्रभव और प्रलय बताना तो ठीक है, पर चेतन-(परा प्रकृति अर्थात् जीवात्मा-)का उत्पत्ति और विनाश कैसे हुआ? क्योंकि वह तो नित्य तत्त्व है—“नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः” (गीता 2। 24)। जो परिवर्तनशील है, उसको जगत् कहते हैं— “गच्छतीति जगत्।” पर यहाँ जगत् शब्द जड-चेतनात्मक सम्पूर्ण संसारका वाचक है। इसमें जड-अंश तो परिवर्तनशील है और चेतन-अंश सदा-सर्वथा परिवर्तनरहित तथा निर्विकार है। वह निर्विकार तत्त्व जब जडके साथ अपना सम्बन्ध मानकर तादात्म्य कर लेता है, तब वह जड-(शरीर-) के उत्पत्ति-विनाशको अपना उत्पत्ति-विनाश मान लेता है। इसीसे उसके जन्म-मरण कहे जाते हैं। इसीलिये भगवान्ने अपनेको सम्पूर्ण जगत् अर्थात् अपरा और परा प्रकृतिका प्रभव तथा प्रलय बताया है। अगर यहाँ “जगत्” शब्दसे केवल नाशवान् परिवर्तन- शील और विकारी संसारको ही लिया जाय, चेतनको नहीं लिया जाय तो बड़ी बाधा लगेगी। भगवान्ने “कृत्स्नस्य जगतः” पदोंसे अपनेको सम्पूर्ण जगत्का कारण बताया है3। अतः सम्पूर्ण जगत्के अन्तर्गत स्थावर-जंगम, जड- चेतन सभी लिये जायँगे। अगर केवल जडको लिया जायगा तो चेतन-भाग छूट जायगा, जिससे “मैं सम्पूर्ण जगत्का कारण हूँ” यह कहना नहीं बन सकेगा और आगे भी बड़ी बाधा लगेगी। कारण कि आगे इसी अध्यायके तेरहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि तीनों गुणोंसे मोहित जगत् मेरेको नहीं जानता, तो यहाँ जानना अथवा न जानना चेतनका ही हो सकता है, जडका जानना अथवा न जानना होता ही नहीं। इसलिये “जगत्” शब्दसे केवल जडको ही नहीं, चेतनको भी लेना पड़ेगा। ऐसे ही सोलहवें अध्यायके आठवें श्लोकमें भी आसुरी सम्पदावालोंकी मान्यताके अनुसार “जगत्” शब्दसे जड और चेतन—दोनों ही लेने पड़ेंगे; क्योंकि आसुरी सम्पदावाले व्यक्ति सम्पूर्ण शरीरधारी जीवोंको असत्य मानते हैं, केवल जडको नहीं। इसलिये अगर वहाँ “जगत्” शब्दसे केवल जड संसार ही लिया जाय तो जगत्को (जड संसारको) असत्य, मिथ्या और अप्रतिष्ठित कहनेवाले अद्वैत-सिद्धान्ती भी आसुरी सम्पदावालोंमें आ जायँगे, जो कि सर्वथा अनुचित है। ऐसे ही आठवें अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें आये “शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः” पदोंमें “जगत्” शब्द केवल जडका ही वाचक मानें तो जडकी शुक्ल और कृष्ण गतिका क्या तात्पर्य होगा? गति तो चेतनकी ही होती है। जडसे तादात्म्य करनेके कारण ही चेतनको “जगत्” नामसे कहा गया है। इन सब बातोंपर विचार करनेसे यह निष्कर्ष निकलता है कि जडके साथ एकात्मता करनेसे जीव “जगत्” कहा जाता है। परन्तु जब यह जडसे विमुख होकर चिन्मय- तत्त्वके साथ अपनी एकताका अनुभव कर लेता है, तब यह “योगी” कहा जाता है, जिसका वर्णन गीतामें जगह- जगह आया है।
परिशिष्ट भाव
जो न खुदको जान सके और न दूसरेको जान सके, वह “अपरा प्रकृति” है। जो खुदको भी जान सके और दूसरेको भी जान सके, वह “परा प्रकृति” है। इन अपरा और परा—दोनोंके माने हुए संयोगसे ही सम्पूर्ण स्थावर-जंगम प्राणी पैदा होते हैं (गीता—तेरहवें अध्यायका छब्बीसवाँ श्लोक)। मूल दोष एक ही है, जो स्थानभेदसे अनेक रूपसे दीखता है, वह है—अपराके साथ सम्बन्ध। इस एक दोषसे ही सम्पूर्ण दोष उत्पन्न होते हैं। यह एक दोष आ जाय तो सम्पूर्ण दोष आ जायँगे और यह एक दोष दूर हो जाय तो सम्पूर्ण दोष दूर हो जायँगे। इसी तरह मूल गुण भी एक ही है, जिससे सम्पूर्ण गुण प्रकट होते हैं, वह है—भगवान्के साथ सम्बन्ध। अपराको चाहे नित्य मानें, चाहे अनित्य मानें, पर उसके साथ हमारा सम्बन्ध अनित्य है— यह सर्वसम्मत बात है। यह सम्बन्ध ही जन्म-मरणका कारण है—“कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु” (गीता 13। 21)। यही संसारका बीज है। मैं सम्पूर्ण जगत्का प्रभव तथा प्रलय हूँ—इसका तात्पर्य है कि इस स्थावर-जंगमरूप जगत्को मैं ही उत्पन्न करनेवाला हूँ और मैं ही उत्पन्न होनेवाला हूँ; मैं ही नाश करनेवाला हूँ और मैं ही नष्ट होनेवाला हूँ; क्योंकि मेरे सिवाय संसारका दूसरा कोई भी कारण तथा कार्य नहीं है (इसी अध्यायका सातवाँ श्लोक) अर्थात् मैं ही इसका निमित्त तथा उपादान कारण हूँ। अतः जगत्-रूपसे मैं ही हूँ। नवें अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने कहा है—“अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन” अर्थात् “अमृत और मृत्यु तथा सत् और असत् भी मैं ही हूँ।” श्रीमद्भागवतमें भगवान् कहते हैं— आत्मैव तदिदं विश्वं सृज्यते सृजति प्रभुः। त्रायते त्राति विश्वात्मा ह्रियते हरतीश्वरः॥ “जो कुछ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष वस्तु है, वह सर्वशक्तिमान् परमात्मा ही हैं। जो कुछ सृष्टि प्रतीत हो रही है, इसके निमित्त कारण भी वे ही हैं और उपादान कारण भी वे ही हैं अर्थात् वे ही विश्व बनाते हैं और वे ही विश्व बनते हैं। वे ही रक्षक हैं और वे ही रक्षित हैं। वे ही सर्वात्मा भगवान् इसका संहार करते हैं और जिसका संहार होता है, वह भी वे ही हैं।” तैत्तिरीयोपनिषद्में आया है कि अन्न भी मैं ही हूँ और अन्नको खानेवाला भी मैं ही हूँ—“अहमन्नमहमन्नमहमन्नम्। अहमन्नादोऽहमन्नादोऽहमन्नादः।” (3। 10। 6) तात्पर्य यह हुआ कि अपरा और परा प्रकृति तथा उनके संयोगसे पैदा होनेवाले सम्पूर्ण प्राणी—ये सब-के- सब एक भगवान् ही हैं। कारण भी भगवान् हैं और कार्य भी! (11। 28। 6)
* “एतद्योनीनि भूतानि” पदोंका अर्थ है—“एते अपरा-परे योनी कारणे येषां तानि” अर्थात् “अपरा और परा—ये दो
प्रकृतियाँ जिनकी कारण हैं, ऐसे सम्पूर्ण प्राणी”।
1-इसमें एक विचित्र बात है कि सम्बन्ध केवल क्षेत्रज्ञने माना है, क्षेत्रने नहीं। यदि यह अपना सम्बन्ध न माने तो इसका
पुनर्जन्म हो ही नहीं सकता; क्योंकि पुनर्जन्मका कारण गुणोंका संग ही है—“कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ।”
(गीता 13। 21)
2-जीवोंके द्वारा किये हुए अनादिकालके कर्म जीवोंके प्रलयकालमें लीन होनेपर जब परिपक्व होते हैं अर्थात् फल देनेके
लिये उन्मुख होते हैं, तब उससे (प्रलयका समय समाप्त होनेपर, सर्गके आदिमें) भगवान्का संकल्प होता है और उसी
संकल्पसे शरीरोंकी उत्पत्ति होती है।
3-अपरा प्रकृति और भगवान्में तो कार्य-कारणका सम्बन्ध है; क्योंकि अपरा प्रकृति भगवान्का कार्य है। परन्तु परा
प्रकृति और भगवान्में कार्य-कारणका सम्बन्ध नहीं है; क्योंकि परा प्रकृति (जीव) भगवान्का अंश है, कार्य नहीं। इसलिये
अंश-अंशीकी दृष्टिसे ही भगवान् जीवके कारण कहे गये हैं, कार्य-कारणकी दृष्टिसे नहीं।
7श्रीभगवान्
मत्तः परतरं ान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जयमयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥ 7॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अपनेको परा और अपरा प्रकृतिरूप सम्पूर्ण जगत्का मूल कारण बताया। अब भगवान्के सिवाय भी जगत्का और कोई कारण होगा—इसका आगेके श्लोकमें निषेध करते हैं।

पदच्छेद
श्लोकमें ढूँढ़नेके लिये हॉवर करें
व्याख्या
3 sections
मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनंजय
हे अर्जुन! मेरे सिवाय दूसरा कोई कारण नहीं है, मैं ही सब संसारका महाकारण हूँ। जैसे वायु आकाशसे ही उत्पन्न होती है, आकाशमें ही रहती है और आकाशमें ही लीन होती है अर्थात् आकाशके सिवाय वायुकी कोई पृथक् स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। ऐसे ही संसार भगवान्से उत्पन्न होता है, भगवान्में स्थित रहता है और भगवान्में ही लीन हो जाता है अर्थात् भगवान्के सिवाय संसारकी कोई पृथक् स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। यहाँ “परतरम्” कहकर सबका मूल कारण बताया गया है। मूल कारणके आगे कोई कारण नहीं है अर्थात् मूल कारणका कोई उत्पादक नहीं है। भगवान् ही सबके मूल कारण हैं। यह संसार अर्थात् देश, काल, व्यक्ति, वस्तु, घटना, परिस्थिति आदि सभी परिवर्तनशील हैं। परन्तु जिसके होनेपनसे इन सबका होनापन दीखता है अर्थात् जिसकी सत्तासे ये सभी “है” दीखते हैं, वह परमात्मा ही इन सबमें परिपूर्ण हैं। भगवान्ने इसी अध्यायके दूसरे श्लोकमें कहा कि मैं विज्ञानसहित ज्ञान कहूँगा, जिसको जाननेके बाद कुछ जानना बाकी नहीं रहेगा—“यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्य- मवशिष्यते” और यहाँ कहते हैं कि मेरे सिवाय दूसरा कोई कारण नहीं है—“मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति”। दोनों ही जगह “न अन्यत्” कहनेका तात्पर्य है कि जब मेरे सिवाय कुछ है ही नहीं, तब मेरेको जाननेके बाद जानना कैसे बाकी रहेगा? अतः भगवान्ने यहाँ “मयि सर्वमिदं प्रोतम्” और आगे “वासुदेवः सर्वम्” (7। 19) तथा “सदसच्चाहम्” (9। 19) कहा है। जो कार्य होता है, वह कारणके सिवाय अपनी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं रखता। वास्तवमें कारण ही कार्यरूपसे दीखता है। इस प्रकार जब कारणका ज्ञान हो जायगा, तब कार्य कारणमें लीन हो जायगा अर्थात् कार्यकी अलग सत्ता प्रतीत नहीं होगी और
एक परमात्माके सिवाय अन्य कोई कारण नहीं है
ऐसा अनुभव स्वतः हो जायगा।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव
यह सारा संसार सूतमें सूतकी ही मणियोंकी तरह मेरेमें पिरोया हुआ है अर्थात् मैं ही सारे संसारमें अनुस्यूत (व्याप्त) हूँ। जैसे सूतसे बनी मणियोंमें और सूतमें सूतके सिवाय अन्य कुछ नहीं है; ऐसे ही संसारमें मेरे सिवाय अन्य कोई तत्त्व नहीं है। तात्पर्य है कि जैसे सूतमें सूतकी मणियाँ पिरोयी गयी हों तो दीखनेमें मणियाँ और सूत अलग-अलग दीखते हैं, पर वास्तवमें उनमें सूत एक ही होता है। ऐसे ही संसारमें जितने प्राणी हैं, वे सभी नाम, रूप, आकृति आदिसे अलग-अलग दीखते हैं, पर वास्तवमें उनमें व्याप्त रहनेवाला चेतन-तत्त्व एक ही है। वह चेतन-तत्त्व मैं ही हूँ—“क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत” (गीता 13। 2) अर्थात् मणिरूप अपरा प्रकृति भी मेरा स्वरूप है और धागारूप परा प्रकृति भी मैं ही हूँ। दोनोंमें मैं ही परिपूर्ण हूँ, व्याप्त हूँ। साधक जब संसारको संसारबुद्धिसे देखता है, तब उसको संसारमें परिपूर्णरूपसे व्याप्त परमात्मा नहीं दीखते। जब उसको परमात्मतत्त्वका वास्तविक बोध हो जाता है, तब व्याप्य-व्यापक भाव मिटकर एक परमात्मतत्त्व ही दीखता है। इस तत्त्वको बतानेके लिये ही भगवान्ने यहाँ कारणरूपसे अपनी व्यापकताका वर्णन किया है।
परिशिष्ट भाव
जैसे सूतकी मणियाँ सूतके धागेमें पिरोयी हुई हों तो उनमें सूतके सिवाय और कुछ नहीं है, ऐसे ही संसारमें भगवान्के सिवाय और कुछ नहीं है। तात्पर्य है कि मणिरूप अपरा प्रकृति और धागारूप परा प्रकृति—दोनोंमें भगवान् ही परिपूर्ण हैं। मणियाँ बननेमें अपरा प्रकृतिकी मुख्यता है और धागा बननेमें परा प्रकृतिकी मुख्यता है। “मणिगणाः” पद बहुवचनमें देनेका तात्पर्य है कि अपरा प्रकृति स्थावर-जंगम, जलचर-थलचर-नभचर, चौदह भुवन, चौरासी लाख योनियाँ आदि अनन्त रूपोंमें और अनन्त समुदायोंमें विभक्त है। अपरा और पराका भेद “अपरा” प्रकृतिके कारण ही है; क्योंकि अपराको सत्ता और महत्ता देकर उसके साथ सम्बन्ध जोड़नेके कारण ही जीव है (इसी अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)। अतः अपरा प्रकृति जगत्में भी है और जीवमें भी। परन्तु परमात्मामें न अपरा है, न परा है; न जगत् है, न जीव है। तात्पर्य है कि वास्तवमें न धागा है, न मणियाँ हैं, प्रत्युत एक सूत (रुई) ही है। इसी तरह न अपरा है, न परा है, प्रत्युत एक परमात्मा ही हैं। इसी बातका भगवान्ने आगे बारहवें श्लोकतक वर्णन किया है। इस श्लोकमें आये “मत्तः” पदसे आरम्भ करके बारहवें श्लोकके “मत्त एव” पदोंतक भगवान्ने यही बात बतायी है कि मेरे सिवाय कुछ भी नहीं है। यहाँ “मत्तः” पद समग्र परमात्माका वाचक है, जो परा और अपरा दोनों प्रकृतियोंका मालिक है। कारण ही कार्यमें परिणत होता है; जैसे, रुई ही धागा बनती है, बीज ही वृक्ष बनता है। अतः सबके परम कारण भगवान् होनेसे सब रूपोंमें भगवान् ही हैं—“वासुदेवः सर्वम्।” इसलिये भगवान्के सिवाय दूसरी सत्ताको देखना भूल है। “मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति”—जो दोमें श्रेष्ठ हो, उसको “परतर” कहते हैं। भगवान् अद्वितीय हैं, उनके सिवाय दूसरी कोई वस्तु (“पर”) है ही नहीं, फिर वे “परतर” कैसे हो सकते हैं? उनमें “परतर” शब्द लागू ही नहीं होता। यहाँ भगवान्को अद्वितीय बतानेके लिये ही “परतर” शब्द आया है। तात्पर्य है कि भगवान्से अन्य भी कुछ नहीं है और श्रेष्ठ भी कुछ नहीं है। उपनिषद्में आया है— पुरुषान्न परं किञ्चित्सा काष्ठा सा परा गतिः॥ “पुरुषसे पर कुछ भी नहीं है। वही सबकी परम अवधि और वही परम गति है।” अर्जुनने भी कहा है— न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव। (कठ0 1। 3। 11)
(गीता 11। 43)
8श्रीभगवान्
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोःप्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु॥ 8॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

जो कुछ कार्य दीखता है, उसके मूलमें परमात्मा ही हैं—यह ज्ञान करानेके लिये अब भगवान् आठवेंसे बारहवें श्लोकतकका प्रकरण आरम्भ करते हैं।

पदच्छेद
श्लोकमें ढूँढ़नेके लिये हॉवर करें
व्याख्या
7 sections
[जैसे साधारण दृष्टिसे लोगोंने रुपयोंको ही सर्वश्रेष्ठ मान रखा है तो रुपये पैदा करने और उनका संग्रह करनेमें लोभी आदमीकी स्वाभाविक रुचि हो जाती है। ऐसे ही देखने, सुनने, मानने और समझनेमें जो कुछ जगत् आता है, उसका कारण भगवान् हैं (सातवें अध्यायका छठा श्लोक); भगवान्के सिवाय उसकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं—ऐसा माननेसे भगवान्में स्वाभाविक रुचि हो जाती है। फिर स्वाभाविक ही उनका भजन होता है। यही बात दसवें अध्यायके आठवें श्लोकमें कही है कि
मैं सम्पूर्ण संसारका कारण हूँ, मेरेसे ही संसारकी उत्पत्ति होती है
ऐसा समझकर बुद्धिमान् मनुष्य मेरा भजन करते हैं। ऐसे ही अठारहवें अध्यायके छियालीसवें श्लोकमें कहा है कि “जिस परमात्मासे सम्पूर्ण जगत्की प्रवृत्ति होती है और जिससे सारा संसार व्याप्त है, उस परमात्माका अपने कर्मोंके द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त कर लेता है।” इसी सिद्धान्तको बतानेके लिये यह प्रकरण आया है।]
रसोऽहमप्सु कौन्तेय
हे कुन्तीनन्दन! जलोंमें मैं “रस” हूँ। जल रस-तन्मात्रासे1 पैदा होता है; रस- तन्मात्रामें रहता है और रस-तन्मात्रामें ही लीन होता है। जलमेंसे अगर “रस” निकाल दिया जाय तो जलतत्त्व कुछ नहीं रहेगा। अतः रस ही जलरूपसे है। वह रस मैं हूँ।
प्रभास्मि शशिसूर्ययोः
चन्द्रमा और सूर्यमें प्रकाश करनेकी जो एक विलक्षण शक्ति “प्रभा” है2, वह मेरा स्वरूप है। प्रभा रूप-तन्मात्रासे उत्पन्न होती है, रूप- तन्मात्रामें रहती है और अन्तमें रूप-तन्मात्रामें ही लीन हो जाती है। अगर चन्द्रमा और सूर्यमेंसे प्रभा निकाल दी जाय तो चन्द्रमा और सूर्य निस्तत्त्व हो जायँगे। तात्पर्य है कि केवल प्रभा ही चन्द्र और सूर्यरूपसे प्रकट हो रही है। भगवान् कहते हैं कि वह प्रभा भी मैं ही हूँ।
प्रणवः सर्ववेदेषु
सम्पूर्ण वेदोंमें प्रणव (ओंकार) मेरा स्वरूप है। कारण कि सबसे पहले प्रणव प्रकट हुआ। प्रणवसे त्रिपदा गायत्री और त्रिपदा गायत्रीसे वेदत्रयी प्रकट हुई है। इसलिये वेदोंमें सार “प्रणव” ही रहा। अगर वेदोंमेंसे प्रणव निकाल दिया जाय तो वेद वेदरूपसे नहीं रहेंगे। प्रणव ही वेद और गायत्रीरूपसे प्रकट हो रहा है। वह प्रणव मैं ही हूँ।
शब्दः खे
सब जगह यह जो पोलाहट दीखती है, यह आकाश है। आकाश शब्द-तन्मात्रासे पैदा होता है, शब्द-तन्मात्रामें ही रहता है और अन्तमें शब्द-तन्मात्रामें ही लीन हो जाता है। अतः शब्द-तन्मात्रा ही आकाश-रूपसे प्रकट हो रही है। शब्द-तन्मात्राके बिना आकाश कुछ नहीं है। वह शब्द मैं ही हूँ।
पौरुषं नृषु
मनुष्योंमें सार चीज जो पुरुषार्थ है, वह मेरा स्वरूप है। वास्तवमें नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्वका अनुभव करना ही मनुष्योंमें असली पुरुषार्थ है। परन्तु मनुष्योंने अप्राप्तको प्राप्त करनेमें ही अपना पुरुषार्थ मान रखा है; जैसे—निर्धन आदमी धनकी प्राप्तिमें पुरुषार्थ मानता है, अपढ़ आदमी पढ़ लेनेमें पुरुषार्थ मानता है, अप्रसिद्ध आदमी अपना नाम विख्यात कर लेनेमें अपना पुरुषार्थ मानता है, इत्यादि। निष्कर्ष यह निकला कि जो अभी नहीं है, उसकी प्राप्तिमें ही मनुष्य अपना पुरुषार्थ मानता है। पर यह पुरुषार्थ वास्तवमें पुरुषार्थ नहीं है। कारण कि जो पहले नहीं थे, प्राप्तिके समय भी जिनका निरन्तर सम्बन्ध-विच्छेद हो रहा है और अन्तमें जो “नहीं” में भरती हो जायँगे, ऐसे पदार्थोंको प्राप्त करना पुरुषार्थ नहीं है। परमात्मा पहले भी मौजूद थे, अब भी मौजूद हैं और आगे भी सदा मौजूद रहेंगे; क्योंकि उनका कभी अभाव नहीं होता। इसलिये परमात्माको उत्साहपूर्वक प्राप्त करनेका जो प्रयत्न है, वही वास्तवमें पुरुषार्थ है। उसकी प्राप्ति करनेमें ही मनुष्योंकी मनुष्यता है। उसके बिना मनुष्य कुछ नहीं है अर्थात् निरर्थक है।
परिशिष्ट भाव
छठे-सातवें श्लोकोंमें भगवान्ने अपनेको सम्पूर्ण जगत्का कारण बताया है। इसलिये अब भगवान् आठवें श्लोकसे बारहवें श्लोकतक “कारण”-रूपसे अपनी विभूतियोंका वर्णन करते हैं। यद्यपि कारणकी अपेक्षा कार्यमें विशेष गुण होता है, पर स्वतन्त्र सत्ता कारणकी ही होती है अर्थात् कारणके बिना कार्यकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं होती। जैसे, मिट्टी कारण है और घड़ा कार्य है। घड़ेमें जल भरा जा सकता है, पर यह विशेषता मिट्टीमें नहीं है। परन्तु मिट्टीके बिना घड़ेकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। तात्पर्य है कि कारण ही कार्यरूपमें परिणत होता है। घड़ेकी रचनामें कर्ता, कारण और कार्य—तीनों एक नहीं होते अर्थात् कारण (मिट्टी) और कार्य-(घड़ा-) की तो एक सत्ता होती है, पर कर्ता-(कुम्हार-) की अलग (स्वतन्त्र) सत्ता होती है। परन्तु सृष्टिकी रचनामें कर्ता, कारण और कार्य—तीनों एक भगवान् ही होते हैं। अतः रस भी भगवान् हैं और जल भी भगवान् हैं। प्रभा भी भगवान् हैं और चन्द्र-सूर्य भी भगवान् हैं। ओंकार भी भगवान् हैं और वेद भी भगवान् हैं। शब्द भी भगवान् हैं और आकाश भी भगवान् हैं। पुरुषार्थ भी भगवान् हैं और मनुष्य भी भगवान् हैं। [मिट्टी तो घड़ेके रूपमें परिणत होती है, पर परमात्मा संसारके रूपमें परिणत नहीं होते। कारण कि परिणत होनेवाली वस्तु विकारी होती है, जबकि परमात्मा निर्विकार हैं। अतः जैसे अँधेरेमें रस्सी ही साँपके रूपमें दीखती है अथवा साँप ही कुण्डलीरूपमें दीखता है, ऐसे ही परमात्मा संसाररूपमें दीखते हैं। तात्पर्य है कि परमात्मामें कार्य- कारणका भेद नहीं है; क्योंकि उनके सिवाय अन्य कोई वस्तु है ही नहीं। कार्य-कारणका भेद मनुष्योंकी दृष्टिमें ही है। इसलिये मनुष्योंको समझानेके लिये अन्य वस्तुकी कुछ-न-कुछ सत्ता मानकर ही परमात्माका वर्णन, विवेचन, विचार, चिन्तन, प्रश्नोत्तर आदि किया जाता है—“नोद्यं वा परिहारो वा क्रियतां द्वैतभाषया।”]
1-पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—इन स्थूल पंचमहाभूतोंके कारणोंका नाम भी क्रमशः गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और
शब्द है, जो “पंचतन्मात्राएँ” कहलाती हैं। पंचतन्मात्राएँ इन्द्रियों और अन्तःकरणकी विषय नहीं हैं तथा केवल शास्त्रोंसे सुनकर
मानी जाती हैं। पंचमहाभूतोंके कार्योंका नाम भी गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द है, जो इन्द्रियों और अन्तःकरणके विषय हैं।
2-रूप-तन्मात्रामें दो शक्तियाँ होती हैं—एक “प्रकाशिका” अर्थात् प्रकाश करनेवाली और एक “दाहिका” अर्थात्
जलानेवाली। प्रकाशिका शक्तिको “प्रभा” कहते हैं और दाहिका शक्तिको “तेज” कहते हैं। “प्रकाशिका शक्ति” दाहिका शक्तिके
बिना भी रह सकती है (जैसे—मणि, चन्द्र आदिमें), पर “दाहिका शक्ति” प्रकाशिका शक्तिके बिना नहीं रह सकती। यहाँ
“प्रभास्मि शशिसूर्ययोः” पदोंमें चन्द्रमा और सूर्यकी “प्रकाशिका शक्ति” की प्रधानताको लेकर “प्रभा” शब्दका प्रयोग हुआ
है और आगे इसी अध्यायके नवें श्लोकमें “तेजश्चास्मि विभावसौ” पदोंमें अग्निकी “दाहिका शक्ति” की प्रधानताको लेकर
“तेज” शब्दका प्रयोग हुआ है।
सूर्य और अग्निमें प्रकाशिका और दाहिका—दोनों शक्तियाँ हैं। चन्द्रमामें प्रकाशिका शक्ति तो है, पर उसमें दाहिका
शक्ति तिरस्कृत होकर “सौम्य शक्ति” प्रकट हो गयी है, जो कि शीतलता देनेवाली है।
9श्रीभगवान्
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां तेजश्ास्मि विभावसौजीवनं सर्वभूतेषु तपश्ास्मि तपस्विषु॥ 9॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
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पुण्यो गन्धः पृथिव्याम्
पृथ्वी गन्ध- तन्मात्रासे उत्पन्न होती है, गन्ध-तन्मात्रारूपसे रहती है और गन्ध-तन्मात्रामें ही लीन होती है। तात्पर्य है कि गन्धके बिना पृथ्वी कुछ नहीं है। भगवान् कहते हैं पृथ्वीमें वह पवित्र गन्ध मैं हूँ। यहाँ गन्धके साथ “पुण्यः” विशेषण देनेका तात्पर्य है कि गन्धमात्र पृथ्वीमें रहती है। उसमें पुण्य अर्थात् पवित्र गन्ध तो पृथ्वीमें स्वाभाविक रहती है, पर दुर्गन्ध किसी विकृतिसे प्रकट होती है।
तेजश्चास्मि विभावसौ
तेज रूप-तन्मात्रासे प्रकट होता है, उसीमें रहता है और अन्तमें उसीमें लीन हो जाता है। अग्निमें तेज ही तत्त्व है। तेजके बिना अग्नि निस्तत्त्व है, कुछ नहीं है। वह तेज मैं ही हूँ।
जीवनं सर्वभूतेषु
सम्पूर्ण प्राणियोंमें एक जीवनीशक्ति है, प्राणशक्ति है, जिससे सब जी रहे हैं। उस प्राणशक्तिसे वे प्राणी कहलाते हैं। प्राणशक्तिके बिना उनमें प्राणिपना कुछ नहीं है। प्राणशक्तिके कारण गाढ़ नींदमें सोता हुआ आदमी भी मुर्दे-से विलक्षण दीखता है। वह प्राणशक्ति मैं ही हूँ।
तपश्चास्मि तपस्विषु
द्वन्द्वसहिष्णुताको तप कहते हैं। परन्तु वास्तवमें परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिके लिये कितने ही कष्ट आयें, उनमें निर्विकार रहना ही असली तप है। यही तपस्वियोंमें तप है, इसीसे वे तपस्वी कहलाते हैं और इसी तपको भगवान् अपना स्वरूप बताते हैं। अगर तपस्वियोंमेंसे ऐसा तप निकाल दिया जाय तो वे तपस्वी नहीं रहेंगे।
परिशिष्ट भाव
सृष्टिकी रचनामें भगवान् ही कर्ता हैं, भगवान् ही कारण हैं और भगवान् ही कार्य हैं। अतः गन्ध और पृथ्वी, तेज और अग्नि, जीवनीशक्ति और प्राणी, तपस्या और तपस्वी—ये सब-के-सब (कारण तथा कार्य) एक भगवान् ही हैं। कारण कि परा और अपरा—दोनों ही भगवान्की शक्ति होनेसे भगवान्से अभिन्न हैं। अतः परा-अपराके संयोगसे पैदा होनेवाली सम्पूर्ण सृष्टि भगवत्स्वरूप ही है। “पुण्यो गन्धः”—गन्ध-तन्मात्रा कारण है और पृथ्वी उसका कार्य है। गन्धको पवित्र कहनेका तात्पर्य है कि कारण (तन्मात्रा) सदा पवित्र ही होता है। अपवित्रता कार्यमें विकृति होनेसे ही आती है। अतः जैसे गन्ध-तन्मात्रा पवित्र है, ऐसे ही शब्द, स्पर्श, रूप और रस-तन्मात्रा भी पवित्र समझनी चाहिये।
10श्रीभगवान्
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्॥ 10॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
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बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्
हे पार्थ! सम्पूर्ण प्राणियोंका सनातन (अविनाशी) बीज मैं हूँ अर्थात् सबका कारण मैं ही हूँ। सम्पूर्ण प्राणी बीजरूप मेरेसे उत्पन्न होते हैं, मेरेमें ही रहते हैं और अन्तमें मेरेमें ही लीन होते हैं। मेरे बिना प्राणीकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। जितने बीज होते हैं, वे सब वृक्षसे उत्पन्न होते हैं और वृक्ष पैदा करके नष्ट हो जाते हैं। परन्तु यहाँ जिस बीजका वर्णन है, वह बीज “सनातन” है अर्थात् आदि-अन्तसे रहित (अनादि एवं अनन्त) है। इसीको नवें अध्यायके अठारहवें जडके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, नहीं तो यह भगवान्का स्वरूप ही है।
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि
बुद्धिमानोंमें बुद्धि मैं हूँ। बुद्धिके कारण ही वे बुद्धिमान् कहलाते हैं। अगर उनमें बुद्धि न रहे तो उनकी बुद्धिमान् संज्ञा ही नहीं रहेगी।
तेजस्तेजस्विनामहम्
तेजस्वियोंमें तेज मैं हूँ। यह तेज दैवी-सम्पत्तिका एक गुण है। तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त महापुरुषोंमें एक विशेष तेज—शक्ति रहती है, जिसके प्रभावसे दुर्गुण-दुराचारी मनुष्य भी सद्गुण-सदाचारी बन जाते हैं। यह तेज भगवान्का ही स्वरूप है। श्लोकमें “अव्यय बीज” कहा गया है। यह चेतन-तत्त्व अव्यय अर्थात् अविनाशी है। यह स्वयं विकाररहित रहते हुए ही सम्पूर्ण जगत्का उत्पादक, आश्रय और प्रकाशक है तथा जगत्का कारण है। गीतामें “बीज” शब्द कहीं भगवान् और कहीं जीवात्मा—दोनोंके लिये आया है। यहाँ जो “बीज” शब्द आया है, वह भगवान्का वाचक है; क्योंकि यहाँ कारणरूपसे विभूतियोंका वर्णन है। दसवें अध्यायके उनतालीसवें श्लोकमें विभूतिरूपसे आया “बीज” शब्द भी भगवान्का ही वाचक है; क्योंकि वहाँ उनको सम्पूर्ण प्राणियोंका कारण कहा गया है। नवें अध्यायके अठारहवें श्लोकमें “बीज” शब्द भगवान्के लिये आया है; क्योंकि उसी अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें “सदसच्चाहमर्जुन” पदमें कहा गया है कि कार्य और कारण सब मैं ही हूँ। सब कुछ भगवान् ही होनेसे “बीज” शब्द भगवान्का वाचक है। चौदहवें अध्यायके चौथे श्लोकमें “अहं बीजप्रदः पिता”
मैं बीज प्रदान करनेवाला पिता हूँ
ऐसा होनेसे वहाँ “बीज” शब्द जीवात्माका वाचक है। “बीज” शब्द जीवात्माका वाचक तभी होता है, जब यह
परिशिष्ट भाव
अपनेको सम्पूर्ण प्राणियोंका बीज कहनेका तात्पर्य यह है कि सब प्राणियोंके रूपमें मैं ही हूँ। सृष्टि अनन्त है। अनन्त ब्रह्माण्डोंमें अनन्त जीव हैं। परन्तु उन अनन्त जीवोंका बीज (परमात्मा) एक ही है। अनन्त सृष्टि पैदा होनेपर भी उस बीजमें कोई फर्क नहीं पड़ता; क्योंकि वह अव्यय है—“बीजमव्ययम्” (गीता 9। 18)। उस एक ही बीजसे अनेक प्रकारकी सृष्टि उत्पन्न होती है (गीता—दसवें अध्यायका उनतालीसवाँ श्लोक)। बीजको कितनी ही सूक्ष्म दृष्टिसे देखें, उसमें फल-फूल-पत्ते आदि नहीं दीखेंगे; क्योंकि वे उस बीजमें कारणरूपसे विद्यमान हैं। उस बीजसे पैदा होनेवाले वृक्षके दो पत्ते भी आपसमें नहीं मिलते—यह अनेकता भी उस एक बीजमें ही रहती है। सृष्टिकी एक-एक वस्तुमें अनेक भेद हैं। विभिन्न देशोंमें मनुष्योंकी अनेक जातियाँ हैं। उनमें भी इतना भेद है कि दो मनुष्योंके अँगूठेकी रेखाएँ भी परस्पर नहीं मिलतीं। उनके रूप, स्वभाव, रुचि, प्रकृति, मान्यता, भाव आदि भी परस्पर नहीं मिलते। गाय, भैंस, भेंड़, बकरी, घोड़ा, ऊँट, कुत्ता आदिकी अनेक जातियाँ हैं और उनकी एक-एक जातिमें भी अनेक भेद हैं। वृक्षोंमें भी एक-एक वृक्षकी अनेक जातियाँ होती हैं। एक-एक विद्याको देखें तो उसमें इतने भेद हैं कि उनका अन्त नहीं आता। मूल रंग तीन हैं, पर उनके मिश्रणसे अनेक रंग बन जाते हैं। उनमें भी एक-एक रंगमें इतने भेद हैं कि दो व्यक्तियोंको भी एक रंग समानरूपसे नहीं दीखता। इस प्रकार सृष्टिमें एक समान दीखनेवाली दो चीजें भी वास्तवमें समान नहीं होतीं। इतनी अनेकता होनेपर भी सृष्टिका बीज एक ही है। तात्पर्य है कि एक ही भगवान् अनेक रूपोंमें प्रकट होते हैं और अनेक रूपोंमें प्रकट होनेपर भी एक ही रहते हैं।1 भगवान् देश, काल आदि सभी दृष्टियोंसे अनन्त हैं। जब भगवान्की बनायी हुई सृष्टिका भी अन्त नहीं आ सकता तो फिर भगवान्का अन्त आ ही कैसे सकता है? आजतक भगवान्के विषयमें जो कुछ सोचा गया है, जो कुछ कहा गया है, जो कुछ लिखा गया है, जो कुछ माना गया है, वह पूरा-का-पूरा मिलकर भी अधूरा है। इतना ही नहीं, भगवान् भी अपने विषयमें पूरी बात नहीं कह सकते, अगर कह दें तो अनन्त कैसे रहेंगे?
विशेष बात
विशेष बात भगवान् ही सम्पूर्ण संसारके कारण हैं, संसारके रहते हुए भी वे सबमें परिपूर्ण हैं और सब संसारके मिटनेपर भी वे रहते हैं। इससे सिद्ध हुआ कि सब कुछ भगवान् ही हैं। इसके लिये उपनिषदोंमें सोना, मिट्टी और लोहेका दृष्टान्त दिया गया है कि जैसे सोनेसे बने हुए सब गहने सोना ही हैं, मिट्टीसे बने हुए सब बर्तन मिट्टी ही हैं और लोहेसे बने हुए सब अस्त्र-शस्त्र लोहा ही हैं, ऐसे ही भगवान्से उत्पन्न हुआ सब संसार भगवान् ही है। परन्तु गीतामें भगवान्ने बीजका दृष्टान्त दिया है कि सम्पूर्ण संसारका बीज मैं हूँ। बीज वृक्षसे पैदा होता है और वृक्षको पैदा करके स्वयं नष्ट हो जाता है अर्थात् बीजसे अंकुर निकल आता है, अंकुरसे वृक्ष हो जाता है और बीज स्वयं मिट जाता है। परन्तु भगवान्ने अपनेको संसारमात्रका बीज कहते हुए भी यह एक विलक्षण बात बतायी कि मैं अनादि बीज हूँ, पैदा हुआ बीज नहीं हूँ—“बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्” (7। 10), और मैं अविनाशी बीज हूँ— “बीजमव्ययम्” (9। 18)। अविनाशी बीज कहनेका मतलब यह है कि संसार मेरेसे पैदा हो जाता है, पर मैं मिटता नहीं हूँ, जैसा-का-तैसा ही रहता हूँ। सोना, मिट्टी और लोहेके दृष्टान्तमें गहनोंमें सोना दीखता है, बर्तनोंमें मिट्टी दीखती है और अस्त्र-शस्त्रोंमें लोहा दीखता है, पर संसारमें परमात्मा दीखते नहीं। अगर बीजका दृष्टान्त लें तो वृक्षमें बीज नहीं दीखता। जब वृक्षमें बीज आता है, तब पता लगता है कि इस वृक्षमें ऐसा बीज है, जिससे यह वृक्ष पैदा हुआ है। सम्पूर्ण वृक्ष बीजसे ही निकलता है और बीजमें ही समाप्त हो जाता है। वृक्षका आरम्भ बीजसे होता है और अन्त भी बाजमें ही होता है अर्थात् वह वृक्ष चाहे सौ वर्षोंतक रहे, पर उसकी अन्तिम परिणति बीजमें ही होगी, बीजके सिवाय और क्या होगा? ऐसे ही भगवान् संसारके बीज हैं अर्थात् भगवान्से ही संसार उत्पन्न होता है और भगवान्में ही लीन हो जाता है। अन्तमें एक भगवान् ही बाकी रहते हैं—“शिष्यते शेषसंज्ञः” (श्रीमद्भा0 10। 3। 25)। वृक्ष दीखते हुए भी “यह बीज ही है”—ऐसा जो जानते हैं, वे वृक्षको ठीक-ठीक जानते हैं और जो बीजको न देखकर केवल वृक्षको देखते हैं, वे वृक्षके तत्त्वको नहीं जानते। भगवान् यहाँ “बीजं मां सर्वभूतानाम्” कहकर सबको यह ज्ञान कराते हैं कि तुम्हारेको जितना यह संसार दीखता है, इसके पहले मैं ही था, मैं एक ही प्रजारूपसे बहुत रूपोंमें प्रकट हुआ हूँ—“बहु स्यां प्रजायेय” (छान्दोग्य0 6। 2। 3) और इनके समाप्त होनेपर मैं ही रह जाता हूँ। तात्पर्य है कि पहले मैं ही था और पीछे मैं ही रहता हूँ तो बीचमें भी मैं ही हूँ। यह संसार पांचभौतिक भी उन्हींको दीखता है, जो विचार करते हैं, नहीं तो यह पांचभौतिक भी नहीं दीखता। जैसे कोई कह दे कि ये अपने सब-के-सब शरीर पार्थिव (पृथ्वीसे पैदा होनेवाले) हैं, इसलिये इनमें मिट्टीकी प्रधानता है तो दूसरा कहेगा कि ये मिट्टी कैसे हैं? मिट्टीसे तो हाथ धोते हैं, मिट्टी तो रेता होती है; अतः ये शरीर मिट्टी नहीं हैं। इस तरह शरीर मिट्टी होता हुआ भी उसको मिट्टी नहीं दीखता। परन्तु यह जितना संसार दीखता है, इसको जलाकर राख कर दिया जाय तो अन्तमें एक मिट्टी ही हो जाता है। विचार करें कि इन शरीरोंके मूलमें क्या है? माँ-बापमें जो रज-वीर्यरूप अंश होता है, जिससे शरीर बनता है, वह अंश अन्नसे पैदा होता है। अन्न मिट्टीसे पैदा होता है। अतः ये शरीर मिट्टीसे ही पैदा होते हैं और अन्तमें मिट्टीमें ही लीन हो जाते हैं। अन्तमें शरीरकी तीन गतियाँ होती हैं—चाहे जमीनमें गाड़ दिया जाय, चाहे जला दिया जाय और चाहे पशु-पक्षी खा जायँ। तीनों ही उपायोंसे वह अन्तमें मिट्टी हो जाता है। इस तरह पहले और आखिरमें मिट्टी होनेसे बीचमें भी शरीर या संसार मिट्टी ही है। परन्तु बीचमें यह शरीर या संसार देखनेमें मिट्टी नहीं दीखता। विचार करनेसे ही मिट्टी दीखता है, आँखोंसे नहीं। इसी तरह यह संसार विचार करनेसे परमात्मस्वरूप दीखता है। विचार करें तो जब भगवान्ने यह संसार रचा तो कहींसे कोई सामान नहीं मँगवाया, जिससे संसारको बनाया हो और बनानेवाला भी दूसरा नहीं हुआ है। भगवान् आप ही संसारको बनानेवाले हैं और आप ही संसार बन गये। शरीरोंकी रचना करके आप ही उनमें प्रविष्ट हो गये—“तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्” (तैत्तिरीयोपनिषद् 2। 6)। इन शरीरोंमें जीवरूपसे भी वे ही परमात्मा हैं। अतः यह संसार भी परमात्माका स्वरूप ही है।
* इसी अध्यायके छठे श्लोकमें भगवान्ने “उपधारय” कहा और यहाँ “विद्धि” कहते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि मात्र
संसारमें साररूपसे मैं ही हूँ—इस बातको समझो और समझकर धारण करो। समझकर धारण करनेसे असली प्रेम जाग्रत्
हो जाता है।
11श्रीभगवान्
बलं बलवतां ाहं कामरागविवर्जितम्धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ॥ 11॥
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बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्
कठिन-से-कठिन काम करते हुए भी अपने भीतर एक कामना-आसक्तिरहित शुद्ध, निर्मल उत्साह रहता है। काम पूरा होनेपर भी
मेरा कार्य शास्त्र और धर्मके अनुकूल है तथा लोकमर्यादाके अनुसार सन्तजनानुमोदित है
ऐसे विचारसे मनमें एक उत्साह रहता है। इसका नाम “बल” है। यह बल भगवान्का ही स्वरूप है। अतः यह बल ग्राह्य है। गीतामें भगवान्ने खुद ही बलकी व्याख्या कर दी है। सत्रहवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें “कामरागबलान्विताः” पदमें आया बल कामना और आसक्तिसे युक्त होनेसे दुराग्रह और हठका वाचक है। अतः यह बल भगवान्का स्वरूप नहीं है, प्रत्युत आसुरी सम्पत्ति होनेसे त्याज्य है। ऐसे ही “सिद्धोऽहं बलवान्सुखी” (गीता 16। 14) और “अहङ्कारं बलं दर्पम्” (गीता 16। 18; 18। 53) पदोंमें आया बल भी त्याज्य है। छठे अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें “बलवद्दृढम्” पदमें आया बल शब्द मनका विशेषण है। वह बल भी आसुरी सम्पत्तिका ही है; क्योंकि उसमें कामना और आसक्ति है। परन्तु यहाँ (7। 11में) जो बल आया है, वह कामना और आसक्तिसे रहित है, इसलिये यह सात्त्विक उत्साहका वाचक है और ग्राह्य है। सत्रहवें अध्यायके आठवें श्लोकमें “आयुःसत्त्वबलारोग्य....” पदमें आया बल शब्द भी इसी सात्त्विक बलका वाचक है।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ
हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! मनुष्योंमें2 धर्मसे अविरुद्ध अर्थात् धर्मयुक्त “काम”3 मेरा स्वरूप है। कारण कि शास्त्र और लोक-मर्यादाके अनुसार शुभ-भावसे केवल सन्तान- उत्पत्तिके लिये जो काम होता है, वह काम मनुष्यके अधीन होता है। परंतु आसक्ति, कामना, सुखभोग आदिके लिये जो काम होता है, उस काममें मनुष्य पराधीन हो जाता है और उसके वशमें होकर वह न करनेलायक शास्त्रविरुद्ध काममें प्रवृत्त हो जाता है। शास्त्रविरुद्ध काम पतनका तथा सम्पूर्ण पापों और दुःखोंका हेतु होता है। कृत्रिम उपायोंसे सन्तति-निरोध कराकर केवल भोग- बुद्धिसे काममें प्रवृत्त होना महान् नरकोंका दरवाजा है। जो सन्तानकी उत्पत्ति कर सके, वह “पुरुष” कहलाता है और जो गर्भ धारण कर सके, वह “स्त्री” कहलाती है1। अगर पुरुष और स्त्री आपरेशनके द्वारा अपनी सन्तानोत्पत्ति करनेकी योग्यता-(पुरुषत्व और स्त्रीत्व-) को नष्ट कर देते हैं, वे दोनों ही हिंजड़े कहलानेयोग्य हैं। नपुंसक होनेके कारण देवकार्य (हवन-पूजन आदि) और पितृकार्य (श्राद्ध-तर्पण)-में उनका अधिकार नहीं रहता2। स्त्रीमें मातृशक्ति नष्ट हो जानेके कारण उसके लिये परम आदरणीय एवं प्रिय “माँ” सम्बोधनका प्रयोग भी नहीं किया जा सकता। इसलिये मनुष्यको चाहिये कि वह या तो शास्त्र और लोकमर्यादाके अनुसार केवल सन्तानोत्पत्तिके लिये कामका सेवन करे अथवा ब्रह्मचर्यका पालन करे।
परिशिष्ट भाव
जंगम सृष्टिमात्र कामसे पैदा होती है। अतः मनुष्यमें जो काम धर्मसे विरुद्ध नहीं है, मर्यादाके अनुसार है, वह काम भगवान्का स्वरूप है। भगवान् पहले कह चुके हैं—“मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति” (7। 7) और आगे भी कहेंगे—“ये चैव सात्त्विका भावा0” (7। 12), “वासुदेवः सर्वम्” (7। 19)। अतः जैसे धर्मयुक्त काम भगवान्का स्वरूप है, ऐसे ही धर्मविरुद्ध काम भी भगवान्से अलग नहीं है। जो धर्मविरुद्ध कामका आचरण करते हैं, उनको नरकरूपसे भगवान् मिलते हैं; क्योंकि नरक भी भगवान् ही हैं! परन्तु गीताका उद्देश्य मनुष्यको नरकोंमें अथवा जन्म-मरणमें भेजना नहीं है, प्रत्युत उसका कल्याण करना है। उद्देश्य सदा कल्याणका, आनन्दका ही होता है, दुःखका नहीं। दुःख कोई भी नहीं चाहता। अर्जुनने भी कल्याणकी बात पूछी है3। उदाहरणार्थ, शब्द अच्छे भी होते हैं और बुरे भी, पर व्याकरणमें अच्छे शब्दोंपर ही विचार किया जाता है; क्योंकि व्याकरण आदि भी मनुष्यके उद्धारके लिये हैं।
1-प्राणियोंमें अनेकता होनेपर भी उनमें परस्पर प्रेमकी एकता होनी चाहिये। जैसे काँटा पैरमें गड़ता है, पर आँसू नेत्रोंमें
आते हैं, ऐसा ही भाव सम्पूर्ण प्राणियोंमें रहना चाहिये—“सर्वभूतहिते रताः” (गीता 5। 25, 12। 4)। एकमात्र प्रेम ही ऐसी
चीज है, जिसमें कोई भेद नहीं रहता। प्रेमका भेद नहीं कर सकते। प्रेममें सब एक हो जाते हैं। ज्ञानमें तत्त्वभेद तो नहीं रहता,
पर मतभेद रहता है। प्रेममें मतभेद भी नहीं रहता। अतः प्रेमसे आगे कुछ भी नहीं है। प्रेमसे त्रिलोकीनाथ भगवान् भी वशमें
हो जाते हैं।
2-धर्मका विधान मनुष्योंके लिये ही है; क्योंकि मनुष्येतर प्राणियोंमें धर्मकी मर्यादा लागू ही नहीं होती।
3-तीसरे अध्यायके सैंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने जिस कामको सम्पूर्ण पापोंका हेतु बताया है, उस कामका वाचक यहाँ
“काम” शब्द नहीं है। यहाँ “काम” शब्द गृहस्थधर्मके पालनका वाचक है।
12श्रीभगवान्
ये ैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश् येमत्त एवेति तान्विद्धि त्वहं तेषु ते मयि॥ 12॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
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व्याख्या
3 sections
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये
ये जो सात्त्विक, राजस और तामस भाव (गुण, पदार्थ और क्रिया) हैं, वे भी मेरेसे ही उत्पन्न होते हैं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि सृष्टिमात्रमें जो कुछ हो रहा है, मूलमें सबका आश्रय, आधार और प्रकाशक भगवान् ही हैं अर्थात् सब भगवान्से ही सत्ता-स्फूर्ति पाते हैं। सात्त्विक, राजस और तामस भाव भगवान्से ही होते हैं, इसलिये इनमें जो कुछ विलक्षणता दीखती है, वह सब भगवान्की ही है; अतः मनुष्यकी दृष्टि भगवान्की तरफ ही जानी चाहिये, सात्त्विक आदि भावोंकी तरफ नहीं। यदि उसकी दृष्टि भगवान्की तरफ जायगी तो वह मुक्त हो जायगा और यदि उसकी दृष्टि सात्त्विक आदि भावोंकी तरफ जायगी तो वह बँध जायगा। सात्त्विक, राजस और तामस—इन भावोंके (गुण, पदार्थ और क्रियामात्रके) अतिरिक्त कोई भाव है ही नहीं। ये सभी भगवत्स्वरूप ही हैं। यहाँ शंका होती है कि अगर ये सभी भगवत्स्वरूप ही हैं तो हमलोग जो कुछ करें, वह सब भगवत्स्वरूप ही होगा, फिर ऐसा करना चाहिये और ऐसा नहीं करना चाहिये—यह विधि-निषेध कहाँ रहा? इसका समाधान यह है कि मनुष्यमात्र सुख चाहता है, दुःख नहीं चाहता। अनुकूल परिस्थिति विहित-कर्मोंका फल है और प्रतिकूल परिस्थिति निषिद्ध-कर्मोंका फल है। इसलिये कहा जाता है कि विहितकर्म करो और निषिद्धकर्म मत करो। अगर निषिद्धको भगवत्स्वरूप मानकर करोगे तो भगवान् दुःखों और नरकोंके रूपमें प्रकट होंगे। जो अशुभ कर्मोंकी उपासना करता है, उसके सामने भगवान् अशुभरूपसे ही प्रकट होते हैं; क्योंकि दुःख और नरक भी तो भगवान्के ही स्वरूप हैं। जहाँ करने और न करनेकी बात होती है, वहीं विधि और निषेध लागू होता है। अतः वहाँ विहित ही करना चाहिये, निषिद्ध नहीं करना चाहिये। परंतु जहाँ मानने और जाननेकी बात होती है, वहाँ परमात्माको ही “मानना” चाहिये और अपनेको अथवा संसारको “जानना” चाहिये। जहाँ माननेकी बात है, वहाँ परमात्माको ही मानकर उनके मिलनेकी उत्कण्ठा बढ़ानी चाहिये। उनको प्राप्त और प्रसन्न करनेके लिये उनकी आज्ञाका पालन करना चाहिये तथा उनकी आज्ञा और सिद्धान्तोंके विरुद्ध कार्य नहीं करना चाहिये। भगवान्की आज्ञाके विरुद्ध कार्य करेंगे तो उनको प्रसन्नता कैसे होगी? और विरुद्ध कार्य करनेवालेको उनकी प्राप्ति कैसे होगी? जैसे, किसी मनुष्यके मनके विरुद्ध काम करनेसे वह राजी कैसे होगा और प्रेमसे कैसे मिलेगा? जहाँ जाननेकी बात है, वहाँ संसारको जानना चाहिये। जो उत्पत्ति-विनाशशील है, सदा साथ रहनेवाला नहीं है, वह अपना नहीं है और अपने लिये भी नहीं है—ऐसा जानकर उससे सम्बन्ध-विच्छेद करना चाहिये। उसमें कामना, ममता, आसक्ति नहीं करनी चाहिये। उसका महत्त्व हृदयसे उठा देना चाहिये। इससे सत्-तत्त्व प्रत्यक्ष हो जायगा और जानना पूर्ण हो जायगा। असत् (नाशवान्) वस्तु हमारे साथ रहनेवाली नहीं है—ऐसा समझनेपर भी अगर समय-समयपर उसको महत्त्व देते रहेंगे तो वास्तविकता (सत्-वस्तु)-की प्राप्ति नहीं होगी।
मत्त एवेति तान्विद्धि
उन सबको तू मेरेसे ही उत्पन्न होनेवाला समझ अर्थात् सब कुछ मैं ही हूँ। कार्य और कारण—ये दोनों भिन्न दीखते हुए भी कार्य कारणसे अपनी भिन्न एवं स्वतन्त्र सत्ता नहीं रखता। अतः कार्य कारणरूप ही होता है। जैसे, सोनेसे गहने पैदा होते हैं तो वे सोनेसे अलग नहीं होते अर्थात् सोना ही होते हैं। ऐसे ही परमात्मासे पैदा होनेवाली अनन्त सृष्टि परमात्मासे भिन्न स्वतन्त्र सत्ता नहीं रख सकती। “मत्त एव” कहनेका तात्पर्य है कि अपरा और परा प्रकृति मेरा स्वभाव है; अतः कोई उनको मेरेसे भिन्न सिद्ध नहीं कर सकता। सातवें अध्यायके परिशिष्टरूप नवें अध्यायमें भगवान्ने कहा है कि “कल्पके आदिमें प्रकृतिको वशमें करके मैं बार-बार सृष्टिकी रचना करता हूँ” (नवें अध्यायका आठवाँ श्लोक) और आगे कहते हैं कि मेरी अध्यक्षतामें प्रकृति चराचर संसारको रचती है” (नवें अध्यायका दसवाँ श्लोक)—ये दोनों बातें एक ही र्हुइं। चाहे प्रकृतिको लेकर भगवान् रचना करें, चाहे भगवान्की अध्यक्षतामें प्रकृति रचना करे—इन दोनोंका तात्पर्य एक ही है। भगवान् रचना करते हैं तो प्रकृतिको लेकर ही करते हैं, तो मुख्यता भगवान्की ही हुई और प्रकृति भगवान्की अध्यक्षतामें रचना करती है, तो भी मुख्यता भगवान्की ही हुई। इसी बातको यहाँ कहा है कि “मैं सम्पूर्ण जगत्का प्रभव और प्रलय हूँ (सातवें अध्यायका छठा श्लोक), और इसका उपसंहार करते हुए कहते हैं कि “सात्त्विक, राजस और तामस—ये भाव मेरेसे ही होते हैं।” भगवान्ने विज्ञानसहित ज्ञान कहनेकी प्रतिज्ञा करके जाननेवालेकी दुर्लभता बताते हुए जो प्रकरण आरम्भ किया, उसमें अपरा और परा प्रकृतिका कथन किया। अपरा और परा प्रकृतियोंको सम्पूर्ण प्राणियोंका कारण बताया; क्योंकि इनके संयोगसे ही सम्पूर्ण प्राणी पैदा होते हैं। फिर अपनेको इन अपरा और पराका कारण बताया— “मत्तः परतरं नान्यत्” (7। 7)। यही बात विभूतियोंके वर्णनका उपसंहार करते हुए यहाँ कही है कि सात्त्विक, राजस और तामस भावोंको मेरेसे ही होनेवाला जान।
न त्वहं तेषु ते मयि
मैं उनमें नहीं हूँ और वे मेरेमें नहीं हैं। तात्पर्य है कि उन गुणोंकी मेरे सिवाय कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है अर्थात् मैं-ही-मैं हूँ; मेरे सिवाय और कुछ है ही नहीं। वे सात्त्विक, राजस और तामस जितने भी प्राकृत पदार्थ और क्रियाएँ हैं, वे सब-के-सब उत्पन्न और नष्ट होते हैं। परन्तु मैं उत्पन्न भी नहीं होता और नष्ट भी नहीं होता। अगर मैं उनमें होता तो उनका नाश होनेपर मेरा भी नाश हो जाता; परन्तु मेरा कभी नाश नहीं होता, इसलिये मैं उनमें नहीं हूँ। अगर वे मेरेमें होते तो मैं जैसा अविनाशी हूँ, वैसे वे भी अविनाशी होते; परंतु वे तो नष्ट होते हैं और मैं रहता हूँ, इसलिये वे मेरेमें नहीं हैं। जैसे बीज ही वृक्ष, शाखाएँ, पत्ते, फूल आदिके रूपमें होता है; परंतु वृक्ष, शाखाएँ, पत्ते आदिमें बीजको खोजेंगे तो उनमें बीज नहीं मिलेगा। कारण कि बीज उनमें तत्त्व- रूपसे विद्यमान रहता है। ऐसे ही सात्त्विक, राजस और तामस भाव मेरेसे ही होते हैं; परन्तु उन भावोंमें मेरेको खोजोगे तो उनमें मैं नहीं मिलूँगा (गीता—सातवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। कारण कि मैं उनमें मूलरूपसे और तत्त्वरूपसे विद्यमान हूँ। अतः मैं उनमें और वे मेरेमें नहीं हैं अर्थात् सब कुछ मैं-ही-मैं हूँ। जैसे, बादल आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं, आकाशमें ही रहते हैं और आकाशमें ही लीन होते हैं; परंतु आकाश ज्यों-का-त्यों निर्विकार रहता है। न आकाशमें बादल रहते हैं और न बादलोंमें आकाश रहता है। ऐसे ही आठवें श्लोकसे लेकर यहाँतक जितनी (सत्रह) विभूतियाँ बतायी गयी हैं, वे सब मेरेसे ही उत्पन्न होती हैं, मेरेमें ही रहती हैं और मेरेमें ही लीन हो जाती हैं। परंतु वे मेरेमें नहीं हैं और मैं उनमें नहीं हूँ। मेरे सिवाय उनकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। इस दृष्टिसे सब कुछ मैं ही हूँ। तात्पर्य यह हुआ कि भगवान्के सिवाय जितने सात्त्विक, राजस और तामस भाव अर्थात् प्राकृत पदार्थ और क्रियाएँ दिखायी देती हैं, उनकी सत्ता मानकर और उनको महत्ता देकर ये मनुष्य उनमें फँस रहे हैं। अतः भगवान् उन मनुष्योंका लक्ष्य इधर कराते हैं कि इन सब पदार्थों और क्रियाओंमें सत्ता और महत्ता मेरी ही है। कहा है। तात्पर्य यह कि प्रकृति भगवान्से अभिन्न होनेसे ये सभी भाव भगवान्से उत्पन्न होते हैं और भगवान्में ही लीन हो जाते हैं, पर परा प्रकृति (जीवात्मा-) ने इनके साथ सम्बन्ध जोड़ लिया अर्थात् इनको अपना और अपने लिये मान लिया—यही परा प्रकृतिद्वारा जगत्को धारण करना है। इसीसे वह जन्मता-मरता रहता है। अब उस बन्धनका निवारण करनेके लिये यहाँ कहते हैं कि सात्त्विक, राजस और तामस—ये सब भाव मेरेसे ही होते हैं। इसी रीतिसे दसवें अध्यायमें कहा है—“भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः” (10। 5) अर्थात् प्राणियोंके ये अलग-अलग प्रकारवाले (बीस) भाव मेरेसे ही उत्पन्न होते हैं; और “अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते” (10। 8) अर्थात् सबका प्रभव मैं हूँ और सब मेरेसे प्रवृत्त होते हैं। पंद्रहवें अध्यायमें भी कहा है कि स्मृति, ज्ञान आदि सब मेरेसे ही उत्पन्न होते हैं—“मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च” (15। 15)। जब सब कुछ परमात्मासे ही उत्पन्न होता है, तब मनुष्यके साथ उन गुणोंका कोई सम्बन्ध नहीं है। अपने साथ गुणोंका सम्बन्ध न माननेसे यह मनुष्य बँधता नहीं अर्थात् वे गुण उसके लिये जन्म-मरणके कारण नहीं बनते। गीतामें जहाँ भक्तिका वर्णन है, वहाँ भगवान् कहते हैं कि सब कुछ मैं ही हूँ—“सदसच्चाहमर्जुन” (9। 19) और अर्जुन भी भगवान्के लिये कहते हैं कि आप सत् और असत् भी हैं तथा उनसे पर भी हैं—“सदसत्तत्परं यत्” (11। 37)। ज्ञानी (प्रेमी) भक्तके लिये भी भगवान् कहते हैं कि उसकी दृष्टिमें सब कुछ वासुदेव ही है— “वासुदेवः सर्वम्” (7। 19)। कारण यह है कि भक्तिमें श्रद्धा और मान्यताकी मुख्यता होती है तथा भगवान्में दृढ़ अनन्यता होती है। भक्तिमें अन्यका अभाव होता है। जैसे उत्तम पतिव्रताको एक पतिके सिवाय संसारमें दूसरा कोई पुरुष दीखता ही नहीं, ऐसे ही भक्तको एक भगवान्के सिवाय और कोई दीखता ही नहीं, केवल भगवान् ही दीखते हैं।
परिशिष्ट भाव
“मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति” (7। 7) का विस्तार करते हुए भगवान्ने पिछले चार श्लोकोंमें जो बात कही है और जो बात नहीं कही है, वह सब-की-सब बात उपसंहाररूपसे भगवान्ने इस श्लोकमें कह दी है। भगवान् कहते हैं कि सम्पूर्ण सात्त्विक, राजस और तामस भाव मेरेसे ही उत्पन्न होते हैं, मेरेसे ही सत्ता- स्फूर्ति पाते हैं, तथापि मैं इनमें नहीं हूँ और ये मेरेमें नहीं हैं अर्थात् सब कुछ मैं-ही-मैं हूँ। अतः मेरी प्राप्ति चाहनेवाले साधककी दृष्टि इन भावोंकी तरफ न जाकर मेरी तरफ ही जानी चाहिये। अगर वह उन भावोंमें ही उलझ जायगा तो कभी मुक्त अथवा भक्त नहीं हो सकेगा। देखने, सुनने, समझने आदिमें जो भी भाव आते हैं और जो नहीं आते, वे सब-के-सब “ये” पदके अन्तर्गत समझने चाहिये। भगवान्से उत्पन्न होनेके कारण यहाँ सात्त्विक, राजस और तामस गुणोंको “भाव” नामसे कहा गया है। तात्पर्य है कि भगवान् भाव (सत्ता)-रूप हैं1; अतः उनसे भाव ही उत्पन्न होगा, अभाव कैसे उत्पन्न होगा? भगवान्से उत्पन्न होनेके कारण सब भाव भगवान्के ही स्वरूप हैं—“भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः” (गीता 10। 5)। तात्पर्य है कि शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिसे जो भी सात्त्विक, राजस और तामस भाव, क्रिया, पदार्थ आदि ग्रहण किये जाते हैं, वे सब भगवान् ही हैं2। मनकी स्फुरणामात्र चाहे अच्छी हो या बुरी, भगवान् ही हैं। संसारमें अच्छा-बुरा, शुद्ध-अशुद्ध, शत्रु-मित्र, दुष्ट-सज्जन, पापात्मा-पुण्यात्मा आदि जो कुछ भी देखने, सुनने, कहने, सोचने, समझने आदिमें आता है, वह सब केवल भगवान् ही हैं। भगवान्के सिवाय कहीं कुछ भी नहीं है। अपना कुछ स्वार्थ रखें, लेनेकी इच्छा रखें, तभी सात्त्विक, राजस और तामस—ये तीन भेद होते हैं। यदि अपना कुछ स्वार्थ न रखें और दूसरेके हितकी दृष्टि रखें तो ये भगवान्के ही स्वरूप हैं। इनको अपने लिये मानना, इनसे सुख लेना ही पतनका कारण है (गीता—तीसरे अध्यायका सैंतीसवाँ श्लोक)। “तीनों गुण मेरेसे ही प्रकट होते हैं”—ऐसा कहकर भगवान्ने यह भाव प्रकट किया है कि साधककी दृष्टि इन गुणोंकी तरफ न जाकर मुझ गुणातीतकी तरफ ही जानी चाहिये, अर्थात् मेरी सत्ता और महत्ता मानकर मेरे ही साथ सम्बन्ध जोड़ना चाहिये, जिससे मेरी प्राप्ति हो जाय और सदाके लिये दुःख मिटकर महान् आनन्दका अनुभव हो जाय। “मैं उनमें नहीं हूँ और वे मेरेमें नहीं हैं”—ऐसा कहकर भगवान्ने यह भाव प्रकट किया है कि अगर कोई मनुष्य मेरेको सत्ता और महत्ता न देकर सात्त्विक, राजस और तामस गुण, पदार्थ तथा क्रियाको सत्ता और महत्ता देकर उनके साथ सम्बन्ध जोड़ेगा तो वह मेरेको प्राप्त न होकर जन्म-मरणमें चला जायगा—“कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु” (गीता 13। 21)। “मत्त एव” पदोंका प्रयोग करके भगवान् मानो यह कहते हैं कि तीनों गुण मेरेसे ही होते हैं, फिर तुम मेरी तरफ न आकर गुणोंमें क्यों फँसते हो? जो गुणोंमें फँस जाते हैं, वे मेरा भजन नहीं कर सकते (गीता—इसी अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। परन्तु जो गुणोंमें नहीं फँसते, वे भक्त मेरा भजन करते हैं (गीता—सातवें अध्यायका सोलहवाँ और दसवें अध्यायका आठवाँ श्लोक)। ये गुण टिकनेवाले नहीं हैं; क्योंकि कारण टिकता है, कार्य नहीं टिकता। जैसे सोना टिकता है, गहने नहीं टिकते; मिट्टी टिकती है, घड़ा नहीं टिकता, ऐसे ही भगवान् टिकते हैं, गुण नहीं टिकते। गुण तो परिवर्तनशील और मिटनेवाले हैं, पर भगवान् नित्य-निरन्तर ज्यों-के-त्यों रहनेवाले हैं। उनका न परिवर्तन होता है, न नाश। इसलिये भगवान्की प्राप्ति गुणोंसे नहीं होती, प्रत्युत गुणोंके सम्बन्ध-विच्छेदसे होती है। अतः तमोगुणको रजोगुणसे और रजोगुणको सत्त्वगुणसे जीतकर गुणोंसे अतीत होना है। यहाँ एक विशेष बात समझनेयोग्य है कि सगुण-साकार भगवान् भी वास्तवमें निर्गुण ही हैं; क्योंकि वे सत्त्व, रज और तमोगुणसे युक्त नहीं हैं, प्रत्युत ऐश्वर्य, माधुर्य, सौन्दर्य, औदार्य आदि गुणोंसे युक्त हैं। इसलिये सगुण-साकार भगवान्की भक्तिको भी निर्गुण (सत्त्वादि गुणोंसे रहित) बताया गया है; जैसे—“मन्निष्ठं निर्गुणं स्मृतम्”, “मन्निकेतं तु निर्गुणम्”, “निर्गुणो मदपाश्रयः”, “मत्सेवायां तु निर्गुणा” (श्रीमद्भा0 11। 25। 24—27)। प्रश्न—जब सब कुछ भगवान् ही हैं, तो फिर सात्त्विक-राजस-तामस भाव त्याज्य क्यों हैं? उत्तर—जैसे जमीनमें जल सब जगह रहता है, पर उसका प्राप्ति-स्थान कुआँ है, ऐसे ही भगवान् सब जगह हैं, पर उनका प्राप्ति-स्थान यज्ञ (कर्तव्य-कर्म) है—“तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्” (गीता 3। 15)। परन्तु सात्त्विक-राजस-तामस भाव भगवान्के प्राप्ति-स्थान नहीं हैं अर्थात् इनके द्वारा भगवान्की प्राप्ति नहीं होती (गीता—इसी अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। अतः ये साधकके लिये कामके नहीं हैं। इसलिये भगवान्ने कहा है कि ये भाव मेरेसे होनेपर भी मैं इनमें और ये मेरेमें नहीं हैं। जैसे, बाजरीकी खेतीमें बाजरी ही मुख्य होती है, पत्ती-डंठल नहीं। किसानका लक्ष्य केवल बाजरीको प्राप्त करनेका ही होता है। बाजरीको प्राप्त करनेके लिये वह खेतीको जल, खाद आदिसे पुष्ट करता है, जिससे बढि़या बाजरी प्राप्त हो सके। ऐसे ही साधकका लक्ष्य भी केवल भगवान्का होना चाहिये, संसारका नहीं। भगवान्को प्राप्त करनेके लिये साधकको संसारकी सेवा करनी चाहिये। सेवाके सिवाय संसारसे अपना कोई मतलब नहीं रखना चाहिये। महत्त्व बाजरी (दाने-) का है, पत्ती-डंठलका नहीं; क्योंकि आरम्भमें भी बाजरी रहती है और अन्तमें भी बाजरी ही रहती है। बाजरी प्राप्त करनेके बाद जो शेष बचता है, वह (पत्ती-डंठल) बाजरीसे अलग न होनेपर भी अपने लिये किसी कामकी चीज नहीं है, प्रत्युत पशुओंके खानेकी चीज है। ऐसे ही सात्त्विक-राजस-तामस भाव मूढ़ (अविवेकी) मनुष्योंके लिये हैं। ये तीनों ही भाव मनुष्यको बाँधनेवाले हैं (गीता—चौदहवें अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)। इसलिये ये भाव भगवान्के रूप होते हुए भी स्वयंके लिये नहीं हैं, प्रत्युत विवेकपूर्वक सांसारिक व्यवहारके लिये हैं। जैसे, जहर भी भगवान्का रूप है, पर वह खानेके लिये नहीं है! जैसे बाजरी (बीज)-से पत्ती-डंठल पैदा होनेपर भी पत्ती-डंठलमें बाजरी नहीं है और बाजरीमें पत्ती-डंठल नहीं है, ऐसे ही भगवान्से पैदा होनेपर भी सात्त्विक-राजस-तामस भावोंमें भगवान् नहीं हैं और भगवान्में सात्त्विक- राजस-तामस भाव नहीं हैं।
विशेष बात
विशेष बात सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणसे उत्पन्न होनेवाले तरह-तरहके जितने भाव (प्राकृत पदार्थ और क्रियाएँ) हैं, वे सब-के-सब भगवान्की शक्ति प्रकृतिसे ही उत्पन्न होते हैं। परंतु प्रकृति भगवान्से अभिन्न होनेके कारण इन गुणोंको भगवान्ने “मत्त एव” “मेरेसे ही होते हैं”—ऐसा गीतामें जहाँ ज्ञानका वर्णन है, वहाँ भगवान् बताते हैं कि सत् और असत्—दोनों अलग-अलग हैं—“नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः” (2। 16)। ऐसे ही ज्ञानमार्गमें शरीर-शरीरी, देह-देही, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ, प्रकृति- पुरुष—दोनोंको अलग-अलग जाननेकी बात बहुत बार आयी है; जैसे—“प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि” (13। 19); “क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानम्” (13। 2); “क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्” (13। 26); “क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नम्” (13। 33); “क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा” (13। 34)। कारण यह है कि ज्ञानमार्गमें विवेककी प्रधानता होती है। अतः वहाँ नित्य-अनित्य, अविनाशी-विनाशी आदिका विचार होता है और फिर अपना स्वरूप बिलकुल निर्लिप्त है—ऐसा बोध होता है। साधकमें श्रद्धा और विवेक—दोनों ही रहने चाहिये। भक्तिमार्गमें श्रद्धाकी मुख्यता होती है और ज्ञानमार्गमें विवेककी मुख्यता होती है। ऐसा होनेपर भी भक्तिमार्गमें विवेकका और ज्ञानमार्गमें श्रद्धाका अभाव नहीं है। भक्ति- मार्गमें मानते हैं कि सात्त्विक, राजस और तामस भाव भगवान्से ही होते हैं (सातवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक) और ज्ञानमार्गमें मानते हैं कि सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण प्रकृतिसे ही होते हैं—“सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः” (14। 5)। दोनों ही साधक अपनेमें निर्विकारता मानते हैं कि ये गुण अपने नहीं हैं; और दोनों ही जहाँ एक तत्त्वको प्राप्त होते हैं, वहाँ न द्वैत कह सकते हैं, न अद्वैत; न सत् कह सकते हैं, न असत्। भक्तिमार्गवाले भगवान्के साथ अनन्य प्रेमसे अभिन्न होकर प्रकृतिसे सर्वथा रहित हो जाते हैं और ज्ञानमार्गवाले प्रकृति एवं पुरुषका विवेक करके प्रकृतिसे बिलकुल असम्बद्ध अपने स्वरूपका साक्षात् अनुभव करके प्रकृतिसे सर्वथा सम्बन्धरहित हो जाते हैं।
1-“स्त्यै शब्दसंघातयोः।” स्त्यायतः—संगते भवतः अस्यां शुक्रशोणिते इति स्त्री। (सिद्धान्तकौमुदी, बालमनोरमा)।
2-अंगहीनाश्रोत्रियषण्ढशूद्रवर्जम्। (कात्यायनश्रौतसूत्र 1। 1। 5)
3-“यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे” (गीता 2। 7)
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्॥ (गीता 3। 2)
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्॥ (गीता 5। 1)
1-“नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।” (गीता 2। 16); “मद्भावं सोऽधिगच्छति” (गीता 14। 19); “सर्वभूतेषु
येनैकं भावमव्ययमीक्षते।” (गीता 18। 20)
2-मनसा वचसा दृष्ट्या गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियैः। अहमेव न मत्तोऽन्यदिति बुध्यध्वमंजसा॥
(श्रीमद्भा0 11। 13। 24)
“मनसे, वाणीसे, दृष्टिसे तथा अन्य इन्द्रियोंसे जो कुछ (शब्दादि विषय) ग्रहण किया जाता है, वह सब मैं ही हूँ। अतः
मेरे सिवाय और कुछ भी नहीं है—यह सिद्धान्त आप विचारपूर्वक शीघ्र समझ लें अर्थात् स्वीकार करके अनुभव कर लें।”
13श्रीभगवान्
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्। मोहितं ाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्॥ 13॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

