ग्रन्थ
7ज्ञानविज्ञानयोग

ज्ञानविज्ञानयोग

Jnana-Vijnana-Yoga
Knowledge and Realisation
30 verses · 30 printed blockspp. 196210 · Srimad Bhagavad Gita Shankarabhashyaसाधारण भाषाटीका 29 · साधक-संजीवनी 29 · श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्य 30 · श्रीमद्भगवद्गीता — तत्त्वविवेचनी टीका 29
1श्रीभगवान्
श्रीभगवान् उवाच
श्रीभगवानुवाच— मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः। असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥ 1॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

“योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।

श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥”

इति प्रश्नबीजम् उपन्यस्य स्वयम् एव ईदृशं मदीयं तत्त्वम् एवं मद्गतान्तरात्मा स्याद् इति एतद् विवक्षुः—

हिन्दी

“योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना। श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥”

इस श्लोकद्वारा छठे अध्यायके अन्तमें प्रश्नके बीजकी स्थापना करके फिर स्वयं ही “ऐसा मेरा तत्त्व है” “इस प्रकार मुझमें स्थित अन्तरात्मावाला हो जाना चाहिये” इत्यादि बातोंका वर्णन करनेकी इच्छावाले भगवान् बोले—

भाष्य
संस्कृत

मयि वक्ष्यमाणविशेषणे परमेश्वरे आसक्तं मनो यस्य स मय्यासक्तमना हे पार्थ, योगं युञ्जन् मनःसमाधानं कुर्वन् मदाश्रयः अहम् एव परमेश्वर आश्रयो यस्य स मदाश्रयः।

यो हि कश्चित् पुरुषार्थेन केनचिद् अर्थी भवति स तत्साधनं कर्म अग्निहोत्रादि तपो दानं वा किञ्चिद् आश्रयं प्रतिपद्यते। अयं तु योगी माम् एव आश्रयं प्रतिपद्यते हित्वा अन्यत् साधनान्तरं मयि एव आसक्तमना भवति।

यः त्वम् एवम्भूतः सन् असंशयं समग्रं समस्तं विभूतिबलशक्त्यैश्वर्यादिगुणसम्पन्नं मां यथा येन प्रकारेण ज्ञास्यसि संशयम् अन्तरेण एवम् एव भगवान् इति तत् शृणु उच्यमानं मया॥ 1॥

हिन्दी

आगे कहे जानेवाले विशेषणोंसे युक्त मुझ परमेश्वर-में ही जिसका मन आसक्त हो, वह “मय्यासक्तमना” है और मैं परमेश्वर ही जिसका (एकमात्र) अवलम्बन हूँ वह “मदाश्रय” है, हे पार्थ ! ऐसा “मय्यासक्तमना” और “मदाश्रय” होकर तू योगका साधन करता हुआ अर्थात् मनको ध्यानमें स्थित करता हुआ (जिस प्रकार मुझको संशयरहित समग्ररूपसे जानेगा सो सुन—)

जो कोई (धर्मादि पुरुषार्थोंमेंसे) किसी पुरुषार्थका चाहनेवाला होता है, वह उसके साधनरूप अग्निहोत्रादि कर्म, तप या दानरूप किसी एक आश्रयको ग्रहण किया करता है, परंतु यह योगी तो अन्य साधनोंको छोड़कर केवल मुझको ही आश्रयरूपसे ग्रहण करता है और मुझमें ही आसक्तचित्त होता है।

इसलिये तू उपर्युक्त गुणोंसे सम्पन्न होकर विभूति, बल, ऐश्वर्य आदि गुणोंसे सम्पन्न मुझ समग्र परमेश्वरको जिस प्रकार संशयरहित जानेगा कि “भगवान् निस्सन्देह ठीक ऐसा ही है,” वह प्रकार मैं तुझसे कहता हूँ, सुन॥ 1॥

2
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः। यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥ 2॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

तत् च मद्विषयम्—

हिन्दी

वहीं यह अपने स्वरूपका—

भाष्य
संस्कृत

ज्ञानं ते तुभ्यम् अहं सविज्ञानं विज्ञानसहितं स्वानुभवसंयुक्तम् इदं वक्ष्यामि कथयिष्यामि अशेषतः कार्त्स्न्येन।

तद् ज्ञानं विवक्षितं स्तौति श्रोतुः अभिमुखीकरणाय।

यद् ज्ञात्वा यद् ज्ञानं ज्ञात्वा न इह भूयः पुनः ज्ञातव्य पुरुषार्थसाधनम् अवशिष्यते, न अवशेषो भवति इति मत्तत्त्वज्ञो यः स सर्वज्ञो भवति इत्यर्थः।

अतो

विशिष्टफलत्वाद्

दुर्लभं ज्ञानम्॥ 2॥

हिन्दी

ज्ञान मैं तुझे विज्ञानके सहित अर्थात् अपने अनुभवके सहित निःशेषतः—सम्पूर्णतासे कहूँगा।

श्रोताको सम्मुख अर्थात् सावधान करनेके लिये जिसका वर्णन करना है उस ज्ञानकी स्तुति करते हैं।

जिस ज्ञानको जान लेनेपर फिर इस जगत्में पुरुषार्थका कोई साधन जानना शेष नहीं रहता अर्थात् जो मेरे तत्त्वको जाननेवाला है वह सर्वज्ञ हो जाता है। अतः यह ज्ञान अति उत्तम फलवाला होनेके कारण दुर्लभ है॥ 2॥

3
मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये। यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः॥ 3॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

कथम् इति उच्यते—

हिन्दी

यह (दुर्लभ) कैसे है? सो कहते हैं—

भाष्य
संस्कृत

मनुष्याणां मध्ये सहस्त्रेषु अनेकेषु कश्चिद् यतति प्रयत्नं करोति सिद्धये सिद्ध्यर्थम्, तेषां यतताम् अपि सिद्धानां सिद्धा एव हि ते ये मोक्षाय यतन्ते तेषां कश्चिद् एव मां वेत्ति तत्त्वतो यथावत्॥ 3॥

हिन्दी

हजारों मनुष्योंमें कोई एक ही (मोक्षरूप) सिद्धिके लिये प्रयत्न करता है और उन यत्न करनेवाले सिद्धोंमें भी—जो मोक्षके लिये यत्न करते हैं वे (एक तरहसे) सिद्ध ही हैं उनमें भी—कोई एक ही मुझे तत्त्वसे— यथार्थ जान पाता है॥ 3॥

4
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥ 4॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

