ज्ञानविज्ञानयोग
सम्बन्ध—छठे अध्यायके अन्तिम श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि—“अन्तरात्माको मुझमें लगाकर जो श्रद्धा और प्रेमके साथ मुझको भजता है, वह सब प्रकारके योगियोंमें उत्तम योगी है।” परंतु भगवान्के स्वरूप, गुण और प्रभावको मनुष्य जबतक नहीं जान पाता, तबतक उसके द्वारा अन्तरात्मासे निरन्तर भजन होना बहुत कठिन है; साथ ही भजनका प्रकार जानना भी आवश्यक है। इसलिये अब भगवान् अपने गुण, प्रभावके सहित समग्र स्वरूपका तथा विविध प्रकारोंसे युक्त भक्तियोगका वर्णन करनेके लिये सातवें अध्यायका आरम्भ करते हैं और सबसे पहले दो श्लोकोंमें अर्जुनको उसे सावधानीके साथ सुननेके लिये प्रेरणा करके ज्ञान-विज्ञानके कहनेकी प्रतिज्ञा करते हैं—
सम्बन्ध—अपने समग्ररूपके ज्ञान-विज्ञानको कहनेकी प्रतिज्ञा करके अब भगवान् अपने उस स्वरूपको तत्त्वसे जाननेकी दुर्लभताका प्रतिपादन करते हैं—
सम्बन्ध—यहाँतक भगवान्ने अपने समग्र स्वरूपके ज्ञान-विज्ञान कहनेकी प्रतिज्ञा और उसकी प्रशंसा की, अब ज्ञान-विज्ञानके प्रकरणका आरम्भ करते हुए पहले अपनी “अपरा” और “परा” प्रकृतियोंका स्वरूप बतलाते हैं—
सम्बन्ध—परा और अपरा प्रकृतियोंका स्वरूप बतलाकर अब भगवान् यह बतलाते हैं कि ये दोनों प्रकृतियाँ ही चराचर सम्पूर्ण भूतोंका कारण हैं और मैं इन दोनों प्रकृतियोंसहित समस्त जगत्का महाकारण हूँ—
सम्बन्ध—इस प्रकार भगवान् ही समस्त विश्वके परम कारण और परमाधार हैं, तब स्वभावतः ही यह भगवान्का स्वरूप है और उन्हींसे व्याप्त है। अब इसी बातको स्पष्ट करनेके लिये भगवान् कहते हैं—
सम्बन्ध—सूत और सूतके मनियोंके दृष्टान्तसे भगवान्ने अपनी सर्वरूपता और सर्वव्यापकता सिद्ध की। अब भगवान् अगले चार श्लोकोंद्वारा इसीको भलीभाँति स्पष्ट करनेके लिये उन प्रधान-प्रधान सभी वस्तुओंके नाम लेते हैं, जिनसे इस विश्वकी स्थिति है; और साररूपसे उन सभीको अपनेसे ही ओत-प्रोत बतलाते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार प्रधान-प्रधान वस्तुओंमें साररूपसे अपनी व्यापकता बतलाते हुए भगवान्ने प्रकारान्तरसे समस्त जगत्में अपनी सर्वव्यापकता और सर्वस्वरूपता सिद्ध कर दी, अब अपनेको ही त्रिगुणमय जगत्का मूल कारण बतलाकर इस प्रसंगका उपसंहार करते हैं।
सम्बन्ध—भगवान्ने यह दिखलाया कि समस्त जगत् मेरा ही स्वरूप है और मुझसे ही व्याप्त है। यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि इस प्रकार सर्वत्र परिपूर्ण और अत्यन्त समीप होनेपर भी लोग भगवान्को क्यों नहीं पहचानते? इसपर भगवान् कहते हैं—
सम्बन्ध—भगवान्ने सारे जगत्को त्रिगुणमय भावोंसे मोहित बतलाया। इस बातको सुनकर अर्जुनको यह जाननेकी इच्छा हुई कि फिर इससे छूटनेका कोई उपाय है या नहीं? अन्तर्यामी दयामय भगवान् इस बातको समझकर अब अपनी मायाको दुस्तर बतलाते हुए उससे तरनेका उपाय सूचित कर रहे हैं—