भगवान्ने पहले बारहवें श्लोकमें कहा कि ये सात्त्विक, राजस और तामस भाव मेरेसे ही होते हैं,पर मैं उनमें और वे मेरेमें नहीं हैं। इस विवेचनसे यह सिद्ध हुआ कि भगवान् प्रकृति और प्रकृतिके कार्यसे सर्वथा निर्लिप्त हैं। ऐसे ही भगवान्का शुद्ध अंश यह जीव भी निर्लिप्त है। इसपर यह प्रश्न होता है कि यह जीव निर्लिप्त होता हुआ भी बँधता कैसे है? इसका विवेचन आगेके श्लोकमें करते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
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त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः...परमव्ययम्
सत्त्व, रज और तम—तीनों गुणोंकी वृत्तियाँ उत्पन्न और लीन होती रहती हैं। उनके साथ तादात्म्य करके मनुष्य अपनेको सात्त्विक, राजस और तामस मान लेता है अर्थात् उनका अपनेमें आरोप कर लेता है कि “मैं सात्त्विक, राजस और तामस हो गया हूँ।” इस प्रकार तीनों गुणोंसे मोहित मनुष्य ऐसा मान ही नहीं सकता कि मैं परमात्माका अंश हूँ। वह अपने अंशी परमात्माकी तरफ न देखकर उत्पन्न और नष्ट होनेवाली वृत्तियोंके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है—यही उसका मोहित होना है। इस प्रकार मोहित होनेके कारण वह
मेरा परमात्माके साथ नित्य-सम्बन्ध है
इसको समझ ही नहीं सकता। यहाँ “जगत्” शब्द जीवात्माका वाचक है। निरन्तर परिवर्तनशील शरीरके साथ तादात्म्य होनेके कारण ही यह जीव “जगत्” नामसे कहा जाता है। तात्पर्य है कि शरीरके जन्मनेमें अपना जन्मना, शरीरके मरनेमें अपना मरना, शरीरके बीमार होनेमें अपना बीमार होना और शरीरके स्वस्थ होनेमें अपना स्वस्थ होना मान लेता है, इसीसे यह “जगत्” नामसे कहा जाता है। जबतक यह शरीरके साथ अपना तादात्म्य मानेगा, तबतक यह जगत् ही रहेगा अर्थात् जन्मता-मरता ही रहेगा, कहीं भी स्थायी नहीं रहेगा। गुणोंकी भगवान्के सिवाय अलग सत्ता माननेसे ही प्राणी मोहित होते हैं। अगर वे गुणोंको भगवत्स्वरूप मानें तो कभी मोहित हो ही नहीं सकते। तीनों गुणोंका कार्य जो शरीर है, उस शरीरको चाहे अपना मान लें, चाहे अपनेको शरीर मान लें—दोनों ही मान्यताओंसे मोह पैदा होता है। शरीरको अपना मानना “ममता” हुई और अपनेको शरीर मानना “अहंता” हुई। शरीरके साथ अहंता-ममता करना ही मोहित होना है। मोहित हो जानेसे गुणोंसे सर्वथा अतीत जो भगवत्तत्त्व है, उसको नहीं जान सकता। यह उस भगवत्तत्त्वको तभी जान सकता है, जब त्रिगुणात्मक शरीरके साथ इसकी अहंता- ममता मिट जाती है। यह सिद्धान्त है कि मनुष्य संसारसे सर्वथा अलग होनेपर ही संसारको जान सकता है और परमात्मासे सर्वथा अभिन्न होनेपर ही परमात्माको जान सकता है। कारण इसका यह है कि त्रिगुणात्मक शरीरसे यह स्वयं सर्वथा भिन्न है और परमात्माके साथ यह स्वयं सर्वथा अभिन्न है। अस्वाभाविकमें स्वाभाविक भाव होना ही मोहित होना है। जो प्रतिक्षण नष्ट होनेवाले तीनों गुणोंसे परे हैं, अत्यन्त निर्लिप्त हैं और नित्य-निरन्तर एकरूप रहनेवाले हैं, ऐसे परमात्मा “स्वाभाविक” हैं। परमात्माकी यह स्वाभाविकता बनायी हुई नहीं है, कृत्रिम नहीं है, अभ्याससाध्य नहीं है, प्रत्युत स्वतः-स्वाभाविक है। परंतु शरीर तथा संसारमें अहंता-ममता अर्थात् “मैं” और
मेरा
भाव उत्पन्न हुआ है एवं नष्ट होनेवाला है, यह केवल माना हुआ है, इसलिये यह “अस्वाभाविक” है। इस अस्वाभाविकको स्वाभाविक मान लेना ही मोहित होना है, जिसके कारण मनुष्य स्वाभाविकताको समझ नहीं सकता। जीव पहले परमात्मासे विमुख हुआ या पहले संसारके सम्मुख (गुणोंसे मोहित) हुआ?—इसमें दार्शनिकोंका मत यह है कि परमात्मासे विमुख होना और संसारसे सम्बन्ध जोड़ना—ये दोनों अनादि हैं, इनका आदि नहीं है। अतः इनमें पहले या पीछेकी बात नहीं कही जा सकती। परन्तु मनुष्य यदि मिली हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग न करे, उसे केवल भगवान्में ही लगाना शुरू कर दे तो यह संसारसे ऊपर उठ जाता है अर्थात् इसका जन्म-मरण मिट जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि यह मनुष्य प्रभुकी दी हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके ही बन्धनमें पड़ा है। अपनी स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके नष्ट होनेवाले पदार्थोंमें उलझ जानेसे यह परमात्मतत्त्वको जान नहीं सकता। “परमव्ययम्” पदसे भगवान् कहते हैं कि मैं इन गुणोंसे पर हूँ अर्थात् इन गुणोंसे सर्वथा रहित, असम्बद्ध, निर्लिप्त हूँ। मैं न कभी किसी गुणसे बँधा हुआ हूँ और न गुणोंके परिवर्तनसे मेरेमें कोई परिवर्तन ही होता है। ऐसे मेरे वास्तविक स्वरूपको गुणोंसे मोहित प्राणी नहीं जान सकते।
परिशिष्ट भाव
जो मनुष्य भगवान्को न देखकर सात्त्विक, राजस और तामस भावोंको ही देखता है, उनका भोग करता है, उनसे सुख लेता है, वह उन भावोंसे मोहित हो जाता है अर्थात् भगवान्की दुरत्यय गुणमयी मायासे बँध जाता है और फलस्वरूप बार-बार जन्मता-मरता है। तात्पर्य है कि सात्त्विक, राजस और तामस भाव (कर्म, पदार्थ, काल, स्वभाव, गुण आदि) अनित्य हैं और भगवान् नित्य हैं। जो अनित्यका भोग करते हैं, वे बँध जाते हैं; परन्तु जो अनित्यका त्याग करके नित्यस्वरूप भगवान्का आश्रय लेते हैं, वे मुक्त हो जाते हैं (गीता—इसी अध्यायका चौदहवाँ श्लोक)। इस श्लोकमें जीवात्माके लिये “जगत्” शब्द आया है। इसका तात्पर्य है कि जिसकी सत्ता विद्यमान है ही नहीं, उसको सत्ता और महत्ता देकर उससे सम्बन्ध जोड़नेसे जीव भी जगत् हो जाता है! चेतन भी (चेतनताका दुरुपयोग करके) जड़ हो जाता है! उत्कृष्ट परा प्रकृति भी निकृष्ट अपरा प्रकृति बन जाती है! जीव जगत्के उत्पत्ति-विनाशको अपना उत्पत्ति-विनाश, जगत्के लाभ-हानिको अपना लाभ-हानि मान लेता है। जैसे मनुष्य कामनाके साथ अभिन्न होकर “कामात्मानः” अर्थात् कामना-रूप हो जाता है (गीता 2। 43) और भगवान्के साथ अभिन्न होकर “मन्मयाः” अर्थात् भगवद्रूप हो जाता है (गीता 4। 10), ऐसे ही जीव जगत्के साथ अभिन्न होकर जगत्-रूप हो जाता है। फर्क यही है कि भगवद्रूपसे वह नित्य है, पर कामनारूप या जगत्-रूपसे वह अनित्य है। जीवने भगवान्के सिवाय दूसरी सत्ताको माना, सत्ता मानकर उसको महत्त्व दिया, महत्त्व देकर उससे सम्बन्ध जोड़ा और सम्बन्ध जोड़कर अपनी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव कर लिया, इसलिये वह “जगत्” बन गया! जो केवल जगत्की सत्ताको मानता है, वह अपनी सत्तासे विमुख होकर जगत् हो जाता है, जो अवास्तविक है और जो केवल भगवान्की सत्ताको मानता है, वह अपनी स्वतन्त्र सत्ताकी मान्यताको मिटाकर भगवान् हो जाता है—“मम साधर्म्यमागताः” (गीता 14। 2), जो वास्तविक है। जीवको “जगत्” कहनेका तात्पर्य है कि उसका चेतनताकी तरफ खयाल ही नहीं रहा, प्रत्युत जड़ शरीरको ही “मैं” (अपना स्वरूप) और “मेरा” मानने लग गया। जीव स्वरूपसे निर्गुण तथा अव्यय होनेपर भी “जगत्” हो जानेके कारण सात्त्विक-राजस-तामस गुणोंसे बँध जाता है—“निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्” (गीता 14। 5)। वास्तवमें अलौकिक परमात्माका अंश होनेसे जीव भी अलौकिक ही है (गीता—तेरहवें अध्यायका इकतीसवाँ श्लोक), पर लौकिक जगत्को पकड़नेसे वह भी लौकिक हो जाता है! अहम्से लेकर पृथ्वीतक सब अपरा प्रकृति है (गीता 7। 4)। अतः जैसे पृथ्वी जड़ है, ऐसे ही अहम् भी जड़ है। जब जीव अहम्को दृढ़तासे पकड़कर “अहंकारविमूढात्मा” हो जाता है अर्थात् अहम्को अपना स्वरूप मान लेता है, तब उसका पतन होते-होते वह भी जड़ जगत् ही बन जाता है अर्थात् उसका चेतनपना लुप्त (विस्मृत) हो जाता है, उसको चेतनपनेका अनुभव नहीं होता। जो गुणोंमें आसक्त नहीं होते, उनके सामने जड़ता रहती ही नहीं, इसलिये उनको सब जगह भगवान्-ही-भगवान् दीखते हैं—“वासुदेवः सर्वम्” (गीता 7। 19)। परन्तु जो गुणोंमें आसक्त होते हैं, उनको भगवान् दीखते ही नहीं, प्रत्युत संसार-ही-संसार दीखता है, इसलिये वे भगवान्को भी संसारी ही देखते हैं! वे गुणोंसे अतीत भगवान्को भी गुणोंसे बँधे हुए देखते हैं, अविनाशी भगवान्को भी जन्मने-मरनेवाला देखते हैं (गीता—इसी अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक)। भक्तकी दृष्टि तो भगवान्को छोड़कर दूसरी तरफ नहीं जाती, पर गुणोंमें आसक्त संसारी लोगोंकी दृष्टि संसारको छोड़कर दूसरी तरफ नहीं जाती। इसलिये भक्तको आनन्द-ही-आनन्द प्राप्त होता है और संसारी मनुष्यको दुःख-ही-दुख—“दुःखालयम्” (गीता 8। 15)।
14श्रीभगवान्
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्ययामामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥ 14॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

अब आगेके श्लोकमें भगवान् अपनेको न जान सकनेमें हेतु बताते हैं।

पदच्छेद
श्लोकमें ढूँढ़नेके लिये हॉवर करें
व्याख्या
3 sections
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया
सत्त्व, रज और तम—इन तीन गुणोंवाली दैवी (देव अर्थात् परमात्माकी) माया बड़ी ही दुरत्यय है। भोग और संग्रहकी इच्छा रखनेवाले मनुष्य इस मायासे सम्बन्ध-विच्छेद नहीं कर सकते। “दुरत्यय” कहनेका तात्पर्य है कि ये मनुष्य अपनेको कभी सुखी और कभी दुःखी, कभी समझदार और कभी बेसमझ, कभी निर्बल और कभी बलवान् आदि मानकर इन भावोंमें तल्लीन रहते हैं। इस तरह आने-जानेवाले प्राकृत भावों और पदार्थोंमें ही तादात्म्य, ममता, कामना करके उनसे बँधे रहते हैं और अपनेको इनसे रहित अनुभव नहीं कर सकते। यही इस मायामें दुरत्ययपना है। यह गुणमयी माया तभी दुरत्यय होती है; जब भगवान्के सिवाय गुणोंकी स्वतन्त्र सत्ता और महत्ता मानी जाय। अगर मनुष्य भगवान्के सिवाय गुणोंकी अलग सत्ता और महत्ता नहीं मानेगा, तो वह इस गुणमयी मायासे तर जायगा।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते
मनुष्योंमेंसे जो केवल मेरे ही शरण होते हैं, वे इस मायाको तर जाते हैं; क्योंकि उनकी दृष्टि केवल मेरी ही तरफ रहती है, तीनों गुणोंकी तरफ नहीं। जैसा कि पहले वर्णन किया है, सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण न मेरेमें हैं और न मैं उनमें हूँ। मैं तो निर्लिप्त रहकर सभी कार्य करता हूँ। इस प्रकार जो मेरे स्वरूपको जानते हैं, वे गुणोंमें नहीं फँसते, इस मायासे तर जाते हैं। वे गुणोंका कार्य मन- बुद्धिका किंचिन्मात्र भी सहारा नहीं लेते। क्यों नहीं लेते? क्योंकि वे इस बातको जानते हैं कि प्रकृतिका कार्य होनेसे मन-बुद्धि भी तो प्रकृति हैं। प्रकृतिकी क्रियाशीलता प्रकृतिमें ही है। जैसे प्रकृति हरदम प्रलयकी तरफ जा रही है, ऐसे ही ये मन-बुद्धि भी तो प्रलयकी तरफ जा रहे हैं। अतः उनका सहारा लेना परतन्त्रता ही है। ऐसी परतन्त्रता बिलकुल न रहे और परा प्रकृति (जो कि परमात्माका अंश है) केवल परमात्माकी तरफ आकृष्ट हो जाय तथा अपरासे सर्वथा विमुख हो जाय—यही भगवान्के सर्वथा शरण होनेका तात्पर्य है। यहाँ “मामेव” कहनेका तात्पर्य है कि वे अनन्यभावसे केवल मेरे ही शरण होते हैं; क्योंकि मेरे सिवाय दूसरी कोई सत्ता है ही नहीं। कई साधक मेरे शरण तो हो जाते हैं; परन्तु केवल मेरे ही शरण नहीं होते। इसलिये कहा कि जो
मामेव
केवल मेरी ही शरण लेते हैं, वे तर जाते हैं। मायाकी शरण न ले अर्थात् हमारे पास रुपये-पैसे, चीज-वस्तु आदि सब रहें, पर हम इनको अपना आधार न मानें, इनका आश्रय न लें, इनका भरोसा न करें, इनको महत्त्व न दें। इनका उपयोग करनेका हमें अधिकार है। इनपर कब्जा करनेका हमें अधिकार नहीं है। इनपर कब्जा कर लेना ही इनके आश्रित होना है। आश्रित होनेपर इनसे अलग होना कठिन मालूम देता है— यही वास्तवमें दुरत्ययपना है। इस दुरत्ययपनासे छूटनेके लिये ही उपाय बताते हैं—“मामेव ये प्रपद्यन्ते।” शरीर, इन्द्रियाँ आदि सामग्रीको अपनी और अपने लिये न मानकर, भगवान्की और भगवान्के लिये ही मानकर भगवान्के भजनमें, उनके आज्ञापालनमें लगा देना है। अपनेको इनसे कुछ नहीं लेना है। इनको भगवान्में लगा देनेका फल भी अपनेको नहीं लेना है; क्योंकि जब भगवान्की वस्तु सर्वथा भगवान्के अर्पण कर दी अर्थात् उसमें भूलसे जो अपनापन कर लिया था, वह हटा लिया, तब उस समर्पणका फल हमारा कैसे हो सकता है? यह सब सामग्री तो भगवान्की सेवाके लिये ही भगवान्से मिली है। अतः इसको उनकी सेवामें लगा देना हमारा कर्तव्य है, हमारी ईमानदारी है। इस ईमानदारीसे भगवान् बड़े प्रसन्न हो जाते हैं और उनकी कृपासे मनुष्य मायाको तर जाते हैं। अपने पास अपनी करके कोई वस्तु है नहीं। भगवान्की दी हुई वस्तुओंको अपनी मानकर अपनेमें अभिमान किया था—यह गलती थी। भगवान्का तो बड़ा ही उदार एवं प्रेमभरा स्वभाव है कि वे जिस किसीको कुछ देते हैं, उसको इस बातका पता ही नहीं लगने देते कि यह भगवान्की दी हुई है, प्रत्युत जिसको जो कुछ मिला है, उसको वह अपनी और अपने लिये ही मान लेता है। यह भगवान्का देनेका एक विलक्षण ढंग है। उनकी इस कृपाको केवल भक्तलोग ही जान सकते हैं। परन्तु जो लोग भगवान्से विमुख होते हैं, वे सोच ही नहीं सकते कि इन वस्तुओंको हम सदा पासमें रख सकते हैं क्या? अथवा वस्तुओंके पास हम सदा रह सकते हैं क्या? इन वस्तुओंपर हमारा आधिपत्य चल सकता है क्या? इसलिये वे अनन्यभावसे भगवान्के शरण नहीं हो सकते। इस श्लोकका भाव यह हुआ कि जो केवल भगवान्के ही शरण होते हैं अर्थात् जो केवल दैवी सम्पत्तिवाले होते हैं, वे भगवान्की गुणमयी मायाको तर जाते हैं। परन्तु जो भगवान्के शरण न होकर देवता आदिके शरण होते हैं अर्थात् जो केवल आसुरी सम्पत्तिवाले (प्राण-पिण्ड- पोषण-परायण, सुखभोग-परायण) होते हैं, वे भगवान्की गुणमयी मायाको नहीं तर सकते। ऐसे आसुर स्वभाववाले मनुष्य भले ही ब्रह्मलोकतक चले जायँ, तो भी उनको (ब्रह्म-लोकतक गुणमयी माया होनेसे) वहाँसे लौटना ही पड़ता है, जन्मना-मरना ही पड़ता है।
परिशिष्ट भाव
जब मनुष्य संसारसे विमुख होकर भगवान्की शरणागति स्वीकार कर लेता है, तब वह माया- (अपरा प्रकृतिके कार्य-)को तर जाता है अर्थात् उसके अहम्का सर्वथा नाश हो जाता है। भगवान्की शरणागति स्वीकार करनेका तात्पर्य है—भगवान्की सत्तामें ही अपनी सत्ता मिला दे अर्थात् केवल भगवान्की ही सत्ताको स्वीकार कर ले। न अपनी स्वतन्त्र सत्ता माने, न मायाकी स्वतन्त्र सत्ता माने। न अहम्का आश्रय ले, न माया-(गुणों-) का आश्रय ले। इसमें कोई परिश्रम, उद्योग नहीं है। मायाको सत्ता मनुष्यने ही दी है—“ययेदं धार्यते जगत्” (गीता 7। 5), “मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति” (गीता 15। 7)। अगर वह मायाको सत्ता न देकर केवल भगवान्की ही शरणमें रहता तो वह मायाको तर जाता अर्थात् उसके लिये मायाकी सत्ता रहती ही नहीं। जीव जड़ताका आश्रय लेनेसे अर्थात् उसको अपना एवं अपने लिये माननेसे जड़तामें चला जाता है और जगत् बन जाता है (गीता—इसी अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। परन्तु भगवान्का आश्रय लेनेसे वह स्वतःसिद्ध चिन्मयतामें चला जाता है और भक्त हो जाता है। भक्त होनेपर जगत् लुप्त हो जाता है अर्थात् जगत् जगत्-रूपसे नहीं रहता, प्रत्युत भगवत्स्वरूप हो जाता है, जो वास्तवमें है। “मामेव” पदसे भगवान्का तात्पर्य है कि जीव मेरा ही (मम एव) अंश है—“ममैवांशो जीवलोके” (गीता 15। 7); अतः मेरे ही (माम् एव) शरण होनेसे वह मायाको तर जाता है। इसलिये मेरी शरण लेनेवाले भक्तोंका मेरे सिवाय अन्य किसीसे सम्बन्ध होता ही नहीं, होना सम्भव ही नहीं; क्योंकि उनकी दृष्टिमें मेरे (भगवान्के) सिवाय अन्य कोई होता ही नहीं। न तो उनकी दृष्टि दूसरेमें जाती है और न दूसरा उनकी दृष्टिमें आता है। उनकी दृष्टिमें अपरा प्रकृतिकी न तो सत्ता रहती है, न महत्ता रहती है और न अपनापन ही रहता है। उनकी केवल भगवद्बुद्धि हो जाती है, जो वास्तवमें भगवत्स्वरूप ही है। जिनमें विवेककी प्रधानता है, ऐसे भक्त अहम्का आश्रय छोड़कर अर्थात् संसारका त्याग करके भगवान्के आश्रित होते हैं। परन्तु जिनमें विवेककी प्रधानता नहीं है, प्रत्युत भगवान्में श्रद्धा-विश्वासकी प्रधानता है, ऐसे सीधे-सरल भक्त अहम्के साथ (जैसे हैं, वैसे ही) भगवान्के आश्रित हो जाते हैं। ऐसे भक्तोंके अहम्का नाश भगवान् स्वयं करते हैं (गीता—दसवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)।
* भगवान् पहले बारहवें श्लोकमें यह कहकर आये हैं कि ये सात्त्विक, राजस और तामस भाव मेरेसे ही होते हैं। उसी
बातको लेकर भगवान्ने यहाँ गुणमयी मायाको अपनी दैवी (अलौकिक) माया बताया है। पीछेके तेरहवें श्लोकमें जिन तीन
गुणमय भावोंसे सम्पूर्ण जगत्को मोहित बताया था, उनको ही यहाँ “एषा” पदसे कहा है। मायाको “गुणमयी” कहनेका तात्पर्य
है कि यह माया कार्यरूप है; क्योंकि गुण प्रकृतिके कार्य हैं और वे गुण ही जीवको बाँधते हैं, स्वयं प्रकृति नहीं।
15श्रीभगवान्
न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाःमाययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः॥ 15॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

पूर्वश्लोकमें भगवान्ने यह बताया कि मेरे शरण होनेवाले सभी मायासे तर जाते हैं। अतः सब-के- सब प्राणी मेरे शरण क्यों नहीं होते—इसका कारण आगेके श्लोकमें बताते हैं।