श्रोतारं प्ररोचनेन अभिमुखीकृत्य आह—

हिन्दी

इस प्रकार रुचि बढ़ाकर श्रोताको सम्मुख करके कहते हैं—

भाष्य
संस्कृत

भूमिः इति पृथिवीतन्मात्रम् उच्यते न स्थूला “भिन्ना प्रकृतिरष्टधा” इति वचनात्। तथा अबादयः अपि तन्मात्राणि एव उच्यन्ते।

आपः अनलो वायुः खं मन इति मनसः कारणम् अहङ्कारो गृह्यते। बुद्धिः इति अहङ्कार-कारणं महत्तत्त्वम्। अहङ्कार इति अविद्या-संयुक्तम् अव्यक्तम्।

यथा विषसंयुक्तम् अन्नं विषम् उच्यते एवम् अहङ्कारवासनावद् अव्यक्तं मूलकारणम् अहङ्कार इति उच्यते प्रवर्तकत्वाद् अहङ्कारस्य। अहङ्कार एव हि सर्वस्य प्रवृत्तिबीजं दृष्टं लोके।

इति इयं यथोक्ता प्रकृतिः मे मम ईश्वरी मायाशक्तिः अष्टधा भिन्ना भेदम् आगता॥ 4॥

हिन्दी

“भिन्ना प्रकृतिरष्टधा” वह कथन होनेके कारण यहाँ भूमि-शब्दसे पृथिवी-तन्मात्रा कही जाती है, स्थूल पृथ्वी नहीं; वैसे ही जल आदि तत्त्व भी तन्मात्रारूपसे ही कहे जाते हैं।

(इस प्रकार पृथ्वी,) जल, अग्नि, वायु और आकाश एवं मन—यहाँ मनसे उसके कारणभूत अहंकारका ग्रहण किया गया है—तथा बुद्धि अर्थात् अहंकारका कारण महत्तत्त्व और अहंकार अर्थात् अविद्यायुक्त अव्यक्त—मूलप्रकृति।

जैसे विषयुक्त अन्न भी विष ही कहा जाता है वैसे ही अहंकार और वासनासे युक्त अव्यक्त—मूल-प्रकृति भी “अहंकार” नामसे कही जाती है; क्योंकि अहंकार सबका प्रवर्तक है, संसारमें अहंकार ही सबकी प्रवृत्तिका बीज देखा गया है।

इस प्रकार यह उपर्युक्त प्रकृति अर्थात् मुझ ईश्वरकी मायाशक्ति आठ प्रकारसे भिन्न है—विभागको प्राप्त हुई है॥ 4॥

5
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्। जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥ 5॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
भाष्य
संस्कृत

अपरा न परा निकृष्टा अशुद्धा अनर्थकरी संसारबन्धनात्मिका इयम्।

इतः अस्या यथोक्तायाः तु अन्यां विशुद्धां प्रकृतिं मम आत्मभूतां विद्धि मे परां प्रकृष्टां जीवभूतां क्षेत्रज्ञलक्षणां प्राणधारणनिमित्तभूतां हे महाबाहो यया प्रकृत्या इदं धार्यते जगत् अन्तःप्रविष्टया॥ 5॥

हिन्दी

यह (उपर्युक्त) मेरी अपरा प्रकृति है अर्थात् परा नहीं, किंतु निकृष्ट है, अशुद्ध है और अनर्थ करनेवाली है एवं संसारबन्धनरूपा है।

और हे महाबाहो! इस उपर्युक्त प्रकृतिमें दूसरी जीवरूपा अर्थात् प्राणधारणकी निमित्त बनी हुई जो क्षेत्रज्ञरूपा प्रकृति है, अन्तरमें प्रवृष्ट हुई जिस प्रकृतिद्वारा यह समस्त जगत् धारण किया जाता है उसको तू मेरी परा प्रकृति जान अर्थात् उसे मेरी आत्मरूपा उत्तम और शुद्ध प्रकृति जान॥ 5॥

6
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय। अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा॥ 6॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
भाष्य
संस्कृत

एतद्योनीनि एते परापरे क्षेत्रक्षेत्रज्ञलक्षणे प्रकृती योनिः येषां भूतानां तानि एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणि इति एवम् उपधारय जानीहि।

यस्माद् मम प्रकृती योनिः कारणं सर्व-भूतानाम् अतः अहं कृत्स्नस्य समस्तस्य जगतः प्रभव उत्पत्तिः प्रलयो विनाशः तथा, प्रकृति-द्वयद्वारेण अहं सर्वज्ञ ईश्वरो जगतः कारणम् इत्यर्थः॥ 6॥

हिन्दी

यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञरूप दोनों “परा” और “अपरा” प्रकृति ही जिनकी योनि—कारण है ऐसे ये समस्त भूतप्राणी प्रकृतिरूप कारणसे ही उत्पन्न हुए हैं, ऐसा जान।

क्योंकि मेरी दोनों प्रकृतियाँ ही समस्त भूतोंकी योनि यानी कारण हैं, इसलिये समस्त जगत्का प्रभव—उत्पत्ति और प्रलय—विनाश मैं ही हूँ अर्थात् इन दोनों प्रकृतियोंद्वारा मैं सर्वज्ञ ईश्वर ही समस्त जगत्का कारण हूँ॥ 6॥

7
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय। मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥ 7॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

यतः तस्मात्—

हिन्दी

ऐसा होनेके कारण—

भाष्य
संस्कृत

मत्तः परमेश्वरात् परतरम् अन्यत् कारणान्तरं किञ्चिद् न अस्ति न विद्यते, अहम् एव जगत्कारणम् इत्यर्थः।

हे धनञ्जय यस्माद् एवं तस्माद् मयि परमेश्वरे सर्वाणि भूतानि सर्वम् इदं जगत् प्रोतम् अनुस्यूतम् अनुगतम् अनुविद्ध ग्रथितम् इत्यर्थः। दीर्घतन्तुषु पटवत् सूत्रे च मणिगणा इव॥ 7॥

हिन्दी

मुझ परमेश्वरसे परतर (अतिरिक्त) जगत्का कारण अन्य कुछ भी नहीं है अर्थात् मैं ही जगत्का एकमात्र कारण हूँ।

हे धनंजय! क्योंकि ऐसा है इसलिये यह सम्पूर्ण जगत् और समस्त प्राणी मुझ परमेश्वरमें, दीर्घ तन्तुओंमें वस्त्रकी भाँति तथा सूत्रमें मणियोंकी भाँति पिरोया हुआ—अनुस्यूत—अनुगत—बिंधा हुआ— गूँथा हुआ है॥ 7॥

8
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः। प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु॥ 8॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