सम्बन्ध—भगवान्ने मायाकी दुस्तरता दिखलाकर अपने भजनको उससे तरनेका उपाय बतलाया। इसपर यह प्रश्न उठता है कि जब ऐसी बात है तब सब लोग निरन्तर आपका भजन क्यों नहीं करते? इसपर भगवान् कहते हैं—
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने यह बतलाया कि पापात्मा आसुरी प्रकृतिवाले मूढ़लोग मेरा भजन नहीं करते। इससे यह जिज्ञासा होती है कि फिर कैसे मनुष्य आपका भजन करते हैं, इसपर भगवान् कहते हैं—
सम्बन्ध—चार प्रकारके भक्तोंकी बात कहकर अब उनमें ज्ञानी भक्तके प्रेमकी प्रशंसा और अन्यान्य भक्तोंकी अपेक्षा उसकी श्रेष्ठताका निरूपण करते हैं—
सम्बन्ध—भगवान्ने ज्ञानी भक्तको सबसे श्रेष्ठ और अत्यन्त प्रिय बतलाया। इसपर यह शंका हो सकती है कि क्या दूसरे भक्त श्रेष्ठ और प्रिय नहीं हैं? इसपर भगवान् कहते हैं—
सम्बन्ध—अब उस ज्ञानी भक्तकी दुर्लभता बतलानेके लिये भगवान् कहते हैं—
सम्बन्ध—पंद्रहवें श्लोकमें आसुरी प्रकृतिके दुष्कृती लोगोंके भगवान्को न भजनेकी और सोलहवेंसे उन्नीसवेंतक सुकृती पुरुषोंके द्वारा भगवान्को भजनेकी बात कही गयी। अब भगवान् उनकी बात कहते हैं जो सुकृती होनेपर भी कामनाके वश अपनी-अपनी प्रकृतिके अनुसार अन्यान्य देवताओंकी उपासना करते हैं—
सम्बन्ध—अब दो श्लोकोंमें देवोपासकोंको उनकी उपासनाका कैसे और क्या फल मिलता है, इसका वर्णन करते हैं—
सम्बन्ध—अब उपर्युक्त अन्य देवताओंकी उपासनाके फलको विनाशी बतलाकर भगवदुपासनाके फलकी महत्ताका प्रतिपादन करते हैं—
सम्बन्ध—जब भगवान् इतने प्रेमी और दयासागर हैं कि जिस-किसी प्रकारसे भी भजनेवालेको अपने स्वरूपकी प्राप्ति करा ही देते हैं तो फिर सभी लोग उनको क्यों नहीं भजते, इस जिज्ञासापर कहते हैं—
सम्बन्ध—इस प्रकार मनुष्यके रूपमें प्रकट सर्वशक्तिमान् परमेश्वरको लोग साधारण मनुष्य क्यों समझते हैं? इसपर कहते हैं—
सम्बन्ध—भगवान्ने अपनेको योगमायासे आवृत बतलाया। इससे कोई यह न समझ ले कि जैसे मोटे परदेके अंदर रहनेवालेको बाहरवाले नहीं देख सकते और वह बाहरवालोंको नहीं देख सकता, इसी प्रकार यदि लोग भगवान्को नहीं जानते तो भगवान् भी लोगोंको नहीं जानते होंगे—इसलिये और साथ ही यह दिखलानेके लिये कि योगमाया मेरे ही अधीन और मेरी ही शक्तिविशेष है, वह मेरे दिव्य ज्ञानको आवृत नहीं कर सकती, भगवान् कहते हैं—
सम्बन्ध—श्रद्धा-भक्तिरहित मूढ़ मनुष्योंमेंसे कोई भी भगवान्को नहीं जानता, इसमें क्या कारण है? यही बतलानेके लिये भगवान् कहते हैं—
सम्बन्ध—“भूतानि”के साथ “सर्व” शब्दका प्रयोग होनेसे ऐसा भ्रम हो सकता है कि सभी प्राणी द्वन्द्वमोहसे मोहित हो रहे हैं, कोई भी उससे बचा नहीं है, अतएव ऐसे भ्रमकी निवृत्तिके लिये भगवान् कहते हैं—
सम्बन्ध—अब भगवान्का भजन करनेवालोंके भजनका प्रकार और फल बतलाते हैं—