पदच्छेद
श्लोकमें ढूँढ़नेके लिये हॉवर करें
व्याख्या
3 sections
न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः
जो दुष्कृती और मूढ़ होते हैं, वे भगवान्के शरण नहीं होते। दुष्कृती वे ही होते हैं, जो नाशवान्, परिवर्तनशील प्राप्त पदार्थोंमें “ममता” रखते हैं और अप्राप्त पदार्थोंकी “कामना” रखते हैं। कामना पूरी होनेपर “लोभ” और कामनाकी पूर्तिमें बाधा लगनेपर “क्रोध” पैदा होता है। इस तरह जो “कामना” में फँसकर व्यभिचार आदि शास्त्र-निषिद्ध विषयोंका सेवन करते हैं, “लोभ”में फँसकर झूठ, कपट, विश्वासघात, बेईमानी आदि पाप करते हैं और “क्रोध” के वशीभूत होकर द्वेष, वैर आदि दुर्भावपूर्वक हिंसा आदि पाप करते हैं, वे “दुष्कृती” हैं। जब मनुष्य भगवान्के सिवाय दूसरी सत्ता मानकर उसको महत्त्व देते हैं, तभी कामना पैदा होती है। कामना पैदा होनेसे मनुष्य मायासे मोहित हो जाते हैं और
हम जीते रहें तथा भोग भोगते रहें
यह बात उनको जँच जाती है। इसलिये वे भगवान्के शरण नहीं होते, प्रत्युत विनाशी वस्तु, पदार्थ आदिके शरण हो जाते हैं। तमोगुणकी अधिकता होनेसे सार-असार, नित्य- अनित्य, सत्-असत्, ग्राह्य-त्याज्य, कर्तव्य-अकर्तव्य आदिकी तरफ ध्यान न देनेवाले भगवद्विमुख मनुष्य “मूढ़” हैं। दुष्कृती और मूढ़ पुरुष परमात्माकी तरफ चलनेका निश्चय ही नहीं कर सकते, फिर वे परमात्माकी शरण तो हो ही कैसे सकते हैं? “नराधमाः” कहनेका मतलब है कि वे दुष्कृती और मूढ़ मनुष्य पशुओंसे भी नीचे हैं। पशु तो फिर भी अपनी मर्यादामें रहते हैं, पर ये मनुष्य होकर भी अपनी मर्यादामें नहीं रहते हैं। पशु तो अपनी योनि भोगकर मनुष्ययोनिकी तरफ आ रहे हैं और ये मनुष्य होकर (जिनको कि परमात्माकी प्राप्ति करनेके लिये मनुष्यशरीर दिया), पाप, अन्याय आदि करके नरकों और पशुयोनियोंकी तरफ जा रहे हैं। ऐसे मूढ़तापूर्वक पाप करनेवाले प्राणी नरकोंके अधिकारी होते हैं। ऐसे प्राणियोंके लिये भगवान्ने (गीता— सोलहवें अध्यायके उन्नीसवें-बीसवें श्लोकोंमें) कहा है कि “द्वेष रखनेवाले, मूढ़, क्रूर और संसारमें नराधम पुरुषोंको मैं बार-बार आसुरी योनियोंमें गिराता हूँ। वे आसुरी योनियोंको प्राप्त होकर फिर घोर नरकोंमें जाते हैं।”
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः
भगवान्की जो तीनों गुणोंवाली माया है (गीता—सातवें अध्यायका चौदहवाँ श्लोक), उस मायासे विवेक ढक जानेके कारण जो आसुर भावको प्राप्त हो गये हैं अर्थात् शरीर, इन्द्रियाँ, अन्तःकरण और प्राणोंका पोषण करनेमें लगे हुए हैं, वे मेरेसे सर्वथा विमुख ही रहते हैं। इसलिये वे मेरे शरण नहीं होते। दूसरा भाव यह है कि जिनका ज्ञान मायासे अपहृत है, उनकी वृत्ति पदार्थोंके आदि और अन्तकी तरफ जाती ही नहीं। उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंको प्रत्यक्ष नश्वर देखते हुए भी वे रुपये-पैसे, सम्पत्ति आदिके संग्रहमें और मान, योग्यता, प्रतिष्ठा, कीर्ति आदिमें ही आसक्त रहते हैं और उनकी प्राप्ति करनेमें ही अपनी बहादुरी और उद्योगकी सफलता, इतिश्री मानते हैं। इस कारण वे यह समझ ही नहीं सकते कि जो अभी नहीं है, उसकी प्राप्ति होनेपर भी अन्तमें वह “नहीं” ही रहेगा और उसके साथ हमारा सम्बन्ध नहीं रहेगा। “असु” नाम प्राणोंका है। प्राणोंको प्रत्यक्ष ही आने- जानेवाले अर्थात् क्रियाशील और नाशवान् देखते हुए भी वे उन प्राणोंका पोषण करनेमें ही लगे रहते हैं। जीवन- निर्वाहमें काम आनेवाली सांसारिक वस्तुओंको ही वे महत्त्व देते हैं। उन वस्तुओंसे भी बढ़कर वे रुपये-पैसोंको महत्त्व देते हैं, जो कि स्वयं काममें नहीं आते, प्रत्युत वस्तुओंके द्वारा काममें आते हैं। वे केवल रुपयोंको ही आदर नहीं देते, प्रत्युत उनकी संख्याको बहुत आदर देते हैं। रुपयोंकी संख्या अभिमान बढ़ानेमें काम आती है। अभिमान सम्पूर्ण आसुरी सम्पत्तिका आधार और सम्पूर्ण दुःखों एवं पापोंका कारण है*। ऐसे अभिमानको लेकर ही जो अपनेको मुख्य मानते हैं, वे आसुर भावको प्राप्त हैं। उन प्राणियोंके किये हुए कार्य हैं। मूलमें तो वे प्राणी सदा भगवान्के शुद्ध अंश हैं। केवल दुराचारके कारण उनकी भगवान्में रुचि नहीं होती। अगर किसी कारणवशात् रुचि
परिशिष्ट भाव
जो मनुष्य भगवान्का आश्रय नहीं लेते, वे आसुरी, राक्षसी और मोहिनी प्रकृतिका आश्रय लेनेवाले होते हैं (गीता—नवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक)। उनकी दृष्टि संसार-(पदार्थ और क्रिया-) को छोड़कर दूसरी तरफ जाती ही नहीं। उनकी दृष्टिमें भगवान्की सत्ता ही नहीं होती, फिर भगवान्की शरण लेनेका प्रश्न ही नहीं उठता! भोग भोगना और संग्रह करना ही उनका अन्तिम लक्ष्य होता है—“कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः” (गीता 16। 11)। उनका ज्ञान मायाके द्वारा अपहृत होनेसे वे मायाके वशमें होते हैं। मायाके वशमें होनेसे वे मायाको तर ही नहीं सकते। “माययापहृतज्ञानाः” पदका तात्पर्य है कि मायाके कारण उन मनुष्योंकी विवेकशक्ति तिरस्कृत हो गयी है। वे मनुष्य मायामें ही रचे-पचे रहते हैं अर्थात् भोग भोगने और संग्रह करने, शरीरको सजाने, मकानकी सजावट करने आदिमें ही लगे रहते हैं। वे शरीरको सुख-आराम देनेवाली वस्तुओंका ही नया-नया अविष्कार करते रहते हैं और उसीको विशेष महत्त्व देते हैं। ऐसे अनित्य, परिवर्तनशील वस्तुओंको ही जाननेवाले लोग नित्य, अपरिवर्तनशील तत्त्वको कैसे जानें? क्योंकि उधर उनकी दृष्टि जाती ही नहीं, जा सकती ही नहीं।
विशेष बात
विशेष बात यहाँ भगवान्ने कहा है कि दुष्कृती मनुष्य मेरे शरण नहीं हो सकते और नवें अध्यायके तीसवें श्लोकमें कहा है कि सुदुराचारी मनुष्य भी अगर अनन्यभावसे मेरा भजन करता है तो वह बहुत जल्दी धर्मात्मा हो जाता है तथा निरन्तर रहनेवाली शान्तिको प्राप्त होता है—यह कैसे? इसका समाधान यह है कि वहाँ (9। 30) में “अपि चेत्” पद आये हैं, जिनका अर्थ होता है—दुराचारीकी प्रवृत्ति परमात्माकी तरफ स्वाभाविक नहीं होती; परन्तु अगर वह भगवान्के शरण हो जाय, तो उसके लिये भगवान्की तरफसे मना नहीं है। भगवान्की तरफसे किसी भी जीवके लिये किंचिन्मात्र भी बाधा नहीं है; क्योंकि भगवान् प्राणिमात्रके लिये सम हैं। उनका किसी भी प्राणीमें राग- द्वेष नहीं होता (गीता—नवें अध्यायका उनतीसवाँ श्लोक)। दुराचारी-से-दुराचारी मनुष्य भी भगवान्के द्वेषका विषय नहीं है। सब प्राणियोंपर भगवान्का प्यार और कृपा समान ही है। वास्तवमें दुराचारी अधिक दयाका पात्र है। कारण कि वह अपना ही महान् अहित कर रहा है, भगवान्का कुछ भी नहीं बिगाड़ रहा है। इसलिये किसी कारणवशात् कोई आफत आ जाय, बड़ा भारी संकट आ जाय और उसका कोई सहारा न रहे तो वह भगवान्को पुकार उठेगा। ऐसे ही किसी सन्तको उसने दुःख दिया और संतके हृदयमें कृपा आ जाय तो उस सन्तकी कृपासे वह भगवान्में लग जाय अथवा किसी ऐसे स्थानमें चला जाय, जहाँ अच्छे- अच्छे बड़े विलक्षण दयालु महात्मा रह चुके हैं और उनके प्रभावसे उसका भाव बदल जाय अथवा किसी कारणवशात् उसका कोई पुराना विलक्षण पुण्य उदय हो जाय, तो वह अचानक चेत सकता है और भगवान्के शरण हो सकता है। ऐसा पापी पुरुष अगर भगवान्में लगता है तो बड़ी दृढ़तासे लगता है। कारण कि उसके भीतर कोई अच्छाई नहीं होती, इसलिये उसमें अच्छेपनका अभिमान नहीं होता। तात्पर्य यह हुआ कि सम्पूर्ण प्राणियोंमें भगवान्की व्यापकता और कृपा समान है। सदाचार और दुराचार तो हो जाय, तो भगवान् उनके किये हुएको न देखकर उनको स्वीकार कर लेते हैं— रहति न प्रभु चित चूक किए की। करत सुरति सय बार हिए की॥ जैसे, माँका हृदय अपने सम्बन्धसे बालकोंपर समान ही रहता है। उनके सदाचार-दुराचारसे उनके प्रति माँका व्यवहार तो विषम होता है, पर हृदय विषम नहीं होता— “कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।” माँ तो एक जन्मको और एक शरीरको देनेवाली होती है; परन्तु प्रभु तो सदा रहनेवाली माँ हैं। प्रभुका हृदय तो प्राणिमात्रपर सदैव द्रवित रहता ही है। प्राणी निमित्तमात्र भी शरण हो जाय तो प्रभु विशेष द्रवित हो जाते हैं। भगवान् कहते हैं— इसका तात्पर्य है कि जो चराचर प्राणियोंके साथ द्वेष करनेवाला है, वह अगर कहीं भी आश्रय न मिलनेसे भयभीत होकर सर्वथा मेरा ही आश्रय लेकर मेरे शरण हो जाता है, तो उसमें होनेवाले मद, मोह , कपट, नाना छल आदि दोषोंकी तरफ न देखकर, केवल उसके भावकी तरफ देखकर मैं उसको बहुत जल्दी साधु बना लेता हूँ। धर्मका आश्रय रहनेसे धर्मात्मा पुरुषके भीतर अनन्यभाव होनेमें कठिनता रहती है। परन्तु दुरात्मा पुरुष जब किसी कारणसे भगवान्के सम्मुख होता है, तब उसमें किसी प्रकारके शुभकर्मका आश्रय न होनेसे केवल भगवत्- परायणताका ही बल रहता है। यह बल बहुत शीघ्र पवित्र करता है। कारण कि यह बल खुदका होता है अर्थात् किसी तरहका आश्रय न रहनेसे उसकी खुदकी पुकार होती है। इस पुकारसे भगवान् बहुत शीघ्र पिघल जाते हैं। ऐसी पुकार होनेमें पुण्यात्मा-पापात्मा, विद्वान्-मूर्ख, सुजाति- कुजाति आदिका होना कारण नहीं है, प्रत्युत संसारकी तरफसे सर्वथा निराश होना ही खास कारण है। यह निराशा हरेक मनुष्यको हो सकती है। दूसरी बात, भगवान्के कथनका तात्पर्य है कि दुष्कृती पुरुष मेरे शरण नहीं होते; क्योंकि उनका स्वभाव मेरे विपरीत होता है। उनमेंसे अगर कोई मेरे शरण हो जाय, तो मैं उससे प्यार करनेके लिये हरदम तैयार हूँ। भगवान्की कृपालुता इतनी विलक्षण है कि भगवान् भी अपनी कृपाके परवश होकर जीवका शीघ्र कल्याण कर देते हैं। अतः यहाँके और वहाँके प्रसंगमें विरोध नहीं है, प्रत्युत इसमें भगवान्की कृपालुता ही प्रकट होती है। सुकृती और दुष्कृती* का होना उनकी क्रियाओंपर निर्भर नहीं है, प्रत्युत भगवान्के सम्मुख और विमुख होनेपर निर्भर है। जो भगवान्के सम्मुख है, वह सुकृती है और जो भगवान्से विमुख है, वह दुष्कृती है। भगवान्के सम्मुख होनेका जैसा माहात्म्य है, वैसा माहात्म्य सकामभावपूर्वक किये गये यज्ञ, दान, तप, तीर्थ, व्रत आदि शुभ कर्मोंका भी नहीं है। यद्यपि यज्ञ, दान, तप आदि क्रियाएँ भी पवित्र हैं, पर जो अपनेको सर्वथा अयोग्य समझकर और अपनेमें किसी तरहकी पवित्रता न देखकर आर्तभावसे भगवान्के सम्मुख रो पड़ता है, उसकी पवित्रता भगवत्कृपासे बहुत जल्दी होती है। भगवत्कृपासे होनेवाली पवित्रता अनेक जन्मोंमें किये हुए शुभ कर्मोंकी अपेक्षा बहुत ही विलक्षण होती है। इसी तरहसे शुभ कर्म करनेवाले सुकृती भी शुभ कर्मोंका आश्रय छोड़कर भगवान्को पुकार उठते हैं, तो उनका भी शुभ कर्मोंका आश्रय न रहकर एक भगवान्का आश्रय हो जाता है। केवल भगवान्का ही आश्रय होनेके कारण वे भी भगवान्के प्यारे भक्त हो जाते हैं। एक कृति होती है और एक भाव होता है। कृतिमें बाहरकी क्रिया होती है और भाव भीतरमें होता है। भावके पीछे उद्देश्य होता है और उद्देश्यके पीछे भगवान्की तरफ अनन्यता होती है। वह अनन्यता कृतियों और भावोंसे बहुत विलक्षण होती है; क्योंकि वह स्वयंकी होती है। उस अनन्यताके सामने कोई दुराचार टिक ही नहीं सकता। वह अनन्यता दुराचारी-से-दुराचारी पुरुषको भी बहुत जल्दी पवित्र कर देती है। वास्तवमें यह जीव परमात्माका अंश होनेसे पवित्र तो है ही। केवल दुर्भावों और दुराचारोंके कारण ही इसमें अपवित्रता आती है।
(मानस 1। 29। 3)
जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवै सभय सरन तकि मोही॥
तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना॥
(मानस 5। 48। 1-2)
* संसृत मूल सूलप्रद नाना। सकल सोक दायक अभिमाना॥ (मानस 7। 74। 3)
* यहाँ (7। 15 में) “दुष्कृतिनः” कहकर बहुवचन दिया गया है और वहाँ (9। 30 में) “सुदुराचारः” कहकर एकवचन
दिया है। इसका तात्पर्य है कि बहुवचन देना सामान्य शास्त्र (सामान्य बात) है और एकवचन देना विशेष शास्त्र (विशेष
बात) है। जहाँ सामान्य और विशेष शास्त्रकी तुलना होती है, वहाँ सामान्य शास्त्रसे विशेष शास्त्र बलवान् हो जाता है—
“सामान्यशास्त्रो न्यूनं विशेषो बलवान् भवेत्।” इसलिये एकवचन बलवान् है।
दूसरी बात, जिसको अवकाश नहीं मिलता, वह विधि बलवान् होती है—“निरवकाशो विधिरपवादः।” इसका मतलब
यह हुआ कि दुष्कृती भगवान्के शरण नहीं होते—यह उनका सामान्य स्वभाव बताया; परन्तु उनमेंसे कोई एक किसी कारण-
विशेषसे भगवान्के शरण हो जाय तो भगवान्की तरफसे कृपाका दरवाजा खुला है—
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥ (मानस 5। 44। 1)
16श्रीभगवान्
तुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन। आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥ 16॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

पूर्वश्लोकमें भगवान्ने कहा कि दुष्कृती पुरुष मेरे शरण नहीं होते। तो फिर शरण कौन होते हैं? इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
4 sections
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनो- ऽर्जुन
सुकृती पवित्रात्मा मनुष्य अर्थात् भगवत्- सम्बन्धी काम करनेवाले मनुष्य चार प्रकारके होते हैं। ये चारों मनुष्य मेरा भजन करते हैं अर्थात् स्वयं मेरे शरण होते हैं। पूर्वश्लोकमें “दुष्कृतिनः” पदसे भगवान्में न लगने- वाले मनुष्योंकी बात आयी थी। अब यहाँ “सुकृतिनः” पदसे भगवान्में लगनेवाले मनुष्योंकी बात कहते हैं। ये सुकृती मनुष्य शास्त्रीय सकाम पुण्य-कर्म करनेवाले नहीं हैं, प्रत्युत भगवान्से अपना सम्बन्ध जोड़कर भगवत्सम्बन्धी कर्म करनेवाले हैं। सुकृती मनुष्य दो प्रकारके होते हैं— एक तो यज्ञ, दान, तप आदि और वर्ण-आश्रमके शास्त्रीय कर्म भगवान्के लिये करते हैं अथवा उनको भगवान्के अर्पण करते हैं और दूसरे भगवन्नामका जप तथा कीर्तन करना, भगवान्की लीला सुनना तथा कहना आदि केवल भगवत्सम्बन्धी कर्म करते हैं। जिनकी भगवान्में रुचि हो गयी है, वे ही भाग्यशाली हैं, वे ही श्रेष्ठ हैं और वे ही मनुष्य कहलानेयोग्य हैं। वह रुचि चाहे किसी पूर्व पुण्यसे हो गयी हो, चाहे आफतके समय दूसरोंका सहारा छूट जानेसे हो गयी हो, चाहे किसी विश्वसनीय मनुष्यके द्वारा समयपर धोखा देनेसे हो गयी हो, चाहे सत्संग, स्वाध्याय अथवा विचार आदिसे हो गयी हो, किसी भी कारणसे भगवान्में रुचि होनेसे वे सभी सुकृती मनुष्य हैं। जब भगवान्की तरफ रुचि हो जाय, वही पवित्र दिन है, वही निर्मल समय है और वही सम्पत्ति है। जब भगवान्की तरफ रुचि नहीं होती, वही काला दिन है, वही विपत्ति है— भगवान्ने कृपा करके भगवत्प्राप्तिरूप जिस उद्देश्यको लेकर जिन्हें मानव-शरीर दिया है, वे “जनाः” (जन) कहलाते हैं। भगवान्का संकल्प मनुष्यमात्रके उद्धारके लिये बना है; अतः मनुष्यमात्र भगवान्की प्राप्तिका अधिकारी है। तात्पर्य है कि उस संकल्पमें भगवान्ने मनुष्यको अपने उद्धारकी स्वतन्त्रता दी है, जो कि अन्य प्राणियोंको नहीं मिलती; क्योंकि वे भोगयोनियाँ हैं और यह मानवशरीर कर्मयोनि है। वास्तवमें केवल भगवत्प्राप्तिके लिये ही होनेके कारण मानव-शरीरको साधनयोनि ही मानना चाहिये। इसलिये इस स्वतन्त्रताका सदुपयोग करके मनुष्य शास्त्र-निषिद्ध कर्मोंको छोड़कर अगर भगवत्प्राप्तिके लिये ही लग जाय तो उसको भगवत्कृपासे अनायास ही भगवत्प्राप्ति हो सकती है। परन्तु जो मिली हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके विपरीत मार्गपर चलते हैं, वे नरकों और चौरासी लाख योनियोंमें जाते हैं। इस तरह सबके उद्धारके भावको लेकर भगवान्ने कृपा करके जो मानव-शरीर दिया है, उस शरीरको पाकर भगवान्का भजन करनेवाले सुकृती मनुष्य ही “जनाः” अर्थात् मनुष्य कहलानेयोग्य हैं।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ
अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी अर्थात् प्रेमी—ये चार प्रकारके भक्त भगवान्का भजन करते हैं अर्थात् भगवान्के शरण होते हैं। (1) अर्थार्थी भक्त—जिनको अपनी न्याययुक्त सुख-सुविधाकी इच्छा हो जाती है अर्थात् धन-सम्पत्ति, वैभव आदिकी इच्छा हो जाती है, परन्तु उसको वे केवल भगवान्से ही चाहते हैं, दूसरोंसे नहीं, ऐसे भक्त अर्थार्थी भक्त कहलाते हैं। चार प्रकारके भक्तोंमें अर्थार्थी आरम्भिक भक्त होता है। पूर्व-संस्कारोंसे उसकी धनकी इच्छा रहती है और वह धनके लिये चेष्टा भी करता है, पर वह समझता है कि भगवान्के समान धनकी इच्छा पूरी करनेवाला दूसरा कोई नहीं है। ऐसा समझकर वह धनप्राप्तिके लिये तत्परतापूर्वक भगवन्नामका जप-कीर्तन, भगवत्स्वरूपका ध्यान आदि करता है। धन प्राप्त करनेके लिये उसका भगवान्पर ही विश्वास, निष्ठा होती है। जिसको धनकी इच्छा तो है, पर उसकी प्राप्तिके लिये वह सांसारिक उपायोंका सहारा लेता है और कभी धनके लिये भगवान्को भी याद कर लेता है, वह केवल अर्थार्थी अर्थात् अर्थका भक्त है, भगवान्का भक्त नहीं है। कारण कि उसमें धनकी इच्छा ही मुख्य है। परन्तु जिसमें भगवान्के सम्बन्धकी मुख्यता है, वह क्रमशः भगवान्की तरफ ही बढ़ता चला जाता है। भगवान्में लगे रहनेसे उसकी धनकी इच्छा बहुत कम हो जाती है और समय पाकर मिट भी जाती है। यही भगवान्का अर्थार्थी भक्त है। इसमें मुख्यतया ध्रुवजीका नाम लिया जाता है। एक दिन बालक ध्रुवके मनमें राजाकी गोदमें बैठनेकी इच्छा हुई, पर छोटी माँने बैठने नहीं दिया। उसने ध्रुवसे कहा कि “तूने भजन नहीं किया है, तू अभागा है और अभागिनके यहाँ ही तूने जन्म लिया है; अतः तू राजाकी गोदमें बैठनेका अधिकारी नहीं है।” ध्रुवने छोटी माँकी कही हुई सब बात अपनी माँसे कह दी। माँने कहा कि “बेटा! तेरी छोटी माँने ठीक ही कहा है; क्योंकि भजन न तूने किया और न मैंने ही किया।” इसपर ध्रुवने माँसे कहा कि “माँ! अब तो मैं भजन करूँगा।” ऐसा कहकर वे भगवद्भजन करनेके लिये घरसे निकल पड़े और माँने भी बड़ी हिम्मत करके ध्रुवको जंगलमें जानेके लिये आज्ञा दे दी। रास्तेमें जाते हुए नारदजी महाराज मिल गये। नारदजीने ध्रुवसे कहा कि “अरे भोले बालक! तू अकेला कहाँ जा रहा है? यों भगवान् जल्दी थोड़े ही मिलते हैं? तू जंगलमें कहाँ रहेगा? वहाँ बड़े-बड़े जंगली जानवर हैं। वे तेरेको खा जायँगे। वहाँ तेरी माँ थोड़े ही बैठी है! तू मेरे साथ चल। राजा मेरी बात मानते हैं। मैं तेरा और तेरी माँका प्रबन्ध करवा दूँगा।” नारदजीकी बातोंको सुनकर ध्रुवकी भगवद्भजनमें और दृढ़ता हो गयी कि देखो, भगवान्की तरफ चलनेसे नारदजी भी इतनी बात कहते हैं। अब ये मेरेको घर चलनेके लिये कहते हैं, पर पहले ये कहाँ गये थे! ध्रुवने नारदजीसे कहा कि “महाराज! मैं तो अब भगवान्का भजन ही करूँगा।” ध्रुवजीका ऐसा दृढ़ निश्चय देखकर नारदजीने उनको द्वादशाक्षर मन्त्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) दिया और चतुर्भुज भगवान् विष्णुका ध्यान बताकर मधुवनमें जाकर भजन करनेकी आज्ञा दी। ध्रुवजीने मधुवनमें जाकर ऐसी निष्ठासे भजन किया कि उनकी निष्ठाको देखकर छः महीनेकी अवधिके भीतर-ही- भीतर भगवान् ध्रुवके सामने प्रकट हो गये। भगवान्ने ध्रुवजीको राजगद्दीका वरदान दिया, पर इस वरदानसे ध्रुवजी विशेष राजी नहीं हुए। भजनसे अन्तःकरण शुद्ध होनेके कारण उनको धन-(राज्य-) के लिये भगवान्की तरफ चलनेमें बड़ी लज्जा हुई कि मैंने बड़ी गलती की! तात्पर्य यह हुआ कि ध्रुवजीको तो पहले राजाकी गोदमें बैठनेकी इच्छा हुई, पर उन्होंने उस इच्छाकी पूर्तिका मुख्य उपाय भगवान्का भजन ही माना। भजन करनेसे उनको राज्य मिल गया और इच्छा मिट गयी। इस तरह अर्थार्थी भक्त केवल भगवान्की तरफ ही लगता है। आजकल जो धन-प्राप्तिके लिये झूठ, कपट, बेईमानी आदि करते हैं, वे भी धनके लिये समय-समयपर भगवान्को पुकारते हैं। वे अर्थार्थी तो हैं, पर भगवान्के भक्त नहीं हैं। वे तो झूठ, कपट, बेईमानी आदिके भक्त हैं; क्योंकि उनका
पापके बिना, झूठ-कपटके बिना काम नहीं चलता
इस तरह झूठ-कपट आदिपर जितना विश्वास है, उतना विश्वास भगवान्पर नहीं है। जो केवल भगवान्के ही परायण हैं और जो भगवान्के साथ अपनापन करके भगवान्का ही भजन करते हैं; परन्तु कभी-कभी पूर्व-संस्कारोंसे अथवा किसी कारणसे जिनमें अपने शरीर आदिके लिये अनुकूल परिस्थितिकी इच्छा हो जाती है, वे भी अर्थार्थी भक्त कहलाते हैं। उनकी अनुकूलताकी इच्छा ही अर्थार्थीपन है। (2)
आर्त भक्त
प्राण-संकट आनेपर, आफत आनेपर, मनके प्रतिकूल घटना घटनेपर जो दुःखी होकर अपना दुःख दूर करनेके लिये भगवान्को पुकारते हैं और दुःखको दूर करना केवल भगवान्से ही चाहते हैं, दूसरे किसी उपायको काममें नहीं लेते, वे आर्त भक्त कहलाते हैं। आर्त भक्तोंमें उत्तराका दृष्टान्त लेना ठीक बैठता है*। कारण कि जब उसपर आफत आयी, तब उसने भगवान्के सिवाय अन्य किसी उपायका सहारा नहीं लिया। अन्य उपायोंकी तरफ उसकी दृष्टि ही नहीं गयी। उसने केवल भगवान्का ही सहारा लिया*। तात्पर्य यह हुआ कि सकामभाव रहनेपर भी आर्त भक्त उसकी पूर्ति केवल भगवान्से ही चाहते हैं। जो भगवान्के साथ अपनापन करके भगवान्के परायण हैं और अनुकूलताकी वैसी इच्छा नहीं करते; पर प्रतिकूल परिस्थिति आनेपर इच्छा हो जाती है कि भगवान्ने ऐसा क्यों किया? “यह प्रतिकूलता मिट जाय तो बहुत अच्छा है।” इस प्रकार प्रतिकूलता मिटानेका भाव पैदा होनेसे वे भी आर्त भक्त कहलाते हैं। (3) जिज्ञासु भक्त—जिसमें अपने स्वरूपको, भगवत्तत्त्वको जाननेकी जोरदार इच्छा जाग्रत् हो जाती है कि वास्तवमें मेरा स्वरूप क्या है? भगवत्तत्त्व क्या है? इस प्रकार तत्त्वको जाननेके लिये शास्त्र, गुरु अथवा पुरुषार्थ (श्रवण, मनन, निदिध्यासन आदि उपायों) का भी आश्रय न रखते हुए केवल भगवान्के आश्रित होकर उस तत्त्वको केवल भगवान्से ही जो जानना चाहते हैं; वे जिज्ञासु भक्त कहलाते हैं। जिज्ञासु भक्त वही होता है, जिसका जिज्ञास्य केवल भगवत्तत्त्व और उपाय केवल भगवद्भक्ति ही होती है अर्थात् उपेय और उपायमें अनन्यता होती है। जिज्ञासु भक्तोंमें उद्धवजीका नाम लिया जाता है। भगवान्ने उद्धवजीको दिव्यज्ञानका उपदेश दिया था, जो “उद्धवगीता” (श्रीमद्भागवत 11। 7—30) के नामसे प्रसिद्ध है। जो भगवान्में अपनापन करके भगवान्के भजनमें ही तल्लीन रहते हैं; परन्तु कभी-कभी संगसे, संस्कारोंसे मनमें यह भाव पैदा हो जाता है कि वास्तवमें मेरा स्वरूप क्या है? भगवत्तत्त्व क्या है? वे भी जिज्ञासु कहलाते हैं। (4) ज्ञानी (प्रेमी) भक्त—अर्थार्थी, आर्त और जिज्ञासु—तीनों भक्तोंसे ज्ञानी भक्तकी विलक्षणता बतानेके लिये यहाँ “च” अव्यय आया है। ज्ञानी भक्तको अनुकूल-से-अनुकूल और प्रतिकूल- से-प्रतिकूल परिस्थिति, घटना, व्यक्ति, वस्तु आदि सब भगवत्स्वरूप ही दीखते हैं अर्थात् उसको अनुकूल- प्रतिकूल परिस्थिति केवल भगवल्लीला ही दीखती है। जैसे भगवान्में अपने लिये अनुकूलता प्राप्त करने, प्रतिकूलता हटाने, बोध प्राप्त करने आदि किसी तरहकी कभी किंचिन्मात्र भी इच्छा होती ही नहीं, वे तो केवल भक्तोंके प्रेममें ही मस्त रहते हैं; ऐसे ही ज्ञानी (प्रेमी) भक्तोंमें किंचिन्मात्र भी कोई इच्छा नहीं होती, वे केवल भगवान्के प्रेममें ही मस्त रहते हैं। ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्तोंमें गोपिकाओंका नाम प्रसिद्ध है। देवर्षि नारदजीने भी “यथा व्रजगोपिकानाम्” (भक्तिसूत्र 21) कहकर गोपियोंको प्रेमी भक्तोंका आदर्श माना है। कारण कि गोपियोंमें अपने सुखका सर्वथा त्याग था। प्रियतम भगवान्का सुख ही उनका सुख था। यहाँ एक बात समझनेकी है कि धनकी इच्छा, दुःख दूर करनेकी इच्छा और जिज्ञासा-पूर्तिकी इच्छाको लेकर जो भगवान्की तरफ लगते हैं, उनमें तो भगवान्का प्रेम जाग्रत् हो जाता है और वे भक्त कहलाते हैं। परन्तु जिनकी यह भावना रहती है कि अन्य उपायोंसे धन मिल सकता है, दुःख दूर हो सकता है, जिज्ञासा-पूर्ति हो सकती है, उनका भगवान्के साथ सम्बन्ध न होनेसे उनमें प्रेम जाग्रत् नहीं होता और उनकी भक्त संज्ञा नहीं होती। संतोंकी वाणीमें आता है कि प्रेम तो केवल भगवान् ही करते हैं, भक्त केवल भगवान्में अपनापन करता है। कारण कि प्रेम वही करता है, जिसे कभी किसीसे कुछ भी लेना नहीं है। भगवान्ने जीवमात्रके प्रति अपने-आपको सर्वथा अर्पित कर रखा है और जीवसे कभी कुछ भी प्राप्त करनेकी इच्छाकी कोई सम्भावना ही नहीं रखी है। इसलिये भगवान् ही वास्तवमें प्रेम करते हैं। जीवको भगवान्की आवश्यकता है, इसलिये जीव भगवान्से अपनापन ही करता है। जब अपने-आपको सर्वथा भगवान्के अर्पित करनेपर भक्तमें कभी कुछ भी पानेकी कोई अभिलाषा नहीं रहती, तब वह ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्त कहा जाता है। अपने-आपको सर्वथा भगवान्के अर्पित कर देनेसे उस भक्तकी सत्ता भगवान्से किंचिन्मात्र भी अलग नहीं रहती, प्रत्युत उसकी जगह केवल भगवान्की सत्ता ही रह जाती है। “हृतज्ञानाः” नहीं हैं। उनको तो भगवान्ने “सुकृतिनः” और “उदाराः” (7। 18) कहा है। जो भगवान्के शरण होते हैं, उनमें सकामभाव भी हो सकता है; परन्तु उनमें मुख्यता भगवन्निष्ठ होनेकी ही होती है। इसलिये उनकी भगवान्के साथ जितनी-जितनी घनिष्ठता होती जाती है, उतना-उतना ही उनमें सकामभाव मिटता जाता है और विलक्षणता आती जाती है। इसलिये उनको भगवान्ने “उदाराः” कहा है और ज्ञानी भक्तको अपना स्वरूप बताया है—“ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्” (7। 18)। (2)
परिशिष्ट भाव
चौदहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा था कि मेरी शरण लेनेवाले भक्त गुणमयी मायाको तर जाते हैं। वे शरण लेनेवाले भक्त कौन हैं—इसको अब इस श्लोकमें बताते हैं। पूर्व श्लोकमें “दुष्कृती” मनुष्योंकी और इस श्लोकमें “सुकृती” मनुष्योंकी बात आयी है। जो हमारेसे अलग है, उस संसारको अपना मानना सबसे बड़ा दुष्कृत अर्थात् पाप है और जो हमारेसे अभिन्न हैं, उन भगवान्को अपना मानना सबसे बड़ा सुकृत अर्थात् पुण्य है। अतः जो संसारको अपना मानते हैं, वे दुष्कृती हैं और जो भगवान्को अपना मानते हैं, वे सुकृती हैं। भोगी मनुष्य भगवान्में नहीं लगता, इसलिये “अर्थार्थी” तो भगवान्का भक्त हो सकता है, पर “भोगार्थी” भगवान्का भक्त नहीं हो सकता। कारण कि भोगार्थीमें संसारकी लिप्तता अधिक होती है और अर्थार्थीमें लिप्तता कम होती है तथा भगवान्की मुख्यता होती है। कुछ अंशमें भगवान्के सिवाय अन्य सत्ताकी मान्यता होनेके कारण ही भक्त अर्थार्थी, आर्त अथवा जिज्ञासु होता है। अगर अन्य सत्ताकी मान्यता सर्वथा न हो तो वह ज्ञानी (प्रेमी) हो जाता है। तात्पर्य है कि भगवान्के सिवाय दूसरी सत्ता माननेसे ही ये चार भेद होते हैं। वास्तवमें एक भगवान्की सत्ताके सिवाय दूसरी सत्ता सम्भव ही नहीं है। जो विज्ञानसहित ज्ञानको अर्थात् परमात्माके समग्ररूपको जानना चाहता है, वह “जिज्ञासु” है। जिज्ञासु भगवान्के ऐश्वर्य, प्रभाव, सामर्थ्यको जानना चाहता है, इसलिये भगवान्की लीला-कथामें उसको विशेष रस आता है। भगवान्ने “मुमुक्षु” पद न देकर “जिज्ञासु” पद दिया है; क्योंकि मुमुक्षु तो केवल तत्त्वज्ञान चाहनेवाला ही हो सकता है, पर “जिज्ञासु” ज्ञान चाहनेवाला भी हो सकता है और भक्ति चाहनेवाला भी। मुमुक्षुमें अपने कल्याणकी बात मुख्य होती है और जिज्ञासु भक्तमें अपनेको भगवान्के अर्पित करनेकी बात मुख्य होती है। मुमुक्षुको ब्रह्मका ज्ञान होता है और जिज्ञासु भक्तको “वासुदेवः सर्वम्” का ज्ञान होता है। तत्त्वज्ञानीको तो ब्रह्मका ज्ञान होता है, पर भक्तको समग्रका ज्ञान होता है (गीता इसी अध्यायका उनतीसवाँ, तीसवाँ श्लोक)। अर्थार्थी, आर्त और जिज्ञासुमें क्रमशः संसारका सम्बन्ध घटता जाता है और परमात्माका सम्बन्ध बढ़ता जाता है। जबतक जीव जगत्को धारण किये रहता है, तभीतक अर्थार्थी, आर्त और जिज्ञासु रहते हैं। जब वह जगत्को धारण नहीं करता, तब केवल “ज्ञानी” रहता है। जिस भक्तको “सब कुछ वासुदेव ही है”— इस प्रकार परमात्माके समग्ररूपका ज्ञान हो गया है, उसको यहाँ “ज्ञानी” कहा गया है। इसी ज्ञानी भक्तको आगे उन्नीसवें श्लोकमें “ज्ञानवान्” कहा गया है। “अर्थार्थी” प्राप्त परिस्थितिमें सन्तोष न करके धन चाहता है। “आर्त” प्राप्त परिस्थितिमें सन्तोष तो करता है, पर दुःख आनेपर उससे दुःख सहा नहीं जाता। “अर्थार्थी” में अर्थकी मुख्यता नहीं है, प्रत्युत भगवान्की मुख्यता है। उसमें धनकी इच्छा तो रहती है, पर उस इच्छाको वह केवल भगवान्से ही पूरी कराना चाहता है। कारण कि भगवान्में कोई कमी नहीं है। अपरा प्रकृति है तो भगवान्की ही! “आर्त” भी अपना दुःख केवल भगवान्से ही दूर करना चाहता है। “जिज्ञासु” भी केवल भगवान्से ही अपनी जिज्ञासाकी पूर्ति करना चाहता है। परन्तु जब भक्तमें ऐसी उत्कट अभिलाषा रहती है कि “मेरेको केवल भगवान् ही प्यारे लगें”, तब उसमें अर्थार्थीपना, आर्तपना और जिज्ञासुपना नहीं रहता और वह ज्ञानी अर्थात् प्रेमी हो जाता है। “अर्थार्थी” का तो अर्थसे निरन्तर सम्बन्ध रहता है; क्योंकि अर्थकी वासना हरदम रहती है। परन्तु “आर्त” का दुःखसे निरन्तर सम्बन्ध नहीं रहता; क्योंकि दुःख हरदम नहीं रहता। “जिज्ञासु” को सुख-दुःखकी परवाह नहीं होती; अतः वह न तो सुखके आनेकी इच्छा करता है और न दुःखके जानेकी इच्छा करता है। अर्थार्थी और आर्त—दोनों जिज्ञासु होकर ज्ञानी हो जाते हैं। “अर्थार्थी” भक्तको जब अर्थ मिलता है, तब उसको अपनी भूलपर पश्चात्ताप होता है; जैसे—ध्रुवजीको राज्य मिलनेपर पश्चात्ताप हुआ। परन्तु “आर्त” भक्तको उतना पश्चात्ताप नहीं होता, प्रत्युत उसमें यह भाव रहता है कि भगवान् दुःख दूर करनेवाले हैं; जैसे—द्रौपदी और गजेन्द्रकी रक्षा होनेपर उनको पश्चात्ताप नहीं हुआ, प्रत्युत भगवान्की तरफ ही उनकी वृत्ति रही। “आर्त” भक्त आये हुए दुःखको सह नहीं सकता—यह उसकी कमजोरी है। “जिज्ञासु” भक्तमें भगवान्के समग्ररूपको जाननेकी कमी रहती है। उसको मुक्ति, तत्त्वज्ञान होनेपर भी सन्तोष नहीं होता, प्रत्युत उसमें प्रेम प्राप्त करनेकी भूख रहती है। परन्तु “ज्ञानी” भक्तकी दृष्टिमें एक वासुदेवके सिवाय अन्य सत्ता लेशमात्र भी नहीं होती, फिर उसमें कोई कमी कैसे रह सकती है। इसलिये भगवान्ने ज्ञानी भक्तको अपना स्वरूप बताया है—“ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्” (गीता 7। 18)।
विशेष बात
विशेष बात (1) चार लड़के खेल रहे थे। इतनेमें उनके पिताजी चार आम लेकर आये। उनको देखते ही एक लड़का आम माँगने लग गया और एक लड़का आम लेनेके लिये रो पड़ा। पिताजीने उन दोनोंको एक-एक आम दे दिया। तीसरा लड़का न तो रोता है और न माँगता है, केवल आमकी तरफ देखता है और चौथा लड़का आमकी तरफ न देखकर जैसे पहले खेल रहा था, वैसे ही मस्तीसे खेल रहा है। उन दोनोंको भी पिताजीने एक-एक आम दे दिया। इस प्रकार चारों ही लड़कोंको आम मिलता है। यहाँ आम माँगनेवाला लड़का अर्थार्थी है, रोनेवाला लड़का आर्त है, केवल आमकी तरफ देखनेवाला जिज्ञासु है और आमकी परवाह न करके खेलमें लगे रहनेवाला लड़का ज्ञानी है। ऐसे ही अर्थार्थी भक्त भगवान्से अनुकूलता माँगता है, आर्त भक्त भगवान्से प्रतिकूलता दूर कराना चाहता है, जिज्ञासु भक्त भगवान्को जानना चाहता है और ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्त भगवान्से कुछ भी नहीं चाहता। अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी—ये चारों ही भक्त भगवन्निष्ठ हैं। अतः इनको योगभ्रष्ट पुरुषों (गीता—छठे अध्यायका इकतालीसवाँ-बयालीसवाँ श्लोक)-में नहीं लिया जा सकता। ऐसे ही अर्थार्थी और आर्त—ये दोनों सकाम पुरुषोंसे अलग हैं; क्योंकि इन दोनों भक्तोंमें भगवान्का आश्रय मुख्य है। सकाम पुरुष कामनापूर्तिमें ही लगे रहनेके कारण “हृतज्ञानाः” हैं (गीता 7। 20), इसलिये उनको आसुरी सम्पत्तिवाले पुरुषोंमें लिया गया है। यद्यपि अर्थार्थी आदि भक्तोंमें जो कुछ न्यूनाधिकता है, वह कामनाके कारण ही है, परन्तु कामना होते हुए भी वे भगवान्के साथ अपनापन माननेके समान दूसरा कोई साधन नहीं है, कोई योग्यता नहीं है, कोई बल नहीं है, कोई अधिकारिता नहीं है। भगवान्का प्राणिमात्रपर अपनापन सदासे है और सदा ही रहेगा। उस अपनेपनको केवल प्राणी ही भूला है और उसने भूलसे संसारके साथ अपनापन मान लिया है। अतः इस भूलसे किये हुए अपनेपनको हटाना है और प्रभुके साथ जो स्वतःसिद्ध अपनापन है, उसको मानना है। प्रभुको अपना माननेमें मन, बुद्धि आदि किसीकी सहायता नहीं लेनी पड़ती, जबकि दूसरे साधनोंमें मन, बुद्धि आदिकी सहायता लेनी पड़ती है। भगवान्के साथ अपनापन होनेपर अर्थात् “मैं केवल भगवान्का ही हूँ और केवल भगवान् ही मेरे हैं”—ऐसा दृढ़तासे मान लेनेपर साधक भक्तको अपने कहलानेवाले अन्तःकरणमें भावोंकी, गुणोंकी कमी भी दीख सकती है, पर भगवान्के साथ अपनापन होनेसे वह टिकेगी नहीं। दूसरी बात, साधक भक्तमें कुछ गुणोंकी कमी रहनेपर भी भगवान्की दृष्टि केवल अपनेपनपर ही जाती है, गुणोंकी कमीपर नहीं। कारण कि भगवान्के साथ हमारा जो अपनापन है, वह वास्तविक है। भगवान्का अपनापन तो दुष्ट-से-दुष्ट मनुष्यपर भी वैसा ही है। इसलिये सोलहवें अध्यायमें आसुरी प्रकृतिवालोंका वर्णन करते हुए भगवान् कहते हैं कि “क्रूर, द्वेष करनेवाले, नराधम दुष्टोंको मैं आसुरी योनियोंमें गिराता हूँ।” इस प्रकार भगवान् उनको आसुरी योनियोंमें गिराकर शुद्ध करते हैं। जैसे माता अपने बच्चेको स्नान कराती है तो उसकी सम्मति नहीं लेती, ऐसे ही उनको शुद्ध करनेके लिये भगवान् उनकी सम्मति नहीं लेते; क्योंकि भगवान्का उनपर अपनापन है। भगवान्के साथ अपनापनका सम्बन्ध पहलेसे ही है। फिर भी कोई कामना उत्पन्न हो जाती है तो भक्तका भगवान्के साथ अपनेपनका सम्बन्ध मुख्य होता है और कामना गौण होती है। इस दृष्टिसे ये भक्त पहली श्रेणीके हैं। भगवान्का सम्बन्ध तो पहलेसे ही है, पर समय- समयपर कामना उत्पन्न हो जाती है, जिसकी पूर्ति दूसरोंसे चाहते हैं। जब दूसरोंसे कामनाकी पूर्ति नहीं होती, तब अन्तमें भगवान्से चाहते हैं। इस तरह अनन्यताकी कमी होनेके कारण ये भक्त दूसरी श्रेणीके हैं। जहाँ केवल कामना-पूर्तिके लिये ही भगवान्के साथ अपनेपनका सम्बन्ध किया जाय, वहाँ कामना मुख्य होती है और भगवान्का सम्बन्ध गौण होता है। इस दृष्टिसे ये भक्त तीसरी श्रेणीके हैं। मार्मिक बात कामना दो तरहकी होती है—पारमार्थिक और लौकिक। (1) पारमार्थिक कामना—पारमार्थिक कामना दो तरहकी होती है—मुक्ति-(कल्याण-)की और भक्ति- (भगवत्प्रेम-) की। जो मुक्तिकी कामना है, उसमें तत्त्वको जाननेकी इच्छा होती है, जिसे जिज्ञासा कहते हैं। यह जिज्ञासा जिसमें होती है, वह जिज्ञासु होता है। गहरा विचार किया जाय तो जिज्ञासा कामना नहीं है; क्योंकि वह अपने स्वरूपको अर्थात् तत्त्वको जानना चाहता है, जो वास्तवमें उसकी आवश्यकता है। आवश्यकता उसको कहते हैं, जो जरूर पूरी होती है और पूरी होनेपर फिर दूसरी आवश्यकता पैदा नहीं होती1। यह आवश्यकता सत्-विषयकी होती है। दूसरी कामना प्रभु-प्रेम-प्राप्तिकी होती है। उसको प्राप्ति तो कहते हैं, पर वास्तवमें वह प्राप्ति अपने लिये नहीं होती, प्रत्युत प्रभुके लिये ही होती है। उसमें अपना किंचिन्मात्र प्रयोजन नहीं रहता; प्रभुके समर्पित होनेका ही प्रयोजन रहता है। प्रेमी तो अपने-आपको प्रभुके समर्पित कर देता है, जो कि उसीका अंश है2। उपर्युक्त दोनों ही पारमार्थिक कामनाएँ वास्तवमें “कामना” नहीं हैं। (2) लौकिक कामना—लौकिक कामना भी दो तरहकी होती है—सुख प्राप्त करनेकी और दुःख दूर करनेकी। शरीरको आराम मिले; जीते-जी मेरा आदर-सत्कार होता रहे और मरनेके बाद मेरा नाम अमर हो जाय, मेरा स्मारक बन जाय; कोई ग्रन्थ बना दे, जिसको लोग देखते रहें, पढ़ते रहें और यह जान जायँ कि ऐसा कोई विलक्षण पुरुष हुआ है; मरनेके बाद स्वर्ग आदिमें भोग भोगते रहें आदि-आदि लौकिक सुख-प्राप्तिकी कामनाएँ होती हैं। ऐसी कामनाओंसे तो वासना ही बढ़ती है, जिससे बन्धन और पतन ही होता है, उद्धार नहीं होता। यह कामना आसुरी सम्पत्ति है इसलिये यह त्याज्य है। दूसरी कामना दुःख दूर करनेकी है। दुःख तीन प्रकारके हैं—आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक। अतिवृष्टि, अनावृष्टि, सरदी-गरमी, वायु आदिसे जो दुःख होता है, उसको “आधिदैविक” कहते हैं। यह दुःख देवताओंके अधिकारसे होता है। सिंह, साँप, चोर आदि प्राणियोंसे जो दुःख होता है, उसको “आधिभौतिक” कहते हैं। शरीर और अन्तःकरणको लेकर जो दुःख होता है, वह “आध्यात्मिक” होता है।* इन दुःखोंको दूर करनेकी और सुख प्राप्त करनेकी जो कामना होती है, वह सर्वथा निरर्थक है; क्योंकि उस कामनाकी पूर्ति नहीं होती। पूर्ति हो भी जाती है तो दूसरी नयी कामना पैदा हो जाती है और अन्तमें अपूर्ति ही बाकी रहती है। इसलिये इन दोनों कामनाओंकी पूर्ति किसी भी मनुष्यकी कभी भी नहीं हुई, न होती है और न भविष्यमें ही पूरी होनेवाली है।
“कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई॥
(मानस 5। 32। 2)
* आर्त भक्तोंमें द्रौपदी और गजेन्द्रका दृष्टान्त ठीक नहीं बैठता; क्योंकि उन्होंने अपनी रक्षाके लिये अन्य उपायोंका भी
सहारा लिया था, केवल भगवान्का ही नहीं। जबतक अपना दुःख दूर करनेके लिये अन्य उपायोंका सहारा रहता है, अन्य उपायोंकी
तरफ वृत्ति रहती है, तबतक वे अनन्यभक्त नहीं हैं और तभीतक उनपर कष्ट आता है। जब यह अन्यकी तरफसे वृत्ति मिट
जाती है, तब वे भक्त कहलाते हैं और उनपर कष्ट नहीं आता। जैसे, चीर-हरणके समय जबतक द्रौपदीकी दूसरोंकी तरफ
दृष्टि थी, दूसरोंका भरोसा था, अपने बलका सहारा था, तबतक वह कष्ट पाती रही। परन्तु जब दूसरोंकी तरफसे तो क्या,
अपने हाथसे भी साड़ीको नहीं पकड़ा अर्थात् अपने बलका भी सहारा नहीं लिया, तब उसका अनन्यभाव हो गया और उसको
दुःख नहीं पाना पड़ा।
ऐसे ही गजेन्द्रने जबतक हाथियों और हथिनियोंका सहारा लिया, अपने बलका सहारा लिया, तबतक वह वर्षोंतक
दुःख पाता रहा। जब सब सहारा छूट गया, केवल भगवान्का ही सहारा रहा, तब उसको दुःख नहीं पाना पड़ा।
* पाहि पाहि महायोगिन् देवदेव जगत्पते। नान्यं त्वदभयं पश्ये यत्र मृत्युः परस्परम्॥
अभिद्रवति मामीश शरस्तप्तायसो विभो। कामं दहतु मां नाथ मा मे गर्भो निपात्यताम्॥ (श्रीमद्भा0 1। 8। 9-10)
“देवाधिदेव! जगदीश्वर! महायोगिन्! आप मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। आपके सिवाय इस लोकमें मुझे अभय
देनेवाला दूसरा कोई नहीं है; क्योंकि यहाँ सभी आपसमें एक-दूसरेकी मृत्युका कारण बन रहे हैं। प्रभो! सर्वशक्तिमान्! यह
दहकता हुआ लोहेका बाण मेरी तरफ दौड़ा आ रहा है। स्वामिन्! यह मुझे भले ही जला डाले, पर मेरे गर्भको नष्ट न करे।”
1-कामना वह होती है, जो कभी पूरी नहीं होती। एक कामना पूरी होनेपर फिर दूसरी कामना पैदा हो जाती है। जैसे,
धनकी कामना हुई। जितना धन चाहता है, उतना धन मिल जाय तो फिर और अधिक धनकी कामना होती है। धनकी तरह
ही मान-बड़ाईकी, जीनेकी, भोगकी, नीरोगताकी, यश-कीर्तिकी, स्त्री-पुत्रकी आदि-आदि उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंकी
कामना होती है। ये धनादि वस्तुएँ अपनी नहीं हैं, क्योंकि इनमेंसे कोई भी वस्तु स्वयंतक पहुँचती ही नहीं। इनकी कामनापूर्ति
केवल शरीर और नामतक ही पहुँचती है। कामना असत्-विषयकी होती है। कामनापूर्तिके बाद फिर और कामना पैदा हो
जाती है; इस प्रकार अपूर्ति ही बाकी रहती है। अतः कामना त्याज्य है; क्योंकि ये चीजें तो रहेंगी नहीं और उनकी पूर्तिके
लिये की हुई कामना और प्रयत्न—ये दोनों ही निष्फल होंगे।
2-मुक्तिकी अपेक्षा भक्तिकी कामना श्रेष्ठ है; क्योंकि मुक्तिमें स्वयं मुक्त होना चाहता है और भक्तिमें भगवान्के समर्पित
होना चाहता है। तात्पर्य है कि मुक्तिमें लेनेकी इच्छा और भक्तिमें देनेकी इच्छा रहती है। इसलिये मुक्तिमें तो सूक्ष्म अहं रहता
है, पर भक्तिमें अहं बिलकुल नहीं रहता।
* आध्यात्मिक दुःखके दो प्रकार हैं—आधि और व्याधि। मनकी चिन्ता “आधि” है और शरीरका रोग “व्याधि” है। आधि
भी दो तरहकी होती है—(1) पागलपन और (2) चिन्ता, शोक, भय, उद्वेग आदि। पागलपन तो प्रारब्धसे होता है और चिन्ता,
शोक आदि अज्ञानसे होते हैं। ज्ञान होनेपर चिन्ता, शोक आदि तो मिट जाते हैं, पर पागलपन प्रारब्धवशात् हो सकता है।
17श्रीभगवान्
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यतेप्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स मम प्रियः॥ 17॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