केन केन धर्मेण विशिष्टे त्वयि सर्वम् इदं प्रोतम् इति उच्यते—

हिन्दी

यह समस्त जगत् किस-किस धर्मसे युक्त आपमें पिरोया हुआ है? इसपर कहते हैं—

भाष्य
संस्कृत

रसः अहम् अपां यः सारः स रसः तस्मिन् रसभूते मयि आपः प्रोता इत्यर्थः। एवं सर्वत्र।

यथा अहम् अप्सु रस एवं प्रभा अस्मि शशिसूर्ययोः। प्रणव ओङ्कारः सर्ववेदेषु तस्मिन् प्रणवभूते मयि सर्वे वेदाः प्रोताः।

तथा खे आकाशे शब्दः सारभूतः तस्मिन् मयि खं प्रोतम्।

तथा पौरुषं पुरुषस्य भावो यतः पुम्बुद्धिः नृषु तस्मिन् मयि पुरुषाः प्रोताः॥ 8॥

हिन्दी

जलमें मैं रस हूँ अर्थात् जलका जो सार है उसका नाम रस है उस रसरूप मुझ परमात्मामें समस्त जल पिरोया हुआ है। ऐसे ही और सबमें भी समझना चाहिये।

जैसे जलमें मैं रस हूँ, वैसे ही चन्द्रमा और सूर्यमें मैं प्रकाश हूँ। समस्त वेदोंमें मैं ओंकार हूँ अर्थात् उस ओंकाररूप मुझ परमात्मामें सब वेद पिरोये हुए हैं।

आकाशमें उसका सारभूत शब्द हूँ, अर्थात् उस शब्दरूप मुझ ईश्वरमें आकाश पिरोया हुआ है।

तथा पुरुषोंमें मैं पौरुष हूँ अर्थात् पुरुषोंमें जो पुरुषत्व है, जिससे उनको पुरुष समझा जाता है वह मैं हूँ, उस पौरुषरूप मुझ ईश्वरमें पुरुष पिरोये हुए हैं॥ 8॥

9
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ। जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु॥ 9॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
भाष्य
संस्कृत

पुण्यः सुरभिः गन्धः पृथिव्यां च अहं तस्मिन् मयि गन्धभूते पृथिवी प्रोता।

पुण्यत्वं गन्धस्य स्वभावत एव पृथिव्यां दर्शितम् अबादिषु रसादेः पुण्यत्वोपलक्षणार्थम्।

अपुण्यत्वं तु गन्धादीनाम् अविद्याधर्माद्यपेक्षं संसारिणां भूतविशेषसंसर्गनिमित्तं भवति।

तेजो दीप्तिः च अस्मि विभावसौ अग्नौ। तथा जीवनं सर्वभूतेषु येन जीवन्ति सर्वाणि भूतानि तद् जीवनम्। तपः च अस्मि तपस्विषु तस्मिन् तपसि मयि तपस्विनः प्रोताः॥ 9॥

हिन्दी

पृथिवीमें मैं पवित्र गन्ध—सुगन्ध हूँ अर्थात् उस सुगन्धरूप मुझ ईश्वरमें पृथिवी पिरोयी हुई है।

जल आदिमें रस आदिकी पवित्रताका लक्ष्य करानेके लिये यहाँ गन्धकी स्वाभाविक पवित्रता ही पृथिवीमें दिखलायी गयी है।

गन्ध-रस आदिमें जो अपवित्रता आ जाती है, वह तो सांसारिक पुरुषोंके अज्ञान और अधर्म आदिकी अपेक्षासे एवं भूतविशेषोंके संसर्गसे है (वह स्वाभाविक नहीं है)।

मैं अग्निमें प्रकाश हूँ तथा सब प्राणियोंमें जीवन हूँ अर्थात् जिससे सब प्राणी जीते हैं वह जीवन मैं हूँ और तपस्वियोंमें तप मैं हूँ अर्थात् उस तपरूप मुझ परमात्मामें (सब) तपस्वी पिरोये हुए हैं॥ 9॥

10
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्। बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्॥ 10॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
भाष्य
संस्कृत

बीजं प्ररोहकारणं मां विद्धि सर्वभूतानां हे पार्थ सनातनं चिरन्तनम्। किं च बुद्धिः विवेकशक्तिः अन्तःकरणस्य बुद्धिमतां विवेक-शक्तिमताम् अस्मि, तेजः प्रागल्भ्यं तद्वतां तेजस्विनाम् अहम्॥ 10॥

हिन्दी

हे पार्थ! मुझे तू सब भूतोंका सनातन—पुरातन बीज अर्थात् उनकी उत्पत्तिका मूल कारण जान। तथा मैं ही बुद्धिमानोंकी बुद्धि अर्थात् विवेक-शक्ति और तेजस्वियों अर्थात् प्रभावशाली पुरुषोंका तेज—प्रभाव हूँ॥ 10॥

11
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्। धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ॥ 11॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
भाष्य
संस्कृत

बलं सामर्थ्यम् ओजो बलवताम् अहम्। तत् बलं च कामरागविवर्जितम्।

कामः च रागः च कामरागौ कामः तृष्णा असन्निकृष्टेषु विषयेषु रागो रञ्जना प्राप्तेषु विषयेषु ताभ्यां विवर्जितं देहादिधारणमात्रार्थं बलम् अहम् अस्मि, न तु यत् संसारिणां तृष्णारागकारणम्।

किं च धर्माविरुद्धो धर्मेण शास्त्रार्थेन अविरुद्धो यः प्राणिषु भूतेषु कामो यथा देहधारण-मात्राद्यर्थः अशनपानादि विषयः कामः अस्मि हे भरतर्षभ॥ 11॥

हिन्दी

बलवानोंका जो कामना और आसक्तिसे रहित बल—ओज-सामर्थ्य है, वह मैं हूँ।

(अभिप्राय यह कि) अप्राप्त विषयोंकी जो तृष्णा है, उसका नाम “काम” है और प्राप्त विषयोंमें जो प्रीति—तन्मयता है, उसका नाम “राग” है, उन दोनोंसे रहित, केवल देह आदिको धारण करनेके लिये जो बल है, वह मैं हूँ। जो संसारी जीवोंका बल कामना और आसक्तिका कारण है, वह मैं नहीं हूँ।

तथा हे भरतश्रेष्ठ! प्राणियोंमें जो धर्मसे अविरुद्ध शास्त्रानुकूल कामना है,जैसे देहधारणमात्रके लिये खाने-पीनेकी इच्छा आदि, वह (इच्छारूप) काम भी मैं ही हूँ॥ 11॥

12
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये। मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि॥ 12॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