पूर्वश्लोकमें वर्णित चारों भक्तोंमेंसे ज्ञानी भक्तकी विशेषताका विशद वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं—

पदच्छेद
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व्याख्या
3 sections
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्तः
उन (अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी) भक्तोंमें ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्त श्रेष्ठ है; क्योंकि वह नित्ययुक्त है अर्थात् वह सदा- सर्वदा केवल भगवान्में ही लगा रहता है। भगवान्के सिवाय दूसरे किसीमें वह किंचिन्मात्र भी नहीं लगता। जैसे गोपियाँ गाय दुहते, दही बिलोते, धान कूटते आदि सभी लौकिक कार्य करते हुए भी भगवान् श्रीकृष्णमें चित्तवाली रहती हैं*, ऐसे ही वह ज्ञानी भक्त लौकिक और पारमार्थिक सब क्रियाएँ करते समय सदा-सर्वदा भगवान्से जुड़ा रहता है। भगवान्का सम्बन्ध रखते हुए ही उसकी सब क्रियाएँ होती हैं।
एकभक्तिर्विशिष्यते
उस ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्तका आकर्षण केवल भगवान्में होता है। उसकी अपनी कोई व्यक्तिगत इच्छा नहीं रहती। इसलिये वह श्रेष्ठ है। अर्थार्थी आदि भक्तोंमें पूर्वसंस्कारोंके कारण जबतक व्यक्तिगत इच्छाएँ उत्पन्न होती रहती हैं, तबतक उनकी एकभक्ति नहीं होती अर्थात् केवल भगवान्में प्रेम नहीं होता। परन्तु उन भक्तोंमें इन इच्छाओंको नष्ट करनेका भाव भी होता रहता है और इच्छाओंके सर्वथा नष्ट होनेपर सभी भक्त भगवान्के प्रेमी और भगवान्के प्रेमास्पद हो जाते हैं। वहाँ भक्त और भगवान्में द्वैतका भाव न रहकर प्रेमाद्वैत (प्रेममें अद्वैत) हो जाता है। ऐसे तो चारों भक्त भगवान्में नित्य-निरन्तर लगे रहते हैं; परन्तु तीन भक्तोंके भीतरमें कुछ-न-कुछ व्यक्तिगत इच्छा रहती है; जैसे—अर्थार्थी भक्त अनुकूलताकी इच्छा करते हैं, आर्त भक्त प्रतिकूलताको मिटानेकी इच्छा करते हैं और जिज्ञासु भक्त अपने स्वरूपको या भगवत्तत्त्वको जाननेकी इच्छा करते हैं। ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्तमें अपनी कोई इच्छा नहीं रहती; अतः वह एकभक्ति है।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः
उस ज्ञानी प्रेमी भक्तको मैं अत्यन्त प्यारा हूँ। उसमें अपनी किंचिन्मात्र भी इच्छा नहीं है, केवल मेरेमें प्रेम है। इसलिये वह मेरेको अत्यन्त प्यारा है। वास्तवमें तो भगवान्का अंश होनेसे सभी जीव स्वाभाविक ही भगवान्को प्यारे हैं। भगवान्के प्यारमें कोई निजी स्वार्थ नहीं है। जैसे माता अपने बच्चोंका पालन करती है, ऐसे ही भगवान् बिना किसी कारणके सबका पालन-पोषण और प्रबन्ध करते हैं। परन्तु जो मनुष्य किसी कारणसे भगवान्के सम्मुख हो जाते हैं, उनकी उस सम्मुखताके कारण भगवान्में उनके प्रति एक विशेष प्रियता हो जाती है। जब भक्त सर्वथा निष्काम हो जाता है अर्थात् उसमें लौकिक-पारलौकिक किसी तरहकी भी इच्छा नहीं रहती, तब उसमें स्वतःसिद्ध प्रेम पूर्णरूपसे जाग्रत् हो जाता है। पूर्णरूपसे जाग्रत् होनेका अर्थ है कि प्रेममें किंचिन्मात्र भी कमी नहीं रहती। प्रेम कभी समाप्त भी नहीं होता; क्योंकि वह अनन्त और प्रतिक्षण वर्धमान है। प्रतिक्षण वर्धमानका तात्पर्य है कि प्रेममें प्रतिक्षण अलौकिक विलक्षणताका अनुभव होता रहता है अर्थात् इधर पहले दृष्टि गयी ही नहीं, इधर हमारा खयाल गया ही नहीं, अभी दृष्टि गयी— इस तरह प्रतिक्षण भाव और अनुभव होता ही रहता है। इसलिये प्रेमको अनन्त बताया गया है।
परिशिष्ट भाव
भगवान्ने अपने प्रेमी भक्तको “ज्ञानी” नामसे इसलिये कहा है कि “सब कुछ परमात्मा ही हैं”—यही वास्तविक और अन्तिम ज्ञान है, इससे आगे कुछ नहीं है। इसलिये ऐसा अनुभव करनेवाला प्रेमी भक्त ही वास्तविक ज्ञानी है (इसी अध्यायका उनतीसवाँ श्लोक)। कारण कि ऐसे भक्तकी दृष्टिमें एक परमात्माके सिवाय दूसरी सत्ता है ही नहीं, जबकि विवेकी पुरुषकी दृष्टिमें सत् और असत्—दो सत्ता रहती है। तात्पर्य है कि यहाँ “ज्ञानी” शब्द जीवन्मुक्त तत्त्वज्ञानीके लिये नहीं आया है, प्रत्युत “वासुदेवः सर्वम्” का अनुभव करनेवाले ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्तके लिये आया है। गीतामें भगवान्ने मुख्य रूपसे भक्तको ही “ज्ञानी” कहा है (इसी अध्यायका सोलहवाँ, सत्रहवाँ और अठारहवाँ श्लोक); क्योंकि वही अन्तिम और असली ज्ञानी है। उसका केवल भगवान्में ही प्रेम होता है, इसलिये वह श्रेष्ठ है— “एकभक्तिर्विशष्यिते”। भगवान्का अर्थार्थी भक्त अनित्ययुक्त (निरन्तर भगवान्में न लगा हुआ) होता है। अर्थार्थीकी अपेक्षा आर्त कम अनित्ययुक्त होता है। आर्तकी अपेक्षा भी जिज्ञासु कम अनित्ययुक्त होता है। परन्तु ज्ञानी सर्वथा नित्ययुक्त होता है। “प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः” पदोंका तात्पर्य है कि “वासुदेवः सर्वम्” का अनुभव होनेपर फिर भक्त और भगवान्—दोनोंमें परस्पर प्रेम-ही-प्रेम शेष रहता है। इसीको शास्त्रोंमें प्रतिक्षण वर्धमान प्रेम, अनन्तरस आदि नामोंसे कहा गया है।
* या दोहनेऽवहनने मथनोपलेपप्रेङ्खेङ्खनार्भरुदितोक्षणमार्जनादौ।
गायन्ति चैनमनुरक्तधियोऽश्रुकण्ठ्यो धन्या व्रजस्त्रिय उरुक्रमचित्तयानाः॥ (श्रीमद्भा0 10। 44। 15)
“जो गौओंका दूध दुहते समय, धान आदि कूटते समय, दही मथते समय, आँगन लीपते समय, बालकोंको पालनेमें
झुलाते समय, रोते हुए बच्चोंको लोरी देते समय, तुलसी आदिको जलसे सींचते समय तथा झाड़ू देने आदि सब कर्मोंको
करते समय प्रेमपूर्ण चित्तसे आँखोंमें आँसू भरकर गद्गद कण्ठसे श्रीकृष्णकी दिव्य लीलाओंका गान करती रहती हैं, वे
श्रीकृष्णमें निरन्तर चित्त लगाये रहनेवाली व्रजवासिनी गोपियाँ धन्य हैं।”
18श्रीभगवान्
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्आस्थितःहि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्॥ 18॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

पूर्वश्लोकमें भगवान्ने ज्ञानी भक्तको अपना अत्यन्त प्यारा बताया, तो इससे यह असर पड़ता है कि भगवान्ने दूसरे भक्तोंका आदर नहीं किया। इसलिये भगवान् आगेके श्लोकमें कहते हैं—

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व्याख्या
4 sections
उदाराः सर्व एवैते
ये सब-के-सब भक्त उदार हैं, श्रेष्ठ भाववाले हैं। भगवान्ने यहाँ जो “उदाराः” शब्दका प्रयोग किया है, उसमें कई विचित्र भाव हैं; जैसे— (1) चौथे अध्यायके ग्यारहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि “भक्त जिस प्रकार मेरे शरण होते हैं, उसी प्रकार मैं उनका भजन करता हूँ।” भक्त भगवान्को चाहते हैं और भगवान् भक्तको चाहते हैं। परन्तु इन दोनोंमें पहले भक्तने ही सम्बन्ध जोड़ा है और जो पहले सम्बन्ध जोड़ता है, वह उदार होता है। तात्पर्य यह है कि भगवान् सम्बन्ध जोड़ें या न जोड़ें, इसकी भक्त परवाह नहीं करता। वह तो अपनी तरफसे पहले सम्बन्ध जोड़ता है और अपनेको समर्पित करता है। इसलिये वह उदार है। (2) देवताओंके भक्त सकामभावसे विधिपूर्वक यज्ञ, दान, तप आदि कर्म करते हैं तो देवताओंको उनकी कामनाके अनुसार वह चीज देनी ही पड़ती है; क्योंकि देवतालोग उनका हित-अहित नहीं देखते। परन्तु भगवान्का भक्त अगर भगवान्से कोई चीज माँगता है तो भगवान् अगर उचित समझें तो वह चीज दे देते हैं अर्थात् देनेसे उसकी भक्ति बढ़ती हो तो दे देते हैं और भक्ति न बढ़ती हो, संसारमें फँसावट होती हो तो नहीं देते। कारण कि भगवान् परम पिता हैं और परम हितैषी हैं। तात्पर्य यह हुआ कि अपनी कामनाकी पूर्ति हो अथवा न हो, तो भी वे भगवान्का ही भजन करते हैं, भगवान्के भजनको नहीं छोड़ते—यह उनकी उदारता ही है। (3) संसारके भोग और रुपये-पैसे प्रत्यक्ष सुखदायी दीखते हैं और भगवान्के भजनमें प्रत्यक्ष जल्दी सुख नहीं दीखता, फिर भी संसारके प्रत्यक्ष सुखको छोड़कर अर्थात् भोग भोगने और संग्रह करनेकी लालसाको छोड़कर भगवान्का भजन करते हैं, यह उनकी उदारता ही है। (4) भगवान्के दरबारमें माँगनेवालोंको भी उदार कहा जाता है—“यहि दरबार दीनको आदर रीति सदा चलि आई।” (विनयपत्रिका 165। 5) अर्थात् कोई कुछ माँगता है, कोई धन चाहता है, कोई दुःख दूर करना चाहता है—ऐसे माँगनेवाले भक्तोंको भी भगवान् उदार कहते हैं, यह भगवान्की विशेष उदारता ही है। (5) भक्तोंका लौकिक-पारलौकिक कामनापूर्तिके लिये अन्यकी तरफ किंचिन्मात्र भी भाव नहीं जाता। वे केवल भगवान्से ही कामनापूर्ति चाहते हैं। भक्तोंका यह अनन्यभाव ही उनकी उदारता है।
ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्
यहाँ “तु” पदसे ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्तकी विलक्षणता बतायी है कि दूसरे भक्त तो उदार हैं ही, पर ज्ञानीको उदार क्या कहें, वह तो मेरा स्वरूप ही है। स्वरूपमें किसी निमित्तसे, किसी कारण- विशेषसे प्रियता नहीं होती, प्रत्युत अपना स्वरूप होनेसे स्वतःस्वाभाविक प्रियता होती है। प्रेममें प्रेमी अपने-आपको प्रेमास्पदपर न्योछावर कर देता है अर्थात् प्रेमी अपनी सत्ता अलग नहीं मानता। ऐसे ही प्रेमास्पद भी स्वयं प्रेमीपर न्योछावर हो जाते हैं। उनको इस प्रेमाद्वैतकी विलक्षण अनुभूति होती है। ज्ञानमार्गका जो अद्वैतभाव है, वह नित्य-निरन्तर अखण्डरूपसे शान्त, सम रहता है। परन्तु प्रेमका जो अद्वैतभाव है, वह एक-दूसरेकी अभिन्नताका अनुभव कराता हुआ प्रतिक्षण वर्धमान रहता है। प्रेमका अद्वैतभाव एक होते हुए भी दो हैं और दो होते हुए भी एक है। इसलिये प्रेम-तत्त्व अनिर्वचनीय है। शरीरके साथ सर्वथा अभिन्नता (एकता) मानते हुए भी निरन्तर भिन्नता बनी रहती है और भिन्नताका अनुभव होनेपर भी भिन्नता बनी रहती है। इसी तरह प्रेमतत्त्वमें भिन्नता रहते हुए भी अभिन्नता बनी रहती है और अभिन्नताका अनुभव होनेपर भी अभिन्नता बनी रहती है। जैसे, नदी समुद्रमें प्रविष्ट होती है तो प्रविष्ट होते ही नदी और समुद्रके जलकी एकता हो जाती है। एकता होनेपर भी दोनों तरफसे जलका एक प्रवाह चलता रहता है अर्थात् कभी नदीका समुद्रकी तरफ और कभी समुद्रका नदीकी तरफ एक विलक्षण प्रवाह चलता रहता है। ऐसे ही प्रेमीका प्रेमास्पदकी तरफ और प्रेमास्पदका प्रेमीकी तरफ प्रेमका एक विलक्षण प्रवाह चलता रहता है। उनका नित्ययोगमें वियोग और वियोगमें नित्ययोग—इस प्रकार प्रेमकी एक विलक्षण लीला अनन्तरूपसे अनन्तकालतक चलती रहती है। उसमें कौन प्रेमास्पद है और कौन प्रेमी है—इसका खयाल नहीं रहता। वहाँ दोनों ही प्रेमास्पद हैं और दोनों ही प्रेमी हैं। यही “ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्” पदोंका तात्पर्य है।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्
क्योंकि जिससे उत्तम गति कोई हो ही नहीं सकती, ऐसे सर्वोपरि मेरेमें ही उसकी दृढ़ स्थिति है।
केवल भगवान् ही मेरे हैं
इस प्रकार मेरेमें उसका जो अपनापन है, उसमें अनुकूलता-प्रतिकूलताको लेकर किंचिन्मात्र भी फरक नहीं पड़ता, प्रत्युत वह अपनापन दृढ़ होता और बढ़ता ही चला जाता है। वह युक्तात्मा है अर्थात् वह किसी भी अवस्थामें मेरेसे अलग नहीं होता, प्रत्युत सदा मेरेसे अभिन्न रहता है।
परिशिष्ट भाव
सांसारिक अर्थार्थी भगवान्को छोड़कर केवल अर्थको ही चाहता है; अतः वह झूठ, कपट, बेईमानी आदिका भक्त होता है। उसके भीतर धनका महत्त्व ज्यादा होनेसे वह उदार नहीं होता, प्रत्युत महान् कृपण होता है। अतः उसके लिये “उदार” शब्द लागू ही नहीं होता। परन्तु जो अर्थार्थी भगवान्का भक्त होता है, उसके भीतर अर्थका महत्त्व न होकर भगवान्का महत्त्व होता है। इसलिये उसमें कृपणता नहीं होती, प्रत्युत उदारता होती है। अतः उसको भगवान्ने यहाँ उदार कहा है। यहाँ उदारभावका अर्थ है—त्याग। अर्थार्थी, आर्त और जिज्ञासु भक्त संसार-(भोग और संग्रह-) को छोड़कर भगवान्में लग गये—यह उनका त्याग है। इसलिये वे सभी उदार हैं—“उदाराः सर्व एवैते।” एकमात्र भगवान्का सम्बन्ध मुख्य होनेसे अर्थार्थी, आर्त और जिज्ञासु भी आगे चलकर स्वतः “ज्ञानी” हो जाते हैं। एक मार्मिक बात है कि भगवान्को न मानना कामनासे भी अधिक दोषी है। जो भगवान्को छोड़कर अन्य देवताओंकी उपासना करते हैं, उनमें यदि कामना रह जाय तो वे जन्म-मरणको प्राप्त होते हैं—“गतागतं कामकामा लभन्ते” (गीता 9। 21)। परन्तु जो केवल भगवान्का ही भजन करते हैं, उनमें यदि कामना रह भी जाय तो भगवान्की कृपा और भजनके प्रभावसे वे भगवान्को ही प्राप्त होते हैं। कारण कि मनुष्यका किसी भी तरहसे भगवान्के साथ सम्बन्ध जुड़ जाय तो वह भगवान्को ही प्राप्त होता है*; क्योंकि वह मूलमें भगवान्का ही अंश है। अर्थार्थी, आर्त और जिज्ञासु—इन तीनोंको ही भगवान्ने यहाँ “उदार” कहा है। परन्तु जो भगवान्के सिवाय अन्यका भजन करनेवाले हैं, उनको भगवान्ने उदार न कहकर “अल्पमेधा” कहा है (गीता—इसी अध्यायका तेईसवाँ श्लोक) और उनके भजनको अविधिपूर्वक किया गया बताया है (गीता—नवें अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)। देवताओंको भगवान्से अलग समझनेके कारण अर्थात् देवताओंमें भगवद्बुद्धि न होनेके कारण तथा कामना भी होनेके कारण उनकी उपासना अविधिपूर्वक है। तात्पर्य है कि सबमें भगवद्बुद्धि न होना सकामभावसे भी अधिक घातक है; क्योंकि चेतनके साथ सम्बन्ध नहीं हुआ! तत्त्वज्ञानीकी ब्रह्मसे “तात्त्विक एकता” अर्थात् सधर्मता होती है; परन्तु भक्तकी भगवान्के साथ “आत्मीय एकता” होती है—“ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्”। तत्त्वज्ञानीकी तात्त्विक एकता-(सधर्मता-) में जीव और ब्रह्ममें अभेद हो जाता है अर्थात् जैसे ब्रह्म सत्-चित्-आनन्दस्वरूप है, ऐसे वह भी सत्-चित्-आनन्दस्वरूप हो जाता है और एक तत्त्वके सिवाय कुछ नहीं रहता। परन्तु भक्तकी आत्मीय एकतामें जीव और भगवान्में अभिन्नता हो जाती है। अभिन्नतामें भक्त और भगवान् एक होते हुए भी प्रेमके लिये दो हो जाते हैं। उनमें दोनों ही प्रेमी और दोनों ही प्रेमास्पद होते हैं। इसलिये वे दो होते हुए भी एक ही रहते हैं। जीव परमात्माका अंश है। अतः वह परमात्मासे जितना-जितना दूर जाता है, उतना-उतना अहंकार दृढ़ होता जाता है और वह ज्यों-ज्यों परमात्माकी तरफ आता है, त्यों-त्यों अहंकार मिटता जाता है। स्वरूपमें स्थित होनेपर भी सूक्ष्म अहम्की गन्ध रह सकती है। परन्तु प्रेममें परमात्माके साथ अभिन्नता (आत्मीयता) होनेपर जीवका अपरा प्रकृतिसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और अहंकार सर्वथा मिट जाता है, क्योंकि अहंकार अपरा प्रकृतिका ही कार्य है। इसलिये भगवान्ने कहा है—“ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्”। अर्थार्थी, आर्त और जिज्ञासुमें क्रमशः अपनी स्वतन्त्र सत्ता (अहंता) कम होती जाती है और ज्ञानीमें अपनी स्वतन्त्र सत्ता बिलकुल नहीं रहती। इसलिये “त्वात्मैव” पदका तात्पर्य है कि प्रेमी भक्तकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रही, प्रत्युत केवल भगवान् ही रहे अर्थात् प्रेमीके रूपमें साक्षात् भगवान् ही हैं—“तस्मिंस्तज्जने भेदाभावात्” (नारद0 41)। यह आत्मीयता भक्तिके लिये स्वीकृत द्वैत है, जो ज्ञानयोगके अद्वैतसे भी सुन्दर है—“भक्त्यर्थं कल्पितं (स्वीकृतं) द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम्” 1 (बोधसार, भक्ति0 42)। “मामेवानुत्तमां गतिम्”—भगवान्से बढ़कर उत्तम गति और कोई नहीं है। “गति” शब्दके तीन अर्थ होते हैं—ज्ञान, गमन और प्राप्ति। यहाँ “गति” शब्द प्राप्तिके अर्थमें आया है। अन्तिम प्रापणीय तत्त्व होनेसे भगवान् सर्वोत्तम गति हैं। “आस्थितः”—एक दृढ़ता अभ्याससे होती है और एक दृढ़ता स्वतः होती है। जैसे मात्र प्राणियोंकी “मैं हूँ”— इस प्रकार अपने-आपमें स्वतः दृढ़ स्थिति होती है, ऐसे ही ज्ञानी भक्तकी भगवान्में स्वतः दृढ़ स्थिति होती है।
* कामाद् द्वेषाद् भयात् स्नेहाद् यथा भक्त्येश्वरे मनः। आवेश्य तदघं हित्वा बहवस्तद्गतिं गताः॥
(श्रीमद्भा0 7। 1। 29)
“एक नहीं, अनेक मनुष्य कामसे, द्वेषसे, भयसे और स्नेहसे अपने मनको भगवान्में लगाकर तथा अपने सारे पाप धोकर
वैसे ही भगवान्को प्राप्त हुए हैं, जैसे भक्त भक्तिसे।”
19श्रीभगवान्
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यतेवासुदेवः सर्वमिति महात्मा सुदुर्लभः॥ 19॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

पूर्वश्लोकमें कहे हुए ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्तकी वास्तविकता और उसके भजनका प्रकार आगेके श्लोकमें बताते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
11 sections
बहूनां जन्मनामन्ते
मनुष्यजन्म सम्पूर्ण जन्मोंका अन्तिम जन्म है। भगवान्ने जीवको मनुष्यशरीर देकर उसे जन्म-मरणके प्रवाहसे अलग होकर अपनी प्राप्तिका पूरा अधिकार दिया है। परन्तु यह मनुष्य भगवान्को प्राप्त न करके रागके कारण फिर पुराने प्रवाहमें अर्थात् जन्म-मरणके चक्करमें चला जाता है। इसलिये भगवान् कहते हैं—“अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसार- वर्त्मनि” (गीता 9। 3)। जहाँ भगवान् आसुरी योनियों और नरकोंके अधिकारियोंका वर्णन करते हैं, वहाँ दुर्गुण- दुराचारोंके कारण भगवत्प्राप्तिकी सम्भावना न दीखनेपर भी भगवान् कहते हैं—“मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्” (गीता 16। 20) अर्थात् मेरेको प्राप्त किये बिना ही ये प्राणी अधम गतिको चले गये अर्थात् वे मरनेके बाद मनुष्ययोनिमें भी चले जाते तो कम-से-कम मनुष्य तो रह जाते; पर वे मेरी प्राप्तिका पूरा अधिकार प्राप्त करके भी अधम गतिको चले गये! संतोंकी वाणीमें और शास्त्रोंमें आता है कि मनुष्यजन्म केवल अपना कल्याण करनेके लिये मिला है, विषयोंका सुख भोगनेके लिये तथा स्वर्गकी प्राप्तिके लिये नहीं2। इसलिये गीताने स्वर्गकी प्राप्ति चाहनेवालोंको मूढ़ और तुच्छ बुद्धिवाले कहा है—“अविपश्चितः” (2। 42) और “अल्पमेधसाम्” (7। 23)। यह मनुष्यजन्म सम्पूर्ण जन्मोंका आदि जन्म भी है और अन्तिम जन्म भी है। सम्पूर्ण जन्मोंका आरम्भ मनुष्यजन्मसे ही होता है अर्थात् मनुष्यजन्ममें किये हुए पाप चौरासी लाख योनियों और नरकोंमें भोगनेपर भी समाप्त नहीं होते, बाकी ही रहते हैं, इसलिये यह सम्पूर्ण जन्मोंका आदि जन्म है। मनुष्यजन्ममें सम्पूर्ण पापोंका नाश करके, सम्पूर्ण वासनाओंका नाश करके अपना कल्याण कर सकते हैं, भगवान्को प्राप्त कर सकते हैं, इसलिये यह सम्पूर्ण जन्मोंका अन्तिम जन्म है। भगवान्ने आठवें अध्यायके छठे श्लोकमें कहा है कि “जो मनुष्य अन्त-समयमें जिस-जिस भावका स्मरण करते हुए शरीर छोड़कर जाता है, उस-उस भावको ही वह प्राप्त होता है।” इस तरह मनुष्यको जिस किसी भावका स्मरण करनेमें जो स्वतन्त्रता दी गयी है, इससे मालूम होता है कि भगवान्ने मनुष्यको पूरा अधिकार दिया है अर्थात् मनुष्यके उद्धारके लिये भगवान्ने अपनी तरफसे यह अन्तिम जन्म दिया है। अब इसके आगे यह नये जन्मकी तैयारी कर ले अथवा अपना उद्धार कर ले—इसमें यह सर्वथा स्वतन्त्र है*। इस बातको लेकर गीता मनुष्यमात्रको परमात्मप्राप्तिका अधिकारी मानती है और डंकेकी चोटके साथ, खुले शब्दोंमें कहती है कि वर्तमानका दुराचारी-से-दुराचारी, पूर्वजन्मके पापोंके कारण नीच योनिमें जन्मा हुआ पापयोनि और चारों वर्णवाले स्त्री-पुरुष—ये सभी भगवान्का आश्रय लेकर परमगतिको प्राप्त हो सकते हैं (गीता—नवें अध्यायके तीसवेंसे तैंतीसवें श्लोकतक)। गीताने (नवें अध्यायके बत्तीसवें श्लोकमें) ऐसा विचित्र “पापयोनि” शब्द कहा है, जिसमें शूद्रसे भी नीचे कहे और माने जानेवाले चाण्डाल, यवन आदि तथा पशु-पक्षी, कीट-पतंग, वृक्ष-लता आदि सभी लिये जा सकते हैं। हाँ, यह बात अलग है कि पशु-पक्षी आदि मनुष्येतर प्राणियोंमें परमात्माकी तरफ मनुष्य भगवान्से विमुख होकर संसारके रागमें न फँसे, तो भगवान्के उस संकल्पसे अनायास ही मुक्त हो जाय। भगवान्का संकल्प ऐसा नहीं है कि साधककी इच्छाके बिना उसका कल्याण हो जाय अर्थात् जैसे शाप या वरदान दिया जाता है, वैसा यह संकल्प नहीं है। तो फिर कैसा है यह संकल्प? भगवान्ने मनुष्यको अपना कल्याण करनेकी स्वतन्त्रता इस मनुष्यजन्ममें दी है। अगर यह प्राणी उस स्वतन्त्रताका दुरुपयोग न करे अर्थात् भगवान् और शास्त्रोंसे विपरीत न चले, कम-से-कम अपने विवेकके विरुद्ध न चले तो उससे भगवान् और शास्त्रोंके अनुकूल चलना स्वाभाविक होगा। कारण कि भगवान् और शास्त्रोंसे विपरीत न चलनेपर दो अवस्थाओंमेंसे एक अवस्था स्वाभाविक होगी—या तो वह शरीर-इन्द्रियाँ-मन- बुद्धिसे कुछ नहीं करेगा या केवल भगवान् और शास्त्रके अनुकूल ही करेगा। कुछ नहीं करनेकी अवस्थामें अर्थात् कुछ करनेकी रुचि न रहनेकी अवस्थामें मन, बुद्धि, इन्द्रियों आदिके साथ चलनेकी योग्यता नहीं है; परन्तु परमात्माके अंश होनेसे उनके लिये परमात्माकी तरफसे मना नहीं है। उनमेंसे बहुत-से प्राणी भगवान् और संत-महापुरुषोंकी कृपासे तथा तीर्थ और भगवद्धामके प्रभावसे परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं। देवता भोगयोनि हैं; वे भोगोंमें ही लगे रहते हैं, इसलिये उनको “अपना उद्धार करना है” ऐसा विचार नहीं होता। परन्तु वे अगर किसी कारणसे भगवान्की तरफ लग जायँ तो उनका भी उद्धार हो जाता है। इन्द्रको भी ज्ञान प्राप्त हुआ था—ऐसा शास्त्रोंमें आता है। भगवान्की तरफसे मनुष्यमात्रका जन्म अन्तिम जन्म है। कारण कि भगवान्का यह संकल्प है कि मेरे दिये हुए इस शरीरसे यह अपना कल्याण कर ले। अतः यह अपना कोई संकल्प न रखकर केवल निमित्तमात्र बन जाय, तो भगवान्के संकल्पसे इसका कल्याण हो जाय। जैसे ग्यारहवें अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा है—मेरे द्वारा मारे हुएको ही तू मार दे—“मया हतांस्त्वं जहि”। तू चिन्ता मत कर—“मा व्यथिष्ठाः।” तू युद्ध कर, तेरी विजय होगी—“युध्यस्व जेतासि।” इसी तरहसे भगवान्ने कृपा करके मनुष्यशरीर दिया है। अगर करनेकी इच्छासे ही कर्तृत्वाभिमान उत्पन्न होकर अन्तःकरण और इन्द्रियोंके साथ सम्बन्ध जुड़ता है और अपने लिये करनेसे फलके साथ सम्बन्ध जुड़ता है। कुछ भी न करनेसे न कर्तृत्व-अभिमान होगा और न फलेच्छा होगी, प्रत्युत स्वरूपमें स्वतः स्थिति होगी। शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार निष्कामभावपूर्वक कर्म करनेकी अवस्थामें करनेका प्रवाह मिट जाता है और क्रिया तथा पदार्थसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। क्रिया और पदार्थसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेसे नयी कामना होगी नहीं और पुराना राग मिट जायगा तो स्वतः बोध हो जायगा— “तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति” (गीता 4। 32)। गीतामें आया है—निष्कामभावसे विधिपूर्वक अपने कर्तव्यकर्मका पालन किया जाय तो अनादिकालसे बने हुए सम्पूर्ण कर्म नष्ट हो जाते हैं (चौथे अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)। ज्ञानयोगसे मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे तर जाता है (चौथे अध्यायका छत्तीसवाँ श्लोक)। भगवान् भक्तको सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर देते हैं (अठारहवें अध्यायका छाछठवाँ श्लोक)। जो भगवान्को अज-अनादि जानता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है (दसवें अध्यायका तीसरा श्लोक)। इस प्रकार कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनों योगोंसे पाप नष्ट हो जाते हैं। तात्पर्य यह निकला कि अन्तिम मनुष्यजन्म केवल कल्याणके लिये ही मिला है। मनुष्यजन्ममें सत्संग मिल जाय, गीता-जैसे ग्रन्थसे परिचय हो जाय, भगवन्नामसे परिचय हो जाय तो साधकको यह समझना चाहिये कि भगवान्ने बहुत विशेषतासे कृपा कर दी है; अतः अब तो हमारा उद्धार होगा ही, अब आगे हमारा जन्म-मरण नहीं होगा। कारण कि अगर हमारा उद्धार नहीं होना होता, तो ऐसा मौका नहीं मिलता। परन्तु
भगवान्की कृपासे उद्धार होगा ही
इसके भरोसे साधन नहीं छोड़ना चाहिये, प्रत्युत तत्परता और उत्साहपूर्वक साधनमें लगे रहना चाहिये। समय सार्थक बने, कोई समय खाली न जाय—ऐसी सावधानी हरदम रखनी चाहिये। परन्तु अपने कल्याणकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये; क्योंकि अबतक जिसने इतना प्रबन्ध किया है, वही आगे भी करेगा। जैसे, किसीने भोजनके लिये निमन्त्रण दे दिया, आसन बिछा दिया, आसनपर बैठा दिया, पत्तल दे दी, लोटेमें जल भरकर पासमें रख दिया। अब कोई चिन्ता करे कि यह व्यक्ति भोजन देगा कि नहीं देगा, तो यह बिलकुल गलतीकी बात है। कारण कि अगर भोजन नहीं देना होता तो वह निमन्त्रण क्यों देता? भोजनकी तैयारी क्यों करता? परन्तु जब उसने निमन्त्रण दिया है, बुलाया है, तैयारी की है, तब उसको भोजन देना ही पड़ेगा। हम भोजनकी चिन्ता क्यों करें? अब तो बस, ज्यों-ज्यों भोजनके पदार्थ आयें, त्यों-त्यों उनको पाते जायँ। ऐसे ही भगवान्ने हमको मनुष्यशरीर दिया है और उद्धारकी सब सामग्री (सत्संग, भगवन्नाम आदि) जुटा दी है, तो हमारा उद्धार होगा ही, अब तो हम संसार-समुद्रके किनारे आ गये हैं—ऐसा दृढ़ विश्वास करके निमित्तमात्र बनकर साधन करना चाहिये। जिसके पूर्वजन्मोंके पुण्य होते हैं, वही भगवान्की तरफ चल सकता है—अगर ऐसा माना जाय तो पूर्वजन्मोंके पाप-पुण्योंका फल तो पशु-पक्षी-कीट-पतंग आदि योनि- वाले प्राणी भोगते ही हैं, फिर मनुष्यमें और उन प्राणियोंमें क्या फरक रहेगा? भगवान्का कृपा करके मनुष्यशरीर देना कहाँ सार्थक होगा? तथा मनुष्यजन्मकी विलक्षणता, महिमा क्या होगी? मनुष्यजन्मकी महिमा तो इसीमें है कि मनुष्य भगवान्का आश्रय लेकर अपने कल्याणके मार्गमें लग जाय।1 “वासुदेवः सर्वम्” 2—महासर्गके आदिमें एक भगवान् ही अनेक रूपोंमें हो जाते हैं—“सदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति” (छान्दोग्य0 6। 2। 3) और अन्तमें अर्थात् महाप्रलयमें एक भगवान् ही शेष रह जाते हैं—“शिष्यते शेषसंज्ञः” (श्रीमद्भा0 10। 3। 25)। इस प्रकार जब आदि और अन्तमें एक भगवान् ही रहते हैं, तब बीचमें दूसरा कहाँसे आया? क्योंकि संसारकी रचना करनेमें भगवान्के पास अपने सिवाय कोई सामग्री नहीं थी, वे तो स्वयं संसारके रूपसे प्रकट हुए हैं। इसलिये यह सब वासुदेव ही है। जो चीज आदि और अन्तमें होती है, वही चीज मध्यमें भी होती है। जैसे, सोनेके गहने आदिमें सोना थे और अन्तमें सोना रहेंगे, तो गहनोंमें दूसरी चीज कहाँसे आयेगी? केवल सोना-ही-सोना है। मिट्टीसे बननेवाले बर्तन पहले मिट्टी थे और अन्तमें मिट्टी हो जायँगे, तो बीचमें मिट्टीके सिवाय क्या है? केवल मिट्टी-ही-मिट्टी है। खाँड़से बने हुए खिलौने पहले खाँड़ थे और अन्तमें खाँड़ ही हो जायँगे, तो बीचमें खाँड़के सिवाय क्या है? केवल खाँड़-ही-खाँड़ है। इसी तरह सृष्टिके पहले भगवान् थे और अन्तमें भगवान् ही रहेंगे; तो बीचमें भगवान्के सिवाय क्या है? केवल भगवान्-ही-भगवान् हैं। जैसे सोनेको चाहे गहनोंके रूपमें देखें, चाहे पासेके रूपमें देखें, चाहे वरकके रूपमें देखें, है वह सोना ही। ऐसे ही संसारमें अनेक रूपोंमें, अनेक आकृतियोंमें एक भगवान् ही हैं। जबतक मनुष्यकी दृष्टि गहनोंकी तरफ, उसकी आकृतियोंकी तरफ रहती है, उसीको महत्त्व देती है, तबतक “यह सोना ही है” इस तरफ उसकी दृष्टि नहीं जाती। ऐसे ही जबतक मनुष्यकी दृष्टि संसारकी तरफ रहती है, उसीको महत्त्व देती है, तबतक “सब कुछ भगवान् ही हैं” इस तरफ उसकी दृष्टि नहीं जाती। परन्तु जब गहनोंकी तरफ दृष्टि नहीं रहती, तब गहनोंमें सोनेकी भावना नहीं होती, प्रत्युत “यह सोना ही है” ऐसी भावना होती है। ऐसे ही जब संसारकी तरफ दृष्टि नहीं रहती, तब संसारमें भगवान्की भावना नहीं होती, प्रत्युत “सब कुछ भगवान् ही हैं, भगवान्के सिवाय दूसरा कुछ है ही नहीं” ऐसी भावना होती है। कारण कि संसारमें भगवान्की भावना करनेसे संसारकी सत्ता साथमें रहती है अर्थात् संसारकी भावना रखते हुए उसकी सत्ता मानते हुए, उसमें भगवान्की भावना करते हैं। अतः जबतक संसारकी सत्ता मानते हैं, संसारको महत्त्व देते हैं, तबतक संसारमें भगवान्की भावना करते रहनेपर भी “वासुदेवः सर्वम्” का अनुभव नहीं होता। ब्रह्मभूत मनुष्य निर्वाण ब्रह्मको प्राप्त होता है (पाँचवें अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक); ब्रह्मभूत योगीको उत्तम सुख मिलता है (छठे अध्यायका सत्ताईसवाँ श्लोक); ब्रह्मभूत भगवान्की पराभक्तिको प्राप्त होता है और उस भक्तिसे तत्त्वको जानकर उसमें प्रवेश करता है (अठारहवें अध्यायका चौवनवाँ-पचपनवाँ श्लोक)— गीताकी दृष्टिसे ये तीनों ही अवस्थाएँ हैं। अवस्थाओंमें परिवर्तन होता है। परन्तु
वासुदेवः सर्वम्
यह अवस्था नहीं है, प्रत्युत वास्तविक तत्त्व है। इसमें कभी परिवर्तन नहीं होता। यह जो कुछ संसार दीखता है, सब भगवान्का ही स्वरूप है। भगवान्के सिवाय इस संसारकी स्वतन्त्र सत्ता थी नहीं, है नहीं और कभी होगी भी नहीं। अतः देखने, सुनने और समझनेमें जो कुछ संसार आता है, वह सब- का-सब भगवत्स्वरूप ही है। भगवान्की आज्ञा है— मनसा वचसा दृष्ट्या गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियैः। अहमेव न मत्तोऽन्यदिति बुध्यध्वमंजसा॥ “मनसे, वाणीसे, दृष्टिसे तथा अन्य इन्द्रियोंसे भी जो कुछ ग्रहण किया जाता है, वह सब मैं ही हूँ। मुझसे भिन्न और कुछ नहीं है। यह सिद्धान्त आपलोग विचारपूर्वक समझ लीजिये।” इस आज्ञाके अनुसार ही उस ज्ञानी अर्थात् प्रेमीका जीवन हो जाता है। वह सब जगह भगवान्को ही देखता है—“यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति” (गीता 6। 30)। वह सब कुछ करता हुआ भी भगवान्में ही रहता है—“सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते” (गीता 6। 31)। किसीको एक जगह भी अपनी प्रिय वस्तु मिल जाती है, तो उसको बड़ी प्रसन्नता होती है, फिर जिसको सब जगह ही अपने प्यारे इष्टदेवका अनुभव होता है,* उसकी प्रसन्नताका, आनन्दका क्या ठिकाना? उस आनन्दमें विभोर होकर भगवान्का प्रेमी भक्त कभी हँसता है, कभी रोता है, कभी नाचता है और कभी चुप होकर शान्त हो जाता है।* इस तरह उसका जीवन अलौकिक आनन्दसे परिपूर्ण हो जाता है। फिर उसके लिये कुछ भी करना, जानना और पाना बाकी नहीं रहता। वह सर्वथा पूर्ण हो जाता है अर्थात् उसके लिये किसी भी अवस्थामें, किसी भी परिस्थितिमें कुछ भी प्राप्त करना बाकी नहीं रहता। जो भक्तिमार्गपर चलता है, वह “यह सत् है और यह असत् है” इस विवेकको लेकर नहीं चलता। उसमें विवेक- ज्ञानकी प्रधानता नहीं रहती। उसमें केवल भगवद्भावकी ही प्रधानता रहती है। केवल भगवद्भावकी प्रधानता रहनेके कारण उसके लिये यह सब संसार चिन्मय हो जाता है। उसकी दृष्टिमें जडता रहती ही नहीं। भगवान्में तल्लीनता होनेसे भक्तका शरीर भी जड नहीं रहता, प्रत्युत चिन्मय हो जाता है, जैसे—मीराबाईका शरीर (चिन्मय होनेसे) भगवान्के विग्रहमें लीन हो गया था। ज्ञानमार्गमें जहाँ सत्-असत्का विवेक होता है, वहाँ परिणाममें सत्-असत् दोकी सत्ता नहीं रहती, केवल सत्- स्वरूप ही रह जाता है। परन्तु भक्तिमार्गमें सत्-असत् सब कुछ भगवत्स्वरूप ही हो जाता है। फिर भक्त भगवत्स्वरूप संसारकी सेवा करता है। सेवामें पहले तो सेवक, सेवा और सेव्य—ये तीन होते हैं। परन्तु जब भगवद्भावकी अत्यधिक गाढ़ता हो जाती है, तब सेवक-भावकी विस्मृति हो जाती है। फिर भक्त स्वयं सेवारूप होकर सेव्यमें लीन हो जाता है। केवल एक भगवत्तत्त्व ही शेष रह जाता है। इस तरह भगवद्भावमें तल्लीन हुए भगवान्के प्रेमी भक्त जहाँ-कहीं भी विचरते हैं, वहाँ उनके दर्शन, स्पर्श, भाषण आदिका प्राणियोंपर बड़ा असर पड़ता है। जबतक मनुष्योंकी पदार्थोंमें भोगबुद्धि रहती है, तबतक उनको उन पदार्थोंका वास्तविक स्वरूप समझमें नहीं आता। परन्तु जब भोगबुद्धि सर्वथा हट जाती है, तब केवल भगवत्स्वरूप ही देखनेमें आ जाता है। मार्मिक बात
वासुदेवः सर्वम्
इस तत्त्वको समझनेके दो प्रकार हैं—(1) संसारका अभाव करके परमात्माको रखना अर्थात् संसार नहीं है और परमात्मा है, (2) सब कुछ भगवान्-ही-भगवान् हैं। इसमें जो परिवर्तन दीखता है, वह भी भगवान्का ही स्वरूप है; क्योंकि भगवान्के सिवाय उसकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। उपर्युक्त दोनों ही प्रकार साधकोंके लिये हैं। जिस साधकका पदार्थोंको लेकर संसारमें आकर्षण (राग) है, उसको
यह सब कुछ नहीं है, केवल परमात्मा ही है
इस प्रणालीको अपनाना चाहिये। जिस साधकका पदार्थोंको लेकर संसारमें किंचिन्मात्र भी आकर्षण नहीं है और जो केवल भगवान्के स्मरण, चिन्तन, जप, कीर्तन आदिमें लगा रहता है, उसको
संसाररूपसे सब कुछ भगवान् ही हैं
इस प्रणालीको अपनाना चाहिये। वास्तवमें देखा जाय तो ये दोनों प्रणालियाँ तत्त्वसे एक ही हैं। इन दोनोंमें फरक इतना ही है कि जैसे सोनेमें गहने और गहनोंके नाम, रूप, आकृति आदि अलग-अलग होते हुए भी सब कुछ सोना- ही-सोना जानना। जहाँपर संसारका अभाव करके परमात्माको तत्त्वसे जानना है, वहाँ “विवेक” की प्रधानता है; और जहाँ संसारको भगवत्स्वरूप मानना है, वहाँ “भाव” की प्रधानता है। निर्गुणके उपासकोंमें विवेककी प्रधानता होती है और सगुणके उपासकोंमें भावकी प्रधानता होती है। संसारका अभाव करके परमात्मतत्त्वको जानना भी तत्त्वसे जानना है और संसारको भगवत्स्वरूप मानना भी तत्त्वसे जानना है। कारण कि वास्तवमें तत्त्व एक ही है। फरक इतना ही है कि ज्ञानमार्गमें जाननेकी प्रधानता रहती है और भक्तिमार्गमें माननेकी प्रधानता रहती है। इसलिये भगवान्ने ज्ञानमार्गमें माननेको भी जाननेके अर्थमें लिया है—“इति मत्वा न सज्जते” (गीता 3। 28), और भक्तिमार्गमें जाननेको भी माननेके अर्थमें लिया है (पाँचवें अध्यायका उनतीसवाँ, नवें अध्यायका तेरहवाँ, दसवें अध्यायका तीसरा, सातवाँ, चौबीसवाँ, सत्ताईसवाँ और इकतालीसवाँ श्लोक)। इसमें एक खास बात समझनेकी है कि परमात्माको जानना और मानना—दोनों ही ज्ञान हैं तथा संसारको सत्ता देकर संसारको जानना और मानना— दोनों ही अज्ञान हैं। संसारको तत्त्वसे जाननेपर संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव हो जाता है, और परमात्माको तत्त्वसे जाननेपर परमात्माका अनुभव हो जाता है। ऐसे ही संसार भगवत्स्वरूप है—ऐसा दृढ़तासे माननेपर संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव हो जाता है और फिर संसार संसार-रूपसे न दीखकर भगवत्स्वरूप दीखने लग जाता है। तात्पर्य है कि परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेपर जानना और मानना—दोनों एक हो जाते हैं।
इति ज्ञानवान्मां प्रपद्यते
जो प्रतिक्षण बदलने- वाले संसारकी सत्ताको मानते हैं, वे अज्ञानी हैं, मूढ़ हैं; परन्तु जिनकी दृष्टि कभी न बदलनेवाले भगवत्तत्त्वकी तरफ रहती है, वे ज्ञानवान् हैं, असम्मूढ़ हैं। “ज्ञानवान्” कहनेका तात्पर्य है कि वह तत्त्वसे समझता है कि सब जगह, सबमें और सबके रूपमें वस्तुतः एक भगवान् ही हैं। ऐसे ज्ञानवान्को ही आगे पन्द्रहवें अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें “सर्ववित्” कहा गया है। ज्ञानवान्की शरणागति अर्थार्थी, आर्त और जिज्ञासु भक्तोंकी तरह नहीं है। भगवान्ने ज्ञानीको अपनी आत्मा बताया है—“ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्” (गीता 7। 18)। जब ज्ञानी भगवान्की आत्मा हुआ तो ज्ञानीकी आत्मा भगवान् हुए। अतः एक भगवत्तत्त्वके सिवाय दूसरी सत्ता ही नहीं रही। इसलिये ज्ञानीकी शरणागति उन तीनों भक्तोंसे विलक्षण होती है। उसके अनुभवमें एक भगवत्तत्त्वके सिवाय कोई दूसरी सत्ता होती ही नहीं—यही उसकी शरणागति है। भगवान्की दृष्टिमें अपने सिवाय कोई अन्य तत्त्व है ही नहीं—“मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव” (गीता 7। 7)। जैसे सूतकी मालामें मणियोंकी जगह सूतकी गाँठ लगा दी, तो मालामें सूतके सिवाय अन्य क्या रहा? केवल सूत ही रहा। हाँ, दीखनेमें गाँठें अलग दीखती हैं और धागा अलग दीखता है; परन्तु तत्त्वसे एक ही चीज (सूत) है। ऐसे ही परमात्मा संसारमें व्यापक दीखते हैं; परन्तु तत्त्वसे परमात्मा और संसार एक ही है। उनमें व्याप्य-व्यापकका भाव नहीं है। अतः सब कुछ एक वासुदेव ही है—ऐसा जिसको अनुभव होता है, वह भी भगवत्स्वरूप ही हुआ। भगवत्स्वरूप हो जाना ही उसकी शरणागति है।
स महात्मा सुदुर्लभः
बहुत-से मनुष्य तो “हमें परमात्माकी प्राप्ति करनी है” इस तरफ दृष्टि ही नहीं डालते और ऐसा चाहते ही नहीं। जो इस तरफ दृष्टि डालते हैं, वे भी उत्कण्ठापूर्वक अनन्यभावसे अपने जीवनको सफल करनेमें नहीं लगते। जो अपना कल्याण करनेमें लगते हैं, वे भी मूर्खताके कारण परमात्मप्राप्तिसे निराश होकर अपने असली अवसरको खो देते हैं, जिससे वे परम लाभसे वंचित रह जाते हैं। इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि मनुष्योंमें हजारों और हजारोंमें कोई एक मनुष्य वास्तविक सिद्धिके लिये यत्न करता है। यत्न करनेवाले उन सिद्धोंमें भी कोई एक मनुष्य “सब कुछ वासुदेव ही है” ऐसा तत्त्वसे जानता है। ऐसा तत्त्वसे जाननेवाला महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि परमात्मा दुर्लभ हैं, प्रत्युत सच्चे हृदयसे परमात्मप्राप्तिके लिये लगनेवाले दुर्लभ हैं। सच्चे हृदयसे परमात्मप्राप्तिके लिये लगनेपर मनुष्यमात्रको परमात्मप्राप्ति हो सकती है; क्योंकि उसकी प्राप्तिके लिये ही मनुष्य-शरीर मिला है। संसारमें सब-के-सब मनुष्य धनी नहीं हो सकते। सांसारिक भोग-सामग्री सबको समान रीतिसे नहीं मिल सकती। परन्तु जो परमात्मतत्त्व भगवान् शंकरको प्राप्त है, सनकादिकोंको प्राप्त है, नारद, वसिष्ठ आदि देवर्षि- महर्षियोंको प्राप्त है, वही तत्त्व सब मनुष्योंको समानरूपसे अवश्य प्राप्त हो सकता है। इसलिये मनुष्यको ऐसा दुर्लभ अवसर कभी नहीं खोना चाहिये। भगवान्की यह एक अलौकिक विलक्षणता है कि वे भूखेके लिये अन्नरूपसे, प्यासेके लिये जलरूपसे और विषयीके लिये शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध-रूपसे बनकर आते हैं। वे ही मन-बुद्धि-इन्द्रियाँ बनकर आते हैं। वे ही संकल्प-विकल्प बनकर आते हैं। वे ही व्यक्ति बनकर आते हैं। परन्तु साथ-ही-साथ दुःख-रूपसे आकर मनुष्यको चेताते हैं कि अगर तुम इन वस्तुओंको भोग्य मानकर इनके भोक्ता बनोगे, तो इसके फलस्वरूप तुमको दुःख-ही-दुःख भोगना पड़ेगा। इसलिये मनुष्यको शर्म आनी चाहिये कि मैं भगवान्को भोग-सामग्री बनाता हूँ, मेरे सुखके लिये भगवान्को सुखकी सामग्री बनना पड़ता है! भगवान् कितने विचित्र दयालु हैं कि यह प्राणी जो चाहता है, भगवान् वैसे ही बन जाते हैं! देखने, सुनने और समझनेमें जो कुछ आ रहा है, और जो मन-बुद्धि-इन्द्रियोंका विषय नहीं है, वह सब भगवान् ही हैं और भगवान्का ही है—ऐसा मान ले, वास्तविकतासे अनुभव कर ले तो मनुष्य विलक्षण हो जाता है, “स महात्मा सुदुर्लभः” हो जाता है। एक वैरागी बाबाजी थे। वे गणेशजीका पूजन किया करते थे। उनके पास सोनेकी बनी हुई एक गणेशजीकी और एक चूहेकी मूर्ति थी। वे दोनों मूर्तियाँ तौलमें बराबर थीं। एक बार बाबाजीने तीर्थोंमें जानेका विचार किया और वे उन मूर्तियोंकी बिक्री करनेके लिये सुनारके पास गये। सुनारने उन दोनों मूर्तियोंको तौलकर दोनोंके बराबर दाम बता दिये तो बाबाजी सुनारपर बिगड़ गये कि तू क्या कह रहा है? गणेशजी तो देवता हैं और चूहा उनका वाहन है, पर तू दोनोंका बराबर मूल्य बता रहा है! यह कैसे हो सकता है? सुनार बोला कि बाबाजी! मैं गणेश और चूहेको नहीं खरीदता हूँ, मैं तो सोना खरीदता हूँ, सोनेका जितना वजन होगा, उसके अनुसार ही उसका मूल्य होगा। अगर सुनार गणेश और चूहेको देखेगा तो उसको सोना नहीं दीखेगा और अगर सोनेको देखेगा तो उसको गणेश और चूहा नहीं दीखेगा। इसलिये सुनार न गणेशको देखता है, न चूहेको, वह तो केवल सोनेको ही देखता है। ऐसे ही भगवान्के साथ अभिन्न हुआ महात्मा संसारको नहीं देखता, वह तो केवल भगवान्को ही देखता है। कोई एक सन्त रास्तेमें चलते-चलते किसी खेतमें लघुशंका करनेको बैठे। उस खेतके मालिकने उनको देखा तो
मतीरा (तरबूजा) चुरानेवाला यही आदमी है
ऐसा समझकर पीछेसे आकर उनके सिरपर लाठी मार दी। फिर देखा कि ये तो कोई बाबाजी हैं; अतः हाथ जोड़कर बोला—“महाराज! मैंने आपको जाना नहीं और चोर समझकर लाठी मार दी; इसलिये महाराज! मुझे माफ करो।” सन्तने कहा—“माफ क्या करना? तूने मेरेको तो मारा नहीं, तूने तो चोरको मारा है।” उसने कहा—“अब क्या करूँ महाराज?” सन्तने कहा—“तेरी जैसी मरजी हो, वैसे कर।” उसने सन्तको बैलगाड़ीमें ले जाकर अस्पतालमें भरती कर दिया। वहाँ मलहम-पट्टी करनेके बाद कोई आदमी दूध लेकर आया और बोला—“महाराज! दूध पी लो।” सन्तने कहा—“तू बड़ा चालाक-होशियार है। तेरे विचित्र-विचित्र रूप हैं। तू विचित्र-विचित्र लीलाएँ करता है। पहले तो तूने लाठीसे मारा और अब कहता है दूध पी लो!” वह आदमी डर गया और कहने लगा— “बाबाजी! मैंने नहीं मारा है।” सन्त बोले—“बिलकुल झूठी बात है। मैं पहचानता हूँ, तू ही था। तूने ही मारा है। तेरे सिवाय और कौन आये, कहाँसे आये? और कैसे आये? पहले तो मारा लाठीसे और अब आया दूध पिलाने! मैं दूध पी लूँगा, पर था तू ही।” इस तरह बाबाजी तो अपनी
वासुदेवः सर्वम्
वाली भाषामें बोल रहे थे और वह सोच रहा था कि बाबाजी कहीं फँसा न दें! तात्पर्य यह है कि सन्त केवल भगवान्को ही देखते हैं कि लाठी मारनेवाला, मरहम-पट्टी करनेवाला, दूध पिलानेवाला—सब वह ही है। महात्माओंकी महिमा जहाँ सन्त-महात्माओंका वर्णन आता है, वहाँ कहा गया है— (1) जो ऊँचे दर्जेके तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त महापुरुष होते हैं, वे अभिन्नभाव और अखण्डरूपसे केवल अपने स्वरूपमें अथवा भगवत्तत्त्वमें स्थित रहते हैं। उनके जीवनसे, उनके दर्शनसे, उनके चिन्तनसे, उनके शरीरका स्पर्श की हुई वायुके स्पर्शसे जीवोंका कल्याण होता रहता है। (2) जो मनुष्य उन महापुरुषोंकी महिमाको नहीं जानते, उनके सामने वे महापुरुष अपने भावोंसे नीचे उतरते हैं तो कुछ कह देते हैं; जैसे—सन्त-महात्माओंने ऐसा किया है, उनके किये हुए आचरणों और कहे हुए वचनोंके अनुसार ही शास्त्र बनते हैं, आदि। (3) जब वे इससे भी नीचे उतरते हैं तो कह देते हैं कि सन्त-महात्माओंकी आज्ञाका पालन करना चाहिये। (4) जिनसे उपर्युक्त बातका पालन नहीं होता, उन साधकोंके सामने वे स्वयं ऐसा विधान कर देते हैं कि ऐसा करना चाहिये, ऐसा नहीं करना चाहिये। (5) जब वे इससे भी नीचे उतरते हैं तो
ऐसा करो और ऐसा मत करो
ऐसी आज्ञा दे देते हैं। [सन्तोंकी आज्ञामें जो सिद्धान्त भरा हुआ है, वह आज्ञापालकमें उतर आता है। उनकी आज्ञापालनके बिना भी उनके सिद्धान्तका पालन करनेवालोंका कल्याण हो जाता है; परन्तु वे महात्मा आज्ञाके रूपमें जिसको जो कुछ कह देते हैं, उसमें एक विलक्षण शक्ति आ जाती है। आज्ञापालन करनेवालेको कोई परिश्रम नहीं पड़ता और उसके द्वारा स्वतः-स्वाभाविक वैसे आचरण होने लगते हैं।] (6) जो उनकी आज्ञाका पालन नहीं करते, ऐसे नीचे दर्जेके साधकोंको वे कहीं-कहीं, कभी-कभी शाप या वरदान दे देते हैं। इस परम्परामें देखा जाय तो (1) जो कुछ नहीं करते, निरन्तर अपने स्वरूपमें ही स्थित रहते हैं—यह उन सन्त- महापुरुषोंका ऊँचा दर्जा हो गया, (2) शास्त्रोंने ऐसा कहा, सन्त-महात्माओंने ऐसा किया—इस तरह संकेत करनेसे उन सन्तोंका दूसरा दर्जा हो गया, (3) सन्त-महात्माओंकी आज्ञाका पालन करना चाहिये—ऐसा कहनेसे सन्तोंका तीसरा दर्जा हो गया, (4) ऐसा करना चाहिये और ऐसा नहीं करना चाहिये—इस तरहका विधान करनेसे उन सन्तोंका चौथा दर्जा हो गया, (5) तुम ऐसा करो और ऐसा मत करो—ऐसा कहना उन सन्तोंके पाँचवें दर्जेकी बात हो गयी, (6) शाप और वरदान देना उन सन्तोंके छठे दर्जेकी बात हो गयी। इन सब दर्जोंमें सन्त- महापुरुषोंका जो नीचे उतरना है, उसमें उनकी क्रमशः अधिकाधिक दयालुता है। वे शाप और वरदान दे दें, ताड़ना कर दें, इसमें उन सन्तोंका दर्जा तो नीचे हुआ, पर इसमें उनका अत्यधिक त्याग है। कारण कि उन्होंने जीवोंके उद्धारके लिये ही नीचा दर्जा स्वीकार कर लिया है। इसमें उनका लेशमात्र भी अपना स्वार्थ नहीं है। ऐसे ही भगवान् भी अपने स्वरूपमें नित्य-निरन्तर स्थित रहते हैं, यह उनके ऊँचे दर्जेकी बात है; परन्तु वे ही भगवान् अत्यधिक कृपालुताके कारण, कृपाके परवश होकर जीवोंका उद्धार करनेके लिये अवतार लेकर आदर्श लीला करते हैं। उनकी लीलाओंको देखने-सुननेसे लोगोंका उद्धार होता है। भगवान् और भी नीचे उतरते हैं तो उपदेश देते हैं। उससे भी नीचे उतरते हैं तो आज्ञा दे देते हैं। और भी नीचे उतरते हैं तो शासन करके लोगोंको सही रास्तेपर लाते हैं। उससे भी नीचे उतरते हैं तो शाप और वरदान दे देते हैं अथवा उसके और संसारके हितके लिये उसका शरीरसे वियोग भी करा देते हैं।
परिशिष्ट भाव
सोलहवें श्लोकमें भगवान्ने अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी—इन चार प्रकारके भक्तोंद्वारा अपना भजन करनेकी बात कही थी—“चतुर्विधा भजन्ते माम्”। उनमें ज्ञानीके भजनका क्या स्वरूप है—इसको इस श्लोकमें बताते हैं कि “सब कुछ वासुदेव ही है”—ऐसा अनुभव करना ही ज्ञानीका भजन है, शरणागति है। असली शरणागति वही है, जिसमें शरणागतकी सत्ता ही न रहे, प्रत्युत शरण्य ही रह जाय। सब कुछ भगवान् ही हैं—यह वास्तविक ज्ञान है। ऐसे वास्तविक ज्ञानवाला महात्मा भक्त भगवान्के शरण हो जाता है अर्थात् अपना अस्तित्व (मैंपन) मिटाकर भगवान्में लीन हो जाता है। फिर मैंपन नहीं रहता अर्थात् प्रेमवाला नहीं रहता, प्रत्युत केवल प्रेमस्वरूप भगवान् रह जाते हैं, जिनमें मैं-तू-यह-वह चारों ही नहीं हैं। यही शरणागतिका वास्तविक स्वरूप है। “महात्मा” शब्दका अर्थ है—महान् आत्मा अर्थात् अहंभाव, व्यक्तित्व, एकदेशीयतासे सर्वथा रहित आत्मा1। जिसमें अहंभाव, व्यक्तित्व, एकदेशीयता है, वह “अल्पात्मा” है। यहाँ “वासुदेवः” पद पुँल्लिंगमें आया है; अतः यहाँ “वासुदेवः सर्वः” पद आने चाहिये थे। परन्तु यहाँ “सर्वः” पद न देकर “सर्वम्” पद दिया गया है, जो नपुंसकलिंगमें है। अगर तीनों लिंगों-(सर्वः, सर्वा और सर्वम्)-का एकशेष किया जाय तो नपुंसकलिंग (सर्वम्) ही एकशेष रहता है। नपुंसकलिंगके अन्तर्गत तीनों लिंग आ जाते हैं। अतः “सर्वम्” पदमें स्त्री, पुरुष और नपुंसक—सबका समाहार हो जाता है। गीतामें जगत्, जीव और परमात्मा— इन तीनोंके लिये पुँल्लिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसकलिंग—इन तीनों ही लिंगोंका प्रयोग हुआ है2। इससे यह तात्पर्य निकलता है कि जगत्, जीव और परमात्मा—ये तीनों ही “सर्वम्” शब्दके अन्तर्गत हैं। अतः तीनों लिंगोंसे कही जानेवाली सब- की-सब वस्तुएँ, व्यक्ति, परिस्थितियाँ आदि परमात्मा ही हैं। “वासुदेवः सर्वम्”—इसमें “सर्वम्” तो असत् है और “वासुदेवः” सत् है। असत्का भाव विद्यमान नहीं है और सत्का अभाव विद्यमान नहीं है—“नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः” (गीता 2। 16)। तात्पर्य है कि सत्-ही-सत् है, असत् है ही नहीं। वासुदेव-ही-वासुदेव है, “सर्वम्” है ही नहीं। परन्तु कहने, सुनने, पढ़नेवाले साधकोंकी दृष्टिमें “सर्वम्” (संसार) रहता है, इसलिये भगवान् “सर्वम्” की धारणा मिटानेके लिये “वासुदेवः सर्वम्” कहते हैं। कर्मयोगी, ज्ञानयोगी, ध्यानयोगी, लययोगी, हठयोगी, राजयोगी, मन्त्रयोगी, अनासक्तयोगी आदि अनेक तरहके योगी हैं, जिनका शास्त्रोंमें वर्णन हुआ है, पर उनको भगवान् अत्यन्त दुर्लभ नहीं बताते हैं, प्रत्युत “सब कुछ वासुदेव ही है”—इसका अनुभव करनेवाले महात्माको ही अत्यन्त दुर्लभ बताते हैं। भगवान् सम्पूर्ण संसारके बीज हैं—“यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन” (गीता 10। 39), “बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्” (गीता 7। 10)। बीजसे जितनी चीजें पैदा होती हैं, वे सब बीजरूप ही होती हैं। जैसे, गेहूँसे पैदा होनेवाली खेतीको भी गेहूँ ही कहते हैं। किसानलोग कहते हैं कि गेहूँकी खेती बहुत अच्छी हुई है! देखो, खेतमें गेहूँ खड़े हैं, गेहूँसे खेत भरा है! परन्तु कोई शहरमें रहनेवाला व्यापारी हो, वह उसको गेहूँ कैसे मान लेगा? वह कहेगा कि मैंने बोरे-के-बोरे गेहूँ खरीदा और बेचा है, क्या मैं नहीं जानता कि गेहूँ कैसा होता है? यह तो घास है, डंठल और पत्ती है, यह गेहूँ नहीं है। परन्तु खेती करनेवाला जानकार आदमी तो यही कहेगा कि यह वह घास नहीं है, जो पशु खाया करते हैं; यह तो गेहूँ है। खेतीको गाय खा जाती है तो कहते हैं कि तुम्हारी गाय हमारा गेहूँ खा गयी, जबकि उसने गेहूँका एक दाना भी नहीं खाया। खेतमें भले ही गेहूँका एक दाना भी न दीखे, पर यह गेहूँ है—इसमें सन्देह नहीं होता। कारण कि यह पहले भी गेहूँ ही था, अन्तमें भी गेहूँ रहेगा; अतः बीचमें खेतीरूपसे अलग दीखते हुए भी गेहूँ ही है। अभी तो यह हरी-हरी घास दीखती है, पर बादमें पकनेपर इससे गेहूँ ही निकलेगा। इसी तरह संसारके पहले भी परमात्मा थे—“सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्” (छान्दोग्य0 6। 2। 1), अन्तमें भी परमात्मा ही रहेंगे—“शिष्यते शेषसंज्ञः” (श्रीमद्भा0 10। 3। 25)। अतः बीचमें भी सब कुछ परमात्मा ही हैं—“वासुदेवः सर्वम्। जबतक साधकमें अहम् है, तबतक वह भोगी है। मैं योगी हूँ—यह योगका भोग है, मैं ज्ञानी हूँ—यह ज्ञानका भोग है, मैं प्रेमी हूँ—यह प्रेमका भोग है। जबतक साधकमें भोग रहता है, तबतक उसके पतनकी सम्भावना रहती है। जो योगका भोगी है, वह कभी विषयोंका भोगी भी हो सकता है; जो ज्ञानका भोगी है, वह कभी अज्ञानका भोगी भी हो सकता है और जो प्रेमका भोगी है, वह कभी रागका भोगी भी हो सकता है। कारण कि उसमें पहलेसे भोगकी प्रवृत्ति, आदत रही है। जब भोगी नहीं रहता, तब केवल योग रहता है। योग रहनेपर मनुष्य मुक्त हो जाता है। परन्तु मुक्त होनेपर भी महापुरुषने जिस साधनसे मुक्ति प्राप्त की है, उस साधनका एक संस्कार (अहम्की सूक्ष्म गन्ध) रह जाता है, जो दूसरे दार्शनिकोंके साथ एकता नहीं होने देता। इस संस्कारके कारण ही दार्शनिकोंमें और उनके दर्शनोंमें मतभेद रहता है। अपने मतका संस्कार दूसरे दार्शनिकोंके मतोंका समान आदर नहीं करने देता। परन्तु प्रतिक्षण वर्धमान प्रेमकी प्राप्ति होनेपर अपने मतका संस्कार भी नहीं रहता और सबके साथ एकता हो जाती है अर्थात् सम्पूर्ण मतभेद मिट जाते हैं और “वासुदेवः सर्वम्” का अनुभव हो जाता है। वास्तवमें “वासुदेवः सर्वम्” का अनुभव करनेवाला, इसको जाननेवाला, कहनेवाला भी नहीं रहता, प्रत्युत एक वासुदेव ही रहता है, जो अनादिकालसे ज्यों- का-त्यों है। सबमें परमात्माको देखनेसे सम्पूर्ण मतोंमें समान आदरभाव हो जाता है; क्योंकि अपने इष्ट परमात्मासे विरोध सम्भव ही नहीं है—“निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध” (मानस, उत्तर0 112 ख)। ईश्वर और जीवके विषयमें दो तरहका वर्णन है—(1) ईश्वर समुद्र है और जीव उसकी तरंग है अर्थात् तरंग समुद्रकी है और (2) जीव (स्वरूप) समुद्र है और ईश्वर उसकी तरंग है अर्थात् समुद्र तरंगका है। इन दोनोंमें तरंग समुद्रकी है—ऐसा मानना ही ठीक दीखता है। समुद्र तरंगका है—ऐसा मानना ठीक नहीं दीखता; क्योंकि समुद्र अपेक्षाकृत नित्य है और तरंग अनित्य (क्षणभंगुर) है। अतः तरंग समुद्रकी होती है, समुद्र तरंगका नहीं होता। अगर अपनेको समुद्र और ईश्वरको तरंग मानें तो इस मान्यतासे अनर्थ होगा; क्योंकि ऐसा माननेसे अभिमान पैदा हो जायगा तथा अहम् (चिज्जड़ग्रन्थि) तो नित्य रहेगा और ईश्वर अनित्य हो जायगा! कारण कि जीवमें अनादिकालसे अहम्- (व्यक्तित्व-) का अभ्यास पड़ा हुआ है। अतः जहाँ स्वरूपको अहम् कहेंगे, वहाँ वही अहम् आयेगा, जो अनादिकालसे है। उस अहम्के मिटनेसे ही मुक्ति होती है। उपर्युक्त दोनों बातोंके सिवाय तीसरी एक विलक्षण बात है कि जल- तत्त्वमें न समुद्र है, न तरंग है अर्थात् वहाँ समुद्र और तरंगका भेद नहीं है। यही वास्तविक बात है। समुद्र और तरंग तो सापेक्ष हैं, पर जल-तत्त्व निरपेक्ष है। जैसे जल-तत्त्वमें समुद्र, नदी, वर्षा, ओस, कोहरा, भाप, बादल आदि सब मिटकर एक हो जाते हैं, ऐसे ही “वासुदेवः सर्वम्” में सभी साधन, योगमार्ग मिटकर एक (वासुदेवरूप) हो जाते हैं। जैसे जल-तत्त्वमें कोई भेद नहीं है, ऐसे ही “वासुदेवः सर्वम्” में कोई भेद नहीं है। मतभेदसे असन्तोष होता है, पर “वासुदेवः सर्वम्” में कोई मतभेद न होनेसे सबको सर्वथा सन्तोष हो जाता है। “वासुदेवः सर्वम्” में न योगी है, न ज्ञानी है, न प्रेमी है, इसलिये इसका अनुभव करनेवाला महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है। एक ही जल बर्फ, कोहरा, बादल, ओला, वर्षा, नदी, तालाब, समुद्र आदि अनेक रूपोंमें हो जाता है। कड़ाहीमें बर्फ डालकर उसको अग्निपर रखा जाय तो बर्फ पिघलकर पानी हो जायगी। फिर पानी भी भाप हो जायगा और भाप परमाणु होकर निराकार हो जायगा। जल ही कोहरारूपसे होता है, वही बादलरूपसे होता है, वही निराकाररूपसे होता है, वही बर्फरूपसे होता है, वही ओलारूपसे होता है, वही वर्षारूप होकर पृथ्वीपर बरसता है, वही नदीरूपसे होता है, वही समुद्ररूपसे होता है। अनेक रूपसे होनेपर भी तत्त्वसे जल एक ही रहता है। इसी तरह एक ही भगवान् अनेक रूपसे बन जाते हैं। जैसे जल ठण्डकसे जमकर बर्फ हो जाता है और गरमीसे पिघलकर तथा भाप बनकर परमाणुरूप हो जाता है, ऐसे ही अज्ञानरूपी ठण्डकसे भगवान् स्थूल तथा जड़ संसाररूपसे दीखते हैं और ज्ञानरूपी अग्निसे सूक्ष्म तथा चेतन वासुदेवरूपसे दीखते हैं। जल चाहे बर्फरूपसे दीखे, चाहे भाप, बादल आदि रूपोंसे दीखे, है वह जल ही। जलके सिवाय कुछ नहीं है। ऐसे ही भगवान् चाहे संसाररूपसे दीखें, चाहे अन्य रूपोंसे दीखें, हैं वे भगवान् ही। भगवान्के सिवाय कुछ नहीं है। साधकसे एक गलती होती है कि वह अपनेको अलग रखकर संसारको भगवत्स्वरूप देखनेकी चेष्टा करता है अर्थात् “वासुदेवः सर्वम्” को अपनी बुद्धिका विषय बनाता है। वास्तवमें दीखनेवाला संसार ही भगवत्स्वरूप नहीं है, प्रत्युत देखनेवाला भी भगवत्स्वरूप है—“सकलमिदमहं च वासुदेवः” (विष्णुपुराण 3। 7। 32)। अतः साधकको ऐसा मानना चाहिये कि अपनी देहसहित सब कुछ भगवान् ही हैं अर्थात् शरीर भी भगवत्स्वरूप है, इन्द्रियाँ भी भगवत्स्वरूप हैं, मन भी भगवत्स्वरूप है, बुद्धि भी भगवत्स्वरूप है, प्राण भी भगवत्स्वरूप हैं और अहम् (मैंपन) भी भगवत्स्वरूप है। सब कुछ भगवान् ही हैं—इसको माननेके लिये साधकको बुद्धिसे जोर नहीं लगाना चाहिये, प्रत्युत सहजरूपसे जैसा है, वैसा स्वीकार कर लेना चाहिये। इसलिये श्रीमद्भागवतमें आया है— सर्वं ब्रह्मात्मकं तस्य विद्ययाऽऽत्ममनीषया। परिपश्यन्नुपरमेत् सर्वतो मुक्तसंशयः॥ जब “सब कुछ भगवान् ही हैं”—ऐसा निश्चय हो जाय, तब साधक इस अध्यात्मविद्या-(ब्रह्मविद्या-) के द्वारा सब प्रकारसे संशयरहित होकर सब जगह भगवान्को भलीभाँति देखता हुआ उपराम हो जाय अर्थात् “सब कुछ भगवान् ही हैं”—यह चिन्तन भी न रहे, प्रत्युत साक्षात् भगवान् ही दीखने लगें। तात्पर्य है कि “सब कुछ भगवान् ही हैं”—इस भावसे भी उपराम हो जाय अर्थात् न द्रष्टा (देखनेवाला) रहे, न दृश्य (दीखनेवाला) रहे और न दर्शन (देखनेकी वृत्ति) ही रहे, केवल भगवान् ही रहें। “वासुदेवः सर्वम्” का अनुभव अनेक दृष्टियोंसे हो सकता है; जैसे— (1) क्रिया, पदार्थ और व्यक्तिका तो आदि और अन्त होता है, पर सत्ता निरन्तर ज्यों-की-त्यों रहती है। इसलिये मनुष्यमात्रको क्रिया, पदार्थ और व्यक्तिके अभावका तो अनुभव होता है, पर अपनी सत्ताके अभावका अनुभव कभी किसीको नहीं होता। इस नित्य-निरन्तर रहनेवाली सत्ताका अनुभव होना विवेककी दृष्टिसे “वासुदेवः सर्वम्” है। (2) सृष्टिसे पहले भी केवल भगवान् थे और पीछे भी केवल भगवान् रहेंगे, फिर बीचमें भगवान्के सिवाय दूसरा कैसे आ सकता है?—यह युक्तिकी दृष्टिसे “वासुदेवः सर्वम्” है। (3) मेरे तो एक भगवान् ही हैं, भगवान्के सिवाय मेरा कोई है ही नहीं और कोई है तो होगा, हमें उससे क्या मतलब?—यह सीधे-सरल, विश्वासी भक्तोंकी दृष्टिसे “वासुदेवः सर्वम्” है। जैसे, व्रजमें एक साधु कुएँपर किसीसे बातें कर रहा था कि ब्रह्म ऐसा होता है, जीव ऐसा होता है आदि-आदि। वहाँ जल भरनेके लिये आयी एक गोपीने ये बातें (11। 29। 18) सुनीं तो उसने दूसरी गोपीसे पूछा—अरी वीर! ये ब्रह्म, जीव आदि क्या होते हैं? वह गोपी बोली कि ये हमारे लालाके ही कोई सगे-सम्बन्धी होंगे, तभी साधुलोग उनकी बात करते हैं, नहीं तो साधुओंको लालाके सिवाय औरसे क्या मतलब? (4) जिसके भीतर भगवत्तत्त्वको जाननेकी व्याकुलता है, दिनमें भूख नहीं लगती, रातमें नींद नहीं आती, वह किसी सन्तसे सुनकर अथवा पुस्तकमें पढ़कर दृढ़तापूर्वक मान लेता है कि सब कुछ भगवान् ही हैं। भगवान् कैसे हैं—इसका तो पता नहीं, पर भगवान्के सिवाय कुछ नहीं है—यह सन्तके वचनोंपर विश्वासकी दृष्टिसे “वासुदेवः सर्वम्” है। सन्त- वचनपर प्रत्यक्षसे भी बढ़कर विश्वास होनेपर फिर वैसा ही दीखने लग जाता है अर्थात् अनुभव हो जाता है। दार्शनिक दृष्टिसे विचार करें तो सत्ता एक ही हो सकती है, दो नहीं। श्रद्धा-विश्वास (भक्ति) की दृष्टिसे देखें तो सब कुछ भगवान् ही हैं, भगवान्के सिवाय कुछ नहीं है। भक्तकी दृष्टि भगवान्को छोड़कर दूसरी तरफ जाती ही नहीं और भगवान्के सिवाय दूसरा कोई उसकी दृष्टिमें आता ही नहीं।
1-भक्तिका यह अद्वैत कल्पना नहीं है, प्रत्युत स्वीकृति है। कल्पित अद्वैत तो असत्य होता है, उसमें प्रेम नहीं होता।
2-एहि तन कर फल बिषय न भाई। स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई॥ (मानस 7। 44। 1)
* नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही॥
नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी॥ (मानस 7। 121। 5)
1-(1) लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहुसम्भवान्ते मानुष्यमर्थदमनित्यमपीह धीरः।
(1) तूर्णं यतेत न पतेदनुमृत्युयावन्निःश्रेयसाय विषयः खलु सर्वतः स्यात्॥ (श्रीमद्भा0 11। 9। 29)
“अनेक जन्मोंके बाद इस परमपुरुषार्थके साधनरूप मनुष्यशरीरको, जो अनित्य होनेपर भी अत्यन्त दुर्लभ है, पाकर
बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह शीघ्र-से-शीघ्र, मृत्यु आनेसे पहले ही अपने कल्याणके लिये प्रयत्न कर ले। विषयभोग
तो सभी योनियोंमें प्राप्त हो सकते हैं, इसलिये उनके संग्रहमें इस अमूल्य जीवनको नहीं खोना चाहिये।”
(2) नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम्।
(2) मयानुकूलेन नभस्वतेरितं पुमान् भवाब्धिं न तरेत् स आत्महा॥ (श्रीमद्भा0 11। 20। 17)
“यह मनुष्यशरीर समस्त शुभ फलोंकी प्राप्तिका मूल है और अत्यन्त दुर्लभ होनेपर भी अनायास सुलभ हो गया है।
इस संसारसागरसे पार होनेके लिये यह एक सुदृढ़ नौका है, जिसे गुरुरूप नाविक चलाता है और मैं (भगवान्) वायुरूप
होकर इसे लक्ष्यकी ओर बढ़ानेमें सहायता देता हूँ। इतनी सुविधा होनेपर भी जो मनुष्य इस संसारसागरसे पार नहीं होता, वह
अपनी आत्माका हनन करनेवाला अर्थात् पतन करनेवाला है।”
2-यहाँ “वासुदेवः” शब्द पुँल्लिंगमें और “सर्वम्” शब्द नपुंसकलिंगमें आया है। यहाँ “वासुदेवः सर्वः” भी कह सकते थे;
परन्तु ऐसा न कहकर “वासुदेवः सर्वम्” कहा है। इसका तात्पर्य यह है कि “सर्वम्” शब्दमें स्त्री, पुरुष, नपुंसक, स्थावर-जंगम
आदि सबका समाहार हो जाता है।
(श्रीमद्भा0 11। 13। 24)
* जित देखौं तित स्याममई है।
स्याम कुंज बन जमुना स्यामा, स्याम गगन घन घटा छई है॥
सब रंगनमें स्याम भरो है, लोग कहत यह बात नई है।
हौं बौरी, कै लोगन ही की, स्याम पुतरिया बदल गई है॥
चंद्रसार रबिसार स्याम है, मृगमद सार काम बिजई है।
नीलकंठको कंठ स्याम है, मनहुँ स्यामता बेल बई है॥
श्रुतिको अच्छर स्याम देखियत, दीप सिखापर स्यामतई है।
नर देबनकी कौन कथा है, अलख ब्रह्मछबि स्याममई है॥
* वाग् गद्गदा द्रवते यस्य चित्तं रुदत्यभीक्ष्णं हसति क्वचिच्च।
विलज्ज उद्गायति नृत्यते च मद्भक्तियुक्तो भुवनं पुनाति॥ (श्रीमद्भा0 11। 14। 24)
“जिसकी वाणी मेरे नाम, गुण और लीलाका वर्णन करती-करती गद्गद हो जाती है, जिसका चित्त मेरे रूप, गुण,
प्रभाव और लीलाओंको याद करते-करते द्रवित हो जाता है, जो बारंबार रोता रहता है, कभी-कभी हँसने लग जाता है, कभी
लज्जा छोड़कर ऊँचे स्वरसे गाने लगता है, कभी नाचने लग जाता है, ऐसा मेरा भक्त सारे संसारको पवित्र कर देता है।”
1-गीतामें भगवान्ने “महात्मा” शब्दका प्रयोग केवल भक्तके लिये ही किया है। जो भक्तिमार्गपर चलते हैं, उन
साधकोंको भी महात्मा कहा है—“महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः” (9। 13), जो भगवान्से अभिन्न हो गये हैं,
उनको भी महात्मा कहा है—“वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः” (7। 19), और जो परमसिद्धि (परमप्रेम)-को प्राप्त
हो चुके हैं, उनको भी महात्मा कहा है—“नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः” (8। 15)। इसी तरह गीतामें भगवान्ने
“सुकृतिनः” (7। 16), “उदाराः” (7। 18), “सुदुर्लभः” (7। 19), “युक्ततमः” (6। 47; 12। 2), “अद्वेष्टा”, “मैत्रः”,
“करुणः” (12। 13), “अतीव मे प्रियाः” (12। 20) आदि पदोंका प्रयोग भी केवल भक्तके लिये ही किया है।
2-द्रष्टव्य—“गीता-दर्पण” ग्रन्थमें लेख-संख्या 99—“गीतामें ईश्वर, जीवात्मा और प्रकृतिकी अलिंगता”।
20श्रीभगवान्
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताःतं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया॥ 20॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

विच्छेद हो जाता है। कारण कि कुछ-न-कुछ जो भगवान्की महत्ताको समझकर भगवान्की शरण होते हैं, ऐसे भक्तोंका वर्णन सोलहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक करनेके बाद अब भगवान् आगेके तीन श्लोकोंमें देवताओंके शरण होनेवाले मनुष्योंका वर्णन करते हैं।

पदच्छेद
श्लोकमें ढूँढ़नेके लिये हॉवर करें
व्याख्या
3 sections
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः
उन-उन अर्थात् इस लोकके और परलोकके भोगोंकी कामनाओंसे जिनका ज्ञान ढक गया है, आच्छादित हो गया है। तात्पर्य है कि परमात्माकी प्राप्तिके लिये जो विवेकयुक्त मनुष्यशरीर मिला है, उस शरीरमें आकर परमात्माकी प्राप्ति न करके वे अपनी कामनाओंकी पूर्ति करनेमें ही लगे रहते हैं। संयोगजन्य सुखकी इच्छाको कामना कहते हैं। कामना दो तरहकी होती है—यहाँके भोग भोगनेके लिये धन- संग्रहकी कामना और स्वर्गादि परलोकके भोग भोगनेके लिये पुण्य-संग्रहकी कामना। धन-संग्रहकी कामना दो तरहकी होती है—पहली, यहाँ चाहे जैसे भोग भोगें; चाहे जब, चाहे जहाँ और चाहे जितना धन खर्च करें, सुख-आरामसे दिन बीतें आदिके लिये अर्थात् संयोगजन्य सुखके लिये धन-संग्रहकी कामना होती है और दूसरी, मैं धनी हो जाऊँ, धनसे मैं बड़ा बन जाऊँ आदिके लिये अर्थात् अभिमानजन्य सुखके लिये धन-संग्रहकी कामना होती है। ऐसे ही पुण्य-संग्रहकी कामना भी दो तरहकी होती है—पहली, यहाँ मैं पुण्यात्मा कहलाऊँ और दूसरी, परलोकमें मेरेको भोग मिलें। इन सभी कामनाओंसे सत्-असत्, नित्य-अनित्य, सार-असार, बन्ध-मोक्ष आदिका विवेक आच्छादित हो जाता है। विवेक आच्छादित होनेसे वे यह समझ ही नहीं पाते कि जिन पदार्थोंकी हम कामना कर रहे हैं, वे पदार्थ हमारे साथ कबतक रहेंगे और हम उन पदार्थोंके साथ कबतक रहेंगे? “प्रकृत्या नियताः स्वया” 2—कामनाओंके कारण विवेक ढका जानेसे वे अपनी प्रकृतिसे नियन्त्रित रहते हैं अर्थात् अपने स्वभावके परवश रहते हैं। यहाँ “प्रकृति” शब्द व्यक्तिगत स्वभावका वाचक है, समष्टि प्रकृतिका वाचक नहीं। यह व्यक्तिगत स्वभाव सबमें मुख्य होता है— “स्वभावो मूर्ध्नि वर्तते।” अतः व्यक्तिगत स्वभावको कोई छोड़ नहीं सकता—“या यस्य प्रकृतिः स्वभावजनिता केनापि न त्यज्यते।” परन्तु इस स्वभावमें जो दोष हैं, उनको तो मनुष्य छोड़ ही सकता है, अगर उन दोषोंको मनुष्य छोड़ नहीं सकता, तो फिर मनुष्यजन्मकी महिमा ही क्या हुई? मनुष्य अपने स्वभावको निर्दोष, शुद्ध बनानेमें सर्वथा स्वतन्त्र है। परन्तु जबतक मनुष्यके भीतर कामनापूर्तिका उद्देश्य रहता है, तबतक वह अपने स्वभावको सुधार नहीं सकता और तभीतक स्वभावकी प्रबलता और अपनेमें निर्बलता दीखती है। परन्तु जिसका उद्देश्य कामना मिटानेका हो जाता है, वह अपनी प्रकृति-(स्वभाव-) का सुधार कर सकता है अर्थात् उसमें प्रकृतिकी परवशता नहीं रहती।
तं तं नियममास्थाय
कामनाओंके कारण अपनी प्रकृतिके परवश होनेपर मनुष्य कामनापूर्तिके अनेक उपायोंको और विधियों (नियमों-) को ढूँढ़ता रहता है। अमुक यज्ञ करनेसे कामना पूरी होगी कि अमुक तप करनेसे? अमुक दान देनेसे कामना पूरी होगी कि अमुक मन्त्रका जप करनेसे? आदि-आदि उपाय खोजता रहता है। उन उपायोंकी विधियाँ अर्थात् नियम अलग-अलग होते हैं। जैसे—अमुक कामनापूर्तिके लिये अमुक विधिसे यज्ञ आदि करना चाहिये और अमुक स्थानपर करना चाहिये आदि-आदि। इस तरह मनुष्य अपनी कामनापूर्तिके लिये अनेक उपायों और नियमोंको धारण करता है।
प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः
कामनापूर्तिके लिये अनेक उपायों और नियमोंको धारण करके मनुष्य अन्य देवताओंकी शरण लेते हैं, भगवान्की शरण नहीं लेते। यहाँ “अन्यदेवताः” कहनेका तात्पर्य है कि वे देवताओंको भगवत्स्वरूप नहीं मानते हैं, प्रत्युत उनकी अलग सत्ता मानते हैं, इसीसे उनको अन्तवाला (नाशवान्) फल मिलता है—“अन्तवत्तु फलं तेषाम्” (गीता 7। 23)। अगर वे देवताओंकी अलग सत्ता न मानकर उनको भगवत्स्वरूप ही मानें तो फिर उनको अन्तवाला फल नहीं मिलेगा, प्रत्युत अविनाशी फल मिलेगा। यहाँ देवताओंकी शरण लेनेमें दो कारण मुख्य हुए— एक कामना और एक अपने स्वभावकी परवशता।
परिशिष्ट भाव
भगवान्के अर्थार्थी और आर्त भक्तोंमें जो कामनाएँ हैं, वही कामनाएँ इस श्लोकमें वर्णित मनुष्योंमें भी हैं। परन्तु दोनोंमें फर्क यह है कि अर्थार्थी और आर्त भक्तोंमें कामनाकी मुख्यता नहीं है, प्रत्युत भगवान्की मुख्यता है, इसलिये वे “हृतज्ञानाः” नहीं हैं। परन्तु यहाँ वर्णित मनुष्योंमें कामनाकी मुख्यता है; इसलिये ये “हृतज्ञानाः” हैं। अर्थार्थी और आर्त भक्त तो केवल भगवान्के ही शरण होते हैं, पर ये मनुष्य भगवान्को छोड़कर अन्य देवताओंके शरण होते हैं। कामनाएँ, देवता, मनुष्य और नियम—ये सभी अनेक हुआ करते हैं। अगर अनेक कामनाएँ होनेपर भी उपास्यदेव एक परमात्मा हों तो वे उपासकका उद्धार कर देंगे। परन्तु कामनाएँ भी अनेक हों और उपास्यदेव भी अनेक हों तो उद्धार कौन करेगा? एक भगवान्के सिवाय दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं—यह ज्ञान सुखकी कामनाके कारण ढक जाता है। यह कामना न तो प्रकृतिकी बनायी हुई है और न परमात्माकी बनायी हुई है, प्रत्युत मनुष्यकी अपनी बनायी हुई है। इसलिये इसको मिटानेकी जिम्मेवारी मनुष्यपर ही है। “हृतज्ञानाः” कहनेका तात्पर्य है कि यह ज्ञान नष्ट नहीं हुआ है, प्रत्युत कामनाके कारण हरा गया है। इस बातको गीतामें “माययापहृतज्ञानाः” (7। 15), “अज्ञानेनावृतं ज्ञानम्” (5। 15) आदि पदोंसे भी कहा गया है। इसी अध्यायके पन्द्रहवें श्लोकमें आये “माययापहृतज्ञानाः” पदमें तमोगुणकी प्रधानता और रजोगुणकी गौणता है, पर यहाँ आये “कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः” पदमें रजोगुणकी प्रधानता और तमोगुणकी गौणता है। “माययापहृतज्ञानाः” पदमें अर्थकी इच्छा मुख्य है और “कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः” पदमें भोगोंकी इच्छा मुख्य है। दोनोंमें फर्क यह है कि मायासे अपहृत ज्ञानवाले मनुष्य देवताओंका पूजन नहीं करते, पर कामनाओंसे अपहृत ज्ञानवाले मनुष्य देवताओंका पूजन कर सकते हैं। कारण कि अर्थसे अरुचि नहीं होती—“जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई”, पर भोगोंसे अरुचि होती ही है। “माययापहृतज्ञानाः” में तो आसुरभावका, झूठ, कपट, बेईमानी आदिका आश्रय है, पर “कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः” में देवताओंका आश्रय है। अतः “माययापहृतज्ञानाः” में तो विशेष जड़ता है, पर “कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः” में उनकी अपेक्षा चेतनता है1।
1-इसी अध्यायके पन्द्रहवें श्लोकमें वर्णित पुरुषोंका ज्ञान तो मायासे ढका हुआ है और यहाँ वर्णित पुरुषोंका ज्ञान
कामनासे ढका हुआ है। वहाँके पुरुष तो कामनापूर्तिके लिये जड-पदार्थोंका आश्रय लेते हैं और यहाँके पुरुष कामनापूर्तिके
लिये देवताओंका आश्रय लेते हैं। वहाँके पुरुष दुष्टताके कारण नरकोंमें जाते हैं और यहाँके पुरुष कामनाके कारण बार-
बार जन्म-मरणको प्राप्त होते हैं।
2-यहाँ जो “प्रकृत्या नियताः स्वया” कहा है, इसीको सत्रहवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें “यो यच्छ्रद्धः स एव सः” कहा है।
“स्वया” कहनेका तात्पर्य है कि अपनी-अपनी प्रकृतिके अनुसार सबकी कामनाएँ भी अलग-अलग होती हैं।
21श्रीभगवान्
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति। तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्॥ 21॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
पदच्छेद
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व्याख्या
1 section
यो यो यां यां तनुं भक्तः ....... तामेव विदधाम्यहम्
जो-जो मनुष्य जिस-जिस देवताका भक्त होकर श्रद्धापूर्वक यजन-पूजन करना चाहता है, उस-उस मनुष्यकी श्रद्धा उस-उस देवताके प्रति मैं अचल (दृढ़) कर देता हूँ। वे दूसरोंमें न लगकर मेरेमें ही लग जायँ— ऐसा मैं नहीं करता। यद्यपि उन-उन देवताओंमें लगनेसे कामनाके कारण उनका कल्याण नहीं होता, फिर भी मैं उनको उनमें लगा देता हूँ, तो जो मेरेमें श्रद्धा-प्रेम रखते हैं, अपना कल्याण करना चाहते हैं, उनकी श्रद्धाको मैं अपने प्रति दृढ़ कैसे नहीं करूँगा अर्थात् अवश्य करूँगा। कारण कि मैं प्राणिमात्रका सुहृद् हूँ—“सुहृदं सर्वभूतानाम्” (गीता 5। 29)। इसपर यह शंका होती है कि आप सबकी श्रद्धा अपनेमें ही दृढ़ क्यों नहीं करते? इसपर भगवान् मानो यह कहते हैं कि अगर मैं सबकी श्रद्धाको अपने प्रति दृढ़ करूँ तो मनुष्यजन्मकी स्वतन्त्रता, सार्थकता ही कहाँ रही? तथा मेरी स्वार्थपरताका त्याग कहाँ हुआ? अगर लोगोंको अपनेमें ही लगानेका मेरा आग्रह रहे, तो यह कोई बड़ी बात नहीं है; क्योंकि ऐसा बर्ताव तो दुनियाके सभी स्वार्थी जीवोंका स्वाभाविक होता है। अतः मैं इस स्वार्थपरताको मिटाकर ऐसा स्वभाव सिखाना चाहता हूँ कि कोई भी मनुष्य पक्षपात करके दूसरोंसे केवल अपनी पूजा-प्रतिष्ठा करवानेमें ही न लगा रहे और किसीको पराधीन न बनाये। अब दूसरी शंका यह होती है कि आप उनकी श्रद्धाको उन देवताओंके प्रति दृढ़ कर देते हैं, इससे आपकी साधुता तो सिद्ध हो गयी, पर उन जीवोंका तो आपसे विमुख होनेसे अहित ही हुआ? इसका समाधान यह है कि अगर मैं उनकी श्रद्धाको दूसरोंसे हटाकर अपनेमें लगानेका भाव रखूँगा तो उनकी मेरेमें अश्रद्धा हो जायगी। परन्तु अगर मैं अपनेमें लगानेका भाव नहीं रखूँगा और उनको स्वतन्त्रता दूँगा, तो उस स्वतन्त्रताको पानेवालोंमें जो बुद्धिमान् होंगे, वे मेरे इस बर्तावको देखकर मेरी तरफ ही आकृष्ट होंगे। अतः उनके उद्धारका यही तरीका बढि़या है। अब तीसरी शंका यह होती है कि जब आप स्वयं उनकी श्रद्धाको दूसरोंमें दृढ़ कर देते हैं, तो फिर उस श्रद्धाको कोई मिटा ही नहीं सकता। फिर तो उसका पतन ही होता चला जायगा? इसका समाधान यह है कि मैं उनकी श्रद्धाको देवताओंके प्रति ही दृढ़ करता हूँ, दूसरोंके प्रति नहीं—ऐसी बात नहीं है। मैं तो उनकी इच्छाके अनुसार ही उनकी श्रद्धाको दृढ़ करता हूँ और अपनी इच्छाको बदलनेमें मनुष्य स्वतन्त्र है, योग्य है। इच्छाको बदलनेमें वे परवश, निर्बल और अयोग्य नहीं हैं। अगर इच्छाको बदलनेमें वे परवश होते तो फिर मनुष्यजन्मकी महिमा ही कहाँ रही? और इच्छा (कामना-) का त्याग करनेकी आज्ञा भी मैं कैसे दे सकता था—“जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्” (गीता 3। 43)?
परिशिष्ट भाव
प्रायः मनुष्य दूसरे मनुष्योंको अपनी तरफ लगाना चाहते हैं, अपना शिष्य या दास बनाना चाहते हैं, अपने सम्प्रदायमें लाना चाहते हैं, अपनेमें श्रद्धा करवाना चाहते हैं, अपना पूजन, आदर, मान-सम्मान करवाना चाहते हैं, अपनी बात मनवाना चाहते हैं। परन्तु भगवान् सर्वोपरि होते हुए भी किसीको अपने अधीन नहीं बनाते, प्रत्युत जो जहाँ श्रद्धा रखता है, उसकी श्रद्धाको वहीं दृढ़ कर देते हैं—यह भगवान्की कितनी उदारता है, निष्पक्षता है! भगवान्की दृष्टिमें सब कुछ उनका ही स्वरूप है—“मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति”। इसलिये भगवान्में किसीके प्रति किंचिन्मात्र भी पक्षपात नहीं है। परन्तु भगवान्का यह पक्षपातरहित स्वभाव सहज ही समझमें नहीं आता, प्रत्युत गहरा विचार करनेसे ही समझमें आता है। अगर यह स्वभाव किसीकी समझमें आ जाय तो वह भगवान्का भक्त हो जायगा— उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना॥ स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥ (गीता 15। 19) दूसरेको अपना दास वही बनाता है, जिसमें कोई कमी है। भगवान्में कोई कमी है ही नहीं, इसलिये वे अपनी तरफसे किसीको अपना दास (अधीन) कैसे बना सकते हैं? परन्तु कोई उनका दास बनना चाहे तो वे मना नहीं करते और दयापूर्वक उसको दास स्वीकार कर लेते हैं। यह उनकी विशेष उदारता है! जैसे छोटे-से बालकको देखकर कोई व्यक्ति रीझ जाता है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उस बालकसे उसका कोई स्वार्थभाव है। ऐसे ही जो भगवान्का दास बनता है, उसके सरलभावसे भगवान् रीझ जाते हैं—“मोरें अधिक दास पर प्रीती” (मानस, उत्तर0 16। 4)। गीताके अठारहवें अध्यायमें जब भगवान्के द्वारा “यथेच्छसि तथा कुरु” सुनकर अर्जुन घबरा गये, तब भगवान् दयापरवश होकर अर्जुनसे बोले कि तू मेरी शरणमें आ जा—“मामेकं शरणं व्रज” (18। 66) परन्तु ऐसा कहनेसे पहले भगवान्ने कहा कि यह सबसे अत्यन्त गोपनीय बात है (अठारहवें अध्यायका चौंसठवाँ श्लोक) और बादमें भी कहा कि इसे हर किसीको मत कहना (अठारहवें अध्यायका सड़सठवाँ श्लोक)। इससे सिद्ध होता है कि दूसरेको अपना दास बनानेकी नीयत न होनेपर भी अगर कोई दूसरा सहारा न मिलनेपर मनुष्य घबरा जाय और उनका दास बनना चाहे तो भगवान् दयापरवश होकर उसको स्वीकार कर लेते हैं। तात्पर्य यह हुआ कि जो किसी देवतापर श्रद्धा रखता है, उसकी श्रद्धाको भगवान् उस देवतामें दृढ़ कर देते हैं और जो भगवान्पर श्रद्धा रखता है, उसकी श्रद्धाको भगवान् अपनेमें दृढ़ कर दें— इसमें सन्देह ही क्या है! कारण कि भगवान्की दृष्टि भक्तके हितके लिये होती है, अपने स्वार्थके लिये नहीं। (मानस, सुन्दर0 34। 2)
1-जो अपनेको तथा दूसरेको भी जाने, वह “चेतन” है और जो अपनेको तथा दूसरेको भी नहीं जाने, वह “जड़” है।
2-जैसे यहाँ “यो यः, यां याम्” आया है, ऐसे ही आठवें अध्यायके छठे श्लोकमें “यं यं वापि स्मरन्भावम्” आया है। दो
बार “यत्” शब्दका अर्थात् “यो यः” “यां याम्” और “यं यम्” शब्दोंका प्रयोग करनेका तात्पर्य है कि जैसे मनुष्य उपासना करनेमें
स्वतन्त्र है अर्थात् देवताओंकी उपासना करे, चाहे मेरी उपासना करे—इसमें वह स्वतन्त्र है, ऐसे ही अन्तकालमें स्मरण करनेमें
भी मनुष्य सर्वथा स्वतन्त्र है अर्थात् मेरा स्मरण करे चाहे किसी औरका स्मरण करे—इसमें वह स्वतन्त्र है।
22श्रीभगवान्
तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते। लभते ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्॥ 22॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
पदच्छेद
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व्याख्या
1 section
स तया श्रद्धया युक्तः ................ मयैव विहितान्हि तान्
मेरे द्वारा दृढ़ की हुई श्रद्धासे सम्पन्न हुआ वह मनुष्य उस देवताकी आराधनाकी चेष्टा करता है और उस देवतासे जिस कामनापूर्तिकी आशा रखता है, उस कामनाकी पूर्ति होती है। यद्यपि वास्तवमें उस कामनाकी पूर्ति मेरे द्वारा ही की हुई होती है; परन्तु वह उसको देवतासे ही पूरी की हुई मानता है। वास्तवमें देवताओंमें मेरी ही शक्ति है और मेरे ही विधानसे वे उनकी कामनापूर्ति करते हैं। जैसे सरकारी अफसरोंको एक सीमित अधिकार दिया जाता है कि तुमलोग अमुक विभागमें अमुक अवसरपर इतना खर्च कर सकते हो, इतना इनाम दे सकते हो। ऐसे ही देवताओंमें एक सीमातक ही देनेकी शक्ति होती है; अतः वे उतना ही दे सकते हैं, अधिक नहीं। देवताओंमें अधिक-से-अधिक इतनी शक्ति होती है कि वे अपने- अपने उपासकोंको अपने-अपने लोकोंमें ले जा सकते हैं। परन्तु अपनी उपासनाका फल भोगनेपर उनको वहाँसे लौटकर पुनः संसारमें आना पड़ता है (गीता—आठवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)। यहाँ “मयैव” कहनेका तात्पर्य है कि संसारमें स्वतः जो कुछ संचालन हो रहा है, वह सब मेरा ही किया हुआ है। अतः जिस किसीको जो कुछ मिलता है, वह सब मेरे द्वारा विधान किया हुआ ही मिलता है। कारण कि मेरे सिवाय विधान करनेवाला दूसरा कोई नहीं है। अगर कोई मनुष्य इस रहस्यको समझ ले, तो फिर वह केवल मेरी तरफ ही खिंचेगा।
परिशिष्ट भाव
भगवान्ने सब देवताओंको अलग-अलग और सीमित अधिकार दिये हुए हैं। परन्तु भगवान्का अधिकार असीम है। भगवान्में यह विशेषता है कि वे किसीपर शासन नहीं करते, किसीको अपना गुलाम नहीं बनाते, किसीको अपना चेला नहीं बनाते, प्रत्युत हर एकको अपना मित्र बनाते हैं, अपने समान बनाते हैं। जैसे, निषादराज सिद्ध भक्त था, विभीषण साधक था और सुग्रीव विषयी था, पर भगवान् श्रीरामने तीनोंको ही अपना सखा बनाया। यह विशेषता देवताओं आदि किसीमें भी नहीं है। इसलिये वेदोंमें भी भगवान्को जीवका सखा बताया गया है— द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। गीतामें भी भगवान्ने अर्जुनको कहा है—“भक्तोऽसि मे सखा चेति” (4। 3)। यहाँ भगवान्ने “भक्त” तो अर्जुनकी दृष्टिसे कहा है*, पर अपनी दृष्टिसे “सखा” कहा है। “ममैवांशो जीवलोके” (15। 7)—इन पदोंमें भी भगवान्ने “एव” पदसे जीवको साक्षात् अपना स्वरूप बताया है। यह मेरा ही अंश है—ऐसा कहनेका तात्पर्य है कि इसमें प्रकृतिका अंश बिलकुल नहीं है। (मुण्डक0 3। 1। 1, श्वेता0 4। 6)
23श्रीभगवान्
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्। देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि॥ 23॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