किं च—

हिन्दी

तथा—

भाष्य
संस्कृत

ये च एव सात्त्विकाः सत्त्वनिर्वृता भावाः पदार्था राजसा रजोनिर्वृताः तामसाः तमोनिर्वृताः च ये केचित् प्राणिनां स्वकर्मवशाद् जायन्ते भावाः तान् मत्त एव जायमानान् इति एवं विद्धि सर्वान् समस्तान् एव।

यद्यपि ते मत्तो जायन्ते तथापि न तु अहं तेषु तदधीनः तद्वशो यथा संसारिणः ते पुनः मयि मद्वशा मदधीनाः॥ 12॥

हिन्दी

जो सात्त्विक—सत्त्वगुणसे उत्पन्न हुए भाव— पदार्थ हैं और जो राजस—रजोगुणसे उत्पन्न हुए एवं तामस—तमोगुणसे उत्पन्न हुए भाव—पदार्थ हैं, उन सबको अर्थात् प्राणियोंके अपने कर्मानुसार ये जो कुछ भी भाव उत्पन्न होते हैं उन सबको तू मुझसे ही उत्पन्न हुए जान।

यद्यपि वे मुझसे उत्पन्न होते हैं तथापि मैं उनमें नहीं हूँ अर्थात् संसारी मनुष्योंकी भाँति मैं उनके वशमें नहीं हूँ, परंतु वे मुझमें हैं यानी मेरे वशमें हैं—मेरे अधीन हैं॥ 12॥

13
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्। मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्॥ 13॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

एवं भूतम् अपि परमेश्वरं नित्यशुद्धबुद्धमुक्त-स्वभावं सर्वभूतात्मानं निर्गुणं संसारदोषबीज-प्रदाहकारणं मां न अभिजानाति जगद् इति अनुक्रोशं दर्शयति भगवान्। तत् च किन्निमित्तं जगतः अज्ञानम् इति उच्यते—

हिन्दी

ऐसा जो साक्षात् परमेश्वर नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव एवं सब भूतोंका आत्मा गुणोंसे अतीत और संसाररूप दोषके बीजको भस्म करनेवाला मैं हूँ,उसको जगत् नहीं पहचानता! इस प्रकार भगवान् खेद प्रकट करते हैं और जगत्का यह अज्ञान किस कारणसे है, सो बतलाते हैं—

भाष्य
संस्कृत

त्रिभिः गुणमयैः गुणविकारै रागद्वेषमोहादि-प्रकारैः भावैः पदार्थैः एभिः यथोक्तैः सर्वम् इदं प्राणिजातं जगत् मोहितम् अविवेकताम् आपादितं सत् न अभिजानाति माम् एभ्यो यथोक्तेभ्यो गुणेभ्यः परं व्यतिरिक्तं विलक्षणं च अव्ययं व्ययरहितं जन्मादिसर्वभावविकार-वर्जितम् इत्यर्थः॥ 13॥

हिन्दी

गुणोंमें विकाररूप सात्त्विक, राजस और तामस इन तीनों भावोंसे अर्थात् उपर्युक्त राग, द्वेष और मोह आदि पदार्थोंसे यह समस्त जगत्—प्राणिसमूह मोहित हो रहा है अर्थात् विवेकशून्य कर दिया गया है, अतः इन उपर्युक्त गुणोंसे अतीत—विलक्षण, अविनाशी— विनाशरहित तथा जन्मादि सम्पूर्ण भाव-विकारोंसे रहित मुझ परमात्माको नहीं जान पाता॥ 13॥

14
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥ 14॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

कथं पुनः दैवीम् एतां त्रिगुणात्मिकां वैष्णवीं मायाम् अतिक्रामन्ति इति उच्यते—

हिन्दी

तो फिर इस देवसम्बन्धिनी त्रिगुणात्मिका वैष्णवी मायाको मनुष्य कैसे तरते हैं? इसपर कहते हैं—

भाष्य
संस्कृत

दैवी देवस्य मम ईश्वरस्य विष्णोः स्वभूता हि यस्माद् एषा यथोक्ता गुणमयी मम माया दुरत्यया दुःखेन अत्ययः अतिक्रमणं यस्या सा दुरत्यया। तत्र एवं सति सर्वधर्मान् परित्यज्य माम् एव मायाविनं स्वात्मभूतं सर्वात्मना ये प्रपद्यन्ते ते मायाम् एतां सर्वभूत-मोहिनीं तरन्ति अतिक्रामन्ति, संसारबन्धनाद् मुच्यन्ते इत्यर्थः॥ 14॥

हिन्दी

क्योंकि यह उपर्युक्त दैवी माया अर्थात् मुझ व्यापक ईश्वरकी निज शक्ति मेरी त्रिगुणमयी माया दुस्तर है अर्थात् जिससे पार होना बड़ा कठिन है, ऐसी है। इसलिये जो सब धर्मोंको छोड़कर अपने ही आत्मा मुझ मायापति परमेश्वरकी ही सर्वात्मभावसे शरण ग्रहण कर लेते हैं, वे सब भूतोंको मोहित करनेवाली इस मायासे तर जाते हैं—वे इसके पार हो जाते हैं अर्थात् संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं॥ 14॥

15
न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः। माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः॥ 15॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

यदि त्वां प्रपन्ना मायाम् एतां तरन्ति कस्मात् त्वाम् एव सर्वे न प्रपद्यन्ते, इति उच्यते—

हिन्दी

यदि आपके शरण हुए मनुष्य इस मायासे तर जाते हैं तो फिर सभी आपकी शरण क्यों नहीं लेते? इसपर कहते हैं—

भाष्य
संस्कृत

न मां परमेश्वरं दुष्कृतिनः पापकारिणो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमा नराणां मध्ये अधमा निकृष्टाः ते च मायया अपहृतज्ञानाः सम्मुषितज्ञाना आसुरं भावं हिंसानृतादिलक्षणम् आश्रिताः॥ 15॥

हिन्दी

जो कोई पापकर्म करनेवाले मूढ़ और नराधम हैं अर्थात् मनुष्योंमें अधम—नीच हैं एवं मायाद्वारा जिनका ज्ञान छीन लिया गया है वे हिंसा, मिथ्याभाषण आदि आसुरी भावोंके आश्रित हुए मनुष्य मुझ परमेश्वरकी शरणमें नहीं आते॥ 15॥

16
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन। आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥ 16॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

ये पुनः नरोत्तमाः पुण्यकर्माणः—

हिन्दी

परंतु जो पुण्यकर्म करनेवाले नरश्रेष्ठ हैं (वे क्या करते हैं सो बतलाते हैं—)

भाष्य
संस्कृत

चतुर्विधाः चतुष्प्रकारा भजन्ते सेवन्ते मां जनाः सुकृतिनः पुण्यकर्माणो हे अर्जुन। आर्त आर्तिपरिगृहीतः तस्करव्याघ्ररोगादिना अभिभूत आपन्नो जिज्ञासुः भगवत्तत्त्वं ज्ञातुम् इच्छति यः अर्थार्थी धनकामो ज्ञानी विष्णोः तत्त्ववित् च हे भरतर्षभ॥ 16॥

हिन्दी

हे भारत! आर्त अर्थात् चोर, व्याघ्र, रोग आदिके वशमें होकर किसी आपत्तिसे युक्त हुआ, जिज्ञासु अर्थात् भगवान्का तत्त्व जाननेकी इच्छावाला, अर्थार्थी यानी धनकी कामनावाला और ज्ञानी अर्थात् विष्णुके तत्त्वको जाननेवाला, हे अर्जुन! ये चार प्रकारके पुण्यकर्मकारी मनुष्य मेरा भजन-सेवन करते हैं॥ 16॥

17
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते। प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः॥ 17॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
भाष्य
संस्कृत

तेषां चतुर्णां मध्ये ज्ञानी तत्त्ववित् तत्त्व-वित्त्वाद् नित्ययुक्तो भवति एकभक्तिः च अन्यस्य भजनीयस्य अदर्शनाद् अतः स एकभक्तिः विशिष्यते, विशेषम् आधिक्यम् आपद्यते अति-रिच्यते इत्यर्थः।

प्रियो हि यस्माद् अहम् आत्मा ज्ञानिनः अतः तस्य अहम् अत्यर्थं प्रियः।

प्रसिद्धं हि लोके आत्मा प्रियो भवति इति। तस्माद् ज्ञानिनः आत्मत्वाद् वासुदेवः प्रियो भवति इत्यर्थः।

स च ज्ञानी मम वासुदेवस्य आत्मा एव इति मम अत्यर्थं प्रियः॥ 17॥

हिन्दी

उन चार प्रकारके भक्तोंमें जो ज्ञानी है अर्थात् यथार्थ तत्त्वको जाननेवाला है वह तत्त्ववेत्ता होनेके कारण सदा मुझमें स्थित है और उसकी दृष्टिमें अन्य किसी भजनेयोग्य वस्तुका अस्तित्व न रहनेके कारण वह केवल एक मुझ परमात्मामें ही अनन्य भक्तिवाला होता है। इसलिये वह अनन्य प्रेमी (ज्ञानी भक्त) श्रेष्ठ माना जाता है। (अन्य तीनोंकी अपेक्षा) अधिक— उच्च कोटिका समझा जाता है।

क्योंकि मैं ज्ञानीका आत्मा हूँ इसलिये उसको अत्यन्त प्रिय हूँ।

संसारमें यह प्रसिद्ध ही है कि आत्मा ही प्रिय होता है। इसलिये ज्ञानीका आत्मा होनेके कारण भगवान् वासुदेव उसे अत्यन्त प्रिय होता है। यह अभिप्राय है।

तथा वह ज्ञानी भी मुझ वासुदेवका आत्मा ही है, अतः वह मेरा अत्यन्त प्रिय है॥ 17॥

18
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्। आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्॥ 18॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

न तर्हि आर्तादयः त्रयो वासुदेवस्य प्रियाः। न, किं तर्हि—

हिन्दी

तो फिर क्या आर्त आदि तीन प्रकारके भक्त आप वासुदेवके प्रिय नहीं हैं? यह बात नहीं, तो क्या बात है?

भाष्य
संस्कृत

उदारा उत्कृष्टाः सर्व एव एते त्रयः अपि मम प्रिया एव इत्यर्थः। न हि कश्चिद् मद्भक्तो मम वासुदेवस्य अप्रियो भवति, ज्ञानी तु अत्यर्थं प्रियो भवति इति विशेषः।

तत् कस्माद् इति आह—

ज्ञानी तु आत्मा एव न अन्यो मत्त इति मे मम मतं निश्चयः। आस्थित आरोढुं प्रवृत्तः स ज्ञानी हि यस्माद् अहम् एव भगवान् वासुदेवो न अन्यः अस्मि इति एवं युक्तात्मा समाहितचित्तः सन् माम् एव परं ब्रह्म गन्तव्यम् अनुत्तमां गतिं गन्तुं प्रवृत्त इत्यर्थः॥ 18॥

हिन्दी

ये सभी भक्त उदार हैं, श्रेष्ठ हैं। अर्थात् वे तीनों भी मेरे प्रिय ही हैं। क्योंकि मुझ वासुदेवको अपना कोई भी भक्त अप्रिय नहीं होता, परंतु ज्ञानी मुझे अत्यन्त प्रिय होता है इतनी विशेषता है।

ऐसा क्यों है सो कहते हैं—

ज्ञानी तो मेरा स्वरूप ही है, वह मुझसे अन्य नहीं है, यह मेरा निश्चय है, क्योंकि वह योगारूढ़ होनेके लिये प्रवृत्त हुआ ज्ञानी “स्वयं मैं ही भगवान् वासुदेव हूँ, दूसरा नहीं” ऐसा युक्तात्मा—समाहितचित्त होकर मुझ परम प्राप्तव्य गतिस्वरूप परब्रह्ममें ही आनेके लिये प्रवृत्त है॥ 18॥

19
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते। वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥ 19॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

ज्ञानी पुनः अपि स्तूयते—

हिन्दी

फिर भी ज्ञानीकी स्तुति करते हैं—

भाष्य
संस्कृत

बहूनां जन्मनां ज्ञानार्थसंस्कारार्जनाश्रयाणाम् अन्ते समाप्तौ ज्ञानवान् प्राप्तपरिपाकज्ञानो मां वासुदेवं प्रत्यगात्मानं प्रत्यक्षतः प्रपद्यते। कथम्, वासुदेवः सर्वम् इति।

य एवं सर्वात्मानं मां प्रतिपद्यते स महात्मा न तत्समः अन्यः अस्ति अधिको वा। अतः सुदुर्लभः स मनुष्याणां सहस्त्रेषु इति उक्तम्॥ 19॥

हिन्दी

ज्ञानप्राप्तिके लिये जिनमें संस्कारोंका संग्रह किया जाय ऐसे बहुत-से जन्मोंका अन्त—समाप्ति होनेपर (अन्तिम जन्ममें) परिपक्व ज्ञानको प्राप्त हुआ ज्ञानी अन्तरात्मारूप मुझ वासुदेवको “सब कुछ वासुदेव ही है” इस प्रकार प्रत्यक्षरूपसे प्राप्त होता है।