अब भगवान् उपासनाके अनुसार फलका वर्णन करते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
2 sections
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्प- मेधसाम्
देवताओंकी उपासना करनेवाले अल्पबुद्धि- युक्त मनुष्योंको अन्तवाला अर्थात् सीमित और नाशवान् फल मिलता है। यहाँ शंका होती है कि भगवान्के द्वारा विधान किया हुआ फल तो नित्य ही होना चाहिये, फिर उनको अनित्य फल क्यों मिलता है? इसका समाधान यह है कि एक तो उनमें नाशवान् पदार्थोंकी कामना है और दूसरी बात, वे देवताओंको भगवान्से अलग मानते हैं। इसलिये उनको नाशवान् फल मिलता है। परन्तु उनको दो उपायोंसे अविनाशी फल मिल सकता है—एक तो वे कामना न रखकर (निष्कामभावसे) देवताओंकी उपासना करें तो उनको अविनाशी फल मिल जायगा और दूसरा, वे देवताओंको भगवान्से भिन्न न समझकर, अर्थात् भगवत्स्वरूप ही समझकर उनकी उपासना करें तो यदि कामना रह भी जायगी, तो भी समय पाकर उनको अविनाशी फल मिल सकता है अर्थात् भगवत्प्राप्ति हो सकती है। यहाँ “तत्” कहनेका तात्पर्य है कि फल तो मेरा विधान किया हुआ ही मिलता है, पर कामना होनेसे वह नाशवान् हो जाता है। यहाँ “अल्पमेधसाम्” कहनेका तात्पर्य है कि उनको नियम तो अधिक धारण करने पड़ते हैं तथा विधियाँ भी अधिक करनी पड़ती हैं, पर फल मिलता है सीमित और अन्तवाला। परन्तु मेरी आराधना करनेमें इतने नियमोंकी जरूरत नहीं है तथा उतनी विधियोंकी भी आवश्यकता नहीं है, पर फल मिलता है असीम और अनन्त। इस तरह देवताओंकी उपासनामें नियम हों अधिक, फल हो थोड़ा और हो जाय जन्म-मरणरूप बन्धन और मेरी आराधनामें नियम हों कम, फल हो अधिक और हो जाय कल्याण— ऐसा होनेपर भी वे उन देवताओंकी उपासनामें लगते हैं और मेरी उपासनामें नहीं लगते। इसलिये उनकी बुद्धि अल्प है, तुच्छ है।
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि
देवताओंका पूजन करनेवाले देवताओंको प्राप्त होते हैं और नित्य-सम्बन्धकी स्मृति हो जाती है; क्योंकि भगवान्का सम्बन्ध सदा रहनेवाला है। अतः भगवान्की प्राप्ति होनेपर फिर संसारमें लौटकर नहीं आना पड़ता—“यद्गत्वा न निवर्तन्ते” (15। 6)। परन्तु देवताओंका सम्बन्ध सदा रहनेवाला नहीं है; क्योंकि वह कर्मजनित है। अतः देवता- लोककी प्राप्ति होनेपर संसारमें लौटकर आना ही पड़ता है—“क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति” (9। 21)। मेरा भजन करनेवाले मेरेको ही प्राप्त होते हैं—इसी भावको लेकर भगवान्ने अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी—इन चारों प्रकारके भक्तोंको सुकृती और उदार कहा है (सातवें अध्यायका सोलहवाँ और अठारहवाँ श्लोक)। यहाँ “मद्भक्ता यान्ति मामपि” का तात्पर्य है कि जीव कैसे ही आचरणोंवाला क्यों न हो अर्थात् वह दुराचारी- से-दुराचारी क्यों न हो, आखिर है तो मेरा ही अंश। उसने केवल आसक्ति और आग्रहपूर्वक संसारके साथ सम्बन्ध जोड़ लिया है। अगर संसारकी आसक्ति और आग्रह न हो तो उसे मेरी प्राप्ति हो ही जायगी। मेरा पूजन करनेवाले मेरेको ही प्राप्त होते हैं। यहाँ “अपि” पदसे यह सिद्ध होता है कि मेरी उपासना करनेवालोंकी कामनापूर्ति भी हो सकती है और मेरी प्राप्ति तो हो ही जाती है अर्थात् मेरे भक्त सकाम हों या निष्काम, वे सब- के-सब मेरेको ही प्राप्त होते हैं। परन्तु भगवान्की उपासना करनेवालोंकी सभी कामनाएँ पूरी हो जायँ, यह नियम नहीं है। भगवान् उचित समझें तो पूरी कर भी दें और न भी करें अर्थात् उनका हित होता हो तो पूरी कर देते हैं और अहित होता हो तो कितना ही पुकारनेपर तथा रोनेपर भी पूरी नहीं करते। यह नियम है कि भगवान्का भजन करनेसे भगवान्के
परिशिष्ट भाव
देवताओंकी उपासना करनेवाले तो अधिक-से-अधिक देवताओंके पुनरावर्ती लोकोंमें ही जा सकते हैं, पर भगवान्की उपासना करनेवाले भगवान्को ही प्राप्त होते हैं। हाँ, अगर साधककी देवताओंमें भगवद्बुद्धि हो अथवा अपनेमें निष्कामभाव हो तो उसका उद्धार हो जायगा अर्थात् वह भी भगवान्को प्राप्त हो जायगा। परन्तु देवताओंमें भगवद्बुद्धि न हो और अपनेमें निष्कामभाव भी न हो तो उद्धार नहीं होगा। देवताओंकी उपासनाका दोष यह है कि उसका फल अन्तवाला अर्थात् नाशवान् होता है; क्योंकि देवता खुद भी सीमित अधिकारवाले हैं। अतः जो भगवान्को छोड़कर अन्य देवताओंकी उपासना करते हैं, वे अल्प बुद्धिवाले हैं। यदि वे अल्प बुद्धिवाले न होते तो नाशवान् फल देनेवाले देवताओंकी उपासना क्यों करते? भगवान्की ही उपासना करते अथवा देवताओंमें भगवद्बुद्धि करते। भगवान्की उपासना तो बड़ी सुगम है, उसमें विधिकी, नियमकी, परिश्रमकी जरूरत नहीं है। उसमें तो केवल भावकी ही प्रधानता है। परन्तु देवताओंकी उपासनामें क्रिया, विधि और पदार्थकी प्रधानता है। मनुष्यको संसारकी कितनी ही विद्याओंका, कला-कौशल आदिका ज्ञान हो जाय तो भी वह “अल्पमेधा” (तुच्छ बुद्धिवाला) ही है। वह ज्ञान वास्तवमें अज्ञानको दृढ़ करनेवाला है। परन्तु जिसने भगवान्को जान लिया है, उसको किसी सांसारिक विद्या, कला-कौशल आदिका ज्ञान न होनेपर भी वह “सर्ववित्” (सब कुछ जाननेवाला) है (गीता— पन्द्रहवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)!
विशेष बात
विशेष बात सब कुछ भगवत्स्वरूप ही है और भगवान्का विधान भी भगवत्स्वरूप है—ऐसा होते हुए भी भगवान्से भिन्न संसारकी सत्ता मानना और अपनी कामना रखना—ये दोनों ही पतनके कारण हैं। इनमेंसे यदि कामनाका सर्वथा नाश हो जाय तो संसार भगवत्स्वरूप दीखने लग जायगा और यदि संसार भगवत्स्वरूप दीखने लग जाय तो कामना मिट जायगी। फिर मात्र क्रियाओंके द्वारा भगवान्की सेवा होने लग जायगी। अगर संसारका भगवत्स्वरूप दीखना और कामनाका नाश होना—दोनों एक साथ हो जायँ, तो फिर कहना ही क्या है!
* अर्जुनकी दृष्टिसे इसलिये “भक्त” कहा कि अर्जुनने भगवान्की शरणागति स्वीकार की थी—“शाधि मां त्वां प्रपन्नम्”
(गीता 2। 7)
24श्रीभगवान्
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः। परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्॥ 24॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

यद्यपि देवताओंकी उपासनाका फल सीमित और अन्तवाला होता है, फिर भी मनुष्य उसमें क्यों उलझ जाते हैं, भगवान्में क्यों नहीं लगते—इसका उत्तर आगेके श्लोकमें देते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
1 section
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं ........... ममाव्यय- मनुत्तमम्
जो मनुष्य निर्बुद्धि हैं और जिनकी मेरेमें श्रद्धा-भक्ति नहीं है, वे अल्पमेधाके कारण अर्थात् समझकी कमीके कारण मेरेको साधारण मनुष्यकी तरह अव्यक्तसे व्यक्त होनेवाला अर्थात् जन्मने-मरनेवाला मानते हैं। मेरा जो अविनाशी अव्ययभाव है अर्थात् जिससे बढ़कर दूसरा कोई हो ही नहीं सकता और जो देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदिमें परिपूर्ण रहता हुआ इन सबसे अतीत, सदा एकरूप रहनेवाला, निर्मल और असम्बद्ध है—ऐसे मेरे अविनाशी भावको वे नहीं जानते और मेरा अवतार लेनेका जो तत्त्व है, उसको नहीं जानते। इसलिये वे मेरेको साधारण मनुष्य मानकर मेरी उपासना नहीं करते, प्रत्युत देवताओंकी उपासना करते हैं। “अबुद्धयः” पदका यह अर्थ नहीं है कि उनमें बुद्धिका अभाव है, प्रत्युत बुद्धिमें विवेक रहते हुए भी अर्थात् संसारको उत्पत्ति-विनाशशील जानते हुए भी इसे मानते नहीं—यही उनमें बुद्धिरहितपना है, मूढ़ता है। दूसरा भाव यह है कि कामनाको कोई रख नहीं सकता, कामना रह नहीं सकती; क्योंकि कामना पहले नहीं थी और कामनापूर्तिके बाद भी कामना नहीं रहेगी। वास्तवमें कामनाकी सत्ता ही नहीं है, फिर भी उसका त्याग नहीं कर सकते—यही अबुद्धिपना है। मेरे स्वरूपको न जाननेसे वे अन्य देवताओंकी उपासनामें लग गये और उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंकी कामनामें लग जानेसे वे बुद्धिहीन मनुष्य मेरेसे विमुख हो गये। यद्यपि वे मेरेसे अलग नहीं हो सकते तथा मैं भी उनसे अलग नहीं हो सकता, तथापि कामनाके कारण ज्ञान ढक जानेसे वे देवताओंकी तरफ खिंच जाते हैं। अगर वे मेरेको जान जाते, तो फिर केवल मेरा ही भजन करते। (1) बुद्धिमान् मनुष्य वे होते हैं, जो भगवान्के शरण होते हैं। वे भगवान्को ही सर्वोपरि मानते हैं। (2) अल्पमेधावाले मनुष्य वे होते हैं, जो देवताओंके शरण होते हैं। वे देवताओंको अपनेसे बड़ा मानते हैं, जिससे उनमें थोड़ी नम्रता, सरलता रहती है। (3) अबुद्धिवाले मनुष्य वे होते हैं, जो भगवान्को देवता-जैसा भी नहीं मानते; किन्तु साधारण मनुष्य-जैसा ही मानते हैं। वे अपनेको ही सर्वोपरि, सबसे बड़ा मानते हैं (गीता—सोलहवें अध्यायका चौदहवाँ-पन्द्रहवाँ श्लोक)। यही तीनोंमें अन्तर है। “परं भावमजानन्तः” का तात्पर्य है कि मैं अज रहता हुआ, अविनाशी होता हुआ और लोकोंका ईश्वर होता हुआ ही अपनी प्रकृतिको वशमें करके योगमायासे प्रकट होता हूँ—इस मेरे परमभावको बुद्धिहीन मनुष्य नहीं जानते। “अनुत्तमम्” कहनेका तात्पर्य है कि पन्द्रहवें अध्यायमें जिसको क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम बताया है अर्थात् जिससे उत्तम दूसरा कोई है ही नहीं, ऐसे मेरे अनुत्तम भावको वे नहीं जानते।
परिशिष्ट भाव
भगवान् व्यक्त भी हैं और अव्यक्त भी हैं, लौकिक भी हैं और अलौकिक भी हैं—“वासुदेवः सर्वम्” (गीता 7। 19), “सदसच्चाहमर्जुन” (गीता 9। 19)। परन्तु बुद्धिहीन मनुष्य भगवान्को उन प्राणियोंकी तरह अव्यक्तसे व्यक्त होनेवाला अर्थात् लौकिक (जन्मने-मरनेवाला) मानते हैं, जिनके लिये भगवान्ने कहा है— अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत। अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥ “हे भारत! सभी प्राणी जन्मसे पहले अप्रकट थे और मरनेके बाद अप्रकट हो जायँगे, केवल बीचमें ही प्रकट दीखते हैं; अतः इसमें शोक करनेकी बात ही क्या है?” भगवान् मनुष्योंकी तरह अव्यक्तसे व्यक्त नहीं होते, प्रत्युत अव्यक्त रहते हुए ही व्यक्त होते हैं और व्यक्त होते हुए भी अव्यक्त रहते हैं। “परम्”—भगवान् देवताओंकी उपासना करनेवालोंको श्रद्धा भी देते हैं और उनकी उपासनाका फल भी देते हैं— यह भगवान्का परम अर्थात् पक्षपातरहित भाव है। “अव्ययम्”—देवता सापेक्ष अविनाशी (अमर) हैं, सर्वथा अविनाशी नहीं। परन्तु भगवान् निरपेक्ष अविनाशी हैं। उनके समान अविनाशी दूसरा कोई नहीं है और हो भी नहीं सकता। “अनुत्तमम्”—भगवान् प्राणिमात्रका हित चाहते हैं—यह भगवान्का सर्वश्रेष्ठ भाव है। इससे श्रेष्ठ दूसरा कोई भाव हो ही नहीं सकता। (गीता 2। 28)
विशेष बात
विशेष बात इस (चौबीसवें) श्लोकका अर्थ कोई ऐसा करते हैं कि “(ये) अव्यक्तं मां व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते (ते) अबुद्धयः” अर्थात् जो सदा निराकार रहनेवाले मेरेको केवल साकार मानते हैं, वे निर्बुद्धि हैं; क्योंकि वे मेरे अव्यक्त, निर्विकार और निराकार स्वरूपको नहीं जानते। दूसरे कोई ऐसा अर्थ करते हैं कि “(ये) व्यक्तिमापन्नं माम् अव्यक्तं मन्यन्ते (ते) अबुद्धयः” अर्थात् मैं अवतार लेकर तेरा सारथि बना हुआ हूँ—ऐसे मेरेको केवल निराकार मानते हैं, वे निर्बुद्धि हैं; क्योंकि वे मेरे सर्वश्रेष्ठ अविनाशी भावको नहीं जानते। उपर्युक्त दोनों अर्थोंमेंसे कोई भी अर्थ ठीक नहीं है। कारण कि ऐसा अर्थ माननेपर केवल निराकारको माननेवाले साकाररूपकी और साकाररूपके उपासकोंकी निन्दा करेंगे और केवल साकार माननेवाले निराकाररूपकी और निराकाररूपके उपासकोंकी निन्दा करेंगे। यह सब एकदेशीयपना ही है। पृथ्वी, जल, तेज आदि जो महाभूत हैं, जो कि विनाशी और विकारी हैं, वे भी दो-दो तरहके होते हैं— स्थूल और सूक्ष्म। जैसे, स्थूलरूपसे पृथ्वी साकार है और परमाणुरूपसे निराकार है; जल बर्फ, बूँदें, बादल और भापरूपसे साकार है और परमाणुरूपसे निराकार है; तेज (अग्नितत्त्व) काठ और दियासलाईमें रहता हुआ निराकार है और प्रज्वलित होनेसे साकार है, इत्यादि। इस तरहसे भौतिक सृष्टिके भी दोनों रूप होते हैं और दोनों होते हुए भी वास्तवमें वह दो नहीं होती। साकार होनेपर निराकारमें कोई बाधा नहीं लगती और निराकार होनेपर साकारमें कोई बाधा नहीं लगती। फिर परमात्माके साकार और निराकार दोनों होनेमें क्या बाधा है? अर्थात् कोई बाधा नहीं। वे साकार भी हैं और निराकार भी हैं, सगुण भी हैं और निर्गुण भी हैं। गीता साकार-निराकार, सगुण-निर्गुण—दोनोंको मानती है। नवें अध्यायके चौथे श्लोकमें भगवान्ने अपनेको “अव्यक्तमूर्ति” कहा है। चौथे अध्यायके छठे श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि मैं अज होता हुआ भी प्रकट होता हूँ, अविनाशी होता हुआ भी अन्तर्धान हो जाता हूँ और सबका ईश्वर होता हुआ भी आज्ञापालक (पुत्र और शिष्य) बन जाता हूँ। अतः निराकार होते हुए साकार होनेमें और साकार होते हुए निराकार होनेमें भगवान्में किंचिन्मात्र भी अन्तर नहीं आता। ऐसे भगवान्के स्वरूपको न जाननेके कारण लोग उनके विषयमें तरह-तरहकी कल्पनाएँ किया करते हैं।
25श्रीभगवान्
ाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः। मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्॥ 25॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

भगवान्को साधारण मनुष्य माननेमें क्या कारण है? इसपर आगेका श्लोक कहते हैं।

पदच्छेद
श्लोकमें ढूँढ़नेके लिये हॉवर करें
व्याख्या
2 sections
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामज- मव्ययम्
मैं अज और अविनाशी हूँ अर्थात् जन्म- मरणसे रहित हूँ। ऐसा होनेपर भी मैं प्रकट और अन्तर्धान होनेकी लीला करता हूँ अर्थात् जब मैं अवतार लेता हूँ, तब अज (अजन्मा) रहता हुआ ही अवतार लेता हूँ और अव्ययात्मा रहता हुआ ही अन्तर्धान हो जाता हूँ। जैसे सूर्य भगवान् उदय होते हैं तो हमारे सामने आ जाते हैं और अस्त होते हैं तो हमारे नेत्रोंसे ओझल हो जाते हैं, छिप जाते हैं, ऐसे ही मैं केवल प्रकट और अन्तर्धान होनेकी लीला करता हूँ। जो मेरेको इस प्रकार जन्म-मरणसे रहित मानते हैं, वे तो असम्मूढ हैं (गीता—दसवें अध्यायका तीसरा और पन्द्रहवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)। परन्तु जो मेरेको साधारण प्राणियोंकी तरह जन्मने-मरनेवाला मानते हैं, वे मूढ़ हैं (गीता—नवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)। भगवान्को अज, अविनाशी न माननेमें कारण है कि इस मनुष्यका भगवान्के साथ जो स्वतः अपनापन है, उसको भूलकर इसने शरीरको अपना मान लिया कि “यह शरीर ही मैं हूँ और यह शरीर मेरा है।” इसलिये उसके सामने परदा आ गया, जिससे वह भगवान्को भी अपने समान ही जन्मने- मरनेवाला मानने लगा। मूढ़ मनुष्य मेरेको अज और अविनाशी नहीं जानते। उनके न जाननेमें दो कारण हैं—एक तो मेरा योगमायासे छिपा रहना और एक उनकी मूढ़ता। जैसे, किसी शहरमें किसीका एक घर है और वह अपने घरमें बंद है तथा शहरके सब-के-सब घर शहरकी चहारदीवारी (परकोटे) में बंद हैं। अगर वह मनुष्य बाहर निकलना चाहे तो अपने घरसे निकल सकता है, पर शहरकी चहारदीवारीसे निकलना उसके हाथकी बात नहीं है। हाँ, यदि उस शहरका राजा चाहे तो वह चहारदीवारीका दरवाजा भी खोल सकता है और उसके घरका दरवाजा भी खोल सकता है। अगर वह मनुष्य अपने घरका दरवाजा नहीं खोल सकता तो राजा उस दरवाजेको तोड़ भी सकता है। ऐसे ही यह प्राणी अपनी मूढ़ताको दूर करके अपने नित्य स्वरूपको जान सकता है। परन्तु सर्वथा भगवत्तत्त्वका बोध तो भगवान्की कृपासे ही हो सकता है। भगवान् जिसको जनाना चाहें, वही उनको जान सकता है—“सोइ जानइ जेहि देहु जनाई” (मानस 2। 127। 2)। अगर मनुष्य सर्वथा भगवान्के शरण हो जाय तो भगवान् उसके अज्ञानको भी दूर कर देते हैं और अपनी मायाको भी दूर कर देते हैं।
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः
उन सबके सामने अर्थात् उस मूढ़ समुदायके सामने मैं भगवद्रूपसे प्रकट नहीं होता। कारण कि वे मेरेको अज-अविनाशी भगवद्रूपसे जानना अथवा मानना ही नहीं चाहते, प्रत्युत वे मेरेको साधारण मनुष्य मानकर मेरी अवहेलना करते हैं। अतः उनके सामने मैं अपने भगवत्-स्वरूपसे कैसे प्रकट होऊँ? तात्पर्य है कि जो मेरेको अज-अविनाशी नहीं मानते, प्रत्युत मेरेको जन्मने-मरनेवाला मानते हैं, उनके सामने मैं अपनी योगमायामें छिपा रहता हूँ और सामान्य मनुष्य-जैसा ही रहता हूँ। परन्तु जो मेरेको अज, अविनाशी और सम्पूर्ण प्राणियोंका ईश्वर मानते हैं, मेरेमें श्रद्धा-विश्वास रखते हैं, उनके भावोंके अनुसार मैं उनके सामने प्रकट रहता हूँ। भगवान्की योगमाया विचित्र, विलक्षण, अलौकिक है। मनुष्योंका भगवान्के प्रति जैसा भाव होता है, उसके अनुसार ही वे योगमाया-समावृत भगवान्को देखते हैं।* यहाँ भगवान्ने कहा है कि जो मेरेको अज-अविनाशी नहीं जानते, वे मूढ़ हैं और दसवें अध्यायके दूसरे श्लोकमें कहा है कि देवता और महर्षि मेरे प्रभावको नहीं जानते। इसपर शंका होती है कि भगवान्को अज-अविनाशी नहीं जानना और उनके प्रभवको नहीं जानना—ये दोनों बातें तो एक ही हो गयीं; परन्तु यहाँ न जाननेवालोंको मूढ़ बताया है और वहाँ उनको मूढ़ नहीं बताया है, ऐसा क्यों? इसका समाधान है कि भगवान्के प्रभवको अर्थात् प्रकट होनेको न जानना दोषी नहीं है; क्योंकि वहाँ भगवान्ने स्वयं कहा है कि मैं सब तरहसे देवताओं और महर्षियोंका आदि हूँ। जैसे बालक अपने पिताके जन्मको कैसे देख सकता है? क्योंकि वह उस समय पैदा ही नहीं हुआ था। वह तो पितासे पैदा हुआ है। अतः उसका पिताके जन्मको न जानना दोषी नहीं है। ऐसे ही भगवान्के प्रकट होनेके हेतुओंको पूरा न जानना देवताओं और महर्षियोंके लिये कोई दोषी नहीं है। भगवान्के प्रकट होनेको कोई सर्वथा जान ही नहीं सकता। इसलिये वहाँ देवताओं और महर्षियोंको मूढ़ नहीं बताया है। मनुष्य भगवान्को अज-अविनाशी जान सकते हैं अर्थात् मान सकते हैं। अगर वे भगवान्को अज-अविनाशी नहीं मानते तो यह उनका दोष है। इसलिये उनको यहाँ मूढ़ कहा है।
परिशिष्ट भाव
जो बुद्धिहीन मनुष्य भगवान्को नहीं मानते, भगवान् अवतारकालमें सबके सामने प्रकट होते हुए भी उनके सामने प्रकट नहीं होते—“ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्” (गीता 4। 11)। वास्तवमें भगवान् अप्रकट रहना चाहते नहीं, पर जो उनको नहीं मानते, उनके सामने वे कैसे प्रकट हों? अवतारकालमें भगवान् लौकिक रूपमें दीखनेपर भी वास्तवमें सदा अलौकिक ही रहते हैं। परन्तु राग-द्वेषके कारण अज्ञानी मनुष्योंको भगवान् लौकिक दीखते हैं अर्थात् भगवान्रूपसे न दीखकर मनुष्यरूपसे ही दीखते हैं।
* (1) मल्लानामशनिर्नृणां नरवरः स्त्रीणां स्मरो मूर्तिमान्
गोपानां स्वजनोऽसतां क्षितिभुजां शास्ता स्वपित्रोः शिशुः।
मृत्युर्भोजपतेर्विराडविदुषां तत्त्वं परं योगिनां
वृष्णीनां
परदेवतेति
विदितो
रंगं
गतः
साग्रजः॥ (श्रीमद्भा0 10। 43। 17)
26श्रीभगवान्
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि ार्जुभविष्याणि भूतानि मां तु वेदकश्चन॥ 26॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

जो भगवान्को अज-अविनाशी नहीं मानते, उनके ही सामने मायाका परदा रहता है, पर भगवान्के सामने वह परदा नहीं रहता—इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
2 sections
वेदाहं समतीतानि ....... मां तु वेद न कश्चन
यहाँ भगवान्ने प्राणियोंके लिये तो भूत, वर्तमान और भविष्यकालके तीन विशेषण दिये हैं; परन्तु अपने लिये “अहं वेद” पदोंसे केवल वर्तमानकालका ही प्रयोग किया है। इसका तात्पर्य यह है कि भगवान्की दृष्टिमें भूत, भविष्य और वर्तमान—ये तीनों काल वर्तमान ही हैं। अतः भूतके प्राणी हों, भविष्यके प्राणी हों अथवा वर्तमानके प्राणी हों—सभी भगवान्की दृष्टिमें वर्तमान होनेसे भगवान् सभीको जानते हैं। भूत, भविष्य और वर्तमान—ये तीनों काल तो प्राणियोंकी दृष्टिमें हैं, भगवान्की दृष्टिमें नहीं। जैसे सिनेमा देखनेवालोंके लिये भूत, वर्तमान और भविष्य- कालका भेद रहता है, पर सिनेमाकी फिल्ममें सब कुछ वर्तमान है, ऐसे ही प्राणियोंकी दृष्टिमें भूत, वर्तमान और भविष्यकालका भेद रहता है, पर भगवान्की दृष्टिमें सब कुछ वर्तमान ही रहता है। कारण कि सम्पूर्ण प्राणी कालके अन्तर्गत हैं और भगवान् कालसे अतीत हैं। देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदि बदलते रहते हैं और भगवान् हरदम वैसे-के-वैसे ही रहते हैं। कालके अन्तर्गत आये हुए प्राणियोंका ज्ञान सीमित होता है और भगवान्का ज्ञान असीम है। उन प्राणियोंमें भी कोई योगका अभ्यास करके ज्ञान बढ़ा लेंगे तो वे “युञ्जान योगी” होंगे और जिस समय जिस वस्तुको जानना चाहेंगे, उस समय उसी वस्तुको वे जानेंगे। परन्तु भगवान् तो “युक्त योगी हैं” अर्थात् बिना योगका अभ्यास किये ही वे मात्र जीवोंको और मात्र संसारको सब समय स्वतः जानते हैं। भूत, भविष्य और वर्तमानके सभी जीव नित्य-निरन्तर भगवान्में ही रहते हैं, भगवान्से कभी अलग हो ही नहीं सकते। भगवान्में भी यह ताकत नहीं है कि वे जीवोंसे अलग हो जायँ! अतः प्राणी कहीं भी रहें, वे कभी भी भगवान्की दृष्टिसे ओझल नहीं हो सकते। “मां तु वेद न कश्चन” का तात्पर्य है कि पूर्वश्लोकमें कहे हुए मूढ़ समुदायमेंसे मेरेको कोई नहीं जानता अर्थात् जो मेरेको अज और अविनाशी नहीं मानते, प्रत्युत मेरेको साधारण मनुष्य-जैसा जन्मने-मरनेवाला मानते हैं, उन मूढ़ोंमेंसे मेरेको कोई भी नहीं जानता, पर मैं सबको जानता हूँ। जैसे बाँसकी चिक दरवाजेपर लटका देनेसे भीतरवाले तो बाहरवालोंको पूर्णतया देखते हैं, पर बाहरवाले केवल दरवाजेपर टँगी हुई चिकको ही देखते हैं, भीतरवालोंको नहीं। ऐसे ही योगमायारूपी चिकसे अच्छी तरहसे आवृत होनेके कारण भगवान्को मूढ़ लोग नहीं देख पाते, पर भगवान् सबको देखते हैं। यहाँ एक शंका होती है कि भगवान् जब भविष्यमें होनेवाले सब प्राणियोंको जानते हैं, तो किसकी मुक्ति होगी और कौन बन्धनमें रहेगा—यह भी जानते ही हैं; क्योंकि भगवान्का ज्ञान नित्य है। अतः वे जिनकी मुक्ति जानते हैं, उनकी तो मुक्ति होगी और जिनको बन्धनमें जानते हैं, वे बन्धनमें ही रहेंगे। भगवान्की इस सर्वज्ञतासे तो मनुष्यकी मुक्ति परतन्त्र हो गयी, मनुष्यके प्रयत्नसे साध्य नहीं रही। इसका समाधान यह है कि भगवान्ने अपनी तरफसे मनुष्यको अन्तिम जन्म दिया है। अब इस जन्ममें मनुष्य अपना उद्धार कर ले अथवा पतन कर ले—यह उसके ऊपर निर्भर करता है (गीता—सातवें अध्यायका सत्ताईसवाँ और आठवें अध्यायका छठा श्लोक)। उसके उद्धार अथवा पतनका निर्णय भगवान् नहीं करते। इसी अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें भगवान् यह कह आये हैं कि बहुत जन्मोंके इस अन्तिम मनुष्यजन्ममें जो “सब कुछ वासुदेव ही है” ऐसे मेरे शरण होता है, वह महात्मा दुर्लभ है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि मनुष्यशरीरमें सम्पूर्ण प्राणियोंको यह स्वतन्त्रता है कि वे अपने अनन्त जन्मोंके संचित कर्म-समुदायका नाश करके भगवान्को प्राप्त कर सकते हैं, अपनी मुक्ति कर सकते हैं। अगर यही माना जाय कि कौन-सा प्राणी आगे किस गतिमें जायगा— ऐसा भगवान्का संकल्प है, तो फिर अपना उद्धार करनेमें मनुष्यकी स्वतन्त्रता ही नहीं रहेगी और
ऐसा करो, ऐसा मत करो
यह भगवान्, सन्त, शास्त्र, गुरु आदिका उपदेश भी व्यर्थ हो जायगा। इसके सिवाय “जो-जो मनुष्य जिस-जिस देवताकी उपासना करना चाहता है, उस-उस देवताके प्रति मैं उसकी श्रद्धा दृढ़ कर देता हूँ” (सातवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक) और “अन्त-समयमें मनुष्य जिस-जिस भावका स्मरण करके शरीर छोड़ता है, वह उस-उसको ही प्राप्त होता है” (आठवें अध्यायका छठा श्लोक)—इस तरह उपासना और अन्तकालीन स्मरणमें स्वतन्त्रता भी नहीं रहेगी, जो भगवान्ने मनुष्यमात्रको दे रखी है। बिना कारण कृपा करनेवाले प्रभु जीवको मनुष्यशरीर देते हैं*, जिससे यह जीव मनुष्यशरीर पाकर स्वतन्त्रतासे अपना कल्याण कर ले। गीतामें ग्यारहवें अध्यायके तैंतीसवें श्लोकमें जैसे भगवान्ने अर्जुनसे कहा—“मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्” अर्थात् मेरे द्वारा ये पहले ही मारे जा चुके हैं, तू केवल निमित्तमात्र बन जा। ऐसे ही मनुष्यमात्रको विवेक और उद्धारकी पूरी सामग्री देकर भगवान्ने कहा है कि तू अपना उद्धार कर ले अर्थात् अपने उद्धारमें तू केवल निमित्तमात्र बन जा, मेरी कृपा तेरे साथ है। इस मनुष्यशरीररूपी नौकाको पाकर मेरी कृपारूपी अनुकूल हवासे जो भवसागरको नहीं तरता अर्थात् अपना उद्धार नहीं करता, वह आत्महत्यारा है—“मयानुकूलेन नभस्वतेरितं पुमान् भवाब्धिं न तरेत् स आत्महा” (श्रीमद्भा0 11। 20। 17)। गीतामें भी भगवान्ने कहा है कि जो परमात्माको सब जगह समान रीतिसे परिपूर्ण देखता है, वह अपनी हत्या नहीं करता, इसलिये वह परमगतिको प्राप्त होता है (तेरहवें अध्यायका अट्ठाईसवाँ श्लोक)। इससे भी यह सिद्ध हुआ कि मनुष्यशरीर प्राप्त होनेपर अपना उद्धार करनेका अधिकार, सामर्थ्य, समझ आदि पूरी सामग्री मिलती है। ऐसा अमूल्य अवसर पाकर भी जो अपना उद्धार नहीं करता, वह अपनी हत्या करता है और इसीसे वह जन्म-मरणमें जाता है। अगर यह जीव मनुष्यशरीर पाकर शास्त्र और भगवान्से विरुद्ध न चले तथा मिली हुई सामग्रीका ठीक-ठीक उपयोग करे, तो इसकी मुक्ति स्वतःसिद्ध है। इसमें कोई बाधा लग ही नहीं सकती। मनुष्यके लिये यह खास बात है कि भगवान्ने कृपा करके जो सामर्थ्य, समझ आदि सामग्री दी है, उसका मैं दुरुपयोग नहीं करूँगा, भगवान्के सिद्धान्तके विरुद्ध नहीं चलूँगा—ऐसा वह अटल निश्चय कर ले और उस निश्चयपर डटा रहे। अगर अपनी असामर्थ्यसे कभी दुरुपयोग भी हो जाय तो मनमें उसकी जलन पैदा हो जाय और भगवान्से कह दे कि “हे नाथ! मेरेसे गलती हो गयी, अब ऐसी गलती कभी नहीं करूँगा। हे नाथ! ऐसा बल दो, जिससे कभी आपके सिद्धान्तसे विपरीत न चलूँ” तो उसका प्रायश्चित्त हो जाता है और भगवान्से मदद मिलती है। मनुष्यकी असामर्थ्य दो तरहसे होती है—एक असामर्थ्य यह होती है कि वह कर ही नहीं सकता; जैसे—किसी नौकरसे कोई मालिक यह कह दे कि तुम इस मकानको उठाकर एक मीलतक ले जाकर रख दो, तो वह यह काम कर ही नहीं सकता। दूसरी असामर्थ्य यह होती है कि वह कर तो सकता है और करना चाहता भी है, फिर भी समयपर प्रमादवश नहीं करता। यह असामर्थ्य साधकमें आती रहती है। इसको दूर करनेके लिये साधक भगवान्से कहे कि “हे नाथ! मैं ऐसा प्रमाद फिर कभी न करूँ, ऐसी मेरेको शक्ति दो।” भगवान्की ही दी हुई स्वतन्त्रताके कारण भगवान् ऐसा संकल्प कभी कर ही नहीं सकते कि इस जीवके इतने जन्म होंगे। इतना ही नहीं, चर-अचर अनन्त जीवोंके लिये भी भगवान् ऐसा संकल्प नहीं करते कि उनके अनेक जन्म होंगे। हाँ, यह बात जरूर है कि मनुष्यके सिवाय दूसरे प्राणियोंके पीछे परम्परासे कर्म-फलोंका ताँता लगा हुआ है, जिससे वे बार-बार जन्मते-मरते रहते हैं। ऐसी परम्परामें पड़े हुए जीवोंमेंसे कोई जीव किसी कारणसे मनुष्यशरीरमें अथवा किसी अन्य योनिमें भी प्रभुके चरणोंकी शरण हो जाता है, तो भगवान् उसके अनन्त जन्मोंके पापोंको नष्ट कर देते हैं—
परिशिष्ट भाव
यहाँ शंका हो सकती है कि जब भगवान् सब जीवोंको जानते ही हैं तो फिर जिसको बद्ध जानते हैं, वह बद्ध ही रहेगा और जिसको मुक्त जानते हैं, वही मुक्त होगा; क्योंकि भगवान्का ज्ञान नित्य है! यह शंका वस्तुतः संसारकी सत्ता और महत्ताको लेकर (हमारी दृष्टिमें) है। वास्तवमें भगवान् और महात्मा—दोनोंकी ही दृष्टिमें संसार नहीं है, प्रत्युत केवल भगवान् ही हैं—“वासुदेवः सर्वम्”। हमने ही अहम्के कारण संसारको सत्ता और महत्ता दे रखी है। इसलिये भगवान् हमारी भाषामें भूत-भविष्य-वर्तमानकी बात कहते हैं। अगर वे हमारी भाषामें नहीं बोलेंगे तो हम समझेंगे कैसे? जैसे, हमें अँग्रेजी भाषा सिखानेवाला अगर अँग्रेजी भाषामें ही बोले तो हम अँग्रेजी सीख ही नहीं सकेंगे। भगवान्का ज्ञान नित्य है। सब कुछ भगवान्के ज्ञानके अन्तर्गत है। उनके ज्ञानसे बाहर कुछ भी नहीं है। भगवान्के ज्ञानमें उनके सिवाय कुछ नहीं है—“मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति” (गीता 7। 7)। जीवने ही अहम्के कारण (अज्ञानसे) जगत्को धारण कर रखा है—“ययेदं धार्यते जगत्” (गीता 7। 5)। अतः बन्धन और मोक्ष जीवके ही बनाये हुए हैं। तत्त्वसे न बन्धन है, न मोक्ष; किन्तु केवल परमात्मा ही हैं*। दो बार “च” पद देनेका तात्पर्य है कि कोई भी काल स्थायी नहीं है। न भूतकाल सदा रहता है, न वर्तमान सदा रहता है और न भविष्य सदा रहता है, पर भगवान् सदा रहते हैं। जैसे भूतकाल और भविष्यकाल अभी नहीं हैं, ऐसे ही वर्तमानकाल भी नहीं है। भूतकाल और भविष्यकालकी सन्धिको ही वर्तमानकाल कह देते हैं। पाणिनि- व्याकरणका एक सूत्र है—“वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवद्वा” (3। 3। 131) अर्थात् वर्तमानसामीप्य भी वर्तमानकी तरह होता है। जैसे, भूतकालको लेकर कहते हैं कि “मैं अभी आया हूँ” और भविष्यकालको लेकर कहते हैं कि “मैं अभी जा रहा हूँ”—यह वर्तमानसामीप्य है। वास्तवमें वर्तमानसामीप्यको ही वर्तमानकाल कह देते हैं। अगर वर्तमानकाल वास्तवमें होता तो वह कभी भूतकालमें परिणत नहीं होता। वास्तवमें काल वर्तमान नहीं है, प्रत्युत भगवान् ही वर्तमान हैं। तात्पर्य है कि जो प्रतिक्षण बदलता है, वह वर्तमान नहीं है, प्रत्युत जो कभी नहीं बदलता, वही वर्तमान है। इसलिये भगवान्ने श्लोकके आरम्भमें वर्तमान-क्रिया दी है—“वेदाहम्” (मैं जानता हूँ)। भगवान् भूत, भविष्य और वर्तमान—सबमें सदा वर्तमान हैं, पर भगवान्में न भूत है, न भविष्य है और न वर्तमान है। भगवान्का वर्तमानपना कालके अधीन नहीं है; क्योंकि भगवान् कालातीत हैं। काल न भगवान्की दृष्टिमें है, न महात्माकी दृष्टिमें।
“जिस समय भगवान् श्रीकृष्ण बलरामजीके साथ रंगभूमिमें पधारे, उस समय वे पहलवानोंको वज्रकठोर-शरीर,
साधारण मनुष्योंको नर-रत्न, स्त्रियोंको मूर्तिमान् कामदेव, गोपोंको स्वजन, दुष्ट राजाओंको दण्ड देनेवाले शासक, माता-
पिताके समान बड़े-बूढ़ोंको शिशु, कंसको मृत्यु, अज्ञानियोंको विराट्, योगियोंको परमतत्त्व और भक्तशिरोमणि
वृष्णिवंशियोंको अपने इष्टदेव जान पड़े।”
(2) जिन्ह कें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी। (मानस 1। 241। 2)
* कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हेतु सनेही॥ (मानस 7। 44। 3)
कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥
(मानस 5। 44। 1)
* न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः। न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता॥ (आत्मोपनिषद् 31)
“न प्रलय है और न उत्पत्ति है, न बद्ध है और न साधक है, न मुमुक्षु है और न मुक्त है—यही परमार्थता अर्थात् वास्तविक
तत्त्व है।”
27श्रीभगवान्
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारतसर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप॥ 27॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

पूर्वश्लोकमें भगवान्ने यह कहा कि मुझे कोई भी नहीं जानता, तो भगवान्को न जाननेमें मुख्य कारण क्या है? इसका उत्तर आगेके श्लोकमें देते हैं।