जो इस प्रकार सर्वात्मरूप मुझ परमात्माको प्रत्यक्षरूपसे प्राप्त हो जाता है, वह महात्मा है; उसके समान या उससे अधिक और कोई नहीं है, अतः कहा है कि हजारों मनुष्योंमें भी ऐसा पुरुष अत्यन्त दुर्लभ है॥ 19॥

20
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः। तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया॥ 20॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

आत्मा एव सर्वं वासुदेव इति एवम् अप्रतिपत्तौ कारणम् उच्यते—

हिन्दी

“यह सर्व जगत् आत्मस्वरूप वासुदेव ही है” इस प्रकार न समझमें आनेका कारण बतलाते हैं—

भाष्य
संस्कृत

कामैः तैः तैः पुत्रपशुस्वर्गादिविषयैः हृतज्ञाना अपहृतविवेकविज्ञानाः प्रपद्यन्ते अन्यदेवताः प्राप्नुवन्ति वासुदेवाद् आत्मनः अन्या देवताः तं तं नियमं देवताराधने प्रसिद्धो यो यो नियमः तं तम् आस्थाय आश्रित्य प्रकृत्या स्वभावेन जन्मान्तरार्जितसंस्कारविशेषेण नियता नियमिताः स्वया आत्मीयया॥ 20॥

हिन्दी

पुत्र, पशु, स्वर्ग आदि भोगोंकी प्राप्तिविषयक नाना कामनाओंद्वारा जिनका विवेक-विज्ञान नष्ट हो चुका है वे लोग अपनी प्रकृतिसे अर्थात् जन्म-जन्मान्तरमें इकट्ठे किये हुए संस्कारोंके समुदायरूप स्वभावसे प्रेरित हुए अन्य देवताओंको अर्थात् आत्मस्वरूप मुझ वासुदेवसे भिन्न जो देवता हैं, उनको, उन्हींकी आराधनाके लिये जो-जो नियम प्रसिद्ध हैं उनका अवलम्बन करके भजते हैं अर्थात् उनकी शरण लेते हैं॥ 20॥

21
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति। तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्॥ 21॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

तेषां च कामिनाम्—

हिन्दी

उन कामी पुरुषोंमेंसे—

भाष्य
संस्कृत

यो यः कामी यां यां देवतातनुं श्रद्धया संयुक्तो भक्तः च सन् अर्चितुं पूजयितुम् इच्छति, तस्य तस्य कामिनः अचलां स्थिरां श्रद्धां ताम् एव विदधामि स्थिरीकरोमि।

यया एव पूर्वं प्रवृत्तः स्वभावतो यो यां देवतातनुं श्रद्धया अर्चितुम् इच्छति इति॥ 21॥

हिन्दी

जो-जो सकाम भक्त जिस-जिस देवताके स्वरूपका श्रद्धा और भक्तियुक्त होकर अर्चन-पूजन करना चाहता है, उस-उस भक्तकी देवताविषयक उस श्रद्धाको मैं अचल—स्थिर कर देता हूँ।

अभिप्राय यह कि जो पुरुष पहले स्वभावसे ही प्रवृत्त हुआ जिस श्रद्धाद्वारा जिस देवताके स्वरूपका पूजन करना चाहता है (उस पुरुषकी उसी श्रद्धाको मैं स्थिर कर देता हूँ)॥ 21॥

22
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्या राधनमीहते। लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्॥ 22॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
भाष्य
संस्कृत

स तया मद्विहितया श्रद्धया युक्तः सन् तस्या देवतातन्वा राधनम् आराधनम् ईहते चेष्टते।

लभते च ततः तस्या आराधिताया देवता-तन्वाः कामान् ईप्सितान् मया एव परमेश्वरेण सर्वज्ञेन कर्मफलविभागज्ञतया विहितान् निर्मितान् तान् हि यस्मात् ते भगवता विहिताः कामाः तस्मात् तान् अवश्यं लभते इत्यर्थः।

हितान् इति पदच्छेदे हितत्वं कामानाम् उपचरितं कल्प्यं न हि कामा हिताः कस्यचित्॥ 22॥

हिन्दी

मेरे द्वारा स्थिर की हुई उस श्रद्धासे युक्त हुआ वह उसी देवताके स्वरूपकी सेवा—पूजा करनेमें तत्पर होता है।

और उस आराधित देवविग्रहसे कर्म-फल-विभागके जाननेवाले मुझ सर्वज्ञ ईश्वरद्वारा निश्चित किये हुए इष्ट भोगोंको प्राप्त करता है। वे भोग परमेश्वरद्वारा निश्चित किये होते हैं इसलिये वह उन्हें अवश्य पाता है, यह अभिप्राय है।

यहाँपर यदि “हितान्” ऐसा पदच्छेद करें तो भोगोंमें जो “हितत्व” है उसको औपचारिक समझना चाहिये, क्योंकि वास्तवमें भोग किसीके लिये भी हितकर नहीं हो सकते॥ 22॥

23
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्। देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि॥ 23॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
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संस्कृत

यस्माद् अन्तवत्साधनव्यापारा अविवेकिनः कामिनः च ते अतः—

हिन्दी

क्योंकि वे कामी और अविवेकी पुरुष विनाशशील साधनकी चेष्टा करनेवाले होते हैं, इसलिये—

भाष्य
संस्कृत

अन्तवद् विनाशि तु फलं तेषां तद् भवति अल्पमेधसाम् अल्पप्रज्ञानाम्, देवान् देवयजो यान्ति देवान् यजन्ति इति देवयजः ते देवान् यान्ति। मद्भक्ता यान्ति माम् अपि।

एवं समाने अपि आयासे माम् एव न प्रपद्यन्ते अनन्तफलाय अहो खलु कष्टं वर्तन्ते, इति अनुक्रोधं दर्शयति भगवान्॥ 23॥

हिन्दी

उन अल्पबुद्धिवालोंका वह फल नाशवान्— विनाशशील होता है। देवयाजी अर्थात् जो देवोंका पूजन करनेवाले हैं वे देवोंको पाते हैं और मेरे भक्त मुझको ही पाते हैं।

अहो! बड़े दुःखकी बात है कि इस प्रकार समान परिश्रम होनेपर भी लोग अनन्त फलकी प्राप्तिके लिये केवल मुझ परमेश्वरकी ही शरणमें नहीं आते। इस प्रकार भगवान् करुणा प्रकट करते हैं॥ 23॥

24
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः। परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्॥ 24॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
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संस्कृत