पदच्छेद
श्लोकमें ढूँढ़नेके लिये हॉवर करें
व्याख्या
1 section
इच्छाद्वेषसमुत्थेन ............... सर्गे यान्ति परन्तप
इच्छा और द्वेषसे द्वन्द्वमोह पैदा होता है, जिससे मोहित होकर प्राणी भगवान्से बिलकुल विमुख हो जाते हैं और विमुख होनेसे बार-बार संसारमें जन्म लेते हैं। मनुष्यको संसारसे विमुख होकर केवल भगवान्में लगनेकी आवश्यकता है। भगवान्में न लगनेमें बड़ी बाधा क्या है? यह मनुष्यशरीर विवेक-प्रधान है; अतः मनुष्यकी प्रवृत्ति और निवृत्ति पशु-पक्षियोंकी तरह न होकर अपने विवेकके अनुसार होनी चाहिये। परन्तु मनुष्य अपने विवेकको महत्त्व न देकर राग और द्वेषको लेकर ही प्रवृत्ति और निवृत्ति करता है, जिससे उसका पतन होता है। मनुष्यकी दो मनोवृत्तियाँ हैं—एक तरफ लगाना और एक तरफसे हटाना। मनुष्यको परमात्मामें तो अपनी वृत्ति लगानी है और संसारसे अपनी वृत्ति हटानी है अर्थात् परमात्मासे तो प्रेम करना है और संसारसे वैराग्य करना है। परन्तु इन दोनों वृत्तियोंको जब मनुष्य केवल संसारमें ही लगा देता है, तब वही प्रेम और वैराग्य क्रमशः राग और द्वेषका रूप धारण कर लेते हैं, जिससे मनुष्य संसारमें उलझ जाता है और भगवान्से सर्वथा विमुख हो जाता है। फिर भगवान्की तरफ चलनेका अवसर ही नहीं मिलता। कभी-कभी वह सत्संगकी बातें भी सुनता है, शास्त्र भी पढ़ता है, अच्छी बातोंपर विचार भी करता है, मनमें अच्छी बातें पैदा हो जाती हैं तो उनको ठीक भी समझता है। फिर भी उसके मनमें रागके कारण यह बात गहरी बैठी रहती है कि मुझे तो सांसारिक अनुकूलताको प्राप्त करना है और प्रतिकूलताको हटाना है, यह मेरा खास काम है; क्योंकि इसके बिना मेरा जीवन-निर्वाह नहीं होगा। इस प्रकार वह हृदयमें दृढ़तासे राग-द्वेषको पकड़े रखता है; जिससे सुनने, पढ़ने और विचार करनेपर भी उसकी वृत्ति राग-द्वेषरूप द्वन्द्वको नहीं छोड़ती। इसीसे वह परमात्माकी तरफ चल नहीं सकता। द्वन्द्वोंमें भी अगर उसका राग मुख्यरूपसे एक ही विषयमें हो जाय, तो भी ठीक है। जैसे, भक्त बिल्वमंगलकी वृत्ति चिन्तामणि नामक वेश्यामें लग गयी, तो उनकी वृत्ति संसारसे तो हट ही गयी। जब वेश्याने यह ताड़ना की—“ऐसे हाड़-मांसके शरीरमें तू आकृष्ट हो गया, अगर भगवान्में इतना आकृष्ट हो जाता तो तू निहाल हो जाता” तब उनकी वृत्ति वेश्यासे हटकर भगवान्में लग गयी और उनका उद्धार हो गया। इसी तरहसे गोपियोंका भगवान्में राग हो गया, तो वह राग भी कल्याण करनेवाला हो गया। शिशुपालका भगवान्के साथ वैर (द्वेष) रहा तो वैरपूर्वक भगवान्का चिन्तन करनेसे भी उसका कल्याण हो गया। कंसको भगवान्से भय हुआ, तो भयवृत्तिसे भगवान्का चिन्तन करनेसे उसका भी कल्याण हो गया। हाँ, यह बात जरूर है कि वैर और भयसे भगवान्का चिन्तन करनेसे शिशुपाल और कंस भक्तिके आनन्दको नहीं ले सके। तात्पर्य यह है कि किसी भी तरहसे भगवान्की तरफ आकर्षण हो जाय तो मनुष्यका उद्धार हो जाता है। परन्तु संसारमें राग-द्वेष, काम-क्रोध, ठीक-बेठीक, अनुकूल- प्रतिकूल आदि द्वन्द्व रहनेसे मूढ़ता दृढ़ होती है और मनुष्यका पतन हो जाता है। दूसरी रीतिसे यों समझें कि संसारका सम्बन्ध द्वन्द्वसे दृढ़ होता है। जब कामनाको लेकर मनोवृत्तिका प्रवाह संसारकी तरफ हो जाता है, तब सांसारिक अनुकूलता और प्रतिकूलताको लेकर राग-द्वेष हो जाते हैं अर्थात् एक ही पदार्थ कभी ठीक लगता है, कभी बेठीक लगता है; कभी उसमें राग होता है, कभी द्वेष होता है, जिनसे संसारका सम्बन्ध दृढ़ हो जाता है। इसलिये भगवान्ने दूसरे अध्यायमें “निर्द्वन्द्वः” (2। 45) पदसे द्वन्द्वरहित होनेकी आज्ञा दी है। निर्द्वन्द्व पुरुष सुखपूर्वक मुक्त होता है—“निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते” (5। 3)। सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंसे रहित होकर भक्तजन अविनाशी पदको प्राप्त होते हैं—“द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःख- सञ्ज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्” (15। 5)। भगवान्ने द्वन्द्वको मनुष्यका खास शत्रु बताया है (तीसरे अध्यायका चौंतीसवाँ श्लोक)। जो द्वन्द्वमोहसे रहित होते हैं, वे दृढ़व्रती होकर भगवान्का भजन करते हैं (सातवें अध्यायका अट्ठाईसवाँ श्लोक) इत्यादि रूपसे गीतामें द्वन्द्वरहित होनेकी बात बहुत बार आयी है। जन्म-मरणमें जानेका कारण क्या है? शास्त्रोंकी दृष्टिसे तो जन्म-मरणका कारण अज्ञान है; परन्तु सन्तवाणीको देखा जाय तो जन्म-मरणका खास कारण रागके कारण प्राप्त परिस्थितिका दुरुपयोग है। फलेच्छापूर्वक शास्त्रविहित कर्म करनेसे और प्राप्त परिस्थितिका दुरुपयोग करनेसे अर्थात् भगवदाज्ञा-विरुद्ध कर्म करनेसे सत्-असत् योनियोंकी प्राप्ति होती है अर्थात् देवताओंकी योनि, चौरासी लाख योनि और नरक प्राप्त होते हैं। प्राप्त परिस्थितिका सदुपयोग करनेसे सम्मोह अर्थात् जन्म-मरण मिट जाता है। उसका सदुपयोग कैसे करें? हमारेको जो अवस्था, परिस्थिति मिली है, उसका दुरुपयोग न करनेका निर्णय किया जाय कि “हम दुरुपयोग नहीं करेंगे अर्थात् शास्त्र और लोक-मर्यादाके विरुद्ध काम नहीं करेंगे।” इस प्रकार रागरहित होकर दुरुपयोग न करनेका निर्णय होनेपर सदुपयोग अपने-आप होने लगेगा अर्थात् शास्त्र और लोक-मर्यादाके अनुकूल काम होने लगेगा। जब सदुपयोग होने लगेगा तो उसका हमें अभिमान नहीं होगा। कारण कि हमने तो दुरुपयोग न करनेका विचार किया है, सदुपयोग करनेका विचार तो हमने किया ही नहीं, फिर करनेका अभिमान कैसे? इससे तो कर्तृत्व- अभिमानका त्याग हो जायगा। जब हमने सदुपयोग किया ही नहीं तो उसका फल भी हम कैसे चाहेंगे? क्योंकि सदुपयोग तो हुआ है, किया नहीं। अतः इससे फलेच्छाका त्याग हो जायगा। कर्तृत्व-अभिमान और फलेच्छाका त्याग होनेसे अर्थात् बन्धनका अभाव होनेसे मुक्ति स्वतःसिद्ध है। प्रायः साधकोंमें यह बात गहराईसे बैठी हुई है कि साधन-भजन, जप-ध्यान आदि करनेका विभाग अलग है और सांसारिक काम-धंधा करनेका विभाग अलग है। इन दो विभागोंके कारण साधक भजन-ध्यान आदिको तो बढ़ावा देते हैं, पर सांसारिक काम-धंधा करते हुए राग- द्वेष, काम-क्रोध आदिकी तरफ ध्यान नहीं देते, प्रत्युत ऐसी दृढ़ भावना बना लेते हैं कि काम-धंधा करते हुए तो राग- द्वेष होते ही हैं, ये मिटनेवाले थोड़े ही हैं। इस भावनासे बड़ा भारी अनर्थ यह होता है कि साधकके राग-द्वेष बने रहते हैं, जिससे उसके साधनमें जल्दी उन्नति नहीं होती। वास्तवमें साधक चाहे पारमार्थिक कार्य करे, चाहे सांसारिक कार्य करे उसके अन्तःकरणमें राग-द्वेष नहीं रहने चाहिये। पारमार्थिक और सांसारिक क्रियाओंमें भेद होनेपर भी साधकके भावमें भेद नहीं होना चाहिये अर्थात् पारमार्थिक और सांसारिक दोनों क्रियाएँ करते समय साधकका भाव एक ही रहना चाहिये कि “मैं साधक हूँ और मुझे भगवत्प्राप्ति करनी है।” इस प्रकार क्रियाभेद तो रहेगा ही और रहना भी चाहिये, पर भावभेद नहीं रहेगा। भावभेद न रहनेसे अर्थात् एक भगवत्प्राप्तिका ही भाव (उद्देश्य) रहनेसे पारमार्थिक और सांसारिक दोनों ही क्रियाएँ साधन बन जायँगी।
परिशिष्ट भाव
यद्यपि संसार-बन्धनका मूल कारण अज्ञान है, तथापि अज्ञानकी अपेक्षा भी मनुष्य राग-द्वेषरूप द्वन्द्वसे संसारमें ज्यादा फँसता है। किसी देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति आदिको अपने सुख-दुःखका कारण माननेसे राग-द्वेष पैदा होते हैं। जिसको अपने सुखका कारण मानते हैं, उसमें “राग” हो जाता है और जिसको अपने दुःखका कारण मानते हैं, उसमें “द्वेष” हो जाता है। राग-द्वेष मिटनेपर मनुष्य सुखपूर्वक संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है—“निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते” (गीता 5। 3)। पहले तेरहवें श्लोकमें भी भगवान् कह चुके हैं कि तीनों गुणोंसे मोहित प्राणी मेरेको नहीं जानता। ऐसे मोहित प्राणी न संसारको जानते हैं, न भगवान्को। संसारमें रचे-पचे रहकर मनुष्य संसारको नहीं जान सकता और भगवान्से अलग (दूर) रहकर मनुष्य भगवान्को नहीं जान सकता। वास्तवमें संसारका ज्ञान संसारसे अलग होनेपर और भगवान्का ज्ञान भगवान्से अभिन्न होनेपर ही होता है। संसार नहीं है—यही संसारका ज्ञान है। वास्तवमें जो है ही नहीं, रहता ही नहीं, उसका ज्ञान कैसा? संसार है—ऐसा मानना ही अज्ञान है।
28श्रीभगवान्
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥ 28॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

पूर्वश्लोकमें भगवान्ने द्वन्द्वमोहसे मोहित होनेवालोंकी बात बतायी, अब आगेके श्लोकमें द्वन्द्वमोहसे रहित होनेवालोंकी बात कहते हैं।

पदच्छेद
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व्याख्या
5 sections
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्य- कर्मणाम्
द्वन्द्वमोहसे मोहित मनुष्य तो भजन नहीं करते और जो द्वन्द्वमोहसे मोहित नहीं हैं, वे भजन करते हैं, तो भजन न करनेवालोंकी अपेक्षा भजन करनेवालोंकी विलक्षणता बतानेके लिये यहाँ “तु” पद आया है। जिन मनुष्योंने
अपनेको तो भगवत्प्राप्ति ही करनी है
इस उद्देश्यको पहचान लिया है अर्थात् जिनको उद्देश्यकी यह स्मृति आ गयी है कि यह मनुष्यशरीर भोग भोगनेके लिये नहीं है, प्रत्युत भगवान्की कृपासे केवल उनकी प्राप्तिके लिये ही मिला है—ऐसा जिनका दृढ़ निश्चय हो गया है, वे मनुष्य ही “पुण्यकर्मा” हैं। तात्पर्य यह हुआ कि अपने एक निश्चयसे जो शुद्धि होती है, पवित्रता आती है, वह यज्ञ, दान, तप आदि क्रियाओंसे नहीं आती। कारण कि “हमें तो एक भगवान्की तरफ ही चलना है”, यह निश्चय स्वयंमें होता है और यज्ञ, दान आदि क्रियाएँ बाहरसे होती हैं। “अन्तगतं पापम्” कहनेका भाव यह है कि जब यह निश्चय हो गया कि “मेरेको तो केवल भगवान्की तरफ ही चलना है” तो इस निश्चयसे भगवान्की सम्मुखता होनेसे विमुखता चली गयी, जिससे पापोंकी जड़ ही कट गयी; क्योंकि भगवान्से विमुखता ही पापोंका खास कारण है। सन्तोंने कहा है कि डेढ़ ही पाप है और डेढ़ ही पुण्य है। भगवान्से विमुख होना पूरा पाप है और दुर्गुण-दुराचारोंमें लगना आधा पाप है। ऐसे ही भगवान्के सम्मुख होना पूरा पुण्य है और सद्गुण-सदाचारोंमें लगना आधा पुण्य है। तात्पर्य यह हुआ कि जब मनुष्य भगवान्के सर्वथा शरण हो जाता है, तब उसके पापोंका अन्त हो जाता है। दूसरा भाव यह है कि जिनका लक्ष्य केवल भगवान् हैं, वे पुण्यकर्मा हैं; क्योंकि भगवान्का लक्ष्य होनेपर सब पाप नष्ट हो जाते हैं। भगवान्का लक्ष्य होनेपर पुराने किसी संस्कारसे पाप हो भी जायगा, तो भी वह रहेगा नहीं; क्योंकि हृदयमें विराजमान भगवान् उस पापको नष्ट कर देते हैं— “विकर्म यच्चोत्पतितं कथञ्चिद् धुनोति सर्वं हृदि सन्निविष्टः” (श्रीमद्भा0 11। 5। 42)। तीसरा भाव यह है कि मनुष्य सच्चे हृदयसे यह दृढ़ निश्चय कर ले कि “अब आगे मैं कभी पाप नहीं करूँगा” तो उसके पाप नहीं रहते।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः
पुण्यकर्मा लोग द्वन्द्वरूप मोहसे रहित होकर और दृढ़व्रती होकर भगवान्का भजन करते हैं। द्वन्द्व कई तरहका होता; जैसे— 1—भगवान्में लगें या संसारमें लगें? क्योंकि परलोकके लिये भगवान्का भजन आवश्यक है और इहलोकके लिये संसारका काम आवश्यक है। 2—वैष्णव, शैव, शाक्त, गाणपत और सौर—इन सम्प्रदायोंमेंसे किस सम्प्रदायमें चलें और किस सम्प्रदायमें न चलें? 3—परमात्माके स्वरूपके विषयमें द्वैत, अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत, अचिन्त्यभेदाभेद आदि कई तरहके सिद्धान्त हैं। इनमेंसे किस सिद्धान्तको स्वीकार करें और किस सिद्धान्तको स्वीकार न करें? 4—परमात्माकी प्राप्तिके भक्तियोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग, ध्यानयोग, हठयोग, लययोग, मन्त्रयोग आदि कई मार्ग हैं। उनमेंसे किस मार्गपर चलें और किस मार्गपर न चलें? 5—संसारमें होनेवाले अनुकूल-प्रतिकूल, हर्ष-शोक, ठीक-बेठीक, सुख-दुःख, राग-द्वेष आदि सभी द्वन्द्व हैं। उपर्युक्त सभी पारमार्थिक और सांसारिक द्वन्द्वरूप मोहसे मुक्त हुए मनुष्य दृढ़व्रती होकर भगवान्का भजन करते हैं। मनुष्यका एक ही पारमार्थिक उद्देश्य हो जाय, तो पारमार्थिक और सांसारिक सभी द्वन्द्व मिट जाते हैं। पारमार्थिक उद्देश्यवाले साधक अपनी-अपनी रुचि, योग्यता और श्रद्धा-विश्वासके अनुसार अपने-अपने इष्टको सगुण मानें, साकार मानें, निर्गुण मानें, निराकार मानें, द्विभुज मानें, चतुर्भुज मानें अथवा सहस्त्रभुज आदि कैसे ही मानें, पर संसारकी विमुखतामें और परमात्माकी सम्मुखतामें वे सभी एक हैं। उपासनाकी पद्धतियाँ भिन्न-भिन्न होनेपर भी लक्ष्य सबका एक होनेसे कोई भी पद्धति छोटी-बड़ी नहीं है। जिस साधकका जिस पद्धतिमें श्रद्धा-विश्वास होता है, उसके लिये वही पद्धति श्रेष्ठ है और उसको उसी पद्धतिका ही अनुसरण करना चाहिये। परन्तु दूसरोंकी पद्धति या निष्ठाकी निन्दा करना, उसको दो नम्बरका मानना दोष है। जबतक यह साधनविषयक द्वन्द्व रहता है और साधकमें अपने पक्षका आग्रह और दूसरोंका निरादर रहता है, तबतक साधकको भगवान्के समग्ररूपका अनुभव नहीं होता। इसलिये आदर तो सब पद्धतियों और निष्ठाओंका करे, पर अनुसरण अपनी पद्धति और निष्ठाका ही करे; तो इससे साधनविषयक द्वन्द्व मिट जाता है। मनुष्यमात्रकी यह प्रकृति होती है, ऐसा एक स्वभाव होता है कि जब वह पारमार्थिक बातें सुनता है, तब वह यह समझता है कि साधन करके अपना कल्याण करना है; क्योंकि मनुष्यजन्मकी सफलता इसीमें है। परन्तु जब वह व्यवहारमें आता है, तब वह ऐसा सोचता है कि “साधन-भजन” से क्या होगा? सांसारिक काम तो करना पड़ेगा; क्योंकि संसारमें बैठे हैं; चीज-वस्तुकी आवश्यकता पड़ती है, उसके बिना काम कैसे चलेगा? अतः संसारका काम मुख्य रहेगा ही और भजन-स्मरणका नित्य-नियम तो समयपर कर लेना है; क्योंकि सांसारिक कामकी जितनी आवश्यकता है, उतनी भजन-स्मरण, नित्य-नियमकी नहीं। ऐसी धारणा रखकर भगवान्में लगे हुए मनुष्य बहुत हैं। भगवान्की तरफ चलनेवालोंमें भी जिन्होंने एक निश्चय कर लिया है कि मेरेको तो अपना कल्याण करना है, सांसारिक लाभ-हानि कुछ भी हो जाय, इसकी कोई परवाह नहीं। कारण कि सांसारिक जितनी भी सिद्धि है, वह आँख मीचते ही कुछ नहीं है—“सम्मीलने नयनयोर्नहि किंचिदस्ति” और इन सांसारिक वस्तुओंको प्राप्त करनेसे कितने दिनतक हमारा काम चलेगा? ऐसा विचार करके जो एक भगवान्की तरफ ही लग जाते हैं और सांसारिक आदर-निरादर आदिकी तरफ ध्यान नहीं देते, ऐसे मनुष्य ही द्वन्द्वमोहसे छूटे हुए हैं। “दृढव्रताः” कहनेका तात्पर्य है कि हमें तो केवल परमात्माकी तरफ ही चलना है, हमारा और कोई लक्ष्य है ही नहीं। वह परमात्मा द्वैत है कि अद्वैत है, शुद्धाद्वैत है कि विशिष्टाद्वैत है, सगुण है कि निर्गुण है, द्विभुज है कि चतुर्भुज है—इससे हमें कोई मतलब नहीं है*। वह हमारे लिये कैसी भी परिस्थिति भेजे; हमें कहीं भी रखे और कैसे भी रखे—इससे भी हमें कोई मतलब नहीं है। बस, हमें तो केवल परमात्माकी तरफ चलना है—ऐसे निश्चयसे वे दृढ़व्रती हो जाते हैं। परमात्माकी तरफ चलनेवालोंके सामने तीन बातें आती हैं—परमात्मा कैसे हैं? जीव कैसा है? और जगत् कैसा है? तो उनके हृदयमें इनका सीधा उत्तर यह होता है कि “परमात्मा हैं।” वे कहाँ रहते हैं, क्या करते हैं आदिसे हमें कोई मतलब नहीं, हमें तो परमात्मासे मतलब है। जीव क्या है, उसका कैसा स्वरूप है, वह कहाँ रहता है, इससे हमें कोई मतलब नहीं। हमें तो इतना ही पर्याप्त है कि “मैं हूँ।” जगत् कैसा है, ठीक है कि बेठीक है, हमें इससे कोई मतलब नहीं। हमें तो इतना ही समझना पर्याप्त है कि “जगत् त्याज्य है” और हमें इसका त्याग करना है। तात्पर्य यह हुआ कि परमात्माकी तरफ चलना है, संसारको छोड़ना है और हमें चलना है अर्थात्
हमें संसारसे विमुख होकर परमात्माके सम्मुख होना है
यही सम्पूर्ण दर्शनोंका सार है और यही दृढ़व्रती होना है। दृढ़व्रती होनेसे उनके द्वन्द्व नष्ट हो जाते हैं; क्योंकि एक निश्चय न होनेसे ही द्वन्द्व रहते हैं। दूसरा भाव है कि उनको न तो निर्गुणका ज्ञान है और न उनको सगुणके दर्शन हुए हैं; किन्तु उनकी मान्यतामें संसार निरन्तर नष्ट हो रहा है, निरन्तर अभावमें जा रहा है और सब देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदिमें भावरूपसे एक परमात्मा ही हैं—ऐसा मानकर वे दृढ़व्रती होकर भजन करते हैं। जैसे पतिव्रता स्त्री पतिके परायण रहती है, ऐसे ही भगवान्के परायण रहना ही उनका भजन है। हो जाता है—“क्षिप्रं भवति धर्मात्मा”* (गीता 9। 31)। अतः मनुष्यको कभी भी ऐसा नहीं मानना चाहिये कि पुराने पापोंके कारण मेरेसे भजन नहीं हो रहा है; क्योंकि पुराने पाप केवल प्रतिकूल परिस्थितिरूप फल देनेके लिये होते हैं, भजनमें बाधा देनेके लिये नहीं। प्रतिकूल परिस्थिति देकर वे पाप नष्ट हो जाते हैं। अगर ऐसा मान लिया जाय कि पापोंके कारण ही भजन नहीं होता, तो “अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्” (गीता 9। 30)
दुराचारी-से-दुराचारी पुरुष अनन्यभावसे मेरा भजन करता है
यह कहना बन नहीं सकता। पापोंके कारण अगर भजन-ध्यानमें बाधा लग जाय, तो बड़ी मुश्किल हो जायगी; क्योंकि बिना पापके कोई प्राणी है ही नहीं। पाप-पुण्यसे ही मनुष्यशरीर मिलता है। इससे सिद्ध होता है कि पुराने पाप भजनमें बाधक नहीं हो सकते। इसलिये जो दृढ़व्रती पुरुष भगवान्के शरण होकर वर्तमानमें भगवान्के भजनमें लग जाते हैं, उनके पुराने पापोंका अन्त हो जाता है। मनुष्यशरीर भजन करनेके लिये ही मिला है, अतः जो परिस्थितियाँ शरीरतक रहनेवाली हैं, वे भजनमें बाधा पहुँचायें—ऐसा कभी सम्भव ही नहीं है। सकाम पुण्यकर्मोंकी मुख्यता होनेसे जीव स्वर्गमें जाते हैं और पापकर्मोंकी मुख्यता होनेसे नरकोंमें जाते हैं। परन्तु भगवान् विशेष कृपा करके पापों और पुण्योंका पूरा फल- भोग न होनेपर भी अर्थात् चौरासी लाख योनियोंके बीचमें ही जीवको मनुष्यशरीर दे देते हैं। मनुष्यशरीरमें भगवद्भजनका अवसर विशेषतासे प्राप्त होता है। अतः मनुष्यशरीर
परिशिष्ट भाव
भगवान्के सम्मुख होना सबसे बड़ा पुण्य है; क्योंकि यह सब पुण्योंका मूल है*। परन्तु भगवान्से विमुख होना सबसे बड़ा पाप है; क्योंकि यह सब पापोंका मूल है। जिन मनुष्योंके पाप नष्ट हो गये हैं अर्थात् जो संसारसे विमुख होकर भगवान्के सम्मुख हो गये हैं, वे राग-द्वेष, हर्ष-शोक, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंसे रहित होकर भगवान्का भजन करते हैं। भजन करनेवालोंके प्रकारका वर्णन भगवान् सोलहवें श्लोकमें “चतुर्विधा भजन्ते माम्” पदोंसे कर चुके हैं। राग-द्वेष मनुष्यको संसारकी तरफ खींचते रहते हैं। जबतक एक वस्तुमें राग रहता है, तबतक दूसरी वस्तुमें द्वेष रहता ही है; क्योंकि मनुष्य किसी वस्तुके सम्मुख होगा तो किसी वस्तुसे विमुख होगा ही। जबतक मनुष्यके भीतर राग-द्वेष रहते हैं; तबतक वह भगवान्के सर्वथा सम्मुख नहीं हो सकता; क्योंकि उसका सम्बन्ध संसारसे जुड़ा रहता है। उसका जितने अंशमें संसारसे राग रहता है, उतने अंशमें भगवान्से द्वेष अर्थात् विमुखता रहती है। “दृढव्रताः”—ढीली प्रकृतिवाला अर्थात् शिथिल स्वभाववाला मनुष्य असत्का जल्दी त्याग नहीं कर सकता। एक विचार किया और उसको छोड़ दिया, फिर दूसरा विचार किया और उसको छोड़ दिया—इस प्रकार बार-बार विचार करने और उसको छोड़ते रहनेसे आदत बिगड़ जाती है। इस बिगड़ी हुई आदतके कारण ही वह असत्के त्यागकी बातें तो सीख जाता है, पर असत्का त्याग नहीं कर पाता। अगर वह असत्का त्याग कर भी देता है तो स्वभावकी ढिलाईके कारण फिर उसको सत्ता दे देता है। स्वभावकी यह शिथिलता स्वयं साधककी बनायी हुई है। अतः साधकके लिये यह बहुत आवश्यक है कि वह अपना स्वभाव दृढ़ रहनेका बना ले। एक बार वह जो विचार कर ले, उसपर वह दृढ़ रहे। छोटी-से-छोटी बातमें भी वह दृढ़ (पक्का) रहे तो ऐसा स्वभाव बननेसे उसमें असत्का त्याग करनेकी, संसारसे विमुख होनेकी शक्ति आ जायगी।
विशेष बात
विशेष बात शास्त्रोंमें, सन्तवाणीमें और गीतामें भी यह बात आती है कि पापी मनुष्य भगवान्में प्रायः नहीं लग पाते; पर यह एक स्वाभाविक सामान्य नियम है। वास्तवमें कितने ही पाप क्यों न हों, वे भगवान्से विमुख कर ही नहीं सकते; क्योंकि जीव साक्षात् भगवान्का अंश है; अतः उसकी शुद्धि पापोंसे आच्छादित भले ही हो जाय, पर मिट नहीं सकती। इसलिये दुराचारी भी दुराचार छोड़कर भगवान्के भजनमें लग जाय, तो वह बहुत जल्दी धर्मात्मा (भक्त) प्राप्त होनेपर भगवत्प्राप्तिकी तरफसे कभी निराश नहीं होना चाहिये; क्योंकि भगवत्प्राप्तिके लिये ही मनुष्यशरीर मिलता है। यह मनुष्यशरीर भोगयोनि नहीं है। इसको सामान्यतः कर्मयोनि कहते हैं। परन्तु संतोंकी वाणी और सिद्धान्तोंके अनुसार मनुष्यशरीर केवल भगवत्प्राप्तिके लिये ही है। इसमें पुराने पुण्योंके अनुसार जो अनुकूल परिस्थिति आती है और पुराने पापोंके अनुसार जो प्रतिकूल परिस्थिति आती है—ये दोनों ही केवल साधन-सामग्री हैं। इन दोनोंमेंसे अनुकूल परिस्थिति आनेपर दुनियाकी सेवा करना और प्रतिकूल परिस्थिति आनेपर अनुकूलताकी इच्छाका त्याग करना— यह साधकका काम है। ऐसा करनेसे ये दोनों ही परिस्थितियाँ साधन-सामग्री हो जायँगी। इनमें भी देखा जाय तो अनुकूल परिस्थितिमें पुराने पुण्योंका नाश होता है और वर्तमानमें भोगोंमें फँसनेकी सम्भावना भी रहती है। परन्तु प्रतिकूल परिस्थितिमें पुराने पापोंका नाश होता है और वर्तमानमें अधिक सजगता, सावधानी रहती है, जिससे साधन सुगमतासे बनता है। इस दृष्टिसे संतजन सांसारिक प्रतिकूल परिस्थितिका आदर करते आये हैं।
* जैसा कि गजेन्द्रने कहा था—
* यः कश्चनेशो बलिनोऽन्तकोरगात् प्रचण्डवेगादभिधावतो भृशम्।
भीतं प्रपन्नं परिपाति यद्भयान्मृत्युः प्रधावत्यरणं तमीमहि॥ (श्रीमद्भा0 8। 2। 33)
“जो कोई ईश्वर प्रचण्ड वेगसे (सबको निगल जानेके लिये) दौड़ते हुए अत्यन्त बलवान् कालरूपी साँपसे भयभीत
होकर शरणमें आये हुएकी रक्षा करता है और जिससे भयभीत होकर मृत्यु भी दौड़ रही है, उसीकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ।”
* अन्य योनियोंमें पाप नष्ट होनेपर भी स्वभाव सुधर जाय—यह नियम नहीं है; जैसे—चौरासी लाख योनियाँ और नरक
भोगते हुए पाप तो नष्ट हो जाते हैं, पर स्वभाव नहीं सुधरता। परन्तु मनुष्ययोनिमें पाप रहनेपर भी साधकका स्वभाव सुधर
सकता है, जैसे—पापोंके रहनेसे उनके फलरूपमें प्रतिकूल परिस्थिति (बीमारी आदि) आती है, पर सत्संगसे, साधनपरायणतासे,
अहंता-परिवर्तनसे पारमार्थिक साधकका स्वभाव सुधर जाता है।
29श्रीभगवान्
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति येते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म ाखिलम्॥ 29॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

सातवें अध्यायके आरम्भमें भगवान्ने साधकके लिये तीन बातें कही थीं—“मय्यासक्तमनाः”—मेरेमें प्रेम करके और “मदाश्रयः”—मेरा आश्रय लेकर “योगं युञ्जन्”—योगका अनुष्ठान करता है, वह मेरे समग्ररूपको जान जाता है। उन्हीं तीन बातोंका उपसंहार अब आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।

पदच्छेद
श्लोकमें ढूँढ़नेके लिये हॉवर करें
व्याख्या
7 sections
[इन उनतीसवें-तीसवें श्लोकोंमें आये “मामाश्रित्य” पदमें “मदाश्रयः” का, “यतन्ति” पदमें “योगं युञ्जन्” का और “युक्तचेतसः” पदमें “मय्यासक्तमनाः” का उपसंहार किया गया है। इसी अध्यायके आरम्भमें जो “समग्रम्” पद आया था, उसको यहाँ ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ कहा गया है।]
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये
यहाँ जरा (वृद्धावस्था) और मरणसे मुक्ति पानेका तात्पर्य यह नहीं है कि ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मका ज्ञान होनेपर वृद्धावस्था नहीं होगी, शरीरकी मृत्यु नहीं होगी। इसका तात्पर्य यह है कि बोध होनेके बाद शरीरमें आनेवाली वृद्धावस्था और मृत्यु तो आयेगी ही, पर ये दोनों अवस्थाएँ उसको दुःखी नहीं कर सकेंगी। जैसे तेरहवें अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें “भूतप्रकृतिमोक्षम्” कहनेका तात्पर्य भूत और प्रकृति अर्थात् कार्य और कारणसे सम्बन्ध- विच्छेद होनेमें है, ऐसे ही यहाँ “जरामरणमोक्षाय” कहनेका तात्पर्य जरा, मृत्यु आदि शरीरके विकारोंसे यत्न करना—इन दो बातोंको कहनेका तात्पर्य है कि मनुष्य अगर स्वयं यत्न करता है, तो अभिमान आता है कि “मैंने ऐसा कर लिया, जिससे ऐसा हो गया” और अगर स्वयं यत्न न करके “भगवान्के आश्रयसे सब कुछ हो जायगा” ऐसा मानता है, तो वह आलस्य और प्रमादमें तथा संग्रह और भोगमें लग जाता है। इसलिये यहाँ दो बातें बतायीं कि शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार स्वयं तत्परतासे उद्योग करे और उस उद्योगके होनेमें तथा उद्योगकी सफलतामें कारण भगवान्को माने। जो नित्य-निरन्तर वियुक्त हो रहा है, ऐसे शरीर- संसारको मनुष्य प्राप्त और स्थायी मान लेता है। जबतक वह शरीर और संसारको स्थायी मानकर उसे जैसे कोई युवा पुरुष है, तो उसकी अभी न वृद्धावस्था है और न मृत्यु है; अतः वह जरा-मरणसे अभी मुक्त है। परन्तु वास्तवमें वह जरा-मरणसे मुक्त नहीं है; क्योंकि जरा-मरणके कारण शरीरके साथ जबतक सम्बन्ध है, तबतक जरा-मरणसे रहित होते हुए भी वह इनसे मुक्त नहीं है। परन्तु जो जीवन्मुक्त महापुरुष हैं, उनके शरीरमें जरा और मरण होनेपर भी वे इनसे मुक्त हैं। अतः जरा-मरणसे मुक्त होनेका तात्पर्य है—जिसमें जरा और मरण होते हैं, ऐसे प्रकृतिके कार्य शरीरके साथ सर्वथा महत्ता देता रहता है, तबतक साधन करनेपर भी उसको भगवत्प्राप्ति नहीं होती। अगर वह शरीर-संसारको स्थायी न माने और उसको महत्त्व न दे, तो भगवत्प्राप्तिमें देरी नहीं लगेगी। अतः इन दोनों बाधाओंको अर्थात् शरीर- संसारकी स्वतन्त्र सत्ताको और महत्ताको विचारपूर्वक हटाना ही यत्न करना है। परन्तु जो भगवान्का आश्रय लेकर यत्न करते हैं, वे श्रेष्ठ हैं। उनका तो यही भाव रहता है कि उस प्रभुकी कृपासे ही साधन-भजन हो रहा है। भगवान्की कृपाका आश्रय लेनेसे और अपने बलका अभिमान न करनेसे वे भगवान्के समग्ररूपको तादात्म्य (“मैं यही हूँ”) मान लेता है, तब शरीरके वृद्ध होनेपर “मैं वृद्ध हो गया” और शरीरके मरनेको लेकर
मैं मर जाऊँगा
ऐसा मानता है। यह मान्यता “शरीर मैं हूँ और शरीर मेरा है” इसीपर टिकी हुई है। इसलिये तेरहवें अध्यायके आठवें श्लोकमें आया है— “जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्” अर्थात् जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधिमें दुःख-रूप दोषोंको देखना— इसका तात्पर्य है कि शरीरके साथ “मैं” और “मेरा-पन” का सम्बन्ध न रहे। जब मनुष्य “मैं” और “मेरा-पन” से मुक्त हो जायगा, तब वह जरा, मरण आदिसे भी मुक्त हो जायगा; क्योंकि शरीरके साथ माना हुआ सम्बन्ध ही वास्तवमें जन्मका कारण है—“कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु” (गीता 13। 21)। वास्तवमें इसका शरीरके साथ सम्बन्ध नहीं है, तभी सम्बन्ध मिटता है। मिटता वही है, जो वास्तवमें नहीं होता। यहाँ “मामाश्रित्य यतन्ति ये” पदोंमें आश्रय लेना और जान लेते हैं। जो भगवान्का आश्रय न लेकर अपना कल्याण चाहते हुए उद्योग करते हैं, उनको अपने-अपने साधनके अनुसार भगवत्स्वरूपका बोध तो हो जाता है, पर भगवान्के समग्ररूपका बोध उनको नहीं होता। जैसे, कोई प्राणायाम आदिके द्वारा योगका अभ्यास करता है, तो उसको अणिमा, महिमा आदि सिद्धियाँ मिलती हैं और उनसे ऊँचा उठनेपर परमात्माके निराकार-स्वरूपका बोध होता है अथवा अपने स्वरूपमें स्थिति होती है। ऐसे ही बौद्ध, जैन आदि सम्प्रदायोंमें चलनेवाले जितने मनुष्य हैं, जो कि ईश्वरको नहीं मानते, वे भी अपने-अपने सम्प्रदायके सिद्धान्तोंके अनुसार साधन करके असत्-जडरूप संसारसे सम्बन्ध- विच्छेद करके मुक्त हो जाते हैं। परन्तु जो संसारसे विमुख होकर भगवान्का आश्रय लेकर यत्न करते हैं, उनको भगवान्के समग्ररूपका बोध होकर भगवत्प्रेमकी प्राप्ति हो जाती है—यह विलक्षणता बतानेके लिये ही भगवान्ने यहाँ “मामाश्रित्य यतन्ति ये” कहा है।
ते ब्रह्म तत् (विदुः)
इस तरहसे यत्न (साधन) करनेपर वे मेरे स्वरूपको* अर्थात् जो निर्गुण-निराकार है, जो मन-बुद्धि-इन्द्रियों आदिका विषय नहीं है, जो सामने नहीं है, शास्त्र जिसका परोक्षरूपसे वर्णन करते हैं, उस सच्चिदानन्दघन ब्रह्मको जान जाते हैं। ”“ब्रह्म” के साथ “तत्” शब्द देनेका तात्पर्य यह है कि प्रायः सभी “तत्” शब्दसे कहे जानेवाले जिस परमात्माको परोक्षरूपसे ही देखते हैं, ऐसे परमात्माका भी वे साक्षात् अपरोक्षरूपसे अनुभव कर लेते हैं। उस परमात्माकी सत्ता प्राणिमात्रमें स्वतःसिद्ध है। कारण कि वह परमात्मा किसी देशमें न हो, किसी समयमें न हो, किसी वस्तुमें न हो और किसी व्यक्तिमें न हो— ऐसा नहीं है, प्रत्युत वह सब देशमें है, सब समयमें है, सब वस्तुओंमें है और सब व्यक्तियोंमें है। ऐसा होनेपर भी वह अप्राप्त क्यों दीखता है? जो पहले नहीं था, बादमें नहीं रहेगा, अभी मौजूद रहते हुए भी प्रतिक्षण वियुक्त हो रहा है, अभावमें जा रहा है—ऐसे शरीर-संसारकी सत्ता और महत्ता स्वीकार कर ली, इसीसे नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्व अप्राप्त दीख रहा है।
कृत्स्नमध्यात्मम् (विदुः)
वे सम्पूर्ण अध्यात्मको जान जाते हैं अर्थात् सम्पूर्ण जीव तत्त्वसे क्या हैं, इस बातको वे जान जाते हैं। पंद्रहवें अध्यायके दसवें श्लोकमें कहा है कि “जीवके द्वारा एक शरीरको छोड़कर दूसरे शरीरको प्राप्त करनेको विमूढ़ पुरुष नहीं जानते और ज्ञानचक्षुवाले जानते हैं।” इसको जाननेका तात्पर्य यह नहीं है कि
जीव कितने हैं, वे क्या-क्या करते हैं और उनकी क्या-क्या गति हो रही है
इसको जान जाते हैं, प्रत्युत आत्मा शरीरसे अलग है—इसको तत्त्वसे जान जाते हैं अर्थात् अनुभव कर लेते हैं। भगवान्के आश्रयसे साधकका जब क्रियाओं और पदार्थोंसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, तब वह अध्यात्म- तत्त्वको—अपने स्वरूपको जान जाता है। केवल अपने स्वरूपको ही नहीं, प्रत्युत तीनों लोकों और चौदह भुवनोंमें जितने भी स्थावर-जंगम प्राणी हैं, उन सबके स्वरूपको भी जान जाता है कि सबका स्वरूप शुद्ध है, निर्मल है, प्रकृतिसे असम्बद्ध है। अनन्त जन्मोंतक अनन्त क्रियाओं और शरीरोंके साथ एकता करनेपर भी उनकी कभी एकता हो ही नहीं सकती और अनन्त जन्मोंतक अपने स्वरूपका बोध न होनेपर भी वे अपने स्वरूपसे कभी अलग हो ही नहीं सकते—ऐसा जानना सम्पूर्ण अध्यात्म-तत्त्वको जानना है।
कर्म चाखिलं विदुः
वे सम्पूर्ण कर्मोंके वास्तविक तत्त्वको जान जाते हैं अर्थात् सृष्टिकी रचना क्यों होती है, कैसे होती है और भगवान् कैसे करते हैं—इसको भी वे जान जाते हैं। जैसे भगवान्ने चारों वर्णोंकी रचना की। उस रचनामें जीवोंके जो गुण और कर्म हैं अर्थात् उनके जैसे भाव हैं और उन्होंने जैसे कर्म किये हैं, उनके अनुसार ही शरीरोंकी रचना की गयी है। उन वर्णोंमें जन्म होनेमें स्वयं भगवान्की तरफसे कोई सम्बन्ध नहीं है, इसलिये भगवान्में कर्तृत्व नहीं है और फलेच्छा भी नहीं है (गीता—चौथे अध्यायका तेरहवाँ-चौदहवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह हुआ कि सृष्टिकी रचना करते हुए भी भगवान् कर्तृत्व और फलासक्तिसे सर्वथा निर्लिप्त रहते हैं। ऐसे ही मनुष्यमात्रको देश, काल, परिस्थितिके अनुरूप जो भी कर्तव्य-कर्म प्राप्त हो जाय, उसे कर्तृत्व और फलासक्तिसे रहित होकर करनेसे वह कर्म मनुष्यको बाँधनेवाला नहीं होता अर्थात् वह कर्म फलजनक नहीं बनता। तात्पर्य है कि कर्मोंके साथ अपना कोई सम्बन्ध नहीं है, इस तरह उनके साथ निर्लिप्तताका अनुभव करना ही अखिल कर्मको जानना है। जो अनन्यभावसे केवल भगवान्का आश्रय लेता है, उसका प्राकृत क्रियाओं और पदार्थोंका आश्रय छूट जाता है। इससे उसको यह बात ठीक तरहसे समझमें आ जाती है कि ये सब क्रियाएँ और पदार्थ परिवर्तनशील और नाशवान् हैं अर्थात् क्रियाओंका भी आरम्भ और अन्त होता है तथा पदार्थोंकी भी उत्पत्ति और विनाश, संयोग और वियोग होता है। ब्रह्मलोकतककी कोई भी क्रिया और पदार्थ नित्य रहनेवाला नहीं है। अतः कर्मोंके साथ मेरा किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है—यह भी अखिल कर्मको जानना है। तात्पर्य यह हुआ कि भगवान्का आश्रय लेकर चलने- वाले ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मके वास्तविक तत्त्वको जान जाते हैं अर्थात् भगवान्ने जैसे कहा है कि “यह सम्पूर्ण संसार मेरेमें ही ओतप्रोत है” (सातवें अध्यायका सातवाँ श्लोक) और “सब कुछ वासुदेव ही है” (सातवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक), ऐसे ही वे भगवान्के समग्ररूपको जान जाते हैं कि ब्रह्म, अध्यात्म और कर्म— ये सभी भगवत्स्वरूप ही हैं, भगवान्के सिवाय इनमें दूसरी कोई सत्ता नहीं है।
* सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥ (मानस, सुन्दर0 44। 1)
* यहाँ अट्ठाईसवें, उनतीसवें और तीसवें श्लोकमें भगवान्ने अस्मत् शब्द “माम्” का प्रयोग किया है, इसलिये यहाँ
व्याख्यामें “मेरा स्वरूप” ऐसा अर्थ लिया है।
30श्रीभगवान्
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं ये विदुःप्रयाणकालेऽपि मां ते विदुर्युक्तचेतसः॥ 30॥
साधक-संजीवनीSwami Ramsukhdas
सम्बन्ध