किन्निमित्तं माम् एव न प्रपद्यन्ते इति उच्यते—

हिन्दी

वे मुझ परमेश्वरकी ही शरणमें क्यों नहीं आते, सो बतलाते हैं—

भाष्य
संस्कृत

अव्यक्तम् अप्रकाशं व्यक्तिम् आपन्नं प्रकाशं गतम् इदानीं मन्यन्ते मां नित्यप्रसिद्धम् ईश्वरम् अपि सन्तम् अबुद्धयः अविवेकिनः परं भावं परमात्मस्वरूपम् अजानन्तः अविवेकिनो मम अव्ययं व्ययरहितम् अनुत्तमं निरतिशयं मदीयं भावम् अजानन्तो मन्यन्ते इत्यर्थः॥ 24॥

हिन्दी

मेरे अविनाशी निरतिशय परम भावको अर्थात् परमात्मस्वरूपको न जाननेवाले बुद्धिरहित—विवेक-हीन मनुष्य मुझको, यद्यपि मैं नित्य-प्रसिद्ध सबका ईश्वर हूँ तो भी, ऐसा समझते हैं कि यह पहले प्रकट नहीं थे, अब प्रकट हुए हैं। अभिप्राय यह कि मेरे वास्तविक प्रभावको न समझनेके कारण वे ऐसा मानते हैं॥ 24॥

25
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः। मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्॥ 25॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
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संस्कृत

तदीयम् अज्ञानं किन्निमित्तम् इति उच्यते—

हिन्दी

उनका वह अज्ञान किस कारणसे है? सो बतलाते हैं—

भाष्य
संस्कृत

न अहं प्रकाशः सर्वस्य लोकस्य केषाञ्चिद्। एव

मद्भक्तानां

प्रकाशः

अहम्

इति अभिप्रायः। योगमायासमावृतो योगो गुणानां युक्तिः घटनं सा एव माया योगमाया तया योगमायया समावृत्तः सञ्च्छन्न इत्यर्थः। अत एव मूढो लोकः अयं न अभिजानाति माम् अजम् अव्ययम्॥ 25॥

हिन्दी

तीनों गुणोंके मिश्रणका नाम योग है और वही माया है—उस योगमायासे आच्छादित हुआ मैं समस्त प्राणिसमुदायके लिये प्रकट नहीं रहता हूँ, अभिप्राय यह कि किन्हीं-किन्हीं भक्तोंके लिये ही मैं प्रकट होता हूँ। इसलिये यह मूढ़ जगत् (प्राणिसमुदाय) मुझ जन्मरहित अविनाशी परमात्माको नहीं जानता॥ 25॥

26
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन। भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन॥ 26॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
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संस्कृत

यया योगमायया समावृतं मां लोको न अभिजानाति, न असौ योगमाया मदीया सती मम ईश्वरस्य मायाविनो ज्ञानं प्रतिबध्नाति यथा अन्यस्य अपि मायाविनो माया ज्ञानं तद्वत्। यत एवम् अतः—

हिन्दी

जिस योगमायासे छिपे हुए मुझ परमात्माको संसार नहीं जानता, वह योगमाया, मेरी ही होनेके कारण मुझ मायापति ईश्वरके ज्ञानका प्रतिबन्ध नहीं कर सकती, जैसे कि अन्य मायावी (बाजीगर) पुरुषोंकी माया भी उनके ज्ञानको (आच्छादित नहीं करती) इसलिये—

भाष्य
संस्कृत

अहं तु वेद जाने समतीतानि समतिक्रान्तानि भूतानि वर्तमानानि च अर्जुन भविष्याणि च भूतानि वेद अहम्, मां तु वेद न कश्चन मद्भक्तं मच्छरणम् एकं मुक्त्वा मत्तत्त्ववेदनाभावाद् एव न मां भजते॥ 26॥

हिन्दी

हे अर्जुन! जो पूर्वमें हो चुके हैं उन प्राणियोंको एवं जो वर्तमान हैं और जो भविष्यमें होनेवाले हैं उन सब भूतोंको मैं जानता हूँ। परंतु मेरे शरणागत भक्तको छोड़कर मुझे और कोई भी नहीं जानता और मेरे तत्त्वको न जाननेके कारण ही (अन्य जन) मुझे नहीं भजते॥ 26॥

27
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत। सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप॥ 27॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
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संस्कृत

केन पुनः त्वत्तत्त्ववेदनप्रतिबन्धेन प्रतिबद्धानि सन्ति जायमानानि सर्वभूतानि त्वां न विदन्ति इति अपेक्षायाम् इदम् आह—

हिन्दी

आपका तत्त्व जाननेमें ऐसा कौन प्रतिबन्धक है, जिससे मोहित हुए सभी उत्पत्तिशील प्राणी आपको नहीं जान पाते? यह जाननेकी इच्छा होनेपर कहते हैं—

भाष्य
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संस्कृत

इच्छाद्वेषसमुत्थेन इच्छा च द्वेषः च इच्छाद्वेषौ ताभ्यां समुत्तिष्ठति इति इच्छाद्वेषसमुत्थः तेन इच्छाद्वेषसमुत्थेन।

केन इति विशेषापेक्षायाम् इदम् आह—

द्वन्द्वमोहेन द्वन्द्वनिमित्तो मोहो द्वन्द्वमोहः तौ एव इच्छाद्वेषौ शीतोष्णवत् परस्परविरुद्धौ सुखदुःखतद्धेतुविषयौ यथाकालं सर्वभूतैः सम्बध्यमानौ द्वन्द्वशब्देन अभिधीयेते। तत्र यदा इच्छाद्वेषौ सुखदुःखतद्धेतुसम्प्राप्त्या लब्धात्मकौ भवतः

तदा

तौ

सर्वभूतानां

प्रज्ञायाः स्ववशापादनद्वारेण

परमार्थात्मतत्त्वविषय-ज्ञानोत्पत्तिबन्धकारणं मोहं जनयतः।

न हि इच्छाद्वेषदोषवशीकृतचित्तस्य यथा-भूतार्थविषयज्ञानम् उत्पद्यते बहिः अपि किमु वक्तव्यं ताभ्याम् आविष्टबुद्धेः सम्मूढस्य प्रत्यगात्मनि बहुप्रतिबन्धे ज्ञानं च उत्पद्यते इति।

अतः तेन इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत भरतान्वयज सर्वभूतानि सम्मोहितानि सन्ति सम्मोह सम्मूढतां सर्गे जन्मनि उत्पत्तिकाले इति एतद् यान्ति गच्छन्ति हे परन्तप।

मोहवशानि एव सर्वभूतानि जायमानानि जायन्ते इति अभिप्रायः।

यत एवम् अतः तेन द्वन्द्वमोहेन प्रतिबद्ध-प्रज्ञानानि सर्वभूतानि सम्मोहितानि माम् आत्मभूतं न जानन्ति अत एव आत्मभावेन मां न भजन्ते॥ 27॥

हिन्दी

इच्छा और द्वेष इन दोनोंसे जो उत्पन्न होता है उसका नाम इच्छाद्वेषसमुत्थ है, उससे (प्राणी मोहित होते हैं।)

वह कौन है? ऐसी विशेष जिज्ञासा होनेपर यह कहते हैं—

द्वन्द्वोंके निमित्तसे होनेवाला जो मोह है उस द्वन्द्व-मोहसे (सब मोहित होते हैं)। शीत और उष्णकी भाँति परस्परविरुद्ध (स्वभाववाले) और सुख-दुःख तथा उनके कारणोंमें रहनेवाले वे इच्छा और द्वेष ही यथासमय सब भूतप्राणियोंसे सम्बन्धयुक्त होकर द्वन्द्व नामसे कहे जाते हैं। सो ये इच्छा और द्वेष, जब इस प्रकार सुख-दुःख और उनके कारणकी प्राप्ति होनेपर प्रकट होते हैं, तब वे सब भूतोंकी बुद्धिको अपने वशमें करके परमार्थ-तत्त्वविषयक ज्ञानकी उत्पत्तिका प्रतिबन्ध करनेवाले मोहको उत्पन्न करते हैं।

जिसका चित्त इच्छा-द्वेषरूप दोषोंके वशमें फँस रहा है, उसको बाहरी विषयोंके भी यथार्थ तत्त्वका ज्ञान प्राप्त नहीं होता, फिर उन दोनोंसे जिसकी बुद्धि आच्छादित हो रही है ऐसे मूढ़ पुरुषको अनेकों प्रतिबन्धोंवाले अन्तरात्माके सम्बन्धमें ज्ञान नहीं होता, इसमें तो कहना ही क्या है?

इसलिये हे भारत! अर्थात् भरतवंशमें उत्पन्न अर्जुन! उस इच्छा-द्वेष-जन्य द्वन्द्व-निमित्तक मोहके द्वारा मोहित हुए समस्त प्राणी, हे परंतप! जन्मकालमें— उत्पन्न होते ही मूढभावमें फँस जाते हैं।

अभिप्राय यह है कि उत्पत्तिशील समस्त प्राणी मोहके वशीभूत हुए ही उत्पन्न होते हैं।

ऐसा होनेके कारण द्वन्द्वमोहसे जिनका ज्ञान प्रतिबद्ध हो गया है वे मोहित हुए समस्त प्राणी अपने आत्मारूप मुझ (परमात्मा)-को नहीं जानते और इसीलिये वे आत्मभावसे मुझे नहीं भजते॥ 27॥

28
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्। ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥ 28॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

के पुनः अनेन द्वन्द्वमोहेन निर्मुक्ताः सन्तः त्वां विदित्वा यथाशास्त्रम् आत्मभावेन भजन्ते इति अपेक्षितम् अर्थं दर्शयितुम् उच्यते—

हिन्दी

तो फिर इस द्वन्द्वमोहसे छूटे हुए ऐसे कौन-से मनुष्य हैं जो आपको शास्त्रोक्त प्रकारसे आत्मभावसे भजते हैं? इस अपेक्षित अर्थको दिखानेके लिये कहते हैं—

भाष्य
संस्कृत

येषां तु पुनः अन्तगतं समाप्तप्रायं क्षीणं पापं जनानां पुण्यकर्मणां पुण्यं कर्म येषां सत्त्वशुद्धिकारणं विद्यते ते पुण्यकर्माणः तेषां पुण्यकर्मणाम्, ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता यथोक्तेन द्वन्द्वमोहेन निर्मुक्ता भजन्ते मां परमात्मानं दृढव्रताः, एवम् एव परमार्थतत्त्वं न अन्यथा इति एवं निश्चितविज्ञाना दृढव्रता उच्यन्ते॥ 28॥

हिन्दी

जिन पुण्यकर्मा पुरुषोंके पापोंका लगभग अन्त हो गया होता है, अर्थात् जिनके कर्म पवित्र यानी अन्तःकरणकी शुद्धिके कारण होते हैं वे पुण्यकर्मा हैं ऐसे उपर्युक्त द्वन्द्वमोहसे मुक्त हुए वे दृढ़व्रती पुरुष मुझ परमात्माको भजते हैं। “परमार्थतत्त्व ठीक इसी प्रकार है, दूसरी प्रकार नहीं” ऐसे निश्चित विज्ञानवाले पुरुष दृढ़व्रती कहे जाते हैं॥ 28॥

29
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये। ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्॥ 29॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
सम्बन्ध
संस्कृत

ते किमर्थं भजन्ते, इति उच्यते—

हिन्दी

वे किसलिये भजते हैं! सो कहते हैं—

भाष्य
संस्कृत

जरामरणमोक्षाय जरामरणमोक्षार्थं मां परमेश्वरम् आश्रित्य मत्समाहितचित्ताः सन्तो यतन्ति प्रयतन्ते ये ते यद् ब्रह्म परं तद् विदुः कृत्स्नं समस्तम् अध्यात्मं प्रत्यगात्मविषयं वस्तु तद् विदुः, कर्म च अखिलं समस्तं विदुः॥ 29॥

हिन्दी

जो पुरुष जरा और मृत्युसे छूटनेके लिये मुझ परमेश्वरका आश्रय लेकर अर्थात् मुझमें चित्तको समाहित करके प्रयत्न करते हैं, वे जो परब्रह्म है उसको जानते हैं एवं समस्त अध्यात्म अर्थात् अन्तरात्मविषयक वस्तुको और अखिल समस्त कर्मको भी जानते हैं॥ 29॥

30
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः। प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः॥ 30॥
श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्यAdi Shankaracharya
भाष्य
संस्कृत

साधिभूताधिदैवम् अधिभूतं च अधिदैवं च अधिभूताधिदैवं

सह

अधिभूताधिदैवेन साधिभूताधिदैवं च मां ये विदुः साधियज्ञं च सह अधियज्ञेन साधियज्ञं ये विदुः प्रयाणकाले अपि च मरणकाले अपि च मां ते विदुः युक्तचेतसः समाहितचित्ता इति॥ 30॥

हिन्दी

(इसी प्रकार) जो मनुष्य मुझ परमेश्वरको साधिभूताधिदैव अर्थात् अधिभूत और अधिदैवके सहित जानते हैं एवं साधियज्ञ अर्थात् अधियज्ञके सहित भी जानते हैं वे निरुद्ध-चित्त योगी लोग मरण-कालमें भी मुझे यथावत् जानते हैं॥ 30॥

7.1श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्य