विच्छेद होनेमें है। विच्छेद होना। जब मनुष्य शरीरके साथ

पदच्छेद
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व्याख्या
2 sections
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः
[पूर्वश्लोकमें निर्गुण-निराकारको जाननेका वर्णन करके अब सगुण-साकारको जाननेकी बात कहते हैं।] यहाँ “अधिभूत” नाम भौतिक स्थूल सृष्टिका है, जिसमें तमोगुणकी प्रधानता है। जितनी भी भौतिक सृष्टि है, उसकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। उसका क्षणमात्र भी स्थायित्व नहीं है। फिर भी यह भौतिक सृष्टि सत्य दीखती है अर्थात् इसमें सत्यता, स्थिरता, सुखरूपता, श्रेष्ठता और आकर्षण दीखता है। यह सत्यता आदि सब-के-सब वास्तवमें भगवान्के ही हैं, क्षणभंगुर संसारके नहीं। तात्पर्य है कि जैसे बर्फकी सत्ता जलके बिना नहीं हो सकती, ऐसे ही भौतिक स्थूल सृष्टि अर्थात् अधिभूतकी सत्ता भगवान्के बिना नहीं हो सकती। इस प्रकार तत्त्वसे यह संसार भगवत्स्वरूप ही है—ऐसा जानना ही अधिभूतके सहित भगवान्को जानना है। “अधिदैव” नाम सृष्टिकी रचना करनेवाले हिरण्यगर्भ ब्रह्माजीका है, जिनमें रजोगुणकी प्रधानता है। भगवान् ही ब्रह्माजीके रूपमें प्रकट होते हैं अर्थात् तत्त्वसे ब्रह्माजी भगवत्स्वरूप ही हैं—ऐसा जानना ही अधिदैवके सहित भगवान्को जानना है। बयालीसवाँ और ग्यारहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक) और उस विराट्रूपमें अधिभूत (अनन्त ब्रह्माण्ड), अधिदैव (ब्रह्माजी) और अधियज्ञ (विष्णु) आदि सभी हैं, जैसा कि अर्जुनने कहा है—हे देव! मैं आपके शरीरमें सम्पूर्ण प्राणियोंको; जिनकी नाभिसे कमल निकला है, उन विष्णुको, कमलपर विराजमान ब्रह्माको और शंकर आदिको देख रहा हूँ (गीता—ग्यारहवें अध्यायका पन्द्रहवाँ श्लोक)। अतः तत्त्वसे अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं। श्रीकृष्ण ही समग्र भगवान् हैं।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः
जो संसारके भोगों और संग्रहकी प्राप्ति-अप्राप्तिमें समान रहनेवाले हैं तथा संसारसे सर्वथा उपरत होकर भगवान्में लगे हुए हैं, वे पुरुष युक्तचेता हैं। ऐसे युक्तचेता मनुष्य अन्तकालमें भी मेरेको ही जानते हैं अर्थात् अन्तकालकी पीड़ा आदिमें भी वे मेरेमें ही अटलरूपसे स्थित रहते हैं। उनकी ऐसी दृढ़ स्थिति होती है कि वे स्थूल और सूक्ष्म- शरीरमें कितनी ही हलचल होनेपर भी कभी किंचिन्मात्र भी विचलित नहीं होते। भगवान्के समग्ररूप-सम्बन्धी “अधियज्ञ” नाम भगवान् विष्णुका है, जो अन्तर्यामी- रूपसे सबमें व्याप्त हैं और जिनमें सत्त्वगुणकी प्रधानता है। तत्त्वसे भगवान् ही अन्तर्यामीरूपसे सबमें परिपूर्ण हैं— ऐसा जानना ही अधियज्ञके सहित भगवान्को जानना है। अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञके सहित भगवान्को जाननेका तात्पर्य है कि भगवान् श्रीकृष्णके शरीरके किसी
परिशिष्ट भाव
इस अध्यायके आरम्भमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा था कि मैं वह विज्ञानसहित ज्ञान कहूँगा, जिससे तू मेरे समग्ररूपको जान जायगा और जिसको जाननेके बाद फिर कुछ भी जानना बाकी नहीं रहेगा। फिर उन्नीसवें श्लोकमें भगवान्ने “वासुदेवः सर्वम्” कहकर अपने समग्ररूपका संक्षेपसे वर्णन किया। अब अध्यायके अन्तमें भगवान् उसका खुलासा करते हैं। साधकका जन्म तो हो चुका है और व्याधि अवश्यम्भावी नहीं है; परन्तु वृद्धावस्था और मृत्यु—ये दोनों अवश्यम्भावी हैं और इनसे मनुष्यको अधिक दुःख होता है। इसलिये यहाँ “जरामरणमोक्षाय” कहनेका तात्पर्य है कि भगवान्का आश्रय लेनेवाले भक्त जरा और मरण—दोनोंसे मुक्त हो जाते हैं अर्थात् उनको शरीरके रहते हुए वृद्धावस्थाका भी दुःख नहीं होता और गतिके विषयमें भी दुःख नहीं होता कि मरनेके बाद हमारी क्या गति होगी? वे भगवान्का आश्रय लेकर प्रयत्न करते हैं, इसलिये वे परा-अपराके सहित भगवान्के समग्ररूपको जान लेते हैं अर्थात् विज्ञानसहित ज्ञानको जान लेते हैं। यद्यपि कर्मयोगी और ज्ञानयोगी भी जन्म-मरणसे मुक्त हो जाते हैं, पर भक्त जरा-मरणसे मुक्त होनेके साथ- साथ भगवान्के समग्ररूपको भी जान लेते हैं। कारण कि कर्मयोगी और ज्ञानयोगीकी तो आरम्भसे ही अपने साधनकी निष्ठा होती है (गीता—तीसरे अध्यायका तीसरा श्लोक), पर भक्त आरम्भसे ही भगवन्निष्ठ अर्थात् भगवत्परायण होता है। भगवन्निष्ठ होनेसे भगवान् कृपा करके उसको अपने समग्ररूपका ज्ञान करा देते हैं। इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने कहा था कि कोई एक ही (विरला) मनुष्य मेरे समग्ररूपको जानता है— “कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः”। यहाँ बताते हैं कि जो मेरे शरण हो जाता है, वह मेरे समग्ररूपको जान लेता है। अतः भगवान्के समग्ररूप-(विज्ञानसहित ज्ञान-) को जाननेकी मुख्य साधना है—शरणागति (मामाश्रित्य)। कारण कि समग्रका ज्ञान विचारसे नहीं होता, प्रत्युत श्रद्धा-विश्वासपूर्वक शरणागत होनेपर भगवत्कृपासे ही होता है। इसलिये भगवान्ने सातवें अध्यायके आरम्भमें “मदाश्रयः” कहकर अन्तमें “मामाश्रित्य” पदसे उसका उपसंहार किया है। ब्रह्म (निर्गुण-निराकार), कृत्स्न अध्यात्म (अनन्त योनियोंके अनन्त जीव) तथा अखिल कर्म (उत्पत्ति- स्थिति-प्रलय आदिकी सम्पूर्ण क्रियाएँ)—यह “ज्ञान” का विभाग है। इस विभागमें निर्गुणकी मुख्यता है। अधिभूत (अपने शरीरसहित सम्पूर्ण पांचभौतिक जगत्), अधिदैव (मन-इन्द्रियोंके अधिष्ठातृ देवतासहित ब्रह्माजी आदि सभी देवता) तथा अधियज्ञ (अन्तर्यामी विष्णु और उनके सभी रूप)—यह “विज्ञान” का विभाग है। इस विभागमें सगुणकी मुख्यता है। अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञके “सहित” कहनेका तात्पर्य है कि सत्-असत्, परा-अपरा सब कुछ भगवान् ही हैं। भगवान्के सिवाय किंचिन्मात्र भी कुछ नहीं है। सत्-असत्को अलग-अलग करनेसे ज्ञानमार्ग होता है—“नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। उभयोरपि.......” (गीता 2। 16) और एक करनेसे भक्तिमार्ग होता है— “सदसच्चाहमर्जुन” (गीता 9। 19)। “ब्रह्म” की बात पहले पाँचवें अध्यायमें तेरहवेंसे छब्बीसवें श्लोकतक कही गयी है। “कृत्स्न अध्यात्म” की बात पहले छठे अध्यायके उनतीसवें श्लोकमें “सर्वभूतस्थमात्मानम्” पदसे कही गयी है। “अखिल कर्म” की बात पहले चौथे अध्यायके अठारहवें, तेईसवें और तैंतीसवें श्लोकमें क्रमशः “कृत्स्नकर्मकृत्”, “कर्म समग्रम्” और “सर्वं कर्माखिलम्” पदसे कही गयी है। अभाव कर्मका होता है, आत्मा या ब्रह्मका नहीं। न्यायमें आता है कि किसी वस्तुके भावका ज्ञान जिस इन्द्रियसे होता है, उसी इन्द्रियसे उसके अभावका और जातिका ज्ञान भी होता है। अतः मनुष्य जिस ज्ञानसे कर्मोंको जानता है (कर्म चाखिलम्), उसी ज्ञानसे कर्मोंके अभावको अर्थात् अकर्मको भी जानता है— “कर्मण्यकर्म यः पश्येत्” (गीता 4। 18)। ब्रह्म, आत्मा और अकर्म—तीनों एक ही हैं; ऐसा जानना ही “ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्” पदोंका तात्पर्य है। “कर्म” सीमित है, कर्मसे व्यापक “अध्यात्म” है और अध्यात्मसे व्यापक “ब्रह्म” है। परन्तु “माम्” (समग्र) उस ब्रह्मसे भी श्रेष्ठ है; क्योंकि ब्रह्मके अन्तर्गत तो समग्र नहीं आता, पर समग्रके अन्तर्गत ब्रह्म आ जाता है। “अध्यात्म” के साथ “कृत्स्न” शब्द देनेका तात्पर्य है—जिनको भगवान्ने अपनी परा प्रकृति बताया है, वे अनेक रूपसे दीखनेवाले सम्पूर्ण जीव। “कर्म” के साथ “अखिल” शब्द देनेका तात्पर्य है—जिनके फलस्वरूप जीव अनेक योनियोंमें और अनेक लोकोंमें जाता है, वे शुभ-अशुभ सम्पूर्ण कर्म, परन्तु “ब्रह्म” के साथ “कृत्स्न” या “अखिल” शब्द न देनेका तात्पर्य है कि ब्रह्म अनेक नहीं है, प्रत्युत एक ही है। गीतामें भगवान्ने दो निष्ठाएँ बतायी हैं—कर्मयोग और ज्ञानयोग। ये दोनों ही निष्ठाएँ लौकिक हैं—“लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा” (गीता 3। 3); परन्तु भक्तियोग अलौकिक निष्ठा है। कारण कि कर्मयोगमें “क्षर” (संसार) की प्रधानता है और ज्ञानयोगमें “अक्षर” (जीवात्मा) की प्रधानता है। क्षर और अक्षर—दोनों ही लोकमें हैं— “द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च” (गीता 15। 16) इसलिये कर्मयोग और ज्ञानयोग—दोनों लौकिक निष्ठाएँ हैं। परन्तु भक्तियोगमें “परमात्मा” की प्रधानता है, जो क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम है (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका सत्रहवाँ, अठारहवाँ श्लोक)। इसलिये भक्तियोग अलौकिक निष्ठा है। भगवान्के समग्ररूपमें ब्रह्म, अध्यात्म तथा कर्म—इनमें लौकिक निष्ठा (कर्मयोग तथा ज्ञानयोग) की बात आयी है* और अधिभूत, अधिदैव तथा अधियज्ञ—इनमें अलौकिक निष्ठा-(भक्तियोग-) की बात आयी है। “ज्ञान” लौकिक है—“न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते”1 (गीता 4। 38) और “विज्ञान” अलौकिक है। लौकिक तथा अलौकिक—दोनों ही समग्र भगवान्के रूप हैं—“वासुदेवः सर्वम्”। “लोक” शब्दमें जड़ भी है और चेतन भी। केवल जड़ अथवा केवल चेतनका वाचक “लोक” शब्द नहीं हो सकता। अतः “लौकिक” में जड़ और चेतन दोनों आते हैं, पर “अलौकिक” में केवल चेतन ही आता है; क्योंकि अलौकिक सदा चिन्मय ही होता है। परन्तु “समग्र” में लौकिक और अलौकिक—दोनों आ जाते हैं। यहाँ एक विशेष ध्यान देनेकी बात है कि निर्गुण-निराकार “ब्रह्म” का नाम भगवान्के समग्ररूपके अन्तर्गत आया है। लोगोंमें प्रायः इस बातकी प्रसिद्धि है कि “निर्गुण-निराकार ब्रह्मके अन्तर्गत ही सगुण ईश्वर है। ब्रह्म मायारहित है और ईश्वर मायासहित है। अतः ब्रह्मके एक अंशमें ईश्वर है।” वास्तवमें ऐसा मानना शास्त्रसम्मत एवं युक्तिसंगत नहीं है; क्योंकि जब ब्रह्ममें माया है ही नहीं तो फिर मायासहित ईश्वर ब्रह्मके अन्तर्गत कैसे हुआ? ब्रह्ममें माया कहाँसे आयी? परन्तु गीतामें भगवान् कह रहे हैं कि मेरे समग्ररूपके एक अंशमें ब्रह्म है! इसलिये भगवान्ने अपनेको ब्रह्मका आधार बताया है—“ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्” (गीता 14। 27) “मैं ब्रह्मकी प्रतिष्ठा हूँ” तथा “मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना” (गीता 9। 4) “यह सब संसार मेरे अव्यक्त स्वरूपसे व्याप्त है।” भगवान्के इस कथनका तात्पर्य है कि ब्रह्मका अंश मैं नहीं हूँ, प्रत्युत मेरा अंश ब्रह्म है। अतः निष्पक्ष विचार करनेसे ऐसा दीखता है कि गीतामें ब्रह्मकी मुख्यता नहीं है, प्रत्युत ईश्वरकी मुख्यता है। पूर्ण तत्त्व समग्र ही है। समग्रमें सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार सब आ जाते हैं। वास्तवमें देखा जाय तो समग्ररूप सगुणका ही हो सकता है; क्योंकि सगुण शब्दके अन्तर्गत तो निर्गुण आ सकता है, पर निर्गुण शब्दके अन्तर्गत सगुण नहीं आ सकता। कारण कि सगुणमें निर्गुणका निषेध नहीं है, जबकि निर्गुणमें गुणोंका निषेध है। अतः निर्गुणमें समग्र शब्द लग ही नहीं सकता। इसलिये यहाँ “अध्यात्म” और “कर्म” के साथ तो क्रमशः “कृत्स्न” और “अखिल” शब्द आये हैं, जो समग्रताके वाचक हैं, पर “ब्रह्म” के साथ समग्रताका वाचक कोई शब्द कहीं भी नहीं आया है। अतः समग्रता सगुणमें ही है, निर्गुणमें नहीं। प्रश्न—ब्रह्म, अध्यात्म और कर्म—ये तीनों लौकिक कैसे हैं? उत्तर—भगवान्ने ब्रह्मको “अक्षर” कहा है—“अक्षरं ब्रह्म परमम्” (गीता 8। 3) और जीवको भी “अक्षर” कहा है—“द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च” (गीता 15। 16)। जीव और ब्रह्म—दोनों एक हैं—“अयमात्मा ब्रह्म” (माण्डूक्य0 1)। प्रकृति-(शरीर-) के साथ सम्बन्ध होनेसे जो “जीव” (अध्यात्म) है2, वही प्रकृतिके साथ सम्बन्ध न होनेसे सामान्य “ब्रह्म” है। अतः गीताके अनुसार जैसे जीव लोकमें है, ऐसे ही ब्रह्म भी लोकमें है अर्थात् ब्रह्म लौकिक निष्ठा-(कर्मयोग तथा ज्ञानयोग-) से प्रापणीय तत्त्व है। “अध्यात्म” अर्थात् जीवने जगत्को धारण किया हुआ है—“ययेदं धार्यते जगत्” (गीता 7। 5)। जीवकी अपनी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। इसलिये जगत्के संगसे जीव भी जगत् अर्थात् लौकिक हो जाता है। (गीता—इसी अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। लोकमें होनेके कारण भी जीव लौकिक है—“ममैवांशो जीवलोके” (गीता 15। 7), “द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च” (गीता 15। 16)। “कर्म” दो प्रकारसे होते हैं—सकामभावसे और निष्कामभावसे। ये दोनों ही प्रकारके कर्म लोकमें होनेसे लौकिक है3। प्रश्न—अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ—ये तीनों अलौकिक कैसे हैं? उत्तर—“अधिभूत” अर्थात् सम्पूर्ण पांचभौतिक जगत् तत्त्वसे भगवान्का ही स्वरूप होनेसे अलौकिक है—“अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन” (गीता 9। 19) “अमृत और मृत्यु तथा सत् और असत् भी मैं ही हूँ”1। भगवान्ने अर्जुनको जो विराट्रूप दिखाया था, वह भी दिव्य अर्थात् अलौकिक था2। वह दिव्य विराट्रूप भगवान्ने अपने ही दिव्य शरीरके एक अंगमें दिखाया था3। अतः भगवान्का ही विराट्रूप होनेसे यह पांचभौतिक जगत् भी अलौकिक ही है4। भगवान्ने संसारमें अपनी विभूतियोंको भी दिव्य अर्थात् अलौकिक कहा है—“दिव्या ह्यात्मविभूतयः” (गीता 10। 19), “मम दिव्यानां विभूतीनाम्” (10। 40)5। परन्तु जीवको अज्ञानवश अपनी बुद्धिसे (राग-द्वेषके कारण) यह जगत् लौकिक दीखता है। इसलिये अज्ञान मिटनेपर जड़ता रहती ही नहीं, केवल चिन्मयता रहती है। “अधिदैव” अर्थात् ब्रह्माजी आदि सभी देवता अलौकिक हैं। “अधियज्ञ” अर्थात् अन्तर्यामी भगवान् सबके हृदयमें रहते हुए भी निर्लिप्त होनेके कारण अलौकिक हैं6। भगवान्ने “साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञम्” पदोंमें अपनेको अधिभूत, अधिदैव तथा अधियज्ञके सहित जाननेकी बात कही है। इससे सिद्ध होता है कि परमात्माके सहित होनेसे ही ये तीनों अलौकिक हैं, अन्यथा लौकिक ही हैं। जबतक भगवान्के साथ सम्बन्ध नहीं होता, तबतक सब लौकिक ही होता है; परन्तु भगवान्के साथ सम्बन्ध होनेसे सब अलौकिक हो जाता है। इसलिये अपना उद्योग मुख्य होनेसे कर्मयोग तथा ज्ञानयोग “लौकिक निष्ठा” है और भगवान्का आश्रय मुख्य होनेसे भक्तियोग “अलौकिक निष्ठा” है। वास्तवमें लौकिक कोई तत्त्व नहीं है। वास्तविक तत्त्व तो अलौकिक ही है। परन्तु साधककी दृष्टिसे लौकिक और अलौकिक—ये दो भेद कहे गये हैं। तात्पर्य है कि लौकिक-अलौकिकका विभाग अज्ञानवश होनेवाले राग- द्वेषके कारण ही है। राग-द्वेष न हों तो सब कुछ अलौकिक, चिन्मय, दिव्य ही है—“वासुदेवः सर्वम्”। कारण कि लौकिककी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं है। राग-द्वेषके कारण ही लौकिककी सत्ता और महत्ता दीखती है। राग-द्वेषके कारण ही जीवने भगवत्स्वरूप संसारको भी लौकिक बना दिया और खुद भी लौकिक बन गया! विज्ञानसहित ज्ञानका अर्थात् भगवान्के समग्ररूपका वर्णन करनेका तात्पर्य यही है कि जड़-चेतन, सत्-असत्, परा-अपरा, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ आदि जो कुछ भी है, वह सब भगवान्का ही स्वरूप है। इसलिये भगवान्ने यहाँ समग्ररूपवर्णनके आदि और अन्तमें “माम्” पद दिया है, जो समग्रका वाचक है— “मामाश्रित्य” (7। 29) और “मां ते विदुः” (7। 30)। भगवान्ने कर्मोंकी गति (तत्त्व)-को गहन बताया है—“गहना कर्मणो गतिः” (गीता 4। 17), पर भक्त उसको भी जान लेता है। कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म (चौथे अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)—दोनोंको भक्त जान लेता है। तात्पर्य है कि वह कर्मको भी जान लेता है और कर्मयोगको भी जान लेता है। कर्मयोगी तो कर्मयोगको ही जानता है और ज्ञानयोगी ज्ञानयोगको ही जानता है, पर भक्त भगवत्कृपासे कर्मयोग और ज्ञानयोग—दोनोंको ही जान लेता है। इसी अध्यायके पहले श्लोकमें आये “योगं युञ्जन्मदाश्रयः” को यहाँ “मामाश्रित्य यतन्ति ये” पदोंसे और “मय्यासक्तमनाः” को यहाँ “युक्तचेतसः” पदसे कहा गया है। तात्पर्य है कि मेरा आश्रय लेनेसे भक्तको कर्मयोग तथा ज्ञानयोगकी भी सिद्धि हो जाती है अर्थात् वे दोनोंके फल (लक्ष्य) रूप ब्रह्मको भी जान लेते हैं—“ते ब्रह्म तद्विदुः” और मेरे समग्ररूपको भी जान लेते हैं—“मां ते विदुः।” “प्रयाणकालेऽपि” में “अपि” पद देनेका तात्पर्य है कि वे भक्त मेरेको पहले भी जानते हैं और अन्तकालमें भी जानते हैं अर्थात् उनका ज्ञान कभी लुप्त नहीं होता। ऐसे भक्त “युक्तचेता” हो जाते हैं अर्थात् उनके मनकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती, प्रत्युत केवल भगवान् ही रहते हैं। भगवान्के साथ उनकी अभिन्नता (नित्ययोग) होनेसे न वे भगवान्से वियुक्त होते हैं, न भगवान् उनसे वियुक्त होते हैं। ऐसे युक्तचेता भक्त अन्तकालमें कुछ भी चिन्तन होनेपर भी योगभ्रष्ट नहीं होते, प्रत्युत भगवान्को ही प्राप्त होते हैं—“प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः।” कारण कि उन भक्तोंकी दृष्टिमें जब भगवान्के सिवाय किंचिन्मात्र भी कुछ नहीं है, तो फिर उनका मन भगवान्को छोड़कर कहाँ जायगा ? क्यों जायगा? कैसे जायगा? उनके मनमें कुछ भी चिन्तन होगा तो भगवान्का ही चिन्तन होगा, फिर उनका मन विचलित कैसे होगा और मनके विचलित हुए बिना वह योगभ्रष्ट कैसे होगा? कारण कि करणसापेक्ष साधनमें योगसे मनके विचलित होनेपर ही मनुष्य योगभ्रष्ट होता है—“योगाच्चलितमानसः” (गीता 6। 37); परन्तु सब जगह भगवान्को देखनेवालेका भगवान्से नित्ययोग रहता है। भगवान्के कुछ भक्त तो मुक्ति चाहते हैं—“जरामरणमोक्षाय” और कुछ भक्त प्रेम चाहते हैं—“मां ते विदुर्युक्तचेतसः”। मुक्ति चाहनेवाले भक्त कर्मयोग और ज्ञानयोग (ब्रह्म, अध्यात्म और कर्म)-को जान लेते हैं, पर प्रेम चाहनेवाले भक्त स्वयं समग्र भगवान्को जान लेते हैं—“मां विदुः।” भगवान् अपने प्रेमी भक्तोंको कर्मयोग (बुद्धियोग) और ज्ञानयोग—दोनों प्रदान कर देते हैं (गीता—दसवें अध्यायका दसवाँ-ग्यारहवाँ श्लोक)। जरा-मरणरूप बन्धन और मुक्ति—दोनों ही लौकिक हैं, पर प्रेम अलौकिक है। यद्यपि साधन-भक्ति भी लौकिक है, तथापि उद्देश्य अलौकिक होनेसे वह अलौकिक साध्य-भक्तिमें चली जाती है—“भक्त्या संजातया भक्त्या” (श्रीमद्भा0 11। 3। 31)। इस प्रकार ॐ, तत्, सत्—इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्रूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें “ज्ञानविज्ञानयोग” नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ 7॥ इस सातवें अध्यायमें ज्ञान और विज्ञानका वर्णन किया गया है। भगवान् इस सम्पूर्ण जगत्के महाकारण हैं—ऐसा दृढ़तापूर्वक मानना “ज्ञान” है। ऐसे ही भगवान्के सिवाय कुछ भी नहीं है—ऐसा अनुभव हो जाना “विज्ञान” है। ज्ञान और विज्ञानसे परमात्माके साथ नित्ययोगका अनुभव हो जाता है अर्थात् “मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं” इस परम प्रेमरूप नित्य-सम्बन्धकी जागृति हो जाती है। इसलिये इस सातवें अध्यायका नाम “ज्ञानविज्ञानयोग” रखा गया है। सातवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच (1)इस अध्यायमें “अथ सप्तमोऽध्यायः” के तीन, “श्रीभगवानुवाच” के दो, श्लोकोंके चार सौ छः और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका योग चार सौ चौबीस है। (2) “अथ सप्तमोऽध्यायः” के सात “श्रीभगवानुवाच” सातवें अध्यायका सार भगवान्की दो प्रकृतियाँ हैं—अपरा और परा। संसार “अपरा” प्रकृति है और जीव “परा” प्रकृति है। अपरा प्रकृति जड़ तथा निरन्तर परिवर्तनशील है और परा प्रकृति चेतन तथा नित्य अपरिवर्तनशील है। भगवान्ने अपरा और परा— दोनोंको अपनी ही प्रकृति अर्थात् स्वभाव बताया है—“इतीयं मे” (7। 4), “मे पराम्” (7। 5)। भगवान्का स्वभाव होनेसे अपरा प्रकृतिकी स्वतन्त्र (भगवान्से अलग) सत्ता नहीं है; परन्तु जीव (परा प्रकृति) अपराको सत्ता और महत्ता देकर उसके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है। यह सम्बन्ध जीव दो प्रकारसे मानता है—(1) अहंतापूर्वक; जैसे—मैं शरीर हूँ और (2) ममतापूर्वक; जैसे—शरीर मेरा है। यह माना हुआ सम्बन्ध ही सम्पूर्ण प्राणियोंके उत्पन्न होनेमें कारण है—“कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु” (गीता 13। 21)। वास्तवमें सम्पूर्ण जगत्के कर्ता, कारण तथा कार्य एक भगवान् ही हैं। भगवान्के सिवाय दूसरा कोई है ही नहीं— “मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति” (7। 7)। यह सिद्धान्त है कि सत्ता एक ही होती है, दो नहीं होती। अतः एक भगवान् ही अनेक रूपोंमें प्रकट हुए हैं। आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी—ये पाँच महाभूत तथा इनके कार्य शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये पाँच विषय—इन सबके मूल कारण भगवान् ही हैं। भगवान् ही सम्पूर्ण प्राणियोंके अनादि तथा अविनाशी बीज हैं। तात्पर्य है कि सृष्टिमें जो कुछ भी क्रिया, पदार्थ, भाव आदि देखने-सुनने-समझनेमें आते हैं, उन सबके बीज (मूल कारण) एकमात्र भगवान् ही हैं। कारण ही कार्यरूपमें परिणत होता है।* अतः कारणकी तो स्वतन्त्र सत्ता होती है, पर कार्यकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं होती। इसलिये अगर कोई साधक कार्यमें भगवान्को प्राप्त करना चाहे तो उसको भगवान् नहीं मिलेंगे—“न त्वहं तेषु ते मयि” (7। 12)। जो सबके कारणरूप भगवान्के शरण होते हैं, उन्हींको भगवान् मिलते हैं। परन्तु जो कारणरूप भगवान्के शरण न होकर कार्यरूप सत्त्वादि गुणोंमें उलझ जाते हैं, वे जन्म- मरणके चक्रमें पड़े रहते हैं। ऐसे मनुष्य कार्यरूप शरीर-संसारके सम्बन्धसे होनेवाली कामनाओंकी पूर्तिके लिये देवताओंकी शरण लेते हैं, क्योंकि वे अलौकिक भगवान्को साधारण मनुष्यकी तरह लौकिक मानते हैं। परन्तु जो मनुष्य तीनों गुणोंसे मोहित नहीं होते, वे भगवान्की शरण लेते हैं। ऐसे भक्तोंके चार भेद होते हैं—अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी। इन शरणागत भक्तोंमें भी जो “सब कुछ भगवान् ही हैं”—इस प्रकार भगवान्के शरण हो जाता है, वह महात्मा भक्त मुक्त पुरुषोंसे भी श्रेष्ठ होनेके कारण अत्यन्त दुर्लभ है। वह महात्मा भक्त भगवान्की कृपासे परा-अपरासहित भगवान्के समग्ररूपको के सात, श्लोकोंके नौ सौ साठ और पुष्पिकाके अड़तालीस अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका योग एक हजार बाईस है। इस अध्यायके सभी श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं। (3) इस अध्यायमें एक उवाच है—“श्रीभगवानुवाच”। सातवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द इस अध्यायके तीस श्लोकोंमेंसे—छठे श्लोकके तृतीय चरणमें और चौदहवें श्लोकके प्रथम चरणमें “नगण” प्रयुक्त होनेसे “न-विपुला”; ग्यारहवें श्लोकके तृतीय चरणमें और पचीसवें श्लोकके प्रथम चरणमें “मगण” प्रयुक्त होनेसे “म-विपुला”; सत्रहवें श्लोकके प्रथम चरणमें “रगण” प्रयुक्त होनेसे “र-विपुला”; तथा उन्नीसवें और बीसवें श्लोकके तृतीय चरणमें “भगण” प्रयुक्त होनेसे “भ- विपुला” संज्ञावाले छन्द हैं। शेष तेईस श्लोक ठीक “पथ्यावक्त्र” अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं। जान लेता है, जिसको जाननेपर फिर कुछ भी जानना शेष नहीं रहता; क्योंकि उसके सिवाय अन्य चीज कोई है ही नहीं। उसका भगवान्के साथ आत्मीय सम्बन्ध हो जाता है, जिससे प्रतिक्षण वर्धमान प्रेमकी प्राप्ति (जागृति) हो जाती है। इस प्रेमकी जागृतिमें ही मनुष्यजन्मकी पूर्णता है। एक अपरा प्रकृति है, एक परा प्रकृति है और एक परा-अपराके मालिक परमात्मा हैं। सम्पूर्ण शरीर-संसार (अधिभूत) अपरा प्रकृतिके अन्तर्गत और सम्पूर्ण शरीरी (कृत्स्न अध्यात्म) परा प्रकृतिके अन्तर्गत आते हैं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि मात्र शरीर (संसार) भी एक हैं और मात्र शरीरी (जीव) भी एक हैं तथा अपरा और परा— ये दोनों जिसकी शक्तियाँ हैं, वे परमात्मा भी एक हैं। अतः शरीरोंकी दृष्टिसे, आत्माकी दृष्टिसे और परमात्माकी दृष्टिसे— तीनों ही दृष्टियोंसे हम सब एक हैं, अनेक नहीं हैं—“नेह नानास्ति किञ्चन” (कठ0 2। 1। 11, बृहदा0 4। 4। 19)। सम्पूर्ण शरीरोंमें एकता स्वीकार करनेपर किसी भी प्राणीसे राग अथवा द्वेष नहीं होगा और सम्पूर्ण प्राणियोंके हितका भाव होगा। ऐसा होनेसे “कर्मयोग” सुगमतापूर्वक स्वतः सिद्ध हो जायगा। कारण कि जब अपनेसे भिन्न दूसरा कोई है ही नहीं और व्यक्तिगत अपना कुछ है ही नहीं तो फिर अपने पास जो भी वस्तु है, उसमें ममता नहीं होगी और जो वस्तु नहीं है, उसकी कामना नहीं होगी। ममता और कामना न होनेपर अपने पास जो भी वस्तु है, वह स्वतः दूसरोंकी सेवामें लगेगी। सम्पूर्ण जीवोंमें एकता स्वीकार करनेपर सर्वत्र आत्मभाव अथवा ब्रह्मभाव हो जायगा—“सर्वं खल्विदं ब्रह्म” (छान्दोग्य0 3। 14। 1), “आत्मैवेदं सर्वम्” (छान्दोग्य0 7। 25। 2)। ऐसा होनेसे “ज्ञानयोग” सुगमतापूर्वक स्वतः सिद्ध हो जायगा। कारण कि अनेक रूपसे जो जीव है, वही एक रूपसे ब्रह्म है अर्थात् जीव और ब्रह्म एक ही हैं—“अयमात्मा ब्रह्म” (माण्डूक्य0 1)। अपरा और परा—इन दोनों प्रकृतियोंकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है; क्योंकि ये दोनों भगवान्की शक्तियाँ, स्वभाव होनेसे भगवत्स्वरूप ही हैं। ऐसा स्वीकार करनेसे सर्वत्र भगवद्भाव हो जायगा। “वासुदेवः सर्वम्” (7। 19)। ऐसा होनेसे “भक्तियोग” सुगमतापूर्वक स्वतः सिद्ध हो जायगा। कारण कि “सब कुछ भगवान् ही हैं”—यही वास्तविक शरणागति है। तात्पर्य यह निकला कि जगत्, जीव और परमात्मा—तीनोंकी दृष्टिसे हम सब एक समान हैं। इस समताको गीताने “योग” कहा है—“समत्वं योग उच्यते” (गीता 2। 48)। भेद (विषमता) केवल व्यवहारके लिये है, जो अनिवार्य है; क्योंकि व्यवहारमें समता सम्भव ही नहीं है। अतः साधककी दृष्टि (भावना) सम होनी चाहिये—“सर्वत्र समदर्शनः” (गीता 6। 29), “पण्डिताः समदर्शिनः” (गीता 5। 18), “समबुद्धिर्विशिष्यते” (गीता 6। 9), “सर्वत्र समबुद्धयः” (गीता 12। 4)। व्यवहारकी भिन्नता तो स्वाभाविक है, पर भावकी भिन्नता मनुष्यने अपने राग-द्वेषसे पैदा की है। राग-द्वेषके कारण ही मनुष्यने जगत्, जीव और परमात्मा—तीनोंमें अनेक भेद पैदा कर लिये हैं, जो इसके जन्म- मरणका कारण है—“मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति” (कठ0 2। 1। 11)। जो किसीको भी पराया मानता है, किसीका भी बुरा चाहता, देखता तथा करता है और संसारसे कुछ भी चाहता है, वह न तो कर्मयोगी हो सकता है, न ज्ञानयोगी हो सकता है और न भक्तियोगी ही हो सकता है। जगत्, जीव और परमात्मा—इन तीनोंपर विचार करें तो स्वतन्त्र सत्ता एक परमात्माकी ही है। जगत् और जीवकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। जगत्को जीवने ही धारण किया है—“ययेदं धार्यते जगत्” (7। 5) अर्थात् जगत्को सत्ता जीवने ही दी है, इसलिये जगत्की स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। जीव परमात्माका ही अंश है—“ममैवांशो जीवलोके” (गीता 15। 7), इसलिये खुद जीवकी भी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। तात्पर्य है कि जगत्की सत्ता जीवके अधीन है और जीवकी सत्ता परमात्माके अधीन है, इसलिये एक परमात्माके सिवाय अन्य कुछ नहीं है—“सदसच्चाहमर्जुन” (गीता 9। 19)। जगत् और जीव—दोनों परमात्मामें ही भासित हो रहे हैं।
विशेष बात
विशेष बात (1) प्रकृति और प्रकृतिके कार्य—क्रिया, पदार्थ आदिके साथ अपना सम्बन्ध माननेसे ही सभी विकार पैदा होते हैं और उन क्रिया, पदार्थ आदिकी प्रकटरूपसे सत्ता दीखने लग जाती है। परन्तु प्रकृति और प्रकृतिके कार्यसे सर्वथा सगुणके दो भेद होते हैं—एक सगुण-साकार और एक स्वतन्त्र सत्ता उस भगवत्तत्त्वमें ही लीन हो जाती है। फिर उनकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं दीखती। जैसे, किसी व्यक्तिके विषयमें हमारी जो अच्छे और बुरेकी मान्यता है, वह मान्यता हमारी ही की हुई है। तत्त्वसे तो वह व्यक्ति भगवान्का स्वरूप है अर्थात् उस व्यक्तिमें तत्त्वके सिवाय दूसरा कोई स्वतन्त्र व्यक्तित्व ही नहीं है। ऐसे ही संसारमें “यह ठीक है, यह बेठीक है” इस प्रकार ठीक-बेठीककी मान्यता हमारी ही की हुई है। तत्त्वसे तो संसार भगवान्का स्वरूप ही है। हाँ, संसारमें जो वर्ण- आश्रमकी मर्यादा है, “ऐसा काम करना चाहिये और ऐसा नहीं करना चाहिये”—यह जो विधि-निषेधकी मर्यादा है, इसको महापुरुषोंने जीवोंके कल्याणार्थ व्यवहारके लिये मान्यता दी है। जब यह भौतिक सृष्टि नहीं थी, तब भी भगवान् थे और इसके लीन होनेपर भी भगवान् रहेंगे—इस तरहसे जब वास्तविक भगवत्तत्त्वका बोध हो जाता है, तब भौतिक सृष्टिकी सत्ता भगवान्में ही लीन हो जाती है अर्थात् इस सृष्टिकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती। इसका यह तात्पर्य नहीं है कि संसारकी स्वतन्त्र सत्ता न रहनेपर संसार मिट जाता है, उसका अभाव हो जाता है, प्रत्युत अन्तःकरणमें सत्यत्वेन जो संसारकी सत्ता और महत्ता बैठी हुई थी, जो कि जीवके कल्याणमें बाधक थी, वह नहीं रहती। जैसे सोनेके गहनोंकी अनेक तरहकी आकृति और अलग-अलग उपयोग होनेपर भी उन सबमें एक ही सोना है, ऐसे ही भगवद्भक्तके द्वारा अनेक तरहका यथायोग्य सांसारिक व्यवहार होनेपर भी उन सबमें एक ही भगवत्तत्त्व है—ऐसी अटलबुद्धि रहती है। इस तत्त्वको समझनेके लिये ही उनतीसवें और तीसवें श्लोकमें समग्ररूपका वर्णन हुआ है। (2) उपासनाकी दृष्टिसे भगवान्के प्रायः दो रूपोंका विशेष वर्णन आता है—एक सगुण और एक निर्गुण। इनमें सगुण-निराकार। परन्तु निर्गुणके दो भेद नहीं होते, निर्गुण निराकार ही होता है। हाँ, निराकारके दो भेद होते हैं— एक सगुण-निराकार और एक निर्गुण-निराकार। उपासना करनेवाले दो रुचिके होते हैं—एक सगुण- विषयक रुचिवाला होता है और एक निर्गुणविषयक रुचिवाला होता है। परन्तु इन दोनोंकी उपासना भगवान्के “सगुण-निराकार” रूपसे ही शुरू होती है; जैसे—परमात्म- प्राप्तिके लिये कोई भी साधक चलता है तो वह पहले “परमात्मा है”—इस प्रकार परमात्माकी सत्ताको मानता है और “वे परमात्मा सबसे श्रेष्ठ हैं, सबसे दयालु हैं, उनसे बढ़कर कोई है नहीं”—ऐसे भाव उसके भीतर रहते हैं, तो उपासना सगुण-निराकारसे ही शुरू हुई। इसका कारण यह है कि बुद्धि प्रकृति कार्य (सगुण) होनेसे निर्गुणको पकड़ नहीं सकती। इसलिये निर्गुणके उपासकका लक्ष्य तो निर्गुण-निराकार होता है, पर बुद्धिसे वह सगुण-निराकार- का ही चिन्तन करता है*। सगुणकी ही उपासना करनेवाले पहले सगुण-साकार मानकर उपासना करते हैं। परन्तु मनमें जबतक साकार- रूप दृढ़ नहीं होता, तबतक “प्रभु हैं और वे मेरे सामने हैं” ऐसी मान्यता मुख्य होती है। इस मान्यतामें सगुण भगवान्की अभिव्यक्ति जितनी अधिक होती है, उतनी ही उपासना ऊँची मानी जाती है। अन्तमें जब वह सगुण- साकाररूपसे भगवान्के दर्शन, भाषण, स्पर्श और प्रसाद प्राप्त कर लेता है, तब उसकी उपासनाकी पूर्णता हो जाती है। निर्गुणकी उपासना करनेवाले परमात्माको सम्पूर्ण संसारमें व्यापक समझते हुए चिन्तन करते हैं। उनकी वृत्ति जितनी ही सूक्ष्म होती चली जाती है, उतनी ही उनकी उपासना ऊँची मानी जाती है। अन्तमें सांसारिक आसक्ति और गुणोंका सर्वथा त्याग होनेपर जब “मैं”, “तू” आदि कुछ भी नहीं रहता, केवल चिन्मय-तत्त्व शेष रह जाता है, तब उसकी उपासनाकी पूर्णता हो जाती है। इस प्रकार दोनोंकी अपनी-अपनी उपासनाकी पूर्णता होनेपर दोनोंकी एकता हो जाती है अर्थात् दोनों एक ही तत्त्वको प्राप्त हो जाते हैं 1। सगुण-साकारके उपासकोंको तो भगवत्कृपासे निर्गुण-निराकारका भी बोध हो जाता है—मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पाव निज सहज सरूपा॥ (मानस 3। 36। 5) निर्गुण-निराकारके उपासकमें यदि भक्तिके संस्कार हैं और भगवान्के दर्शनकी अभिलाषा है, तो उसे भगवान्के दर्शन हो जाते हैं अथवा भगवान्को उससे कुछ काम लेना होता है, तो भगवान् अपनी तरफसे भी दर्शन दे सकते हैं। जैसे, निर्गुण- निराकारके उपासक मधुसूदनाचार्यजीको भगवान्ने अपनी तरफसे दर्शन दिये थे2। (3) वास्तवमें परमात्मा सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार सब कुछ हैं। सगुण-निर्गुण तो उनके विशेषण हैं, नाम हैं। साधक परमात्माको गुणोंके सहित मानता है तो उसके लिये वे सगुण हैं और साधक उनको गुणोंसे रहित मानता है तो उसके लिये वे निर्गुण हैं। वास्तवमें परमात्मा सगुण तथा निर्गुण—दोनों हैं और दोनोंसे परे भी हैं। परन्तु इस वास्तविकताका पता तभी लगता है, जब बोध होता है। भगवान्के सौन्दर्य, माधुर्य, ऐश्वर्य, औदार्य आदि जो दिव्य गुण हैं, उन गुणोंके सहित सर्वत्र व्यापक परमात्माको “सगुण” कहते हैं। इस सगुणके दो भेद होते हैं— (1) सगुण-निराकार—जैसे, आकाशका गुण “शब्द” है, पर आकाशका कोई आकार (आकृति) नहीं है, इसलिये आकाश सगुण-निराकार हुआ। ऐसे ही प्रकृति और प्रकृतिके कार्य संसारमें परिपूर्णरूपसे व्यापक परमात्माका नाम सगुण-निराकार है। (2) सगुण-साकार—वे ही सगुण-निराकार परमात्मा जब अपनी दिव्य प्रकृतिको अधिष्ठित करके अपनी योगमायासे लोगोंके सामने प्रकट हो जाते हैं, उनकी इन्द्रियोंके विषय हो जाते हैं, तब उन परमात्माको सगुण- साकार कहते हैं। सगुण तो वे थे ही, आकृतियुक्त प्रकट हो जानेसे वे साकार कहलाते हैं। जब साधक परमात्माको दिव्य अलौकिक गुणोंसे भी रहित मानता है अर्थात् साधककी दृष्टि केवल निर्गुण परमात्माकी तरफ रहती है, तब परमात्माका वह स्वरूप “निर्गुण-निराकार” कहा जाता है। गुणोंके भी दो भेद होते हैं—(1) परमात्माके स्वरूपभूत सौन्दर्य, माधुर्य, ऐश्वर्य आदि दिव्य, अलौकिक, अप्राकृत गुण और (2) प्रकृतिके सत्त्व, रज और तम गुण। परमात्मा चाहे सगुण-निराकार हों, चाहे सगुण- साकार हों, वे प्रकृतिके सत्त्व, रज और तम—तीनों गुणोंसे सर्वथा रहित हैं, अतीत हैं। वे यद्यपि प्रकृतिके गुणोंको स्वीकार करके सृष्टिकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयकी लीला करते हैं, फिर भी वे प्रकृतिके गुणोंसे सर्वथा रहित ही रहते हैं (गीता—सातवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। जो परमात्मा गुणोंसे कभी नहीं बँधते, जिनका गुणोंपर पूरा आधिपत्य होता है, वे ही परमात्मा निर्गुण होते हैं। अगर परमात्मा गुणोंसे बँधे हुए और गुणोंके अधीन होंगे, तो वे कभी निर्गुण नहीं हो सकते। निर्गुण तो वे ही हो सकते हैं, जो गुणोंसे सर्वथा अतीत हैं और जो गुणोंसे सर्वथा अतीत हैं, ऐसे परमात्मामें ही सम्पूर्ण गुण रह सकते हैं। इसलिये परमात्माको सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार आदि सब कुछ कह सकते हैं। ऐसे परमात्माका ही उनतीसवें-तीसवें श्लोकोंमें समग्ररूपसे वर्णन किया गया है। अध्याय-सम्बन्धी विशेष बात भगवान्ने इस अध्यायमें पहले परिवर्तनशीलको “अपरा” और अपरिवर्तनशीलको “परा” नामसे कहा (चौथा-पाँचवाँ श्लोक)। फिर इन दोनोंके संयोगसे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति बतायी और अपनेको सम्पूर्ण संसारका प्रभव और प्रलय बताया अर्थात् संसारके आदिमें और अन्तमें “केवल मैं ही रहता हूँ”—यह बताया (छठा-सातवाँ श्लोक)। उसी प्रसंगमें भगवान्ने सत्रह विभूतियोंके रूपमें कारणरूपसे अपनी व्यापकता बतायी (आठवेंसे बारहवें श्लोकतक)। फिर भगवान्ने कहा कि जो तीनों गुणोंसे मोहित है अर्थात् जिसने निरन्तर परिवर्तनशील प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध मान लिया है, वह गुणोंसे पर मेरेको नहीं जान सकता (तेरहवाँ श्लोक)। यह गुणमयी माया तरनेमें बड़ी दुष्कर है। जो मेरे शरण हो जाते हैं, वे इस मायाको तर जाते हैं (चौदहवाँ श्लोक); परन्तु जो मेरेसे विमुख होकर निषिद्ध आचरणोंमें लग जाते हैं, वे दुष्कृती मनुष्य मेरे शरण नहीं होते (पन्द्रहवाँ श्लोक)। अब यहाँ चौदहवें श्लोकके बाद ही सोलहवाँ श्लोक कह देते तो बहुत ठीक बैठता अर्थात् चौदहवें श्लोकमें शरण होनेकी बात कही, तो अब शरण होनेवाले चार तरहके होते हैं—ऐसा बतानेसे शृंखला बहुत ठीक बैठती। परन्तु पंद्रहवाँ श्लोक बीचमें आ जानेसे प्रकरण ठीक नहीं बैठता। अतः यह श्लोक प्रकरणके विरुद्ध अर्थात् बाधा डालनेवाला मालूम देता है। परन्तु वास्तवमें यह श्लोक प्रकरणके विरुद्ध नहीं है; क्योंकि यह श्लोक न आनेसे “पापी मेरे शरण नहीं होते”—यह कहना बाकी रह जाता। इसलिये पंद्रहवें श्लोकमें “दुष्कृती (पापी) मेरे शरण होते ही नहीं”— यह बात बता दी और सोलहवें श्लोकमें शरण होनेवालोंके चार प्रकार बता दिये। अब जो शरण होते हैं, उनके भी दो प्रकार हैं—एक तो भगवान्को भगवान् समझकर अर्थात् भगवान्की महत्ता समझकर भगवान्के शरण होते हैं (सोलहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक) और दूसरे भगवान्को साधारण मनुष्य मानकर देवताओंको सबसे बड़ा मानते हैं, इसलिये भगवान्का आश्रय न लेकर कामनापूर्तिके लिये देवताओंके शरण हो जाते हैं (बीसवेंसे तेईसवें श्लोकतक)। देवताओंके शरणमें होनेमें भी दो हेतु होते हैं— कामनाओंका बढ़ जाना और भगवान्की महत्ताको न जानना। इनमेंसे पहले हेतुका वर्णन तो बीसवेंसे तेईसवें श्लोकतक कर दिया और दूसरे हेतुका वर्णन चौबीसवें श्लोकमें कर दिया। जो भगवान्को साधारण मनुष्य मानते हैं, उनके सामने भगवान् प्रकट नहीं होते—यह बात पचीसवें श्लोकमें बता दी। अब ऐसा असर पड़ता है कि भगवान् भी मायासे ढके होंगे। अतः भगवान् कहते हैं कि मेरा ज्ञान ढका हुआ नहीं है (छब्बीसवाँ श्लोक)। मेरेको न जाननेमें राग-द्वेष ही मुख्य कारण हैं (सत्ताईसवाँ श्लोक)। जो इस द्वन्द्वरूप मोहसे रहित होते हैं, वे दृढ़व्रती होकर मेरा भजन करते हैं (अट्ठाईसवाँ श्लोक)। जो मेरा आश्रय लेकर यत्न करते हैं, वे मेरे समग्ररूपको जान जाते हैं और अन्तमें मेरेको ही प्राप्त होते हैं (उनतीसवाँ-तीसवाँ श्लोक)। इस अध्यायपर आदिसे अन्ततक विचार करके देखें तो भगवान्के विमुख और सम्मुख होनेका ही इसमें वर्णन है। तात्पर्य है कि जडताकी तरफ वृत्ति रखनेसे मनुष्य बार- बार जन्मते-मरते रहते हैं। अगर वे जडतासे विमुख होकर भगवान्के सम्मुख हो जाते हैं, तो वे सगुण-निराकार, निर्गुण-निराकार और सगुण-साकार—ऐसे भगवान्के समग्ररूपको जानकर अन्तमें भगवान्को ही प्राप्त हो जाते हैं।
* उपासना सगुण-निराकारसे शुरू होती है—इसीलिये भगवान्ने इस (सातवें) अध्यायके अट्ठाईसवें श्लोकमें “सगुण-
निराकार” का वर्णन किया है। फिर उनतीसवें श्लोकमें “निर्गुण-निराकार” का और तीसवें श्लोकमें “सगुण-साकार” का
वर्णन किया है। इस प्रकार यहाँ तो तीनों स्वरूपोंका एक-एक श्लोकमें वर्णन किया गया है, पर आगे आठवें अध्यायमें
इन तीनोंका तीन-तीन श्लोकोंमें वर्णन किया गया है, जैसे—आठवें अध्यायके आठवें, नवें और दसवें श्लोकमें “सगुण-
निराकार”की उपासनाका; ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें श्लोकमें “निर्गुण-निराकार” की उपासनाका तथा चौदहवें, पंद्रहवें
और सोलहवें श्लोकमें “सगुण-साकार” की उपासनाका विशद वर्णन किया गया है।
1-सगुण-निर्गुणका भेद तो उपासनाकी दृष्टिसे है। वास्तवमें इन दोनों उपासनाओंमें उपास्यतत्त्व एक ही है। उपासना
साधककी रुचि, विश्वास और योग्यताके अनुसार होती है। अतः साधकोंकी भिन्न-भिन्न रुचि, विश्वास और योग्यता होनेके
कारण उपासनाएँ भी भिन्न-भिन्न होती हैं। परन्तु सम्पूर्ण उपासनाओंसे अन्तमें एक ही उपास्यतत्त्वकी प्राप्ति होती है। उस
उपास्यतत्त्वको ही “समग्र ब्रह्म” कहते हैं।
2-अद्वैतवीथीपथिकैरुपास्याः स्वाराज्यसिंहासनलब्धदीक्षाः। शठेन केनापि वयं हठेन दासीकृता गोपवधूविटेन॥
“अद्वैतमार्गके अनुयायियोंद्वारा पूज्य तथा स्वाराज्यरूपी सिंहासनपर प्रतिष्ठित होनेका अधिकार प्राप्त किये हुए हमें
गोपियोंके पीछे-पीछे फिरनेवाले किसी धूर्तने हठपूर्वक अपने चरणोंका गुलाम बना लिया!”
* “अध्यात्म” से ज्ञानयोग और “कर्म” से कर्मयोग लेना चाहिये। ज्ञानयोग और कर्मयोग—दोनोंसे “ब्रह्म” की प्राप्ति होती
है (गीता—पाँचवें अध्यायका चौथा-पाँचवाँ श्लोक)।
भक्तिका प्रसंग होनेसे यहाँ भगवान्ने ज्ञानयोग और कर्मयोगका विस्तारसे वर्णन नहीं किया। इनका विस्तारसे वर्णन
पिछले (दूसरेसे छठे) अध्यायोंमें कर चुके हैं।
1-यहाँ “पवित्रमिह” के अन्तर्गत आया “इह” शब्द लोकका वाचक है।
2-बँध्यो बिषय सनेह ते, ताते कहियै जीव। अलख अजोणी आप है, हरिया न्यारौ थीव॥
3-लोकमें होनेवाले सकाम-कर्म—“यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।” (गीता 3। 9), “क्षिप्रं हि मानुषे लोके
सिद्धिर्भवति कर्मजा॥” (गीता 4। 12); “कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके” (गीता 15। 2)।
लोकमें होनेवाले निष्काम-कर्म—“लोकेऽस्मिन्द्विविधा ........ योगिनाम्॥” (गीता 3। 3)।
वास्तवमें कर्म सकाम या निष्काम नहीं होते, प्रत्युत कर्ता सकाम या निष्काम होता है। अतः सकाम-निष्कामभाव
कर्तामें रहते हैं।
1-मनसा वचसा दृष्ट्या गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियैः। अहमेव न मत्तोऽन्यदिति बुध्यध्वमंजसा॥
(श्रीमद्भा0 11। 13। 24)
“मनसे, वाणीसे, दृष्टिसे तथा अन्य इन्द्रियोंसे भी जो कुछ ग्रहण किया जाता है, वह सब मैं ही हूँ। अतः मेरे सिवाय
और कुछ भी नहीं है—यह सिद्धान्त आपलोग विचारपूर्वक शीघ्र समझ लें, स्वीकार कर लें।
2-“नानाविधानि दिव्यानि” (गीता 11। 5), “अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्” (11। 10), “दिव्यमाल्याम्बरधरं
दिव्यगन्धानुलेपनम्” (11। 11), “पश्यामि देवांस्तव देव देहे......सर्वानुरगांश्च दिव्यान्” (11। 15)।
3-भगवान्के वचन हैं—“इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं...... मम देहे” (11। 7)।
संजयके वचन हैं—“तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं...... अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे” (11। 13)।
अर्जुनके वचन हैं—“पश्यामि देवांस्तव देव देहे” (11। 15)।
4-खं वायुमग्निं सलिलं महीं च
ज्योतींषि सत्त्वानि दिशो द्रुमादीन्।
सरित्समुद्रांश्च
हरेः
शरीरं
यत् किंच भूतं प्रणमेदनन्यः॥
(श्रीमद्भा0 11। 2। 41)
“आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, ग्रह-नक्षत्र, जीव-जन्तु, दिशाएँ, वृक्ष, नदियाँ, समुद्र—सब-के-सब भगवान्के
ही शरीर हैं—ऐसा मानकर भक्त सभीको अनन्यभावसे प्रणाम करता है।”
भूद्वीपवर्षसरिदद्रिनभःसमुद्रपातालदिङ्नरकभागणलोकसंस्था
गीता मया तव नृपाद्भुतमीश्वरस्य स्थूलं वपुः सकलजीवनिकायधाम॥
(श्रीमद्भा0 5। 26। 40)
“परीक्षित्! मैंने तुमसे पृथ्वी, उसके अन्तर्गत द्वीप, वर्ष, नदी, पर्वत, आकाश, समुद्र, पाताल, दिशा, नरक, ज्योतिर्गण
और लोकोंकी स्थितिका वर्णन किया। यही भगवान्का अति अद्भुत स्थूल रूप है, जो समस्त जीवसमुदायका आश्रय है।”
5-अर्जुनने भी विभूतियोंको दिव्य कहा है—“वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः” (10। 16)।
द्वा
सुपर्णा
सयुजा
सखाया
समानं
वृक्षं
परिषस्वजाते।
तयोरन्यः
पिप्पलं
स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो
अभिचाकशीति॥
(मुण्डक0 3। 1। 1; श्वेताश्वतर0 4। 6)
6-“एक साथ रहनेवाले तथा परस्पर सखाभाव रखनेवाले दो पक्षी—जीवात्मा और परमात्मा एक ही वृक्ष—शरीरका
आश्रय लेकर रहते हैं। उन दोनोंमेंसे एक (जीवात्मा) तो उस वृक्षके कर्मफलोंका स्वाद ले-लेकर उपभोग करता है, पर दूसरा
(परमात्मा) उपभोग न करता हुआ केवल प्रकाशित करता है।”
* भगवान् कार्यरूपमें परिणत नहीं होते, प्रत्युत कार्यरूपसे प्रकट होते हैं।
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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः॥
7.1साधक-संजीवनी